नेपाल : ‘प्रचंड’ ने दिया मधेशियों को धोखा

मधेशी आंदोलन को नेपाल के प्रधानमंत्री पुष्पकमल दहल ‘प्रचंड’ जितना दबाने की कोशिश कर रहे हैं, उतनी ही तेजी से उस की आग धधकती जा रही है. 6 मार्च, 2017 को सरकार ने राजविराज में प्रदर्शनकारी मधेशियों पर पुलिस फायरिंग करा कर इस आंदोलन को फिर से हवा दे दी है. इस पुलिस फायरिंग में 7 मधेशी कार्यकर्ताओं की मौत हो गई. उस के बाद भड़के मधेशियों ने नेपाल कम्यूनिस्ट पार्टी (एमाले) के दफ्तर, भूमि सुधार कार्यालय और नेकपा (एमाले) के सांसद सुमन प्याकुरेल के घर में आग लगा दी.

मधेशी मोरचा के कार्यकर्ताओं ने सप्तसरी जिले के राजविराज, रूपनी, कल्याणपुर, भरदह वगैरह इलाकों के चौकचौराहों पर टायरों में आग लगा कर बवाल मचाया.

दरअसल, 6 मार्च, 2017 को नेपाल के प्रधानमंत्री रह चुके केपी शर्मा ओली की अगुआई में नेपाल कम्यूनिस्ट पार्टी (एमाले) की आम सभा थी. उस के बाद मेची से महाकाली तक रथयात्रा निकाली जानी थी.

मधेशी मोरचा रथयात्रा का विरोध कर रहा था. सप्तसरी जिले के राजविराज इलाके में जिस जगह पर आम सभा हो रही थी, उस जगह को मधेशियों ने चारों ओर से घेर लिया. नेपाल कम्यूनिस्ट पार्टी और मधेशी मोरचा के कार्यकर्ता आपस में उलझ गए और तीखी झड़प हो गई. पुलिस ने फायरिंग की, जिस से अफरातफरी पैदा हो गई.

नेपाल के 28 शहरों में मधेशी आंदोलन का पूरा असर दिखने लगा. तमाम स्कूलकालेज, बाजार और कारखाने बंद हो गए. मधेशियों के गुस्से को देखते हुए नेपाल सरकार ने सप्तसरी के कलक्टर उद्धव प्रसाद, एसपी दिवेश लोहानी, सशस्त्र पुलिस बल के एसपी जय बहादुर खड़का और डीएसपी दान बहादुर को आननफानन सस्पैंड कर दिया. इस के बाद भी मधेशियों का गुस्सा ठंडा नहीं हुआ.

नेपाल में संविधान संशोधन विधेयक पेश होने और 5वां अलग प्रांत बनाने के फैसले के खिलाफ मधेशियों ने 9 मार्च, 2017 को प्रदर्शन किया. नया प्रांत बनाए जाने के विरोध में मधेशियों ने बुटबल, रूपनदेही, भैरावाहा, पाल्पा, कपिलवस्तु, गुल्मी, अधरखांची समेत कई इलाकों में प्रदर्शन किए.

मधेशी मांग कर रहे हैं कि प्रांतों की सीमा फिर से तय की जाए और उन्हें नेपाल की नागरिकता दी जाए. पुष्पकमल दहल ‘प्रचंड’ ने पिछले साल अगस्त महीने में प्रधानमंत्री बनने के बाद मधेशियों को उन का हक देने का भरोसा दिया था, उस के बाद मधेशियों ने आंदोलन खत्म किया था. लेकिन अब मधेशियों पर गोलियां बरसा कर ‘प्रचंड’ सरकार ने आंदोलन को फिर गरमा दिया है.

गौरतलब है कि नेपाल में राज्यों के बंटवारे के बाद से ही मधेशी बनाम पहाड़ी का झगड़ा चल रहा है. ओली सरकार के हटने के बाद ‘प्रचंड’ के सत्ता की बागडोर संभालने के बाद हालात धीरेधीरे सामान्य होने लगे थे. इसी बीच ‘प्रचंड’ ने स्थानीय निकायों के चुनाव का ऐलान कर मधेशियों के गुस्से को भड़का दिया.

मधेशियों की नाराजगी यह है कि उन की मांगों का निबटारा किए बगैर चुनाव कराना जायज नहीं है. मधेशी इसे भेदभाव को बढ़ावा देने वाले संविधान को वैधता दिलाने की साजिश करार दे रहे हैं.

पिछले साल भारत यात्रा के दौरान पुष्पकमल दहल ‘प्रचंड’ ने यह भरोसा दिया था कि संविधान संशोधन की प्रक्रिया में मधेशियों की मांगों का पूरा खयाल रखा जाएगा और उन से बातचीत के बाद ही संविधान में संशोधन को अंतिम रूप दिया जाएगा. इस के बाद भी मधेशियों की मांगों पर कोई विचार नहीं किया गया.

नेपाल सरकार ने 3 साल पहले अपने संविधान में नए सिरे से सुधार और बदलाव का काम शुरू किया था. उस के तहत नए भौगोलिक सीमांकन भी किए गए.

नेपाल की कुल आबादी में 52 फीसदी मधेशी हैं, जो भारतीय मूल के हैं. बड़ी ही चालाकी के साथ नया सीमांकन इस तरह किया गया कि मतदान में मधेशियों की आबादी कोई खास असर नहीं दिखा सके.

नेपाल के कुल 7 राज्यों में से केवल एक राज्य में मधेशियों को बहुसंख्यक दिखाया गया है. मधेशियों का आरोप है कि उन्हें राजनीतिक तौर पर अलग करने और उन्हें उन के हक से वंचित करने की साजिश के तहत नया सीमांकन किया गया है. ऐसा कर के नेपाल ने देश की एक बड़ी आबादी के साथ नाइंसाफी की है और भारत को भी नाराज करने का काम कर डाला है.

मधेशी मोरचा ने 8 मार्च, 2017 को सरकार से समर्थन वापस लेने का ऐलान कर दिया. यूनाइटेड डैमोक्रेटिक मधेशी फ्रंट ने 6 मार्च, 2017 को बालुवाटर में प्रधानमंत्री के आवास पर पुष्पकमल  दहल ‘प्रचंड’ से मुलाकात कर 5 सूत्री मांगों का मैमोरैंडम सौंपा.

नवंबर, 2013 में हुए चुनाव के बाद नेपाल की 601 सदस्यीय संविधान सभा में मधेशी पार्टियों के कुल 39 सदस्य हैं और वे ‘प्रचंड’ सरकार को बाहर से समर्थन दे रहे हैं. इन में मधेशी पीपुल्स राइट्स फोरम के 14, तराई मधेशी डैमोक्रेटिक पार्टी के 11, मधेशी जन अधिकार फोरम के 10, राष्ट्रीय मधेश समाजवादी पार्टी के 3 और मधेशी नागरिक फोरम का एक सदस्य था.

साल 2008 के संविधान सभा के चुनाव में मधेशी पार्टियों के सदस्यों की तादाद 83 थी. नेपाल के झापा, मोरंग, सप्तरी, सुनसरी, सिरहा, परसा, बारा, धनुषा, महोतरी, सरलाही, रूटहाट, नवलपरासी, रूपादेही, कपिलवस्तु, चितवन बांके, बदरिया, कंचनपुर, खेलाली जिलों में मधेशियों की भरमार है.

नेपाल के कुल 75 जिलों में से 22 जिलों में मधेशियों की आबादी ज्यादा है. नेपाल के बीरगंज में पिछले 32 सालों से रह रहे मधेशी केशव यादव कहते हैं कि नेपाल सरकार हमेशा मधेशियों को बाहरी मानती रही है.

गौरतलब है कि पिछले तकरीबन 50 सालों से मधेशी ‘एक मधेश एक प्रदेश’ की मांग करते रहे हैं. मधेशियों की आबादी 52 फीसदी है, लेकिन वे नेपाल के कुल क्षेत्रफल में से 17 फीसदी इलाके में ही रहते हैं और उन के बूते ही नेपाल सरकार को मिलने वाले कुल राजस्व का 80 फीसदी हिस्सा आता है.

नेपाल की कुल आबादी 2 करोड़, 95 लाख है, जिस में से डेढ़ करोड़ मधेशी हैं. नेपाल में कुल 103 जातियां हैं, जिस में 56 जातियां मधेशियों की हैं. इन में यादव, ब्राह्मण, कुर्मी, राजपूत, कुशवाह, वैश्य, कायस्थ, मल्लाह, हलवाई, केवट, लोहार, माली, कुम्हार, तेली, धोबी, हरिजन, पासवान और मुसहर जातियां खास हैं.

इन जातियों में सब से ज्यादा 4 फीसदी यादव हैं. उस के बाद 1.3 फीसदी हरिजन, 1.35 फीसदी तेली, 1.2 फीसदी कुशवाह और एक फीसदी कुर्मी जाति के लोग हैं.

नेपाल के नए संविधान में देश के कुल 75 जिलों में से केवल 7 जिलों को ही एक मधेश प्रदेश बनाने और 7 राज्यों को नए सिरे से बनाने के लिए राजनीतिक समिति बनाने की बात कही गई है. इसी को ले कर मधेशी पार्टियां बिदकी हुई हैं.

मधेशी नेता उपेंद्र यादव कहते हैं कि नेपाल सरकार की मंशा मधेशियों को राजनीतिक हाशिए पर रखने की है, इसी वजह से मधेशियों को उन के हक देने में अड़ंगे लगाती रही है.

नेपाल की संसद ने 3 अगस्त, 2016 को माओवादी सुप्रीमो पुष्पकमल दहल ‘प्रचंड’ को दूसरी बार नेपाल का प्रधानमंत्री चुन लिया था. तराई मधेशी राष्ट्रीय अभियान के संयोजक जयप्रकाश प्रसाद गुप्ता बताते हैं कि नेपाल में संविधान सभा का कोई मतलब ही नहीं रह गया है.

नेपाल के नए संविधान में मधेशियों को उन का हक देने के बजाय हाशिए पर डालने की कोशिश की गई है. इस से नेपाल का एक बार फिर से हिंसा की आग में झुलसना तय है.

धर्म की निरंकुश दुकानें और सब्सिडी का खेल

केंद्र सरकार हज जाने वालों को दी जाने वाली सब्सिडी को कतरने वाली है. यह कदम अच्छा है क्योंकि किसी भी सरकार को किसी भी धर्म को कोई आर्थिक सहायता नहीं देनी चाहिए. पर कठिनाई यह है कि अगर कांग्रेस सरकार मुसलमानों को हज सब्सिडी देती थी तो अब हिंदू मंदिरों, मठों, तीर्थों, तीर्थयात्रियों को कहीं सीधी, तो कहीं सुविधाओं के नाम पर छिपी सब्सिडी दी जा रही है.

हर धर्म अपने भक्त को कट्टर और निरंकुश बनाने की कोशिश करता है और साथ ही, उसे फुसला कर उस की जेब ढीली करवाता है. दुनियाभर के विशाल चर्च, मसजिदें, मंदिर, बौद्ध मोनस्ट्रियां गवाह हैं कि वहां सैकड़ों लोग बिना काम किए सुरक्षित जिंदगी जीते हैं क्योंकि धर्म के नाम पर बने मूर्ख लोग अपनी जेब कटाने वहां खुद आते हैं. उस पर सरकारी सहायता भी मिलने लगे, तो कौन धर्मों की पोल खोलेगा और कौन धंधे की आग को धीमा करेगा.

आधुनिक सोच, विज्ञान, तकनीक, नई खोजों, नए आविष्कारों से पिछले 300 वर्षों से मानव बेहतर तरीके से रहना सीख रहा है और यह किसी धर्म की देन नहीं है. यह व्यक्तियों की अपनी मेहनत, सूझबूझ, लगन और नया सोचने से हुआ. सरकारों को उसे प्रोत्साहन देना चाहिए, न कि हज सहायता या मानसरोवर सहायता दे कर उन्हें 1,000-2,000 साल पीछे ले जाना चाहिए.

मानव ने प्रकृति से लड़ना सीखा पर धर्म चतुराई से प्रकृति और मानव के बीच का दलाल बन बैठा. प्रकृति क्या है,

इस की जानकारी धर्म ने काल्पनिक किस्सेकहानियों से मानव मस्तिष्क में भर दी. धर्म को लगातार लाभ हुआ क्योंकि धर्म अघोषित टैक्स लगा सका और आमतौर पर राजा भी इस साजिश में हिस्सेदार रहा क्योंकि धर्म की कर्मठ, उत्साही, अनुशासित और सवाल न पूछने वाली फौज हमेशा राजा की फौज से ज्यादा उपयोगी रही है.

भारत में धर्म की दुकानें कभी मद्धम नहीं पड़ी थीं और भाजपा की जीत से अब और चमकेंगी. मोदी की जीत का अर्थ यह न समझें कि दूसरे धर्म वाले भयातीत हो कर दुबक जाएंगे, हर धर्म के भक्त अंधे होते हैं और धर्म के नाम पर वे हर तरह की कुरबानी दे सकते हैं. कालाधन जो सरकार को टैक्स न दे कर बचाया जाता है, धर्म के नाम पर चेहरे पर बिना शिकन लाए चढ़ावे में दे दिया जाता है. धर्म के लिए तो लोग मरने को भी तैयार हैं.

21वीं सदी की तकनीक का लाभ उठा कर गरीबी, बीमारी, भेदभाव, ऊंचनीच, प्रकृति प्रकोप से बचाने का प्रयास न कर, धर्म आधारित सरकारों का उदय होना मानव इतिहास के काले अध्याय की शुरुआत है और ऐसा दुनियाभर में हो रहा है. अरब देश जलने लगे हैं और अमेरिका इस के कगार पर है. यूरोप में भी ऐसा कुछ हो रहा है. अफसोस यह है कि देश का बुद्धिजीवी वर्ग भी पाखंडों का मुरीद है और धर्र्मकर्म को ही उन्नति का मुख्य मार्ग मानता है.

डांस से तनाव दूर भागता है : माधुरी दीक्षित

‘डांसिंग दिवा’ के रूप में जानी जाने वाली अभिनेत्री माधुरी दीक्षित ने फिल्म ‘अबोध’ से अभिनय कैरियर की शुरुआत की थी. उन्होंने 3 साल की उम्र से कथक डांस सीखना शुरू किया था. हालांकि उसे बचपन से डाक्टर बनने की इच्छा थी, लेकिन नृत्य उनमें इतनी अच्छी तरह रच-बस गया था कि वह उसे छोड़ नहीं पायी, जिस भी मंच पर उन्होंने नृत्य किया, सभी ने उनकी तारीफे की. नृत्य की वजह से ही वह इंडस्ट्री में अपनी एक अलग पहचान बना पायी. 80 और 90 के दशक की वह सबसे चहेती और धक्-धक् गर्ल बनी. “तेजाब”, “खलनायक”, “राम-लखन”, “किशन-कन्हैया”, “दिल”, “प्रहार” आदि सभी माधुरी की सफल फिल्में हैं. कामयाबी के शिखर पर पहुंचकर माधुरी ने अमेरिका में स्टाब्लिशड डॉ. श्रीराम नेने से शादी की और दो बच्चों की मां बनी. कुछ सालों बाद वह फिर से मुंबई आई और अपनी दूसरी पारी शुरू की. इस समय वह फिल्मों से अधिक डांस पर फोकस्ड है, जिसमें उनका साथ दे रहे हैं उनके डॉक्टर पति श्रीराम नेने.

माधुरी ने कभी भी अपनी डांस और फिटनेस को खोने नहीं दिया आज भी वह उतनी ही फिट हैं और अपने इस डांस के हुनर को पूरे देश में फैलाने की कोशिश कर रही हैं. वीडियोकॉन डी2एच के शो ‘नचले’ ने ‘डांस विथ माधुरी’ के साथ साझेदारी की है. जिसमें भारतीय नृत्य शैली में कथक, भरतनाट्यम, से लेकर वेस्टर्न जैज, कंटेम्पररी, हिप-हॉप, सालसा आदि के साथ बॉलीवुड डांस भी होगा.

इस मौके पर माधुरी कहती है कि “मैंने डांस 3 साल की उम्र से सीखा है और आज मैं जो भी हूं, इस डांस की वजह से हूं. डांस की वजह से मैं फिल्मों में भी आई, क्योंकि मैंने बहुत सारे स्टेज शो और डांस परफॉर्म किये थे, डांस ने मुझे अपने मूड, फिटनेस, आत्मविश्वास आदि सबकुछ बनाये रखने की सीख दी. मेरे हिसाब से हर व्यक्ति को आज के वातावरण में डांस सीख लेना चाहिए. इससे तनाव दूर भागता है. मुझे जब भी तनाव होता है, मैं डांस कर लेती हूं. नृत्य करने से जो आनंद आता है, उसे व्यक्त कर पाना मुश्किल है. ये कला व्यक्ति में जन्म से ही आती है. डांस सिखने की कोई उम्र नहीं होती, अगर कही गाना बजता है तो 6 महीने का बच्चा भी नाचने लगता है”.

इसके आगे माधुरी कहती है कि “एक दिन मैंने अपने पति के साथ बैठकर इस बात पर चर्चा की. कैसे लोगों के घर तक नृत्य पहुचाया जाय, क्योंकि मैं हर माध्यम के साथ जुड़कर पूरे देश में इसे फैलाना चाहती हूं. इस काम के लिए मेरे साथ हर तरह के नृत्य में पारंगत गुरु शामिल है.

माधुरी आज की सबसे अच्छी डांसर प्रियंका चोपड़ा, करीना कपूर, सोनाक्षी सिन्हा, दीपिका पादुकोण आदि को कहती हैं. उनके हिसाब से सभी की डांस फॉर्म एक दूसरे से अलग और अच्छी है. शास्त्रीय नृत्य को डांस का फाउंडेशन कहा जाता है, इसके बावजूद लोग वेस्टर्न डांस पर अधिक जोर देते हैं. माधुरी आगे कहती हैं कि बेसिक ज्ञान नृत्य में होना चाहिए और इसके लिए शास्त्रीय नृत्य पहले सीखना जरुरी है. इसमें फुटवर्क, तत्काल, हाथ की मुद्राएं, बॉडी मूवमेंट, अभिनय आदि सब एक डांस में आ जाती हैं. बेसिक प्रशिक्षण के बाद आप कोई भी ‘डांस स्टाइल’, ‘पिकअप’ कर सकते हैं. बेसिक सेंस ऑफ रिदम, सेंस ऑफ डीसिप्लिन और सेंस ऑफ इमोशन, जो हमारे शरीर को चाहिए वह मिल जाता है. मुझे क्लासिकल डांस बहुत पसंद है. आज भी मैं रोज डांस का रियाज करती हूं. इससे मुझे खुशी मिलती है”.

पहली बार जब माधुरी अभिनय के लिए कैमरे के आगे आईं, तो कभी नर्वस नहीं हुईं, क्योंकि नृत्य में अभिनय पूरी तरह से समाया हुआ होता है. वह कहती हैं कि ‘डांस सीख लेने से आपके जीवन के अर्थ ही बदल जाते हैं. मुझे अच्छा लगता है कि मैंने इस क्षेत्र को ही अपना सबकुछ माना है’.

बौलीवुड में है कमी : तापसी पन्नू

पंजाबी मूल की अभिनेत्री तापसी पन्नू ने अपने अभिनय कैरियर की शुरुआत दक्षिण भारतीय फिल्मों से की. उन्हें दक्षिण में स्टार कलाकार माना जाता है. सिनेमा के बदलते रूप के साथ ही अब तापसी पन्नू ने तेलुगू फिल्मों में नकारात्मक किरदार निभाने शुरू कर दिए हैं, तो दूसरी तरफ फिल्म ‘पिंक’ व ‘नाम शबाना’ की सफलता के साथ ही अब वे हिंदी फिल्मों में भी चर्चा का केंद्र बन गई हैं. चर्चा है कि तापसी पन्नू अब ‘पिंक’ के तेलुगू रीमेक में भी अभिनय कर रही हैं. मगर खुद तापसी इस बात से इनकार करती हैं.

फिल्म ‘पिंक’ में अभिनय के बाद आप देश की युवतियों से क्या कहना चाहेंगी?

मैं हर युवती को क्राव मागा जैसी मार्शल आर्ट की ट्रेनिंग लेने की सलाह दूंगी. क्राव मागा सीख चुकी युवती अपनी रक्षा खुद कर सकती है, क्योंकि क्राव मागा में कुछ तकनीक ऐसी हैं कि सामने वाला चाहे जितना स्ट्रौंग हो, क्राव मागा सीखी युवती उसे परास्त कर सकती है.

दक्षिण भारत खासकर तेलुगू सिनेमा करने के अनुभव क्या रहे?

बहुत अच्छे. मैं ने बहुत इज्जत पाई. तेलुगू सिनेमा वाले आप को बिगाड़ते भी हैं. वे आप के साथ रानी जैसा व्यवहार करते हैं. आप जैसे ही अपनी वैनिटी वैन से बाहर निकलती हैं, वे खड़े हो जाते हैं और जब आप वहां से चलीं नहीं जातीं, वे बैठते नहीं हैं. वे आप को बहुत सम्मान देते हैं. वहां जो अपनापन मिलता है, उस की कमी मुझे बौलीवुड में खलती है.

सुना है आप ‘पिंक’ के तेलुगू भाषा की रीमेक भी करने जा रही हैं?

मुझे तो इस बात की जानकारी नहीं है कि इस फिल्म का तेलुगू में रीमेक बन रहा है मगर ऐसा हुआ और मुझे औफर मिला, तो मुझे यह फिल्म करने में खुशी होगी.

किस कलाकार के साथ काम करने की तमन्ना है?

रितिक रोशन व आमिर खान के साथ काम करना चाहती हूं, लेकिन मुझ में इतना साहस नहीं है कि मैं किसी निर्देशक से जा कर कहूं कि मुझे रितिक रोशन के साथ काम करना है. मैं मणि रत्नम के निर्देशन में भी अभिनय क रना चाहती हूं.

सरकार 3 : कहीं आप सिरदर्द तो मोल नहीं ले रहे

‘‘वंशवाद’’ ही सर्वश्रेष्ठ है. इस बात को रेखांकित करने वाली फिल्म का नाम है-‘‘सरकार 3’’. जो कि राम गोपाल वर्मा निर्देशित फिल्म ‘‘सरकार’’ का यह तीसरा सिक्वअल है. फिल्म के शुरू होते ही निर्देशक ने सुभाष नागरे उर्फ सरकार को चीकू के पेड़ को पानी देते हुए दिखाया है. और यह सीन फिल्म में कई बार आता है. इसी से यह बात साफ हो जाती है कि सरकार नाटक कर रहे हैं, असल में तो वह अपने पोते शिवाजी नागरे उर्फ चीकू को तैयार कर रहे हैं.

कहानी के केंद्र में सुभाष नागरे उर्फ सरकार (अमिताभ बच्चन) ही हैं. इस वक्त वह कई दुश्मनों से घिरे हुए हैं. उनके धुर विरोधी माइकल वाल्या (जैकी श्राफ) और राजनीतिज्ञ गोविंद देशपांडे (मनोज बाजपेयी) एक उद्योगपति गांधी को आगे कर सुभाष नागरे का प्रभुत्व खत्म करना चाहते हैं. इनके साथ अनु करकरे (यामी गौतम) है. गांधी को लगता है कि अनु करकरे अपने पिता की मौत के लिए सुभाष नागरे को ही जिम्मेदार मानती है और वह अपने पिता की मौत का बदला उनसे लेना चाहती है. तो दूसरी तरफ सुभाष नागरे का अपना पोता शिवाजी नागरे उर्फ चीकू (अमित साध) है. राजनीतिक उठापटक भी तेज गति से चल रही है. इससे सुभाष  नागरे उर्फ सरकार को अपना प्रभुत्व डगमगाता नजर आ रहा है. पर वह डरते नहीं हैं. लोगों की नजर में एक दिन सुभाष नागरे अपनी बीमार पत्नी पुष्पा (सुप्रिया पाठक) के कहने पर पोते शिवाजी नागरे उर्फ चीकू को अपने साथ आकर रहने की इजाजत दे देते हैं. इससे सरकार के अति निकटतम सहयोगी गोकुल साटम (रोनित राय) को असुरक्षा सताने लगती है. गोकुल साटम के चलते नेता गोविंद देशपांडे मारे जाते हैं. उधर गोकुल साटम इसका आरोप चीकू पर लगाता है, तो दूसरी तरफ वह सरकार को खत्म करने में गांधी की मदद करने का आश्वासन दे देता है. इसकी भनक सरकार को लग जाती है. पर सरकार, गोकुल कीबात पर यकीन करने का नाटक कर चीकू को घर से बाहर कर देते हैं.

चीकू घर से बाहर निकलते ही सरकार के सभी विरोधियों को अपने साथ एकजुट करता है. और सारी सच्चाई जुटाकर अपने दादा यानी कि सरकार तक पहुंचाता रहता है. जिसकी भनक किसी को नहीं लगती है. एक दिन वह आता है जब सरकार खुद ही गोकुल की हत्या कर देते हैं और इसके लिए चीकू को दोषी ठहराते हुए कहते हैं कि अब वह 35 साल बाद अपने हाथ से चीकू की हत्या करेंगे. पर जैसे ही माइकल वाल्या, सरकार के घर पहुंचते हैं. वैसे ही सरकार सारा सच बता देते हैं. उधर अनु खुद गांधी को गोली मार देती है. चीकू अपने दादा के घर वापस आ जाता है. अंत में सरकार कहते हैं कि राजनीति का खेल आसान नहीं है. राजनीति करने के लिए पहले इंसान को अपने घर की राजनीति को समझना व सीखना पड़ेगा. क्योंकि क्लेश सबसे बड़ादुश्मन है.

जहां तक अभिनय का सवाल है, तो फिल्म में यामी गौतम को जाया किया गया है. यामी के हिस्से करने के लिए कुछ है ही नहीं. सिर्फ बीच बीच में वह अपना खूबसूरत चेहरा दिखा जाती हैं, पर उस चेहरे पर भी कोई भाव नजर नहीं आते. अमित साध ने निराश किया है. फिल्म में अति महत्वपूर्ण किरदार निभाने का अवसर उन्हे मिला है, पर वह पूरी तरह से सफल नहीं रहे. यदि यह कहा जाए कि वह इस अवसर का लाभ नहीं उठा पाए, तो गलत नहीं होगा. कलाकार को इस तरह के मौके बार बार नहीं मिलते. पर अमित साध अपनी प्रतिभा को साबित करने में विफल नजर आते हैं. मनोज बाजपेयी ने छोटे से किरदार में भी जान डाल दी है. रोनित राय ने ठीक ठाक अभिनय किया है. अमिताभ बच्चन ने फिर साबित किया कि वह महान कलाकार हैं.

फिल्म ‘‘सरकार 3’’ की सबसे बड़ी कमजोरी इसका कहानी विहीन होना है. टीवी सीरियल की तरह कुछ घटनाक्रमों के बल पर पूरी फिल्म बनायी गयी है. फिल्म में न तो कोई रोमांच है और न ही कोई प्रेम कहानी है. फिल्म में कहानी का कोई ठोस प्लाट ही नहीं है. निर्देशक व लेखक पूरी तरह से कन्फ्यूज्ड नजर आते हैं. टीवी सीरियल की तरह किसी सीन में एक पात्र हावी हो जाता है, तो किसी सीन में दूसरा पात्र. इसी तरह फिल्म के खलनायक भी सीन के साथ बदलते रहते हैं. वास्तव में पटकथा की कमजोरी के चलते एक भी किरदार उभर नहीं पाता. हर किरदार को लंबे लंबे संवाद दे दिए गए हैं. फिल्म को बेवजह सीरियल की ही तरह लंबा खींचा गया है. एक भी सीन रोचक नहीं बन पाया. कई दृश्यों में दर्शक अपनी हंसी नहीं रोक पाता. क्योंकि उसकी समझ में नहीं आता कि आखिर हो क्या रहा है? कुल मिलाकर फिल्म ‘‘सरकार’’ देखने का अर्थ सरदर्द मोल लेना है.

‘सरकार’ के सिक्वअल ‘सरकार राज’ के बाद फिल्मकार राम गोपाल वर्मा कोई अच्छी फिल्म नहीं बना पाए. राम गोपाल वर्मा ने कैमरे के साथ प्रयोग करते हुए फिल्म को बिगाड़ने का ही काम किया है.

दो घंटे 20 मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘सरकार 3’’ का निर्माण ‘ए बी कार्प लिमिटेड’, ‘वेव सिनेमा,अलुम्ब्रा इंटरटेनमेंट ने मिलकर किया है. फिल्म के निर्देशक राम गोपाल वर्मा, लेखक द्वय पी जय कुमार और राम कुमार सिंह, पटकथा लेखक राम गोपाल वर्मा, कहानी निलेश गिरकर और राम गोपाल वर्मा, संगीतकार रवि शंकर, कैमरामैन अमोल राठौड़ तथा कलाकार हैं – अमिताभ बच्चन, जैकी श्राफ, मनोज बाजपेयी, अमित साध, यामी गौतम, रोनित राय, रोहिणी हट्टंगड़ी, पराग त्यागी, शिव शर्मा व अन्य.

शुक्र है आधा सच तो बोले राजनाथ सिंह

मोदी मंत्रिमंडल के जो दो चार सदस्य तुक की बात बोल पाते हैं गृह मंत्री राजनाथ सिंह उनमे से एक हैं, जिन्हें कुछ बोलने के पहले मोदी की इजाजत या रजामंदी की जरूरत नहीं पड़ती. नक्सल प्रभावित दस राज्यों के मुख्यमंत्रियों की मीटिंग में राजनाथ सिंह की यह स्वीकारोक्ति कोई राजनैतिक मजबूरी नहीं थी कि नक्सली हिंसा का हल गोलियां नहीं हैं. यह जरूर उनकी सच से मुंह मोड़ने की कवायद थी कि वे बजाय कोई ठोस हल पेश करने के नक्सली समस्या से निबटने के अव्यवहारिक सुझाव देते रहे, मसलन सरकार के खुफिया तंत्र का कमजोर होना और नक्सलियों की फंडिंग के स्त्रोत रोकना वगैरह वगैरह.

किसी भी समस्या का हल असल में उसकी वजहों से होकर जाता है. राजनाथ सिंह या मौजूदा केंद्र सरकार पूर्ववर्ती सरकार की तर्ज पर जाने क्यों इन वजहों से कतरा रहे कि इस समस्या की जड़ या उत्पत्ति आदिवासियों का शोषण और उनके हक छीने जाना है. यह ठीक है की इन शोषकों की शक्ल सूरत बदल गई है, ठीक वैसे ही जैसे हिन्दी फिल्मों के खलनायक की बदल गई है. सरकार यह नहीं सोच रही कि भोला भाला आदिवासी बजाय उसके नक्सलियों पर क्यों भरोसा करता है और बस्तर में तैनात अर्धसैनिक बल उन पर वही कहर बरपाते हैं, जो कभी सामंत और जमींदार बरपाते थे, इस के लिए उदाहरणों की कमी नहीं है.

चार दिन पहले ही रायपुर जेल की डिप्टी जेलर वर्षा डोंगरे को राज्य सरकार ने बर्खास्त किया है. वर्षा का गुनाह इतना भर था कि उसने आदिवासियों पर हो रहे सरकारी अत्याचारों का कच्चा चिट्ठा सोशल मीडिया पर खोलकर रख दिया था, जिसे सुन हर किसी के रोंगटे खड़े हो सकते हैं. बकौल वर्षा आदिवासी इलाकों में पूंजीवादी अर्थव्यवस्था लागू की जा रही है, आदिवासियों से उनका जल, जंगल और जमीन का हक छीना जा रहा है. अपनी भड़ास मे सीधे सरकार पर आरोप वह नहीं लगाती जिसकी जरूरत भी नहीं. वह कहती हैं, सारे प्राकृतिक संसाधन उद्योगपतियों और पूंजीपतियों को बेचने के लिए जंगल खाली करवाये जा रहे हैं. वर्षा कहती हैं कि खुद आदिवासी नक्सलवाद का अंत चाहते हैं लेकिन जिस तरह से देश के रक्षक ही उनकी बहू बेटियों की इज्जत उतार रहे हैं, उनके घर जला रहे हैं तो इंसाफ के लिए आदिवासी कहां जाएं.

खुद वर्षा ने अपनी आंखों से देखा है कि बस्तर थाने में आदिवासी किशोरियों को पूरी तरह नग्न कर उनकी कलाइयों और स्तनों पर करंट लगाया गया, 14 से 16 साल की इन लड़कियों का इलाज खुद उसने करवाया था. वर्षा गलत इसलिए करार नहीं दी जा सकती कि अपनी बात में उसने सीबीआई रिपोर्ट और बिलासपुर हाईकोर्ट के एक फैसले का भी हवाला दिया है.

यह सब और इससे भी ज्यादा वीभत्स नजारे किसी गृहमंत्री को नहीं दिखते, इसलिए वर्षा यह सच बयानी कर अपनी नौकरी जाने का अफसोस नहीं करती कि बस्तर में जो भी समाजसेवी या मानवाधिकारकर्ता आदिवासियों के हक में बोलता है उसे नक्सली कहते जेल में ठूंस दिया जाता है. ऐसे में राजनाथ सिंह सच ही कह रहे हैं कि गोलियां नक्सली हिंसा का हल नहीं, क्योकि अघोषित तौर पर अधिकांश आदिवासी सैनिक शासन के खिलाफ हैं और इन सभी कथित नक्सलियों पर गोलियों कारगर नहीं होंगी. फिर जो हल बचता है वह यह है कि सरकार बस्तर से पहले सेना हटाए, फिर आदिवासियों का भरोसा जीते, नहीं तो हर साल हिंसा में मारे जाने बाले औसतन एक हजार आदिवासियों के मौतों की जिम्मेदारी लेने की हिम्मत दिखाए. समस्या अब नक्सली कम बस्तर में तैनात अर्ध सैनिक बलों की तैनाती ज्यादा हो चली है. भ्रष्टाचार पर सवार शोषण बस्तर में भी आम है, जिसके शिकार वे गरीब नंगे भूखे आदिवासी ज्यादा होते हैं जिन्हें अपने संवैधानिक हक तक नहीं मालूम.

रही बात फंडिंग की तो राजनाथ सिंह को औरों से ज्यादा बेहतर मालूम होना चाहिए कि मेहनती आदिवासी ही नक्सलियों के बड़े फाइनेंसर हैं, जो सेना से अपनी हिफाजत की कीमत नक्सलियों को चुकाते हैं. बंदूक की नोक पर कौन बस्तर में लोकतन्त्र की हत्या कर रहा है इस पर माथापच्ची अब बेकार की बात है, कौन विकास का दुश्मन है यह कतई चर्चा  की बात नहीं, मुद्दे की बात वे वजहें हैं जिनके चलते नक्सली वजूद में आए और ये वजहें जब तक दूर नहीं होंगी तब तक बस्तर के जंगलों में उड़ता बारूद खत्म या बंद होने की उम्मीद किसी को नहीं करनी चाहिए.

पुलिस, योगी आदित्यनाथ और एक बुजुर्ग

जब से उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की सरकार बनी है, तब से योगी अपने एक्शन अवतार में हैं. आज हम आपको ऐसा ही वाकया बताने जा रहें हैं, जब एक थानेदार की हालत पतली हो गई, क्यूंकि उससे परेशान एक बुजुर्ग ने सीएम योगी को फोन लगा दिया.

दरअसल इलाहाबाद के मांडा थाने में एक वृद्ध अपनी शिकायत लेकर थानेदार के पास पहुंचा. लेकिन आदत से मजबूर पुलिस ने बुजुर्ग की फरियाद पर भी टाल मटोल करना शुरू कर दिया. जब सुनवाई नहीं हुई, तो बुजुर्ग ने अपना मोबाइल निकाला और एक नंबर डायल कर थानेदार की ओर बढ़ाकर बोला, “लीजिए सीएम साहब से बात करिये.” थानेदार समझ ही नहीं पाया की आखिर अब वो करे तो क्या करे?

उस समय थाने में कई और लोग भी मौजूद थे, बुजुर्ग के आत्मविश्वास को देखकर वे सभी भी चौक गए. सकपकाते हुए थानेदार ने मोबाइल थाम लिया. मोबाइल की स्क्रीन पर नंबर देखा और कान पर लगा लिया. फिर तो अगले कुछ मिनट तक थानेदार साहब बस “जी सर” का शब्द ही दोहराते रहे.

बात करने के बाद दरोगा ने खुद बताया कि फोन पर सीएम योगी आदित्यनाथ के पीआरओ थे. उन्होंने वृद्ध के मामले में तुरंत कार्रवाई और वृद्ध की समस्या का निदान करने को कहा.

ये था मामला

इलाहाबाद जिले के मांडा हेठार गांव के रहने वाले बुजुर्ग की जमीन पर बनी बाउंड्री कुछ लोगों ने तोड़ दी. घटना की शिकायत करने बुजुर्ग मांडा थाने पहुंचा. यहां थाने में इंस्पेक्टर मांडा पीके मिश्रा फरयादियों से मिल रहे थे. बुजुर्ग ने उनसे अपनी समस्या बताई तो इंस्पेक्टर साहब ने राजस्व विभाग का प्रकरण बताकर बुजुर्ग को वहां से जाने को कह दिया. थानेदार के व्यवहार से दुखी  बुजुर्ग थोड़ा सा दूर गए, मोबाइल से नंबर मिलाया और फोन पर ही अपनी सारी समस्या बताने लगे. लगभग दो मिनट बाद बुजुर्ग फोन लेकर इंस्पेक्टर के पास वापस वापिस पहुंचे और बोले, “लीजिए सीएम साहब से बात करिये.

राजमार्ग, शराब और सुप्रीम कोर्ट का फैसला

देश के होटलमालिकों का अंदाजा है कि सुप्रीम कोर्ट के मुख्य राजमार्गों से 500 मीटर की दूरी तक शराब न बेची जाने, न परोसी जाने के फैसले से 1,000 करोड़ रुपए की प्रतिदिन हानि होगी. खुशी की बात है कि इस का लाभ देश के परिवारों को जाएगा. जो काम शराबबंदी नहीं कर सकती, वह काम सुप्रीम कोर्ट ने शराब के सेवन के साथ ड्राइविंग करने से होती दुर्घटनाओं के नाम पर कर दिया. अगर देश के लोग 3,65,000 करोड़ रुपए की शराब केवल सड़कों के किनारे बने होटलों, ढाबों व रैस्तरांओं में गले उतार लेते हैं तो यह गंभीर बात है. इस का नुकसान उन के परिवारों, बच्चों को झेलना पड़ता है.

उम्मीद की जानी चाहिए कि सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश, जिस की पुनर्विचार याचिका भी खारिज हो चुकी है, को सरकार अपने आदेशों से नहीं बदलेगी. कुछ राज्य सोच रहे हैं कि राजमार्गों को बदल कर छोटी सड़क घोषित कर दिया जाए, पर यह भी आसान नहीं है. इस में कई महीने लग जाएंगे और शराब पीने की बढ़ती आदत पर लगाम लगेगी.

बिहार और गुजरात जहां शराब की बिक्री बंद है, वहां लोगों को डिप्रैशन की बीमारी हो गई है, ऐसा सुनने को तो नहीं मिला. शराब बंद नहीं हो सकती, न चोरी, न डकैती, न फरेब, न जुआ. पर इन सब को क्या एक श्रेणी में रख सकते हैं कि ये तो आनंददायक हैं, इसलिए समाज इन्हें करने वालों को सहे.

शराब पी कर बहकने के साथ ड्राइव करता हुआ शख्स आतंकवादी बम की तरह है जो कहीं भी, कभी भी फूट सकता है. शराब से स्वास्थ्य लाभ तो है ही नहीं. कहने को तो अफीम का अंश भी कुछ दवाओं में  पड़ता है और अलकोहल का भी, पर उसे उन दवाओं को मौज के लिए भरभर कर तो नहीं पिया जाता.

सुप्रीम कोर्ट को चिंता केवल सड़कों की थी, स्वास्थ्य की नहीं. पर उस के फैसले से घरों में होने वाली लाखों दुर्घटनाएं कम हो सकती हैं क्योंकि ज्यादातर पतिपत्नी विवाद शराब के चारों ओर घिरे होते हैं.

आजकल फिल्म ‘साहब बीबी गुलाम’ की मीना कुमारी की तरह औरतें भी जम कर शराब का सेवन करने लगी हैं. इसलिए कुछ दिन ही लगाम लगेगी. जब तक ठेके, रैस्तरां, होटल गलियों में या जंगलों में नहीं बनते तब तक तो बचत ही बचत है.

एक्टिंग में उलझना नहीं चाहती : रश्मि सचदेवा

मिसेज यूनिवर्स रश्मि सचदेवा को देख कर कोई नहीं कह सकता कि उन की 21 साल की बेटी भी है. शादी के बाद फैशन की दुनिया में रश्मि ने वह सबकुछ हासिल किया जो किसी प्रोफैशनल मौडल का सपना होता है. दिल्ली एनसीआर से शुरू हुआ उन का सफर मिसेज यूनिवर्स तक पहुंचा. आज वे बड़ी मौडल की तरह सैलिब्रिटी हैं. लखनऊ में मिसेज यूपी के जजमैंट पैनल में शामिल होने आईं रश्मि ने कहा, ‘‘फोटो खिंचवाने का शौक शुरू से था. पहली बार मुझे ‘सरिता’ पत्रिका में यह मौका मिला. उस समय सरिता में अंदर छपने वाली शायरी के साथ मेरी फोटो छपी थी. मैं ग्रेजुएशन के पहले साल में थी, तब शादी हुई. शादी के बाद बेटी हुई. मैंने अपनी पढ़ाई जारी रखी.

‘‘मिसेज दिल्ली एनसीआर प्रतिभागिता में मेरी एक दोस्त हिस्सा ले रही थी. मेरी बेटी ने देखा तो वह बोली कि मैं भी इस में हिस्सा लूं. बेटी की बात का समर्थन पति ने भी किया. वहां से दोबारा मैं ने फैशन की दुनिया में कदम रखा. यह सफर मिसेज इंडिया और मिसेज यूनिवर्स तक पहुंच गया.’’

रश्मि के पति चार्टर्ड अकाउंटैंट हैं. बेटी अंगरेजी औनर्स की पढ़ाई कर रही है. रश्मि एक्टिंग में जाना नहीं चाहतीं. वे कहती हैं, ‘‘मेरे लिए परिवार को समय देना सब से जरूरी है. उस के साथ जो मैं कर सकती हूं वही करना चाहती हूं. एक्टिंग में समय बहुत लगता है. मौडलिंग और फैशन शो बहुत समय नहीं लेते. घरपरिवार के साथ इन को मैनेज किया जा सकता है.’’

रश्मि आज भी किसी मौडल की तरह स्लिम दिखती हैं. अपनी फिटनैस के बारे में वे कहती हैं, ‘‘मैं जिम के बजाय मौर्निंग वाक पर ज्यादा फोकस करती हूं. रोज कम से कम 40 मिनट की वाक करती हूं. क्रैश डाइट पर यकीन नहीं करती. हैल्दी और क्वालिटी फूड लेती हूं. 40 वर्ष के बाद महिलाओं में तमाम तरह की हैल्थ प्रौब्लम होती हैं. इन में थायराइड और विटामिंस की कमी सब से ज्यादा होती हैं. ऐसे में जिम करने से बौडी को नुकसान हो सकता है. ऐसे में वाकिंग सब से बेहतर लगती है. जब प्रैग्नैंसी होती है तो प्रैग्नैंसी के बाद बढ़े हुए वजन को कम करना सब से जरूरी होता है. एक बार वह कम हो जाए तो फिटनैस को हासिल करना

सरल हो जाता है. मैं ने प्रैग्नैंसी के समय अपना 12 किलो वजन कम किया था.’’

रश्मि थैलीसिमिया फांउडेशन के साथ जुड़ कर काम कर रही हैं. उन्होंने कई पंजाबी म्यूजिक एलबमों में भी काम किया है. रश्मि कहती हैं, ‘‘फैशन की फील्ड को ले कर खुलेपन और शोषण की जो बातें होती हैं वे उतनी सही नहीं हैं. अगर कोई बिना किसी तरह के समझौते के काम करना चाहता है तो वह भी काम कर सकता है.

घुड़दौड़ : ये है एक अनूठी प्रतियोगिता

फिल्मों में घुड़सवारी या घोड़े दौड़ाते  हीरोहीरोइन को देख कर मन में घुड़सवारी का शौक तो जरूर जागता है. ऐसा नजारा लाइव भी है, जिस में घोड़े रेस लगा कर एकदूसरे से आगे निकलने की कोशिश करते हैं ताकि वे खुद पर सवार प्रतियोगी को जिता सकें. दुनियाभर में न केवल इंसानों की प्रतियोगिताएं आयोजित होती हैं बल्कि जानवरों के शोज व प्रतियोगिताओं का भी आयोजन किया जाता है ताकि कुछ हट कर होने के कारण ज्यादा ऐंटरटेनमैंट हो सके.

क्या है हौर्स रेस प्रतियोगिता

हौर्स रेस आज की नहीं बल्कि पुराने समय से चली आ रही प्रतियोगिता है, जिसे लोगों ने हमेशा पसंद किया है. यह एक ऐसा खेल है, जिस में प्रतियोगिता के लिए चयनित घोड़ों पर सवार प्रतियोगी घोड़ों को दिशानिर्देश देते हुए बिना गिरे औरों से पहले अपने लक्ष्य तक पहुंचने की कोशिश करते हैं.

इस में सिर्फ एक ही टास्क नहीं बल्कि विभिन्न तरह के टास्क होते हैं, जिन्हें विभिन्न राउंड्स के रूप में पूरा कर अपना गोल अचीव करना होता है. इस में विभिन्न राउंड्स होते हैं. किसी राउंड में एक ही नस्ल के घोड़े भाग लेते हैं, किसी राऊंड में उन्हें बाधाओं को पार करते हुए आगे बढ़ना होता है, तो किसी राउंड में निश्चित दूरी को कम समय में तय करना होता है. किसी में अलगअलग ट्रैक पर दौड़ना होता है. फिर इसी के आधार पर बैस्ट परफौर्मर को विजेता घोषित किया जाता है. इस प्रतियोगिता में दुनियाभर से लोग भाग लेने आते हैं.

संभल कर आगे बढ़ना जरूरी

जब भी हम कभी हिल स्टेशन घूमने जाते हैं, वहां हौर्स राइडिंग का लुत्फ उठाना नहीं भूलते. भले ही हमें राइडिंग आती हो या नहीं, लेकिन यह सोच कर ट्राई जरूर करते हैं कि साथ में हमें संभालने वाला और घोड़े को कंट्रोल करने वाला है.

जब यही बात प्रतियोगिता के लिए आती है तब वहां न तो कोई संभालने वाला होता है और न ही गिरने पर उठाने वाला. वहां सबकुछ खुद ही हैंडिल करना होता है, इसलिए यहां थोड़ा संभल कर कदम रखना जरूरी होता है. सो इस के लिए प्रशिक्षण लेना जरूरी हो जाता है.

घोड़े पर बैठने से पहले अच्छी तरह सोच लें कि आप को घोड़े पर सवार होना व उसे आगे बढ़ने के लिए ठीक तरह से संकेत देना आता हो. इस के लिए जरूरी है कि आप अपने घोड़े के साथ सभी जरूरी तैयारी कर लें यानी उस के साथ ऐसी दोस्ती गांठें कि जब आप उस पर बैठें तो उसे एहसास हो जाए कि यही मेरा मालिक है जिसे जिताना है. इस में दोनों के स्किल्स और दोनों का ही प्रशिक्षित होना जरूरी है.

प्रशिक्षण

घोड़ों का ट्रेनिंग प्रोग्राम रेस की अवधि पर निर्भर करता है. घोड़े की परफौर्मैंस में आनुवंशिक कारण, ट्रेनिंग, उम्र वगैरा का अहम रोल होता है. घोड़े की प्रजाति पर भी उस की फिटनैस निर्भर करती है. इस के अलावा जब उसे ट्रेनिंग दी जाती है, तो उस के आनुवंशिक कारणों को भी ध्यान में रखा जाता है. ट्रेनिंग के दौरान उस के खानेपीने, उसे चोट न लगे इन चीजों का खासतौर से ध्यान रखा जाता है, क्योंकि  चोट लगने से घोड़े की सीखने की क्षमता प्रभावित होती है.

हौर्स रेसिंग के प्रकार

फ्लेट रेसिंग : इस में घोड़े सीधी या फिर अंडाकार बनी सतह पर तेजी से दौड़ते हुए आगे बढ़ते हैं. इस में थरोब्रैड, क्वार्टर, अरबी, पेंट और एप्पालूसा नामक नस्ल के घोड़े इस्तेमाल किए जाते हैं.

जंप रेसिंग : इसे आप एक तरह से खतरों का खेल कह सकते हैं, क्योंकि इस में घोड़े ऊंचाई से जंप करते हुए आगे बढ़ते हैं. इस में थरोब्रैड जैसी नस्ल के घोड़े प्रयोग में लाए जाते हैं.

हारनैस रेसिंग : इस रेस में जब घुड़सवार घोड़े को मंदगति से खींचता है, तो वह धीरेधीरे अपने कदम आगे बढ़ाता है. इस में स्टैंडर्ड नस्ल के घोड़ों का प्रयोग होता है.

एंडुरैंस रेसिंग : इस रेस में बाकी रेसों की तुलना में डिस्टैंस ज्यादा होता है.

हौर्स रेसिंग इन इंडिया

देश में होर्स रेसिंग का खेल 200 साल पुराना है. यहां पहली रेसकौर्स चेन्नई (तत्कालीन मद्रास) में 1777 में आयोजित की गई थी. इस तरह के आयोजनों के लिए यहां 6 टर्फ क्लब हैं,

बैंगलुरु टर्फ क्लब साल में 2 बार, मई से अगस्त और नवंबर से अप्रैल के महीनों में रेसिंग प्रतियोगिताओं का आयोजन करता है.

हैदराबाद टर्फ क्लब जुलाई से अक्तूबर और नवंबर से फरवरी के बीच प्रोग्राम आयोजित करता है. इस के अलावा रौयल कलकत्ता टर्फ क्लब, नवंबर से अप्रैल और जुलाई से अक्तूबर के बीच, रौयल वैस्टर्न इंडिया टर्फ क्लब मुंबई में नवंबर से मई के बीच और पूना में जुलाई से नवंबर के बीच, मैसूर रेस क्लब अगस्त से अक्तूबर के बीच व दिल्ली टर्फ क्लब मई से अगस्त के बीच हौर्स रेसिंग प्रतियोगिता का आयोजन करते हैं.

इसी तरह इस वर्ष मार्च में साउथवैस्ट के इंगलैंड के ग्लूस्टरशायर शहर में चैल्टेनहैम फैस्टिवल हौर्स रेसिंग का आयोजन किया गया, जिसे सब ने खूब ऐंजौय किया.

दर्शक कैसे ऐंजौय करते हैं

हौर्स राइडिंग का लुत्फ सिर्फ घुड़सवार ही नहीं उठाता बल्कि देखने वाले भी उसे ऐसे अनुभव करते हैं जैसे वे खुद मैदान में हों. इतना ही नहीं वे रेस शुरू होने से पहले शर्त लगाने में भी पीछे नहीं रहते. इस से उन्हें खेल देखने में और मजा आता है, क्योंकि जीतने वाले को प्राइज जो मिलता है. इतना ही नहीं दर्शकों की शो के प्रति ऐक्साइमैंट का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वे शो शुरू होने के काफी देर पहले ही प्रतियोगिता स्थल पर पहुंच जाते हैं ताकि किसी भी कीमत पर शो मिस न होने पाए और वे हर ऐडवैंचर को अपनी आंखों से देख पाएं. आखिर घुड़दौड़ के प्रति इतना दीवानापन जो है.

खतरे भी कम नहीं

यह खेल बहुत रोमांचक होता है, इस में घोड़े और घुड़सवार दोनों को ही टास्क के दौरान चोट लगने का डर रहता है, क्योंकि कई बार घोड़ा कुछ ज्यादा ही तेजी से जंप लगाने के कारण खुद तो गिरता ही है साथ ही अपने घु़ड़सवार को भी गिरा देता है. ऐसे में चोट वगैरा न लगे इसलिए दोनों का ही प्रशिक्षण लेना जरूरी होता है.

बाकी प्रतियोगिताओं की तरह घुड़दौड़ भी अपनी तरह की एक अलग प्रतियोगिता है जिसे घु़ड़सवार से ले कर दर्शक तक सभी ऐंजौय करते हैं.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें