जल समाधि: आखिर क्यूं परेशान था सुशील? भाग 3

तभी उन दोनों को किसी के आने की आहट सुनाई दी, तो वे संभल कर बैठ  गए. प्रकाश ने छोटे बच्चे को गोद में ले लिया और अपने साथ लाया हुआ पाउडर का डब्बा रीता को दिखाने लगा. समाज की नजर में भले ही रीता ने पराए मर्द के साथ सैक्स कर के गलत काम किया था, पर उस के अपने विचार से वह एकदम सही थी, क्योंकि उस के इस एक कदम ने घर के सभी लोगों को खुश कर दिया था.

रीता के ससुर को वंश आगे बढ़ाने वाला मिल गया था, बेटियों को भाई और सुशील को बेटा. इसी वजह से सुशील पहले से ज्यादा खुश रहने लगा था और अपने काम को हंसीखुशी करने लगा था. इसी बीच प्रकाश की आवाजाही रीता के घर में अब और ज्यादा बढ़ गई थी. समय और बीता तो लोगों में बातें बनने लगीं कि हो न हो, जरूर इन दोनों में कोई लफड़ा है. और यह लड़का सुशील का नहीं, बल्कि प्रकाश का ही है. जिस घर में सभी काले और सांवले रंग के हों, वहां कोई गोरा लड़का पैदा कैसे हो सकता है?

बेटे के जन्म के बाद सुशील और उस के पिता के बीच सबकुछ ठीक होने लगा था. आज वह अपने पिता के पास आया और बोला, ‘‘क्या आप को नहीं लगता कि प्रकाश की आवाजाही कुछ ज्यादा बढ़ने लगी है? अब तो महल्ले में लोग बातें भी बनाने लगे हैं…’’

साथ ही साथ सुशील ने अपने मोबाइल को राममोहन की नजरों के सामने कर दिया. मोबाइल की स्क्रीन पर एक तसवीर थी, जिस में प्रकाश और रीता एकदूसरे के साथ ऐसे चिपक कर बैठे थे, जैसे पतिपत्नी हों.

सुशील ने बताया कि रीता के मोबाइल में यह तसवीर उस की बड़ी बेटी ने अनजाने में ही ले ली थी और आज जब रीता के नहाने जाने के बाद  सुशील उस के मोबाइल की भर चुकी मैमोरी की तसवीरें डिलीट कर के खाली कर रहा था, तभी उस की नजर इस तसवीर पर पड़ी और उस ने अपने मोबाइल में उस तसवीर को ले लिया.

राममोहन पर इन सब बातों का कोई असर नहीं हुआ और वे बोले, ‘‘ये सारी बातें मुझ से छिपी नहीं हैं. पर जैसे भी हो, आज हमारे वंश को आगे ले जाने वाला एक लड़का तो हमें प्रकाश ने ही दिया है, इसलिए जैसा चल रहा है, वैसा ही चलने दो और अपना मुंह बंद रखो. और हां, हो सके तो अपनी आंखें भी बंद कर लो.’’

सुशील अपने पिता की बातें सुन कर सन्न रह गया. आज सुबह से ही सुशील अपने कागजपत्र इकट्ठे कर रहा था, क्योंकि उसे अनाथ बच्चों के भविष्य के लिए चंदा जमा करने के लिए मंत्रीजी से मिलने जाना था.

‘‘पूरे 2 दिन का प्रोग्राम है. बच्चों का ध्यान रखना,’’ रीता को कह कर सुशील निकल गया था.

सुशील के जाते ही रीता ने एक अलग ही आजादी का अहसास किया और नौकरानी को जल्दीजल्दी काम निबटाने की हिदायत देने लगी.

बीचबीच में प्रकाश का फोन भी आता रहा. रीता उस से पता नहीं क्या फुसफुसा कर बात करती कि किसी और को सुनाई भी नहीं देता था.

आज शाम को रीता के ससुर और उस की बेटियों ने खाना खा लिया और अपने कमरों में आराम करने लगे… राममोहन सोने जाने से पहले अपने पोते को प्यार करना नहीं भूले. आज सुशील भी नहीं था, सो रीता भी अपने बेटे को ले कर बिस्तर पर चली गई थी.

कुछ ही देर बाद रीता के मोबाइल पर प्रकाश का फोन आ गया, ‘तुम से मिलने आ रहा हूं. दरवाजा खुला रखना,’ कह कर फोन कट गया था.

रीता को प्रकाश का इस समय चोरीछिपे आना अजीब तो लगा, पर उस के जिस्म की जरूरत ने उसे प्रकाश को आने से नहीं रोका. तकरीबन आधे घंटे के बाद प्रकाश रीता के साथ उस के बिस्तर पर था.

‘‘कहीं बाबूजी ने तुम्हें देखा तो नहीं?’’ रीता फुसफुसाई.

‘‘अरे, वे हमारे बारे में सब जानते हैं, पर उन्हें तो सिर्फ अपने पोते से मतलब है, जो मैं ने उन्हें दिया है,’’ कहते हुए प्रकाश ने रीता के कपड़े हटाने शुरू कर दिए. आज बहुत दिनों के बाद प्रकाश ने रीता को इस हालत में देखा था, इसलिए उस के अंदर जोश जाग चुका था.

रीता और प्रकाश अभी नाजायज रिश्ते का मजा ले ही रहे थे कि अचानक कमरे का दरवाजा खुल गया. सामने कोई खड़ा था.

रीता ने आंखें फाड़ कर देखा कि वह कोई और नहीं, बल्कि उस का पति सुशील था, जो अपनी बीवी को गैरमर्द के साथ देख कर हैरान था.

रीता ने प्रकाश को धक्का दिया और कपड़े पहनने लगी. प्रकाश भी चौंक गया था, फिर भी वह बेशर्मी दिखाते हुए बोला, ‘‘अरे सुशील, इतनी जल्दी वापस कैसे आ गए? तुम ने तो हमारा सारा मजा ही खराब कर दिया.’’

प्रकाश बाहर जा चुका था और सुशील की समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे. उस की जबान हलक से जा चिपकी थी और आंखें पथरा रही थीं. उस ने रीता को बड़े जबरदस्त तरीके से घूरा, पर रीता पर उस के घूरने का भी कोई असर नहीं हुआ. सुशील उसी समय बिना कुछ कहे वहां से चला गया.

तकरीबन 20 दिन के बाद भी सुशील जब वापस नहीं आया, तो रीता को थोड़ी चिंता हुई. हालांकि उस की आंखों पर तो बेशर्मी का परदा पड़ा हुआ था, फिर भी उस ने पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराना जरूरी समझा, पर तभी उसे एक चिट्ठी मिली, जो साधारण डाक से आई थी. उस में लिखा था :

‘तुम दूसरे आदमी के साथ लड़का पाने के लिए सोई या सिर्फ मजे के लिए, यह तो सिर्फ तुम जानती हो. मैं अगर तुम दोनों के खिलाफ कोई भी कार्यवाही करता हूं, तो उस में मेरी और मेरे खानदान की बदनामी ही होगी, इसलिए मैं खामोश हूं… और मेरी दोनों लड़कियों की जिम्मेदारी अब से मेरी एनजीओ उठाएगी. अफसोस है कि उन की मां के होते हुए भी वे दोनों अनाथालय में पलेंगी.

‘मैं तुम्हारे इस रिश्ते पर खामोश रहा और अब हमेशा के लिए खामोश ही रहूंगा. मेरे पिता ने एक पोते के लिए इस गंदे रिश्ते पर मुंह और आंखें बंद रखने को कहा था. मेरा मुंह तो पहले से ही बंद था और अब मेरी आंखें भी बंद हो रही हैं. ‘और हां, मेरी लाश तुम्हें नहीं मिल पाएगी, क्योंकि मेरा शरीर पानी की लहर के साथ कहां तक बहता चला जाएगा, यह मुझे भी नहीं पता…’चिट्ठी पढ़ कर रीता की समझ में आ चुका था कि सुशील ने जल समाधि ले ली है. पर क्या सुशील की खुदकुशी हकीकत में खुदकुशी थी या रीता द्वारा न चाहते हुए भी की गई हत्या?

न्याय- क्या हुआ था रुकमा के साथ

सांझ का धुंधलका गहराते ही मुझे भय लगने लगता है. घर के  सामने ऊंचीऊंची पहाडि़यां, जो दिन की रोशनी में मुझे बेहद भली लगती हैं, अंधेरा होते ही दानव के समान दिखती हैं. देवदार के ऊंचे वृक्षों की लंबी होती छाया मुझे डराती हुई सी लगती है. समझ में नहीं आता दिन की खूबसूरती रात में इतनी डरावनी क्यों लगती है. शायद यह डर मेरी नौकरानी रुकमा की अचानक मृत्यु होने से जुड़ा हुआ है.

रुकमा को मरे हुए अब पूरा 1 माह हो चुका है. उस को भूल पाना मेरे लिए असंभव है. वह थी ही ऐसी. अभी तक उस के स्थान पर मुझे कोई दूसरी नौकरानी नहीं मिली है. वह मात्र 15 साल की थी पर मेरी देखभाल ऐसे करती थी जैसे मां हो या कोई घर की बड़ी.

मेरी पसंदनापसंद का रुकमा को हमेशा ध्यान रहता था. मैं उस के ऊपर पूरी तरह आश्रित थी. ऐसा लगता था कि उस के बिना मैं पल भर भी नहीं जी पाऊंगी. पर समय सबकुछ सिखा देता है. अब रहती हूं उस के बिना पर उस की याद में दर्द की टीस उठती रहती है.

वह मनहूस दिन मुझे अभी भी याद है. रसोईघर का नल बहुत दिनों से टपक रहा था. उस की मरम्मत के लिए मैं ने वीरू को बुलाया और उसे रसोईघर में ले जा कर काम समझा दिया तथा रुकमा को देखरेख के लिए वहीं छोड़ कर मैं अपनी आरामकुरसी पर समाचारपत्र ले कर पसर गई.

सुबह की भीनीभीनी धूप ने मुझे गरमाहट पहुंचाई और पहाडि़यों की ओर से बहने वाली बयार ने मुझे थपकी दे कर सुला दिया था.

अचानक झटके से मेरी नींद खुल गई. ध्यान आया कि नल मरम्मत करने आया वीरू अभी तक काम पूरा कर के पैसे मांगने नहीं आया था. हाथ में बंधी घड़ी देखी तो उसे आए पूरा 1 घंटा हो चुका था. इतने लंबे समय तक चलने वाला काम तो था नहीं. फिर मैं ने रुकमा को कई बार आवाज दी पर उत्तर न पा कर कुछ विचित्र सा लगा क्योंकि वह मेरी एक आवाज सुनते ही सामने आ कर खड़ी हो जाती थी. मजबूर हो कर मैं खुद अंदर पता लगाने गई.

रसोईघर का दृश्य देख कर मैं चौंक गई. गैस बर्नर के ऊपर दूध उफन कर बह गया था जिस के कारण लौ बुझ गई थी और गैस की दुर्गंध वहां भरी हुई थी. वीरू और रुकमा अपने में खोएखोए रसोईघर में बने रैक के सहारे खडे़ हो कर एकदूसरे को देख रहे थे. सहसा मुझे प्रवेश करते देख दोनों अचकचा गए.

मैं ने क्रोधित हो कर दोनों को बाहर निकलने का आदेश दिया. नाक पर कपड़ा रख कर पहले बर्नर का बटन बंद किया. फिर मरम्मत किए हुए नल की टोंटी की जांच की और बाहर आ गई. वीरू को पैसे दे कर चलता किया और रुकमा को चायनाश्ता लाने का आदेश दे कर मैं फिर आरामकुरसी पर आ बैठी.

वातावरण में वही शांति थी. लेकिन रसोईघर में देखा दृश्य मेरे दिलोदिमाग पर अंकित हो गया था. रुकमा चाय की ट्रे सामने तिपाई पर रखने के लिए जैसे ही मेरे सामने झुकी तो मैं ने नजरें उठा कर पहली बार उसे भरपूर नजर से देखा.

मेरे सामने एक बेहद सुंदर युवती खड़ी थी. वह छोटी सी बच्ची जिसे मैं कुछ साल पहले ले कर आई थी, जिसे मैं जानती थी, वह कहीं खो गई थी. मेरा ध्यान ही नहीं गया था कि उस में इतना बदलाव आ गया था. मेरी दी हुई गुलाबी साड़ी में उस की त्वचा एक अनोखी आभा से दमक रही थी. उस की खूबसूरती देख कर मुझे ईर्ष्या होने लगी.

मैं ने चाय का घूंट जैसे ही भरा, मुंह कड़वा हो गया. वह चीनी डालना भूल गई थी. वह चाय रखने के बाद हमेशा की तरह मेरे पास न बैठ कर अंदर जा ही रही थी कि मैं ने रोक लिया और कहा,  ‘‘रुकमा, यह क्या? चाय बिलकुल फीकी है और मेरा नाश्ता?’’

बिना कुछ कहे वह अंदर गई और चीनी का बरतन ला कर मेरे हाथ में थमा दिया.

मैं ने फिर टोका, ‘‘रुकमा, नाश्ता भी लाओ. कितनी देर हो गई है. भूल गई कि मैं खाली पेट चाय नहीं पीती.’’

वह फिर से अंदर गई और बिस्कुट का डब्बा उठा लाई और मुझे पकड़ा दिया. मैं ने चिढ़ कर कहा, ‘‘रुकमा, मुझे बिस्कुट नहीं चाहिए. सवेरे नाश्ते में तुम ने कुछ तो बनाया होगा? जा कर लाओ.’’

वह अंदर चली गई. बहुत देर तक जब वह वापस नहीं लौटी तो मैं चाय वहीं छोड़ कर उसे देखने अंदर गई कि आखिर वह बना क्या रही है.

वह रसोईघर में जमीन पर बैठी धीरेधीरे सब्जी काट रही थी. उस का ध्यान कहीं और था. मेरे आने की आहट भी उसे सुनाई नहीं दी. कुछ ही घंटों में उस में इतना अंतर आ गया था. पल भर के लिए चुप न रहने वाली रुकमा ने अचानक चुप्पी साध ली थी.

रोज मैं उसे अधिक बोलने के लिए लताड़ लगाती थी पर आज मुझे उस का चुप रहना बुरी तरह अखर रहा था.

सिर से पानी गुजरा जा रहा था. मैं ने उस से दोटूक बात की, ‘‘रुकमा, जब से वह सड़कछाप छोकरा वीरू नल ठीक करने आया, तुम एकदम लापरवाह हो गई हो. क्या कारण है?’’

मेरे बारबार पूछने पर भी उस का मुंह नहीं खुला. मानो सांप सूंघ गया हो. उस के इस तरह खामोश होने से दुखी हो कर मैं ने उस वीरू के बारे में जानकारी हासिल की तो पता चला कि वह विवाहिता है तथा 2 छोटे बच्चे भी हैं. यह भी पता चला कि वह और रुकमा अकसर सब्जी की दुकान में मिला करते हैं.

मुझे रुकमा का विवाहित वीरू से इस तरह मिलने की बात सुन कर बहुत बुरा लगा. यह मेरी प्रतिष्ठा का प्रश्न था. उस की बदनामी के छींटे मेरे ऊपर भी गिर सकते थे. मैं रुकमा को बुला कर डांटने का विचार कर ही रही थी कि गेट के बाहर जोरजोर से बोलने की आवाज सुनाई दी. देखा, एक बूढ़ा व्यक्ति मैलेकुचैले कपड़ों में अंदर आने की कोशिश कर रहा है और चौकीदार उसे रोक रहा है. मैं ने ऊंचे स्वर में चौकीदार को आदेश दिया कि वह उसे अंदर आने दे.

आते ही वह बुजुर्ग मेरे पैरों पर गिर कर रोने लगा. बोला, ‘‘मां, मेरी बेटी का घर बचाओ. मेरा दामाद आप की नौकरानी रुकमा से शादी करने के लिए मेरी बेटी को छोड़ रहा है.’’

मैं ने पूछा, ‘‘तुम्हारा दामाद कौन, वीरू?’’

प्रत्युत्तर में वह जमीन पर सिर पटक कर रोने लगा. मैं भौचक्की सी सोचने लगी ‘तो मामला यहां तक बिगड़ चुका है.’

मैं ने उसे सांत्वना देते हुए वचन दिया कि मैं किसी भी हालत में उस की बेटी का घर नहीं उजड़ने दूंगी.

आश्वस्त हो कर जब वह चला गया तो रुकमा को बुला कर मैं ने बुरी तरह डांटा और धमकाया, ‘‘बेशर्म कहीं की, तुझे शादी की इतनी जल्दी पड़ी है तो अपने बापभाई से क्यों नहीं कहती? विवाहित पुरुष के पीछे पड़ कर उस की पत्नी का घर बरबाद क्यों कर रही है? मैं आज ही तेरे भाई को बुलवाती हूं.’’

वह अपने बाप से ज्यादा हट्टेकट्टे भाई से डरती थी जो जरा सी बात पर झगड़ा करने और किसी को भी जान से मार देने की धमकी के लिए मशहूर था. रुकमा बुरी तरह से डर गई. बहुत दिनों बाद उस की चुप्पी टूटी. बोली, ‘‘अब मैं उस की ओर देखूं भी तो आप सच में मेरे भाई को खबर कर देना.’’

कान पकड़ कर वह मेरे पैरों में झुक गई. इस घटना के बाद सबकुछ सामान्य सा हो गया प्रतीत होता था. मैं अपने काम में व्यस्त हो गई.

मुश्किल से 15 दिन ही बीते थे कि एक दिन दोपहर में जब मैं बाहर से घर लौटी तो दरवाजे पर ताला लगा देख कर चौंक गई. रुकमा कहां गई? यह सवाल मेरे दिमाग में रहरह कर उठ रहा था. खैर, पर्स से घर की डुप्लीकेट चाबी निकाल कर दरवाजा खोला और अंदर गई तो घर सांयसांय कर रहा था. दिल फिर से आशंका से भर गया और रुकमा की अनुपस्थिति के लिए वीरू को दोषी मान रहा था.

शाम हो गई थी पर रुकमा अभी तक लौटी नहीं थी. चौकीदार सब्जी वाले के  यहां पता लगाने गया तो पता चला कि आज दोनों को किसी ने भी नहीं देखा. वीरू के घर से पता चला कि वह भी सवेरे से निकला हुआ था. आशंका से मेरा मन कांपने लगा.

2 दिन गुजर गए थे. वीरू व रुकमा का कहीं पता नहीं था. मैं ने पुलिस में शिकायत दर्ज करवा दी थी. किसी ने रुकमा के बाप व भाई को भी सूचित कर दिया था. सब हैरान थे कि वे दोनों अचानक कहां गुम हो गए. पुलिस जंगल व पहाडि़यों का चप्पाचप्पा छान रही थी. उधर रुकमा का भाई अपने हाथ में फसल काटने वाला चमचमाता हंसिया लिए घूमता दिखाई दे रहा था.

एक सप्ताह बाद मुझे पुलिस ने एक स्त्री की क्षतविक्षत लाश की शिनाख्त करने के लिए बुलवाया जोकि पहाडि़यों के  पास जंगली झाडि़यों के झुरमुट में पड़ी मिली थी. लाश के ऊपर की नीली साड़ी मैं तुरंत पहचान गई जोकि रुकमा ने मेरे घर से जाते समय चुरा ली थी. मुझे लाश पहचानने में तनिक भी समय नहीं लगा कि वह रुकमा ही थी.

रुकमा का मृत शरीर मिल गया था. पर वीरू का कहीं पता नहीं था और उस का भाई अब भी हंसिया लिए घूम रहा था. चौकीदार ने बताया कि पहाड़ी लोग अपने घरपरिवार को कलंकित करने वाली लड़की या स्त्री को निश्चित रूप से मृत्युदंड देते हैं. साथ ही वह उस के प्रेमी को भी मार डालते हैं जिस के  कारण उन के घर की स्त्री रास्ता भटक जाती है.

मुझे दुख था रुकमा की मृत्यु का. उस से भी अधिक दुख था मुझे कि मैं वीरू की पत्नी का घर बचाने में असमर्थ रही थी. मैं बारबार यही सोचती कि आखिर वीरू गया कहां? मैं इसी उधेड़बुन में एक शाम रसोईघर में काम कर रही थी कि पिछवाड़े किसी के चलने की पदचाप सुनाई दी. सांस रोक कर कान लगाया तो फिर से किसी के दबे पैरों की पदचाप सुनाई दी. हिम्मत बटोर कर जोर से चिल्लाई ‘‘कौन है? क्या काम है? सामने आओ, नहीं तो पुलिस को फोन करती हूं.’’

रसोईघर के पिछवाड़े की ओर खुलने वाली खिड़की के सामने जो चेहरा नजर आया उसे देख कर मेरे मुंह से मारे खुशी के आवाज निकल गई, ‘‘तुम जीवित हो?’’

वह वीरू था. फटेहाल, बदहवास चेहरा, मेरे घर के पिछवाडे़ में घने पेड़ों के बीच छिपा हुआ था. किसी ने भी मेरे घर के पीछे उसे नहीं खोजा था. वह डर के मारे बुरी तरह कांप रहा था.

मुझे आश्चर्य हुआ कि मेरे चौकीदार की चौकन्नी आंखों से वह कैसे बचा रहा. मुझे भी उस पर बहुत गुस्सा आ रहा था. उस ने नल ठीक करने के साथ रुकमा को बिगाड़ दिया था. मन करने लगा कि लगाऊं उसे 2-4 थप्पड़. पर उस की हालत देख कर मैं ने क्रोध पर काबू पाना ही उचित समझा.

पिछवाड़े का दरवाजा खोल कर उसे रात के घुप अंधेरे में चुपचाप अंदर बुला लिया क्योंकि मुझे उस की पत्नी व बच्चों को उन का सहारा लौटाना था. मैं ने उसे खाने को दिया और वह उस पर टूट पड़ा. उस का खाना देख कर लगा कि भूख भी क्या चीज है.

वीरू के खाना खा लेने के बाद मैं ने उस से कहा, ‘‘तुम ने यह बहुत घिनौना काम किया है कि विवाहित हो कर भी एक कुंआरी लड़की को अपने जाल में फंसाया. तुम्हारे कारण ही उस की हत्या हुई है. तुम दोषी हो अपनी पत्नी व बच्चों के, जिन्हें तुम ने धोखा दिया. तुम ने तो रुकमा से कहीं अधिक बड़ा अपराध किया है. तुम्हारे साथ मुझे जरा भी सहानुभूति नहीं है पर मैं मजबूर हूं तुम्हारी रक्षा करने के लिए क्योंकि मैं ने तुम्हारी मासूम पत्नी के पिता को वचन दिया है कि उस की बेटी का घर मैं कदापि उजड़ने नहीं दूंगी.’’

ऐसा कहते हुए मैं ने उसे रसोईघर के भंडारगृह में बंद कर ताला लगा दिया. वीरू, रुकमा तथा उस का भाई तीनों अपराधी थे. लेकिन इन के अपराध की सजा वीरू की पत्नी व बच्चों को नहीं मिलनी चाहिए. करे कोई, भरे कोई. इन्हें न्याय दिलवाना ही होगा तो इस के लिए मुझे वीरू की रक्षा करनी होगी.

मुझे वीरू से पता चला कि रुकमा की हत्या के अपराध में उस के जिस भाई को पुलिस ढूंढ़ रही थी वह उस के घर में घात लगाए उस की बीवी व बच्चों को बंधक बना कर छिपा बैठा था. इस रहस्य को केवल वही जानता था क्योंकि रात के अंधेरे में जब वह अपने बीवीबच्चों से मिलने गया था तो तब उस ने उस को वहां छिपा हुआ देखा था.

वीरू को सुरक्षित ताले में बंद कर मैं आश्वस्त हो गई और फिर तुरंत ही रुकमा के भाई को सजा दिलवाने के लिए मैं ने पुलिस को फोन द्वारा सूचित कर दिया. यही एक रास्ता था मेरे पास अपना वचन निभाने का और वीरू की पत्नी व बच्चों का सहारा लौटा कर घर बचाने का, उन्हें न्याय दिलाने का.

मेरी शिकायत पर पुलिस रुकमा के भाई को पकड़ कर ले गई. मैं ने ताला खोल कर वीरू को बाहर निकाल कर कहा, ‘‘जाओ, अपने घर निश्ंिचत हो कर जाओ. अब तुम्हें रुकमा के भाई से कोई खतरा नहीं है. वह जेल में बंद है.’’

वीरू ने अपने घर जाने से साफ मना कर दिया. वह अब भी भयभीत दिखाई दे रहा था. मेरा माथा ठनका. रहस्य और अधिक गहराता जा रहा था. मैं ने उस से बारबार पूछा तो वह चुप्पी साधे बैठा रहा.

मैं क्रोध से चीखी, ‘‘आखिर अपने ही घर में तुम्हें किस से भय है? मैं तुम्हें सदा के लिए यहां छिपा कर नहीं रख सकती. अगर तुम ने सच बात नहीं बताई तो मैं तुम्हें भी पुलिस के हवाले कर दूंगी. क्योंकि सारी बुराई की जड़ तो तुम्ही हो.’’

वह हकलाता हुआ बोला, ‘‘मांजी, किसी से मत कहिएगा, मेरे बच्चे बिन मां के हो जाएंगे. मेरी पत्नी ने मेरे ही सामने रुकमा की हत्या की थी और अब वह मेरे खून की भी प्यासी है. मुझे यहीं छिपा लो.’’

कहते हुए वह फफकफफक कर रोने लगा.

कातिल फिसलन: दारोगा राम सिंह के पास कौनसा आया था केस

कातिल फिसलन: दारोगा राम सिंह के पास कौनसा आया था केस- भाग 3

सलोनी की बात सुनते ही पास खड़ी महिला सिपाही ने उसे मारने के लिए हाथ ऊपर किया, लेकिन राम सिंह ने उसे रोक दिया और सलोनी से पूछा, ‘‘तो तुम्हारी उंगलियों के निशान उस छड़ पर कैसे आए?’’

‘‘मुझे नहीं मालूम साहब… मुझे नहीं मालूम,’’ कहते हुए सलोनी फूटफूट कर रोने लगी. दारोगा राम सिंह बाहर निकला तो उस ने सुधीर को बच्चों के साथ थाने की बैंच पर बैठा पाया.

दारोगा राम सिंह ने सुधीर से कहा, ‘‘तुम अपने वकील से बात कर लो. अगर वकील रखने में पैसों की समस्या आ रही है तो कोर्ट में अर्जी दे देना. कोर्ट तुम को वकील मुहैया कराएगा.’’

दारोगा राम सिंह को उन लोगों से हमदर्दी होने लगी थी, क्योंकि उस ने सुखलाल का असली रूप वीडियो में देख लिया था, लेकिन सुधीर गुस्से में चिल्ला उठा, ‘‘मुझे कोई वकील नहीं करना साहब. मैं क्यों परेशान होऊं उस के लिए, जो उस सुखलाल के साथ गुलछर्रे उड़ाती थी और मुझे ही जेल भिजवा दिया था. हो गया होगा दोनों में पैसों को ले कर झगड़ा और यह खून हो गया.’’

‘‘ऐसा नहीं है सुधीर…’’ दारोगा राम सिंह ने उसे समझाया, ‘‘गैरकानूनी हथियार रखने के जुर्म में तुम्हारी जो गिरफ्तारी पहले हुई थी, वह सुखलाल ने केवल तुम्हारी बीवी को पाने के लिए साजिशन कराई थी. इस में तुम्हारी बीवी का कोई कुसूर नहीं था. वह बेचारी तो बस तुम्हारे लिए उस के आगे झुकती चली गई. वह तुम से और केवल तुम से ही प्यार करती है.’’

सुधीर हैरानी से दारोगा राम सिंह का मुंह ताकने लगा. राम सिंह ने सुखलाल के मोबाइल फोन में मिला वही वीडियो उस के आगे चला दिया.

‘‘नहींनहीं… बंद कीजिए इसे दारोगा बाबू,’’ वीडियो देखता हुआ सुधीर चिल्लाया. सलोनी के शरीर पर सुखलाल का हाथ लगने वाला सीन वह नहीं देख पाया और वहीं बैठ कर रोने लगा. सलोनी के प्रति उस का शक आंसुओं से बाहर निकल चुका था.

सुधीर बोला, ‘‘मैं तो उसी रात सुखलाल को मारने उस के कमरे में गया था साहब, जिस के अगले दिन उस की लाश मिली. उस समय वह सो रहा था, लेकिन कानूनी बंधन का डर मुझे रोकने में कामयाब हो गया और मैं घर से निकल कर पूरी रात तनाव में इधरउधर भटकता रहा.

‘‘कल दोपहर को घर लौटने पर उस हैवान के मरने की खुशखबरी मिली. खैर, चाहे उसे मेरी सलोनी ने मारा हो या जिस ने भी, मैं उस का शुक्रगुजार हूं.’’

पिता को यों रोते देख साथ खड़े बच्चे और भी सहम गए. राम सिंह ने सुधीर को उठाया और लौकअप की ओर इशारा किया. उस का संकेत समझ कर सुधीर बेतहाशा सलोनी से मिलने भागा. सलोनी भी उसे देखते ही उस की ओर दौड़ी, लेकिन दीवार बनी सलाखों ने उस के पैर रोक दिए.

सुधीर उस का हाथ पकड़ कर बोला, ‘‘चिंता मत करना. चाहे जैसे भी हो, तुम को यहां से मैं छुड़ा कर ले जाऊंगा, वरना अपनी भी जान दे दूंगा,’’ इतना कह कर वह वहां से चल दिया.

कुछ दिन बीत गए. दारोगा राम सिंह का बचपन एक अनाथ के रूप में बीता था. मांबाप के बिना बच्चों की क्या हालत होती है, वह अच्छी तरह जानता था. सलोनी थाने में बंद थी और सुधीर वकील खोजने में. ऐसे में उस के बच्चे किस हाल में होंगे?

दारोगा राम सिंह को चिंता हुई तो वह अपनी पत्नी के साथ खानेपीने का कुछ सामान ले कर सुधीर के घर आया. उस का सोचना सही निकला और बच्चे बेसहारा जैसे घर में बैठे मिले.

दारोगा राम सिंह ने उन से पूछा, ‘‘पापा कहां हैं बेटा?’’

‘‘वे तो सुबह से बाहर गए हैं… हम को भूख लगी है, लेकिन पास वाली आंटी ने अभी तक खाना नहीं दिया,’’ बड़े वाले बेटे ने कहा.

दारोगा राम सिंह का कलेजा भर आया. उस ने अपनी बीवी की ओर देखा. राम सिंह की बीवी ने दोनों बच्चों को अपनी गोद में बिठाया और बोली, ‘‘मैं भी तो तुम्हारी आंटी हूं. देखो, मैं लाई हूं खाना.’’

वह उन को खाना खिलाने लगी. कुछ देर सकुचाने के बाद बच्चे उस से घुलनेमिलने लगे.

तभी छोटा वाला बेटा बोल पड़ा, ‘‘आंटीआंटी, मेरे भैया बहुत बहादुर हैं.’’

‘‘अच्छा, क्या किया है भैया ने?’’

‘‘भैया ने उस विलेन अंकल को नीचे गिरा दिया, जो मम्मी को आएदिन परेशान करता था.’’

दारोगा राम सिंह को उस की यह बात सुन कर झटका लगा. उस ने तुरंत उस की ओर देखा, लेकिन फिर समझदारी से काम लेते हुए बड़े वाले बेटे से पूछा, ‘‘बेटा, तुम ने ऐसा क्यों किया जो तुम्हारा यह प्यारा सा छोटा भाई बता रहा है?’’

बड़ा वाला बेटा मुसकरा कर बोला, ‘‘अंकल, मम्मी कहती हैं कि मच्छर मारने वाली दवा पीने से आदमी मर जाता है, इसलिए मैं ने वही दवा उस विलेन अंकल के जूस में मिला दी थी. छोटे भाई ने तो मेरा फोटो भी लिया था.’’

दारोगा राम सिंह के कानों में जैसे बम फूट रहे थे. बड़े वाले बेटे ने उसे मोबाइल फोन में अपना वह फोटो भी दिखाया, जिस में वह सुखलाल के शराब की बोतल को जूस की बोतल समझ के उस में लिक्विडेटर मिला रहा था.

दारोगा राम सिंह कुछ और पूछता, इस से पहले ही छोटा वाला बेटा बोला, ‘‘रात को हम ने चुपके से सीढ़ी पर कंचे रख दिए थे… विलेन अंकल रोज की तरह बाथरूम जाने के लिए बाहर आए और फिसल कर नीचे गिर गए. इस का मैं ने वीडियो भी बनाया है. मेरे भैया… बहुत बहादुर…’’ कह कर वह ताली बजाने लगा.

दारोगा राम सिंह ने वीडियो लिस्ट से जल्दी से वह वीडियो खोजा. सचमुच उस में बड़ा वाला बेटा सीढ़ी पर कंचे रखता दिख रहा था और उस के तुरंत बाद सुखलाल अपना पेट पकड़े वहां आया क्योंकि लिक्विडेटर मिली शराब पी कर सोने के बाद शायद उस की तबीयत बिगड़ रही थी. उस का पैर इसी जल्दी में कंचों पर पड़ा और वह नीचे गिर गया, जहां जमीन पर पड़ी छड़ पेट में धंस गई होगी और वह मर गया.

चूंकि छड़ों के वे टुकड़े सलोनी ने ही उधर फेंके थे, सो उन पर उस की उंगलियों के निशान भी मिल गए, इस घटना का समय बिलकुल वही था जो पोस्टमार्टम में सुखलाल की मौत का बताया गया था.

‘‘बेटा, तुम ने ऐसा क्यों किया?’’ दारोगा राम सिंह ने बड़े बेटे से पूछा.

वह लड़का बोला, ‘‘वे विलेन अंकल मम्मी को हमेशा परेशान करते थे. मैं ने बहुत बार छिप कर देखा था. उस दिन मम्मी के सिर में उन्होंने ही चोट लगा दी थी. जब मैं स्कूल से आया तो पता चला और मुझे बहुत गुस्सा आया.’’

‘‘और यह मोबाइल फोन कहां से मिला तुम को?’’

‘‘यह नानाजी ने हम को दिया है वीडियो गेम खेलने के लिए,’’ बड़े बेटे के कहने के बाद वे दोनों बच्चे फिर खाना खाने लगे.

दारोगा राम सिंह ने अपनी पत्नी की ओर देखा. वह भी हैरान थी. उस ने पूछा, ‘‘बचपन को क्या सजा दी जाएगी?’’

‘‘बचपन किलकने के लिए होता है…’’ दारोगा राम सिंह का चेहरा अब तनाव मुक्त दिखने लगा था. वह हंसते हुए बोला, ‘‘यह केस कानून के लिए एक हादसा माना जाएगा. इन बच्चों की मां भी कुछ दिनों में घर आ जाएगी.’’

सेक्स के दौरान फेविक्विक से चिपका कपल

बात राजस्थान के उदयपुर के गोगुंदा थानांतर्गत केलाबावड़ी के जंगल से शुरू होती है, जिस में 2 जिंदगियां

खत्म हो गईं और एक के माथे पर हत्या का आरोप लग गया. इस जिले में उबेश्वर के जंगलों में मजावद गांव के पास 18 नवंबर, 2022 की सुबहसुबह लाश मिलने की सूचना पर कांस्टेबल विजेश कुमार और कांस्टेबल भवानी सिंह मौके पर पहुंच गए. वहां उन्हें 2 लाशें नग्नावस्था में मिलीं. एक लाश युवक की थी, जबकि दूसरी एक युवती की.

पास में महिला के कपड़े कुरती और लेगी पड़ी थी. जबकि वहीं जींसटीशर्ट भी थी. बरामद लाश के आसपास पाए गए उन के कुछ सामानों से उन की पहचान राहुल मीणा (30) और सोनू कुंवर (28) के रूप में हुई. कांस्टेबल ने इस की जानकारी गोगुंदा के एसएचओ योगेंद्र व्यास को दे दी. उन्होंने उन्हें बताया कि दोनों लाशों को क्षतिग्रस्त किया गया है. ऐसा जान पड़ता है, जैसे मरने वालों पर किसी ने गुस्सा निकाला हो.

उस ने अपने अधिकारियों को यह भी बताया कि पुरुष के गुप्तांग और स्त्री के वक्षों को नुकसान पहुंचाया गया है. शरीर की चमड़ी जगहजगह उधड़ी हुई है.

शहर से ही सटे जंगल में 2 लाशें मिलने से पूरे इलाके में सनसनी फैल गई. पुलिसकर्मियों की इस पहल के बाद उदयपुर के एसपी विकास कुमार ने हत्याकांड की जांच के लिए टीमें बनाईं.

गोगुंदा के एसएचओ योगेंद्र व्यास की देखरेख में जांच शुरू की गई. घटनास्थल से मिले सुराग के आधार पर मालूम हुआ कि राहुल मीणा एक सरकारी स्कूल में टीचर था. दोनों मृतकों का पता भी मालूम हो गया था. उन के घर 10 किलोमीटर के दायरे में स्थित अलगअलग गांवों में थे.

उदयपुर के एसपी विकास कुमार के दिशानिर्देश पर गहन जांच की जाने लगी. पहली प्राथमिकता हत्याकांड में शामिल अपराधियों का पता लगाना और संबंधित साक्ष्य जुटाने की थी. आगे की जांच के सिलसिले में 200 लोगों से पूछताछ की गई और आसपास के 50 स्थानों के सीसीटीवी फुटेज खंगाले गए. दोनों मृतकों के मोबाइल नंबर भी मिल गए, उन की  बीते 2 हफ्ते की काल डिटेल्स निकलवाई गई.

जांच में यब भी पता चला कि दोनों मृतक शादीशुदा थे. उन के अपनेअपने जीवनसाथी थे. शादीशुदा होते हुए भी उन के द्वारा जंगल में सैक्स संबंध के लिए आने का मतलब प्रेमप्रसंग और अवैध रिश्ते का लग रहा था. पुलिस ने मृतक राहुल मीणा की पत्नी से पूछताछ की तो कई संदिग्ध बातों की जानकारी मिली.

उस ने पुलिस को बताया कि उस के पति के अवैध संबंध सोनू कुंवर नाम की महिला से थे. कुछ समय पहले उन की जानपहचान भादवी गुड़ा स्थित शेषनाग मंदिर में आतेजाते हुई थी. वह मंदिर इच्छापूर्ति मंदिर के रूप में दूरदूर तक मशहूर है.

पति के नाजायज रिश्ते के बारे में मालूम होने पर उस ने विरोध जताया था. इसे ले कर उस का पति के साथ हर रोज झगड़ा होने लगा. उन्हीं दिनों उस की मंदिर से जुड़े तांत्रिक भालेश कुमार से मुलाकात हुई. वह पिछले 7-8 सालों से भादवी गुड़ा स्थित उस इच्छापूर्ति मंदिर में रह कर लोगों को कष्ट निवारण के लिए ताबीज बना कर देता था.

इसी के साथ राहुल और सोनू के मोबाइल डिटेल्स से भी एक ऐसा नंबर मिला, जिस पर  लगातार कई बार बातें करने के बारे में पता लगा. वह नंबर उसी तांत्रिक भालेश कुमार का था.

राहुल की पत्नी ने पुलिस को बताया कि उस ने तांत्रिक से मदद मांगी थी. दूसरी तरफ पुलिस को तांत्रिक से राहुल और सोनू के बातचीत करने के सुराग मिलने से जांच की सूई अनैतिक संबंध के साथसाथ तंत्रमंत्र और अंधविश्वास की ओर भी घूम गई.

फिर क्या था पुलिस ने तांत्रिक भालेश कुमार को तुरंत थाने बुलवा लिया. उस से राहुल और सोनू के बारे में पूछताछ की गई. तांत्रिक मंदिर का एक जानामाना व्यक्ति था. उस की समाज में काफी इज्जत थी. उस के पास लोग दूरदूर से अपनी व्यक्तिगत समस्याओं से ले कर घरेलू झगड़े आदि के निदान के लिए आते थे.

यह जानते हुए भी कि भालेश के उपाय निहायत ही अंधविश्वास वाले थे, लेकिन लोग उस के पास मानसिक संतुष्टि के लिए आते थे.

भालेश ने खुद को राहुल और सोनू के साथ किसी भी तरह की गहरी जानपहचान होने से इनकार कर दिया. उस ने बताया कि उस के पास हर दिन अनेक लोगों के फोन आते रहते हैं और लोग उस से मिलते हैं. वे दोनों भी उसी जैसे थे.

पुलिस के यह कहने पर कि दोनों की उस के साथ कई बार लंबीलंबी बातें हुई हैं. यहां तक कि उस ने रात में भी बातें की हैं. उन की हत्या कर दी गई है.

उस की समस्या के बारे पूछे जाने पर भालेश बौखला गया और इस बारे में गुप्त रखने की बात बताई. किंतु जब पुलिस ने उस पर अंधविश्वास बढ़ाने और तंत्रमंत्र कर लोगों को बरगलाने के कानून में जेल भेजने की धमकी दी, तब वह टूट गया.

हालांकि पूछताछ के क्रम में भालेश ने खुद को एक सिद्ध पुरुष और विकट साधना और लंबे समय तक मंत्र जाप करने वाला व्यक्ति बताया.

उस ने यह भी बताया कि उस की इसी योग्यता के पुण्य प्रताप से उसे इस मंदिर में जगह मिली हुई है. यहां वह लोगों की समस्याओं का निदान करता है.

इसी के साथ उस ने कथित तौर पर राहुल और सोनू के बीच अवैध संबंध तथा अंधविश्वास की हैरान कर देने वाली बातें बताईं. साथ ही दोहरे हत्याकांड को अंजाम देने की बात भी कुबूल कर ली.

उस के बाद राहुल और सोनू कुंवर की हत्या के बारे में जो खुलासा हुआ, वह काफी चौंकाने वाला निकला— कोरोना प्रकोप का असर काफी हद तक कम होने के बाद लौकडाउन खुला तो मंदिर भी खुल गए थे. लोगों का आनाजाना शुरू हो गया था. लोग नई तरह की अजीबोगरीब समस्या ले कर आने लगे थे.

इन में अधिकांश लोग प्रेम विवाह, दांपत्य जीवन में तकरार, विवाह टूटने, आर्थिक स्थिति बिगड़ने, कानूनी मामले में फंसने आदि से ले कर अवैध रिश्ते से छुटकारा पाने तक की समस्या के निदान के लिए आते थे.

उन्हीं में राहुल की पत्नी समेत सोनू कुंवर के परिजन भी थे. राहुल की पत्नी ने तांत्रिक भालेश से अपनी समस्या बताई कि वह पति को वश में रखने के लिए कोई उपाय बताए. उस का पति किसी दूसरी औरत के साथ प्रेम संबंध बनाए हुए है और उस की उपेक्षा करता है. यहां तक कि उस के साथ यौन संबंध भी नहीं बनाता है. लंबे समय से राहुल देर रात को घर आ रहा था और शराब पी कर अकसर झगड़ा करता था. इस पर राहुल के परिवार के लोग मंदिर में भालेश जोशी के पास आए और राहुल के ऐसा करने का कारण पूछा.

इस पर तांत्रिक भावेश ने राहुल और सोनू कुंवर के बीच में अफेयर की बात बता दी थी. राहुल के इस व्यवहार से क्षुब्ध हो कर उस की पत्नी तांत्रिक भालेश से मदद मांगने आई थी.

इस सिलसिले में राहुल भी भालेश से मिला था. लेकिन उस की तमन्ना कुछ और ही थी. वह भी प्रेमिका से छुटकारा पाना चाहता था. बताते हैं कि उस की नजर तांत्रिक भालेश की बेटी पर थी. इस कारण सोनू कुंवर से छुटकारा दिलाने का कोई उपाय पूछा.

जबकि सोनू कुंवर भी अलग से भावेश से मिली थी. वह राहुल से गहरे संबंध कायम बनाए रखने और उस के पत्नी से संबंध तुड़वाने की मांग कर रही थी. ऐसे में भालेश उलझन में घिर गया था. वह समझ नहीं पा रहा था कि किस की बात माने और किस के खिलाफ व किस के पक्ष में तंत्र साधना करे.

तंत्रमंत्र और ताबीज आदि से जुड़ी एक सच्चाई को वह अच्छी तरह जानता था कि इस से किसी समस्या का निदान नहीं निकलता है. यह सिर्फ मानसिक संतुष्टि भर होता है. किंतु हां, उस ने भी रोजीरोटी के लिए दूसरे फरेबी तांत्रिकों की तरह ही एक ज्ञानी और सिद्ध तांत्रिक होने का चोला पहन लिया था.

दूसरों की समस्याओं का निदान करने वाले भालेश खुद समस्या में फंस गया था, क्योंकि उसे सोनू कुंवर ने काम नहीं करने पर बदनाम करने की धमकी दी थी.

इसी तरह राहुल तांत्रिक भालेश की बेटी को भी चाहता था. उस ने तांत्रिक से कहा कि वह अपनी तंत्रसाधना के जरिए उस की इच्छा की पूर्ति करे. उस ने धमकी दी कि यदि उस की इच्छा पूरी नहीं हुई तो वह उस के खिलाफ दुष्प्रचार कर उस की छवि को पलक झपकते ही मिटा सकता है. भालेश दोनों तरफ से तंत्रमंत्र के झूठे साम्राज्य के ध्वस्त होने और अपनी बदनामी होने से घबरा गया. उस के सामने उलझन यह थी कि राहुल और सोनू दोनों वशीकरण की साधना करना चाहते थे.

जैसा कि उन्हें मालूम था कि भालेश ने वशीकरण सीख कर और सवा लाख मंत्रजाप कर ही सिद्धि हासिल की है. उस के बारे में लोगों में ऐसी मान्यता थी कि इस जाप के पूरा होते ही उन की हर इच्छा पूर्ण हो जाती है.

एक तरफ भालेश के सामने राहुल की इच्छापूर्ति के लिए बेटी को दांव पर लगाने की बात थी. दूसरी तरफ सोनू की धमकी थी. सोनू कुंवर ने भालेश का हाथ पकड़ते हुए धमकी दी थी कि यदि उस ने उसे वशीकरण नहीं सिखाया तो वह सभी को बता देगी कि उस ने मेरे साथ गलत हरकत करने की कोशिश की है. यह बात पुलिस को भी बता दूंगी और वह जेल जाएगा. उस का बनाबनाया नाम खत्म कर दूंगी.

तांत्रिक ने बेटी के दांव पर लगे होने की बात  सामने नहीं आने दी और उस ने दोनों से छुटकारा पाने के लिए एक साजिश रच डाली. उस ने राहुल और सोनू कुंवर को अपनी इच्छापूर्ति के लिए आखिरी बार यौन संबंध बनाने के लिए राजी कर लिया. इस के लिए वे दोनों तैयार हो गए. तांत्रिक ने दोनों को हिदायत दी कि वे अपनी इच्छाओं के बारे में किसी से जिक्र नहीं करेंगे. घटना वाले दिन यानी 15 नवंबर, 2022 की शाम को तांत्रिक क्रिया के बहाने राहुल और उस की प्रेमिका को गोगुंदा इलाके के एकांत जंगल में ले गया और उन्हें अपने सामने ही सैक्स संबंध बनाने को कहा.

राहुल मीणा और सोनू कुंवर उस के कहे अनुसार सैक्स संबंध बनाने लगे. जिस के बाद उस ने मंत्र जाप करते हुए एक बोतल से तरल पदार्थ उन पर उड़ेल दिया. वह तरल पदार्थ उन दोनों के गुप्तांगों तक भी पहुंच गया.

वह तरल पदार्थ दरअसल फेविक्विक था, जिस के दोनों के बदन पर गिरते ही वे चिपक गए. प्रेमी युगल को जरा भी समय नहीं मिल पाया कि वे उस से बच सकें. कुछ समझ पाते, तब तक वे बुरी तरह चिपक चुके थे. अलग होने की कोशिश में दोनों के गुप्तांगों व शरीर के अन्य हिस्सों की चमड़ी उधड़ गई.

उधर तांत्रिक भालेश ने राहुल का प्राइवेट पार्ट काट दिया और सोनू कुंवर के वक्षों पर भी वार कर दिया. उस के बाद उन दोनों की हत्या कर वहां से वह फरार हो गया. हत्या के लिए उस ने चाकू और पत्थर का इस्तेमाल किया था. हत्याकांड को अंजाम देने के लिए तांत्रिक ने 15 रुपए वाली 50 फेविक्विक खरीदी थीं. उन्हें खोल कर सारा तरल पदार्थ एक छोटी बोतल में भर लिया था.

इतनी अधिक संख्या में फेविक्विक खरीदने को ले कर किसी तरह की साजिश का कोई शक नहीं हुआ, क्योंकि वह ताबीज बनाता था इस वजह से वह पहले भी अकसर फेविक्विक खरीदा करता था.

मर्डर के दौरान तांत्रिक के अंगूठे और हाथपैर पर भी फेविक्विक लग गई थी, जिसे हटाने के प्रयास में उस के हाथपैर की खाल भी उधड़ गई थी. तांत्रिक उस दिन के बाद से पट्टी बांध कर घूम रहा था.

हालांकि उस ने इस दौरान पूरी सतर्कता बरतते हुए हाथों में ग्लव्स पहन रखे थे, फिर भी ग्लव्स के फटने से उस के हाथों में फेविक्विक लग गई थी. पुलिस ने तांत्रिक भालेश से पूछताछ कर उसे कोर्ट में पेश कर जेल भेज दिया.

जल समाधि: आखिर क्यूं परेशान था सुशील? भाग 2

प्रकाश समझ गया था कि लोहा गरम है. उस ने रीता को अपनी बांहों में भर लिया और उस के होंठों को चूमने लगा. रीता भी किसी लता की तरह उस की बांहों में समा गई और फिर दोनों की गरम सांसें पूरे कमरे में गूंजने लगीं. दोनों के शरीर एकदूसरे से ऐसे चिपटे हुए थे, जैसे उन्हें किसी ने एक ही कर दिया हो. उस दिन के बाद उन दोनों ने कई बार जम कर सैक्स का मजा लूटा.

ऐसा नहीं था कि यह जिस्मानी रिश्ता अनजाने में बना था, बल्कि रीता ने जानबूझ कर प्रकाश के साथ संबंध को बढ़ने दिया, ताकि वह उस के साथ हमबिस्तर हो कर एक लड़का पैदा कर सके. यही नहीं, बातोंबातों में रीता ने यह डर भी प्रकाश पर जाहिर कर दिया था कि उसे फिर से लड़की हुई तो क्या होगा? प्रकाश ने रीता से वादा किया था कि उस की मर्दानगी में वह दम है, जो लड़की नहीं, बल्कि लड़का ही पैदा करेगी और अगर फिर भी भ्रूण की जांच में लड़की होती है, तो वह उसे गिरवा देगा.

और ऐसा भी लगता था कि रीता के ससुर ने इन दोनों के बीच आने की कोई कोशिश नहीं की. कहीं न कहीं वे भी चाहते थे कि जो हो रहा है, होने दिया जाए. आखिरकार वे भी तो एक पोता चाहते ही थे. कुछ समय के बाद वही हुआ, जिस का इंतजार रीता को था. वह पेट से हो गई. सुशील खुश तो हुआ, पर अगले पल ही मायूसी ने उसे घेर लिया.

‘‘इस बार भी लड़की हो गई तो…?’’ सुशील बोला. ‘‘हम पहले जांच करा लेंगे, उस के बाद ही इसे पनपने देंगे,’’ यह कहते हुए रीता के चेहरे पर चमक थी. जांच के नतीजे ने बताया कि रीता के पेट में पल रहा बच्चा एक लड़का ही है, तो यह जान कर राममोहन, सुशील और रीता सभी खुशी से झूम उठे.

ठीक समय आने पर रीता ने सुंदर चेहरे वाले गोरे लड़के को जन्म दिया… छोटे बालक को देख कर सब की आंखें फैल गई थीं, क्योंकि राममोहन के परिवार में तो सभी सांवले थे, ऐसे में एक गोरे बालक का जन्म सब को सुहा रहा था. राममोहन तो बस इसी बात से खुश थे कि उन के वंश को आगे बढ़ाने के लिए उन्हें एक पोता मिल गया था. 2 महीने बीत गए थे. रीता अपने बेटे को जी भर कर देखती और मन ही मन अपने उस फैसले पर खुश होती, जब उस ने प्रकाश के साथ संबंध कायम किए थे.

आज प्रकाश रीता के घर पहुंचा, तो राममोहन सिर्फ मुसकरा कर रह गए. रीता अपने कमरे में बैठी थी, जिस की देह चिकनी और गदराई हो गई थी… इधर कई महीनों से प्रकाश रीता के साथ हमबिस्तर भी नहीं हुआ था और आज इसी उम्मीद में वह रीता के पास आया था. प्रकाश ने रीता को चूमना चाहा, तो रीता ने बनावटी गुस्सा दिखाते हुए कहा, ‘‘मुझ से दूर ही रहो, अब मैं एक बेटे की मां हूं.’’ ‘‘अजी, इस में मेरी भी मेहनत लगी है,’’ प्रकाश ने रीता की पीठ सहलाते हुए कहा.

दादी अम्मा : आखिर कहां चली गई थी दादी अम्मा

विश्वास: क्या थी कहानी शिखा की

कातिल फिसलन: दारोगा राम सिंह के पास कौनसा आया था केस- भाग 2

तफतीश पूरी होने तक के लिए सुखलाल के कमरे को सील कर दारोगा राम सिंह वहां से चला गया.

दोपहर को अचानक सुधीर लौट आया. सलोनी भाग कर उस से लिपट गई और पूछा, ‘‘कहां चले गए थे आप अचानक आधी रात से?’’

‘‘दुकान के लिए निकलना है मुझे…’’ सुधीर ने बेरुखी से उसे खुद से अलग करते हुए कहा.

सलोनी उसे देखती रह गई. उस ने फिर बातों का सिलसिला शुरू करना चाहा, ‘‘अरे, पुलिस आई थी यहां. सुखलाल की मौत हो गई न आज…’’

‘‘हां, मुझे पता चला है पड़ोसियों से इस बारे में,’’ सुधीर ने उसे बीच में ही टोक दिया, ‘‘तुम को पैसे की तंगी हो जाएगी, फिर अब तो…’’

सलोनी उस की बात सुन कर सन्न रह गई. सुधीर तीखे लहजे में आगे बोला, ‘‘मेरे कहने का मतलब है कि हम को अब किराया नहीं मिल सकेगा न.’’

इतना कह कर सुधीर अपना थैला ले कर दुकान के लिए निकल गया. सलोनी उस के कहे का मतलब अच्छी तरह समझ रही थी. वह बच्चों को अपनी बांहों में भर कर उदास मन से फिर वहीं बैठ गई.

कुछ दिन ऐसे ही बीतते रहे. उधर सुखलाल की पोस्टमार्टम रिपोर्ट आ चुकी थी. दारोगा राम सिंह उसे पढ़ने में लगा था. सुखलाल की मौत की वजह पेट में लोहे की छड़ धंसना बताई गई थी. बाकी शरीर पर लगी चोटें जानलेवा नहीं थीं. इस के अलावा एक बात जिस ने राम सिंह को चौंका दिया, वह थी सुखलाल के शरीर में मिली जहरीली चीज की मात्रा. जहरीली चीज भी क्या थी, घरों में मच्छर भगाने के लिए काम में आने वाला लिक्विडेटर उस की शराब में मिलाया गया था.

दारोगा राम सिंह को समझ नहीं आ रहा था कि इस का क्या मतलब है? लिक्विडेटर इतना ज्यादा जहरीला नहीं होता कि कोई उस का इस्तेमाल किसी को जहर दे कर मारने के लिए करे. और सुखलाल खुद उसे पीएगा नहीं, फिर यह क्या चक्कर है? फोरैंसिक और फिंगर प्रिंट रिपोर्टें भी उस के सामने थीं. उन के मुताबिक जो छड़ सुखलाल के पेट में धंसी थी, उस पर सुखलाल के अलावा एक और आदमी की उंगलियों के निशान मिले थे. सुखलाल पर एकसाथ इतने सारे हमले कैसे हुए? पहले शराब में जहरीली चीज दी गई, उस के बाद पेट में छड़ घोंपी गई. मारने वाले को इतने से भी संतोष नहीं मिला तो उस ने उस को ऊपर से नीचे गिरा दिया और सुखलाल ने अपने बचाव के लिए किसी को कोई आवाज क्यों नहीं दी?

दारोगा राम सिंह को समझ आने लगा कि सुखलाल की मकान मालकिन सलोनी उस से झूठ बोल रही है. उस ने गुप्त रूप से उस के पड़ोसियों से पूछताछ शुरू कर दी. बाकियों ने तो कुछ खास बात नहीं बताई लेकिन सुखलाल के कमरे की खिड़की के ठीक सामने रहने वाले छात्र विवेक ने कहा, ‘‘सर, उस

रात मैं रोज की तरह जाग कर अपने कंपीटिशन के इम्तिहान की तैयारी में जुटा था तो मैं ने सुधीर भैया को सीढि़यों से ऊपर सुखलाल चाचा के कमरे में जाते देखा था, पर वे बाहर कब आए, इस का मुझे ध्यान नहीं.’’

‘‘अच्छा,’’ राम सिंह को ऐसी ही किसी बात का शक तो पहले से था. उस ने आगे पूछा, ‘‘सुखलाल और सुधीर

की कोई दुश्मनी? वह तो किराएदार था उस का.’’

‘‘सर… वह…’’ विवेक खुल कर कुछ बोलने से बचता दिखा. राम सिंह ने उसे भरोसा दिलाया कि केस में उस का नाम नहीं आएगा.

विवेक ने डरतेडरते कहा, ‘‘सर, सुधीर भैया को शक था सुखलाल चाचा और सलोनी भाभी को ले कर…’’

दारोगा राम सिंह मुसकरा उठा कि यहां भी वही चक्कर. वह वहां से चल पड़ा. गैरकानूनी हथियार रखने के केस में सुधीर के पहले भी गिरफ्तार होने की जानकारी तो उसे अपने थाने के रिकौर्ड से मिल ही चुकी थी. वह चाहता तो सुधीर को सीधे गिरफ्तार कर सकता था, मगर वह अपने महकमे के दूसरे पुलिस वालों सा नहीं था. किसी भी केस को बिना किसी पक्षपात के हल करना उस की पहचान थी.

दारोगा राम सिंह को अब सुखलाल के मोबाइल फोन की तलाश थी. उसे वह न तो सुखलाल के कमरे में मिला था और न ही उस के कपड़ों में. अचानक उस की छठी इंद्रिय ने उस से कुछ कहा और वह उसी जगह आया जहां सुखलाल की लाश पड़ी मिली थी.

दारोगा राम सिंह ने इधरउधर खोजना शुरू किया और आखिर एक पौधे के पीछे छिपा पड़ा सुखलाल का मोबाइल फोन उसे मिल गया.

थाने आ कर दारोगा राम सिंह उसे खंगालने लगा और जल्दी ही अपने काम की चीज उसे नजर आ गई. उस में सुखलाल और सलोनी का एक वीडियो था जो शायद सुखलाल ने चोरीछिपे बनाया था. उस में सुखलाल अपने कपड़े उतारते हुए कह रहा था, ‘बस, मुझे खुश करो, तुम्हारा पति तुरंत थाने से बाहर आ जाएगा.’

वहीं सलोनी उस के आगे गिड़गिड़ा रही थी, ‘मैं अपने पति से बहुत प्यार करती हूं… मुझे ऐसा काम करने को मजबूर मत कीजिए.’

लेकिन सुखलाल ने उस की एक न सुनी और अपने दिल की कर के ही उसे बिस्तर पर लिटा दिया. वीडियो को आगे देखना राम सिंह को सही नहीं लगा. वह हर औरत की इज्जत करता था. उस ने ऐसे भी कई केस देखे थे जहां औरत

ने अपने साथ हुए इस तरह के जुल्मों

का बदला खुद लिया था. उस ने अपनी इसी सोच के साथ एक बार फिर सलोनी से मिलने का फैसला किया और उस के घर पहुंचा.

‘‘दारोगा बाबू, आप यहां,’’ सलोनी उसे देख कर ठिठक गई.

‘‘डरिए नहीं… बस, आप से कुछ जानकारियां चाहिए थीं,’’ दारोगा राम सिंह उसे सहज करने के लिए बोला और सामान्य तरीके से इसी केस के सिलसिले में बातें करने लगा.

इसी बीच दारोगा राम सिंह ने अपना मोबाइल फोन सलोनी के हाथ में दिया जिस से उस की उंगलियों के निशान उस पर आ जाएं और उन का मिलान छड़ पर मिले निशानों से हो सके.

सलोनी उस की यह चालाकी समझ नहीं सकी. राम सिंह ने वापस आ कर उन निशानों की जांच कराई और इस बार फिर उस का सोचना सही निकला. छड़ पर सुखलाल के अलावा सलोनी की

ही उंगलियों के निशान थे. उस ने तुरंत सलोनी को गिरफ्तार कर लिया.

लौकअप में सलोनी दारोगा राम सिंह के सामने रोरो कर कहने लगी, ‘‘दारोगा साहब, मैं ने किसी का खून नहीं किया है. जिंदगी तो मेरी उस सुखलाल ने बरबाद की थी. मैं अकेली उस भारीभरकम आदमी को कैसे मार सकती हूं? मैं ने तो अपने घर की साफसफाई में कुछ दिनों पहले ही लोहे की छड़ों के सारे टुकड़े पास की उसी खाली जमीन में फेंक दिए थे.’’

दादी अम्मा : आखिर कहां चली गई थी दादी अम्मा- भाग 4

जब नर्सिंग होम से डिस्चार्ज होने का समय आया तो दादी अम्मा ने दोनों से कहा, ‘बेटा, अब मुझे घर छोड़ आओ और तुम भी अपना घर देखो. तुम ने मुझ पर बहुत बड़ा एहसान किया है.’

‘यह क्या कह रही हैं, अम्मा. हम दोनों के मांबाप तो रहे नहीं. आप की खिदमत से लगा जैसे उन की कमी दूर हो गई,’ मेहनाज ने कहा.

अम्मा उस के सिर पर हाथ फिराने लगीं. लेकिन अम्मा को आरजू और पोतेपोतियों की याद सता रही थी. इसलिए साजिद और मेहनाज को आगे कभी उन के साथ रहने की तसल्ली दे कर अपने घर आ गईं. उन के आने पर कुछ दिन तक तो बेटेबहुएं उन के आसपास रहे, लेकिन फिर उन का रवैया पहले जैसा हो गया, अम्मा के प्रति उपेक्षित व्यवहार. वे फिर अपनी मौजमस्ती में डूब गए.

कुछ समय बीता तो दादी अम्मा की तबीयत फिर बिगड़ने लगी. अब कौन उन की देखभाल करेगा. वे जबरदस्ती अपने बेटों पर बोझ नहीं बनना चाहती थीं. एक दिन दादी अम्मा ने घर छोड़ दिया. किसी को बता कर नहीं गईं कि कहां जा रही हैं.

आज उन्हें घर छोड़े हुए 1 महीने से ऊपर हो चला था. सभी रिश्तेदारों के बीच खोजा, लेकिन कहीं पता नहीं चला. जब पूरा घर सूना और उजड़ा सा लगा तो बेटों को उन की अहमियत का पता चला. अब वे चाह रहे थे कि किसी भी तरह अम्मा घर वापस आ जाएं. इसीलिए हाजी फुरकान के आगे वे दुखड़ा रो रहे थे.

दूसरे दिन हाजी फुरकान, गफूर मियां, जाबिर मियां और मजहबी कार्यक्रमों के नाम पर चंदा उगाहने वाले रशीद अली को ले कर रेहान के घर पर पहुंच गए. आंगन में दरी बिछा कर उस पर कालीन डाल दी गई और बीच में हुक्का व पानदान रख दिया गया.

‘‘बताओ मियां, क्या परेशानी है?’’ थोड़ी देर हुक्का गुड़गुड़ाने के बाद राशिद अली ने पूछा.

‘‘अम्मा का कुछ पता नहीं चल रहा है. पता नहीं किस हाल में हैं. दुनिया में हैं भी या नहीं?’’ रेहान ने बुझी आवाज में कहा.

‘‘देखो मियां, घबराओ नहीं, हम अपने इलम से अभी पता लगा लेते हैं,’’ जाबिर मियां ने तसल्ली दी, फिर सब से बोले, ‘‘सब लोग खामोश रहें. हमें अपना काम करने दें.’’

वे कुछ देर तक आंखें बंद कर के मुंह ऊपर उठा कर बुदबुदाते रहे. फिर धीरे से बोले, ‘‘बेटा, सब्र से काम लेना. हम ने पता लगा लिया है. तुम्हारी अम्मा अब इस दुनिया में नहीं हैं.’’

‘‘आप ने कैसे पता लगाया?’’ जुबैर ने जिज्ञासावश पूछना चाहा कि गफूर मियां ने उसे बीच में ही झिड़क दिया, ‘‘देखो बेटे, या तो हम पर यकीन करो या फिर हमें बुलाते ही नहीं.’’ फिर हाजी फुरकान पर बिगड़ते हुए बोले, ‘‘मियां, कैसे दीन से फिरे हुए लोगों के घर ले आए हमें. चलो, जाबिर मियां. यहां रुकना अब ठीक नहीं है.’’

इस पर हाजी फुरकान ने जुबैर को डांटना शुरू कर दिया, ‘‘तुम लोग क्या जाबिर मियां को ऐसावैसा समझ रहे हो. बड़े पहुंचे हुए हैं. अपने कब्जे में की हुई रूहानी ताकतों से वे सात समंदर पार की खबर निकाल लेते हैं, यह तो फिर भी यहीं का मामला है. और सुनो, मेरे कहने से तो आ भी गए, वरना ऐसीवैसी जगह तो वैसे भी ये लोग हाथ नहीं डालते हैं,’’ फिर गफूर मियां और जाबिर मियां को समझाते हुए बोले, ‘‘बच्चा है, गलती से पूछ बैठा. आप कहीं मत जाइए, आप की जो खिदमत करनी होगी, उस के लिए ये लोग तैयार हैं. मैं गारंटी लेता हूं.’’

थोड़ी देर तक नाकभौं सिकोड़ने के बाद जाबिर मियां दाढ़ी पर हाथ फेरते हुए रेहान से बोले, ‘‘देखो बेटे, आप की वालिदा को तो कोई वापस ला नहीं सकता, अलबत्ता उन को शांति मिले, इस के लिए काफी कुछ किया जा सकता है.’’

‘‘वह कैसे?’’ रेहान ने पूछा.

‘‘उन के जीतेजी जो ख्वाहिशें अधूरी रह गई हैं उन्हें पूरा कर के उन को सुकून मिल सकता है. बताओ, क्याक्या ख्वाहिशें थीं उन की? फिर हम ऐसे उपाय बताएंगे कि अम्मा को शांति मिल जाएगी और आप लोगों का प्रायश्चित्त भी हो जाएगा,’ जाबिर मियां उगलदान में पान की पीक थूकने के बाद बोले.

‘‘चचाजान, अम्मा को खीर, पान, रसगुल्ले, फल और मुरब्बे बहुत पसंद थे. बिरयानी भी चाव से खाती थीं,’’ फैजान ने बताया.

‘‘अजी मियां, ये दोचार बातें क्या बता रहे हो, हम ने अपने इलम से पता लगा लिया है कि उन्हें क्याक्या पसंद था,’’ जाबिर मियां हुक्का गुड़गुड़ाने के बाद बोले, ‘‘देखो बेटे, तुम्हारी अम्मा को जो पसंद था, उस की लिस्ट हम दे देते हैं. ये सारा सामान ले आओ, जब तक हम और साथियों को बुला लेते हैं.’’

रेहान ने जब लिस्ट देखी तो उस के होश उड़ गए. उस में 40 मुल्लाओं को धार्मिक अनुष्ठान के मौके पर मुर्गमुसल्लम, पुलाव, खीर, फल और मिठाई मिला कर 25 व्यंजन खिलाने और कपड़े दिए जाने के अलावा गफूर मियां और रशीद अली को अलग से 11-11 हजार रुपए दिए जाने की हिदायत दे डाली थी जाबिर मियां ने.

इन कठमुल्लों के फरमान को टालना तीनों भाइयों के बस की बात नहीं थी. फिर भी थोड़ी देर के लिए वे सोच में पड़ गए.

उन्हें चुप देख कर हाजी फुरकान ने व्यंग्यात्मक शब्दों की तोप दागी, ‘‘मियां, ये लोग तो समझो मुफ्त में परेशानी दूर कर रहे हैं, वरना इस नेक काम के तो लाखों लेते हैं. और यह भी समझो कि अगर इन से आप लोगों का रिश्ता बना रहा तो अपनी रूहानी ताकत और तावीजगंडों से आगे भी इस घर को बुरी हवा से बचाए रखेंगे.’’

इस से आगे बढ़ कर गफूर मियां ने और डरा दिया, ‘‘बेटा, सोच लो, अगर मजहब की परंपराओं को भुला दिया तो इस घर को बरबाद होने से कोई नहीं बचा सकेगा, समझे. हमारा क्या, यहां नहीं तो दूसरों के दुखदर्द दूर करेंगे.’’

‘‘आप नाराज मत होइए. कल अम्मा का चालीसवां है. हम सारा इंतजाम कर देंगे. बस, आप दुआएं देते रहें, आप ही सहारा हैं,’’ रेहान उन के आगे गिड़गिड़ाने लगा.

दूसरे दिन सुबह से ही रेहान, जुबैर और फैजान व उन की पत्नियां चालीसवें के धार्मिक अनुष्ठान की तैयारी में जुट गए. घर के आंगन में बड़ी सी दरी बिछ गई, भट्ठियों पर देगें चढ़ा दी गईं और कठमुल्लों के प्रवचनों के लिए छत के कोनों पर लाउडस्पीकर लगा दिए गए.

दोपहर होतेहोते कठमुल्लों की भीड़ आंगन में इकट्ठी हो गई. जाबिर मियां के आदेश पर दरी के बीच में अम्मा की पसंद का नाम ले कर तरहतरह के पकवान सजा दिए गए. आरजू यह सब देख कर दुखी हो रही थी. वह खुले विचारों की थी और रूढि़यों व मजहब के नाम पर धंधेबाजों से उसे नफरत थी.

वह सोच रही थी कि मुसलिम समाज में कितना ढकोसला है. जब दादी अम्मा जीवित थीं तो ये बेटे उन को 2 रोटी और 1 कटोरी दालसब्जी नहीं देते थे और अब उन की मृत्यु हो जाने पर कितने पकवान उन के नाम पर बना रहे हैं, जिन्हें वे स्वयं ही खाएंगे. उसे जब इस ढकोसले से चिढ़ होने लगी तो कमरे में चली गई.

थोड़ी देर बाद जाबिर मियां ने प्रवचन शुरू किया. उन्होंने संबोधन के कुछ शब्द ही बोले थे कि दरवाजा खटखटाने की आवाज आई. कमरे से निकल कर आरजू ने जब दरवाजा खोला तो सामने दादी अम्मा खड़ी थीं, साथ में साजिद और मेहनाज भी थे.

कुछ पल के लिए आरजू चौंकी, फिर ‘दादी अम्मा’ कहते हुए उन से लिपट कर रोने लगी. जब दादी अम्मा आंगन में आईं तो उन्हें जिंदा देख कर अफरातफरी मच गई. तीनों बेटे और बहुएं उन्हें भय व आश्चर्य से देखने लगे.

‘‘घबराओ नहीं, अम्मा जिंदा हैं. लेकिन तुम लोगों ने तो इन्हें जीतेजी मार ही दिया था. जब इन्हें रोटी और कपड़ों की जरूरत थी तो पूछा नहीं और अब पकवानों व कपड़ों के ढेर लगा रहे हो. और ये लोग प्रवचन कर रहे हैं, इन की झूठी मौत का बहाना बना कर कमाई कर रहे हैं,’’ साजिद ने अपने दिल की भड़ास निकाल डाली.

आंगन में सन्नाटा सा छा गया. हाजी फुरकान और उन के साथ आए कठमुल्लों की सिट्टीपिट्टी गुम हो गई. उन्होंने वहां से खिसकने में ही भलाई समझी. कठमुल्लों के जाने के बाद सारे बच्चे अम्मा से लिपट गए.

‘‘कहां चली गई थीं, दादी अम्मा, मुझे छोड़ कर?’’ आरजू ने आंसू पोंछते हुए पूछा.

‘‘मैं बताता हूं,’’ साजिद ने कहा. और फिर साजिद ने जो बताया उसे सुन कर बेटे और बहुएं शर्म से गड़ गए.

दरअसल, पिछली बार जब दादी अम्मा बीमार पड़ीं तो वे लापरवाह बेटों व बहुओं पर बोझ बनने और अपनी देखभाल न हो पाने के दुख से बचने के लिए दूसरे शहर में बुजुर्गों की देखभाल करने वाले संस्थान में चली गईं, ताकि बाकी जिंदगी वहीं काट सकें. वे साजिद और मेहनाज के पास भी यह सोच कर नहीं गईं कि जब सगे बेटेबहुएं अपने नहीं हुए तो दूर के रिश्तेदार पर बोझ क्यों बना जाए. इस की जानकारी होने पर साजिद और मेहनाज ने तमाम दौड़धूप के बाद उन का पता लगाया और किसी तरह उन्हें वापस घर आने के लिए राजी किया.

‘‘अम्मा, हमें माफ कर दो. हम से बड़ी भूल हो गई. अब हम कभी ऐसा नहीं करेंगे. हमें एक मौका दे दो,’’ कहते हुए तीनों बेटे और बहुएं दादी अम्मा के पास आ गए. उन्होंने एकएक कर के सब को गले लगाया. ऐसा करते उन की आंखों में खुशी के आंसू छलक आए.

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