बहके कदमों का खूनी अंजाम

राजस्थान के भरतपुर जिले के चिकसाना थाना क्षेत्र के गांव नौह निवासी हरिप्रसाद शर्मा के शादीशुदा बेटे पवन शर्मा के रहस्यमय परिस्थितियों में घर से देर रात गायब हो जाने पर परिवार ही नहीं, मोहल्ले के लोग भी अचंभित हो गए.

गुमशुदा पवन शर्मा के घर वालों को उस की पत्नी टीना ने बताया कि देर रात किसी का फोन आया था, जिस के बाद कामधंधे के लिए जाने की बात कह कर वह कहीं चले गए. जाते समय उन्होंने बताया था कि थोड़ी देर में आ जाएंगे.

टीना की बात पर यकीन कर के घर वाले कुछ नहीं बोले. हालांकि आधी रात को कामधंधे के लिए कहीं चले जाने की बात उन के गले से नहीं उतरी, पर और कोई चारा भी नहीं था. लेकिन 4-5 दिन गुजर जाने के बाद पवन वापस नहीं आया तो पिता हरिप्रसाद शर्मा थाने में बेटे की गुमशुदगी दर्ज कराने के लिए जाने लगे.

इस पर पहले तो टीना ने उन्हें यह कह कर रोकने की कोशिश की कि वो कामधंधे के लिए गए हैं, गुमशुदगी दर्ज कराई तो पुलिस उलटे हमें ही परेशान कर सकती है. फिर बाद में कुछ सोच कर उस ने ससुर के साथ चिकसाना थाने जा कर पति की गुमशुदगी दर्ज करवा दी.

पुलिस ने हरिप्रसाद से पवन का हुलिया, पहने गए कपड़ों सहित अन्य जरूरी जानकारी ले कर गुमशुदगी दर्ज कर ली और अपने स्तर से पवन को तलाशना शुरू कर दिया.

लेकिन हफ्ते-2 हफ्ते की बात छोडि़ए, 4-5 महीने बीत जाने के बाद भी पवन की खबर नहीं मिली, जिस से उस के घर वाले निराश हो चुके थे. जबकि बहू टीना अपने में मस्त रहती.

बच्चों को उस ने पहले ही पवन के दादादादी के पास बेहतर पढ़ाई कराने के बहाने भेज दिया था, इसलिए उस पर कोई जिम्मेदारी तो थी नहीं. वह आजादी से मनमानी कर रही थी. बस एक काम वह जरूर कर रही थी. वह यह कि सभी व्रत उपवास और धार्मिक कार्यों में घर वालों के साथ जरूर शामिल होती थी.

पवन की गुमशुदगी के बाद घर वालों की नजर में टीना एक तरह से दुखियारी बन चुकी थी, इसलिए हर कोई उस से सहानुभूति रखता था.

अक्तूबर 2022 महीने की 18 तारीख थी. हरिप्रसाद शर्मा को नींद नहीं आ रही थी. जवान बेटे के असमय वियोग ने उन्हें उम्र से कहीं ज्यादा बूढ़ा बना दिया था. जीवन बोझ लगने लगा था. बस बेटे के वापस आने की उम्मीद में ही जिंदा थे.

देर रात हरिप्रसाद शर्मा पानी पीने के लिए उठे तो बहू के कमरे से किसी मर्द की आवाज सुन उन्हें लगा कि शायद उन की मुराद पूरी हो गई है और बेटा वापस आ गया है. कौतूहलवश उन के कदम बहू के कमरे की तरफ बढ़ चले. लेकिन थोड़ी दूर जा कर ही उन्हें रुकना पड़ा.

कमरे के अंदर बेटा तो नहीं था, बल्कि पड़ोसी भोगेंद्र उर्फ भोला उन की बहू के साथ आपत्तिजनक हालत में था. बहू टीना का हाथ पकड़ कर वह कह रहा था, ‘‘जानू, किस्मत अच्छी थी जो अपना काम भी हो गया और किसी को पता भी नहीं चला. मस्त रहो तुम, अब अपन ऐश करेंगे.’’

यह सुन कर अपमान, शर्म और दुख से आहत हो हरिप्रसाद ने बहू के कमरे को बाहर से ताला लगा दिया और थाने में सूचना देने चल पड़े. लेकिन जब तक पुलिस पहुंचती भोगेंद्र उर्फ भोला ने फोन कर अपने पिता दिनेश चंद और भाई को बुला लिया.

उन दोनों ने हरिप्रसाद के घर वालों से लड़झगड़ कर कमरे का ताला तोड़ कर भोगेंद्र को वहां से निकाल लिया और अपने साथ ले गए. भोगेंद्र उसी रात को गांव से दिल्ली चला गया.

हरिप्रसाद शर्मा ने 20 नवंबर, 2022 को चिकसाना थाने पहुंच कर लिखित शिकायत कर दी. उन्होंने अपनी बहू टीना और उस के प्रेमी भोगेंद्र द्वारा अपने बेटे पवन की हत्या अथवा उसे गायब करने का आरोप लगाया.

एसएचओ विनोद कुमार मीणा ने मामले की गंभीरता देखते हुए हत्या के ऐंगल से मामले की जांच शुरू की और भरतपुर के एसपी श्याम सिंह के आदेश तथा एएसपी बृजेश ज्योति उपाध्याय (आईपीएस) के निर्देशन में पुलिस टीम गठित की गई, जिस में एएसआई बलबीर सिंह, महेंद्र सिंह, हेडकांस्टेबल कैलाश चंद और सिपाही पुष्पेद्र सिंह, उदयवीर सिंह तथा योगेंद्र सिंह को शामिल किया गया.

पुलिस टीम ने सब से पहले दिल्ली से गांव लौटे आरोपी भोगेंद्र और टीना को हिरासत में ले कर उन से मनोवैज्ञानिक ढंग से पूछताछ की. इस के साथ ही साक्ष्य एकत्रित किए.

पुलिस पूछताछ से घबरा कर टीना और भोगेंद्र ने हत्या को अंजाम देना कुबूल कर लिया, जिस के बाद दोनों को गिरफ्तार कर लिया गया. आरोपियों के कुबूलनामे के बाद पवन की हत्या की जो कहानी उजागर हुई, वह इस प्रकार निकली—

राजस्थान और उत्तर प्रदेश की सरहद पर बसा एक बड़ा शहर है भरतपुर, जिसे उत्तर प्रदेश के लोग राजस्थान का प्रवेश द्वार भी कहते हैं. इसी भरतपुर जिले के चिकसाना थाना क्षेत्र गांव नौह में ब्राह्मणों के कई परिवार रहते हैं.

इन में से एक परिवार है हरिप्रसाद शर्मा का. इन के बेटे पवन शर्मा की शादी की उम्र निकलती जा रही थी. उस के योग्य कोई रिश्ता नहीं मिल पाने से मातापिता और रिश्तेदार चिंता में रहते थे.

तभी पवन के लिए उत्तर प्रदेश के महानगर कानपुर से टीना नाम की लड़की का रिश्ता आया. फिर दोनों ओर से बातचीत हो जाने पर यह रिश्ता तय हो गया और 2015 में पवन की शादी टीना के साथ हो गई.

महानगर की रहने वाली खुले स्वभाव की टीना को गांव में स्थित ससुराल आ कर थोड़ी परेशानी हुई, लेकिन भरतपुर शहर गांव के नजदीक होने के कारण वह धीरेधीरे वहां के रंग में रचबस गई. हंसीखुशी के साथ पतिपत्नी का समय बीतने लगा और 5 साल में टीना 2 बच्चों की मां भी बन गई.

बच्चे बड़े हुए तो दंपति ने उन्हें उन की अच्छी पढ़ाई के लिए थोड़ी दूर स्थित दादादादी के पास छोड़ दिया. टीना और पवन पिता के साथ रहने लगे. पवन और टीना की उम्र में बड़ा अंतर था. जहां टीना 23 की थी वहीं पवन 37 साल का यानी उन की उम्र में 14 साल का अंतर था.

उम्र का ये बड़ा अंतर शुरू में तो पता नहीं चला, लेकिन वक्त गुजरने के साथ ही दांपत्य जीवन में यह अंतर अपना असर दिखाने लगा. जहां टीना हिरनी की तरह कुलांचे भर कर दौड़ना चाहती थी तो वहीं 2 बच्चों का बाप बनने के बाद पवन धीरगंभीर हो गया था और कामधंधे को ले कर ज्यादा समय गुजारने लगा था.

पति द्वारा अपनी उपेक्षा से आहत टीना ने इसी दौरान करीब 2 साल पहले ब्राह्मण परिवार के हमउम्र पड़ोसी युवक भोगेंद्र उर्फ भोला से जानपहचान बढ़ा ली, जो बाद में अवैध संबंधों में बदलती गई.

27 वर्षीय भोगेंद्र दिल्ली की किसी प्राइवेट फर्म में नौकरी करता था और गांव में घर होने के कारण समयसमय पर आताजाता रहता था. जब से टीना से उस की आंखें चार हुईं, भोगेंद्र टीना के आकर्षण में फंस कर उस के आसपास मंडराने लगा और दोनों का प्रेम परवान चढ़तेचढ़ते अनैतिकता की हदें पार कर गया.

पवन को भोला का बारबार उस के घर आना अच्छा नहीं लगता था, लेकिन 2 बच्चों की मां बन चुकी पत्नी पर वह शक नहीं करना चाहता था, इसलिए देवरभाभी का रिश्ता मान कर चुप रह जाता था, जिस का बेजा फायदा उठा कर टीना और भोगेंद्र उर्फ भोला मर्यादा की सीमाएं लांघ गए थे.

मई महीने की एक रात थी, जब थकान के कारण पवन जल्दी घर आ कर सो गया था. देर रात उस की नींद खुली तो अपनी पत्नी को भोगेंद्र के साथ हमबिस्तर देख सन्न रह गया.

फिर परिवार की बदनामी होने के चलते दोनों को कड़ी फटकार लगा कर उस ने मामला दबा दिया, लेकिन वासना की आग में जल रहे टीना और भोगेंद्र ने अपने रास्ते के कांटे पवन को ठिकाने लगाने का मन बना लिया था. वे मौके की तलाश में रहने लगे.

तयशुदा साजिश के अनुसार 29 मई, 2022 की रात को टीना ने फोन कर दिल्ली से भोगेंद्र को गांव बुलाया तो वह अपने दोस्त उत्तर प्रदेश के एटा जिले के रहने वाले दीप सिंह के साथ रात साढ़े 12 बजे गांव पहुंचा और दीप सिंह को घर के बाहर बाइक पर छोड़ कर खुद टीना से मिलने घर में घुस गया.

वह बेखौफ हो कर उस से रोमांस करने लगा, तभी पवन की नींद खुल गई और अपनी पत्नी को गैरमर्द की बाहों में देख अपना आपा खो बैठा. वह भोगेंद्र उर्फ भोला से भिड़ गया. लेकिन कदकाठी से मजबूत भोगेंद्र ने नींद से जागे पवन का मुंह दबोच कर उसे काबू में कर लिया और अपने साथी दीप सिंह को बुला कर उस की मदद से पवन की रस्सी से गला घोट कर हत्या कर के ठिकाने लगा दिया.

रात ढलने वाली थी, इसलिए रजाई के कवर में लाश लपेट कर बोरे में भर कर दोनों दोस्तों ने वह बैड के अंदर बने बौक्स में रख दी. उन्होंने सोचा कि मौका देख कर नहर में फेंक देंगे. फिर दोनों सुबह होने से पहले बाइक से दिल्ली चले गए. अगले दिन वट सावित्री व्रत आया, यह व्रत सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र और सलामती के लिए रखती हैं.

टीना ने भी व्रत पूजा की और बाद में उसी बैड पर बैठ कर खीरपूरी खाई, जिस के अंदर बौक्स में पति की लाश रखी गई थी. इत्मीनान से फोन पर किसी से देर तक बातचीत करने के बाद वह सो गई.

एकदो दिन से ज्यादा लाश को घर में नहीं रखा जा सकता था, क्योंकि गरमी के दिन थे. बदबू फैल कर हत्या का राज फाश कर सकती थी. लिहाजा वापस भोगेंद्र अपने दोस्त दीप सिंह के साथ गांव नौह पहुंचा. दोनों ने बाइक से गांव से 2 किलोमीटर दूर स्थित गिरिराज नहर में लाश बड़े पत्थर से बांध फेंक दी. इस के बाद वे दोनों वापस दिल्ली लौट गए.

इस बीच रोनेधोने के साथ ही टीना ने एकदो दिन खानापीना छोड़ कर घर वालों को जता दिया कि वह पति के लापता हो जाने से बेहद दुखी है. साथ ही गुमशुदगी दर्ज होने के बाद कुछ दिनों तक शातिरदिमाग टीना और भोगेंद्र ने मोबाइल से बात करनी बंद कर दी, ताकि किसी को उन शक न हो. इसी बीच टीना अपने पीहर वालों को बुला कर उन के साथ कानपुर चली गई.

वापस भरतपुर आने के बाद टीना घर वालों और पुलिस की गतिविधियों के समाचार दूसरे फोन से प्रेमी भोगेंद्र को दे कर सचेत करती रही. खास बात यह रही कि गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज होने के बाद पुलिस और घर वाले पवन को तलाशते रहे और भोगेंद्र तथा टीना वापस मिलने लगे और उन की नजदीकियां बढ़ती गईं.

2 बच्चों की मां टीना और भोगेंद्र का प्रेम धीरेधीरे पागलपन की हद तक पहुंच चुका था. दोनों को एकदूसरे से मिले बिना चैन नहीं था, इसलिए दोनों देर रात को उस वक्त चोरीछिपे मिल लेते थे. जब दुनिया वाले सो रहे होते.

दीपावली से पहले महिलाओं का सब से महत्त्वपूर्ण व्रत करवाचौथ आया. तब भी टीना ने पति की लंबी उम्र और सलामती के लिए वह सावित्री का व्रत रखा. उस ने नई साड़ी पहन, शृंगार कर के दूसरी औरतों की तरह करवाचौथ की कहानी सुन कर चंद्रमा की पूजा आरती भी की. किसी को शक तक नहीं होने दिया कि गुमशुदा पवन शर्मा के साथ अनहोनी हो चुकी है.

लेकिन 16 अक्तूबर, 2022 की रात को हरिप्रसाद को बहू की हकीकत पता लग गई. भोगेंद्र उर्फ भोला और टीना की निशानदेही पर पुलिस ने मृतक के कमरे में उस के बैड से खून से सना रजाई का कवर, नायलौन की रस्सी के अतिरिक्त हत्याकांड में प्रयुक्त बाइक बरामद कर ली.

अभियुक्त भोगेंद्र को रिमांड पर ले कर पुलिस उसे उस जगह ले गई, जहां उस ने पवन की लाश फेंकी थी. गोताखोरों की मदद से नहर के गंदे पानी से मृतक का करीब 6 महीने पुराना शव जो करीबकरीब नष्ट हो चुका था. उस की हड्डियां और वह बड़ा पत्थर बरामद कर जब्त कर लिया, जिस से बांध कर शव फेंका था.

साथ ही नहर से मिली मृतक पवन की पैंट शर्ट की जेबों से पवन तथा टीना के आधार कार्ड जन आधार कार्ड भी बरामद कर सबूत के लिए जब्त कर लिए और हत्याकांड के बाद फरार हो गए भोगेंद्र के साथी दीप सिंह निवासी एटा (उत्तर प्रदेश) को तलाशना शुरू किया.

पुलिस टीम ने उसे भी जल्दी गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया. साथ ही 21 नवंबर से 4 दिन के पुलिस रिमांड पर चल रहे भोगेंद्र उर्फ भोला को भी रिमांड अवधि पूर्ण होने तथा सभी वांछित साक्ष्य बरामद कर लेने के बाद 24 नवंबर, 2022 को अदालत में पेश किया गया, जहां से कोर्ट के आदेश पर दोनों आरोपियों को न्यायिक अभिरक्षा में भेज दिया गया.

मृतक की पत्नी टीना को पहले ही गिरफ्तार कर कोर्ट के आदेश पर जेल भेजा जा चुका था. कथा लिखे जाने तक पवन शर्मा हत्याकांड के सभी तीनों आरोपियों को जेल भेज दिया गया था.

हालांकि मामला न्यायालय में विचाराधीन है, लेकिन दुखद बात यह रही कि टीना की नासमझी या यूं कहिए कि टीवी के क्राइम पैट्रोल जैसे शो लगातार देखने के कारण उपजी शातिराना हरकतों की वजह से उस की खुशहाल गृहस्थी तो उजड़ी ही, साथ ही 2 निर्दोष मासूम बच्चे भी अनाथ हो गए

उदास क्षितिज की नीलिमा: आभा को बहू नीलिमा से क्या दिक्कत थी- भाग 3

अच्छा पूजापाठ की बात कह कर मजाक बनाया जा रहा. वह दुखी हो जाता मन ही मन.

उस की हंसी उड़ती और वह अलसाए कदमों को खींचते हुए उन से दूर चला जाता, हमेशा एकाकी.

पहाड़ी मंदिर पर दर्शनार्थी का पूजा निबटा कर अभी नल में हाथमुंह धोते हुए वह दुनियाभर की इन्हीं बातों पर अपना सिर पीट रहा था कि नीलिमा ने उसे आवाज दी- “पंडित जी.”

“क्या है?” पुकारने वाले को बिना देखे ही वह चिड़चिड़ा कर बोल पड़ा था. मन ही मन जिस बात पर खफा था, दुखी था, उसी शब्द के कानों में पड़ते ही उस ने पलट कर जवाब दिया. मगर जैसे ही उस ने बोलने वाले की ओर देखा, खूबसूरत नीलिमा को पा कर सकपका गया. अभी तक वह सास के साथ ही ऊपर आती थी, इसलिए क्षितिज ने कभी उस पर गौर नहीं किया था.

आज पीली सिफोन की साड़ी में सोने सा उस का उज्ज्वल रंग सुनहरे सूरज सा चमक रहा था. 5.4 फुट की हाइट, लंबी, भींगी, एक अलसायी सी चोटी, ललाट पर गोल लाल बिंदी और कलाई में पीली चूड़ियों की धूम थी.

क्षितिज ने शांति से निहारा, वह नल पर अपना पैर धोती रही. फिर क्षितिज की ओर मुखातिब हुई, “आप को देर तो न हो जाएगी? पूजा कर देंगे?”

“हां, क्यों नहीं? देर किस बात की?”

“आप को कचहरी जाना है न.”

“हां, आप को किस ने बताया?”

“आप के पापा ने मेरी सासुमां को बताया था, आप वहां जूनियर वकील हैं.”

“चलिए, पूजा कर देता हूं.”

पूजा की थाली ले  कर मंदिर के गर्भगृह तक चलते हुए नीलिमा पिछड़ जाती है तो क्षितिज मुड़ कर देखता है. नीलिमा लंगड़ा कर चल रही थी.

“अरे, क्या हुआ आप को?” क्षितिज ने चौंकते हुए पूछा. नीलिमा ने घटना बताई. क्षितिज ने पूजा की थाली उस के हाथ से ले ली और उसे सहारा दे कर मंदिर के गर्भगृह तक ले आया.

पूजा करते हुए उसे बारबार नीलिमा के बारे में जानने की इच्छा होती रही. पूजा के बाद किसी  तरह क्षितिज ने नाम से बातचीत शुरू की.

“अगर बुरा न मानें तो आप का नाम जान सकता हूं?”

“नाम तो नीलिमा है, लेकिन बुरा क्यों मानने लगी?”

“आप शादीशुदा हैं न, शादीशुदा स्त्री में दिलचस्पी लेना…”

“देखिए, शादीशुदा स्त्री कोई अजूबा नहीं होती, वह शादी के बाद अपने सारे अधिकार खो नहीं देती.”

“वह तो ठीक है लेकिन पति को पसंद नहीं होता न.”

“पत्नी को भी पति की ढेरों बातें पसंद नहीं होतीं, क्या पति, पत्नी के अनुसार चलता है?

और मेरी तो बात ही अलग है. पति ही पसंद नहीं, तो पति की पसंद पर जाऊं ही क्यों?”

क्षितिज अचरज से उसे देख रहा था, बोला, “काश, आप मेरी दोस्त हो पातीं. आप में तो गजब का आत्मविश्वास है.”

“दोस्त होने में दिक्कत क्या है. मैं कल से आधा घंटा पहले आ जाया करूंगी, फिर हमें बात करने को कुछ वक्त मिल जाया करेगा. दोस्ती तो एकदूसरे को अच्छी तरह जानने से ही होगी न.”

दोनों ने अब अपने लिए समय निकालना शुरू किया.

नीलिमा का खिला रूप, धूपधूप सा आत्मविश्वास, जिंदगी को तसल्ली से जीने की इच्छा… उदास क्षितिज में भी आसमानी रंग भरने लगे, उस की झिझक जाती रही.

नीलिमा और क्षितिज मंदिर के पीछे पहाड़ पर बैठ कुछ देर बातें करते.

“जानते हो क्षितिज, मैं शादी से पहले की जिंदगी को खूब याद करती हूं.”

“क्यों, ऐसा क्या था पहले, जो अब नहीं है?”

“कालेज, घूमनाफिरना, अपनी पसंद का खाना, पहनना, अपने शौक…सबकुछ. ग्रेजुएशन करते हुए मैं ने केक बनाना सीखा. शादी से पहले तक मेरा बिसनैज अच्छा चल निकला था.”

“फिर शादी की जल्दी क्या थी?”

“जल्दी मुझे नहीं, मेरे बड़े भाई व भाभी को थी.

“बचपन में पापा की मौत के बाद मां ने बड़ी मुश्किल से हमें संभाला और बड़े भाई, जो मुझ से 5 साल बड़े हैं, मात्र 19 साल के होते ही पापा के औफिस में नौकरी में लगा दिए गए. नौकरी लग गई, तो 22 साल में 20 साल की लड़की से मां ने उन का विवाह भी करवा दिया. इसलिए जैसे ही मेरी स्नातक पूरी हुई, बड़े भाईभाभी ने मेरी शादी का कर्तव्य निभा कर छुट्टी पा जाने में ही अपनी भलाई समझी.

“जब भाई की शादी 22 साल में हुई तो मां के पास भी चारा नहीं था कि वे मेरी शादी रोक लें और वह भी तब जब अच्छाभला लड़का मिल गया था.  इकलौता लड़का, अपना अच्छा बड़ा घर, सरकारी नौकरी और सास के सिवा कोई जिम्मेदारी भी न थी. अब अलग बात है कि यह अकेली सास सौ बोलने वाली औरतों के बराबर है.

“अभी तो यह हाल है कि हमारा जिंदा रहना ही पूजापाठ और कर्मकांड के लिए रह गया है.

आएदिन तीनचार घंटे पूजा की तैयारी में लगाओ,  पूजा की सामग्री के पीछे पैसा और समय बहा, अपने शौक और जरूरी कामों को मारो.  इस के बाद भी सास की सहेली मंडली के नाज उठा कर बदनामी भी सहो. एक और बड़ी मुश्किल मेरी ड्रैस को ले कर है. मैं वैस्टर्न ड्रैस की शौकीन हूं, लेकिन यहां तो बहू का ऐसा लेबल लग गया है कि साड़ी के सिवा कुछ पहन ही नहीं सकती.”

“तुम्हारी जिंदगी तो बिलकुल मेरी जैसी है नीलू.”

नीलिमा ने देखा क्षितिज की ओर. आसमान की नीलिमा से क्षितिज के संधिस्थल की दूरी मिट चुकी थी. नीलिमा धीरे से उठ कर क्षितिज के बिलकुल पास बैठ गई. दोनों के चेहरे पास थे, सांसें गहरी हो चली थीं. क्षितिज ने उम्रभर की शिद्दत जुटा कर नीलू के होंठों पर अपने होंठ रख दिए. नीलू की आंखें बंद हो गईं.

क्षितिज ने हटते हुए कहा- “नीलू, मुझे माफ करो. प्यार पर जोर न चल सका.”

“अब कोई माफी नहीं होगी.”

क्षितिज का चेहरा पीला पड़ने लगा. नीलिमा ने उसे गले से लगा लिया और उस के होंठों पर भरपूर चुंबन रख दिया.

“नीलू…”

“अब पाप की धारणा में मत बहना. अगर पाप ही कहना है तो मेरा निरूपम से रिश्ता पाप है, वह रिश्ता जहां सिर्फ शरीर के सुख के लिए एक स्त्री को रौंदा जाता है. अगर पाप है तो वही है. प्रेम तो सब से शुद्ध है, शांत है, आनंद है.”

“नीलू,  पापा बता रहे थे तुम्हारा मायका टाटी सिलवे है, सुवर्ण रेखा नदी से आगे. क्यों न मायके जाओ और उधर मैं सुवर्ण रेखा के तट पर तुम से मिलूं?”

“जाने नहीं देते और घर में चाहता भी कौन है कि मैं वहां जाऊं. लेकिन हम सुवर्ण रेखा पर मिलेंगे जरूर. तुम बता देना, मैं आ जाऊंगी.”

और इस तरह दोनों का सफर शुरू हुआ.

नीलिमा जब भी आती, अपने पसंदीदा वैस्टर्न ड्रैस में. और क्षितिज को भी मिल गई थी अपने पसंद से जीनेपहनने की आजादी.

वैसे यह सबकुछ उन्हें मिला था कुछ कीमत चुका कर ही.

कभी झूठ, कभी बहाने- नीलिमा और क्षितिज  को बड़ी मुश्किलों से  निभानी पड़ रही थी यह दोस्ती.

लेकिन जब 2 दिलों के दर्द एक थे, उदासियां एक थीं, सपने और जिंदगी एक सी थी, तो दोस्ती की सारी बाधाओं को तो पार पाना ही था.

नीलिमा और क्षितिज आज के युवा थे, उन्हें यह कतई पसंद नहीं था कि उन के जीवन और इच्छा की डोर किसी और के हाथों में बंधी रहे.

जब दोनों ने कुछ अपनी कही, कुछ उन की सुनी, लगा उन का दर्द उन की असुविधाएं अलग कहां.

नीलिमा ने उस दिन नदी के किनारे बैठ क्षितिज से पूछा- “तो तुम्हारा आखिरी फैसला यही है?”

“हां, बस यही. तुम न मत कहना.”

नीलिमा और क्षितिज वापस घर आ गए थे. वे बेचैन थे. क्या यह फैसला सही था? क्षितिज ने  इस बारे में रामेश्वर सर से बात की. उन्होंने भी माना, इस तरह चोरीछिपे मिलना सही नहीं. अब ज्यादा दिन ऐसे ही बीते तो निश्चित ही परिवार व समाज के हाथों उन दोनों की बुरी गत होगी.

रामेश्वर सर ने क्षितिज को सारी बातें समझा दीं.

महीनेभर नीलिमा ने जैसेतैसे बिताया.

एक दिन रामेश्वर सर नीलिमा की ससुराल आए. उन लोगों से कहा कि वे नीलिमा के पापा के दोस्त हैं, उन के घरवालों ने नीलिमा को खाने पर बुलाया है, साथ ले जाने आए हैं, शाम तक नीलिमा को वापस भेज देंगे. नीलिमा सारी बातें जानती थी, वह रामेश्वर के साथ चली आई.

शाम को नीलिमा के बदले आया नीलिमा के निरूपम से तलाक के कागज. वे अवाक रह गए. ससुराल और मायके में हड़कंप मच गया.

नीलिमा ने साफ कर दिया कि वह बालिग है, जिंदगीभर मरमर कर नहीं जिएगी.

सारा कुसूर, सारा दोष जब लड़की का ही है और उसे शांति से, अपनी मरजी से सजनेसंवरने व पसंदीदा काम करने का अधिकार ही नहीं, तो वह घुटघुट कर नहीं जी सकती.

चूंकि तलाक के साथ नीलिमा ने किसी संपत्ति की मांग नहीं की थी, उसे बहुत जल्द तलाक मिल गया.

रामेश्वर के पास अपने 3 मकान थे. उन में 2 को वे किराए पर दिया करते थे.  उन में से एक के किराएदार पहले से ही घर खाली करने वाले थे. उन के घर खाली करते ही क्षितिज और नीलिमा  कोर्टमैरिज का फैसला कर रामेश्वर के इस बढ़िया हवादार मकान में साथ रहने चले आए.

अब सेवाराम की नींद उड़ी. बेटे को बुलवा कर लाख समझाया लेकिन बेटा टस से मस नहीं हुआ. तो सेवाराम बिफर पड़े- “पंडित हो कर कुर्मी की शादीशुदा औरत से विवाह. बहुत हेठी होगी, पूरा धंधा चौपट हो जाएगा, पंडित बिरादरी में नाक कटेगी, यजमानों के घर छूट जाएंगे. कुछ तो समझो.”

“कुछ नहीं समझना है पिताजी. प्यार में निर्णय लिया जाता है, आप समझें मेरी परेशानी.

पूजापाठ बहुत हुआ, अब मुझे मेरी जिंदगी जीने दीजिए. और यह मेरी अकेली की बात भी नहीं, नीलिमा को अकेला क्यों छोड़ दूं? उस ने तो मेरी खातिर इतनी हिम्मत की. अगर आज की युवा पीढ़ी अंधविश्वास और कर्मकांड के पीछे, जातपांत, भेदभाव और कुसंस्कार के पीछे अपना सुकून गंवा दे, तो उस की सारी ऊर्जा व्यर्थ चली जाएगी. समाज के लिए, आर्थिक और राजनीतिक बेहतरी के लिए एक युवा क्या कुछ नहीं कर सकता है. आप लोग उन की क्षमता को अंधविश्वास व भेदभाव की परंपरा में नष्ट करना चाहते हैं?”

क्षितिज खुद आश्चर्य में था कि उस ने अपनी दिल की बात इतनी बेझिझक कही कैसे? क्या यह नीलिमा की दी हुई शक्ति और प्रेरणा है…

सेवाराम अब भी अड़े थे- “बेटा, तू यह सब बातें छोड़, चल एक काम कर, तुझे जितना रहना है उस के साथ रह ले, घूम ले, शादी मत करना. ब्राह्मण का बेटा सोने की अंगूठी है, सोने की अंगूठी में दोष नहीं होता. एकदो साल बाद मैं तेरे लिए  ब्राह्मण की अच्छी लड़की ले आऊंगा.”

“पिताजी, आप इतने वर्षों से पूजापाठ करते आ रहे हैं, लेकिन आप ने पूजा का अर्थ नहीं समझा. जिस दिन मानव से प्रेम कर लेंगे, धर्मजाति का भेद भूल जाएंगे. आप की पूजा पूरी हो जाएगी. मैं नीलिमा के साथ जिंदगीभर का साथ निभाने जा रहा हूं पिता जी.  हां, आप की जरूरतों पर मैं हमेशा आप का साथ दूंगा.”

कोर्टमैरिज के बाद नीलिमा और क्षितिज के नए घर में प्रेम की नीलवर्णी अपराजिता खिल उठी. वह उदास क्षितिज नीलिमा की गहराई में समा कर आशा का आकाश हो गया था.

विश्वास: क्या थी कहानी शिखा की- भाग 3

‘‘तब क्या दूसरों को खुश करने के लिए तुम अपनी मां को चरित्रहीन करार दे दोगी? उन की झूठी बातों पर विश्वास कर के अपनी मां को उस की सब से प्यारी सहेली से दूर करने की जिद पकड़ोगी?’’

‘‘मुझ पर क्या गुजर रही है, इस की आप को भी कहां चिंता है, मम्मी,’’ शिखा चिढ़ कर गुस्सा हो उठी, ‘‘मैं आप की सहेली नहीं बल्कि सहेली के चालाक पति से आप को दूर देखना चाहती हूं. अपनी बेटी की सुखशांति से ज्यादा क्या कमल अंकल के साथ जुडे़ रहना आप के लिए जरूरी है?’’

‘‘कमल अंकल मेरे लिए तुम से ज्यादा महत्त्वपूर्ण कैसे हो सकते हैं, शिखा? मुझे तो अफसोस और दुख इस बात का है कि मेरी बेटी को मुझ पर विश्वास नहीं रहा. मैं पूछती हूं कि तुम ही मुझ पर विश्वास क्यों नहीं कर रही हो?  अपनी सहेलियों की बकवास पर ध्यान न दे कर मेरा साथ क्यों नहीं दे रही हो? मेरे मन में खोट नहीं है, इस बात को मेरे कई बार दोहराने के बावजूद तुम ने उस पर विश्वास न कर के मेरे दिल को जितनी पीड़ा पहुंचाई है, क्या उस का तुम्हें अंदाजा है?’’ बोलते हुए अंजलि का चेहरा गुस्से से लाल हो गया.

‘‘यों चीखचिल्ला कर आप मुझे चुप नहीं कर सकोगी,’’ गुस्से से भरी शिखा उठ कर खड़ी हो गई, ‘‘चित भी मेरी और पट भी मेरी का चालाकी भरा खेल मेरे साथ न खेलो.’’

‘‘क्या मतलब?’’ अंजलि फौरन उलझन का शिकार बन गई.

‘‘मतलब यह कि पापा ने अपनी बिजनेस पार्टनर सीमा आंटी को ले कर आप को सफाई दे दी तब तो आप ने उन की एक नहीं सुनी और यहां भाग आईं, और जब मैं आप से कमल अंकल के साथ संबंध तोड़ लेने की मांग कर रही हूं तो किस आधार पर आप मुझे गलत और खुद को सही ठहरा रही हो?’’

अंजलि को बेटी का सवाल सुन कर तेज झटका लगा. उस ने अपना सिर झुका लिया. शिखा आगे एक भी शब्द न बोल कर अपने कमरे में लौट गई. दोनों मांबेटी ने तबीयत खराब होने का बहाना बना कर रात का खाना नहीं खाया. शिखा के नानानानी को उन दोनों के उखडे़ मूड का कारण जरा भी समझ में नहीं आया.

उस रात अंजलि बहुत देर तक नहीं सो सकी. अपने पति के साथ चल रहे मनमुटाव से जुड़ी बहुत सी यादें उस के दिलोदिमाग में हलचल मचा रही थीं. शिखा द्वारा लगाए गए आरोप ने उसे बुरी तरह झकझोर दिया था.

राजेश ने कभी स्वीकार नहीं किया था कि अपने दोस्त की विधवा के साथ उस के अनैतिक संबंध थे. दूसरी तरफ आफिस में काम करने वाली 2 लड़कियों और राजेश के दोस्तों की पत्नियों ने इस संबंध को समाप्त करवा देने की चेतावनी कई बार उस के कानों में डाली थी.

तब खूबसूरत सीमा को अपने पति के साथ खूब खुल कर हंसतेबोलते देख अंजलि जबरदस्त ईर्ष्या व असुरक्षा की भावना का शिकर रहने लगी.

राजेश ने उसे प्यार से व डांट कर भी खूब समझाया पर अंजलि ने साफ कह दिया, ‘मेरे मन की सुखशांति, मेरे प्यार व खुशियों की खातिर आप को सीमा से हर तरह का संबंध समाप्त कर लेना होगा.’

‘मैं ऐसा कुछ नहीं करूंगा जिस से अपनी नजरों में गिर जाऊं. मैं कुसूरवार हूं ही नहीं, तो सजा क्यों भोगूं? अपने दिवंगत दोस्त की पत्नी को मैं बेसहारा नहीं छोड़ सकता हूं. तुम्हारे बेबुनियाद शक के कारण मैं अपनी नजरों में खुद को गिराने वाला कोई कदम नहीं उठाऊंगा,’ राजेश के इस फैसले को अंजलि किसी भी तरह से नहीं बदलवा सकी.

पहले अपने पति और अब अपनी बेटी के साथ हुए टकरावों में अंजलि को बड़ी समानता नजर आई. उस ने सीमा को ले कर राजेश पर चरित्रहीन होने का आरोप लगाया था और शिखा ने कमल को ले कर खुद उस पर.

वह अपने को सही मानती थी, जैसे अब शिखा अपने को सही मान रही थी. वहां राजेश अपराधी के कटघरे में खड़ा हो कर सफाई देता था और आज वह अपनी बेटी को सफाई देने के लिए मजबूर थी.

अपने दिल की बात वह अच्छी तरह जानती थी. उस के मन में कमल को ले कर रत्ती भर भी गलत तरह का आकर्षण नहीं था. इस मामले में शिखा पूरी तरह गलत थी.

तब सीमा व राजेश के मामले में क्या वह खुद गलत नहीं हो सकती थी? इस सवाल से जूझते हुए अंजलि ने सारी रात करवटें बदलते हुए गुजार दी.

अगली सुबह शिखा के जागते ही अंजलि ने अपना फैसला उसे सुना दिया, ‘‘अपना सामान बैग में रख लो. नाश्ता करने के बाद हम अपने घर लौट रहे हैं.’’

‘‘ओह, मम्मी. यू आर ग्रेट. मैं बहुत खुश हूं,’’ शिखा भावुक हो कर उस से लिपट गई.

अंजलि ने उस के माथे का चुंबन लिया, पर मुंह से कुछ नहीं बोली. तब शिखा ने धीमे स्वर में उस से कहा, ‘‘गुस्से में आ कर मैं ने जो भी पिछले दिनों आप से उलटासीधा कहा है, उस के लिए मैं बेहद शर्मिंदा हूं. आप का फैसला बता रहा है कि मैं गलत थी. प्लीज मम्मा, मुझे माफ कर दीजिए.’’

अंजलि ने उसे अपने सीने से लगा लिया. मांबेटी दोनों की आंखों में आंसू भर आए. पिछले कई दिनों से बनी मानसिक पीड़ा व तनाव से दोनों पल भर में मुक्त हो गई थीं.

उस के बुलावे पर वंदना उस से मिलने घर आ गई. कमल के आफिस चले जाने के कारण अंजलि के लौटने की खबर कमल तक नहीं पहुंची.

वंदना को अंजलि ने अकेले में अपने वापस लौटने का सही कारण बताया, ‘‘पिछले दिनों अपनी बेटी शिखा के कारण राजेश और सीमा को ले कर मुझे अपनी एक गलती…एक तरह की नासमझी का एहसास हुआ है. उसी भूल को सुधारने को मैं राजेश के पास बेशर्त वापस लौट रही हूं.

‘‘सीमा के साथ उस के अनैतिक संबंध नहीं हैं, मुझे राजेश के इस कथन पर विश्वास करना चाहिए था, पर मैं और लोगों की सुनती रही और हमारे बीच प्रेम व विश्वास का संबंध कमजोर पड़ने लगा.

‘‘अगर राजेश निर्दोष हैं तो मेरा झगड़ालू रवैया उन्हें कितना गलत और दुखदायी लगता होगा. बिना कुछ अपनी आंखों से देखे, पत्नी का पति पर विश्वास न करना क्या एक तरह का विश्वासघात नहीं है?

‘‘मैं राजेश को…उन के पे्रम को खोना नहीं चाहती हूं. हो सकता है कि सीमा और उन के बीच गलत तरह के संबंध बन गए हों, पर इस कारण वह खुद भी मुझे छोड़ना नहीं चाहते. उन के दिल में सिर्फ मैं रहूं, क्या अपने इस लक्ष्य को मैं उन से लड़झगड़ कर कभी पा सकूंगी?

‘‘वापस लौट कर मुझे उन का विश्वास फिर से जीतना है. हमारे बीच प्रेम का मजबूत बंधन फिर से कायम हो कर हम दोनों के दिलों के घावों को भर देगा, इस का मुझे पूरा विश्वास है.’’

अंजलि की आंखों में दृढ़निश्चय के भावों को पढ़ कर वंदना ने उसे बडे़ प्यार से गले लगा लिया.

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अपराध: श्रद्धा हत्याकांड- बेबस हैं लड़कियां, चाहे शादीशुदा चाहे लिवइन

दुनिया के किसी भी समाज में अपराध को पूरी तरह रोक पाना तकरीबन नामुमकिन है. लेकिन ऐसा न हो, इसलिए पुलिस के साथसाथ मीडिया वाले भी किसी अपराध की हकीकत बताते हुए लोगों को जागरूक करते रहते हैं, ताकि भविष्य में ऐसे कांड न होने पाएं. पिछले काफी सालों से टैलीविजन पर हत्या जैसे अपराधों की कहानियां ‘क्राइम पैट्रोल’ या ‘सावधान इंडिया’ या फिर दूसरे नामों से दिखाई जाती हैं और ‘मनोहर कहानियां’ या ‘सत्यकथा’ जैसी अपराध खोजी पत्रिकाएं भी देशविदेश में होने वाले अपराधों की जानकारी देती रहती हैं, ताकि लोग अपने आसपास नजरें जमाए रखें कि कहीं कोई बड़े कांड की तैयारी तो नहीं कर रहा है.

इस के बावजूद अगर देश की राजधानी में कोई लड़का अपनी लिवइन पार्टनर की हत्या कर के काफी दिनों तक मासूम होने का ढोंग करता रहे तो समझ लीजिए कि लोगों की भावनाओं के साथसाथ उन की इनसानियत भी दम तोड़ रही है.

दिल्ली के महरौली इलाके में 18 मई, 2022 को ऐसा ही एक दिल दहलाने वाला कांड हुआ था, पर इस का खुलासा कई महीने बाद हुआ. वह भी तब जब दिल्ली पुलिस ने पीडि़ता श्रद्धा के पिता विकास वालकर द्वारा दर्ज कराई गई गुमशुदगी की शिकायत की जांच शुरू की थी.

श्रद्धा की हत्या उस के तथाकथित प्रेमी आफताब ने की थी और इस की जड़ में था उन के बीच का झगड़ा. दिल्ली पुलिस सूत्रों ने बताया कि इस प्रेमी जोड़े के बीच 18 मई, 2022 को पहली बार झगड़ा नहीं हुआ था, बल्कि वे दोनों पिछले काफी समय से झगड़ा करते आ रहे थे. समाचार एजेंसी एएनआई को सूत्रों ने बताया कि 18 मई को मुंबई से घर का सामान लाने को ले कर आफताब और श्रद्धा के बीच झगड़ा हुआ था. घर का खर्च कौन उठाएगा और सामान कौन लाएगा, इस बात को ले कर भी उन में झगड़े होते थे. इस बात को ले कर आफताब काफी गुस्से में आ गया था.

18 मई, 2022 की रात को तकरीबन 8 बजे दोनों के बीच जम कर झगड़ा शुरू हुआ. झगड़ा इतना ज्यादा बढ़ गया कि आफताब ने श्रद्धा की गला दबा कर हत्या कर दी. उस ने रातभर श्रद्धा की लाश को कमरे में रखा और अगले दिन

चाकू और रैफ्रिजरेटर खरीदने चला गया. पर क्यों?

क्या है पूरा मामला आफताब और श्रद्धा पिछले 3 साल से झगड़ रहे थे. वे आपस में क्यों झगड़ते थे, इस से पहले यह जान लेते हैं कि वे दोनों कौन थे और मुंबई छोड़ कर दिल्ली में क्या कर रहे थे?पेशे से शैफ और फोटोग्राफर तकरीबन 28 साल के आफताब पूनावाला का जन्म मुंबई में हुआ था और वह वहां अपने छोटे भाई अहद, पिता आमिन और मां मुनीरा बेन के साथ वसई उपनगर में बनी यूनिक पार्क हाउसिंग सोसाइटी में रहता था.

मुंबई के एलएस रहेजा कालेज से ग्रेजुएट आफताब पूनावाला इस साल की शुरुआत में श्रद्धा से मिलने के बाद दिल्ली में रहने लगा था.श्रद्धा का पूरा नाम श्रद्धा वाकर था. वह मूल रूप से महाराष्ट्र के पालघर जिले की रहने वाली थी और मुंबई के मलाड इलाके में एक मल्टीनैशनल कंपनी के एक काल सैंटर में काम करती थी. यहीं से उस की मुलाकात आफताब पूनावाला से हुई थी.

कुछ ही समय में श्रद्धा और आफताब एकदूसरे से बेहद प्यार करने लगे थे और उन्होंने शादी तक का फैसला कर लिया था, लेकिन उन दोनों के परिवार वाले इस रिश्ते से खुश नहीं थे. नतीजतन, उन दोनों ने अपने प्यार की खातिर परिवार और मुंबई छोड़ दी. इस के बाद वे दिल्ली आ गए और महरौली के एक फ्लैट में लिवइन में रहने लगे. पुलिस की पूछताछ में आरोपी आफताब पूनावाला ने अपना गुनाह कबूल करते हुए बताया कि श्रद्धा उस पर लगातार शादी करने का दबाव बना रही थी. वह रोजाना सुबह से ले कर शाम तक बस एक ही बात कहती थी कि शादी कर लो. इसी बात को ले कर उन के बीच आएदिन झगड़ा होता था. पूछताछ में यह भी सामने आया कि आफताब की कई दूसरी लड़कियों से भी दोस्ती थी, जिन को ले कर श्रद्धा को उस पर शक हो रहा था. जब श्रद्धा ने इस बारे में पूछा तो आफताब ने सिरे से खारिज कर दिया.

18 मई, 2022 की रात भी दोनों के बीच इन्हीं सब बातों को ले कर झगड़ा हुआ था, जिस के बाद आफताब ने श्रद्धा की बेरहमी से हत्या कर दी. श्रद्धा को मारने वाले आफताब की हैवानियत से इनकार नहीं किया जा सकता है. उस ने उस लड़की को मौत के घाट उतार दिया, जिस से वह प्यार करता था और उस के साथ एक ही घर में रहता था. पर ऐसा क्यों होता है कि कोई इनसान किसी के साथ जानवर जैसा बरताव करने पर उतारू हो जाता है?

क्या श्रद्धा ने शादी की बात कह कर इतनी बड़ी गलती कर दी थी कि उसे अपनी ही जान से हाथ धोना पड़ा? आफताब जैसे लोगों की यह कैसी फितरत होती है कि वे कोल्ड ब्लडेड मर्डर को अंजाम दे देते हैं और किसी को खबर तक नहीं लगती? सब से बड़ा सवाल यह कि ऐसे मामलों में लव जिहाद का एंगल कैसे जुड़ जाता है लव जिहाद का हौआ उन्हीं मामलों में उछाला जाता है, जहां लड़का मुसलिम और लड़की हिंदू होती है, पर यहां तो शादी ही नहीं हुई थी. आफताब ने एक दिल दहला देने वाला कांड सिर्फ इसलिए किया, क्योंकि वह मुसलिम था, यह बात गले से नीचे नहीं उतरती है.

जब आफताब ने श्रद्धा का कत्ल किया था, तब वह नशे में था. अब अगर पुलिस को शक है कि आफताब सीरियल किलर हो सकता है, तो लव जिहाद का बुलबुला वैसे ही फूट जाता है.इस हत्याकांड ने साल 2010 की उसी खौफनाक कहानी को याद दिला दिया है, जिस में श्रद्धा की तरह ही एक और औरत की हत्या की गई थी. तब 36 साल की अनुपमा गुलाटी की उस के पति राजेश गुलाटी ने उत्तराखंड के देहरादून में हत्या कर दी थी.हत्यारे राजेश ने अनुपमा को मारने के बाद उस के शरीर के 70 टुकड़े करने के लिए बिजली से चलने वाले कटर का इस्तेमाल किया था. वहां तो लव जिहाद की कोई गुंजाइश नहीं थी, जबकि कांड बहुत बड़ा था.

अगर कोई अपना जानवर सरीखा हो कर जुल्म करे तो यकीनन हमें ही उसे पहचानने में कोई कमी रह गई है. श्रद्धा को जरूर अंदाजा रहा होगा कि आफताब जब आपा खो बैठता है, तो वह किस हद तक जा सकता है. इस के बावजूद वह उस के दिमाग को पढ़ नहीं पाई. दरअसल, आफताब पूनावाला या राजेश गुलाटी जैसे लोग स्वभाव से गुस्सैल होते हैं, जो सामने वाले की छोटी से छोटी बात को दिल से लगा लेते हैं. फिर वे सामने वाले पर हावी होने की कोशिश करते हैं और जब उन्हें ‘न’ सुनने को मिलती है, तो वे इसे बरदाश्त नहीं कर पाते हैं.

साल 1995 के दिल्ली में हुए जेसिका लाल हत्याकांड में आरोपी मनु शर्मा को जेसिका की ‘न’ ही चुभ गई थी कि एक बारमेड कैसे उसे ड्रिंक देने से मना कर सकती है और मनु शर्मा ने जेसिका पर गोली दागने में देर नहीं की. आफताब ने श्रद्धा की लाश के टुकड़े करने में झिझक महसूस नहीं की. तो क्या वह चाकू का इस तरह इस्तेमाल करने का आदी था? ऐसा हो सकता है, क्योंकि गला घोंट कर मारने के बाद फुतूर सिर से उतरने के बाद वह घबरा सकता था, पर उस ने ऐसा नहीं किया और श्रद्धा की लाश के टुकड़ेटुकड़े करने में कोई दया नहीं दिखाई.

चूंकि श्रद्धा अब इस दुनिया में नहीं है, तो उसे ही पीडि़ता समझा जाएगा, पर आफताब पूनावाला जैसे अपराधी दिमाग के लोग खुद को पीडि़त समझते हैं और पीड़ा देने वाले को सजा देना अपना हक समझते हैं. गला दबा कर मारने के बाद भी आफताब को संतुष्टि नहीं मिली थी. वह श्रद्धा की लाश को भी सजा देना चाहता था, ताकि खुद के अहम को संतुष्टि मिले. अगर दूसरी तरफ श्रद्धा आफताब पर शादी करने का जोर दे रही थी, तो इस में कोई गलत बात नहीं थी. लेकिन उन के रोजरोज के झगड़ों के बावजूद श्रद्धा आफताब की बदनीयती नहीं समझ पाई तो यही उस की सब से बड़ी गलती थी.

श्रद्धा ने अपने मांबाप की नहीं सुनी और आफताब के साथ बिना शादी किए एकसाथ रहने लगी, यहां तक तो सब ठीक था, पर उसे आफताब के गुस्सैल स्वभाव को समझ जाना चाहिए था. वह उस से तुरंत अलग हो जाती. अगर मांबाप के घर नहीं जाती तो भी कोई बात नहीं थी. वह अपने पैरों पर खड़ी थी, इसलिए अकेली रह सकती थी. उसे पीजी में तो जगह मिल ही जाती, जहां उस की जान बची रह सकती थी. पर वह ऐसा न करने की गलती कर बैठी.

ऐसे मामलों में गलती तो उन पड़ोसियों की भी होती है, जो ऐसे झगड़ों की जड़ में जाने के बजाय कन्नी काट लेते हैं. इस मामले में पड़ोसी जानते थे कि आफताब और श्रद्धा झगड़ते थे, पर उन्हें भी इतना बड़ा अपराध होने की भनक तक नहीं लग पाई. आफताब ने श्रद्धा का सिर काट कर उसे रैफ्रिजरेटर में रखा और जिस्म के कई टुकड़े कर दिए थे. हत्या के 5 महीने बाद उस ने उन्हें ठिकाने लगाना शुरू किया, पर मजाल है कि पड़ोसी यह हत्याकांड सूंघ पाए. आफताब लाश काटते समय पानी का नल चला देता था, ताकि खून नाली में बह जाए. उस पर पानी के बिल के 300 रुपए पैंडिंग थे, पर मकान मालिक को जरा भी शक नहीं हुआ.

दिक्कत यह है कि शहरों में लोग धीरेधीरे सामाजिक सरोकारों को भूलते जा रहे हैं. कोई आप के पड़ोस में आया तो यह कह कर नाकभौं सिकोड़ लेते हैं कि बड़ा अजीब है, ‘नमस्ते’ तक नहीं की. पर क्या हम खुद कोई पहल करते हैं? पड़ोस में जब भी कोई आता है, तो उसे चायपानी पूछ कर अच्छे पड़ोसी होने का संकेत दे सकते हैं, फिर यह उस पर है कि वह अपना मेलजोल बढ़ाता है या नहीं. इस से एकदूसरे को कुछ हद तक समझने में मदद मिल जाती है.

इस सब के बावजूद आफताब पूनावाला जैसे अपराधी का दिमाग पढ़ना मुश्किल होता है, पर श्रद्धा को अगर यह पता लगने लगा था कि आफताब उस पर हावी होने की नाजायज कोशिश करने लगा है, तो उसे सतर्क हो जाना चाहिए था. उसे कतई आफताब की उंगलियों पर नहीं नाचना चाहिए था और किसी को अपने इस बिगड़ते रिश्ते के बारे में बता देना चाहिए था.लेकिन जिस देश में बड़ी आसानी से निठारी कांड हो जाता हो या जहां आज तक आरुषी हत्याकांड के हत्यारे के बारे में पता नहीं चल पाया हो, वहां आम लोगों की समाज के प्रति जागरूकता की असलियत की पोल खुल जाती है.

पहले लोग आसपड़ोस में आंखें खुली रख कर जिम्मेदार नागरिक होने के संकेत दे देते थे, पर अब तो मकान मालिक को किराएदार से किराया लेने के अलावा कोई सरोकार नहीं होता है. पड़ोसी भी बंद कमरों से आती झगड़े की आवाजों को नजरअंदाज कर देते हैं और जब कोई बड़ा कांड हो जाता है, तो ऐसे चौंकते हैं, जैसे उन्हें कुछ मालूम ही नहीं था.आफताब पूनावाला जैसे लोग समाज का वे अटूट हिस्सा हैं, जो कहीं भी हो सकते हैं और अपने आसपड़ोस में बड़े अच्छे होने की ऐक्टिंग करते हैं, इसीलिए उन्हें कांड होने से पहले समझ लेना बड़ा मुश्किल होता है, पर यह नामुमकिन भी नहीं है.अगर हम सतर्क रहें, क्योंकि हर बड़े अपराध की दस्तक बहुत पहले होने लगती है, अगर उसे सुन लिया जाए तो. लेकिन हमारे इसी बहरेपन का फायदा अपराधी उठाते हैं.

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एकतरफा प्यार का गुनाह

सुबह के यही कोई साढ़े 3 बजे मुंबई के डोमेस्टिक एयरपोर्ट परिसर में स्थित थाना विलेपार्ले पुलिस को इर्ला कूपर अस्पताल से सूचना मिली कि एक युवती की हत्या कर के उस की लाश को जला दिया गया है. उस समय ड्यूटी पर तैनात इंसपेक्टर महादेव निवालकर ने इस सूचना की तुरंत डायरी बनवाई और थानाप्रभारी लक्ष्मण चव्हाण, पुलिस कंट्रोल रूम के अलावा अन्य वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को सूचना दे कर खुद एआई देवकाते, सांलुके, सबइंसपेक्टर पाटिल, महिला सबइंसपेक्टर कडव, सिपाही सुरेश छोत्रो, संतोष शिंदे, योगेंद्र सिंह शिंदे, गांवडे, सावडेकर, महांडिक और पालवे को साथ ले कर के इर्ला कूपर अस्पताल के लिए रवाना हो गए.

इंसपेक्टर महादेव निवालकर जिस समय सहयोगियों के साथ अस्पताल पहुंचे थे, डाक्टरों की एक टीम युवती के शव का निरीक्षण कर रही थी. युवती के साथ आए लोग अस्पताल परिसर में ही मौजूद थे. उन के बीच मातम का माहौल था. महादेव निवालकर ने देखा, युवती का चेहरा बुरी तरह से जला हुआ था.

पूछताछ में पता चला कि मृतका का नाम श्रद्धा पांचाल था. वह फिजियोथेरैपिस्ट थी. डाक्टरों के अनुसार, श्रद्धा की हत्या एक से डेढ़ घंटा पहले गला घोंट कर की गई थी. उस के दोनों पैरों पर खरोंच के निशान थे, जिस से आशंका जताई गई थी कि हत्या के पूर्व उस के साथ मनमानी भी की गई थी.

डाक्टरों से बातचीत के बाद महादेव निवालकर ने मृतका श्रद्धा के साथ आए लोगों से बातचीत शुरू की. घर वालों से तो उस समय कोई खास जानकारी नहीं मिल सकी, क्योंकि उस समय वे कुछ बताने की स्थिति में नहीं थे. साथ आए पड़ोसियों ने जो बताया था उस के अनुसार, मामला काफी संदिग्ध था. पड़ोसियों ने रात ढाई बजे के आसपास श्रद्धा के कमरे से धुआं निकलता देखा था. तब उन्हें लगा था कि यह धुआं शायद एयरकंडीशनर से निकल रहा है.

लेकिन आधे घंटे बाद जब श्रद्धा के घर वालों के रोनेचीखने की आवाजें आईं तो पता चला कि वह धुआं एसी से नहीं, बल्कि श्रद्धा के कमरे से निकल रहा था. किसी ने श्रद्धा की हत्या कर के उस की लाश को जलाने की कोशिश की थी. पड़ोसी भाग कर वहां पहुंचे तो कमरे की लाइट नहीं जल रही थी. टौर्च की रोशनी में उन्होंने जो दृश्य देखा, वह दिल को दहलाने वाला था. कमरे के बीचोबीच श्रद्धा की अधजली निर्वस्त्र लाश पड़ी थी. उसी की जींस से उस का गला कसा हुआ था.

पड़ोसी दीपक और सचिन ने जल्दी से जींस हटाई और उपचार के लिए उसे इर्ला कूपर अस्पताल ले आए. डाक्टरों ने उसे मृत घोषित कर इस बात की सूचना थाना विलेपार्ले पुलिस को दे दी थी. महादेव निवालकर ने मामले की प्राथमिक काररवाई निपटा कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए अस्पताल में रखवा दिया था. यह 6 दिसंबर, 2016 की बात थी.

अस्पताल की काररवाई निपटा कर महादेव निवालकर सहयोगियों के साथ घटनास्थल पर यानी श्रद्धा के घर पहुंचे. डा. श्रद्धा पांचाल मकान की ऊपरी मंजिल पर बने कमरे में रहती थी. उसी कमरे में उस ने सोने से ले कर पढ़ाई तक का इंतजाम कर रखा था. लेकिन डाक्टर होने के बावजूद वह समय की पाबंद नहीं थी. उस के आनेजाने का कोई निश्चित समय नहीं था.

घर वालों को किसी तरह की तकलीफ न हो, इस के लिए श्रद्धा ने अपने कमरे की सीढ़ी घर के बाहर से बनवा रखी थी. इसलिए वह जब भी देर से घर आती थी, सीधे अपने कमरे में चली जाती थी. अगर कभी वह सहेलियों के घर रुक जाती थी तो घर वालों को बता देती थी.

महादेव निवालकर श्रद्धा के कमरे का निरीक्षण करने लगे. उस के कमरे की सारी चीजें बिखरी हुई थीं. अलमारी के भी दोनों पट खुले हुए थे. उस के अंदर का सारा सामान बिखरा था. कमरे में बिखरे किताबों के पेज जले हुए थे. इस से पुलिस को लगा कि किताबों के पन्ने फाड़ कर श्रद्धा की लाश को जलाने की कोशिश की गई थी.

महादेव निवालकर घटनास्थल का निरीक्षण कर आसपड़ोस वालों से पूछताछ कर रहे थे कि जोन-8 के डीसीपी वीरेंद्र मिश्र, एसीपी प्रकाश गव्हाणे, थानाप्रभारी लक्ष्मण चव्हाण भी आ पहुंचे. इन्हीं अधिकारियों के साथ फोरैंसिक टीम और क्राइम ब्रांच यूनिट-8 के अधिकारी भी आए थे. फोरैंसिक टीम का काम निपट गया तो अधिकारियों ने भी घटनास्थल का निरीक्षण किया.

अधिकारियों के जाने के बाद महादेव निवालकर भी थाने लौट आए थे. उन्होंने श्रद्धा के घर वालों की ओर से हत्या का मुकदमा दर्ज कर मामले की जांच शुरू कर दी थी. चूंकि मामला दुष्कर्म और हत्या का था, इसलिए पुलिस हत्यारे को जल्दी से जल्दी गिरफ्तार करना चाहती थी. हत्यारे तक पहुंचने के लिए पुलिस ने श्रद्धा के घर वालों से गहराई से पूछताछ की, लेकिन उन लोगों से कोई खास जानकारी नहीं मिल सकी.

इस पूछताछ में पुलिस को सिर्फ इतना ही पता चला था कि उस रात श्रद्धा साढ़े 9 बजे घर आई थी. 10 बजे घर वालों के साथ खाना खा कर वह निपटी थी कि उस की 2 सहेलियां पूजा उर्फ पल्लवी और चैताली मुखर्जी उस से मिलने आ गई थीं. कुछ देर तीनों बातें करती रहीं, उस के बाद वे बाहर चली गई थीं. इस के बाद वे कब कमरे पर आईं, घर वालों को पता नहीं चला.

महादेव निवालकर ने श्रद्धा की दोनों सहेलियों को थाने बुला कर पूछताछ की तो पता चला कि वे श्रद्धा की जिगरी सहेलियां थीं. वे आपस में अकसर मिलती रहती थीं. कभीकभी एकदूसरे के घर रुक भी जाया करती थीं. उस दिन रात को वे श्रद्धा के यहां आईं तो थोड़ी देर घर में रुक कर सभी एटीएम पर पैसे निकालने चली गईं.

वहां से आ कर 12 बजे तक दोनों श्रद्धा के कमरे पर बातें करती रहीं. श्रद्धा को नींद आने लगी तो दोनों उठीं और श्रद्धा से दरवाजा बंद करने को कह कर दरवाजा उढ़का कर चली गईं. श्रद्धा की दोनों सहेलियों से भी हत्यारे तक पहुंचने का कोई सुराग नहीं मिला था. इस के बाद महादेव निवालकर ने अपना ध्यान श्रद्धा की क्लिनिक पर केंद्रित किया.

श्रद्धा फिजियोथेरैपिस्ट थी, ऐसे में उस के यहां हर तरह और हर उम्र के लोग आते थे. उन में कुछ ऐसे भी रहे होंगे, जो श्रद्धा को पसंद करते रहे होंगे. क्योंकि श्रद्धा आधुनिक फैशनपरस्त और खुले विचारों वाली युवती थी. वह हर किसी से खुल कर बात करती थी.

ऐसे में कोई ऐसा भी रहा होगा, जो उस के प्रति आकर्षित हो गया होगा. श्रद्धा ने उसे नजरअंदाज किया होगा, जिस की वजह से बात दुष्कर्म से हत्या तक पहुंच गई होगी. यही सोच कर पुलिस ने श्रद्धा के क्लिनिक और उस के यहां आनेजाने वालों के नामपते तथा टेलीफोन नंबर ले कर गहराई से जांच की, लेकिन कोई भी ऐसा आदमी नहीं मिला, जिस पर शक किया जाता. इस तरह मामला धीरेधीरे जटिल और पेंचीदा होता जा रहा था.

ऐसे में परिस्थितियां कुछ ऐसी बनीं कि पुलिस को श्रद्धा के घर वालों पर ही शक हो गया. पुलिस को लगा कि श्रद्धा की हत्या एक सोचीसमझी साजिश के तहत की गई थी, जिस में घर वाले ही शामिल हैं. वे श्रद्धा की किसी कमजोरी को छिपाने की कोशिश कर रहे हैं. यही सोच कर पुलिस पूछताछ के लिए श्रद्धा के एक मुंहबोले भाई तथा घर वालों को थाने ले आई.

इस बात की भनक जैसे ही मीडिया को लगी, उन्होंने श्रद्धा के घर वालों का जीना दूभर कर दिया. अपनी टीआरपी बढ़ाने के लिए इलैक्ट्रौनिक और प्रिंट मीडिया ने इस मामले को तिल का ताड़ बना दिया. जिस के जो मन में आया, वह खबरों को रंगीन और चटपटी बना कर नोएडा के आरुषि हत्याकांड से जोड़ कर अनापशनाप खबरें पेश करने लगा.

मीडिया ने श्रद्धा के मांबाप को गुनाहों के कटघरे में खड़ा कर दिया. यही नहीं, डा. श्रद्धा के चरित्र को भी जम कर शर्मसार किया गया. और यह सब तब तक चलता रहा, जब तक श्रद्धा का असली कातिल पकड़ा नहीं गया. एक ओर जहां मीडिया नाक में दम किए था, वहीं दूसरी ओर मामले की जांच कर रही पुलिस टीम पर वरिष्ठ अधिकारियों का भी दबाव था. क्राइम ब्रांच और थाना पुलिस का मिलाजुला औपरेशन भी काम नहीं आ रहा था. पुलिस का सारा तंत्र बेकार हो चुका था.

परेशान पुलिस ने सभी रेलवे स्टेशनों, मुंबई के उपनगर नवी मुंबई, थाणे, वसई पालघर जनपद के नालासोपारा, विरार, कल्याण के सभी पुलिस थानों के संदिग्धों के रिकौर्ड चैक कर पूछताछ कर डाली, साथ ही श्रद्धा के फोन नंबरों के काल डिटेल्स निकलवा कर खंगाला. इस के अलावा करीब 5 सौ से अधिक लोगों से पूछताछ की गई, लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात रहा.

50 दिनों से अधिक बीत गए, पर पुलिस अंधेरे में ही हाथपैर मारती रही. पुलिस की समझ में नहीं आ रहा था कि श्रद्धा की हत्या का रहस्य क्या था और हत्यारा कौन था? इस मामले को ले कर पुलिस चिंतित जरूर थी, लेकिन निराश नहीं थी.

एक बार फिर पुलिस ने वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देश पर घटनास्थल पर जा कर मामले से संबंधित सारे तथ्यों को समझने की कोशिश की. इसी के साथ उस इलाके में लगे सभी सीसीटीवी कैमरों की फुटेज निकलवा कर उन्हें बारीकी से देखा गया. इस में उन्हें आशा के विपरीत फल मिला. आखिर इस से श्रद्धा की हत्या की कडि़यां जुड़ ही गईं.

पुलिस को एक फुटेज में एक ऐसा चेहरा दिखाई दिया, जिस पर शक हुआ. उस का चेहरा काफी धुंधला था, पर उस की गतिविधियां काफी संदिग्ध लग रही थीं. चेहरा स्पष्ट न होने की वजह से उसे पहचाना नहीं जा सकता था. फुटेज को सांताकु्रज की लैब भेजा गया तो चेहरा कुछ साफ हुआ. इस के बाद सच्चाई सामने आ गई. वह युवक उसी बस्ती में लगभग 7 सालों से रह रहा था, जहां श्रद्धा का परिवार रहता था.

उस युवक का नाम देवाशीष धारा था. पुलिस उस की तलाश में लग गई. वह जिस मकान में किराए पर रहता था, मकान मालिक ने बताया कि वह 8 जनवरी, 2017 को कमरा खाली कर के अपने गांव चला गया था. पुलिस ने इस मामले में देर करना उचित नहीं समझा. वैसे भी संभावित अभियुक्त उन की पहुंच से काफी दूर निकल चुका था.

थानापुलिस ने इस बात की जानकारी वरिष्ठ अधिकारियों को दी. इस के बाद अधिकारियों के निर्देश पर पुलिस की एक टीम पश्चिम बंगाल स्थित देवाशीष के गांव के लिए रवाना हो गई. पुलिस को उस का पता मकान मालिक से मिल गया था.

देवाशीष के गांव गई पुलिस टीम ने स्थानीय पुलिस की मदद से उसे गिरफ्तार कर लिया. उसे वहां की अदालत में पेश कर के प्रोडक्शन वारंट पर मुंबई ला कर अधिकारियों की उपस्थिति में उस से पूछताछ की गई तो पहले वह खुद को इस मामले से अनभिज्ञ बताता रहा. लेकिन जब पुलिस ने थोड़ी सख्ती की तो वह टूट गया और उस ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया.

27 वर्षीय देवाशीष धारा मूलरूप से पश्चिम बंगाल के जिला मिदनापुर के थाना दासपुर के गांव मेधूपुर का रहने वाला था. उस के पिता नंदलाल गांव के एक गरीब किसान थे. परिवार का सब से बड़ा बेटा देवाशीष ही था. बड़ा हुआ तो घर की आर्थिक स्थिति ठीक न होने की वजह से सन 2010 में वह काम की तलाश में मुंबई आ गया.

कहा जाता है कि मुंबई में कोई भूखा नहीं सोता, पर यहां काम नसीब से मिलता है. यही देवाशीष के साथ भी हुआ. उसे उस के मनमुताबिक काम नहीं मिला. उस के गांव के कुछ लोग वहां मेहनतमजदूरी करते थे, उन्हीं के साथ वह भी मेहनतमजदूरी करने लगा.

देवाशीष महत्त्वाकांक्षी युवक था. मेहनतमजदूरी से जो पैसे मिलते थे, उन्हें जोड़ कर रखता था. खर्चे के बाद जो भी पैसे बचते थे, वह उन्हें गांव भेज देता था. रहने के लिए उस ने विलेपार्ले पूर्व के श्रद्धानंद रोड पर साईंबाबा मंदिर के पास किराए का कमरा ले रखा था.

जहां देवाशीष रहता था, उसी के नजदीक की लीलाबाई सोसायटी के एक चालनुमा 2 मंजिले मकान में काशीनाथ पांचाल परिवार के साथ रहते थे. उन के परिवार में पत्नी और 2 बेटियां थीं. 50साल के काशीनाथ मुंबई लोअर परेल की सन मिल कंपाउंड की एक प्रतिष्ठित फर्म में नौकरी करते थे. उन्हें बेटा नहीं था, इसलिए उन्होंने बेटियों को ही बेटों की तरह पालापोसा. वह बेटियों को पढ़ालिखा कर किसी योग्य बनाना चाहते थे. बड़ी बेटी श्रद्धा पढ़लिख कर फिजियोथेरैपिस्ट बन गई थी और विलेपार्ले वेस्ट जुहू में अपनी क्लिनिक खोल ली थी, जो धीरेधीरे चलने भी लगी थी. छोटी बेटी भी इलैक्ट्रौनिक इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रही थी.

24 साल की श्रद्धा खूबसूरत तो थी ही, वाचाल भी थी. वह किसी से भी बात करने में नहीं झिझकती थी. इस की एक वजह यह थी कि उस का काम ही ऐसा था.

जो दूसरों की फिटनेस का खयाल रखता हो, वह अपनी फिटनेस का ध्यान रखेगा ही. श्रद्धा के अधिकतर ग्राहक फिल्मी दुनिया और टीवी सीरियलों में काम पाने वाले युवकयुवतियां थे. वे क्लिनिक पर भी आते थे और घर पर भी. ऐसे लोगों के बीच रहने की वजह से श्रद्धा खुद भी मौडल की तरह रहती थी. वह कपड़े भी छोटेछोटे पहनती थी.

देवाशीष की नजर श्रद्धा पर पड़ी तो वह उसे चाहने लगा. वैसे तो वह श्रद्धा को कई सालों से देखता आ रहा था, लेकिन उस के मन में श्रद्धा के प्रति प्यार तब जागा, जब उस ने फिजियोथेरैपिस्ट डाक्टर बन कर अपनी क्लिनिक खोली थी. फिल्म और सीरियल में काम पाने के इच्छुक युवकयुवतियों के संपर्क में रहने की वजह से श्रद्धा का रहनसहन और बातव्यवहार उसी तरह हो गया था. वह बनसंवर कर घर से सुबह निकलती थी तो देर रात को ही लौटती थी.

श्रद्धा की खूबसूरती देवाशीष को अपनी ओर आकर्षित करने लगी थी. दिल के हाथों मजबूर देवाशीष श्रद्धा का सामीप्य पाने को बेचैन रहने लगा था. इस के लिए वह श्रद्धा का पीछा भी करने लगा था. लेकिन वह उस से अपने दिल की बात कह नहीं पा रहा था. इस की एक वजह यह थी कि उस की और श्रद्धा की हैसियत में बड़ा अंतर था. श्रद्धा के सामने वह कुछ नहीं था.

लेकिन दिल तो दिल है, वह किस पर आ जाए कौन जानता है. जब देवाशीष से रहा नहीं गया तो एक दिन उस ने श्रद्धा से दिल की बात कह ही दी. भला श्रद्धा उस के प्यार को कहां स्वीकार करने वाली थी. उस ने जो जवाब दिया, वह देवाशीष के कलेजे में तीर की तरह उतर गया.

देवाशीष को अपमानित कर श्रद्धा अपने काम पर चली गई और उसे भूल गई. उस ने यह बात किसी को बताई भी नहीं. श्रद्धा भले ही इस बात को भूल गई थी, लेकिन देवाशीष अपने अपमान को नहीं भुला सका था. वह बदले की आग में जलने लगा. वह श्रद्धा को सबक सिखाने का मौका ढूंढने लगा.

घटना वाली रात देवाशीष दोस्तों से मिल कर लौट रहा था, तभी उस ने श्रद्धा की सहेलियों को उस के कमरे से निकलते देखा. उसे यह मौका उचित लगा. वह कुछ देर श्रद्धा के मकान के आसपास घूमता रहा. उस के बाद मौका देख कर वह श्रद्धा के कमरे के दरवाजे पर जा पहुंचा.

उस ने दरवाजे पर हाथ रखा तो दरवाजा खुल गया, क्योंकि दरवाजा खुला ही था. दरअसल, श्रद्धा की सहेलियों ने जाते समय उस से दरवाजा बंद करने को कहा था, लेकिन नींद में होने की वजह से वह दरवाजा बंद नहीं कर सकी थी. गहरी नींद में सो रही श्रद्धा को देवाशीष ने इस तरह दबोचा कि वह अर्द्धबेहोशी की स्थिति में चली गई. उसी हालत में उस ने श्रद्धा के कपड़े उतार कर उस के साथ दुष्कर्म किया और अपना अपराध छिपाने के लिए उसी की जींस से उस का गला घोंट दिया.

श्रद्धा मर गई तो अलमारी में रखी किताबें निकाल कर उस ने फाड़ा और उन के पन्ने श्रद्धा की लाश पर रख कर आग लगा दी. आग जब तक जोर पकड़ती, उस ने कमरे की लाइट तोड़ कर बाहर आ गया. बाहर आ कर दरवाजे की कुंडी बंद की और भाग गया.

इस हत्याकांड के बाद एक महीने तक वह अपने दोस्तों के यहां रह कर पुलिस काररवाई के बारे में पता करता रहा. जब उस ने देखा कि पुलिस हत्यारे के बारे में पता नहीं लगा पा रही है तो निश्चिंत हो कर वह गांव चला गया. लेकिन वह बच नहीं सका और 2 फरवरी, 2017 को पुलिस द्वारा पकड़ा गया.

इंसपेक्टर महादेव निवालकर ने पूछताछ के बाद देवाशीष के खिलाफ दुष्कर्म और हत्या का मुकदमा दर्ज कर उसे अदालत में पेश किया, जहां से उसे आर्थर रोड जेल भेज दिया गया.

जिस गली जाना नहीं: क्या हुआ था सोम के साथ- भाग 3

आज भी अजय उस से प्यार करता है, यह सोच आशा की जरा सी किरण फूटी सोम के मन में. कुछ ही सही, ज्यादा न सही.

‘‘कैसे हो, सोम?’’ परदा उठा कर अंदर आया अजय और सोम को अपने हाथ रोकने पड़े. उस दिन जब दुकान पर मिले थे तब इतनी भीड़ थी दोनों के आसपास कि ढंग से मिल नहीं पाए थे.

‘‘क्या कर रहे हो भाई, यह क्या बना रहे हो?’’ पास आ गया अजय. 10 साल का फासला था दोनों के बीच. और यह फासला अजय का पैदा किया हुआ नहीं था. सोम ही जिम्मेदार था इस फासले का. बड़ी तल्लीनता से कुछ बना रहा था सोम जिस पर अजय ने नजर डाली.

‘‘चाची ने बताया, तुम परेशान से रहते हो. वहां सब ठीक तो है न? भाभी, तुम्हारा बेटा…उन्हें साथ क्यों नहीं लाए? मैं तो डर रहा था कहीं वापस ही न जा चुके हो? दुकान पर बहुत काम था.’’

‘‘काम था फिर भी समय निकाला तुम ने. मुझ से हजारगुना अच्छे हो तुम अजय, जो मिलने तो आए.’’

‘‘अरे, कैसी बात कर रहे हो, यार,’’ अजय ने लपक कर गले लगाया तो सहसा पीड़ा का बांध सारे किनारे लांघ गया.

‘‘उस दिन तुम कब चले गए, मुझे पता ही नहीं चला. नाराज हो क्या, सोम? गलती हो गई मेरे भाई. चाची के पास तो आताजाता रहता हूं मैं. तुम्हारी खबर रहती है मुझे यार.’’

अजय की छाती से लगा था सोम और उस की बांहों की जकड़न कुछकुछ समझा रही थी उसे. कुछ अनकहा जो बिना कहे ही उस की समझ में आने लगा. उस की बांहों को सहला रहा था अजय, ‘‘वहां सब ठीक तो है न, तुम खुश तो हो न, भाभी और तुम्हारा बेटा तो सकुशल हैं न?’’

रोने लगा सोम. मानो अभीअभी दोनों रिश्तों का दाहसंस्कार कर के आया हो. सारी वेदना, सारा अवसाद बह गया मित्र की गोद में समा कर. कुछ बताया उसे, बाकी वह स्वयं ही समझ गया.

‘‘सब समाप्त हो गया है, अजय. मैं खाली हाथ लौट आया. वहीं खड़ा हूं जहां आज से 10 साल पहले खड़ा था.’’

अवाक् रह गया अजय, बिलकुल वैसा जैसा 10 साल पहले खड़ा रह गया था तब जब सोम खुशीखुशी उसे हाथ हिलाता हुआ चला गया था. फर्क सिर्फ इतना सा…तब भी उस का भविष्य अनजाना था और अब जब भविष्य एक बार फिर से प्रश्नचिह्न लिए है अपने माथे पर. तब और अब न तब निश्चित थे और न ही आज. हां, तब देश पराया था लेकिन आज अपना है.

जब भविष्य अंधेरा हो तो इंसान मुड़मुड़ कर देखने लगता है कि शायद अतीत में ही कुछ रोशनी हो, उजाला शायद बीते हुए कल में ही हो.

मेज पर लकड़ी के टुकड़े जोड़ कर बहुत सुंदर घर का मौडल बना रहा सोम उसे आखिरी टच दे रहा था, जब सहसा अजय चला आया था उसे सुखद आश्चर्य देने. भीगी आंखों से अजय ने सुंदर घर के नन्हे रूप को निहारा. विषय को बदलना चाहा, आज त्योहार है रोनाधोना क्यों? फीका सा मुसकरा दिया, ‘‘यह घर किस का है? बहुत प्यारा है. ऐसा लग रहा है अभी बोल उठेगा.’’

‘‘तुम्हें पसंद आया?’’

‘‘हां, बचपन में ऐसे घर बनाना मुझे बहुत अच्छा लगता था.’’

‘‘मुझे याद था, इसीलिए तो बनाया है तुम्हारे लिए.’’

झिलमिल आंखों में नन्हे दिए जगमगाने लगे. आस है मन में, अपनों का साथ मिलेगा उसे.

सोम सोचा करता था पीछे मुड़ कर देखना ही क्यों जब वापस आना ही नहीं. जिस गली जाना नहीं उस गली का रास्ता भी क्यों पूछना. नहीं पता था प्रकृति स्वयं वह गली दिखा देती है जिसे हम नकार देते हैं. अपनी गलियां अपनी होती हैं, अजय. इन से मुंह मोड़ा था न मैं ने, आज शर्म आ रही है कि मैं किस अधिकार से चला आया हूं वापस.

आगे बढ़ कर फिर सोम को गले लगा लिया अजय ने. एक थपकी दी, ‘कोई बात नहीं. आगे की सुधि लो. सब अच्छा होगा. हम सब हैं न यहां, देख लेंगे.’

बिना कुछ कहे अजय का आश्वासन सोम के मन तक पहुंच गया. हलका हो गया तनमन. आत्मग्लानि बड़ी तीव्रता से कचोटने लगी. अपने ही भाव याद आने लगे उसे, ‘जिस गली जाना नहीं उधर देखना भी क्यों.

कातिल फिसलन: दारोगा राम सिंह के पास कौनसा आया था केस- भाग 1

‘‘देखिए… मैं अभी नहा कर आई हूं,’’ सुखलाल से खुद को छुड़ाने की कोशिश करते हुए सलोनी किसी तरह बोली, लेकिन वह शराबी कहां मानने वाला था. वह बेशर्मी से बोला, ‘‘इसीलिए तो अभी खासतौर से तुम को प्यार करने आया हूं. तरोताजा फल का स्वाद ही अलग होता है.’’

इसी पकड़धकड़ में सलोनी का सिर टेबल के कोने से जा टकराया और उस की चीख निकल गई, ‘‘आह…’’

लेकिन सलोनी की कमजोरी तो जिस्मानी से ज्यादा दिमागी थी. वह कसमसा कर रह गई और सुखलाल उस के ऊपर छा गया.

तकरीबन 15 मिनट बाद सलोनी के जलते दिल पर अपने जहर की बरसात करने के बाद संतुष्टि की सांसें भरता सुखलाल उठा और कहने लगा, ‘‘बस, हो तो गया. कोई ज्यादा समय थोड़े ही लगता है हम को काम करने में. तुम्हीं बेकार में टैंशन ले लेती हो और हम को भी दे देती हो,’’ इस के बाद वह बाहर चला गया.

सलोनी ने भरी आंखों से घड़ी देखी तो बच्चों के स्कूल से लौटने का समय हो रहा था. बुझे मन से वह दोबारा नहाने चली गई. बाहर आ कर अपने माथे की चोट पर एंटीसैप्टिक क्रीम लगा ही रही थी कि दरवाजे की घंटी बज उठी.

सलोनी ने दरवाजा खोला. उस के दोनों बेटे स्कूल से आ चुके थे.

बड़े बेटे की नजर अपनी मां के माथे पर गई तो वह पूछ बैठा, ‘‘मम्मी, यह चोट कैसे लगी?’’

‘‘वह जरा टेबल से सिर टकरा गया. तुम दोनों फ्रैश हो लो. मैं आलू के परांठे बना रही हूं,’’ सलोनी ने जल्दी से उसे टाला और रसोईघर में चली गई.

सलोनी के साथ इस तरह की घटनाओं की भूमिका तो उसी दिन से शुरू हो गई थी जब तकरीबन 6 महीने पहले उस के पति सुधीर ने पैसे की तंगी कम करने के लिए सुखलाल को ऊपर का कमरा किराए पर दिया था. उन को तब पता नहीं था कि कि 50 साल का सुखलाल किस कदर काइयां आदमी है. उस के तार इलाके के कुछ बड़े दबंगों से जुड़े थे और पुलिस से भी.

टीवीकूलरपंखे वगैरह की रिपेयरिंग की दुकान चलाने वाला सुधीर सीधासादा आदमी था. सुखलाल की गंदी नजरें यहां आते ही खुद से 10 साल छोटी सलोनी पर टिक गई थीं. पहली मुलाकात में ही वह उस के हुस्न को देखता रह गया था, जब वह उस के लिए चाय ले कर आई थी. इस के बाद तो सुखलाल ने उस पर लगातार डोरे डालने शुरू कर दिए थे.

जब सलोनी ने सुखलाल की दाल नहीं गलने दी तो उस ने एक दिन अपना गैरकानूनी कट्टा चुपके से सुधीर की दुकान में रखवा कर इलाके के अपने परिचित दारोगा से उस को गिरफ्तार

करा दिया.

अपने पति को दिलोजान से चाहने वाली सलोनी ने हर मुमकिन कोशिश कर ली लेकिन सुधीर को छुड़ा नहीं पाई. तब एक रात इसी सुखलाल ने सलोनी को अपने कमरे में इस बारे में बात करने के लिए बुलाया और अपने मन की कर ली. सुबह उस ने अपने नशे में होने का बहाना बनाया और सुधीर की रिहाई का लालच दे कर उसे किसी से कुछ भी न बताने के लिए राजी कर लिया.

रोजरोज थाने में थर्ड डिगरी झेल रहा बेकुसूर सुधीर अगले दिन ही रिहा कर दिया गया. सलोनी उस की हालत देख कर रो पड़ी.

सुखलाल ने उस के इलाज के लिए कुछ पैसे दे कर सलोनी की रहीसही हिम्मत भी तोड़ दी. उस ने सोचा कि अपनेआप को एक बार दागदार कर के उस ने अपना घर और सुहाग बचा लिया है, लेकिन उस का यह सोचना गलत निकला.

सुखलाल पर सलोनी का स्वाद लग चुका था. अब वह अकसर उस को मौका पाते ही दबोच लेता था.

आज भी सलोनी के साथ वही हुआ. वह बारबार सोचती कि सुधीर को सबकुछ बता दे, लेकिन सुखलाल का डर उस की जबान सिल देता.

शाम को सुधीर दुकान से आया और सलोनी के माथे पर लगी चोट देख कर शंका भरी आवाज में सवाल करने लगा.

दरअसल, सुधीर को यह सारा मामला किसी और ही नजरिए से दिखने लगा था. वह सोचता था कि सलोनी और सुखलाल के बीच कुछ है और उस का खमियाजा पति होने के नाते थाने में गिरफ्तार हो कर उसे भुगतना पड़ा.

सलोनी ने सुधीर से भी अपनी चोट का वही बहाना बनाया जो उस ने अपने बच्चों से बनाया था. सुधीर उस का जवाब सुन कर चुपचाप वहां से चला तो गया, लेकिन आज उस की आंखों में सलोनी ने एक ऐसी आग की झलक देखी जो उस ने पहले कभी महसूस नहीं की थी.

अगली सुबह बाहर हो रहे शोर से सलोनी जागी तो उस ने सुधीर को अपने पास नहीं पाया. वह हड़बड़ी में अपने बाल बांधती बाहर भागी. उस के घर के बगल वाली खाली जमीन के सामने लोगों की भीड़ लगी थी. कोई आदमी कह रहा था, ‘‘जिंदा है कि मर गया?’’

ये शब्द सुनते ही सलोनी को बेहोशी आने लगी. कहीं सुधीर ने तनाव में आ कर खुदकुशी तो…

घबराहट में वह बेतहाशा लोगों को धकियाती आगे बढ़ी तो पाया कि सामने सुखलाल खून से लथपथ गिरा पड़ा था. उस के पेट में लोहे की एक छड़ धंसी थी और जिस्म शांत हो चुका था.

इसी बीच पुलिस भी आ गई. नए दारोगा राम सिंह ने कुछ ही दिनों पहले इस इलाके का चार्ज लिया था और सुखलाल उस से भी मेलजोल बढ़ाने में लगा रहता था लेकिन राम सिंह की ईमानदारी के चलते वह कामयाब नहीं हो सका था.

सलोनी घर वापस आई और सुधीर को पूरे घर में तलाशा. उसे नहीं पा कर उस को फोन मिलाया. वह भी बंद मिला.

सलोनी सिर पकड़ कर रोने लगी कि आखिर वही हुआ जिस से बचने के लिए उस ने अपना सबकुछ लुटा दिया था… आखिरकार सुधीर कानून का मुजरिम बन ही गया.

सुखराम की लाश को कस्टडी में लेने के बाद दारोगा राम सिंह सलोनी

के घर आया क्योंकि सुखलाल उसी का किराएदार था. उस ने सुखलाल के कमरे की तलाशी ली. सीढ़ीघर के बाहर

की तरफ दीवार नहीं बनी थी जिस के चलते वहां से नीचे गिरने का खतरा बना रहता था.

दारोगा राम सिंह ने अंदाजा लगा लिया कि यहीं से सुखलाल भी नीचे गिरा है. उस के कमरे में रखी शराब की बोतलों को आगे की जांच के लिए जब्त कर उस ने सलोनी से सवाल किया, ‘‘आप के पति कहां हैं?’’

‘‘ज… जी, वे मेरे मायके गए हैं, कल रात को… मेरे चाचाजी की तबीयत अचानक खराब हो गई थी तो उन को ही देखने,’’ सलोनी ने झूठ बोल दिया ताकि राम सिंह का शक सुधीर पर न जाए. अपनी बात की तसदीक तो वह अपने मायके वालों को समझा कर करा ही सकती थी.

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