आशंका: भाग 2

‘‘फिर तो देर होने का सवाल ही नहीं उठता सर,’’ विभोर ने आश्वासन दिया. उस के बाद वह काम में जुट गया.

रणबीर इस प्रोजैक्ट में कुछ ज्यादा ही दिलचस्पी ले रहा था, अकसर साइट पर भी आता रहता था. एक सुबह जब विभोर साइट पर जा रहा था तो उस ने देखा कि ढलान शुरू होने से कुछ पहले उस के कई सहकर्मियों की गाडि़यां और मोटरसाइकिलें, स्कूटर सड़क के किनारे खड़े हैं और कुछ लोग उस की गाड़ी को रोकने को हाथ हिला रहे हैं.

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‘‘रणबीर साहब की गाड़ी भी खड़ी है साहब,’’ ड्राइवर ने गाड़ी रोकते हुए कहा.

विभोर चौंक पड़ा कि क्या वे इतनी सुबह यहां मीटिंग कर रहे हैं?

‘‘सर, बड़े साहब की गाड़ी में उन की लाश पड़ी है,’’ उसे गाड़ी से उतरते देख कर एक आदमी लपक कर आया और बोला.

विभोर भागता हुआ गाड़ी के पास पहुंचा. रणबीर ड्राइवर की सीट पर बैठा था, उस की दाहिनी कनपटी पर गोली लगी थी और दाहिने हाथ में रिवौल्वर था. सीटबैल्ट बंधी होने के कारण लाश गिरी नहीं थी. रणबीर जौगर्स सूट और शूज में थे यानी वे सुबह को सैर के लिए तैयार हुए थे. ‘वे तो घर के पास के पार्क में ही सैर करते थे. फिर गाड़ी में यहां कैसे आ गए?’ विभोर सोच ही रहा था कि तभी पुलिस की गाड़ी आ गई.

इंस्पैक्टर देव को देख कर विभोर को तसल्ली हुई. उस के बारे में मशहूर था कि कितना भी पेचीदा केस क्यों न हो वह सप्ताह भर में सुलझा लेता है.

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‘‘लाश पहले किस ने देखी?’’ देव ने पूछा.

‘‘मैं ने इंस्पैक्टर,’’ एक व्यक्ति सामने आया, ‘‘मैं प्रोजैक्ट मैनेजर विभास हूं. मैं जब साइट पर जाने के लिए यहां से गुजर रहा था तो साहब की गाड़ी खड़ी देख कर रुक गया. गाड़ी के पास जा कर मैं ने अधखुले शीशे से झांका तो साहब को खून में लथपथ पाया. मैं ने तुरंत साहब के घर और पुलिस को फोन कर दिया.’’

कुछ देर बाद रणबीर की पत्नी गरिमा, बेटी मालविका, बेटा कबीर, छोटा भाई सतबीर और उस की पत्नी चेतना आ गए. देव ने शोकविह्वल परिवार को संयत होने के लिए थोड़ा समय देना बेहतर समझा. कुछ देर के बाद गरिमा ने विभोर से पूछा कि क्या साइट पर कुछ गड़बड़ है, क्योंकि आज रणबीर रोज की तरह सुबह सैर पर निकले थे, पर चंद मिनट बाद ही लौट आए और चौकीदार से गाड़ी की चाबी मंगवा कर गाड़ी ले कर चले गए.

‘‘हमें तो किसी ने फोन नहीं किया,’’ विभास और विभोर ने एकसाथ कहा, ‘‘और साइट के चौकीदार को तो हम ने साहब का नंबर दिया भी नहीं है.’’

‘‘क्या मालूम भैया ने खुद दे दिया हो,’’ सतबीर बोला, ‘‘वह इस प्रोजैक्ट में कुछ ज्यादा ही दिलचस्पी ले रहे थे.’’

‘‘अगर किसी ने फोन किया था तो इस का पता मोबाइल से चल जाएगा,’’ देव ने कहा, ‘‘यह बताइए यह रिवौल्वर क्या रणबीर साहब का अपना है?’’

गरिमा और बच्चों ने इनकार में सिर हिलाया.

‘‘मैं इस रिवौल्वर को पहचानता हूं इंस्पैक्टर,’’ सतबीर बोला, ‘‘यह हमारा पुश्तैनी रिवौल्वर है.’’

‘‘लेकिन यह रिवौल्वर था कहां सतबीर?’’ गरिमा ने पूछा.

सतबीर ने कंधे उचकाए, ‘‘मालूम नहीं भाभी. दादाजी के निधन के कुछ समय बाद मैं पढ़ने के लिए बाहर चला गया था. जब लौट कर आया तो पापा पुरानी हवेली बेच कर हम दोनों भाइयों के लिए नई कोठियां बनवा चुके थे. पुराने सामान का खासकर इस रिवौल्वर का क्या हुआ, मुझे खयाल ही नहीं आया.’’

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‘‘चाचा जब बड़े दादाजी गुजरे तब दयानंद काका थे क्या?’’ कबीर ने पूछा.

‘‘हां, क्यों?’’

‘‘क्योंकि दयानंद काका को जरूर मालूम होगा कि यह रिवौल्वर किस के पास था,’’ कबीर बोला.

‘‘यह दयानंद काका कौन हैं और कहां मिलेंगे?’’ देव ने उतावली से पूछा.

‘‘घर के पुराने नौकर हैं और हमारे साथ ही रहते हैं,’’ गरिमा बोली.

‘‘उन से रिवौल्वर के बारे में पूछना बहुत जरूरी है, क्योंकि आत्महत्या दिखाने की कोशिश में हत्यारे ने गोली चला कर रिवौल्वर मृतक के हाथ में पकड़ाया है,’’ देव बोला.

‘‘दयानंद काका आ गए,’’ तभी औटो से एक वृद्ध को उतरते देख कर मालविका ने कहा.

‘‘साहब, काकाजी की जिद्द पर हमें इन्हें यहां लाना पड़ा,’’ दयानंद के साथ आए एक युवक ने कहा.

‘‘अच्छा किया,’’ सतबीर ने कहा और सहारा दे कर बिलखते दयानंद को गाड़ी के पास ले गया.

‘‘इस रिवौल्वर को पहचानते हो काका?’’ देव ने कुछ देर के बाद पूछा.

दयानंद ने आंसू पोंछ कर गौर से रिवौल्वर को देखा. फिर बोला, ‘‘हां, यह तो साहब का पुश्तैनी रिवौल्वर है. यह यहां कैसे आया?’’

‘‘यह रिवौल्वर किस के पास था?’’ सतबीर ने पूछा.

‘‘किसी के भी नहीं. बड़े बाबूजी के कमरे की अलमारी में जहां उन का और मांजी का सामान रखा है, उसी में रखा रहता था.’’

‘‘आप को कैसे मालूम?’’ कबीर ने पूछा.

‘‘हमीं से तो रणबीर भैया उस कमरे की साफसफाई करवाते थे. इस इतवार को भी करवाई थी.’’

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‘‘तब मैं कहां थी?’’ गरिमा ने पछा.

‘‘होंगी यहीं कहीं,’’ दयानंद ने अवहेलना से कहा.

‘‘भैया कब क्या करते थे, इस की कभी खबर रखी आप ने?’’

‘‘पहले मेरे सवाल का जवाब दो काका,’’ देव ने बात संभाली, ‘‘उस रोज क्या उन्होंने यह रिवौल्वर अलमारी से निकाला था?’’

‘‘जी हां, हमेशा ही सब चीजें निकालते थे, फिर उन्हें बड़े प्यार से पोंछ कर वापस रख देते थे.’’

‘‘इतवार को भी रिवौल्वर वापस रखा था?’’

‘‘मालूम नहीं, हम तो अपना काम खत्म कर के भैया को वहीं छोड़ कर आ गए थे.’’

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मनोहर कहानियां: प्रेमी की खातिर

 नसीम अंसारी कोचर 

18सितंबर, 2021 की रात को बिहार के शहर मुजफ्फरपुर के टाउन थाना क्षेत्र के बालूघाट इलाके में स्थित एक मकान की तीसरी मंजिल के कमरे में अचानक तेज धमाका हुआ. धमाके की आवाज के साथ बंद कमरे के खिड़कीदरवाजे की झिर्रियों से काला धुआं निकलने लगा.

पहले लोगों को लगा कि मकान के भीतर कोई बम फटा है. कुछ लोगों ने अंदाजा लगाया कि शायद गैस सिलिंडर फटा है. कुछ ही देर में वहां भारी भीड़ जुट गई, मगर मकान के भीतर जाने की हिम्मत किसी की नहीं हो रही थी. मकान से निकलने वाला बदबूदार धुआं हवा में फैलता जा रहा था.

इसी दौरान भीड़ में मौजूद किसी व्यक्ति ने इस की सूचना फोन द्वारा पुलिस को दे दी. इस सूचना पर थोड़ी देर में पुलिस की गाड़ी और फायर ब्रिगेड वहां पहुंच गई. पुलिस और फायर ब्रिगेड कर्मचारी जब दरवाजा तोड़ कर भीतर पहुंचे तो वहां का दृश्य देख कर उन के होश उड़ गए. वहां एक ड्रम गिरा पड़ा था. आसपास मांस के लोथड़े बिखरे हुए थे. ड्रम से बदबूदार धुआं बाहर निकल रहा था. लग रहा था जैसे कि ड्रम में कोई कैमिकल हो.

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फायर ब्रिगेड ने खिड़की और अन्य सामान में लगी आग बुझाई. धुआं छंटा तो ड्रम के भीतर मानव शरीर के टुकड़े मिले. पुलिस ने सभी टुकड़े इकट्ठे किए तो उन की संख्या 8 थी. वे टुकड़े किसी पुरुष के थे, जिन्हें शायद ड्रम के भीतर भरे कैमिकल में गलाने के लिए डाला गया था. कमरे में और कोई नहीं था.

पुलिस के सामने बड़ा सवाल उस लाश की पहचान का था. आखिर वह कौन था? उसे क्यों मारा गया? किस ने मारा? मार कर उस की लाश गलाने के लिए ड्रम में कैमिकल के भीतर किस ने डुबोई? कातिल एक था या कई थे? ऐसे अनेक सवाल पुलिस के सामने थे.

पुलिस ने लाश की पहचान के लिए बाहर खड़े लोगों को बुलाया. मगर कोई भी उस लाश को नहीं पहचान पाया. तभी भीड़ से एक आदमी निकल कर लाश के काफी करीब पहुंच गया. वह झुक कर लाश को गौर से देखने लगा और फिर उस ने एक चौंकाने वाला खुलासा किया.

उस ने कहा कि उस का नाम दिनेश साहनी है और यह लाश उस के भाई राकेश साहनी की है, जो शराब का अवैध धंधा करता था और जिस के खिलाफ पुलिस ने वारंट निकाल रखा था.

गौरतलब है कि बिहार में शराबबंदी लागू है. राकेश लंबे समय से पुलिस से छिपछिप कर यहांवहां रह रहा था. मगर वह मारा जा चुका है, इस बात से उस के घरवाले बेखबर थे.

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लाश की शिनाख्त होने के बाद पुलिस ने मकान मालिक सुनील कुमार शर्मा को पूछताछ के लिए हिरासत में ले लिया. दरअसल, किताब कारोबारी सुनील कुमार शर्मा के इस मकान में कई कमरे थे, जिसे उस ने अलगअलग लोगों को किराए पर दे रखे थे.

जिस कमरे से लाश मिली, वह सुनील ने सुभाष नाम के व्यक्ति को किराए पर दिया हुआ था. लेकिन इधर काफी दिनों से सुभाष और उस का परिवार यहां दिख नहीं रहा था. आसपास के लोग सोच रहे थे कि शायद वह सपरिवार गांव गया हुआ है.

दिनेश साहनी की तहरीर पर पुलिस ने हत्या का मामला दर्ज कर तफ्तीश शुरू कर दी. पुलिस का पहला लक्ष्य था सुभाष की तलाश करना. राकेश नाम के जिस व्यक्ति की लाश टुकड़ों में पुलिस को मिली थी, वह शराब का अवैध धंधा करता था और सुभाष भी उस के धंधे में बराबर का शरीक था.

मकान मालिक से हुई पूछताछ

मकान मालिक सुनील कुमार शर्मा ने पुलिस को बताया कि जब उस ने सुभाष को यह कमरा किराए पर दिया था, तब उस ने बताया था कि वह मुजफ्फरपुर के कर्पूरी नगर का रहने वाला है. वहां उस के घर में बाढ़ का पानी घुस गया है, इस वजह से वह कुछ दिन इस मकान में किराए पर रहना चाहता है.

सुनील ने अपने बयान में कहा, ‘‘मैं ने उस को कमरा इसलिए किराए पर दे दिया क्योंकि उस ने किराए में कोई रियायत नहीं मांगी, उलटा बाकी किराएदारों द्वारा दिए जा रहे किराए से एक हजार रुपए ज्यादा दिए और एडवांस किराया औनलाइन ही अकाउंट में जमा करवा दिया.

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‘‘फिर वह अपनी पत्नी और 3 बच्चों के साथ यहां रहने लगा. कुछ दिन बाद उस की साली और साढ़ू भी यहां आ कर उस के साथ रहने लगे. मगर 3 दिन से कमरे पर ताला लटका था तो लगा कि वह अपने पुराने मकान में गए होंगे.’’

उधर राकेश के बारे में पुलिस को पता चला कि 5 साल पहले उस ने राधा से शादी की थी. उस के 3 बच्चे हैं. वह सुभाष के साथ मिल कर अवैध शराब का धंधा चलाता था और फिलहाल पुलिस से जान बचा कर भागा हुआ था. उस की पत्नी राधा भी उसी दिन से गायब है जिस दिन से राकेश गायब है.

पुलिस को यह भी पता चला कि जबजब राकेश पुलिस से बचने के लिए फरार होता था, उस की पत्नी बच्चों को ले कर सुभाष के इसी मकान में आ जाती थी और सुभाष ही उन का खयाल रखता था.

कुछ लोगों ने यह भी बताया कि सुभाष और राधा के बीच अफेयर चल रहा था. आसपास के कुछ लोग तो यही समझते थे कि राधा सुभाष की पत्नी है. ऐसा समझने वालों में मकान मालिक सुनील शर्मा भी था.

पुलिस को सुभाष और राधा के ऊपर शक पक्का हो गया और वह तेजी से उन की तलाश में जुट गई. शहर भर के होटलों, बस अड््डों और रेलवे स्टेशन पर उन की खोज शुरू हो गई. आखिरकार पुलिस की तेजी काम आई और पुलिस ने सुभाष और राधा को शहर के स्टेशन रोड से गिरफ्तार कर लिया. दोनों दिल्ली भागने की फिराक में थे और ट्रेन पकड़ने के लिए निकले थे.

पुलिस ने उन की निशानदेही पर अहियापुर थाने के संगम घाट के पास से खून से सने कपड़े व बिस्तर भी बरामद किया. कपड़े  सुभाष, राधा और अन्य आरोपियों के थे.

जिन लोगों को पुलिस और अन्य लोग सुभाष की साली और साढ़ू समझ रहे थे, दरअसल वे राकेश की साली यानी राधा की बहन कृष्णा देवी और उस का पति विकास कुमार था, जो सुभाष और राधा के साथ राकेश साहनी की हत्या में शामिल थे.

सुभाष के बताने पर पुलिस ने दोनों को पकड़ने के लिए सीतामढ़ी व शिवहर में छापेमारी की, मगर सुभाष और राधा की गिरफ्तारी की खबर पा कर दोनों वहां से फरार हो चुके थे.

राधा निकली मास्टरमाइंड

पुलिस ने सुभाष और राधा को थाने ला कर जब सख्ती से पूछताछ की तो राकेश की हत्या की रोंगटे खड़े कर देने वाली एक भयानक कहानी सामने आई.

दरअसल, अवैध शराब के धंधेबाज राकेश कुमार की हत्या की साजिश 2 माह से रची जा रही थी. इस साजिश में उस का दोस्त सुभाष, राकेश की पत्नी और सुभाष की प्रेमिका राधा, राधा की बहन कृष्णा और उस का पति विकास शामिल था.

राकेश की हत्या कर शव के डिस्पोजल की तैयारी भी पूरी कर ली थी. शव को गलाने के लिए कैमिकल का इंतजाम किया गया था. शव से उठने वाली दुर्गंध को बाहर फैलने से रोका जा सके, इस के लिए अगरबत्ती का इंतजाम भी किया गया था.

राकेश की हत्या के पीछे कारण था सुभाष और राधा का नाजायज रिश्ता. दरअसल, शराब के धंधे के चलते राकेश के पीछे अकसर पुलिस पड़ी रहती थी. इस के चलते राकेश कईकई दिनों तक अंडरग्राउंड हो जाता था. उस के पीछे उस की पत्नी राधा और बच्चों की देखभाल सुभाष ही करता था.

पति के बाहर कहीं छिपते रहने की वजह से राधा की सुभाष के साथ नजदीकियां बढ़ती गईं. सुभाष भी राधा को चाहता था. इस तरह उन दोनों के बीच अवैध संबंध बन गए.

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राकेश को जब इस बात का पता चला तो उस ने पत्नी राधा को खूब पीटा. राधा ने उस से माफी मांग ली. सुभाष ने भी उस से माफी मांग ली. राकेश की भी मजबूरी थी. क्योंकि वह बीवीबच्चों की देखभाल के लिए सुभाष पर आश्रित था. लिहाजा उस ने दोनों को माफ कर दिया.

लेकिन यही उस की भूल थी. राकेश जबजब परेशान होता तो वह राधा से लड़ता और राधा भाग कर सुभाष के घर चली जाती थी. फिर राकेश उसे समझाबुझा कर वापस ले आता. यह चक्र काफी समय से चल रहा था.

सुभाष ने राधा को अपने प्रेम जाल में पूरी तरह फांस रखा था और राधा भी अब राकेश की गालीगलौज और मारपीट से तंग आ चुकी थी. राधा पति के बजाय अपने प्रेमी सुभाष के साथ ज्यादा खुशी महसूस करती थी. वह तनमन दोनों से सुभाष की हो चुकी थी.

अब राकेश दिनरात उस की नजर में खटक रहा था. वह उस की कोई भी जलीकटी बात सुनने को तैयार नहीं थी. सुभाष और राधा अब राकेश को अपने बीच कांटा समझने लगे थे.

पति के बाहर रहने पर बहक गई राधा

राकेश की जिंदगी स्थिर नहीं थी. पुलिस उस के पीछे थी और घर में बीवी उसे धोखा दे रही थी. वह काफी तनाव में रहता था और अकसर शराब पी कर राधा को पीट देता था.

राधा अब राकेश से ज्यादा ही परेशान हो चुकी थी. वह उस की मोहब्बत के रास्ते का रोड़ा भी था, लिहाजा राधा और सुभाष ने इस रोड़े को हटाने का मन बना लिया था.

कर्पूरी नगर में जहां सुभाष का घर था, वहां उस के अन्य परिवार वाले भी रहते थे. सभी का एकदूसरे के घर में आनाजाना लगा रहता था. काफी घनी बस्ती होने के कारण वहां हत्याकांड को अंजाम देना संभव नहीं था. इसलिए सुभाष बालूघाट में नया ठिकाना तलाशने लगा.

उसे पता चला कि सुनील शर्मा के मकान की तीसरी मंजिल खाली है. उस ने किसी के माध्यम से सुनील कुमार शर्मा की मां से संपर्क साधा और बाढ़ पीडि़त होने की बात कह कर किराए पर कमरा देने का आग्रह किया.

उस ने मकान में अन्य कमरों के किराएदारों से एक हजार रुपए अधिक किराया देना भी स्वीकार किया और फटाफट एडवांस किराया औनलाइन उस के अकाउंट में जमा करवा दिया.

वह अपने कुछ सामान के साथ सुनील कुमार के मकान में आ गया. थोड़े दिन में राधा भी अपने तीनों बच्चों के साथ उस के पास आ गई. आसपास के लोगों को राधा का परिचय सुभाष ने अपनी पत्नी के रूप में कराया. इस के कुछ रोज बाद ही राधा की बहन कृष्णा और बहनोई विकास भी उन के साथ रहने आ गए.

राकेश को खत्म करने की साजिश इन चारों ने बैठ कर बनाई. राधा की बहन और बहनोई को साजिश में शामिल करना सुभाष की मजबूरी थी. दरअसल, राकेश अच्छी कदकाठी का आदमी था. उस पर काबू पाना एकदो लोगों के बस की बात नहीं थी. इन दोनों को भी लाने का मकसद यह था कि जब राकेश वहां आएगा तो सब मिल कर उस का काम आसानी से तमाम कर देंगे.

हत्या कर कैमिकल के ड्रम में डाले लाश के टुकड़े

सारी तैयारियां हो जाने के बाद राधा ने तीज वाले दिन राकेश को फोन कर के वहां बुलाया. उस वक्त राकेश पुलिस के डर से कहीं छिप कर रह रहा था. उस के खिलाफ गिरफ्तारी का वारंट भी निकला हुआ था.

हालांकि एक माह पहले राकेश की सुभाष से लड़ाई भी हुई थी. तब सुभाष ने उसे धमकाते हुए कहा था, ‘‘राकेश, तुम्हारी भलाई इसी में है कि तुम हम दोनों के बीच में मत आओ.’’

राकेश उस का मंसूबा भांप गया था. इस के बावजूद पत्नी के बुलाने पर आ गया था. उस रात वहां सभी ने शराब पी और मुरगा खाया. राकेश को राधा और सुभाष ने जम कर शराब पिलाई थी. जब वह नशे में धुत हो गया तो उन्होंने उस की निर्मम हत्या कर दी.

शराब के नशे में बेसुध राकेश के सिर पर हथौड़ा मार कर उसे खत्म कर दिया और तेजधार वाले चाकू से उस के शरीर के 8 टुकड़े कर दिए. इस के बाद एक बड़े ड्रम में उस के शव के सभी टुकड़ों को डाल कर गलाने के लिए ऊपर से यूरिया, नमक और तेजाब भर दिया.

हत्या: प्रेम गली अति सांकरी

कमरे से बदबू बाहर न जाए, इसलिए खिड़की और दरवाजे में कपड़े ठूंस दिए गए. रात में कमरे के दरवाजे और आसपास काफी संख्या में अगरबत्ती जलाने के बाद सभी आरोपी वहां से निकल गए.

4 दिन तक यूरिया, सल्फ्यूरिक एसिड और नमक से शव गलने के कारण ड्रम में अमोनियम नाइट्रेट गैस बनने लगी. इस गैस के जलती अगरबत्ती के संपर्क के कारण ही वहां धमाका हुआ और सारे राज का परदाफाश हो गया.

सुभाष व राकेश की शराब के धंधे की चलती थी फ्रैंचाइजी

अखाड़ा घाट रोड, बालूघाट व सिकंदरपुर क्षेत्र में सुभाष व राकेश की जोड़ी ने अवैध शराब के धंधे की फ्रैंचाइजी खोल रखी थी. बड़े धंधेबाजों से शराब ले कर इस क्षेत्र के छोटेछोटे विक्रेताओं को आपूर्ति की जाती थी. इस धंधे की कमाई से राकेश और सुभाष दोनों ने कई स्थानों पर जमीन भी खरीदी थी. अब पुलिस उन संपत्तियों का पता लगा रही है.

2 महीने पहले जब राकेश के ठिकाने से पुलिस ने शराब की बड़ी खेप पकड़ी तभी उस का खेल बिगड़ गया था. पुलिस के भय से राकेश शुरू में इधरउधर छिपता रहा, फिर वह भाग कर दिल्ली चला गया था. इधर उस की पत्नी को मौका मिल गया और वह बच्चों को ले कर सुभाष के पास चली गई थी.

साली और साढ़ू की तलाश में छापेमारी

घटना में शामिल मृतक राकेश की साली कृष्णा और साढ़ू विकास की तलाश में एक टीम समस्तीपुर और सीतामढ़ी में छापेमारी कर रही है. हालांकि, कथा लिखने तक दोनों का सुराग नहीं मिला था. गिरफ्तार आरोपियों से उन दोनों के ठिकाने के बारे में पूछताछ की गई. सुभाष ने बताया, ‘‘विकास और कृष्णा के बारे में कोई जानकारी नहीं है. घटना के बाद से दोनों का उस से संपर्क नहीं हुआ है.’’  हालांकि उस के बयान पर पुलिस संदेह कर रही है.

टाउन डिप्टी एसपी रामनरेश पासवान का कहना है, ‘‘कई बिंदुओं पर आरोपियों से पूछताछ की गई. पुलिस की पूछताछ में आरोपियों ने बताया है कि घटना के बाद सभी एक साथ शहर से भागे थे. पहले वे सब बसस्टैंड पर छिप गए थे. वहीं रात गुजारी थी. फिर दूसरे दिन अलगअलग जगहों के लिए निकले थे. विकास और कृष्णा ने सीतामढ़ी जाने की बात कही थी. वहां से निकलने के बाद सुभाष का उन से संपर्क नहीं हुआ.’’

सभी आरोपियों से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने उन्हें कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया.

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—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

साक्षी के बाद: भाग 3

फिर साक्षी एक तटस्थ भाव चेहरे पर लिए चली गई थी और पूर्वा अगली सुबह अरुण और सूर्य के साथ आगरा चली गई भाई की शादी में. 5 दिन बाद लौटी तो ये सब. वहां मौजूद लोगों से पता चला कि वह अबौर्शन के लिए अकेली ही अस्पताल पहुंच गई थी. सास को पता चला तो वह भी पीछेपीछे पहुंच गईं और उस की मरजी देखते हुए उसे इजाजत दे दी. फिर अबौर्शन ऐसा हुआ कि बच्ची के साथसाथ वह भी चली गई.

देखते ही देखते साक्षी विदा हो गई सदा के लिए. कई दिन तक हर दिन पूर्वा वहां जाती और कलेजे को पत्थर बना कर वहां बैठी रहती. उस दौरान स्वाति और उस की मां कई दिन पूर्वा के घर ही रहीं. एक दिन पारंपरिक रस्म अदायगी के बाद साक्षी का अध्याय बंद हो गया. सुहानी मौसी के साथ इन दिनों में इतना घुलमिल गई थी कि पल भर भी नहीं रहती थी उस के बिना, इसलिए फैसला यह हुआ कि फिलहाल तो मौसी व नानी के साथ ही जाएगी वह.

एक दौर गुजरा और दूसरा दौर शुरू हुआ उदासी का, साक्षी के संग गुजारे अनगिनत खूबसूरत पलों की यादों का. संदीप भाई भी जबतब इन यादों में हिस्सा बंटाने चले आते और सिर्फ और सिर्फ साक्षी की बातें करते तो पूर्वा तड़प उठती. लगता था संदीप भाई कभी नहीं संभल पाएंगे, लेकिन हर अगले दिन रत्तीरत्ती कर दुख कम होता जा रहा था. यही तो कुदरत का नियम भी है.

‘‘अरे, ऐसे कैसे बैठी हो गरमी में, पूर्वा और इतनी सुबह क्यों उठ गईं तुम?’’ अरुण ने पंखा चलाते हुए कहा तो पूर्वा वर्तमान में लौट आई.

‘‘लोग कितनी जल्दी भुला देते हैं उन्हें, जिन के बिना घड़ी भर भी न जी सकने का दावा करते हैं, है न अरुण?’’ एक सर्द सांस लेते हुए सपाट स्वर में कहा पूर्वा ने.

‘‘किस की बात कर रही हो पूर्वा?’’

‘‘इंदु भाभी का फोन आया था. आप के संदीप ने दूसरी शादी कर ली.’’

सुन कर चौंके नहीं अरुण. बस तटस्थ से खामोश बैठे रहे.

हैरानी हुई पूर्वा को. पूछा, ‘‘आप कुछ कहते क्यों नहीं अरुण? हां, क्यों कहोगे, मर्द हो न, मर्द का ही साथ दोगे. अच्छा चलो, एक बात का ही जवाब दे दो. यही हादसा अगर संदीप भाई के साथ गुजरा होता तो क्या साक्षी दूसरी शादी करती, वह भी इतनी जल्दी?’’

‘‘नहीं करती, बिलकुल नहीं करती, मैं मानता हूं. औरत में वह शक्ति है जिस का रत्ती भर भी हम मर्द नहीं छू सकते. तभी तो मैं दिल से इज्जत करता हूं औरत की और इंदु भाभी या उन जैसी कोई और रिपोर्टर तुम्हें नमकमिर्च लगा कर कल को कुछ बताए, उस से पहले मैं ही बता देता हूं तुम्हें कि मैं भी संदीप के साथ था. कल मैं औफिस के काम से नहीं, संदीप के लिए बाहर गया था.’’

‘‘क्या, इतनी बड़ी बात छिपाई आप ने मुझ से? लड़की कौन है?’’ घायल स्वर में पूछा पूर्वा ने.

‘‘साक्षी की बहन स्वाति.’’

‘‘क्या, ऐसा कैसे कर सकते हैं संदीप भाई और वे साक्षी की मां, कैसा दोहरा चरित्र है उन का? उस वक्त तो सब की नजरों से बचाबचा कर यहां छिपा रही थीं स्वाति को. कहती थीं, बिटिया गरीब हूं तो क्या जमीर बेच दूं? खूब समझ रही हूं मैं इन सब के मन की बात, पर कैसे कर दूं अपनी उस बच्ची को इन के हवाले, जहां से मेरी एक बेटी गई. जीजूजीजू कहते जबान नहीं थकती लड़की की, अब कैसे उसे पति मान पाएगी? और संदीप भाई का क्या यही प्यार था साक्षी के प्रति कि वह चली गई तो उसी की बहन ब्याह लाए? और कोई लड़की नहीं बची थी क्या दुनिया में?’’ अपने स्वभाव के एकदम विपरीत अंगारे उगल रही थी पूर्वा.

अरुण ने आगे बढ़ कर उस के मुंह पर अपनी हथेली रख दी. बोले, ‘‘शांत हो जाओ, पूर्वा. यह सब इतना आसान नहीं था संदीप के लिए और न ही स्वाति के लिए. रही बात साक्षी की मां की, तो यह उन की मरजी नहीं थी, स्वाति का फैसला था. उस का कहना था कि मेरे लिए साक्षी दीदी अब सिर्फ सुहानी में बाकी हैं. उस के सिवा और कोई खून का रिश्ता नहीं बचा मेरे पास. मैं सुहानी के बिना नहीं जी सकती. अगर इस की नई मां आ गई तो सुहानी के साथ नहीं मिलनेजुलने देगी हमें. तब इसे देखने तक को तरस जाऊंगी मैं और शादी तो मुझे कभी न कभी करनी ही है, तो क्यों न जीजू से ही कर लूं. सब समस्याएं हल हो जाएंगी.

‘‘साक्षी की मां ने मुझे अलग ले जा कर कहा था कि मैं अपने ही कहे लफ्जों पर शर्मिंदा हूं अरुणजी, संदीपजी के साथ स्वाति का रिश्ता न जोड़ने की बात एक मां के दिल ने की थी और अब जोड़ने का फैसला एक मां के दिमाग का है. कहां है मेरे पास कुछ भी, जो स्वाति को ब्याह सकूं. होता तो कब की ब्याह चुकी होती. और भी बहुत कुछ था, जो अनकहा हो कर भी बहुत कुछ कह रहा था. तुम ने उन की गरीबी नहीं देखी पूर्वा, मैं ने देखी है. एक छोटे से किराए के कमरे में रहती हैं मांबेटी. एक नर्सरी स्कूल में नौकरी करती हैं आंटी और थोड़ी तनख्वाह में से घर भी चला रही हैं और स्वाति को भी पढ़ा रही हैं.

‘‘अब रही बात संदीपकी, तो उस का कहना था कि अरुण, मम्मीजी मेरा ब्याह किए बिना तो मानेंगी नहीं, इकलौता जो हूं मैं. फिर कोई और लड़की क्यों, स्वाति क्यों नहीं? एक वही तो है, जो मेरा दर्द समझ सकती है, क्योंकि यही दर्द उस का भी है. और एक वही है, जो मेरी सुहानी को सगी मां की तरह पाल सकती है. कोई और आ गई तो सब कुछ तहसनहस हो जाएगा.’’

पूर्वा खामोश बैठी रही बिना एक शब्द बोले, तो अरुण ने तड़प कर कहा, ‘‘यों खामोश न बैठो पूर्वा, कुछ तो कहो.’’

‘‘बसबस, बहुत हो गया. मैं चाय बना कर लाती हूं. चाय पी कर घर के कामों में मेरी मदद करो. आज बाई छुट्टी पर है. साथ ही, यह सोच कर रखो कि स्वाति को शगुन में क्या देना है. यह काम भी सुबहसुबह निबटा आएंगे और स्वाति और संदीप भाई को भी अच्छा लगेगा.’’

एक मीठी मुसकराहट के साथ पूर्वा उठ खड़ी हुई तो राहत भरी मुसकान अरुण के होंठों पर भी बिखर गई.

सौल्वर गैंग : पैसा फेंको, इम्तिहान पास करो

बीरेंद्र बरियार

लाखों रुपए ले कर फर्जी तरीके से इम्तिहान देने वालों की जगह किसी सौल्वर (सवाल हल करने वाला) को बिठा कर इम्तिहान देने वालों के एक गैंग का खुलासा हुआ है. इस गैंग के सरगना के तार बिहार के छपरा और जहानाबाद जिले से जुड़े हुए हैं. सौल्वर गैंग के ज्यादातर लोग मैडिकल और इंजीनियरिंग का इम्तिहान पास कर चुके हैं या उस की तैयारियों में लगे हुए हैं.

सौल्वरों के जरीए नीट (नैशनल ऐलिजिबिलिटी कम ऐंट्रैंस टैस्ट) पास कराने का सौदा करने वाले गैंग का सरगना पीके उर्फ प्रेम कुमार उर्फ प्रमोद कुमार उर्फ नीलेश इस के लिए 30 लाख से 50 लाख रुपए तक वसूलता था.

इसी पैसे से पीके ने पटना में तिमंजिला मकान और दानापुर में 4 प्लौट खरीदे. उस के पास फौर्चुनर, हुंडई लिवो और एक वैगनआर कार बरामद हुई. बिहार, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक और त्रिपुरा की पुलिस पीके की तलाश में लगी हुई थी. वाराणसी पुलिस ने पीके को पकड़ने वाले को एक लाख रुपए का इनाम देने का ऐलान कर रखा था.

पीके पिछले 6-7 सालों से नीट (यूजी) और पीजी के इम्तिहान में सौल्वरों को बिठा कर कैंडिडेट को पास कराने का गेम खेल रहा था. इस के अलावा वह बिहार और उत्तर प्रदेश में मास्टरों की बहाली, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में अधीनस्थ सेवा, बिहार पुलिस सेवा वगैरह में भी अपना गोरखधंधा चला रहा था. उसे पिछली 18 नवंबर को छपरा में दबोचा गया.

पीके की बहन प्रिया भी इस गिरोह में शामिल है. प्रिया साल 2019 में पटना के इंदिरा गांधी इंस्टीट्यूट औफ मैडिकल साइंसेज से एमबीबीएस की डिगरी ले कर डाक्टर बनी थी. फिलहाल वह छपरा के सारण में नगरा ब्लौक के प्राइमरी हैल्थ सैंटर में पोस्टेड है.

प्रिया की शादी रीतेश कुमार सिंह के साथ साल 2014 में हुई थी, जो बिहार सरकार के कला एवं संस्कृति विभाग में क्लर्क है. वह इस पद पर साल 2004 में बहाल हुआ था. पीके की गिरफ्तारी के बाद उस की बहन प्रिया की एमबीबीएस की डिगरी भी जांच के घेरे में आ गई है.

पीके ने कोरैस्पोंडेंस कोर्स के जरीए पटना यूनिवर्सिटी से बीए का इम्तिहान पास किया था. उस ने अपने दोस्तों और रिश्तेदारों को बता रखा था कि वह डाक्टर है.

पीके मूल रूप से छपरा के सारण के एकमासिंटू गांव का रहने वाला है. उस के पिता कमलवंश नारायण सिंह बिहार सरकार के उद्योग विभाग से साल 1990 में रिटायर हो चुके हैं. पीके अपने पिता के साथ ही पटना की पाटलिपुत्र कालोनी के अपने मकान में रहता था.

12 सितंबर को सारनाथ के एक परीक्षा केंद्र पर त्रिपुरा के रहने वाली हिना विश्वास की जगह बीएचयू की बीडीएस की छात्रा जूली कुमारी को इम्तिहान देते हुए पकड़ा गया था. इस मामले में जूली, उस की मां बबीता, भाई ओसामा, विकास कुमार महतो, रवि कुमार गुप्ता और तपन साहा को पुलिस ने गिरफ्तार किया था.

उस के बाद 22 सितंबर को पटना के रघुनाथ गर्ल्स हाईस्कूल में डिप्लोमा इन ऐलीमैंट्री ऐजूकेशन के इम्तिहान में 4 लड़कियों समेत 9 सौल्वर को पकड़ा गया.

इम्तिहान के दौरान वहां आए इंविजीलेटर को कुछ छात्रों पर शक हुआ. उस ने मजिस्ट्रेट को इस बात की जानकारी दी. जब सभी छात्रों के एडमिट कार्ड की जांच की गई, तो सौल्वर गैंग के लोग पकड़ में आ गए.

सौल्वर गैंग के सदस्य रिंकू कुमारी (मधुबनी), शैलेंद्र कुमार (मधेपुरा), शिवम सौरभ (मधुबनी), बीरेंद्र कुमार (मधुबनी), सुरुचि कुमारी (नालंदा), रंजीत कुमार (निर्मली), विनोद कुमार (सुपौल), गुडि़या कुमार (नालंदा), गुंजन कुमारी (मधेपुरा) को पुलिस ने गिरफ्तार किया.

पाटलिपुत्र थाना क्षेत्र के मंगलदीप अपार्टमैंट्स के पास औनलाइन परीक्षा केंद्र आईडीजेड-5 में इम्तिहान देने के दौरान किसी दूसरे की जगह इम्तिहान दे रहे दीपक कुमार को पकड़ा गया. बाद में उस से मिली जानकारी के आधार पर ओरिजनल उम्मीदवार लकी कुमार को भी पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया.

लकी कुमार सारण के गरखा गांव का रहने वाला है. दीपक ने पुलिस को बताया कि एक लाख रुपए में सौदा तय हुआ था और एडवांस के तौर पर 10,000 रुपए मिले थे. बाकी रकम कैंडिडेट के पास होने के बाद मिलने वाली थी.

पुलिस से मिली जानकारी के मुताबिक, लकी कुमार ने दीपक को अपने एडमिट कार्ड के साथ इम्तिहान सैंटर में पहुंचा दिया था. इम्तिहान शुरू होने से पहले जब सभी कैंडिडेट की जांच की गई, तो दीपक का चेहरा एडमिट कार्ड में चिपकाए गए फोटो से मेल नहीं खा रहा था. शक होने पर दीपक से पूछताछ की गई. पहले तो उस ने चकमा देने की कोशिश की, पर कुछ ही देर में सबकुछ सचसच उगल दिया.

पीके के गैंग में उस की प्रेमिका समेत दूसरी 12 लड़कियां भी शामिल थीं. सभी लड़कियां एजेंट का काम करती थीं और मैडिकल और इंजीनियरिंग का इम्तिहान देने वाले छात्रों को अपने जाल में फंसाती थीं. जब कोई छात्र जाल में फंस जाता था, तो उस की काउंसलिंग भी कराई जाती थी.

पुलिस रिकौर्ड के मुताबिक, बिहार के जहानाबाद जिले के अतुल वत्स ने सब से पहले सौल्वर गैंग बनाया था. उस के बाद उस ने काफी कम समय में बिहार समेत हरियाणा, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, झारखंड, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश तक अपना जाल फैला लिया था.

उस के गैंग में तकरीबन 60 लड़के थे. सभी लड़कों को बाकायदा ट्रेनिंग दी गई थी कि किस तरह से शिकार को फंसाया जाए.

सभी एजेंट लग्जरी गाडि़यों में घूमते थे और महंगे होटलों में ठहरते थे. तमाम सुविधाओं के साथ उन्हें 20,000 से 25,000 रुपए हर महीने तनख्वाह के रूप में दिए जाते थे.

सौल्वर गैंग के लोगों ने पुलिस से बचने के लिए ऐसा पक्का इंतजाम कर रखा था कि उन का मोबाइल फोन सर्विलांस पर ट्रेस न हो सके. गैंग के सभी लोगों को कोडवर्ड में बात करने की हिदायत थी. जैसे ‘टिशू मिलना’ का मतलब होता था, डौक्यूमैंट मिलना. इसी तरह ‘खजूर मिलना’ का मतलब होता था, एडवांस मिलना. ‘डनडन’ कहा गया तो समझिए डील पक्की हो गई.

बीटैक, नीट, बीबीए क्वालिफाई कर चुके स्टूडैंट रातोंरात करोड़पति बनने के चक्कर में सौल्वर गैंग के जाल में फंसते रहे हैं.

गैंग का सरगना अतुल वत्स खुद बीटैक है. इस के अलावा गैंग में शामिल उज्ज्वल कश्यप, रमेश सिंह, प्रशांत कुमार और रोहित कुमार के पास भी बीटैक की डिगरी है.

साल 2006 में अतुल ने एनईईटी में और कंप्यूटर साइंस में दाखिला लिया था. साल 2010 में बीटैक करने के बाद अतुल ने दिल्ली जा कर एमबीए किया.

एमबीए में उसे काफी कम नंबर मिले, जिस से वह बहुत परेशान हुआ था. उस के बाद वह पटना लौट आया और अपने दोस्त दीपक के साथ मिल कर उस ने बोरिंग रोड इलाके में इंजीनियरिंग और मैडिकल कोचिंग इंस्टीट्यूट खोला.

कोचिंग में अतुल फिजिक्स और कार्बनिक रसायन पढ़ाता था. साल 2014 में उस ने यूको बैंक के पीओ का इम्तिहान पास किया, लेकिन एक साल में ही उस का मन ऊब गया और उस ने नौकरी छोड़ दी.

साल 2016 में नीट पेपर सौल्वर गैंग में अतुल का नाम आया था. साल 2017 में वह पहली बार पुलिस के हत्थे चढ़ा था. दिल्ली पुलिस ने उसे गिरफ्तार किया था.

Holi Special: अधूरी चाह- भाग 1

चलिए, आप को संजय चावला से मिलाते हैं… आज से 25 साल पहले का संजय चावला.

संजय के पापा नौकरी करते हैं. एक बड़ा भाई, जिस की अपने ही घर के बाहर किराने की दुकान है. घर के बाहर के हिस्से में 3 दुकानें हैं. पापा ने पहले से ही 3 दुकानें बनाईं, तीनों बेटों के लिए.

छोटा बेटा अभी पढ़ रहा है. बड़े बेटे की शादी हो गई है. अब संजय का नंबर आया है, हजारों लड़कियां उस पर मरती थीं, एक से एक हसीना उस के कदमों में दिल बिछा देती थीं, उस की एक ?ालक पर ही लड़कियां तड़प उठती थीं, उस के साथ न जाने कितने सपनों के तानेबाने बुनतीं, लेकिन उस की भाभी को उस के लिए कोई लड़की नहीं जंचती.

अरे भई, कैसे जंचेगी? कोई संजय जैसी ही मिले तब न. संजय का गोराचिट्टा रंग, तीखे नैननक्श, आंखें ऐसीं जैसे नशा हो इन में, जो देखे बस खो जाए इन नशीली आंखों में. लंबा कद, चौड़ा सीना, होंठों के ऊपर छोटीछोटी बारीक सी मूंछें, चाल में गजब का रोबीलापन और स्वभाव जैसे हंसी बस इन्हीं की गुलाम हो. जी हां साहब, एकदम हंसमुख स्वभाव… ऐसे हैं संजय चावला.

बड़ी मशक्कत के बाद एक कश्मीर की कली भा गई संजय साहब को. क्यों न भाए कश्मीर की जो ब्यूटी है. शालिनी नाम है. नाम से मेल खाता स्वभाव. शालीन सी, बला की खूबसूरती जिसे देखते ही संजय साहब अपना दिल हार बैठे थे. बस, ?ाट से हां बोल दी शादी के लिए.

अरेअरे, कोई शालिनी से तो पूछो कि वह क्या चाहती है, लेकिन नहीं, कोई पूछने की जरूरत नहीं. उस का तो एक ही फैसला है कि जो मम्मीपापा कहेंगे, वही ठीक है.

बस तो चट मंगनी और पट ब्याह वाली बात हो गई. शादी के बाद जिम्मेदारी बढ़ गई. पहले दोनों भाई इसी एक ही किराने की दुकान पर बैठते थे, लेकिन अब संजय को लगा कि खर्चे बढ़े हैं, मगर आमदनी नहीं. तो उस ने भी नौकरी करने के बारे में सोचा. नौकरी भी अच्छी मिल गई. घरपरिवार में सब मिलजुल कर रहते हैं. इस बात को 8 साल बीत गए.

बड़े भाई सुनील के भी 2 बच्चे हैं और संजय के भी 2 बच्चे हैं. छोटे भाई  संदीप की भी शादी हो गई. परिवार भी बढ़े और खर्चे भी. मम्मीपापा भी नहीं रहे. अब तक तो बहुत प्यार था परिवार में, लेकिन कहते हैं न कि प्यार भी पैसा मांगता है, पेट भी पैसा मांगता है, पैसे बिना प्यार बेकार लगता है और प्यार से पेट भी नहीं भरता.

संजय ने कश्मीर में नौकरी तलाश की, तो दिल्ली से अच्छी नौकरी उसे कश्मीर में मिल गई और वह अपनी फैमिली के साथ कश्मीर शिफ्ट हो गया.

एक तो पहले से इतना हैंडसम, उस पर कश्मीर की आबोहवा में संजय और भी कातिल हो गया. जहां से निकलता, न जाने कितने दिलों पर छुरियां चलती थीं, कितने दिल घायल होते थे.

संजय परिवार को ले कर कश्मीर चला तो गया, लेकिन भाइयों से दूर रह नहीं सकता था. अकसर 4-6 महीने बाद जरूर मिलने आता और 10-15 दिन यहीं रहता.

लेकिन जब भी आता, महल्ला तो क्या जिसे भी पता चलता कि संजय आया है, सब लड़कियां, जिन की शादी भी हो चुकी थी, फिर भी संजय की एक ?ालक पाने के लिए किसी न किसी बहाने कोई संजय के घर और कोई उस के भाई की दुकान पर आती, ताकि संजय की एक ?ालक मिल जाए.

यह बात संजय भी अच्छे से जानता था और मन ही मन इतराता था, लेकिन आज संजय को दिल्ली आए 8 महीने हो चुके हैं. शुरू में 2 दिन तो बहुत ही औरतें आईं संजय की ?ालक पाने के बहाने (जी हां औरतें, क्योंकि संजय को कश्मीर गए अब तक 17 साल बीत चुके हैं). इन 17 सालों में ऐसा नहीं कि संजय दिल्ली नहीं आया या कभी वे लड़कियां संजय को देखने के बहाने नहीं आईं, मगर अब तक वे सब औरतें बन चुकी हैं न. दोस्तो, तकरीबन संजय और उन सब की उम्र (जो संजय पर मरती थीं) 45 से 50 साल के बीच है, तो औरतें ही कहेंगे न.

हां, तो अब बस 2 ही दिन औरतें आईं उस की ?ालक पाने को, लेकिन अब नहीं आतीं वे, क्योंकि उन से संजय का उतरा हुआ चेहरा देखा नहीं जाता. वे संजय को इस तरह हारा हुआ बरदाश्त नहीं कर पा रहीं, लेकिन फोन पर संजय से बात कर के उसे ढांढ़स बंधा रही हैं, उसे अपनी परेशानी से बाहर निकलने का रास्ता बताती हैं, उसे नई राह पर चलने की सलाह देती हैं, उसे अपने हक के लिए लड़ना सिखाती हैं, क्योंकि संजय ने कभी परिवार में किसी भी चीज को ले कर मेरातेरा किया ही नहीं, वह सबकुछ छोड़ कर कश्मीर चला गया था. वहां उस की अच्छी नौकरी थी, उस ने यहां से पुश्तैनी जायदाद पर कोई हक कभी जताया ही नहीं था. लेकिन आज उसे हक जताने की जरूरत है. आज हक जताने की मजबूरी है, लेकिन फिर भी भाई के सामने उस की बोलने की हिम्मत नहीं होती, इसलिए सब उसे अपने हक के लिए बोलने को कहते हैं.

संजय का कश्मीर में सबकुछ खत्म हो गया है, इसलिए अब वह भाइयों से पुश्तैनी जायदाद में अपना हिस्सा ले कर नए सिरे से जिंदगी की शुरुआत करना चाहता है.

लेकिन ऐसा क्यों? जानते हैं ऐसा क्यों हो रहा है? ऐसा क्या हुआ संजय के साथ कि उस का खिलता चेहरा मुर?ा गया? ऐसा क्या हुआ, जो उसे भाई से आज इतने सालों बाद अपना हक मांगना पड़ा?

सुनिए, संजय की दर्दभरी दास्तां…

जब संजय ने कश्मीर शिफ्ट किया था, उस की अच्छीभली गृहस्थी चल रही थी, लेकिन कुछ ही समय बाद तकरीबन 4 साल के बाद एक बुरी छाया मंडराई परिवार पर.

जी हां, जब कोई मुसीबत आएगी तो बुरी छाया का मंडराना ही कहेंगे. शालिनी को लगाव हो गया किसी से यानी प्यार हो गया.

अजीब लग रहा है न सुन कर, लेकिन यही सच है. तकरीबन 32-33 साल की शालिनी और इसी उम्र का ही अजय श्रीवास्तव, जो शालिनी के घर से तकरीबन 200-250 मीटर की दूरी पर ही रहता था.

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Holi Special: अधूरी चाह

Holi Special: ये कैसा सौदा- भाग 1

Reeta Kashyap

जैसे ही उस नवजात बच्चे ने दूध के लिए बिलखना शुरू किया वैसे ही सब सहम गए. हर बार उस बदनसीब का रोना सब के लिए तूफान के आने की सूचना देने लगता है, क्योंकि बच्चे के रोने की आवाज सुनते ही संगीता पर जैसे पागलपन का दौरा सा पड़ जाता है. वह चीखचीख कर अपने बाल नोचने लगती है. मासूम रिया और जिया अपनी मां की इस हालत को देख कर सहमी सी सिसकने लगती हैं. ऐसे में विक्रम की समझ में कुछ नहीं आता कि वह क्या करे? उस 10 दिन के नवजात के लिए दूध की बोतल तैयार करे, अपनी पत्नी संगीता को संभाले या डरीसहमी बेटियों पर प्यार से हाथ फेरे.

संगीता का पागलपन हर दिन बढ़ता ही जा रहा है. एक दिन तो उस ने अपने इस नवजात शिशु को उठा कर पटकने की कोशिश भी की थी. दिन पर दिन स्थिति संभलने के बजाय विक्रम के काबू से बाहर होती जा रही थी. वह नहीं जानता था कि कैसे और कब तक वह अपनी मजदूरी छोड़, घर पर रह कर इतने लोगों के भोजन का जुगाड़ कर पाएगा, संगीता का इलाज करवा पाएगा और दीक्षित दंपती से कानूनी लड़ाई लड़ पाएगा. आज उस के परिवार की इस हालत के लिए दीक्षित दंपती ही तो जिम्मेदार हैं.

विक्रम जानता था कि एक कपड़ा मिल में दिहाड़ी पर मजदूरी कर के वह कभी भी इतना पैसा नहीं जमा कर पाएगा जिस से संगीता का अच्छा इलाज हो सके और इस के साथ बच्चों की अच्छी परवरिश, शिक्षा और विवाह आदि की जिम्मेदारियां भी निभाई जा सकें. उस पर कोर्टकचहरी का खर्चा. इन सब के बारे में सोच कर ही वह सिहर उठता. इन सब प्रश्नों के ऊपर है इस नवजात शिशु के जीवन का प्रश्न, जो इस परिवार के लिए दुखों की बाढ़ ले कर आया है जबकि इसी नवजात से उन सब के जीवन में सुखों और खुशियों की बारिश होने वाली थी. पता नहीं कहां क्या चूक हो गई जो उन के सब सपने टूट कर ऐसे बिखर गए कि उन टूटे सपनों की किरचें इतनी जिंदगियों को पलपल लहूलुहान कर रही हैं.

कोई बहुत पुरानी बात नहीं है. अभी कुछ माह पहले तक विक्रम का छोटा सा हंसताखेलता सुखी परिवार था. पतिपत्नी दोनों मिल कर गृहस्थी की गाड़ी बखूबी चला रहे थे. मिल मजदूरों की बस्ती के सामने ही सड़क पार धनवानों की आलीशान कोठियां हैं. उन पैसे वालों के घरों में आएदिन जन्मदिन, किटी पार्टियां जैसे छोटेबड़े समारोह आयोजित होते रहते हैं. ऐसे में 40-50 लोगों का खाना बनाने के लिए कोठियों की मालकिनों को अकसर अपने घरेलू नौकरों की मदद के लिए खाना पकानेवालियों की जरूरत रहती है. संगीता इन्हीं घरेलू अवसरों पर कोठियों में खाना बनाने का काम करती थी. ऐसे में मिलने वाले खाने, पैसे और बख्शिश से संगीता अपनी गृहस्थी के लिए अतिरिक्त  सुविधाएं जुटा लेती थी.

पिछले साल लाल कोठी में रहने वाले दीक्षित दंपती ने एक छोटे से कार्यक्रम में खाना बनाने के लिए संगीता को बुलाया था. संगीता सुबहसुबह ही रिया और जिया को अच्छे से तैयार कर के अपने साथ लाल कोठी ले गई थी. उस दिन संगीता और उस की बेटियां ढेर सारी पूरियां, हलवा, चने, फल, मिठाई, पैसे आदि से लदी हुई लौटी थीं. तीनों की जबान श्रीमती दीक्षित का गुणगान करते नहीं थक रही थी. उन की बातें सुन कर विक्रम ने हंसते हुए कहा था, ‘‘सब पैसों का खेल है. पैसा हो तो दुनिया की हर खुशी खरीदी जा सकती है.’’

संगीता थोड़ी भावुक हो गई. बोली, ‘‘पैसे वालों के भी अपने दुख हैं. पैसा ही सबकुछ नहीं होता. पता है करोड़ों में खेलने वाले, बंगले और गाडि़यों के मालिक दीक्षित दंपती निसंतान हैं. शादी के 15 साल बाद भी उन का घरआंगन सूना है.’’

‘‘यही दुनिया है. अब छोड़ो इस किस्से को. तुम तीनों तो खूब तरमाल उड़ा कर आ रही हो. जरा इस गरीब का भी खयाल करो. तुम्हारे लाए पकवानों की खुशबू से पेट के चूहे भी बेचैन हो रहे हैं,’’ विक्रम ने बात बदलते हुए कहा.

संगीता तुरंत विक्रम के लिए खाने की थाली लगाने लगी और रिया और जिया अपनेअपने उपहारों को सहेजने में लग गईं.

अगले ही दिन श्रीमती दीक्षित ने अपने नौकर को भेज कर संगीता को बुलवाया था. संदेश पाते ही संगीता चल दी. वह खुश थी कि जरूर कोठी पर कोई आयोजन होने वाला है. ढेर सारा बढि़या खाना, पैसे, उपहारों की बात सोचसोच कर उस के चेहरे की चमक और चाल में तेजी आ रही थी.

संगीता जब लाल कोठी पहुंची तो उसे मामला कुछ गड़बड़ लगा. श्रीमती दीक्षित बहुत उदास और परेशान सी लगीं. संगीता ने जब बुलाने का कारण पूछा तो वे कुछ बोली नहीं, बस हाथ से उसे बैठने का इशारा भर किया. संगीता बैठ तो गई लेकिन वह कुछ भी समझ नहीं पा रही थी. थोड़ी देर तक कमरे में चुप्पी छाई रही. फिर धीरे से अपने आंसू पोंछते हुए श्रीमती दीक्षित ने बताना शुरू किया, ‘‘हमारी शादी को 15 साल हो गए लेकिन हमें कोई संतान नहीं है. इस बीच 2 बार उम्मीद बंधी थी लेकिन टूट गई. विदेशी डाक्टरों ने बहुत इलाज किया लेकिन निराशा ही हाथ लगी. अब तो डाक्टरों ने भी साफ शब्दों में कह दिया कि कभी मां नहीं बन पाऊंगी. संतान की कमी हमें भीतर ही भीतर खाए जा रही है.’’

संगीता को लगा श्रीमती दीक्षित ने अपना मन हलका करने के लिए उसे बुलवाया है. संगीता तो उन का यह दर्द कल ही उन की आंखों में पढ़ चुकी थी. वह सबकुछ चुपचाप सुनती रही.

‘‘संगीता, तुम तो समझ सकती हो, मां बनना हर औरत का सपना होता है. इस अनुभव के बिना एक औरत स्वयं को अधूरा समझती है.’’

‘‘आप ठीक कहती हैं बीबीजी, आप तो पढ़ीलिखी हैं, पैसे वाली हैं. कोई तो ऐसा रास्ता होगा जो आप के सूने जीवन में बहार ले आए?’’ श्रीमती दीक्षित के दुख में दुखी संगीता को स्वयं नहीं पता वह क्या कह रही थी.

‘‘इसीलिए तो तुम्हें बुलाया है,’’ कह कर श्रीमती दीक्षित चुप हो गईं.

‘‘मैं…मैं…भला आप की क्या मदद कर सकती हूं?’’ संगीता असमंजस में पड़ गई.

‘‘तुम अपनी छोटी बेटी जिया को मेरी झोली में डाल दो. तुम्हें तो कुदरत ने 2-2 बेटियां दी हैं,’’ श्रीमती दीक्षित एक ही सांस में कह गईं.

यह सुनते ही जैसे संगीता के पैरों के नीचे से जमीन ही खिसक गई. उस का दिमाग जैसे सुन्न हो चला था. वह बड़ी मुश्किल से इतना ही कह पाई, ‘‘बीबीजी, आप मुझ गरीब से कैसा मजाक कर रही हैं?’’

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Holi Special: ये कैसा सौदा

दीवार: भाग 2

‘‘खानेवाने का कैसे चलता है फिर?’’

‘‘जानकी रात का खाना बना कर रख जाती है, सवेरे मैं देर से जाती हूं इसलिए आसानी से कुछ बना लेती हूं.’’

‘‘फिर भी कभी कुछ काम हो तो मुरली से कह देना, कर देगा.’’

‘‘थैंक्यू, अंकल. आप को भी जब फुरसत हो यहां आ जाइएगा. मैं तो 7 बजे तक आ जाता हूं,’’ राहुल ने कहा.  आनंद के जाने के कुछ देर बाद कपिल आया. बोला, ‘‘माफ करना भाई, फ्लैट बदलने के चक्कर में तुम्हारे आने की तारीख याद…’’

‘‘लेकिन बैठेबिठाए अच्छाभला फ्लैट बदलने की क्या जरूरत थी यार?’’ राहुल ने बात काटी.

‘‘जब उस बालकनी की वजह से जिसे इस्तेमाल करने की हमें फुरसत ही नहीं थी, आनंद साहब मुझे उस फ्लैट की मार्केट वैल्यू से कहीं ज्यादा दे रहे थे तो मैं फ्लैट क्यों न बदलता?’’  राहुल ने खुद को कहने से रोका कि हमें तो अभी तुम्हारी कमी महसूस नहीं हुई और शायद होगी भी नहीं. उसे न जाने क्यों आनंद अंकल अच्छे या यह कहो अपने से लगे थे. सब से अच्छी बात यह थी कि उन का व्यवहार बड़ा आत्मीय था.

अगली सुबह जया ने कहा, ‘‘आनंद अंकल के नाश्ते के बरतन मैं जानकी से भिजवाना भूल गई. तुम शाम को जानकी से कहना, दे आएगी.’’

लेकिन शाम को राहुल खुद ही बरतन लौटाने के बहाने आनंद के घर चला गया. आनंद बालकनी में बैठे थे, उन्होंने राहुल को भी वहीं बुला लिया.  ‘‘स्वच्छ तो खैर नहीं कह सकते लेकिन खुली हवा यहीं बैठ कर मिलती है और चलतीफिरती दुनिया भी नजर आ जाती है वरना तो वही औफिस के वातानुकूलित कमरे या घर के बैडरूम, ड्राइंगरूम और टैलीविजन की दुनिया, कुछ अलग सा महसूस होता है यहां बैठ कर,’’ आनंद ने कहा, ‘‘सुबह का तो खैर कोई मुकाबला ही नहीं है. यहां की ताजी हवा में कुछ देर बैठ जाओ तो दिनभर स्फूर्ति और चुस्ती बनी रहती है.’’  ‘‘तभी आप ने बहुत ऊंचे दामों में कपिल से यह फ्लैट बदला है,’’ राहुल बोला.  आनंद ने उसे गहरी नजरों से देखा और बोले, ‘‘कह सकते हो वैसे बालकनी के सुख देखते हुए यह कीमत कोई ज्यादा नहीं है. चाहो तो आजमा कर देख लो. सुबह अखबार तो पढ़ते ही होगे?’’

‘‘जी हां, चाय भी पीता हूं.’’

‘‘तो कल यह सब बालकनी में बैठ कर करो, सारा दिन ताजगी महसूस करोगे.’’

अगले दिन जया और राहुल सवेरे ही आनंद अंकल की बालकनी में आ कर बैठ गए. आनंद की बात ठीक थी, राहुल और जया अन्य दिनों की अपेक्षा दिन भर खुश रहे इसलिए रोज सुबह बालकनी में बैठने और आनंद के साथ खबरों पर टिप्पणियां करने का सिलसिला शुरू हो गया.  एक रविवार की सुबह आनंद ने जया  को आराम से अखबार पढ़ते देख कर पूछा, ‘‘आज संडे स्पैशल बे्रकफास्ट बनाने का मूड नहीं है क्या?’’

जया ने इनकार में सिर हिलाया, ‘‘संडे को हम ब्रेकफास्ट करते ही नहीं अंकल, चलतेफिरते फल, नट्स आदि खाते रहते हैं.’’

‘‘मैं तो भई संडे को हैवी ब्रेकफास्ट करता हूं, भरवां परांठे या पूरीभाजी का और फिर उसे पचाने के लिए जी भर कर गोल्फ खेलता हूं. तुम्हें गोल्फ का शौक नहीं है, राहुल?’’  राहुल ने उन की ओर हसरत से देखा और कहा, ‘‘है तो अंकल, लेकिन कभी खेलने का या यह कहिए देखने का मौका भी नहीं मिला.’’

‘‘समझो मौका मिल गया. चलो मेरे साथ.’’ और आनंद ने मुरली को आवाज दे कर राहुल और जया के लिए भी नाश्ता बनाने को कहा. नाश्ता कर आनंद और राहुल गोल्फ क्लब पहुंचे.  राहुल और आनंद के जाने के बाद मुरली गाड़ी में जया को ब्यूटी पार्लर ले गया. आज उस ने रिलैक्स हो कर पार्लर में आने का मजा लिया.  राहुल की तो बरसों पुरानी गोल्फ क्लब जाने की तमन्ना पूरी हो गई. खेलने के बाद अंकल के दोस्तों के साथ बैठ कर बीयर पीना और लंच लेना, फिर घर आ कर कुछ देर इतमीनान से सोना.  यह प्रत्येक रविवार का सिलसिला बन गया. जया भी इस सब से बहुत खुश थी, मुरली बगैर कहे सफाई के अलावा भी कई और काम कर देता था. मुरली के साथ जा कर वह अपने उन रिश्तेदारों या परिचितों से भी मिल लेती थी जिन से मिलने में राहुल को दिलचस्पी नहीं थी. शाम वह और राहुल इकट्ठे गुजारते थे. संक्षेप में आनंद अंकल के पड़ोस में आने से उन की जिंदगी में बहार आ गई थी. जया अकसर उन की पसंद का गाजर का हलवा या नाश्ता बना कर उन्हें भिजवाती रहती थी, कभी पिक्चर या सांस्कृतिक कार्यक्रम में जाने के लिए बगैर पूछे अंकल का टिकट भी ले आती थी.

कुछ अरसे तक तो सब ठीक चला फिर राहुल को लगने लगा कि जया का झुकाव अंकल की तरफ बढ़ता ही जा रहा है. औफिस से जल्दी लौटने पर वह अंकल को जबरदस्ती घर पर बुला लेती थी, कभी उन्हें अपनी शादी का वीडियो दिखाती थी, कभी साहिल की शादी का या राहुल के बचपन की तसवीरें.  अंकल भी उसे खुश करने के लिए दिलचस्पी से सब देखते रहते थे. तभी राहुल को प्रमोशन मिल गया. जाहिर है, जया ने सब से पहले यह खबर आनंद अंकल को सुनाई और उन्होंने उसी रात इस खुशी में क्लब में पार्टी दी जिस में कपिल, पूजा और अपार्टमैंट में रहने वाले कुछ और लोगों को भी बुलाया. जब राहुल के औफिस वालों ने दावत मांगी तो राहुल ने किसी रेस्तरां में दावत देने की सोची लेकिन खर्च बहुत आ रहा था. जया ने कहा कि दावत घर पर ही करेंगे. मुरली भी साथ रहेगा.  ‘‘लेकिन अंकल शाम को गाड़ी नहीं चलाते. अगर मुरली यहां रहेगा तो वे क्लब कैसे जाएंगे, शनिवार की शाम उन्हें घर में गुजारनी पड़ेगी,’’ राहुल ने कहा.

‘‘कमाल करते हो, राहुल. हमारी पार्टी छोड़ कर अंकल क्लब जाएंगे या अपने घर में शाम गुजारेंगे, यह तुम ने सोच भी कैसे लिया?’’

‘‘यानी अंकल पार्टी में आएंगे?’’ राहुल ने हैरानी से पूछा, ‘‘तुम ने यह भी सोचा है जया कि यह जवान लोगों की पार्टी है. उस में अंकल को बुलाने से हमारा मजा किरकिरा हो जाएगा.’’

जया चौंक गई. उस ने आहत स्वर में पूछा, ‘‘हर रविवार को अंकल के साथ गोल्फ क्लब जाने या कभी शाम को जिमखाना क्लब जाने में तुम्हारा मजा किरकिरा नहीं होता?’’  खैर, पार्टी बढि़या रही, अंकल ने पार्टी के मजे में खलल डालने के बजाय जान ही डाली और औफिस के लोग राहुल के उच्चकुलीन वर्ग के लोगों से संपर्क देख कर प्रभावित भी हुए. लेकिन राहुल को जया का अंकल से इतना लगाव चिढ़ की हद तक कचोटने लगा था.

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