Sad Story : सांवली

शहर से काफी दूर बसा सज्जनपुर गांव पुराने समय से ही 3 हिस्सों में बंटा था. इस गांव के राजामहाराजा और बड़ेबड़े जमींदार एक जगह बसे थे. उन के सारे मकान पक्के थे. पैसे की कोई कमी नहीं थी, इसलिए उन के बच्चे अपना ज्यादा समय ऐशोआराम में बिताते थे. दूसरे हिस्से में ब्राह्मण और राजपूत थे. कुछ मुसलिम भी थे.

तीसरा हिस्सा पिछड़ी जाति या दलित तबके का था. उन लोगों की बस्ती अलग पहाड़ीनुमा टीले पर थी. उन के घर फूस के बने थे. वे लोग पैसे वाले जमींदारों, राजामहाराजाओं की मेहरबानी पर गुजरबसर कर रहे थे.

उस गांव में एक प्राइमरी स्कूल था. 30-40 गांवों के बीच महज एक ही स्कूल था. आसपास की सारी सड़कें कच्ची और बड़ेबड़े गड्ढों वाली थीं.

उन सभी गांवों से स्कूल को जोड़ने वाली सड़कें जब पक्की हो गईं, तो स्कूल भी चल निकला और 2-3 साल में हाईस्कूल बन गया. फिर वहां इंटर तक की पढ़ाई शुरू हो गई थी. दलित झोपड़पट्टी का कोई बच्चा वहां पढ़ने नहीं आता था.

कहा जाता है कि महात्मा गांधी और भीमराव अंबेडकर भी एक बार वहां गए थे. दलितों के पक्के मकान बनवाने के वादे भी किए गए थे, पर महात्मा गांधी की हत्या के बाद उन दलितों की सुध लेने वाला कोई नहीं था.

एक बार कलक्टर साहब का वहां दौरा हुआ. उन्होंने वहां के लोगों को सम?ाया कि आप अपने बच्चों को स्कूल क्यों नहीं भेजते हैं? अपने हक की जानकारी होने पर ही आप उस की मांग कर सकते हैं. सरकार बच्चों की सुविधा का खयाल करेगी, पहले उन्हें स्कूल में तो भेजिए.

बहुत समझने के बाद एक निषाद की बेटी स्कूल जाने को तैयार हुई. फिर उस झोंपड़पट्टी के दूसरे बच्चे भी स्कूल जाने लगे.

उस स्कूल के सारे मास्टर ऊंची जाति के थे. उन्हें दलित तबके के बच्चों से नफरत होने लगी, क्योंकि उन के कपड़े अच्छे नहीं होते थे. पैरों में जूते नहीं होते थे. शिष्टाचार की कमी भी थी.

स्कूल जाने वाली पहली दलित लड़की का नाम सांवली था. उसे शुरू से ही अपने कपड़ों का खयाल था. वह शिष्टाचार का पालन भी करती थी. एक तरह से वह सभी दलित बच्चों की हैड गर्ल बन गई थी. धीरेधीरे वह पढ़ने में भी होशियार हो गई.

बड़ीबड़ी आंखें, घुंघराले घने बाल, शरीर भी गठा हुआ. न दुबली और न मोटी. स्कूल में सब की चहेती थी सांवली.

अपने महल्ले में भी सांवली का बहुत आदर होता था. लोग आपस में बात करते हुए कहते थे कि सांवली बड़ी हो कर अफसर बनेगी. कार में घूमेगी.

सांवली के पिता मंगरू मल्लाह से लोग कहते, ‘देखो मंगरू, सांवली की पढ़ाई बंद मत करना. रुपएपैसे की किल्लत होगी, तो हम लोग आपस में चंदा कर के पैसे जुटाएंगे.’

जैसेजैसे सांवली बड़ी होती गई, वैसेवैसे उस की खूबसूरती भी बढ़ती गई. 9वीं जमात में आने पर सांवली के बदन पर जवानी भी दस्तक देने लगी थी.

जब सांवली 7वीं जमात में थी, तब ऊंची जाति के एक मास्टर ने उस के अंकों को जानबू?ा कर घटा दिया था, जिस से एक राजपूत की बेटी क्लास में फर्स्ट आ गई थी.

सांवली इस बात पर उस मास्टर से लड़ बैठी थी और उस ने हैडमास्टर से शिकायत भी कर दी थी. उन्होंने सांवली के साथसाथ सभी मास्टरों को बुलवा कर कहा था कि जो बच्चे जैसा लिखते हैं, उन्हें उतने ही अंक मिलने चाहिए. इस में जाति का फर्क नहीं होना चाहिए.

उस दिन से सांवली पढ़ने में ज्यादा मन लगाने लगी थी. उस की बस्ती में बिजली नहीं थी, इसलिए वह लालटेन की रोशनी में पढ़ती थी. तेल नहीं रहने पर महल्ले के कई लोग सांवली को तेल भरी लालटेन दे जाते थे.

इधर सांवली का पिता मंगरू मल्लाह दिनभर मछली पकड़ता और शाम को नजदीक के बाजार में उन्हें बेचता था. अगर कुछ मछलियां बच जाती थीं, तो जमींदार को भी दे आता था. जमींदार मंगरू को कभी पैसे देते, कभी नहीं भी देते थे.

सांवली 9वीं जमात में स्कूलभर में फर्स्ट आई थी. हर जगह उस की चर्चा होने लगी. राज्य सरकार ने अव्वल आने वाली लड़कियों को साइकिल देने का ऐलान किया था. सांवली को भी लाल रंग की साइकिल मिल गई थी. अब वह साइकिल से ही स्कूल आनेजाने लगी थी.

क्लास में लड़कियों की तरफ ताकझांक करने की हिम्मत लड़कों में नहीं थी, पर लंच टाइम में सभी लड़के अपनेअपने ढंग से मनोरंजन करते थे. सभी अपनीअपनी पसंद की लड़की बताते थे.

मनोज नाम का लड़का कहता, ‘‘नाम भी सांवली और रंग भी सांवला. सांवली होने के बावजूद यह कितनी अच्छी लगती है. जी करता है कि चूम लूं इसे. लेकिन इशारा करने पर भी नहीं देखती है.’’

यह सुन कर दिनेश ने कहा, ‘‘साइकिल पर घंटी बजाती हुई जब वह हम सब लड़कों के बीच से गुजरती है, तो दिल पर छुरी चला देती है.’’

जमींदार राय साहब के बेटे मधुरेश ने कहा, ‘‘सांवली कहीं अकेले में मिल जाए, तो कसम से मैं इसे सीने से लगा कर चूम लूंगा.’’

अब सांवली 10वीं जमात में थी. बोर्ड के इम्तिहान भी नजदीक आ रहे थे. सांवली का मन पढ़ाई में ज्यादा लग रहा था. इधर लड़कों का मन पढ़ने से उचट रहा था. उस स्कूल में ही नहीं, आसपास के सभी गांवों में सांवली की चर्चा होने लगी थी.

मधुरेश के पिता राय साहब को मालूम हो गया था कि उन का बेटा पढ़ाई में जीरो है और सांवली हीरो.

एक दिन राय साहब ने मधुरेश से पूछा, ‘‘क्या तुम्हारे स्कूल में दलित की बेटी पढ़ाई में फर्स्ट आती है?’’

‘‘सांवली पहले से ही पढ़ाई में तेज है,’’ मधुरेश का जवाब था.

एक दिन शाम को जब मंगरू राय साहब के यहां मछली देने आया, तो वे बोल पड़े,  ‘‘मंगरू, मु?ो तु?ा से जरूरी काम है. इधर आ.’’

जब मंगरू उन के नजदीक पहुंचा, तो राय साहब ने कहा  ‘‘देखो मंगरू, तुम्हारे खानदान का मेरे खानदान से आज का नाता नहीं है.’’

‘‘हां, सो तो है,’’ मंगरू ने कहा.

‘‘क्या सांवली तुम्हारी बेटी है?’’

‘‘हां सरकार, आप लोगों की दुआ से,’’ मंगरू बोला.

‘‘वह पढ़ाई में बहुत तेज है न?’’

‘‘जी हां मालिक?’’

फिर राय साहब बोल उठे, ‘‘मेरा एक बेटा है और 2 बेटियां हैं. बड़ी बेटी की शादी की बात चल रही है. दूसरी बेटी तो बहुत छोटी है. चिंता है तो सिर्फ मधुरेश की. वह 10वीं जमात में आ गया है, पर उसे आताजाता कुछ नहीं है. अगर तुम्हारी बेटी सांवली उसे थोड़ा पढ़ा दे, तो वह जरूर 10वीं पास कर जाएगा.’’

मंगरू ने कहा, ‘‘अब हम क्या बताएं मालिक, यह तो सांवली ही जाने. वह क्या पढ़ती है, क्या लिखती है, मु?ो नहीं मालूम.’’

‘‘देखो मंगरू, सांवली बहुत अच्छी लड़की है. वह तुम्हारी बात नहीं टालेगी. साइकिल से आएगीजाएगी. तुम जितना कहोगे, हम उस को फीस दे दिया करेंगे.’’

‘‘ठीक है मालिक,’’ मंगरू ने कहा.मंगरू रात को घर पहुंचा, तो उस ने सांवली को राय साहब की बातें बता दीं.सांवली का कहना था, ‘‘हम दोनों तो 10वीं जमात में ही पढ़ते हैं, फिर मैं कैसे उसे पढ़ा सकती हूं?’’ लेकिन बहुत नानुकर के बाद सांवली राय साहब के यहां जा कर पढ़ाने को राजी हो गई.

स्कूल से छूटती, तो सांवली सीधे राय साहब के यहां अपनी साइकिल से पहुंच जाती. मधुरेश को बिन मांगी मुराद पूरी होती नजर आई.

2-3 महीनों के बाद मधुरेश सम?ा गया कि सांवली बहुत भोली है, घमंड तो उस में बिलकुल नहीं. वह सांवली के गदराए बदन को देखदेख कर मजा उठाता रहा. लेकिन जब मधुरेश की हिम्मत बढ़ती गई, तो सांवली ने पूछ लिया, ‘‘ऐसे क्यों घूरते हो मु?ो?’’

यह सुन कर मधुरेश बहुत डर गया.

‘‘मधुरेश, तुम मेरी तरफ घूरघूर कर क्यों देखते हो? बोलो न?’’ सांवली ने फिर पूछा.

‘‘जी करता है कि मैं तुम्हें चूम लूं,’’ मधुरेश धीरे से बोला.

सांवली ने कहा, ‘‘तो चूम लो मु?ो, पर दूसरी चीज मत मांगना.’’ मधुरेश चुप रहा. सांवली अपने गालों को उस की तरफ बढ़ाते हुए बोली,  ‘‘तो चूम लो न.’’ मधुरेश उस को चूमने लगा, तो सांवली उस के सीने से चिपक गई.इस तरह मधुरेश और सांवली का एकदूसरेके प्रति खिंचाव बढ़ता गया.

मैट्रिक बोर्ड का रिजल्ट आ गया था. सांवली का नंबर पूरे राज्य में पहला था और मधुरेश भी सैकंड डिविजन से पास हो गया था.रिजल्ट के बाद जब वे दोनों मिले, तो सांवली बोली, ‘‘मधुरेश, तुम मु?ो चाहते हो न? शादी करोगे न मु?ा से?’’ मधुरेश का जवाब था, ‘‘मैं वादा करता हूं.’’ ‘‘तो अपने पिताजी को सम?ाओ.’’ मधुरेश ने कहा, ‘‘पिताजी तो मु?ा से ज्यादा तुम से खुश रहते हैं.’’ रात को सांवली ने अपने मातापिता को मधुरेश की बात बता दी.

मंगरू उसे सम?ाते हुए बोला, ‘‘देखो सांवली, प्यार सिर्फ बड़े लोगों के लिए है, पैसे वालों के लिए है, हम जैसे गरीब को यह सुहाता नहीं है.

‘‘क्या राय साहब अपने बेटे की शादी हम जैसे गरीब निषाद से करेंगे? नामुमकिन. वैसे, राय साहब तुम्हारी जी भर कर तारीफ करते हैं. देखता हूं कि वे क्या कहते हैं.’’

एक शाम को मंगरू मछली ले कर राय साहब के यहां पहुंचा और उन से हाथ जोड़ कर बोला, ‘‘सरकार, मैं आप से एक भीख मागने आया हूं.’’

‘‘कैसी भीख? ’’

‘‘आप का बेटा मधुरेश मेरी बेटी से शादी करना चाहता है,’’ मंगरू ने डरतेडरते कहा.

यह सुनते ही राय साहब अपना आपा खो बैठे और मंगरू पर गरज पड़े, ‘‘तुम्हारी बेटी की हिम्मत कैसे हुई मेरे बेटे पर डोरे डालने की…’’ फिर वे एक मोटा सा डंडा ले आए और जानवरों की तरह मंगरू पर बरसाने लगे.

मंगरू बेहोश हो कर जमीन पर गिर पड़ा. राय साहब के लोगों ने उसे उठा कर सड़क के किनारे पटक दिया. मंगरू के पीटे जाने की खबर चारों ओर फैल गई थी. दलित बस्ती के लोग उग्र हो चुके थे. जल्दी ही मंगरू को अस्पताल पहुंचाया गया. उस की हालत चिंताजनक थी. सांवली यह खबर सुन कर बेहोश हो गई थी. 2 दिनों के बाद दलित बस्ती के टीले पर गांव वालों की सभा बुलाई गई. तय हुआ कि कोई भी दलित किसी भी काम के लिए ऊंची जाति की बस्ती में कभी कदम नहीं रखेगा.

एक महीने बाद राय साहब की बेटी की शादी थी. घर में चहलपहल थी. सारे सामान दूसरे शहर से मंगवाए गए थे.आज राय साहब का घर जश्न में डूबा हुआ था, उधर दलित बस्ती में हाहाकार मचा था, क्योंकि मंगरू दम तोड़ चुका था. दाह संस्कार के बाद सारे गांव वाले थाने पर टूट पड़े. वहां आग लगा दी गई. थानेदार भाग कर राय साहब के घर में छिप गया था. अगले दिन से धीरेधीरे माहौल शांत हो गया, पर राय साहब का घमंड ज्यों का त्यों बना हुआ था.

बरसात का मौसम आ गया था. सज्जनपुर गांव के बगल का बांध अचानक टूट गया और ऐसी भयंकर बाढ़ आई कि पूरा गांव बह गया. दलितों की बस्ती बहुत ऊंची थी, इसलिए महफूज थी. वहां के लोगों ने अपनीअपनी नावों से बहुत से लोगों को बह जाने से बचाया था.

सांवली निषाद की बेटी थी, इसलिए वह अच्छी तैराक भी थी. वह किनारे पर नाव ले कर खड़ी थी कि एक टूटीफूटी नाव में राय साहब का पूरा परिवार खुद को बचा रहा था.

नाव में पानी भर गया था. उस में से ‘सांवली बचाओ’, ‘सांवली बचाओ’ की आवाजें आ रही थीं. सांवली का चाचा चिल्ला उठा, ‘‘उन्हें मत बचाओ सांवली.’’ इतने में राय साहब की नाव पानी से पूरी तरह भर गई थी.

सांवली का दिल पिघल कर मोम हो गया. वह ?ाट से अपनी नाव को बड़ी तेजी से उन की ओर बढ़ाने लगी. राय साहब के परिवार के सारे लोग सांवली की नाव को पकड़ने लगे.

कुछ देर बाद कोई चिल्लाया, ‘‘मधुरेश डूब गया है.’’ सांवली ?ाट से पानी में कूद गई. एक डुबकी के बाद उसे मधुरेश का कुछ पता नहीं चला, तो उस ने दूसरी बार डुबकी लगाई.

इधर किनारे पर खड़े राय साहब के परिवार के सदस्य रो रहे थे. जब सांवली ने तीसरी बार डुबकी लगाई, तो वह मधुरेश को खींचती हुई पानी से बाहर निकाल लाई. एक नाव में मधुरेश को अस्पताल ले जाया गया. राय साहब का पूरा परिवार वहां था.

जैसे ही मधुरेश की आंखें खुलीं, सामने सांवली को देख कर उस ने उस के पैरों में सिर ?ाका दिया और रोने लगा.मधुरेश को बिलखता देख कर सांवली भी उसे अपनी छाती से लगा कर रोने लगी. राय साहब सिर ?ाकाए खड़े रहे… वे अपने किए पर शर्मिंदा लग रहे थे.

Family Story : मंदिर

परमहंस गांव से उकता चुका था. गांव के मंदिर के मालिक से उसे महीने भर का राशन ही तो मिलता था, बाकी जरूरतों के लिए उसे और उस की पत्नी को भक्तों द्वारा दिए जाने वाले न के बराबर चढ़ावे पर निर्भर रहना पड़ता था. अब तो उस की बेटी भी 4 साल की हो गई है और उस का खर्च भी बढ़ गया है. तन पर न तो ठीक से कपड़ा, न पेट भर भोजन. एक रात परमहंस अपनी पत्नी को विश्वास में ले कर बोला, ‘‘क्यों न मैं काशी चला जाऊं.’’ ‘‘अकेले?’’ पत्नी सशंकित हो कर बोली.

‘‘अभी तो अकेले ही ठीक रहेगा लेकिन जब वहां काम जम जाएगा तो तुम्हें भी बुला लूंगा,’’ परमहंस खुश होते हुए बोला. ‘‘काशी तो धरमकरम का स्थान है. मुझे पूरा भरोसा है कि वहां तुम्हारा काम जम जाएगा.’’ पत्नी की विश्वास भरी बातें सुन कर परमहंस की बांछें खिल गईं. दूसरे दिन पत्नी से विदा ले कर परमहंस ट्रेन पर चढ़ गया. चलते समय रामनामी ओढ़ना वह नहीं भूला था, क्योंकि बिना टिकट चलने का यही तो लाइसेंस था. माथे पर तिलक लगाए वह बनारस के हसीन खयालों में कुछ ऐसे खोया कि तंद्रा ही तब टूटी जब बनारस आ गया. बनारस पहुंचने पर परमहंस ने चैन की सांस ली.

प्लेटफार्म से बाहर आते ही उस ने अपना दिमाग दौड़ाया. थोडे़ से सोचविचार के बाद गंगाघाट जाना उसे मुनासिब लगा. 2 दिन हो गए उसे घाट पर टहलते मगर कोई खास सफलता नहीं मिली. यहां पंडे़ पहले से ही जमे थे. कहने लगे, ‘‘एक इंच भी नहीं देंगे. पुश्तैनी जगह है. अगर धंधा जमाने की कोशिश की तो समझ लेना लतियाए जाओगे.’’ निराश परमहंस की इस दौरान एक व्यक्ति से जानपहचान हो गई. वह उसे घाट पर सुबहशाम बैठे देखता.

बातोंबातों में परमहंस ने उस के काम के बारे में पूछा तो वह हंस पड़ा और कहने लगा, ‘‘हम कोई काम नहीं करते. सिपाही थे, नौकरी से निकाल दिए गए तो दालरोटी के लिए यहीं जम गए.’’ ‘‘दालरोटी, वह भी यहां?’’ परमहंस आश्चर्य से बोला, ‘‘बिना काम के कैसी दालरोटी?’’ वह सोचने लगा कि वह भी तो ऐसे ही अवसर की तलाश में यहां आया है. फिर तो यह आदमी बड़े काम का है. उस की आंखें चमक उठीं, ‘‘भाई, मुझे भी बताओ, मैं बिहार के एक गांव से रोजीरोटी की तलाश में आया हूं.

क्या मेरा भी कोई जुगाड़ हो सकता है?’’ ‘‘क्यों नहीं,’’ बडे़ इत्मीनान से वह बोला, ‘‘तुम भी मेरे साथ रहो, पूरीकचौरी से आकंठ डूबे रहोगे. बाबा विश्वनाथ की नगरी है, यहां कोई भी भूखा नहीं सोता. कम से कम हम जैसे तो बिलकुल नहीं.’’ इस तरह परमहंस को एक हमकिरदार मिल गया. तभी पंडा सा दिखने वाला एक आदमी, सिपाही के पास आया, ‘‘चलो, जजमान आ गए हैं.’’ सिपाही उठ कर जाने लगा तो इशारे से परमहंस को भी चलने का संकेत दिया. दोनों एक पुराने से मंदिर के पास आए.

वहां एक व्यक्ति सिर मुंडाए श्वेत वस्त्र में खड़ा था. पंडे ने उसे बैठाया फिर खुद भी बैठ गया. कुछ पूजापाठ वगैरह किया. उस के बाद जजमान ने खानेपीने का सामान उस के सामने रख कर खाने का आग्रह किया. तीनों ने बडे़ चाव से देसी घी से छनी पूरी व मिठाइयों का भोजन किया. जजमान उठ कर जाने को हुआ तो पंडे ने उस से पूरे साल का राशनपानी मांगा. जजमान हिचकिचाते हुए बोला, ‘‘इतना कहां से लाएं. अभी मृतक की तेरहवीं का खर्चा पड़ा था.’’ वह चिरौरी करने लगा, ‘‘पीठ ठोक दीजिए महाराज, इस से ज्यादा मुझ से नहीं होगा.’’

बिना लिएदिए जजमान की पीठ ठोकने को पंडा तैयार नहीं था. परमहंस इन सब को बडे़ गौर से देख रहा था. कैसे शास्त्रों की आड़ में जजमान से सबकुछ लूट लेने की कोशिश पंडा कर रहा था. अंतत: 1,001 रुपए लेने के बाद ही पंडे ने सिर झुकवा कर जजमान की पीठ ठोकी. उस ने परम संतोष की सांस ली. अब मृतक की आत्मा को शांति मिल गई होगी, यह सोच कर उस ने आकाश की तरफ देखा. लौटते समय पंडे को छोड़ कर दोनों घाट पर आए. कई सालों के बाद परमहंस ने तबीयत से मनपसंद भोजन का स्वाद लिया था. सिपाही के साथ रहते उसे 15 दिन से ऊपर हो चुके थे. खानेपीने की कोई कमी नहीं थी मगर पत्नी को उस ने वचन दिया था कि सबकुछ ठीक कर के वह उसे बुला लेगा.

कम से कम न बुला पाने की स्थिति में रुपएपैसे तो भेजने ही चाहिए पर पैसे आएं कहां से? परमहंस चिंता में पड़ गया. मेहनत वह कर नहीं सकता था. फिर मेहनत वह करे तो क्यों? पंडे को ही देखा, कैसे छक कर खाया, ऊपर से 1,001 रुपए ले कर भी गया. उसे यह नेमत पैदाइशी मिली है. वह उसे भला क्यों छोडे़? इसी उधेड़बुन में कई दिन और निकल गए. एक दिन सिपाही नहीं आया. पंडा भी नहीं दिख रहा था. हो सकता हो दोनों कहीं गए हों. परमहंस का भूख के मारे बुरा हाल था. वह पत्थर के चबूतरे पर लेटा पेट भरने के बारे में सोच रहा था कि एक महिला अपने बेटे के साथ उस के करीब आ कर बैठ गई और सुस्ताने लगी. परमहंस ने देखा कि उस ने टोकरी में कुछ फल ले रखे थे. मांगने में परमहंस को पहले भी संकोच नहीं था फिर आज तो वह भूखा है, ऐसे में मुंह खोलने में क्या हर्ज?

‘‘माता, आप के पास कुछ खाने के लिए होगा. सुबह से कुछ नहीं खाया है.’’ साधु जान कर उस महिला ने परमहंस को निराश नहीं किया. फल खाते समय परमहंस ने महिला से उस के आने की वजह पूछी तो वह कहने लगी, ‘‘पिछले दिनों मेरे बेटे की तबीयत खराब हो गई थी. मैं ने शीतला मां से मन्नत मांगी थी.’’ परमहंस को अब ज्यादा पूछने की जरूरत नहीं थी. इतने दिन काशी में रह कर कुछकुछ यहां पैसा कमाने के तरीके सीख चुका था. अत: बोला, ‘‘माताजी, मैं आप की हथेली देख सकता हूं.’’ वह महिला पहले तो हिचकिचाई मगर भविष्य जानने का लोभ संवरण नहीं कर सकी. परमहंस कुछ जानता तो था नहीं. उसे तो बस, पैसे जोड़ कर घर भेजने थे. अत: महिला का हाथ देख कर बोला, ‘‘आप की तो भाग्य रेखा ही नहीं है.’’ उस का इतना कहना भर था कि महिला की आंखें नम हो गईं, ‘‘आप ठीक कहते हैं. शादी के 2 साल बाद ही पति का फौज में इंतकाल हो गया.

यही एक बच्चा है जिसे ले कर मैं हमेशा परेशान रहती हूं. एक प्राइवेट स्कूल में काम करती हूं. बच्चा दाई के भरोसे छोड़ कर जाती हूं. यह अकसर बीमार रहता है.’’ ‘‘घर आप का है?’’ परमहंस ने पूछा. ‘‘हां’’ बातों के सिलसिले में परमहंस को पता चला कि वह विधवा थी, और उस ने अपना नाम सावित्री बताया था. विधवा से परमहंस को खयाल आया कि जब वह छोटा था तो एक बार अपने पिता मनसाराम के साथ एक विधवा जजमान के घर अखंड रामायण पाठ करने गया था. रामायण पाठ खत्म होने के बाद पिताजी रात में उस विधवा के यहां ही रुक गए. अगली सुबह पिताजी कुछ परेशान थे. जजमान को बुला कर पूछा, ‘बेटी, यहां कोई बुजुर्ग महिला जल कर मरी थी?’ यह सुन कर वह विधवा जजमान सकते में आ गई. ‘जली तो थी और वह कोई नहीं मेरी मां थी. बाबूजी बहरे थे. दूसरे कमरे में कुछ कर रहे थे. उसी दौरान चूल्हा जलाते समय अचानक मां की साड़ी में आग लग गई.

वह लाख चिल्लाई मगर बहरे होने के कारण पास ही के कमरे में रहते हुए बाबूजी कुछ सुन न सके. इस प्रकार मां अकाल मृत्यु को प्राप्त हुई.’ मनसाराम के मुख से मां के जलने की बात जान कर विधवा की उत्सुकता बढ़ गई और वह बोली, ‘आप को कैसे पता चला?’ ‘बेटी, कल रात मैं ने स्वप्न में देखा कि एक बुजुर्ग महिला जल रही है. वह मुक्ति के लिए छटपटा रही है,’ मनसाराम रहस्यमय ढंग से बोले, ‘इस घटना को 20 साल गुजर चुके थे फिर भी मां को मुक्ति नहीं मिली. मिलेगी भी तो कैसे? अकाल मृत्यु वाले बिना पूजापाठ के नहीं छूटते. उन की आत्मा भटकती रहती है.’

यह सुन कर वह विधवा जजमान भावुक हो उठी. उस ने मुक्ति पाठ कराना मंजूर कर लिया. इस तरह मनसाराम को जो अतिरिक्त दक्षिणा मिली तो वह उस का जिक्र घर आने पर अपनी पत्नी से करना न भूले. परमहंस छोटा था पर इतना भी नहीं कि समझ न सके. उसे पिताजी की कही एकएक बात आज भी याद है जो वह मां को बता रहे थे. जजमान अधेड़ विधवा थी. पास के ही गांव में ग्रामसेविका थी. पैसे की कोई कमी नहीं थी. सो चलतेचलते सोचा, क्यों न कुछ और ऐंठ लिया जाए. शाम को रामायण पाठ खत्म होने के बाद मैं गांव में टहल रहा था कि एक जगह कुछ लोग बैठे आपस में कह रहे थे कि इस विधवा ने अखंड रामायण पाठ करवा कर गांव को पवित्र कर दिया और अपनी मां को भी. मां की बात पूछने पर गांव वालों ने उन्हें बताया कि 20 बरस पहले उन की मां जल कर मरी थी.

बस, मैं ने इसी को पकड़ लिया. स्वप्न की झूठी कहानी गढ़ कर अतिरिक्त दक्षिणा का भी जुगाड़ कर लिया. और इसी के साथ दोनों हंस पडे़. परमहंस के मन में भी ऐसा ही एक विचार जागा, ‘‘आप के पास कुंडली तो होगी?’’ ‘‘हां, घर पर है,’’ सावित्री ने जवाब दिया. ‘‘आप चाहें तो मुझे एक बार दिखा दें, मैं आप को कष्टनिवारण का उपाय बता दूंगा,’’ परमहंस ने इतने निश्छल भाव से कहा कि वह ना न कर सकी. सावित्री तो परमहंस से इतनी प्रभावित हो गई कि घर आने तक का न्योता दे दिया.

परमहंस यही तो चाहता था. सावित्री का अच्छाखासा मकान था. देख कर परमहंस के मन में लालच आ गया. वह इस फिराक में पड़ गया कि कैसे ऐसी कुछ व्यवस्था हो कि कहीं और जाने की जरूरत ही न हो और यह तभी संभव था जब कोई मंदिर वगैरह बने और वह उस का स्थायी पुजारी बन जाए. काशी में धर्म के नाम पर धंधा चमकाने में कोई खास मेहनत नहीं करनी पड़ती.

वह तो उस ने घाट पर ही देख लिया था. मानो दूध गंगा में या फिर बाबा विश्वनाथ को लोग चढ़ा देते हैं. भले ही आम आदमी को पीने के लिए न मिलता हो. सावित्री ने उस की अच्छी आवभगत की. परमहंस कुंडली के बारे में उतना ही जानता था जितना उस का पिता मनसाराम. इधरउधर का जोड़घटाना करने के बाद परमहंस तनिक चिंतित सा बोला, ‘‘ग्रह दोष तो बहुत बड़ा है. बेटे पर हमेशा बना रहेगा.’’ ‘‘कोई उपाय,’’ सावित्री अधीर हो उठी. उपाय है न, शास्त्रों में हर संकट का उपाय है, बशर्ते विश्वास के साथ उस का पालन किया जाए,’’ परमहंस बोला, ‘‘होता यह है कि लोग नास्तिकों के कहने पर बीच में ही पूजापाठ छोड़ देते हैं,’’ कुंडली पर दोबारा नजर डाल कर वह बोला, ‘‘रोजाना सुंदरकांड का पाठ करना होगा व शनिवार को हनुमान का दर्शन.’’

‘‘हनुमानजी का आसपास कोई मंदिर नहीं है. वैसे भी जिस मंदिर की महत्ता है वह काफी दूर है,’’ सावित्री बोली. परमहंस कुछ सोचने लगा. योजना के मुताबिक उस ने गोटी फेंकी, ‘‘क्यों न आप ही पहल करतीं, मंदिर यहीं बन जाएगा. पुण्य का काम है, हनुमानजी सब ठीक कर देंगे.’’ सावित्री ने सोचने का मौका मांगा. परमहंस उस रोज वापस घाट चला आया. सिपाही पहले से ही वहां बैठा था. ‘‘कहां चले गए थे?’’ सिपाही ने पूछा तो परमहंस ने सारी बातें विस्तार से उसे बता दीं. ‘‘ये तुम ने अच्छा किया. भाई मान गए तुम्हारे दिमाग को. महीना भी नहीं बीता और तुम पूरे पंडे हो गए,’’ सिपाही ने हंसी की.

उस के बाद परमहंस सावित्री का रोज घाट पर इंतजार करने लगा. करीब एक सप्ताह बाद वह आते दिखाई दी. परमहंस ने जल्दीजल्दी अपने को ठीक किया. रामनामी सिरहाने से उठा कर बदन पर डाली. ध्यान भाव में आ कर वह कुछ बुदबुदाने लगा. सावित्री ने आते ही परमहंस के पांव छुए. क्षणांश इंतजारी के बाद परमहंस ने आंखें खोलीं. आशीर्वाद दिया. ‘‘मैं ने आप का ध्यान तो नहीं तोड़ा?’’ ‘‘अरे नहीं, यह तो रोज का किस्सा है. वैसे भी शास्त्रों में ‘परोपकार: परमोधर्म’ को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है. आप का कष्ट दूर हो इस से बड़ा ध्यान और क्या हो सकता है मेरे लिए.’’ परमहंस का निस्वार्थ भाव उस के दिल को छू गया. ‘‘महाराज, कल रात मैं ने स्वप्न में हनुमानजी को देखा,’’ सावित्री बोली. ‘‘इस से बड़ा आदेश और क्या हो सकता है, रुद्रावतार हनुमानजी का आप के लिए.

अब इस में विलंब करना उचित नहीं. मंदिर का निर्माण अति शीघ्र होना चाहिए,’’ गरम लोहे पर चोट करने का अवसर न खोते हुए परमहंस ने अपनी शातिर बुद्धि का इस्तेमाल किया. ‘‘पर एक बाधा है,’’ सावित्री तनिक उदास हो बोली, ‘‘मैं ज्यादा खर्च नहीं कर सकती.’’ परमहंस सोच में पड़ गया. फिर बोला,‘‘कोई बात नहीं. आप के महल्ले से चंदा ले कर इस काम को पूरा किया जाएगा.’’ और इसी के साथ सावित्री के सिर से एक बड़ा बोझ हट चुका था. परमहंस कुछ पैसा घर भेजना चाह रहा था मगर जुगाड़ नहीं बैठ रहा था. उस के मन में एक विचार आया कि क्यों न ग्रहशांति के नाम से हवनपूजन कराया जाए. सावित्री मना न कर सकेगी. परमहंस के प्रस्ताव पर सावित्री सहर्ष तैयार हो गई.

2 दिन के पूजापाठ में उस ने कुल 2 हजार बनाए. कुछ सावित्री से तो कुछ महल्ले की महिलाओं के चढ़ावे से. मौका अच्छा था, सो परमहंस ने मंदिर की बात छेड़ी. अब तक महिलाएं परमहंस से परिचित हो चुकी थीं. उन सभी ने एक स्वर में सहयोग देने का वचन दिया. परमहंस ने इस आयोजन से 2 काम किए. एक अर्थोपार्जन, दूसरे मंदिर के लिए प्रचार. सावित्री का पति फौज में था. फौजी का गौरव देश के लिए हो जाने वाली कुरबानी में होता है. देश के लिए शहीद होना कोई ग्रहों के प्रतिकूल होने जैसा नहीं. जैसा की सावित्री सोचती थी. सावित्री का बेटा हमेशा बीमार रहता था.

यह भी पर्याप्त देखभाल न होने की वजह से था. सावित्री का मूल वजहों से हट जाना ही परमहंस जैसों के लिए अपनी जमीन तैयार करने में आसानी होती है. परमहंस सावित्री की इसी कमजोरी का फायदा उठा रहा था. दुर्गा पूजा नजदीक आ रही थी, सो महल्ला कमेटी के सदस्य सक्रिय हो गए. अच्छाखासा चंदा जुटा कर उन्होंने एक दुर्गा की प्रतिमा खरीदी. पूजा पाठ के लिए समय निर्धारित किया गया तो पता चला कि पुराने पुरोहितजी बीमार हैं. ऐसे में किसी ने परमहंस का जिक्र किया. आननफानन में सावित्री से परमहंस का पता ले कर कुछ उत्साही युवक उसे घाट से लिवा लाए. परमहंस ने दक्षिणा में कोई खास दिलचस्पी नहीं दिखाई क्योंकि उस ने दूर तक की सोच रखी थी.

पूजापाठ खत्म होने के बाद उस ने कमेटी वालों के सामने मंदिर की बात छेड़ी. युवाओं ने जहां तेजी दिखाई वहीं लंपट किस्म के लोग, जिन का मकसद चंदे के जरिए होंठ तर करना था, ने तनमन से इस पुण्य के काम में हाथ बंटाना स्वीकार किया. घर से दुत्कारे ऐसे लोगों को मंदिर बनने के साथ पीनेखाने का एक स्थायी आसरा मिल जाएगा. इसलिए वे जहां भी जाते मंदिर की चर्चा जरूर करते, ‘‘चचा, जरा सोचो, कितना लाभ होगा मंदिर बनने से. कितना दूर जाना पड़ता है हमें दर्शन करने के लिए. बच्चों को परीक्षा के समय हनुमानजी का ही आसरा होता है. ऐसे में उन्हें कितना आत्मबल मिलेगा. वैसे भी राम ने कलयुग में अपने से अधिक हनुमान की पूजा का जिक्र किया है.’’ धीरेधीरे लोगों की समझ में आने लगा कि मंदिर बनना पुण्य का काम है. आखिर उन का अन्नदाता ईश्वर ही है.

हम कितने स्वार्थी हैं कि भगवान के रहने के लिए थोड़ी सी जगह नहीं दे सकते, जबकि खुद आलिशान मकानों के लिए जीवन भर जोड़तोड़ करते रहते हैं. इस तरह आसपास मंदिर चर्चा का विषय बन गया. कुछ ने विरोध किया तो परमहंस के गुर्गों ने कहा, ‘‘दूसरे मजहब के लोगों को देखो, बड़ीबड़ी मीनार खड़ी करने में जरा भी कोताही नहीं बरतते. एक हम हिंदू ही हैं जो अव्वल दरजे के खुदगर्ज होते हैं. जिस का खाते हैं उसी को कोसते हैं. हम क्या इतने गएगुजरे हैं कि 2-4 सौ धर्मकर्म के नाम पर नहीं खर्च कर सकते?’’ चंदा उगाही शुरू हुई तो आगेआगे परमहंस पीछेपीछे उस के आदमी.

उन्होंने ऐसा माहौल बनाया कि दूसरे लोग भी अभियान में जुट गए. अच्छीखासी भीड़ जब न देने वालों के पास जाती तो दबाववश उन्हें भी देना पड़ता. परमहंस ने एक समझदारी दिखाई. फूटी कौड़ी भी घालमेल नहीं किया. वह जनता के बीच अपने को गिराना नहीं चाहता था क्योंकि उस ने तो कुछ और ही सोच रखा था. मंदिर के लिए जब कोई जगह देने को तैयार नहीं हुआ तो सड़क के किनारे खाली जमीन पर एक रात कुछ शोहदों ने हनुमान की मूर्ति रख कर श्रीगणेश कर दिया और अगले दिन से भजनकीर्तन शुरू हो गया. दान पेटिका रखी गई ताकि राहगीरों का भी सहयोग मिलता रहे.

फिरकापरस्त नेता को बुलवा कर बाकायदा निर्माण की नींव रखी गई ताकि अतिक्रमण के नाम पर कोई सरकारी अधिकारी व्यवधान न डाले. सावित्री खुश थी. चलो, परमहंसजी महाराज की बदौलत उस के कष्टों का निवारण हो रहा था. तमाम कामचोर महिलाओं को भजनपूजन के नाम पर समय काटने की स्थायी जगह मिल रही थी. सावित्री के रिश्तेदारों ने सुना कि उस ने मंदिर बनवाने में आर्थिक सहयोग दिया है तो प्रसन्न हो कर बोले, ‘‘चलो उस ने अपना विधवा जीवन सार्थक कर लिया.’’ मंदिर बन कर तैयार हो गया. प्राणप्रतिष्ठा के दिन अनेक साधुसंतों व संन्यासियों को बुलाया गया

यह सब देख कर परमहंस की छाती फूल कर दोगुनी हो गई. परमहंस ने मंदिर निर्माण का सारा श्रेय खुद ले कर खूब वाहवाही लूटी. उस का सपना पूरा हो चुका था. आज उस की पत्नी भी मौजूद थी. काशी में उस के पति ने धर्म की स्थायी दुकान खोल ली थी इसलिए वह फूली न समा रही थी. इस में कोई शक भी नहीं था कि थोड़े समय में ही परमहंस ने जो कर दिखाया वह किसी के लिए भी ईर्ष्या का विषय हो सकता था. परमहंस के विशेष आग्रह पर सावित्री भी आई जबकि उस के बच्चे की तबीयत ठीक नहीं थी.

पूजापाठ के दौरान ही किसी ने सावित्री को खबर दी कि उस के बेटे की हालत ठीक नहीं है. वह भागते हुए घर आई. बच्चा एकदम सुस्त पड़ गया था. उसे सांस लेने में दिक्कत आ रही थी. वह किस से कहे जो उस की मदद के लिए आगे आए. सारा महल्ला तो मंदिर में जुटा था. अंतत वह खुद बच्चे को ले कर अस्पताल की ओर भागी परंतु तब तक बहुत देर हो चुकी थी. निमोनिया के चलते बच्चा रास्ते में ही दम तोड़ चुका था.

Beautiful Story: शायद बर्फ पिघल जाए

‘‘हमारा जीवन कोई जंग नहीं है मीना कि हर पल हाथ में हथियार ही ले कर चला जाए. सामने वाले के नहले पर दहला मारना ही क्या हमारे जीवन का उद्देश्य रह गया है?’’ मैं ने समझाने के उद्देश्य से कहा, ‘‘अब अपनी उम्र को भी देख लिया करो.’’

‘‘क्या हो गया है मेरी उम्र को?’’ मीना बोली, ‘‘छोटाबड़ा जैसे चाहे मुझ से बात करे, क्या उन्हें तमीज न सिखाऊं?’’

‘‘तुम छोटेबड़े, सब के हर काम में अपनी टांग क्यों फंसाती हो, छोटे के साथ बराबर का बोलना क्या तुम्हें अच्छा लगता है?’’

‘‘तुम मेरे सगे हो या विजय के? मैं जानती हूं तुम अपने ही खून का साथ दोगे. मैं ने अपनी पूरी उम्र तुम्हारे साथ गुजार दी मगर आज भी तुम मेरे नहीं अपने परिवार के ही सगे हो.’’

मैं ने अपना सिर पीट लिया. क्या करूं मैं इस औरत का. दम घुटने लगता है मेरा अपनी ही पत्नी मीना के साथ. तुम ने खाना मुझ से क्यों न मांगा, पल्लवी से क्यों मांग लिया. सिरदर्द की दवा पल्लवी तुम्हें क्यों खिला रही थी? बाजार से लौट कर तुम ने फल, सब्जी पल्लवी को क्यों पकड़ा दी, मुझे क्यों नहीं बुला लिया. मीना अपनी ही बहू पल्लवी से अपना मुकाबला करे तो बुरा लगना स्वाभाविक है.

उम्र के साथ मीना परिपक्व नहीं हुई उस का अफसोस मुझे होता है और अपने स्नेह का विस्तार नहीं किया इस पर भी पीड़ा होती है क्योंकि जब मीना ब्याह कर मेरे जीवन में आई थी तब मेरी मां, मेरी बहन के साथ मुझे बांटना उसे सख्त नागवार गुजरता था. और अब अपनी ही बहू इसे अच्छी नहीं लगती. कैसी मानसिकता है मीना की?

मुझे मेरी मां ने आजाद छोड़ दिया था ताकि मैं खुल कर सांस ले सकूं. मेरी बहन ने भी शादी के बाद ज्यादा रिश्ता नहीं रखा. बस, राखी का धागा ही साल भर बाद याद दिला जाता था कि मैं भी किसी का भाई हूं वरना मीना के साथ शादी के बाद मैं एक ऐसा अनाथ पति बन कर रह गया जिस का हर कोई था फिर भी पत्नी के सिवा कोई नहीं था. मैं ने मीना के साथ निभा लिया क्योंकि मैं पलायन में नहीं, निभाने में विश्वास रखता हूं, लेकिन अब उम्र के इस पड़ाव पर जब मैं सब का प्यार चाहता हूं, सब के साथ मिल कर रहना चाहता हूं तो सहसा महसूस होता है कि मैं तो सब से कटता जा रहा हूं, यहां तक कि अपने बेटेबहू से भी.

मीना के अधिकार का पंजा शादी- शुदा बेटे के कपड़ों से ले कर उस के खाने की प्लेट तक है. अपना हाथ उस ने खींचा ही नहीं है और मुझे लगता है बेटा भी अपना दम घुटता सा महसूस करने लगा है.

‘‘कोई जरूरत नहीं है बहू से ज्यादा घुलनेमिलने की. पराया खून पराया ही रहता है,’’ मीना ने सदा की तरह एकतरफा फैसला सुनाया तो बरसों से दबा लावा मेरी जबान से फूट निकला.

‘‘मेरी मां, बहन और मेरा भाई विजय तो अपना खून थे पर तुम ने तो मुझे उन से भी अलग कर दिया. मेरा अपना आखिर है कौन, समझा सकती हो मुझे? बस, वही मेरा अपना है जिसे तुम अपना कहो…तुम्हारे अपने भी बदलते रहते हैं… कब तक मैं रिश्तों को तुम्हारी ही आंखों से देखता रहूंगा.’’

कहतेकहते रो पड़ा मैं, क्या हो गया है मेरा जीवन. मेरी सगी बहन, मेरा सगा भाई मेरे पास से निकल जाते हैं और मैं उन्हें बुलाता ही नहीं…नजरें मिलती हैं तो उन में परायापन छलकता है जिसे देख कर मुझे तकलीफ होती है. हम 3 भाई, बहन जवान हो कर भी जरा सी बात न छिपाते थे और आज वर्षों बीत गए हैैं उन से बात किए हुए.

आज जब जीवन की शाम है, मेरी बहू पल्लवी जिस पर मैं अपना ममत्व अपना दुलार लुटाना चाहता हूं, वह भी मीना को नहीं सुहाता. कभीकभी सोचता हूं क्या नपुंसक हूं मैं? मेरी शराफत और मेरी निभा लेने की क्षमता ही क्या मेरी कमजोरी है? तरस आता है मुझे कभीकभी खुद पर.

क्या वास्तव में जीवन इसी जीतहार का नाम है? मीना मुझे जीत कर अलग ले गई होगी, उस का अहं संतुष्ट हो गया होगा लेकिन मेरी तो सदा हार ही रही न. पहले मां को हारा, फिर बहन को हारा. और उस के बाद भाई को भी हार गया.

‘‘विजय चाचा की बेटी का  रिश्ता पक्का हो गया है, पापा. लड़का फौज में कैप्टन है,’’ मेरे बेटे दीपक ने खाने की मेज पर बताया.

‘‘अच्छा, तुझे बड़ी खबर है चाचा की बेटी की. वह तो कभी यहां झांकने भी नहीं आया कि हम मर गए या जिंदा हैं.’’

‘‘हम मर गए होते तो वह जरूर आता, मीना, अभी हम मरे कहां हैं?’’

मेरा यह उत्तर सुन हक्काबक्का रह गया दीपक. पल्लवी भी रोटी परोसती परोसती रुक गई.

‘‘और फिर ऐसा कोई भी धागा हम ने भी कहां जोड़े रखा है जिस की दुहाई तुम सदा देती रहती हो. लोग तो पराई बेटी का भी कन्यादान अपनी बेटी की तरह ही करते हैं, विजय तो फिर भी अपना खून है. उस लड़की ने ऐसा क्या किया है जो तुम उस के साथ दुश्मनी निभा रही हो.

खाना पटक दिया मीना ने. अपनेपराए खून की दुहाई देने लगी.

‘‘बस, मीना, मैं इस बहस में नहीं पड़ना चाहता कि कल क्या हुआ था. जो भी हुआ उस का इस से बुरा परिणाम और क्या होगा कि इतने सालों से हम दोनों भाइयों ने एकदूसरे की शक्ल तक नहीं देखी… आज अगर पता चला है कि उस की बच्ची की शादी है तो उस पर भी तुम ताना कसने लगीं.’’

‘‘उस की शादी का तो मुझे 15 दिन से पता है. क्या वह आप को बताने आया?’’

‘‘अच्छा, 15 दिन से पता है तो क्या तुम बधाई देने गईं? सदा दूसरों से ही उम्मीद करती हो, कभी यह भी सोचा है कि अपना भी कोई फर्ज होता है. कोई भी रिश्ता एकतरफा नहीं चलता. सामने वाले को भी तो पता चले कि आप को उस की परवा है.’’

‘‘क्या वह दीपक की शादी में आया था?’’ अभी मीना इतना ही कह पाई थी कि मैं खाना छोड़ कर उठ खड़ा हुआ.

मीना का व्यवहार असहनीय होता जा रहा है. यह सोच कर मैं सिहर उठता कि एक दिन पल्लवी भी दीपक को ले कर अलग रहने चली जाएगी. मेरी उम्र भर की साध मेरा बेटा भी जब साथ नहीं रहेगा तो हमारा क्या होगा? शायद इतनी दूर तक मीना सोच नहीं सकती है.

सहसा माली ने अपनी समस्या से चौंका दिया, ‘‘अगले माह भतीजी का ब्याह है. आप की थोड़ी मदद चाहिए होगी साहब, ज्यादा नहीं तो एक जेवर देना तो मेरा फर्ज बनता ही है न. आखिर मेरे छोटे भाई की बेटी है.’’

ऐसा लगा  जैसे किसी ने मुझे आसमान से जमीन पर फेंका हो. कुछ नहीं है माली के पास फिर भी वह अपनी भतीजी को कुछ देना चाहता है. बावजूद इस के कि उस की भी अपने भाई से अनबन है. और एक मैं हूं जो सर्वसंपन्न होते हुए भी अपनी भतीजी को कुछ भी उपहार देने की भावना और स्नेह से शून्य हूं. माली तो मुझ से कहीं ज्यादा धनवान है.

पुश्तैनी जायदाद के बंटवारे से ले कर मां के मरने और कार दुर्घटना में अपने शरीर पर आए निशानों के झंझावात में फंसा मैं कितनी देर तक बैठा सोचता रहा, समय का पता ही नहीं चला. चौंका तो तब जब पल्लवी ने आ कर पूछा, ‘‘क्या बात है, पापा…आप इतनी रात गए यहां बैठे हैं?’’ धीमे स्वर में पल्लवी बोली, ‘‘आप कुछ दिन से ढंग से खापी नहीं रहे हैं, आप परेशान हैं न पापा, मुझ से बात करें पापा, क्या हुआ…?’’

जरा सी बच्ची को मेरी पीड़ा की चिंता है यही मेरे लिए एक सुखद एहसास था. अपनी ही उम्र भर की कुछ समस्याएं हैं जिन्हें समय पर मैं सुलझा नहीं पाया था और अब बुढ़ापे में कोई आसान रास्ता चाह रहा था कि चुटकी बजाते ही सब सुलझ जाए. संबंधों में इतनी उलझनें चली आई हैं कि सिरा ढूंढ़ने जाऊं तो सिरा ही न मिले. कहां से शुरू करूं जिस का भविष्य में अंत भी सुखद हो? खुद से सवाल कर खुद ही खामोश हो लिया.

‘‘बेटा, वह…विजय को ले कर परेशान हूं.’’

‘‘क्यों, पापा, चाचाजी की वजह से क्या परेशानी है?’’

‘‘उस ने हमें शादी में बुलाया तक नहीं.’’

‘‘बरसों से आप एकदूसरे से मिले ही नहीं, बात भी नहीं की, फिर वह आप को क्यों बुलाते?’’ इतना कहने के बाद पल्लवी एक पल को रुकी फिर बोली, ‘‘आप बड़े हैं पापा, आप ही पहल क्यों नहीं करते…मैं और दीपक आप के साथ हैं. हम चाचाजी के घर की चौखट पार कर जाएंगे तो वह भी खुश ही होंगे…और फिर अपनों के बीच कैसा मानअपमान, उन्होंने कड़वे बोल बोल कर अगर झगड़ा बढ़ाया होगा तो आप ने भी तो जरूर बराबरी की होगी…दोनों ने ही आग में घी डाला होगा न, क्या अब उसी आग को पानी की छींट डाल कर बुझा नहीं सकते?…अब तो झगड़े की वजह भी नहीं रही, न आप की मां की संपत्ति रही और न ही वह रुपयापैसा रहा.’’

पल्लवी के कहे शब्दों पर मैं हैरान रह गया. कैसी गहरी खोज की है. फिर सोचा, मीना उठतीबैठती विजय के परिवार को कोसती रहती है शायद उसी से एक निष्पक्ष धारणा बना ली होगी.

‘‘बेटी, वहां जाने के लिए मैं तैयार हूं…’’

‘‘तो चलिए सुबह चाचाजी के घर,’’ इतना कह कर पल्लवी अपने कमरे में चली गई और जब लौटी तो उस के हाथ में एक लाल रंग का डब्बा था.

‘‘आप मेरी ननद को उपहार में यह दे देना.’’

‘‘यह तो तुम्हारा हार है, पल्लवी?’’

‘‘आप ने ही दिया था न पापा, समय नहीं है न नया हार बनवाने का. मेरे लिए तो बाद में भी बन सकता है. अभी तो आप यह ले लीजिए.’’

कितनी आसानी से पल्लवी ने सब सुलझा दिया. सच है एक औरत ही अपनी सूझबूझ से घर को सुचारु रूप से चला सकती है. यह सोच कर मैं रो पड़ा. मैं ने स्नेह से पल्लवी का माथा सहला दिया.

‘‘जीती रहो बेटी.’’

अगले दिन पहले से तय कार्यक्रम के अनुसार पल्लवी और मैं अलगअलग घर से निकले और जौहरी की दुकान पर पहुंच गए, दीपक भी अपने आफिस से वहीं आ गया. हम ने एक सुंदर हार खरीदा और उसे ले कर विजय के घर की ओर चल पड़े. रास्ते में चलते समय लगा मानो समस्त आशाएं उसी में समाहित हो गईं.

‘‘आप कुछ मत कहना, पापा,’’ पल्लवी बोली, ‘‘बस, प्यार से यह हार मेरी ननद को थमा देना. चाचा नाराज होंगे तो भी हंस कर टाल देना…बिगड़े रिश्तों को संवारने में कई बार अनचाहा भी सहना पड़े तो सह लेना चाहिए.’’

मैं सोचने लगा, दीपक कितना भाग्यवान है कि उसे पल्लवी जैसी पत्नी मिली है जिसे जोड़ने का सलीका आता है.

विजय के घर की दहलीज पार की तो ऐसा लगा मानो मेरा हलक आवेग से अटक गया है. पूरा परिवार बरामदे में बैठा शादी का सामान सहेज रहा था. शादी वाली लड़की चाय टे्र में सजा कर रसोई से बाहर आ रही थी. उस ने मुझे देखा तो उस के पैर दहलीज से ही चिपक गए. मेरे हाथ अपनेआप ही फैल गए. हैरान थी मुन्नी हमें देख कर.

‘‘आ जा मुन्नी,’’ मेरे कहे इस शब्द के साथ मानो सारी दूरियां मिट गईं.

मुन्नी ने हाथ की टे्र पास की मेज पर रखी और भाग कर मेरी बांहों में आ समाई.

एक पल में ही सबकुछ बदल गया. निशा ने लपक कर मेरे पैर छुए और विजय मिठाई के डब्बे छोड़ पास सिमट आया. बरसों बाद भाई गले से मिला तो सारी जलन जाती रही. पल्लवी ने सुंदर हार मुन्नी के गले में पहना दिया.

किसी ने भी मेरे इस प्रयास का विरोध नहीं किया.

‘‘भाभी नहीं आईं,’’ विजय बोला, ‘‘लगता है मेरी भाभी को मनाने की  जरूरत पड़ेगी…कोई बात नहीं. चलो निशा, भाभी को बुला लाएं.’’

‘‘रुको, विजय,’’ मैं ने विजय को यह कह कर रोक दिया कि मीना नहीं जानती कि हम यहां आए हैं. बेहतर होगा तुम कुछ देर बाद घर आओ. शादी का निमंत्रण देना. हम मीना के सामने अनजान होेने का बहाना करेंगे. उस के बाद हम मान जाएंगे. मेरे इस प्रयास से हो सकता है मीना भी आ जाए.’’

‘‘चाचा, मैं तो बस आप से यह कहने आया हूं कि हम सब आप के साथ हैं. बस, एक बार बुलाने चले आइए, हम आ जाएंगे,’’ इतना कह कर दीपक ने मुन्नी का माथा चूम लिया था.

‘‘अगर भाभी न मानी तो? मैं जानती हूं वह बहुत जिद्दी हैं…’’ निशा ने संदेह जाहिर किया.

‘‘न मानी तो न सही,’’ मैं ने विद्रोही स्वर में कहा, ‘‘घर पर रहेगी, हम तीनों आ जाएंगे.’’

‘‘इस उम्र में क्या आप भाभी का मन दुखाएंगे,’’ विजय बोला, ‘‘30 साल से आप उन की हर जिद मानते चले आ रहे हैं…आज एक झटके से सब नकार देना उचित नहीं होगा. इस उम्र में तो पति को पत्नी की ज्यादा जरूरत होती है… वह कितना गलत सोचती हैं यह उन्हें पहले ही दिन समझाया होता, इस उम्र में वह क्या बदलेंगी…और मैं नहीं चाहता वह टूट जाएं.’’

विजय के शब्दों पर मेरा मन भीगभीग गया.

‘‘हम ताईजी से पहले मिल तो लें. यह हार भी मैं उन से ही लूंगी,’’ मुन्नी ने सुझाव दिया.

‘‘एक रास्ता है, पापा,’’ पल्लवी ने धीरे से कहा, ‘‘यह हार यहीं रहेगा. अगर मम्मीजी यहां आ गईं तो मैं चुपके से यह हार ला कर आप को थमा दूंगी और आप दोनों मिल कर दीदी को पहना देना. अगर मम्मीजी न आईं तो यह हार तो दीदी के पास है ही.’’

इस तरह सबकुछ तय हो गया. हम अलगअलग घर वापस चले आए. दीपक अपने आफिस चला गया.

मीना ने जैसे ही पल्लवी को देखा सहसा उबल पड़ी,  ‘‘सुबहसुबह ही कौन सी जरूरी खरीदारी करनी थी जो सारा काम छोड़ कर घर से निकल गई थी. पता है न दीपक ने कहा था कि उस की नीली कमीज धो देना.’’

‘‘दीपक उस का पति है. तुम से ज्यादा उसे अपने पति की चिंता है. क्या तुम्हें मेरी चिंता नहीं?’’

‘‘आप चुप रहिए,’’ मीना ने लगभग डांटते हुए कहा.

‘‘अपना दायरा समेटो, मीना, बस तुम ही तुम होना चाहती हो सब के जीवन में. मेरी मां का जीवन भी तुम ने समेट लिया था और अब बहू का भी तुम ही जिओगी…कितनी स्वार्थी हो तुम.’’

‘‘आजकल आप बहुत बोलने लगे हैं…प्रतिउत्तर में मैं कुछ बोलता उस से पहले ही पल्लवी ने इशारे से मुझे रोक दिया. संभवत: विजय के आने से पहले वह सब शांत रखना चाहती थी.

निशा और विजय ने अचानक आ कर मीना के पैर छुए तब सांस रुक गई मेरी. पल्लवी दरवाजे की ओट से देखने लगी.

‘‘भाभी, आप की मुन्नी की शादी है,’’ विजय विनम्र स्वर में बोला, ‘‘कृपया, आप सपरिवार आ कर उसे आशीर्वाद दें. पल्लवी हमारे घर की बहू है, उसे भी साथ ले कर आइए.’’

‘‘आज सुध आई भाभी की, सारे शहर में न्योता बांट दिया और हमारी याद अब आई…’’

मैं ने मीना की बात को बीच में काटते हुए कहा, ‘‘तुम से डरता जो है विजय, इसीलिए हिम्मत नहीं पड़ी होगी… आओ विजय, कैसी हो निशा?’’

विजय के हाथ से मैँ ने मिठाई का डब्बा और कार्ड ले लिया. पल्लवी को पुकारा. वह भी भागी चली आई और दोनों को प्रणाम किया.

‘‘जीती रहो, बेटी,’’ निशा ने पल्लवी का माथा चूमा और अपने गले से माला उतार कर पल्लवी को पहना दी.

मीना ने मना किया तो निशा ने यह कहते हुए टोक दिया कि पहली बार देखा है इसे दीदी, क्या अपनी बहू को खाली हाथ देखूंगी.

मूक रह गई मीना. दीपक भी योजना के अनुसार कुछ फल और मिठाई ले कर घर चला आया, बहाना बना दिया कि किसी मित्र ने मंगाई है और वह उस के घर उत्सव पर जाने के लिए कपड़े बदलने आया है.

‘‘अब मित्र का उत्सव रहने दो बेटा,’’ विजय बोला, ‘‘चलो चाचा के घर और बहन की डोली सजाओ.’’

दीपक चाचा से लिपट फूटफूट कर रो पड़ा. एक बहन की कमी सदा खलती थी दीपक को. मुन्नी के प्रति सहज स्नेह बरसों से उस ने भी दबा रखा था. दीपक का माथा चूम लिया निशा ने.

क्याक्या दबा रखा था सब ने अपने अंदर. ढेर सारा स्नेह, ढेर सारा प्यार, मात्र मीना की जिद का फल था जिसे सब ने इतने साल भोगा था.

‘‘बहन की शादी के काम में हाथ बंटाएगा न दीपक?’’

निशा के प्रश्न पर फट पड़ी मीना, ‘‘आज जरूरत पड़ी तो मेरा बेटा और मेरा पति याद आ गए तुझे…कोई नहीं आएगा तेरे घर पर.’’

अवाक् रह गए सब. पल्लवी और दीपक आंखें फाड़फाड़ कर मेरा मुंह देखने लगे. विजय और निशा भी पत्थर से जड़ हो गए.

‘‘तुम्हारा पति और तुम्हारा बेटा क्या तुम्हारे ही सबकुछ हैं किसी और के कुछ नहीं लगते. और तुम क्या सोचती हो हम नहीं जाएंगे तो विजय का काम रुक जाएगा? भुलावे में मत रहो, मीना, जो हो गया उसे हम ने सह लिया. बस, हमारी सहनशीलता इतनी ही थी. मेरा भाई चल कर मेरे घर आया है इसलिए तुम्हें उस का सम्मान करना होगा. अगर नहीं तो अपने भाई के घर चली जाओ जिन की तुम धौंस सारी उम्र्र मुझ पर जमाती रही हो.’’

‘‘भैया, आप भाभी को ऐसा मत कहें.’’

विजय ने मुझे टोका तब न जाने कैसे मेरे भीतर का सारा लावा निकल पड़ा.

‘‘क्या मैं पेड़ पर उगा था और मीना ने मुझे तोड़ लिया था जो मेरामेरा करती रही सारी उम्र. कोई भी इनसान सिर्फ किसी एक का ही कैसे हो सकता है. क्या पल्लवी ने कभी कहा कि दीपक सिर्फ उस का है, तुम्हारा कुछ नहीं लगता? यह निशा कैसे विजय का हाथ पकड़ कर हमें बुलाने चली आई? क्या इस ने सोचा, विजय सिर्फ इस का पति है, मेरा भाई नहीं लगता.’’

मीना ने क्रोध में मुंह खोला मगर मैं ने टोक दिया, ‘‘बस, मीना, मेरे भाई और मेरी भाभी का अपमान मेरे घर पर मत करना, समझीं. मेरी भतीजी की शादी है और मेरा बेटा, मेरी बहू उस में अवश्य शामिल होंगे, सुना तुम ने. तुम राजीखुशी चलोगी तो हम सभी को खुशी होगी, अगर नहीं तो तुम्हारी इच्छा…तुम रहना अकेली, समझीं न.’’

चीखचीख कर रोने लगी मीना. सभी अवाक् थे. यह उस का सदा का नाटक था. मैं ने उसे सुनाने के लिए जोर से कहा, ‘‘विजय, तुम खुशीखुशी जाओ और शादी के काम करो. दीपक 3 दिन की छुट्टी ले लेगा. हम तुम्हारे साथ हैं. यहां की चिंता मत करना.’’

‘‘लेकिन भाभी?’’

‘‘भाभी नहीं होगी तो क्या हमें भी नहीं आने दोगे?’’

चुप था विजय. निशा के साथ चुपचाप लौट गया. शाम तक पल्लवी भी वहां चली गई. मैं भी 3-4 चक्कर लगा आया. शादी का दिन भी आ गया और दूल्हादुलहन आशीर्वाद पाने के लिए अपनीअपनी कुरसी पर भी सज गए.

मीना अपने कोपभवन से बाहर नहीं आई. पल्लवी, दीपक और मैं विदाई तक उस का रास्ता देखते रहे. आधीअधूरी ही सही मुझे बेटी के ब्याह की खुशी तो मिली. विजय बेटी की विदाई के बाद बेहाल सा हो गया. इकलौती संतान की विदाई के बाद उभरा खालीपन आंखों से टपकने लगा. तब दीपक ने यह कह कर उबार लिया, ‘‘चाचा, आंसू पोंछ लें. मुन्नी को तो जाना ही था अपने घर… हम हैं न आप के पास, यह पल्लवी है न.’’

मैं विजय की चौखट पर बैठा सोचता रहा कि मुझ से तो दीपक ही अच्छा है जिसे अपने को अपना बनाना आता है. कितने अधिकार से उस ने चाचा से कह दिया था, ‘हम हैं न आप के पास.’ और बरसों से जमी बर्फ पिघल गई थी. बस, एक ही शिला थी जिस तक अभी स्नेह की ऊष्मा नहीं पहुंच पाई थी. आधीअधूरी ही सही, एक आस है मन में.

सैक्सुअली कितनी तैयार हैं आप

शादी के लिए तो युवतियां सहज तैयार हो जाती हैं, लेकिन सैक्स के लिए खुद को तैयार करने में उन्हें खासी मशक्कत करना पड़ती है. ऐसा इसलिए कि उन्हें सैक्स की बहुत ज्यादा वैज्ञानिक और तकनीकी जानकारी नहीं होती. यह बात और है कि युवतियां शिक्षित और आधुनिक होने के नाते यह मान बैठती हैं कि वे सैक्स के बारे में बहुत कुछ जानती हैं और इस का आधार सैक्स ऐजुकेशन के वीडियो, इंटरनैट की चुनिंदा साइट और एक हद तक पोर्न फिल्में होती हैं.

सैक्स की जानकारी के ये सोर्स फौरी तौर पर उत्तेजना तो देते हैं पर कोई शिक्षा नहीं देते और न ही सैक्स के लिए बेफिक्री की हद की गारंटी होते. सैक्स को पूरी तरह सम?ाने का दावा अकसर भ्रम ही साबित होता है जिस की तुलना ऐग्रीकल्चर से की जा सकती है जो साइंस भी है और आर्ट भी. खेत को कितनी गहराई तक जोतना है, सिंचाई कब और कितनी करनी है, खाद कितनी देनी है, कटाई कब करनी है जैसी बातें कहेसुने की बीना पर हर किसी को किसान नहीं बना देतीं. ठीक इसी तरह पेपर वर्क में सैक्स साइंस होता है लेकिन करते वक्त आर्ट हो जाता है.

जिंदगी के आनंद में खलल

जिंदगी पहले के मुकाबले अब और ज्यादा कठिन होती जा रही है खासतौर से सैक्स के मामले में जटिलताएं अकसर मुंह बाए खड़ी रहती हैं चूंकि यह नितांत व्यक्तिगत मसला होता है इसलिए बात या परेशानी उजागर नहीं होती लेकिन इस का यह मतलब नहीं कि वह हल हो गई. युवतियों को सैक्स संबंधी जानकारी जिन स्रोतों से मिल रही है वह वैज्ञानिक नहीं है इसलिए युवतियां सैक्सुअली जरूरत के मुताबिक तैयार नहीं हो पातीं जिस से दांपत्य के आनंद में खलल पड़ता है.

किसी युवती से यह पूछा जाए कि क्या वह सैक्सुला तैयार है तो शायद ही वह ईमानदारी से इस का जवाव हां में दे पाए. इस की बड़ी वजह सैक्स की बुनियादी जानकारी का न होना है और अधिकतर युवतियां इसे शादी के बाद का विषय मानते हुए कहेंगी कि देखेंगे वह तो अपनेआप हो जाता है.

अपनेआप के नुकसान

अपनेआप तो खेती भी होती है लेकिन वह जंगल और खरपतवार टाइप होती है जिस से किसी को फायदा नहीं होता. यही बात अपनेआप होने वाले सैक्स की मानसिकता को ले कर है कि इस की सारी जिम्मेदारी पुरुष की है. बिलाशक सैक्स अपनेआप हो सकता है लेकिन इस से मैरिड लाइफ का एक बड़ा सुख खुशी या उपलब्धि छिनती है. हमारे समाज में कभी भी किसी स्तर पर लड़कियों को सैक्सुअली तैयार या मैच्योर होने देने का माहौल कभी नहीं बनने दिया गया. उलटे उन्हें डराने और रोकने छत्तीसों लोग खड़े रहते हैं.

अब इस के दुष्परिणाम सामने आने लगे हैं. नई पीढ़ी स्मार्ट है, ऊर्जावान है, कमाऊ है और महत्त्वाकांक्षी भी है. वह जिंदगी को जितना हो जिंदादिली से जी लेने में यकीन करती है. यह सब रहने, पहनने और खानपान के मामलों में तो बिंदास लागू होता है क्योंकि ये चीजें पैसे से खरीदीं लेकिन सैक्स के मामले में नहीं. निश्चित रूप से यह वर्जनाओं की वजह से है.

शादी की तैयारियों में किसी भी लड़की का सारा उत्साह फोटोग्राफी, ज्वैलरी, कपड़ों और दूसरी शौपिंग में देखते बनता है लेकिन सैक्स को ले कर उस की क्या तैयारियां हैं यह बात बहुत छोटे में सिमट कर रह जाती है. इस बात को बहुत गंभीरता से लेने की जरूरत हर युवती को है कि वह शादीशुदा जिंदगी के मद्देनजर सैक्स की अहमियत को शिद्दत से सम?ो और इस मानसिकता से बाहर आए कि सहवास ही सैक्स होता है.

बदल रही सोच

ऐसा गलत नहीं कहा जाता कि शादी के बाद शुरुआती दिनों का सैक्स अच्छी और सुखी जिंदगी की नींव रखता है. पहले युवतियां सोचती थीं कि अगर वे पति से सैक्स पर खुल कर बात करेंगी तो वह उसे अन्यथा लेगा और चरित्र पर भी शक करेगा. क्या आज भी ऐसा है इस बारे में लोगों की राय अलगअलग हो सकती है पर शादी के पहले मौडर्न युवा सैक्स पर चर्चा करने से कतराते नहीं. लेकिन एक बड़ा फर्क है.

भोपाल के एक बैंककर्मी सारांश का कहना है कि लड़कालड़की शादी के पहले एकदूसरे को सम?ाने के लिए मिलते हैं तो तमाम मुद्दों पर चर्चा करते हैं मसलन फाइनैंशियल, पारिवारिक, कैरियर और सामाजिक. वे धीरेधीरे रोमांटिक भी होते जाते हैं लेकिन सैक्स पर खुल कर बात नहीं कर पाते. मु?ो लगता है कि फ्लैट कब लेंगे, कार कब खरीदेंगे जैसी प्लानिंग के साथसाथ सैक्स प्लानिंग भी जरूरी है. सारांश बताते हैं कि लड़के भी इस चर्चा में ?ि?ाकते हैं.

उन्हें लगता है कि सैक्स की बात करने पर होने वाली पत्नी की राय और इमेज उन के बारे में अच्छी स्थापित नहीं होगी. वह उन्हें लंपट सम?ा सकती है.

बकौल सारांश आप यह न सम?ों कि लड़के सैक्स के बारे में बहुत कुछ जानते हैं. हां वे बहुत कुछ जानने का दिखावा जरूर करते हैं लेकिन यदि पत्नी मैच्योर और सम?ादार हो तो बहुत सी उल?ानें और परेशानियां पैदा होने के पहले ही खत्म हो जाती हैं और रिश्ते की शुरुआत बेहद खुशनुमा होती है. ऐसे में युवती का रोल और ज्यादा अहम हो जाता है बशर्ते वह खुद को सैक्स के लिए तन और मन दोनों से तैयार कर ले.

इस के लिए जरूरी है-

आप को सैक्स के बारे में अधिकतम जानकारी हो और उस के सोर्स शैक्षणिक होने चाहिए. तभी आप खुद को सैक्सुअली फिट मान सकती हैं. इसे कुछ उदाहरणों से सम?ा जा सकता है. मसलन, पहली बार सैक्स के बाद ब्लीडिंग हो यह जरूरी नहीं लेकिन हां दर्द जरूर होता है. मगर यह कोई डरावनी या घबराने वाली बात नहीं है. यह बहुत कुदरती बात है और कुछ दिनों तक ही ऐसा होता है.

सैक्स के पहले फोर प्ले ज्यादा माने रखता है. यह असल में कला है इस के लिए खुद को तैयार रखें और पार्टनर को उत्साहित करती रहें. सिर्फ सहवास ही मकसद नहीं होना चाहिए. बेहतर तो यह भी होता है कि अच्छी सैक्स लाइफ और ऐंजौयमैंट के लिए शुरूआती दिनों में ज्यादातर ध्यान और कोशिश फोर प्ले की हो.

पुरुष जल्दी उत्तेजित होते हैं और कुछ ही देर में स्खलित होने की कोशिश करने लगते हैं. ऐसे में सब्र से पार्टनर को संभालें और सैक्स को लंबा से लंबा खींचने की कोशिश करें. अगर वह जल्दी डिस्चार्ज होने लगे तो अपनी तरफ से कुछ जाहिर न होने दें. इस से उस की परफौर्मैंस पर असर पड़ता है. इस से बचने के लिए बीच में ब्रैक ले सकती हैं.

मुमकिन है आप अपने ही प्राइवेट पार्ट्स की बनाबट के बारे में ज्यादा नहीं जानती हों लेकिन यह आप को मालूम होना चाहिए कि पेनिट्रेशन कहां से और कैसे होना चाहिए. न केवल

बनाबट बल्कि दूसरी सैक्स ऐक्टिविटीज के बारे में भी आप को शादी के पहले जानकारी इकट्ठा कर लेनी चाहिए जैसाकि पीरियड के कितने दिन बाद गर्भ ठहरने की संभावना ज्यादा रहती है और सहवास के बाद वैजाइना में गीलापन कोई बीमारी नहीं होती.

यह बहुत स्वाभाविक बात है जिसे कुछ दिनों के अनुभव के बाद आप सम?ाने लगेंगी. हालांकि युवती खुद को कितना ही बोल्ड और ऐडवांस सम?ो शुरूशुरू में पेनिस को छूना तो दूर की बात है ज्यादा देर तक देखने में भी हिचकती है. और्गेज्म बहुत अहम होता है और यही असल सैक्स सुख होता है लेकिन शुरू के दिनों में इस तक पहुंचना या इसे महसूसना थोड़ा कठिन होता है. ऐसा दोनों के जोश के चलते भी हो सकता है इसलिए इसे सब्र से पाने की कोशिश करें.

सैक्स के शुरुआती दिनों में सैक्स के बाद यूरिन इन्फैक्शन भी बहुत आम बात है जो थोड़ी सी दवाइयों से ठीक हो जाता है. इस से घबराना नहीं चाहिए. ऐसी कई बातें और हैं जो आप को सैक्स के लिए बिना किसी डर के तैयार करती हैं. सैक्स को ले कर मन में कोई वहम या डर मजा खराब कर सकता है. इसलिए सैक्स हमेशा बिना किसी ?ि?ाक के करें और इस पर पति से बातचीत करती रहें.

शादी का झांसा देकर ठगी

31 मई, 2017 की दोपहर को जब सर्किल इंसपेक्टर श्रीचंद सिंह एसपी अंशुमान भोमिया से मिलने पहुंचे तो उन के मन में उथलपुथल मची हुई थी. इस की वजह भी वाजिब थी, क्योंकि एसपी साहब आमतौर पर लंच ब्रेक के समय अपने मातहतों को तलब नहीं करते थे. जबकि उन्होंने श्रीचंद सिंह को तत्काल बुलाया था. बहरहाल, इंसपेक्टर श्रीचंद सिंह सैल्यूट कर के एसपी साहब के सामने जा खड़े हुए.

‘‘तुम्हारे लिए एक खबर है, जो मध्य प्रदेश पुलिस से मिली है.’’ अंशुमान भोमिया ने इंसपेक्टर श्रीचंद सिंह की ओर देखते हुए कहा, ‘‘उज्जैन और इंदौर में एक गिरोह सक्रिय है, जो शादी कराने के नाम पर लूटखसोट करता है. इस गिरेह ने कोटा में भी पांव पसार लिए हैं.’’

‘‘कोई लीड मिली है सर?’’ श्रीचंद सिंह ने पूछा तो श्री भोमिया ने कहा, ‘‘लीड नहीं, पूरी खबर है. रिद्धिसिद्धिनगर में रहने वाले कारोबारी बसंतीलाल जैन इस गिरोह के हाथों ठगे गए हैं. उन के साथ जबरदस्त धोखा हुआ है, जिस से पूरा परिवार सदमे में है. उन का पैसा भी गया और समाज में खासी बदनामी भी हुई. वे लोग कल तुम से मिलेंगे. इस मामले की जांच मैं तुम्हें सौंपता हूं. अपनी एक विश्वस्त टीम तैयार करो और लग जाओ काम पर.’’

‘‘ठीक है सर, मैं संभाल लूंगा.’’ कह कर श्रीचंद सिंह ने सैल्यूट किया और एसपी साहब के औफिस से बाहर आ गए.

अगले दिन यानी 1 जून को बसंतीलाल जैन अपने बेटों सुशील जैन और मनोज जैन के साथ थाना कुन्हाड़ी आ कर थानाप्रभारी इंसपेक्टर श्रीचंद सिंह से मिले. इस से पहले कि बसंतीलाल अपना परिचय देते, पहचान लेने के अंदाज में उन्होंने उन्हें बैठने को कहा तो बसंतीलाल ने उन्हें कृतज्ञता की दृष्टि से देखा. बैठते ही उन्होंने श्रीचंद सिंह को अपने बेटों का परिचय दिया. उस के बाद मनोज के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, ‘‘सर, यह मेरा छोटा बेटा मनोज है. इसी की शादी में हम धोखे का शिकार हुए हैं.’’

श्रीचंद सिंह ने हमदर्दी जताते हुए कहा, ‘‘आप की पीड़ा मैं समझ रहा हूं. आप सिलसिलेवार सब कुछ बताइए कि आप के साथ कैसे और क्या हुआ? आप इत्मीनान रखिए, हम बदमाशों को पकड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे.’’

बसंतीलाल के चेहरे पर राहत के भाव आए और मुरझाए चेहरे पर क्षीण सी मुसकान तैर गई. बसंतीलाल ने एक पल के लिए बड़े बेटे सुशील की तरफ देखा. उस के चेहरे पर सहमति के भाव नजर आए तो उन्होंने आश्वस्त हो कर अपनी नादानी और शादी के बहाने धोखाधड़ी करने वालों के कमीनेपन की कहानी सुनानी शुरू कर दी.

‘‘बड़े खुराफाती लोगों से वास्ता पड़ा आप का तो…’’ करीब एक घंटे तक बसंतीलाल जैन की आपबीती सुनने के बाद इंसपेक्टर श्रीचंद सिंह ने हैरानी जताते हुए कहा, ‘‘वारदात का पता आप को अप्रैल में चला और आप पुलिस के पास अब पहुंच रहे हैं 2 महीने बाद?’’

‘‘अब क्या कहूं सर? अपनी जिल्लत और अंधविश्वास की गाथा किसी को सुनाने का हौसला नहीं कर पा रहा था.’’ बसंतीलाल ने कहा, ‘‘बदमाशों का असली चेहरा तो अप्रैल में फेसबुक देखने से ही उजागर हुआ. उसी से उन की करतूतों का पता चला. शादी में 5 लाख रुपए नकद और 15 लाख के जेवर हड़पने के बाद अब 30 लाख और वसूलने की फिराक में हैं. हमें धमका रहे हैं कि रुपए नहीं मिले तो घरेलू हिंसा और दहेज उत्पीड़न के मामले में फंसा देंगे. इस के बाद तो पुलिस का ही सहारा बचा.’’

‘‘ठीक है.’’ श्रीचंद सिंह ने गहरी सांस लेते हुए कहा, ‘‘आप सबइंसपेक्टर के पास जा कर एफआईआर दर्ज करवा दीजिए, उस के बाद देखते हैं.’’

कोटा के कुन्हाड़ी स्थित रिद्धिसिद्धि नगर की चंचल विहार कालोनी के रहने वाले पत्थर कारोबारी बसंतीलाल जैन के परिवार में उन की पत्नी के अलावा 2 बेटे सुशील और मनोज थे. दोनों ही बेटे पिता के पारिवारिक कारोबार  में हाथ बंटा रहे थे. बडे़ बेटे सुशील का विवाह हो चुका था. अब उन्हें छोटे बेटे मनोज की शादी की चिंता थी.

वैवाहिक रिश्तों को ले कर बसंतीलाल की भी एक ही सोच थी कि परिवार मानसम्मान वाला हो और लड़की संस्कारी. मनोज की उम्र 32 साल हो चुकी थी. अभी तक ठीकठाक रिश्ता न मिलने से बसंतीलाल काफी चिंतित थे. अच्छे रिश्ते के लिए उन्होंने अपने सभी परिचितों को कह भी रखा था. इसी साल जनवरी की शुरुआत में उन के जयपुर के एक परिचित अशोक जैन ने बसंतीलाल और उन के बेटों के बारे में उज्जैन निवासी पूनमचंद जैन को जानकारी देते हुए कहा कि काफी अच्छे लोग हैं. ऐसे परिवारों का साथ संयोग से ही मिलता है. उन्होंने उन्हें उन के बारे में बता दिया है, जल्दी ही वे लोग उन से संपर्क करेंगे.

पूनमचंद जैन और बसंतीलाल की मुलाकात इंदौर में रहने वाले संजय जैन के माध्यम से हुई थी. संजय जैन का पता अशोक जैन ने यह कहते हुए दिया था कि रिश्ते की बात वह संजय जैन के माध्यम चलाएं तो ज्यादा बेहतर रहेगा. संजय जैन पूनमचंद जैन को ले कर कोटा पहुंचे. बातचीत में अपने परिवार का ब्यौरा देते हुए पूनमचंद ने बताया कि 4 भाईबहनों में नेहा सब से बड़ी है. 2 भाई हैं पारस और महावीर तथा एक छोटी बहन है नीहारिका.’’

मनोज से नेहा के रिश्ते की बात चलाते हुए जहां पूनमचंद ने उस के रूपगुणों का भरपूर बखान किया, वहीं बसंतीलाल ने भी अपने बेटे मनोज को समझदार और सुशील स्वभाव का बताया.

पूनमचंद ने बातचीत में नेहा को देखने का भी प्रस्ताव रखा, पर बसंतीलाल फोटो देख कर ही आश्वस्त हो गए. पूनमचंद ने बातचीत में जिस तरह से जैन समाज के नियम, कर्म और समाज के विशिष्ट शख्सियतों की चर्चा की, उस से बसंतीलाल काफी प्रभावित हुए. दोनों परिवार एकमत थे, इसलिए शुभ काम में देरी का कोई मतलब नहीं था.

फलस्वरूप नेहा और मनोज की सगाई 15 जनवरी, 2017 को कर दी गई. सगाई समारोह का आयोजन कुन्हाड़ी स्थित होटल कान्हा पैलेस में किया गया. बसंतीलाल मूलरूप से खानपुर के चांदखेड़ी कस्बे के रहने वाले थे. इसलिए शादी पूरी धूमधाम के साथ बसंतीलाल के पैतृक गांव चांदखेड़ी से हुई.

शादी में कन्या पक्ष के काफी रिश्तेदर आए थे. शादी का पूरा खर्च बसंतीलाल के परिवार ने ही वहन किया, यहां तक कि उन के रहने और आवाजाही के लिए गाडि़यां भी वर पक्ष ने ही उपलब्ध कराई थीं. मनोज और नेहा के परिणय सूत्र में बंध जाने के बाद नेहा दुलहन बन कर चंचल विहार, कोटा स्थित अपनी ससुराल आ गई.

मनोज थोड़ा संकोची स्वभाव का था, जबकि नेहा दबंग किस्म की मौडर्न लड़की थी. अभी बसंतीलाल के घर वाले हंसीठिठोली के साथ मनोज को शादी की बधाइयां ही दे रहे थे कि सजीसंवरी दुलहन ने यह कह कर मनोज के होश उड़ा दिए कि उस ने व्रत ले रखा है, इसलिए जब तक वह पूरा नहीं हो जाता, तब तक वह न तो सुहाग कक्ष में आ सकता है और न उसे छू सकता है.

उस ने यह भी कहा कि यह व्रत एक विशिष्ट पूजा के साथ उज्जैन लौटने पर ही टूटेगा. शुरू में लोगों ने दुलहन के इस हठ को यह सोच कर हल्के में लिया कि वह समझानेबुझाने से मान जाएगी. लेकिन नेहा को न मानना था और न मानी. मनोज नहीं चाहता था कि शादी की शुरुआत में ही मतभेद बढ़ें और बात घर के बाहर जाए.

नतीजतन मनोज को उस की मनमानी के आगे झुकना पड़ा. बाद में नेहा उज्जैन गई तो एक महीने तक न तो उस ने अपनी कोई खैरखबर दी और न ही लौटने की मंशा जताई. मनोज की काफी मानमनुहार के आगे झुक कर वह कोटा आई भी तो केवल 2 दिनों के लिए. वह यह कह कर वापस चली गई कि उस के भाई की शादी है. इन 2 दिनों में भी नेहा ने मनोज को अपने पास नहीं फटकने दिया था.

मनोज तो नेहा की मनमानी से दुखी था ही, बसंतीलाल को भी उस का व्यवहार अटपटा लग रहा था. उन्होंने मनोज से पूछा भी कि यह कैसा समधियाना है कि बहू के भाई की शादी है और हमें खबर तक नहीं. उत्सुकतावश उन्होंने नेहा के पिता पूनमचंद से बात करने के लिए फोन किया तो उन का फोन स्विच्ड औफ मिला.

नेहा के व्यवहार से असमंजस में डूबा जैन परिवार अब क्या किया जाए, इसी उधेड़बुन में था कि तभी अचानक नेहा लौट आई तो सब ने राहत की सांस ली. लेकिन यह खुशी भी 2 दिनों से ज्यादा नहीं टिकी. उस ने यह कहते हुए सीकर जाने की रट लगा दी कि उसे वहां बहन की शादी में जाना है.

इस अजबगजब की स्थिति में उलझे बसंतीलाल के सब्र का पैमाना छलक गया. आखिर उन्होने नेहा से पूछा, ‘‘बहू, यह कैसी रिश्तेदारी है कि तुम्हारे भाई की शादी हुई, हमें बुलाना तो दूर औपचारिक खबर तक नहीं दी गई? अब तुम कह रही हो कि तुम्हारी बहन की शादी है? लेकिन तुम्हारे पिता की तरफ से हमें कोई खबर नहीं दी गई हैं. उन का फोन भी औफ आ रहा है.’’

इस सवाल का जवाब नेहा ने 2 टूक लहजे में दिया, ‘‘इतने बड़े व्यापारी हैं पापा, नहीं होगा उन के पास बात करने का समय. क्या शादी के वक्त ऐसा कोई वादा किया गया था कि पापा हर खबर आप को देंगे? मुझे सीकर जाना है तो बस जाना है.’’

बहू के इस जवाब से बुरी तरह आहत और अपमानित बसंतीलाल सिर थाम कर बैठ गए. बड़ा बेटा सुशील भी हतप्रभ रह गया. लेकिन मनोज बुरी तरह सुलग उठा. पर नेहा की गुस्से से भरी आंखों को देख वह भी विवश हो कर रह गया. नेहा सीकर जाने की जिद पूरी कर के ही मानी. उस के जाने के बाद हतप्रभ बेटे को बसंतीलाल ने यह कह कर दिलासा दी कि इस उम्र में लड़कियों का मातापिता से ज्यादा लगाव होता है. इसलिए इस बात को दिल से न लगाए, आहिस्ताआहिस्ता सब ठीक हो जाएगा.

जैसी उम्मीद थी कि धीरेधीरे सब ठीक हो जाएगा, लेकिन वैसा नहीं हुआ. अलबत्ता बसंतीलाल की उलझनें और बढ़ गईं. दरअसल, महीना भर बीतने के बाद भी जब नेहा नहीं लौटी और न ही उस ने कोई खबर दी तो आशंकित परिवार  ने उज्जैन जाना ठीक समझा. पर उज्जैन पहुंच कर उन्हें आघात तब लगा, जब पूनमचंद परिवार सहित अपने बताए पते पर नहीं मिला.

आशंकाओं में डूबतेउतराते बसंतीलाल ने जब फोन पर उन से संपर्क किया तो उन का कहना था कि वे फिलहाल अपने रिश्तेदारों के यहां आए हुए हैं. नेहा भी उन्हीं के साथ है. पूनमचंद ने उन्हें आश्वस्त करते हुए कहा कि वह नेहा को ले कर जल्दी ही पहुंचेंगे.

हैरान परेशान बसंतीलाल के परिवार ने राहत की सांस ली. कुछ ही दिनों बाद नेहा कोटा पहुंच गई. लेकिन बसंतीलाल परिवार की खुशी ज्यादा दिनों तक कायम नहीं रही सकी. एक पखवाड़े बाद ही नेहा ने यह कहते हुए उज्जैन जाने की रट लगा दी कि वह यहां के माहौल में ऊब गई है और कुछ दिनों के लिए चेंज चाहती है.

बसंतीलाल अच्छे कारोबारी थे तो दुनियादार भी थे. अंदेशों से घिरे बसंतीलाल ने नेहा की जिद पर यह सोच कर घुटने टेक दिए कि मनमानी पर उतारू लड़की ने कोई उलझन खड़ी कर दी तो बेमतलब की परेशानी खड़ी हो जाएगी. लेकिन पिछले 3 महीनों में नेहा की हरकतों ने उन के मन मे अंदेशों के हजार फन खड़े कर दिए थे. अपने बेटे सुशील और परिवार के शुभचिंतकों से अपनी शंका साझा करते हुए उन्होंने मशविरा मांगा कि अब उन्हें क्या करना चाहिए?

उन का शंकित होना स्वाभाविक था. सामने सवाल ही सवाल थे. टूट कर चाहने वाला शील स्वभाव पति, छोटी बहू होने के नाते परिवार का भरापूरा लाड़प्यार और मानसम्मान. इस के बावजूद नेहा ससुराल से बारबार क्यों भाग रही है? क्यों वह अपने पति को पास फटकने नहीं दे रही है? समधियाने में शादीब्याह हो रहे हैं, लेकिन उन्हें बुलाना तो दरकिनार, कोई खबर तक नहीं दी जा रही है.

रिश्ते की बात के समय स्नेह भाव उडे़लने वाले पूनमचंद जैन से सीधे मुंह बात तक करना मुश्किल हो रहा था. रिश्ते का जरिया बने अशोक जैन और संजय जैन भी बातचीत से कन्नी काट रहे थे. अशोक जैन का यह कहना उन्हें बुरी तरह आहत कर गया कि ‘भाई साहब, रिश्ता बताना मेरा काम था, ऊंचनीच और भलाबुरा आप को देखना चाहिए था. इस में मैं क्या कर सकता हूं?’

जिस समय बसंतीलाल का परिवार ऊहापोह में डूबा हुआ था, उसी समय एक विस्फोटक घटना ने उन की रहीसही उम्मीद छीन ली. बसंतीलाल जिस बहू के आने की उम्मीद गंवा चुके थे, वह एकाएक लौटी तो जरूर, लेकिन उस के चेहरे पर स्त्री सुलभ मुसकान के बजाय आक्रामक तेवर थे. अपने पिता पूनमचंद के साथ कोटा पहुंची नेहा ने जो कहा, उस ने पहले से ही हताश बंसतीलाल परिवार पर वज्रपात का काम किया.

नेहा ने गुस्से में कहा, ‘‘अब तुम सीधेसीधे 50 लाख रुपए देने की तैयारी कर लो, वरना घरेलू हिंसा और दहेज प्रताड़ना में फंसा कर तुम सभी को जेल की सलाखों के पीछे पहुंचा दूंगी.’’

यह सुन कर मनोज तो वहीं गश खा कर गिर पड़ा. नेहा और पूनमचंद जिस अफरातफरी के साथ आए थे, वैसे ही वापस लौट गए.

बदहवास और बेहाल करने वाली इन घटनाओं के बीच सदमे में डूबे जैन परिवार के लिए उम्मीदों का सूरज भी उगा. यह इत्तफाक ही था कि 25 मई को बसंतीलाल के बड़े बेटे सुशील की पत्नी शालिनी (परिवर्तित नाम) जब नेहा के कमरे की सफाई कर रही थी तो उसे बैड के नीचे एक मोबाइल फोन पड़ा मिला. वह मोबाइल फोन नेहा का था. उस ने मोबाइल अपने पति सुशील को दे दिया. उत्सुकतावश सुशील ने उस की काल डिटेल्स खंगाली तो उस में एक ऐसा नंबर पकड़ में आया, जिस पर रोजाना सब से ज्यादा फोन किए गए थे. सुशील ने जब यह बात अपने पिता बसंतीलाल और भाई मनोज को बताईं तो उन्होंने जिज्ञासावश मैमोरी कार्ड को खंगालना शुरू किया.

फिर तो हकीकत जान कर उन की आंखें फटी रह गईं. मैमोरी कार्ड से पता चला कि नेहा का असली नाम माया उर्फ सोना ठाकुर था और किसी संजय से उस के अनैतिक संबंध थे. यह बात पता चलने के बाद जैन परिवार ने उस के नाम की फेसबुक खोजनी शुरू कर दी.

उन की मेहनत रंग लाई और नेहा उर्फ सोना ठाकुर की फेसबुक मिल गई. फेसबुक पर उस के अलगअलग लोगों के साथ उत्तेजक भावभंगिमाओं और अश्लील मुद्राओं वाले फोटोग्राफ्स थे. इस से यह पुष्टि हो गई कि नेहा उर्फ माया उर्फ सोना ठाकुर कालगर्ल थी और उस का पूरा गिरोह देहव्यापार में डूबा था. संजय जैन इस गिरोह का सरगना था. इस जानकारी के बाद ही बसंतीलाल एसपी अंशुमान भोमिया से मिले थे.

जांच आगे बढ़ाने और किसी भी ठोस नतीजे पर पहुंचने के लिए नेहा उर्फ माया उर्फ सोना ठाकुर के कोटा और उस के आसपास के संबंधों की जानकारी जरूरी थी. यह सूचना बसंतीलाल के परिवार अथवा उन के परिचितों से ही मिल सकती थी. श्रीचंद सिंह की इस थ्यौरी की ठोस वजह थी कि जो गिरोह देहव्यापार से जुड़ा है और शादी कर के लोगों को फंसाने का काम भी करता है, उस का कहीं न कहीं स्थानीय संपर्क जरूर होगा.

श्रीचंद सिंह के जेहन में एक ऐसी ही घटना और भी थी, जो नजदीकी कस्बे रामगंजमंडी में घटी थी. इस घटना में लुटेरी दुलहन ने पति की हत्या कर के उस की लाश को जमीन में गाड़ दिया था. इस वारदात को अंजाम देने में भी मध्य प्रदेश के ही किसी गिरोह का हाथ था.

रामगंजमंडी की वारदात को जेहन में रखने की वजह यह थी कि बसंतीलाल जैन ने अपने बयान में इस बात का जिक्र किया था कि रिश्ते की बातचीत के दौरान पूनमचंद ने नेहा का जो आधार कार्ड दिखाया था, वह रामगंजमंडी से बनवाया गया था.

रामगंजमंडी में श्रीचंद सिंह और उन की टीम को इस से ज्यादा कोई जानकारी नहीं मिली कि नेहा का आधार कार्ड बनवाने के लिए फर्जी दस्तावेजों का इस्तेमाल किया गया था. कार्ड बनवाने वाले कौन थे, काफी कोशिश के बाद भी उन का कुछ पता नहीं चला. पुलिस टीम ने सूत्र हाथ लगने की उम्मीद में करीबी शहर बारां में भी खोजखबर ली. वहां भी कुछ  समय पहले ऐसी ही वारदात हुई थी.

इस घटना में कोतवाली पुलिस ने एक मैरिज ब्यूरो संचालक तथा 2 युवतियों समेत 4 लोगों को गिरफ्तार किया था. लेकिन इस से भी श्रीचंद सिंह को नेहा के स्थानीय संपर्क सूत्रों की कोई जानकारी नहीं मिली. 5 दिनों तक आसपास के इलाकों की जांच में पुलिस को इस से ज्यादा कुछ नहीं मिला.

अपनी अब तक की जांच का ब्यौरा श्रीचंद सिंह ने एसपी अंशुमान भोमिया को दिया. उन्होंने अपनी जांच की सभी जानकारियां भी उन से साझा कीं. उन्होंने मामले की गहन जांच के लिए मध्य प्रदेश के उज्जैन और इंदौर जाने के निर्देश दिए.

अगले दिन 6 जून को श्रीचंद सिंह अपनी टीम के साथ उज्जैन के लिए रवाना हो गए. इस बीच एसपी अंशुमान भोमिया ने इंदौर क्राइम ब्रांच के एएसपी अमरेंद्र सिंह को भी अपनी रणनीति से अवगत कराया.

उधर श्रीचंद सिंह अपनी टीम के साथ इंदौरउज्जैन के कस्बाई इलाकों में डेरा डाले हुए वहां की पुलिस की मदद से ऐसे गिरोहों की जानकारी जुटाने में लगे थे. 7 दिनों की अथक भागदौड़ के बाद आखिर नतीजा सामने आ गया. राजस्थान और मध्य प्रदेश का यह साझा औपरेशन कामयाब रहा.

8 जून को लुटेरी दुलहन नेहा उर्फ माया उर्फ सोना ठाकुर पुलिस की गिरफ्त में आ गई. इंदौर क्राइम ब्रांच के एएसपी अमरेंद्र सिंह के अनुसार, कोटा पुलिस से मिली सूचना के बाद नेहा को गिरफ्तार कर लिया गया. कोटा पुलिस के सीआई श्रीचंद सिंह ने इंदौर क्राइम ब्रांच के एएसपी को नेहा के उज्जैन स्थित लीला का बागीचा में छिपे होने की इत्तला दी थी.

नेहा के गिरफ्त में आते ही श्रीचंद सिंह ने एसपी भोमिया को टीम की कामयाबी की जानकारी दी. एमपी पुलिस ने आवश्यक काररवाई के बाद नेहा को कोटा पुलिस के हवाले कर दिया. उसी दिन नेहा को गिरफ्तार कर के श्रीचंद सिंह अपनी टीम के साथ कोटा आ गए.

कुन्हाड़ी थाना पुलिस ने नेहा को शनिवार 9 जून को न्यायालय में पेश कर रिमांड पर ले लिया. रिमांड के दौरान पुलिस पूछताछ में नेहा ने कई चौंकाने वाले रहस्य उजागर किए. उस ने स्वीकार किया कि 11 साल पहले उस की शादी इंदौर में गोमा की फैल निवासी मुकेश ठाकुर से हुई थी. उस की एक बेटी भी थी.

लेकिन पति से झगड़े के बाद वह अलग रहने लगी. संजय ने उसे दौलत कमाने के लिए फर्जी शादी का रास्ता बताया. वह उस के साथ इस धंधे से जुड़ गई. उस ने बताया कि संजय ने उसे जैन समाज की बेटी बता कर मनोज जैन के परिवार को उस का फोटो भेजा था.

फोटो पसंद करने और रिश्ता पक्का करने के लिए वह भी पूनमचंद जैन के साथ कोटा आया था. नेहा के नाम से आधार कार्ड भी उसी ने बनवाया था, ताकि राजस्थान का परिवार उस पर विश्वास कर सके.

फर्जी मातापिता रिश्तेदार और घराती भी संजय ने तैयार किए थे. उसी ने ही फर्जी शादी की पूरी प्लानिंग की थी, साथ ही उन लोगों ने एक माह तक मनोज और उस के घर वालों की रेकी की थी. नेहा उर्फ माया उर्फ सोना ठाकुर फिलहाल न्यायिक अभिरक्षा में है.

पुलिस की एक टीम अभी भी इंदौर में पड़ाव डाले हुए है, ताकि गिरोह के सरगना संजय और उन के साथियों को गिरफ्तार किया जा सके. पुलिस ने नेहा और उस के गिरोह के खिलाफ भादंवि की धारा 420, 406 के तहत मुकदमा दर्ज किया है.

बसंतीलाल जैन और उन के घर वालों का कहना है कि हमारे लाखों रुपए चले गए और मनोज का घर भी नहीं बस पाया. पूरा परिवार सदमे में है. लेकिन उन का एक ही मकसद है कि ऐसे लोग बेनकाब हों, ताकि समाज के दूसरे लोग सतर्क हो सकें.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

पारले बिस्किट को लेकर बिग बौस18 में जबरदस्‍त लड़ाई

Bigg Boss 18: बिग बौस 18 हर साल की तरह धमाकेदार स्‍टेज पर पहुंच गया है. सलमान खान के इस शो में हर दिन नए नए ट्विस्‍ट देखने को मिल रहे हैं लेकिन इस शो में अगर कुछ हटकर दिखाया जा रहा है तो वह है शो में जमकर एक दूसरे के ऊपर हाथपैर चलना. शो में हर दिन एक कंटेस्टेंट दूसरे कंटेस्टेंट के साथ लड़ाई करता नजर आता है. हाल ही में, दिग्विजय और अविनाश के बीच ऐसी लड़ाई हुई है जिसे देख बिग बौस गुस्सा गए है.

आपको बता दें कि शो में पारले जी टास्क हुआ. इस टास्क में दिग्विजय राठी जीत जाते हैं. जिसके बाद दिग्विजय को पारले जी के बिस्किट मिलते हैं तो उसमें से ईशा एक बिस्किट उठा लेती है. तब दिग्विजय ईशा को बोल देते है कि पूछ कर उठा. इसी बात को लेकर दिग्विजय और अविनाश की लड़ाई हो जाती है.

‘ग्लैम वर्ल्ड टौक’ के मुताबिक की वजह से दिग्विजय और अविनाश में जमकर लड़ाई होती है. दिग्विजय और अविनाश एक दूसरे को धक्का मारते हैं. इस तरह दोनों के बीच भयंकर लड़ाई होती है. अविनाश भड़क जाते हैं. इसके बाद दिग्विजय को धक्का मारते हैं और कौलर पकड़ लेते हैं. इसके बाद एक दूसरे पर ताने मारते हैं.

बता दें कि ये पहली बार नहीं है टाइम गौड के मामले में भी अविनाश और दिग्विजय की लड़ाई हो चुकी है. हालांकि बिग बौस उस टाइम इन दोनों के खिलाफ कोई एक्शन नहीं लिया था. न ही कंफेशन रुम में बुलाया था. लेकिन इस बार एक्शन फाइट ज्यादा हुई है. अब देखना होगा कि क्या बिग बौस इस बार के एक्शन पर कोई स्टैंड लेते है या नहीं.

दिग्विजय सिंह राठी

टीवी एक्टर दिग्विजय सिंह राठी एक पौपुलर स्टार है. पंचकूला मनसा देवी कौपलेक्स सेक्टर 4 निवासी दिग्विजय सिंह ने 2023 में रोडीज़ कर्म या कांड और स्पिलट्सलिवा एक्स5 जैसे पौपुलर शो हुए. जिसके बाद बिग बौस में आने का मौका मिला है. हालांकि दिग्विजय की पौपुलेरिटी बेहद ही कम है.

अविनाश मिश्रा

अविनाश मिश्रा जो इन दिनों बिग बौस 18 में कंटेस्टेंट है. वे STF के फाउंडर मेंबर भी रहे है. माफियाओं का अंत करते हुए उन्होंने ATS ज्वाइन किया और साल 2019 में डिप्टी एसपी के रैंक से रिटायर हुए है. उन्होंने अपनी तैनाती के पहले ही साल 3 एनकाउंटर कर दिए थे. अविनाश मिश्रा की छवि हमेशा से एक निडर पुलिस वाले की रही है और अब बिग बौस ने उन्‍हें मौका दिया है.

गरीबों का मसीहा : चापलूसों की चालबाजी

शाम होतेहोते पूरी बस्ती में काफी जोरों का हंगामा मच गया था. 2 दिनों के बाद मान्यवर नेताजी बस्ती का दौरा करने वाले थे. नेताजी के करकमलों द्वारा ही उस बस्ती को गैरकानूनी रूप से बसाया गया था. नेताजी की यह तुरुप की चाल सौलिड वोटबैंक साबित हो रही थी.

गरीबों की इस बस्ती में हर तरह का गैरकानूनी काम होता था. ‘गरीब’ बस्ती वालों को नेताजी का पूरा साथ मिला था. इस वजह से पुलिस वाले भी बस्ती के अंदर घुसने में घबराते थे.

बेरोकटोक ‘गरीब’ बस्ती वाले सत्कर्म करते रहते थे. न पानी, न सड़क, फिर भी वहां एक इंच जगह खाली नहीं थी. सांप जैसी बनी झोपड़ियां, जहां एक बार कोई बाहर का आदमी घुस जाए, तो शायद ही जिंदा वापस लौटे.

इस बस्ती में सभी कलाकार रहते थे. कोई ड्रग्स का धंधा करता, तो कोई कच्ची शराब बेचता, तो कोई चोरी की गाडि़यों के पुरजे बेचता था. बस्ती के अंदर बीसियों रद्दी वालों की दुकानें थीं. लोहे के सामान और तांबे के तार खूब बिकते थे.

बस्ती की ‘गरीब’ औरतें पास के औद्योगिक क्षेत्र में बनी कंपनियों में ?ाड़ू मारने और पैकिंग करने का काम किया करती थीं. 20-30 फीसदी कम पगार लेने के चलते उन्हें आसानी से काम मिल जाया करता था, पर कम पगार की भरपाई वे कंपनियों में से सामान चोरी कर के किया करती थीं.

चौकीदार को धमका कर या फिर मुफ्त की दारू का लालच दे कर या फिर चोरी के माल में हिस्सा दे कर मिला लिया जाता था. कुछ शातिर औरतें जासूसी भी करती थीं. उन से मिली सूचना के आधार पर ही कंपनियों में रात में चोरियां होती थीं. कई औरतें, जिन के पति दारूबाज थे, वे नौकरी के साथसाथ जिस्मफरोशी का धंधा कर के अपना घर चलाती थीं.

महीनेभर बाद ही ये लोग अपने हाथ का कमाल दिखाते थे. अगर कभी सुपरवाइजर ने पकड़ लिया तो रोधो कर, छाती पीट कर, गरीबी का गाना गा कर, औरत होने की दुहाई दे कर या फिर पहली गलती है आगे से कभी नहीं होगी कह कर बच निकलती थीं. ऐसे मौकों पर ज्यादातर सुपरवाइजर को ही नौकरी से हाथ धोना पड़ता था.

‘‘शिंदे साहब, अब आप ही बताओ कि एक दिन में 6 महीनों की गंदगी कैसे साफ करें?’’ इतना कह कर बनसोडे के माथे पर बल पड़ गए.

तभी अकबर, जो ड्रग्स का धंधा किया करता था, बोल पड़ा, ‘‘सफाई गई तेल लेने. अरे, बस्ती में जो एकमात्र सुलभ शौचालय था, उसे भी लोगों ने बंद करवा दिया.’’

शिंदे ने पूछा, ‘‘वह क्यों भला?’’

अकबर ने बताया, ‘‘लोग कहते हैं कि हम गरीब हैं और संडास का 5 रुपया भी बहुत ज्यादा है. इसे मुफ्त करो, नहीं तो पहले की तरह हम लोग डब्बा ले कर पहाड़ी पर जाएंगे.’’

शिंदे बोला, ‘‘इन को सब चीजें मुफ्त में चाहिए. हर घर में 2-2 डिश एंटीना लगे हैं, पैसे बरस रहे हैं, पर 5 रुपया भी नहीं निकालेंगे.’’

तभी शबनम, जिस का आदमी गैरकानूनी रूप से गाय के बछड़े काटता था और शबनम, जो टिफिन में मांस भर कर आसपास के होटलों में दे कर आती थी, ने बीच में ही टोका, ‘‘अरे अकबर भाई, तुम क्या रोना ले कर बैठ गए. असली मुद्दा तो नेताजी के बस्ती के दौरे को कामयाब बनाना है.’’

शिंदे ने कहा, ‘‘यह बात सही कही शबनम बहन ने. हमें इधरउधर ध्यान नहीं भटकाना है.’’

अकबर और शबनम के बीच गहरा संबंध था. दोनों मौका देख कर यूसुफ के रूम में आधी रात को मिलते थे, जबजब यूसुफ की नाइट ड्यूटी रहती थी. पड़ोसी सबकुछ जानते थे, पर पिटाई के डर से या खुद का भेद खुलने के डर से वे चुप रहना ही पसंद करते थे.

अफसाना और सुलेखा, जो कि मानवाधिकार संगठन की सदस्या थीं, ने अचूक रास्ता निकाला.

‘‘देखो, अपने नेताजी को बस्ती के अंदरूनी हिस्सों का दौरा कराओ ही मत. नेताजी गाड़ी से उतर कर 50-60 मीटर चल लेंगे. सब लोग नेताजी की जयजयकार कर देंगे. कुछ बच्चे उन के पैर छू लेंगे. लड़कियां उन पर फूलों के पंखुडि़यों की वर्षा कर देंगी. बस्ती के कर्ताधर्ता उन्हें फूलों की माला पहना देंगे,’’ अफसाना ने कहा.

‘‘वाहवाह, क्या दिमाग पाया है,’’ कह कर भालेराव ने जोर से तालियां बजाईं.

अब भालेराव ने बोलना शुरू किया, ‘‘इस के बाद नेताजी को बस्ती के एक घर में ले जाएंगे, जहां औरतें थाल में पानी भर कर तैयार रहेंगी. नेताजी को एक कुरसी पर बैठा कर उन के पैर थाल में रखे जाएंगे. 2 औरतें उन के पैर धोएंगीं.’’

शिंदे ने कहा, ‘‘फिर उन्हें ताजमहल होटल से लाई गई चाय पिलाएंगे.’’

बनसोडे ने बताया, ‘‘इसी बीच कुछ बूढ़ी औरतें उन से कुछ बेकार सी शिकायत करेंगी, जिन का हल निकालने के लिए नेताजी उन्हें अगले हफ्ते अपने ‘जनता दरबार’ में बुलाएंगे. इस बात पर हम सब जोरजोर से ‘नेताजी जिंदाबाद’ के नारे लगाएंगे.’’

‘‘वाह बनसोडे, लगता है कि तू आजकल हिंदी फिल्में खूब देखता है’’

‘‘ऐ माने, तू मेरा मजाक तो नहीं उड़ा रहा है न कहीं?’’

माने ने कहा, ‘‘नहीं यार, तू मेरा यार है, यारों का यार है.’’

‘‘अच्छा, अब मस्काबाजी बंद कर.’’

बनसोडे बोला, ‘‘ओ शिंदे साहब…’’

शिंदे ने कहा, ‘‘बोलो बनसोडे, मैं सुन रहा हूं.’’

‘‘शिंदे साहब, चाय के साथसाथ ताजमहल होटल से ही उन के लिए नाश्ता भी मंगा लेना.’’

‘‘हां, यह अच्छा आइडिया है,’’ शिंदे ने बनसोडे की बात का समर्थन किया.

अफसाना ने कहा, ‘‘अबे बेवड़ो, बस्ती की औरतों से ढंग से नाटक नहीं हो पाएगा. क्यों न मंदा को बोल कर उस की नाटक कंपनी में से कुछ लड़कियों को बुलवा लें? तुम सब लोग क्या बोलते हो?’’

सब ने अफसाना के विचार का जोरदार समर्थन किया. बात तो पते की कही थी अफसाना ने. देर रात तक चली इस बैठक में आखिरकार सभी समस्याओं का हल निकाल लिया गया. सब ने दारू पी और मुरगा खाया.

शबनम बोली, ‘‘रात जवां है, हम भी जवां हैं. लाइट बंद करो और सब चालू हो जाओ.’’

तुरंत लाइट बंद हुई और सभी काम पर लग गए. पूरा कमरा मुगलों का हरम बन गया था. डेढ़ 2 घंटे बाद सभी इज्जतदार लोग अपनेअपने घरों की तरफ चल पड़े. इसी बीच उन के घरों में लीला रचा चुके उन के पड़ोसी भी अपनेअपने घरों की तरफ रवाना हो चुके थे. आखिर वे भी तो इज्जतदार थे. उन्होंने भी ‘इज्जत’ का मुखौटा जो लगा रखा था.

सुबह होने के बाद बस्ती की सड़क की तरफ के 10 झपड़ों को चुना गया. उन घरों में रहने वालों को नेताजी के भावी दौरे की सूचना दे दी गई. उन्हें अपनेअपने घरों की सफाई के अलावा घर के सामने की सफाई करने को कहा गया. जिस ने ढंग से सफाई नहीं की, उस के घर पर बुलडोजर चल सकता है.

बुलडोजर का नाम सुनते ही सब बेचारे गरीब लोग डर से गए. सभी ने अपनी औरतों से कहा और सफाई में जुट गए. कोई नहीं चाहता था कि बस्ती में बुलडोजर आए, वरना उन के सभी गैरकानूनी काम बंद हो जाएंगे. इन्हीं कामों में तो वन टू का फोर खुलेआम होता था.

बस्ती के कुछ डरपोक किस्म के लोग शाम के समय बस्ती के बाहर स्टौल लगा कर तरहतरह के खानेपीने के सामान मसलन पानीपूरी, आलू टिक्की, नूडल्स, आमलेट वगैरह बेचा करते थे. शाम को काम से छूट कर घर जाने वाले लोग सस्ते के चक्कर में इन चीजों को खूब खाते थे. सस्ते के नाम पर लोगों को जहर खिलाया जाता था.

बस्ती वाले मार्केट से ऐक्सपायरी डेट का सामान ले कर आते थे. इसी तरह फूटे हुए अंडे, मरी हुई मुरगियां, काला पड़ गया खाने का तेल काम में लाया जाता था. कबूतरों को हलाल कर के उन का मांस मुरगियों के मांस के साथ मिला दिया जाता था.

कांदाबटाटा मार्केट से चोरी का प्याजआलू एकचौथाई रेट पर खरीदा जाता था. भाजीपाला मार्केट से चोरी की हुई या फेंकी हुई सब्जी खरीदी जाती थी. इन सस्ती चीजों को खा कर अनगिनत लोगों बीमार पड़ चुके थे, पर सस्ते का लालच सोचने की ताकत को दबा देता है.

वैसे, अगर बनसोडे की बात मानें, तो वह यही कहा करता था, ‘‘इस बस्ती में धर्मनिरपेक्ष और समाजवादी विचारधारा के लोग रहते हैं. इन लोगों का एकदूसरे की बीवियों के साथ कुछ ज्यादा ही गहरा संबंध है. भंडारे में हर कोई शामिल होता है. कुछ लोग तो ऐसे भी हैं, जो गूगल पर सर्च करते हैं कि आज कहां भंडारा है.’’

मोरे, जो दलित पैंथर ग्रुप से संबंध रखता था, ने एक बहुत बड़ी बात कही थी, ‘‘बस्ती वालों की यह एकता ही उन की कामयाबी का राज है. अगर गलती से भी कोई पुलिस की टीम बस्ती के अंदर घुस गई तो क्या बूढ़े, क्या बच्चे, क्या जवान और क्या औरतें… सभी मिलजुल कर पत्थरबाजी करते थे.

‘‘शाम को जब चैनल वाले आते तो उन्हें देख कर औरतें और लड़कियां ऐसे बिलखबिलख कर रोतीं, छाती पीटतीं और जमीन पर ऐसे लोटतीं, मानो पता नहीं क्या हो गया.

‘‘गरीबी, दलित और अल्पसंख्यक का इतना जोरदार विक्टिम कार्ड खेला जाता था कि चैनल वाले इसे मुख्य समाचार बना देते थे.’’

तभी बनसोडे, जो पास में ही खड़ा पान चबा रहा था, थूक निगल कर बोला, ‘‘मोरे, यह दुनिया अपने मतलब की है. आखिर चैनल वालों को भी तो गरमागरम खबरें चाहिए अपनी टीआरपी बढ़ाने के लिए. कई बार तो सम?ादार चैनल वाले पैसा दे कर भी नाटक करवाते हैं. सब पैसों का खेल है. ढंग से पैसे मिलें तो कपड़े भी फाड़ डालें.’’

वैसे, सब से बड़ी बात तो शिवबदन ने बताई. शिवबदन का गांव उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले में था. कहने को तो वह बिजली मिस्त्री था, पर सुबहशाम अपनी मकान मालकिन की टपरी पर समोसे, भजिया और वडे तलता था. रात को अपनी मकान मालकिन के कमरे में ही सोता था.

‘‘साहब, इन बस्ती वालों की असली कमाई तो चुनाव के समय में होती है.’’

नेताजी के बहुचर्चित ?ांपड़पट्टी के दौरे से एक दिन पहले एक खास टीम आई. उस टीम में कुछ सिक्योरिटी अफसर, मीडिया वाले और पार्टी के कुछ खास लोग थे. इन्होंने बस्ती वालों के साथ बस्ती का मुआयना किया और नेताजी के बस्ती दौरे को कामयाब बनाने पर सोचविचार किया.

अगले दिन नेताजी धूमधड़ाके के साथ बस्ती का दौरा करने आए. उन के स्वागत में 15 मिनट तक आतिशबाजी हुई. बच्चे, बूढ़े और औरतों ने नेताजी की जयजयकार की. फिर नेताजी को सिक्कों से तोला गया. नेताजी ने उन सिक्कों को हाथों से छू कर गरीबों में बांटने का हुक्म दिया. सब बस्ती वाले तुरंत ?ाली फैला कर खड़े हो गए.

मोरे चिल्लाया, ‘‘बनसोडे, एक लट्ठ ला कर बजा इन पर. गांव बसा नहीं और भिखारी चले आए.’’

नौजवानों ने आगे बढ़ कर नेताजी के पैर छुए. नेताजी खुश हो गए. पर नेताजी को असली खुशी तब हुई, जब लड़कियों ने उन के पैर छुए. नेताजी खुश हो कर उन की पीठ पर हाथ फेरे जा रहे थे.

गहमागहमी बढ़ते ही जा रही थी. फिर फोटो सैशन हुआ. नेताजी पर जम कर फूलों की वर्षा की गई. कुछ बूढ़ी औरतें, जिन्हें डेटौल मिले पानी से रगड़रगड़ कर नहलाया गया था, ताकि उन के करीब जाने से नेताजी को कहीं इंफैक्शन न हो जाए, ने नेताजी को अपना माईबाप बताया.

तभी नेताजी के निजी सचिव ने कहा, चूंकि नेताजी बिजी होने के बावजूद बस्ती वालों की खास गुजारिश पर बस्ती में आए हैं, इसलिए आगे का कार्यक्त्रम तेजी से निबटाया जाए. जैसा कि सभी को पता है, नेताजी लोक नेता हैं, इसलिए उन्हें और काम भी हैं, समय की बेहद कमी है.’’

अब नेताजी की सवारी धीरेधीरे सरकनी शुरू हुई. 150 फुट चली होगी कि 2 भाई लोगों ने निजी सचिव की जेब में 500 रुपयों के नोटों की 4 गड्डियां डालीं. निजी सचिव ने कारवां को वहीं रुकने का इशारा किया. सामने बनी ?ांपड़ी में नेताजी ने प्रवेश किया. निजी सचिव ने धीरे से नेताजी के कान में कहा कि चायनाश्ता ताजमहल होटल का है.

अंदर 2 डाइटिशियन टैस्ट कर के खाना परोस रही थीं, फिर भी नेताजी ने दो घूंट चाय पी. उन के निजी सचिव ने कहा कि नेताजी ने बस्ती वालों के लिए उपवास रखा है, इसलिए नाश्ता नहीं करेंगे. सभी बस्ती वाले यह सुन कर खुश हो गए. फिर से सभी ने नेताजी की जयजयकार की.

तभी एक भाई ने मौका देख कर नेताजी को एक बैग भेंट में दिया.

नेताजी ने पूछा, ‘‘कितने हैं?’’

भाई बोला, ‘‘10 लाख हैं दादा. बाकी के 20 लाख अगले हफ्ते औफिस में पहुंचा दूंगा.’’

नेताजी ने बैग अपने निजी सचिव को पकड़ाया और हाथ जोड़ कर सभी बस्ती वालों से कहा, ‘‘आप लोगों का अपनापन देख कर बेहद खुशी हो रही है. आप सभी का कल्याण हो. अच्छा, अब इजाजत दीजिए. जय हिंद.’’

इतना कह कर नेताजी चल पड़े. साथ में बस्ती वालों का हुजूम चल पड़ा. कुछ बूढ़ी औरतें रोने लगीं. नेताजी का काफिला देखते ही देखते आंखों से ओ?ाल हो गया.

एक बुजुर्ग दूसरे बुजुर्ग से बोला, ‘‘जब यह नेतवा मार्केट में घूमघूम कर नीबू बेचता था, तब नहीं थकता था. पर, अभी तो तुरंत ही थक जाता है.’’

बनसोडे ने कहा, ‘‘चचा, यह नीबू बेचताबेचता गरीबों का मसीहा बन गया और तुम हमाल के हमाल ही रह गए.’’

बनसोडे की बातें बुजुर्ग को अच्छी नहीं लगीं, पर फिर भी उन्होंने चुप रहने में ही अपनी भलाई सम?ा.

बनसोडे ने कहा, ‘‘अरे भालेराव, नेताजी तो गए. अब चलो हम ही लोग चायनाश्ता कर लें.’’

भालेराव बोला, ‘‘नाश्ता, अरे वह तो सब प्रैस वाले ले गए. अपने घर जा कर नाश्ता करो.’’

‘‘हे देवा, अब क्या होगा. घरवाली तो ड्यूटी पर गई है.’’

‘‘अबे घोंचू, जब्बार की कैंटीन में चल कर खाते हैं फ्री में.’’

दोनों एकदूसरे का हाथ पकड़े मुसकराते हुए चल पड़े.

कुहू : परिवार को संभालती एक हिम्मती लड़की

लेखक – प्रदीप कुमार रॉय 

वह अपने मातापिता का एकलौता बेटा था. 3 बहनें उस से बड़ी थीं. हम लोग उस के पड़ोस में रहते थे. उस के लालनपालन को देख कर बचपन से ही मैं उस से जलता था.

वह मुझ से 5 साल छोटा था, पर उसे वे सारी सुविधाएं मुहैया थीं, जिन की चाह अकसर हर बच्चे को होती है.

उस के पास खेलने के लिए महंगे खिलौने थे, पहनने को एक से एक मौडर्न पोशाकें थीं, पढ़ने के लिए तरहतरह की पत्रिकाएं और कहानियों की ढेरों किताबें थीं.

कम आमदनी के बावजूद भी उस के पिता उस की तमाम जायज और नाजायज जरूरतों को पूरा करने में खुशी महसूस करते थे, जिस की भरपाई बहनों से होती थी. उन की तो आम जरूरतें ही पूरी नहीं होती थीं.

वे तीनों एक जोड़ी कपड़े में साल निकाल देती थीं. पढ़नेलिखने के लिए किताबें और कौपियां भी नहीं होती थीं. लड़कियां पढ़लिख लें, इस की चिंता मांबाप को कतई नहीं थी. लड़कियां घर के कामकाज में लगी रहती थीं और मांबाप बेटे की देखभाल में.

दोनों बड़ी बहनों की पढ़ाई 5वीं-6ठी क्लास तक ही सिमट कर रह गई. उन्हें इस की कोई शिकायत नहीं थी, बल्कि उन्होंने तो छोटी उम्र से ही  झाड़ूपोंछा से ले कर चौकाबरतन तक सभी कामों में अपनेआप को ढाल लिया था, घर का सारा काम संभाल लिया था, बल्कि ऐसा करने पर उन्हें मजबूर किया गया था, क्योंकि नौकरचाकर को तो खर्च में कटौती के लिए हटाया जा चुका था. तकलीफें तो बहनों को सहनी पड़ी थीं.

लेकिन, जो सब से ज्यादा अनदेखी की शिकार हुई थी, वह थी कुहू. बस, इसी के चलते उसे बचपन से ही पढ़ाईलिखाई में बेहद दिलचस्पी थी. घर के कामकाज से उसे न कोई लगाव था और न ही कोई इच्छा थी. वह दिनभर पढ़नेलिखने में ही लगी रहती थी, जिस का खमियाजा उसे मां की डांटफटकार से भुगतना पड़ता था.

मां से डांट पड़ती… वे कहतीं, ‘‘क्या कर लेगी पढ़लिख कर. लड़की जात है, कुछ भी कर ले, चूल्हाचौका में सिमट कर रह जाएगी. बेहतर है कि अभी से घरगृहस्थी के काम सम झ ले, नहीं तो बाद में पछताएगी. फिर न कहना कि मां ने यह सब सिखाया नहीं था.’’

कभीकभी उसे मार भी पड़ती थी. बड़ी दोनों बहनें काम करती थीं, इसलिए उन्हें मार नहीं पड़ती थी. ये सब बातें कुहू के दिलोदिमाग पर इस तरह से रचबस गई थीं कि बरसों बाद आज जब मैं उस से मिला, तो आगबबूला हो कर अपनी भड़ास निकालते हुए मु झे बताने लगी.

दरअसल, मैं उस की बड़ी बहन की शादी में शरीक होने आया था. इधरउधर की बातों के बाद जब मैं ने उस के भाई संतु के बारे में जानने की इच्छा जाहिर की, तो वह भड़क गई और अनापशनाप बकने लगी.

गुस्से में कुहू न जाने क्याक्या कह गई, ‘‘तीसरी बेटी के रूप में पैदा होना जैसे मेरे लिए एक कलंक था… शायद मांबाप की इच्छा के खिलाफ मैं पैदा हो गई थी. एक साल के बाद ही संतोष उर्फ संतु पैदा हुआ था. बेटे के आते ही घर में रौनक का माहौल बन गया था. मांबाप का उस के प्रति जरूरत से ज्यादा लाड़प्यार से मैं असहज महसूस करती. अपनेआप को मातापिता की नजरों में हमेशा गिरा हुआ पाती. अपने प्रति मां के भेदभाव को तब मैं अच्छी तरह सम झने लगी थी. मेरे पैदा होते ही गुस्से से पिता ने भगवान की फोटो को नदी में फेंक कर घर में पूजापाठ पर रोक लगा दी थी,’’ ऐसा बताते हुए कुहू फूटफूट कर रो पड़ी थी.

संतु के पैदा होते ही भगवान को घर में फिर से प्रतिष्ठित किया गया था और घर में पूजापाठ फिर से शुरू हो गया था. ऐसा कुहू ने सुना था और भी उस ने बताया कि किस तरह खानेपहनने में उन की मां उन के साथ भेदभाव किया करती थीं… ‘‘सुबह नाश्ते में अकसर हम बहनों के लिए बासी रोटी होती थी और वे भी रूखीसूखी, जबकि संतु के लिए परांठे और मक्खन. दूध, दही, फल वगैरह के लिए तो हम बहनें तरस ही जाती थीं.

‘‘संतु के खाने के बाद अगर कुछ बचता तो ही हमें नसीब होता था. एक जोड़ी स्कूल के कपड़ों से हफ्ता निकाल देती थीं… पसीने की बदबू आती थी, सहेलियां फब्तियां कसती थीं, जबकि संतु की पोशाक हमेशा लौंड्री से धुली हुई होती थी.

‘‘इस्तरी वाले पोशाक हम बहनें सिर्फ किसी खास मौके पर, जैसे गणतंत्र दिवस या स्वतंत्रता दिवस पर ही पहनती थीं, जिस के लिए हम शाम को स्कूल के बाद खुद अपने कपड़े धोतीं और पंखे के नीचे सुखाया करतीं…

‘‘बड़ी दीदी कपड़ों पर इस्तरी कर देतीं. कभीकभी कपड़े सूख नहीं पाते और गीले कपड़ों में ही स्कूल जाना पड़ता था… और वहीं संतु… जिसे मांबाप ने सिर पर बिठा रखा था, आज..’’  कहतेकहते कुहू दोबारा फफक कर रो पड़ी.

कुहू की इन बातों से कुछ पता चले या न चले, पर इतना तो साफ हो गया था कि संतु के किसी गैरजिम्मेदाराना बरताव से उसे गहरा सदमा पहुंचा है और वह दुखी है. ऐसे समय में मैं ने उसे कुरेदना ठीक नहीं सम झा. मैं ने उसे हिम्मत बंधा कर चुप कराया.

शादी में काफी लोग थे. पर न जाने क्यों चहलपहल में कमी कहीं न कहीं मु झे डरा रही थी. मैं 10 साल बाद इस परिवार से मिल रहा था.

मेरी 10वीं जमात के बाद पिताजी का तबादला हो गया और उस के बाद कभी कोई ऐसा मौका नहीं आया कि हम मिलते. कुहू से कालेज में बातचीत हो जाती थी… पर सीमित रूप से. कई पुराने दोस्तों से वहां मुलाकात हुई. उन लोगों से ही संतु के बारे में जानकारी मिली और उस के वहां न होने की वजह साफ हो गई.

दरअसल, कालेज में फर्स्ट ईयर के दौरान संतु पिंकी के प्रेमपाश में फंस गया था, जिस पर कुहू ने एतराज जताया था, क्योंकि कुहू पिंकी के चरित्र से अच्छी तरह वाकिफ थी.

पिंकी कुहू की हमउम्र थी. दोनों एक ही क्लास में पढ़ती थीं. पिंकी को डांस में दिलचस्पी थी. वह बचपन से ही कथक डांस की तालीम ले रही थी. स्कूल हो या कालोनी… सभी सांस्कृतिक कार्यक्रमों में डांस करने के लिए उसे कहा जाता था. डांस के सिलसिले में उसे अपने ग्रुप के साथ शहर से बाहर भी जाना पड़ता था.

कुहू और पिंकी दोनों अच्छी सहेली हुआ करती थीं. दोनों का एकदूसरे के घर पर आनाजाना था. उन का एकसाथ पढ़नालिखना और घूमनाफिरना भी था. तब पिंकी के कई बौयफ्रैंड हुआ करते थे, जो शायद पिंकी के मुताबिक डांस ग्रुप से ही जुड़े थे, इसलिए कुहू उन से अनजान थी.

स्कूल जाते हुए या कभी शाम को टहलते हुए उन दोस्तों में से कोई न कोई पिंकी से मिलने आ जाता था. कई बार कुहू को उन के मिलनेजुलने का ढंग अच्छा नहीं लगता था. वह पिंकी से इस की शिकायत भी करती, पर वह किसी न किसी बहाने सबकुछ टाल जाती.

कई बार तो पिंकी रातरात भर घर से बाहर रहती, पर अपने घर पर बता कर आती कि वह कुहू के घर जाएगी गणित की प्रैक्टिस करने. कभीकभी तो किसी कार्यक्रम के लिए डांस की प्रैक्टिस करने का बहाना बना कर रातभर घर से नदारद रहती थी.

पिंकी की मां के पूछने पर कुहू वैसा ही बताती, जैसा कि उसे पिंकी के द्वारा कहने को कहा जाता था. उस के लिए कुहू को बेवजह ही  झूठ बोलना पड़ता था, जो वह नहीं चाहती थी. उन लड़कों के चालचलन पर उसे शक होने लगा था. यकीनन, ये आवारा लड़के ही थे, जिन से पिंकी का मेलजोल था.

पूछने पर पहले तो कुहू ने आनाकानी की, पर असलियत का पता चलते ही फौरन कुहू ने पिंकी से दूरी बना ली. फिर भी पिंकी कहीं न कहीं किसी रैस्टोरैंट में, पार्क में या सड़क पर किसी पेड़ की आड़ में लड़कों के साथ मटरगश्ती करती दिख ही जाती. कभी किसी के साथ तो कभी कोई और होता था. खुले आसमान में चिडि़या अपने पंख फैला कर उड़ रही थी… न कोई दिशा थी और न ही कोई मंजिल.

अब संतु की बारी थी. वह भी पिंकी के प्यार के चंगुल से बच नहीं पाया. वह पिंकी पर फिदा हो चुका था. सरेआम दोनों का मिलनाजुलना होता था.

पिंकी के साथ संतु का मेलजोल कुहू को बिलकुल बरदाश्त नहीं था, क्योंकि पिंकी की कोई भी बात उस से छिपी तो थी नहीं.

कुहू नहीं चाहती थी कि उस का भाई पिंकी के साथ रह कर बिगड़ जाए. उस की पढ़ाई में कहीं बाधा न हो.

जब कुहू ने अपना कड़ा एतराज जताया, तो संतु ने अपनी बहन को ही भलाबुरा कह डाला. तमतमाए चेहरे से अपनी बहन को ओछी सोच वाला बताया और यह भी कह डाला कि वह पिंकी से जलती है.

कुहू संतु को साफसाफ कहना चाहती थी, ‘गर्लफ्रैंड या बौयफ्रैंड का होना हर किसी का निजी मामला है. किसी को उस में दखल देने का कोई हक नहीं है. फिर किसी के तुम्हारी गर्लफ्रैंड होने से भला मु झे कोई शिकायत या परेशानी क्यों होगी. दरअसल, परेशानी की बात यह है कि पिंकी की बुरी संगति से एतराज है.’

पर कुहू ने चुप रहना ही उचित सम झा, क्योंकि उसे यकीन था कि जल्दी ही पिंकी आदतन संतु को भी अपने हाल पर छोड़ कर किसी और को फंसा लेगी.

आखिर हुआ भी वही…  संतु को ठुकरा कर पिंकी पैसों के लिए किसी और के साथ अठखेलियां करने लगी

थी. पर एक पागल प्रेमी की तरह संतु अपनेआप को पिंकी से अलग होने की बात सोच भी नहीं सकता था.

वह पिंकी के पीछे हाथ धो कर पड़ गया. उस ने दाढ़ी बढ़ा ली और पिंकी के इर्दगिर्द चक्कर काटने लगा, ताकि पिंकी उस पर तरस खा कर फिर से दोस्ती का हाथ बढ़ा ले.

पर पिंकी तो पुरानी खिलाड़ी निकली. उस ने अपना पुराना नुसखा आजमाया. नतीजतन, संतु चोटिल हालत में अस्पताल के बैड पर कराहता मिला. इन सब बातों के बावजूद अपनी बहन के साथ उस का संबंध बिगड़ा ही रहा.

संतु का पिंकी की निजी जिंदगी में दखल पिंकी और उस के बौयफ्रैंड को गवारा न हुआ. संतु से छुटकारा पाने के लिए पिंकी और उस के बौयफ्रैंड ने कोर्टमैरिज कर ली. इस में शायद उस के बौयफ्रैंड की ही पहल रही होगी.

अब तो संतु पढ़ाई वगैरह छोड़ पागलों की तरह भटकने लगा. उसे शराब की लत लग गई थी. घर पर वह कभीकभार ही आता था.

संतु की बदहाली पर घर के सभी सदस्य परेशान थे. जिस लड़के को मांबाप ने बेटियों की सामान्य जरूरतों की अनदेखी कर लाड़प्यार से पालापोसा, उस की परवरिश में कोई कसर नहीं छोड़ी.

आज संतु दरदर भटक रहा है. किस मांबाप से यह सब सहन होगा… घर पर पहली शादी थी और घर का एकलौता बेटा इस खुशी के मौके पर नहीं था. खुशी के माहौल में वहां मातम सा पसरा था.

संतु कुछेक साल यों ही गुमशुदा रहा. हुआ यों कि आखिरी बार जब वह घर आया था और मांबाप ने उस की शादी की बात चलाई थी, तो उस ने साफ मना कर दिया था.

संतु ने कहा था कि वह शादी नहीं करेगा और अगर करेगा भी तो किसी विधवा से करेगा. शादी और विधवा से? ऐसे बेतुके लगने वाले प्रस्ताव पर किसी की रजामंदी नहीं थी.

पहले कुहू ने ही अपना विरोध जताया था, मातापिता ने बस कुहू के फैसले पर हामी भरी थी, पर उन के अंदर की सुगबुगाहट किसी से छिपी नहीं थी. आखिर बेटा जो ठहरा.

दरअसल, उन्हें अपने बेटे के द्वारा लिए गए फैसले को किसी क्रांतिकारी कदम से कम नहीं सू झा. पर, खुल कर कुछ कहने से बचे रहे. वे कुहू के खिलाफ जा कर उसे नाराज नहीं करना चाहते थे. कुहू ही तो एकमात्र सहारा थी. वैसे भी दोनों बड़ी बहनें शादी के बाद ससुराल में थीं. संतु अपने फैसले पर अडिग रहा.

जातेजाते संतु ने इसे अपना फैसला बताते हुए कहा कि चाहे कुछ भी हो, वह ऐसा कर दिखलाएगा. संतु के मुंह से विधवा विवाह वाली बात सभी कीसम झ से परे थी.

संतु कहीं बाहर चला गया. किसी ने भी उसे ढूंढ़ने की कोशिश नहीं की. सुनीसुनाई खबर थी कि आजकल वह हरिद्वार के किसी आश्रम में रह रहा है और योग सिखा रहा है. इस बात से पता नहीं क्यों मु झे बड़ा सुकून मिला.

मु झे महसूस हुआ कि शायद अब संतु सुधर गया है, वरना किसी विधवा से विवाह की बात उस के मन में क्यों आई. उस में मु झे समाजसुधारक की छवि नजर आने लगी. उस से मिलने की इच्छा मेरे मन में जाग गई, पर सिर्फ मन मसोस कर रह जाना पड़ा. सिवा इस के मेरे पास कोई उपाय नहीं था.

बूढ़े मांबाप के साथ अब अकेली कुहू ही रह गई. अपने मांबाप को साथ लिए इलाहाबाद आ गई. वहां वह कालेज में टीचिंग का काम कर रही है.

कुहू को दुख इस बात का था कि मांबाप की हर खुशी का ध्यान रखते हुए भी उस के लिए उन्हें कोई फिक्र न थी, बल्कि बातबात में संतु को याद कर के वे परेशान होते.

इसी सदमे में पिताजी चल बसे. संतु का कोई ठिकाना नहीं था. उसे यह खबर नहीं दी जा सकी. मैं पहुंच गया था.

कुहू की मां को अब अपने पति के खोने का गम सताने लगा था. वे कुछ ज्यादा ही बेचैन रहने लगी थीं. उन्हें शायद यह डर था कि कुहू शादी कर लेगी, तो उन का क्या होगा? वे कहां रहेंगी? इस शक से तो वह शायद पति के रहते हुए भी चिंतित थीं, लेकिन कभी खुलासा नहीं किया था.

आजकल मां के हावभाव से कुहू सम झने लगी है. कभीकभार तो अनायास ही इशारेइशारे में कुछ कह जाती हैं. अब पहले की तरह कोसती नहीं. बचपन में बातबात पर कोसती थीं. पढ़नेलिखने में बाधा पैदा करती थीं.

कितनी छोटी सोच थी कि बेटा पढ़लिख कर मांबाप के बुढ़ापे का सहारा बनेगा. बेटी पढ़ेगी तो क्या कर लेगी, आखिर ससुराल ही तो जाएगी. अपने मांबाप के लिए तो पराई ही होगी…

तभी तो बचपन से कुहू ने अपने घर में पराई होने जैसी दुखद घडि़यों को जिया है. बचपन से ही उसे पढ़ने की जिद रही है. माहौल न होने के बावजूद भी उस ने पढ़ाई जारी रखी. बच्चों को ट्यूशन पढ़ाती और उन्हीं पैसों से पढ़ाई का खर्च निकालती.

एमए के बाद कुहू टीचिंग में आ गई. साथसाथ पीएचडी भी कर रही है. अपनी हैसियत पर हर टारगेट को हासिल किया है उस ने. दोनों बहनों की शादी में हाथ बंटाया, वरना उस के पिताजी की आमदनी ही कितनी थी. उस ने अपनी जिम्मेदारी से कभी मुंह नहीं मोड़ा. अब इस हालत में मां को छोड़ कर अपनी शादी की बात कैसे सोच सकती थी वह.

बचपन से ही हम एकदूसरे को चाहते थे. बड़े हुए तो बड़ी सादगी से मिलते थे. रिश्ते को निभाने में शुरू से हम ने कभी ऐसी कोई फूहड़ हरकत नहीं की, जिस से हमारे संबंध की भनक तक किसी को पड़ती.

हम दोनों के रिश्ते की बात सिर्फ हम ही जानते थे. हम एकदूसरे की तकलीफों और मजबूरियों को बखूबी सम झते थे. किसी ने भी कभी कोई जल्दबाजी नहीं दिखाई, तभी तो हमारे संबंध मजबूत थे.

कुहू ने बताया कि एक दिन अचानक संतु मां को लेने आ गया. उस ने शादी कर ली थी. यही बताया था संतु ने मां को. मां तो जैसे बेटे के इंतजार में बिलकुल तैयार बैठी थीं. बेटे के साथ ऐसी गईं, मानो अचानक तय समय से पहले किसी कैदी की सजा माफ कर दी गई हो. ऐसा लगा जैसे वह यहां कैदी

की जिंदगी जी रही थीं और छुटकारा मिलते ही भाग खड़ी हुईं. कुछ कह कर भी नहीं गईं.

कुहू उन्हें जाते हुए देखती रह गई. मुड़ कर भी पीछे नहीं देखा था उन्होंने. यहां से चले जाने के बाद वह अकेली कैसे रहेगी, पूछा तक नहीं.

कुहू की 10 साल की तपस्या एक पल में भंग हो गई, मानो इस जमाने में लड़की के रूप में जन्म लेना ही पाप है. रोरो कर कुहू का बुरा हाल था. उसे दिलासा देने वाला कोई भी साथ नहीं था. उस के कहने पर एक परची में संतु अपना पता छोड़ गया था.

अचानक एक दिन कुहू ने मु झे आने को कहा. आननफानन में ही हम दोनों ने आर्य समाज विधि से शादी कर ली. सिर्फ मेरे घर के लोग शादी में थे.

कुहू ने किसी को भी नहीं बुलाया था. मां, बहनें और भाई किसी को भी नहीं. जब किसी को उस की फिक्र नहीं है, तो वह क्यों उन्हें बुलाए.

उन लोगों के प्रति कुहू के मन में गुस्सा होना मुझे लाजिमी लगा. मेरे घर के लोग इस शादी से बेहद खुश लगे.

कई महीने बीत गए. पता नहीं अचानक कुहू को मां की याद आने लगी. हम दोनों ने उन से मिलने का मन बनाया. हरिद्वार के किसी आश्रम का पता परची में लिखा था.

जब हम वहां आश्रम में पहुंच कर संतु के बारे में पूछताछ कर रहे थे, तो मैलीकुचैली साड़ी में लिपटी एक दुबली सी बुढि़या कुहू से लिपट कर रोने लगीं.

वे मां हो सकती हैं, हम ने कल्पना भी नहीं की थी. वे सूख कर कांटा हो चुकी थीं, पहचानना मुश्किल हो रहा था.

मां की हालत पर कुहू भी बिलख कर रोने लगी थी. उन्हें शांत कराया. मां हमें संतु के घर पर ले गईं. वहां संतु नहीं था और न ही उस की पत्नी. वे कई दिनों से शहर से बाहर किसी योग शिविर में गए हुए थे.

मां ने बताया कि महीने में 20 दिन वे लोग घर से बाहर रहते हैं. हमें मां की बदहाली की वजह सम झते देर नहीं लगी. वहां दीवार पर टंगी फोटो में संतु के साथ पिंकी थी.

पिंकी के पति की मौत में हत्या का जो शक जताया जा रहा था, उस की तसदीक तो नहीं हो पाई थी, पर संतु को जिस विधवा विवाह की बात पर जिद थी, उस के पीछे की कहानी साफ हो गई थी.

तकरीबन घंटाभर रहने के बाद जब हम निकलने लगे, तो मां एक साफ साड़ी में तैयार हो कर बड़ी बेबसी से कुहू के चेहरे पर उभरते भावों को अपनी सूनी निगाहों से टोह रही थीं. कुहू ने विनम्र आंखों से मेरी रजामंदी मांगी थी. मां को साथ ले कर हम वहां से वापस आ गए.

पराकाष्ठा: एक विज्ञापन ने कैसे बदली साक्षी की जिंदगी

आज भी मुखपृष्ठ की सुर्खियों पर नजर दौड़ाने के पश्चात वह भीतरी पृष्ठों को देखने लगी. लघु विज्ञापन तथा वर/वधू चाहिए, पढ़ने में साक्षी को सदा से ही आनंद आता है.

कालिज के जमाने में वह ऐसे विज्ञापन पढ़ने के बाद अखबार में से उन्हें काट कर अपनी सहेलियों को दिखाती थी और हंसीठट्ठा करती थी.

शहर के समाचार देखने के बाद साक्षी की नजर वैवाहिक विज्ञापन पर पड़ी जिसे बाक्स में मोटे अक्षरों के साथ प्रकाशित किया गया था, ‘30 वर्षीय नौकरीपेशा, तलाकशुदा, 1 वर्षीय बेटे के पिता के लिए आवश्यकता है सुघड़, सुशील, पढ़ीलिखी कन्या की. गृहकार्य में दक्ष, पति की भावनाओं, संवेदनाओं के प्रति आदर रखने वाली, समझौतावादी व उदार दृष्टिकोण वाली को प्राथमिकता. शीघ्र संपर्र्ककरें…’

साक्षी के पूरे शरीर में झुरझुरी सी होने लगी, ‘कहीं यह विज्ञापन सुदीप ने ही तो नहीं दिया? मजमून पढ़ कर तो यही लगता है. लेकिन वह तलाकशुदा कहां है? अभी तो उन के बीच तलाक हुआ ही नहीं है. हां, तलाक की बात 2-4 बार उठी जरूर है.

शादी के पश्चात हनीमून के दौरान सुदीप ने महसूस किया कि अंतरंग क्षणोें में भी वह उस की भावनाओं का मखौल उड़ा देती है और अपनी ही बात को सही ठहराती है. सुदीप को बुरा तो लगा लेकिन तब उस ने चुप रहना ही उचित समझा.

शादी के 2 महीने ही बीते होंगे, छुट्टी का दिन था. शाम के समय अचानक साक्षी बोली, ‘सुदीप अब हमें अपना अलग घर बसा लेना चाहिए, यहां मेरा दम घुटता है.’

सुदीप जैसे आसमान से नीचे गिरा, ‘यह क्या कह रही हो, साक्षी? अभी तो हमारी शादी को 2 महीने ही हुए हैं और फिर मैं इकलौता लड़का हूं. पिताजी नहीं हैं इसलिए मां की और कविता की जिम्मेदारी भी मुझ पर ही है. तुम ने कैसे सोच लिया कि हम अलग घर बसा लेंगे.’

साक्षी तुनक कर बोली, ‘क्या तुम्हारी जिम्मेदारी सिर्फ तुम्हारी मां और बहन हैं? मेरे प्रति तुम्हारी कोई जिम्मेदारी नहीं?’

‘तुम्हारे प्रति कौन सी जिम्मेदारी मैं नहीं निभा रहा? घर में कोई रोकटोक, प्रतिबंध नहीं. और क्या चाहिए तुम्हें?’ सुदीप भी कुछ आवेश में आ गया.

‘मुझे आजादी चाहिए, अपने ढंग से जीने की आजादी, मैं जो चाहूं पहनूं, खाऊं, करूं. मुझे किसी की भी, किसी तरह की टोकाटाकी पसंद नहीं.’

‘अभी भी तो तुम अपने ढंग से जी रही हो. सवेरे 9 बजे से पहले बिस्तर नहीं छोड़तीं फिर भी मां चुप रहती हैं, भले ही उन्हें बुरा लगता हो. मां को तुम से प्यार है. वह तुम्हें सुंदर कपड़े, आभूषण पहने देख कर अपनी चाह, लालसा पूरी करना चाहती हैं. रसोई के काम तुम्हें नहीं आते तो तुम्हें सिखा कर सुघड़ बनाना चाहती हैं. इस में नाराजगी की क्या बात है?’

‘बस, अपनी मां की तारीफों के कसीदे मत काढ़ो. मैं ने कह दिया सो कह दिया. मैं उस घर में असहज महसूस करती हूं, मुझे वहां नहीं रहना?’

‘चलो, आज खाना बाहर ही खा लेते हैं. इस विषय पर बाद में बात करेंगे,’ सुदीप ने बात खत्म करने के उद्देश्य से कहा.

‘बाद में क्यों? अभी क्यों नहीं? मुझे अभी जवाब चाहिए कि तुम्हें मेरे साथ रहना है या अपनी मां और बहन के  साथ?’

सुदीप सन्न रह गया. साक्षी के इस रूप की तो उस ने कल्पना भी नहीं की थी. फिर किसी तरह स्वयं को संयत कर के उस ने कहा, ‘ठीक है, घर चल कर बात करते हैं.’

‘मुझे नहीं जाना उस घर में,’ साक्षी ने अकड़ कर कहा. सुदीप ने उस का हाथ खींच कर गाड़़ी में बैठाया और गाड़ी स्टार्ट की.

‘तुम ने मुझ पर हाथ उठाया. यह देखो मेरी बांह पर नीले निशान छप गए हैं. मैं अभी अपने मम्मीपापा को फोन कर के बताती हूं.’

साक्षी के चीखने पर सुदीप हक्काबक्का रह गया. किसी तरह स्वयं पर नियंत्रण रख कर गाड़ी चलाता रहा.

घर पहुंचते ही साक्षी दनदनाती हुई अपने कमरे की ओर चल पड़ी. मां तथा कविता संशय से भर उठीं.

‘सुदीप बेटा, क्या बात है. साक्षी कुछ नाराज लग रही है?’ मां ने पूछा.

‘कुछ नहीं मां, छोटीमोटी बहसें तो चलती ही रहती हैं. आप लोग सो जाइए. हम बाहर से खाना खा कर आए हैं.’

साक्षी को समझाने की गरज से सुदीप ने कहा, ‘साक्षी, शादी के बाद लड़की को अपनी ससुराल में तालमेल बैठाना पड़ता है, तभी तो शादी को समझौता भी कहा जाता है. शादी के पहले की जिंदगी की तरह बेफिक्र, स्वच्छंद नहीं रहा जा सकता. पति, परिवार के सदस्यों के साथ मिल कर रहना ही अच्छा होता है. आपस में आदर, प्रेम, विश्वास हो तो संबंधों की डोर मजबूत बनती है. अब तुम बच्ची नहीं हो, परिपक्व हो, छोटीछोटी बातों पर बहस करना, रूठना ठीक नहीं…’

‘तुम्हारे उपदेश हो गए खत्म या अभी बाकी हैं? मैं सिर्फ एक बात जानती हूं, मुझे यहां इस घर में नहीं रहना. अगर तुम्हें मंजूर नहीं तो मैं मायके चली जाऊंगी. जब अलग घर लोगे तभी आऊंगी,’ साक्षी ने सपाट शब्दों में धमकी दे डाली.

अमावस की काली रात उस रोज और अधिक गहरी और लंबी हो गई थी. सुदीप को अपने जीवन में अंधेरे के आने की आहट सुनाई पड़ने लगी. किस से अपनी परेशानियां कहे? जब लोगों को पता लगेगा कि शादी के 2-3 महीनों में ही साक्षी सासननद को लाचार, अकेले छोड़ कर पति के साथ अलग रहना चाहती है तो कितनी छीछालेदर होगी.

सुदीप रात भर इन्हीं तनावों के सागर में गोते लगाता रहा. इस के बाद भी अनेक रातें इन्हीं तनावों के बीच गुजरती रहीं.

मां की अनुभवी आंखों से कब तक सुदीप आंखें चुराता. उस दिन साक्षी पड़ोस की किसी सहेली के यहां गई थी. मां ने पूछ ही लिया, ‘सुदीप बेटा, तुम दोनों के बीच कुछ गलत चल रहा है? मुझ से छिपाओगे तो समस्या कम नहीं होगी, हो सकता है मैं तुम्हारी मदद कर सकूं?’

सुदीप की आंखें नम हो आईं. मां के प्रेम, आश्वासन, ढाढ़स ने हिम्मत बंधाई तो उस ने सारी बातें कह डालीं. मां के पैरों तले जमीन खिसक गई. वह तो साक्षी को बेटी से भी अधिक प्रेम, स्नेह दे रही थीं और उस के दिल में उन के प्रति अनादर, नफरत की भावना. कहां चूक हो गई?

एक दिन मां ने दिल कड़ा कर के फैसला सुना दिया, ‘सुदीप, मैं ने इसी कालोनी में तुम्हारे लिए किराए का मकान देख लिया है. अगले हफ्ते तुम लोग वहां शिफ्ट हो जाओ.’ सुदीप अवाक् सा मां के उदास चेहरे को देखता रह गया. हां, साक्षी के चेहरे पर राहत के भाव स्पष्ट नजर आ रहे थे.

‘लेकिन मां, यहां आप और कविता अकेली कैसे रहेंगी?’ सुदीप का स्वर भर्रा गया.

‘हमारी फिक्र मत करो. हो सकता है कि अलग रह कर साक्षी खुश रहे तथा हमारे प्रति उस के दिल में प्यार, आदर, इज्जत की भावना बढ़े.’

विदाई के समय मां, कविता के साथसाथ सुदीप की भी रुलाई फूट पड़ी थी. साक्षी मूकदर्शक सी चुपचाप खड़ी थी. कदाचित परिवार के प्रगाढ़ संबंधों में दरार डालने की कोशिश की पहली सफलता पर वह मन ही मन पुलकित हो रही थी.

अलग घर बसाने के कुछ ही दिनों बाद साक्षी ने 2-3 महिला क्लबों की सदस्यता प्राप्त कर ली. आएदिन महिलाओं का जमघट उस के घर लगने लगा. गप्पबाजी, निंदा पुराण, खानेपीने में समय बीतने लगा. साक्षी यही तो चाहती थी.

उस दिन सुदीप मां और बहन से मिलने गया तो प्यार से मां ने खाने का आग्रह किया. वह टाल न सका. घर लौटा तो साक्षी ने तूफान खड़ा कर दिया, ‘मैं यहां तुम्हारा इंतजार करती भूखी बैठी हूं और तुम मां के घर मजे से पेट भर कर आ रहे हो. मुझे भी अब खाना नहीं खाना.’

सुदीप ने खुशामद कर के उसे खाना खिलाया और उस के जोर देने पर थोड़ा सा स्वयं भी खाया.

पति को बस में करने के नएनए तरीके आजमाने की जब उस ने कोशिश की तो सुदीप का माथा ठनका. इस तरह शर्तों पर तो जिंदगी नहीं जी जा सकती. आपस में विश्वास, समझ, प्रेम व सामंजस्य की भावना ही न हो तो संबंधों में प्रगाढ़ता कहां से आएगी? रिश्तों की मधुरता के लिए दोनों को प्रयास करने पड़ते हैं और साक्षी केवल उस पर हावी होने, अपनी जिद मनवाने तथा स्वयं को सही ठहराने के ही प्रयास कर रही है. यह सब कब तक चल पाएगा. इन्हीं विचारों के झंझावात में वह कुछ दिन उलझा रहा.

एक दिन अचानक खुशी की लहर उस के शरीर को रोमांचित कर गई जब साक्षी ने उसे बताया कि वह मां बनने वाली है. पल भर के लिए उस के प्रति सभी गिलेशिकवे वह भूल गया. साक्षी के प्रति अथाह प्रेम उस के मन में उमड़ पड़ा. उस के माथे पर प्रेम की मोहर अंकित करते हुए वह बोला, ‘थैंक्यू, साक्षी, मैं तुम्हारा आभारी हूं, तुम ने मुझे पिता बनने का गौरव दिलाया है. मैं आज बहुत खुश हूं. चलो, बाहर चलते हैं. लेट अस सेलीब्रेट.’

मां को जब यह खुशखबरी सुदीप ने सुनाई तो वह दौड़ी चली आईं. अपने अनुभवों की पोटली भी वह खोलती जा रही थीं, ‘साक्षी, वजन मत उठाना, भागदौड़ मत करना, ज्यादा मिर्चमसाले, गरम चीजें मत लेना…’ कह कर मां चली गईं.

एकांत के क्षणों में सुदीप सोचता, बच्चा होने के बाद साक्षी में सुधार आ जाएगा. बच्चे की सारसंभाल में वह व्यस्त हो जाएगी, सहेलियों के जमघट से भी छुटकारा मिल जाएगा.

प्रसवकाल नजदीक आने पर मां ने आग्रह किया कि साक्षी उन के पास रहे मगर साक्षी ने दोटूक जवाब दिया, ‘मुझे यहां नहीं रहना, मां के पास जाना है. मेरी मम्मी, मेरी व बच्चे की ज्यादा अच्छी देखभाल कर सकती हैं.’

हार कर उसे मां के घर भेजना ही पड़ा था सुदीप को.

3 माह के बेटे को ले कर साक्षी जब घर लौटी तो सब से पहले उस ने आया का इंतजाम किया. चूंकि उस का वजन भी काफी बढ़ गया था इसलिए हेल्थ सेंटर जाना भी शुरू कर दिया. उसे बच्चे को संभालने में खासी मशक्कत करनी पड़ती. दिन भर तो आया ही उस की जिम्मेदारी उठाती थी. कई दफा मुन्ना रोता रहता और वह बेफिक्र सोई रहती. एक दिन बातों ही बातों में सुदीप ने जब इस बारे में शिकायत कर दी तो साक्षी भड़क उठी, ‘हां, मुझ से नहीं संभलता बच्चा. शादी से पहले मैं कितनी आजाद थी, अपनी मर्जी से जीती थी. अब तो अपना होश ही नहीं है. कभी घर, कभी बच्चा, बंध गई  हूं मैं…’

सुदीप के पैरों तले जमीन खिसक गई, ‘साक्षी, यह क्या कह रही हो तुम? अरे, बच्चे के बिना तो नारी जीवन ही अधूरा है. यह तो तुम्हारे लिए बड़ी खुशी की बात है कि तुम्हें मां का गौरवशाली, ममता से भरा रूप प्राप्त हुआ है. हम खुशकिस्मत हैं वरना कई लोग तो औलाद के लिए सारी उम्र तरसते रह जाते हैं,’ सुदीप ने समझाने की गरज से कहा.

‘तुम आज भी उन्हीं दकियानूसी विचारों से भरे हो. दुनिया कहां से कहां पहुंच गई है. अभी भी तुम कुएं के मेढक बने हुए हो. घर, परिवार, बच्चे, बस इस के आगे कुछ नहीं.’

साक्षी के कटाक्ष से सुदीप भीतर तक आहत हो उठा, ‘साक्षी, जबान को लगाम दो. तुम हद से बढ़ती जा रही हो.’

‘मुझे भी तुम्हारी रोजरोज की झिकझिक में कोई दिलचस्पी नहीं. मुझे तुम्हारे साथ नहीं रहना, तलाक चाहिए मुझे…’

साक्षी के इतना कहते ही सुदीप की आंखों के आगे अंधेरा छा गया, ‘क्या कहा तुम ने, तलाक चाहिए? तुम्हारा दिमाग तो ठीक है?’

‘बिलकुल ठीक है. मैं अपने मम्मीपापा के पास रहूंगी. वे मुझे किसी काम के लिए नहीं टोकते. मुझे अपने ढंग से जीने देते हैं. मेरी खुशी में ही वे खुश रहते हैं…’

उन के संबंधों में दरार आ चुकी थी. मुन्ने के माध्यम से यह दरार कभी कम अवश्य हो जाती लेकिन पहले की तरह प्रेम, ऊष्मा, आकर्षण नहीं रहा.

तनावों के बीच साल भर का समय बीत गया. इस बीच साक्षी 2-3 बार तलाक की धमकी दे चुकी थी. सुदीप तनमन से थकने लगा था. आफिस में काम करते वक्त भी वह तनावग्रस्त रहने लगा.

मुन्ना रोए जा रहा था और साक्षी फोन पर गपशप में लगी थी. सुदीप से रहा नहीं गया. उस का आक्रोश फट पड़ा, ‘तुम से एक बच्चा भी नहीं संभलता? सारा दिन घर रहती हो, काम के लिए नौकर लगे हैं. आखिर तुम चाहती क्या हो?’

‘तुम से छुटकारा…’ साक्षी चीखी तो सुदीप भी आवेश में हो कर बोला, ‘ठीक है, जाओ, शौक से रह लो अपने मांबाप के घर.’

साक्षी ने फौरन अटैची में अपने और मुन्ने के कपड़े डाले.

‘इसे कहां लिए जा रही हो. यह यहीं रहेगा, मेरी मां के पास. तुम से नहीं संभलता न…’

सुदीप मुन्ने को लेने आगे बढ़ा.

‘यह मेरे पास रहेगा. मेरे मम्मीपापा इस की बेहतर परवरिश करेंगे…’ कह कर साक्षी मुन्ने को ले कर मायके चली गई.

मां से सारी घटना कहते हुए सुदीप की रुलाई फूट पड़ी थी. पत्नी के कारण मां व बहन के प्रति अपने फर्ज ठीक से न निभाने के कारण वह पहले ही अपराधबोध से ग्रस्त था. अब तो साक्षी के व्यवहार ने उन की इज्जत, मानमर्यादा पर भी बट्टा लगा दिया था.

सदा की तरह साक्षी के मातापिता ने उस की हरकत को हलके ढंग से लिया था. साक्षी के अनुसार सुदीप उस के तथा मुन्ना के बगैर नहीं रह सकता था अत: वह स्वयं आ कर उसे मना कर ले जाएगा. लेकिन जब एकएक दिन कर के 4-5 महीने बीत गए, सुदीप नहीं आया तो साक्षी के साथसाथ उस के मातापिता का भी माथा ठनका. कहीं सुदीप हकीकत में तलाक को गंभीरता से तो नहीं लेने लगा? हालांकि साक्षी तलाक नहीं चाहती थी. जैसेजैसे समय बीतता जा रहा था साक्षी का तनाव भी बढ़ता जा रहा था. अब उसे सुदीप का प्यार, मनुहार, उस की जिद के आगे झुकना, उस के कारण मांबहन से अलग हो कर रहना, रातों को उठ कर मुन्ने को संभालना, उस की ज्यादतियां बरदाश्त करना, समयसमय पर उस के लिए उपहार लाना, उसे खुश रखने का हरसंभव प्रयास करना बेइंतहा याद आने लगा था. सोच कर उसे कंपकंपी सी छूटने लगी. नहीं, वह सुदीप के बिना नहीं रह सकती. पर यह सब किस से कहे, कैसे कहे? उस का अहं भी तो आडे़ आ रहा था.

आज विज्ञापन पढ़ कर तो उस की सिट्टीपिट्टी गुम हो गई. तभी याद आया, सुलभा के मामा उसी अखबार में काम करते हैं. पता लगवाया तो उस का शक सही था, विज्ञापन सुदीप ने ही दिया था. अब क्या किया जाए? रात भर साक्षी विचारों के घेरे में उलझी रही. सुबह तक उस ने निर्णय ले लिया था. पति को फोन मिलाया, ‘‘सुदीप, मैं वापस आ रही हूं तुम्हारे पास…’’

मांबाप ने सुना तो उन्होंने भी राहत की सांस ली. कुछ समय से वे भी अपराधबोध महसूस कर रहे थे.

सुदीप के आगोश में साक्षी सुबक रही थी, ‘‘सुदीप, मुझे माफ कर दो…अपनी हरकतों के लिए मैं शर्मिंदा हूं… क्या सचमुच तुम दूसरी शादी करने वाले थे…’’

‘‘पगली, बस, इतना ही मुझे समझ सकीं? काफी सोचविचार के पश्चात मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि एक करारा झटका ही तुम्हारा विवेक जगा सकता है, तुम्हारी लापरवाही, अपरिपक्वता को गंभीरता में बदल सकता है, अपनी गलती का एहसास करा सकता है. मैं जानता था तुम्हें वैवाहिक विज्ञापन पढ़ने का बहुत शौक है. बस, इसी का फायदा उठा कर मैं ने यह चाल चली. अगर इस में सफल न होता तो शायद सचमुच ही…’’

‘‘बस, आगे कुछ मत कहना,’’ साक्षी ने सुदीप के मुंह पर हाथ रख दिया, ‘‘सुबह का भूला शाम से पहले घर लौट आयाहै.’’

सुदीप ने उसे आलिंगनबद्ध कर आंखें बंद कर लीं. मानो पिछले 3 वर्ष के समय को दुस्वप्न की तरह भूल जाने का प्रयास कर रहा हो.

हमारा रिलेशनशिप कभी अच्छे से चला ही नहीं, मैं फिजिकली नहीं इमोशनली अटैच्ड होना चाहती हूं, क्या करूं?

सवाल…

मैं 21 साल की एक मिडिल क्लास फैमिली की लड़की हूं. मैं 3 साल से अपने बौयफ्रैंड के साथ रिलेशनशिप में हूं. पर हमारा रिलेशनशिप कभी अच्छे से चला ही नहीं. हम थोड़ा भी शारीरिक संबंध बनाते तो उस के 10 दिनों तक तो सब ठीक रहता है पर उस के बाद लड़ाइयां शुरू हो जातीं. वह कई दिन तक मेरे मैसेज का रिप्लाई तक नहीं करता, महीनों तक मिलता नहीं और जब भी मिलने की बात करता है तो सैक्स के लिए उतावला होता है. मैं फिजिकली नहीं, इमोशनली अटैच्ड होना चाहती हूं. मैं क्या करूं?

जवाब…

आप की बातों से साफ जाहिर है कि आप का बौयफ्रैंड आप के साथ केवल शारीरिक संबंध बनाना चाहता है. यह प्रेम नहीं है. प्रेम तो एक-दूसरे का ख्याल रखने, बातें करने और एक-दूसरे को समझने को कहते हैं. आप अपने बौयफ्रैंड से प्रेम करती हैं लेकिन वह आप को डिजर्व नहीं करता. वह केवल आप की खूबसूरती और अपने आनंद के लिए आप के साथ है. इस रिश्ते को जल्द से जल्द खत्म कर देना ही सही है.

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सवाल…

मैं 12वीं में पढ़ती हूं. हमारे घर में ऊपर की मंजिल पर एक पति-पत्नी रहते हैं जो आए दिन झगड़ते रहते हैं. उन के चीखने-चिल्लाने की आवाजें इतनी तेज होती हैं कि मैं पढ़ना तो दूर सहम जाती हूं. माता-पिता से बात करती हूं तो वे किराए की दुहाई दे कर मुझे चुप रहने के लिए कहते हैं. इस से  मेरा पढ़ाई में मन नहीं लगता है. मैं क्या करूं?

जवाब…

आप अपने माता-पिता को समझाएं कि किराए से ज्यादा अहम आप की पढ़ाई व कैरियर है. अगर आप लोग किराएदार हैं तो मकान बदल लें और खुद मकान मालिक?हैं तो दूसरा किराएदार रख लें. अगर कलह के चलते आप का रिजल्ट बिगड़ा तो उस की जिम्मेदारी  लेने कोई आगे नहीं आएगा. वैसे भी कलह के दूसरे भी नुकसान होते हैं, इसलिए झगड़ालू पड़ोसियों से दूर चले जाना ही बेहतर है?.

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