राजनीति में कम होती युवाओं की दिलचस्पी

लोकसभा में  युवा सांसदों की बढ़ती तादाद ने राजनीति को एक संभावित कैरियर क्षेत्र बना दिया है. इस क्षेत्र में आने के लिए युवाओं को काफी मुश्किलें झेलनी पड़ती हैं. उन्हें सही प्लेटफौर्म नहीं मिल पाता. यदि कहीं कोई आसार दिखते भी हैं तो वहां पहले से ही सीटें भरी हैं. वैसे तो इस के कई कारण हो सकते हैं, पर सब से बड़ा कारण है, वंशवाद, धनी और बाहुबली लोगों का वर्चस्व.

भारत दुनिया का सब से बड़ा लोकतांत्रिक देश है. प्रजातंत्र पर टिकी इस की राजनीति आज भी अपने स्वरूप को स्पष्ट नहीं कर पाई है. भारतीय राजनीति पर गौर करें तो पाएंगे कि इस का रास्ता बड़ा कठिन व टेढ़ामेढ़ा है, जो आम लोगों के लिए सुलभ नहीं है. यहां सिर्फ वही चल सकता है, जो धनी व बाहुबली हो, जो धांधलेबाजी व घोटाले करने में  माहिर हो. जो अपनी बात मनवाने के हथकंडे जानता हो, जो रातोंरात मालदार बनने का गुड़ जानता हो. फास्ट मनी की कला में माहिर हो.

युवा जहां हर क्षेत्र चाहे वह इंजीनियरिंग का हो, मैडिकल या फिर आईटी, हर जगह पूरे जोशखरोश के साथ दिखते हैं. वहीं फास्ट मनी कमाने वाले क्षेत्र राजनीति को नगण्य मानते हैं.

एक आम युवा राजनीति में हिस्सेदार नहीं बनना चाहता है. वह राजनीति के पचड़े से कोसों दूर रहना चाहता है. दूसरी तरफ युवाओं में यह धारणा भी बनी है कि भारतीय राजनीति वंशवाद की जंजीरों में जकड़ी हुई है.

भारतीय राजनीति में शुरू से ही वंशवाद का बोलबाला रहा है. युवा नेताओं की बात की जाए तो जो युवा आज राजनीति में हैं, उन की पृष्ठभूमि पहले से ही राजनीति से जुड़ी है. उन की राजनीतिक पारिवारिक विरासत की जड़ें बहुत गहरी हैं.

फिर चाहे वे जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुला हों, कांगे्रस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी, कांगे्रस के दिवंगत नेता माधवराव सिंधिया के पुत्र ज्योतिरादित्य सिंधिया, राजेश पायलट के बेटे सचिन पायलट, शीला दीक्षित के बेटे संदीप दीक्षित, मुलायम सिंह के बेटे अखिलेश यादव, मिलिंद देवड़ा, कांग्रेस नेता व सिने स्टार सुनील दत्त की पुत्री प्रिया दत्त,

राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के महासचिव पी ए संगमा की पुत्री अगाथा संगमा, भाजपा की वरिष्ठ नेता व राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया के बेटे दुष्यंत सिंह, जसवंत सिंह के बेटे मानवेंद्र सिंह हों, शरद पवार की पुत्री सुप्रिया सुले या दिवंगत संजय गांधी के पुत्र वरुण गांधी, इन सभी युवा नेताओं को राजनीति विरासत में मिली है.

ऐसे में हम अगर बात करें राजनीतिक कैरियर क्षेत्र की तो आम युवाओं को आज भी मशक्कत करनी पड़ती है. यदि देश की राजनीति सुचारु तरीके से पटरी पर लानी है तो युवाओं को देश की राजनीति में मुख्य भूमिका निभानी ही होगी.

भारत संभावनाओं का देश है. यहां हर कोई अपना भविष्य संवार सकता है. हम यह कह सकते हैं कि राजनीति और युवा एकदूसरे के पूरक हैं. राजनीति हमें शासन करने की शक्ति प्रदान करती है. राहुल गांधी अकेले नहीं और भी कई प्रतिभाशाली युवा हैं, जो लोक कल्याणकारी व देश के सर्वांगीण विकास के उद्देश्य के तहत एक सुनहरे भविष्य व विकसित भारत की बात कर सकते हैं.

आज भले ही राजनीति का लाभ कुछ परिवारों तक सिमटा हुआ है, पर फिर भी अगर एक साधारण युवा सकारात्मक सोच के साथ आगे बढ़े तो आम युवाओं के लिए भी रास्ता आसान हो जाएगा.

युवाओं में जोश तथा मौलिक सोच होती है. काम करने का जोश भी होता है, लेकिन एक आम युवा के लिए क्या राजनीति में कहीं कोई गुंजाइश है? अगर कोई युवा विकास और परिवर्तन की बात करेगा तो सत्तासीन नेता व प्रमुख राजनीतिक दल उसे ऐसा नहीं करने देंगे, क्योंकि ऐसा करने से उन्हें खुद के लिए खतरा लगता है. अपने स्वार्थ के लिए ये नेता व दल किसी भी हद तक जा सकते हैं. इसलिए यही डर इन युवाओं को सता रहा है.

राजनीति में आगे बढ़ने के लिए युवाओं और महिलाओं को खुद ही अपने में जागृति लानी होगी. हमारे देश की आबादी का एक बड़ा हिस्सा युवा महिलाएं हैं. इन में मौलिक सोच तथा कुछ नया कर दिखाने का हुनर होता है. अगर ये जोशीले युवा राजनीति में नहीं आएंगे तो राजनीति का भविष्य उज्ज्वल नहीं होगा.

फिलहाल जो राजनीतिक परिदृश्य दिखाई दे रहा है, उस से ऐसा लगता है कि युवाओं का रुख राजनीति की तरफ कम ही हो रहा है. नीतियों व कार्यक्रमों को लोकलुभावन तो बनाया जा रहा है, लेकिन ये कहां कारगर साबित हो रहे हैं या होंगे, इस पर कुछ कहना जल्दबाजी होगी.

जिस देश की मुख्यधारा राजनीति हो, वहां की उदासीनता देश व राजनीति के लिए अच्छी नहीं है. आज देश को स्वस्थ राजनीति की आवश्यकता है, पर यह सबकुछ तभी संभव है जब हर किसी की सोच कुछ करने के लिए सकारात्मक हो. असंमजस की स्थिति बेहतर परिणाम नहीं देगी.

कुंडली मिलान है बस एक ढकोसला

भारतीय परंपरागत हिंदू विवाह पद्धति में कुंडली मिलान को बहुत आवश्यक समझा जाता है. कई बार बहुत से योग्य युवक या युवतियां इसी कारण बड़ी उम्र तक अविवाहित रह जाते हैं, क्योंकि उन की कुंडली नहीं मिलती. कभीकभी तो 3-4 भाईबहनों वाले परिवार में यदि सब से बड़े बच्चे की कुंडली नहीं मिलती तो सभी की शादी में रुकावट आ जाती है.

समाज में हमें अपने आसपास कई बेमेल दंपती भी सिर्फ कुंडली मिलान के कारण ही दिखते हैं. हमारे पड़ोस में एक सुशिक्षित युवक जो कि ऊंचे पद पर कार्यरत था, का विवाह एक कम पढ़ीलिखी युवती से इसलिए कर दिया गया, क्योंकि उन की कुंडली के 36 गुण आपस में मिलते थे, लेकिन विवाह के बाद दोनों का जीवन परेशानियों से घिर गया, क्योंकि बौद्धिक स्तर पर दोनों का कोई मेल नहीं था.

इसी प्रकार कई बार उच्च शिक्षा प्राप्त किसी बुद्धिमान युवती का विवाह किसी मामूली युवक से इसलिए कर दिया जाता है कि दोनों की कुंडली बहुत अच्छी तरह मिल गई है.

भारतीय विवाह पूरी उम्र साथ निभाने की एक स्वस्थ परंपरा है, जिस से पैदा होने वाले बच्चे भी सामाजिक तथा नैतिक मूल्यों को स्वयं ही अपना लेते हैं. यदि पतिपत्नी के बीच बौद्धिक समानता है तो परिवार का वातावरण भी सकारात्मक रहता है. ऐसे ही परिवार स्वस्थ समाज तथा स्वस्थ राष्ट्र का निर्माण कर सकते हैं.

गौर से विचार किया जाय तो कुंडली मिलान के स्थान पर वरवधु की शैक्षिक योग्यता, रुचियों तथा विचारों का मिलान किया जाना चाहिए.

हमें इस बात का भी ज्ञान होना चाहिए कि विश्व के अनेक देशों में जहां कुंडली मिलान नहीं होता वहां भी सफल वैवाहिक जीवन देखने को मिलता है.

एक समय ऐसा था जब समाज वैवाहिक रिश्तों के लिए पंडितों और विचौलियों पर निर्भर था. उस समय लोग शिक्षित नहीं थे तथा संचार माध्यमों का भी अभाव था. पंडित लोग एक गांव से दूसरे गांव आतेजाते रहते थे और अपने पास विवाह योग्य युवकयुवतियों की सूची रखते थे. वे घरघर जा कर कुंडली मिला कर रिश्ते करवाते थे. यह कार्य उन की आजीविका का मुख्य साधन था.

वर्तमान समय में युवकयुवतियां शिक्षित हैं. अपना व्यवसाय अथवा कैरियर स्वयं चुनते हैं. ऐसे समय में वे अपना जीवनसाथी भी अपनी योग्यता के अनुसार स्वयं चुन लेते हैं. बड़ेबुजुर्गों का यह कर्तव्य है कि वे उन के द्वारा पसंद किए गए जीवनसाथी से मिलें उस की जांच पड़ताल करें ताकि आने वाले समय में उन के साथ धोखाधड़ी न हो.

वर्तमान में समाचारपत्रों में वैवाहिक विज्ञापनों तथा इंटरनैट के द्वारा भी उचित जीवनसाथी का चुनाव किया जाता है. अभिभावकों को अपने बच्चों के साथ मित्रवत व्यवहार रखना चाहिए ताकि वे अपनी पसंदनापसंद मातापिता को बता सकें.

अकसर यह तर्क दिया जाता है कि वर्तमान में हो रहे प्रेमविवाह असफल हो रहे हैं, जबकि कुंडली मिलान द्वारा किए गए विवाह सफल रहते थे, परंतु ऐसा नहीं है. पुराने समय में युवतियां शिक्षित नहीं होती थीं और अपने साथ हो रहे अत्याचार अथवा अन्याय का विरोध नहीं कर पाती थीं. परंतु आज समय बदल रहा है. कुंडली मिलान के बाद होने वाले विवाहों में अधिक तलाक देखने को मिलते हैं.

अनुराधा ने अपनी बेटी कल्पना का विवाह अच्छी तरह कुंडली मिलान के बाद एक संपन्न व्यावसायिक परिवार में किया. लेकिन विवाह के एक महीने के बाद ही युवती वापस घर आ गई. काफी छानबीन के बाद पता चला कि युवक पहले से किसी अन्य युवती को चाहता था. क्या ही अच्छा होता कि युवक के परिवार वाले उसे इतनी छूट देते कि वह पारिवारिक दबाव में आ कर विवाह न करता और कल्पना का जीवन बरबाद होने से बच जाता.

यदि अनुराधा केवल कुंडली मिलान से विवाह संबंध न जोड़ कर युवकयुवती को विवाह से पहले मिलनेजुलने का मौका देतीं तो शायद युवक यह बात पहले ही बता देता और दोनों परिवार मानसिक तनाव से बच जाते.

दूसरी ओर शालिनी ने अपनी बेटी की कुंडली कई जगह दी पर कहीं भी ठीक से मिलान न होने पर उन्होंने बेटी को ही वर चुनने की इजाजत दे दी. शालिनी की बेटी डाक्टर है. उस ने अपने साथ ही काम कर रहे एक अन्य डाक्टर से अंतर्जातीय विवाह कर लिया. अब उन की बेटी बहुत खुश है और शालिनी भी.

अकसर देखा जाता है कि कुंडली मिलान के पूरे खेल में परिवार के सदस्यों को ग्रहनक्षत्रों की कोई जानकारी नहीं होती, जिस का कारण रिश्ता कराने वाले पंडित मोटी कमाई कर जाते हैं. कई बार तो पैसे ले कर पूरी कुंडली ही बदल दी जाती है.

मांगलिक होने अथवा नाड़ी दोष होने पर तो युवकयुवती का विवाह पेड़ अथवा घड़े से करने की परंपरा भी है. अनेक कर्मकांडों को संपन्न करने के बाद उन्हीं युवकयुवती का विवाह आपस में कर दिया जाता है जिन की कुंडली आपस में नहीं मिल रही होती.

कुंडली के दोष निवारण के नाम पर परिवारों को एक मोटी रकम पंडितों के हवाले करनी पड़ती है.

कई बार एक ही कुंडली का मिलान अलगअलग पंडित अलगअलग तरह से करते हैं. सब से बड़े आश्चर्य की बात तो यह है कि हर प्रकार के दोष का निवारण भी संभव है. बस पैसा खर्र्च करो उपाय करा लो, ले दे कर पंडितों की जेब भरती है.

पढ़ेलिखे लोग भी अकारण ही आंख बंद कर इस परंपरा का निर्वाह करते चले आ रहे हैं, जिस के पीछे कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है. कुंडली मिलाने के लिए अनेक जगह भेजा जाता है और बारबार न मिलने पर युवक और युवती के जीवन में तनाव भी बढ़ जाता है. अच्छा तो यह हो कि घर के सदस्य कुंडली मिलान के ढकोसले से बच कर युवकयुवती की पसंद को सही रूप में जांचपरख कर ही वैवाहिक संबंध स्थापित करें.

यूनिफौर्म सिविल कोड के पीछे की मंशा

ट्रिपल तलाक के बाद यूनिफौर्म सिविल कोड की मांग उठाई जा रही है. इस के पीछे भावना यह नहीं कि विवाह कानूनों में सुधार हो, भावना यह है कि दूसरे धर्मों के लोगों के कानूनों में दखल दिया जाए और उन्हें जता दिया जाए कि उन्हें हिंदू देश में हिंदू कानूनों के अंतर्गत रहना होगा.

सामान्य नागरिक संहिता का मामला इतना आसान नहीं जितना कट्टर हिंदू समझ रहे हैं. अगर यह कानून बना तो इसे देश के अपराध व दीवानी कानूनों की तरह बनाना होगा जिस में सब से पहले तो प्रावधान होगा कि कोई भी विवाह किसी धार्मिक रीतिरिवाज के साथ होगा तो मान्य न होगा.

सौ साल पहले जब कट्टर हिंदू विवाह कानूनों के रिवाजों को कुछ समाजसुधारकों ने सुधारा और सुधरे हुए हिंदू रीतिरिवाजों के अंतर्गत विवाह कराने शुरू किए तो उन विवाहों को विरासत के मामलों में चुनौती दी जाने लगी थी. बहुत से विवाह अदालतों ने खारिज किए थे और विधवाओं व बच्चों को अवैध मान कर संपत्ति में हिस्सा नहीं देने दिया था.

ब्रिटिश सरकार को हिंदू सुधारकों की मांग पर नए कानून बना कर विवाहों को मान्यता देने के कई कानून बनाने पड़े थे. 1956 में राष्ट्रपति डा. राजेंद्र प्रसाद की नानुकुर के बावजूद जवाहरलाल नेहरू ने हिंदू विवाह कानूनों में सुधार किए पर वे सुधार सतही थे. हिंदू विवाह आज भी उन्हीं कट्टर रीतिरिवाजों से हो रहे हैं.

सामान्य नागरिक संहिता का अर्थ होगा कि पंडित द्वारा कराई गई शादी मान्य न होगी. अगर ऐसा प्रावधान न हुआ और कहा गया कि सामान्य कानून में भी पंडित, पादरी, ग्रंथी, भिक्षु और काजी विवाह करा सकते हैं तो यह सामान्य कानून शब्दों का मखौल उड़ाना होगा.

सामान्य व्यक्तिगत कानून की मांग करने वाले कट्टर हिंदुओं को पहले अपनी शादियों में जाति, वर्ण, कुंडली, पंडे, सप्तपदी, फेरे आदि को समाप्त करने को तैयार होना होगा. उन्हें हर तरह की संयुक्त परिवार की संपत्ति को छोड़ना होगा और आय व संपदा करों में संयुक्त संपत्ति शब्दों को हटवाने के लिए तैयार होना होगा.

फिर हिंदू विवाह भी अन्य विवाहों की तरह एक समझौता होगा, संस्कार नहीं. आज भी समाज इसे सात जन्मों का मेल मानता है. आज भी तलाक को यहां अपराध माना जाता है और प्रावधानों के बावजूद अदालतें तलाक ऐसे देती हैं मानो कोई अपवाद कर रही हों. संपत्ति के मामलों में आज भी मान लिया जाता है कि लड़की को दहेज में दिया गया पैसा उस का हिस्सा है और उस के बाद मातापिता की संपत्ति में वह कोई हिस्सा न मांगे. सामान्य व्यक्तिगत कानून में लड़की को हिस्सा मिलना तय होगा.

जब तक हिंदू अपने पक्ष के बारे में गहराई से न सोचेंगे, संभावित सामान्य व्यक्तिगत कानून को केवल राजनीतिक शिगूफा मानना होगा. जब तक देश धर्मों, जातियों, वर्णों के हिस्सों में बंटा है, सामान्य नाम की चीज का सवाल ही नहीं उठता.

हौटनेस का जलवा बिखेर रही हैं शाहरुख की बेटी सुहाना

बौलीवुड सुपरस्टार शाहरुख खान की बेटी सुहाना खान फिल्म इंडस्ट्री की पौपुलर स्टार डाटर्स में से एक हैं. सुहाना खान न तो अभी फिल्‍मों में आई हैं और न ही आने की तैयारी ही कर रही हैं, लेकिन वह जहां भी नजर आती हैं, वहां उनका अंदाज छा जाता है.

फिर चाहें पापा के साथ किसी इवेंट में नजर आया सुहाना का लुक हो या फिर सुहाना की एक्टिंग का कोई पुराना वीडियो हो. किंग खान की बेटी का हर अंदाज लोगों द्वारा काफी पसंद किया जाता है.

सोशल मीडिया पर अक्सर सुहाना की तस्वीरें वायरल होती रहती है. हाल ही में गौरी खान ने अपनी बेटी की एक हाट और ग्लैमरस तस्वीर को साझा किया है, इसमें सुहाना बेहद स्टनिंग और कौन्फिडेंट से भरपूर नजर आ रही हैं. यह फोटो इंटरनेट पर काफी वायरल भी हो रही है.

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कुछ दिन पहले ही गौरी खान ने बेटी सुहाना और अबराम के साथ अपनी एक फोटो शेयर की है. इस फोटो में वह सब बीच के किनारे मजे करते नजर आ रहे थे. यह फोटो मालीबू बीच का है, जिसमें उनके साथ बेटी सुहाना बिकिनी में सनबाथ लेती नजर आईं.

इसके बाद इंस्टाग्राम पर स्‍वीमिंग पूल में नहा रही सुहाना का फोटो भी काफी वायरल हुआ. इस फोटो में सुहाना रौयल ब्‍लू स्विमवीयर में एक अलग अंदाज में पोज देती दिखी जो किसी फिल्‍मी सीन से कम नहीं लग रहा.

लगभग एक महीने पहले सुहाना लैक्‍मे फैशन वीक में नजर आई थीं और इसके बाद सारी नजरें उन्‍हीं की तरफ मुड़ गईं. वह सफेद जींस और ब्‍लैक हाल्‍टर नेक ड्रेस में काफी हाट अंदाज में नजर आईं. एक्‍टर चंकी पांडे की बेटी अनन्‍या और संजय कपूर की बेटी शनाया भी उनके साथ नजर आई थीं.

17 साल की सुहाना इन दिनों अपने परिवार के साथ खूबसूरत लम्‍हें बिता रही हैं. मुंबई के धीरूभाई अंबानी इंटरनेशनल स्कूल में पढ़ाई करती हैं. गौरतलब है कि शाहरुख ने गौरी छिब्बर (अब खान) से 25 अक्टूबर, 1991 को शादी की थी. जोड़ी के तीन बच्चें हैं.

जगजीत सिंह के कमरे से सब दूर क्यों भागते थे

‘चिट्ठी ना कोई संदेश कहां तुम चले गए’, ‘होठों से छू लो तुम’, ‘कोई फरियाद तेरे दिल में दबी हो जैसे’, ‘होश वालों को खबर क्या’ और ऐसी ना जानें कितनी गजलें जगजीत सिंह के नाम हैं, जो आज भी उनके हमारे बीच होने का एहसास कराती है.

मशहूर गजल गायक जगजीत सिंह मखमली आवाज के जादूगर थे. जगजीत सिंह को ‘गजल का किंग’ के नाम से भी जाना जाता है. वैसे तो जगजीत सिंह के जीवन से जुड़ी ऐसी बहुत सी बातें है जो शायद की आप जानते होंगे. आज हम आपको जगजीत सिंह के उन दिनों के बारे में बता रहे हैं जब लड़के उनके आसपास वाले कमरों से भी दूर भागते थे.

दरअसल ये उन दिनों की बात है जब जगजीत सिंह जालंधर के डीएवी कौलेज में पढ़ते थे. उन दिनों जगजीत सिंह का हौस्टल कौलेज के सामने हुआ करता था. हौस्टल के जिस रूम में जगजीत सिंह रहते थे उस रूम के आसपास वाले रूम्स से बाकी लड़के दूर भागते थे. उन्हें जगजीत के आसपास रहना पसंद नहीं था. इसके पीछे की वजह जगजीत सिंह का रियाज.

एक रिपोर्ट के मुताबिक जगजीत सिंह सुबह पांच बजे उठकर रियाज किया करते थे और इस वजह से बाकी स्टूडेंट परेशान रहते थे. जगजीत सिंह के रूम के आसपास वाले रूम्स में उनके रियाज की आवाज बाकी स्टूडेंट्स की नींद में खलल पैदा करती थी. ना तो वो खुद सोते थे और न बगल वाले लड़कों को सोने देते थे. इसी वजह से कोई नहीं चाहता था कि उनके आसपास का कमरा मिले.

कई भारतीय भाषाओं में अपनी गायिकी के चलते मील का पत्थर साबित हो चुके जगजीत सिंह का जन्म 8 फरवरी 1941 को बीकानेर के श्रीगंगानगर में हुआ था. 10 अक्टूबर 2011 को जगजीत सिंह इस दुनिया को छोड़ कर चले गए थे.

एक चौथाई भाजपा विधायकों के टिकट कटेंगे..!

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राष्ट्रीय राजनीति में आने के बाद भी गुजरात प्रदेश भाजपा में कुछ नहीं बदला है. इस बार भी विधानसभा चुनाव के लिए उम्मीदवारों का फैसला अहमदाबाद में ही होगा. केंद्रीय चुनाव समिति के सामने हर सीट के लिए सिर्फ एक उम्मीदवार का नाम ही आएगा. संकेत हैं कि इस बार चुनाव में लगभग एक चौथाई विधायकों के टिकट काटे जा सकते हैं.

गुजरात के चुनाव प्रबंधन से जुड़े एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि राज्य में लंबे समय तक सत्ता में रहने के बावजूद भाजपा लोगों की पसंद बनी हुई है. कुछ विधायकों को लेकर लोगों में नाराजगी हो सकती है, लेकिन पार्टी के प्रति लोगों का समर्थन बढ़ा है. ऐसे में पूरी तरह से पड़ताल करने के बाद ही विधायकों के टिकट काटे जाएंगे. यह सामान्य प्रक्रिया है और हर चुनाव में होती है.

पाटीदार खिलाफ नहीं हैं

पाटीदार आंदोलन को लेकर उठ रहे सवालों पर भाजपा नेता ने साफ किया कि उसके 22 विधायक व सात सांसद इसी समुदाय से हैं. ऐसे में यह कहना सही नहीं है कि पाटीदार पार्टी के खिलाफ हैं. पहले भी पटेल समुदाय के कद्दावर नेता अलग चुनाव लड़ चुके हैं. गुजरात जाति पर नहीं बंटा है. अगर कांग्रेस ऐसा करेगी तो उसका फायदा भी भाजपा को ही होगा.

समीकरणों का ध्यान रखा जाएगा

गुजरात में नरेंद्र मोदी ने उम्मीदवार चयन की एक प्रणाली अपनाई थी, पार्टी उसी पर काम कर रही है. तीन स्तरीय चयन प्रणाली में स्थानीय नेता को भी पता रहता है कि उसकी सीट से कौन उम्मीदवार होगा, क्योंकि वह खुद उस पूरी प्रक्रिया में शामिल होता है. प्रदेश नेतृत्व हर जिले के नेताओं के साथ सारे समीकरणों को सामने रखकर सभी उम्मीदवारों के नामों पर चर्चा करता है. उम्मीदवारों के चयन प्रक्रिया का पहला दौर पूरा हो गया है. खास बात यह है कि इन बैठकों में केंद्रीय प्रभारी महासचिव भूपेंद्र यादव व क्षेत्रीय संगठन प्रभारी वी सतीश भी मौजूद रहते हैं. जल्द ही दो दौर और होंगे और उसके बाद हर सीट पर केवल एक नाम रह जाएगा.

अल्पेश से जुड़े दो सौ लोग भाजपा में

कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के समक्ष हाल में पार्टी में शामिल हुए गुजरात में पिछड़ा वर्ग के युवा नेता अल्पेश ठाकोर को झटका देते हुए उनके संगठन ठाकोर सेना के एक प्रमुख नेता समेत 200 सदस्य भाजपा में शामिल हो गए.इन लोगों ने सामाजिक आंदोलन चलाने के बाद अल्पेश के राजनीति में उतरने पर रोष व्यक्त करते हुए यह कदम उठाया है. अरवल्ली जिले के बायड में हुए एक कार्यक्रम में ठाकोर सेना के जिला मंत्री चतुरसिंह समेत 200 लोग भाजपा में शामिल हो गए. गौरतलब है कि अल्पेश ठाकोर के कई समर्थक उनके कांग्रेस में शामिल होने की बात से कथित तौर पर नाराज हैं.

हिजबुल सरगना के बेटे के घर एनआईए की छापेमारी

राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने गुरुवार को आतंकी संगठन हिजबुल मुजाहिदीन सरगना सैयद सलाहुद्दीन के बेटे सैयद शाहिद यूसुफ के आवास पर छापा मारा. कश्मीर के बडगाम स्थित आवास पर की गई कार्रवाई में फोन, लैपटॉप और कई अहम दस्तावेज जब्त किए गए.

हिरासत में है आरोपी

एनआईए ने शाहिद को कश्मीर में विध्वंसक गतिविधियों के लिए कथित रूप से विदेशों से धन लेने के आरोप में 24 अक्तूबर को गिरफ्तार किया था. वह सात दिन के लिए जांच एजेंसी की हिरासत में है. अधिकारियों ने बताया कि एनआईए ने बडगाम जिले के सोईबुग स्थित शाहिद के आवास पर छापेमारी की. वहां से पांच मोबाइल फोन, एक लैपटॉप और कुछ आपत्तिजनक दस्तावेज जब्त किए.

पैसा लेना कबूला

जांच एजेंसी के अनुसार, जम्मू-कश्मीर सरकार के कृषि विभाग में कार्यरत 42 वर्षीय शाहिद ने आतंकी गुटों के लिए धन जुटाने में शामिल हिजबुल मुजाहिदीन के विदेशी सदस्यों के नाम बताए हैं. एजेंसी का दावा है कि पूछताछ में शाहिद ने स्वीकार किया कि उसने अपने पिता मोहम्मद यूसुफ शाह उर्फ सैयद सलाहुद्दीन के कहने पर घाटी में आतंकी गतिविधियों के वित्त पोषण के लिए हिजबुल के लोगों से पैसा लिया.

अमेरिकी कंपनी से शाहिद के पास धन आता था

राष्ट्रीय जांच एजेंसी का आरोप है कि शाहिद को पैसा अमेरिका की धन अंतरण कंपनी के जरिए ऐजाज अहमद भट से मिलता था. भट इस मामले का दूसरा आरोपी है और फिलहाल वह सऊदी अरब में है. एनआईए का कहना है कि शाहिद ऐजाज भट के विभिन्न संपर्को में से एक है और धन अंतरण के कोड लेने के लिए टेलीफोन से संपर्क में रहता था. एनआईए ने दावा किया कि इस तरह से अब तक शाहिद आठ अंतरराष्ट्रीय धन अंतरण के जरिए करीब साढ़े चार लाख रुपये ले चुका है.

छह साल पुराना मामला

जांच एजेंसी द्वारा अप्रैल 2011 में दर्ज किया गया मामला दिल्ली के रास्ते हवाला के जरिए पाकिस्तान से जम्मू कश्मीर में रकम के स्थानांतरण से जुड़ा है. एजेंसी का दावा है कि इस रकम का उपयोग आतंकी वित्त पोषण और अलगाववादी गतिविधियों को अंजाम देने के लिए किया गया.

आरोपपत्र दाखिल हो चुका है

अब तक एनआईए इस मामले में छह लोगों के खिलाफ दो आरोप पत्र दायर कर चुकी है. इनमें पाक समर्थक अलगाववादी सैयद अली शाह गिलानी के निकट सहयोगी जीएम भट, मोहम्मद सिद्दीक गनई, गुलाम जीलानी लीलू और फारूक अहमद डग्गा शामिल हैं. ये चारों न्यायिक हिरासत में हैं.

वैश्विक आतंकी घोषित हो चुका है सलाहुद्दीन

हिजबुल मुजाहिदीन के सरगना सैयद सलाहुद्दीन को इस साल जून में अमेरिका ने वैश्विक आतंकवादी घोषित किया था. आतंकी गुट हिजबुल का प्रमुख होने के साथ ही वह यूनाइटेड जेहाद काउंसिल (यूजेसी) का अध्यक्ष भी है. यूजेसी कश्मीर में सक्रिय विभिन्न आतंकी संगठनों का एक समूह है.

स्विस जोड़े पर हमले में पांच आरोपी गिरफ्तार

फतेहपुर सीकरी में 22 अक्तूबर को स्विटजरलैंड के युगल पर हमले के मामले में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सख्त कार्रवाई के आदेश दिए हैं. इस मामले में कल शाम तक पांच हमलावर गिरफ्तार भी कर लिए गए. गिरफ्तार आरोपियों का कहना है कि उन्होंने सनक में पत्थर मार दिए थे. स्मारक से करीब दो किलोमीटर दूर रेलवे लाइन के पास वारदात हुई थी.

पहले दिन पुलिस ने यह कहकर मामले को हल्का कर दिया था कि विदेशी पर्यटक कोई कार्रवाई नहीं चाहते. गुरुवार को मुख्यमंत्री के आगरा दौरे के दौरान यह मामला सुर्खियों में आ गया. विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने योगी सरकार से रिपोर्ट मांगी. खुद मुख्यमंत्री ने घटना को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए तत्काल गिरफ्तारी के आदेश दिए. शाम तक पांच आरोपी मुकुल, राहुल, पंकज, सनी और हनीफ पकड़ भी लिए गए. एसपी देहात पश्चिम अखिलेश नारायण सिंह ने बताया कि आरोपियों ने अपना जुर्म कबूल किया है.

केंद्र ने यूपी से रिपोर्ट तलब की

केंद्र सरकार ने फतेहपुर सीकरी में स्विटजरलैंड के युगल पर हुए हमले की घटना पर गहरी चिंता जताते हुए यूपी सरकार से रिपोर्ट तलब की है. विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और पर्यटन मंत्री केजे अल्फोंस ने इस संबंध में उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को पत्र लिखकर दोषियों पर कार्रवाई करने को कहा है. स्विस नागरिक क्वेंटिन जेरेमी क्लेर्क अपनी प्रेमिका मेरी द्रोज के साथ रविवार 22 अक्तूबर को फतेहपुर सीकरी रेलवे स्टेशन के पास घूम रहे थे, तभी कुछ बदमाशों ने उनपर हमला कर बुरी तरह घायल कर दिया. उपचार के लिए दोनों को अस्पताल में भर्ती किया गया है.

आगरा में है लपकों का आतंक

ताजमहल, आगरा किला, फतेहपुर सीकरी में लपकों का आतंक है. आगरा में पैर रखते ही विदेशी पर्यटक लपकों से घिरने लगते हैं. कमीशनखोरी के इस खेल को एंपोरियम, रेस्टोरेंट और होटल वालों ने बढ़ावा दिया है. बड़ी संख्या में युवाओं ने लपका गिरी को स्थायी पेशा बना लिया है. ताज के पश्चिमी गेट पर लगभग 500 से 700, पूर्वी गेट की ओर शिल्पग्राम में लगभग 400, आगरा किला के बाहर लगभग 300 लपके सक्रिय हैं.

फतेहपुर सीकरी में भी लगभग 500 लपके सैलानियों के साथ जबरदस्ती करते दिखाई देते हैं. आगरा में कैंट स्टेशन पर गतिमान, शताब्दी, ताज एक्सप्रेस के आने पर बड़ी संख्या में लपके आ जाते हैं. दूर से पर्यटक का बैग देखकर हल्ला मचा देते हैं कि यह उसका है. अधिकारियों का निरीक्षण होता है तो रेलवे पुलिस इन्हें खदेड़ देती है. बाद में फिर से उनकी मनमानी चलती है. शहर में कुछ एंपोरियम तो ऐसे हैं जो सिर्फ विदेशियों को लेकर आने का पैसा देता हैं. 70 फीसदी तक छब्बी (कमीशन) का खेल चलता है. यही नहीं स्मारकों के आसपास ये लोग सक्रिय रहते हुए सैलानियों के साथ विभिन्न तरह के सामान खरीदने के लिए दबाव बनाते हैं.

सुषमा ने नाराजगी जताई

विदेश मंत्री स्वराज ने इस घटना पर गहरी नाराजगी जताई है. उन्होंने ट्वीट करके कहा कि इस मामले में राज्य सरकार से पूरी रिपोर्ट मांगी गई है. विदेश मंत्री ने मंत्रलय के अधिकारियों को अस्पताल जाकर स्विस युगल का हालचाल लेने को कहा है. स्विटजरलैंड दूतावास ने भी विदेश मंत्रालय से पूरी घटना का ब्योरा लिया है.

विदेशी युवती के मोबाइल में कैद थे हमलावर

स्विस पर्यटकों पर पथराव करने वालों की पहचान में विदेशी युवती का मोबाइल फोन मदददार बना. हमलावरों के फोटो विदेशी युवती के मोबाइल में कैद मिल गए. उन्होंने पुलिस की राह आसान कर दी.

एसपी देहात पश्चिम अखिलेश नारायण ने बताया कि 23 अक्तूबर को एक दरोगा को दिल्ली भेजा गया था. वहां हॉस्पिटल में दरोगा ने जख्मी विदेशी युगल से बातचीत की. युवती के मोबाइल में कुछ फोटोग्राफ थे. उन्हीं के आधार पर जांच आगे बढ़ाई गई. पीड़ित विदेशी युगल ने सीकरी थाने के दरोगा को बताया कि युवकों की संख्या चार थी. उन्हेंइस बात का अंदाजा नहीं था कि अकेले घूमना इतना खतरनाक साबित हो सकता है.

स्विस युगल के स्वास्थ्य में सुधार

फतेहपुर सीकरी में रविवार को बदमाशों के हमले का शिकार हुए युवा स्विस युगल की सेहत में सुधार हो रहा है. अपोलो अस्पताल में भर्ती युगल का उपचार कर रहे न्यूरोसर्जन डॉक्चर राजेंद्र प्रसाद ने बताया कि जेरेमी क्लेर्क को आईसीयू से सामान्य कक्ष में भेज दिया गया है. वहीं उसकी महिला मित्र मैरी द्रोज की बांह की हड्डी टूट गई है. उपचार के बाद उन्हें भी अस्पताल से छुट्टी मिल गई है. प्रसाद ने कहा, क्लेर्क को अभी सुनने में दिक्कत आ रही है. अभी कहना मुश्किल है कि सुनने की समस्या स्थायी बनी रहेगी या ठीक हो सकती है.

मेरी उम्र 27 साल और पति की 30 साल है. हम संतान सुख से वंचित हैं. क्या हमें आईवीएफ तकनीक की मदद लेनी चाहिए.

सवाल
मेरी उम्र 27 साल और पति की 30 साल है. हमारी शादी को 5 साल हो चुके हैं. हम लोगों की रिपोर्ट नौर्मल आई है. पति के शुक्राणुओं की संख्या भी लगभग 90 मिलियन आई है, बावजूद इस के हम संतान सुख से वंचित हैं. क्या हमें आईवीएफ तकनीक की मदद लेनी चाहिए?

जवाब
आप को घबराने की जरूरत नहीं है. चूंकि आप के पति के शुक्राणुओं की संख्या ठीक है, इसलिए आप को आईयूआई तकनीक की दरकार नहीं है. लेकिन आप के लिए बढि़या विकल्प आईवीएफ है. इस तकनीक की मदद से संतान सुख की प्राप्ति कर सकते हैं. हां, इस बात का ध्यान रखें कि इस तकनीक के लिए किसी अच्छे चिकित्सक से ही संपर्क करें.

राहुल गांधी और आप्रवासी पर दिया गया बयान

विदेशों में बसे भारतीय आजकल ज्यादा कट्टर और जातिवादी होते जा रहे हैं. उन्होंने उन समाजों के गुण नहीं अपनाए जिन्होंने उन्हें शरण दी और अच्छा कमाने के अवसर दिए. वे भारत के प्रति 50 वर्षों पुरानी सोच रखते हैं और अपने पैसे के घमंड पर भारत की सरकार, नेताओं व जनता को उपदेश देना अब अपना नैसर्गिक अधिकार समझते हैं.

उन्हीं को पटाने के चक्कर में राहुल गांधी ने न्यूयौर्क  की एक सभा में कह दिया कि केवल वहां उपस्थित आप्रवासी भारतीय ही नहीं, गांधी, अंबेडकर, पटेल, नेहरू जैसे भी एनआरआई ही थे. राहुल गांधी की यह चेष्टा भारतीय जनता पार्टी को बहुत नागवार लगी है क्योंकि इन कट्टर आप्रवासियों की भारत में धर्मराज स्थापित करने में बहुत सहायता ली जा रही थी. राहुल गांधी ने उन का संबंध कांग्रेस से जोड़ कर भाजपाई मंसूबे में सेंध लगाई है.

गांधी को एनआरआई कहने पर भारत में राहुल गांधी की खिंचाई करने की काफी कोशिशें हो रही हैं जबकि सच यही है. मोहनदास करमचंद गांधी अन्य गुजराती बनियों की तरह कुछ कमाने के लिए इंगलैंड गए थे. और फिर उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में प्रैक्टिस शुरू की थी. अगर विदेश में रह कर कमा रहे थे, तो आज की परिभाषा के अनुसार वे एनआरआई ही थे. इस तरह की बहुत बातें नरेंद्र मोदी खुद विदेशों में बसे भारतीयों से कहते रहे हैं.

एक तरह से तो जब विदेशी नागरिकता प्राप्त मूल भारतीय विदेश में भारतीय नेता से मिलता है तो वह अपने मौजूदा देश के प्रति अपराध करता है. हमारे अपने राष्ट्रप्रेम की परिभाषा कहती है कि भारत में रहने वाला हर व्यक्ति न केवल अपनी सरकार के प्रति निष्ठा रखे, यहां की संस्कृति, सोच, कट्टरता, गंदगी, रिश्वतखोरी की प्रशंसा भी करे. यदि वह कहीं बाहर से आया है तो उस पर दोहरीतिहरी शर्तें अनायास लगाई जाती हैं. 1962 के युद्ध में भारत सरकार ने भारत में रह रहे चीनी मूल के भारतीय नागरिकों को कई महीनों तक जेल में रखा था.

एनआरआई समूहों को बुलाना और उन से समर्थन मांगना अपनेआप में निरर्थक है और अगर एक दल ऐसा करेगा तो दूसरे को भी हक है. हां, भारत में आलोेचना करने का हक भी है और भाजपा यदि राजनीतिक पैंतरेबाजी में कुछ कह रही है, तो गलत नहीं है.

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