जयपुर के आमेर किले को बड़े कौतूहल से निहारने के बाद मार्था जंतरमंतर के 2 चक्कर लगा चुकी थी. उसे सब कुछ अच्छा तो लगा था, लेकिन कालचक्र की गणना करने वाले यंत्रों में उस की कोई दिलचस्पी नहीं थी. हालांकि उस के दूसरे साथी, पुछल्ले की तरह चिपके हुए गाइड की बातें बड़े गौर से सुन रहे थे. अलबत्ता अखरती धूप अब चुभने लगी थी, जिसे वे लोग हथेलियों से ढांपने की असफल कोशिश कर रहे थे.

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