कब तक चलेगा हिन्दुस्तान और पाकिस्तान का नारा

हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के बीच पिछले कुछ समय से विशेष तौर पर उरी हमले के बाद से तनाव दिनो-दिन बढ़ता जा रहा है. एक तरफ भारतीय सेना पाकिस्तानी आतंकियों से निपट रही है तो वहीं दूसरी तरफ उसे पाकिस्तान की गोलाबारी और स्थानीय कश्मीरियों का भी विरोध सहना पड़ रहा है. हाल ही में कश्मीर से कई ऐसे वीडियो सामने आये हैं जो दिखाते हैं कि वहां के हालात कितने नाजुक हो गये हैं. एक ओर जहां कुलभूषण जाधव को बचाने का प्रयास किया जा रहा है तो वहीं दूसरी ओर सरकार पाकिस्तान से युद्ध से भी बच रही है. जबकि पाकिस्तान आये दिन सीजफायर का उल्लंघन किये जा रहा है.

पिछले कई महीनों से भारत-पाकिस्तान के बीच रोज बढ़ते तनाव के बाद से सोशल मीडिया पर ऐसे वीडियो की बाढ़ आ गई है जिनमें पाकिस्तान का मजाक उड़ाया जा रहा है. लोग अपने-अपने तरीकों से पाकिस्तान के खिलाफ अपनी भड़ास निकालने में लगे हुए हैं. पाकिस्तानियों की अजीबोगरीब हरकतों और रवैये की वजह से पाकिस्तान का जमकर मजाक बनाया जा रहा है.

ऐसा ही एक वीडियो सोशल मीडिया पर इस वक्त खूब वायरल हो रहा है. वायरल हो रहे इस वीडियो में एक हिन्दुस्तानी युवक से कुछ लोग जबरदस्ती हिंदुस्तान मुर्दाबाद के नारे लगवाने की कोशिश करते दिख रहे हैं. जबरन हिंदुस्तान मुर्दाबाद के नारे की कोशिश करते इन युवकों को ऐसा जवाब मिलता है कि उसे देखकर सब हैरान रह जाते हैं.

आप भी देखिए वीडियो…

बेपरदा होना जिन का शौक रहा है

पतियों के लिए क्या पत्नियां सरेआम अपने कपड़े उतार सकती हैं? इस बात पर एकाएक यकीन नहीं होता, लेकिन यह बात बिलकुल सच है. ब्रिटेन में साल 2009 में सेना के जवानों की पत्नियों ने घायल और बीमार सेना वालों की खातिर एक चैरिटी कलैंडर में बिना कपड़ों के पोज दे कर सभी को चौंका दिया था. ‘द गैरिन गर्ल्स’ नामक उस कलैंडर में सेना वालों की पत्नियों ने ब्लैक ऐंड ह्वाइट तसवीरों में ऐसे फोटो खिंचवाए थे. फोटोग्राफर ने उन से कोई मेहनताना नहीं लिया था. कलैंडर की कीमत 10 पाउंड रखी गई थी. 19 साल से 40 साल की उन औरतों को मौडलिंग की इतनी समझ नहीं थी, फिर भी उन्हें यह फोटो शूट कराने में कोई झिझक महसूस नहीं हुई थी.

फ्रांस की कर्लाबनी अपने बौयफ्रैंड और न्यूड फोटो को ले कर हमेशा सुर्खियों में रही हैं. कर्लाबनी साल 2009 में तब पूरी दुनिया में चर्चित हुई थीं, जब उन को एक न्यूड फोटो की नीलामी की खबर मीडिया द्वारा फैली थी. नीलाम किए जाने वाले फोटो में वे बिना कपड़े पहने एक बिस्तर पर लेटी हुई थीं. यह फोटो मार्च, 1993 में एक अमेरिकी फोटोग्राफर पौमेला हैनसन ने खींचा था.

एक रिएलिटी शो के दौरान बेहद खूबसूरत और बिंदास मौडल हैदी क्लूम ने न्यूड हो कर सब को चौंका दिया था. यह बात जून, 2011 की है, जब हैदी क्लूम 19 साल की थीं और तब प्रोजैक्ट ‘रनवे’ नाम के एक शो में वे न केवल काम कर रही थीं, बल्कि होस्ट की भूमिका में भी थीं.

हैदी क्लूम इसी शो के दौरान न्यूड हुई थीं. वैसे भी न्यूड पोज देना हैदी क्लूम के लिए कोई पहली घटना नहीं थी. वे इस से पहले कई बार कई चर्चित पत्रिकाओं के लिए अपने न्यूड फोटो खिंचवा चुकी हैं.

जानेमाने टैनिस स्टार आंद्रे अगासी ने जनवरी, 2011 में चैरिटी के लिए हो रही नीलामी में सर्वाधिक बोली लगाने वाले खरीदार को अपनी पत्नी स्टेफी ग्राफ का न्यूड फोटो दिखाने का ऐलान कर सनसनी फैला दी थी.

आंद्रे अगासी ने नीलामी में 4 हजार डौलर से ज्यादा की बोली लगाने वाले खरीदार को स्टेफी ग्राफ, जो खुद बेहद खूबसूरत और मशहूर लौन टैनिस स्टार रह चुकी हैं, का न्यूड फोटो दिखाने का वादा किया था.

आंद्रे अगासी ने अपने वादे पर कायम रहते हुए अपने मोबाइल फोन पर कथित न्यूड फोटो दिखाया. लेकिन तब यह साफ नहीं हो पाया था कि आंद्रे अगासी ने क्या सचमुच बोली लगाने वाले शख्स को स्टेफी ग्राफ का न्यूड फोटो दिखाया था या फिर वह न्यूड फोटो किसी और का था.

भारत की मौडल पूनम पांडे भी अपने न्यूड फोटो को ले कर समयसमय पर सुर्खियों में रहती आई हैं.

क्रिकेट वर्ल्ड कप में भारत की जीत पर कपड़े उतारने की बात कह कर पूनम पांडे पहली बार चर्चा में आई थीं. अपने वादे को पूरा करते हुए उन्होंने बाथरूम में नहाते हुए एक फोटो वैबसाइट पर पोस्ट कर दिया था. साल 2011 में इस फोटो को ले कर वे खासा चर्चित रही थीं.

पूनम पांडे ने साल 2012 में ट्विटर पर एक और फोटो पोस्ट किया. इस फोटो में वे बिना बिकिनी की दिखाई दे रही थीं. उन्होंने बंगलादेश के खिलाफ खेले गए क्रिकेट मैच में भारतीय टीम को बधाई देते हुए एक हौट फोटो ट्वीट किया था और तब इसे भारतीय टीम की अपनी स्टाइल में दिया गिफ्ट बताया था.

भारत और पाकिस्तान के बीच 19 मार्च, 2016 को खेले गए क्रिकेट मैच में भारतीय टीम की शानदार जीत की खुशी में शाहिद अफरीदी की गर्लफ्रैंड होने का दावा करने वाली इंडियन मौडल अर्शी खान ने न्यूड हो कर अपना वादा पूरा किया था.

अर्शी खान ने कहा था कि मैच भारत के पक्ष में होगा, तो वे इस खुशी में न्यूड हो कर फाटो शूट कराएंगी. कहा जाता है कि अर्शी खान ने कथित तौर पर न्यूड हो कर फोटो शूट कराया और टीम इंडिया को जीत की सौगात दी.

वैसे, कैटरीना मिग्लोरिनी ने जो फैसला लिया, वह बेहद चौंकाने वाला था. ब्राजील की इस 20 साला छात्रा ने साल 2012 में अपनी वर्जिनिटी की नीलामी औनलाइन कर सब को हैरानी में डाल दिया था. इस छात्रा ने अपनी वर्जिनिटी की कीमत 7 लाख, 80 हजार डौलर यानी 4 करोड़ रुपए लगाई थी.

कैटरीना मिग्लोरिनी के इस ऐलान के बाद खरीदारों की लंबी लाइन लग गई थी. जापान के नात्सू नामक शख्स ने सब से ज्यादा बोली लगाई थी.

कैटरीना मिग्लोरिनी ने अपनी वर्जिनिटी को बेचने से मिले पैसे से गरीबों के लिए घर बनाने की बात कही थी. यह भी कहा था कि एक बार किसी के साथ पैसे ले कर सैक्स करने से कोई लड़की कालगर्ल नहीं बन जाती.

चुनाव में मुसलिम संगठनों का रोल

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी की भारी जीत को जहां एक ओर नए समीकरण के रूप में प्रचारित किया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर आम मुसलिमों के मन में इस पार्टी को ले कर डर और शक बढ़ता जा रहा है. सियासी तौर पर मुसलिमों की ताकत कैसे बढ़े, इस पर भी कोई गंभीर बहस होती नहीं दिखाई पड़ रही है. इस वजह से यह सवाल और भी अहम हो रहा है कि क्या आने वाले दिनों में भारत में मुसलिम सियासत का रोल न के बराबर हो जाएगा? क्या उन के बिना भी सियासी पार्टियां सत्ता तक पहुंच सकेंगी?

साल 2014 के लोकसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश के लैवल पर इस तरह का नमूना देखने को मिला था और साल 2017 के विधानसभा चुनावों में भी कुछ ऐसा ही नजारा दिखाई पड़ा है. यहां मुसलिम बहुल 140 सीटों में 20-30 फीसदी मुसलिम हैं, जिन में से महज 24 सीटों पर मुसलिम उम्मीदवार कामयाब हुए हैं, जबकि 82 सीटें मुसलिम वोटों के बंटने के चलते भारतीय जनता पार्टी के खाते में चली गईं.

यहां बुनियादी सवाल मुसलिम वोटों की ताकत का है. कहा जाता है कि ये जिस तरफ जाएंगे, जीत उसी की होगी, जो इन चुनावों में सचाई से परे साबित हुआ.

बाबरी मसजिद मामले के बाद मुसलिम कांग्रेस से नाराज थे. साथ ही, भाजपा से भी उन की दूरी थी. तीसरा मोरचा उन की पहली पसंद था, लेकिन तीसरे मोरचे की सियासत ज्यादा दिनों तक नहीं चली और मुसलिम वापस कांग्रेस में चले गए.

तब सवाल उठा था कि कांग्रेस में ऐसी क्या तबदीली आई है कि मुसलिम नेतृत्व द्वारा उस को माफ कर उस के हक में मुसलिमों को खड़ा किया जा रहा है?

उस समय ‘टैक्टिकल वोटिंग’ की शब्दावली सामने लाई गई, जिस का मतलब यह था कि जिस सैकुलर पार्टी का उम्मीदवार भाजपा को हराने की ताकत रखता हो, मुसलिम उस के हक में वोट करें. इसे कुछ बुद्धिजीवियों द्वारा नेगेटिव सोच से ग्रसित वोटिंग कहा गया.

जब इस शब्दावली को मुसलिमों से परिचित कराया गया था, उस समय से ले कर आज तक इस सवाल का जवाब नहीं मिला है कि इस शब्दावली के इस्तेमाल से किस को कितना फायदा हुआ? क्या मुसलिमों की राजनीतिक ताकत बढ़ी या जिस के विरोध में यह मुहिम चलाई गई, उस के हक में माहौल बना? यह एजेंडा किस का था? अगर यह मुसलिम नेतृत्व का था, तो क्या वह इस की नाकामी पर विचार करने के लिए तैयार है? अगर ऐसा नहीं है, तो क्या यह आरोप सही है कि यह भाजपा का एजेंडा है, जिस का शिकार सीधेतौर पर मुसलिम नेतृत्व हुआ है?

जहां तक उत्तर प्रदेश में मुसलिम वोटों के बंटने या कोई असर न छोड़ पाने की बात है, तो यह बात सभी कह रहे हैं कि सैकुलर पार्टियों के चलते मुसलिम वोट बंटे हैं, क्योंकि इन सैकुलर पार्टियों ने मुसलिम बहुल इलाकों से मुसलिमों को अपना उम्मीदवार बनाया था. समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी दोनों के मुसलिम उम्मीदवार एकदूसरे के खिलाफ चुनावी मैदान में थे और कई जगहों पर तो 4-4 मुसलिम उम्मीदवार मुकाबले में थे, जबकि भाजपा ने किसी भी मुसलिम को टिकट न दे कर अपनी नीति साफ कर दी थी.

इस सूरतेहाल से वोटर समझ नहीं पाए और भाजपा यही चाहती थी कि मुसलिम वोटर कुछ न समझें और उन के वोट बंट जाएं, जिस से उस की जीत पक्की हो सके.

भाजपा इस मिशन में पूरी तरह कामयाब रही. समाज के अलगअलग तबकों को अपने साथ जोड़ते हुए वह उन्हें यह समझाने में कामयाब रही कि अखिलेश मुसलिमपरस्त हैं, मुलायम सिंह यादव कारसेवकों पर गोली चलवा कर अपनी हिंदू विरोधी सोच का परिचय दे चुके हैं. मायावती को भी मुसलिमों का हमदर्द बताया, जिस का सुबूत उन के द्वारा इस चुनाव में एक सौ मुसलिम उम्मीदवारों को टिकट दिया जाना है. भाजपा ही बहुसंख्यक तबके यानी हिंदुओं की रक्षक है, इसलिए उस को मजबूत करना समय की पुकार है.

आल इंडिया मजलिस ए इत्तेहादुल मुसलीमीन के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी पर वोट काटने का आरोप तो नहीं लगाया जा सकता, क्योंकि उन्होंने सिर्फ 38 उम्मीदवारों को ही टिकट दिया और वे सभी हार गए, जबकि उन्हें 2 हजार से 4 हजार वोट ही मिले. सिर्फ संभल में शफीकुर्रहमान बर्क के पोते को 60 हजार वोट मिले, लेकिन उस की वजह मजलिस नहीं, बल्कि उन के दादा और खुद उन का काम है.

असदुद्दीन ओवैसी इलैक्ट्रौनिक चैनलों पर जिस तरह की भाषा का इस्तेमाल करते हैं, वह आपसी भाईचारा बढ़ाने के बजाय झगड़ेफसाद पैदा करने का काम करती है, जिस का फायदा भाजपा को हुआ.

मिसाल के तौर पर उन्होंने एक टैलीविजन चैनल पर चर्चा में हिस्सा लेते हुए कहा था कि ‘नरेंद्र मोदी हमारे प्रधानमंत्री नहीं हैं.’

संघ परिवार ने इसे हिंदूमुसलिम धु्रवीकरण के लिए जम कर इस्तेमाल किया. इस बयान से बहुसंख्यक समाज में यह पैगाम गया कि मुसलिम अपने अलावा किसी दूसरे की अगुआई को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं. इस ने बहुसंख्यक समाज के वोटरों को भी भाजपा के पाले में आने पर मजबूर कर दिया.

वहीं आजम खां की भी भाजपा की ओर वोट खिसकाने में अहम भूमिका रही. उन्होंने किसी समस्या पर तथ्यों पर आधारित आंकड़ों से नीतिगत बातचीत करने के बजाय ‘बादशाह’ या ‘राजा’ कह कर नरेंद्र मोदी को निशाना बनाया, जिस का वोटरों पर गलत असर पड़ा और लोगों में नरेंद्र मोदी के लिए हमदर्दी पैदा हो गई.

इन चुनावों को ले कर जहां एक ओर सियासी पार्टियां अपनी पूरी ताकत लगाए हुए थीं, वहीं दूसरी ओर मुसलिम संगठन भी इसे बहुत अहम मान रहे थे.

अखबारों में उन के बयान और भाजपा के सत्ता में आने पर संदेहों से लेख भरे थे, जिस से वोटरों को सचेत करते हुए उसे नाकाम करने की बात कही जा रही थी. लेकिन नाकाम करने का क्या तरीका हो, इस पर मुसलिम संगठन कुछ भी बोलने को तैयार नहीं थे, क्योंकि तब उन का सीधा मुकाबला सैकुलर पार्टियों से था.

यही वजह थी कि मुसलिम संगठनों के फैडरेशन ‘आल इंडिया मुसलिम मजलिस ए मुशावरत’ की 3 बैठकें दिल्ली में हुईं. इन में कई मुसलिम संगठनों के पदाधिकारी शामिल हुए थे, पर वे भी किसी एक नतीजे पर नहीं पहुंच सके कि वोटरों से वोट देने के लिए किस पार्टी के हक में अपील की जाए. जबकि इस के पहले जमायत ए इसलामी हिंद, मुशावरत और आल इंडिया मिल्ली काउंसिल सैकुलर पार्टियों के उम्मीदवारों के नामों की लिस्ट जारी कर उन्हें वोट देने की अपील करती थीं. लेकिन तब ये सभी संगठन अपनेअपने लैवल पर काम करते थे, संयुक्त रूप से किसी एक मामले पर सहमत न होने के चलते इस बार वोटरों के विवेक पर छोड़ दिया गया कि वे किसे वोट दें.

सवाल यह है कि अगर असलियत में इतना ही खतरा था, जितना इन संगठनों की ओर से बताया जा रहा था, तो इन संगठनों ने जमीनी लैवल पर कोई सर्वे कर वोटरों का मार्गदर्शन क्यों नहीं किया, जिस से मुसलिम वोटों की ताकत बनी रहती और वे बेअसर नहीं होते?

14वीं लोकसभा और हाल ही में हुए विधानसभा चुनावों में एक यही बात तो समान नजर आती है कि धर्मनिरपेक्ष कही जाने वाली पार्टियों ने भाजपा और संघ परिवार की नीतियों और देश पर पड़ने वाले असर पर ठोस रूप से बात नहीं की और नरेंद्र मोदी पर निशाना साधने में गुजार दिया.

केंद्र सरकार के 33 महीनों में मुसलिम नेतृत्व की भूमिका को भी देखना बहुत जरूरी है. परंपरा के उलट मुसलिम संगठनों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से दूरी बनाए रखी. यह दूरी गुजरात दंगों को ले कर थी. लेकिन क्या मुसलिम संगठनों का यह क्रियाकलाप असदुद्दीन ओवैसी की कही गई बात से मेल नहीं खाता है?

कुछ समय पहले मुसलिम संगठनों की ओर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलने के लिए कुछ कोशिश की गई, लेकिन जब यह खबर आम हो गई, तो यह मिशन ठंडा पड़ गया. इस से इस बात की तसदीक होती है कि मुसलिम संगठनों में से कुछ प्रधानमंत्री से मिलने में कोईर् संकोच नहीं करते हैं और उन के सामने मुसलिम समस्याओं का उठाना वे अपना लोकतांत्रिक फर्ज समझते हैं.

इस के साथ ही पीस पार्टी और आल इंडिया मजलिस इत्तेहादुल मुसलीमीन (एमआईएम) एकदूसरे को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का एजेंट साबित करने में जुटी थीं और उर्दू अखबरों में पूरे पन्ने पर इस बाबत इश्तिहार छपवाए जा रहे थे.

मुसलिमों को परवान चढ़ाने की बात सालों से हो रही थी, लेकिन हैरानी की बात यह थी कि कईर् जगहों पर पीस पार्टी और एमआईएम आपस में टकराती नजर आईं, जिस ने यह सवाल खड़ा कर दिया कि कैसा मुसलिम नेतृत्व और कैसे इस को परवान चढ़ाना?

इस के अलावा दोनों पार्टियों के कर्ताधर्ता कई आरोपों के घेरे में रहे. एमआईएम पर संघ और भाजपा से निकट होने का आरोप लगता रहा है, वहीं पीस पार्टी के पदाधिकारियों पर यह आरोप लगता रहा है कि वे योगी आदित्य नाथ से हाथ मिलाए हुए हैं. दोनों पार्टियों ने कोई ऐसा बुनियादी मुद्दा नहीं उठाया, जो वोटरों पर खासा असर डाल सके. अब यह तय माना जा रहा है कि हिंदुत्व और राष्ट्रवाद की अपनी थ्योरी को भाजपा और संघ परिवार बहुसंख्यक के एक बड़े हिस्से को मनवाने में कामयाब हो गया है.

जमायत ए इसलामी हिंद ने एक कदम आगे बढ़ कर यह फैसला लिया कि वह अपनी समस्याओं के लिए प्रधानमंत्री के बजाय राष्ट्रपति से मिलेगी. प्रधानमंत्री जनप्रतिनिधि होता है और इसी वजह से वह जनता के प्रति जवाबदेह होता है. लोकतांत्रिक प्रक्रिया भी यही है, लेकिन जिस तरह से प्रधानमंत्री की अनदेखी की गई, उस ने बहुसंख्यक समाज को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि मुसलिम संगठन एक ही तरह से सोचते हैं. शब्द चाहे जो इस्तेमाल करें, लेकिन उन का मतलब एक ही है.

जमीयत उलेमा ए हिंद के दूसरे धड़े के अध्यक्ष ने समाजवादी पार्टी और कांग्रेस की ओर अपना झुकाव दिखा कर भी एक खास तरह का माहौल बनाने में मदद की. इस से लगा कि सभी मुसलिम संगठन और उन के जिम्मेदार रहनुमा ‘भाजपा हटाओ’ की अघोषित राजनति पर काम कर रहे हैं. इस को बहाना बना कर संघ परिवार द्वारा बहुसंख्यकों के दलित और पिछड़े तबके को गोलबंद करने में आसानी हुई.

जो नतीजे आए हैं, उन के लिए क्या मुसलिम नेतृत्व अपनी जिम्मेदारी से बच सकता है? अगर मुसलिम नेतृत्व सच में गंभीर है, तो उसे चाहिए कि वह ‘भाजपा हटाओ’ एजेंडे पर खुली चर्चा कराए, वरना मुसलिम वोटों की ताकत कैसे बढ़ेगी, यह सवाल अधूरा ही रहेगा.

लोकतांत्रिक तरीके से चुने गए प्रधानमंत्री से मुसलिम संगठनों द्वारा दूरी बनाए रखना किस ओर संकेत करता है? क्या इस से आम मुसलिम का भला हो पाना मुमकिन है?

पहले छोटे से छोटे मुद्दे को ले कर मुसलिम संगठन प्रधानमंत्री से मिलने को इतने उतावले रहते थे कि अकसर इस की खबरें अखबारों में आती थीं, जबकि सचाई यह थी कि आतंकवाद के आरोप में गिरफ्तार मुसलिम नौजवानों को ले कर जैसे ही मुसलिम जमायतों का प्रतिनिधिमंडल प्रधानमंत्री से मिलता, उस के 2-3 दिन के अंदर और भी मुसलिम नौजवान गिरफ्तार कर लिए जाते, लेकिन इस आधार पर कभी किसी मुसलिम संगठन ने प्रधानमंत्री से मिलने में संकोच नहीं किया. ऐसे हालात में अब जो माहौल बना है, क्या मुसलिम संगठन उस पर भी कोई सोचविचार करेंगे?

देशभर में कहां से आ गए ये लट्ठमार गौ गैंग

देशभर में गौ रक्षकों के लट्ठमार गैंग पैदा हो गए हैं, जो दूध देने वाले जानवरों को बचाने के नाम पर खुल्लमखुल्ला कानून हाथ में ले कर मारपीट व हत्याएं कर रहे हैं. पशु पालन, जो खेतीकिसानी और गांवों का एक बड़ा रोजगार है, अब इन गौ गैंगों का शिकार होने लगा है और लाखों परिवार रातदिन डर में रहते हैं कि न जाने कब क्या हो जाए.

जानवर दूध ही नहीं देते, उन का मांस, चमड़ी, हड्डियां सब आमदनी का हिस्सा हैं और फिर भी जानवर पालने वाले बेहद गरीब और दानेदाने को मुहताज रहते हैं. इन पर गौ गैंगों का काला साया इन की थोड़ी सी आमदनी को भी रोक कर इन घरों को भूखा मारने को उतारू है.

अफसोस इस बात का है कि इन गौ गैंगों की नेतागीरी कोई ब्राह्मणबनिया नहीं करते. वे तो केवल पीछे से इन्हें बचाव का वादा कर के मनमानी करने की छूट दे रहे हैं, ताकि इन गौ गैंगों की लगीबंधी आमदनी बन जाए और जानवरों के व्यापार में जानवरों के इंस्पैक्टरों के साथसाथ घंटी लगाए लोगों को भी हिस्सा मिलने लगे.

गौ गैंग पहले तो गायों के नाम पर ही वसूली करते थे, पर अब चूंकि गायों का लेनदेन बंद सा हो गया है, वे दूसरे जानवरों के कारोबार पर भी मांसरहित देश बनाने की जुगत में रोकटोक करने लगे हैं. जानवर खेतीबारी और गांवों के जिंदा रहने के लिए जरूरी हैं, पर इन जानवरों की सिर्फ सेवा करी जाए या इन्हें पूजा ही जाए, इस से गांवों का काम नहीं चल सकता. सिर्फ दूध बेचने से जो आमदनी होगी, वह किसानों और गांवों के व्यापार को जिंदा रखने के लिए काफी नहीं है. जानवर का आखिर तक इस्तेमाल जरूरी है.

सदियों से कुछ जानवरों की पूजा की जाती रही है, पर यह पूजा सिर्फ ऊंची जातियां करती थीं और नीची जातियां इन्हीं पूजने वाले जानवरों के साथ मनमाना और जरूरी इस्तेमाल करने को आजाद थीं. अगर सदियों पहले कुछ जानवरों को मारने या दूसरे इस्तेमाल पर रोक लगा दी गई होती, तो इन की प्रजाति खत्म हो चुकी होती, क्योंकि इन्हें कोई नहीं पालता.

आज भी गाय को दान में लेने वाले गायों को दुहते हैं, पर पहले और बाद में उन का कोई खयाल नहीं रखते. पिंजरापोल बना कर नाटक करा जाता है कि गायों की सेवा करी जा रही है, पर असल में वे कमाई के साधन हैं. जानवर गांवों और कसबों के ही नहीं, शहरों की भी अर्थव्यवस्था के अहम हिस्से हैं और इन की चाबी गौ गैंगों को दे देना एक नया माफिया पैदा करता है.

अगर इरादा ही गौ गैंगों के नाम पर पार्टी के कार्यकर्ताओं की फौज तैयार करना है तो बात दूसरी है, पर यह देश के विनाश का काम करेगा, विकास का नहीं. कुछ दिन लोग डर कर या धर्म के नाम पर अंधे हो कर पेट काट कर इस नौटंकी को तालियां पीट कर सराहेंगे, पर जल्दी ही असलियत सामने आ जाएगी कि यह स्कीम कितनी महंगी है.

जैसे पहले लाल सलाम वालों ने कारखानों की घेराबंदी की थी, जिस का नतीजा देश के कारखानों के इलाकों के मरघटों में तबदील हो जाने पर हुआ, वैसे ही गौ गैंग सब से निचले स्तर के छोटे गरीब व असहाय चार पैसे कमाने वालों के भूखे पेटों को भुखमरी की कगार पर खड़ा कर देंगे.

डांस प्रेमी हूं : सोनाक्षी सिन्हा

फिल्म ‘दबंग’ से अपने कैरियर की शुरुआत करने वाली सोनाक्षी सिन्हा शत्रुघ्न सिन्हा और पूनम सिन्हा की बेटी हैं. अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने फैशन डिजाइनिंग का कोर्स किया. कुछ फिल्मों में उन्होंने कौस्ट्यूम डिजाइनर का भी काम किया. उन्हें लगा नहीं था कि वे कभी हीरोइन बन पाएंगी. लेकिन सलमान खान ने उन्हें फिल्मों में आने के लिए बढ़ावा दिया और उन का नाम आज की टौप हीरोइनों में जुड़ चुका है. फिल्मों के अलावा सोनाक्षी सिन्हा को छोटे परदे पर भी काम करना पसंद है. इन दिनों वे ‘स्टार प्लस’ के एक रिऐलिटी शो ‘नच बलिए 8’ में जज बनी हैं. पेश हैं, उन से की गई बातचीत के खास अंश:

इस शो से कैसे जुड़ना हुआ?

 इस शो से जुड़ना इत्तिफाक नहीं था. इस से पहले भी मैं ने एक रिऐलिटी शो किया था. उस के खत्म होने के बाद यह मिला.

मुझे टैलीविजन पर काम करना बहुत पसंद है, क्योंकि इस की पहुंच हर घर में होती है. यह एक डांस शो है और मुझे भी डांस बहुत पसंद है.

क्या इस शो के दौरान आप भी कुछ नया डांस सीख रही हैं?

मैं हर फिल्म के साथ एक नए तरह का डांस सीखती हूं. अभी मेरी फिल्म ‘नूर’ आई है. उस में मुझे नया डांस ‘हिपहौप’ सीखने को मिला. मुझे कसरत करना जरा भी पसंद नहीं है, लेकिन डांस पसंद है, इसलिए मैं डांस क्लास में जाना पसंद करती हूं, क्योंकि फिट रहने का यह भी एक अच्छा जरीया है.

आप अपने मातापिता से कितनी प्रभावित हैं?

मैं उन्हें आदर्श जोड़ा मानती हूं. दोनों ने अपनी जिंदगी के तकरीबन 36 साल हर मोड़ पर, उतारचढ़ाव में एकदूसरे का साथ दिया है. मैं ने बचपन से देखा है कि पिता के साथ मां का संबंध बहुत गहरा है. पतिपत्नी के रिश्ते को उन्होंने बहुत जिम्मेदारी के साथ निभाया है.

आप ने डांसिंग, सिंगिंग और ऐक्टिंग सबकुछ कर लिया है. अब आगे नया क्या करना चाहती हैं?

 मैं एक क्रिएटिव लड़की हूं और हमेशा कुछ न कुछ नया करने की सोचती हूं. अभी मैं एक ऐसे मुकाम पर भी पहुंच चुकी हूं, जहां से मैं अपने सपने को पूरा कर सकती हूं. ऐसे में मेरे पास अगर कुछ भी नया करने का मौका होगा, तो मैं जरूर करना चाहूंगी.

आजकल रिश्तों के माने बदल गए हैं. हर कोई अपनी तरह से रिश्तों को निभाता है. इस में बहुत कम जोड़े ऐसे होते हैं, जो सालोंसाल साथ निभाते हैं. कहां समस्या है? इसे कैसे ठीक किया जा सकता है?

 मेरे हिसाब से मैं ने एक रिलेशनशिप, जिसे अपने बारे में सोचा है, वह है लव, अफैक्शन, केयरिंग, शेयरिंग, सपोर्ट जो हर काम में होना चाहिए. इन में से कुछ भी कम हो जाए, तो रिश्तों का रूप बदल जाता है.

क्या आप टैलीविजन पर ऐक्टिंग करना चाहती हैं?

 टैलीविजन एक बड़ा जरीया है और करोड़ों लोग इस को देखते हैं. ऐसे में कोई अच्छा काम मिलेगा, तो मैं जरूर करना चाहूंगी.

तनाव में आप क्या करती हैं?

 तनाव से छुटकारा पाने के लिए मैं डांस करना ही बेहतर समझती हूं.

आप ने नई फिल्म ‘नूर’ में एक पत्रकार का किरदार निभाया है. क्या आप को लगता है कि पत्रकार के लिए भी कुछ बंदिशें होनी चाहिए?

 सभी काम के लिए एक हद जरूर होनी चाहिए, फिर चाहे वह डाक्टर, लेखक, पत्रकार, ऐक्टर वगैरह कोई भी हो. अगर आप किसी बात से बुरा मानते हैं, तो वह बात आप को किसी और के लिए भी नहीं कहनी चाहिए.

मोदी सरकार : 3 साल, 15 सवाल

आज का दिन देश और बीजेपी दोनों के लिए बेहद खास है. तीन साल पहले आज के ही दिन लोकसभा के नतीजों का एलान हुआ था. जिसमें नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एनडीए ने बड़ी जात हासिल की था. चुनाव जीतने के तीन साल बाद भारतीय जनता पार्टी और केंद्र सरकार का दावा है कि उसने अभूतपूर्व काम किया है. लेकिन विपक्ष की राय में सरकार हर मोर्चे पर नाकाम रही है. वहीं राजनीतिक विश्लेषक सरकार के कामकाज को मिलाजुला बता रहे हैं.

अपने चुनावी प्रचार में प्रधानमंत्री मोदी ने देश की जनता से कालेधन की वापसी से लेकर नौजवानों के लिए नौकरी पैदा करने और देश की सुरक्षा को लेकर कई चुनावी वादे किया थे. ऐसे में आज तीन साल गुजर जाने के बाद सबसे बड़ा सवाल उभरता है कि क्या हुआ मोदी सरकार के वादों का?

हम करने जा रहे हैं प्रधानमंत्री से 15 सवाल कि आखिर ऐसा क्यों है…

 

प्रधानमंत्री जी, ऐसा क्यों है…?

  1. आपकी पार्टी 23 जनवरी 2014 को करेंसी बदलने का विरोध करती है

और

आप 8 नवम्बर 2016 को खुद करेंसी बदल डालते हैं.

  1. आपकी पार्टी 2013 में 85 रुपये किलो तूअर दाल बिकने पर पूरे देश में महंगाई का विरोध करती है

और

आपके शासन में तूअर दाल 150 से 200 रुपये किलो बिकती है.

  1. आपकी पार्टी गोवंश हत्या का विरोध करती है

और

आपके सत्ता में आते ही भारत बीफ एक्सपोर्ट में दुनिया का नंबर 1 देश बन जाता है.

  1. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जब विदेश में नवाज शरीफ से हाथ मिलाते थे तो आप उन्हें डरपोक कहते थे

और

आप खुद बिना बुलाये नवाज शरीफ के जन्मदिन पर केक और बिरयानी खाने पाकिस्तान पहुंच जाते हैं.

  1. 2004 से 2014 के बीच आपकी पार्टी रेल किराये में 1 रुपये भी बढ़ाने पर उसके विरोध में रेल का चक्का जाम करती थी

और

आपने सत्ता में आते ही दो साल में रेल किराया लगभग 60-70 प्रतिशत बढ़ा दिया.

  1. आपकी पार्टी ने 2004 से 2014 के बीच FDI, GST, AADHAR, MNREGA, कोयला खान नीलामी आदि का विरोध किया

और

सत्ता पाते ही आप उन्हीं सारी योजनाओं का गुणगान कर रहे हो.

  1. निर्भया के समय एक बलात्कार के विरोध में आपकी पार्टी 3 महीने आंदोलन करती है

और

बीजेपी शासन में मध्य प्रदेश में प्रतिदिन 12 और दिल्ली में प्रतिदिन औसतन 7 बलात्कार होने पर आपके कान में जू तक नहीं रेंगती.

  1. UPA सरकार ने 125 से 140 डालर प्रति बैरल में अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार से कच्चा तेल खरीद के 70 से 75 रुपये लीटर पेट्रोल बेचा, उसके विरोध में बीजेपी बैलगाड़ी मार्च निकालती थी

और

अब आपके शासन में 50 से 60 डालर प्रति बैरल में कच्चा तेल खरीद कर आप 70 रुपये में पेट्रोल बेच रहे हो.

  1. आपकी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण रुपये लेते रंगे हाथ पकडे जाते हैं फिर भी आपकी पार्टी ईमानदार है

और

आप बाकी सबके शासन को भ्रष्ट, जंगलराज कहते हो.

  1. आपके मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के राज में व्यापम एवं खानघोटाला, वसुंधरा राजे का ललित मोदी घोटाला, रमन सिंह का 34000 करोड़ का अन्न वितरण घोटाला होता है और आप अपने मुख्यमंत्री का इस्तीफा नहीं मांगते

और

दूसरे के शासन में हर दूसरे दिन किसी न किसी का इस्तीफा मांगने खड़े हो जाते थे.

  1. भक्त कहते हैं आप प्रतिदिन 18 घंटे काम करते हैं

पर

ढाई साल में आपने देश का क्या विकास किया यह कहीं नज़र
नहीं आता.

  1. आपने 100 दिन में सारा काला धन विदेश से लाने का वादा किया था

और

900 दिन में भी कोई काला धन विदेश से नहीं ला पाये.

  1. आपने किसानों को उनके उत्पादन खर्च पर 50% लाभ देने का वचन दिया था

और

पिछले ढाई साल में किसानों के उत्पाद का सरकारी खरीद रेट 1 रुपये भी नहीं बढ़ाया.

  1. चने का बेसन 60 रुपये किलो था तब बीजेपी कार्यकर्ता थाली बजाओ आन्दोलन करते थे

और

अब जनता चने का बेसन 150 रुपये किलो खरीद रही है.

  1. आपकी पार्टीसर्विस टैक्स लगाने का विरोध करती थी

और

आपने कुर्सी पर बैठते ही सर्विस टैक्स 2.5% बढा दिया.

क्यों मोदीजी क्यों ?

क्या इन सवालों को जवाब आप दे पाएंगे प्रधानमंत्री जी.

गर्त में जा रही हैं गरीबों की पार्टियां

हाल के चुनावों में गरीबों के नाम पर वोट लेने वाली पार्टियों का उत्तर प्रदेश, दिल्ली और उत्तराखंड में बुरा हाल हुआ है. पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी का राज भी अब खतरे में है. कम्यूनिस्ट पार्टियों का हाल तो पहले ही बुरा हो चुका है. महाराष्ट्र में अंबेडकर के नाम पर बनी पार्टियों की जरा सी भी पहचान नहीं बची है.

इस की वजह यह रही है कि गरीबों का नाम ले कर उन्हें सपने दिखाने वाली पार्टियां उन की उम्मीदों को पूरा नहीं कर पाईं. इस देश के गरीब को पेट भर खाने के अलावा इज्जत और सुरक्षा भी चाहिए और ये पार्टियां दोनों ही नहीं दे पाईं. बहुजन समाज पार्टी भी बुरी तरह बेकार साबित हुई. बिहार में अभी इन पार्टियों का राज है, पर वह ज्यादा टिक नहीं सकता.

गरीबों को इज्जत दिलाने के लिए उन में सामाजिक बदलाव की जो जरूरत है, उस पर ये पार्टियां बिलकुल ध्यान नहीं दे रहीं. गरीबों को जातपांत, रस्मों, शराब, गंदगी, पढ़ाई की कमी, कम उम्र में शादी, दिखावे में कर्ज ले कर खर्च करने जैसे कांटों का सामना हर रोज करना पड़ता है. पार्टियां गरीबों के वोट तो चाहती हैं, पर उन्हें सदियों से बने गढ़ों में से निकालने के लिए हाथ नहीं बढ़ाना चाहतीं.

गरीब जनता को बस राशन या गैस ही नहीं चाहिए, उसे जिंदगी जीने के सही उसूलों की जानकारी भी चाहिए और ओझाओं, गुनियों, पंडितों, मौलवियों के अलावा उन के पास कोई और कैसा भी रास्ता दिखाने वाला नहीं होता. गरीबों की हमदर्द पार्टियों के पास मौका था कि वे यह काम भी कर लें, ताकि गरीबों की हर तरह की दोस्त व सलाहकार बन सकें, पर उन्होंने सत्ता में आते ही सत्ता का फायदा उठाना शुरू कर दिया. जिन की सेवा करनी चाहिए थी, उन्हें अपनी सेवा में लगा लिया.

कांग्रेस ने महात्मा गांधी के जमाने में कुछ ऐसे काम किए थे, जिन का फायदा नेहरूइंदिरा परिवार ने 70 साल उठाया है, पर बाकी पार्टियों ने ऐसा कुछ नहीं करा. भारतीय जनता पार्टी ने धर्म के नाम पर घरघर में घुसपैठ कर ली और गरीब को पटा लिया कि वह जैसा है, भाग्य की देन मान कर हमेशा की तरह सहता रहे. हां, वोटों के बदले में उस ने इन्हें कुछ छोटे नएनए देवीदेवता गढ़ कर दे दिए, जिन्हें पूज कर गरीब अपनी गरीबी को खत्म करने के बहकावे में आ गए हैं.

गरीबों को जब तक कामकाजी, मेहनती और नया करने लायक नहीं बनाया जाएगा, तब तक यह देश नहीं सुधर सकता. हम ज्यादा हैं, इसलिए हमें दुनिया भाव देती है, ताकि उस के सामान को यहां बेचा जा सके और गरीबों को झुनझुनों से खुश रखा जा सके. ठीक वही जो गरीबों की पार्टियां कर रही हैं.

पूरी दुनिया में बढ़ता नस्लभेद का नासूर

विश्वभर में हिंसा का रंग और सुर्ख हो रहा है. अमेरिका, आस्ट्रेलिया, कनाडा, फ्रांस से ले कर भारत तक कुदरती इंसानी रंगों की आपसी नफरत और गहरी होती जा रही है. ग्रेटर नोएडा में नाइजीरियाई छात्रों के साथ हुई हिंसा से भारत की वर्ण, रंगभेदी सोच उजागर हुई है. मामले की गूंज सोशल मीडिया से ले कर भारतीय संसद और अफ्रीकी देशों तक पहुंच गई. अफ्रीकी देशों ने नाइजीरियाई छात्रों पर हुए हमले को नस्लभेदी हमला करार दिया है. अफ्रीकी राजदूतों के समूह की बैठक में हमले को विदेशियों से घृणा और नस्लवादी सोच से युक्त बताया गया. हालांकि विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने जांच के आदेश दे दिए पर सरकार इसे नस्लीय हमला मानने को तैयार नहीं है.

क्या है मामला

24 मार्च को ग्रेटर नोएडा की एनसीजी रैजिडेंसी सोसायटी में रहने वाला 19 वर्षीय मनीष खारी गायब हो गया तो उस के परिवार ने कासना पुलिस स्टेशन में कुछ नाइजीरियाई युवकों के खिलाफ अपहरण व हमले की रिपोर्ट दर्ज कराई. अगले दिन मनीष अपने घर के पास बेहोशी की हालत में मिला. उसे अस्पताल ले जाया गया. वहां उसे ओवरडोज ड्रग सेवन के संदेह में मृत घोषित कर दिया गया. पुलिस ने मामले में 5 नाइजीरियाइयों को पकड़ा. अगले दिन नाइजीरियाइयों के समूह ने कासना पुलिस स्टेशन के बाहर पकड़े गए युवकों को छोड़ने के लिए विरोध प्रदर्शन किया. पुलिस को इन के खिलाफ कोई सुबूत नहीं मिला.

नाइजीरियाइयों को छोड़ने के बाद 27 मार्च को एसएसपी कार्यालय के बाहर स्थानीय लोग जमा हुए और उन की गिरफ्तारी के लिए परी चौक को ब्लौक कर दिया गया. कैंडल लाइट प्रदर्शन किया गया और इसी दौरान कई नाइजीरियाई छात्रों की पिटाई कर दी गई. घटना के बाद क्षेत्र में तनाव फैल गया. ग्रेटर नोएडा की रिहायशी कालोनियों में रहने वाले अफ्रीकी छात्रों को घर खाली कर चले जाने को कहा गया. प्रशासन द्वारा तनाव के हालात को देख कर 28 मार्च को परी चौक और आसपास के इलाकों में अतिरिक्त रैपिड ऐक्शन फोर्स तैनात कर दी गई. नौलेज पार्क, कासना, सूरजपुर, एच्छर, ओमीक्रोन सैक्टर, ओमेगा, पी4  रिहायशी सोसायटियों में रहने वाले अफ्रीकी छात्रों की सुरक्षा के लिए सुरक्षाकर्मी तैनात करने पड़े.

प्रशासन ने स्थानीय रैजिडैंट वैलफेयर एसोसिएशन और अफ्रीकी छात्रों के प्रतिनिधियों के साथ शांति बनाए रखने के लिए बैठक कर दोनों ओर के लोगों को समझाने का प्रयास किया.

रंगभेद की मार

अफ्रीकी छात्र यहां के कालेज और विश्वविद्यालयों में बड़ी तादाद में पढ़ रहे हैं. 2007-08 के बाद से इन छात्रों की तादाद बढ़ रही है. भारत में कुछ विदेशी छात्रों में से अफ्रीकी 19 प्रतिशत बताए जाते हैं. ये छात्र नियमित तौर पर आएदिन रंगभेद के शिकार हो रहे हैं. रंगों को ले कर इन पर फब्तियां कसी जाती हैं. उन्हें ब्लैक मंकी, कालू आदि कहा जाता है.

इन पर आरोप लगते हैं कि ये नशे का कारोबार करते हैं. यह भी आरोप लगाया जाता है कि भारतीय युवकयुवतियां भी नशे की वजह से इन के साथ रहते हैं. सवाल उठता है कि भारतीय युवा ड्रग लेते ही क्यों हैं? कहा जाता है कि मृतक मनीष खारी भी अपने पड़ोस में रहने वाले इन नाइजीरियाई छात्रों के साथ नशा करता था.

यह पहली घटना नहीं है. पिछले साल दिल्ली में ही एक कांगो छात्र की पिटाई से मौत हो गई थी. इस से पहले एक तंजानियाई युवक को बेंगलुरु में भीड़ ने मार डाला था. मई 2016 में करीब 12 अफ्रीकी युवक और युवतियों के साथ, उन की फ्री लाइफस्टाइल पर विरोध जताते हुए दिल्ली में मारपीट की गई. 2014 में दिल्ली के ही राजीव चौक मैट्रो स्टेशन पर अफ्रीकी छात्र को भीड़ द्वारा पीटा गया.

जनवरी 2014 में आम आदमी पार्टी के नेता सोमनाथ भारती के समर्थकों द्वारा दक्षिण दिल्ली के खिड़की ऐक्सटैंशन इलाके में ड्रग और सैक्स रैकेट चलाने के संदेह में इन लोगों के साथ हिंसा की गई. इस घटना में 2 नाइजीरियाई और 2 युगांडा की महिलाएं घायल हो गई थीं, जिन्हें एम्स में भरती कराया गया था.

भारतीय बड़ी संख्या में विदेशों में रहते हैं. हजारों लोग नौकरियां कर रहे हैं तो हजारों पढ़ाई कर रहे हैं. अमेरिका, आस्टे्रलिया, कनाडा, फ्रांस जैसे देशों में भारतीयों के साथ धार्मिक भेदभाव और हिंसा की घटनाएं आएदिन सुर्खियों में रहती हैं. कई बार इन्हें देश छोड़ कर चले जाने को कहा जाता है.

ग्रेटर नोएडा में बड़ी तादाद में अफ्रीकी युवक पढ़ाई के सिलसिले में रह रहे हैं. हिंसा के बाद स्थानीय लोगों में इन के खिलाफ गुस्सा है. इन लोगों ने नाइजीरियाई युवकों से कहा कि वे यहां न रहें. हमले का आरोप लगाने वाली केन्याई युवती मारिया बुरेंडी ने तो भारत छोड़ने का फैसला कर लिया.

एस्टोनिया सोसायटी में रहने वाले अब्दुल ने कहा कि घटना के बाद हम भयभीत हैं. जब से मैं यहां आया हूं, हमारे साथ अनैतिक व्यवहार किया जाता है. लोग उंगलियों से हमारी ओर इशारा करते हैं. हम पर हंसते हैं जैसे हम कोई इंसान नहीं हैं. हमारे साथ भेदभाव बरता जाता है. यह भारतीयों द्वारा हमारे साथ नस्लभेद व्यवहार है.

बीएससी छात्र वाशिम के अनुसार, ‘‘मैं घर के अंदर बंद हूं और भयभीत हूं. मैं यहां पिछले साल सितंबर में आया था. मैं सोच रहा हूं वापस देश लौट जाऊं. मैं टिकट बनवाने की प्लानिंग कर रहा हूं.

मैं अब यहां किसी भी तरह नहीं रुक सकता. अफ्रीकियों में कुछ लोग ड्रग्स के मामलों में लिप्त हो सकते हैं पर आप सभी को कैसे शामिल कर सकते हैं.

भेदभाव हमारी संस्कृति है

असल में रंगभेद वर्णव्यवस्था का रूप है, भारत में जाति और वर्ण का बोलबाला रहा है, इसलिए यहां हमेशा गोरे और कालों का झगड़ा रहा है. सदियों से यहां शूद्र, दलितों के साथ गुलामों जैसा व्यवहार किया गया. आमतौर पर शूद्र और दलित काले तथा सवर्ण गोरे होते माने गए. इसलिए शूद्रों व दलितों के साथ छुआछूत, भेदभाव, हिंसा होती रही है. विश्वभर में अपने से काली चमड़ी का मजाक उड़ाया जाता है.

भेदभाव हमारी सदियों पुरानी संस्कृति है. यहां वर्ण और जातियां सदैव भेदभाव से त्रस्त रही हैं. खुद को ऊंचा समझने वालों ने अपने से निचले को हीन समझा और उस के साथ भेदभाव बरता. यहां सवर्ण पिछड़ों और पिछड़े दलितों के साथ गैर बराबरी का व्यवहार करते आए हैं. ग्रेटर नोएडा के जिस पिछड़े गुर्जर समुदाय ने नाइजीरियाइयों को मारापीटा, वे खुद सवर्णों से उपेक्षित रहे.

अब वे खुद कभी दलितों के साथ वही व्यवहार कर के सुर्खियों में आते हैं तो कभी मुसलमानों के खिलाफ. उन्होंने खुद को दलितों से और अब दक्षिण अफ्रीकियों से ऊंचा समझ लिया. यह ऊंचनीच की सोच हमारे खून में रचीबसी हुई है. उत्तर प्रदेश के इस क्षेत्र में इस तरह की घटनाएं आम हैं. इस बार दलितों, मुसलमानों की जगह नाइजीरियाई काले भेदभाव की चपेट में आ बैठे.

भारत में दलित और अफ्रीका के अश्वेत तो जन्मजात गैरबराबरी के शिकार रहे हैं. दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद कानून 1948 में बना था पर वहां की गोरी सरकारें कालों के खिलाफ भेदभावपूर्ण रवैया अपनाना जारी रखे हुई थीं. वहां की कुल आबादी के तीनचौथाई अश्वेत थे और अर्थव्यवस्था उन्हीं के श्रम पर आधारित थी पर सारी सुविधाएं मुट्ठीभर गोरे लोगों को मिलती थीं. 70 प्रतिशत जमीन गोरों के कब्जे में थी. रंगभेद के खिलाफ नेल्सन मंडेला को लंबा संघर्ष करना पड़ा.

भारत की विदेश नीति का एक प्रमुख सिद्धांत रंगनीति का विरोध रहा है. स्वतंत्रता से पहले भारत ने दक्षिण अफ्रीका की रंगभेद नीति का विरोध किया था. रंगभेद समर्थक दक्षिण अफ्रीकी सरकार के विरुद्घ 1954 में संयुक्त राष्ट्र के माध्यम से प्रतिबंध लगाने में भारत सक्रिय रहा. इसी नीति के कारण भारत ने 1954 में दक्षिण अफ्रीका से अपने कूटनीतिक संबंध तोड़ लिए थे. भारत तथा अन्य देशों के दबाव के कारण दक्षिण अफ्रीका को राष्ट्रमंडल से बाहर होना पड़ा था. महात्मा गांधी ने रंगभेद नीति का विरोध किया और अफ्रीका जा कर वहां के लोगों को इस समस्या से मुक्ति दिलाने के लिए जनआंदोलन शुरू किया.

दक्षिण अफ्रीका में एक दौर था जब नस्लीय भेदभाव चरम पर था. सुविधाएं रंग के आधार पर बंटी हुई थीं. बसस्टैंड फौर ओनली व्हाइट, समुद्र बीच केवल व्हाइट रेस गु्रप के लिए, भूमिगत मार्ग से प्रवेश केवल गोरों के लिए, बसों, टे्रनों में अलग सीटें, अलग टौयलेट, अलग पार्क, अलग पब्लिक टैलीफोन बाकायदा इस तरह की सुविधाएं कानून बना कर दी गई थीं.

घृणा का डंक

नस्लभेद के चलते दुनिया को बड़ा नुकसान झेलना पड़ा है. पिछली सदी के 2 महायुद्धों में 65 लाख से ज्यादा लोगों की हत्याओं के पीछे भयंकर नस्लभेद कानून और इस के अगुआ यूरोपीय देशों के गोरे शासक थे. यूरोप की सभ्यता जब दुनिया के चारों कोनों में पांव पसार रही थी तब गुलाम देशों के लोगों पर, बंदूक के बल पर, बर्बर रंगभेद कानून थोपे गए.

मानवता के खिलाफ घृणा का डंक खुद भारत ने बहुत झेला है. सामूहिक तौर पर होने वाली हिंसा से बहुत भारी नुकसान होता है लेकिन क्या हमें अमेरिकी समाज में छिपी गैरबराबरी पर उंगली उठाने का हक है? असमानता के मामले में हमारा अतीत अमेरिका से कहीं अधिक बुरा है. हमारे संविधान ने जो बराबरी दलितों, आदिवासियों, स्त्रियों को दी है क्या वह हम वास्तविक तौर पर दे रहे हैं. क्या हमारी आर्थिक गैरबराबरी में हमारे सामाजिक अन्याय की हकीकत भी शामिल नहीं है?

किसी भी देश की तरक्की में धार्मिक, नस्लीय भेदभाव व हिंसा प्रमुख बाधाएं हैं. ऐसे में भारत फिलिस्तीन, इसराईल, वियतनाम की ओर ही जा रहा है. भारत तरक्की में चीन, अमेरिका या जापान की बराबरी नहीं कर पाएगा. ये देश धर्म के अवलंबन के बगैर आगे बढे़ हैं.

ग्रेटर नोएडा में अफ्रीकियों के साथ किए गए दुर्व्यवहार से देश की छवि को गहरा नुकसान हुआ है. ऐसी घटनाओं से भारतीयों की नस्लभेदी सोच उजागर होती है. नस्लीय भेदभाव से अंतर्राष्ट्रीय संबंध भी प्रभावित होते हैं.

हम अमेरिका, आस्ट्रेलिया, कनाडा की निंदा करते हैं क्योंकि वहां भारतीयों पर नस्ल, रंगभेद के नाम पर हमले होते हैं. वहां अश्वेतों के साथ हिंसा बढ़ रही है. हम यह तो चाहते हैं कि विदेशों में रह रहे भारतीय सुरक्षित रहें, उन के साथ धार्मिक भेदभाव न हो पर इस के उलट, भारत में हम यदि विदेशियों के साथ वही व्यवहार करें तो दुनियाभर में भारतीयों पर हो रहे हमलों को हम गलत ठहराने का नैतिक व राजनयिक हक खो रहे हैं.

अमेरिका जैसा पुराना लोकतांत्रिक, प्रगतिशील देश रंगभेद को खत्म करने में असफल साबित होता दिख रहा है. वहां शासकीय स्तर पर धार्मिक, नस्लीय विचार ज्यादा दृढ़ता से मजबूत होते जा रहे हैं. अश्वेतों, दूसरे धर्मों के प्रति हिंसा बढ़ रही है. अश्वेतों द्वारा शुरू किया गया ब्लैक लाइव्ज मैटर जैसा आंदोलन अब खामोश दिख रहा है.

विश्वभर में फैल रही धार्मिक, नस्लीय सोच केवल पीडि़त अल्पसंख्यकों, अश्वेतों या स्त्रियों के लिए खतरा नहीं है, वह समस्त समाज के लिए खतरा है. वह स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व के संवैधानिक मूल्यों और समाज के दबेकुचले वर्गों की बेहतरी के लिए उठाए गए कदमों के लिए भी खतरा है.

धार्मिक, जातीय, नस्लीय भेदभाव का सवाल पूरी दुनिया के सामने है. विश्व के 2 बड़े लोकतंत्रों भारत और अमेरिका के भीतर ही नहीं, सारी दुनिया में बराबरी के लिए वास्तविक क्रांति बाकी है. जो पिट रहे हैं वे कहीं अश्वेत हैं, कहीं दलित हैं, कहीं आदिवासी हैं और हर जगह स्त्रियां हैं. इन तमाम लोगों को समाज से बाहर रख कर न देश स्वस्थ, सुखी रह सकता है, न समाज और न व्यक्ति.

दुनिया में समानता खुशहाली, तरक्की की पहली शर्त है. गैर बराबरी में तो बरबादी ही बरबादी है. यकीन न हो तो जोहान्सबर्ग, वर्जीनिया से ले कर गोहाना, मिर्चपुर की जली हुई बस्तियां देखी जा सकती हैं.

अमेरिका में महिलाओं की डोनाल्ड ट्रंप से टक्कर

अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति का पद संभालते ही अमेरिका गुस्से से उबलने लगा. एक ऐसा व्यक्ति जो औरतों के प्रति नितांत बाजारू व घृणित सोच रखता हो, राजनीति के दांवपेंचों के सहारे राष्ट्रपति बन गया तो अमेरिका समेत दुनिया के 70 देशों में सैकड़ों मार्च निकाले गए. तकरीबन साढ़े 5 लाख महिलाओं ने अपनी सुरक्षा, गरिमा, अधिकार और मानसम्मान की खातिर जबरदस्त विरोधप्रदर्शन कर जता दिया कि उन्हें किसी भी रूप में कमजोर न समझा जाए. ‘सिस्टर्स मार्च’ के जरिए उन्होंने अपनी एकजुटता और मजबूती का जबरदस्त प्रदर्शन किया. इस मार्च के पीछे 60 वर्षीया ग्रैंडमदर टेरेसा शुक की भूमिका काबिलेतारीफ है. बड़ी संख्या में लोगों को बुलाने के लिए उन्होंने सोशल मीडिया फेसबुक के जरिए ट्रंप की नापसंद नीतियों के खिलाफ आमजन का आह्वान किया था. एक नजर डालते हैं उन के प्रयास और उस रणनीति पर जिस ने दुनियाभर की महिलाओं को आवाज बुलंद करने की जबरदस्त हिम्मत दी.

एक अकेली दादी मां टेरेसा शुक, जिस ने दुनियाभर की महिलाओं को अपनी आवाज बुलंद करने की जोरदार हिम्मत दिखाई और अंजाम की परवा किए बगैर अमेरिका के सब से ताकतवर व्यक्ति से टकरा गई.

अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप 8 नवंबर, 2016 को बेहद खुश थे. उन्होंने तमाम विरोधी लहरों और विवादों के बावजूद हिलेरी क्लिंटन को हरा कर राष्ट्रपति पद का चुनाव जीत लिया था. उन के समर्थक जश्न मना रहे थे, जबकि करोड़ों लोगों को उन की जीत लोकतंत्र की जीत नहीं लग रही थी. विभिन्न देशों से आए मुसलिम समुदाय के अप्रवासियों में काफी बेचैनी थी, जो लंबे समय से अमेरिका में रह रहे थे.

उन्हीं में अमेरिकी शहर हवाई की रहने वाली एक सामान्य घरेलू महिला 60 वर्षीया ग्रैंडमदर टेरेसा शुक को ट्रंप की जीत ने अंदर से झकझोर कर रख दिया था. वह काफी विचलित हो गई थी. उस की आंखों की नींद गायब थी. निराशा से भरी हुई वह यह सोचसोच कर कुपित हो रही थी कि ट्रंप का अमेरिकी राष्ट्रपति बनना महिलाओं के लिए किस हद तक हानिकारक साबित होगा.

यह चिंता उस के मन को कचोट रही थी कि क्या ट्रंप के कुछ फैसलों से महिलाओं की समानता और अधिकारों पर अंकुश लग सकता है? इन सब से महिलाओं को बचाने के लिए वह अकेली करे भी तो क्या करे? कैसे विरोध करे? इसी ऊहापोह के बीच उस के दिमाग में महिलाओं को एकजुट करने का विचार कौंध गया.

महिलाओं, अल्पसंख्यकों और प्रवासियों को ले कर ट्रंप द्वारा दिए गए अभद्र और बेतुकी बयानों से जनमानस को आगाह करने के लिए उन्होंने दृढ़ता से एक संकल्प लिया.

मार्च की तैयारी

रात के 12 बजे उन्होंने फेसबुक पर एक इवैंट पेज बनाया, जिस में डोनाल्ड ट्रंप की हेट पौलिटिक्स के खिलाफ मार्च निकालने की बात पोस्ट कर दी. पोस्ट में उन्होंने ट्रंप की नीतियों को ले कर कई आशंकाएं जताईं. ट्रंप को अमेरिकी मूल्यों के बारे में संदेश देने के लिए एक प्रदर्शन के आयोजन की विचारधारा दी. कोई निश्चित मांग किए बगैर प्रदर्शन का मुख्य आधार सम्मान और अधिकार को बनाया.

उन्होंने लिखा, ‘‘मुझे लगता है कि हमें ट्रंप के विरुद्घ रैली निकालनी चाहिए.’’ यह सब सोच कर वह सोने चली गई, लेकिन नींद नहीं आ रही थी. आधे घंटे बाद उस की नींद अचानक खुल गई. उस ने अपने इवैंटपेज पर देखा, विभिन्न पेशे से जुड़े 40 लोग उस की बातों से सहमत थे. सुबह 5 बजे जागने पर पाया कि 10,000 लोग उस के द्वारा आह्वान किए गए मार्च में शामिल होने की अपनी सहमति जता चुके हैं.

शुक के मार्च निकालने के प्रस्ताव और विचार को स्वीकारने वालों में हर वर्ग की कई देशों की महिलाएं थीं. उन में अगर हौलीवुड की कई सैलिब्रिटी थीं, तो कुछ सामान्य घरेलू, शिक्षिकाएं, चिकित्सा एवं उद्योग जगत से जुड़ी कारोबारी और दूसरे सामाजिक कार्यकर्ताएं भी थीं. कुछ महिलाएं ऐसी भी थीं जिन की इच्छा और सोच भी शुक से मेल खाती थी.

फिर क्या था सोशल साइट्स पर इस मार्च का प्रस्ताव वायरल होने के 2 दिनों  के बाद ही न्यूयौर्क के मैनहटन के एक रेस्तरां में वीमेंस मार्च की तैयारी शुरू हो गई. उसे ‘सिस्टर्स मार्च’ का नाम दिया गया. यह तय हुआ कि ट्रंप के शपथ लेने के ठीक अगले रोज ही इस मार्च को एकसाथ यह जताने के लिए निकाला जाएगा कि ‘आप हमें जितना गिराएंगे, हम उतनी ही बार ऊपर उठेंगे.’ उस के बाद 21 जनवरी को दुनिया के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ जब किसी सब से ताकतवर गद्दी पर बैठे व्यक्ति के खिलाफ आवाज बुलंद की गई हो.

पूरे अमेरिका में विरोध का कुहराम तो ट्रंप के शपथग्रहण के समय से ही मचा हुआ था, लेकिन लाखों महिलाओं के प्रदर्शन ने पूरी दुनिया को बता दिया कि उन्होंने ट्रंप से टक्कर ले ली है. विशाल जनसमूह की भीड़ उन के शपथग्रहण समारोह से कहीं ज्यादा मार्च में आंदोलनकारी के रूप में जुटी थी. प्रदर्शनकारी महिलाओं के अलगअलग बने संगठनों ने 7 महाद्वीपों के शहरों में जबरदस्त प्रदर्शन किया. केवल अमेरिका में ही जगहजगह 150 से अधिक मार्च निकाले गए, जबकि इस के 408 मार्च की योजना थी. इस के अलावा ब्रिटेन, कनाडा, मैक्सिको, भारत, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, स्पेन, नार्वे, फिलीपींस समेत कई देशों में भी प्रदर्शन किए गए.

मौलिक अधिकारों की सुरक्षा

लंदन में अगर एक लाख से अधिक महिलाओं ने ट्रंप के खिलाफ मोरचा खोला तो उत्तरी धु्रव के अंटार्कटिका में गिनेचुने लोग और वैज्ञानिकों ने भी हाथ में तख्ती ले कर विरोध जताया. यह  पूरी तरह से गैरराजनीतिक हो कर अपने मौलिक अधिकार की सुरक्षा के लिए निकाला गया मार्च था.

विरोध करने वालों में अगर काले, गोरे और मुसलिम समाज की महिलाएं थीं, तो एलजीबीटी (लेस्बियन, गे, बाइसैक्सुअल और ट्रांसजैंडर) की भी जमातें शामिल थीं. प्रदर्शन काफी शांतिपूर्ण हुआ और इस दौरान न किसी तरह का हंगामा हुआ और न ही किसी की गिरफ्तारी हुई. यह 1960-70 के दशक में वियतनाम युद्घ विरोधी प्रदर्शन के बाद यह सब से बड़ा प्रदर्शन था.

इस वीमेंस मार्च के समर्थन में लंदन की महिलाओं द्वारा ट्रैफल्गा स्क्वायर से अमेरिकी दूतावास तक निकाले गए मार्च में लंदन के मेयर सादिक खान भी शामिल हुए. टीवी प्रैंजेंटर सैडी टौक्सविग और लेबर सांसद वाय कूपर ने ट्रंप के खिलाफ व अपने अधिकारों की तख्ती लिए लोगों को संबोधित किया. आयोजकों ने कड़े लहजे में विरोध करते हुए आम नागरिकों को यह संदेश दिया कि इस से महिलाओं के अधिकारों को रेखांकित किया गया है, जो डोनाल्ड ट्रंप के अमेरिकी राष्ट्रपति बनने के बाद खतरे में पड़ गए हैं. प्रदर्शनकारियों ने मैक्सिको सीमा पर प्रस्तावित दीवार बनाने की बात पर नारे लगाए, ‘पुल बनाओ दीवार नहीं,’ ‘हम एक रहेंगे, नहीं बंटेंगे.’

मार्च में शामिल होने वाली, अमेरिका में लंबे समय से रह रही, फौजिया काजी को भी राष्ट्रपति के तौर ट्रंप कुबूल नहीं हैं. वह 9 साल पहले बंगलादेश से अकेली अमेरिका आई थी और वहां कपड़े की दुकान में काम करती है. उस का कहना है कि ट्रंप के प्रशासन से सब से अधिक डर अप्रवासियों, मुसलमानों, औरतों और शरणार्थियों को है. कारण, उन्होंने अपने चुनावप्रचार के दौरान उन के खिलाफ नागवार गुजरने वाले बयान दिए हैं. ट्रंप मुसलमानों और महिलाओं के खिलाफ भद्दी बातें करते रहे हैं.

इस संबंध में फौजिया कहती है, ‘‘ट्रंप के पास किसी तरह की ठोस नीति नहीं है, जिस से कोई उम्मीद की जा सके. उन की मानसिकता और उन के मूल्य भी हम से मेल नहीं खाते हैं. अब जबकि ट्रंप 4 सालों तक अमेरिका में राज करेंगे, तो हम जैसे लोग उन का हर कदम पर विरोध करेंगे और डट कर विरोध करते रहेंगे. और तो और, अमेरिका में रह कर ही विरोध करेंगे.’’

ट्रंप के खिलाफ इतनी बड़ी संख्या में लोगों में विशेष कर महिलाओं के तन कर खडे़ होने की मूल वजह यही है कि उन का नजरिया महिलाओं के प्रति अच्छा नहीं माना जाता रहा है. उन के द्वारा महिलाओं के संदर्भ में दिए गए कई बयानों में बहुतकुछ अटपटी बातें सामने आ चुकी हैं. जैसे, उन्होंने चुनावप्रचार के दौरान कहा था, ‘जो महिला उन्हें पसंद नहीं है वह भद्दी, मोटी या काली होगी.’ उन्होंने यह भी कहा था, ‘महिलाओं के साथ कुछ भी किया जा सकता है.’ उन का मानना है कि ट्रंप की चुनाव में जीत का कारण गरीब कामगारों का समर्थन रहा है. उन्होंने ट्रंप को वोट इसलिए दिया क्योंकि उन की आर्थिक दशा सुधारने के वादे किए गए हैं.

हवाई की शुक द्वारा किए गए विरोध के आह्वान ने हजारों महिलाओं को भीतर से झिंझोड़ डाला था. वह भले ही राष्ट्रीय स्तर पर नेतृत्व के लिए पर्याप्त नहीं रहा हो लेकिन समर्थन में आए आमलोगों ने इस की जरूरत को गंभीरता से लिया. उन की जैसी फेसबुक पेज बनाने वाली एव्वी हरमौन, न्यूयौर्क की बहुचर्चित फैशन डिजाइनर बौब ब्लांड, ब्रून्नी बटलर की अपील से मार्च के मैसेज और अधिकार संबंधी मांगों को फेसबुक, यूट्यूब और ट्विटर के जरिए तेजी से फैला दिया गया.

शुक ने अपने इस अभियान और ट्रंप के खिलाफ बनी बेचैनी के बारे में एक टीवी शो में कहा था, ‘मैं चुनाव नतीजे के बाद काफी हतोत्साहित हो गई थी. मैं बहुत ही बुरा महसूस कर रही थी. उस रात नींद नहीं आ रही थी. बारबार सोच में थी, यह कैसे हो सकता है?’

बहरहाल, महिलाओं की वैबसाइट के अनुसार, मार्च को बड़े पैमाने पर सफल बनाने के लिए 700 सिस्टर मार्च के आह्वान किए गए थे, जिस में अमेरिका और दूसरे देशों में 20 लाख लोगों को शामिल करने का लक्ष्य रखा गया था. आइए एक नजर उन महिलाओं पर भी डालते हैं जिन्होंने आंदोलन को सफल बनाने में अहम भूमिका निभाई.

बौब ब्लांड : शुक ने विरोध की जो अलख जगाई उस में दूसरी महिलाओं का भरपूर साथ मिला. उन्हीं में एक हैं बौब ब्लांड. वे न्यूयौर्क में एक फैशन डिजाइनर हैं. उन्होंने विरोध प्रदर्शन के लिए युवाओं को आकर्षित करने वाले नैस्टी वीमैन (बुरी औरत) और बैड हौम्ब्रे (बुरा आदमी) जैसे शब्द छपे टीशर्ट डिजाइन किए और उसे बेच कर 3 दिनों के भीतर ही आंदोलन के लिए 20 हजार डौलर की रकम भी जुटा ली.

उन्होंने अभियान संबंधी बातें न्यूयौर्क में कई दूसरे सामाजिक कार्यकर्ताओं के बीच तेजी से फैलाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई. इस का असर यह हुआ कि उन के साथ मार्च में शामिल होने के लिए उन्हें बंदूक इस्तेमाल और नियंत्रण की वकील तमिका मैलोरी, एक आपराधिक न्याय सुधार समूह की प्रमुख कार्मेन पेरेज और मुसलिम समुदाय के लिए छुट्टियों की मांग को ले कर न्यूयौर्क में सफल अभियान का नेतृत्व करने वाली लिंडा सारसौर का भी समर्थन मिल गया.

कुछ दिनों में ही मार्च की तैयारी पूरी हो गई. उन्होंने अपनेअपने तरीके से विरोध के लिए मार्च का नामकरण किया. उन्हीं में मिलियन पुस्सी मार्च ट्रंप द्वारा की गई निंदा के खिलाफ था. मिलियन वीमन मार्च भी कुछ इसी तरह का था.

लिंडा सरसौर : अमेरिकी मुसलिम समाज की लिंडा सरसौर न्यूयौर्क में अरब अमेरिकन एसोसिएशन की कार्यकारी निदेशक हैं. बु्रकलिन की मूल निवासी 3 बच्चों की मां लिंडा वाशिंगटन में महिलाओं की इस मार्च की सहअध्यक्ष थीं. वे नागरिक अधिकार, धार्मिक स्वतंत्रता और 15 सालों से नस्लीय न्याय की मांगों को ले कर सक्रिय हैं. वैसे मूलतया वे अंगरेजी शिक्षिका हैं और अरब अमेरिकन एसोसिएशन के साथ तब जुड़ गई थीं जब इस के संस्थापक बास्मेह अथवेह की 2005 में आकस्मिक मृत्यु हो गई थी.

लिंडा सरसौर के अनुसार, उन्होंने अमेरिका में 9/11 की काली छाया को काफी शिद्दत के साथ महसूस किया था. वे कहती हैं, ‘‘बुरे वक्त के बाद अच्छा समय हमेशा आता है. खास कर वैसे समुदाय के लिए जो रंगभेद के शिकार हैं.’’

शिशि रोज : नस्लीय, लिंग और आर्थिक असमानता के बारे में बोलने और हाशिए पर आए लोगों के उत्थान के लिए संघर्ष करने वाली 27 वर्षीया सामाजिक कार्यकर्ता और लेखिका शिशि रोज 2014 से सक्रिय हैं. इंस्टाग्राम पर उन के 35 हजार से अधिक अनुयायी हैं. यही उन के लिए सफल कार्य करने का औजार है. इस की बदौलत ही उन्होंने राष्ट्रीय महिला मार्च के लिए आह्वान किया. उन्होंने अलगथलग पड़ी गौरवर्णी महिलाओं को मार्च में शामिल होने के लिए तैयार किया.

कार्मेन पेरेज : अपने जीवन को पूरी तरह से एक सामाजिक कार्यकर्ता के तौर पर समर्पित कर चुकी कार्मेन पेरेज 17 वर्ष की उम्र से ही सक्रिय हैं. उन की बहन की 19 वर्ष की आयु में ही मृत्यु हो गई थी. उस के बाद से ही अपनी आतंरिक ऊर्जा को समेटते हुए वे सामाजिक कार्यों में जुट गईं. यूएस सांताक्रुज से वर्ष 2001 में मनोविज्ञान की डिगरी हासिल करने के बाद उन्होंने युवाओं और महिलाओं के हितों के लिए कार्य करने का मन बना लिया था. वे उन्हें आपराधिक न्याय प्रणाली संबंधी व्यापक मार्गदर्शन देती हैं, उन का नेतृत्व करती हैं और समुचित सुविधाएं उपलब्ध करवाती हैं.

कार्मेन की पूरे सांताकु्रज और खास समुदाय में खासी पहचान है. वे युवाओं के एक समूह रीफौर्म, एजुकेशन एडवोकेटिंग फौर यूथ (शिक्षा में सुधार के लिए वकालत) की संस्थापक और लड़कियों की बेहतरी के लिए बनी संस्था टास्क फोर्स की सहसंस्थापक हैं.

तमिका डी मल्लोरी : वीमन मार्च की सहअध्यक्ष तमिका की पहचान सामाजिक न्याय की मुखर वक्ता के रूप में है. मुद्दे चाहे नागरिक अधिकारों के हों, महिलाओं के हित की बात हो, स्वास्थ्य की देखभाल का मसला हो, बंदूकी हिंसा या पुलिस और कदाचार की बातें आदि हों. वाशिंगटन में वे एक राष्ट्रीय मार्च की 50वीं वर्षगांठ के मौके पर 3 लाख लोगों का नेतृत्व कर चुकी हैं.

वैनेसा व्रुबले : सामाजिक तौर पर मीडिया की प्रासंगिकता, राजनीतिक आयोजनों और आधुनिक अफ्रीकी संस्कृति को वैश्विक स्तर पर पुनर्परिभाषित करने को ले कर कार्य करने वाली वैनेसा व्रुबले अपने जीवन को समर्पित कर चुकी है. वे वीमन मार्च

में भी भागीदारी निभा चुकी हैं. ओकायाफ्रिका उन की अपनी एक बड़ी मीडिया कंपनी है, जिस का पूरा फोकस अफ्रीकी महाद्वीप की समस्याओं को ले कर रहता है.

कैस्सडे फेंडली : सामाजिक न्याय के लिए मीडिया में मुद्दे उठाने वाली कैस्सडे फेंडली स्वतंत्र संचार की रणनीतिकार की तरह कार्य करती हैं. उन्होंने गैरलाभकारी संगठनों और सरकारी तथ्यों के जरिए कई प्रगतिशील कदम उठाए हैं तथा सामाजिक न्याय के लिए दूसरे आंदोलनकारियों को समर्थन दिया है.

मृणालिनी चक्रवर्ती : भारतीय मूल की अमेरिकी युवती मृणालिनी चक्रवर्ती शिकागो के इलिनोइस विश्वविद्यालय में मानव विज्ञान की एक डौक्टरेट छात्रा हैं. उन्हें 8 साल पहले अमेरिका में एक कालेज द्वारा छात्रवृत्ति मिली और फिर वे वहां जा बसीं. वहां रहते हुए वे अप्रवासियों और महिला व पुरुष के साथ रंगभेद, एलजीबीटी समुदाय की समस्याओं को ले कर लड़ाई लड़ती रही हैं. उन्होंने खुद को राजनीतिक रूप से सक्रिय बना लिया है. वे मार्च में हिस्सा ले कर, लोगों को जागृत कर उन्हें मुखर आवाज देने की कोशिश करती हैं, जो आंदोलन में भाग लेने से झिझकते हैं. वाशिंगटन में महिला मार्च में हिस्सा ले कर वे अप्रवासी महिला शक्ति को बखूबी दर्शा चुकी हैं.

मिशेल ओबामा भी हैं ट्रंप से खफा

अमेरिका की पूर्व प्रथम महिला मिशेल ओबामा भी डोनाल्ड ट्रंप की शर्मनाक बयानबाजी के खिलाफ अपनी आवाज उठाती रही हैं. जब डोनाल्ड बिली बुश के साथ बातचीत में महिलाओं को ले कर अश्लील टिप्पणियां करते दिखे तो उन्होंने इसे ट्रंप का महिलाओं के प्रति क्रूर और भयावह रवैया करार दिया. उन्होंने ट्रंप को लताड़ लगाते हुए कहा कि यह शर्मनाक और असहनीय है. मर्यादित व्यक्ति ऐसा व्यवहार नहीं करते.

मई में किए जाने वाले ये हैं खेती के खास काम

मई महीने में मौसम व हालात के थपेड़ों के बीच मेहनतकश किसान हमेशा डटे रहते हैं और उन के कामों का सिलसिला बदस्तूर जारी रहता है. पेश है मई महीने के दौरान किए जाने वाले खेती के कामों का एक खुलासा:

* गेहूं के साथसाथ जई व जौ वगैरह फसलें दे चुके खेतों की मिट्टी पलटने वाले हल से गहरी जुताई करें ताकि पिछली फसल के अवशेष खेत की मिट्टी में अच्छी तरह मिल जाएं और मिट्टी भी भुरभुरी हो जाए. पिछली फसल का मोटामोटा कचरा बटोर कर खेत से दूर फेंक देना चाहिए.

* मई की गरमी का खास फायदा यह होता है कि इस से तमाम कीड़ेमकोड़े झुलस कर खत्म हो जाते हैं. इसीलिए करीब 2 हफ्ते के अंतराल से खेतों की लगातार जुताई करते रहना चाहिए. ऐसा करने से गरमी व लू का असर मिट्टी में अंदर तक जाता है और वहां मौजूद खतरनाक बैक्टीरिया व फफूंदी नष्ट हो जाते हैं.

* मिट्टी को भरपूर धूप का सेवन कराना काफी फायदेमंद होता है. इस से मिट्टी का अच्छाखास इलाज हो जाता है और मिट्टी अगली फसल के लिए बढि़या तरीके से तैयार हो जाती है.

* मई में अपने ईख के खेतों का खास खयाल रखें और 2 हफ्ते के अंतर से सिंचाई करते रहें, ताकि खेतों में भरपूर नमी बरकरार रहे.

* गन्ने के खेतों में सिंचाई के साथसाथ निराईगुड़ाई भी करते रहें ताकि खरपतवार न पैदा हो सकें.

* गन्ने की फसल में कीड़ों व रोगों का खतरा बराबर बना रहता है, लिहाजा उन के मामले में सतर्क रहें.

* अगर धान की अगेती किस्म की नर्सरी डालनी हो, तो मई के आखिर तक डाल सकते हैं. नर्सरी में कंपोस्ट खाद या गोबर की खाद का इस्तेमाल जरूर करें.

* धान की नर्सरी डालने में ध्यान रखने वाली बात यह है कि हर बार जगह बदल कर ही नर्सरी डालें. धान की नर्सरी से अच्छा नतीजा पाने के लिए सिंचाई में कमी न करें.

* अगर सिंचाई का इंतजाम हो तो चारे के लिहाज से ज्वार, बाजरा व मक्के की बोआई करें. पानी की दिक्कत होने पर इन फसलों की बोआई न करें, क्योंकि इन फसलों को ज्यादा पानी की जरूरत होती है.

* मई के आसपास बरसीम, लोबिया व जई की बीज वाली फसलें तैयार हो जाती हैं. ऐसे में उन की कटाई का काम खत्म करें.

* मई के आखिरी हफ्ते में अरहर की अगेती किस्मों की बोआई करें, मगर बोआई से पहले जुताई कर के व खाद वगैरह मिला कर खेत को सही तरीके से तैयार करना जरूरी है.

* अपने सूरजमुखी के खेतों की सिंचाई करें, क्योंकि मई के गरम मौसम में खेत में नमी रहना जरूरी है.

* सूरजमुखी की सिंचाई के वक्त इस बात का खास खयाल रखें कि पौधों की जड़ें न खुलने पाएं. अगर पानी से जड़ें खुल जाएं, तो उन पर मिट्टी चढ़ाना न भूलें. मिट्टी चढ़ाने से पौधों को मजबूती मिलती है और वे तेज हवाओं को भी झेल लेते हैं.

* मई के दौरान सूरजमुखी की फसल को बालदार सूंड़ी व जैसिड रोग का काफी खतरा रहता है. ऐसा होने पर कृषि वैज्ञानिकों से सलाह ले कर माकूल इलाज करें.

* गाजर, मूली, मेथी, पालक, शलजम, पत्तागोभी, गांठगोभी व फूलगोभी की बीज वाली फसलें अमूमन मई तक तैयार हो जाती हैं. ऐसे में उन की कटाई का काम निबटाएं. बीजों को निकालने के बाद सुखा कर उन का भंडारण करें.

* पहले डाली गई तुरई की नर्सरी के पौधे तैयार हो चुके होंगे, लिहाजा मई के अंत तक उन की रोपाई निबटाएं.

* खेत को अच्छी तरह तैयार करने के बाद बारिश के मौसम वाली भिंडी की बोआई करें. बोआई से पहले निराईगुड़ाई कर के खेत के तमाम खरपतवार निकालना न भूलें.

* अगर प्याज के खेतों में नमी कम लगे तो तुरंत हलकी सिंचाई करें. मई के अंत तक प्याज की पत्तियों को खेत पर झुका दें, ऐसा करने से प्याज की गांठें बेहतरीन होंगी.

* मई में लहसुन की फसल तैयार हो जाती है, लिहाजा उस की खुदाई करें. खुदाई के बाद फसल को 3 दिनों तक खेत में सूखने दें. 3 दिनों बाद लहसुनों को उठा कर साफ व सूखी जगह पर रखें.

* मई के दौरान अकसर लीची के फलों के फटने की शिकायत सामने आती है. इस की रोकथाम के लिए लीची के गुच्छों व पेड़ों पर पानी का अच्छी तरह छिड़काव करना फायदेमंद रहता है.

* अपने आम, अमरूद, नाशपाती, आलूबुखरा, पपीता, लीची व आंवला के बगीचों की 10-15 दिनों के अंतराल पर सही तरीके से सिंचाई करते रहें. इस दौरान सिंचाई में लापरवाही बरतना ठीक नहीं है, क्योंकि गरमी की वजह से बागों का पानी बहुत तेजी से सूखता रहता है.

* अगर औषधीय फसल तुलसी की बोआई करनी हो तो इस के लिए मई का महीना सही रहता है.

* मई में ही औषधीय फसल सफेद मूसली की भी बोआई करें. यह बहुत ज्यादा फायदे वाली फसल होती है.

* औषधीय फसल सर्पगंधा की नर्सरी डालने के लिहाज से भी मई का महीना बेहद मुफीद होता है.

* मई के तीसरे हफ्ते में पहाड़ी इलाकों में रामदाना की बोआई करें. बोआई से पहले बीजों को फफूंदीनाशक से उपचारित करना जरूरी है.

* मई के आखिरी हफ्ते में पहाड़ी इलाकों में मंडुआ की बोआई भी की जा सकती है. यह भी काफी फायदे वाली फसल होती है.

* सूरजमुखी के खेत में मधुमक्खियों के बक्से रखें. बक्सों को छायादार जगह पर ही रखें. बक्सों के आसपास टबों में पानी भर कर रखें ताकि मधुमक्खियों को पानी की खोज में भटकना न पड़े. मधुमक्खियों से दोहरा फायदा होता है यानी शहद उत्पादन के साथसाथ परागण भी अच्छा होता है.

* मई की गरमी में अकसर मछली पालने वाले तालाब सूखने लगते हैं, लिहाजा उन की मरम्मत कराएं ताकि उन का पानी बाहर न निकल सके. तालाब की सफाई का भी खयाल रखें. इस बात का खयाल रखें कि कोई भी तालाब में कचरा न डालने पाए.

* मई में मवेशियों को लू लगने का खतरा बढ़ जाता है, लिहाजा उन्हें बारबार साफ व ताजा पानी पिलाएं. लू लगने पर पशु के सिर पर बर्फ की पोटली रखें व डाक्टर से इलाज कराएं.

* गरमी की वजह से गायभैंस के छोटे बच्चों को अकसर दस्त की बीमारी हो जाती है, ऐसे में उन्हें दूध कम पीने दें. बीमार बच्चे को दूसरे बच्चों से अलग रखें. जरूरी लगे तो डाक्टर को बुलाएं.

* मुरगियों को गरमी से बचाने के लिए उन के शेडों के अंदर कूलरों का इंतजाम करें

या शेड की जालियों पर जूट के परदे लगा कर उन्हें पानी से भिगोते रहें. चूंकि मुरगियां नाजुक होती हैं, लिहाजा उन का खास खयाल रखना पड़ता है.

* मवेशियों के खाने का भी पूरा खयाल रखें. उन्हें बासी व खराब चारा न दें, वरना हैजा होने का खतरा रहता है. ऐसे में पशु को बचाना कठिन हो जाता है.

* आम के नए बाग लगाने के लिए 12×12 मीटर पर गड्ढों की खुदाई करें. नर्सरी में बीजू पौधों की सिंचाई करें और खरपतवार निकालें. फलों का चिडि़यों से बचाव करें. अगेती किस्मों के फलों की तोड़ाई करें और उन्हें बाजार भेजने का इंतजाम करें.

* केले के पौधों में 50-60 ग्राम यूरिया प्रति पौधे की दर से मिलाएं. बनाना बीटिल की रोकथाम के लिए कार्बोफ्यूरान 3 जी या फोरेट 10 जी 1 चाय चम्मच भर गोफे में डालें. फलों और डंठलों पर कालेभूरे धब्बे दिखाई देने पर कापर आक्सीक्लोराइड 0.3 फीसदी के घोल का छिड़काव करें.

इस के अलावा 5-7 दिनों के अंतर पर सिंचाई करें और नया बाग लगाने के लिए खेत की तैयारी और गड्ढ़ों की खुदाई करें.

* नीबू वर्गीय फलों के बाग की सिंचाई करें. कैंकर बीमारी और सफेद मक्खी का नियंत्रण संस्तुत विधियों के मुताबिक करें. नए बाग लगाने के लिए 6×6 मीटर पर गड्ढों की खुदाई करें.

* अमरूद के बागों में हलकी जुताई और सिंचाई करें. सूखी हुई टहनियों को निकाल कर फेंक दें.

* लीची के फलों को फटने से बचाने के लिए जमीन में सिंचाई द्वारा सही नमी बनाए रखें. नए बाग के लिए 10×10 मीटर की दूरी पर

गड्ढों की खुदाई करें.

* अंगूर में 7 से 10 दिनों के अंतर पर सिंचाई करें. फल पकने की स्थिति से 1 हफ्ते पहले सिंचाई बंद कर दें. फल के गुणों में

बढ़ोत्तरी के लिए इथ्रेल 1 मिलीलीटर प्रति 4 लीटर पानी की दर से या जिब्रेलिक एसिड की संस्तुत मात्रा का पौधों पर पर्णीय छिड़काव करें. फसल सुरक्षा के लिए जाल का इस्तेमाल करें.

* आंवले के नए बाग रोपने के लिए 8-10 मीटर की दूरी पर गड्ढों की खुदाई करें और नए रोपे गए बागों की 10-15 दिनों के अंतर पर सिंचाई करें.

* पपीते की फसल में लिंग भेद साफ होने पर नर पौधों को निकालें और जरूरत के मुताबिक सिंचाई का काम करें.

सब्जी और मसाले

* टमाटर, बैगन, मिर्च की फसलों में जरूरत के मुताबिक सिंचाई करें. फलों की तोड़ाई और बाजार का काम करें. टमाटर और बैगन के फलों से बीज निकालें. मिर्च के पके फलों को तोड़ कर सुखाने और बीज निकालने का काम करें.

* भिंडी की फसल में सिंचाई करें. फलों की तोड़ाई और बाजार ले जाने का इंतजाम करें. पकी फलियों को तोड़ने के बाद सुखा कर बीज निकालने का काम करें. बीमार और बेकार पौधों को निकालने का काम करें.

* लहसुन और प्याज की खुदाई और उन्हें छाया में सुखाने का काम करें. छंटाई कर के उन्हें हवादार कमरों में रखें. लहसुन में पत्तियों सहित बंडल बना कर रखने से नुकसान कम होता है.

फूल और सुगंधित फसलें

* गुलाब की फसल में जरूरत के मुताबिक सिंचाई करें.

* रजनीगंधा में 15 दिनों के अंतराल पर निम्नलिखित पोषक तत्त्व के मिक्चर को 400 लीटर पानी में मिला कर प्रति एकड़ की दर से पर्णीय छिड़काव (फसल अवधि में कुल 16 छिड़काव) करें:

यूरिया 1.108 किलोग्राम, डीएपी 1.308 किलोग्राम, पोटेशियम नाइट्रेट 0.875 किलोग्राम, टी पाल 0.1 फीसदी.

* मेंथा में 10 से 12 दिनों के अंतर पर सिंचाई और निराईगुड़ाई करें. नाइट्रोजन की बची एक तिहाई मात्रा (40-50 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर) की टापड्रेसिंग का काम करें.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें