‘स्पैशल 26’ की तर्ज पर ठगी करने वाला गिरोह

अब से करीब 4 साल पहले बौलीवुड की एक फिल्म रिलीज हुई थी ‘स्पैशल 26’. नीरज पांडे द्वारा निर्देशित इस फिल्म की स्टोरी समाज में घट रही घटनाओं को छूती हुई थी. अभिनेता अक्षय कुमार (अजय सिंह), अनुपम खेर (पी.के. शर्मा), किशोर कदम (इकबाल), राजेश शर्मा (जोगिंदर) आदि का एक गैंग था. यह गैंग फरजी सीबीआई अधिकारी बन कर लोगों के यहां रेड डालता था और वहां से माल ले कर फुर्र हो जाता था. इस गैंग ने असली पुलिस की नींद हराम कर रखी थी.

स्पैशल 26 की तरह दिल्ली में भी नकली पुलिस वालों ने एक के बाद एक वारदातें कर के दिल्ली पुलिस की नाक में दम कर दिया था. दिल्ली में यह नकली पुलिस वाले कहीं रेड वगैरह तो नहीं डालते थे, पर सड़क चलते लोगों को ये इतनी आसानी से ठग लेते थे कि उन्हें ठगी का अहसास घर पहुंचने के बाद होता था. पिछले एक साल में फरजी पुलिस वालों का यह गैंग करीब 70-80 वारदातों को अंजाम दे चुका था. सभी वारदातों में ठगी का तरीका एक जैसा था.

5 मार्च, 2017 की बात है. शक्ति नागपाल विवेक विहार स्थित अपने घर से निकली और मेनरोड से रिक्शा पकड़ कर मैट्रो स्टेशन जा रही थी. वह अभी कुछ दूर ही गई थी कि उस के पास एक मोटरसाइकिल आ कर रुकी. उस पर 2 युवक सवार थे. उन की कदकाठी ठीकठाक थी. उन्होंने रिक्शा रुकवाते हुए शक्ति नागपाल से कहा, ‘‘हम दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच से हैं, आप को पता नहीं है कि कल यहां एक औरत की ज्वैलरी लूट ली गई थी. आप इस तरह ज्वैलरी पहन कर जाती हैं. और अगर आप के साथ कोई घटना हो जाती है तो परेशान पुलिस होगी.’’

यह सुन कर शक्ति नागपाल घबरा कर अंगुली में पहनी हीरे की अंगूठी और कलाई में पहनी सोने की चूडि़यों को देखने लगी. वह बोली, ‘‘मुझे तो बस यहीं कड़कड़डूमा मैट्रो स्टेशन तक जाना है.’’

‘‘देखिए मैडम, आप को जहां भी जाना है जाइए, लेकिन उस के पहले हिफाजत जरूरी है.’’ कह कर उस युवक ने सफेद रंग का एक कोरा कागज बैग से निकाल कर कहा, ‘‘आप अपनी सारी ज्वैलरी इस कागज पर रख दीजिए. इस में ज्वैलरी ले जाना आप के लिए सेफ रहेगा.’’

इस के बाद शक्ति नागपाल ने हाथों से सोने की चूडि़यां और हीरे की अंगूठी निकाल कर उस कागज पर रख दिया. वह व्यक्ति उस ज्वैलरी को कागज में लपेटते हुए उस से बात करने लगा. एकडेढ़ मिनट बाद उस ने कागज में लपेटी ज्वैलरी शक्ति नागपाल को देते हुए कहा, ‘‘मैडम, इस तरह से ज्वैलरी पहन कर मत निकला करो. आजकल जमाना बहुत खराब है. लो, अब इसे अपने पर्स में रख लो.’’

शक्ति नागपाल ने झट से कागज में लिपटी ज्वैलरी अपने पर्स में रखते हुए रिक्शे वाले से कहा, ‘‘चलो भैया, जल्दी चलो. देर हो रही है.’’

रिक्शा के आगे बढ़ते ही मोटरसाइकिल सवार युवक भी वहां से चले गए. शक्ति नागपाल उन पुलिस वालों का बारबार शुक्रिया अदा कर रही थी कि उन्होंने सही सलाह दी. साथ ही उस ने तय कर लिया कि अब वह हर समय आर्टिफिशियल ज्वैलरी ही पहना करेगी. असली ज्वैलरी का उपयोग किसी खास अवसर पर ही करेगी.

कड़कड़डूमा मैट्रो स्टेशन के पास पहुंच कर रिक्शे वाले को पैसे देने के बाद उस का मन अपनी ज्वैलरी देखने को हुआ. पर जैसे ही उस ने वह कागज खोला, उस के जैसे होश उड़ गए. उस कागज में उस की अपनी असली ज्वैलरी की जगह केवल आर्टिफिशियल चूडि़यां थीं.

शक्ति नागपाल को मैट्रो से जहां भी जाना था, वह वहां जाना भूल गई और तुरंत एक रिक्शा पकड़ कर उसी जगह पहुंच गई, जहां उसे पुलिस वाले मिले थे. लेकिन वे वहां नहीं मिले. शक्ति समझ गई कि उस के साथ ठगी की गई है. अब पुलिस में शिकायत करने के अलावा उस के पास कोई उपाय नहीं था.

इसी तरह 2 मार्च, 2017 को पूर्वोत्तर राज्य से एक दंपति करोलबाग आए. इसी तरह लुटेरों का भय दिखा कर मोटरसाइकिल सवार 2 युवकों ने खुद को दिल्ली पुलिस का बताया. उन्होंने विश्वास के लिए उस दंपति को पुलिस का आईडी कार्ड भी दिखाया. उन से भी उन्होंने एक सफेद कागज में हीरे की 2 अंगूठियां, सोने की 2 अंगूठियां, हीराजडि़त चूडि़यां, चेन रखवा लीं और हाथ की सफाई दिखाते हुए पलक झपकते ही दूसरे कागज में लिपटी आर्टिफिशियल ज्वैलरी पकड़ा कर उसे बैग में रखने को कहा.

इस के बाद वे वहां से चंपत हो गए. उस दंपति ने जब वह कागज खोल कर देखा तो उस में आर्टिफिशियल ज्वैलरी मिली. लाखों रुपए की ज्वैलरी ठगी जाने की उन्होंने भी थाने में रिपोर्ट दर्ज करा दी.

ओल्ड राजेंद्रनगर के रहने वाले 75 साल के मखीजा जी शाम के समय घर से बाहर घूमने के लिए निकले. वह भी उन फरजी पुलिस वालों की साजिश का शिकार हो गए. इसी तरीके से मोटरसाइकिल सवार 2 युवक उन की सोने की अंगूठी, कड़ा और सोने की चेन ले कर चंपत हो गए.

करोलबाग में तो कई वारदातों में ठगों ने 2 करोड़ रुपए से ज्यादा के गहनों की ठगी की थी. एक साल के अंदर दिल्ली में इसी तरह की ठगी की 78 वारदातें हो चुकी थीं. इन में से 38 वारदातें तो केवल पश्चिमी जिले में हुई थीं. सभी वारदातों में ठगों ने खुद को दिल्ली पुलिस का बताया था. वे नकली पुलिस वाले कभीकभी सफारी सूट में भी मिलते थे.

पुलिस के नाम पर हो रही इस तरह की ठगी की वारदातों से लोगों का दिल्ली पुलिस से विश्वास उठता जा रहा था. इस से पुलिस की छवि भी खराब हो रही थी. पुलिस आयुक्त ने इसे गंभीरता से लिया. उन्होंने क्राइम ब्रांच के सभी सैक्शनों, समस्त जिलों के स्पैशल स्टाफ, एटीएस और यहां तक कि स्पैशल सेल को भी उन फरजी ठगों का पता लगाने के आदेश दिए.

पश्चिमी जिले में सब से ज्यादा 38 वारदातें इस तरह की ठगी की हुई थीं, इसलिए डीसीपी विजय कुमार ने अपने जिले के स्पैशल स्टाफ को इस काम पर पहले से ही लगा रखा था. एसीपी औपरेशन जगजीत सांगवान के नेतृत्व में स्पैशल स्टाफ की जो टीम इस मामले पर काम कर रही थी, उस में इंसपेक्टर सुरेंद्र संधू, एसआई संदीप डबास, सुमेर सिंह, एएसआई दिलबाग सिंह, दीपेंद्र सिंह, हैडकांस्टेबल रूपेश कुमार, विकास कुमार, नवीन कुमार, कांस्टेबल सनी, योगेश, प्रदीप कुमार, अमित कुमार आदि शामिल थे.

टीम के पास उन ठगों में से किसी का न तो फोटोग्राफ था और न ही कोई फोन नंबर, जिस के सहारे उन तक पहुंचा जा सके. जिन लोगों के साथ ठगी की वारदातें हुई थीं, उन से उन का हुलिया जरूर पता लग गया था. ठगों ने पश्चिमी दिल्ली में ज्यादातर बुजुर्ग महिलाओं को ही अपना निशाना बनाया था.

इलाके में जिन जगहों पर वारदातें हुई थीं, वहां आसपास के सीसीटीवी कैमरों की फुटेज भी देखी, पर सफलता नहीं मिली. पुलिस टीम काम में जुटी थी, उसी दौरान इलाके में ठगी की एक और वारदात हो गई. 9 अप्रैल, 2017 को जे-5 ब्लौक राजौरी गार्डन की रहने वाली 74 वर्षीया रमेश कुमारी अपने पति सुभाषचंद्र शर्मा के साथ रिक्शे में बैठ कर राजौरी गार्डन के ही जे-3 ब्लौक जा रही थीं.

उन का रिक्शा मेनरोड पर कुछ दूर ही आगे बढ़ा था कि आगे खड़े 2 लड़कों ने उन का रिक्शा रुकवा लिया. उन में से एक ने अपना आईडी कार्ड दिखाते हुए खुद को दिल्ली पुलिस का कांस्टेबल बताया.

उस ने कहा, ‘‘माताजी, आप इस तरह सोने की चूडि़यां और अंगूठी पहन कर जा रही हैं, आप को नहीं पता कि कल यहां पर एक बड़ी वारदात हो गई है. बदमाशों ने एक महिला की चूडि़यां व अन्य ज्वैलरी लूट ली थी. सामने हमारे एसएचओ साहब खडे़ हैं. अपनी सुरक्षा के लिए आप को क्या करना है, वह खुद बता देंगे.’’ कह कर वह उस बुजुर्ग महिला और उस के पति को 20-25 कदम दूर खड़े 2 व्यक्तियों के पास ले गए. वे दोनों सफारी सूट पहने थे.

रमेश कुमारी को देखते ही सफारी सूट पहने व्यक्ति ने कहा, ‘‘माताजी, आजकल जमाना इतना खराब चल रहा है और आप ये ज्वैलरी पहन कर जा रही हैं. अब रास्ते में आप के साथ कोई वारदात हो जाएगी तो लोग तो यही कहेंगे कि पुलिस सीनियर सिटिजंस का खयाल नहीं रख रही. वारदात को बढ़ावा तो आप लोग देते हैं.’’

वह व्यक्ति एक पुलिस अधिकारी की तरह ही बुजुर्ग रमेश कुमारी से बात कर रहा था. उसी दौरान सामने से एक और राहगीर आता दिखा. उस के दाहिने हाथ में काले रंग का एक बैग था और वह गले में सोने की मोटी चेन पहने था. सफारी सूट पहनने वाले उसी व्यक्ति ने उस राहगीर को पुलिसिया अंदाज में रोक कर उस से पूछा कि वह कहां से आ रहा है और कहां जा रहा है?

वह राहगीर समझ गया कि ये पुलिस वाले हैं, इसलिए उस ने अपने बारे में बता दिया तो उस सफारी सूट वाले ने कहा, ‘‘तुम्हें पता नहीं कि इधर का माहौल काफी खराब चल रहा है और तुम गले में ये मोटी चेन पहन कर जा रहे हो. यहां स्नैचिंग की कई वारदातें हो चुकी हैं, इसलिए बेहतर यही होगा कि इसे उतार कर रख लो.’’

इतना कह कर उस आदमी ने अपनी डायरी में रखा सफेद कागज निकाल कर कहा, ‘‘चेन इस में रख कर इसे बैग में रख लेना.’’

वह राहगीर डर गया, उस ने गले से सोने की चेन उतार कर उस सफारी सूट वाले को दे दी, जो खुद को दिल्ली पुलिस  का एसएचओ बता रहा था. कागज में चेन लपेट कर उस ने उस राहगीर को दे दी. राहगीर ने उसे अपने बैग में रख लिया और वहां से चला गया. उस समय बुजुर्ग महिला रमेश कुमारी वहीं खड़ी थीं.

एसएचओ ने उन से भी कहा, ‘‘माताजी, आप भी अपनी ज्वैलरी इस कागज पर रख दो, सेफ रहेगी.’’

उस के कहने पर रमेश कुमारी ने अपने हाथों में पहनी सोने की चूडि़यां और अंगुली से सोने की अंगूठी निकाल कर उस सफेद कागज पर रख दी. उस के बाद उस पुलिस वाले ने वह ज्वैलरी लपेट कर सुरक्षित रहने के बारे में बताया और कागज में लपेटी ज्वैलरी थैले में रखने को कहा.

थैले में ज्वैलरी रखने के बाद रमेश कुमारी पति के साथ चली गईं. रास्ते भर वह उस पुलिस वाले की तारीफ पति से करती रहीं, जिस ने उन की सुरक्षा का इतना खयाल रखा था.

घर पहुंचने के बाद रमेश कुमारी ने थैले से कागज में लपेटी ज्वैलरी निकाल कर देखी तो होश उड़ गए. क्योंकि उस कागज में उन की ज्वैलरी की जगह आर्टिफिशियल चूडि़यां रखी थीं. वह फटाफाट घर से निकलीं और पति के साथ रिक्शे में बैठ कर उसी जगह पहुंची, जहां उन्हें पुलिस वाले मिले थे. पर उस समय वहां कोई नहीं मिला.

अब वह समझ गईं कि उन के साथ धोखा हुआ है, वे लोग कोई पुलिस वाले नहीं, बल्कि ठग थे. वह सीधे थाना राजौरी गार्डन पहुंची और थानाप्रभारी को अपने साथ घटी घटना से अवगत करा दिया.

थानाप्रभारी समझ गए कि उन शातिर ठगों ने इस बुजुर्ग महिला को भी अपना निशाना बनाया है. बहरहाल, उन्होंने रमेश कुमारी की तहरीर पर अज्ञात ठगों के खिलाफ भादंवि की धारा 420 के तहत मामला दर्ज कर जांच एसआई विक्रम सिंह के हवाले कर दी. यह घटना पश्चिमी जिले में ही घटित हुई थी, इसलिए इस की जानकारी जब स्पैशल स्टाफ टीम को हुई तो टीम और ज्यादा अलर्ट हो गई.

टीम ने रमेश कुमारी से उन ठगों के हुलिया आदि के बारे में पूछताछ की. उन का हुलिया और काम करने का तरीका पहले घटित हो चुकी घटनाओं से मेल खा रहा था. लेकिन दिल्ली में अलगअलग जगहों पर लगातार वारदातें करने वाले ये लोग हैं कौन, इस बात का पता नहीं लग रहा था. कहीं यह मेवाती गैंग का काम तो नहीं है.

वैसे मेवाती गैंग इस तरह की वारदातें करता नहीं था, फिर भी पुलिस टीम ने मेवाती गैंग के कुछ लोगों को भी पूछताछ के लिए उठाया. काफी पूछताछ के बाद जब लगा कि वे निर्दोष हैं तो उन्हें छोड़ दिया गया.

इंसपेक्टर सुरेंद्र संधू के लिए यह मामला किसी चुनौती से कम नहीं था. उन की टीम में एसआई संदीप डबास, सुमेर सिंह, एएसआई दिलबाग सिंह, दीपेंद्र सिंह जैसे तेजतर्रार पुलिस अधिकारी थे. ये सभी अपनेअपने स्तर से उन ठगों का पता लगाने में जुटे थे. इंसपेक्टर सुरेंद्र संधू ने टीम के सभी सदस्यों के साथ एक मीटिंग की. करीब 2 घंटे तक चली इस मीटिंग में विस्तार से विचारविमर्श किया गया.

मीटिंग के बाद पुलिस एक बार फिर से इसी केस में जुट गई. सभी ने अपनेअपने मुखबिरों को भी अलर्ट कर दिया. एक मुखबिर से एसआई संदीप डबास को सूचना मिली कि ईरानी गैंग इस तरह की वारदातें करता है. उन्होंने इस लीड के बारे में इंसपेक्टर सुरेंद्र संधू को बताया. इंसपेक्टर संधू इसी लीड पर काम करने को हरी झंडी दे दी. एसआई संदीप डबास और सुमेर सिंह ईरानी गिरोह के बारे में जानकारी जुटाने लगे.

जांच में पता चला कि इस गिरोह का ताल्लुक मुंबई के ठाणे जिले से है. इस बारे में मुंबई पुलिस से संपर्क किया गया तो जानकारी मिली कि ईरानी गैंग ने मुंबई पुलिस की नाक में दम कर रखा था. अंबीवली थाने में इस गैंग के खिलाफ अनेक मामले दर्ज हैं. मुंबई क्राइम ब्रांच ने इस गैंग के 9 लोगों को सन 2015 में गिरफ्तार कर मकोका लगा कर जेल भेजा था. लेकिन गिरोह के सदस्य नासिर व जफर अब्बास अभी भी फरार हैं. मुंबई क्राइम ब्रांच ने यह भी बताया कि गैंग के फरार सदस्य दूसरे किसी शहर में हो सकते हैं. क्राइम ब्रांच दिल्ली पुलिस को ईरानी गैंग के बारे में जानकारी तो मिल गई, लेकिन फरार आरोपियों के कोई फोटोग्राफ वगैरह नहीं मिले.

दिल्ली में जिस तरीके से ठगी की वारदातें हो रही थीं, ठीक उसी तरह से ईरानी गैंग मुंबई में भी वारदातें करता था. मुंबई क्राइम ब्रांच पुलिस से मिली जानकारी के बाद इस बात की संभावना लगने लगी कि इन वारदातों में भी ईरानी गैंग का ही हाथ हो सकता है. पर यह पता नहीं लग पा रहा था कि यह सदस्य वारदात करने के बाद कहां चले जाते हैं. यानी वह दिल्ली में रह रहे हैं या एनसीआर में.

कभीकभी कुछ मामले पुलिस को उलझा देते हैं. इस मामले में पुलिस ने जो जांच की थी, उस से कुछ उम्मीद की किरण दिखाई तो दे रही थी, लेकिन अब समस्या यह हो गई थी कि जांच ऐसी जगह आ कर रुक गई थी, जहां से आगे बढ़ने का कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा था. यदि ईरानी गैंग के नासिर या उस के साथी का कहीं से फोटो मिल जाता तो जांच आगे बढ़ने में मदद मिल सकती थी. पर स्पैशल स्टाफ टीम ने हिम्मत नहीं हारी. टीम अपने स्रोतों से मिल रही सूचनाओं पर काम करती रही.

उसी दौरान एक मुखबिर ने एसआई संदीप डबास को ऐसी सूचना दी कि टीम में शामिल सभी सदस्यों के चेहरे पर मुसकान तैर गई. उस ने बताया कि ईरानी गैंग के कुछ लोग दक्षिणपूर्वी दिल्ली के हजरत निजामुद्दीन के भोगल इलाके में रहते हैं. यह जानकारी बहुत महत्त्वपूर्ण थी. मुखबिर की सूचना के बाद पुलिस टीम ने जांच की तो पता चला कि मुंबई से भागा हुआ ईरानी गैंग का मुखिया नासिर उर्फ समीर अली भोगल इलाके में रहता है. यहां भी उस ने अपना एक गैंग बना रखा है. ये लोग मोटरसाइकिल और स्कूटी से वारदात के लिए निकलते हैं.

पुख्ता जानकारी मिलने के बाद स्पैशल स्टाफ टीम 14 अप्रैल, 2017 को भोगल में मसजिद लेन के पास मुस्तैद हो गई. दोपहर करीब 1 बजे मसजिद लेन पर 4 लोग आए. उन में से 2 मोटरसाइकिल पर और 2 स्कूटी पर थे. मुखबिर के इशारे पर पुलिस ने उन्हें घेर लिया. उन में से एक के पास एक बैग था. बैग की तलाशी ली गई तो उस में एक आधार कार्ड, एक पैन कार्ड, कुछ आर्टिफिशियल ज्वैलरी और सफेद कागज मिले.

उन के पास जो टीवीएस कंपनी की जुपिटर स्कूटी और यामाहा मोटरसाइकिल थी, पुलिस ने उन के कागज दिखाने को कहा तो वे केवल मोटरसाइकिल के ही कागज दिखा पाए. पता चला कि वह स्कूटी चुराई हुई है.

पूछताछ में उन्होंने अपने नाम नासिर हफीज खान उर्फ समीर अली, शाह जमन सैय्यद उर्फ आशु, बरकत अली और जफर अब्बास अमजद शेख बताए. ये सभी मूलरूप से महाराष्ट्र के कल्याण इलाके की ईरानी बस्ती के रहने वाले थे और भोगल में मसजिद लेन पर स्थित एक मकान में किराए पर रहते थे. पुलिस ने उन से लूट की वारदातों के बारे में सख्ती से पूछताछ की तो उन्होंने अपना जुर्म स्वीकार कर लिया.

इस के बाद पुलिस उन सभी को स्पैशल स्टाफ औफिस ले गई. उन चारों ने स्वीकार किया कि उन्होंने दिल्ली के पश्चिमी जिले में ही नहीं, बल्कि और भी इलाकों में ठगी की वारदातों को अंजाम दिया था. ईरानी गैंग कौन है और ये लोग ठग कैसे बने, इस की एक अलग ही कहानी है.

बताया जाता है कि इन आरोपियों के पुरखे ईरान से ताल्लुक रखते थे. 15वीं और 16वीं सदी में गोलकुंडा के राजा ईरान के कुछ लोगों को बौडीगार्ड के तौर पर लाए थे. कदकाठी में लंबेतगड़े होने की वजह से ये राजा के बौडीगार्ड के रूप में तैनात रहते थे. रजवाड़े के बाद इन्होंने अपना ठिकाना मुंबई के ठाणे जिले में स्थित कल्याण क्षेत्र में बना लिया.

इन में से अनेक लोगों ने जरायम को अपना पेशा चुना. गैंग बना कर ये अपराध करने लगे. जिस से वहां पर ईरानी गैंग मशहूर हो गया. पिछले कुछ दिनों से इस गैंग ने फरजी पुलिसकर्मी बन कर राह चलते लोगों से ज्वैलरी ठगनी शुरू कर दी.

वहां जब ज्वैलरी ठगी की वारदातें बढ़ने लगीं तो पुलिस हरकत में आई. मुंबई क्राइम ब्रांच भी मामले की जांच करने लगी. सन 2015 में आखिर क्राइम ब्रांच ने ईरानी गैंग के 9 सदस्यों को गिरफ्तार करने में कामयाबी पाई. गैंग के 2 सदस्य नासिर और जफर अब्बास वहां से फरार हो गए.

ईरानी गैंग के जो 9 सदस्य क्राइम ब्रांच ने गिरफ्तार किए थे, पुलिस ने उन्हें मकोका के तहत निरुद्ध कर न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया. फरार नासिर और जफर अब्बास को अनेक संभावित जगहों पर तलाशा गया, पर उन का पता नहीं चल सका.

मुंबई से फरार होने के बाद नासिर और जफर अब्बास कुछ दिन तो इधरउधर घूमते रहे. उस के बाद वे दिल्ली चले आए. दिल्ली के भोगल इलाके में उन के कुछ जानकार रहते थे. वे भी उन के साथ रहने लगे. कहते हैं कि चोर चोरी भले ही छोड़ दे, पर हेराफेरी नहीं छोड़ता. यही हाल नासिर और जफर अब्बास का था. नासिर और जफर ने अपने साथियों शाहजमन उर्फ आशु और बरकत अली से बात की. ये दोनों भी मुंबई के कल्याण इलाके के अंबीवलि के रहने वाले थे.

फरजी पुलिस वाले बन कर राह चलते लोगों को इन्होंने ठगने की योजना बनाई. नासिर ने पुलिस का फरजी आईडी कार्ड बनवा रखा था. इस के अलावा उस ने एक प्रैस रिपोर्टर की भी फरजी आईडी बनवा रखी थी. ये चारों ऐसी सड़क पर खड़े हो जाते थे, जहां से पैदल और रिक्शे वाले गुजरते हों. इन में से 2 सफारी सूट पहने होते थे, जो खुद को पुलिस इंसपेक्टर बताते थे, जबकि 2 उन से कुछ दूर शिकार की तलाश में खड़े हो जाते थे.

ये अधिकतर ऐसी उम्रदराज महिलाओं को अपना शिकार बनाते थे, जो हाथों में या गले में सोने या हीरे की कोई ज्वैलरी पहने होती थीं. दोनों युवक खुद को पुलिस वाला बता कर शिकार के मन में डर पैदा करने के लिए कहते थे कि इस इलाके में ज्वैलरी लूट की घटना हुई है.

इस के बाद वे शिकार को अपने 2 अन्य साथियों के पास ले जाते थे. उन्हें वह अपना अधिकारी बताते थे. खुद को पुलिस अधिकारी बताने वाले गिरोह के ये सदस्य शिकार की ज्वैलरी उतरवा कर एक सफेद पेपर में रखने को कहते थे. उसी दौरान वे असली ज्वैलरी की जगह उसे नकली ज्वैलरी थमा देते थे. शिकार के वहां से जाते ही चारों फरार हो जाते थे. उस महिला को ठगी का तब पता चलता था, जब वह घर पहुंच कर अपने आभूषण देखती थी.

शिकार पर विश्वास जमाने के लिए कभीकभी गिरोह का एक सदस्य गले में सोने की चेन पहन कर उस समय सफारी सूट पहने हुए उधर से गुजरता था, जब वे किसी शिकार से बात कर रहे होते थे. फरजी एसएचओ बना उस का साथी उस सदस्य पर ऐसे रौब दिखाता था, जैसे वह असली एसएचओ हो. वह उस की चेन उतरवा कर कागज में रख कर दे देता था. इस से शिकार भी विश्वास में आ कर अपनी ज्वैलरी उतार देता था.

इस तरह इन लोगों ने दिल्ली के अलगअलग इलाकों में ठगी की वारदातों को अंजाम देना शुरू कर दिया. नासिर शादीशुदा था, फिर भी उस ने भोगल इलाके की पिंकी नाम की एक लड़की से शादी कर ली थी. चुराई गई ज्वैलरी को बेचने की जिम्मेदारी पिंकी की थी. पूछताछ में इन्होंने बताया कि वे दिल्ली और एनसीआर में कितनी वारदातें कर चुके हैं, इस का उन्हें भी पता नहीं है.

पुलिस ने 15 अप्रैल, 2017 को चारों अभियुक्तों को तीसहजारी कोर्ट में महानगर दंडाधिकारी अजय कुमार मलिक की कोर्ट में पेश कर नासिर और आशु का 3 दिनों का पुलिस रिमांड मांगा. कोर्ट ने नासिर और आशु को 3 दिनों के पुलिस रिमांड पर दे दिया तथा बरकत अली और जफर अब्बास को न्यायिक हिरासत में भेज दिया.

पुलिस ने नासिर की निशानदेही पर भोगल रोड, जंगपुरा के ज्वैलर राहुल वर्मा को गिरफ्तार कर लिया. उस का सोनी ज्वैलर्स के नाम से ज्वैलरी शोरूम था. वह इन ठगों से ज्वैलरी खरीदता था. ज्वैलर राहुल से पुलिस ने सोने की एक अंगूठी बरामद की थी. वह अंगूठी वृद्ध महिला रमेश कुमारी से ठगी गई थी. राहुल वर्मा को भी पुलिस ने कोर्ट में पेश कर जेल भेज दिया.

शातिर ठगों को गिरफ्तार करने की  सूचना दिल्ली पुलिस ने ठाणे जिले के कल्याण थाना पुलिस को दे दी थी. चूंकि कल्याण पुलिस को भी मकोका में वांछित नासिर और जफर अब्बास की तलाश थी, इसलिए खबर मिलते ही कल्याण थाने के एपीआई श्रीशैल शेट्टी और हैडकांस्टेबल सुनील जाधव दिल्ली पुलिस के स्पैशल स्टाफ औफिस पहुंच गए. लेकिन तब तक अभियुक्तों को जेल भेजा जा चुका था.

वे उन्हें ट्रांजिट रिमांड पर ले जाना चाहते थे. पर दिल्ली के केसों की टीआईपी से पहले उन्हें उन का ट्रांजिट रिमांड नहीं मिला, लिहाजा कल्याण पुलिस को बैरंग लौटना पड़ा.

इन शातिर ठगों को गिरफ्तार करने वाली पुलिस टीम की डीसीपी विजय कुमार ने काफी सराहना की. मामले की तफ्तीश एसआई सुमेर सिंह कर रहे हैं.?

– कथा पुलिस सूत्रों और जनचर्चा पर आधारित

सलाखों के पीछे पहुंचा पंजाब पुलिस का एसपी

पठानकोट एयरबेस पर जनवरी, 2016 में हुए आतंकी हमले को लोग अभी भूले नहीं होंगे. अगर आप को याद हो तो इस हमले के समय पंजाब के पुलिस अधीक्षक सलविंदर सिंह का नाम आया था. उन दिनों वह गुरदासपुर के एसपी (हैड क्वार्टर) थे. उन का तबादला हालांकि दूसरी जगह कर दिया गया था, लेकिन उन्होंने जौइन नहीं किया था.

संदर्भवश बता दें कि दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने बठिंडा से एक ऐसे युवक को गिरफ्तार किया था, जिस पर पाकिस्तान की कुख्यात खुफिया एजेंसी आईएसआई को भारतीय वायुसेना के गोपनीय दस्तावेज उपलब्ध करवाने का आरोप था. इस युवक का नाम था रंजीत.

पुलिस द्वारा की गई पूछताछ से ये तथ्य सामने आए थे कि रंजीत एयरफोर्स का बरखास्त नौन कमीशंड औफिसर था. उस की उम्र 24 वर्ष थी. वह केरल के मलप्पुरम जिले के एक गांव का रहने वाला था.

एक दिन रंजीत को अपने फेसबुक अकाउंट पर दामिनी मैकनेट के नाम से एक महिला की फ्रैंडशिप रिक्वेस्ट मिली थी, जिसे उस ने स्वीकार कर लिया था. दामिनी द्वारा अपने प्रोफाइल में बताए अनुसार वह देशदुनिया की खबरों पर आधारित यूके की एक पत्रिका में फीचर राइटर थी.

सिलसिला आगे बढ़ा तो रंजीत के मैसेज बौक्स में उस ने अपना मोबाइल नंबर छोड़ कर उस से बात करने की गुजारिश की थी.

रंजीत ने इस नंबर पर बात की तो दोनों की अच्छीभली दोस्ती हो गई. कुछ दिन प्यारभरी मीठीमीठी बातें करते रहने के बाद एक दिन उस ने रंजीत से यह कहते हुए भारतीय वायुसेना से संबंधित कुछ जानकारियां मांगीं कि वह इस विषय पर अपनी पत्रिका के लिए एक फीचर तैयार करना चाहती है. रंजीत पहले ही उस के हनीट्रैप में फंस चुका था, उस ने जो भी जानकारी चाही, रंजीत ने बेझिझक दे दी. बाद में उस ने रंजीत से पठानकोट एयरबेस के बारे में काफी जानकारियां हासिल की थीं.

दिल्ली पुलिस द्वारा रंजीत से पूछताछ का सिलसिला जारी था कि 1 जनवरी, 2016 की भोर में गुरदासपुर जिले की सबडिवीजन पठानकोट के थाना नरोड जैमल सिंह के अधीन पड़ने वाली रावी नदी पर बनी कंबलौर पुलिया के पास एक लावारिस लाश पड़ी मिली. इस से थोड़े ही फासले पर एक गाड़ी खड़ी थी. अनुमान लगाया गया कि मरने वाला उसी गाड़ी का ड्राइवर रहा होगा.

पुलिस गिरफ्त में रंजीत

अभी यह गुत्थी सुलझ भी नहीं पाई थी कि एक अन्य सनसनीखेज समाचार चर्चा का विषय बन गया.

पता चला कि बीती रात गुरदासपुर के एसपी (हैडक्वार्टर) सलविंदर सिंह को उन के साथियों समेत अपहृत कर के उन के साथ बुरी तरह मारपीट की गई. यह काम पाक आतंकियों का था जो उन्हें एक सुनसान जगह पर छोड़ कर उन की नीली बत्ती लगी कार अपने साथ ले गए थे.

जिस ड्राइवर की लाश बरामद की गई थी, छानबीन में पुलिस को उस के बारे में पता चला कि वह थाना नरोट जैमल सिंह के अंतर्गत पड़ने वाले गांव भगवाल का निवासी 35 वर्षीय इकागर सिंह था, जो अपनी इनोवा कार को टैक्सी के रूप में चलाया करता था. पिछली रात करीब 9 बजे किसी ने फोन कर के उस की कार किराए पर लेने के लिए किसी अज्ञात जगह पर बुलाया था. तभी से वह गाड़ी समेत गायब था.

1 जनवरी, 2016 को जब लाश के अलावा उस की गाड़ी बरामद की गई तो गाड़ी के चारों पहियों की हवा निकली हुई थी. गाड़ी को और भी काफी नुकसान पहुंचाने की कोशिश की गई थी. यह सीधेसीधे कत्ल के लिए हमला करने का मामला था.

पहली जनवरी की भोर में ही एक अनजान नंबर से गुरदासपुर के पुलिस मुख्यालय में एसपी सलविंदर सिंह की काल आई, जिस पर उन्होंने औपरेटर को बताया, ‘‘मैं इस वक्त गांव गुलपुर सिंबली में घायल पड़ा हूं. यहीं के किसी व्यक्ति से फोन ले कर बात कर रहा हूं. मेरी सारी बात नोट कर के मामला फ्लैश करवा दो.’’

सलविंदर सिंह ने फोन पर बताया कि पिछले रोज वह अपने एक रसोइए व करीबी दोस्त राजेश वर्मा के साथ इलाके के एक धार्मिक स्थल पर मत्था टेकने गए थे. रात के वक्त जब वे लोग अपनी महिंद्रा एक्सयूवी गाड़ी नंबर पीबी02ए बी0313 से वापस लौट रहे थे तो रास्ते में फौजी वरदी पहने 2 व्यक्तियों ने सड़क पर गाड़ी के सामने आ कर उन्हें रुकने का इशारा किया.

सलविंदर सिंह ने औपरेटर को बताया, ‘‘गाड़ी रुकने पर 3 अन्य व्यक्ति भी वहां आ गए. इस के बाद उन लोगों ने खतरनाक हथियारों के बल पर हमारा अपहरण कर लिया. रास्ते में मेरे साथसाथ मेरे रसोइए की पिटाई करने के बाद हमें गुलपुर सिंबली गांव के पास गाड़ी से उतार दिया गया. राजेश वर्मा को वे लोग अपने साथ ले गए. हमारे सैलफोन उन्होंने पहले ही हथिया लिए थे.’’

निस्संदेह यह गंभीर मामला था. जानकारी मिलते ही पुलिस अधिकारियों ने पठानकोट व आसपास के इलाकों में रेड अलर्ट जारी कर के उस इलाके की सख्त नाकाबंदी करवा दी.

उसी रोज राजेश वर्मा भी पुलिस से संपर्क साधने में कामयाब हो गया था. बुरी तरह पिटाई करने के अलावा उस की गरदन काटने का भी प्रयास किया गया था. उस की गरदन पर तेज धार हथियार का गहरा घाव था, जिस पर उस ने अपनी कमीज बांध रखी थी, जो खून से पूरी तरह लाल हो गई थी. राजेश को सिविल अस्पताल में दाखिल करवा दिया गया था.

चैकिंग के दौरान पुलिस को पठानकोट के गांव अकालगढ़ के नजदीक एक वीरान जगह से एसपी सलविंदर सिंह की गाड़ी खड़ी मिल गई थी. इनोवा चालक इकागर सिंह के कत्ल व एसपी और उन के साथियों के अपहरण के संबंध में अलगअलग प्रकरण दर्ज कर के पुलिस ने काररवाई शुरू कर दी.

इस जांच में एसपी सलविंदर सिंह ही संदेह के दायरे में आते दिख रहे थे. वैसे भी इस एसपी का पिछला आचरण सही नहीं माना जा रहा था. उस के खिलाफ एक साथ 5 महिला सिपाहियों ने गलत आचरण की शिकायत की थी, जिस के आधार पर गुरदासपुर से उस का ट्रांसफर कर दिया गया था. लेकिन रिलीव हो कर नई जगह जौइन करने के बजाय वह गुरदासपुर में ही जमा हुआ था.

बाद में एक महिला ने एसपी सलविंदर पर उस से नाजायज शादी करने का आरोप भी लगाया. मगर इन मामलों में उस के खिलाफ कहीं कोई काररवाई नहीं हुई थी.

पुलिस गिरफ्त में सलविंदर सिंह

एनआईए (नैशनल इनवैस्टिगेशन एजेंसी) ने पूर्व में इस आरोप के आधार पर सलविंदर व उस के साथियों से पूछताछ की कि उस का संबंध पाक आतंकियों से था या नहीं. लेकिन इस पूछताछ में आतंकियों से संबंध वाला आरोप साबित नहीं हो सका, अलबत्ता यह आरोप जरूर प्रमाणित हो गया था कि सलविंदर के संबंध ड्रग माफिया से थे, जिन की खेप सीमा पार करवाने के एवज में वह उन से हीरे लिया करता था. यह भी पता चला कि एसपी का ज्वैलर दोस्त राजेश वर्मा इन हीरों की जांच किया करता था.

उस रात भी एसपी सलविंदर निकला तो इसी काम से था, मगर सामना हो गया था आतंकियों से. छानबीन से यह बात पूरी तरह साफ हो गई थी कि ड्राइवर इकागर सिंह के कत्ल व एसपी सलविंदर के साथियों समेत किए गए अपहरण में उन आतंकियों का ही हाथ था, जिन्होंने बाद में अपने अन्य साथियों से मिल कर पठानकोट एयरबेस पर हमला किया था. संदेह था कि एयरबेस संबंधी जानकारियां रंजीत के माध्यम से जुटाई गई थीं.

खैर, पूछताछ के बाद एनआईए ने एसपी सलविंदर व उस के साथियों को अपने यहां से रिहा कर के पंजाब पुलिस के हवाले कर दिया था, जहां इन के खिलाफ कोई खास काररवाई नहीं हुई.

इसी बीच एक और मामला भी उछला. दरअसल, गुरदासपुर का एक व्यक्ति रेप के आरोप में गिरफ्तार हुआ था. उस की पत्नी ने केस को झूठा बताते हुए एसपी सलविंदर सिंह से उस के पति को बचा लेने की गुहार लगाई. एसपी ने इस काम के लिए न केवल उस से 50 हजार रुपयों की रिश्वत वसूली, बल्कि उस की अस्मत भी लूट ली.

जमानत हासिल कर के घर लौटने पर पति को इस बात की जानकारी मिली तो उस ने एसपी के खिलाफ वांछित काररवाई करने के लिए पुलिस के उच्चाधिकारियों से विनती की. लेकिन किसी ने भी उस की शिकायत पर तवज्जो नहीं दी. एक दिन वह व्यक्ति पत्नी को साथ ले कर पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल के संगतदर्शन कार्यक्रम में पेश हुआ और मुख्यमंत्री को सारी बात बता कर न्याय की गुहार लगाई.

मुख्यमंत्री के आदेश पर पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने इस मामले की व्यापक जांच कर के एसपी सलविंदर सिंह के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज करने की अनुशंसा कर दी. इस तरह 3 अगस्त, 2016 को सलविंदर के खिलाफ आईपीसी की धारा 376 और प्रिवेंशन औफ करप्शन एक्ट की धारा 13 (2) के तहत गुरदासपुर के सिटी थाने में प्राथमिकी दर्ज हो गई.

गिरफ्तारी से बचने के लिए सलविंदर ने अदालत से अग्रिम जमानत हासिल करने का प्रयास किया. आखिरकार उसे पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट से जमानत मिल तो गई, लेकिन जल्दी ही यह जमानत आदेश रद्द हो गया. इस के बाद सलविंदर लापता हो गया तो कोर्ट ने उसे भगोड़ा घोषित कर दिया गया.

रेप पीडि़ता को न्याय दिलवाने के लिए मीडिया ने भी सलविंदर के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था.

आखिर सलविंदर कब तक भागता और कहांकहां छिपता. करीब 8 महीनों की लुकाछिपी के बाद इसी 20 अप्रैल, 2017 को दोपहर में उस ने गुरदासपुर के मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी मोहित बंसल की अदालत में आत्मसमर्पण कर दिया, जिन्होंने उसे 5 मई तक न्यायिक हिरासत में गुरदासपुर के केंद्रीय जेल भिजवाने के आदेश जारी कर दिए. जल्दी ही यहां के अधिकारियों ने इसी जिले में एसपी रहे सलविंदर सिंह को सैंट्रल जेल, अमृतसर ट्रांसफर कर दिया.

कथा तैयार करने तक एसपी सलविंदर की जमानत नहीं हुई थी और गुरदासपुर पुलिस उस के खिलाफ आरोपपत्र तैयार करने में जुटी थी.

‘सहारनपुर में मेरी हत्या की साजिश थी’

बसपा सुप्रीमो मायावती ने सोमवार को केंद्र और राज्य सरकार पर जोरदार हमला बोलते हुए कहा कि सहारनपुर के शब्बीरपुर में उनकी हत्या कर बसपा को दफन करने की साजिश हुई थी. सतर्क होने की वजह से साजिश नाकाम हो गई. दलितों के हक की आवाज नहीं उठाने दी गई तो उन्हें राज्यसभा से इस्तीफा देकर सड़कों पर लड़ने का फैसला करना पड़ा. देश में हालात ऐसे हैं कि लोकसभा चुनाव समय से पहले होंगे.

मायावती सोमवार को मेरठ में बसपा के तीन मंडलों महासम्मेलन को संबोधित कर रही थीं. महासम्मेलन में 71 विधानसभा क्षेत्रों से कार्यकर्ता और समर्थक पहुंचे हुए थे. मायावती ने कहा कि डॉ. अंबेडकर को भी दलितों-आदिवासियों के हक के लिए कानून मंत्री के पद से इस्तीफा देना पड़ा था. रोहित वेमुला कांड, ऊना कांड और शब्बीरपुर कांड की घटनाएं साबित करती हैं कि देश में दलितों का उत्पीड़न बढ़ रहा है.

बसपा प्रमुख ने कहा कि भाजपा दलितों और पिछड़ों का आरक्षण खत्म कर रही है. सब कुछ प्राइवेट सेक्टर को दिया जा रहा है, जहां पहले से ही आरक्षण की व्यवस्था नहीं है. बसपा ने ही वीपी सिंह सरकार में मंडल कमीशन की सिफारिशें लागू कराई थीं.

मायावती ने बार-बार गिनाया कि कैसे उन्होंने अपनी सरकारों में हर जाति के लोगों को तरजीह दी. दलितों में पैठ बनाने के लिए भाजपा ने दलित राष्ट्रपति पद का प्रत्याशी बनाया था लेकिन बसपा के दबाव के चलते कांग्रेस को भी दलित ही प्रत्याशी बनाना पड़ा. माया ने नोटबंदी और जीएसटी को देश की अर्थव्यवस्था के लिए घातक बताया और कहा कि देश में इमरजेंसी जैसे हालात हैं. भाजपा के निशाने पर विपक्षी दल हैं. सीबीआई, इन्कम टैक्स और ईडी का दुरुपयोग कर नेताओं को निशाना बनाया जा रहा है.

पश्चिमी यूपी को साधने की कोशिश

बसपा सुप्रीमो मायावती ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश के नब्ज पर हाथ रखा. तमाम मुद्दों पर फोकस करते हुए बिल्कुल चुनावी अंदाज में मायावती ने गन्ना, किसान, जाट समाज को लेकर सरकार पर निशाना साधा.

मायावती ने कहा कि गन्ने का सबसे अच्छा भाव किसानों को बसपा शासन में ही दिया गया. बसपा की चार सरकारों के समय किसानों को गन्ने की फसल का एक-एक पैसा दिलाया गया. बकाये का भुगतान कराया गया. कर्ज माफी पर भी सरकार किसानों के साथ मजाक कर रही है, जबकि बसपा सरकार के समय किसानों को सभी सुविधाएं आसानी से मुहैया कराई गईं. पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जाटों को बसपा शासन में बिना एक पैसे के भ्रष्टाचार, रिश्वत के नौकरियां दी गईं.

किन्नर समाज रूढ़िवाद से निकले बाहर

किन्नर समाज हिंदू धर्म के अंधविश्वास का शिकार है. इसी के चलते यह समाज की मुख्यधारा में शामिल नहीं हो पाता है. सिक्के का दूसरा पहलू यह भी है कि खुद किन्नर अंधविश्वास को अपनी कमाई का जरीया बनाते हैं.

रूढि़वादी रीतिरिवाजों जैसे शादी, बेटा या बेटी का जन्म, गृह प्रवेश जैसे आयोजनों की आड़ में वे मोटा दान लेते हैं. दान को अपना हक समझते हुए वे कई बार जोरजबरदस्ती करने लगते हैं, जिस की वजह से आपराधिक वारदातें भी घट जाती हैं.

किन्नर समाज कबीलाई संस्कृति का भी शिकार होता रहा है. गुरु की गद्दी पर कब्जा करने के लिए कई तरह के दांवपेंच भी आजमाए जाते हैं.

लेकिन अब किन्नर समाज बदल रहा है. पहले जहां देश के अलगअलग हिस्सों में केवल किन्नर सम्मेलन या मेले लगते थे, पर अब किन्नर फैशन शो भी करने लगे हैं.

लखनऊ में किन्नर समाज की पायल सिंह ने ‘पायल फाउंडेशन’ बना कर किन्नरों को नई राह दिखाने का काम शुरू किया है. इस वजह से पूरे देश में किन्नर समाज का हुनर सामने आ रहा है.

आमतौर पर ढोलक की थाप पर शगुन मांगने और उम्मीद से कम मिलने पर जोरजोर से ताली बजाने की पहचान वाले किन्नर लखनऊ की संगीत नाटक अकादमी में एक के बाद एक रैंप पर उतरे, तो देखने वाले देखते ही रह गए.

पायल सिंह कहती हैं, ‘‘मैं ने यह महसूस किया है कि जब तक मुख्य समाज में हम अपने अच्छे बरताव से संबंध नहीं सुधारेंगे, तब तक हमें कोई स्वीकार नहीं करेगा.

‘‘जब मैं ने अपने समाज में सुधार की बात कही, तो मेरा विरोध हुआ. इस के बाद भी मैं ने कभी हार नहीं मानी और अपना काम जारी रखा.

‘‘किन्नरों पर जबरन वसूली का आरोप लगता रहा है. उन की आड़ में गैरकिन्नर व आपराधिक सोच के लोग वसूली करते हैं.

‘‘हमारी यही कोशिश है कि किन्नर समाज को हिकारत से न देखा जाए. वे भी किसी मां की कोख से पैदा हुए हैं. हमारी कोशिश है कि हम रीतिरिवाजों में नेग मांगने के बजाय रोजी रोटी के दूसरे तरीके अपनाएं. हमारे बीच के जो लोग आगे बढ़ रहे हैं, उन को समाज का साथ मिल रहा है. ऐसे शो देख कर लोगों को लगता है कि हम भी समाज का हिस्सा हो सकते हैं.’’

किन्नर समाज से जुबैदा, शनाया, शबा, मोहिता, सुमन, खुशी, मोहिनी, कजरी, डिंपी और चमन रैंप पर उतरीं, तो पायल सिंह ने उन का साथ दिया.

इस कार्यक्रम में किन्नरों की जिंदगी पर बनी शौर्ट फिल्म और नाटक पेश किए गए, जिस से लोगों को इन के बारे में पता चल सका.

किन्नरों को मौडल की तरह से रैंपवाक के लिए तैयार करने जैसा मुश्किल काम कोरियोग्राफर अमृत शर्मा ने आसान बनाया. नतीजतन, किन्नर कुछ इस तरह रैंप पर उतरे कि लोगों को पता ही नहीं चला कि वे पेशेवर मौडल नहीं हैं.

यह है चाहत

किन्नर न केवल खुद को बदलने के लिए मेहनत कर रहे हैं, बल्कि उन की कोशिश होती है कि वे आम लोगों की तरह से दिख सकें. ऐसे में वे अपनी बोलचाल और पहनावे में बदलाव कर रहे हैं.

शबा ने बताया कि वह 12वीं जमात पास कर चुकी है. उस ने प्राइवेट ग्रेजुएशन की पढ़ाई के लिए फार्म भर दिया है. पढ़ाई करने के बाद वह नौकरी करना चाहती है.

शबा कहती है, ‘‘मुझे फैशन का शौक है. मैं आगे चल कर फैशन सिखाने का काम करना चाहती हूं, जिस से हमारे समाज के लोग अपने पैरों पर खड़े हो सकें.’’

शनाया को भी फैशन का शौक है.  वह लोगों को फैशन के टिप्स भी देती है, जिस से लोग फैशन में किसी से कम न दिख सकें. वह फिल्मों में ऐक्टिंग करना चाहती है.

शनाया कहती है, ‘‘जिस तरह से पिछले कुछ सालों से किन्नर समाज में बदलाव आया है, उस से हमारा हौसला बढ़ा है. अब हम रोजीरोटी कमाने के लिए दूसरे काम कर रहे हैं.’’

खुशी का कहना है, ‘‘मुझे कपड़े कैसे भी पहनने को मिलें, पर गहने हैवी होने चाहिए. मैं हीरे के गहने पहनना पसंद करती हूं. लेकिन अभी मेरे पास हैं नहीं. ऐसे में मैं सोने के गहनों से ही काम चलाती हूं. गले में चेन और कानों में झाले पहनती हूं. मेरे गहने ड्रैस की मैचिंग वाले होते हैं.’’

डिंपी को भारतीय कपड़ों के बजाय वैस्टर्न ड्रैस पसंद है. उस का फिगर ऐसा है कि वैस्टर्न ड्रैस उस पर फबती है. उस के पास गाउन, मिडी, शार्ट्स के तमाम डिजाइन हैं.

मोहिनी को सलवारसूट पहनना पसंद है. उसे प्लेन पटियाला, सितारे लगा सूट, सैमी पटियाला और नौर्मल सलवारसूट पहनना पसंद है.

बदल रही है सोच

किन्नर समाज के इस शो को देखने के लिए पूरा हाल खचाखच भरा हुआ था. टैलीविजन सीरियल ‘शक्ति: अस्तित्व के एहसास की’ में सौम्या नामक किरदार किन्नर है. वह अपने पति और परिवार को कैसे संभालती है, यह बताया गया है. इस से पता चलता है कि अगर किन्नर खुद में बदलाव करे, तो समाज उस को स्वीकार करने को तैयार है.

किन्नर समाज के लोगों से जो डर होता है, वह नेग की वसूली से होता है. हिंदू रीतिरिवाजों में यह कहा गया है कि किन्नर को नेग देने से खुद का भला होता है. ऐसे में समाज किन्नरों को नेग दे कर खुश रहना चाहता है. समाज के जो लोग नेग की रकम किन्नर के मुताबिक नहीं देते, तो दोनों के बीच मतभेद हो जाते हैं.

मनचाहा नेग पाने के लिए बहुत से किन्नर लोगों को डरातेधमकाते हैं, तोड़फोड़, लड़ाईझगड़ा करते हैं. कई बार मानसिक दबाव बनाने के लिए वे कपड़े उठा कर अपने अंगों को दिखाने की कोशिश करते हैं, जिस से लोगों को शर्मिंदगी का सामना करना पड़ता है.

कई बार यह भी देखा गया है कि किन्नरों की आड़ में दूसरे दबंग किस्म के लोग वसूली करते हैं. कई बार किन्नरों और गैरकिन्नरों के बीच ऐसे टकराव की वारदातें भी होती रहती हैं. रेलगाड़ी, बाजारों और सड़क के किनारे वसूली करने वालों में किन्नर और गैरकिन्नर दोनों ही शामिल होने लगे हैं.

गरीब हैं परेशान

किन्नर, जिस को ट्रासजैंडर और शीमेल भी कहा जाता है, यह एक मैडिकल कमजोरी होती है. ऐसे हालात किसी भी परिवार में जनमे बच्चे के साथ हो सकते हैं. जिन परिवारों के पास पैसा है, वे अपने बच्चे को पढ़ालिखा कर उस के बरताव में बदलाव ला कर उसे किन्नर समाज से दूर रखने में कामयाब हो जाते हैं.

किन्नरों द्वारा बच्चे को उठाने की वारदातें अब केवल गरीब, दलित और कम पढे़लिखे लोगों के यहां ज्यादा होती हैं. बड़े घरों में जनमे ऐसे बच्चे अपनी रुचि के हिसाब से कैरियर अपना लेते हैं. कई घरों के ऐसे बच्चे डांस करने लगते हैं. वे डांस को ही अपना कैरियर भी बना लेते हैं.

कुछ ऐसे बच्चे कोरियोग्राफी, फैशन और ऐक्टिंग में अपनी राह तलाश लेते हैं. ऐसे में इन की परेशानियां काफी हद तक कम हो जाती हैं.

निदा नामक एक कलाकार का कहना है, ‘‘पहले के मुकाबले आज हमारे प्रति लोगों का रवैया का बदल रहा है. हां, जो लोग हमें नहीं जानते, वे जरूर छींटाकशी करने से बाज नहीं आते हैं.’’

निदा खुद को किन्नर कहलाया जाना पसंद नहीं करती. वह खुद को शीमेल कहती है.

निदा का कहना है, ‘‘किन्नर शब्द सुनने में थोडा अजीब लगता है. यही वजह है कि ‘हिजड़ा’ शब्द का प्रयोग बंद किया गया था.’’

अंधविश्वास पड़ रहा भारी

जिस तरह से अगवा कर किन्नर बनाने की वारदातें पहले खूब होती थीं, पर अब वे काफी कम हो गई हैं. ऐसे में केवल गरीब और दलित, पिछड़ी जाति के किन्नर ही समाज में सब से ज्यादा बचे हैं. गरीबी है, साधन नहीं हैं, ऐसे में वे अपनी शारीरिक कमजोरी को छिपा नहीं पाते हैं. बाद में वे इस को ही कमाई का जरिया बना लेते हैं.

किन्नर समाज से जुड़े कुछ लोग कहते हैं कि वे जातिधर्म के आधार पर किसी भी तरह का भेदभाव नहीं करते. वे इस बात को स्वीकार जरूर करते हैं कि आज के दौर में बड़े परिवारों के किन्नर बच्चे किन्नर समाज का हिस्सा नहीं बनते. वे अपनी अलग दुनिया में चले जाते हैं.

किन्नरों में फैले अंधविश्वास को ले कर भी कई तरह की सोच फैली है.  उन के अंतिम संस्कार और रीतिरिवाजों को ले कर तमाम तरह के भ्रम फैले हुए हैं.

किन्नर खुद का इस तरह पैदा होना पिछले जन्म का संस्कार मानते हैं. ऐसे में वे अंतिम क्रिया ऐसे करते हैं, जिस से अगले जन्म में किन्नर पैदा न हों.

आज बहुत से लोग इस बात को समझने लगे हैं कि किन्नर पैदा होना मैडिकल परेशानी की वजह से है. ऐसे में वे पुराने रीतिरिवाजों से बाहर निकल रहे हैं. जो कम पढ़ेलिखे लोग हैं, वे ही ऐसी दकियानूसी सोच में फंसते हैं.

किन्नर समुदाय के कुछ लोग जिस्म बेचने के कारोबार में जुड़े हैं. ऐसे लोग बाकी समाज को भी बदनाम करते हैं. जरूरत इस बात की है कि किन्नर समाज रोजीरोटी के लिए बेहतर रास्ते तलाश करे, जिस के बाद ही वे समाज का हिस्सा बन सकेंगे.

राम रहीम : नप गया कमजोरों का रसिया बाबा

हालांकि यह वाकिआ उत्तर प्रदेश के हमीरपुर जिले के एक छोटे से गांव गढ़ा का है, लेकिन इस का गहरा ताल्लुक देश में पनप रहे गुरमीत राम रहीम सिंह जैसे बाबाओं और बाबावाद से है.

गढ़ा के पुराने राम जानकी मंदिर में जुलाई के महीने से अखंड रामायण का पाठ चल रहा था. 21 अगस्त, 2017 को एक दलित नौजवान भी रामायण का पाठ करने इस मंदिर में गया, तो पुजारी कुंवर बहादुर ने उसे भगा दिया.

दूसरे दलित व पिछड़े भी रामायण के पाठ में हिस्सा लेने न आने लगें, इस बाबत पुजारी ने मंदिर के दरवाजे पर एक तख्ती टांग दी, जिस पर लिखा था कि मंदिर में दलित बिरादरी के लोगों के रामायण पढ़ने आने पर रोक है.

इस पर छोटी बिरादरी वालों ने खूब हल्ला मचाया और इलजाम लगाया कि रामायण पढ़ने गए कई दलितों और पिछड़ों को राम जानकी मंदिर से भगा दिया गया.

बवाल मचने पर डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट एसके मिश्र ने वही किया, जो आमतौर पर हर लैवल पर प्रशासन करता है. पुलिस, कानूनगो और लोकपाल से घटना की जांच कराई गई. रिपोर्ट में कहा गया कि चूंकि दलित नौजवान शराब के नशे में था, इसलिए उसे भगाया गया था.

बात आईगई हो गई, लेकिन कुछ दलितों और पिछड़ों ने खुल कर कहा कि उन्हें छोटी जाति का होने के चलते मंदिर में चल रहे रामायण के पाठ में हिस्सा लेने से पुजारी ने रोका था.

यह कोई नई बात नहीं है. न केवल उत्तर प्रदेश, बल्कि देशभर में ब्राह्मण पंडेपुजारी छोटी जाति वालों को मंदिर में आने से रोकते रहे हैं. कुछ मामलों में बवाल मचता है, तो उन की जांच के नाम पर किसी तरह लीपापोती कर दी जाती है.

इस लीपापोती में कहीं इस बात का जिक्र नहीं होता कि शराब का नशा ज्यादा नुकसानदेह होता है या धर्म का. और क्यों दलित मंदिर जाने की जिद पर और ब्राह्मण उन्हें वहां से भगाने की जिद पर अड़े रहते हैं.

इन विवादों का समाज पर क्या फर्क पड़ता है और इन से किस का भला होता है, यह बात अब छिपी नहीं रह गई है. ऐसे मामलों का पंचकुला, हरियाणा के डेरा सच्चा सौदा की हिंसा से गहरा ताल्लुक है, जिस में गरीब दलित तबके के भक्तों को ढाल और हथियार बना कर बाबा राम रहीम ने अपनी बादशाहत और ताकत दिखाई, लेकिन उस के पीछे छिपे जातिवाद का एक कड़वा सच कम ही लोगों को समझ आया कि आखिरकार फसाद की जड़ है क्या और इस से कैसे निबटा जा सकता है.

पंचकुला की हिंसा

25 अगस्त, 2017 को हरियाणा के पंचकुला में सीबीआई की स्पैशल कोर्ट ने जैसे ही स्टाइलिश बाबा राम रहीम को बलात्कार के एक मामले में दोषी करार दिया, वैसे ही उस के लाखों समर्थक बेकाबू हो गए. वे लाखों भक्त पंचकुला और सिरसा में जमा थे. उन्होंने जम कर तोड़फोड़, आगजनी और हिंसा की.

धर्म और आस्था के नाम पर हिंसा का जो खुला तांडव हुआ, उस ने देशभर को हिला कर रख दिया. महज 6 घंटे में राम रहीम के भड़के भक्तों ने 104 जगह आग लगाई, जिन में तकरीबन 2 सौ वाहन जल कर खाक हो गए. उन लोगों ने दर्जनभर सरकारी दफ्तरों को भी आग के हवाले कर दिया और कई रेलवे स्टेशनों पर गदर मचाते हुए 2 ट्रेनों को भी आग लगा दी.

बेकाबू भक्तों की भीड़ को काबू में करने के लिए जगहजगह आंसू गैस के गोले दागे जा रहे थे और पानी की बौछारें मारी जा रही थीं.

अकेले पंचकुला, जहां डेरा सच्चा सौदा का दूसरा बड़ा हैडक्वार्टर है, में बाबा राम रहीम के तकरीबन 2 लाख भक्त जमा थे. उन लोगों ने 20 अगस्त, 2017 से ही पंचकुला आना शुरू कर दिया था, जिन के खानेपीने और ठहरने का इंतजाम बाबा राम रहीम की तरफ से किया गया था. जब डेरे के भीतर जगह भर गई, तो वे लोग पंचकुला की सड़कों, फुटपाथों, पार्कों और बगीचों में डेरा डाल कर पड़े रहे.

जाहिर है कि राम रहीम को यह अहसास हो गया था कि अब वह कानून से बच नहीं पाएगा. लिहाजा, उस ने अपने लाखों भक्तों को पंचकुला में जमा कर एक नया कारनामा कर डाला, जिस का मकसद सरकार और अदालत पर दबाव बनाना था.

डेरा समर्थकों के जमावड़े को देख कर हाईकोर्ट ने हरियाणा सरकार को आगाह भी किया था, लेकिन हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने कोर्ट की नसीहत को बेहद हल्के में लिया. नतीजतन, अकेले पंचकुला में ही 25 अगस्त, 2017 को 30 लोग मारे गए.

हिंसा की यह आग हरियाणा से होते हुए पंजाब, राजस्थान, दिल्ली, उत्तर प्रदेश और झारखंड तक फैली. जगहजगह राम रहीम के भक्तों ने आगजनी की वारदात को अंजाम दिया, जिस के चलते पंजाब और हरियाणा के 11 शहरों में कर्फ्यू लगा दिया गया और पंचकुला और सिरसा को सेना के हवाले कर दिया गया.

पंचकुला की हालत तो यह थी कि शहर में चारों तरफ काला धुआं ही आसमान में दिख रहा था. सड़कों पर पत्थर बिछे हुए थे और पुलिस और सेना के जवान फायरिंग कर रहे थे. शहर की निगरानी हवाई जहाजों से भी की जा रही थी.

टैलीविजन चैनलों के पत्रकार अपनी जान पर खेलते हुए दर्शकों को दिखा रहे थे कि बाबा राम रहीम के भक्त कैसे बेकाबू हो कर अपनी पर उतारू हो आए हैं और लगता ऐसा है कि हरियाणा में कानून व्यवस्था नाम की कोई चीज ही नहीं रह गई है.

इसी दौरान कुछ चैनलों ने दिखाया कि कई दिग्गज भाजपा नेताओं के संबंध बाबा राम रहीम से हैं. इन नेताओं के इस बाबा के पैरों में सिर झुकाते हुए वीडियो भी खूब वायरल हुए.

जलवा बाबा का

50 साला राम रहीम कैसे देखते ही देखते एक मामूली ड्राइवर से खरबपति बाबा बन बैठा, यह कहानी भी कम दिलचस्प नहीं है. साल 1948 में डेरा सच्चा सौदा की स्थापना शाह मस्ताना महाराज नाम के एक बाबा ने की थी.

शाह मस्ताना महाराज की मौत के बाद उन का चेला सतनाम महाराज डेरा सच्चा सौदा की गद्दी पर बैठा. साल 1990 में यह गद्दी गुरमीत सिंह को मिली, जिस का नाम बदल कर संत गुरमीत राम रहीम ‘इंसा’ कर दिया गया.

राम रहीम राजस्थान के श्रीगंगानगर के एक मामूली जाट परिवार में पैदा हुआ था, जो डेरा सच्चा सौदा का अंधभक्त था.

10वीं जमात तक पढ़ेलिखे राम रहीम की शादी कम उम्र में ही हो गई थी. उस की 2 बेटियां चरणप्रीत और अमरप्रीत हैं और एक बेटा जसमीत सिंह है.

राम रहीम की जिंदगी कुछकुछ राज भरी है. उस की बीवी हरजीत कौर को कभी किसी ने पब्लिक प्रोग्राम में नहीं देखा. हां, उस की एक मुंहबोली बेटी हनीप्रीत जरूर उस के साथ हर जगह दिखी, जिस का असली नाम प्रियंका तनेजा है.

राम रहीम ने डेरा सच्चा सौदा के बढ़ते कारोबार को फैलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी. देखते ही देखते डेरा सच्चा सौदा की 250 शाखाएं दुनियाभर में

फैल गईं. विदेशों में कनाडा, अमेरिका, इंगलैंड और आस्ट्रेलिया में भी राम रहीम को मानने वाले पैदा हो गए.

एक रिपोर्ट के मुताबिक, राम रहीम के भक्तों की कुल तादाद तकरीबन 5 करोड़ है, जिन में से अकेले हरियाणा में ही उस के 25 लाख भक्त हैं. सिरसा में डेरा सच्चा सौदा की 7 सौ एकड़ जमीन है, जिस में खेती किसानी होती है. इस के अलावा पूरा एक मार्केट भी यहां डेरा सच्चा ट्रस्ट का है. इस मार्केट की हर एक दुकान का नाम सच से शुरू होता है.

डेरा सच्चा सौदा कमाई के लिए होटल, रैस्टोरैंट, स्कूल और अस्पताल भी चलाता है. इन में से एक 135 बिस्तरों वाला अस्पताल राजस्थान के श्रीगंगानगर में है. बेसहारा अनाथ लड़कियों का एक आश्रम भी राम रहीम ने खोल रखा है.

राम रहीम और डेरा सच्चा सौदा की कुल जायदाद और कमाई का ठीकठाक आंकड़ा तो किसी के पास नहीं है, पर राम रहीम की शानोशौकत देख कर सहज अंदाजा लगाया जा सकता है कि उस के पास अकूत दौलत है.

राम रहीम का एक शौक तरहतरह की नए मौडल की कार रखने का भी है. जब भी वह चलता है, तो एक 1-2 नहीं, बल्कि कम से कम सौ कारों का काफिला उस के साथ होता है. हिफाजत के लिहाज से यह बात किसी को नहीं बताई जाती थी कि वह किस गाड़ी में है.

25 अगस्त, 2017 को भी जब राम रहीम सीबीआई की स्पैशल कोर्ट पहुंचा था, तब भी उस के साथ सैकड़ों कारों का काफिला था.

राम रहीम का रहनसहन और पहनावा भी फिल्मी दुनिया के सितारों सरीखा था. उस की अपनी एक अलग स्टाइल थी, जो परंपरागत बाबाओं की इमेज से कतई मेल नहीं खाती.

अरबों की कमाई के बाद भी यह बाबा सरकार को कोई टैक्स नहीं देता, क्योंकि इनकम टैक्स की धारा 10 (2) के तहत डेरा सच्चा सौदा और उस के दूसरे संगठनों को इनकम टैक्स से छूट मिली हुई है.

ज्यादा पैसा कमाने की गरज से राम रहीम ने भी दूसरे ब्रांडेड बाबाओं की तरह सामान बनाने और बेचने का भी कारोबार शुरू कर दिया था. इन में अनाज, मसाले, नमक, बोतलबंद पानी, नूडल्स वगैरह शामिल हैं. ये सामान एमएसजी के नाम से तकरीबन 2 सौ स्टोरों में बिक रहे हैं. इस के अलावा बाबा राम रहीम के खुद के कई पैट्रोल पंप भी हैं.

जाहिर है कि राम रहीम की तुलना बेवजह बाबा रामदेव, श्रीश्री रविशंकर, मां अमृता आनंदमयी और बलात्कार के ही इलजाम में सजा काट रहे आसाराम बापू से नहीं की जाती. इन बाबाओं और राम रहीम में कई समानताएं हैं. मसलन, उस के भी सभी दलों खासतौर से भाजपा नेताओं से गहरे ताल्लुकात हैं. राम रहीम का एक अलग रसूख है और चेलों की तादाद में भी वह किसी दूसरे बाबा से कम नहीं आंका जा सकता.

लेकिन फर्क भी

बाबा राम रहीम उस वक्त ज्यादा सुर्खियों में आया था, जब उस ने एक फिल्म ‘मैसेंजर औफ गौड’ बनाई थी. इस फिल्म में उस ने खुद की चमत्कारी इमेज को दिखा कर भक्तों को लुभाने की कोशिश की थी.

इस के पहले साल 2014 में शौकिया तौर पर ही उस के गाए गानों का एक अलबम भी रिलीज हुआ था.

कई समानताओं के बाद भी राम रहीम कई मामलों में दूसरे कई बाबाओं से अलग भी है. 25 अगस्त, 2017 को पंचकुला और सिरसा की हिंसा में मारे गए उस के भक्त गरीब तबके और छोटी जातियों के थे. अगर लाखों लोग अंधे हो कर उस के गलत होने पर भी उस का बचाव कर रहे थे, तो इसे एक अलग नजरिए से देखा जाना जरूरी लगता है, जिस का गहरा ताल्लुक ब्राह्मणवाद से है.

देश की 55 फीसदी आबादी बहुत पिछड़ों, दलितों और आदिवासियों की है, जिन्हें आएदिन ऊंची जाति वाले धर्म और जाति के नाम पर सताते हैं. गरीब छोटी जाति वालों का कोई सियासी सामाजिक या धार्मिक माईबाप नहीं है. लिहाजा, ये अपनी छोटीमोटी परेशानियों का हल भी चमत्कारों में ढूंढ़ा करते हैं.

चूंकि कोई रविशंकर या कोई शंकराचार्य इन को घास नहीं डालता, इसलिए ये लोग खुद अपने बाबा बनाने लगे, देवीदेवता तो इन के पहले से अलग हैं ही.

बाबा राम रहीम कोई आसमान से उतरा फरिश्ता नहीं है, बल्कि वह भी दूसरे कई ऐयाश और रंगीनमिजाज बाबाओं की तरह कई कमजोरियों का जीताजागता पुतला है, जो दौलत, जायदाद और खूबसूरत लड़कियों के रसिया होते हैं.

देशभर में 2 तरह के धर्मगुरु या बाबा हैं. पहले ब्राह्मण और दूसरे गैरब्राह्मण. दोनों ही तरह के बाबाओं का एकलौता मकसद बहुत सा पैसा कमा लेना और अपनी बादशाहत खड़ा कर लेना होता है. इस बाबत वे धर्म के चमत्कारों का प्रचार करते हैं और फिर खुद भगवान बन कर लोगों के दुख और परेशानियों को दूर करने के नाम पर दक्षिणा ऐंठते हैं.

ब्राह्मण बाबाओं के मानने वाले आमतौर पर ऊंची जाति वाले ही होते हैं, जिन में ब्राह्मणों के अलावा क्षत्रिय, कायस्थ और बनिए खास हैं. इन जातियों के लोगों के पास खासा पैसा होता है. इन की परेशानियां भी अलग तरह की होती हैं. पढ़ेलिखे और आधुनिक होने का दम भरने वाली इन जातियों के 15-20 फीसदी लोग छोटी जाति वालों से खुला बैर रखते हैं. लिहाजा, इन के गुरु भी गरीबों और दलितों को दीक्षा नहीं देते यानी उन्हें अपना शिष्य नहीं बनाते, क्योंकि ऐसा करने से ऊंची जाति वाले लोग उन से कट जाएंगे.

गैरब्राह्मण बाबाओं ने एक बड़ी आबादी, जो गरीब और दलित तबके की है, के लिए अपनी दुकानें शुरू कर दीं. आसाराम, रामदेव और राम रहीम इसी जमात के बाबा हैं, जिन्होंने सभी के लिए अपने मठों के दरवाजे खोल दिए.

एक आदमी से सौ रुपए दान में लो, उस से तो बेहतर है कि सौ लोगों से एक एक रुपए लो की थ्यौरी पर चलते इन गैरब्राह्मण बाबाओं ने भी अपनीअपनी बादशाहत खड़ी कर ली.

पर ब्राह्मण बाबाओं की तरह ये अपनी बादशाहत संभाल नहीं पाए. इस की अहम वजह यह है कि गैरब्राह्मण बाबाओं को महज वोटों और नोटों के लिए पूछा और पूजा गया, नहीं तो सभी लोग मानते हैं कि ये लोग कोई वेदपुराणों और दूसरे धर्मग्रंथों के जानकार नहीं हैं. इन का सीधा कनैक्शन भगवान से नहीं है, क्योंकि ये जाति के ब्राह्मण नहीं हैं.

इस के उलट ब्राह्मण बाबाओं ने फूंकफूंक कर कदम रखा, जिन में से एक अहम और दिलचस्प है औरतों से परहेज करना, जबकि गैरब्राह्मण बाबाओं ने औरतों को भी अपने संगठनों में शामिल करना शुरू कर दिया.

छोटे तबके की इन औरतों की परेशानियां इतनी सी भर रहती हैं कि कहीं सासबहू की पटरी नहीं बैठ रही, किसी का शौहर दूसरी औरत के चक्कर में पड़ा है, तो कोई घर में हो रही कलह से परेशान है.

आसाराम और राम रहीम जैसे बाबाओं ने भूत भगा कर और भभूत दे कर उन्हें ठगना शुरू कर दिया और जरूरत से कम वक्त में अपनी सल्तनत खड़ी कर ली, तो ब्राह्मण बाबाओं की भौंहें तिरछी होना शुरू हो गईं.

ऐसे फंसा राम रहीम

गलत नहीं कहा जाता कि झगड़े की जड़ तीन, जर, जोरू और जमीन. आसाराम की तरह राम रहीम की सजा की भी अहम वजह एक लड़की बनी.

बात साल 2002 की है, जब 10 मई को तब के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को सिरसा के डेरा सच्चा सौदा की एक साधु लड़की ने गुमनाम खत लिखा था.

उस लड़की ने अपनी लिखी चिट्ठी में गुहार लगाई थी कि बाबा राम रहीम उस का यौन शोषण यानी बलात्कार करता है. उस लड़की के मुताबिक, उस के घर वाले राम रहीम के अंधभक्त

हैं, इसलिए उसे भी डेरे में रख कर संन्यासिन बना दिया गया.

एक दिन राम रहीम ने फिल्मी स्टाइल में उस लड़की को अपने बैडरूम, जिसे गुफा कहा जाता है, में बुलाया. वहां का नजारा देख कर वह सकते में आ गई.

बाबा के बैडरूम में जाते वक्त लड़की बेहद खुश थी कि आज तो भाग्य खुल गए, जो भगवान के दर्शन होंगे. पर बैडरूम का नजारा देखते ही वह भांप गई कि राम रहीम कोई भगवान नहीं, बल्कि साधु के भेष में शैतान है.

बाबा के हाथ में टैलीविजन का रिमोट था और स्क्रीन पर ब्लू फिल्म चल रही थी. सिरहाने रिवाल्वर देख कर वह  डर गई.

राम रहीम ने लड़की को पास बैठा कर उसे पानी पिलाया और फिर पुचकार कर सैक्स संबंध बनाने के लिए उकसाने लगा. इस बाबत उस ने धर्मग्रंथों का हवाला देते हुए कहा कि हर एक शिष्य का तनमनधन सब गुरु का होता है, तो इस में लिहाज कैसा. कृष्ण भी यही करता था. उस की तो हजारों गोपियां थीं.

उस लड़की के मुताबिक, लंबीचौड़ी, मीठी और डराने जैसी कड़वी बातें करते वक्त बाबा ने यह धौंस भी उसे दी थी कि वह चाहे तो उसे मार कर दफना भी सकता है और श्रद्धा के चलते कोई कुछ नहीं पूछेगा. बाबा ने पैसे और ताकत के बूते इंसाफ को खरीदने की बात भी कही.

वह लड़की फिर भी तैयार नहीं हुई, तो राम रहीम ने उस का जबरन बलात्कार किया और फिर आगे भी करता रहा.

उस लड़की ने प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को लिखी चिट्ठी में यह भी कहा कि संन्यासिन बनाई गई लड़कियों से 16-18 घंटे तक सेवा के नाम पर बेगारी कराई जाती है और उन्हें सफेद कपड़े पहनने के लिए मजबूर किया जाता है. साधु लड़कियों को मर्दों से दूर रखा जाता है और उन्हें आपस में बात भी नहीं करने दी जाती.

जब ये बातें उस लड़की ने अपने घर वालों को बताईं, तो उन्होंने बजाय कुछ सुनने के उसे ही झिड़क दिया कि तुम्हारे मन में गुरु के लिए बुरे खयाल आते हैं.

लंबीचौड़ी इस चिट्ठी की एक कौपी पंजाब, हरियाणा हाईकोर्ट को भी लड़की ने भेजी थी. हाईकोई ने चिट्ठी को संजीदगी से लेते हुए उस की पड़ताल के लिए उसे सिरसा के सैशन जज को भेजा. बाद में इस की जांच सीबीआई को दिसंबर, 2003 में सौंप दी गई.

उस लड़की को ढूंढ़ निकालने में ही 3 साल लग गए. उस के मिलने पर शिकायतों व आरोपों की तसल्ली कर लेने के बाद जुलाई, 2007 में सीबीआई ने बाबा राम रहीम के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की.

अगस्त, 2008 में मुकदमा शुरू हुआ और राम रहीम के खिलाफ आरोप तय हुए. साल 2016 तक यह मुकदमा चला. इस दौरान दोनों पक्षों की तरफ से कुल 52 गवाह पेश हुए.

जून, 2017 में जब अदालत ने राम रहीम के विदेश जाने पर रोक लगा दी, तो उस का माथा ठनका था, लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी.

20 जुलाई, 2017 से रोजाना इस मामले की सुनवाई शुरू हुई. 17 अगस्त, 2017 को कार्यवाही उम्मीद से कम वक्त में खत्म हुई और अदालत ने फैसले के लिए 25 अगस्त, 2017 की तारीख मुकर्रर की.

इस दिन जब राम रहीम पर लगे बलात्कार और दूसरे आरोप अदालत ने सही करार दिए, तो पंचकुला और सिरसा में जो हुआ, वह कई लिहाज से चिंता की बात थी. ऐसा लगा, मानो अदालत ने बाबा को गुनाहगार ठहरा कर खुद कोई गुनाह कर दिया है.

28 अगस्त, 2017 को उसे 10-10 यानी कुल 20 साल की कैद की सजा सुनाई गई. शाही और आलीशान जिंदगी जीने वाले बाबा को आम कैदियों की तरह जेल भेज दिया गया. उस दिन भी वह जज के आगे हाथ जोड़े रहम की भीख मांग रहा था.

राम रहीम को दोषी ठहराने वाले सीबीआई के स्पैशल जज जगदीप सिंह अपनी ईमानदारी के लिए जाने जाते हैं. वे खुद भी हरियाणा के रहने वाले हैं. फैसले के बाद उन की निडरता की तारीफ हर किसी ने की थी और जिस बाबा राम रहीम के पांवों में करोड़ों लोग बिछे रहते थे, जिस के पैर छू कर नेता खुद को धन्य समझने लगते थे.

25 अगस्त और फिर 28 अगस्त को जज जगदीप सिंह के सामने जब वह हाथ जोड़े खड़ा थरथर कांप रहा था, तभी उस के भगवान होने की पोल खुल गई थी.

अपनी ताकत, रसूख और दबंगई के इस्तेमाल के बाद भी राम रहीम सजा से बच नहीं सका. उस पर एक पत्रकार और एक अखबार ‘पूरा सच’ के संपादक रामचंद्र छत्रपति की हत्या का शक भी गहरा रहा है, जिन्होंने पहली दफा पीडि़त लड़की की चिट्ठी को अपने अखबार में छापा था. डेरा सच्चा सौदा के मैनेजर रणजीत सिंह की भी हत्या हुई थी, जिस की बहन ने यह चिट्ठी लिखी थी.

छले जाते हैं लोग

क्या पंचकुला और सिरसा की हिंसा का हमीरपुर के गढ़ा गांव जैसे लाखों विवादों से कोई कनैक्शन है? इस सवाल का जवाब हां में ही निकलता है. देश की ज्यादातर आबादी दलित, आदिवासियों और पिछड़ों की है, जो बाबाओं को मानने और पूजने के लिए किसी भी शर्त को पूरा करने को तैयार रहते हैं.

25 अगस्त की हिंसा के पीछे समाज के कमजोर तबके के इन लोगों की मंशा यह दिखाने की भी थी कि उन का बाबा जिसे वे पिता भी कहते हैं, किसी रामदेव, रविशंकर या शंकराचार्य से कम ताकतवर नहीं है.

हिंसा के लिए मुहरा बन कर ताकत दिखाने की गलती यह तबका सदियों से करता रहा है, जिस की वजह ब्राह्मणों और दूसरी ऊंची जाति वालों द्वारा धर्म और जाति की बिना पर इन्हें सताना है. दरअसल, यह भड़ास इस बात का बदला ही थी.

राम रहीम जैसे बाबा इन की आस्था और ताकत की कद्र नहीं करते, उलटे जब ये उन के दिमागी तौर पर गुलाम बन जाते हैं, तो इन्हीं का शोषण शुरू कर देते हैं. वे इन से आश्रमों में बेगारी करवाते हैं उन की औरतों की इज्जत लूटते हैं और उन की ताकत या भक्ति की सौदेबाजी नेताओं से कर तगड़ा पैसा बनाते हैं.

हां, एवज में एकलौता अच्छा काम कुछ जरूरतमंदों की मदद कर के कर देते हैं, जिस से लोग भक्त बने रहें. बीमारों का मुफ्त इलाज और उन के कुछ बच्चों को थोड़ीबहुत तालीम मुहैया करा देना इन में खास है.

ऊंचे समाज द्वारा सताया गया यह तबका इसी बात पर खुश हो लेता है कि सामाजिक और धार्मिक तौर पर भी इन का कोई दबंग और रसूखदार माईबाप और सहारा है. इस दौरान इन का ध्यान इस तरफ नहीं जाता कि राम रहीम जैसे बाबाओं की खुद की कोई चमत्कारिक या दैवीय ताकत नहीं होती. उन की असल ताकत तो ये अंधभक्त होते हैं, जिन का इस्तेमाल आलीशान मठ, आश्रम और डेरे बनाने में किया जाता है, जिस से इतमीनान से बेधड़क हो कर ऐयाशी की जा सके.

गरीब दलितपिछड़ों में तालीम और जागरूकता की कमी है, जिस का फायदा सभी उठाते हैं, इसलिए एक अकेले राम रहीम पर हायहाय मचाना एकतरफा बात है. इस तबके को जिस दिन यह समझ आ जाएगा कि तमाम भगवान, धर्म और उस के चमत्कार उस का शोषण करने के लिए रचे गए हैं, उस दिन किसी हिंसा की जरूरत नहीं पड़ेगी.

समाज का यह धार्मिक कचरा खुद ब खुद छंट जाएगा. मुहरों की तरह इस्तेमाल होता यह ताकतवर तबका सब से ज्यादा मेहनती और हिम्मती है, जिस की दिशा गलत जगह पंडेपुजारियों और इन बाबाओं ने अपनी खुदगर्जी और ऐयाशी के लिए मोड़ रखी है.

अगर यह तबका इस बात को समझ ले कि उस की भलाई का रास्ता राजनीति या धर्म से नहीं, बल्कि तालीम और रोजगार से हो कर जाता है, तो उस का शोषण भी बंद हो जाएगा. लेकिन इस के लिए जरूरी है कि पहले यह समझ लिया जाए कि कोई भगवान नहीं होता, कोई चमत्कार नहीं होता, जिसके पीछे वे एक बेवजह का जुनून पाले रहते हैं.

चीन द्वारा तेजी से चालू है भारत की घेराबंदी

पाकिस्तान में चाइना-पाक इकोनौमिक मार्ग व अफ्रीका के तट पर बसे डिजीबाउटी के बाद चीन ने अब श्रीलंका में 99 साल के पट्टे पर एक बंदरगाह ले लिया है. चीन द्वारा भारत की घेराबंदी तेजी से चालू है. भारत ने बदले में अमेरिका व जापान से सहायता ली है पर ये दोनों देश अपने चरम को पार कर चुके हैं और उन का विकास बंद हो चुका है.

भारत की भारीभरकम युवा जनता छटपटा रही है कि उसे काम के अवसर मिलें पर ये अवसर अब चारों ओर चीन हड़प रहा है. चीनी श्रमिक सब देशों में फैल रहे हैं और वे अफ्रीका में ही नहीं, दक्षिणी अमेरिका तक पहुंच रहे हैं.

चीन ने भारत के उत्तर में डोकला?म में मोरचा खोल कर भारत को सकते में डाल रखा है और हर रोज युद्ध की धमकी दे रहा है. भारत पश्चिमी देशों की ओर समर्थन पाने की निगाहों से देख रहा है पर इस मामले में कोई उलझना नहीं चाहता क्योंकि चीन अधिकांश देशों में भारीभरकम निवेश कर चुका है. चीन संयुक्त राष्ट्र संघ का स्थायी सदस्य है. वह भारत के किसी भी प्रस्ताव को वीटो कर सकता है.

भारत को फिलहाल चीन से मुकाबला करने के लिए बहुत ज्यादा मेहनत करनी होगी. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने प्रारंभ में जो विदेशी मामलों में उत्साह दिखाया था वह अब फीका पड़ गया है और कहीं से भी उस का लाभ नहीं दिख रहा है. गौरक्षा, नोटबंदी, जीएसटी और विपक्षियों को तोड़ने की जगह प्रधानमंत्री को भारत की आन बचाए रखने के लिए विदेशी मामलों में सूझबूझ दिखानी होगी. केवल भाषणों और व्यवहार से बात नहीं बनेगी.

भारतीय मूल के विदेशों में बसे लाखों लोगों का इस्तेमाल किया जाना अब बहुत जरूरी हो गया है. भाजपा जब सत्ता में आई थी तो उस ने हिंदू कट्टरपन के कारण बहुत उत्साह दिखाया था पर अब वह उबाल ठंडा पड़ गया है. भाजपाइयों की मानसिकता यह है कि चार पैसे नहीं बन रहे तो वे क्यों भारत के नाम पर मरेंखपें.

चीन-भारत द्वंद्व सदियों चलेगा, इस में संदेह नहीं रह गया है. जैसी यूरोप में जरमनी, फ्रांस और ब्रिटेन में लगातार एकदूसरे से होड़ लगी रही, वैसी ही यहां दिख रही है. भारत को हरगिज चीन का पलड़ा भारी नहीं होने देना है.

बेमौत मारा गया काला

4 मार्च, 2017 की सुबह काम पर जाने के लिए जैसे ही मक्खन सिंह घर से निकला, सामने से जंगा आता दिखाई दिया. वह उसी की ओर चला आ रहा था, इस का मतलब था कि वह उसी से मिलने आ रहा था. उस ने जंगा से हाथ मिलाते हुए पूछा, ‘‘सुबहसुबह ही इधर, कोई खास काम…?’’

‘‘मैं तुम्हारे पास इसलिए आया था कि तुम्हें काले के बारे में कुछ पता है?’’

‘‘नहीं, उस के बारे में तो कुछ पता नहीं है. उस से तो मुझे जरूरी काम था, पर वह मिल ही नहीं रहा है.’’ मक्खन सिंह ने पछतावा सा करते हुए कहा.

‘‘मैं ने तो उसे कई बार फोन भी किया, पर बात ही नहीं हो सकी.’’

‘‘मैं तो उसे लगातार 3 दिनों से फोन कर रहा हूं. हर बार एक ही जवाब मिल रहा है कि उस का फोन बंद है. यार एक बहुत बड़ा ठेका मिल रहा है, पार्टी पैसे ले कर मेरे पीछे घूम रही है, पर काले के बिना बातचीत रुकी पड़ी है.’’ मक्खन सिंह ने कहा.

‘‘एक काम मेरे पास भी है. रेट भी ठीकठाक है, पर काले के बिना बात नहीं बन रही. पता नहीं वह कहां गायब हो गया है?’’

जंगा और मक्खन काफी देर तक काले के बारे में ही बातें करते रहे. अंत में कुछ सोचते हुए जंगा ने कहा, ‘‘मक्खन, क्यों न हम एक काम करें. हमारी एक दिन की मजदूरी का नुकसान तो होगा, पर काले के बारे में पता तो चल जाएगा.’’

‘‘लेकिन मुझे तो उस का घर भी नहीं मालूम.’’

‘‘घर तो मैं भी नहीं जानता, पर इतना जरूर जानता हूं कि वह बस्ती अजीतनगर में कहीं किराए पर रहता है. वहां चल कर लोगों से पूछेंगे तो कोई न कोई उस के बारे में बता ही देगा.’’

इस तरह जंगा और मक्खन काम पर जाने के बजाए काला की तलाश में अजीतनगर जा पहुंचे.

काला टोपी वाला के नाम से मशहूर नवनीत सिंह जंगा, मक्खन, रमेश और नरेश आदि के साथ मिल कर मकान बनाने का ठेका लेता था. सभी राजमिस्त्री थे, इसलिए सब मिलजुल कर काम करते थे और जो फायदा होता था, आपस में बांट लेते थे.

नवनीत सिंह काला टोपी वाला के नाम से इसलिए मशहूर हो गया था, क्योंकि उस का घर का नाम काले था. वह हर समय सिर पर काली टोपी लगाए रहता था, इसलिए लोग उसे काली टोपी वाले कहने लगे थे. काले बेहद शरीफ, नेकदिल और मेहनती युवक था.

वह जिला मानसा के गांव बीरखुर्द कलां के रहने वाले अजायब सिंह का बेटा था, लेकिन काम की वजह से वह लगभग 5 साल पहले जिला संगरूर में आ कर रहने लगा था. यहां उस का काम ठीकठाक चल निकला तो वह उपनगर बस्ती अजीतनगर में राकेश के मकान का एक हिस्सा किराए पर ले कर उसी में परिवार के साथ रहने लगा था. उस के परिवार में पत्नी कुलदीप कौर के अलावा 2 बच्चे थे.

नवनीत सिंह उर्फ काला टोपी वाला की शादी सन 2007 में कुलदीप कौर के साथ तब हुई थी, जब काला अपने मांबाप के साथ गांव में रहता था. एक दिन वह नजदीक के गांव में किसी के मकान की छत डाल रहा था, तभी उस की मुलाकात कुलदीप कौर से हुई थी. वह पड़ोस में रहती थी. काम करने के दौरान काला और कुलदीप कौर की आपस में आंखें लड़ गईं. मकान का काम पूरा होतेहोते दोनों में ऐसा प्यार हुआ कि दोनों ने शादी करने का फैसला कर लिया.

दोनों की जाति अलगअलग थी, इसलिए घर वाले शादी के लिए तैयार नहीं थे. ऐसे में एक ही सूरत थी कि वे घर से भाग कर शादी कर लें. आखिर उन्होंने यही किया. दोनों ने भाग कर शादी कर ली और अदालत में शादी रजिस्टर्ड करवा कर पतिपत्नी की तरह शान से रहने लगे. समय के साथ दोनों के परिवार भी शांत हो कर बैठ गए और उन का अपनेअपने घर आनाजाना शुरू हो गया.

काला का घर ढूंढते हुए जंगा और मक्खन दोपहर को राकेश घर पहुंचे तो जिस हिस्से में काला रहता था, उस के दरवाजे पर दस्तक दी. तब अंदर से पूछा गया, ‘‘कौन?’’

जंगा ने पूरी बात बता कर काला से मिलने की इच्छा जताते हुए कहा कि उस से उस का मिलना बेहद जरूरी है, क्योंकि उस की वजह से काम के साथसाथ पैसे का भी नुकसान हो रहा है.

पूरी बात सुनने के बाद कुलदीप कौर ने बिना दरवाजा खोले ही अंदर से कहा, ‘‘वह तो कहीं बाहर गए हैं. घर पर नहीं हैं. कब लौटेंगे, यह भी बता कर नहीं गए हैं. जब आएंगे, तब आ कर मिल लेना. अभी आप लोग जाइए.’’

कुलदीप कौर का टका सा जवाब सुन कर दोनों एकदूसरे का मुंह देखने लगे. कहां तो वे यह सोच कर आए थे कि काला मिले न मिले, उस के घर चायनाश्ता तो मिलेगा ही, लेकिन यहां तो चायपानी की कौन कहे, 2 बार कहने पर दरवाजा भी नहीं खुला.

कुलदीप कौर के इस व्यवहार से दोनों असमंजस में थे. मामला क्या है, उन की समझ में नहीं आ रहा था. बेआबरू हो कर वे दरवाजे से लौटने के लिए पलटे ही थे कि काला के पिता अजायब सिंह वहां आ गए. उन्होंने भी काला से मिलने के लिए दरवाजा खटखटाया, पर कुलदीप कौर ने यह कह कर दरवाजा नहीं खोला कि अभी वह कोई जरूरी काम कर रही है, इसलिए वह कल आएं.

जंगा और मक्खन अभी वहीं खडे़ थे. दोनों ससुर और बहू के बीच होने वाली बातें भी सुन रहे थे. अजायब सिंह बड़ी बेबसी से कह रहे थे, ‘‘3 दिनों से कोशिश कर रहा हूं अपने बेटे से मिलने की, पर यह औरत मिलने नहीं दे रही है. रोज कोई न कोई बहाना बना कर लौटा देती है. कल मैं अपने कुछ रिश्तेदारों के साथ काले से मिलने आया था, तब इस ने बड़ी चालाकी से हमें लौटा दिया था.

‘‘यह हम सभी को बाजार ले गई और वहां बोली, ‘तुम सभी घर जाओ, मैं शाम को उन्हें भेज दूंगी.’ हम सब इंतजार करते रहे, काला नहीं आया. तब मुझे फिर आना पड़ा. अभी भी देखो न, कुछ बता नहीं रही है.’’

‘‘पापाजी बुरा मत मानना, हमें तो माजरा ही कुछ समझ में नहीं आ रहा है. भला कोई अपने ससुर से इस तरह का व्यवहार करता है?’’ जंगा ने कहा तो बुजुर्ग अजायब सिंह का सिर शरम से झुक गया. उस बीच मकान मालिक राकेश भी वहां आ पहुंचा. पूरी बात सुन कर उस ने कहा, ‘‘मुझे तो कुछ और ही संदेह हो रहा है. कल से मकान के काले वाले हिस्से से अजीब सी दुर्गंध आ रही है. 2 दिनों से कुलदीप भी दरवाजा नहीं खोल रही है. पापाजी मेरी बात मानो तो पुलिस को खबर कर दो. खुद ही पता चल जाएगा कि माजरा क्या है?’’

यह बात सभी को उचित लगी. सभी थाना सिटी पहुंचे और थानाप्रभारी इंसपेक्टर जसविंदर सिंह टिवाणा से मिल कर उन्हें पूरी बात विस्तार से बताई. इस के बाद उन्होंने अजायब सिंह से तहरीर ले कर मामला दर्ज कराया और इस मामले की जांच चौकीप्रभारी बलजिंदर सिंह चड्ढा को सौंप दी.

चौकीप्रभारी बलजिंदर सिंह अजीतनगर स्थित काला के मकान पर पहुंचे और कुलदीप कौर से काला के बारे में पूछा. कुलदीप कौर पुलिस को भी गुमराह करते हुए कहती रही कि वह बाहर गए हैं. मकान से दुर्गंध आ रही थी, इसलिए बलजिंदर सिंह को मामला संदेहास्पद लगा. उन्होंने फोन द्वारा पूरी बात थानाप्रभारी को बताई तो वह एएसआई बलकार सिंह, तरसेम कुमार और अशोक कुमार को साथ ले कर अजीतनगर स्थित राकेश के मकान पर आ पहुंचे.

उन्होंने भी कुलदीप कौर से काला के बारे में पूछा तो अन्य लोगों की तरह उस ने उन्हें भी टालने की कोशिश करते हुए बताया कि वह शहर से बाहर गए हैं. कहां गए हैं, यह बता कर नहीं गए हैं. हार कर थानाप्रभारी ने साथ आई महिला हैडकांस्टेबल सुरजीत कौर को इशारा किया तो उस ने कुलदीप कौर से थोड़ी सख्ती की तो उस ने कहा, ‘‘काला की हत्या हो गई है. उस की लाश रसोईघर में पड़ी है.’’

काला की लाश रसोईघर में पड़ी होने की बात सुन कर सब हैरान रह गए. थानाप्रभारी जसविंदर सिंह साथियों के साथ मकान के अंदर पहुंचे तो रसोईघर में काला की लाश पड़ी मिल गई. अब तक वहां काफी भीड़ जमा हो चुकी थी. पुलिस लाश की जांच करने में लग गई, तभी मौका पा कर कुलदीप कौर फरार हो गई.

लाश अभी तक पूरी तरह सड़ी नहीं थी, पर सड़ने जरूर लगी थी. मृतक काला के पेट में एक गहरा सुराख था, जिस में से खून निकल कर जम कर काला पड़ चुका था. घटनास्थल की सारी काररवाई निपटा कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भिजवा दिया गया.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार, काला के पेट में कोई तेजधार वाली नुकीली चीज घुसेड़ कर घुमाई गई थी, जिस से नाभि चक्र एवं आंतें कट गई थीं. इसी वजह से उस की मौत हो गई थी. अजायब सिंह की तहरीर पर काला की हत्या का मुकदमा दर्ज कर पुलिस कुलदीप कौर की तलाश में जुट गई. उस के मायके में छापा मारा गया, पर वह वहां नहीं मिली.

आखिर 6 मार्च, 2017 को मुखबिर की सूचना पर उसे पटियाला जाने वाली सड़क पर बने बसअड्डे से गिरफ्तार कर लिया गया. थाने ला कर कुलदीप कौर से पूछताछ की गई तो उस ने अपना अपराध स्वीकार करते हुए काला की हत्या की जो कहानी सुनाई, वह संदेह में उपजी हत्या की कहानी थी.

दरअसल, काला शरीफ, ईमानदार होने के साथसाथ हंसमुख और मिलनसार भी था. दूसरों के दुखदर्द को समझना, लोगों की मदद करना और सब से हंसहंस कर बोलना उस के स्वभाव में था. उस के इसी स्वभाव से कुलदीप कौर को जलन होती थी. यही नहीं, वह उसे गलत भी समझती थी.

इन्हीं छोटीछोटी बातों को ले कर काला और कुलदीप कौर में लड़ाईझगड़ा ही नहीं, मारपीट भी हो जाती थी. मामला शांत होने पर काला कुलदीप कौर को प्यार से समझाता था कि वह बेकार ही उस पर शक करती है.

नवनीत सिंह उर्फ काला पत्नी के इस शक से काफी डरता था. उसे अपने बच्चों के भविष्य की चिंता थी. गलीपड़ोस की औरतों को ले कर ही नहीं, कुलदीप कौर अपनी जेठानी को ले कर भी संदेह करती थी. पहले तो काला यह सब बरदाश्त करता रहा, पर जब उस ने उस के संबंध जेठानी से होने की बात कही तो काला बरदाश्त नहीं कर सका.

दरअसल, काला भाभी को मां की तरह मानता था. वह भाभी की बड़ी इज्जत करता था. जबकि कुलदीप कौर उस के पवित्र रिश्ते को तारतार करने पर तुली थी. काला ने उसे न जाने कितनी बार समझाया, पर वह अपनी आदत से मजबूर थी. उस के दिमाग की गंदगी निकल ही नहीं रही थी. काला के समझाने का उस पर कोई असर नहीं पड़ रहा था. जब देखो, तब वह काला को जेठानी के साथ जोड़ बुराभला कहती रहती थी.

कुलदीप कौर काला पर इस बात के लिए भी दबाव डालती रहती थी कि वह अपने भाई और पिता से मिलने उन के घर न जाए. जबकि काला पिता और भाइयों को नहीं छोड़ना चाहता था. कुलदीप कौर ने उसे कई बार धमकी दी थी कि अगर उस ने उस की बात नहीं मानी तो वह उसे छोड़ कर चली जाएगी या फिर वह उसे ऐसा सबक सिखाएगी कि वह भूल नहीं पाएगा.

कुलदीप कौर ने जब देखा कि काला उस की बात नहीं मान रहा है और पिता तथा भाइयों से मिलने जाता है तो उस ने काला को ही ठिकाने लगाने का फैसला कर लिया. 12 मार्च की रात उस ने काला के खाने में नींद की गोलियां मिला दीं. खाना खा कर काला गहरी नींद सो गया तो कुलदीप कौर ने बर्फ तोड़ने वाला सूजा पूरी ताकत से काला के पेट में घुसेड़ कर तेजी से चारों ओर कई बार घुमा दिया, जिस से उस की मौत हो गई.

काला को मौत के घाट उतार कर कुलदीप कौर उस की लाश को घसीट कर रसोईघर में ले गई और उसे वहां वैसे ही छोड़ दिया. अगले दिन वह रोज की तरह सामान्य रूप से अपने काम करती रही. उस ने काला का फोन भी बंद कर दिया था. इस बीच उस ने बच्चों को रसोईघर में नहीं जाने दिया.

रातदिन कुलदीप कौर लाश को ठिकाने लगाने के बारे में सोचती रही, पर उस की समझ में नहीं आ रहा था कि वह लाश को कहां ले जाए. अंत में लोग जब काले को तलाशते उस के घर पहुंचे तो उस की हत्या का राज खुल गया.

6 मार्च, 2017 को थानाप्रभारी जसविंदर सिंह टिवाणा ने कुलदीप कौर को अदालत में पेश कर एक दिन के रिमांड पर लिया. रिमांड अवधि में काला की हत्या में प्रयुक्त बर्फ तोड़ने वाला सूजा कुलदीप कौर की निशानदेही पर बरामद कर लिया गया. इस के बाद रिमांड अवधि समाप्त होने पर उसे पुन: अदालत में पेश किया गया, जहां से उसे जिला जेल भेज दिया गया.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

इस हीरोईन के लिए सोशल मीडिया बना सिरदर्द

आजकल सभी बौलीवुड कलाकार सोशल मीडिया पर काफी एक्टिव रहते हैं और ये प्लेटफार्म सभी को बेहद पसंद भी आ रहा है. वो यहां अपनी प्रोफेशनल लाइफ से लेकर पर्सनल लाइफ तक की सारी बातें अपने फैंस के साथ शेयर करते हैं. लेकिन काजोल ने सोशल मीडिया को सिरदर्द बताया है.

अपने बच्चों और पति के साथ फोटोज शेयर करने वाली काजोल ने हाल ही में कहा कि उन्हें रोजाना अपने फैंस से बात करना या सोशल मीडिया पर एक्टिव रहना पसंद नहीं है. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक काजोल ने कहा, ‘मुझे सोशल मीडिया का कुछ हिस्सा तो पसंद है लेकिन वहां मौजूद सब कुछ पसंद हो ऐसा नहीं है.

इसके आगे उन्होने कहा, मुझे पता है कई लोगों को सोशल मीडिया पर रहना बहुत अच्छा लगता है और दूसरे के साथ सोशल मीडिया पर इंगेज रहना भी, लेकिन मैं उनमें से एक नहीं हूं. मुझे कई बार ये बहुत जिम्मेदारी और सिरदर्दी वाला काम लगता है.

बता दें कि कुछ दिन पहले काजोल ने अपने फेसबुक पेज पर एक वीडियो शेयर किया था. इस वीडियो में वह अपने दोस्तों के साथ पार्टी कर रही थीं. यहां उन्होंने अपने दोस्त से यह पूछा कि जो वह खाने जा रही हैं उसका नाम बताया जाए. दोस्त ने कहा था- बीफ.

इस वीडियो के सामने आने के बाद से ही यूजर्स सोशल मीडिया पर काजोल को ट्रोल करने लगे थे. बाद में लोगों के ट्रोल करने पर उन्होंने सफाई दी थी. लोगों ने लिखा कि जब बीफ खाने वाले देशद्रोह है तो क्या काजोल देशद्रोही नहीं हुईं. अपने वीडियो पर खुद को घिरता हुआ देख काजोल ने अपने फेसबुक पेज से वो वीडियो डिलीट कर दिया था.

‘आप’ नेता को कार्यकर्ता ने जड़े थप्पड़

यमुनापार के शाहदरा विधानसभा में रविवार को आम आदमी पार्टी की एक बैठक के दौरान जबरदस्त हंगामा हुआ. एक कार्यकर्ता ने निगम चुनाव में ‘आप’ की प्रत्याशी रहीं निशा शर्मा को थप्पड़ जड़ दिया. इसके बाद कार्यकर्ता दो गुटों में बंट गए.

विधानसभा अध्यक्ष और स्थानीय विधायक राम निवास गोयल ने लोगों का शांत करने का प्रयास किया, लेकिन निशा ने पुलिस कॉल कर दी. इतना ही नहीं विवेक विहार थाने पहुंच शिकायत भी दे दी है. वहीं आरोपी की तरफ से भी निशा के कार्यकर्ताओं पर बदसलूकी करने की शिकायत दी गई है. पुलिस मामले की जांच कर रही है. निशा शर्मा पिछले चुनाव में झिलमिल से चुनाव लड़ी थीं, लेकिन वह हार गई थीं.

रविवार को नवनियुक्त जिलाध्यक्ष डॉ. सुजीत आचार्य की अध्यक्षता में विवेक विहार स्थित ओसवाल भवन में बैठक बुलाई गई थी. इसमें वार्ड प्रभारी नवीन चौहान कार्यकर्ताओं को संबोधित कर रहे थे. निशा शर्मा चुपचाप बैठी हुई थीं. निशा का आरोप है कि इस बीच अचानक आरोपी ने थप्पड़ मारते हुए बदसलूकी की. दोनों गुटों को समझाने-बुझाने का काम देर शाम तक जारी रहा. उधर,पुलिस ने शिकायत के आधार पर जांच करने की बात कही है.

बताया जा रहा है कि निशा शर्मा को स्थानीय नेतृत्व के विरोध के बावजूद चुनाव में टिकट मिला था. हालांकि कारण क्या है, यह तो जांच के बाद ही साफ हो पाएगा. लेकिन, पार्टी के अंदर दबी जुबान से कुछ लोगों ने बताया कि सारा विवाद निगम चुनाव के दौरान टिकट बंटवारे को लेकर हुआ. हालांकि पहले भी कुछ लोगों में इस बात को लेकर विवाद हुआथा, लेकिन मामले को सुलझा लिया गया.पर रविवार की घटना ने पार्टीके अंदर के अनुशासन को तार-तार कर दिया. बताया जा रहा है कि पार्टी इसको लेकर सख्त रवैया अपनाएगी.

पोंगापंथ : काटे सांप, मारे अंधविश्वास

उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले के रहने वाले हनीफ की पत्नी नगीना को एक दिन सांप ने डस लिया. परिवार वाले नगीना को सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र ले गए. प्राथमिक उपचार के साथ ही डाक्टर ने उसे किसी बड़े अस्पताल में ले जा कर बेहतर इलाज कराने की सलाह दी, लेकिन वे उसे कसबा जहांगीराबाद में एक तांत्रिक के पास ले गए.

वह तांत्रिक कुछ नहीं कर पाया, तो नगीना को दूसरे तांत्रिकों के पास भी ले जाया गया. इसी भागादौड़ी के बीच नगीना की सांसों की डोर टूट गई. इस के बाद भी एक झाड़फूंक करने वाले ने रातभर लाश को रखवाया और सुबह गंगनगर ले गया.

उसी तांत्रिक के कहने पर नगीना के हाथपैर बांध कर नहर में तैराया गया. झाड़फूंक के दौरान ही उसे डुबोया व निकाला जाता रहा. सभी को उम्मीद थी कि तांत्रिक नगीना की लाश में जान डाल देगा, पर घंटों चले तमाशे के बाद भी जब नगीना के जिस्म में जान नहीं आ सकी, तो तांत्रिक ने इसे ऊपर वाले की मरजी बता कर पल्ला झाड़ लिया.

ऐसा किसी के साथ पहली बार नहीं हुआ है, बल्कि सांप द्वारा काटने के मामले में ऐसा अंधविश्वास एक जमाने से लोगों के दिलोदिमाग पर कायम है.

गैरसरकारी आंकड़ों के मुताबिक, भारत में हर साल तकरीबन 5 हजार लोगों की मौत सांप के काटने से होती है. इन में से ज्यादातर लोगों की मौत तब होती है, जब उन्हें डाक्टरों के पास नहीं ले जाया जाता. उन की जान झाड़फूंक के चक्कर में ही चली जाती है.

मुजफ्फरनगर जिले के एक परिवार को भी अंधविश्वास की कीमत घर के मुखिया बुंदू की जान दे कर चुकानी पड़ी. दरअसल, वह सांपों को पकड़ने और उन्हें मारने का आदी था. एक दिन विष्णुगिरी नामक शख्स के घर में 2 सांप निकल आए, तो उसे बुलाया गया. उस ने एक सांप को पकड़ कर स्टील के बरतन में बंद कर लिया, लेकिन इसी बीच दूसरे सांप ने उसे डस लिया. इस से कुछ ही देर में वह बेहोश हो कर गिर पड़ा.

बुंदू के परिवार वालों को पक्का यकीन था कि झाड़फूंक के जरीए वह ठीक हो जाएगा और वे उसे तंत्रमंत्र करने वालों के पास ले गए.

तकरीबन 25 घंटे तक कई लोगों ने इलाज के नाम पर उस पर हाथ आजमाए, पर कोई फायदा नहीं हुआ. बुंदू की मौत डाक्टरी इलाज की कमी में पहले ही हो चुकी थी.

मेरठ जिले में भी ऐसी ही कोशिश के चक्कर में एकसाथ 2 बच्चों की जानें चली गईं.

रिकशा चालक सागर अपने परिवार के साथ मलियाना इलाके में रहता था. एक रात उस की 18 साला बेटी पूनम व 17 साला बेटा बबलू सो रहे थे. घर में अंधेरा था कि इसी बीच उन्हें सांप ने डस लिया. दोनों की चीखें निकलीं, तो परिवार वाले पास पहुंचे. उन के शरीर पर सांप के डसने के निशान थे और मुंह से झाग निकल रहे थे.

कायदे से उन दोनों को तभी अस्पताल ले जाना चाहिए था, लेकिन सागर को किसी डाक्टर से ज्यादा झाड़फूंक करने वालों पर भरोसा था. लिहाजा, वह उन्हें लोगों की मदद से झाड़फूंक करने वालों के पास ले गया.

इस चक्कर में सागर ने 5 घंटे गंवा दिए. सुबह वह उन्हें अस्पताल ले गया, तो डाक्टरों ने उन्हें मरा हुआ बता दिया.

इस के बाद भी सागर के दिमाग में अंधविश्वास कायम रहा. वह कुछ लोगों की सलाह पर दोनों को गंगनगर ले गया, जहां दोनों को रस्सी के सहारे तेलपानी में घंटों लटकाए रखा.

एक झाड़फूंक करने वाला भी कोशिश करता रहा, लेकिन नाकाम रहा. इसी जिले के 14 साला जीशान को 14 जुलाई, 2017 को खेलते समय सांप ने डस लिया. यह बात उस के पिता को पता चली, तो वह उसे अस्पताल ले जाने के बजाय तंत्रमंत्र करने वालों के पास जहर उतरवाने ले गया. नतीजा यह रहा कि जीशान की मौत हो गई.

ऐसा अंधविश्वास किसी एक गांव, कसबे या शहर तक नहीं सिमटा है, बल्कि हर जगह फैला हुआ है. तांत्रिक तरहतरह के पांखड करते हैं और रकम भी वसूलते हैं. जान जाने पर लोगों को समझा दिया जाता है कि उन्होंने लाने में देर कर दी, इसलिए बचाया नहीं जा सका.

दूरदराज के जिन इलाकों में डाक्टरी इलाज की सुविधा नहीं होती, वहां तो पूरी तरह ओझाओं का ही राज होता है. वे खुद भी ऐसा दावा करते हैं, जबकि इस की असली वजह यह होती है कि जिन लोगों की जान बचती है, उन्हें जहरीले सांप ने नहीं काटा होता. ऐसा 2-4 साल में एक मामला भी हो, तो उस का बाबा लोग जम कर प्रचार करते हैं.

डाक्टर वीपी सिंह कहते हैं, ‘‘सांप के काटने के ज्यादातर मामलों में पीडि़तों की मौत सही वक्त पर इलाज न मिलने के चलते होती है. जिस समय पीडि़त को डाक्टर के पास ले जाना चाहिए, वह समय लोग अंधविश्वास में पड़ कर बरबाद कर देते हैं.’’

सांप काटने पर करें ये उपाय

* सांप के काटने पर शांत रहने की कोशिश करें, क्योंकि ब्लडप्रैशर बढ़ने से जहर शरीर में तेजी से फैल सकता है.

* शरीर के जिस भाग पर सांप ने काटा हो, उसे स्थिर रखने की कोशिश करें.

* सांप काटने वाले हिस्से पर दबाव डालने जैसी पट्टी न बांधे.

* घाव को धोने या घरेलू उपचार करने में अपना समय बरबाद न करें.

* किसी अंधविश्वास में पड़ने के बजाय पीडि़त को तत्काल अस्पताल ले जाएं.

* पीडि़त को सोने न दें. इस से उस की मौत भी हो सकती है.

* सांप पकड़ने के ऐक्सपर्ट लोगों का नंबर अपने पास रखें.

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