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पिता का दोस्त : भाग 3

कार रोक कर वीरेंद्र खुद भी पिछली सीट पर कनिका के दाईं ओर जा बैठा. फिर क्या था? दोनों मिल कर कनिका का दुपट्टा खींचने लगे और उस का गला कस कर हत्या कर दी.
हत्या करने के बाद लाश मेरठ की गंगनहर में फेंक कर वापस लौट आए और आराम से सो गए. अगले दिन वीरेंद्र अपने घर लौट गया था.उधर वेदप्रकाश सोच रहा था कि कनिका को मायके गए 24 घंटे बीत चुके थे लेकिन उस ने एक बार भी फोन नहीं किया था. जब वेदप्रकाश से रहा नहीं गया तो उस ने कनिका को फोन किया. काल खुद विजयपाल ने रिसीव की. उस ने विजयपाल को नमस्कार किया और कनिका से बात कराने का आग्रह किया तो विजयपाल ने कहा कि अभी वह सो रही है. इतना कह कर उस ने काल डिसकनेक्ट कर दी.

अगले दिन फिर वेदप्रकाश ने फोन किया और पत्नी से बात कराने के लिए कहा तो विजयपाल ने कह दिया कि वह बुआ के घर गई है, आते ही बात करा
दी जाएगी.इस के बाद उस ने 2 दिन बाद फिर से फोन कर के कनिका से बात कराने के लिए कहा लेकिन उसे हर बार टाल दिया जाता था.

इस पर वेदप्रकाश को कुछ शक हो गया तो इसी शक के आधार पर उस ने राई थाने जा कर पत्नी के साथ अनहोनी की रिपोर्ट दर्ज करा दी.रिपोर्ट दर्ज करने के बाद राई थाने की पुलिस मुकीमपुर पहुंची और विजयपाल से कनिका के बारे में पूछताछ की. तब वह इधरउधर की बातें करने लगा. शक होने पर पुलिस उसे पूछताछ के लिए थाने ले आई.

थानाप्रभारी वजीर सिंह ने जब उस से कड़ाई से पूछताछ की तो उस ने पुलिस के सामने सारी सच्चाई उगल दी कि उस ने अपने बुआ के पोते वीरेंद्र के साथ मिल कर कनिका की हत्या कर दी है और उस की लाश को गंगनहर में फेंक दिया है.

विजयपाल द्वारा अपना जुर्म कुबूल करने के बाद पुलिस ने दूसरे आरोपी वीरेंद्र को भी गिरफ्तार कर लिया. दोनों पर हत्या का मुकदमा दर्ज कर पुलिस लाश बरामद करने के लिए उन्हें गंगनहर, मेरठ ले गई.
पुलिस ने उन के द्वारा बताई गई जगह और अन्य जगहों पर जाल डाल कर और गोताखोरों के द्वारा कनिका की लाश ढूंढने की कोशिश की, लेकिन उस की लाश नहीं मिल सकी. फिर पुलिस ने दोनों आरोपियों को कोर्ट में पेश करने के बाद जेल भेज दिया गया.

अदालत में कनिका हत्याकांड का मुकदमा चल रहा था. वेदप्रकाश ने पत्नी के हत्यारों को कड़ी से कड़ी सजा दिलाने के लिए दिनरात एक कर दिया था. इधर विजयपाल वेदप्रकाश अदालत की पैरवी से बुरी तरह डर गया था कि कहीं उस के चलते उसे फांसी की सजा न हो जाए.

जेल में रहते हुए विजयपाल ने वेदप्रकाश को भी रास्ते से हटाने की योजना बनाई और उस ने इस काम के लिए अपने भांजे अंकुश और गांव के लड़के राहुल को लगा दिया.
राहुल ने मुजफ्फरनगर के एक परिचित से एक देशी तमंचा और एक पिस्टल खरीदा. इन असलहों को खरीदने के लिए पैसे की व्यवस्था विजयपाल ने ही की थी. फिर इन्हीं असलहों से राहुल और अंकुश ने 22 अप्रैल, 2022 को कोर्ट परिसर में उस समय गोली मार कर हत्या कर दी, जब वेदप्रकाश मुकदमे में गवाही देने जिला न्यायालय पहुंचा था.

इस तरह एक प्रेम कहानी का दर्दनाक अंत हो गया. कथा लिखे जाने तक पुलिस ने दोनों आरोपियों अंकुश और राहुल को भी गिरफ्तार कर जेल भेज दिया था. दोनों आरोपियों से हत्या में प्रयुक्त देशी तमंचा और पिस्टल बरामद कर ली थी.
पुलिस पूछताछ में विजयपाल ने वेदप्रकाश की हत्या कराने का अपना जुर्म कुबूल कर लिया था. चारों आरोपी विजयपाल, वीरेंद्र, राहुल और अंकुश जेल में बंद थे. द्य

गे संबंधों का लव ट्रायएंगल- भाग 1

मध्य प्रदेश के रायसेन जिले के औबेदुल्लागंज में रहने वाले पुराने कपड़ा व्यापारी देवेंद्र कोठारी का 45
वर्षीय एकलौता बेटा नीरज उर्फ मोनू रात को साढ़े 9 बजे अपनी स्कूटी से घर से यह कह कर निकला था कि ‘कुछ देर में घूम कर आता हूं.’मगर रात के 12 बज गए और नीरज घर नहीं लौटा. इंतजार करतेकरते नीरज की पत्नी शिवांजलि ने जब नीरज को फोन लगाया तो उस का फोन स्विच्ड औफ था.
शिवांजलि समझ नहीं पा रही थी कि पति का फोन बंद क्यों है. पति के बारे में सोचसोच कर बुरा हाल था. परेशान हो कर शिवांजलि ने अपने 15 वर्षीय बेटे को यह बात बताने के लिए अपने ससुर के कमरे में भेजा.

पोते से नीरज के अभी तक घर न पहुंचने की बात सुनते ही 70 साल के देवेंद्र कोठारी बेचैन हो गए. उन्हें यह बात समझ नहीं आ रही थी कि इतनी रात गए नीरज आखिर कहां गया होगा.निशांत भी पिता के दोस्तों को फोन लगा कर उन की जानकारी जुटाने की कोशिश करने लगा. काफी मशक्कत के बाद जब नीरज के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली तो आधी रात को ही दादा और पोते नीरज को खोजने निकल पड़े. यह बात 16 फरवरी, 2022 की है.

पूरी रात शहर में कई जगहों पर खोजबीन के बाद भी नीरज के बारे में कोई खबर नहीं मिली तो देवेंद्र कोठारी दूसरे दिन 17 फरवरी की सुबह औबेदुल्लागंज थाने पहुंच गए.उन्होंने टीआई संदीप चौरसिया को पूरे घटनाक्रम की जानकारी देते हुए नीरज की गुमशुदगी दर्ज करा दी. कुछ ही घंटों में नीरज के गायब होने की खबर सोशल मीडिया पर वायरल हो चुकी थी.नीरज के पिता शहर के पुराने कपड़ा व्यापारी थे. उन की अपनी खेती की जमीन होने के साथ ही नीरज प्रौपर्टी डीलर के तौर पर काम कर रहा था. नीरज के इस तरह गायब होने से लोग तरहतरह के कयास लगा रहे थे.

शहर में एक चर्चा यह भी थी कि नीरज जमीन में छिपी दौलत को खोजने के चक्कर में कहीं गया होगा. लोगों का यह अनुमान इसलिए भी था कि नीरज तंत्रमंत्र और ज्योतिषियों के चक्कर में पड़ कर बिना मेहनत किए दौलत कमाना चाहता था.कुछ साल पहले सड़क किनारे बैठने वाले किसी ज्योतिषी ने नीरज को बताया था कि उसे जमीन में गड़ा अकूत धन मिलेगा. तभी से नीरज इसी चक्कर में पड़ा रहता था. वह अकसर यही सोचता था कि कभी तो ज्योतिषी की भविष्यवाणी सच निकलेगी.

नीरज के इस तरह गायब होने की यह चर्चा बेवजह नहीं थी. 16 फरवरी को अमावस्या की रात थी और नीरज को घर से जूट के बोरे स्कूटी में रखते हुए उस के बेटे ने देखा था. इस वजह से लोगों का अनुमान था कि तंत्रमंत्र के जरिए जमीन में गड़े धन को बोरे में भर कर लाया जाएगा.नीरज की गुमशुदगी को टीआई संदीप चौरसिया ने गंभीरता से लेते हुए घटना की जानकारी रायसेन जिले के एसपी विकास कुमार सेहवाल, एडीशनल एसपी अमृत मीणा, एसडीपीओ मलकीत सिंह को दे दी और खुद नीरज की खोजबीन में जुट गए.

पुलिस अधिकारियों को यह भी शक था कि नीरज का कहीं अपहरण तो नहीं हो गया. क्योंकि नीरज के पिता औबेदुल्लागंज के करोड़पति कारोबारी हैं. पुलिस ने नीरज की गुमशुदगी की सूचना समीप के भोपाल, होशंगाबाद और विदिशा जिले के पुलिस थानों को भी दे दी. शहर में इस घटना को ले कर चर्चाओं का बाजार गर्म था और पुलिस अलगअलग एंगिल से मामले की जांच कर रही थी. औबेदुल्लागंज के एसडीपीओ मलकीतसिंह ने 4 पुलिस थानों की एक टीम जांच के लिए गठित की.

टीम को इलाके की तलाशी के दौरान 18 फरवरी को होशंगाबाद रोड पर बने शगुन वाटिका मैरिज गार्डन के पीछे रेल पटरियों के किनारे झाडि़यों में एक लाश मिल गई. लाश को आवारा कुत्तों ने नोच दिया था, जिस की वजह से पुलिस को शिनाख्त करने में मुश्किल हो रही थी.पुलिस टीम ने जब नीरज के घर वालों को घटनास्थल पर बुलाया तो कपड़ों के आधार पर घर वालों ने शव की पहचान कर बताया कि शव नीरज का ही है. नीरज की पत्नी और बेटे का रोरो कर बुरा हाल था. नीरज के पिता भी दुखी मन से बहू और पोते को ढांढस बंधा रहे थे. घटनास्थल पर भारी भीड़ जमा हो चुकी थी.

नीरज का शव अर्द्धनग्न अवस्था में मिला था, उस की पेंट और अंडरवियर कमर के नीचे घुटनों तक सरके हुए थे. शव की हालत देख कर पुलिस का शक अवैध संबंधों की वजह से हत्या की ओर जा रहा था.
नीरज का शव बरामद होने की सूचना मिलते ही रायसेन के एसपी के निर्देश पर एडीशनल एसपी अमृत मीणा घटनास्थल पर आ चुके थे. लाश का पंचनामा कर उसे पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया. औबेदुल्लागंज थाने के टीआई संदीप चौरसिया को जांच के दौरान कुछ लोगों ने बताया कि नीरज छोटी उम्र के लड़कों से दोस्ती रखने का शौकीन था और उन के साथ गे रिलेशनशिप रखता था. कुछ ही घंटों में पुलिस को कई लड़कों के नाम मिल गए, जिन से नीरज के गे संबंध थे.

शक के आधार पर कुछ लड़कों से पुलिस ने पूछताछ की तो पता चला कि पिछले कुछ महीनों से नीरज की दोस्ती 23 साल के मनोज कटारे और 17 साल के राजू (परिवर्तित नाम) से चल रही थी.
राजू को अकसर ही नीरज की स्कूटी पर बैठे देखा जाता था. मनोज और राजू रेलवे स्टेशन के पास एक नमकीन की दुकान पर काम करते थे. पुलिस ने जब मनोज और राजू की तलाश शुरू की तो पता चला कि 16 फरवरी के बाद वे दुकान ही नहीं पहुंचे.

पुलिस ने साइबर सेल की मदद से मनोज और राजू की मोबाइल लोकेशन की जांच की तो राजधानी भोपाल के नादिरा बसस्टैंड की मिल रही थी. पुलिस को अब पूरा यकीन हो गया था कि दोनों नीरज की हत्या कर भागने की फिराक में हैं.पुलिस की एक टीम तुरंत भोपाल के नादिरा भेजी गई, जहां से उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया. सख्ती से की गई पूछताछ में दोनों ने नीरज की हत्या करने की बात कुबूल कर ली. उस के बाद जो दिलचस्प कहानी सामने आई, वह ट्रायंगल गे रिलेशनशिप पर रचीबसी निकली

बिगड़ी लड़की : अजय से ड्राइविंग के बारे में कौन पूछ रहा था

एक दामाद और : पांच बेटी होने के बाद भी उसे कोई दिक्कत नहीं थी क्यों -भाग 2

‘‘क्यों?’’ नरेश ने चौंक कर कहा.

दूसरी तरफ से कई लोगों के खिल- खिलाने की आवाजें आईं, ‘‘जीजाजी… जीजाजी.’’

नरेश ने माथा पीट लिया. उर्मिला फोन करने पास की एक दुकान पर जाती थी. वह प्रति फोन 1 रुपया लेता था. सड़क पर आवाजें काफी आती थीं, इसलिए जोरजोर से बोलना पड़ता था. नरेश ने कह रखा था कि जब तक एकदम आवश्यक न हो यहां से फोन न करे. सब लोग दूरदूर तक सुनते हैं और मुसकराते हैं. उसे यह बिलकुल अच्छा नहीं लगता था और उस समय तो वहां पूरी बरात ही खड़ी थी. वह सोचने लगा, दुनिया भर को मालूम हो जाएगा कि वह पलटन के साथ फिल्म देखने जा रहा है. और तो और, ये सालियां क्या हैं एक से एक बढ़ कर पटाखा हैं, इन्हें फुलझडि़यां कहना तो इन का अपमान होगा.

‘‘ठीक है,’’ कह कर उस ने फोन पटक दिया. आगे बात करने का अवसर ही नहीं दिया. रूमाल निकाल कर माथे का पसीना पोंछने लगा. उसे याद था कि कैसे बड़ी कठिनाई से उस ने उर्मिला को टरकाया था, जब वह सब सालियों समेत दफ्तर आने की धमकी दे रही थी.

2 जने जाते तो 14 रुपए के टिकट आते. अब पूरे 42 रुपए के टिकट आएंगे. सालियां आइसक्रीम और पापकार्न खाए बिना नहीं मानेंगी. वैसे तो वह स्कूटर पर ही जाता, पर अब पूरी टैक्सी करनी पड़ेगी. उस का भी ड्योढ़ा किराया लगेगा. उस ने मन ही मन ससुर को गाली दी. घर में अच्छीखासी मोटर है. यह नहीं कि अपनी रेजगारी को आ कर ले जाएं. उसे स्वयं ही टैक्सी कर के घर छोड़ने भी जाना होगा. अभी तो महीना खत्म होने में पूरे 3 सप्ताह बाकी थे.

सालियां तो सालियां ठहरीं, पूरी फिल्म में एकदूसरी को कुहनी मारते हुए खिलखिला कर हंसती रहीं. आसपास वालों ने कई बार टोका. नरेश शर्म के मारे और कभी क्रोध से मुंह सी कर बैठा रहा. उस का एक क्षण भी जी न लगा. जैसेतैसे फिल्म समाप्त हुई तो वह बाहर आ कर टैक्सी ढूंढ़ने लगा.

‘‘सुनो,’’ उर्मिला ने कहा.

‘‘अब क्या हुआ?’’

‘‘देर हो गई है. इन्हें खाना खिला कर भेजूंगी. घर में तो 2 ही जनों का खाना है. होटल से कुछ खरीद कर घर ले चलें.’’

बड़ी साली ने इठला कर कहा, ‘‘जीजाजी, आप ने कभी होटल में खाना नहीं खिलाया. आज तो हम लोग होटल में ही खाएंगे. दीदी घर में कहां खाना बनाती फिरेंगी?’’

बाकी की सालियों ने राग पकड़ लिया, ‘‘होटल में खाएंगे. जीजाजी, आज होटल में खाना खिलाएंगे.’’

नरेश सुन्न सा खड़ा रहा

उर्मिला ने मुसकरा कर कहा, ‘‘हांहां, क्यों नहीं, शोर क्यों मचाती हो?’’ और फिर नरेश की ओर मुंह कर के बोली, ‘‘सुनो, आज इन का मन रख लो.’’

नरेश ने जेब की ओर इशारा करते हुए कहा, ‘‘रुपए हैं पास में? मेरे पास तो कुछ नहीं है.’’

उर्मिला ने पर्स थपथपाते हुए कहा, ‘‘काम चल जाएगा. यहीं ‘चाचे दा होटल’ में चले चलेंगे.’’

जब तक खाना खाते रहे पूरी फिल्म के संवाद दोहरादोहरा कर सब हंसी के मारे लोटपोट होते रहे. और जो लोग वहां खाना खा रहे थे वे खाना छोड़ कर इन्हें ही विचित्र नजरों से देख रहे थे. नरेश अंदर ही अंदर झुंझला रहा था.

टैक्सी में बिठा कर जब वह उन्हें घर छोड़ कर वापस आया तो उस ने उर्मिला से पूरा युद्ध करने की ठान ली थी. परंतु उस के खिलखिलाते संतुष्ट चेहरे को देख कर उस ने फिलहाल युद्ध को स्थगित रखने का ही निश्चय किया.

 

उलझन : शीला जीजी क्यों ताना मार रही थी-भाग 1

आश्चर्य में डूबी रश्मि मुझे ढूंढ़ती हुई रसोईघर में पहुंची तो उस की नाक ने उसे एक और आश्चर्य में डुबो दिया, ‘‘अरे वाह, कचौरियां, बड़ी अच्छी खुशबू आ रही है. किस के लिए बना रही हो, मां?’’

‘‘तेरे पिताजी के दोस्त आ रहे हैं आज,’’ उड़ती हुई दृष्टि उस के थके, कुम्हलाए चेहरे पर डाल मैं फिर चकले पर झुक गई.

‘‘कौन से दोस्त?’’ हाथ की किताबें बरतनों की अलमारी पर रखते हुए उस ने पूछा.

‘‘कोई पुराने साथी हैं कालिज के. मुंबई में रहते हैं आजकल.’’

जितनी उत्सुकता से उस के प्रश्न आ रहे थे, मैं उतनी ही सहजता से और संक्षेप में उत्तर दिए जा रही थी. डर रही थी, झूठ बोलते कहीं पकड़ी न जाऊं.

गरमागरम कचौरी का टुकड़ा तोड़ कर मुंह में ठूंसते हुए उस ने एक और तीर छोड़ा, ‘‘इतनी बढि़या कचौरियां आप ने हमारे लिए तो कभी नहीं बनाईं.’’

उस का फूला हुआ मुंह और उस के साथ उलाहना. मैं हंस दी, ‘‘लगता है, तेरे कालिज की कैंटीन में आज तेरे लिए कुछ नहीं बचा. तभी कचौरियों में ज्यादा स्वाद आ रहा है. वरना वही हाथ हैं और वही कचौरियां.’’

‘‘अच्छा, तो पिताजी के यह दोस्त कितने दिन ठहरेंगे हमारे यहां?’’ उस ने दूसरी कचौरी तोड़ कर मुंह में ठूंस ली थी.

‘‘ठहरे तो वह रमाशंकरजी के यहां हैं. उन से रिश्तेदारी है कुछ. तुम्हारे पिताजी ने तो उन्हें आज चाय पर बुलाया है. तू हाथ तो धो ले, फिर आराम से प्लेट में ले कर खाना. जरा सब्जी में भी नमक चख ले.’’

उस ने हाथ धो कर झरना मेरे हाथ से ले लिया, ‘‘वह सब चखनावखना बाद में होगा. पहले आप बेलबेल कर देती जाइए, मैं तलती जाती हूं. आशु नहीं आया अभी तक स्कूल से?’’

‘‘अभी से कैसे आ जाएगा? कोई तेरा कालिज है क्या, जो जब मन किया कक्षा छोड़ कर भाग आए? छुट्टी होगी, बस चलेगी, तभी तो आएगा.’’

‘‘तो हम क्या करें? अर्थशास्त्र के अध्यापक पढ़ाते ही नहीं कुछ. जब खुद ही पढ़ना है तो घर में बैठ कर क्यों न पढ़ें. कक्षा में क्यों मक्खियां मारें?’’ उस ने अकसर कक्षा छोड़ कर आने की सफाई पेश कर दी.

4 हाथ लगते ही मिनटों में फूलीफूली कचौरियों से परात भर गई थी. दहीबड़े पहले ही बन चुके थे. मिठाई इन से दफ्तर से आते वक्त लाने को कह दिया था.

‘‘अच्छा, ऐसा कर रश्मि, 2-4 और बची हैं न, मैं उतार देती हूं. तू हाथमुंह धो कर जरा आराम कर ले. फिर तैयार हो कर जरा बैठक ठीक कर ले. मुझे वे फूलवूल सजाने नहीं आते तेरी तरह. समझी? तब तक तेरे पिताजी और आशु भी आ जाएंगे.’’

‘‘अरे, सब ठीक है मां. मैं पहले ही देख आई हूं. एकदम ठीक है आप की सजावट. और फिर पिताजी के दोस्त ही तो आ रहे हैं, कोई समधी थोड़े ही हैं जो इतनी परेशान हो रही हो,’’ लापरवाही से मुझे आश्वस्त कर वह अपनी किताबें उठा कर रसोई से निकल गई. दूर से गुनगुनाने की आवाज आ रही थी, ‘रजनीगंधा फूल तुम्हारे, महके यों ही जीवन में…’

भाई ही बने जोरू और जमीन के प्यासे- भाग 2

इस मामले की हकीकत जानने के लिए पुलिस ने अखिलेश के छोटे भाई अनिल से पूछताछ की. तब अनिल ने बताया कि उस के भाई की दिमागी हालत सही नहीं थी. वह बहुत पहले से ही भाभी पर शक करता था.

कुछ समय पहले वह अखिलेश के साथ ही रहता था. देवरभाभी पर शक के कारण ही उस ने उसे अलग कर दिया था. जिस के बाद उस का उन से कोई लेनादेना नहीं था. उस के बाद पतिपत्नी के बीच ऐसी कौन सी बात हुई, जिस के कारण अखिलेश ने उसे मौत के घाट उतार दिया.अनिल से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने अंजलि की हत्या की सच्चाई जानने के लिए उस के मोबाइल की काल डिटेल्स निकलवाई तो उस की सब से ज्यादा बात अनिल से ही होना पाई गई.

जिस से साफ जाहिर था कि अंजलि का अपने देवर के अलावा किसी अन्य पुरुष के साथ संबंध नहीं था. लेकिन अनिल के खिलाफ कोई ऐसा केस नहीं बनता था, जिस के आधार पर उस पर काररवाई की जा सके.इस मामले को ले कर अनिल ने भाई को भाभी की हत्या का आरोपी मानते हुए उस के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करा दी. हालांकि अखिलेश का इलाज चल रहा था. फिर भी पुलिस ने उस के छोटे भाई की लिखित तहरीर पर अखिलेश के खिलाफ केस दर्ज कर लिया था.

पुलिस पूछताछ और परिवार वालों से मिली जानकारी से इस मामले की जो सच्चाई उभर कर सामने आई, वह जर, जोरू और जमीन वाली कहावत से काफी मिलती हुई थी.अखिलेश ने जिस तरह से अपने बड़े भाई अजय और पत्नी अंजलि की हत्या करने के बाद खुद को गोली मारी थी, उस से क्षेत्र में यह काफी सनसनीखेज मामला बन गया था.एक पुरानी कहावत है, ‘जर, जोरू, जमीन जोर की, नहीं तो किसी और की.’ अर्थात धन, स्त्री और जमीन एक बलवान व्यक्ति ही रख सकता है. धन के मामले में यह कहावत सच हो न हो, लेकिन स्त्री और जमीन के मामले में तो यह अखिलेश पर सटीक बैठती है.

उत्तर प्रदेश के जिला बाराबंकी के थाना सुबेहा अंतर्गत एक गांव है शुकुलपुर. राजनारायण शुक्ला इसी गांव के मूल निवासी हैं. राजनारायण शुक्ला की गांव में 5 बीघा जमीन थी, जिस पर वह खुद ही खेतीबाड़ी करते आ रहे थे. इस के अलावा राजनारायण शुक्ला लखनऊ शहर में लोगों के घरों में पूजापाठ करने का काम भी करते थे.राजनारायण की पत्नी का काफी समय पहले किसी बीमारी के चलते निधन हो गया था. उन के 4 बेटे थे. इन में सब से बड़ा बेटा राघव शरण गांव में अलग मकान बना कर रहने लगा था. जबकि दूसरा अजय शुक्ला व सब से छोटा अनिल लखनऊ में ही प्राइवेट नौकरी करते थे.
तीसरे नंबर का बेटा अखिलेश काफी समय से दिल्ली में प्राइवेट नौकरी करता था. अखिलेश की शादी अब से लगभग 3 साल पहले अमेठी जिले के शुकुल बाजार थाना क्षेत्र के ग्राम बूबूपुर मजरा पाली निवासी अंजलि से हुई थी.

उस समय तक अनिल अखिलेश के साथ ही रहता था. शादी के बाद अंजलि ससुराल में ही रही. उस की सास पहले ही खत्म हो चुकी थी. घर पर 3 प्राणी थे. अखिलेश, उस के पापा राजनारायण शुक्ला और छोटा भाई अनिल.

घर में खाना बनाने की दिक्कत थी. इसी कारण शादी के बाद से ही अंजलि अपनी ससुराल की हो कर रह गई थी. अखिलेश शादी से पहले से ही दिल्ली में रह कर काम करता था. उस के पिता राजनारायण शुक्ला पुजारी का काम करते थे, जिस के चलते आए दिन उन्हें बाहर ही रहना पड़ता था.
हालांकि अनिल भी लखनऊ में नौकरी करता था. लेकिन घर पर भाभी के अकेला रहने के कारण वह अकसर गांव आताजाता रहता था. अंजलि देखनेभालने में जितनी सुंदर थी, उस से कहीं ज्यादा स्मार्ट अनिल भी था. फिर दोनों के बीच देवरभाभी का प्यार भरा रिश्ता.

कभीकभी अनिल अपनी भाभी के चेहरे पर उदासी देखता तो परेशान हो कर कहता, ‘‘लगता है भाभी को भैया की याद सता रही है.’’‘‘याद क्यों नहीं सताएगी देवरजी, अब तुम्हारे भैया तो मुझे घर में कैद कर के दिल्ली में मौजमस्ती कर रहे हैं. घर पर मन लगाने के लिए एक देवर ही तो है, जो कभी भाभी के दुखदर्द को महसूस ही नहीं करता.’’ अंजलि उलाहना देते हुए बोली.‘‘भाभी, ऐसी दिल तोड़ने वाली बात क्यों करती हो. मैं लखनऊ से तुम्हारी सेवा के लिए ही तो आता हूं. अगर तुम्हें किसी चीज की जरूरत हो तो बिना किसी झिझक के बता देना.’’ अनिल ने उसे आश्वस्त किया.

अंजलि ने कई बार अनिल से बात करने की कोशिश की थी. लेकिन शर्म के मारे वह पहल नहीं कर पा रही थी. अनिल की तरफ से इशारा मिलते ही उस के दिल की ट्रेन रेंगनी शुरू हो गई थी. फिर वह ऐसे अवसर की तलाश में जुट गई, जब वह अनिल से खुल कर बात कर सके.एक दिन ऐसा ही मौका आया. राजनारायण शुक्ला को किसी काम से लखनऊ में रुकना पड़ा. उस दिन अनिल घर पर ही आया हुआ था. अंजलि ने खाना बनाया और देवरभाभी ने एक साथ बैठ कर खाना खाया. उस दिन जैसे की अंजलि अपना कामकाज निपटा कर कमरे में पहुंची, उस के पैरों में दर्द होने लगा.

भाभी के पैर में दर्द होने पर अनिल परेशान हो उठा. अनिल ने डाक्टर से दवाई लाने की बात कही तो भाभी ने डाक्टर के पास जाने से साफ मना कर दिया. अंजलि बोली, ‘‘आप परेशान मत हो. मैं पैरों की तेल से मालिश कर लूंगी.’’फिर वह तेल की शीशी उठा कर लाई और अनिल के सामने ही पैरों की मालिश करने लगी. भाभी को मालिश करते देख अनिल से रहा नहीं गया.अनिल बोला, ‘‘भाभी, आप लेट जाओ. आप के नाजुक हाथों से मालिश करने से कुछ नहीं होने वाला. मैं आप के पैरों की मालिश कर देता हूं.’’

अंजलि भी यही चाहती थी. अनिल के कहते ही उस ने झट से शीशी उस के हाथ में थमाते हुए बोली, ‘‘देवरजी, अपने हाथ से मालिश करने में वह मजा कहां जो दूसरों के हाथों में आता है.’’पलभर में ही उस के तेल लगे हाथ अंजलि की पिंडलियों पर फिसलने लगे थे. जैसेजैसे अनिल के हाथ भाभी के पैरों की ऊंचाइयों पर बढ़ते गए, अंजलि का पेटीकोट भी ऊपर को सरकते गया. अनिल की जिंदगी में एक औरत के शरीरे को छूने का पहला अहसास था. एक औरत के गर्म शरीर की गरमी पा कर अनिल मदहोश हो गया.

भाभी की गोरीगोरी पिंडलियां देख कर वह अपना आपा खो बैठा. देखते ही देखते उस के हाथ पैरों के ऊपरी हिस्से पर भी पहुंच गए. अंजलि कब से इन्हीं पलों के इंतजार में थी.पलभर में ही एक तूफान आया और गुजर गया. जब अनिल अपने होशोहवास में आया तो वह निर्वस्त्र था. उस का सारा शरीर पसीनापसीना था. अंजलि सामने पड़ी ठंडी आहें भर रही थी.अनिल के संपर्क में आने के बाद अंजलि को पहली बार किसी की मर्दानगी का अहसास हुआ था. उस दिन देवरभाभी के रिश्तों की मर्यादाओं की सीमा टूटी तो यह सिलसिला बन गया.

अखिलेश दिल्ली से कभीकभार आता और एकदो दिन रुकने के बाद फिर से वापस चला जाता. लेकिन उस दौरान भी अंजलि अखिलेश की चोरीछिपे फोन पर अनिल से बात करती रहती थी.धीरेधीरे अंजलि की शादी को 2 साल बीत गए, लेकिन वह मां नहीं बन सकी. उस के बाद उस का झुकाव अनिल की तरफ हो गया था. वह हर समय अनिल से ही फोन पर बात करती रहती थी.अखिलेश अंजलि के फोन बिजी रहने से परेशान हो चुका था. जब कभी भी वह उसे फोन मिलाता तो उस का नंबर बिजी ही आता था. अखिलेश समझ नहीं पा रहा था कि वह हर वक्त किस से बात करती है.

इसी सच्चाई को जानने के लिए उस ने एक दिन उस का मोबाइल चैक किया तो पता चला कि वह घंटोंघंटों उस के छोटे भाई अनिल से ही बात करती थी. अखिलेश समझ गया कि उस की बीवी और भाई के बीच जरूर कुछ चक्कर चला रहा है.देवरभाभी पर शक होने के बाद वह सच्चाई जानने के लिए एक ऐसे अवसर की तलाश में जुट गया, जब वह दोनों को रंगेहाथों पकड़ सके. जब कभी भी अनिल लखनऊ से घर आता तो वह दोनों पर गहरी नजर रखता था.

एक दिन अनिल लखनऊ से घर आया तो अखिलेश कहीं काम का बहाना बना कर घर से निकल गया. घर से निकलते ही उस ने दारू पी और फिर अपने दोस्तों में बैठ गया. उस ने अपना मोबाइल भी बंद कर लिया था. उस दौरान कई बार अंजलि ने उस के मोबाइल पर काल की, लेकिन हर बार उस का मोबाइल बंद ही आया.

देर रात वह घर पहुंचा तो घर के मेनगेट का दरवाजा खुला था. अखिलेश सीधा अपने कमरे में पहुंचा. अंजलि अपने कमरे से गायब थी. उस के बाद वह अपने भाई के कमरे के पास पहुंचा. उस ने कान लगा कर सुना तो अंदर से दोनों के बातचीत की आवाज आ रही थी.अखिलेश भले ही नशे में था, लेकिन वह इतना तो समझ ही गया था कि उस की बीवी उस के भाई के साथ मौजमस्ती कर रही है. यह सब देख कर उस का गुस्सा बढ़ गया. उस ने दरवाजा खटखटाया तो उस के भाई ने दरवाजा खोला.

दरवाजा खुलते ही उस ने अंजलि के बारे में पूछा तो अनिल ने कहा कि भाभी अपने कमरे में होंगी. भाभी के बारे में उसे कुछ पता नहीं. भाई का लिहाज करते हुए उस समय अखिलेश अपने कमरे में चला गया. लेकिन उस की निगाहें भाई के कमरे पर ही टिकी हुई थीं.अनिल और अंजलि को विश्वास था कि अखिलेश अब तक नशे की हालत में सो चुका होगा. तभी मौका पाते ही अंजलि अनिल के कमरे से निकल कर छत पर चली गई. छत पर कुछ देर टहलने के बाद वह अपने कमरे में आ गई.
अंजलि के आते ही अखिलेश ने उस से पूछा, ‘‘इतनी रात गए कहां गई थी?’’

तब अंजलि ने बताया, ‘‘मैं ने कई बार तुम्हारा मोबाइल मिलाया. लेकिन वह स्विच्ड औफ आ रहा था. मुझे नींद नहीं आ रही थी, इसी कारण मैं छत पर घूमने चली गई थी.’’अखिलेश अंजलि से बहुत प्यार करता था. लेकिन उस दिन उस का प्यार नफरत में बदल चुका था. अखिलेश नशे में था. उस ने तभी अंजलि को मारनापीटना शुरू कर दिया.

अनिल बचाव में आया तो उसे भी भलाबुरा कहा. अखिलेश ने उसी समय अनिल को चेतावनी दी, ‘‘आज से तेरेमेरे बीच भाई का रिश्ता खत्म. आज के बाद तू मेरे घर में मत आना.’’अगले दिन सुबह होते ही अखिलेश ने अनिल को अपने घर से अलग कर दिया था. उस के बाद अनिल भी अलग रहने लगा था. कुछ समय पहले ही अखिलेश ने अपने घर के सामने 3 बिस्वा जमीन खरीदी थी. भाइयों के बीच मनमुटाव होने के कारण उस के तीनों भाई भी उस जमीन पर अपना हक जमाते हुए उस में से अपने हिस्से की मांग करने लगे थे. जिसे ले कर कई बार चारों भाइयों में विवाद भी हुआ था.

खोया हुआ आशिक : शालिनी के लौटने पर क्यों परेशान थी विनीता -भाग 1

‘‘हैलोविन्नी… कैसी हो मेरी जान… अरे, मैं शालिनी बोल रही हूं… तुम्हारी शालू’’ सुन कर विनीता को समझने में कुछ समय लगा, मगर फिर जल्दी ही जैसे दिमाग सोते से जागा.

‘‘अरे, शालू तुम? अचानक इतने सालों बाद? तुम तो नितेश से शादी कर के अमेरिका चली गई थी… आज इतने सालों बाद अचानक मेरी याद कैसे आई? क्या इंडिया आई हो?’’ विनीता ने अपने मन की घबराहट छिपाते हुए पूछा.

‘‘अरे बाप रे, इतने सारे सवाल एकसाथ? बताती हूं… बताती हूं… अभी तो बातें शुरू हुई हैं…’’ शालिनी ने अपनी आदत के अनुसार ठहाका लगाते हुए कहा.

‘‘पहले तू यह बता कि मेरे खोए हुए आशिक यानी जतिन के बारे में तुझे कोई खबर है क्या? शायद मेरी तरह उस ने भी हमारे अतीत के कुछ पन्ने संभाल कर रखें हों…’’ शालिनी का सवाल सुनते ही विनीता के हाथ से मोबाइल छूटने को हुआ. वह उसे कैसे बताती कि उस का खोया हुआ आशिक ही अब उस का पाया हुआ प्यार है… जिन अतीत के पन्नों की बात ‘शालू कर रही थी वही पन्ने उस के जाने के बाद विनीता वर्तमान में पढ़ रही है… हां, वही जतिन जो कभी शालू का आशिक हुआ करता था आज विनीता का पति है.’

विनीता को एकाएक कोई जवाब नहीं सूझा तो उस ने 4-5 बार ‘‘हैलो… हैलो…’’ कह कर फोन काट दिया और फिर उसे स्विच औफ भी कर दिया. वह फिलहाल शालू के किसी भी सवाल का जवाब देने की स्थिति में नहीं थी.

विनीता बैडरूम में आ कर कटे पेड़ की तरह ढह गई. न जाने कितनी ही बातें… कितनी ही यादें थीं, जो 1-1 कर आंखों के रास्ते गुजर रही थी. कौन जाने… आंखों से यादें बह रही थीं या आंसुओं का सैलाब… कैसे भूल सकती है विनीता कालेज के आखिरी साल के वे दिन जब शालिनी ने अचानक नितेश से शादी करने के अपने पापा के फैसले को हरी झंडी दे दी थी. विनीता ने क्या कम समझाया था उसे?

‘‘शालू, तुम जतिन के साथ ऐसा कैसे कर सकती हो? उसे कितना भरोसा है तुम पर… बहुत प्यार करता है तुम से… वह टूट जाएगा शालू… मुझे तो डर है कि कहीं कुछ उलटासीधा न कर बैठे…’’ विनीता को शालू की बातों पर विश्वास नहीं हो रहा था. एक वही तो थी इस रिश्ते की चश्मदीद गवाह.

‘‘बी प्रैक्टिकल यार. प्यार अलग चीज है और शादी अलग… नितेश से जो मुझे मिल सकता है वह जतिन कभी नहीं दे सकता… नीतेश एअर इंडिया में पायलट है… महानगर में शानदार फ्लैट… अच्छी नौकरी… हैंडसम पर्सनैलिटी… रोज विदेश के दौरे… क्या

ये सब जतिन दे पाएगा मुझे? उसे तो अभी

सैटल होने में ही बरसों लग जाएंगे… तब तक

तो मैं बूढ़ी हो जाऊंगी…’’ शालू ने आदतन ठहाका लगाया.

‘‘देख शालू, तुझे जो करना है वह कर,

मगर प्लीज… फाइनल ऐग्जाम तक इस बारे में जतिन को कुछ मत बताना वरना वह एग्जाम भी नहीं दे पाएगा… उस का फ्यूचर खराब हो जाएगा…’’ विन्नी उस के सामने लगभग गिड़गिड़ा उठी.

‘‘ओके डन… मगर तू क्यों इतनी मरी जा रही है उस के लिए?’’ शालू विन्नी पर कटाक्ष करते हुए क्लास से चली गई.

फाइनल परीक्षा खत्म हो गई. आखिरी पेपर के बाद तीनों कालेज कैंटीन में मिले थे. तभी शालू ने नितेश के साथ अपनी सगाई की खबर सार्वजनिक की थी. विनीता की नजर लगातार जतिन के चेहरे पर ही टिकी थी. वह संज्ञा शून्य सा बैठा था. उन दोनों को सकते में छोड़ कर शालू कब की जा चुकी थी. विनीता किसी तरह जतिन को वहां से उठा कर ला पाई थी.

नितेश से शादी कर के 2 ही महीनों में शालू अमेरिका चली गई. फाड़ कर फेंक गई थी अपने अतीत के पन्ने… पीछे छोड़ गई थी टूटा… हारा… अपना आशिक… जिसे विनीता ने न केवल संभाला, बल्कि संवार निखार भी दिया. शालू की बेवफाई के गम को भुलाने के लिए जतिन ने अपने आप को पढ़ाई में डुबो दिया. विनीता ने उस के आंसुओं को कंधा दिया. वह लगातार उस का हौसला बढ़ाती रही. आखिर जतिन की मेहनत और विनीता की तपस्या रंग लाई. प्रशासनिक अधिकारी तो नहीं, मगर जतिन एक राजपत्रित अधिकारी तो बन ही गया था. अपनी सफलता का सारा श्रेय विनीता को देते हुए एक दिन जब जतिन ने उसे शादी के लिए प्रोपोज किया तो वह भी न नहीं कह सकी और घर वालों की सहमति से दोनों विवाहसूत्र में बंध गए. बेशक यह पहली नजर वाला प्रेम नहीं था, मगर हौलेहौले हो ही गया था.

तभी लैंडलाइन की घंटी ने उसे वर्तमान में ला दिया.

‘‘अरे, क्या बात है… तुम्हारी तबीयत तो ठीक है न? मोबाइल स्विच औफ क्यों आ रहा है?’’ जतिन की आवाज में खुद के लिए इतनी फिक्र महसूस कर विनीता को दिली राहत मिली.

 

अपने पराए: संकट की घड़ी में किसने दिया अमिता का साथ -भाग 2

अमिता ने स्थायी रूप से मायके जा कर रहना पसंद नहीं किया. यह उस के पति का अपना घर है, पति के साथ 5 साल यहीं तो बीते हैं, फिर राहुल भी यहीं पैदा हुआ है. जाहिर है, भावनाओं के जोश में उस ने बाप के घर जा कर रहने से मना कर दिया.

सुभाषचंद्र के प्रयास से वह बैंक में मैनेजर से मिल कर पति के खाते की स्वामिनी कागजपत्रों पर हो गई. पासबुक, चेकबुक मिल गई और फिलहाल के जरूरी खर्चों के लिए उस ने 25 हजार की रकम भी बैंक से निकाल ली.

अब वह पहले वाली निरीह गृहिणी अमिता नहीं बल्कि अधिकार भाव रखने वाली संपन्न अमिता है. राहुल को नगर निगम के स्कूल से हटा कर पास के ही एक अच्छे पब्लिक स्कूल में दाखिल करा दिया. अब उसे स्कूल की बस लाती, ले जाती है.

बेटी घर में अकेली कैसे रहेगी, यह सोच कर मां और छोटी बहन वीणा वहीं रहने लगीं. वीणा वहीं से स्कूल पढ़ने जाने लगी. छोटा भाई भी रोज 1-2 बार आ कर पूछ जाता. अब एक काम वाली रख ली गई, वरना पहले अमिता ही चौका- बरतन से ले कर साफसफाई का सब काम करती थीया है…’’

मां ने रोते हुए अमिता का हाथ पकड़ लिया, ‘‘बेटी, अब तुम्हारे ही ऊपर है, इन्हें जेल जाने से बचाओ…’’

अमिता ने बैंक द्वारा भेजे गए कागज देखने चाहे. पिता का चेहरा उतर गया. बोले, ‘‘बैंक ने अभी तो सम्मन नहीं भेजा है, लेकिन वहां के एक जानपहचान के आदमी ने बताया है कि जल्द भेजने की तैयारी हो रही है. उस ने राय दी है कि मैं मैनेजर से मिल लूं और शीघ्र रुपए की व्यवस्था करूं.’

काली सोच : क्या वो खुद को माफ कर पाई -भाग 1

अंधविश्वास, पुरातनपंथी और कट्टरवादी सोच ने न जाने कितनों का घर उजाड़ा है. शुभा की आंखों पर भी न जाने क्यों इन्हीं सब का परदा पड़ा हुआ था, जिस का परिणाम इतना भयावह होगा, इस की वह कल्पना भी नहीं कर सकती थी.

लेखन कला मुझे नहीं आती, न ही वाक्यों के उतारचढ़ाव में मैं पारंगत हूं. यदि होती तो शायद मुझे अपनी बात आप से कहने में थोड़ी आसानी रहती. खुद को शब्दों में पिरोना सचमुच क्या इतना मुश्किल होता है?

बाहर पूनम का चांद मुसकरा रहा है. नहीं जानती कि वह मुझ पर, अपनेआप पर या किसी और पर मुस्कुरा रहा है. मैं तो बस इतना जानती हूं कि वह भी पूनम की ऐसी ही एक रात थी जब मैं अस्पताल के आईसीयू के बाहर बैठी अपने गुनाहों के लिए बेटी से माफी मांग रही थी, ‘मुझे माफ कर दे बेटी. पाप किया है मैं ने, महापाप.’

मानसी, मेरी इकलौती बेटी, भीतर आईसीयू में जीवन और मौत के बीच झूल रही है. उस ने आत्महत्या करने की कोशिश की, यह तो सभी जानते हैं पर यह कोई नहीं जानता कि उसे इस हाल तक लाने वाली मैं ही हूं. मैं ने उस मासूम के सामने कोई और रास्ता छोड़ा ही कहां था?

कहते हैं आत्महत्या करना कायरों का काम है पर क्या मैं कायर नहीं जो भविष्य की दुखद घटनाओं की आशंका से वर्तमान को ही रौंदती चली आई?

हर मां का सपना होता है कि वह अपनी नाजों से पाली बेटी को सोलहशृंगार में पति के घर विदा करे. मैं भी इस का अपवाद नहीं थी. तिनकातिनका जोड़ कर जैसे चिडि़या अपना घोंसला बनाती है. वैसे ही मैं भी मानसी की शादी के सपने संजोती गई. वह भी मेरी अपेक्षाओं पर हमेशा खरी उतरी. वह जितनी सुंदर थी उतनी ही मेधावी भी. शांत, सुसभ्य, मृदुभाषिणी मानसी घरबाहर सब की चहेती थी. एक मां को इस से ज्यादा और क्या चाहिए?

‘देखना अपनी लाडो के लिए मैं चांद सा दूल्हा लाऊंगी,’ मैं सुशांत से कहती तो वे मुसकरा देते.

उस दिन मानसी की 12वीं कक्षा का परिणाम आया था. वह पूरे स्टेट में फर्स्ट आईर् थी. नातेरिश्तेदारों की तरफ से बधाइयों का तांता लगा हुआ था. हमारे पड़ोसी व खास दोस्त विनोद भी हमारे घर आए थे मिठाई ले कर.

‘मिठाई तो हमें खिलानी चाहिए भाईसाहब, आप ने क्यों तकलीफ की,’ सुशांत ने गले मिलते हुए कहा तो वे बोले, ‘हां हां, जरूर खाएंगे. सिर्फ मिठाई ही क्यों? हम तो डिनर भी यहीं करेंगे, लेकिन पहले आप मेरी तरफ से मुंह मीठा कीजिए. रोहित का मैडिकल कालेज में दाखिला हो गया है.’

‘फिर तो आज दोहरी खुशी का दिन है. मानसी ने 12वीं में टौप किया है. मैं ने मिठाई की प्लेट उन की ओर बढ़ाई.’

‘आप चाहें तो हम यह खुशी तिहरी कर लें,’ विनोद ने कहा.

‘हम समझे नहीं,’ मैं अचकचाई.

‘अपनी बेटी मानसी को हमारे आंचल में डाल दीजिए. मेरी बेटी की कमी पूरी हो जाएगी और आप की बेटे की,’ मिसेज विनोद बड़ी मोहब्बत से बोली.

‘देखिए भाभीजी, आप के विचारों की मैं इज्जत करती हूं, लेकिन मुंह रहते कोई नाक से पानी नहीं पीता. शादीविवाह अपनी बिरादरी में ही शोभा देते हैं,’ इस से पहले कि सुशांत कुछ कहते मैं ने सपाट सा उत्तर दे दिया.

‘जानती हूं मैं. सदियों पुरानी मान्यताएं तोड़ना आसान नहीं होता. हमें भी काफी वक्त लगा है इस फैसले तक पहुंचने में. आप भी विचार कर देखिएगा,’ कहते हुए वे लोग चले गए.

‘इस में हर्ज ही क्या है शुभा? दोनों बच्चे बचपन से एकदूसरे को जानते हैं, समझते हैं. सब से बढ़ कर बौद्धिक और वैचारिक समानता है दोनों में. मेरे खयाल से तो हमें इस रिश्ते के लिए हां कह देनी चाहिए.’ सुशांत ने कहा तो मेरी त्योरियां चढ़ गईं.

‘तुम्हारा दिमाग तो नहीं फिर गया है. आलते का रंग चाहे जितना शोख हो, उस का टीका नहीं लगाते. कहां वो, कहां हम उच्चकुलीन ब्राह्मण. हमारी उन की भला क्या बराबरी? दोस्ती तक तो ठीक है, पर रिश्तेदारी अपनी बराबरी में होनी चाहिए. मुझे यह रिश्ता बिलकुल पसंद नहीं है.’

‘एक बार खुलेमन से सोच कर तो देखो. आखिर इस में बुराई ही क्या है? दीपक ले कर ढूंढ़ेंगे तो भी ऐसा दामाद हमें नहीं मिलेगा’, सुशांत ने कहा.

 

पालनहार बना हैवान

बिहार के समस्तीपुर जिले के रोसड़ा अनुमंडलीय मुख्यालय स्थित बड़ी दुर्गा स्थान में मिश्र टोला का रहने वाला शिक्षक है रविंद्र झा. 50 वर्षीय रविंद्र झा रोसड़ा के संस्कृत विद्यालय में अध्यापक है. उस की बुरी नजर अपनी ही 20 साल की बेटी मोनिका पर थी.

4 वर्ष पहले की बात है एक दिन मोनिका घर में अकेली थी. बस, बेशर्म शिक्षक पिता रविंद्र झा ने अपनी बेटी मोनिका के साथ अश्लील हरकत करनी शुरू कर दी.मोनिका ने विरोध किया फिर भी रविंद्र झा ने उस के साथ जबरदस्ती शारीरिक संबंध बना लिए. मोनिका ने यह बात अपनी मां से बताई. लेकिन लोकलाज का हवाला दे कर मां ने उसे चुप रहने की हिदायत दी.

उस समय मोनिका इंटरमीडिएट की छात्रा थी. वह अब स्नातक तीसरे वर्ष की छात्रा है. उस के बाद रविंद्र झा का मनोबल बढ़ता ही चला गया और वह जबतब घर में अकेली रहती बेटी मोनिका के साथ जबरदस्ती शारीरिक संबंध बनाने लगा.पिता की हरकत से परेशान हो कर मोनिका ने सबूत इकट्ठा करने के खयाल से ही यह घिनौनी करतूत 20 अप्रैल, 2022 को अपने मोबाइल के कैमरे में कैद कर ली.
पिता के घिनौने कृत्य की वीडियो बनाने के बाद मोनिका ने अपनी मामी से यह बात शेयर की. मामामामी उस के घर पहुंचे और मोनिका को साथ ले कर अपने घर चले गए. जहां मोनिका ने सारी बात मामामामी व अन्य रिश्तेदारों को खुल कर बताई.

वहां उस का ममेरा भाई माधव मिश्रा कोने में खड़े हो कर सारी बात सुन रहा था. माधव ने मोनिका को मदद का भरोसा दिलाया तो वह मान गई और मोनिका ने वीडियो माधव के हवाले कर दी.
माधव ने वह वीडियो प्रशासनिक मदद के खयाल से अपने एक परिचित हसनपुर निवासी एक न्यूज पोर्टल के पत्रकार संजय भारती को दे दी. ‘रोसड़ा जंक्शन’ नामक उस न्यूज पोर्टल से जुड़े पत्रकार संजय भारती ने पहले मोनिका से मोबाइल पर संपर्क कर उसे ब्लैकमेल किया और जब उसे पैसा नहीं मिला तो उस ने वह वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल कर दी.

मोनिका को जब वीडियो वायरल होने की खबर मिली तो वह बहुत परेशान हो गई. उस ने रोसड़ा थाने जा कर मदद की गुहार लगाई. लेकिन पुलिस वाले पीडि़ता के पिता से मिल गए और उन्होंने केस दर्ज नहीं किया.पुलिस उच्चाधिकरियों के संज्ञान में मामला आने के बाद पुलिस ने केस दर्ज कर मोनिका के घर पर छापेमारी की. फिर मोनिका के पिता रविंद्र झा को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है. इतना ही नहीं, पुलिस ने पीडि़ता के ममेरे भाई माधव मिश्रा को भी गिरफ्तार कर जेल भेज दिया.

समस्तीपुर के एसपी हृदयकांत के आदेश पर अब यह मामला समस्तीपुर महिला थानाप्रभारी पुष्पलता कुमारी को ट्रांसफर कर दिया गया है.दुष्कर्मी पिता रविंद्र झा व ममेरे भाई माधव मिश्रा के खिलाफ भादंवि की धारा 376, 354(बी), 341, 504, 506 आईपीपी व पोक्सो एक्ट एवं 67(ए) आईटी एक्ट के तहत गिरफ्तार कर जेल भेज चुकी है. तो वहीं न्यूज पोर्टल के पत्रकार संजय भारती के खिलाफ भी 5 मई, 2022 को भादंवि की धारा 384, 506, 509 व 67(ए) आईटी एक्ट 2000 के तहत रिपोर्ट दर्ज की जा चुकी है. लेकिन वह गिरफ्तार नहीं हो सका है.

थानाप्रभारी पुष्पलता कुमारी ने पीडि़ता मोनिका का 6 मई, 2022 को समस्तीपुर के सदर अस्पताल में मैडिकल कराया. डा. नवनीता, डा. गिरीश कुमार व डा. उत्सव की टीम ने पीडि़ता का मैडिकल परीक्षण किया. उस का अल्ट्रासाउंड व एक्सरे तक कराया गया. मैडिकल जांच में उस के साथ शारीरिक शोषण की पुष्टि हुई.

मैडिकल जांच और कोर्ट में बयान दर्ज कराने के बाद मोनिका को उस के मामामामी के साथ भेज दिया गया है. क्योंकि माधुरी ने मां के साथ घर जाने से इनकार कर दिया था.
फिलहाल मोनिका अभी डर से उबर नहीं पाई है. वह सहमी हुई रहती है.

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