आईएएस टौपर्स की अनूठी प्रेम कहानी

उत्तराखंड के पर्यटकस्थल मसूरी को पहाड़ों की रानी कहा जाता है. यहीं केंप्टीफाल रोड पर स्थित है सन 1959 में स्थापित ऐतिहासिक लालबहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासनिक अकादमी (एलबीएसएनएए), जहां सिविल सेवा के अधिकारियों को प्रशिक्षण दिया जाता है. साल में एक बार आयोजित होने वाले यहां के समारोह में राष्ट्रपति मुख्य अतिथि होते हैं.

अक्तूबर, 2016 के अंतिम सप्ताह की एक दिलकश सुबह को हौस्टल के अपने कमरे में बैठी खूबसूरत और आकर्षक व्यक्तित्व की वारिस आईएएस टीना डाबी किसी सोच में गुम थीं कि उन के कानों में चिरपरिचित मीठी आवाज गूंजी, ‘‘हैलो टीना, क्या सोच रही हो?’’

‘‘ओह अतहर, बस ऐसे ही कुछ सोच रही थी.’’ टीना ने टालने वाले अंदाज में कहा तो अतहर ने नजदीक आ कर पूछा, ‘‘आखिर ऐसे ही क्या सोच रही थी?’’

‘‘यही कि तुम ने मेरे दिल में कितनी जल्दी जगह बना ली, यू आर लविंग परसन.’’

‘‘मुझे तो शायद वक्त लगा, लेकिन तुम ने तो पहली नजर में ही यह काम कर लिया था.’’

‘‘लेकिन सोचा नहीं था कि इतनी जल्दी हम अपनी जिंदगी का अहम फैसला ले लेंगे.’’

‘‘एक बात कहूं टीना?’’

‘‘यस.’’

अतहर ने टीना की आंखों में आंखें डाल कर कहा, ‘‘जब हम किसी चीज को पूरी शिद्दत से चाहते हैं तो पूरी कायनात उसे पूरा करने में लग जाती है. मेरे प्यार का मसला भी कुछ ऐसा ही रहा.’’

उस की बात पर टीना ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘रियली, तुम्हारी ऐसी बातें ही मुझे करीब ले आईं. तुम सचमुच परफैक्ट इंसान हो.’’

‘‘शायद तुम से मिलने के बाद ऐसा हो गया हूं.’’

‘‘ओके.’’

‘‘प्लीज कम, क्लास चलते हैं.’’ अतहर ने कहा.

इस के बाद दोनों रूटीन क्लास के लिए चले गए. प्रतिदिन सुबह पीटी, जिम और योगा के बाद प्रशासनिक पढ़ाई होती है. टीना डाबी और अतहर आमिर उल शफी खान आईएएस टौपर थे. दोनों साथ ही प्रशासनिक प्रशिक्षण ले रहे थे. उन का ताल्लुक वैसे तो अलगअलग जातिधर्म से था, उन के घरों के बीच भी मीलों का फासला था, लेकिन चंद महीने में ही वे एकदूसरे के दिलों के करीब आ गए थे.

उन की धड़कनें एक ही तराना गुनगुनाने लगी थीं तो उन्होंने दिल के इस रिश्ते को छिपाया भी नहीं. इस के बाद वे सुर्खियों में आ गए. उन की मोहब्बत और इरादों से वक्त के साथ हर कोई वाकिफ हो चला था. उन की मोहब्बत परवान चढ़ रही थी. ये ऐसे लमहे होते हैं, जिन्हें हर कोई जीने के साथ यादों के महल में हमेशा के लिए करीने से सजा लेना चाहता है.

वक्त रफ्तारफ्ता बीत रहा था. उन की इस मोहब्बत से पहले चंद लोग ही वाकिफ थे, लेकिन 9 नवंबर को सोशल मीडिया के जरिए टीना ने यह बात जमाने के सामने जाहिर कर दी थी. अतहर और टीना ने प्यार को मंजिल दे कर एकदूसरे को हमसफर बनाने का फैसला कर लिया, क्योंकि उन के इस फैसले से उन के घर वालों को कोई ऐतराज नहीं था.

उन की मोहब्बत का किस्सा जगजाहिर हुआ तो उन्हें जैसे एक अनचाहे तूफान से रूबरू होना पड़ा. प्यार का कोई मजहब नहीं होता. चर्चित आईएएस जोड़ी ने भी प्यार करते वक्त मजहब नहीं देखा. लेकिन उन के इस फैसले से धर्म के ठेकेदारों को ऐतराज हो गया. उन्होंने लव जिहाद से जोड़ कर इसे मजहबी रंग दे दिया.

सोशल मीडिया पर प्रतिक्रियाओं का दौर चल निकला. एक संगठन ने तो टीना के घर वालों को पत्र लिख कर टीना को समझाने और धर्म न बदलने की सलाह तक दे डाली. शादी रोकने या फिर अतहर को हिंदू धर्म अपनाने की बात कही. इस सब से दोनों आहत हुए. प्यार जिंदगी के किसी मोड़ पर कब किसे किस से हो जाए, इस बात को कोई नहीं जानता.

टीना और अतहर के मामले में भी ऐसा ही था, क्योंकि जो जिंदगी का बड़ा फैसला कर रहे थे, वे कुछ महीने पहले तक एकदूसरे को बिलकुल नहीं जानते थे. टीना का संबंध एक आर्थिक रूप से संपन्न दलित परिवार से है. उन के पिता जसवंत डाबी और मां हिमानी टेलीकौम डिपार्टमेंट में इंजीनियर थे. उन का परिवार पहले भोपाल में रहा, उस के बाद करीब 10 साल पहले दिल्ली की बीएसएनएल कालोनी में आ कर शिफ्ट हो गया था.

उस समय टीना सातवीं में पढ़ रही थी. कौन्वेंट औफ जीसस एंड मैरी स्कूल में उन की पढ़ाई हुई. हाईस्कूल और इंटरमीडिएट परीक्षा में वह टौपर रहीं. सन 2014 में राजधानी दिल्ली के सब से अच्छे कालेज माने जाने वाले लेडी श्रीराम कालेज से उन्होंने ग्रैजुएशन किया. पढ़ाई में अव्वल रहने वाली टीना को स्टूडेंट औफ द ईयर भी घोषित किया गया था.

पौलिटिकल साइंस उन का पसंदीदा विषय था. उन के परिवार में मातापिता के अलावा एक बहन रिया थी. इंजीनियर दंपति टीना को सफलता की बुलंदियों पर देखना चाहता था. हिमानी ने बेटी से सिविल सर्विस परीक्षा की तैयारी करने को कहा. वह पढ़ने में होशियार थी ही, इसलिए इस सपने को साकार करने की ठान ली.

टीना की मां ने बेटी की पढ़ाई के लिए नौकरी छोड़ने का मन बना कर घर वालों की सलाह पर रिटायरमेंट ले लिया. उन्हें बेटी पर पूरा भरोसा था. उस ने जुनून के साथ पढ़ाई कर के यूपीएससी की परीक्षा दी. 10 मई, 2016 को परीक्षा परिणाम घोषित हुआ, जिस में कुल 1078 परीक्षार्थी पास हुए. इन सब से खुशनसीब 0256747 रोल नंबर वाली 22 साल की टीना रहीं, जिस ने कम उम्र में ही पहली पोजीशन हासिल कर ली थी. यह कोई मामूली बात नहीं थी. आईएएस की परीक्षा भारत की सब से कठिन परीक्षा मानी जाती है. उस से भी बड़ी बात यह थी कि यह टीना का पहला प्रयास था.

टीना की यह सफलता कोई किस्मत का खेल नहीं थी, इस के लिए उन्होंने शुरू से ही मेहनत की थी. यह उस सपने का फल था, जिस के लिए वह प्रतिदिन 10 से 12 घंटे पढ़ती थी. टीना के साथ दिल का रिश्ता जोड़ने वाले आमिर जम्मूकश्मीर के अनंतनाग के रहने वाले थे. उन के पिता मोहम्मद शफी खान गवर्नमेंट हायर सैकेंडरी स्कूल में अध्यापक और मां ताहिरा गृहिणी थीं.

परिवार में अतहर से छोटा एक भाई और 2 बहनें भी थीं. शफी खान चूंकि खुद शिक्षक थे, इसलिए उन्होंने बच्चों की शिक्षा को भी खास महत्त्व दिया. उन के बडे़ बेटे अतहर ने यूपीएससी परीक्षा में दूसरी पोजीशन हासिल की थी. वह आतंकवाद का दंश झेल रहे कश्मीर से एक मिसाल बन कर निकले कि वहां के नौजवान शिक्षा से भी बड़ा लगाव रखते हैं.

मृदुभाषी अतहर का व्यक्तित्व आकर्षित करने वाला था. टीना के साथ उन के प्यार का सफर भी कुछ अलग रहा. 11 मई को दिल्ली के नौर्थ ब्लौक के डिपार्टमेंट औफ पर्सनल एंड ट्रेनिंग औफिस में आयोजित एक सम्मान समारोह में दोनों की मुलाकात सुबह के समय हुई थी. मुलाकात भले ही साधारण थी, लेकिन अतहर के लिए बेहद खास थी.

इसी पहली मुलाकात में टीना को देख कर उन के दिल की धड़कनें बढ़ गई थीं. वह टीना को अपना दिल दे बैठे थे. उन्हें इस बात का भी मलाल नहीं था कि टीना मेरिट में उन से एक कदम आगे हो कर बाजी मार ले गई थी. वह एकतरफा प्यार का शिकार हो गए थे. कहते हैं, पहली नजर का प्यार बहुत गहरा होता है. अतहर ने कभी सोचा भी नहीं था कि टीना की तरफ वह इस तरह आकर्षित हो जाएंगे.

शाम होतेहोते वह टीना के घर जा पहुंचे. हालांकि बहाना उस के परिवार वालों से मिलने का था, लेकिन दिल का राज कुछ और ही था. दिल के हाथों मजबूर हो कर टीना की चाहत उन्हें उन के दरवाजे तक खींच ले गई थी. उसी दिन दोनों के बीच दोस्ती का रिश्ता बन गया था. कुछ दिनों बाद दोनों प्रशिक्षण के लिए अकादमी चले गए.

अतहर ने टीना का हर तरह से खयाल रखना शुरू कर दिया. वह अपने दिल की बात टीना से खुल कर कह देना चाहते थे, लेकिन कभी हिम्मत नहीं कर पाए. टीना नादान नहीं थी. वह अतहर के जरूरत से ज्यादा लगाव रखने का मतलब समझ रही थी. वह भी अतहर के व्यक्तित्व से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकी थी. इस तरह अतहर ने टीना के दिल में जगह बना ली थी.

जज्बातों को दिल में कैद रखना कोई आसान नहीं होता. अतहर ने अपने दोस्तों के सामने यह राज उजागर किया कि वह टीना से प्यार करते हैं. यह बात टीना को पता चल गई थी, लेकिन वह खामोश ही रहीं. आखिर अतहर ने अपने दिल की बात कहने का फैसला किया और अगस्त, 2016 में दोनों जयपुर गए थे तो अतहर ने अपने दिल की बात टीना से कह दी.

टीना ने इस के लिए वक्त मांगा. शायद वह उसे अच्छी तरह से समझ लेना चाहती थी. दोनों की सोच एक थी और आदतें भी. वक्त के साथ अतहर से रैंक में जीतने वाली टीना दिल से हार गई. पहली नजर से शुरू हुआ प्यार आईएएस अकादमी जा कर परवान चढ़ा. दोनों का वक्त रोज साथसाथ बीतने लगा. उन्होंने प्यार को पंख दे कर जिंदगी भर साथ निभाने का वादा कर लिया. उन्होंने अपने प्यार को छिपाया नहीं और घर वालों के सामने अपने इरादे जाहिर कर दिए. उन के घर वाले मिले और टीना और अतहर की खुशियों पर अपनी रजामंदी की मोहर लगा दी. एक दलित लड़की का मुसलिम लड़के से प्यार जमाने के सामने आया तो सुर्खियां बन गया. प्यार को धर्म की बंदिशों के बीच उलझाने की कोशिश शुरू हो गई. धर्म और जाति को ले कर पहले से ही बड़ी खाईं है. जाति के भीतर भी कई गोत्र होते हैं, लेकिन टीना और अतहर ने इन बंदिशों को तोड़ दिया. अलगअलग जातिधर्म के होने के बावजूद दोनों के घर वाले उन के इस नए रिश्ते से खुश हैं. सगाई के बाद अगले साल वे विवाह करने वाले हैं. टीना का कहना है कि दूसरी जाति और धर्म के लड़के से प्यार कर के उस ने कोई गुनाह नहीं किया है. यह उस की जिंदगी का फैसला है, जिसे किसी के सामने कुछ साबित करने की जरूरत नहीं है. वह अपनी पसंद पर खुश है, उस के मातापिता खुश हैं, लेकिन कुछ आपत्तिजनक कमेंट्स से वह डिस्टर्ब जरूर है. पर सार्वजनिक जीवन में रहने की कुछ कीमत तो चुकानी ही पड़ती है.

अतहर का कहना है कि उस के लिए यह खुशी की बात है कि दोनों एकदूसरे को अच्छी तरह जानतेसमझते हैं. वह टीना को देखते ही उस पर फिदा हो गया था. उसे टीना की मुसकराहट, हर किसी के बारे में अच्छी सोच, खयालात और बातचीत करने का अंदाज बहुत पसंद है. धर्म का इस्तेमाल इंसानों को जोड़ने के लिए किया जाना चाहिए न कि तोड़ने के लिए. इंसान को उस की अच्छाइयों से पहचाना जाना चाहिए न कि उस की जाति या धर्म से.

– कथा पात्रों से बातचीत पर आधारित

नोटबंदी के काले अध्याय की असल कहानी

रेखा गणित से संबंधित एक कहावत है कि किसी बड़ी रेखा को बिना छेड़े छोटी करना हो तो उस के समानांतर उस से बड़ी रेखा खींच दो. ऐसा करने से पहली रेखा खुदबखुद छोटी दिखने लगेगी. 8 नवंबर, 2016 को नोटबंदी के ऐलान के बाद मोदी सरकार भी यही करती दिखी. बैंकों और एटीएम के सामने लगी लंबीलंबी लाइनों को कम करने के लिए सरकार ने नित नए हथकंडे अपनाए. कभी कुछ तो कभी कुछ. कभी रकम थोड़ी ज्यादा तो कभी कम. लेकिन इस का कोई नतीजा नहीं निकला. एटीएम और बैंकों के सामने कतारें और लंबी होती गईं. अपना ही पैसा पाने के लिए, लोग कईकई घंटों तक बैंकों और एटीएम के सामने भिखारी की तरह झोली फैलाए लाइनों में खड़े रहे. कुछ को 2-4 हजार रुपए मिल जाते तो कुछ को बैंकों या एटीएम में रकम खत्म हो जाने की सूचना के साथ खाली हाथ लौटना पड़ता. डेढ़ महीने बाद लाइनें अगर कम हुईं तो इसलिए क्योंकि सरकार के फैसले गिरगिट की तरह रंग बदल रहे थे. यानी बड़ी लाइनों को छोटा करने के लिए उन से बड़ी लाइनें खींची जा रही थीं. बहरहाल, लाइनें तो अब खत्म हो गईं, लेकिन लोगों की परेशानियां अभी खत्म नहीं हुईं. खत्म होने के आसार भी नहीं लगते.

नोटबंदी के पीछे सरकार की मंशा भले ही सही रही हो, जिसे शुरुआती दिनों में ज्यादातर लोगों ने सराहा भी. लेकिन लंबी परेशानियां झेल कर अब अधिकांश लोगों के सिर से इस तथाकथित अच्छाई का भूत उतर चुका है. अब बात डिजि धन पर आ कर ठहर गई है. जो इस मुहिम का शायद अंतिम चरण है. डिजि धन यानी डिजिटल लेनदेन. जाहिर है, डिजिटल लेनदेन की प्रक्रिया 50 प्रतिशत से ज्यादा लोगों के लिए आसान नहीं होगी. जो डिजिटल लेनदेन करेंगे उन के लिए दूसरे तरह के खतरे मुंह बाए खड़े हैं. इन में सब से बड़ा खतरा साइबर अपराधियों का है.

8 नवंबर, 2016 की रात को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब न्यूज चैनल्स पर घोषणा की थी कि आज रात 12 बजे से 500 और 1000 रुपए के नोट लीगल टेंडर नहीं रहेंगे, तभी से देश में आर्थिक आपातकाल जैसी स्थिति बन गई थी. चूंकि तब तक 12 बजने में काफी समय था, इसलिए कितने ही लोग हजार और पांच सौ के नोट ले कर बाजार की ओर दौड़े ताकि थोड़ीबहुत खरीदारी कर के बड़े नोटों का खुल्ला करा सकें.

जिन के पास ज्यादा नोट थे, उन्होंने सोने के जेवरात खरीदे. हालात यह रहे कि कितने ही ज्वैलर्स की दुकानें रात 2 बजे तक खुली रहीं, जिस के चलते उस रात करोड़ों का सोना बिका. वह भी मनमाने रेट पर. अनुमान है कि उस रात ज्वैलर्स ने 5000 करोड़ के गहने और गोल्ड बार बेचे.

8 नवंबर को नोटबंदी के बाद देश में कुछ वैसी ही स्थिति बन गई थी, जैसी संजय गांधी के नसबंदी अभियान की घोषणा और इंदिरा गांधी की आपातकाल की घोषणा के बाद बनी थी. नोटबंदी का उद्देश्य था, लोगों के पास पड़े काले धन को बाहर निकालना और भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाना.

हकीकत यह है कि जितना काला धन बाहर नहीं आया, उस से ज्यादा बैंक वालों ने अंदर ही अंदर काले को सफेद कर दिया. पैसा चूंकि बैंकों में जा रहा था, इसलिए अंदर होने वाले काले कारनामों की उन रसूखदारों के अलावा किसी को खबर नहीं थी, जो अपने काले धन को सफेद करा रहे थे. दूसरी ओर बैंकों के बाहर लाइनों में खड़ा आम आदमी इस सब से अनभिज्ञ अपना नंबर आने के इंतजार में बैंक के गेट को हसरत भरी नजरों से देख रहा था.

नोटबंदी की घोषणा के बाद एक डेढ़ माह तक लोगों ने बैंक और एटीएम के बाहर लाइनों में लग कर जिस त्रासदी को झेला, उसे देख कर लगता था जैसे आम आदमी का कोई वजूद ही नहीं है. उन की स्थिति बिलकुल भेड़बकरियों जैसी होती है, जिन्हें गड़रिया जिधर हांक दे, वे उधर ही चलती जाती है. हकीकत भी यही है, वोट देने के बाद आम आदमी की स्थिति ऐसी ही तो हो जाती है. बागडोर हाथ में आ जाने के बाद सरकार जनता पर कोई भी फैसला थोप सकती है और अगर बहुमत वाला शासक निरकुंश हो तो फिर तो कहना ही क्या. गुजरे दिनों की स्थिति को देख कर तो ऐसा ही लगा.

मोदीजी ने काले धन को बाहर निकालने के लिए देश पर नोटबंदी का जो फैसला थोपा, वह आम जनता के लिए निरंकुश शासक जैसा ही था. हां, उद्योगपतियों, बिजनैसमैनों, रसूखदार लोगों और नेताओं पर इस का कोई असर नहीं पड़ा, जबकि काला धन ऐसे ही लोगों के पास होता है. जिन के पास काला धन था, उन में से ज्यादातर का काला धन बड़े आराम से सफेद हो गया.

शुरुआती दौर में जो लोग नोटबंदी को प्रधानमंत्री का कड़ा कदम और जनता के हित में मान रहे थे, जहांतहां करोड़ों रुपए की नई करेंसी पकड़ी जाती देख उन्होंने खुद को ठगा सा महसूस किया. जाहिर है यह सब बैंक कर्मचारियों की वजह से हुआ था.

नोटबंदी के चक्कर में देश के करोड़ों लोगों ने महीनों तक लंबीलंबी लाइनों में लग कर जो मुसीबत झेली, वह किसी से छुपी नहीं है. लेकिन दूसरी ओर हजारों लोग ऐसे भी हैं जिन्होंने नोटबंदी से जम कर फायदा उठाया. इस मौके का लाभ उठाने वालों में तमाम बैंक कर्मचारी भी हैं और काले धन के वे कुबेर भी, जिन्होंने बैंक कर्मचारियों से मिल कर अपने काले धन को सफेद कराया.

दरअसल, मोदी सरकार को शायद यह उम्मीद नहीं थी कि बैंकों में भी हेराफेरी हो सकती है. इस मामले में सरकार तब चेती जब जहांतहां लाखों रुपए की नई करेंसी पकड़ी जाने लगी. दुख की बात यह कि इसे रोकने के लिए सरकार ने कदम उठाए भी तो काफी देर से और अपर्याप्त.

इस तरह की हेराफेरी की एक वजह यह भी रही कि कोई भी बैंक छोटे खाता धारकों से नहीं चलता. उसे जरूरत होती है बडे़ खाता धारकों की. ऐसे खाताधारक जिन का ट्रांजेक्शन लाखोंकरोड़ों में होता है. ये लोग अपने किसी कर्मचारी को भेज कर लाखों रुपए बैंकों में जमा भी कराते हैं और निकलवाते भी हैं. बैंक मैनेजर या कर्मचारी उन के एक फोन पर सारा काम कर देते हैं.

जाहिर है, बैंक मैनेजर या कर्मचारी सारे नियमों को ताक पर रख कर पहले उन का काम करते हैं. नए नोटों के मामलों में भी ऐसा ही हुआ. 2-4 हजार रुपयों की चाह रखने वालों को जहां 2 से 5-6 घंटे तक लाइनों में लगना पड़ा, वहीं बड़े खाताधारकों को बैकडोर से लाखों की नई करेंसी बड़े आराम से मिलती रही. पुराने नोट बदलने के मामले में भी ऐसा ही हुआ.

अगर यह कहा जाए कि नई करेंसी की सब से ज्यादा हेराफेरी बैंकों में हुई तो गलत नहीं होगा. क्योंकि लाखोंकरोड़ों की करेंसी बैंक से ही बाहर जा सकती थी. यह रकम उद्योगपतियों, बिजनैसमैनों, रसूखदारों, नेताओं या नंबर-2 का धंधा करने वालों के पास ही गई.

टीवी चैनलों पर नोटबंदी को ले कर रोज डिबेट होती रहीं. सभी बड़ी पार्टियों के प्रवक्ता एकदूसरे की खूब छीछालेदर करते रहे, जनता के स्वयंभू मसीहा बन कर उस की परेशानियों का रोना रोते रहे. लेकिन उन्होंने कभी भी एकदूसरे से ये नहीं पूछा कि तुम्हारे पास नई करेंसी कहां से आई, जो ऐशोआराम की जिंदगी जी रहे हो. यह सवाल किसी एंकर की लिस्ट में भी नहीं था कि आप में से किसी के परिवार का कोई आदमी लाइन में लगा क्या? मतलब सीधा सा है कि जो खुद को आम आदमी का नुमाइंदा समझते हैं, उन में कोई भी न तो आम आदमी है और न आम आदमी का रहनुमा. ये लोग सारे खेल बैठेबैठे खेलते हैं.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नोटबंदी की योजना 6 लोगों की टीम के साथ मिल कर बनाई थी. टीम के सभी सदस्य विश्वसनीय थे. इस बात का पूरा ध्यान रखा गया था कि नोटबंदी की घोषणा तक योजना की गोपनीयता पूरी तरह बनी रहे. मोदी के बाद इस टीम के मुखिया थे वित्तीय सेवाएं सचिव हसमुख अढि़या.

58 वर्षीय अढि़या गुजरात में नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में 2003 से 2006 तक प्रमुख सचिव रह चुके हैं. उसी दौरान दोनों के रिश्ते मजबूत हुए. अढि़या ने अपनी निष्ठा और विवेक से नरेंद्र मोदी की नजरों में अपनी खास इमेज बना ली थी. सितंबर 2015 में हसमुख अढि़या का नाम राजस्व सचिव के रूप में सामने आया. हालांकि यह पद वित्तमंत्री अरुण जेटली के अधीन आता है, लेकिन अढि़या सीधे नरेंद्र मोदी के संपर्क में रहते थे.

6 महीने में बनी इस योजना में प्रधानमंत्री निवास के 2 कमरों का इस्तेमाल किया गया. जहां रिसर्च चल रही थी, वहां जब कोई खास बात होती थी तो मोदी और अढि़या गुजराती में बात करते थे, जिसे कोई नहीं समझ पाता था. इस काम में लगाए गए अन्य लोग प्रधानमंत्री के सोशल मीडिया अकाउंट और ऐप संभालते थे. इस टीम का फीडबैक मिलने पर ही मोदी ने 8 नवंबर को नोटबंदी से पहले कैबिनेट की मीटिंग बुलाई.

उस मीटिंग में अपनी योजना बताने के बाद नरेंद्र मोदी ने मौजूद सदस्यों से कहा कि अगर नोटबंदी फेल होती है तो जिम्मेदारी सिर्फ मेरी होगी. इस के बाद 8 नवंबर की रात को नोटबंदी की घोषणा कर दी गई. इस के समर्थन में पहला ट्वीट भी हसमुख अढि़या ने ही किया.

बताया जाता है कि काले धन के खिलाफ पिछले एक साल से काम चल रहा था. इस के तहत रिजर्व बैंक से अलगअलग समय पर कई सवाल भी पूछे गए. लेकिन इस तरह कि कोई समझ न सके. अगस्त 2016 में 2000 के नोट डिजाइन करने की बात भी सामने आई. नोटबंदी का ऐलान 18 नवंबर को होना था, लेकिन योजना लीक होने के डर से 10 दिन पहले ही नोटबंदी का ऐलान कर दिया गया, बिना पूरी तैयारी के. यह शायद बंपर जीत के बाद सत्ता में आए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कौंफीडेंस था, जो पूरे देश पर भारी पड़ा.

प्रधानमंत्री मोदी ने इलेक्शन से पहले जो वादे किए थे, उन में एक वादा यह भी था कि वे विदेशों में जमा धनपतियों और नेताओं का काला धन लाएंगे. अगर वह धन आ गया तो इतना होगा कि देश के हर खाते में डाला जाए तो हरेक के हिस्से में 15-15 लाख रुपए आ जाएंगे. निस्संदेह, न तो यह असान था और न ही प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी ऐसा कर पाए.

कोई और नेता होता तो भी यह संभव नहीं था. मोदी के इस वादे को विरोधी पार्टियां पकड़ कर बैठ गईं. चुनाव प्रचार के बाद उन्होंने इस वादे को अपने हिसाब से डायवर्ट कर के पूछना शुरू कर दिया कि मोदी हर खाते में जो पंद्रह लाख रुपए डालने वाले थे, उस का क्या हुआ? जब बारबार यह बात उठी तो अमित शाह ने कह दिया कि वह चुनावी जुमला था. इस के बाद विरोधी पार्टियों ने दोनों बातों को जोड़ कर प्रधानमंत्री पर तंज कसने शुरू कर दिए.

संभवत: प्रधानमंत्री के मन में यह बात गहरे तक बैठी थी. इसी के चलते उन्होंने विदेश न सही तो देश के धनकुबेरों का ही काला धन निकालने का फैसला कर लिया. इस में शायद वह कामयाब भी हो जाते अगर सोचविचार कर अथवा पूरी तैयारी कर के फैसला लिया गया होता. इस सब का खामयाजा भोगना पड़ा आम आदमी को, गरीबों को, मेहनतकश लोगों को. इस के बाद भी ज्यादातर लोग मोदीजी के इस फैसले को सही बताते रहे तो सिर्फ इसलिए क्योंकि वे जल्दी ही स्थिति सामान्य होने की उम्मीद लगाए बैठे थे.

स्थिति कुछ हद तक सामान्य हो भी जाती अगर सरकार ने 500 रुपए के पर्याप्त नोट छापे होते और बैंकों में मौजूद 100 रुपए के नोटों का सही वितरण हो पाता. कुछ लोगों के हाथों में आए भी तो 2000 के नोट, जो तब तक किसी काम के नहीं थे, जब तक बाजार में पर्याप्त मात्रा में छोटी मुद्रा न हो, जो थी ही नहीं. इस का सब से ज्यादा असर गरीब, मेहनतकश तबके पर पड़ा.

शादियों का सीजन होने की वजह से पैसे के अभाव में कितनी ही शादियां रुक गईं. बीमार लोग इलाज से वंचित रह गए. कितने ही चूल्हे ठंडे पड़े रहे, मजदूरों को काम मिलना बंद हो गया. छोटेछोटे उद्योग बंद हो गए. कामगरों की छुट्टी कर दी गई. किसानों की रबी की फसल ठीक से नहीं बोई जा सकी.

इतनी परेशानियों के बाद भी जब प्रधानमंत्री ने सब कुछ ठीक कर देने के लिए 50 दिन का समय मांगा तो भी लोगों ने उन की बातों पर भरोसा कर लिया. लेकिन उन का भरोसा तब दरकने लगा जब देश के कोनेकोने में लाखों करोड़ों की नई करेंसी पकड़ी जाने लगीं, काला धन पकड़ा जाने लगा. इस का मतलब था कि मोदी का नोटबंदी अभियान फेल हो गया था. लाइनों में लगे लोगों को जहां 2-4 हजार रुपए नहीं मिल रहे थे, वहीं कुछ लोग लाखों करोड़ों की नई करेंसी लिए घूम रहे थे.

24 नवंबर, 2016 को दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने हजरत निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन पर पीतमपुरा के रहने वाले अजितपाल सिंह और राजेंद्र सिंह को 27 लाख रुपए की नई करेंसी के साथ पकड़ा. सारी करेंसी 2000 के नोटों में थी, जिसे ये लोग मुंबई से लाए थे. पता चला ये हवाला करोबारी अब तक इसी तरह मुंबई से 1 करोड़ 5 लाख रुपए ला चुके थे.

इसी तरह करोलबाग के एक होटल से 14 दिसंबर को दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच की टीम ने हवाला कारोबार से जुड़े 5 लोगों अंसारी आफाम, फैजल कौशर खान, अंसार अबू जार, लाडू राम और महावीर सिंह को पकड़ा. ये लोग होटल तक्ष के कमरा नंबर 202, 206 और 106 में ठहरे थे. इन लोगों के पास से 3 करोड़ 25 लाख रुपए के पुराने नोट बरामद हुए, जो इन्होंने 4 सूटकेसों और एक कार्ड बोर्ड कार्टन बौक्स में रख रखे थे.

ये लोग विभिन्न राज्यों से पुराने नोट मुंबई के ललितभाई भोलू भाई के पास ले जाते थे. वह कमीशन के आधार पर पुराने नोटों की जगह नए नोट दे देता था. इस से पहले ये लोग दिल्ली से इसी तरह 3 बार करोड़ों की रकम मुंबई ले जा चुके थे.

खास बात यह कि ये लोग इतनी बड़ी रकम हवाई जहाज से ले जातेलाते थे. एयरपोर्ट पर इन के पकड़े न जाने की वजह यह थी कि ललितभाई के एक्सपर्ट्स रुपयों की गड्डियों को सूटकेसों में नीचे रख कर ऊपर से डबल साइडेड टेप चिपका देते थे और उस के ऊपर काला कपड़ा रख कर इंटरनेट का तार या केबल डाल देते थे. इस तरह एयरपोर्ट का विशेष स्कैनर भी इस रकम को नहीं पकड़ पाता था. पकड़े जाने तक ये लोग इसी तरह 20 करोड़ की रकम मुंबई ले जा चुके थे.

पकड़े गए लोगों ने बताया कि नोटबंदी के बाद से हवाला करोबार का तरीका बदल गया है. 8 नवंबर से पहले हवाला का काम जहां कोडवर्ड या नंबर के आधार पर होता था, जब यह बंद हो गया तो हवाला कारोबारी पुरानी करेंसी की जगह नए नोट दे कर अपना काम चलाने लगे. आफान ने बताया कि दिल्ली के हवाला कारोबारी नेताओं, अफसरों और बिजनैसमैनों का काला धन मुंबई भेज कर नई करेंसी मंगा रहे थे.

जिस तरह से नोटबंदी के बाद नई करेंसी पकड़ी गई, उस से साफ पता चलता है कि सारी हेराफेरी बैंकों में ही हुई. आयकर अधिकारियों ने औचक छापों में कर्नाटक सरकार के 2 इंजीनियरों और 2 ठेकेदारों के बेंगलुरु स्थित घरों से 4.7 करोड़ की नई करेंसी, 6 करोड़ के पुराने नोट और 7 किलो सोना जब्त किया.

कर्नाटक के आयकर अधिकारी एलेक्स मैथ्यू के अनुसार सब से ज्यादा जब्ती पीडब्ल्यूडी के इंजीनियर ए.सी. जयचंद्रन के फ्लैट से हुई. उस के बहुमंजिला अपार्टमेंट के बेसमेंट में खड़ी 2 महंगी कारों लेंबोरगिनी और पोर्शे लिमोजिन को भी इस केस में अटैच कर दिया गया. इनकम टैक्स के एक इसी तरह के छापे में 9 दिसंबर को चेन्नै के एक ज्वैलर्स से 106 करोड़ रुपए की रकम और 127 किलोग्राम सोना जब्त किया गया. बरामद की गई रकम में 10 करोड़ के नए नोट भी शामिल थे. इस से पहले आयकर विभाग ने बेंगलुरु में 5.7 करोड़ रुपए के नए नोट जब्त किए थे.

ओडिसा के संबलपुर की पुलिस टीम ने 4 दिसंबर को नोट बदलने वाले एक गिरोह से 1 करोड़ 42 लाख 91 हजार रुपए के 500 रुपए के नए और पुराने नोट पकड़े. पकड़े गए लोगों से पता चला कि इस गड़बड़झाले में शराब व्यवसाई जियारत अली और भारतीय स्टेट बैंक की शाखा के जनसंपर्क अधिकारी रश्मि रंजन राउत भी शामिल हैं.

पुलिस और आयकर विभाग ने आगे की जांच में जियारत अली, उस के बेटे मोहम्मद कजाफी और रिफत अली, सबतिन अली, स्टेट बैंक की प्रमुख शाखा के जनसंपर्क अधिकारी रश्मि रंजन राउत व उस के भाई पंकज कुमार राउत को गिरफ्तार किया. इन लोगों के पास से 85 लाख 62 हजार रुपए के 500 और 2000 रुपए के नए नोट मिले. ये लोग कमीशन ले कर पुराने नोटों को नए में बदलते थे.

रविवार 11 दिसंबर को क्राइम ब्रांच ने दिल्ली के गे्रटर कैलाश स्थित ला फार्म ‘टी ऐंड टी’ पर छापा मार कर 13 करोड़ 50 लाख रुपए की करेंसी बरामद की. इन में ढाई करोड़ 2000 के नोटों की शक्ल में थे. यह फर्म सुप्रीम कोर्ट के वकील रोहित टंडन की थी. बताया जाता है कि रोहित के एक बिल्डर और एक कांग्रेसी नेता से करीबी संबंध थे. उस के पास दिल्ली और एनसीआर में 125 करोड़ की प्रौपर्टी भी बताई जाती है.

दिल्ली की क्राइम ब्रांच को सूचना मिली थी कि छावला में रहने वाले प्रौपर्टी डीलर सुखवीर शौकीन के पास बड़ी संख्या में नए नोट हैं. क्राइम ब्रांच ने इनकम टैक्स डिपार्टमेंट के साथ छापा मारा तो 64 लाख 84 हजार रुपए की रकम मिली. इन में 11 लाख 34 हजार रुपए के नए नोट थे. साथ ही एक करोड़ की ज्वैलरी भी बरामद हुई. उसी दिन घारूहेड़ा में एक स्विफ्ट कार में सवार 2 युवकों के पास से 6 लाख के नए नोट बरामद किए गए.

8 दिसंबर को आयकर विभाग ने चैन्नै में रेत खनन कारोबारी एस रेड्डी के 8 ठिकानों पर छापा मार कर 142 करोड़ की नकदी और 36.29 करोड़ कीमत का 127 किलोग्राम सोना जब्त किया. रेड्डी के पास पूरे राज्य में रेत खनन का लाइसेंस है. छापे में मिली रकम में 9.63 करोड़ के 2000 रुपए के नए नोट थे. रेत खनन व्यवसाई ने दावा किया है कि यह रकम और सोना उस का है.

8 दिसंबर को ही सूरत पुलिस ने 4 लोगों को कार में 2000 रुपए के नए नोटों की शक्ल में 76 लाख रुपए ले जाते हुए पकड़ा. इन में एक फैशन डिजाइनर युवती भी थी. इसी दिन पुलिस ने पोरबंदर के राणावाव में 25 लाख रुपए के नोट बरामद किए. पकड़े गए तीनों लोग गुजरात के थे. 6 दिसंबर को ही क्राइम ब्रांच ने गुड़गांव में 10 लाख की नए नोटों की करेंसी पकड़ी. यहां भी सारे नोट 2000 के ही मिले. इसी तारीख मे मुंबई क्राइम ब्रांच ने दादर क्षेत्र की हिंदू कालोनी से 85 लाख रुपए के नए नोट पकड़े.

इसी तरह 11 दिसंबर को फरीदाबाद पुलिस ने 2 अलगअलग मामलों में 64 लाख रुपए के नए नोटों के साथ 6 लोगों को पकड़ा. इन में से सेक्टर 30 की क्राइम ब्रांच ने 27.30 लाख रुपए के साथ 2 युवकों को पकड़ा. ये 20-25 प्रतिशत कमीशन ले कर पुराने नोटों की जगह नए नोट देते थे. पकड़े गए युवक दिल्ली के थे. बाकी रकम मुजेसर की पुलिस ने पकड़ी थी, जो 2 हजार के नोटों की शक्ल में थी.

काले धन के कुबेरों ने बैंक वालों से मिल कर धांधलियां तो खूब की, लेकिन सब न सही कुछ लोग कानूनी शिकंजे में फंसते रहे. नोटबंदी के 32 दिन बाद 10 दिसंबर को आयकर विभाग ने कर्नाटक के चित्रदुर्ग के एक हवाला एजेंट के घर छापा मारा तो 5.7 करोड़ रुपए के नए नोट, 90 लाख रुपए के 500 और 1000 रुपए के नोट और 32 किलोग्राम सोना मिला. यह रकम और सोना बाथरूम में एक गुप्त तिजोरी बना कर रखे गए थे. स्टील की तिजोरी वाश बेसिन के ऊपर टाइलों के पीछे छिपाई गई थी. इसे खोलने के लिए विंडो के पास एक सीक्रेट बटन था. बटन दबाने पर तिजोरी टाइल के साथ खुल जाती थी. उसी दिन आयकर विभाग की काररवाई में 3 शहरों चैन्नै, हैदराबाद और दिल्ली में अलगअलग जगहों से 33.56 करोड़ की नई करेंसी जब्त की गई, जो साफ इशारा करती थी कि सारी गड़बड़ी बैंकों से ही हुई है.

हिमाचल प्रदेश की सीमा पर स्थित कालाअंब में पुलिस ने सिंडीकेट बैंक की पावटा साहिब शाखा के मैनेजर रोहित की मारुति कार से एक ट्रंक बरामद किया जिस में 30 लाख की नई करेंसी थी. ट्रंक में 24 लाख के 2-2 हजार के नोट थे और 5 लाख कीमत के 500-500 के नेट. बाकी रकम सौ-सौ के नोटों में थी. जाहिर है, बैंकों के अधिकारी जनता की चिंता छोड़ कर अपनी जेबें भरने में लगे थे.

बैंकों की बात करें तो सब से बड़ा घोटाला एक्सिस बैंक की शाखाओं में हुआ. इसी के चलते बैंक के 27 अफसरों को सस्पैंड कर दिया गया. दरअसल, मंगलवार 13 नवंबर को उत्तरी जिला पुलिस ने शाम को एक्सिस बैंक की कश्मीरी गेट शाखा के बाहर एक ज्वैलर, एक चार्टर्ड एकाउंटेंट और उस के सहायक को दबोचा. इन के पास से 3 करोड़ 70 लाख रुपए के पुराने नोट बरामद हुए.

पूछताछ में ज्वैलर ने बताया कि एक्सिस बैंक के मैनेजर से उस की सांठगांठ है और इस से पहले भी वह मैनेजर के माध्यम से करोड़ों के पुराने नोट बदलवा चुका है. उस ने यह भी बताया कि इस के एवज में वह बैंक के 2 मैनेजरों को सोने की ईंट दे चुका है. पुलिस ने यह बात इनकम टैक्स रेवेन्यू इंटेलिजेंस के असिस्टेंट डायरेक्टर को बता दी. असिस्टेंट डायरेक्टर की टीम ने तीनों व्यक्तियों से 8 घंटे पूछताछ की. इस के बाद उन का 3 लाख 70 हजार रुपया जब्त कर के उन्हें छोड़ दिया गया. प्रवर्तन निदेशालय ने इस सब की लंबी जांच कर के केस दर्ज कराया और 5 दिसंबर, 2016 को प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की टीम ने एक्सिस बैंक के 2 मैनेजरों विनीत गुप्ता और शोभित सिन्हा को गिरफ्तार कर लिया.

इन लोगों ने ऐसी फर्जी कंपनियों के खातों में 39 करोड़ रुपए के पुराने नोट जमा करवाए थे, जिन का डायरेक्टर मजदूर और गरीबों को बनाया गया था. इस के बदले में इन मैनेजरों ने सोने की 2 ईंट ली थीं. साथ ही इन्हें 2 पर्सेंट कमीशन अलग से मिलना था. इन खातों में जमा पैसा आरटीजीएस से वापस कर दिया गया, जो ज्वैलर को मिल चुका था.

शोभित सिन्हा के लखनऊ स्थित घर से 2 किलो सोने की ईंट बरामद भी हो गई. इस मामले से जुड़े ज्वलैर से 1 किलो सोने की ईंट पहले ही जब्त कर ली गई थी. दोनों मैनेजरों को तत्काल प्रभाव से सस्पेंड कर के जेल भेज दिया गया. ज्वैलर ने बताया कि नोटबंदी के अगले दिन ही एक दलाल ने उसे इन मैनेजरों से मिलवाया था. इस के बाद वह मैनेजरों से अपना और दूसरे ज्वैलर्स का काला धन बोगस खातों में जमा कराने लगा था. शाम के 5 बजे के बाद बैंक का शटर गिरा कर यही गोरखधंधा होता था.

ज्वैलर की पुराने नोटों वाली रकम को वर्किंग आवर में ही जमा दिखाया जाता था. अगले दिन फर्जी खातों में जमा रकम आरटीजीएस के जरिए ज्वैलर के खातों में भेज दी जाती थी, जिसे वह 31 से 32 हजार रुपए प्रति दस ग्राम की दर से सोने की बिक्री में दिखा देता था. हकीकत में यह सोना पुराने नोट वालों को 45 हजार से 50 हजार रुपए प्रति 10 ग्राम के हिसाब से बेचा जाता था.

चांदनी चौक का एक्सिस बैंक भी पीछे नहीं था. आयकर विभाग ने एक्सिस बैंक की चांदनी चौक शाखा में ऐसे 44 खाते पकड़े, जिन से 100 करोड़ रुपए निकाले गए थे. इन में से किसी भी खाते ने केवाईसी मानक पूरा नहीं किया था.

इनकम टैक्स डिपार्टमेंट ने नोएडा के सेक्टर 51 स्थित एक्सिस बैंक पर छापा मार कर 40 फर्जी एकाउंट पकड़े. नोटबंदी के बाद इन खातों में पुरानी करेंसी जमा कर के आरटीजीएस के जरिए 60 करोड़ रुपए दूसरे खातों में भेजे गए थे. फर्जी खातों में 20 खाते फर्जी सेल्स कंपनियों के नाम पर खुलवाए गए थे. एक खाता धारक को फोन कर के पूछा गया तो वह हैरान रह गया. उस ने बताया कि वह तो मजदूर है. यहां भी कई बैंक कर्मचारियों को सस्पेंड किया गया. एक्सिस बैंक की कृष्णानगर शाखा में भी इसी तरह की गड़बड़ी पाई गई.

सीबीआई ने बेंगलुरु में भी पुराने नोटों के बदले नए नोट देने वाले एक बड़े सिंडीकेट का परदाफास किया. सीबीआई द्वारा 10 जगह डाले गए छापों में कर्नाटक बैंक और धनलक्ष्मी बैंक के मैनेजरों की भूमिका भी पाई गई थी. इस साजिश में एटीएम में नोट डालने वाली कंपनी सिक्योर वैल्यू इंडिया भी शामिल थी. ये लोग एटीएम में भरने के लिए लाए गए नोटों को सीधे काले धन के कारोबारियों के पास पहुंचा देते थे और उन से पुराने नोट ले कर बैंकों में जमा करा देते थे.

सिक्योर वैल्यू इंडिया ने इस के लिए शहर भर में अपने एजेंट फैला रखे थे, जो कमीशन के बदले पुराने नोट बदलने के इच्छुक लोगों को ढूंढ कर लाते थे. इस रैकेट का तब भंडाफोड़ हुआ जब 1 दिसंबर को आयकर विभाग के छापे में 6 करोड़ रुपए के नए नोट पकडे़ गए. जांच में इन लोगों के पास 152 करोड़ रुपए के काले धन का पता चला. ईडी ने इन आरोपियों के खिलाफ मनी लांडिं्रग रोकथाम कानून के तहत केस दर्ज कर लिया है. सीबीआई अलग से इस मामले की जांच कर रही है.

मोदी सरकार ने 8 नवंबर को नोट बंदी के ऐलान के बाद सारी जिम्मेदारी बैंकों पर छोड़ दी थी. सफेद स्याह जो भी करना था, उन्हें ही करना था. यानि आदेश सरकार का, उसे पूरा करने की जिम्मेदारी बैंकों की. बस यहीं से गड़बड़ शुरू हुई. मौकापरस्त लोग आम आदमी की परेशानियों को परे रख कर काले धन को सफेद करने के नएनए हथकंडे ढूंढने लगे. इस में काफी हद तक वह कामयाब भी रहे. आइए जाने उन के हथकंडों की हकीकत.

बेंगलुरु के इंदिरा नगर स्थित कर्नाटक बैंक के चीफ मैनेजर सूर्य नारायण बेरी को जब सीबीआई ने स्याह को सफेद करने के आरोप में पकड़ा तो पता चला ये जनाब अपने कस्टमर्स से उन के आधार कार्ड, पहचान पत्र अथवा पैनकार्ड की फोटोकापी वगैरह ले कर बैंक में कैश न होने का बहाना कर देते थे. बाद में इन्हीं दस्तावेजों के आधार पर चोरी छुपे काले धन को सफेद कर देते थे.

कुछ बैंक अधिकारियों ने काले धन को सफेद करने के लिए पुराने नोट ले कर डिमांड ड्राफ्ट बना दिए. फिर उन्हें कैंसल कर के नए नोट दे दिए गए. इस तरह की हेराफेरी खूब जम कर हुई. सेंट्रल बैंक औफ इंडिया की बासवमुंडी ब्रांच में 149 डिमांड ड्राफ्ट्स के जरिए 71 लाख रुपए जमा कराए गए जो बाद में नए नोटों में लौटा दिए गए.

बेंगलुरु में सीबीआई के हत्थे चढ़े रिजर्व बैंक औफ इंडिया के रीजनल औफिस में वरिष्ठ विशेष सहायक के. माइकल ने लोगों से बिना आईडी प्रूफ लिए ही नए नोट दे दिए. जो पुराने नोट जमा हुए, उन्हें माइकल ने पहले से ही बैंक में मौजूद रकम बता कर उस की जगह नई करेंसी ले ली. माइकल ने हेराफेरी का यह खेल चमराजपेट जिले के कोल्लेगज स्थित स्टेट बैंक औफ मैसूर में खेला जहां बैंक की चेस्ट थी. उस ने 1.51 करोड़ की करेंसी बदली थी. ऐसा और भी तमाम कैशियरों ने किया. उन्होंने कमीशन ले कर पुराने नोटों को नई करेंसी में बदल दिया. पुराने नोटों को उन्होंने बैंक में पहले से मौजूद पुरानी रकम बता दिया.

कुछ बैंक कर्मचारियों ने ईमानदार खाताधारकों के आईडी प्रूफ ले कर उन के नाम पर नए खाते खोले और उन में जमा रकम दिखा कर खूब हेराफेरी की. ऐसे खातों में पुराने नोट जमा कर के नए नोट निकाले गए. ज्ञातव्य हो, एकाउंट में जीरो बैलेंस होने पर वह खुद ब खुद अमान्य हो जाता है. 8 नवंबर के बाद खोले गए ऐसे खातों की जांच हो रही है.

दुकानदारों से रोज छोटे नोट जमा करने वाले माइक्रो फाइनैंस एजेंट्स ने भी स्वयं सहायता समूहों के अकाउंट्स में पैसे डाल कर खूब हेराफेरी की. इन एजेंट्स ने दुकानदारों से नए नोट लिए. जबकि इन्होंने स्वयं सहायता समूह के अकाउंट्स में पुराने नोट डाल कर काले धन को सफेद किया. ऐसे कम से कम 5000 स्वयं सहायक समूह और एजेंट्स जांच के दायरे में हैं.

इंडियन फाउंडेशन औफ ट्रांसपोर्ट रिसर्च एंड ट्रेनिंग के संयोजक एस.पी. सिंह के मुताबिक, ज्यादातर ट्रांसपोर्टरों के पास 500 और 1000 रुपए के नोटों का भंडार था. पेट्रोल पंपों पर पुराने नोट चलाने की सुविधा दिए जाने का इन्होंने इस का भरपूर फायदा उठाया. इस में ज्यादातर काला धन था. इंडियन फाउंडेशन रिसर्च ऐंड ट्रेनिंग के अनुसार नोटबंदी के बाद ट्रांसपोर्टरों ने पेट्रौल पंपों को मिली पुराने नोट लेने की सुविधा का लाभ उठाते हुए अपना ही नहीं, अपने परिचितों और रिश्तेदारों का करोड़ों का काला धन सफेद कराया.

आरटीओ यानी रीजनल ट्रांसपोर्ट औफिस और उन के मुखिया अफसरों के हाथों में प्रदेश के किसी जिले के ट्रांसपोर्ट महकमे की नकेल होती है. इस के चलते ट्रांसपोर्टरों के साथ उन के घनिष्ठ रिश्ते बन जाते हैं. ट्रांसपोर्टरों ने इन अफसरों के काले धन को भी खूब सफेद कराया.

और तो और इस मामले में डीटीसी यानी दिल्ली ट्रांसपोर्ट कारपोरेशन भी पीछे नहीं रही. 8 नवंबर को नोटबंदी के ऐलान के बाद 9 नवंबर को डीटीसी ने घोषणा कर दी थी कि डीटीसी बसों में 1000 और 500 के नोट नहीं लिए जाएंगे. इस के बावजूद डीटीसी के डिपो से 8,14,85,500 रुपए पुराने नोट जमा कराए गए.

काले धन को सफेद करने का खेल हर जगह, हर स्तर पर और हर तरह से खेला गया. जिस तरह बैंकों में पुराने नोट आए उसे देख कर सरकार भी हतप्रभ रह गई. दरअसल, सरकार को उम्मीद थी कि 3-4 लाख करोड़ की करेंसी काले धन के रूप में है. लेकिन उस की यह धारणा गलत साबित हुई. पुराने नोट बदलवाने में एक बड़ी भूमिका दलालों की भी रही जो 30-35 प्रतिशत कमीशन ले कर विभिन्न तरीकों से लोगों के पुराने नोट बदलवा रहे थे.

इस के अलावा कुछ कंपनियों ने अपने कैश इन हैंड के जरिए भी लोगों का काला धन सफेद कराया. दरअसल 8 नवंबर की रात को इन कंपनियों के खातों में जितना कैश इन हैंड शो हो रहा था, उतना उन के पास था ही नहीं. खातों में ज्यादा कैश इन हैंड जान बूझ कर दिखाया जाता है ताकि बैंकों से लोन वगैरह लेने की सुविधा रहे. कुछ लोगों ने इसी रास्ते से स्याह को सफेद किया.

काले धन को सफेद करने के लिए सीसी एकाउंट भी बड़ा हथियार बना. दरअसल, सीसी अकाउंट किसी कंपनी या फर्म की बैंक से लोन लेने की लिमिट होती है. मसलन अगर किसी कंपनी या फर्म ने सीसी अकाउंट से 15-25 लाख का लोन ले रखा है तो वह लोन की यह रकम पुराने नोटों में जमा करा सकती है. हालांकि यह जरूरी था कि नोटबंदी की रात को उस के रिकौर्ड में उतना कैश इन हैंड हो.

रीयल टाइम ग्रास सेटलमेंट यानी आरटीजीएस और ओवर ड्राफ्ट भी काले धन को सफेद करने के माध्यम बने. आरटीजीएस ट्रांजेक्शन में कम से कम 2 लाख रुपए ट्रांसफर किए जा सकते हैं. जबकि अधिकतम की कोई सीमा नहीं है. कई कंपनियों या फर्मों ने भी अपने करंट अकाउंट में इसी तरह पैसा जमा कराया. यहां भी शर्त वही थी कि नोटबंदी की रात को उन के पास कितना कैश इन हैंड दिखाया गया था. उस रकम को वह 30 दिसंबर तक पुराने नोटों के रूप में जमा करा सकते थे. इस तरह दूसरों का काला धन सफेद करने के लिए ऐसे लोगों ने 20 से 25 प्रतिशत कमीशन लिया.

बड़े बिजनैसमैन कई फर्जी कंपनियां बना कर रखते हैं ताकि बैंक से कर्ज ले सकें या फिर टैक्स की चोरी कर सकें. ऐसी फर्जी फर्मों या कंपनियों के माध्यम से काले धन को सफेद किया गया. इस में भी शर्त यही थी कि 8 नवंबर की रात को क्लोजिंग में उतना कैश दिखाया गया हो. ऐसे लोगों को भी 30 दिसंबर तक पुराने नोटों में रकम जमा करने की छूट थी.

सच्चाई यह है कि नरेंद्र मोदी की नोटबंदी की योजना को उन्हीं बैंकों ने पलीता लगाया, जिन पर भरोसा कर के यह योजना शुरू की गई थी. एक सच्चाई यह भी है कि कुछ ऐसे भाजपाई नेता इस योजना के फेल होने से खुश भी हैं, जिन्हें मोदी का बढ़ता हुआ कद अच्छा नहीं लगता.

अगर आम लोगों की बात करें तो डेढ़ महीने तक लाइनों में लग कर थक चुका यह वर्ग यह सोचसोच कर परेशान है कि मोदी सरकार जिस ई-बैंकिंग और प्लास्टिक मनी की बात कर रही है, उसे वह कैसे हैंडल करेगा? उस के साथ कहीं धोखाधड़ी हुई तो वह क्या करेगा?

उधर आमूलचूल परिवर्तन का सपना ले कर नोटबंदी करने वाले नरेंद्र मोदी अपनी योजना के फेल होने के बाद एक और लंबी रेखा खींचने के लिए ई-बैंकिंग और प्लास्टिक मनी लाने पर अड़े हैं. नरेंद्र मोदी की इस महत्वाकांक्षी योजना के फेल होने की एक वजह यह भी रही कि सरकार के आंकलन में गड़बड़ी हो गई.

दरअसल आरबीआई के आंकड़ों के अनुसार करीब 14.5 लाख करोड़ की रकम के 500 और 1000 के नोट मार्केट में थे. नोटबंदी के बाद सरकार को उम्मीद थी कि 500 और 1000 रुपए के नोटों के जरिए छिपाया गया करीब 4-5 लाख करोड़ रुपए का काला धन बाहर आएगा.

लेकिन जिस तरह लोग बैंकों में पैसा जमा करा रहे हैं, उस से लगता है कि 30 दिसंबर तक जमा होने वाली रकम का आंकड़ा 4-5 लाख करोड़ की जगह लगभग 14 लाख करोड़ तक पहुंच जाएगा. मजे की बात यह कि इस में नकली करेंसी भी होगी, क्योंकि कई बैंकों ने जमा करते समय असली नकली को नहीं देखा.

जब कई बार प्यार से तो कई बार धौंस देने पर भी लोगों ने काला धन बाहर नहीं निकाला तो मोदी सरकार ने अपनी असल लाइन बदल कर ई-बैंकिंग और प्लास्टिक मनी की लाइन पकड़ ली. लेकिन यह इतना आसान नहीं होगा. क्योंकि यह ऐसा काम है, जिस में डाटा चुरा कर साइबर क्रिमिनल्स पलभर में किसी का भी खाता खाली कर सकते हैं.

कहने का अभिप्राय यह है कि मोदी जी ने फर्जी करेंसी, काला धन, आतंकवाद की फंडिंग जैसे जिन महत्वपूर्ण मुद्दों पर नोटबंदी की शुरुआत की थी, उन में से एक भी पूरा नहीं हो पाया.

रही बात धन की परेशानी की तो लोगों को यह परेशानी 6-7 महीने से पहले समाप्त नहीं होगी, क्योंकि मोदी सरकार ने ई-बैंकिंग को सफल बनाने के लिए कम नोट छापने का फैसला कर लिया है. जब बैंकों में पैसा नहीं होगा तो लोगों को मजबूरी में ई-बैंकिंग की तरफ जाना ही पड़ेगा. लेकिन यह भी सच है कि सारे काम ई-बैंकिंग या ई-वालेट से नहीं हो सकते. कुछ कामों के लिए नकद रकम चाहिए ही.

नयनतारा : जिसने उजाड़ दिया प्रभुदेवा का घर

हॉट एक्ट्रेसेस में शुमार नयनतारा का नाम साउथ की सबसे ज्यादा चर्चित और विवादास्पद हस्तियों में है. कभी गुजरात के जामनगर शहर की स्टूडेंट रही नयनतारा का नाम दो वजहों से काफी चर्चा में रहा. पहला, साउथ फिल्मों के सुपर स्टार और डांसर प्रभु देवा से शादी करने के लिए ईसाई धर्म छोड़ हिंदू बनने का और दूसरा शाहरुख खान की फिल्म ‘चेन्नई एक्सप्रेस’ में आइटम सॉन्ग करने से मना करने के लिए.

रजनीकांत की ब्लॉकबस्टर मूवी ‘चंद्रमुखी’ की एक्ट्रेस नयनतारा ने प्रभुदेवा से शादी करने के लिए हिंदू धर्म अपना लिया था. नयनतारा मूल रूप से ईसाई थीं और उनका जन्म बेंगलुरु में एक कट्टर ईसाई फैमिली में हुआ था. उनका मूल नाम ‘डायना मरियम कुरियन’ है. नयनतारा के पिता कुरियन कोदियात्तु एयरफोर्स में थे, जबकि मां ओमाना कुरियन हाउसवाइफ हैं. एयरफोर्स में होने की वजह से वो कई शहरों में रहे, जिसके चलते नयनतारा ने देश के कई शहरों जैसे चेन्नई, जामनगर, थिरुवला और दिल्ली में पढ़ाई की.

नयनतारा ने 2008 में एक्टर-डायरेक्टर प्रभुदेवा को डेट करना शुरू किया. 2010 में प्रभुदेवा की पत्नी ने फैमिली कोर्ट में पिटीशन लगाई की प्रभुदेवा नयनतारा के साथ लिव-इन में रह रहे हैं. इसके बाद लता ने धमकी दी थी कि अगर उन्होंने नयनतारा से शादी की तो वो भूख हड़ताल करेंगी. यहां तक कि कई महिला संगठनों ने नयनतारा पर तमिल कल्चर को बदनाम करने को लेकर उनके खिलाफ प्रोटेस्ट (प्रदर्शन) किया और उनका पुतला भी फूंका था.

नयनतारा से अफेयर के बाद प्रभुदेवा ने शादी के 16 साल बाद पत्नी से अलग होने का फैसला किया. जुलाई, 2011 में उन्होंने पत्नी लता को तलाक दे दिया. हालांकि, बाद में साल 2012 में नयनतारा ने कहा कि वो अब प्रभुदेवा से अपने सारे रिश्ते खत्म कर चुकी हैं.

प्रभुदेवा को पत्नी लता से हुए तलाक ने उन्हें दिवालिया होने की कगार पर ला दिया था. उन्हें अपनी पत्नी को 10 लाख रुपए का गुजारा भत्ता देने के अलावा प्रॉपर्टी भी देनी पड़ी थी.इसकी कीमत 20-25 करोड़ रुपए थी. साथ ही, दो कारें व अन्य संपत्ति भी उन्होंने लता को दी थी. प्रभु और लता की शादी सितंबर 1995 में हुई थी और तलाक जुलाई 2011 में. प्रभुदेवा के तीन बेटे थे. हालांकि उनके एक बेटे की मौत 2008 में कैंसर से हो गई थी.

शाहरुख खान के साथ काम करने की एक्ट्रेस में होड़ लगी रहती है. जिसे मौका हाथ लगता है, वह उसे गंवाना नहीं चाहता लेकिन नयनतारा इस मामले में दूसरी एक्ट्रेस की तुलना में बिल्कुल उलट निकलीं. उन्होंने शाहरुख की फिल्म ‘चेन्नई एक्सप्रेस’ में आइटम सॉन्ग करने से मना कर दिया था. मीडिया में नयनतारा के बारे में यहां तक लिखा गया था कि शाहरुख के साथ काम करने से इनकार करने वाली शायद वे पहली एक्ट्रेस हैं.

शाहरुख की फिल्म में काम न करने के पीछे वजह यह बताई गई कि नयनतारा ने शाहरूख या रोहित शेट्टी की वजह से नहीं, बल्कि डांस गुरु प्रभुदेवा के कारण वह फिल्म छोड़ी थी.

अपने हॉट किरदार के लिए पहचानी जाने वालीं नयनतारा का एक विवाद एक्टर सिंबू के साथ उनके लिप लॉक किस को लेकर भी है. नयनतारा और सिंबू का यह किस काफी विवादास्पद रहा था और इसके लिए नयनतारा व सिंबू से माफी मांगने के लिए भी कहा गया था.

नयनतारा ने फिल्मी करियर की शुरुआत 2003 में आई मलयालम फिल्म ‘मनासिनाक्करे’ से की. इसके बाद 2004 में वे ‘विस्मयथुंबाथू’ और 2005 में ‘आया’ फिल्म में नजर आईं. फिल्म ‘आया’ में दमदार रोल कर नयनतारा ने काफी सुर्खिया बटोंरी और इसके बाद उन्होंने कभी मुड़कर नहीं देखा.

नयनतारा की सबसे सुपरहिट फिल्म रजनीकांत की ‘चंद्रमुखी’ रही, जो हिंदी में ‘भूलभुलैया’ नाम से रिलीज हुई. फिल्म की स्क्रिप्ट ने साउथ ही नहीं, बल्कि बॉलीवुड में भी जमकर धमाल मचाया और फिल्म सुपरहिट रही.

2007 में आई तमिल फिल्म ‘बिल्ला’ के बाद नयनतारा का सितारा ऐसा चमका कि इसके बाद उन्होंने दर्जनों हिट फिल्में दीं और अब उनका नाम साउथ की सबसे हॉट एक्ट्रेस में शुमार हो गया था. साल 2009 में नयनतारा केरल के ओट्टापालम के निकट किलिकावु अम्मान मंदिर में साड़ी न पहनकर सलवार-कमीज में पहुंच गई थीं. इस पर नयनतारा को प्रशासन और श्रद्धालुओं ने मंदिर में प्रवेश करने से रोक दिया था. इसके पीछे वजह यह बताई गई कि उन्होंने मंदिर परिसर में कपड़े पहनने के नियमों को तोड़ा है. दक्षिण भारत में महिलाएं मंदिर में आमतौर पर साड़ियों में ही प्रवेश करती हैं. इसके बाद उन्हें लोगों ने साड़ी से भरा एक बड़ा बक्सा ही पार्सल कर दिया था.

नयनतारा आईपीएल 20-20 क्रिकेट टूर्नामेंट में चेन्नई टीम की ब्रांड एम्बेसडर भी रह चुकी हैं. हालांकि, उन्होंने व्यस्तता के कारण जल्द ही इस पद से इस्तीफा दे दिया था. नयनतारा फिलहाल साउथ की सबसे महंगी एक्ट्रेसेस में शुमार हैं. वो एक फिल्म के लिए करीब 2.5 से 3 करोड़ रुपए चार्ज करती हैं.

वीना मलिक ने इस कारण तोड़ी अपनी शादी

पाकिस्तान की हॉट एक्ट्रेस वीना मलिक ने अपने पति असद बशीर खान से खुला तलाक ले लिया है. ये तलाक खुद उन्होंने ही लिया है. कानून के मुताबिक औरत जब खुद तलाक चाहती हैं तो उसे ‘खुला’ के लिए आवेदन करना होता है. पाकिस्तान की मीडिया के अनुसार, वीना मलिक के वकील अली अहमद ने इसकी पुष्टि कर दी है. कहा जा रहा है कि दोनों 9 जनवरी में ही अलग होने का फैसला कर लिया था. इस शादी से दोनों के 2 बच्चे भी है. मीडिया में छपी खबरों के अनुसार वीना फिल्मी करियर में वापस जाना चाहती थीं, जिसको लेकर उनकी अपने ससुराल वालों से पटरी नहीं बैठ रही थी.

इस बारे में वीना और असद ने कुछ भी कहने से इंकार किया है. जिसकी वजह से वीना ने तलाक लेने का फैसला लिया था. वीना मलिक हमेशा अपने फैसलों से लोगों को झटका देती रहती है. वीना मलिक ने 2013 में दुबई के बिजनेसमैन असद से शादी कर ली थी. कहा जाता है कि वीना मलिक बिना शादी के ही असद के बच्चे की मां बनने वाली थी, इसलिए दोनों नो जल्दबाजी में निकाह कर लिया था.

वीना मलिक भारत के शो बिग बॉस-4 का हिस्सा रह चुकी है. और अब खबरे आ रही है कि वीना मलिक पूरी तरह पाकिस्तानी राजनीति का हिस्सा बनने जा रही हैं और वह फिर से फिल्मी करियर में वापस जाना चाहती हैं.

शशिकला की इस चाल को कुछ ऐसे समझिए

तमिलनाडु में मुख्यमंत्री की कुरसी के लिए अच्छा तमाशा चला और शायद यह अभी कई महीने चलेगा. महारानी जयराम जयललिता की मृत्यु की खबर सुनते ही कुछ के सपने जाग गए और उन में से एक शशिकला हैं जो वर्षों से अविवाहित जयललिता के साथ साए की तरह रह रही थीं. जयललिता की मृत्यु के बाद उन का सारा पैसा और पार्टी के विधायकों की पोलपट्टी शशिकला के हाथों में आ गई और वे मुख्यमंत्री बनने के सपने देखने लगीं.

वे मुख्यमंत्री बन जातीं पर फिर उन पर जयललिता के साथ 65 करोड़ रुपए की बेईमानी के मामले में चल रहे मुकदमे की सुप्रीम कोर्ट में आखिरी फैसले की तारीख आ गई. इसलिए 3 बार कठपुतली बने मुख्यमंत्री पन्नीर सेल्वम ने विद्रोह करना शुरू कर दिया था. अब जब सुप्रीम कोर्ट ने शशिकला को 4 साल की सजा और 10 साल तक चुनाव न लड़ने की शर्त लगा दी है, पन्नीर सेल्वम के इरादे कुछ और हो गए हैं. वे अपना दावा ठोकने लगे हैं जबकि शशिकला के समर्थक अपना.

अम्मा और चिनम्मा के नाम पर चल रही राजनीतिक ड्रामेबाजी देश के लोकतंत्र की असल पोल खोलती है. हमारा चुनाव आयोग खासे निष्पक्ष चुनाव तो करा लेता है पर हमारी जनता अभी भी नहीं जानती कि शासकों के चुनाव में कैसी सावधानी बरतनी चाहिए कि केवल कर्मठ, सेवाभावी, जनहित के बारे में सोचने वाले नेता सत्ता में आएं. लगभग हर राज्य में चुनावों से जो जीतता है वह क.ालिखपुता होता है जिस का उद्देश्य जनता की समस्याएं दूर करना नहीं, अपने लिए व्यक्तिगत साम्राज्य खड़ा करना होता है.

शशिकला को राजनीति का कोई अनुभव नहीं, चाहे जयललिता की सहायिका होने के कारण उन्हें बहुतकुछ मालूम हो. जयललिता खुद भी दिखावटी गुडि़या ज्यादा थीं. उन्हें तमिलनाडु की चिंता हो, ऐसा नहीं दिखा. यह तो तमिलनाडु की जनता की अपनी मेहनत थी कि उस का राज्य दूसरों से बेहतर है वरना सरकार और नेता तो वहां भी निकम्मे ही हैं. उस पर यदि सरकार नौसिखियों के हाथों में आ जाए तो यह खतरे की घंटी ही होगी.

शशिकला ने ही पन्नीर सेल्वम को मुख्यमंत्री बनाया था, फिर खुद बनना चाहा और अब जेल जाने से पहले एक विधायक पलनीसामी को नेता बना दिया है. राज्यपाल विद्यासागर राव ने पलनीसामी को मुख्यमंत्री नियुक्त कर दिया. वहीं, पार्टी के एक धड़े का नेतृत्व पन्नीर सेल्वम कर रहे हैं. ऐसे में यह पक्का है कि राज्य की सरकार डांवांडोल ही रहेगी.

यह बीमारी लगभग हर राज्य में है और केंद्र भी बीचबीच में इसे भुगत चुका है. सरकार जनता का भला करे या न करे, पर ढुलमुल सरकार हो तो पूरी सरकारी मशीनरी निरंकुश हो जाती है और तब सरकारी फैसले मनमाने होने लगते हैं.

गरीबी, बीमारी, बेईमानी, भ्रष्टाचार से बीमार देश को उस अस्पताल में इलाज कराना पड़ रहा है जहां डाक्टर आपस में लड़ते रहते हैं, गलत दवाएं दी जाती रहती हैं और औपरेशन थिएटर खंडहर में तबदील होते रहते हैं. यह देश फिर भी जिंदा है और अराजकता के दलदल में नहीं फंसा हुआ, यही गनीमत है. शशिकला जैसी नेताओं के हाथों में राज्य की बागडोर आ जाए सिर्फ इसलिए कि वे पूर्व मुख्यमंत्री की दोस्त रही हैं, देश को कोढ़ की बीमारी होने की निशानी है.

केंद्रीय बजट : सड़े सेब पर सुनहरा लेप

हैडलाइनें जो देश के प्रमुख समाचारपत्रों के मुख्य पृष्ठों पर 2 फरवरी को प्रकाशित हुईं या 1 फरवरी को टीवी न्यूज चैनलों ने हल्ले में कहीं, बारबार कहीं और विशेषज्ञों के माध्यम से कहलवाईं, उन में जो कहा गया और बजट प्रस्तावों की सत्यता में कितना मेल है, जरा देखें और समझें :

टाइम्स औफ इंडिया : ‘वूविंग हैव-नौट्स’, हिटिंग हैव-नोट्स, यानी बजट ने उन्हें खुश किया जिन के पास कुछ नहीं है और उन पर प्रहार किया जिन के पास नोटों के भंडार हैं.

इंडियन ऐक्सप्रैस : ‘नो-नौनसैंस बजट’. यानी बिना खराबी वाला बजट.

इकोनौमिक टाइम्स : ‘नो फायरवर्क्स, एफएम शूट्स स्ट्रेट’. यानी आतिशबाजी नहीं, सीधा निशाना.

दैनिक जागरण : ‘सियासत में कालेधन पर चाबुक’, यानी नेताओं के कालेधन पर लगाम कसी और उन्हें पकड़ कर उन पर चाबुक चलेगा.

हिंदुस्तान टाइम्स :  ‘सेफ बजट, हाइक्स रूरल, इन्फ्रा स्पैंड’. यानी पूरी तरह से जनहित का सुरक्षित बजट.

नवभारत टाइम्स : ‘जेटली ने साधा टैक्स चोरों पर निशाना’, और ‘मितरो’… यानी अरुण जेटली इस बजट के जरिए  टैक्सचोरों को निशाने पर ले रहे हैं और मितरो का मतलब तो हर कोई जानता है ही.

अमर उजाला : ‘जेब में आई उम्मीदें.’ यानी इस बजट से आम जनता की जेबें भर जाएंगी.

जी न्यूज : ‘युवाओं पर फोकस’. यानी रोजगार का खजाना निकलेगा

और युवाओं के लिए रोजगार संबंधी ढेरों फायदे.

इंडिया टीवी और न्यूज 24 : ‘नया नोट नया बजट’. यानी इस बार बजट में जनता के लिए काफीकुछ नया है.

आज तक : ‘किसानों के लिए सरकार ने खोला पिटारा’. यानी बजट से अब किसानों की खस्ताहालत में सुधार होगा.

हिंदुस्तान : ‘जेटली का बजट दांव,  करोड़ों मतदाताओं पर करम’. यानी बजट के नाम पर आम जनता और राज्यों के चुनावों के करदाताओं पर कोई एहसान किया गया है.

हैडलाइन और खबर में फर्क

इन शीर्ष खबरों और बजट प्रस्तावों में क्या कोई तालमेल है? बिलकुल नहीं. कैसे? आइए जानते हैं. उदाहरण के तौर पर ‘वूविंग हैव-नौट्स’, हिटिंग हैव-नोट्स वाली हैडलाइन से लगता है कि उन्हें खुश किया जा रहा है जिन के पास पैसे नहीं हैं. यहां गरीबों की बात की जा रही है.

सवाल है कि इन के लिए बजट में ऐसी कौन सी घोषणा कर दी गई है जो आने वाले बजट साल यानी 2017-18 में इन लोगों को खुश कर देगी, जिन के पास पैसे नहीं हैं. यह एक तरह का फरेब है. वजह, इस अखबार ने जिस दिन यह खबर प्रकाशित की थी, उसी दिन घरेलू गैस यानी एलपीजी के 67 रुपए महंगी होने की खबर भी छपी थी. क्या इसी महंगाई से, जिन के पास कुछ नहीं है, उन्हें राहत मिल जाएगी?

बजट समाचार कुछ और ही सब्जबाग दिखा रहा है लेकिन बजट प्रस्तावना में गरीबों के लिए कोई खास तोहफा नहीं है. बजट भाषण या प्रस्तावों में वही बातें दोहराई गई हैं जो अरुण जेटली से पहले प्रणब मुखर्जी, मनमोहन सिंह, मोरारजी देसाई से ले कर पी चिदंबरम आदि कमबढ़ती दोहराते रहे हैं, जब वे देश के वित्त मंत्री थे.

अरुण जेटली ने 5 लाख रुपए सालाना तक की आय वाले करदाताओं के लिए कर की दर को मौजूदा 10 प्रतिशत से घटा कर 5 प्रतिशत कर दिया. यानी अब साढ़े 3 लाख रुपए के टैक्सयोग्य इनकम वाले व्यक्ति को सिर्फ 2,575 रुपए टैक्स देना होगा, जो पहले 5,150 रुपए देने पड़ते थे. यह तो ऊंट के मुंह में जीरा है.

एक तरफ एलपीजी महंगी कर दी गई और दूसरी तरफ केंद्र सरकार कहती है कि अगले वित्तवर्ष से राशन की दुकानों से बिकने वाली चीनी के लिए वह राज्यों को 18.50 रुपए प्रतिकिलो के हिसाब से सब्सिडी नहीं देगी. इस से जाहिर है कि चीनी के दाम बढ़ सकते हैं. यानी देश में राशन, पानी और गैस से ले कर हर सामान महंगा और टैक्स का बोझ डाल कर बेचा जाएगा. फिर भी बजट में जिन के पास नोट नहीं हैं, उन को खुश करने के झूठे दावे किए जा रहे हैं.

वित्त मंत्री इस गलतफहमी में हैं कि कैशलैस इकोनौमी से टैक्स की वसूली बढ़ेगी, लेकिन आखिर में यह भार आम जनता पर ही बढ़ेगा क्योंकि पहले आम लोग राशन की दुकानों से नकद माल खरीद कर जिस थोड़े से टैक्स से बचते थे अब उन्हें उस पर भी कई तरह के सर्विस व वैटनुमा टैक्स देने होंगे. इस से आम लोगों की जेब, जो पहले से ही खाली है, और खाली होगी. क्या सिर्फ टैक्स में 2,575 रुपए की राहत मिलने भर से इसे महान बजट बता कर इस का महिमामंडन करना जायज है?

यह बजट ‘नो-नौनसैंस’ कैसे हो सकता है? बजट में जिन योजनाओं व घोषणाओं को सौगात बता कर वित्त मंत्री और अखबार पेश कर रहे हैं, वे सौगातें क्या बजट साल 2017-18 के बीच जनता को मिल जाएंगी? बिलकुल नहीं. इस शीर्षक का मतलब निकालें,  तो आम बजट बहुत ही व्यावहारिक, अर्थपूर्ण व सटीक है. बजट की घोषणा के पहले दिन ही बिना किसी योजना के कार्यान्वयन के ढांचे या बजट में किए गए वादों की समयसीमा जाने बिना अखबार ने इसे रामायण की तर्ज पर संपूर्ण बजट होने के भरम की तरह रचा है.

शीर्षक ‘नौकरीपेशा की लौटरी’ और ‘युवाओं पर फोकस’ का ढोल बजा कर भरम फैलाया जा रहा है कि बजट की टैक्स नीतियों से रोजगार और नौकरियों के अवसर बढ़ेंगे, लेकिन ऐसा कुछ नहीं होने वाला. नरेंद्र मोदी सरकार की 2 दर्जन से अधिक योजनाएं रोजगार व आमदनी बढ़ाने में विफल रही हैं. हमारी अर्थव्यवस्था सिर्फ खपत के इंजन पर चल रही है, जिस में नई नौकरियां पैदा नहीं हो रहीं. देश में एकतिहाई लोग बेरोजगार हैं, जबकि वर्ष 2015 में सिर्फ 1.35 लाख नौकरियों का ही सृजन हुआ. मिलीं कितनों को, यह बाद की बात है. विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार, आटोमेशन (स्वचालन) की बदौलत भारत में 69 फीसदी नौकरियों पर तलवार लटक रही है. ऐसे में यह बजट देश के युवाओं को पर्याप्त रोजगार कैसे देगा?

एक करोड़ लोगों को रोजगार के हवाई सपने दिखा रहे इस बजट से क्या अगले साल तक इतने रोजगार मिलना संभव हैं? कहां से पैदा होंगी इतनी नौकरियां? वह भी तब जब भारतीय आईटी कंपनियों की 60 फीसदी आमदनी अमेरिका से होती है, जो नवनिर्वाचित अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की बेतुकी नीतियों की वजह से खतरे में हैं.

डिजिटल इकोनौमी से भारत में बेरोजगारी बढ़ने के साथ अमेरिकी इंटरनैट कंपनियों को अनुचित फायदा हो रहा है,  जिस के लिए बजट में समुचित प्रावधान नहीं किए गए. ऊपर से डोनाल्ड ट्रंप भारत में काम कर रही मल्टीनैशनल कंपनियों, जो माल यहां से बना कर अमेरिका भेजती हैं, पर भी चाबुक चलाने की फिराक में हैं. ऐसे में रोजगार के हालात बदतर ही होंगे. लेकिन बजट में सब हरा ही हरा बताया व दिखाया जा रहा है.

दावों की लौलीपौप

बजट प्रस्तावना में किसानों के लिए सिंचाई से ले कर तरहतरह के कर्ज और सुविधाओं के दावे हैं. ‘किसानों के लिए सरकार ने खोला पिटारा,’ ‘किसानों के लिए 10 लाख करोड़ रुपए का कर्ज’, ‘पूर्वोत्तर और जम्मूकश्मीर के किसानों को प्रमुखता’, ‘मनरेगा के लिए 48 हजार करोड़ रुपए का प्रावधान’, ‘गांवों में

10 लाख तालाब’, ‘कोऔपरेटिव बैंकों में सेवाओं को डिजिटल बनाने के लिए 3 साल में 1,900 करोड़ रुपए का प्रस्ताव’ जैसी बड़ीबड़ी बातें कही गई हैं. इस के अलावा ‘नाबार्ड के अंतर्गत डेयरी प्रोसैसिंग इन्फ्रा फंड के तहत 8,000 करोड़ रुपए का प्रावधान’ और ‘फसल बीमा योजना की रकम 5,500 करोड़ रुपए से बढ़ा कर 13 हजार करोड़ रुपए’ जैसे लुभावने वादे हैं. ऐसे वादे हर साल किए जाते हैं. हकीकत से उन का कोई लेनादेना नहीं है.

किसानों के लिए बजट का भला क्या महत्त्व है. 5 वर्षों में उन की आय दोगुनी होने के बजाय आधी रह जाएगी. उन की समस्या है उत्पादन का उचित दाम न मिलना, बिचौलियों के चलते उन की मेहनत किसी और की जेबों में चली जाती है.

‘गुजरात व झारखंड में 2 नए एम्स’ खोलने की घोषणा ऐसे की गई है मानो दोनों अस्पताल अगले ही साल बन कर जनता के इलाज के लिए खोल दिए जाएंगे. ‘लंबी सड़कों का निर्माण होगा’, ‘स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार होगा’, ‘रोजगार के मौके आएंगे’, ‘देश का हर गांव बिजली से संपन्न होगा’, और ‘शिक्षा का स्तर सुधरेगा’ जैसे तमाम अच्छे दिनों की तर्ज पर गढ़े गए जुमले मोदी सरकार ने बजट की फर्जी दूरदर्शिता वाली स्कीम में फिट कर दिए हैं, जिन को मीडिया ने हाइलाइट किया है. लंबी सड़कें कब बनेंगी? कौन इन्हें नापने जाएगा कि कितनी सड़कें बनी हैं?

सरकार देशभर में पहले से मौजूद सरकारी अस्पतालों की हालत तो दुरुस्त कर नहीं सकी और बातें नए एम्स बनाने की कर रही है. देश की प्रगति के लिए व स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर करने के लिए नए बड़े अस्पताल बनाना ठीक है, पर ऐसा होने में सालों लग जाएंगे. इस से अच्छी पहल तो दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में ‘महल्ला क्लिनिक’ बनाने की है, जो घोषणा करने के बाद न सिर्फ तुरंत बन गए, बल्कि राजधानी के तकरीबन हर महल्ले में सफलतापूर्वक चल भी रहे हैं. वहां मुफ्त इलाज और जांचें हो रही हैं. मरीज का हाथोंहाथ औनलाइन रिकौर्ड भी बन रहा है, ताकि अगली बार आने पर उस को ब्योरा दोबारा न देना पड़े और इलाज सुचारु रूप से चल सके.

सीधा निशाना किस पर?

‘नो फायर वर्क्स, एफएम शूट्स स्ट्रेट’ शीर्षक के हिसाब से जो सीधा निशाना साधा गया है, वह किस पर साधा गया है, पता नहीं. नोटबंदी के नाम पर कालेधन वालों को निशाना बताया गया लेकिन शिकार हो गया गरीब. जो चंद नोटों को बदलवाने के लिए हफ्तों बैंकों की लाइनों में धक्के खाता रहा. क्या ऐसा ही सीधा निशाना फिर से बजट के माध्यम से साधा गया है? अगर ऐसा है तो यह आम जनता के लिए चिंता की बात है. इस में टैक्स देने वाले लोग भी पिसे हैं.

वित्त मंत्री अरुण जेटली ने टैक्स देने वालों के आंकड़े पेश करते हुए बताया कि साल 2015-16 में कुल 3 करोड़, 70 लाख लोगों ने इनकम टैक्स रिटर्न फाइल किया. इन में से 99 लाख करदाताओं ने सालाना आय टैक्स छूट की लिमिट ढाई लाख रुपए से कम बताई. वहीं, 1 करोड़, 95 लाख लोगों ने अपनी इनकम ढाई लाख से 5 लाख रुपए सालाना घोषित की. 52 लाख करदाताओं ने 5 लाख से 10 लाख रुपए तक अपनी सालाना आमदनी बताई, जबकि महज 24 लाख लोगों ने अपनी सालाना आमदनी 10 लाख रुपए से ज्यादा घोषित की.

जब भी बजट पेश किया जाता है, तो टैक्स देने वालों से ज्यादा टैक्सचोरों की बात की जाती है कि वे किस तरह अपनी आमदनी कम दिखा कर सरकार को वाजिब टैक्स देने से बच जाते हैं. क्या सरकार ऐसे ‘टैक्स चोरों’ पर निशाना साधती है. लोगों की आमदनी, उपयोग और उन के टैक्स चुकाने में बड़ा अंतर है.

सवाल उठता है कि देश में ऐसे हालात ही क्यों बने हैं कि लोगों को टैक्स चोरी करनी पड़े? इस की सब से बड़ी वजह यह है कि खुद को मिलने वाली बुनियादी सुविधाओं की अनदेखी के चलते देश की आजादी के इतने साल बाद भी लोग टैक्स देने से बचते हैं या उन्हें अपनी मेहनत की आमदनी पर टैक्स वसूला जाना सरकार का डाका डालना लगता है.

उदाहरण के तौर पर एक खबर लेते हैं. देश की राजधानी दिल्ली से तकरीबन 50 किलोमीटर दूर उत्तर प्रदेश राज्य में एक छोटा सा गांव मोतीपुर है. गांव में ‘मोती’ जैसा उजला शब्द जुड़ा होने के बावजूद इस गांव के लोग बिजली की राह देख रहे हैं. यकीन नहीं होता, लेकिन यहां के बाशिंदों का दावा है कि उन्होंने अपने गांव में पिछले तकरीबन 35 सालों से बिजली के दर्शन नहीं किए हैं. इतना ही नहीं, इस गांव में न कोई डिस्पैंसरी है, न स्कूल है और कई जगह तो रास्ता भी धूलभरा है.

मोतीपुर गांव के लिए बिजली की दिल्ली अभी दूर है, लेकिन भारत के दिल दिल्ली में कौन से हालात सुधर गए हैं. शर्म की बात है कि यहां की जितनी ट्रैफिक लाइटें हैं, वे सही माने में कभी भी दुरुस्त नहीं रहती हैं.

दिल्ली के भारी ट्रैफिक में ये लाइटें लोगों की जान और उन की गाडि़यों का ईंधन बचाने का काम करती हैं, पर हालात वही ढाक के तीन पात हैं. भारत की तमाम सरकारें जब बुनियादी सुविधाएं ही देने में नाकाम रही हैं, तो वे किस हक से लोगों से टैक्स की वसूली करना चाहती हैं?

‘अरुण जेटली का बजट दांव, करोड़ों मतदाताओं पर करम’ से साफ है कि अखबार ने बजट में पेश की गई राजनीति को सूंघ कर खबर लिखी कि वित्त मंत्री ने 21.47 लाख करोड़ रुपए का बजट पेश किया. यह रकम पिछले बजट से 1.69 लाख करोड़ रुपए ज्यादा है.

क्या कोई वक्त लिए बिना बता सकता है कि 21.47 लाख करोड़ रुपए में कितने जीरो होते हैं? सब से बड़ा एतराज तो इस बात का है कि इस बजट ने करोड़ों मतदाताओं पर करम कैसे कर दिया? करम तो कर्महीन पर किया जाता है. क्या सरकार बजट के नाम पर देने वाली सुविधाओं को जनता में खैरात के तौर पर बांटती है? बजट तोहफा है या टौर्चर, यह तो जनता को आने वाले समय में मालूम हो जाएगा. अखबारों द्वारा इसे तोहफा बताने की जल्दबाजी हजम नहीं होती.

नोटबंदी भी फेल

‘करदाताओं को नोटबंदी का तोहफा’ कहने वाले भूल गए हैं कि नोटबंदी के दौरान पेटीएम जैसी कंपनियां कमाई करती रहीं और आम आदमी डिजिटाइजेशन के नाम पर ठगा गया.

मीडिया अफोर्डेबल हाउसिंग सोसाइटी, रियल एस्टेट प्रोजैक्ट और लोगों को आशियाना मिलने में आसानी जैसे जुमले दोहराते हैं और यह भी बताते हैं कि प्रधानमंत्री आवास योजना की बजट राशि 15 हजार करोड़ रुपए से बढ़ा कर 23 हजार करोड़ रुपए कर दी गई है, लेकिन इन तथ्यों का कहीं जिक्र नहीं है कि विश्व श्रम संगठन (आईएलओ) की रिपोर्ट के अनुसार, तकरीबन सवा अरब की आबादी वाले हमारे देश में 91 करोड़ (73 फीसदी) लोग गरीबी के चंगुल में हैं, जिन में से 23 करोड़ लोग घोर गरीब हैं. सरकारी योजनाएं गरीबों को दो वक्त का खाना मुहैया कराने में विफल रही हैं, फिर 1 करोड़ मकानों का सपना कैसे साकार होगा? क्या आम जनता ने अपने सिर पर जो छतें बनाई हैं, उन में कभी भी सरकार का योगदान रहा है? ये लोगों की कड़ी मेहनत और पाईपाई के जोड़ से बनी हैं.

मनरेगा की बजट राशि में बढ़ोतरी कर अपनी पीठ थपथपाने वाली सरकार पिछले बजट की मनरेगा पर खर्च की गई राशि का हिसाब देने में तो बगलें झांकती है, ऐसे में इस बढ़ाई गई राशि की क्या परिणीति होगी, बताने की आवश्यकता नहीं है. मनरेगा के लिए पिछले बजट में 38,500 करोड़ रुपए का प्रावधान था, जबकि वास्तविक खर्च 58,000 करोड़ रुपए हुआ. ऐसे में बजट राशि, जो कि जनता की जेब काट कर वसूली जाएगी, बढ़ाने से अच्छा पुरानी राशि को पारदर्शिता से खर्चने पर काम किया गया होता, तो बेहतर होता. वैसे भी बजट में मनरेगा हेतु सिर्फ जिस राशि का आवंटन किया गया है, वह ग्रामीण भारत में इन्फ्रास्ट्रक्चर के विकास के लिए नाकाफी है.

‘सेफ्टी अमेनिटीज टू पुट रेलवेज बैक औन द ट्रैक’ का राग आलाप रहे मीडिया को भारतीय रेलवे से जुड़े न तो दयनीय आंकड़े याद आते हैं और न ही रेल की खस्ताहाल व्यवस्था. आएदिन रेल के हादसे, ट्रेनों की लेटलतीफी और यात्रियों को मिलता सड़ागला खाना जैसी दिक्कतें जस की तस कायम हैं.

बजट को ‘प्रो पुअर’ यानी गरीबों के हित का भला कैसे बताया जा सकता है? आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार, साल 2001 से 2011 के दौरान 10 वर्षों में 8 करोड़ मजदूर गांवों से पलायन कर शहर आ गए हैं. देश में गरीबीरेखा से नीचे रहने वाले परिवारों की संख्या करीब साढ़े 5 करोड़ है. जबकि 23 करोड़ लोग घोर गरीबी का जीवन जी रहे हैं. उन वंचित वर्गों के अच्छे जीवन के लिए ढांचागत विकास हेतु बजट में पर्याप्त प्रावधान नहीं किए गए हैं.

कालेधन की गंगा

‘सियासत के कालेधन पर चाबुक’ कहने से कालेधन पर लगाम नहीं लगेगी. यह बात किसी से नहीं छिपी है कि कालेधन की गंगा निकलती कहां से है. अगर पिछले 70 वर्षों से राजनीतिक दलों की फंडिंग को पारदर्शी नहीं रखा गया, तो क्या इस में आम जनता की गलती है?

3 लाख रुपए से ज्यादा के लेनदेन पर नजर रखने का दावा करने से पहले यह किसी ने नहीं सोचा कि देश में ऐसे लेनदेन पर नजर रखना नामुमकिन है.

अगर कोई किसान किसी से ट्रैक्टर खरीदता है और सोना बेच कर लिए गए पैसे उस ट्रैक्टर मालिक को दे कर बिना कागजात ट्रांसफर किए उस गांव में उसे चलाता है तो भला इस लेनदेन की भनक सरकार को कैसे लगेगी? ऐसे कई लेनदेन सरकार की नाक के नीचे होते रहे हैं और होते रहेंगे.

कालेधन पर जो ‘डिजिटल नकेल’ कसने की बात की जा रही है, वह भी हवाहवाई लग रही है, क्योंकि डिजिटल तकनीक में साइबर क्राइम का खतरा बढ़ जाता है. ऐसा नहीं है कि कंप्यूटर इमरजैंसी रिस्पौंस टीम बनाने का प्रस्ताव पास नहीं हो सकता है, पर किसी भी सरकार ने अभी तक तो इस बारे में कोई गंभीर पहल नहीं की है.

सब से बड़ा सवाल तो यह है कि राजनीतिक दलों के पास पैसा कहां से आ रहा है, यह सवाल पूछने कौन जाएगा? आम आदमी तो सरकारी दफ्तर में घुसने तक से घबराता है कि कहीं किसी बात पर उस से घूस न मांग ली जाए. ऐसे में फिर कालेधन को चंदे के रूप में चबाने वाले राजनीतिक मगरमच्छों के तालाब में कौन उतरना चाहेगा?

मीडिया का दायित्व

बजट पेश करना सरकार का काम है. यह तो हर साल होता है. यह होता तो एक साल का है, पर सरकार की चतुराई और मीडिया के भरम से ऐसा दिखाया जाता है कि  आज से पहले ऐसा बजट मानो पहले कभी पेश ही नहीं किया गया, जबकि आम जनता तो महज इतना चाहती है कि उस की बुनियादी जरूरतें कैसे पूरी होंगी. इस के लिए ज्यादातर लोग तो सरकार का मुंह भी नहीं देखते हैं. लेकिन जब मीडिया बजट को संजीवनी बूटी की तरह पेश करता है तो देशवासी बजट को ही सबकुछ मान लेते हैं. क्या यही है मीडिया का दायित्व?

अमेरिका के तीसरे राष्ट्रपति थौमस जेफरसन ने तो सरकार और अखबार में से अखबार चुनने की बात कही थी. मतलब सरकार का अस्तित्व भले ही न रहे, पर अखबार हमेशा जिंदा रहने चाहिए.

आमतौर पर इतने महत्त्वपूर्ण मीडिया को सरकार नियंत्रित नहीं करती, लेकिन क्या आज मीडिया सरकार और कौर्पोरेट जगत के स्वार्थ के लिए काम करता है? आखिर आम आदमी, खासकर ग्रामीण इलाकों के कमजोर तबकों के लोगों की आजीविका से जुड़े मुद्दे मीडिया में महत्त्वपूर्ण खबर क्यों नहीं बन पाते हैं? बजट को ले कर भी यह बात कही जा सकती है. मीडिया, आखिर, अपने नैतिक मूल्यों की जिम्मेदारियों से तो नहीं बच सकता. लेकिन आज वह इन सब की अवहेलना करता दिखता है, जो स्वस्थ समाज के लिए सही नहीं है.

क्या हुआ सस्ता

सोलर पैनल

इस्तेमाल होने वाले ग्लास

रेलवे ई टिकट

समूह बीमा

रक्षाकर्मियों के लिए

पीओएस मशीनें

आरओ

बायोमीट्रिक मशीन

क्या हुआ महंगा

एलईडी लैंप

मोबाइल

भारत में बने स्मार्टफोन

चांदी के सिक्के

सिगरेट

तलेभुने काजू

पानमसाला

उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में हिंदुत्व का परचम

भगवा रंग और गाढा हो गया है. संकीर्णता की आंधी जब समूची दुनिया में चल रही हो तो धर्म, जातियों का गढ़ भारत कैसे बच सकता है. अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप की तर्ज पर भेदभाव, नफरत की हवा ने उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड में कथित धर्मनिरेपक्ष समाजवादियों के तंबू उखाड़ दिए और हिंदुत्व का परचम लहरा दिया है. 5 राज्यों में हुए चुनावों में धार्मिक नफरत भरी और समाज को बांट कर रखने वाली सोच की जीत दर्ज हुई है. खासतौर से नरेंद्र मोदी, अमित शाह उत्तर प्रदेश में धार्मिक, जातीय ध्रुवीकरण करने में कामयाब रहे. ये चुनाव मोदी और अमित शाह के लिए बड़ी चुनौती थे क्योंकि नोटबंदी और सर्जिकल स्ट्राइक को ले कर विपक्ष उन के खिलाफ माहौल तैयार कर रहा था.

असल में यह भाजपा की जीत नहीं, न मोदी की जीत है. यह जीत धर्म के बीच व्याप्त भेदभाव, ईर्ष्या, नफरत की जीत है, जिस के आधार पर यहां के मतदाता अपनी सरकार चुनने पर विवश होते हैं. चुनावी मैदान पर मोदी अमित शाह ने जो शतरंज बिछाई, और धार्मिक, जातीय पासे चले, वे कामयाब हो गए. उत्तर प्रदेश में भाजपा का कोई बड़ा नेता नहीं है. अमित शाह कई महीनों पहले से यहां डेरा डाले हुए थे. प्रचार के दौरान भाजपा की वह ओछी सोच सामने आती रही जो लोकतंत्र और संपूर्ण समाज के लिए घातक होती है.

कुछ समय से विश्व भर में उदार बनाम संकीर्ण विचारों की लड़ाई चल रही है. इस में लोकतंत्र के नाम पर संकीर्ण विचारों की विजय होती दिख रही है. भारत जैसे सब से बड़े लोकतंत्र में ऐसी शक्तियों का मजबूत होना निश्चित ही नुकसानदायक है. अमेरिका की तरह इन चुनावों में विकास की बात ही नहीं हुई, कहीं हुई तो यह गौण हो गई. सारी बातें, सोरी चर्चाएं, भाषण और सारी कवायद धर्म, जाति, मंदिर, मस्जिद, श्मशान, कब्रिस्तान को ले कर हुई.

यह चुनाव मुद्दों, विचारों पर नहीं, व्यक्तियों के बीच लड़ा गया. जहां मोदी, राहुल, अखिलेश, मायावती थे. अमित शाह के नेतृत्व में भय माहौल बनाने के प्रयास हुए. मतदाताओं तक इस तरह का संदेश पहुंचा. ये चुनावी नतीजे 2019 के लोकसभा चुनाव की दिशा तय करेंगे. अब यह तय है कि आने वाले समय में देश में संकीर्णता फैलेगी. लोकतंत्र की उदारता के लिए कोई जगह नहीं होगी. सोच विस्तृत होने के बजाय सिकुड़ती जाएगी क्योंकि माहौल ऐसा बनाया जा रहा है. तर्क, बहस के लिए जगह नहीं रहेगी. स्वतंत्र बोलने, लिखने वालों पर देशद्रोही होने का खतरा बढ़ जाएगा. कौलिजों, विश्वविद्यालयों और स्कूलों से इस की शुरुआत की जा चुकी है. हर जगह असहमति के विचार रखने वालों पर हिंसा का प्रयोग किया जाने लगा है. विचारों से मतभेद रखने वालों की खैर नहीं होगी.

राजनीतिबाजों के हाथ में धर्म हमेशा लोकतंत्र को खत्म करने का हथियार रहा है. उत्तर प्रदेश में वैसे भी घृणा भरी बातें करते वाले भगवाधारियों की कमी नहीं है. अब ये लोग लोकतंत्र के नाम पर तानाशाही रवैए को जगजाहिर करने पर उतारू होंगे. देश के सब से बड़े राज्य में भारी बहुमत से मोदी की जीत के बाद उन की जिम्मेदारी बढ़ गई है. क्या वह नफरत फैलाने वालों पर अंकुश लगा पाएंगे? इस जीत के संकेत शुभ नहीं हैं. 2019 के बाद के भारत की तस्वीर साफ हो गई है. आगे इस देश, समाज का भविष्य क्या होगा, यह बुद्घिजीवियों के लिए चिंताजनक है.

भाजपा के हवाले ‘राम का प्रदेश’ और ‘देव भूमि’

मिनी लोकसभा चुनाव कहे जा रहे 5 राज्यों के विधानसभा चुनाव में 2 सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड को भाजपा ने अपने कब्जे में ले लिया है. उत्तर प्रदेश को ‘राम का प्रदेश’ और उत्तराखंड को ‘देवभूमि’ कहा जाता है. दोनों ही प्रदेशों में चुनाव के आधार अलग अलग थे. उत्तराखंड में मुख्यमंत्री हरीश रावत पूरी भाजपा से अकेले चुनाव लड़ रहे थे. भाजपा ने कांग्रेस के बड़े नेताओं को तोड़ कर हरीश रावत को बेबस कर दिया. अब भाजपा के लिये मुश्किल भरा दौर शुरू होगा, क्योंकि भाजपा और कांग्रेस के दलबदल करने वाले नेता एक साथ कैसे चलेंगे?

उत्तर प्रदेश में चुनाव के हालात पूरी तरह से अलग थे. चुनाव के कुछ समय पहले तक अखिलेश के मुकाबले सबसे बड़ी प्रतिद्वंदी बसपा नेता मायावती को माना जा रहा था. इस बीच मुलायम का परिवार विवाद शुरू हुआ. इसके बाद राहुल और अखिलेश का गठबंधन शुरू हुआ. मायावती ने इसको हाशिये पर ढकेलने के लिये ‘मुस्लिम कार्ड’ खेला, जिसके तहत बसपा ने सबसे अधिक विधानसभा के टिकट मुस्लिम प्रत्याशियों को दिये. यही वह प्वाइंट था जिसमें चुनाव में मतों का ध्रुवीकरण शुरू हो गया. उत्तर प्रदेश की जनता के सामने एक तरफ बसपा थी जो मुसिलम गठजोड़ को आगे करके चुनाव जीतना चाहती थी. दूसरी तरफ भाजपा थी जिसने एक भी मुसलिम प्रत्याशी को टिकट नहीं दिया था.

बसपा को जिस दलित वर्ग पर भरोसा था वह धार्मिक धुव्रीकरण के समय भाजपा के पक्ष में खड़ा हो गया. केवल दलित ही नहीं पिछड़े वर्ग में भी यह भावना काम आई. भाजपा ने खुद ध्रुवीकरण की शुरुआत नहीं की पर उसको यह हवा रास आई और उसने धीरे धीरे अपने जुमलों के सहारे धार्मिक भावना को आगे किया. इसके तहत दीवाली और ईद, श्मशान और कब्रिस्तान जैसे मुद्दे उपर आये. नोटबंदी और दूसरे कारणों से दुखी लोगों के सामने कोई रास्ता नहीं था. ज्यादातर लोगों ने वोट नहीं दिया जिसने दिया वह सबकुछ भूल कर धार्मिक ध्रुवीकरण के साथ खड़ा हो गया.

उत्तर प्रदेश में 2007 में बसपा, 2012 में सपा और अब 2017 में भाजपा को बहुमत से सरकार बनाने का मौका दिया है. सामाजिक स्तर पर 2017 में भाजपा की जीत का कुछ वैसा ही असर होगा जैसे दलित और पिछडों को पहले के 2 चुनावों में हुआ था. भाजपा के लिये इस जीत के बाद प्रदेश का विकास सबसे बड़ा मुद्दा होगा. उत्तर प्रदेश से भाजपा के पास 73 सांसद और भारी बहुमत से प्रदेश में सरकार बना चुकी है. अब भाजपा को प्रदेश के लिये अपने समर्थकों के लिये बहुत कुछ करना होगा. बसपा की हार से दलित वर्ग की आवाज का क्या होगा? यह सोचने वाली बात है.

पंजाब में क्यों उतरा भगवा नशा

उत्तर प्रदेश की कामयाबी का भाजपा का नशा अगर पंजाब में उतरता दिखाई दिया तो इससे ये तथ्य तो स्थापित होते हैं कि पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में कोई राष्ट्रीय या दूसरी लहर नहीं थी और राज्यों में सिर्फ सत्ता विरोधी लहर चली है. आम तौर पर लोग अपने अपने राज्यों की सरकारों के कामकाज से संतुष्ट नहीं रहते, भाजपा ने इसका फायदा अगर खासतौर से उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में उठाया तो पंजाब में इसका खामियाजा भी उसे भुगतना पड़ा. शिरोमणि अकाली दल और भाजपा का गठबंधन खारिज कर दिया गया है और वोटर ने कांग्रेस पर भरोसा जताया है तो बात  हैरत की इस लिहाज से भी है कि वहां सत्ता की प्रबल दावेदार आम आदमी पार्टी एक बेहतर विकल्प के रूप में थी, पर धाकड़ कांग्रेसी नेता केप्टन अमरिंदर सिंह की जमीनी पकड़ कांग्रेस के काम आई.

नशा पंजाब चुनाव में एक बड़ा मुद्दा था जिसे लेकर काफी बवंडर पिछले एक साल से मच रहा था. राज्य  सरकार का उम्मीदों पर खरा न उतरना और बादल परिवार की बदनामी भी हार की वजह बने, इसीलिए भाजपा अब बड़ी मासूमियत से कह रही है कि हम तो पंजाब में अतिथि और सहयोगी थे. प्रचार का जिम्मा तो एसएडी का था यानि मीठा मीठा गप्प और कड़वा कड़वा थू वाली बात की जा रही है, जो राजनीति का शगल भी है.

नरेंद्र मोदी प्रचार के दौरान सिर्फ पंजाब की शान और खेतीबाड़ी की बातें करते बादल साहब बादल साहब करते रहे ,थे लेकिन राहुल गांधी ने नशे पर रोक की बात प्रमुखता से कही थी और सारे फैसले अपने हाथ में रखने का एक पुराना कांग्रेसी रिवाज भी पहली दफा तोड़ते अमरिंदर सिंह को अपने हिसाब से फैसले लेने की छूट दी थी, जिससे मतदाता में यह संदेश गया था कि अब कांग्रेस बदल रही है और सब कुछ दस जनपथ से तय नहीं होगा.

दरअसल में पंजाब में कांग्रेस के सामने बड़ी चुनौती भाजपा एसएडी गठबंधन नहीं, बल्कि आप थी. अरविंद केजरीवाल यहां लंबे वक्त से सक्रिय थे, पर संगठनात्मक ढांचा न बना पाने के कारण लुढ़क गए. नवजोत सिंह सिद्धू भी एक बड़ा फेक्टर पंजाब में थे ,जिनहोंने पत्नी नवजोत कौर सहित भाजपा छोड़ दी थी, आप ने उन्हें नहीं लिया तो वे कांग्रेस में चले गए. उनकी लोकप्रियता का फायदा कांग्रेस को मिला, नतीजा सामने है कि भाजपा एसएडी गठबंधन और आप को पछाड़ते वह सत्ता में है और खुद को भाजपा के राष्ट्रीय विकल्प के रूप में पेश करने में सफल रही है.

पंजाब में कांग्रेस की वापसी से यह भी जाहिर होता है कि वोटर का मूड हर जगह अलग है. विधानसभा चुनाव मे स्थानीय मुद्दे काफी अहम होते हैं और रही बात जाति या धर्म की तो ये मुद्दे पंजाब में कहने भर को थे. यहां का युवा अच्छी बात है कि नशे के दुष्परिणामों को समझने लगा है, इसलिए उसने पंजाब के नाम या बदनामी से ऊपर उठते कांग्रेस को मौका दिया.

चापलूसी के ऐसे देवता कहीं देखे हैं आपने

कहते हैं आजादी के समय देश में 33 करोड़ देवीदेवता थे और लगभग इतनी ही देश की जनसंख्या थी. आजादी के बाद जनगणना तो हुई मगर देवगणना रुक गई. देवगणना इसलिए रुक गई क्योंकि सभी देवीदेवतागण बिना सिरपैर के थे और मात्र पंडेपुजारियों द्वारा धर्मभीरू जनता को लूटने के लिए बताएसमझाए गए थे. मगर, इस धर्मभीरू देश में विभिन्न राजनीतिक पार्टियों के कार्यकर्ताओं द्वारा धड़ल्ले से अपने नेताओं को देवता, देवी और दूसरे दल के नेताओं को दानव करार दिया गया. ज्योंज्यों चुनावी खुमार बढ़ता गया त्योंत्यों देवी, देवता और दैत्य बढ़ते गए. देश का सब से बड़ा राज्य उत्तर प्रदेश इस मसले में सब से आगे निकला. सीधी बात है कि पहले अभिनेता अपने ग्लैमर के बूते आसानी से नेता बन जाया करते थे, वहीं अब नेता अपने चापलूस कार्यकर्ताओं के जरिए आसानी से देवी व देवता बन जाते हैं.

राजनीति में हर समय साम, दाम, दंड और भेद से लदे ये नेता अपने को देवता करार दिए जाने वाले छुटभैया नेताओं पर कोई रोकटोक नहीं लगाते हैं और खुद को देवता समझ शान से रहते हैं. मामला यहीं खत्म नहीं होता है, बल्कि इन नए देवताओं के नाम पर मंदिर बन चुके हैं, चालीसा होती है, आरती होती है, भजन गाए जाते हैं. हालांकि देश का यह रिवाज बहुत ही पुराना है मगर 2014 के संसदीय चुनावों के समय से इस में गति आ चुकी है. इस भेड़चाल में जो कसर रह गई थी, वह मैसेज को इधर से उधर करने वाले व्हाट्सऐप, फेसबुक जैसे सोशल नैटवर्किंग के मैसेंजर्स ने पूरी कर दी है.

चरम पर चापलूसी : भारतीय जनमानस में खुशामद करने के लिए हददरजे की चापलूसी और बिना सिरपैर का पुराणवाद किस तरह से फलफूल रहा है, इस का अंदाजा आप कुछ दिनों पहले उत्तर प्रदेश में छिड़े हाईस्पीड पोस्टर वार से लगा सकते हैं. छुटभैया नेताओं के ऐसा करने पर पार्टियां उन पर कोई कार्यवाही नहीं करती हैं, इसलिए उम्मीद रखिए कि नेता से देवता और डाकू से देवता बना देने की यह गंदी बात भविष्य में भी कायम रहेगी.

कहानी कृष्ण अवतार की : राज्य में भाजपा नेतृत्व ने कुछ महीनों पहले नए प्रदेश अध्यक्ष के रूप में केशव प्रसाद मौर्य की ताजपोशी की. प्रदेश अध्यक्ष के रूप में ताजपोशी होते ही केशव को वाराणसी जाना हुआ, वहां भाजपा के एक कार्यकर्ता द्वारा बड़ा पोस्टर लगाया गया जिस में केशव को सुदर्शनधारी कृष्ण के रूप में दिखाया गया था, उत्तर प्रदेश को द्रौपदी (पौराणिक महाभारत की पात्र) और सभी विपक्षी दलों के नेताओं को द्रौपदी का चीरहरण करते हुए कौरव या दुशासन के तौर पर दिखाया गया था. पोस्टर में सपा सरकार के मंत्री आजम खान, बसपा प्रमुख मायावती, कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी, मुख्यमंत्री अखिलेश यादव, औल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी उत्तर प्रदेशरूपी द्रौपदी का चीरहरण कर रहे हैं और वह ‘रक्षमाम केशव:’ का जाप कर रही है.

इस संबंध में पोस्टर लगवाने वाले वाराणसी के स्थानीय भाजपा नेता रूपेश पांडेय ने कुछ इस तरह सफाई दी थी, ‘‘मेरा मानना है कि आज उत्तर प्रदेश का चीरहरण हो रहा है. कांग्रेस की सरकार के दौरान गरीबी, बेरोजगारी बढ़ी. अखिलेश यादव की सरकार के दौरान गुंडाराज बढ़ा और मायावती के राज में भ्रष्टाचार बढ़ा. आजम खान सांप्रदायिकता फैला रहे हैं और ओवैसी राष्ट्रद्रोही बयान देते हैं. ऐसे में भाजपा नेतृत्व ने केशव प्रसाद मौर्य को युद्घभूमि में भेजा है.’’

दूसरा नजारा वाराणसी शहर में ही जेडीयू के राज्यस्तरीय सम्मेलन में देखा गया जिस में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को महाभारत के केंद्रीय पात्र अर्जुन के रूप में और शरद यादव को कृष्ण के रूप में दिखाया गया.

इतना सब होने के बाद भला कांग्रेस पार्टी क्यों पीछे रहती. इलाहाबाद में कांग्रेस पार्टी के स्थानीय नेताओं हसीब अहमद, श्रीशचंद्र दुबे और कादिर भाई द्वारा राहुल गांधी के रोड शो ‘किसान यात्रा’ के स्वागत के लिए एक पोस्टर शहर के बीच लगा दिया गया. पोस्टर में राहुल गांधी को युगपुरुष व महाभारत के प्रमुख पात्र अर्जुन के रूप में दिखाया गया.

इसी तरह हाल ही में प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ‘डायल 100’ सेवा शुरू करने के लिए बरेली पहुंचे. राज्य की सरकार के कारागार मंत्री बलवंत सिंह रामूवालिया ने अखिलेश की कुछ इस तरह तारीफ की, ‘‘जिस तरह द्रौपदी ने चीरहरण के समय ‘कृष्ण भइया बचाओ, कृष्ण भइया बचाओ’ की आवाज दी और कृष्ण उन को बचाने दौड़ पड़े, उसी तरह जनता अपनी परेशानी में मन से ‘अखिलेश भइया बचाओ, अखिलेश भइया बचाओ’ की आवाज देगी तो वे वहीं खड़े मिलेंगे.’’

काली और दुर्गा का दंभ : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुखिया मोहन भागवत के आरक्षण संबंधी बयान के बाद पश्चिमी उत्तर प्रदेश के हाथरस जिले में बहुजन समाज पार्टी के कार्यकर्ताओं ने एक झांकी निकाली जिस में बसपा प्रमुख मायावती को काली के रूप में प्रदर्शित किया गया था. उस झांकी में संघ प्रमुख मोहन भागवत मायावती के पैरों पर लेटे हुए थे. साथ ही, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मायावती के सामने हाथजोड़े खड़े थे. पोस्टर में लिखा गया था, ‘बहिनजी, हमें माफ करो, हम आरक्षण बंद नहीं करेंगे. यही नहीं, इस पोस्टर में मायावती को तत्कालीन मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी का कटा हुआ सिर थामे दिखाया गया.

इलाहाबाद में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्र नेता अनुराग शुक्ला द्वारा लगवाया गया पोस्टर दुर्गा का दंभ भरता नजर आया. पोस्टर में बसपा प्रमुख मायावती के खिलाफ विवादित बयान दे कर चर्चा में आए उत्तर प्रदेश के पूर्व भाजपा उपाध्यक्ष दयाशंकर सिंह की पत्नी स्वाति सिंह को दुर्गा जबकि मायावती को शूर्पणखा के रूप में दिखाया गया. इतना ही नहीं, उत्तर प्रदेश के भाजपा अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य को भगवान राम और दयाशंकर सिंह को लक्ष्मण के रूप में दिखाया गया. पोस्टर में पूर्व बसपा नेता स्वामी प्रसाद मौर्य को विभीषण, बसपा नेताओं सतीश चंद्र मिश्र और नसीमुद्दीन सिद्दीकी को क्रमश: मारीच व रावण के तौर पर दिखाया गया.

रामायण राग : दंगाभड़काऊ भाषण के आरोपों से घिरे गोरखपुर से भारतीय जनता पार्टी के सांसद महंत योगी आदित्यनाथ के 44वें जन्मदिन पर वहां की भाजपा अल्पसंख्यक मोरचा इकाई द्वारा लगवाया गया पोस्टर भी चापलूसी की चरमसीमा को पार करते दिखा. पोस्टर में योगी को रामरूपी अवतार में पेश किया गया. सपा, बसपा, कांग्रेस, आम आदमी पार्टी व ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम समेत बाकी सभी पार्टियों को रावण के रूप में दिखाया गया. पोस्टर में लिखा गया कि उत्तर प्रदेश के राम 2017 में रावण को पराजित करेंगे. दरअसल, यह योगी समर्थकों की उन को मुख्यमंत्री पद के लिए प्रोजैक्ट करने की चापलूसी थी.

डाकू देवता : उत्तर प्रदेश में नेतागण अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए डाकुओं को भी देवता करार दे कर पूजा करवा सकते हैं. इस का ताजा उदाहरण पिछले दिनों देखने को तब मिला जब सपा विधायक द्वारा मरहूम डकैत ददुआ की पत्नी सहित मूर्ति लगवाई गई.

बता दें कि शिवकुमार पटेल उर्फ ददुआ वही डाकू था जिस के नाम पर कभी उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ तीनों राज्यों के लोग थरथर कांपते थे. 2007 में राज्य की स्पैशल टास्क फोर्स द्वारा मार गिराए गए दुर्दांत ददुआ के सिर पर 7 लाख रुपए का इनाम सरकार ने घोषित कर रखा था. उस के खिलाफ अकेले उत्तर प्रदेश में विभिन्न मामलों के 241 मुकदमे दर्ज थे.

ददुआ की मूर्ति फतेहपुर जिले के धाता तहसील के अंतर्गत नरसिंहपुर कबरहा गांव में लगाई गई. राजनीतिक संरक्षण के फलस्वरूप उस के जीजा, भाई और बेटा विधायक से ले कर सांसद तक बन चुके हैं. वर्तमान में उस का लड़का वीर सिंह पटेल सपा से विधायक हैं.

संभवतया समाजवादी पार्टी से खुला संरक्षण मिलने के कारण ही मूर्ति अनावरण के समय प्रदेश के तत्कालीन लोक निर्माण मंत्री शिवपाल सिंह यादव के भी आने की चर्चा गरम थी. कहते हैं कि मूर्ति अनावरण के इस कार्यक्रम में दलीय भिन्नता भुला कर कई कद्दावर सांसद व विधायक शरीक हुए. दावा था कि 251 क्विंटल अन्न का भंडार किया गया था, जिस में उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश के करीब 1 लाख लोगों ने ददुआ देवता के पूजन का प्रसाद भी चखा. इस से पहले दस्यु सरगना मोहर सिंह की मूर्ति आगरा में स्थापित की जा चुकी है.

इसी क्रम में फतेहपुर जिले के जहानाबाद विधानसभा क्षेत्र से बसपा के पूर्व विधायक आदित्य पांडेय, 90 के दशक में पूर्वांचल और बिहार में आतंक के पर्याय रहे सुपारीकिलर श्रीप्रकाश शुक्ला की मूर्ति फतेहपुर की बिंदकी तहसील के अंतर्गत कौंह गांव में स्थित परशुराम मंदिर में लगवाए जाने की घोषणा कर सुर्खियों में है.

श्रीप्रकाश शुक्ला ने वर्ष 1998 में पटना स्थित इंदिरा गांधी अस्पताल के बाहर बिहार सरकार के तत्कालीन मंत्री बृज बिहारी प्रसाद को गोलियों से छलनी कर मौत के घाट उतार दिया था. बाद में उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह को मारने की सुपारी लेने की सुरागकशी पर सूबे के एसटीएफ द्वारा उसे मार गिराया गया था.

इसी तरह कभी 90 के दशक में उत्तर प्रदेश व मध्य प्रदेश में चंबल के बीहड़ों में आतंक का पर्याय रहे दस्यु सरगना निर्भय गुज्जर की मूर्ति लगवाने की घोषणा गुज्जर के चचेरे भाई सरन सिंह गुज्जर ने कर दी है. मूर्ति स्थापित करने की यह योजना इटावा जनपद के बिठौली इलाके में जाहरपुर गांव के काली मंदिर में की गई है. हालांकि 6-7 वर्ष पहले ही निर्भय गुज्जर की मूर्ति लगवाने की योजना बनाई गई थी मगर तत्कालीन शासन, प्रशासन की मंजूरी न मिल पाने के कारण यह काम लटक गया था. बता दें कि निर्भय गुज्जर के खिलाफ 250 से अधिक संगीन मामलों में अनेक मुकदमें दर्ज थे. साल 2008 में पुलिस मुठभेड़ में हुई मौत से पहले उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश पुलिस द्वारा निर्भय गुज्जर के सिर पर 2.5 लाख रुपए का इनाम घोषित था.

चापलूसी की चालीसा : इस से पहले देश, विदेश में लालू चालीसा खूब सुर्खियां बटोर चुका है. मगर अब प्रधानमंत्री के चालपूस टाइप के भक्त उन के नाम पर मोदी चालीसा धड़ल्ले से लिखने और पढ़ने लगे हैं. यही नहीं, चालीसा और आरती को पढ़ने के माकूल ठिकाने के लिए मंदिर भी बना डाले गए हैं.

देश के अलगअलग हिस्सों में मंदिर बनाए जाने की खबरें आ चुकी हैं. गुजरात के राजकोट, उत्तर प्रदेश के भगवानपुर (कौशाम्बी) और इलाहाबाद के जलालपुर गांव में मोदी के नाम पर बनाए गए मंदिर पर खुद प्रधानमंत्री कड़ा एतराज जता चुके हैं. मंदिर बनाए जाने के मुद्दे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कुछ इस तरह ट्वीट कर चुके हैं- ‘‘किसी इंसान का मंदिर बनाना हमारी सभ्यता नहीं है. मंदिर बनाने से मुझे दुख हुआ है. मैं लोगों से ऐसा नहीं करने की अपील करता हूं.’’ फिर भी भक्त हैं कि मानने को तैयार नहीं. वे तो, बस, देवता बनाने पर तुले हैं.

दागदार हैं देवता : जिन छुटभैया नेताओं ने अपने आकाओं को देवता या देवी करार दिया है, वे दागदार भी हैं. केशव प्रसाद मौर्य के लोकसभा चुनाव के समय चुनाव आयोग को दिए हलफनामे के अनुसार, उन पर धारा 302, धारा 153, धारा 420 समेत 10 विभिन्न गंभीर आरोप दर्ज हैं. इसी तरह बसपा मुखिया मायावती भी ताज हैरिटेज कौरिडोर समेत अन्य कई मामलों में दागी हैं. जबकि दुर्गा करार दिए जाने वाली स्वाती सिंह के पति दयाशंकर सिंह मायावती के खिलाफ विवादित बयान दे कर फंस चुके हैं.

पल्ला झाड़ती पार्टियां : जिन पार्टी के नेताओं को देवी या देवता करार दिया गया है उन में से सभी पार्टियों ने अपने को किनारे करते हुए मामले से पल्ला झाड़ लिया है. भाजपा के कार्यकर्ताओं द्वारा इस तरह के सब से ज्यादा पोस्टर लगवाए जाने पर प्रदेश भाजपा नेता दिनेश शर्मा ने कहा कि लगवाए जाने वाले पोस्टरों से पार्टी का कोई नाता नहीं है, अति उत्साहित कार्यकर्ता ऐसा कर बैठते हैं. जबकि भाजपा प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य ने कहा कि कृष्ण संबंधी पोस्टर से मेरा कोई लेनादेना नहीं है. कांग्रेसी कार्यकर्ताओं द्वारा राहुल गांधी को कृष्ण का अवतार बताने वाले मसले पर प्रदेश कांग्रेस महासचिव मुकुंद तिवारी ने कहा कि ऐसे पोस्टर लगाने वाले पार्टी के जिम्मेदार नेता नहीं हैं.

कैसे लगेगी रोक

डा. इंदु प्रकाश सिंह, सहायक प्रोफैसर, दर्शनशास्त्र व संबंद्घ अधिकारी, उच्च शिक्षा निदेशालय, उत्तर प्रदेश के नजरिए से सब से अहम बात ईश्वर का कोई रूप नहीं है. दूसरी बात, ईश्वर किसी भी राग, द्वेष, ईर्ष्या समेत अनेक मानवसुलभ दुर्गुणों से रहित माना गया है. आज के मानव का तो ऐसा बिलकुल नहीं है. ऐसे में भला कौन सा नेता देवतातुल्य हो सकता है. पौराणिक ग्रंथों के हवाले से भी कंस, रावण में जब मानवसुलभ दुर्गुण बढ़ गए तो वे राक्षस माने गए. डाकुओं और नेताओं को देवता करार दिए जाने का प्रकरण हिंदुओं की आस्था पर गहरी चोट जैसा है. इस प्रकार के पोस्टर और मंदिरों से बचने के लिए हिंदू समाज के बुद्घिजीवी वर्ग को उच्च न्यायालय जनहित याचिका जरूर दायर करनी चाहिए.’’

मुकुंद तिवारी, महासचिव, उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी, कहते हैं, ‘‘धर्म को कभी भी राजनीति से नहीं जोड़ना चाहिए. यह बिलकुल गलत और आस्था के साथ खुला खिलवाड़ है. इस मसले पर जनता को माफ नहीं करना चाहिए. बीजेपी तो हमेशा धार्मिक उन्माद भड़काने व धर्म के सहारे सत्ता में बरकरार रहना चाहती है.’’

पल्लवी सिंह चंदेल, सामाजिक कार्यकर्ता कहती हैं, ‘‘किसी भी पार्टी के कार्यकर्ताओं को अपने नेताओं को खुश करने के बजाय शहर या कसबे के विकास के एजेंडे को पोस्टर में दिखा कर नेताओं उसे पूरा करवाने की पुरजोर कोशिश करनी चाहिए. आजकल के नेताओं में नैतिक मूल्य जैसी बुनियादी बातें दूर हो चुकी हैं, इसलिए किसी भी नेता की तुलना किसी देवीदेवता से करना अनुचित होगा. इसी तरह व्यंग्यात्मक टिप्पणी के लिए धार्मिक पात्रों का सहारा लेना समाज के लिए शर्मनाक है.’’

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