वोटिंग मशीन नहीं दलितों की चिंता करें ‘बहन जी’

बसपा प्रमुख मायावती के पास अब इतने विधायक भी नहीं बचे हैं जो 2018 में उनकी राज्यसभा से सदस्यता खत्म होने के बाद दोबारा राज्यसभा या विधानपरिषद का सदस्य बना सकें. मायावती को अब चुनाव लड़ कर ही लोकसभा या विधानसभा का सदस्य बनना होगा. 25 साल में पार्टी वापस वहीं पहुंच गई जहां से वह चली थी. ऐसे में मायावती को वोटिंग मशीन की नहीं अपने दलित वर्ग बैंक की चिंता करने की जरूरत है. पार्टी को अपने दलित हित के स्टैंड पर वापस लौटना होगा नहीं तो हिन्दुत्व का शिकार हो रहे दलित पूरी तरह से बसपा से दूर हो जायेंगे.

दलित अब वोटबैंक बनने को तैयार नहीं हैं. उसे केवल पार्टी के नाम से जोड़ा नहीं जा सकता. 2007 में बसपा को बहुमत से सरकार बनाने का अवसर पाकर भी मायावती सरकार ने दलितों की तरक्की के लिये ठोस काम नहीं किये. उसके बाद से ही बसपा का जनाधार टूटने लगा था. मायावती इस सच को आज भी स्वीकार नहीं कर पा रही. 2009 के लोकसभा, 2012 के 2014 के लोकसभा और अब 2017 के विधानसभा चुनावों में लगातार बसपा को गिरावट का सामना करना पड़ा है. इसका कारण यह है कि बसपा से लगातार गैर जाटव जातियों का मोहभंग हो रहा है. इस कमी को पूरा करने के लिये बसपा से भदलित-मुसलिम्य समीकरण बनाने का जो प्रयास किया वह उल्टा पड गया.

दलितों में पूजा-पाठ करने वाले लोगों की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है. यह लोग वोट के धार्मिक ध्रुवीकरण के समय बसपा के पक्ष में नहीं खड़े होते. 2014 के लोकसभा और 2017 के विधानसभा चुनावों में भाजपा ने बसपा की इस कमजोर नस को भांप कर काम करना शुरू किया. भाजपा ने गैर जाटव जातियों को अपने से जोड़ा और बसपा को कमजोर करने में सफलता हासिल की थी. असल में 2007 में पहली बार बसपा की बहुमत से सरकार बनी थी. उसके पहले 3 बार मायावती भाजपा के सहयोग से मुख्यमंत्री बनी थी. एक बार भी उनको पूरे समय काम करने का मौका नहीं मिला. ऐसे में वह अपने लोगों को यह समझाने में सफल हो जाती थीं कि उनको काम करने का मौका नहीं मिला.

बहुमत की सरकार से बसपा के लोगों को बहुत अपेक्षायें थी. इसके बाद भी मायावती ने दलितो के मुद्दों पर काम नहीं किया. दलित-ब्राहमण समीकरण को साधने के चक्कर में दलितों के कोर मुद्दों से वह भटक गईं. समाज में दलितों को सम्मान मिले ऐसी कोई योजना नहीं बनाई. दलितों को रोजगार मिले इसके लिये प्रयास नहीं किया. प्रदेश में रोजगार के साधन पैदा हो इस पर भी कोई पहल नहीं हुई. जो दलित संगठन दलित मुद्दों पर काम कर रहे थे उनको हतोत्सहित किया गया. ऐसे में दलितों में बहुत ही निराशाजनक माहौल बनने लगा.

इन बातों को उस समय भी उठाया गया. पर मायावती ने इनको सोचने समझने में वक्त नहीं लगाया. आलोचना करने वालों को विरोधी समझा और अपने मन से काम करना जारी रखा. नतीजा उस सरकार की इमेज भ्रष्टाचार और घोटालों की बन गई. मायावती के साथ रहने वालों ने उस सरकार में कमाई की और उनकी इमेज को भी नुकसान पहुंचाया. केवल बसपा का जनाधार ही नहीं टूटा, बल्कि पार्टी में मायावती के भरोसेमंद लोगों में भी कमी आने लगी. जिससे पार्टी में अनुशासनहीनता का बोलबाला शुरू हो गया.

अब तक चुनाव लड़ने वाले सभी दलों को यह लग रहा था कि बसपा से टिकट लेकर उसके वोट को अपने साथ जोड़ा जा सकता है. 3 लगातार चुनावों में यह भ्रम टूटने लगा है. ऐसे में आने वाले दिनों में बसपा के लिये संकट का दौर है. अब बाहरी नेताओं के बसपा से चुनाव लड़ना कम हो जायेगा. बसपा प्रमुख मायावती अभी राज्यसभा की सदस्य हैं. 2018 में उनकी राज्यसभा सदस्यता खत्म हो रही है. इसके बाद पार्टी के पास इतने विधायक भी नहीं हैं जो उनको राज्यसभा या विधानपरिषद तक पहुंचा सकें. इसके बाद मायावती को चुनाव लड़कर ही लोकसभा या विधानसभा में जाने का मौका मिलेगा.

 

बेमतलब की सरकारी धौंस के मायने

अमेरिका के राष्ट्रपति द्वारा 7 देशों के निवासियों पर अमेरिका में घुसने पर लगाए गए प्रतिबंध और नरेंद्र मोदी द्वारा लिए गए नोटबंदी के फैसले में बेहद समानता है. दोनों फैसलों में आतंकवादियों के नाम पर हर निर्दोष को काला साबित कर दिया गया. दोनों में न कोई विचार हुआ, न संसद का फैसला हुआ. दोनों में बेमतलब की सरकारी धौंस दिखाई गई. दोनों में आम शरीफ लोगों को कतारों में खड़ा होना पड़ा, अपना जीवन आंखों के सामने एक सरकारी आदेश के आगे फलतेफूलते पेड़ के ठूंठ होते दिखा.

डौनल्ड ट्रंप और नरेंद्र मोदी जैसे नेता दुनियाभर में पनपने लगे हैं और युवाओं की बिना सीमाओं वाले विश्व की तमन्ना समाप्त होती दिख रही है. आज का युवा इंटरनैट से दुनियाभर से जुड़ा है पर सरकारें इन जुड़े युवाओं पर नक्शों पर खिंची सीमाओं पर पक्की दीवारें बनाने की तैयारी में लगी हैं. पहले कभी रूसियों ने पूर्वी जरमनी का हिस्सा पूर्वी बर्लिन के और खुले पश्चिमी बर्लिन के बीच दीवार बनाईर् थी जो 1989 में टूटी. आज महान नेता पैदा हो रहे हैं जो युवा तमन्नाओं पर दीवारों पर दीवारें बना रहे हैं.

हर देश में अपनेपराए का भेद अब गहरा रहा है. धर्म को इस में बड़ा मजा आ रहा है, क्योंकि धर्म के पाखंड से विमुख हो रहे युवाओं को भड़का कर आतंकवाद और राष्ट्रवाद के नाम पर कट्टर बनाया जा रहा है और जो कट्टर होता है वह सर्वव्यापी धर्म के पाखंड और सरकार के प्रचार में भेद नहीं कर पाता. डौनल्ड ट्रंप और नरेंद्र मोदी दोनों धर्म की कट्टरता का सरकारी धौंसपट्टी थोपने के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं.

युवाओं का मन धर्म, जाति, रंग, उम्र और यहां तक कि लिंग भेद भी नहीं मानता. उन को तो अपने साथी से मतलब होता है.  फिल्म ‘क्वीन’  की तरह यूथ होस्टलों में एक कमरे में अलग रंगों के, अलग देशों के युवा मजे में एकदूसरे के साथ रह सकते हैं. युवाओं का दिल बड़ा है पर डौनल्ड ट्रंप, नरेंद्र मोदी, फ्रांस की मेरीन ली पेन, टर्की के रिसप एरडोगन अपने देशों में दीवारों की बातें ही नहीं कर रहे, वे युवाओं में अलगाव का जहर भर रहे हैं.

मुसलिम देशों में यह कट्टरता की नफरत पहले फैली जब अलकायदा ने धर्म के नाम पर अलगाव करना शुरू किया. इस भयंकर वायरस को दूर करने के बजाय हर देश अपना विषैला वायरस पैदा करने में लग गया है ताकि यह विश्व ‘पा’ के सीमा रहित ग्लोब की तरह न हो, छोटेछोटे समुदायों में बंटा हो, जो धर्म, जाति, रंग, सोच, पैसे आदि पर लड़तेमरते रहें. अमेरिका की बढ़ती बेकारी, यूरोप का आर्थिक संकट, भारत की उलटीपुलटी अर्थव्यवस्था इसी का परिणाम है.

युवाओं को सीमाओं से मुक्त करो, नई दुनिया में शांति और तरक्की होगी. वरना तो बंटाधार होगा, युद्धों की झड़ी लगेगी.

बिहार में इस तरह लुटेरे चुग गए अरबों के चावल

बिहार में हो रही चावल मिलों की धांधली पर रोक लगाने में सरकार बिलकुल नाकाम रही है. पिछले 5 सालों से चावल मिल मालिकों के पास बिहार खाद्य निगम के 12 सौ करोड़ रुपए बकाया हैं और निगम उसे वसूलने के लिए कछुआ चाल ही चलता रहा है. जब भी बकाया रकम की वसूली के लिए मुहिम शुरू की जाती है, वह कभी भी अपने अंजाम तक नहीं पहुंच पाती है. राज्य में 13 सौ चावल मिलें ऐसी हैं, जिन्होंने धान ले कर सरकार को चावल नहीं लौटाया है, इस के बावजूद धान कुटाई के लिए इन मिलों को दोबारा से धान दे दिया गया.

पटना की 64 चावल मिलों पर 55.61, भोजपुर की 90 मिलों  पर 72.05, बक्सर की 152 मिलों पर 101, कैमूर की 357 मिलों पर 220, रोहतास की 191 मिलों पर 111, नालंदा की 84 मिलों पर 55.34, गया की 49 मिलों पर 40 और औरंगाबाद की 207 मिलों पर 62.15 करोड़ रुपए बकाया हैं.

वैशाली की 25 मिलों पर 23.66, मुजफ्फरपुर की 33 मिलों पर 66.51, पूर्वी चंपारण और पश्चिमी चंपारण की 153 मिलों पर 63, सीतामढ़ी की 52 मिलों पर 55.83, दरभंगा की 34 मिलों पर 39.83, शिवहर की 8 मिलों पर 17.78 करोड़ रुपए की वसूली बाकी है.

नवादा की 23 मिलों पर 20.48 करोड़ रुपए की रकम बकाया है. इस के अलावा अरवल, शेखपुरा, लखीसराय, मधुबनी, समस्तीपुर, सिवान, सारण, गोपालगंज वगैरह जिलों की सैकड़ों छोटीमोटी चावल मिलों पर तकरीबन 90 करोड़ रुपए बकाया हैं.

साल 2011-12 में राज्य खाद्य निगम ने 4 लाख, 55 हजार टन और पैक्स यानी प्राथमिक कृषि साख समितियों ने 17 लाख, 6 हजार टन किसानों से धान  खरीदा था. सारा धान चावल मिलों को दे दिया गया. चावल मिलों से सरकार को 14 लाख, 47 हजार टन चावल मिलना था, पर चावल मिलों ने केवल

8 लाख, 56 हजार टन चावल ही लौटाया. बाकी चावल इन मिलों ने नहीं लौटाया. उस चावल की कीमत 12 सौ करोड़ रुपए है. बिहार महालेखाकार ने पिछले साल की अपनी रिपोर्ट में कहा था कि धान को ले कर चावल मिलों ने सरकार को 434 करोड़ रुपए का चूना लगाया है. इस के पहले 2011-12 में भी चावल मिलों ने 434 करोड़ रुपए का धान दबा लिया था. उस के बाद के साल में 929 करोड़ रुपए के धान की हेराफेरी कर सरकारी खजाने को नुकसान पहुंचाया. इस के बाद भी सरकार ने मिल मालिकों के खिलाफ कार्यवाही करने में कोई दिलचस्पी नहीं ली.

बिहार राज्य खाद्य निगम के सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक, साल 2011-12 में जिन चावल मिलों पर धांधली का आरोप लगा था, उन्हीं मिलों को साल 2012-13 में भी करोड़ों रुपए का धान दे दिया गया. केवल 50 हजार रुपए की गारंटी रकम पर ही 3 करोड़ से 6 करोड़ रुपए का धान चावल मिलों को सौंप दिया गया.

मिलों को धान देने के बारे में नियम यह है कि भारतीय खाद्य निगम इन चावल मिलों से एग्रीमैंट करता है, जिस के तहत चावल मिलें पहले निगम को 67 फीसदी चावल देती हैं, जिस के बदले में उन्हें रसीद मिलती है. उस रसीद को दिखाने के बाद ही चावल मिलों को सौ फीसदी धान दिया जाता है.

राज्य के मुख्य सचिव अंजनी कुमार सिंह ने खाद्य निगम को फटकार लगाई थी और चावल मिलों से बकाया रकम वसूलने की मुहिम तेज करने का फरमान जारी किया था. उस के बाद बिहार में किसानों और सरकार से धान ले कर चावल नहीं लौटाने वाले मिल मालिकों को जेल भेजने की कवायद कई बार शुरू की गई, पर उस की रफ्तार काफी धीमी रही है.

सरकार ने ऐसे चावल मिल मालिकों को गिरफ्तार करने और उन की कुर्कीजब्ती का आदेश जारी कर दिया है. इस सिलसिले में 13 सौ बड़े बकायादार मिल मालिकों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई गई है. गौरतलब है कि पिछले 5 सालों से चावल मिलों के मालिक बकाया 1342 करोड़ रुपए देने में टालमटोल करते रहे हैं. चावल मिल मालिकों पर साल 2013-14 के 150 करोड़, साल 2012-13 के 732 करोड़ और साल 2011-12 के 427 करोड़ रुपए बकाया हैं.

धान ले कर चावल वापस नहीं करने के मामले में खाद्य निगम समेत कई महकमों के अफसरों और मुलाजिमों पर भी कानूनी कार्यवाही की जा रही है. कुल 394 अफसरों और मुलाजिमों की जांच की जा रही है और 184 लोगों पर मुकदमा दर्ज किया गया है. साल 2011-12, 2012-13 और 2013-14 में 2024 चावल मिल मालिकों पर राज्य खाद्य निगम से धान लेने के बाद उस का चावल तैयार कर के नहीं लौटाने का आरोप है. चावल की बकाया रकम का भी भुगतान नहीं किया गया है.

चावल मिल मालिकों के पास निगम के 1341 करोड़, 75 लाख रुपए बकाया हैं. काफी जद्दोजेहद के बाद निगम केवल 240 करोड़, 62 लाख रुपए ही वसूल सका है. निगम द्वारा बारबार कहे जाने के बाद भी 332 चावल मिलों ने पैसे जमा नहीं किए हैं. इस मामले में अब तक 1193 चावल मिल मालिकों पर 992 एफआईआर दर्ज की गई हैं. 1630 सर्टिफिकेट केस किए गए हैं और 722 चावल मिल मालिकों के खिलाफ वारंट जारी किया गया है, जिन में से 319 वारंटों की तामील हो चुकी है. इन में से 199 मिल मालिकों की गिरफ्तारी हुई है और 836 ने सरैंडर किया है. 255 मिल मालिकों के खिलाफ आरोपपत्र दायर किए जा चुके हैं.

अब ‘पैक्स’ लगाएगी चावल मिलें

प्राइवेट चावल मिलों की बढ़ती धांधली के बाद अब राज्य सरकार प्राथमिक कृषि साख समितियों को चावल मिल लगाने के लिए 25 लाख रुपए तक का अनुदान देगी. राज्य में 8463 पैक्स हैं और वे चावल मिल लगाने की योजना का फायदा उठा सकती हैं. व्यापार मंडल को भी इस योजना का फायदा मिल सकता है.

चावल मिल लगाने के लिए पैक्स के अध्यक्ष को जिला सहकारिता कार्यालय में आवेदन देना होगा. सहकारिता विभाग ने बिजली से चलने वाली मिलों को लगाने के लिए प्रस्ताव तैयार कर लिया है. इस के तहत प्रति घंटा 20 क्विंटल धान की कुटाई क्षमता वाली चावल मिल लगाई जानी हैं. एक मिल के लगाने पर 50 लाख रुपए का खर्च आएगा. इस में से 50 लाख रुपए अनुदान के तौर पर मिलेंगे.

कैबिनेट की मंजूरी मिलने के बाद इस योजना को जमीन पर उतारा जाएगा. इस से पैक्स को न्यूनतम समर्थन मूल्य पर धान की खरीद में काफी सुविधा हो जाएगी और किसानों से ज्यादा से ज्यादा धान की खरीद हो सकेगी. किसानों को इस से काफी फायदा मिल सकेगा. गौरतलब है कि इस साल सरकार ने धान की खरीद का कोई टारगेट तय नहीं किया है. सरकार का दावा है कि  किसान जितना भी धान बेचेंगे, उतने की खरीद की जाएगी.

असल मैजिक तो इन चाटुकारों का है

सत्तर के दशक के एक धाकड़ कांग्रेसी नेता थे असम के देवकान्त बरुआ, उनकी इकलौती योग्यता थी इंदिरा गांधी की चापलूसी करते रहना, जिसके एवज में इंदिरा गांधी ने उन्हें कांग्रेस का अध्यक्ष भी बनाया था और बिहार का राज्यपाल भी बना दिया था. एक और कांग्रेसी नेता विद्याचरण शुक्ला थे, जो इंदिरा गांधी की स्तुति यह कहते करते थे कि तेरी सुबह की जय तेरी शाम की जय तेरे काम की जय तेरे नाम की जय.

ये आपातकाल के पहले की बातें हैं जब इंदिरा गांधी की तूती भारतीय राजनीति में ठीक वैसे ही बोलती थी जैसे अब उत्तर प्रदेश की ऐतिहासिक जीत के बाद नरेंद्र मोदी की बोल रही है. देश में कहीं भी देख लें मोदी के नाम की माला जपने वालों में एक होड़ सी पैदा हो गई है. चारों तरफ जश्न का सा माहौल है. भाजपाई उन्हें करिश्माई नेता साबित करने पर उतारू हो आए हैं. जगह जगह विजयोत्सव मनाए जा रहे हैं. जल्द ही मोदी के नाम के भजन कीर्तन भी शुरू हो जाएं तो बात कतई हैरानी की नहीं होगी.

व्यक्ति पूजा की यह हद इंदिरा युग की याद बेवजह नहीं दिलाती, जिन्हें कांग्रेसियों ने देवी साबित करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी थी, जिसका खामियाजा आखिरकार आपातकाल के रूप में देश को भुगतना पड़ा था. इंदिरा गांधी कोई हार तो हार, अदालत का फैसला न मानने तक की हद तक मनमानी करने पर उतारू हो गईं थीं, जिसकी एक बड़ी वजह तत्कालीन चाटुकार थे. नरेंद्र मोदी को भगवान साबित करने तुले लोग बरुआ और शुक्ला सरीखा गुनाह ही  कर रहे हैं जिन्हें रोकने वाला कोई नहीं, क्योंकि यह उनका हक हर लिहाज से है.

मोदी भक्त यह बात जानबूझ कर अनदेखी कर रहे हैं कि 3 राज्यों में भाजपा कांग्रेस से पिछड़ी है. जोड़ तोड़ कर वह गोवा और मणिपुर में सरकार बना ले, यह उसका संवैधानिक अधिकार है, पर इससे साबित यह होता है कि कोई लहर मोदी के नाम की नहीं थी, अगर होती तो पंजाब उससे अछूता नहीं रहता, फिर जश्न किस बात का  बिलाशक उत्तर प्रदेश में भाजपा ने उम्मीद से परे वह आंकड़ा पार कर लिया है जिसका अंदाजा उस मीडिया को भी नहीं था, जो अब दिन रात मोदी के गुणगान तरह तरह से कर अपनी झेंप और खिसियाहट ढक रहा है.

लोकतन्त्र के मायने मोदी भक्ति में गुम होते जा रहे हैं, तो यह खुद मोदी के लिए चिंता की बात है कि देश कहां आकर ठहर गया है. बात बात में नेहरू गांधी परिवार को कोसते रहने वाले नरेंद्र मोदी अगर अपनी जय जय कार होते देख आत्म मुग्धता के शिकार हो चले हैं तो शायद ही अभी वे भांप पाएं कि ये चाटुकार दरअसल में उनका कितना और कैसा कैसा नुकसान कर रहे हैं और जय जय कार की यह अति आम लोगों में उनके प्रति एक खास तरह की एलर्जी भी पैदा कर सकती है.

सार्वजनिक रूप से जश्न मनाए जाने में पैसे की बरबादी तो होती ही है, साथ ही लोगों में भय भी पैदा होता है कि आखिर एक राज्य की जीत पर इतना हल्ला क्यों. हल्ला मचाने वाले नेता क्या साबित करना चाहते हैं, सिर्फ यही कि मोदी नायक हैं, रोल मॉडल हैं, चमत्कारी नेता हैं और पूज्यनीय हैं और यह बात वे तरह तरह से बार बार कर रहे हैं तो लगता है कि आम लोगों की उम्मीदों पर या तो नरेंद्र मोदी खरे नहीं उतर पा रहे हैं, जिसे शोर शराबे से ढका जा रहा है या फिर यह मान लिया जाए कि अब कुछ कामधाम नहीं होना है. जय जय कार से ही देश चलना है.

दलित और मुसलिमों को रिझाते चुनाव

उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में दलितों और मुसलिमों के वोट पाने के लिए जम कर भागदौड़ हुई. जो लोग सदियों से इन दोनों जमातों को अछूत, पराया, गरीब, बेसहारा, बेचारा और ध्यान न देने लायक मानते रहे हैं, इन के वोट पाने के लिए दड़बेनुमा, बदबूदार महल्लों में भी गए और गंदी तिरपाल की या फूस की झुग्गी बस्तियों में भी. लेकिन इन नेताओं को दलितों और मुसलिमों के सिर्फ वोट चाहिए थे, उन के भले से इन का कोई मतलब नहीं. इन लोगों की अपनी सी पार्टियां बहुजन समाज पार्टी या आल इंडिया मुसलिम लीग भी अपने माने जाने वाले वोटरों का कल सुधारने की कोई बात नहीं करती दिखीं. हर बार ‘हम तुम्हारे साथ हैं’ जैसे बेमतलबी नारे लगा कर वोट ले लिए जाते हैं और अगले चुनावों तक दलितों को भुला दिया जाता है.

उत्तर प्रदेश के दलित और मुसलिम एक ही सी जातियों से आते हैं. इन्हें सवर्ण हिंदू समाज ने शास्त्रों के कहे के हिसाब से सैकड़ों सालों से नीचा समझा है. जब भी विदेशी लोगों ने राज किया, इन पर अत्याचार कम हुए, पर जहां अपने लोगों का राज हुआ, इन्हें जोरजबरदस्ती का सामना करना पड़ा.

सदियों की गुलामी का हाल यह है कि आज उत्तर प्रदेश ही नहीं, दूसरी जगह का भी दलित या मुसलिम सिर उठा कर चलने में घबराता है. जिन्हें आरक्षण के कारण कुछ नौकरियां मिल गईं, वे भी अपनी जमातों के लिए लंबाचौड़ा जागरण नहीं कर पा रहे. जो आगे निकल गया, उसे हर समय डर लगा रहता है कि ऊंची जमातें उसे फिर जंजीरें न पहना दें. आम दलित को तो लगता है कि उस के गले में आज भी तख्ती लटकी है कि वह पाप योनि का है. चुनाव हों या न हों, उस के दिनों पर कुछ असर नहीं पड़ रहा है.

हां, पिछले दशकों में जो थोड़ाबहुत विकास हुआ है, उस की वजह से लाखों ऐसी नौकरियां निकली हैं, जिन में इन दलितों और मुसलिमों को रोटी कमाने के मौके मिले हैं. इन का पेट भरने लगा है, पर चुनावों से कोई हक मिल रहा हो, ऐसा नहीं दिखता. इन चुनावों में भी मायावती को अपने हीरों और पर्स की वजह से मजाकों का निशाना बनना पड़ा और मुसलिमों को भारत से अलग हुए पाकिस्तानबंगलादेश के लिए जिम्मेदार होने का अपराधी माना गया.

मोदी, अखिलेश, राहुल, मायावती, ओवैसी किसी ने भी इन बड़ी जमातों को काम देने की बात नहीं की, क्योंकि इन दोनों जमातों की जबान नहीं है. इन के अखबार नहीं हैं. इन के टीवी चैनल नहीं हैं. इंटरनैट ये देख नहीं सकते. कालेजों में इन के बच्चों की जगह नहीं है.

दलितों, पिछड़ों, मुसलिम गरीबों ने गालियों की भाषा, नशे, समय की बरबादी, फालतू के झगड़ों को अपनी जिंदगी बना लिया है. वे काम करते हैं तो मन मार कर. हां, ऊंची जातियों ने साजिश कर जो छोटे देवीदेवताओं के मंदिर इन्हें पकड़ाए हैं, उन में खूब जोशखरोश दिखाते हैं. इन मंदिरों को चलाने वाली असल में वही पुरानी पुजारी जमात है, जो इन्हें समाज का कोढ़ मानती रही है. इन के नेता भी इन मंदिरों में सिर नवा आते हैं, क्योंकि इन्हें लगता है कि इन के अच्छे दिन उसी अंधविश्वासी गली से आएंगे, जिस पर ऊंची जातियों के लोग चलते हैं.

भारत के लोकतंत्र में वोट देने का हक है और सोच व बोलने की आजादी भी है. ये दोनों जमातें इन दोनों हकों को सही तरह इस्तेमाल करना नहीं जानतीं. ये जमातें इन की बात करने वाले अखबारों या चैनलों से जुड़ी नहीं हैं. ये अपने दड़बे में घुस कर कोशिश करती हैं कि जुल्मों से बच जाएंगी. इन का हाल उस लड़की की तरह है, जो झाड़ी के पीछे छिप कर चुप रहती है कि शायद बलात्कारियों की नजर उस पर न पड़े. होता कुछ और है. इन्हें ढूंढ़ लिया जाता है और चुनावों से 1-2 माह पहले के अलावा जबरन इन का बलात्कार करा जाता है.

चूंकि इन की जबान नहीं, इन की बात कहने वाले को ये खुद भी जानते नहीं, इन की वकालत करने वाले भी आमतौर पर थक जाते हैं और जहां सुनहरी चमक दिखती है, वहां जमा हो जाते हैं. तभी दलितों के नेता भाजपा और कांग्रेस में शामिल हो जाते हैं, क्योंकि वहां दलित नेता को तो नकली आदर मिलता है, चाहे उस की जमात को मिले या नहीं.

दलित और मुसलिम मिल कर देश के खेतों, व्यापारों और कारखानों की रीढ़ की हड्डी हैं, पर इन्हें उन मूक जानवरों का सा समझा जाता है, जिन्हें घर में घुसने नहीं दिया जाता, जब चाहे चाबुक मार दिया जाता है. इन की दशा तो उन गायों से भी बदतर है, जिन के लिए कुछ मरनेमारने को तैयार हो जाते हैं.

दलितों और मुसलिमों में बहुत से पढ़ने लगे हैं, समझदार हो गए हैं, पर उन के पैरों में अभी भी पुरानी जाति की बिवाइयां हैं, जो उन्हें दूसरों की तरह भागने से रोकती हैं. उन के दिमागों पर आज भी अपने को हीन होने के अहसास का काला साया छाया हुआ है. इन के नेता इन्हें दलदल से निकाल नहीं रहे, बल्कि इन की छातियों पर पैर रख कर अपना जीवन सुधार रहे हैं.

आज कितने अखबार, कितने चैनल, कितने धारावाहिक, कितने उपन्यास हैं, जो इन जमातों की बात सोचते हैं. चुनाव से 10 दिन पहले पुचकारने से सदियों की मिट्टी धुलेगी नहीं. यह काम इन जमातों को खुद करना होगा. दलितों, मुसलिमों और पिछड़ों को चुनावों के हक का इस्तेमाल सोचने और बोलने के हक को पाने में करना होगा. इन को शास्त्रों और शरीअतों के बंधनों से आजादी चाहिए, जो न वोटिंग मशीन में है, न टीवीमोबाइल में. यह मन में तैयार करनी होगी. हर तरह के मौके के बारे में जानना होगा और फिर बराबरी का हक पाने के लिए मुंह खोलना होगा, पढ़ना होगा. सही वोट देना होगा. अपनों से आजादी भी उतनी ही मुश्किल से मिलती है, जितनी दूसरों से आजादी मिलती है.

इन जमातों को अपने पर हो रहे अनाचार व अत्याचार की वजह खोजनी होगी. सिर्फ अछूत या दलित या मुसलिम मां के पेट से पैदा होने की वजह से ये नीचे नहीं हो गए हैं, गरीबी में जीने को मजबूर नहीं हैं. इन्हें अपनी जिंदगी सुधारनी होगी, पर खुद. नेताओं के भरोसे कुछ न होगा. यह न भूलें कि नमूने के तौर पर बनियों के नेता न के बराबर हैं, पर हर बनिया पैदा होते ही समझदार हो जाता है, क्योंकि वह जानकारी से घिरा रहता है, अपने मतलब की जानकारी से.

नाहिद के खिलाफ 46 मौलानाओं ने जारी किया फतवा

असम में 16 साल की एक सिंगर नाहिद आफरीन के खिलाफ 46 मौलानाओं ने फतवा जारी किया है. बताया जा रहा है कि फतवा इसलिए जारी किया गया है, ताकि उसे पब्लिक के बीच गाने से रोका जा सके. बता दें कि नाहिद 2015 में रियलिटी टीवी शो इंडियन आइडल जूनियर में फर्स्ट रनर-अप रही थीं. न्यूज एजेंसी और मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, नाहिद ने हाल ही में आईएसआईएस समेत कुछ आतंकी गुटों के खिलाफ गाने गाए थे. पुलिस पता लगा रही है कि फतवा जारी करना कहीं उसका रिएक्शन तो नहीं है.

एडीजी स्पेशल ब्रांच पल्लब भट्टाचार्य ने कहा, “हम इस एंगल से भी मामले की जांच कर रहे हैं.” मंगलवार को असम के होजई और नागांव जिलों में पर्चे बांटे गए, जिनमें फतवा और इसे जारी करने वाले मौलानाओं के नाम लिखे थे. फतवे के मुताबिक, “म्यूजिकल नाइट जैसी चीजें शरिया के बिल्कुल खिलाफ हैं. अगर ऐसी चीजें मस्जिद, ईदगाह, मदरसा और कब्रिस्तान के आसपास होने लगीं तो हमारी आने वाली पीढ़ी को अल्लाह की नाराजगी झेलनी पड़ेगी.”

बताया जा रहा है कि 25 मार्च को असम के लंका इलाके के उदाली सोनई बीबी कॉलेज में नाहिद को परफॉर्म करना है, इसी को देखते हुए उसके खिलाफ फतवा जारी किया गया है. नाहिद 10वीं क्लास में पढ़ती हैं और बिश्वनाथ चारिअली इलाके में रहती हैं. फतवे पर नाहिद ने कहा, “मुझे लगता है कि मेरा संगीत अल्लाह का तोहफा है. मैं ऐसी धमकियों के आगे झुककर अपना संगीत नहीं छोड़ूंगी.”

फिर बोल्ड अवतार में नजर आईं दिशा पाटनी

बॉलीवुड एक्ट्रेस दिशा पाटनी ने हाल ही में अपने इंस्टाग्राम पर एक पुरानी फोटो पोस्ट की है. जिसमें दिशा एक बार फिर बोल्ड अवतार में नजर आ रही हैं. इस फोटो में दिशा पीच कलर की बिकिनी पहने बीच के पास खड़ी काफी बोल्ड लुक में नजर आ रही हैं. दिशा ने इस फोटो को शेयर करते हुए इसका कैप्शन “❤Beach life.. missing the breeze❤” दिया है. बता दें, कुछ दिनों पहले दिशा एक अवॉर्ड फंक्शन में बोल्ड ड्रेस पहनकर पहुंची थीं, जिसे लेकर वो खूब चर्चाओं में रही थीं.

दिशा अपनी पर्सनल लाइफ की वजह से चर्चाओं में रहती हैं. टाइगर और दिशा अपने रिश्ते को सिर्फ दोस्ती का नाम देते हैं. लेकिन बार-बार इन्हें वेकेशन और डिनर डेट के दौरान स्पॉट किया जाता है. बता दें, टाइगर और दिशा रोमांटिक सिंगल ‘बेफिक्रा’ में नजर आ चुके हैं.

दिशा ने साल 2016 में सुशांत सिंह राजपूत स्टारर फिल्म ‘एम एस धोनी: द अनटोल्ड स्टोरी’ से बॉलीवुड करियर की शुरुआत की थी. इसके बाद दिशा जैकी चैन की फिल्म ‘कुंग फू योगा’ में नजर आई हैं.

Video: मां बनने के लिए बाबा के पास पहुंची महिला, बाबा ने कहा उतार दो कपड़े और फिर

संतान की चाह ने एक महिला को ढोंगी बाबा का शिकार बना दिया. महिला को संतान नहीं हो रही थी. उसने कई डाक्टरों को दिखाया, लेकिन कोई उपाय नहीं निकला. ऐसे में किसी ने उसे सलाह दी कि वह किसी बाबा से इस बारे में समाधान मांगे और वह महिला बाबा के पास संतान प्राप्ति का आशीर्वाद लेने पहुंच गई. जबकि बाबा ने ढोंग रचाकर उस महिला को अपने जाल में फंसा लिया और उसके साथ जो किया वह बहुत शर्मनाक था.

सोशल मीडिया एक ऐसा प्लैटफार्म है जहां अच्छे से अच्छा और बुरे से बुरा हर कुछ वायरल हो जाता है. इसी कड़ी में इन दिनों एक वीडियो वायरल हो रहा है, जिसमे एक महिला संतान प्राप्ति के लिए बाबा के पास उपाय मांगने जाती है.

महिला को देख कर बाबा अपने पर काबू नहीं रख पाता है और उसका ढोंगीपन सामने आ जाता है. आजकल वैसे भी ढोंगी बाबाओं का पर्दाफाश हो रहा है. कुछ ढोंगी लोग बाबा का भेष धारण कर के मासूम लोगों को अपने जाल में फंसा लेते हैं और फिर कई तरह की शर्मनाक घटनाओं को अंजाम देते हैं.

ऐसा ही कुछ इस महिला के साथ भी हुआ जो संतान प्राप्ति के सुख के लिए बाबा के पास पहुंची थी, लेकिन बाबा ने उसे अपना शिकार बना डाला.

यहां देखें वीडियो.

जब रातोंरात सुपरस्टार बन गई गांव की ये लड़की

महाराष्ट्र में 7 मार्च से दसवीं की परीक्षा शुरू हो गई है. ‘सैराट’ फिल्म की एक्ट्रेस रिंकू राजगुरु भी इस बार 10 वीं की परीक्षा दे रही हैं. अकलुज के जीजामाता कन्या स्कूल के सेंटर पर रिंकू परीक्षा देने पहुंचीं. इस दौरान केंद्र की प्रमुख मंजुषा जैन ने फूल देकर उनका वेलकम किया.
बता दें कि मराठी फिल्म ‘सैराट’ में काम कर रिंकू रातोंरात सुपरस्टार बन गईं. रिंकू सोलापुर जिले के अकलुज कस्बे की शिक्षक कॉलोनी में रहने वाली एक मिडल क्लास फैमिली से बिलॉन्ग करती हैं. रिंकू के पिता का नाम महावीर है.
‘सैराट’ फिल्म हिट होने के बाद रिंकू को स्कूल छोड़ना पड़ा था. दरअसल, फिल्म के बाद रिंकू जब स्कूल गईं तो उन्हें देखने के लिए भीड़ उमड़ पड़ी. इस वजह से रिंकू ने स्कूल छोड़ दिया और फिर 17 नंबर का फॉर्म (प्राइवेट स्टूडेंट्स के लिए) भरकर दसवीं की परीक्षा देने का फैसला किया था. बता दें कि 9वीं क्लास में रिंकू को 81 परसेंट मार्क्स मिले थे.
‘सैराट’ के कन्नड़ रिमेक में रिंकू ने लीड रोल किया है. उनकी आने वाली फिल्म का नाम ‘मनसु मल्लिगे’ है. पिछले साल दिवाली में इस फिल्म की शूटिंग पूरी हुई थी. इसके बाद दो महीने में उन्होंने दसवीं के लिए पढ़ाई की.
मराठी फिल्म ‘सैराट’ से रातोंरात हिट हुई एक्ट्रेस रिंकू राजगुरु को स्कूल से निकाले जाने की खबर सोशल मीडिया पर वायरल हुई थी. कहा गया कि उनकी अटेंडेंस कम होने के कारण स्कूल मैनेजमेंट ने उन्हें स्कूल से बाहर निकाल दिया था. हालांकि, बाद में रिंकू के पिता और स्कूल मैनेजमेंट ने इसे अफवाह बताया था.
रिंकू, महाराष्ट्र के सोलापुर डिस्ट्रिक्ट में आने वाले अकलुज गांव की रहने वाली हैं. एक्टिंग से लोहा मनवाने वाली एक्ट्रेस केवल 16 साल की हैं, ‘सैराट’ उनकी डेब्यू फिल्म है. उनकी फिल्म ‘सैराट’ मराठी बॉक्स ऑफिस पर इस कदर हिट हुई की रिंकू रातोंरात एक साधारण लड़की से स्टार बन गई. आमिर खान, सुभाष घई, रितेश देशमुख, आयुष्मान खुराना समेत कई बड़े एक्टर्स सैराट फिल्म और रिंकू की एक्टिंग की तारीफ कर चुके हैं. रिंकू को सैराट में एक्टिंग के लिए 63वें नेशनल अवॉर्ड से भी नवाजा गया है.
सैराट फिल्म में रिंकू लीड एक्ट्रेस हैं, जिसका नाम है आर्ची. उन्हें इस रोल के लिए फिल्म के डायरेक्टर नागराज मंजुले ने सिलेक्ट किया था. नागराज किसी काम के सिलसिले में अकलुज गांव गए थे. जब रिंकू को गांव में नागराज के आने की बात पता लगी तो वो अपने दोस्तों के साथ उन्हें देखने पहुंची. इस बीच नागराज की नजर रिंकू पर पड़ी और उन्होंने उसे फिल्म का ऑफर दिया. इसके बाद उन्होंने 10 मिनट का ऑडिशन दिया. कुछ दिन बाद उन्हें फोन आया कि वे फिल्म के लिए चुन ली गई हैं.
रिंकू राजगुरु को नेशनल अवॉर्ड मिलने के बाद बधाई देने के लिए लगातार फोन कॉल्स आने लगे थे. यहां तक कि हैकर्स ने उनका फेसबुक पेज हैक कर उस पर महाराष्ट्र के उद्योगमंत्री सुभाष देसाई का मोबाइल नंबर अपलोड कर दिया. इसके बाद देसाई के फोन पर अनचाहे कॉल आने लगे. इन अनचाही कॉल्स से परेशान देसाई ने पुलिस की साइबर सेल में कम्प्लेंट दर्ज करवाई. मामला मीडिया में आने के बाद रिंकू की फेसबुक वॉल से देसाई का नंबर हटाया गया है. जांच में पता चला है कि फिल्म रिलीज़ होने के बाद रिंकू राजगुरु के नाम से कई फर्जी फेसबुक अकाउंट्स ओपन किए गए हैं.
फिल्म सैराट एक अमीर लड़की और गरीब लड़के की इमोशनल प्रेम कहानी है. लड़का गरीब है, उसे ऊंची जाति वाली जमींदार की लड़की से प्रेम हो जाता है. जमींदार को प्रेम का पता चल जाता है. इसके बाद सोसाइटी और जमींदार से भागते हुए प्रेम और उसके संघर्ष को दिखाया गया है. ‘सैराट’ में रिंकू के अपोजिट आकाश ठोसर ने काम किया है. आकाश की भी ये डेब्यू फिल्म है.
बॉक्स ऑफिस पर 100 करोड़ से ज्यादा की कमाई करने वाली मराठी फिल्म ‘सैराट’ के दोनों लीड एक्टर्स रिंकू राजगुरु और आकाश ठोसर के मोम के पुतले पुणे के वैक्स म्यूजियम में लगाए जाएंगे. फिल्म से पहले दोनों को कोई नहीं जानता था. दोनों साधारण गांव के रहने वाले हैं. म्यूजियम के शिल्पकार सुनील कंडलूर ने खुद रिंकू राजगुरु और आकाश ठोसर के घर जाकर उनकी बॉडी का नाप लिया था.

लोकतंत्र नहीं, वोटतंत्र फेल हो रहा है

दुनियाभर में लोकतंत्र नहीं, वोटतंत्र फेल हो रहा है. वोटों से चुन कर आने वाले शासक देश, समाज, विश्व व जनता के लिए भले का काम करें, अब यह अनिवार्य नहीं रह गया है. एक समय पहले लोकतंत्र की पहली शर्त निष्पक्ष चुनाव थे जिस में हर व्यक्ति को अपनी इच्छा से वोट देने का हक हो. जिन देशों में यह हक जितना ज्यादा मजबूत था, उन्हें उतना ज्यादा लोकतांत्रिक, उदार, स्वतंत्र व भेदभाव रहित माना जाता था.

अब ऐसा नहीं. अब कई देशों में लोकतंत्र से ऐसे नेता उभर रहे हैं जो न केवल अन्य देशों के लिए बल्कि अपने समर्थक वोटरों के लिए भी खतरा बन रहे हैं.

अमेरिका का उदाहरण तो भयावह है जहां चुनावी प्रक्रिया जटिल है और शासकनेता को एक नहीं, कईकई चुनावी परेशानियों से गुजरना पड़ता है. वहां डोनाल्ड ट्रंप ने न केवल अपनी बकबक के बावजूद बाधाएं सफलता से पार कर लीं बल्कि चुनाव जीत कर राष्ट्रपति बनने के एक सप्ताह में ही अमेरिका की राजनीति, विदेश नीति, घरेलू नीति, स्वास्थ्य नीति, जौब नीति को भी उथलपुथल कर दिया. आने वाले समय में क्याक्या होगा, नहीं मालूम.

अमेरिकी संविधान में एक चुने राष्ट्रपति को हटाना आसान नहीं है और न ही उस की मनमानी को रोकना.

इंगलैंड में वोट के सहारे हुए जनमत में ब्रिटेन की जनता ने यूरोपीय संघ से निकलने का आत्मघाती फैसला ले लिया है. फ्रांस में मेरीन लेपे की नैशनल फ्रंट नामक अतिवादी पार्टी उभर रही है. रूस में ब्लादिमीर पुतिन वोटों के सहारे ही सत्ता में आए थे, उन्हें थोपा नहीं गया था.

भारत में नरेंद्र मोदी को स्वच्छ सरकार, अच्छे दिन, कालाधनमुक्त भारत के लिए भारी बहुमत से चुना गया पर नरेंद्र मोदी ने केवल नोटबंदी जैसा गलत फैसला ही नहीं लिया, उन्होंने रिजर्व बैंक पर कब्जा भी कर लिया, लोकसभा को निरर्थक बना दिया, मंत्रिमंडल को नकार दिया. अपनी बात को मनवाने के लिए उन्होंने दूसरे दलों में तोड़फोड़ करवा दी. ऐसे में भारत में लोकतंत्र की चूलें हिलने लगी हैं.

भारत में ऐसा पहले इंदिरा गांधी के जमाने में हुआ था. जब तक जयललिता तमिलनाडु में थीं, वे अपने को पुजवाती थीं. देश में नेताओं के जूते साफ करने वाले अफसरों की भी कमी नहीं है.

कुछ ऐसे देश हैं जो लोकतंत्र का मखौल बनाते हुए नकली चुनाव करा कर शासनसुख भोगते हैं. यहां बात उन की नहीं हो रही. यहां उन देशों के लोकतंत्रों की बात हो रही है जहां चुनावी लोकतंत्र गहरी जड़ें जमा चुका है पर अब उन जड़ों का खोखलापन दिखने लगा है.

लोकतंत्र का अर्थ स्वतंत्र व्यापार, स्वतंत्र मीडिया, स्वतंत्र न्यायपालिका और स्वतंत्र चुनावी प्रक्रिया है. पर इन सब को अब खरीदा जा रहा है. दुनिया की संपत्ति यानी शक्ति कुछ हाथों में संकुचित हो रही है और वे ही चुनावी फैसले करने लगे हैं, अपने देश में ही नहीं, हर उस देश में भी जहां उन्हें काम करना होता है. एक नए तरह का विश्वव्यापी साम्राज्य उत्पादनों और सेवाओं के नाम से शुरू हो गया है और माइक्रोसौफ्ट, आईबीएम, मौंट्रैनो, फेसबुक, गूगल, यूनीलीवर जैसे नामों की चीजों को इस्तेमाल करने वाले निरंतर अपने को खुद अलोकतंत्र के गड्ढे में धकेल रहे हैं. डोनाल्ड ट्रंप उन्हीं की देन हैं.

लोकतंत्र का अर्थ पूरे समाज के लिए बराबरी के अवसर मिलना, बराबरी के हक मिलना, बराबरी की चिकित्सा सुविधाएं मिलना, बराबरी का न्याय मिलना, बराबरी की शिक्षा मिलना है. उन्हें चुनावों के महंगे प्रचार, महंगी पार्टियों, पार्टियों में परिवारों के दखल,  शासन पर कौर्पोरेटों के कब्जों ने अब समाप्त कर दिया है. लोकतंत्र की भावना अब मरणासन्न स्थिति में है. लोकतंत्र  हमारे बीच में है पर एक पत्थर की मूर्ति की तरह जिस की पूजा की जाती है, जिस पर सिर नवाया जाता है लेकिन वह हमारे लिए कुछ नहीं कर सकता.

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