‘भौजी पटनिया’ से कमबैक कर रही हैं भोजपुरी की सनी लियोनी

एक भोजपुरी एक्ट्रेस ऐसी हैं, जो एक्टिंग के साथ-साथ अपनी पढ़ाई भी पूरी कर रही हैं. सबसे खास बात यह है कि ये दिखने में बिल्कुल सनी लियोनी लगती हैं, इनकी लुक की वजह से ही दोस्तों ने इनका नाम ही बदल दिया और पल्लवी सिंह से ये सन्नी सिंह बन गईं और अब इसी नाम से जानी जाती हैं. सन्नी सिंह की अगली भोजपुरी फिल्म ‘भौजी पटनिया’ की शूटिंग जल्द शुरू होने वाली है. सन्नी अपनी ग्रेजुएशन पूरी करने के बाद फिर से भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री में कमबैक कर रही हैं. पढ़ाई के कारण सन्नी को 5 फिल्में छोड़नी पड़ी. उनकी फिल्म ‘तीन बुरबक’ जल्द रिलीज होने वाली है.

सन्नी अपनी पढाई को लेकर भी काफी संजीदा रही हैं. उन्हें इंटर की पढ़ाई के दौरान भी फिल्म में काम करने का मौका मिला था. दो फिल्में करने के बाद पढ़ाई पर फोकस करने लगी, जिसके कारण कई साल फिल्म इंडस्ट्री से दूर रही. सन्नी के परिजनों ने उनसे कहा कि पहले पढ़ाई पूरी कर लो. फिल्म तो आगे भी कर सकती हो. माता-पिता की बात मानकर सन्नी ने अब बी. कॉम कर लिया है. सन्नी ने कहा कि अभी ‘गद्दर 2’ की शूटिंग में बिजी हूं. फिल्म की शूटिंग महाराष्ट्र में हो रही है.

उन्होंने बताया कि उनकी फिल्म “भौजी पटनिया” की शूटिंग जल्द ही मधुबनी में शुरू होने वाली है. इसके साथ ही कई अन्य फिल्मों को लेकर भी बातचीत हो रही है. सन्नी सिंह का असली नाम पल्लवी सिंह है और वह यूपी की रहने वाली हैं. सन्नी ने बताया कि सनी लियोनी से चेहरा मिलने के कारण दोस्त मुझे भी सनी कहते थे. यह सिलसिला कई साल चला. फिर बाद में मैंने अपना नाम बदलकर सन्नी सिंह कर लिया.

सन्नी ने बताया कि अपना नाम बदलने पर परिजनों ने मना नहीं किया. सनी नाम के कारण कोई परेशानी के संबंध में सन्नी सिंह का कहना है कि यह सोचने वाले पर निर्भर करता है. मुझे इस नाम से कोई परेशानी नहीं है. मैं खुश हूं.

मिस कोलकाता बनी भोजपुरी की नई सनसनी

अभिनेत्री संचिता बनर्जी ने अपनी पहली भोजपुरी फिल्म ‘निरहुआ हिंदुस्तानी 2’ से भोजपुरी सिनेदर्शको के दिलों में तहलका मचा दिया है. फिल्म में संचिता की एक्टिंग और रोमांस को देखकर दर्शक उन पर फिदा हो गए हैं. इस फिल्म में संचिता के संवाद को दर्शक काफी पसंद कर रहे हैं.

भोजपुरी फिल्म जगत में संचिता ने कदम रखकर अपने खूबसूरत हुस्न और अदा से दर्शकों को दीवाना ही नहीं, पागल भी बना दिया है. फिल्म ‘निरहुआ हिन्दुस्तानी 2’ 2014 में प्रदर्शित फिल्म ‘निरहुआ’ की सीक्वल है. इस फिल्म से मिस कोलकत्ता ने भोजपुरी सिनेमाजगत में कदम रखा है. संचिता भोजपुरी फिल्म से पहले मॉडलिंग और कई विज्ञापन फिल्मों और हिंदी फिल्म में अपने अभिनय का जलवा बिखेर चुकी हैं. संचिता बनर्जी कहती हैं कि मुझे भोजपुरी फिल्मों में काम करना बहुत पसंद है. यहां का देसीपन दर्शकों को अच्छा लगता है.

बिहटा : जमीन दबाने और गंवाने का खेल

बिहार में पटना से सटे बिहटा ब्लौक के इलाकों में जमीन खरीदने, बेचने और गैरकानूनी तरीके से सरकारी जमीनों पर कब्जा करने की होड़ मची हुई है. बिहटा में आईआईटी बनने के बाद वहां कई रिएल ऐस्टेट कंपनियों ने भी अपने पैर जमा लिए हैं और कम कीमत पर जमीन खरीद कर अपार्टमैंट्स बनाने का धंधा चालू कर दिया है. इस से बिहटा में जमीन की कीमतों में कई गुना ज्यादा इजाफा होने से जमीन को ले कर कई तरह की तिकड़मबाजी चल रही है. हालत यह है कि सूखी नदी की जमीन पर कब्जा जमाने की होड़ मची हुई है.

वहीं दूसरी ओर अपनी मरजी से सरकारी योजना के लिए जमीन देने वाले किसान मुआवजा पाने के लिए पिछले 5 सालों से लड़ाई लड़ रहे हैं. बिहटा में दनवा नदी के सूखने के बाद पहले तो दबंगों ने उस की खाली जमीन पर कब्जा जमाया और अब उसे बेचने की साजिशें भी शुरू हो चुकी हैं. कई जमीनें बिक भी गई हैं. अब उन पर पक्के मकान भी बनने शुरू हो गए हैं. इतना होने के बाद भी प्रशासन की नींद नहीं खुल सकी है.

जमीन को खरीदने वाले भी दबंग ही हैं और जमीन लेने के तुरंत बाद जेसीबी मशीन लगा कर जमीन पर मिट्टी भराने का काम शुरू कर दिया है. वहीं के बाशिंदों ने जब इस मामले के बारे में थाने को जानकारी दी, तो थाने ने टका सा जवाब दे दिया कि इस मामले में उसे कोई शिकायत नहीं मिली है.

बिहटाखगौल सड़क के किनारे बहने वाली दनवा बरसाती नदी है और वह पिछले कई सालों से सूखी पड़ी है. इस वजह से कई दबंगों और जमीन माफिया की नजरें उस पर गड़ी हुई हैं. पहले उस में बांस, फूस और खपरैल की झोंपडि़यां बनाई गईं और अब उस पर कानूनन कब्जा जमाने के लिए उस की खरीदफरोख्त का काम भी शुरू कर दिया गया है.

बिहटा पटना शहर से 35 किलोमीटर की दूरी पर बसा है. पटना शहर के बढ़ने से बिहटा में जमीन की कीमतें काफी बढ़ गई हैं और वहां जमीन खरीदने की होड़ सी मची हुई है. कई छोटीबड़ी रिएल ऐस्टेट कंपनियों ने वहां काम चालू कर रखा है.

बिहटा के अम्हारा गांव के पास 5 सौ एकड़ जमीन में आईआईटी बनने के बाद वहां की जमीन की कीमतों में काफी उछाल आया है. पटना एयरपोर्ट को भी  फुलवारीशरीफ से हटा कर बिहटा में ले जाने की तैयारी चल रही है.

गौरतलब है कि बिहटा में एयरफोर्स बेस स्टेशन भी है. इन सब वजह से वहां की जमीन अचानक ही कई गुना ज्यादा महंगी हो गई है. 5 साल पहले एक लाख रुपए में एक बीघा यानी 20 कट्ठा के भाग से बिकने वाली बिहटा की जमीनों की कीमत आज 20 लाख रुपए प्रति कट्ठा हो चुकी है.

जमीन की कीमतें बढ़ने के बाद अब सूखी नदी की जमीन को बेचने और खरीदने की आपाधापी मची हुई है. इस आपाधापी का फायदा जमीन माफिया जम कर उठा रहे हैं और लोगों को जमीन बेच कर बेवकूफ बना रहे हैं.

अब जमीन बेचने और खरीदने की होड़ के बीच दबंग जमीन माफिया ने सालों से सूखी पड़ी दनवा नदी की खाली पड़ी जमीन को बेचना चालू कर दिया है. कम कीमत में जमीन खरीदने की मारामारी के बीच लोगों की आंखें इस कदर बंद हैं कि जमीन खरीदने के पहले उस के बारे में छानबीन भी नहीं ले रहे हैं.

कई लोग तो जमीन की घेराबंदी कर उस पर मकान बनाना शुरू कर चुके हैं. दिनरात कई टै्रक्टर तो जमीन को मिट्टी से भरने के काम में लगे हुए हैं.

बिहटा के श्रीचंद्रपुर से ले कर महमूदपुर मुसहरी तक के गांवों के आसपास नदी की जमीन को बेचने का काम धड़ल्ले से चल रहा है. जगहजगह जेसीबी मशीनों और ट्रैक्टरों को लगा कर मिट्टी की कटाई और भराई का काम बड़े पैमाने पर चल रहा है और प्रशासन को इस की खबर तक नहीं लग पा रही है.

श्रीचंद्रपुर गांव के रहने वाले किसान मधुसूदन यादव कहते हैं कि दनवा नदी का तो वजूद ही खत्म कर दिया गया है.  लगता ही नहीं कि वहां पर कभी कोई नदी थी.

किसी ने 4 कट्ठा जमीन खरीदी, पर 10 कट्ठा में बाउंड्री कर ली है. कुछ लोगों को तो धोखे में रख कर जमीन बेची जा रही है, तो कई ऐसे लोग भी हैं, जो सबकुछ जानने के बाद भी जमीन खरीद रहे हैं.

ऐसे लोगों की सोच है कि जब एक बार सरकारी जमीन पर कब्जा कर पक्का मकान बना लिया जाएगा, तो फिर सरकार के साथ सालों तक केसमुकदमा चलेगा और उस के बाद हार कर सरकार कुछ रुपए ले कर जमीन की रजिस्ट्री करने का आदेश जारी कर ही देगी.

दबंगों की देखादेखी आसपास के इलाकों के दलित परिवारों ने भी नदी की जमीन पर झोंपडि़यां बनानी शुरू कर दी हैं. डेढ़ सौ से ज्यादा झोंपडि़यां बन कर तैयार हो गई हैं और उन में लोग रहने भी लगे हैं.

दनवा नदी बिहटा के ही अम्हारा गांव से निकलती है. उस के बाद वह बिहटा और मनेर होते हुए दानापुर कैंट के पास गंगा नदी में जा कर गिरती है.

यह बरसाती नदी है, पर पिछले कई सालों से बिहटा के किसानों के लिए जीवनरेखा बनी हुई थी. सिंचाई के काम में नदी के पानी का बेहतर इस्तेमाल किया जाता था.

हजारों एकड़ में खरीफ की फसल की बोआई में इस नदी के पानी का इस्तेमाल होता था. इस के साथ ही साथ नदी के पानी से उस इलाके में जमीनी पानी लैवल को भी ठीक रखने में मदद मिलती थी.

इस गैरकानूनी कब्जे के मामले के तूल पकड़ने के बाद प्रशासन की नींद खुली और सर्किल अफसर रघुवीर प्रसाद ने मामले की जांच कराई है.

शुरुआती जांच में पता चला है कि 80 लोगों ने नदी की जमीन पर कब्जा जमा रखा है. कइयों ने पक्के घर भी बना लिए हैं. वहीं महमूदपुर और अहियापुर मुसहरी के महादलितों ने 60 से ज्यादा छोटीबड़ी झोंपडि़यां बना ली हैं.

वहीं दूसरी ओर सरकारी योजनाओं के लिए अपनी मरजी से जमीन देने वाले किसान पिछले 10 सालों से मुआवजे के लिए अफसरों के पास चक्कर लगा रहे हैं.

बिहटा में आंदोलन के दौरान बीमार हुए किसान कौशल किशोर पांडे की तकरीबन साढ़े 32 एकड़ जमीन का अधिग्रहण साल 2007 में किया गया था.

वाजिब मुआवजे की मांग करतेकरते थक जाने के बाद वे आमरण अनशन पर बैठ गए. उसी दौरान उन की तबीयत खराब होने के बाद मौत हो गई.

कौशल किशोर पांडेय की बीवी शांति देवी बताती हैं कि जमीन का अधिग्रहण होने और पूरा मुआवजा नहीं मिलने से उन के पति समेत पूरा परिवार परेशान था. एक तो खेती की जमीन छिन गई और दूसरा उन्हें सही मुआवजा नहीं दिया गया. ऐसे में किसानों के सामने जान देने के अलावा और कोई रास्ता ही नहीं बच गया है.

गौरतलब है कि बिहटा में बिहटा लैंड बैंक, मैगा औद्योगिक पार्क और बिहटा औद्योगिक क्षेत्र के लिए 1280 एकड़ जमीन का अधिग्रहण किया गया है.

सरकारी अफसरों और बाबुओं की लापरवाही का आलम तो यह है कि आईआईटी की इमारत बनाने के लिए सरकार ने 11.5 एकड़ जमीन का अधिग्रहण किया और उस पर इमारत बना भी दी. इस के बाद भी अफसरों को पता नहीं है कि उस 11.5 एकड़ जमीन का अधिग्रहण हुआ है या नहीं?

पिछले दिनों जब जिला भूअर्जन पदाधिकारी एनामुलहक सिद्दीकी किसानों की समस्या को सुनने अम्हारा गांव पहुंचे, तो किसानों ने उन्हें इस मामले की जानकारी दी.

किसान आनंद, रामनाथ शर्मा, पंचानन शर्मा, राधेश्याम शर्मा वगैरह किसानों ने उन्हें बताया कि प्रशासन की ओर से अधिग्रहण की कोई सूचना उन्हें नहीं मिली है. खाता नंबर – 149, 478, 664 समेत कई भूखंड को मिला कर 11.5 एकड़ जमीन होती है.

भूअर्जन पदाधिकारी ने जब अपने रिकौर्ड की जांच की, तो पता चला कि उन किसानों की जमीन अधिग्रहण सूची में शामिल ही नहीं है.

बिहटा के किसानों का दर्द केवल वाजिब मुआवजे का मिलना ही नहीं है, बल्कि उन्हें सब से ज्यादा दुख इस बात का है कि सरकार और उस के बाबुओं ने उन के साथ ठीक रवैया नहीं अपनाया.

साल 2007-08 में जब पश्चिम बंगाल में सिंगूर जल रहा था, तो बिहटा के किसानों ने राज्य की तरक्की के लिए अपनी मरजी से जमीन सरकार को सौंप दी थी.

सरकार के प्रस्ताव के बाद किसानों ने सरकार को राजीखुशी जमीन सौंप कर मिसाल पेश की थी. किसानों को हीरो करार देने के बदले सरकारी कुनबे ने अब उन्हें विलेन बना डाला.

बिहटा में आईआईटी, एनआईटी, ईएसआईसी अस्पताल समेत कई बड़ी कपड़ा और साइकिल कंपनी के प्लांट लगने थे. किसानों ने सोचा था कि बड़ेबड़े संस्थान और कंपनियों के आने से बिहटा समेत समूचे बिहार का भला होगा, पर जमीन सौंपने के 9-10 साल के बाद ही मामला उलट गया.

आज बिहटा के किसान सरकारी तंत्र की अनदेखी से नाराज हैं और समूचा बिहटा उबल रहा है. किसान संजय मिश्रा बताता है, ‘‘हम लोगों ने बिना किसी सरकारी दबाव के अपनी मरजी से जमीन सरकार को दी थी. किसी भी किसान ने रत्तीभर विरोध नहीं किया.

‘‘बिहटा के किसान इस बात से खुश थे कि बड़े कालेज और कंपनी के खुलने से बेरोजगार नौजवानों को काम मिलेगा और पूरे इलाके की परेशानियां दूर हो जाएंगी.

‘‘शुरू में तो सबकुछ ठीकठाक था, पर बाद में बाबुओं की करतूतों के चलते किसानों को जमीन का मुआवजा पाने के लिए हल्लाहंगामा करना पड़ा, सड़कों पर उतरना पड़ा और इन सब चक्कर में 3 किसानों को अपनी जान गंवानी पड़ गई.’’

सरकारी सिस्टम से परेशान और हताश होने के बाद बिहटा के किसानों ने साल 2013 में आंदोलन चालू कर दिया.

पहली दफा 13 दिनों तक उपवास पर रहने के बाद सरकार की नींद खुली, तो आननफानन मुआवजा देने का ऐलान कर दिया गया. उस के बाद 2 सालों तक किसान मुआवजे के इंतजार में रहे, पर कुछ नहीं मिल सका.

किसानों का कहना है कि साल 2007 में अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू हुई थी और भूअर्जन नीति के मुताबिक एक साल के अंदर अधिग्रहण की सारी खानापूरी करने के बाद किसानों को पूरा मुआवजा दे देना था. सरकारी सुस्ती और बाबुओं की करतूतों की वजह से किसानों को पूरा मुआवजा नहीं मिल सका.

किसानों का आरोप है कि सरकार ने उन से कौडि़यों के भाव जमीन ले कर कई बड़ी कंपनियों को ऊंची कीमत पर बेच दिया है.

बिहार के राजस्व एवं भूमि सुधार मंत्री नरेंद्र नारायण यादव का दावा है कि 3 परियोजनाओं के लिए जमीन देने वाले किसानों को मुआवजा देने का काम शुरू हो गया है. आंदोलन के दौरान मरे कौशल किशोर पांडे के परिवार को मुआवजा दिया गया. 15 जून, 2016 को कुल 16 किसानों के बीच एक करोड़, 69 लाख, 32 हजार 847 रुपए का मुआवजा बांटा गया. भूअर्जन से जिन किसानों के बैंक खाते में मुआवजा भेजने का पत्र प्रमाणित हो कर कोषागार में पहुंचेगा, उन को मुआवजे की रकम दे दी जाएगी.

संरक्षणवाद की आंधी में उड़ते भारत के सपने

अमेरिकामें डौनल्ड ट्रंप की सरकार को कुछ मोरचों पर शिकस्त मिल रही है पर फिर भी वे अपने चुनावी नारों को थोपने में लगे हैं. आईटी प्रोफैशनल्स को एच-1बी वीजा अब कठिनाई से मिलेगा और अमेरिकी कंपनियों में अमेरिकियों को ही नौकरियों पर रखना होगा. यह सोचना कि अमेरिकी कंपनियां पहले पैसा बचाने के लिए भारत जैसे देशों से आईटी प्रोफैशनल्स को बुलाती थीं, गलत होगा. असल में अमेरिका में पढ़ाई महंगी है और एकदो दशकों से वहां के युवा मौजमस्ती में ज्यादा लगे हैं, काम के प्रति गंभीर होने के बजाय. इधर भारत में ऊंची जातियों के पढ़ेलिखे लोगों के बच्चे और मेहनत कर के अपना स्तर सुधारने में लगे हैं. भारत में नौकरी के अवसर कम मिलने के कारण उन्होंने अमेरिका में नौकरियां ढूंढ़ी और अपनी मेहनत से अपना रंग जमा लिया.

इन कंपनियों के आम गोरे मालिक या मैनेजर भारतीयों को आदर से देखते हों ऐसा नहीं है. जैसा व्यवहार वे अपने देश के काले या दक्षिण अमेरिका से आए मिश्रित लैटिनों से करते रहे हैं, उस से थोड़ा सा अच्छा है. अंगरेजी के ज्ञान के कारण उन की दोस्ती अच्छी चलती है और इसीलिए कंपनियां उन्हें एशिया के दूसरे क्षेत्रों से ज्यादा पसंद करती हैं.

पर अमेरिकियों के मन में भारतीयों के बारे में भी वैसा ही भेदभाव व गुस्सा है जैसा दूसरे बाहरियों के साथ. यह ट्रंप की जीत ने साबित कर दिया है. वैसे ऊंची जातियों के अमेरिकी नागरिकता प्राप्त मूल भारतीयों में से ज्यादातर ने कट्टर रिपब्लिकन पार्टी का समर्थन किया था पर उन्हें अब असल रंग समझ आ रहे हैं.

अमेरिका जा कर अपना भविष्य बनाने का सपना हर भारतीय युवा का होता है और मातापिता लाखों इस पर खर्च करते हैं. असल में इंजीनियरिंग व मैडिकल प्रवेश परीक्षाओं में जो मारामारी है वह इसी अमेरिकी नौकरी की वजह से है और यही नहीं मिली तो समझो कि पूरा भविष्य चौपट हो गया.

अब यह सपना टूट रहा है. न अमेरिका में नौकरियां मिलेंगी, न अमेरिकी कंपनियां भारतीय कंपनियों को काम के ठेके दे पाएंगी. एक तरह से दोनों को टाइट बकसों में रहना पड़ेगा. वैश्वीकरण के सपनों में अब क्रैक पड़ रहे हैं. ऊपर से भारत में अफ्रीकियों के साथ जो व्यवहार हो रहा है उस से अफ्रीका में मिलने वाली मोटे वेतन वाली नौकरियों पर आंच आने लगी है. सिंगापुर भी कुछ बंधन लगाने लगा है.

अगर ऐसे में देश में ही नौकरियों के अवसर न मिले तो बच्चों की पढ़ाई पर किया खर्च बेकार हो जाएगा और अच्छे मेधावी छात्रों को छोटी नौकरियों से संतोष करना होगा. भारत अमेरिका तो क्या न चीन बन पाएगा और यहां तक कि शायद वियतनाम जैसे देश से भी पिछड़ न जाए.

हिंदी मीडियम : कमजोर कहानी, उम्दा अभिनय

यूं तो ‘‘हिंदी मीडियम’’ एक रोमांटिक कामेडी फिल्म है. मगर इस फिल्म का मूल मकसद अपने ही देश में अंग्रेजी भाषा के सामने राष्ट्रभाषा व मातृभाषा हिंदी को कमतर आंकना तथा शिक्षा का जो व्यापारीकरण हो गया है, उस पर चोट करना है. मगर अफसोस की बात यही है कि इन दोनों ही मुद्दों पर यह फिल्म बुरी तरह से असफल रहती है. ऐसा कहानीकार व पटकथा लेखक की कमजोरी का परिणाम है. इन मुद्दों पर बहुत बेहतरीन फिल्म व दर्शकों के दिलों को छू लेने वाली फिल्म का निर्माण किया जा सकता था.

फिल्म में सब कुछ बहुत ही उपरी सतह पर तमाम कमियों के साथ कहने की कोशिश की गयी है. कहानी व पटकथा लिखते समय फिल्म के लेखक शायद अंदर ही अंदर डरे हुए थे अथवा विषयवस्तु के प्रति पूरी तरह से आश्वस्त नहीं थे. तभी तो फिल्म ‘हिंदी मीडियम’ में इस बात को उकेरा गया है कि एक सर्वश्रेष्ठ व उच्च कोटि के अंग्रेजी माध्यम के स्कूल में डोनेशन लेकर बच्चे को प्रवेश नहीं दिया जाता है. खुद को पाक साफ और ईमानदार बताने वाली स्कूल की प्रिंसिपल जब पिया का नाम गरीब कोटे से हटाकर जनरल कोटे में कर देती है, तब वह गरीब कोटे की खाली हुई इस सीट पर मोहन को प्रवेश न देकर क्या करना चाहती हैं, इस पर फिल्म कोई रोशनी नहीं डालती.

रोमांटिक कामेडी फिल्म ‘‘हिंदी मीडियम’’ की कहानी दिल्ली के चांदनी चौक में रहने वाले दंपति राज बत्रा (इरफान खान) और मीता (सबा करीम) के इर्द गिर्द घूमती है. राज बत्रा चांदनी चौक में कपड़े का व्यापारी है. पत्नी मीता के प्यार व अच्छा पति बनने के चक्कर में राज अपनी पत्नी मीता की इस बात को स्वीकार कर लेता है कि उन्हें अपनी बेटी पिया की शिक्षा दिल्ली में अंग्रेजी माध्यम के उच्च कोटि के स्कूल में करवानी हैं, न कि सरकारी स्कूल में. इसी के चलते वह चांदनी चौक छोड़कर वसंत विहार की पाश कालोनी में रहने पहुंच जाते हैं. वहां पड़ोसियों के बीच वह खुद को हाई फाई और अंग्रेजी के ज्ञाता के रूप में स्थापित करने का असफल प्रयास करते हैं. राज व मीता अपनी बेटी पिया को दिल्ली के अति सर्वश्रेष्ठ गिने जाने वले पांच स्कूलों में प्रवेश दिलाने के लिए एक कंसल्टेंट की मदद लेते हैं, जो कि इन्हे ट्रेनिंग देती है. कई तरह की मुसीबतें झेलने के बावजूद इनकी बेटी को प्रवेश नहीं मिल पाता है.

तभी इन्हें पता चलता है कि अपने पसंदीदा स्कूल में बेटी को प्रवेश दिलाने के लिए उन्हे ‘राइट टू एज्यूकेशन’ के तहत हर स्कूल में तय पच्चीस प्रतिशत गरीओं के कोटे का सहारा लेना चाहिए. इसके लिए राज एक इंसान से मिलकर सारे गलत कागज बनवाता है. जांच होने पर पकडे़ न जाने के लिए एक माह के लिए एक गरीब बस्ती में पूरे परिवार के साथ जाकर रहना शुरू करते हैं. जहां उनका पड़ोसी श्याम प्रकाश (दीपक डोबरियाल), उसकी पत्नी व बेटा मोहन रह रहा है. मोहन व पिया के बीच अच्छी दोस्ती हो जाती है. श्याम प्रकाश अपनी तरफ से राज की मदद करने का पूरा प्रयास करता है.

जब 24 हजार जमा करने का वक्त आता है, तो श्याम प्रकाश खुद की जिंदगी खतरे में डालकर राज को पैसा देता है. पर जब गरीब कोटे की लाटरी निकलती है, तो मोहन को स्कूल में प्रवेश नहीं मिलता है, पर पिया को मिल जाता है. फिर राज व मीता अपनी बेटी पिया के साथ वापस अपने पाश मकान में रहने चले जाते हैं. मगर अपराध बोध से ग्रसित राज एक सरकारी स्कूल को पैसे देकर उसके हालात सुधारते हैं. मगर एक वक्त वह आता है, जब राज अपनी बेटी पिया को उसी अंग्रेजी स्कूल से निकाल कर मोहन के साथ सरकारी स्कूल में प्रवेश दिला देते हैं.

फिल्म का गीत संगीत अति साधारण है. फिल्म की लोकेशन व कैमरामैन के काम की प्रशंसा की जा सकती है.

इरफान खान, सबा करीम और दीपक डोबरियाल के बेहतरीन अभिनय के बावजूद यह फिल्म अपनी छाप छोड़ने में असफल रहती है. फिल्म में जिस करोड़पति और हाई फाई सोसायटी की बात की गयी है, उससे आम दर्शक रिलेट नहीं कर सकता. फिल्म की कहानी जिस तरह से आगे बढ़ती है, वह कहीं से भी सहज व स्वाभाविक नहीं लगती. बल्कि शुरू से अंत तक सब कुछ अति बनावटी ही लगता है. इंटरवल के बाद फिल्म पूरी तरह से पटरी पर से उतर जाती है. फिल्म के क्लायमेक्स से चंद मिनट पहले हिंदी भाषा को लेकर राज बत्रा यानी कि इरफान का लंबा चौड़ा भाषण है, मगर उस सभाग्रह में मौजूद माता पिता पर कोई असर न होना बड़ा अजीब सा लगता है. स्कूल में बच्चे को प्रवेश दिलाने में सरकारी तंत्र के अलावा स्कूल मैनेजमेंट की जो भूमिका होती है, जिस तरह के नाटक होते हैं, उस पर भी रोशनी डालने से लेखक व निर्देशक ने बचने का पूरा प्रयास किया है. जबकि सर्वविदित है कि हर स्कूल व कालेज में मैनेजमेंट कोटा, माइनारिटी कोटा आदि के नाम पर क्या खेल होता है. मगर फिल्मकार ने इन सारे पहलुओं को अनदेखा कर दिया. ऐसा करने के पीछे फिल्मकार की मंशा, फिल्मकार ही जाने. फिल्म का क्लायमेक्स बहुत घटिया है. फिल्म में संजय सूरी और नेहा धूपिया जैसे कलाकारों को जाया किया गया है.

फिल्म में बात बात पर मीता अपने पति राज से कहती है कि फिर उनकी बेटी पिया सरकारी स्कूल में पढ़ेगी, फिर वह ड्रग्स लेगी..वगैरह..यह संवाद पूर्णरूपेण गलत है. ड्रग्स का सेवन या ड्रथ्स के व्यापार को हिंदी भाषा की शिक्षा के साथ जोड़कर देखना अपराध ही कहा जाना चाहिए. क्या अंग्रेजी माध्यम से उच्च शिक्षा हासिल करने वाले लोग ड्रग्स या शराब में लिप्त नहीं हैं?

शिक्षा के बाजारीकरण, अंग्रेजी माध्यम के स्कूल में अपने बच्चे को पढ़ाने के मुद्दे व इसकी परेशानी से देश के हर शहर का आम इंसान जूझ रहा है. हर माता पिता अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों की बजाय अंग्रेजी माध्यम के स्कूल में पढ़ाना चाहते हैं. मगर इन आम लोगों की इस इच्छा के चलते इन्हे जिस तरह रोजमर्रा की जिंदगी में समस्याओं से जूझना पड़ता है, डोनेशन ने जो विकराल रूप ले रखा है, उस पर यह फिल्म चुप्पी साध लेती है. इसके क्या मायने निकाले जाएं?

हकीकत में पटकथा लेखक द्वय व निर्देशक ने फिल्म में इतनी बड़ी बड़ी गलतियां की हैं कि उन्हें गिनाने में कई पन्ने भर जाएंगे. पूरे माह गरीब की जिंदगी जीने वाले राज के कपड़े के व्यापार का क्या हुआ? फेसबुक पर राज व मीता की प्रोफाइल चेक कर सच का पता लगाने की बजाय स्कूल की प्रिंसिपल एक इंसान को गरीब बस्ती में राज से मिलने भेजती हैं..वगैरह..वगैरह कई गलतियां है.

दो घंटे 12 मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘हिंदी मीडियम’’ का निर्माण भूषण कुमार व दिनेश वीजन, निर्देशन साकेत चौधरी, कहानी व पटकथा लेखकद्वय जीनत लखानी व साकेत चौधरी, संगीतकार सचिन जिगर, पार्श्वसंगीतकार अमर मोहिले तथा फिल्म को अभिनय से संवारने वाले कलाकार हैं – इरफान खान, सबा करीम, दीपक डोबरियाल, स्वाती दास, दिशिता सहगल, डेलजाद हिवाले, जसपाल शर्मा, विजय कुमार डोगरा, रोहित तन्नन व अन्य.

मेट्रो के दरवाजे में फंस गया युवक का प्राइवेट पार्ट, और फिर..

मेट्रो में भीड़ को काबू करने और उन्हें सुविधा देने के लिए बनाई जा रही योजनाएं विफल साबित हो रही हैं. इस वीडियो में आप देखेंगे की मेट्रो ट्रेन में कितने सारे लोग ठूंस ठूंस कर भरे हैं, पर एक आदमी के साथ जो हुआ, वो बहुत मजाकिया है. समय रहते एक आदमी ने उसे बचा लिया, वरना इस हादसे में कुछ भी हो सकता था.

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नस्ली भेदभाव आखिर कब तक चलता रहेगा

भारत में विदेशियों का रहना मुश्किल होता जा रहा है. चाहे पश्चिमी देशों के गोरे हों या अफ्रीका के काले, हमारा रंग भेद इतना ज्यादा गहरा गया है कि किसी को नहीं बख्शा जा रहा. अकेली पर्यटन पर आई गोरी युवतियों को तो यहां गाइड, टैक्सी ड्राइवर, होटलों के कर्मचारी हरदम बिस्तर पर बिछने को तैयार मानते हैं और उन के नानुकर करने पर बलात्कार कर मार तक डालते हैं. कितनों का ही गैंगरेप किया जाता है.

अभी दिल्ली के निकट नोएडा में रह रहे कई सौ अफ्रीकी छात्रों के साथ बुरी तरह मारपीट की गई. आरोप वैसा ही था जैसा मुसलिम पर गौमांस रखने पर लगाया जाता है. कहा गया कि अफ्रीकियों ने एक स्थानीय युवक को नशे की आदत डाल दी और वह मर गया. इस पर सैकड़ों की भीड़ ने कालों पर हमले शुरू कर दिए. कभी मौल में तो कभी घरों के आसपास. एक युवती को टैक्सी में से घसीट कर बुरी तरह मारा.

नोएडा तो छोडि़ए जो उत्तर प्रदेश में आता है, दिल्ली में भी अफ्रीकियों को रंग की वजह से छेड़ा जाता है. अफ्रीकी दब्बू नहीं होते और प्रतिकार करते हैं तो भीड़ जमा कर ली जाती है. कई बस्तियों में इस तरह के कांड हो चुके हैं. आम आदमी पार्टी के एक मंत्री की एक बार अच्छी मुठभेड़ हुई और उन्होंने सभी अफ्रीकियों को किसी न किसी तरह का अपराधी घोषित कर दिया.

यह रंग भेद हमारी जाति, वर्ण भेद की उपज है. जाति हमारी रगों में इस बुरी तरह भरी है कि हर दूसरा व्यक्ति हमें या तो मजाक का पात्र लगता है या दुश्मन. रंग के कारण हमारे यहां की सांवली युवतियां अपनी पूरी जिंदगी मरमर कर बिता देती हैं. काले युवकों का भी यही हाल होता है. अफ्रीकियों को तो नीचा इसीलिए समझा जाता है कि उन का रंग हमारे गांवों के दलित मजदूरों का सा होता है.

दूसरी तरफ गोरे को हर कोई कच्चा चबा लेना चाहता है. गोरी युवतियों का चाहे देशी ही हों, घर से बाहर निकलना दूभर रहता है. उन की शादी तो आसानी से हो जाती है पर वे हर समय भयभीत रहती हैं कि कब, कौन आक्रमण कर दे.

हमारे समाज ने युवतियों और दूसरों को इज्जत से रखने का पाठ कभी नहीं पढ़ाया. हर कोई तानों व मजाक का निशाना रहता है. पहले मदरासी व बंगाली का मजाक उड़ता था. सरदारों पर बने चुटकुलों पर कोई सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया.

अपने से अलग तरह के लोगों को न मिलाने की वजह से ही हमारी कुंडली मिला कर विवाह करने की आदत है जिस से हमें विविधता का ज्ञान ही नहीं होता. हमें अपने से अलग लोगों से मिलजुल कर रहने की आदत ही नहीं पड़ती. ‘क्वीन’ फिल्म में नायिका को एक अफ्रीकी, एक गोरे और एक पूर्व एशियाई के साथ कुछ दिन मौज उड़ाते दिखाया गया था पर यह हमारे जीवन का हिस्सा नहीं है.

नोएडा और दिल्ली में जो हो रहा है उस से अफ्रीका में भारत की छवि बहुत खराब हुई है. अफ्रीका प्रगति की दौड़ में खासा तेज है और किसी रोज कुछ देश एशिया को मात देने लगें तो आश्चर्य नहीं है. अफ्रीका के कितने ही देशों की प्रति व्यक्ति आय भारतीय प्रति व्यक्ति आय से बेहतर है. उन से पंगा लेना हमें बहुत महंगा पड़ेगा.

पटवारी की दुधारी तलवार से बच कर रहना

‘साहब, मैं कभी पाकिस्तान तो क्या, प्रदेश के किसी दूसरे जिले में भी नहीं गया. जैसेतैसे कर के मैं अपने परिवार की गाड़ी खींच रहा हूं.’’ हाथ बांधे सुलेमान बाड़मेर के तत्कालीन एसडीएम की अदालत में गिड़गिड़ा रहा था. यह सन 1975 के शुरुआती दिनों की बात है.

‘‘सुलेमान, तुम्हारे इलाके के पटवारी ने रिपोर्ट दी है कि तुम कुछ दिनों पहले अनाधिकृत रूप से पाकिस्तान भाग गए थे. इसलिए तुम्हारी पुश्तैनी कृषि भूमि को राजस्थान टीनेंसी एक्ट के तहत जब्त किए जाने की काररवाई विचाराधीन है.’’ उपखंड अधिकारी ने कहा.

सुलेमान फिर गिड़गिड़ाया, ‘‘साहब, पाकिस्तान भाग जाने का आरोप झूठा है. हां, उन दिनों मैं रोजीरोटी के लिए परिवार के साथ कहीं दूसरी जगह जरूर चला गया था. पटवारीजी ने मेरे बारे में झूठी रिपोर्ट दी है. गरीब होने के कारण मैं उन की सेवा नहीं कर सकता. इसीलिए उन्होंने नाराज हो कर झूठ लिख दिया है.’’

एसडीएम सुलेमान की फाइल फिर से पलटने लगे. तहसीलदार के निर्णय के खिलाफ सुलेमान ने एसडीएम की अदालत में अपील की थी. आखिरकार एसडीएम ने सुलेमान की गैरहाजिरी में उस की 24 बीघा कृषि भूमि को जब्त कर सरकारी घोषित कर दिया था. तारीख पेशी की जानकारी नहीं होने के कारण सुलेमान उस दिन अदालत में नहीं था.

सुलेमान को जब यह जानकारी मिली तो उसे बड़ा धक्का लगा. उस ने अपनी व्यथा अपने पड़ोसी चौथमल को बताई. चौथमल उस के साथ हुई नाइंसाफी से द्रवित हो उठा. उस ने सुलेमान को राजस्थान हाईकोर्ट जाने की सलाह दी. इतना ही नहीं, वह सुलेमान के साथ जोधपुर स्थित हाईकोर्ट गया और एसडीएम के आदेश के खिलाफ हाईकोर्ट की सिंगल बेंच में अपील दायर कर दी. वहां भी कई सालों तक केस चला.

अंत में वहां का फैसला भी सुलेमान के पक्ष में नहीं आया. इस के बाद चौथमल ने हाईकोर्ट की ही डबल बेंच में अपील दाखिल करा दी.

पिछले महीने खंडपीठ के माननीय न्यायाधीश गोविंद माथुर और एस.पी. शर्मा ने सिंगल बेंच के आदेश को निरस्त करते हुए आदेश दिया कि किसी नागरिक के देश में किसी अन्य क्षेत्र में चले जाने से उस के खिलाफ टीनेंसी एक्ट की काररवाई अनुचित है. आदेश सुनते ही सुलेमान की आंखों में खुशी के आंसू छलक आए.

राजस्व विभाग के अंतिम छोर के प्यादे ‘पटवारी’ की गलत रिपोर्ट के कारण गरीब सुलेमान 40 सालों तक अदालतों के धक्के खाता रहा. यह तो पटवारी के क्रियाकलापों की बानगी मात्र है, लेकिन राजस्थान के ही हनुमानगढ़ के पटवारी ने अधिकारियों व अन्य लोगों से सांठगांठ कर के फरजीवाड़े का जो खेल खेला, सुन कर आप जरूर चौंक जाएंगे.

देहातों में आज भी बरसों पुरानी एक लोकोक्ति प्रचलित है, ‘ऊपर करतार, नीचे पटवार’. यहां पटवार का मतलब पटवारी यानी लेखपाल से है. लेखपाल राजस्व महकमे का प्यादा होता है. ब्रिटिश हुकूमत काल में कृषि संबंधी लेखाजोखा व लगान वसूली अमीन करता था, जो पटवारी का ही पर्याय होता था. तहसील के मामलों में पटवारी की जांच आख्या को महत्त्वपूर्ण माना जाता है. अपने स्वार्थ की वजह से कुछ पटवारी अपनी कलम से स्याह को सफेद और सफेद को स्याह करने से नहीं चूकते.

 

राजस्थान प्रदेश का एक जिला है हनुमानगढ़. इसी जिले की पीलीबंगा तहसील का गांव है पड़ोपल बारानी. 10-12 हजार की आबादी वाले इस गांव की कृषि भूमि किलाबंदी के अभाव में आज भी खसरों में समाहित है. इस क्षेत्र में कभी घग्घर नदी का बहाव था, जिस से क्षेत्र की लाल व दोमट मिट्टी बारानी होने के बावजूद बहुत उपजाऊ है. इसी कारण यहां की कृषि भूमि जिले के और क्षेत्रों की अपेक्षा कुछ महंगी है.

सन 2012 के आसपास का वाकया है. इस क्षेत्र में पटवारी संजीव मलिक की नियुक्ति हुई. कहा जाता है कि अनुकंपा के आधार पर नौकरी पाने वाले संजीव की पहुंच राष्ट्रीय स्तर की एक राजनीतिक पार्टी के आला पदाधिकारियों तक थी. शातिरदिमाग संजीव मलिक की ऊंची महत्त्वाकांक्षाएं थीं. अपने क्षेत्र की सरकारी भूमि खाली देख कर उस की आंखें चमक उठीं. वह भूमि उसे सोने का अंडा देने वाली मुरगी नजर आ रही थी.

पर वह सोने के अंडे देने वाली मुरगी उसे उच्चाधिकारियों के सहयोग के बिना मिलनी असंभव थी. इस बेशकीमती कृषि भूमि के सहारे उस ने करोड़पति बनने का सपना संजो लिया था. इस के लिए उस ने दिमागी घोड़े दौड़ाने शुरू कर दिए.

अधिकारियों से संबंध बनाने के लिए उस ने अपने घर पर एक पार्टी का आयोजन किया, जिस में कानूनगो से ले कर एसडीएम तक को आमंत्रित किया. कुल मिला कर 15 मेहमान जुटे.

भोज छोटा था, पर मकसद बहुत ऊंचा था. शाही दावत के रूप में आयोजित इस भोज में संजीव ने शराब और कबाब की भी व्यवस्था की थी. सभी मेहमानों ने इस भोज की जी खोल कर प्रशंसा की.

 

दावत खाने के बाद विदा होते समय एक अधिकारी ने संजीव का हाथ अपने हाथ में लेते हुए कहा, ‘‘भई मान गए संजीव, तुम्हारी जिंदादिली को. तुम्हारा प्रोग्राम बहुत अच्छा रहा. सचमुच मजा आ गया.’’

‘‘साहब, यह आप की ही कृपा का फल है और उम्मीद है कि इस नाचीज पर भविष्य में भी आप की कृपा बनी रहेगी.’’ उचित अवसर देख कर संजीव ने साहब का हाथ दबाते हुए दिल की मंशा जाहिर कर दी.

‘‘हां..हां… क्यों नहीं, कल सुबह औफिस में आ जाना. बैठ कर बातें करेंगे.’’ अधिकारी ने कहा.

संजीव का फेंका गया दूसरा पांसा भी सटीक पड़ा था. अगले दिन संजीव अपने अधिकारी के औफिस चला गया. दोनों में आधे घंटे तक गुफ्तगू होती रही. संजीव ने अपनी सोच जाहिर की तो साहब ने उस पर अपनी मौन स्वीकृति दे दी. पटवारी संजीव की भावी योजना में साहब की सीधे कोई भूमिका नहीं थी. केवल उन्हें चुप रहते हुए अपनी आंखें बंद रखनी थीं.

इस के बाद पटवारी संजीव ने अधिकारियों से सांठगांठ कर फरजी तरीके से भू आवंटन करना शुरू कर दिया. जो कोई उस का विरोध करता, वह मोटे गिफ्ट दे कर उस का मुंह बंद कर देता.

राजस्व विभाग में कामयाबी मिलने के बाद संजीव मलिक ने अगला कदम बैंकिंग प्रबंधन में पैठ बढ़ाने के लिए उठाया. शातिर संजीव ने एकदो व्यापारी मित्रों के सहयोग से इलाके के बैंक मैनेजरों को पटा लिया. वर्तमान में देश के सभी राष्ट्रीयकृत व सहकारी बैंक किसानों को उन की जोत वाली कृषि भूमि पर ऋण उपलब्ध करवा रहे हैं. हर बैंक का कृषक ऋण का कोटा निश्चित होता है. इसी का फायदा संजीव ने उठाया.

संजीव की सांठगांठ से बैंककर्मियों को दोहरा लाभ हो रहा था. एक तो उन का ऋण आवंटन का कोटा सहजता से पूरा हो रहा था, ऊपर से जेब भी गरम हो रही थी. जिस खेती की जमीन पर बैंक लोन देती थी, बैंककर्मी उस का सत्यापन बैंक में बैठेबैठे ही पूरा कर के रिपोर्ट लगा देते थे.

 

संजीव मलिक ने शुरू में अपने खासमखास छुटभैया नेता ओमप्रकाश व उस के भाई के सहयोग से भरोसेमंद ग्राहकों को फांसा. बाद में उस के नेटवर्क में अन्य क्षेत्रीय राजनेता भी जुड़ गए. संजीव ने ओमप्रकाश व उस के भाई के नाम 56 बीघा कृषि भूमि इंद्राज कर के उन्हें खातेदार घोषित किया. इतना ही नहीं, दोनों ही भाइयों के नाम से 10 लाख 29 हजार रुपए व साढ़े 8 लाख रुपए का कृषि ऋण भी एक बैंक से दिला दिया.

इसी प्रकार खसरा नंबर 1236 में मात्र 2 बिस्वा (1 बीघा का दसवां हिस्सा) रकबा राजकीय दर्ज था. पर लेखपाल से मिलीभगत कर इस खसरा में 40 बीघा रकबा दर्ज दिखा कर दोनों भाइयों के नाम 20-20 बीघा खातेदारी घोषित कर दी गई.

राजस्थान में प्रदेश सरकार राजस्व विभाग की सहायता से समयसमय पर जायज भूमिहीन कृषकों को भूमि आवंटन व निर्धारित दर से भूमि विक्रय करती है. भू आवंटन हेतु एसडीएम की अध्यक्षता में गठित कमेटी भू आवंटन करती है. क्षेत्र के भू अभिलेख निरीक्षक (कानूनगो), हलका पटवारी से संबंधित भूमि व कृषक की रिपोर्ट से संतुष्ट होने पर एसडीएम किसान को भू आवंटन करता है.

इस आवंटन का इंद्राज पटवार परत व सरकार परत में इंतकाल के रूप में दर्ज किया जाता है. इंतकाल की प्रक्रिया पूरी होने के साथ किसान भूमि का मालिकाना हक पा जाता है. पटवार परत जिसे आम बोलचाल में बही कहते हैं, वह पटवारी के पास तहसील कार्यालय में रहती है.

 

पटवारी के चोले में छिपा संजीव मलिक अब भू माफिया बन चुका था. अपेक्षित स्तर पर मिल रहे सहयोग के बल पर वह फरजी भू आवंटन से बेशुमार दौलत कमा रहा था. सन 2015 के अगस्त माह का वाकया है. क्षेत्र का एक किसान हेतराम संजीव मलिक से मिला. उस ने गिड़गिड़ाते हुए कहा, ‘‘पटवारीजी, गरीब आदमी हूं. मुझे भी एक मुरब्बा खातेदारी अलाट करवा दो.’’

‘‘देखो हेतराम, एक मुरब्बा का रेट 7 लाख है. तुम गरीब आदमी हो, इसलिए तुम्हारे 5 लाख लगेंगे. पैसे ले आओ, तुम्हारा काम कर दूंगा.’’

‘‘साहब, 5 लाख तो दूर, मेरे पास तो एक लाख भी नहीं हैं.’’

‘‘देखो हेतराम, पैसे ऊपर तक देने पड़ते हैं. तुम जैसे भी हो, पैसों की व्यवस्था कर लो. बाद में तुम्हें बैंक से केसीसी दिला दूंगा. इस से तुम्हारी जेब में 2-3 लाख ज्यादा आ जाएंगे.’’ संजीव ने कहा.

हेतराम ने जैसेतैसे कर मोटे ब्याज पर रुपए ले कर पटवारी को सौंप दिए. एक पखवाड़े में ही हेतराम एक मुरब्बा कृषि भूमि का मालिक बन गया. पटवारी संजीव मलिक ने हेतराम को उसी जमीन पर 8 लाख रुपए का लोन भी दिलवा दिया था. उस में से उस ने अपने हिस्से के 5 लाख रुपए ले लिए.

समय गुजरता रहा और पटवारी के ग्राहकों की संख्या बढ़ती रही. सूची में क्षेत्र के लोगों के अलावा एकचौथाई कृषक खातेदारी अधिकारों से वंचित हैं. ऐसे कृषकों को बैंकों के कृषि लोन या अन्य योजनाओं का लाभ नहीं मिल पाता था.

 

जब उन लोगों को पता चला कि पटवारी संजीव जरूरतमंद व्यक्तियों के बजाए अन्य लोगों को लाभ पहुंचा रहा है तो उन्होंने खातेदारी अधिकार के लिए आंदोलन शुरू कर दिया. अप्रैल, 2016 के दूसरे पखवाड़े में शुरू हुए इस आंदोलन में किसानों ने खातेदारी के साथसाथ पटवारी संजीव के कारनामे की जांच व तबादले की मांग भी जोड़ दी.

आंदोलन उग्र होता, इस से पहले ही जिला प्रशासन हरकत में आ गया. तत्कालीन जिलाधिकारी रामनिवास ने इस पूरे मामले की जांच मोहर के एडीएम सुखवीर सिंह चौधरी को सौंप दी. एडीएम ने व्यापक स्तर पर हुए भू घोटाले की जांच हेतु 2 जांच टीमें गठित कीं. पहली टीम में इंसपेक्टर राम सिंह मंद्रा के साथ पटवारी जसवंत सिंह, विनोद कुमार तथा दूसरी में इंसपेक्टर देवीलाल धिंपा के साथ हंसराज व राजकुमार को शामिल किया गया.

जांच टीमों ने सन 2005 से ले कर 2015 तक के तमाम खातों व जमा बंदियों की जांच की. जांच के दौरान पता चला कि आवंटित खसरों में अनुचित रूप से कांटछांट कर अन्य किसानों के नाम जोड़ दिए गए थे. फरजी स्तर पर खातेदारी अधिकार रेवडि़यों की तरह बांटे गए थे.

एडीएम सुखवीर सिंह ने बारीकी से जांच कर 40 पेज की रिपोर्ट तैयार कर के जिलाधिकारी के सामने प्रस्तुत की. रिपोर्ट के अनुसार, पटवारी व अन्य ने अनधिकृत रूप से 41 खाते जोड़े थे. कंप्यूटराइज जमा बंदियों में संविदाकर्मी उमाराम व संजीव मलिक के फरजीवाड़े को इंसपेक्टर उमाराम द्वारा आंखें मूंद कर तसदीक किए जाने का उल्लेख रिपोर्ट में था.

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि सन 1998 से ले कर 2001 तक की पटवार परत/सरकार परत कार्यालय में नहीं मिली. रकबा उपलब्ध नहीं होने के बावजूद फरजी ढंग से पटवार परत में कांटछांट व ओवरराइटिंग कर के किसानों को भू आवंटन किया गया.

 

जिलाधिकारी ने जांच रिपोर्ट के आधार पर तहसीलदार पीलीबंगा को 9 कर्मचारियों व 67 लाभान्वितों के खिलाफ आपराधिक मुकदमा दर्ज करवाने के आदेश दिए. इन में 5 महिलाएं भी थीं. इस जांच रिपोर्ट में पीलीबंगा के तत्कालीन उपखंड अधिकारी व तहसीलदार की भूमिका पर कोई टिप्पणी नहीं की गई थी.

पीलीबंगा के तत्कालीन तहसीलदार बसंत सिंह ने 23 अप्रैल, 2016 को थाने में भू अभिलेख निरीक्षक (कानूनगो) बनवारीलाल, जगदीश बैन, बृजलाल शर्मा, मदनलाल, उमाराम व 4 पटवारियों संजीव, वेदप्रकाश, रामचंद्र व ओमप्रकाश ताखर सहित 76 लोगों के विरुद्ध भांदंवि की धारा 420, 409, 467, 468, 471, 167 व 120बी के तहत रिपोर्ट दर्ज करा दी.

एक आरोपी महिला कृषक चंद्रावली जाट जो एक क्षेत्रीय नेताजी की मां है, को 8 खसरों में लगभग 65 बीघा रकबा आवंटित किया गया था. इस रकबे पर लाखों रुपए का कृषि लोन भी लिया गया था.

 

मुकदमा दर्ज होते ही राजस्व विभाग ने पटवारी संजीव मलिक को अपदस्थ कर दिया था. पर संजीव मलिक राजस्थान उच्च न्यायालय में राजनीतिक द्वेष का हवाला दे कर राहत पाने में सफल हो गया. मुकदमा दर्ज होते ही नामजद लोगों की नींद उड़ गई. संजीव मलिक के कृत्य से आहत किसानों ने अप्रैल में ही उच्च न्यायालय की शरण ली.

माननीय उच्च न्यायालय ने सुनवाई के बाद अक्तूबर, 2016 में जांच अधिकारी सीओ पीलीबंगा को तलब कर लिया. उच्च न्यायालय के दखल के बाद धीमी गति से चल रही पुलिस जांच में तेजी आ गई. सीओ विजय मीणा के निर्देश पर एएसआई हंसराज, हैडकांस्टेबल लिघमन, सुरेंद्र, अमीलाल व बलतेज सिंह ने नामजद पटवारी संजीव मलिक व उमाराम गिरदावर को उन के निवास स्थान से 3 दिसंबर, 2016 को गिरफ्तार कर लिया.

10 दिसंबर को इसी टीम ने पटवारी के सहायक श्रीचंद मेघवाल व संविदाकर्मी उदाराम को भी गिरफ्तार कर लिया. गिरफ्तार आरोपियों से व्यापक पूछताछ के बाद न्यायालय में पेश कर न्यायिक अभिरक्षा में भिजवा दिया गया.

 

पटवारी संजीव मलिक ने जिला मुख्यालय के नजदीक स्थित पौश इलाके ड्रीमलैंड सोसाइटी में एक भव्य बंगला बनवाया था. कहा जाता है कि उस के बंगले पर लग्जरी गाडि़यों का आनाजाना लगा रहता था. यह भी कहा जाता है कि बीसियों लाख रुपयों से बने उस के बाथरूम तक में एसी लगे हुए थे. कृषि भूमि आवंटन के फ्रौड में करोड़ों बनाने वाला साईं भक्त संजीव मलिक अपने 3 साथियों के साथ जेल में बंद है.

हजारों बीघा कृषि भूमि के फरजी आवंटन के इस सिलसिले में कमाए गए लाखों रुपयों की बंदरबांट ऊपर से नीचे तक हुई है. कई राजनेताओं पर भी आरोप लग रहे हैं. पूर्व में जिलाधिकारी हनुमानगढ़ ने सभी आवंटन रद्द करने के आदेश जारी किए थे.

पुलिस जांच मात्र राजस्व विभाग के निचले पायदान के कार्मिकों व नामजद किसानों के इर्दगिर्द घूम रही है. विभाग के आला अधिकारी अभी भी जांच से कोसों दूर हैं. जांच उन बैंककर्मियों की भी होनी चाहिए, जिन्होंने फरजी कागजातों के आधार पर खुले हाथों से लाखों के कृषि लोन मंजूर कर बंदरबांट की. पीडि़त किसानों ने राज्य सरकार से इस महाघोटाले की जांच सीबीआई से कराने की मांग की है.      ?

– कथा राजस्व व पुलिस सूत्रों के आधार पर

कर सकती हूं आइटम डांस : माही सिंह

उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले की रहने वाली माही सिंह ने 4 साल पहले अपने ऐक्टिंग कैरियर की शुरुआत भोजपुरी फिल्म ‘बलमा बिहार वाला’ से की थी. इस के बाद उन्होंने एक के बाद एक कई कामयाब फिल्में कीं. इन में ‘साजन चले ससुराल’,‘जिद्दी’, ‘दहशत’ और ‘जंग सियासत की’ खास हैं.

मुंबई में रह कर अपने कैरियर को आगे बढ़ा रही माही सिंह कहती हैं, ‘‘कम समय में अपनी मेहनत से मैं ने जो मुकाम हासिल किया है, उस से मैं संतुष्ट हूं. आने वाले समय में मैं केवल भोजपुरी फिल्मों में ही नहीं, बल्कि हिंदी फिल्मों में भी ऐक्टिंग करना चाहती हूं. अभी मैं ने कोई आइटम डांस नहीं किया है. मुझे डांस आता है. अगर मुझे अच्छा मौका मिला, तो मैं आइटम डांस भी कर सकती हूं.

‘‘अभी मुझे बड़े रोल कम मिले हैं. मैं लीड रोल में काम कर के खुद को साबित करना चाहती हूं.’’

कुछ नया करना चाहती हैं एकता बहल

पंजाब की रहने वाली और दिल्ली में पलीबढ़ी एकता बहल देखने में किसी हीरोइन से कम नहीं लगती हैं, पर वे ऐक्टिंग की जगह फिल्म प्रोड्यूस करने में अपना कैरियर बना रही हैं. फिल्म बनाने के क्षेत्र में ‘एक रजाई तीन लुगाई’ उन की पहली फिल्म है. इस फिल्म में हीरो यश कुमार, दीया सिंह, अनु उपाध्याय और शुभ्रा घोष हीरोइन के रूप में हैं. इस फिल्म में आशुतोष खरे ने खलनायक की भूमिका अदा की है.

इस बारे में एकता बहल कहती हैं, ‘‘हमारे परिवार में सभी लोग बिजनैस करते हैं. ऐसे में हम फिल्म लाइन में ऐक्टिंग करने नहीं, बल्कि फिल्म बनाने आए हैं. यहां मुझे विजय खरे का साथ मिला, जो भोजपुरी फिल्मों को 40 साल दे चुके हैं. वे 3 सौ से ज्यादा फिल्में कर चुके हैं.

‘‘हमारी फिल्म के डायरैक्टर मंजुल ठाकुर भी बहुत काबिल हैं. हम सब मिल कर दर्शकों को कुछ नया दिखाना चाहते हैं. यह कौमेडी, ऐक्शन और मनोरंजन से भरपूर फैमिली फिल्म है.’’

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