मनोहर कहानियां: 1 मोक्ष, 5 मौतें

  भारत भूषण श्रीवास्तव

बात 20 दिसंबर, 2021 की सुबह के समय की है. हरियाणा के हिसार जिले की बरवाला-अग्रोहा रोड पर गांव वालों ने एक अधेड़ व्यक्ति की लाश पड़ी देखी. पहली नजर में लग रहा था कि किसी गाड़ी ने कुचला है. यानी यह सड़क हादसे का मामला लग रहा था. कुछ ही देर में वहां आनेजाने वालों की भीड़ जमा हो गई.

आसपास के गांवों के लोग भी वहां जमा हो गए. भीड़ में से किसी व्यक्ति ने इस की सूचना पुलिस को दे दी. वहां मौजूद लोगों में कुछ लोगों ने मृतक को पहचान लिया. वह पास के ही नंगथला गांव का रहने वाला 45 वर्षीय रमेश था.

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रमेश का समाज में मानसम्मान था. इसलिए आसपास के गांवों के लोग उसे अच्छी तरह जानते थे. तभी तो उस की इतनी जल्द शिनाख्त हो गई. सूचना पा कर पुलिस कुछ ही देर में वहां पहुंच गई और घटनास्थल की जांच करने लगी.

इधर कुछ लोग यह खबर देने के लिए रमेश के घर की तरफ दौड़े, लेकिन जब वह घर पर पहुंचे तो वहां का नजारा देख कर और सन्न रह गए. क्योंकि घर पर 4 और लाशें पड़ी थीं. इस के बाद गांव में ही नहीं, बल्कि क्षेत्र में सनसनी फैल गई. क्योंकि एक ही परिवार के 5 सदस्यों की मौत बहुत बड़ी घटना थी.

रोड पर रमेश के एक्सीडेंट के मामले की जांच कर रहे पुलिस अधिकारियों को जब पता चला कि रमेश के घर में 4 सदस्यों की लहूलुहान लाशें पड़ी हैं तो वे भी सन्न रह गए. उन्हें मामला जरूरत से ज्यादा संगीन लगा, लिहाजा इस की सूचना वरिष्ठ अधिकारियों को देने के बाद वहां से कुछ पुलिसकर्मी रमेश के घर की तरफ चल दिए. उन के पीछेपीछे भीड़ भी चल दी.

पुलिस जब रमेश के घर पहुंची तो घर के अंदर का दृश्य दख कर हक्कीबक्की रह गई. जितने मुंह थे, उतनी बातें भी हुईं लेकिन कोई किसी नतीजे पर नहीं पहुंच सका. एक हैरानी जरूर सभी को थी कि यह क्या हो गया. रमेश तो बहुत सीधासादा और धार्मिक प्रवृत्ति वाला था, जिस की किसी से दुश्मनी होने का सवाल ही नहीं उठता था और हर तरह के नशापत्ती से वह दूर रहता था.

बैडरूम में 2 पलंगों पर 4 लाशें पड़ी थीं, जिन्हें देखने पर साफ लग रहा था कि उन की बेरहमी से हत्या की गई है. साथ ही समझ यह भी आ रहा था कि मृतकों ने कोई विरोध नहीं किया था.

हाथापाई के निशान वहां कहीं नजर नहीं आ रहे थे. ये लाशें रमेश की 38 वर्षीय पत्नी सुनीता, 14 साल की बेटी अनुष्का, 12 साल की दीपिका और 11 साल के इकलौते बेटे केशव की थीं. जिस ने भी यह नजारा देखा, वह सिहर उठा क्योंकि एक अच्छाखासा घर उजड़ चुका था.

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मामला सनसनीखेज तो निकला पर वैसा नहीं जैसा कि आमतौर पर ऐसी वारदातों में होता है. पुलिस टीम को ज्यादा मशक्कत नहीं करना पड़ी, क्योंकि रमेश इस केस की खुद ही गुत्थी सुलझा कर गया था.

कागजों पर उतरी काली कथा

पुलिस जांच शुरू करती, इस के पहले ही उस के हाथ एक नोटबुक लग गई जोकि रमेश का सुसाइड नोट था. यह नोटबुक केशव के स्कूल की थी, जो रखी इस तरह गई थी कि आसानी से पुलिस को नजर आ जाए.

नोटबुक क्या थी रमेश की परेशानियों, मूर्खताओं और वहशीपन का पुलिंदा थी जिसे टुकड़ोंटुकड़ों में लिखा गया था. इस के बाद भी इस के 11 पेज भर गए थे.

अब हर कोई यह जानना चाह रहा था कि अगर अपनी पत्नी और बच्चों की हत्या रमेश ने ही की है तो इस की वजह क्या है.

अधिकृत रूप से यह वजह दोपहर को लोगों को पता चली, जब डीआईजी (हिसार) बलवान सिंह राणा ने इस बारे में जानकारी दी. इस के पहले वह डीएसपी नारायण सिंह और अग्रोहा थानाप्रभारी के साथ घटनास्थलों पर पहुंचे थे.

शुरुआती जांच के बाद पांचों शव अग्रोहा मैडिकल कालेज पोस्टमार्टम के लिए भेज दिए गए थे. अब तक इस वारदात की खबर जंगल की आग की तरह देश भर में फैल चुकी थी. रमेश ने अपने सुसाइड नोट में आत्महत्या करने की जो वजह बताई, उसे जान कर हर कोई हैरान था कि एक पढ़ालिखा और सभ्य आदमी भला यह कैसे कर सकता है. पता चला कि उन्होंने यह सब मोक्ष पाने के लिए किया.

हरियाणा के हिसार जिले की अग्रोहा तहसील का छोटा सा गांव है नंगथला. कहने को और सरकारी कागजों में ही यह अब गांव रह गया है नहीं तो अग्रोहा से महज 4 किलोमीटर दूर होने से यह उसी का ही हिस्सा बन गया है. 700 साल पुराने इस गांव में दाखिल होते ही लोगों की नजरें एक घर पर जरूर ठहर जाती हैं जिस की दीवारों पर पक्षियों के लिए कोई एकदो नहीं बल्कि 50 इको फ्रैंडली घोंसले बने हुए हैं.

घर पर बना रखे थे पक्षियों के घोंसले

पक्षी संरक्षण के इस अनूठे तरीके से देश भर के लोग प्रभावित थे और आए दिन इस बाबत रमेश वर्मा को फोन किया करते थे.

45 वर्षीय रमेश वर्मा अब इस दुनिया में नहीं है. पक्षियों के लिए बसाया उस का छोटा सा संसार भी अब उजड़ रहा है, जहां कुछ दिन पहले तक 100 से भी ज्यादा चिडि़या चहचहाया करती थीं. रमेश बच्चों की तरह उन का ध्यान रखता था और उन्हें वक्त पर दानापानी दिया करता था. इस मिशन में उस का परिवार भी उस का साथ देता था.

इन घोंसलों को देख कर कुछ लोग उसे सनकी भी कहते थे लेकिन रमेश किसी और धुन या सनक में ही पिछले कुछ दिनों से जी रहा था, जिस के बीज तो किशोरावस्था में ही उस के दिलोदिमाग में पड़ चुके थे.

उन में से एक बीज कैक्टस से भी ज्यादा कंटीला और विषैला पेड़ कब बन गया, यह न तो वह समझ पाया और न ही कोई उसे ढंग से समझा पाया. दिसंबर की हड्डी गला देने वाली ठंडी रातों में जब सारी दुनिया कंबलों, रजाइयों में दुबकी सो रही होती थी, तब रमेश एक कशमकश में डूबा कुछ सोच रहा होता था.

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एक निरर्थक सी बात पर कोई जितना खुद से लड़ सकता है रमेश उस से ज्यादा खुद से लड़ चुका था. आखिरकार 20 दिसंबर को उस की हिम्मत जबाब दे गई. ऐसा नहीं कि उस के पास किसी चीज की कमी थी, बल्कि वह तो दुनिया के उन खुशकिस्मत लोगों में से एक था, जिन के पास सब कुछ था.

परिवार में एक सीधीसादी आज्ञाकारी पत्नी, 2 हंसमुख सुंदर बेटियां और उन के बाद हुआ मासूम सा दिखने वाला बेटा, जिस का नाम उस ने कृष्ण के नाम पर प्यार से केशव रखा था.

नंगथला में प्रिंटिंग प्रैस चलाने वाले रमेश की कमाई इतनी थी कि घर खर्च आराम से चलने के बाद पैसा बच भी जाता था, जिस का बड़ा हिस्सा वह कारोबार बढ़ाने में लगा भी रहा था.

शादी के कार्ड छाप कर खासी कमाई कर लेने वाले इस तजुर्बेकार कारोबारी ने फ्लेक्स प्रिंटिंग का भी काम शुरू कर दिया था. इस के पहले वह पेंटिंग भी किया करता था.

फिर किस चीज की कमी थी रमेश के पास, जो उसे मुंहअंधेरे आत्महत्या कर लेनी पड़ी? इस बात को समझने से पहले और भी बहुत सी बातें समझ लेनी जरूरी हैं, जो आए दिन हर किसी के दिमाग में उमड़तीघुमड़ती रहती हैं.

मैं कौन हूं कहां से आया हूं मरने के बाद कहां जाऊंगा, क्या मेरी आत्मा को मुक्ति मिलेगी या मुझे भी 84 लाख योनियों में भटकना पड़ेगा और नर्क की सजा भुगतनी पड़ेगी, जैसे दरजनों सवाल रमेश को आज से नहीं बल्कि सालों से परेशान कर रहे थे.

इन्हीं सवालों से आजिज आ कर वह संन्यास लेना चाहता था, यानी घर से पलायन करना चाहता था. लेकिन घर वालों ने शादी कर उसे घरगृहस्थी के बंधन में बांध दिया.

धर्म के दुकानदारों के पैदा किए इन सवालों के कोई माने नहीं हैं इसलिए समझदार लोग इन्हें दिमाग से झटक कर अपने काम में लग जाते हैं और थोड़ी सी दक्षिणा पंडे, पुजारियों, पुरोहितों को दे कर अपना परलोक सुधरने की झूठी तसल्ली और मौखिक गारंटी ले कर अपनी जिम्मेदारियां निभाने में जुट जाते हैं और जिंदगी का पूरा लुत्फ उठाते हैं.

लोगों को धर्म के धंधेबाजों के हाथों ठगा कर एक अजीब सा सुख मिलता है, जिस की कीमत रमेश जैसे लोगों को मर कर चुकानी पड़ती है, जो पाखंडों के चक्रव्यूह में अभिमन्यु की तरह फंस कर दम तोड़ देते हैं.

क्या कोई धार्मिक व्यक्ति ऐसे जघन्य हत्या कांड को अंजाम दे सकता है? इस सवाल का जवाब हर कोई न में देना चाहेगा लेकिन हकीकत में यह धार्मिक सनक थी.

हैवान बनने की है अनोखी कहानी

रमेश ने हैवान बनने की कहानी भी खुद अपने हाथों से इस भूमिका के साथ लिखी कि यह दुनिया रहने लायक नहीं है. मैं इस दुनिया में नहीं रहना चाहता, लेकिन सोचता हूं कि मेरी मौत के बाद मेरे घर वालों का क्या होगा. मैं उन से बहुत प्यार करता हूं मैं कोई मानसिक रोगी नहीं हूं.

सुसाइड नोट में आगे रमेश ने लिखा, ‘मैं ने जिंदगी के आखिरी दिनों में बहुत मन लगाने की कोशिश की थी. मशीनें खरीदीं, दुकान भी खरीद ली थी. 2 लाख रुपए दे भी दिए थे और भी बहुत पैसा आ रहा था. चुनाव में कई लाख रुपए आए थे लेकिन शरीर और दिमाग हार मान चुके हैं. मन अब आजाद होना चाहता था कोई सुख, कोई बात अब रोक नहीं सकती. रोज रात को सब सोचता हूं. 3 दिन से पूरी रात जागा हूं आखों में नींद नहीं है. मन को बहुत लालच दिए, लेकिन बहुत देर हो चुकी है. अब रुकना मुश्किल था. कोई अफसोस कोई दुख नहीं.’

अपनी बात जारी रखते रमेश जैसे इस हादसे का आंखों देखा हाल बता देना चाहता था. इस के बाद उस ने लिखा, ‘सुबह के 4 बज चुके हैं घर से निकल चुका हूं. इतनी सर्दी में सब को परेशान कर के जा रहा हूं, माफ करना. सब से माफी.’ जाहिर है कि रमेश ने बेहद योजनाबद्ध तरीके से अपने प्यार करने वालों के मर्डर का प्लान किया था.

खीर में मिला दी थीं नींद की गोलियां

19 दिसंबर को उस ने अपनी दुकान दोपहर 3 बजे ही बंद कर दी थी जबकि आमतौर वह रात 10 बजे दुकान बढ़ाता था, इस दिन बेटा केशव भी उस के साथ था. दूसरे दुकानदारों से वह कम ही बातचीत करता था, इसलिए किसी ने यह नहीं पूछा कि आज इतनी जल्दी घर क्यों जा रहे हो.

कोई भी उसे देख कर अंदाजा नहीं लगा सकता था कि इस आदमी के दिमाग में क्या खुराफात चल रही है. घर पहुंच कर उस ने अपने हाथों से खीर बनाई और पत्नी सहित तीनों बच्चों को बड़े प्यार से खिला दी. फिर वह उन के सोने का इंतजार करने लगा, क्योंकि खीर में उस ने नींद की गोलियां मिला दी थीं.

इन चारों के नींद की गोलियों के असर में आ जाने के बाद उस ने उन सभी के सो जाने का इंतजार किया. सो जाने की तसल्ली हो जाने के बाद कुछ धार्मिक अनुष्ठान किए और फिर कुदाल उठा कर एकएक कर सभी की हत्या कर दी, जो वे बेचारे सपने में भी नहीं सोच सकते थे कि माली ही अपनी बगिया उजाड़ रहा है.

जन्ममरण के चक्र से मुक्त होने की इच्छा लिए इस धार्मिक आदमी को यह एहसास तक नहीं हुआ कि वह 4 बेकुसूर लोगों को महज मोक्ष की अपनी सनक पूरी करने के लिए बलि चढ़ा रहा है.

अपनी दिमागी परेशानी की चर्चा उस ने सुनीता से की भी थी, इस पर सुनीता ने हथियार डालते हुए आदर्श पत्नियों की तरह यह वादा किया था कि साथ जिए हैं तो मरेंगे भी साथसाथ ही. पति के पागलपन को बेहतर तरीके से समझने लगी.

सुनीता कितनी हताशनिराश हो चुकी थी, यह समझना बहुत ज्यादा मुश्किल काम नहीं. जब चारों ने दम तोड़ दिया तो इस पगलाए जुनूनी रमेश ने खुद को भी मारने की गरज से बिजली का नंगा तार अपनी जीभ पर रख लिया लेकिन इस से वह मरा नहीं, क्योंकि बिजली का करंट उस पर असर नहीं करता था, इस बात का जिक्र भी उस ने अपने सुसाइड नोट में किया था.

अब तक रमेश की सोचनेसमझने की ताकत पूरी तरह खत्म हो चुकी थी और जैसे भी हो वह मर जाना चाहता था, क्योंकि सूरज उगने में कुछ वक्त बाकी था फिर खुदकुशी करना आसान नहीं रह जाता और 4 हत्याओं के अपराध में वह हवालात में होता.

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अब उस ने घर से निकल कर सड़क पर आ कर किसी वाहन के नीचे आ कर मरने का फैसला कर लिया और जातेजाते यह बात भी सुसाइड नोट में लिख दी. इस के बाद क्या हुआ, इस के बारे में पुलिस का अंदाजा है कि वह झाडि़यों में छिप कर बैठ गया होगा और तेज रफ्तार से आती किसी गाड़ी के सामने आ गया, जिस से उस की मौके पर ही मौत हो गई.

काफी कोशिशों के बाद भी उस गाड़ी का अतापता नहीं चला, जिस के पहियों ने रमेश की मोक्ष की सनक को पूरा किया.

बुराड़ी कांड का दोहराव

एक और दुखद कहानी का अंत हुआ, जिस की तुलना दिल्ली के 21 जुलाई, 2018 को हुए बुराड़ी कांड से की गई. क्योंकि उस में भी मोक्ष के चक्कर में एक ही घर के 11 सदस्यों ने थोक में आत्महत्या कर ली थी.

मोक्ष नाम के पाखंड का स्याह और वीभत्स सच सामने आने के बाद भी अधिकतर लोगों ने इस बात से इत्तफाक नहीं रखा कि मोक्ष बकवास है बल्कि कहा यह कि रमेश को अगर मोक्ष चाहिए था तो खुद मर जाता, बीवीबच्चों की हत्या न करता. और जिन लोगों ने यह माना कि रमेश को मोक्ष के लिए आत्महत्या नहीं करना चाहिए थी, वे भी मोक्ष की औचित्यता पर सवाल नहीं कर पा रहे.

सवाल यह है कि मोक्ष का इतना फरजी गुणगान क्यों किया जाता है कि लोग अच्छीखासी हंसतीखेलती जिंदगी छोड़ आत्महत्या करने पर उतारू हो जाते हैं और इस के लिए अपने घर वालों की हत्या तक करने लगे हैं. पंडेपुजारियों और मोक्ष का महिमामंडित कर दक्षिणा बटोरने वालों पर गैरइरादतन हत्या का मामला दर्ज क्यों नहीं किया जाता.

रमेश ने गलत किया, यह कहने वाले तो बहुत मिल जाएंगे लेकिन धार्मिक अंधविश्वास और दहशत फैलाने वाले कौन सा सही काम करते हैं. यह कहने वाले जब तक इनेगिने हैं, तब तक इस प्रवृत्ति पर रोक लगने की उम्मीद करना एक बेकार की बात है. रमेश मानसिक कम धार्मिक रोगी ज्यादा था.

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‘‘कितनी खूबसूरत लग रही है निवेदिता दुलहन के वेश में. गोरा रंग, बड़ीबड़ी आंखें और तीखातिकोना चेहरा,’’ समता मौसी दुलहन की बलाएं लेते हुए बोलीं.

‘‘काश, दूल्हे के बारे में भी यही कहा जा सकता…’’ घर आए मेहमानों में से किसी ने कहा.

‘‘यह बात तो है… कहां हमारी निवेदिता एमए तक पढ़ी है… इतनी खूबसूरत और आश्रय सिर्फ 12वीं जमात तक पढ़ा है. पिता की मौत के बाद उन की जगह ही नौकरी लग गई है. रंग भी कुछ दबा हुआ है,’’ निवेदिता की बूआ ने कहा.

निवेदिता के घर में भी पैसा नहीं था. अगर उस के मातापिता को शादी की जल्दी थी. निवेदिता और पढ़ना भी चाहती थी, पर उस की शादी तय कर दी गई.

‘‘हां, कमाताखाता लड़का देख कर शादी कर रहे हैं,’’ किसी ने बात को आगे बढ़ाया.

शादी के बाद रात को निवेदिता सुहाग सेज पर बैठी हुई थी और उम्मीद के मुताबिक बिना किसी तामझाम व दिखावे के आश्रय कमरे में आ गया और गंभीर अंदाज में बोला, ‘‘निवेदिता, आज हमारे मिलन की पहली रात है और ऐसा दस्तूर है कि इस दिन गिफ्ट जरूर दिया जाना चाहिए.

‘‘तुम्हें मेरी माली हालत पता ही है. पहले पिताजी की बीमारी के चलते लिया हुआ कर्ज उतारना पड़ा. इसी वजह से कुछ भी बचत नहीं हुई. फिर भी मैं तुम्हारे लिए यह घड़ी लाया हूं.

‘‘यह घड़ी सस्ती जरूर है, पर समय महंगी घडि़यों के बराबर ही बताती है. यह भी बताती है कि समय कीमती है, इसे बरबाद मत करो. और भी कुछ उपहार चाहिए हों तो मांग सकती हो, बशर्ते वह खरीदना मेरी हद में हो.’’

‘‘क्या मैं ऐसा कुछ चाहूं, जो आप की हद में हो तो आप देंगे?’’ निवेदिता ने झिझकते हुए पूछा.

‘‘जरूर,’’ आश्रय ने जवाब दिया.

‘‘मैं राज्य लोक सेवा आयोग की प्रशासनिक परीक्षा में बैठना चाहती हूं. क्या आप मुझे इजाजत देंगे? मुझे ओबीसी कोटे में जल्दी ही नौकरी भी मिल सकती है,’’ निवेदिता ने पूछा.

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‘‘तुम्हारी पढ़ाई के लैवल के बारे में मैं अच्छी तरह से जानता हूं. निवेदिता, तुम इस एग्जाम में बैठ सकती हो. एक बार पतिपत्नी के संबंध बन जाने के बाद काबू करना मुश्किल होता है, इसलिए मैं चाहता हूं कि जब तक तुम अपने इम्तिहान में कामयाब न हो जाओ, तब तक हम दोनों एक नहीं होंगे’’

‘‘क्या…? आप ने मुझ से शादी किसी मजबूरी में की है? क्या आप मुझे प्यार नहीं करते हैं?’’ निवेदिता ने घबरा कर पूछा, क्योंकि उसे इस तरह के जवाब की उम्मीद नहीं थी.

‘‘नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है. मैं तुम्हें काफी दिन से देख रहा हूं. मैं तुम से बहुत प्यार करता हूं, इसलिए तुम्हारे कामयाब होने के बाद ही हम दोनों इस प्यार के सच्चे हकदार होंगे,’’ आश्रय ने निवेदिता की गोरीगोरी कलाइयों को पकड़ते हुए कहा.

‘‘और, अगर मेरा चयन नहीं हो पाया तो…?’’ निवेदिता ने सवाल किया.

‘‘जब भी जोकुछ होगा, सिर्फ तुम्हारी रजामंदी से होगा,’’ आश्रय बोला.

‘‘बाहर सब को क्या जवाब देंगे?’’ निवेदिता ने पूछा.

‘‘किसी को कुछ कहने की जरूरत नहीं है. बस, इतना कहना है कि हमें अगले 3 साल तक बच्चे की जरूरत नहीं है,’’ आश्रय ने जवाब दिया.

‘‘वाह… आश्रय, मैं कल से ही पढ़ाई शुरू कर देती हूं.’’

दूसरे दिन से निवेदिता ने पढ़ाई शुरू कर दी. आश्रय ने अपनी मम्मी को भी निवेदिता की इच्छा के बारे में बता दिया. घर में 3 लोगों का काम बहुत ज्यादा नहीं था. रसोईघर का ज्यादातर काम आश्रय की मम्मी कर देती थीं.

निवेदिता देर रात तक पढ़ती, तो आश्रय बीच में चाय या कौफी बना कर उसे दे देता. कभीकभार सिर दुखने पर अपने हाथों से तब तक हलकीहलकी मसाज करता, जब तक कि निवेदिता की आंख न लग जाती.

आखिरकार वह ऐतिहासिक पल भी आ ही गया, जब निवेदिता सभी लिखित इम्तिहानों और इंटरव्यू में कामयाब हो कर डिप्टी कलक्टर बन गई.

‘‘अब सिर्फ प्यार,’’ निवेदिता  आश्रय के गले में बांहों का फंदा डाल कर बोली.

‘‘मेहनत तो तुम्हारी ही है निवेदिता. मैं तो सिर्फ तुम्हारे साथ था. तुम मेरी पत्नी हो गुलाम नहीं. आज तो सिर्फ और सिर्फ प्यार होगा,’’ आश्रय मुसकराता हुआ बोला.

अभी वे दोनों बात कर ही रहे थे कि अचानक आश्रय के मोबाइल फोन की घंटी बजी.

‘‘क्या…? कब…? अच्छाअच्छा… हम अभी पहुंचते हैं,’’ आश्रय घबराई आवाज में बोला.

‘‘क्या हुआ…?’’ निवेदिता ने चिंतित हो कर पूछा.

‘‘कुछ नहीं, बस तुम्हारे पापा की थोड़ी सी तबीयत खराब हो गई है,’’ आश्रय ने बताया.

निवेदिता और आश्रय जब तक पहुंचते, तब तक निवेदिता के पापा की मौत हो चुकी थी. अपनी मां को हिम्मत देने के लिए निवेदिता को वहीं पर रुकना पड़ा.

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निवेदिता को अपनी ट्रेनिंग की सूचना मिली, जो कि उस के मायके से तकरीबन 300 किलोमीटर दूर थी.

जौइन करने के साथ ही पता चला कि निवेदिता को अनुकूल शर्मा के अंडर ट्रेनिंग लेनी है.

अनुकूल शर्मा कुछ समय पहले तक निवेदिता के गृह जिले में ही थे और उन की अच्छे अफसरों में गिनती होती है.

अनुकूल शर्मा आ गए और अपने चैंबर में घुस गए. इजाजत ले कर निवेदिता भी चैंबर में आ गई.

‘‘तुम्हारे साथ वह बाहर कौन था?’’ लेटर देखते हुए अनुकूल शर्मा ने पूछा.

‘‘मेरे पति हैं,’’ निवेदिता ने कहा.

‘‘अब अगले 3 महीनों तक घरबार, पति, बच्चे सब भूल जाओ… समझी?’’ अनुकूल शर्मा ने कहा.

‘‘जी,’’ निवेदिता ने जवाब दिया.

‘‘मैं जा रहा हूं निवेदिता. अगले  3 महीनों तक खूब मेहनत करो. आगे की जिंदगी बहुत अच्छी होगी,’’ जातेजाते आश्रय ने निवेदिता से कहा.

अनुकूल शर्मा के अंडर में निवेदिता की टे्रनिंग खूब अच्छी चल रही थी. निवेदिता को अब तक सरकारी गाड़ी नहीं मिली थी. इसी वजह से वह अनुकूल शर्मा के साथ उन्हीं की सरकारी गाड़ी से टूर पर जाती थी.

ऐसे ही एक दिन जब वे दोनों टूर से लौट रहे थे, तो अनुकूल शर्मा बोले, ‘‘मुझे लगता है निवेदिता, तुम्हारे साथ ज्यादती हुई है.’’

‘‘आप को ऐसा क्यों लगता है सर…’’ निवेदिता ने अचरज भाव से पूछा.

‘‘तुम इतनी खूबसूरत और होशियार हो और तुम्हारा पति 12वीं जमात पास क्लर्क,’’ अनुकूल शर्मा ने कहा.

‘‘जिंदगी में हमें जो मिलता है, उसे हम बदल नहीं सकते,’’ निवेदिता बोली.

‘‘हम चाहें तो कुछ भी बदल सकते हैं. तुम ने भी यह नौकरी पा कर अपनी जिंदगी बदल दी है.’’

‘‘पर, अब किया क्या जा सकता है. आज मैं जोकुछ भी हूं, आश्रय के चलते ही हूं,’’ निवेदिता बोली.

‘‘कल उसी आश्रय के चलते तुम्हें शर्मिंदगी होगी. किसी पार्टी में तुम उसे ले जा नहीं पाओगी. तुम्हारे पीछे लोग उसे मखमल में टाट का पैबंद बताएंगे. रही कुछ करने की बात तो उस ने तुम पर कितने रुपए खर्च किए होंगे? लाख 2 लाख. तुम उसे 5 लाख दे कर हिसाब चुकता कर दो.

‘‘मैं ने भी अपनी देहाती पत्नी से तलाक के लिए अर्जी दी हुई है, क्योंकि वह मेरे स्टेटस के मुताबिक नहीं है. तुम भी ऐसा कर सकती हो. कल पछताने से आज सही फैसला लेना बेहतर है…’’ अनुकूल शर्मा बोले, ‘‘मुझे तो लगता है कि आश्रय मर्द ही नहीं है, वरना 3 साल तक कौन पति ऐसा होगा, जो अपनी पत्नी से दूर रहेगा?’’

निवेदिता ने कोई जवाब नहीं दिया.

दरअसल, पिछले 2 महीने से कुछ ज्यादा समय से साथ रहने के चलते अनुकूल शर्मा को ऐसा लगने लगा था कि निवेदिता उन की तरफ खिंच रही है.

एक दिन अचानक निवेदिता के पास कलक्टर का फोन पहुंचा और उसे तुरंत मिलने के लिए बुलाया गया.

‘‘बधाई हो निवेदिता, अनुकूल शर्मा जैसे काबिल अफसर ने आप की बहुत अच्छी रिपोर्ट दी है,’’ कलक्टर खुश हो कर बोले.

‘शुक्रिया सर’ कह कर निवेदिता कलक्टर औफिस से बाहर आ गई.

‘‘बधाई हो निवेदिता, एक पार्टी तो बनती ही है. ऐसा करते हैं कि आज  तुम औफिस का चार्ज ले लो. शनिवार और रविवार की छुट्टी है. हम पास  के शहर चलेंगे. वहां पार्टी करेंगे. सबकुछ मेरी तरफ से होगा,’’ अनुकूल शर्मा बोले.

‘‘जी सर,’’ कह कर निवेदिता अपने नए औफिस में चार्ज लेने चली गई.

जब आश्रय को निवेदिता के चार्ज लेने की बात पता चली, तो वह बहुत खुश हुआ. उस ने फोन पर अपने मन की बात कही.

‘‘तुम्हें देखने की बहुत इच्छा हो रही है. शनिवार और रविवार को छुट्टी है. मैं वहां आ जाता हूं.’’

‘‘अरे, नहींनहीं. शनिवार और रविवार को तो मुझे कलक्टर साहब के साथ राजधानी जाना है,’’ निवेदिता ने झूठ बोलते हुए उसे रोक दिया.

शुक्रवार की शाम जब आश्रय दफ्तर से घर लौटा, तो रसोईघर में से हलवा बनने की मस्त महक आ रही थी.

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‘‘मां, आज हलवा क्यों बन रहा है? कोई त्योहार है क्या?’’ दरवाजे से अंदर आते हुए आश्रय ने पूछा.

‘‘त्योहार से भी बढ़ कर है…’’ मां रसोईघर में से ही बोलीं.

‘‘मैं समझा नहीं,’’ आश्रय ने पूछा.

‘‘तो रसोईघर के भीतर आ कर देख ले,’’ मां बोलीं.

‘‘अरे, निवेदिता तुम…’’ रसोईघर में घुसते ही आश्रय खुशी से चिल्लाया.

निवेदिता ने अपनी स्थायी नियुक्ति तक की पूरी बात आश्रय को बता दी.

‘‘चलो निवेदिता, शाम का खाना हम कहीं बाहर खाते हैं,’’ आश्रय बोला.

‘‘नहीं, बिलकुल नहीं. इन 3 दिनों का एक पल भी मुझे किसी के साथ शेयर नहीं करना है. मुझे सिर्फ तुम और तुम चाहिए,’’ निवेदिता किसी जिद्दी बच्ची सी बोली.

शनिवार की सुबह तकरीबन 10 बजे अनुकूल शर्मा का फोन आया, ‘निवेदिता, कहां हो तुम? हमें पार्टी केलिए जाना था.’

‘‘सर, मैं स्वर्ग में हूं और यहां से नहीं आ सकती.’’

‘स्वर्ग… वह कहां है?’ अनुकूल शर्मा ने हैरानी से पूछा.

‘‘सर, यह हर उस जगह है, जहां पतिपत्नी अपने परिवार के साथ रहते हैं. मैं भी अपने पति के साथ हूं. आप ने ट्रेनिंग के दौरान मुझे एक बात सिखाई थी कि सोने का गहना कितना ही बड़ा क्यों न हो, अगर उस में छोटा सा हीरा लग जाए तो उस की कीमत दोगुनी हो जाती है.

‘‘आश्रय भी मेरी जिंदगी का एक ऐसा ही हीरा है, जिस के लगने से  मेरी जिंदगी अनमोल हो गई है. मुझे कभी भी आश्रय के चलते कोई शर्मिंदगी नहीं होगी.

‘‘धन्यवाद और नमस्कार सर. मैं आप से 2 दिन बाद मिलती हूं,’’ इतना कह कर निवेदिता ने फोन काट दिया.

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इस मल्टीनैशनल कंपनी पर यह दूसरी चोट है. इस से पहले भी एक बार यह कंपनी बिखर सी चुकी है. उस समय कंपनी की एक खूबसूरत कामगार स्नेहा ने अपने बौस पर आरोप लगाया था कि वे कई सालों से उस का यौन शोषण करते आ रहे हैं. उस के साथ सोने के लिए जबरदस्ती करते आ रहे हैं और यह सब बिना शादी की बात किए.

स्नेहा को लग रहा था कि बौस उस से शादी कर ही लेंगे क्योंकि वे घर सज्जा में भी उस की राय लेते रहे थे.

ऐसा नहीं था कि स्नेहा केवल खूबसूरत ही थी, काबिल नहीं. उस ने बीटैक के बाद एमटैक कर रखा था और वह अपने काम में भी माहिर थी. वह बहुत ही शोख, खुशमिजाज और बेबाक थी. उस ने अपनी कड़ी मेहनत से कंपनी को केवल देश में ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी कामयाबी दिलवाई थी.

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इस तरह स्नेहा खुद भी तरक्की करती गई थी. उस का पैकेज भी दिनोंदिन मोटा होता जा रहा था. वह बहुत खुश थी. चिडि़या की तरह हरदम चहचहाती रहती थी. उस के आगे अच्छेअच्छे टिक नहीं पाते थे.

पर अचानक स्नेहा बहुत उदास रहने लगी थी. इतनी उदास कि उस से अब छोटेछोटे टारगेट भी पूरे नहीं होते थे.

इसी डिप्रैशन में स्नेहा ने यह कदम उठाया था. वह शायद यह कदम उठाती नहीं, पर एक लड़की सबकुछ बरदाश्त कर सकती है, लेकिन अपने प्यार में साझेदारी कभी नहीं.

जी हां, स्नेहा की कंपनी में वैसे तो तमाम खूबसूरत लड़कियां थीं, पर हाल ही में एक नई भरती हुई थी. वह अच्छी पढ़ीलिखी और ट्रेंड लड़की थी. साथ ही, वह बहुत खूबसूरत भी थी. उस ने खूबसूरती और आकर्षण में स्नेहा को बहुत पीछे छोड़ दिया था.

इसी के चलते वह लड़की बौस की खास हो गई थी. बौस दिनरात उसे आगेपीछे लगाए रहते थे. स्नेहा यह सब देख कर कुढ़ रही थी. पलपल उस का खून जल रहा था.

आखिरकार स्नेहा ने एतराज किया, ‘‘सर, यह सब ठीक नहीं है.’’

‘‘क्या… क्या ठीक नहीं है?’’ बौस ने मुसकरा कर पूछा.

‘‘आप अपना वादा भूल बैठे हैं.’’

‘‘कौन सा वादा?’’

‘‘मुझ से शादी करने का…’’

‘‘पागल हो गई हो तुम… मैं ने तुम से ऐसा वादा कब किया…? आजकल तुम बहुत बहकीबहकी बातें कर रही हो.’’

‘‘मैं बहक गई हूं या आप? दिनरात उस के साथ रंगरलियां मनाते रहते…’’

बौस ने अपना तेवर बदला, ‘‘देखो स्नेहा, मैं तुम से आज भी उतनी ही मुहब्बत करता

हूं जितनी कल करता था… इतनी छोटीछोटी बातों पर ध्यान

मत दो… तुम कहां से कहां पहुंच

गई हो. अच्छा पैकेज मिल रहा है तुम्हें.’’

‘‘आज मैं जोकुछ भी हूं, अपनी मेहनत से हूं.’’

‘‘यही तो मैं कह रहा हूं… स्नेहा, तुम समझने की कोशिश करो… मैं किस से मिल रहा हूं… क्या कर रहा हूं, क्या नहीं, इस पर ध्यान मत दो… मैं जोकुछ भी करता हूं वह सब कंपनी की भलाई के लिए करता हूं… तुम्हारी तरक्की में कोई बाधा आए तो मुझ से शिकायत करो… खुद भी जिंदगी का मजा लो और दूसरों को भी लेने दो.’’

पर स्नेहा नहीं मानी. उस ने साफतौर पर बौस से कह दिया, ‘‘मुझे कुछ नहीं पता… मैं बस यही चाहती हूं कि आप वर्षा को अपने करीब न आने दें.’’

‘‘स्नेहा, तुम्हारी समझ पर मुझे अफसोस हो रहा है. तुम एक मौडर्न लड़की हो, अपने पैरों पर खड़ी हो. तुम्हें इस तरह की बातों पर ज्यादा ध्यान नहीं देना चाहिए.’’

‘‘आप मुझे 3 बार हिदायत दे चुके हैं कि मैं इन छोटीछोटी बातों पर ध्यान न दूं… मेरे लिए यह छोटी बात नहीं है… आप उस वर्षा को इतनी अहमियत न दें, नहीं तो…

‘‘नहीं तो क्या…?’’

‘‘नहीं तो मैं चीखचीख कर कहूंगी कि आप पिछले कई सालों से मेरी बोटीबोटी नोचते रहे हो…’’

बौस अपना सब्र खो बैठे, ‘‘जाओ, जो करना चाहती हो करो… चीखोचिल्लाओ, मीडिया को बुलाओ.’’

स्नेहा ने ऐसा ही किया. सुबह अखबार के पन्ने स्नेहा के बौस की करतूतों से रंगे पड़े थे. टैलीविजन चैनल मसाला लगालगा कर कवरेज को परोस रहे थे.

यह मामला बहुत आगे तक गया. कोर्टकचहरी से होता हुआ नारी संगठनों तक. इसी बीच कुछ ऐसा हुआ कि सभी सकते में आ गए. वह यह कि वर्षा का खून हो गया. वर्षा का खून क्यों हुआ? किस ने कराया? यह राज, राज ही रहा. हां, कानाफूसी होती रही कि वर्षा पेट से थी और यह बच्चा बौस का नहीं, कंपनी के बड़े मालिक का था.

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इस सारे मामले से उबरने में कंपनी को एड़ीचोटी एक करनी पड़ी. किसी तरह स्नेहा शांत हुई. हां, स्नेहा के बौस की बरखास्तगी पहले ही हो चुकी थी.

कंपनी ने राहत की सांस ली. उसने एक नोटीफिकेशन जारी किया कि कंपनी में काम कर रही सारी लड़कियां और औरतें जींसटौप जैसे मौडर्न कपड़े न पहन कर आएं.

कंपनी के नोटीफिकेशन में मर्दों के लिए भी हिदायतें थीं. उन्हें भी मौडर्न कपड़े पहनने से गुरेज करने को कहा गया. जींसपैंट और टाइट टीशर्ट पहनने की मनाही की गई.

इन निर्देशों का पालन भी हुआ, फिर भी मर्दऔरतों के बीच पनप रहे प्यार के किस्सों की भनक ऊपर तक पहुंच गई.

एक बार फिर एक अजीबोगरीब फैसला लिया गया. वह यह कि धीरेधीरे कंपनी से लेडीज स्टाफ को हटाया जाने लगा. गुपचुप तरीके से 1-2 कर के जबतब उन्हें बाहर का रास्ता दिखाया जाने लगा. किसीकिसी को कहीं और शिफ्ट किया जाने लगा.

दूसरी तरफ लड़कियों की जगह कंपनी में लड़कों की बहाली की जाने लगी. इस का एक अच्छा नतीजा यह रहा कि इस कंपनी में तमाम बेरोजगार लड़कों की बहाली हो गई.

इस कंपनी की देखादेखी दूसरी मल्टीनैशनल कंपनियों ने भी यही कदम उठाया. इस तरह देखते ही देखते नौजवान बेरोजगारों की तादाद कम होने लगी. उन्हें अच्छा इनसैंटिव मिलने लगा. बेरोजगारों के बेरौनक चेहरों पर रौनक आने लगी.

पहले इस कंपनी की किसी ब्रांच में जाते तो रिसैप्शन पर मुसकराती हुई, लुभाती हुई, आप का स्वागत करती हुई लड़कियां ही मिलती थीं. उन के जनाना सैंट और मेकअप से रोमरोम में सिहरन पैदा हो जाती थी. नजर दौड़ाते तो चारों तरफ लेडीज चेहरे ही नजर आते. कुछ कंप्यूटर और लैपटौप से चिपके, कुछ इधरउधर आतेजाते.

पर अब मामला उलटा था. अब रिसैप्शन पर मुसकराते हुए नौजवानों से सामना होता. ऐसेऐसे नौजवान जिन्हें देख कर लोग दंग रह जाते. कुछ तगड़े, कुछ सींक से पतले. कुछ के लंबेलंबे बाल बिलकुल लड़कियों जैसे और कुछ के बहुत ही छोटेछोटे, बेतरतीब बिखरे हुए.

इन नौजवानों की कड़ी मेहनत और हुनर से अब यह कंपनी अपने पिछले गम भुला कर धीरेधीरे तरक्की के रास्ते पर थी. नौजवानों ने दिनरात एक कर के, सुबह

10 बजे से ले कर रात 10 बजे तक कंप्यूटर में घुसघुस कर योजनाएं बनाबना कर और हवाईजहाज से उड़ानें भरभर कर एक बार फिर कंपनी में जान डाल दी थी.

इसी बीच एक बार फिर कंपनी को दूसरी चोट लगी. कंपनी के एक नौजवान ने अपने बौस पर आरोप लगाया कि वे पिछले 2 सालों से उस का यौन शोषण करते आ रहे हैं.

उस नौजवान के बौस भी खुल कर सामने आ गए. वे कहने लगे, ‘‘हां, हम दोनों के बीच ऐसा होता रहा है… पर यह सब हमारी रजामंदी से होता रहा?है.’’

बौस ने उस नौजवान को बुला कर समझाया भी, ‘‘यह कैसी नादानी है?’’

‘‘नादानी… नादानी तो आप कर रहे हैं सर.’’

‘‘मैं?’’

‘‘हां, और कौन? आप अपना वादा भूल रहे हैं.’’

‘‘कैसा वादा?’’

‘‘मेरे साथ जीनेमरने का… मुझ से शादी करने का.’’

‘‘तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है क्या?’’

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‘‘दिमाग तो आप का खराब हो गया है, जो आप मुझ से नहीं, एक लड़की से शादी करने जा रहे हैं.’’

Women’s Day- अपना घर: भाग 1

औफिस की घड़ी ने जैसे ही शाम के 5 बजाए जिया जल्दी से अपना बैग उठा तेज कदमों से मैट्रो स्टेशन की तरफ चल पड़ी. आज उस का मन एकदम बादलों की तरह उड़ रहा था. उड़े भी क्यों न, आज उसे अपनी पहली तनख्वाह जो मिली थी. वह घर में सब के लिए कुछ न कुछ लेना चाहती थी. रोज शाम होतेहोते उस का मन और तन दोनों थक जाते थे पर आज उस का उत्साह देखते ही बनता था. आइए अब जिया से मिल लेते हैं…जिया 23 वर्षीय आज के जमाने की नवयुवती है. सांवलासलोना रंग, आम की फांक जैसी आंखें, छोटी सी नाक, बड़ेबड़े होंठ. सुंदरता में उस का कहीं कोईर् नंबर नहीं लगता था पर फिर भी उस का चेहरा पुरकशिश था. घर में सब की लाडली, जीवन से अब तक जो चाहा वह मिल गया. बहुत बड़े सपने नहीं देखती थी. थोड़े में ही खुश थी.

वह तेज कदमों से दुकानों की तरफ बढ़ी. अपने 2 साल के भतीजे के लिए उस ने एक रिमोट से चलने वाली कार खरीदी. पापा के लिए उन की पसंद का परफ्यूम, मम्मी व भाभी के लिए सूट और साड़ी और भैया के लिए जब उस ने टाई खरीदी तो उस ने देखा कि बस उस के पास अब कुछ ही पैसे बचे हैं. अपने लिए वह कुछ न खरीद पाई. अभी पूरा महीना पड़ा था. बस उस के पास कुछ हजार ही बचे थे. उसे उन में ही अपना खर्चा चलाना था. मांपापा से वह कुछ नहीं लेना चाहती थी.

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जैसे ही वह शोरूम से निकली, बाजू वाली दुकान में उसे आसमानी और फिरोजी रंग के बहुत खूबसूरत परदे दिखाई दिए. बचपन से उस का अपने घर में इस तरह के परदे लगाने का मन था. दुकानदार से जब दाम पूछा तो उसे पसीना आ गया. दुकानदार ने मुसकराते हुए कहा कि ये चंदेरी सिल्क के परदे हैं, इसलिए दाम थोड़ा ज्यादा है पर ये आप के कमरे को एकदम बदल देंगे.

कुछ देर तक खड़ी वह सोचती रही. फिर उस ने वे परदे खरीद लिए. जब वह दुकान से निकली तो बहुत खुश थी. बचपन से वह ऐसे परदे अपने घर में लगाना चाहती थी, पर मां के सामने जब भी बोला उस की इच्छा घर की जरूरतों के सामने छोटी पड़ गई. आज उसे ऐसा लगा जैसे वह वाकई में स्वतंत्र हो गई है.

जब वह घर पहुंची तो रात हो चुकी थी. सब रात के खाने के लिए उस का इंतजार कर रहे थे. भतीजे को चूम कर उस ने सब के उपहार टेबल पर रख दिए. सब उत्सुकता के साथ उपहार देखने लगे. अचानक मां बोली, ‘‘तुम, अपने लिए क्या लाई हो?’’

जिया ने मुसकराते हुए परदों का पैकेट उन की तरफ बढ़ा दिया. परदे देख कर मां बोलीं, ‘‘यह क्या है…? इन्हें तुम पहनोगी?’’

जिया मुसकुराते हुए बोली, ‘‘मेरी प्यारी मां इन्हें हम घर में लगाएंगे.’’

मां ने परदे वापस पैकेट में रखे और फिर बोलीं, ‘‘इन्हें अपने घर लगाना.’’

जिया असमंजस से मां को देखती रही. उस की समझ में नहीं आया कि इस का क्या मतलब है. उस की भूख खत्म हो गई थी.

भाभी ने मुसकरा कर उस के गाल थपथपाते हुए कहा, ‘‘मैं आज तक नहीं समझ पाई, मेरा घर कौन सा है? जिया तुम अपना घर खुद बनाना,’’ और फिर भाभी ने बहुत प्यार से उस के मुंह में एक निवाला डाल दिया.

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आज पूरा घर पकवानों की महक से महक रहा था. मां ने अपनी सारी पाककला को निचोड़ दिया था. कचौरियां, रसगुल्ले, गाजर का हलवा, ढोकले, पनीर के पकौड़े, हरी चटनी, समोसे और करारी चाट. भाभी लाल साड़ी में इधर से उधर चहक रही थीं. पापा और भैया पूरे घर का घूमघूम कर मुआयना कर रहे थे. कहीं कुछ कमी न रह जाए. आज जिया को कुछ लोग देखने आ रहे थे. एक तरह से जिया की पसंद थी, जिस पर आज उस के घर वालों को मुहर लगानी थी. अभिषेक उस के औफिस में ही काम करता था. दोनों में अच्छी दोस्ती थी जिसे अब वे एक रिश्ते का नाम देना चाहते थे.

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ठीक 5 बजे एक कार उन के घर के सामने आ कर रुकी और उस में से 4 लोग उतरे. सब ने ड्राइंगरूम में प्रवेश किया. जिया ने परदे की ओट से देखा. अभिषेक जींस और लाइट ब्लू शर्ट में बेहद खूबसूरत लग रहा था.

सत्यकथा: ऐसे पकड़ा गया गे सेक्स रैकेट

—संवाददाता

अकसर ब्लैकमेलिंग के पोर्न वीडियो में लड़कालड़की होते हैं, किंतु मुंबई में पहली बार गे सैक्स का रैकेट चलाने वाले एक गिरोह द्वारा समलैंगिक पोर्न वीडियो बना कर नवयुवकों से ठगी का परदाफाश हुआ..

मुंबई के मल्टीनैशनल कंपनी में काम करने वाला 23 वर्षीय वशिष्ठ प्रताप (बदला हुआ नाम) अपने एकाकीपन और अकाउंट के उबाऊ काम के बोझ को कम करने के लिए डेटिंग ऐप का सहारा लिया करता था.

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कुछ समय के लिए औनलाइन डेटिंग की दुनिया में तफरीह कर वह तरोताजा महसूस करता था. दरअसल, उसे एक गर्लफ्रैंड की तलाश थी, क्योंकि उस की कोई गर्लफ्रैंड नहीं थी. इस के चलते उस ने कई डेटिंग ऐप पर अपने अकाउंट खोल रखे थे. उन पर उस की प्रोफाइल के मुताबिक किसी वैसी लड़की से दोस्ती नहीं हो पाई थी, जिस की उस ने कल्पना कर रखी थी.

एक दिन उसे एक नए डेटिंग ऐप ‘ग्राइंडर’ पर नजर पड़ी. उस ने तुरंत उस पर रजिस्टर कर अपना सेपरेट अकाउंट बना लिया. उस ऐप की खासियत यह थी कि वहां देसी लुक वाली लड़कियों की कई प्रोफाइल थी, जैसा वह चाहता था.

उस ने फटाफट कई लड़कियों को अपने अकाउंट से जुड़ने के लिए रिक्वेस्ट भेज दी. कुछ घंटे में ही कुछ का एक्सेप्टेंस भी आ गया. उन में उस ने एक को सेलेक्ट कर ओके कर दिया. फिर उस की चैटिंग के साथ डेटिंग शुरू हो गई.

2-4 दिनों की लुभावनी और मजेदार चैटिंग के बाद एक वीडियो आ गया. वीडियो खुदबखुद चल भी पड़ा. उसे देख कर उस के होश उड़ गए. दरअसल, वह एक गे सैक्स का वीडियो था. उस के 2 मिनट में खत्म होते ही एक मैसेज आया ‘न्यू ईयर पार्टी में आप का स्वागत है.’

कुछ सेकेंड में उस के पास एक काल आई, जिस में उसे बताया कि वह अगर थोड़े समय में पैसे कमाना चाहता है तो पार्टी में शामिल हो सकता है. पार्टी वर्चुअल भी होगी, लेकिन जूम ऐप पर सेलिब्रिटीज भी शामिल होंगे.

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उन के द्वारा ईनामी सवाल पूछे जाएंगे, जो कोरोना और लाइफस्टाइल से संबंधित होंगे. सही जवाब देने पर ईनाम की राशि पार्टी खत्म होते ही मिल जाएगी.

वशिष्ठ बगैर कुछ सोचविचार किए पार्टी में शामिल होने के लिए बताए गए उस पते पर चला गया, जहां एक फिक्स टाइम पर शाम के 8 बजे पार्टी का इंतजाम किया गया था.

बेसमेंट में बने छोटे से हाल में गिनती के 4-5 लोग थे. उन की वेशभूषा अजीबोगरीब थी. शोख अदाओं वाले फैशन में सजेसंवरे सभी उसी की उम्र के थे. उन के पहनावे न तो लड़कों जैसे थे और न ही लड़कियों जैसे. खैर, वशिष्ठ ने उन पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया.

कुछ मिनटों में ही वह समझ गया कि वह किसी गलत जगह आ गया है. दीवार पर टंगे टीवी के अलवा वहां स्टैंड पर कैमरे लगे थे. धीमी आवाज में म्यूजिक भी बज रहा था. 2 लड़के कैमरे के सामने टेबल पर चढ़ गए. म्यूजिक तेज हो गया.

टेबल से कुछ दूरी पर रखी कुरसियों पर बाकी लड़के बैठ गए. उन्होंने वशिष्ठ को बीच में बैठा लिया. उस के कंधे पर हाथ रख कर पकड़ बना ली. तब तक टेबल पर दोनों लड़के म्यूजिक की धुन पर डांस करने लगे थे.

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उन का डांस बेहद ही फूहड़ और अश्लील किस्म का था. वे कूल्हे मटकाने लगे थे और एकदूसरे के गले लगते हुए आपस में किस करना शुरू कर दिया था.

यह सब देख वशिष्ठ ने कुरसी से उठना चाहा, लेकिन दोनों लड़कों ने उस के कंधे को दबा कर बैठा दिया. इसी बीच डांस करते लड़कों ने अपनी शर्ट उतार कर वशिष्ठ की ओर फेंक दी, जिस से उस का चेहरा ढंक गया.

थोड़ी देर में वशिष्ठ दोनों लड़कों के बीच टेबल पर था और उस के कपड़े जबरन उतारे जाने लगे थे. उस ने चीखना चाहा. लड़कों को रोकना चाहा. लेकिन तेज म्यूजिक में उस की आवाज दब गई और अर्धनग्न लड़कों ने उस के अंगों को बेतरतीब ढंग से छूनासहलाना शुरू कर दिया था.

उस के बाद जो कुछ हुआ वह वशिष्ठ के शरीर और दिलोदिमाग दोनों पर चोट करने जैसा था. पीड़ा भी हुई. वह गे सैक्स के गिरोह का एक हिस्सा बन चुका था.

उस समय लड़कों ने उस का न केवल शारीरिक शोषण किया, बल्कि मानसिक तौर पर गे सैक्स के लिए प्रेरित भी किया. उस पर अप्राकृतिक सैक्स के लिए दबाव बनाया. इस के बदले में उस से पैसे मांगे. नहीं देने पर धमकियां दीं.

वास्तव में वशिष्ठ डेटिंग ऐप के जरिए गे सैक्स के गिरोह में फंस चुका था. उस से हर घंटे के हिसाब से एक हजार रुपए की मांग की गई थी. गिरोह की योजना के अनुसार उसे गे सैक्स के शौकीनों के पास भेजे जाने की थी. बदले में उसे भी पैसे मिलने के सब्जबाग दिखाए गए.

हालांकि उस रोज पैसा नहीं देने पर चारों युवकों ने उसे बुरी तरह पीटा. उस का फोन, पर्स और सोने की अंगूठी व सोने की चेन छीन ली. साथ ही आरोपी उसे धमका कर उस का एटीएम कार्ड ले कर उस का पिन भी ले लिया.

लड़कों ने जातेजाते उसे के साथ किए गए सैक्स की क्लिपिंग भी दिखा दी. धमकी दी कि उस के बुलावे पर नहीं आने की स्थिति में उस की क्लिपिंग को इंटरनेट पर सार्वजनिक कर दिया जाएगा.

बोरीवली का रहने वाला लुटापिटा वशिष्ठ किसी तरह से उन लड़कों के चंगुल से निकल पाया. घर पहुंच कर घर वालों को आपबीती बताई. घर वालों की पहल से वशिष्ठ के साथ हुए दुराचार की शिकायत थाना मालवानी पहुंची.

पुलिस ने इस मामले में तत्परता दिखाई. डीसीपी विशाल ठाकुर के निर्देश पर सीनियर इंसपेक्टर शेखर भालेराव और हसन मुलानी ने अपनी जांच टीम के साथ 16 जनवरी, 2022 को तड़के मास्टरमाइंड समेत 3 आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया. इन्हें गिरफ्तार करने के लिए पुलिस ने इलेक्ट्रौनिक सर्विलांस का सहारा लिया.

आरोपियों को उसी दिन शाम को बोरीवली कोर्ट में पेश किया गया. यहां से कोर्ट ने उन्हें 3 दिन की पुलिस हिरासत में भेज दिया.

उन से पूछताछ में पता चला कि यह गिरोह पिछले कई महीने से औनलाइन डेटिंग गे ऐप ‘ग्राइंडर’ के जरिए यह सैक्स रैकेट चला रहा था और ब्लैकमेलिंग भी करता था. पुलिस जांच में सामने आया है कि इन के क्लाइंट्स में कई हाईप्रोफाइल लोग भी शामिल हैं.

गिरफ्तार आरोपियों की पहचान इरफान फुरकान खान (26), अहमद फारुकी शेख (24) और इमरान शफीक शेख (24) के रूप में हुई. मामले के 2 अन्य आरोपी कथा लिखे जाने तक फरार थे. पुलिस उन्हें तलाश रही थी.

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आरोपी ऐप के माध्यम से ‘गे’ लोगों से संपर्क करते थे या फिर भोलेभाले लोगों को पैसे का लालच दे कर फंसाते थे. उन से पैसे ले कर सैक्स मुहैया कराने का वादा करते थे.

मुंबई में इस तरह का पहला मामला सामने आया था, जिस में गे सैक्स रैकेट के धंधे के साथसाथ लूटमार और वीडियो बना कर लोगों को ब्लैकमेल कर पैसे भी ऐंठने का काम किया जाता था.

पुलिस ने बताया कि ऐप डाउनलोड करने के बाद उस में पूरी डिटेल्स भरी जाती थी. उस के बाद एरिया के हिसाब से सभी समलैंगिक लड़के एकदूसरे के साथ जुड़ जाते थे. पहले बातचीत करते थे फिर मिल कर अनैतिक संबंध बनाते थे.

तीनों आरोपियों से पूछताछ के बाद पुलिस ने उन्हें फिर से कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया.

Women’s Day- नपुंसक: भाग 2

‘‘शायद बेटे की चाह या कहें औरत की लत पड़ जाने की वजह से मेरे पिता का मन अर्चना से भी दूर होता चला गया. उन की नजर अब एक विधवा पर थी जिस के पहले से 2 बच्चे थे. एक बेटा और एक बेटी. रूपरंग में वह विधवा सुंदर थी, उस की सुंदरता पर मेरे पिता रीझ उठे और उस से तीसरा विवाह कर लिया.

‘‘3 कमरों के छोटे से घर में वह 3 प्राणी और आ गए. मौसी और उस औरत में खूब लड़ाई होती थी. उस लड़ाई में मैं और मेरी छोटी बहन बिलकुल दब कर रह गईं. उस समय मेरी उम्र कोई 12 साल की रही होगी. मैं अकसर रोतीरोती अपनी मां की तसवीरें बनाती रहती थी. नतीजा यह निकला कि मैं चित्रकला में निपुण होती चली गई.

‘‘उस कच्ची उम्र में मुझे पता चला कि मेरी तीसरी मां, जिस का नाम किरण था, ने बच्चे बंद होने का आपरेशन पहले से ही करवा रखा था. किरण के कई पुरुषों से शारीरिक संबंध रह चुके थे और इसी बात को ले कर वह अकसर मेरे पिता से पिट जाया करती थी.

‘‘कुछ समय बाद ही मेरे पिता का तबादला जयपुर हो गया. जयपुर जाते समय वह बहुत खुश थे…शायद अर्चना और किरण भी. किरण को अपनी आजादी प्रिय थी और अर्चना को अपने पति से अकसर पिटने का डर था. पिता तो चले गए पर जाते समय उन्होंने एक नजर भी हमारी ओर नहीं देखा.

‘‘हम दोनों बहनें फिर से अकेली हो गईं. अर्चना मौसी कभीकभी हमें कोसतीं, कभीकभी प्यार करतीं. बस, यों ही समय बीतता गया. पिता का मन जयपुर में लग गया था, क्योंकि उन्हें वहां एक और औरत मिल गई थी. वह उन्हीं के आफिस में कार्यरत थी और उन से वरिष्ठ थी.

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‘‘पापा ने उस औरत को अपने मोहजाल में फंसाया और उस से विवाह रचा लिया. वह औरत मेरे पापा के प्यार में ऐसी पागल हुई कि अपना मकान भी उन के नाम कर दिया.

‘‘तब से ले कर अब तक वह जयपुर में हैं. सुना है, वहां पापा के 3 बच्चे हैं, 2 लड़के और 1 लड़की…’’

‘‘क्या तुम्हें कभी उन की कमी महसूस नहीं होती?’’ अनिरुद्ध ने बीच में टोकते हुए कहा.

‘‘सर…’’

वह उस की बात का जवाब देने वाली थी कि अनिरुद्ध बोल पड़ा, ‘‘तुम ने मुझे फिर सर कहा.’’

‘‘जब तक हम दोनों किसी रिश्ते में नहीं बंध जाते तब तक आप मेरे लिए सर ही रहेंगे.’’

‘‘तो तुम भी मेरे साथ बंधना चाहती हो?’’ उस ने आरुषी की आंखों में आंखें डाल कर पूछा.

‘‘कोई जबरदस्ती नहीं है, सर. मैं जिस परिवार से हूं, उस परिवार के किसी भी सदस्य से समाज का कोई व्यक्ति संबंध बनाना तो दूर, साथ खड़ा होना पसंद नहीं करता. जिस लड़की के बाप ने 4  शादियां कर रखी हों उस लड़की को लोग देखना तक पसंद नहीं करते पर उस का इस्तेमाल जरूर कर लेते हैं.’’

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अपनी कहानी को आगे बढ़ाते हुए आरुषी बोली, ‘‘हमारी मौसी ने भले ही हमें मन से पसंद न किया हो पर हमें संभाल कर रखा. इस उम्र में आ कर समझ में आता है कि उन का दबाव, रौब ठीक ही था. उन्हें एक बात का दुख जरूर रहता है कि वह हमारी शादी नहीं कर पाईं. पैसे की कमी अच्छेअच्छों को तोड़ देती है. शुरूशुरू में तो पिताजी पैसे भेजते थे, पर कुछ समय बाद उन्होंने पैसे भेजना एकदम बंद कर दिया. सुनने में आया था कि मेरी तीसरी मां किरण ने पापा को खर्चे के लिए नोटिस भेजा था, पापा ने हम तीनों का खर्चा बंद कर के उन तीनों का शुरू कर दिया.

‘‘पहले तो मौसी घर से दूर एक कालोनी के कुछ घरों में काम करती थीं, पर जब यह बात महल्ले में फैल गई तो उन्होंने वह काम बंद कर के कपड़े सिलना शुरू कर दिया. तब तक हम दोनों बहनें भी बड़ी हो गई थीं. हम ने ट्यूशन पढ़ाना शुरू कर दिया.

‘‘मेरा मन शायद चित्रकार बनने का इंतजार कर रहा था, इस में मेरी मदद की, मेरी मौसी, बहन और मेरे जनून ने. नतीजा तुम्हारे सामने है. पर अब लगता है मेरी उम्र कुछ ज्यादा ही हो गई. मेरे साथ की लड़कियों के बच्चे भी 15-16 साल के हो गए हैं. एक मैं हूं, अभी भी वहीं हूं जहां 20 साल पहले थी.

‘‘आज मेरे पास सभी कुछ है. एक मां सौतेली ही सही, छोटा सा अपना घर, पर नहीं है तो प्यार. छोटी बहन ने भी कोर्ट मैरिज कर के अपना घर बसा लिया और खुशी से रह रही है. मौसी ने मेरा घर बसाने की कोशिश तो की पर मेरी फोटो से पहले मेरे पापा के कारनामे वहां पहुंच जाते थे.

‘‘लड़कों की देखादेखी में मेरी उम्र 30 से ऊपर की हो चली थी. मैं ने मौसी को शादी करने से साफ इनकार कर दिया था. मौसी मुझ से पूछती थीं कि आरुषी, सारी जिंदगी अकेली कैसे गुजारोगी तो मेरा जवाब होता था कि मौसी, तुम तो शादी कर के भी अकेली रह रही हो, मैं बिना शादी के रह लूंगी. कम से कम इतनी तसल्ली तो है कि मुझे कोई धोखा नहीं दे रहा. बेचारी मौसी भी निरुत्तर हो जाया करती थीं.’’

‘‘आरुषी, तुम ने अपने पापा को वापस बुलाने के लिए या खर्चे के लिए कोर्ट का सहारा नहीं लिया?’’

‘‘जिस औरत के पास हमारी किताबों के पैसे तक नहीं होते थे वह वकील के पैसे कहां से लाती,’’ आरुषी ने लाचारी जाहिर करते हुए कहा, ‘‘सर, आप को मैं ने अपनी जिंदगी के बारे में सबकुछ सचसच बता दिया है. मेरे जीवन का एकएक पन्ना आप के सामने खुल गया है. आप जो भी फैसला करेंगे मुझे खुशीखुशी मंजूर होगा.’’

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‘‘आरुषी, तुम ने तो अपने पन्ने मेरे सामने खोल कर रख दिए पर मेरा भी एक पन्ना है, जो किसी के भी सामने नहीं खुला है. मैं तुम्हें पहले ही बता दूं कि तुम्हारे साथ कोई जबरदस्ती नहीं है, तुम्हारी जिंदगी है और तुम अपनी जिंदगी की स्वयं मालिक हो. बस, इतनी सी प्रार्थना है कि मुझ से दोस्ती कभी मत तोड़ना,’’ इतना कहते हुए अनिरुद्ध की आंखों में पानी आ गया.

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Women’s Day- ऐसा कैसे होगा: उम्र की दहलीज पर आभा

बड़े बाबू के पूछने पर मैं ने अपनी उम्र 38 वर्ष बताई, सहज रूप में ही कह दिया था, ‘38…’ हालांकि बड़े बाबू अच्छी तरह जानते थे कि मेरी जन्मतिथि क्या है, शायद उन्होंने उस पर इतना ध्यान भी नहीं दिया. लेकिन तभी मुझे एहसास हुआ कि मैं अपनी उम्र कम बता रही हूं. यह बात शायद बड़े बाबू जान गए थे और अपनी नाक पर टिके चश्मे से ऊपर आंखें चमका कर मुझे उपहासभरी दृष्टि से देख रहे थे.

वैसे मैं 39 वर्ष 7 महीने 11 दिन की हो गई हूं. सामान्यरूप से इसे 40 वर्ष की उम्र कहा जा सकता है. किंतु मैं 40 वर्ष की कैसे हो सकती हूं? 40 वर्ष तक तो व्यक्ति प्रौढ़ हो जाता है. लेकिन मैं तो अभी जवान हूं, सुंदर हूं, आकर्षक हूं.

नौजवान सहयोगी हसरतभरी निगाहों से मुझे देखते हैं. लोगों की आंखों को मैं पढ़ सकती हूं, भले ही उन में वासना के कलुषित डोरे रहते हैं, कामातुर विकारों से ग्रस्त रहती हैं उन की आंखें, फिर भी मुझे अच्छा लगता है. मुझ से बातें करने की उन की ललक, मेरी यों ही अनावश्यक तारीफ, मेरे कपड़ों के रंग, मेरा मुसकराना, बोलने का लहजा, काम करने का तरीका आदि अनेक चीजें हैं, जो काबिलेतारीफ कही जाती हैं. दूसरों की आंखों में आंखें डाल कर बात करने का मेरा सलीका लोगों को प्रभावित करता है. ये बातें मैं उन तमाम निकटस्थ सहयोगियों के क्रियाकलापों से जान जाती हूं.

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मेरा मन चाहता है कि लोग मुझे घूरें, मेरे मांसल शरीर के ईदगिर्द अपनी निगाहें डालें, मेरा सामीप्य पाने के लिए बहाने ढूंढ़ें, मुझ से बातें करें व प्रेम करने की हद तक भाव प्रदर्शित करें.

किंतु मैं 40 वर्ष की कैसे हो सकती हूं? अभी तो मैं ने कौमार्यवय की अठखेलियों में भाग ही नहीं लिया, जवानी के उफनते वेग में पागल भी नहीं हुई. किसी के प्रणय में मदांध होना तो दूर, स्वच्छंद रतिविलासों का अनुभव भी नहीं किया. किसी के लौह बंधन में बंध कर चरमरा कर बिखर जाने की कामना अभी पूरी कहां हुई है? नारीत्व के समर्पित सुख का अनुभव कहां लिया है? मैं अभी 40 वर्ष की प्रौढ़ा कैसे हो सकती हूं?

मैं ने जब से इस बढ़ती उम्र के गणित को सोचना प्रारंभ किया है, घबरा गई हूं, मन बेचैन सा हो गया है. शरीर में अचानक शिथिलता आ गई है. गालों पर कसी हुई त्वचा जैसे अपने कसाव कम कर रही है. ऐसा लग रहा है जैसे नदी उतर रही है, उस में आई बाढ़ जैसे घट रही है. आंखों के नीचे हलके निशान उभर आए हैं. हलकी सी श्यामलता चेहरे पर छा रही है.

लेकिन यह कैसे हो सकता है? बाबूजी की मृत्यु को 4 बरस हो गए. छोटू का इस बार एमबीबीएस कोर्स पूरा हो जाएगा, लेकिन उसे एमडी बनना है, 2-3 साल अभी लगेंगे. विभा इस वर्ष स्नातिका हो जाएगी. मामाजी ने उस के लिए एक रिश्ते की बात की है. अगले मार्च में उस की शादी कर देंगे. छोटू का भी कुछ प्रेमप्रसंग जोरशोर से चल रहा है, लड़की पंजाबी है, साथ पढ़ती है, इस में बुराई भी क्या है.

लेकिन, मैं अब क्या करूंगी? सोचती थी कि इन 4 सालों में विभा की पढ़ाई पूरी हो जाएगी और छोटू घर संभाल लेगा, तब मैं आजाद हो जाऊंगी. मेरे चाहने वाले बहुत हैं, ढेर सारे उम्मीदवार हैं, तब अपने विषय में सोचूंगी एकदम निश्ंिचत हो कर. लेकिन, इस अवधि में मैं 40 वर्ष की प्रौढ़ा कैसे हो सकती हूं?

घर वालों से मुझे कोई शिकायत नहीं है. बाबूजी कई रिश्ते लाए थे. जातिबिरादरी के, ऊंचे खानदान वाले, बड़ीबड़ी मांगों, दहेज की आकांक्षा वाले लोग. बाबूजी मेरा विवाह कर भी सकते थे. लेकिन तब छोटू एमबीबीएस न कर पाता, विभा बीए की पढ़ाई भी न कर पाती. सारी जमा पूंजी समाप्त हो जाती. मैं बड़ी बेटी हूं न, सारी समस्याएं जानती हूं.

शादी का नाम लेते ही मैं चिढ़ जाती थी, काटने दौड़ती थी. लोग मेरे सामने शादी की बात करने से डरते थे. वे मेरी आलोचना भी करते थे. भलाबुरा भी कहते थे. कोई कहता, ‘गोल्ड मैडलिस्ट है न, इसीलिए दिमाग आसमान पर चढ़ा है.’

दूसरा कहता, ‘रूपगर्विता है, अपने सौंदर्य का बड़ा अभिमान है.’

शादी के नाम पर जैसे मुझे सचमुच चिढ़ थी. किसी की ताबेदारी में रहना मुझे स्वीकार न था.

अच्छी कंपनी में इज्जत की नौकरी है, अच्छीखासी तनख्वाह है, प्रतिष्ठा है. औफिस में रोबदाब है, घर में भी लोग डरते हैं. छोटू और विभा भी सामने आने से कतराते हैं. मां भी जैसे खुशामद सी करती हैं. सबकुछ असहज और अस्वाभाविक लगता है. मन करता है कि विभा मेरे गले में बांहें डाल कर लिपट जाए, छोटू मेरी चोटी खींच कर भाग जाए. मां मुझे डांटें, धमकाएं, लेकिन वह सब कतई बंद है.

मां की बीमारी बढ़ गई है, उन्हें अस्पताल में भरती कराना ही पड़ेगा. डाक्टर ने साफ कह दिया है कि अब ज्यादा दिन नहीं जिएंगी. अंतिम अवस्था है.

लेकिन मेरी अंतिम अवस्था नहीं है. मैं घुलघुल कर नहीं मरूंगी, अपने वजूद को बचा कर रखूंगी. मुझे अभी प्रौढ़ा नहीं बनना है.

अपना राजपाल है न, मुझ पर जान देता है. हमउम्र और हमपेशा भी है. बेचारा विधुर है, 10 साल से एकाकी है. मेरे खयाल से उस से मिलना चाहिए. वह वासना और प्रेम का अंतर जानता है, उस में गहरी समझदारी है.

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एक बार समझदारी के साथ ही उस ने शादी का अप्रत्यक्ष प्रस्ताव भी रखा था और मैं उस के प्रस्ताव से प्रभावित भी थी.

वह बोला था, ‘क्या ऐसा नहीं हो सकता कि हम दोनों इस मुद्दे पर एक लंबी वार्त्ता करें, जिस में अनेक सत्र हों, जो दिनों, महीनों, वर्षों तक चले. अब हमारेतुम्हारे पास विषय तो बहुत से हैं न, उन सभी विषयों पर सलीके से बातें करें. उन पर सोचें, व्यवहार करें, तुम मेरे विचारों की प्रयोगशाला बन जाओ और मैं तुम्हारे खयालों की ठोस जमीन. हम दोनों एकदूसरे से अपने प्रश्नों का समाधान कराएं. क्या तुम अपनी बकाया जिंदगी मेरे ऊलजलूल प्रश्नों को सुलझाने के लिए मेरे नाम कर सकती हो? क्या मैं तुम्हें समझने की कोशिश में तमाम उम्र बिता सकता हूं? सच कहता हूं, मैं तुम्हारी अनंत जिज्ञासाओं का एकमात्र समाधान हूं. मेरे अंतर्मन के पृष्ठों को पलट कर तो देखो.’

मैं कई दिनों से राजपाल के विषय में ही सोच रही हूं. वह एक परिपक्व व्यक्तित्व की गरिमा से युक्त है, संवेदनशील है. उस में कोई छिछोरापन नहीं है. प्रणय प्रस्ताव रखने में भी समझदारी से काम लेता है.

एक दिन कहने लगा, ‘आभा, तुम्हारे होंठों पर लगी लिपस्टिक और मेरे पैन की स्याही एकजैसी है, हलकी मैरून. यह रंग मन की अनुराग भावना को व्यक्त करता है, क्यों?’

मैं ने हलकी सी मुसकराहट फेंकी और आगे बढ़ गई. उस की बात बहुत दिनों तक मेरा पीछा करती रही. वह एक सभ्य और जिम्मेदार अफसर है. उस के साथ उठाबैठा जा सकता है.

कल मां को अस्पताल में भरती करा दूंगी. छोटू को स्कौलरशिप मिलती है. विभा की शादी के लिए बाबू की एफडी तो है. मामाजी सब संभाल लेंगे. मैं आज शाम को राजपाल के बंगले पर जाऊंगी, साफसाफ बात करूंगी और आजकल में ही निर्णय ले लूंगी.

मुझे अभी 40 साल की प्रौढ़ा नहीं बनना. 40 साल में अभी 5 महीने बाकी हैं. इन 5 महीनों में मैं अपना कौमार्य अनुभव करूंगी, नाचूंगी, गाऊंगी, आकाश में उड़ूंगी, सितारों से बातें करूंगी, चांद को छू कर देखूंगी.

अभी मुझे 40 साल की नहीं होना, सबकुछ व्यवस्थित हो गया है, सबकुछ ठीकठाक है.

स्नान करने के बाद मैं ने हलका सा मेकअप किया व नीली साड़ी पहनी. होंठों पर हलके मैरून रंग की लिपस्टिक लगाई. फिर विदेशी इत्र की सुगंध से सराबोर हो कर चल दी अपना अंतिम निर्णय लेने, अपने निश्चित गंतव्य के लिए.

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