दस वर्षों तक क्यों गुमनाम रहे शिवा

इन दिनों ‘‘बिग मैजिक’’ चैनल के सीरियल ‘‘रूद्र के रक्षक’’ में मुख्य भूमिका निभा रहे अभिनेता शिवा  पूरे दस वर्ष बाद सक्रिय हुए हैं. उनकी सक्रियता अब इतनी बढ़ गयी है कि वह ‘चट्टान’,‘डोंट बी वरी बी हैप्पी’ सहित सात फिल्मों में भी अभिनय कर रहे हैं. इतना ही नहीं अब उन्हे दुकानों की शुरुआत के वक्त भी याद किया जाने लगा है.

हाल ही में वह गुजरात राज्य में सूरत के पास बारडोली के कपिल नगर में ‘‘जयश्री गणेश’’ नामक वातानुकूलित पान शौप का उद्घाटन करने पहुंचे. जबकि 2006 में महिमा चौधरी के साथ फिल्म ‘‘सौतनःद अदर ओमन’’ के बाद वह किसी भी फिल्म या सीरियल में पूरे दस वर्ष तक नजर नहीं आए. 2006 से पहले शिवा ने ‘हम’,‘देशद्रोही’ व ‘घातक’ सहित दो सौ फिल्मों में अभिनय किया था. आखिर पूरे दस वर्ष तक वह गुमनाम क्यों रहे?

जब हमने शिवा से यह सवाल किया, तो शिवा ने कहा-‘‘बौलीवुड का मसला बहुत अलग है. यहां आप एक सफल फिल्म में बेहतरीन किरदार निभाते हैं, तो लोग आपको कई वर्ष तक याद रखते हैं. मेरा करियर बहुत अच्छा जा रहा था.

पर अचानक मैने एक फिल्म ‘रक्त’ का निर्देशन किया था. इसके बाद हर किसी ने यह मानकर मुझे फिल्में देनी बंद कर दी कि शिवा तो अब निर्देशक बन चुका है. इसी के चलते पूरे दस वर्ष तक मुझे एक भी फिल्म नहीं मिली.

पर अचानक एक दिन मेरे पास टीवी सीरियल ‘रूद्र के रक्षक’ में मुख्य भूमिका निभाने का औफर आया, जिसे मैने स्वीकार लिया. इसमें मेरा अभिनय लोगों को फिर से प्रभावित कर रहा है. अब मैं सात फिल्में भी कर रहा हूं. सच कहूं तो मेरे करियर की दूसरी पारी की शुरुआत काफी अच्छी हुई है, भले ही इसमें दस वर्ष का समय लग गया.’’

मुंबई में मची ‘‘आबू धाबी वीक’’ की धूम

भारतीयों के बीच ‘यूएई’ का आबू धाबी सर्वाधिक पसंदीदा पर्यटक देश बना हुआ है. भारत से हर माह तकरीबन तीन सौ एअर फ्लाइट आबू धाबी जाती हैं. 2017 में जनवरी से अगस्त यानी कि महज आठ माह के अंदर 2 लाख तेइस हजार भारतीय आबू धाबी घूमने के लिए गए और औसतन तीन दिन वहां रूके.

भारतीयों के बीच पर्यटक स्थल के रूप में बढ़ती आबू धाबी की लेकप्रियता देखकर आबू धाबी के संस्कृतिक व पर्यटन विभाग ने 27,28 और 29 अक्टूबर को मुंबई के बांद्रा कुर्ला कौम्पलेक्स के एमआरडीए मैदान में तीन दिवसीय प्रदर्शनी का आयोजन किया.

जिसे जबरदस्त प्रतिसाद मिला. हर दिन शाम 4 बजे से रात दस बजे तक चली इस प्रदर्शनी का लाखों मुंबई वासियों ने लुत्फ उठाया. आम नागरिको के साथ ही अमरदीप सिंह नट, संगीतकार विकी प्रसाद, टीवी अभिनेता भावेष बालचंदानी,  रीमष्शेख,रोशनी वालिया, अनुष्का सेन, अरिशफा खान, ऐशन्नूर कौर, एकता जैन, श्री राजपूत, सोलोनी दिनी, आशिका भटिया, संचिता सकट, अहसास चानना ने भी इस प्रदर्शनी का लुत्फ उठाया.

इसके अलावा टोलेज डौट कौम के आदित्य कुमार और इमरान शेख ने 27 तारीख को इसके उद्घाटन में भी हिस्सा लिया था.

मुंबई में ‘‘आबू धाबी वीक’’ की शुरूआत करते हुए आबू धाबी सांस्कृतिक व पर्यटन विभाग महानिदेशक सैफ सईद घोबाश ने कहा-‘‘आबू धाबी के लिए भारत पहली प्राथमिकता है. हमारे देश के होटलों के लिए भारतीय मेहमान आय का सबसे बड़ा बाजार है.

इसलिए हम इस प्रदर्शनी में लोगों को बता रहे हैं कि आबू धाबी महज पर्यटन स्थल ही नही बल्कि आदर्श व्यावसायिक स्थल भी है. आबू धाबी में बैठके आयोजित की जा सकती है. पर्यटन के रूप में आबू धाबी की जो खासियते है, उससे भी हम ज्यादा से ज्यादा भारतीयों को अवगत कराने के लिए ‘आबू धाबी वीक’का आयोजन मुंबई व दिल्ली में कर रहे हैं.

दिल्ली में यह आयोजन तीन,चार और पांच नवंबर को होगा.’’

इसी अवसर पर संस्कृति और पर्यटन विभाग के प्रमोशन और प्रवासी कार्यलयों के निदेशका मुबारक अली नुइमी ने इस बात पर रोशनी डाली कि किस तरह भारतीयों के बीच आबू धाबी का संबंध निरंतर प्रगाढ़ होता जा रहा है.

युवा भारत में युवा नेता हैं कहां

भारत आज विश्व में सब से अधिक युवा आबादी वाला देश है. भारत के मुकाबले चीन, अमेरिका बूढ़ों के देश हैं. चीन में केवल 20.69 करोड़ और अमेरिका में 6.5 करोड़ युवा हैं. हमारे यहां 125 करोड़ से ज्यादा की जनसंख्या में 65 प्रतिशत युवा हैं. इन की उम्र 19 से 35 वर्ष के बीच है. लेकिन देश के नेतृत्व की बागडोर 60 साल से ऊपर के नेताओं के हाथों में है. केंद्रीय मंत्रिमंडल में तीनचौथाई नेता सीनियर सिटीजन की श्रेणी वाले हैं. राजनीतिक संगठनों में भी युवाओं से अधिक बूढे़ नेता पदों पर आसीन हैं.

मौजूदा संसद में 554 सांसदों में 42 साल से कम उम्र के केवल 79 सांसद हैं. इन की आवाज संसद में न के बराबर सुनाई पड़ती है. युवाओं की अगुआई कहीं नजर नहीं आती. उन की ओर से कहीं कोई सामाजिक, राजनीतिक  बदलाव या किसी क्रांति की हुंकार भी सुनाई नहीं पड़ रही है.

देश के आम युवाओं की बात करें तो उन का हाल यह है कि वे भेड़ों की तरह हांके जा रहे हैं. चारों ओर युवाओं की केवल भीड़ है. हताश, निराश और उदास युवा. एसोचैम के अनुसार, आज 78 करोड़ युवा सोशल मीडिया पर तो सक्रिय हैं पर उन में राजनीतिक व सामाजिक रचनात्मकता नदारद है.

देश में नई चेतना का संचार करने वाली युवा राजनीतिक पीढ़ी कहीं नहीं दिखाई दे रही है. भाजपा, कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, राजद, बसपा जैसे दलों में बड़ी उम्र के नेता अगुआ बने  हुए हैं. कांग्रेस में 47 साल के राहुल गांधी हैं पर उन में नेतृत्व की क्षमता का साफ अभाव उजागर हो चुका है. केंद्र में सत्तारूढ़ भाजपा में कोई लोकप्रिय युवा नेता दिखाई नहीं देता.

लकीर के फकीर बन बैठे हैं युवा नेता

अन्ना आंदोलन से अरविंद केजरीवाल उभर कर आए. देश को उन की सोच परिवर्तनकारी लगी. उन्हें अवतारी पुरुष बताया जाने लगा पर 2-3 साल गुजरतेगुजरते वे असफल साबित होने लगे. वे मैदान में विरोधियों को झेल नहीं पाए. उन्हें विपक्ष ने असफल साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी. विरोधी उन पर भारी साबित हुए और वे उन के हाथों शिकस्त खा गए दिखते राहुल गांधी कोई करिश्मा नहीं दिखा पाए. अपने कामों से उन की हंसी ज्यादा उड़ रही है. 47 साल के ज्योतिरादित्य सिंधिया, 40 वर्षीय सचिन पायलट अपने परिवारों की राजनीतिक विरासतों को ही आगे बढ़ा रहे हैं. वे भी लकीर के फकीर बने नजर आते हैं. इन्होंने राजनीति में आ कर कोई नई सोच या दिशा नहीं दी.

समाजवादी पार्टी में अखिलेश यादव कोई चमत्कार नहीं कर पाए. हालांकि पिछली बार उत्तर प्रदेश की जनता ने उन्हें युवा जान कर सत्ता सौंपी थी पर वे पारिवारिक झगड़े में ही उलझ कर रह गए. इस बार प्रदेश की उसी युवा पीढ़ी ने उन्हें सत्ता से बाहर कर दिया.

आज की राजनीति में राहुल गांधी, ज्योतिरादित्य सिंधिया, सचिन पायलट से ले कर अखिलेश यादव तक कई युवा हार्वर्ड जैसे विदेशी विश्वविद्यालयों से पढ़ कर आए हुए हैं. गांधी, नेहरू, पटेल भी युवावस्था में विदेश से पढ़ कर देश का राजनीतिक नेतृत्व किया था. उन नेताओं ने देश को धर्मनिरपेक्ष, संप्रभु समाजवादी लोकतांत्रिक स्वरूप प्रदान कराने में अपना योगदान दिया.

पाकिस्तान जैसे कितने देश आजाद होने के दशकों बाद भी लोकतंत्र की स्थापना में नाकाम, कोसों दूर खड़े देखे जा सकते हैं.

राज्यों की बात करें तो मध्य प्रदेश में श्यामाचरण शुक्ला और विद्याचरण शुक्ला के परिवार से युवाओं में उभर कर कोई नहीं आ पाया. पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के बाद कोई नहीं दिख रहा.

ओडिशा में नवीन पटनायक भी किसी युवा को आगे नहीं ला पाए. तेलंगाना में चंद्रशेखर राव का परिवार धर्म की लौ जगाने में ज्यादा भरोसा रखता है.

दक्षिण भारत में रजनीकांत और अब कमल हासन दोनों ही 60 से ऊपर की अवस्था में आ कर राजनीति में उतरने की सोच रहे हैं और अभी भी वहां 85 साल से अधिक उम्र के हो चुके करुणानिधि का दबदबा है और एस एम कृष्णा जैसे नेता कांग्रेस छोड़ कर भाजपा में आ रहे हैं.

अटल बिहारी वाजपेयी जब प्रधानमंत्री थे, अपने भाषणों में कई बार देर तक खामोश बैठे या खड़े रह जाते थे. एच डी देवगौड़ा को मीटिंगों में सोने में महारत थी, महत्त्वपूर्ण बैठकों में उन्हें नींद आ जाती थी. अब भी कई मंत्री टैलीविजन चैनलों में कैमरों के सामने सोए हुए देखे जा सकते हैं.

एक दौर था युवा नेताओं का  

इतिहास का एक दौर था जब महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल, सुभाष चंद्र बोस से ले कर विवेकानंद तक युवावस्था में देश के लिए आदर्श नेता के रूप में अगुआ थे. उस समय जनक्रांति में अनगिनत युवाओं ने खुद को समर्पित कर दिया था.

महात्मा गांधी 1888 में 18 साल की उम्र में वकालत पढ़ने इंगलैंड चले गए थे. 3 साल लंदन में रहने के बाद 1891 में वापस लौट आए. फिर 1893 में साउथ अफ्रीका चले गए. 23-24 साल की उम्र में उन्होंने रंगभेद को देखा और महसूस किया और फिर 25 साल की उम्र में उन्होंने रंगभेद के खिलाफ आंदोलन छेड़ दिया था. 1906 में अवज्ञा आंदोलन के बाद से वे देश की आजादी के लिए लोहा लेते रहे. राजनीतिक आंदोलन को नेतृत्व देते रहे.

महात्मा गांधी ने 1919 से 1931 तक यंग इंडिया नामक पत्रिका निकाली जो अपने विचार और दर्शन की बदौलत देश की युवा पीढ़ी को पे्ररित करती रही. उस में गांधी के देश, समाज और परिवार के प्रति वो विचार होते थे जिन से लोगों को प्रेरणा मिलती थी.

नेहरू 27 वर्ष में ही कैंब्रिज से पढ़ कर होम रूल लीग में शामिल हो चुके थे. सरदार पटेल युवावस्था में ही बाहर से वकालत कर लौटे और खेड़ा सत्याग्रह व बारदोली किसान आंदोलन के नेतृत्व से जल्दी ही प्रसिद्ध हो गए.

1975 में इंदिरा गांधी की ज्यादतियों के विरुद्ध संपूर्ण क्रांति का बिगुल फूंकने वाले जयप्रकाश नारायण की उम्र भी अधिक नहीं थी. समाजवादी सोशलिस्ट पार्टी का गठन कर उन्होंने दलित, पिछड़े युवा नेताओं की एक मजबूत टोली खड़ी कर दी. उन के आंदोलन ने पिछड़ों को संगठित और जाग्रत करने में अहम भूमिका निभाई. संपूर्ण क्रांति में भ्रष्टाचार, बेरोजगारी दूर करने और शिक्षा में क्रांति लाने जैसे महत्त्वपूर्ण मुद्दे थे.

राममनोहर लोहिया भी इसी आंदोलन के एक मजबूत स्तंभ थे. युवा उम्र में वे भी जाग्रति फैलाने में आगे रहे. 57 साल की अवस्था में उन की मृत्यु हो गई थी.

भीमराव अंबेडकर ने 1927 में छुआछूत के खिलाफ व्यापक आंदोलन छेड़ा, उस समय वे युवा ही थे. वे महज 36 वर्ष के थे.

1857 से 1947 तक के लंबे स्वतंत्रता संघर्ष में देशवासियों के दिलों में देशभक्ति एवं क्रांति की लौ जलाने वालों में युवाओं की भूमिका सर्वोपरि रही है. 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के महानायकों में झांसी की रानी लक्ष्मीबाई 26 वर्ष की थीं. तात्या टोपे, मंगल पांडे युवा ही थे. भगत सिंह ने खुद के नास्तिक होने के क्रांतिकारी विचार युवावस्था में ही जाहिर कर दिए थे. चंद्रशेखर, खुदीराम बोस ने देश के सुख के लिए अपने यौवन का बलिदान कर दिया था.

शो पीस बन कर रह गए हैं युवा नेता

लेकिन, पिछले 3-4 दशकों में ऐसा देखने को नहीं मिला. ऐसा नहीं कि देश से समस्याएं मिट गई हों और किसी बदलाव या क्रांति की जरूरत न रही हो.

भाजपा में अटल बिहारी वाजपेयी, मुरली मनोहर जोशी, लालकृष्ण आडवाणी के बाद दूसरी कतार के नेताओं को नेतृत्व सौंपे जाने के प्रयास हुए तो पार्टी में आपसी कलह, टांगखिंचाई शुरू हो गई थी. नेताओं में कुरसी हथियाने की होड़ शुरू हो गई थी. हालांकि उस समय भी वेंकैया नायडू, सुषमा स्वराज, अनंत कुमार, उमा भारती, शिवराज सिंह चौहान जैसे नेता युवा नहीं रहे थे.

राजनीति में युवाओं को आगे लाने की बात होती है, युवा नेतृत्व की बात चलती है पर पार्टी या सरकार का नेतृत्व किसी बड़ी उम्र के नेता को ही सौंपा जाता है. 2008 में राहुल गांधी ने युवा शक्ति से जनाधार बढ़ाने के लिए देशभर से युवाओं के इंटरव्यू किए थे. उस में 40 युवाओं का चयन किया गया. पर वे आज कहां हैं, उन की हट कर कोई अलग पहचान नहीं दिखती.

पिछले लोकसभा चुनावों में युवाओं का चुना जाना अच्छा संकेत था पर ये युवा ज्यादातर अपनी खानदानी विरासत संभालने आए. कुछ बंधनों को छोड़ दें तो इन युवाओं में  जोश और जज्बा तो नजर आता है पर नई सोच नहीं. विचारों में क्रांति लाने का काम नहीं हो रहा है. संसद में सचिन तेंदुलकर जैसे युवा केवल शोपीस बने हुए हैं. वे न खेलों को भ्रष्टाचार, बेईमानी से मुक्त करने के लिए कोई बात करते हैं, न किसी अन्य सुधार की.

दलगत राजनीति हो या छात्र राजनीति, दोनों की दशा डांवाडोल है. राष्ट्रीय व क्षेत्रीय राजनीतिक दलों ने छात्र राजनीति में भी अपनी घुसपैठ बना रखी है. इन्हीं के सहयोगी संगठन छात्र राजनीति का खेल खेलते हैं. छात्र राजनीति में अपराधों व अपराधियों का बोलबाला है.

ऐसी विकट स्थिति के कारण ही मई 2005 में राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर खंडपीठ को विश्वविद्यालयों सहित सभी शिक्षण संस्थानों में छात्र संघों और शिक्षक संघों  के चुनाव पर रोक लगाने का फैसला सुनाना पड़ा था. इस के पीछे बताई गई वजहें गौर करने लायक थीं. खंडपीठ का कहना था कि नेतागीरी की धाक जमाने के लिए छात्र नेता शिक्षकों का अपमान करते हैं और राजनीतिक दल छात्र एकता को विभाजित कर रहे हैं.

कुछ समय पहले व्यवस्था के खिलाफ क्रांति का बिगुल फूंकने वाला कोई युवा नहीं था, 80 साल के वृद्ध अन्ना हजारे थे. उन के पीछे युवाओं की भीड़ जरूर थी पर नेतृत्व में वह पीछे थी.

क्या हमारे युवाओं में राजनीतिक चेतना का विकास नहीं हो रहा है? जो युवा नेता हैं उन में देश की दिशा और दशा बदलने की कूवत नहीं है. ज्यादातर युवा नेता परिवार की राजनीतिक विरासत को ढो रहे हैं.

अन्ना आंदोलन के बाद लगता है कि देश के युवा का बदलाव की राजनीति और वैचारिक क्रांति में भरोसा कम होता जा रहा है. वह यथास्थितिवादी होता जा रहा है. वह परंपरा को तोड़ने के बजाय परंपरापूजक होता जा रहा है. आमतौर पर माना जाता है कि युवा का मतलब है परंपराओं को चुनौती देने वाला और बदलाव में विश्वास रखने वाला. समाज का यह तबका किसी देश में बदलाव का अगुआ होता है.

हाल के समय में लगता है युवा खासतौर से मध्यवर्गीय युवा धारा के विरुद्ध नहीं, धारा के साथ बहने लगा है. बदलाव के बजाय परंपराओं में, यथास्थिति में भविष्य देख रहा है. युवा सामाजिक, राजनीतिक जकड़बंदी से टकराने के बजाय उस से समझौता करने के मूड में दिखाई देने लगा है.

यह बात भी सही है कि सत्ता की ओर से युवाओं को बदलाव की चेतना, आंदोलन से दूर रखने और इन आंदोलनों को कमजोर करने की योजनाबद्ध कोशिशें हुईं और उसे काफी हद तक कामयाबी भी मिली है. असल में मौजूदा व्यवस्था युवाओं की बेचैनी, उस के जोश, उस की क्रिएटिविटी को कुचलने का काम कर रही है. भीड़ की सोच ही युवाओं की सोच बनती जा रही है.  युवा पीढ़ी अतीत की जंजीरों की जकड़न उतार फेंकने में हिचकिचा रही है.

युवा आजादी का लुत्फ उठा रहे हैं. युवाओं ने मान लिया है कि अब उन की देश, समाज के प्रति कोई जिम्मेदारी नहीं है. आजादी ही हमारा लक्ष्य नहीं था. वास्तविक जिम्मेदारियां तो बाद में शुरू हुई हैं. गांधी, नेहरू के बाद देश को बहुत सुधारों की जरूरत है. देश संक्रमण के दौर से गुजर रहा है. हमारे नेता सोच रहे हैं कि देश में सड़कें,पुल, हाईवे, मौल, मैट्रो, मोबाइल फोन, कंप्यूटर जैसी चीजें तरक्की की निशानिया हैं.

भ्रष्टाचार, निकम्मापन, बेरोजगारी, व्यक्ति की आजादी, धार्मिक, जातीय, लैंगिक भेदभाव, अंधविश्वासों से मुक्ति, नौकरशाही में कर्तव्य का अभाव, सरकार की जवाबदेही जैसी चीजों में बड़े सुधारों की जरूरत है.

आजादी बनाम जिम्मेदारी

सरकार का यह दायित्व होता है कि वह प्रशासन, समाज में ईमानदारी, कर्तव्यपरायणता का माहौल पैदा करे. पर ऐसा दिखाई नहीं पड़ता.

वैचारिक क्रांति का अलख सदियों से नहीं हुआ. देश में प्रगति, विकास के एक झूठ का आडंबर फैलाया जा रहा है. अफसोस इस बात का है कि युवा तर्क नहीं कर रहा, सवाल नहीं उठा रहा कि विकास कहां है, कैसा विकास हो रहा है? बस, हां में हां मिलाए जा रहा है.

युवा वर्ग की पहचान है उस की  बेचैनी, उस का आक्रोश, उस की सृजनात्मकता और स्थापित व्यवस्था को चुनौती देने वाला उस का मिजाज. यही मिजाज उसे बदलाव के लिए व्यवस्था से टकराने का हौसला व हर जोखिम उठाने का साहस देता है.

जेल भेज दिया जाता है युवाओं को

पिछले दिनों कन्हैया कुमार, हार्दिक पटेल, जिग्नेश मेवानी, चंद्रशेखर जैसे युवा नेता उभर कर सामने आए. इन में व्यवस्था में बदलाव का जज्बा दिखाई दिया. ये नेता व्यवस्था से टकराए. इन्होंने भेदभाव, आजादी, बेरोजगारी, असमानता जैसे अहम मुद्दों को ले कर आंदोलन का नेतृत्व किया पर व्यवस्था से टकराने पर उन्हें जेल व जलालत मिली.

कन्हैया कुमार ने विश्वविद्यालयों और समाज में व्याप्त धार्मिक, जातीय भेदभाव और स्वतंत्रता के लिए आंदोलन छेड़ा. देश के विश्वविद्यालयों में दलित, पिछड़े, आदिवासी छात्रों के साथ हो रहे भेदभाव की मुखालफत की थी. उन्हें जेएनयू से निकालने की मांग की गई. केंद्र सरकार ने देशद्रोह का आरोप लगा कर मुकदमा ठोंक दिया और जेल भेज दिया. कोर्ट में पेश किए जाते वक्त उन पर वकीलों के एक समूह ने हमला किया. जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से डौक्ट्रेट कर

रहे कन्हैया कुमार अब भी गरीबी, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, असमानता के विरुद्ध खड़े हैं पर सत्ता ऐसे युवाओं से भयभीत है और उन्हें झुकाने के हर हथकंडे अपना रही है.

गुजरात में हार्दिक पटेल ने आक्षरण में भेदभाव को ले कर बड़ा आंदोलन खड़ा किया. लाखों लोग उन के साथ जुड़े. उन पर भी मुकदमा कायम किया गया और प्रदेश निकाला दे दिया गया. हार्दिक पटेल को राजस्थान में कई महीनों तक नजरबंद रखा गया.

गुजरात में ही पिछले साल मरी हुई गाय की खाल उतारने पर 4 दलित युवकों की हिंदू संगठनों के लोगों द्वारा की गई बुरी तरह पिटाई के बाद जिग्नेश मेवानी उभर कर सामने आए. इस घटना के विरोधस्वरूप जिग्नेश ने राज्यभर में आंदोलन की अगुआई की. दलितों को एकजुट कर के सरकार और कट्टर हिंदू संगठनों के खिलाफ आंदोलन किया.

उत्तर प्रदेश के सहारनपुर के शब्बीरपुर में दलितों और राजपूतों के बीच हुई हिंसा के मामले में भीम आर्मी के नेता के रूप में चंद्रशेखर उभर कर सामने आए.

35 वर्षीय चंद्रशेखर ने जातीय भेदभाव और हिंसा के खिलाफ लड़ाई शुरू की थी. दिल्ली के जंतरमंतर पर धरना देने के लिए बुलाई गई भीड़ का नेतृत्व किया और बाद में उन्हें गिरफ्तार कर के जेल भेज दिया गया. चंद्रशेखर के परिवार का भी उत्पीड़न किया गया.

सत्ता और कट्टर राजनीतिक विचारधारा को छोड़ कर देश ने इन युवा नेताओं को हाथोंहाथ लिया, पर आज ये कहां है?

यह तथ्य हैरान करने वाला है कि देश की बहुसंख्यक आम युवा आबादी में बदलाव की कोई हलचल नहीं है. अपवादों को छोड़ दें तो पूरे देश में युवा समुदाय में वह बेचैनी, गुस्सा और आंदोलन दिखाई नहीं दे रहा है जिस के लिए उसे जाना जाता है.

युवा मोबाइल, इंटरनैट, सोशल मीडिया में इतना व्यस्त है कि उसे कुछ दिखाई ही नहीं दे रहा. युवा किसी भी देश व समाज के  कर्णधार माने जाते हैं. वे वह स्तंभ कहलाते हैं जिस पर समाज की मजबूत इमारत का निर्माण होता है.

एक आम मानसिकता यह है कि 10वीं की पढ़ाई के बाद इंटर और फिर ग्रेजुएशन किया जाए. शिक्षा के आंकड़ों पर गौर करें तो स्थिति भयावह दिखती है.

आज 47 प्रतिशत युवा रोजगार के लिहाज से नाकाबिल हैं. 35 प्रतिशत स्नातक क्लर्क की नौकरी के लायक हैं. कुल मिला कर 15 प्रतिशत युवा ही बेहतर रोजगार के स्तर तक पहुंच पाते हैं. विश्व के 200 विश्वविद्यालयों में भारत की उपस्थिति भी नहीं है.

नई सोच का अभाव

विदेशों से पढ़ कर भारत वापस आ रहे युवाओं में भी नेतृत्व की नई सोच का लगभग अभाव ही नजर आता है. संकट में चुनौतियों का सामना समयसमय पर युवा शौर्य ही करता आया है पर युवा नेताओं में ये बातें नहीं हैं.

संसद, विधानसभाएं ऐसे लोगों का जमावड़ा बन गई हैं जहां गंभीरता के साथ बहस या संवाद नहीं होते. केवल चिल्लाने, उत्तेजक भाषण देने और आपस में आरोपप्रत्यारोप में देश का समय बरबाद किया जाता है. संसद में कईकई दिनों तक कामकाज नहीं होता. विधानसभाएं ठप कर दी जाती हैं.

दरअसल राजनीति राष्ट्रीय व्यवस्था एवं अंतर्राष्ट्रीय संबंधों को सुचारु व सुगम बनाने की प्रणाली है. इस के अपने मूल्य एवं नीतियां हैं जो न्याय, समानता के सिद्धांत से ओतप्रोत हैं. लेकिन चारों ओर भ्रष्टाचार, बेईमानी, स्वार्थ, मौकापरस्ती, भाईभतीजावाद का साम्राज्य विद्यमान है. हमारे नेता शासन तो करना चाहते हैं पर उन का बुराइयों के खात्मे से कोई सरोकार नहीं है. यह काम युवा नेताओं को आगे बढ़ कर करना चाहिए, पर वे उदासीन नजर आते हैं.

हमारे देश में संसद, विधानसभाओं से शासन, प्रशासन, देश, समाज, व्यक्ति की तरक्की की कोई राह निकलती नहीं दिखती तो इस का मतलब देश को युवा कहने पर धिक्कार है. अभी देश के यौवन में कुछ खोट है. यौवन की तरंग में तरक्की की कोंपलें फूटती दिखनी चाहिए जो युवा नेताओं की कार्यशैली, उन के विचारों में दिखाई नहीं दे रही हैं.

हौकी का गेम और ऊन सलाइयां

जमाना गया जब खेलों के महंगे शौकों पर पुरुषवर्ग का आधिपत्य था और खूबसूरत लिबासों में उन की पत्नियां या दोस्त सिर्फ उन का साथ देती नजर आती थीं. हौकी की दीवानी मिशेल मिलर जैसी महिलाएं आज खेल के मैदानों में हर कीमत के टिकट वाली सीटों पर बैठी, खिलाडि़यों को चियरअप करती हैं. अमेरिकन नैशनल हौकी लीग के किसी भी मैच में पेन स्टेट की टीम का मनोबल बढ़ाने के लिए 44 वर्षीया कंप्यूटर सिस्टम ऐडमिनिस्टे्रटर मिशेल 500 मील तक ड्राइव कर के भी पहुंचती हैं.

दर्शक दीर्घा में मिशेल की उपस्थिति एक अनोखे कारण के लिए मशहूर है. हाथों में ऊनसलाइयां पकड़े वे कभी मोजे, कभी शौल, बेबी ब्लैंकेट या स्वेटर उतनी ही तन्मयता से बुन रही होती हैं जितनी एकाग्रता से वे अपनी चहेती टीम की हौसला अफजाई करती हैं. जितना तनावपूर्ण मैच, उतनी ही तेज उन की सलाइयां और खेल पर उतना ही गहरा उन का फोकस. साथसाथ उन की बुनी हुई चीजों का बढ़ता हुआ अंबार जिसे वे प्रियजनों पर न्योछावर करती हैं. कुछ ऐसे भी हैं जिन्हें अचरज होता है कि तेज रफ्तार खेल के दौरान कोई बुनाई चालू कैसे रख सकता है.

मिशेल का कहना है कि बुनाई में वर्षों की दक्षतावश उन्हें सलाइयों पर नजर डालने की भी जरूरत नहीं पड़ती. खेल की प्रगति पर उन का फोकस रंचमात्र भी कम नहीं होता. खेल के जानकार अकसर उन से पैने सवाल पूछ कर उन के खेलज्ञान से आश्चर्यचकित रह जाते हैं. किसी कारणवश मिशेल यदि खेल के मैदान में नहीं पहुंच पातीं तो टीवी के आगे खेल की क्षणक्षण प्रगति पर निगाहें टिकाए वे खटाखट सलाइयां चलाती रहती हैं.

जिस चतुराई से खिलाड़ी हौकी स्टिक से गेंद को गोल की तरफ ले जाते हुए विरोधी दल के चक्रव्यूह से बचने की रणनीति रचता चलता है, वैसे ही मिशेल की सलाइयां सीधे और उलटे फंदों के हेरफेर से बुनाई में नमूने रचती चलती हैं. तकनीक समान है, खेल के मैदान में भी और सलाइयों में झूलते बुनाई के पल्लों में भी.

मिशेल मिलर के पति माइकल ने तकरीबन 15 वर्षों पहले प्रणय निवेदन के दौरान उन्हें हौकी का चस्का लगा दिया. माइकल का जनून मिशेल के सिर पर ऐसा चढ़ा कि खुद पर काबू रखने के लिए बुनाई ही सब से कारगर उपाय साबित हुई.

उत्तेजनावश खिलाडि़यों, रेफरियों या खेल के प्रशिक्षकों पर तेज आवाज में खीझ निकालने और बगल में बैठे पति माइकल के कान के परदे फाड़ने के बजाय वे ऊनसलाइयों पर जोरआजमाइश कर डालती हैं. पतिपत्नी मैच को सब से नजदीक वाली सीटों से देखना पसंद करते हैं जिन की कीमत 600 डौलर तक हो सकती है.

बुनाई वे हमेशा चालू रखती हैं- फिल्म देखते हुए, रेस्तरां में टेबल खाली होने के इंतजार में, बल्कि यों कहिए कि उन के पर्सनल टाइम में कहीं भी. उन की बुनाई बोरियत की निशानी नहीं, उन की एकाग्रता की द्योतक है. बुनाई की एक लेखिका और प्रशिक्षिका पर्ल मेक्फी भी मिशेल मिलर के कौशल की सराहना करती हैं. उन के अनुसार, ‘‘मिशेल की बुनाई उन की उत्तेजना पर अंकुश रखती है, धैर्य बढ़ाती है और उन के फोकस को पैना करती है.’’

हाल ही में मिशेल के दाहिने हाथ की कनिका में चोट लगने के कारण उन के हौकी मैच दर्शन रूटीन में बाधा पड़ी. लेकिन अब वे मोरचे पर वापस डटी हैं. बुनाई के कम से कम 20 प्रोजैक्ट उन के जेहन में हैं.

शारीरिक सक्रियता से दिमाग तेज होता है. इस का यह मतलब नहीं कि कामकाजी महिलाएं कार्यस्थल पर अपनी निजी कढ़ाईबुनाई करें. कंप्यूटर सिस्टम ऐडमिनिस्ट्रेटर मिशेल अपनी बुनाई केवल निजी समय में अपनी विश्रांति के लिए करती हैं, दफ्तर में नहीं.

कौर्पोरेट कल्चर का स्ट्रैस निजी जिंदगी पर हावी न होने देने के लिए पेंटिंग, म्यूजिक बल्कि खाना बनाना भी एक जबरदस्त थेरैपी साबित हो रहा है. अत्याधिक व्यस्तता में राहत के लिए काम से बिलकुल अलग कुछ भी करना दिमाग की बैटरीज को रीचार्ज करने जैसा है, गाड़ी चलाते हुए खबरें सुनना या खुद को डिक्टेट किए हुए जरूरी नोट्स दुहरा लेना, सुमधुर संगीत या किसी चर्चित किताब का औडियो टेप सुन कर तनाव कम करना आदि.

आज की जिंदगी चूहादौड़ जैसी है जिस में बहुकार्य वांछित ही नहीं, जरूरत हैं. खाना बनाते हुए बच्चों का होमवर्क करवाना, टीवी देखते हुए कपड़े प्रैस कर डालना आदि. बहुत से छोटेमोटे या मामूली काम तक थेरैपी साबित हो सकते हैं. समय का इस से उत्तम सदुपयोग नहीं हो सकता.

अंकुश पर अंकुश लगाना पड़ गया भारी

पृथ्वी हांडा परिवार के साथ पंजाब प्रांत के जालंधर शहर के मौडल टाउन में अपनी विशाल कोठी में रहते थे. उन के परिवार में पत्नी सुजाता के अलावा एकलौता बेटा जतिन था. कोठी से कुछ दूरी पर मेनमार्केट में उन की 2 दुकानें थीं. एक में हांडा डेयरी थी, जिस में शुद्ध देसी घी का थोक कारोबार होता था तो दूसरी में रेडीमेड गारमेंट्स का. क्वालिटी के लिए उन की दोनों ही दुकानें शहर भर में प्रसिद्ध थीं. दोनों दुकानें घर से ज्यादा दूर नहीं थीं, इसलिए बापबेटा कोठी से दुकानों तक पैदल टहलते हुए चले जाते थे. हांडा डेयरी का काम पृथ्वी हांडा खुद देखते थे, जबकि हांडा कलेक्शन यानी गारमेंट्स की दुकान उन का बेटा जतिन संभालता था. बापबेटे के दुकानों पर चले जाने के बाद घर में सुजाता हांडा के अलावा 17 साल का नौकर हरीश ही रह जाता था. शरीर भारी होने की वजह से सुजाता को चलनेफिरने में दिक्कत होती थी, इसलिए घर के कामों में मदद के लिए उन्होंने हरीश को रखा हुआ था. 20 सितंबर, 2016 की शाम 5 बजे पृथ्वी हांडा ने जतिन की दुकान पर जा कर कहा, ‘‘बेटा, आज मंगलवार है. थोड़ी देर में तुम घर चले जाना और घर में रखा प्रसाद ले जा कर हनुमान मंदिर में चढ़ा देना.’’

‘‘ठीक है पिताजी, मैं थोड़ी देर बाद चला जाऊंगा.’’ जतिन ने कहा, इस के बाद पौने 6 बजे वह घर के लिए निकला तो करीब 15 मिनट बाद 6 बजे के करीब वह कोठी पर पहुंच गया. उस ने कोठी का मेन गेट अंदर से बंद देखा तो उसे हैरानी हुई, क्योंकि कोठी का मुख्य गेट केवल रात को ही बंद होता था.

बहरहाल, कुछ सोचनेविचारने के बजाय जतिन ने डोरबैल बजाई. कई बार डोरबैल बजाने के बावजूद अंदर से कोई आहट सुनाई नहीं दी तो उसे चिंता हुई. पड़ोसी मि. कपूर ने जतिन को लगातार बैल बजाते देखा तो पास आ कर कहा, ‘‘बेटा, यह गेट लगभग आधे घंटे से बंद है और कुछ देर पहले कोठी के अंदर से चीखने की आवाज आई थीं. अंदर क्या हो रहा है, यह पता करने के लिए मैं ने भी खूब बैल बजाई थी, पर गेट नहीं खुला था.’’

‘‘ऐसा कैसे हो सकता है ’’ जतिन बुदबुदाया.

वह मि. कपूर से बातें कर ही रहा था कि तभी कोठी के अंदर खड़ी इनोवा कार के स्टार्ट होने की आवाज आई. जतिन चौंका. उसे लगा कि अंदर जरूर कुछ गड़बड़ है. समय न गंवा कर वह कोठी के 15 फुट ऊंचे मुख्यगेट पर चढ़ गया. जब वह अंदर कूदा तो 2 लड़के इनोवा कार से उतर कर कोठी के अंदर भागते दिखाई दिए.

वे लड़के इतनी तेजी से अंदर की ओर भागे थे कि वह उन्हें देख नहीं पाया. सिर्फ एक लड़के के कपड़े दिखाई दिए थे. वह नीली जींस और पीली शर्ट या टीशर्ट पहने था. लड़कों को कोठी के अंदर जाते देख जतिन उन के पीछे भागा, पर ड्राइंगरूम की ओर जाने वाली गैलरी में उसे नौकर हरीश खून से लथपथ पड़ा मिल गया तो वह उस के पास रुक गया. वह उसे झुक कर देखने लगा, तभी उसे छत पर जाने वाली सीढि़यों पर किसी की आवाज सुनाई दी.

हरीश को छोड़ कर जतिन सीढि़यों की ओर बढ़ा तो उस ने देखा कि जो लड़के कार से निकल कर अंदर आए थे, वे सीढि़यों से छत पर जा रहे थे. उन का पीछा करने के बजाय उस ने सीढि़यों का दरवाजा बंद कर के अंदर से कुंडी लगा दी और भाग कर हरीश के पास आया और उस की नब्ज टटोली तो पता चला कि उस की मौत हो चुकी है.

जतिन घबरा गया. मां को आवाज देते हुए वह ड्राइंगरूम में पहुंचा तो वहां मां को खून से लथपथ पड़ी देख कर वह उसे से चिपट कर रोने लगा. तभी उसे लगा कि मां की सांसें चल रही हैं. अब तक उस के रोने की आवाज सुन कर कई पड़ोसी आ गए थे. जतिन ने खुद को संभाला और पड़ोसियों से पिता को फोन करवाने के साथ उन्हीं की मदद से मां को नजदीक के एक अस्पताल ले गया.

वहां के डाक्टरों ने सुजाता का प्राथमिक उपचार कर के उन्हें पटेल अस्पताल ले जाने को कहा. लेकिन पटेल अस्पताल पहुंचने से पहले ही उन की मौत हो गई. उस समय तक पृथ्वी हांडा भी अस्पताल पहुंच गए थे. जब उन्हें पत्नी की मौत का पता चला तो दुखी हो कर वह बेहोश हो गए.

सूचना पा कर थाना डिवीजन नंबर-6 के थानाप्रभारी इंसपेक्टर सतेंद्र चड्ढा भी अस्पताल पहुंच गए थे. उन्होंने जरूरी काररवाई कर सुजाता की लाश को पोस्टमार्टम के लिए सरकारी अस्पताल भिजवा दिया. इस के बाद उन्होंने पृथ्वी हांडा की कोठी पर आ कर नौकर हरीश की लाश को भी पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया.

दिनदहाड़े हुई इन हत्याओं से शहर में सनसनी तो फैल ही गई थी, खबर पा कर शहर के तमाम व्यापारी पृथ्वी हांडा की कोठी पर जमा हो गए थे. सभी में दहशत का माहौल था. एसीपी, डीसीपी, एडीसीपी (क्राइम) तथा पुलिस कमिश्नर अर्पित शुक्ला भी आ गए थे. फिंगरप्रिंट विशेषज्ञ, डौग स्क्वायड, क्राइम टीम अधिकारियों के साथ ही एवं फोटोग्राफर ने भी आ कर अपना काम शुरू कर दिया था.

घटनास्थल यानी कोठी की जांच में पुलिस ने हांडा की कोठी के कंपाउंड में खड़ी इनोवा कार से एक सेफ बरामद की थी, जो कोठी के अंदर से ला कर कार में रखी गई थी. इस का मतलब था सुजाता और नौकर हरीश की हत्या लूटपाट के लिए की गई थी. जाहिर है, हत्यारे सेफ को कार से अपने साथ ले जाना चाहते थे.

कोठी के अंदर जिस कमरे में सेफ रखी थी, उस में एक अलमारी भी थी, जिस का सारा सामान कमरे में बिखरा पड़ा था. अलमारी को देख कर पृथ्वी हांडा ने बताया कि अलमारी से ढाई, पौने 3 लाख रुपए नकद और करीब 10 लाख रुपए के गहने गायब हैं. इस के अलावा वे सुजाता के पहने गहने भी उतार ले गए थे.

पूछताछ में पुलिस को ऐसा कोई सुराग नहीं मिला, जिस से लुटेरों तक पहुंचा जा सकता. लेकिन पुलिस ने इतना जरूर अंदाजा लगा लिया था कि जिस ने भी वारदात को अंजाम दिया था, उसे हांडा परिवार की दिनचर्या और कोठी के कोनेकोने की जानकारी थी.

पुलिस कमिश्नर अर्पित शुक्ला ने पुलिस अधिकारियों की मीटिंग कर के थानाप्रभारी सतेंद्र चड्ढा के नेतृत्व में एसआई नरेंद्र सिंह, जसवंत कौर, एएसआई महावीर सिंह, लखविंदर सिंह, हैडकांस्टेबल जागीरी लाल, सुखविंदर सिंह, संदीप कौर तथा स्पैशल स्टाफ के एएसआई सुरजीत सिंह और सुनीत को मिला कर एक टीम बनाई और जरूरी निर्देश दे कर टीम को इस मामले की जांच सौंप दी.

घटनास्थल के निरीक्षण के दौरान पुलिस को एक्टिवा स्कूटर की एक चाबी और टोपी मिली, जो शायद लुटेरों से हड़बड़ी में छूट गई थी. गली में लगे सीसीटीवी कैमरों से पुलिस को कोई मदद नहीं मिल सकी. चाबी मिलने से यह अंदाजा लगाया गया कि हो सकता है कोठी के आसपास कोई एक्टिवा स्कूटर खड़ी हो.

सतेंद्र चड्ढा ने कोठी के आसपास तलाश की तो हांडा की कोठी से कुछ दूरी पर एक एक्टिवा स्कूटर लावारिस हालत में खड़ी मिल गई. उन्होंने कोठी में मिली चाबी उस में लगाई तो वह स्टार्ट हो गई. इस का मतलब वह एक्टिवा स्कूटर लुटेरों की थी. पुलिस ने रजिस्ट्रेशन नंबर के आधार पर उस के मालिक के बारे में पता किया तो पता चला कि एक्टिवा मिट्ठापुर के रहने वाले विजय कुमार के नाम रजिस्टर्ड थी.

विजय कुमार से जब स्कूटर के बारे में पूछा गया तो उस ने बताया कि एक्टिवा को ज्यादातर उस का 20 साल का बेटा अंकुश चलाता था. एक दिन पहले उस ने बताया था कि बाजार से उस की स्कूटर चोरी हो गई थी, जिस की उस ने रिपोर्ट लिखवा दी थी.

सतेंद्र चड्ढा ने अंकुश के बारे में पूछा तो विजय कुमार ने बताया कि वह पिछली रात से घर नहीं आया था. उन्होंने अंकुश की फोटो और मोबाइल नंबर ले लिया. पुलिस ने उस का मोबाइल नंबर सर्विलांस पर लगवा कर उस की फोटो की कौपी बनवा कर पुलिस वालों के अलावा मुखबिरों को भी दे दीं ताकि वे उस के बारे में पता कर सकें.

2 दिनों बाद यानी 25 सितंबर को मुखबिर की सूचना पर बसअड्डे के पास से अंकुश को एक लड़के के साथ गिरफ्तार कर लिया गया. थाने ला कर पूछताछ की गई तो पता चला उस के साथ पकड़े गए लड़के का नाम सतीश था. उन दोनों ने ही अन्य 2 साथियों अजय और मलकीत के साथ मिल कर सुजाता हांडा और नौकर हरीश को हौकी और स्टिकपैन से जख्मी कर के लूटपाट को अंजाम दिया था.

इस के बाद दोनों की निशानदेही पर अजय और मलकीत को भी गिरफ्तार कर लिया गया. पकड़े गए चारों अभियुक्तों को अदालत में पेश कर के पूछताछ एवं सामान बरामद करने के लिए 4 दिनों के पुलिस रिमांड पर ले लिया गया. रिमांड अवधि के दौरान अंकुश की निशानदेही पर रुपए तो अजय और मलकीत की निशानदेही पर गहने बरामद कर लिए गए.

पूछताछ में पृथ्वी हांडा की पत्नी सुजाता और नौकर हरीश की हत्या तथा लूट की जो वजह सामने आई, वह मात्र बेइज्जती का बदला लेने के लिए किया गया अपराध था.

मिट्ठापुर के रहने वाले विजय कुमार की कपड़ों की सिलाई की दुकान थी, जो खास नहीं चलती थी. फिर भी रातदिन मेहनत कर के उस ने अपने दोनों बेटों अंकुश और विशाल को पढ़ाने की पूरी कोशिश की थी कि वे पढ़लिख कर कुछ बन जाएं. लेकिन उस का यह सपना पूरा नहीं हुआ. अंकुश तो आवारा निकला ही, उस ने छोटे भाई को भी अपने सांचे में ढालने की कोशिश की.

लेकिन इस मामले में वह पूरी तरह सफल नहीं हुआ. इस की वजह यह थी कि विशाल थोड़ीबहुत बुद्धि का इस्तेमाल कर लेता था. अंकुश अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए छोटेमोटे काम कर लिया करता था. इसी क्रम में वह पृथ्वी हांडा के यहां काम करने गया था.

शुरू में उस ने मेहनत और ईमानदारी से काम किया, जिस से पृथ्वी हांडा को उस पर विश्वास हो गया. इस के बाद अंकुश ने घर की कोई जरूरत बता कर पृथ्वी हांडा से 10 हजार रुपए उधार ले लिए. उस ने 2 महीना बाद से 2 हजार रुपए महीना तनख्वाह से कटवाने को कहा था, लेकिन कई महीने बीत जाने के बाद भी उस ने न तो रुपए लौटाए और न ही वेतन से रुपए काटने दिए.

हर महीने वह कोई न कोई बहाना कर के रुपए काटने से रोक देता था. इसी बीच पृथ्वी हांडा को अंकुश के बारे में पता चला कि वह जैसा दिखाई देता है, वैसा है नहीं. अंकुश की सच्चाई जान कर उन्हें बड़ा दुख हुआ और उन्होंने तय कर लिया कि वह उन के रुपए दे या न दे, अब वह उसे अपने यहां काम पर नहीं रखेंगे.

वेतन वाले दिन पृथ्वी हांडा ने वेतन देते समय अंकुश से पूछा, ‘‘तुम उधार के 10 हजार रुपए लौटा रहे हो या तुम्हारे वेतन से काट लूं ’’

‘‘इस महीने रहने दीजिए, क्योंकि भाई का एडमीशन कराना है और पिताजी भी बीमार हैं.’’

पृथ्वी हांडा को पता था कि अंकुश झूठ बोल रहा है, इसलिए उन्होंने गुस्से में अंकुश की तनख्वाह उस के मुंह पर मार कर नफरत से देखते हुए कहा, ‘‘झूठा कहीं का, यहां से दफा हो जा. तू कभी नहीं सुधर सकता.’’

पृथ्वी हांडा ने अंकुश को जो भी कहा था, दुकान के सभी नौकरों के सामने कहा था, जिस से ये बातें उसे बहुत बुरी लगी थीं. उन की इन बातों से नाराज हो कर उस ने उन्हें सबक सिखाने का निश्चय कर लिया. उसी दिन से वह हांडा परिवार का ऐसा दुश्मन बन गया, जिस के बारे में उन्होंने कभी सोचा भी नहीं था.

अंकुश पृथ्वी हांडा को सबक सिखाने की योजना बनाने लगा. लेकिन यह काम वह अकेला नहीं कर सकता था, इसलिए उस ने अपने सहपाठियों सतीश, मलकीत और अजय को यह कह कर अपनी योजना में शामिल कर लिया कि हांडा के घर लूट में करोड़ों रुपए मिलेंगे. सभी नादान उम्र कि युवक थे, इसलिए बिना सोचेसमझे वे अंकुश की बातों में आ गए. अंकुश ने अपने भाई विशाल को भी योजना में शामिल कर लिया. इस के बाद अंकुश ने 28 मई, 2016 को अपने इन्हीं साथियों के साथ मिल कर पृथ्वी हांडा की दुकानों में आग लगा दी. उस ने सोचा था कि आग से ताले और शटर पिघल जाएंगे तो वे अंदर जा कर लूट कर लेंगे. लेकिन ऐसा नहीं हुआ.

इस योजना में असफल होने के बाद 20 सितंबर को अंकुश ने साथियों के साथ पृथ्वी हांडा की कोठी पर लूट की योजना बनाई. लेकिन इस में विशाल शामिल नहीं हुआ. योजना के अनुसार, अंकुश मलकीत के साथ ठीक साढ़े 5 बजे पृथ्वी हांडा की कोठी में दाखिल हुआ.

कोठी में दाखिल होने से पहले उस ने अपनी एक्टिवा स्कूटर कोठी से थोड़ी दूरी पर खड़ी कर दी थी. सतीश को उस ने बाहर खड़ा कर दिया था ताकि कोई खतरा दिखाई दे तो वह उसे आगाह कर सके. अंकुश अपने साथ एक हौकी ले कर आया था. कोठी के अंदर जाने से पहले उन्होंने मुख्य गेट को अंदर से बंद कर के ताला लगा दिया था.

कोठी में दाखिल होते ही अंकुश का सामना नौकर हरीश से हुआ तो बिना कोई बातचीत किए उस ने हरीश के सिर पर हौकी से अंधाधुंध वार कर किए. हरीश का सिर फट गया, जिस से खून बहने लगा. वह चीख कर फर्श पर गिर पड़ा था. उसी बीच मलकीत रसोई में से स्टिकपैन उठा लाया और उस ने भी उस के सिर पर कई वार किए. इस मारपीट से हरीश बेहोश हो गया.

हरीश चीखा तो उस की चीख सुन कर ड्राइंगरूम में बैठी सुजाता उठ कर उसे देखने आईं. उसी वक्त अंकुश और मलकीत उन पर भी टूट पड़े. वह भी खून से लथपथ हो कर फर्श पर गिर पड़ीं.

इस के बाद अंकुश ने फटाफट सुजाता के शरीर के गहने उतारे और अंदर अलमारी में रखा कैश और आभूषण अपने कब्जे में ले लिए. वहां रखी सेफ को उठा कर वे बाहर ले आए और इनोवा कार में रख दिया. कार की चाबी कहां रखी रहती है, यह अंकुश को पता था. सेफ में काफी दौलत रखी है, यह भी उसे पता था.

उन्होंने सेफ रख कर जैसे ही कार स्टार्ट की, उसी समय जतिन कोठी के अंदर कूदा. उसे देख कर अंकुश और उस के साथी कार छोड़ कर कोठी के अंदर गए और सीढि़यों से छत पर जा कर पीछे से कूद कर भाग गए. भागने में अंकुश की एक्टिवा स्कूटर की चाबी गिर गई, जिस से वे पकड़े गए.

रिमांड अवधि समाप्त होने पर इंसपेक्टर सतेंद्र चड्ढा ने अंकुश, मलकीत, सतीश और अजय को अदालत में पेश किया, जहां से सभी को जिला जेल भेज दिया गया.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

नेपाल में जनहित के फैसलों को समझिए

नेपाल में संसद का कार्यकाल समाप्त होने के चंद हफ्ते पहले कानूनों की एक नई और व्यापक सीमा तय करने-कराने की जद्दोजहद दिखी थी. इनमें कई कानून व्यापक जनहित के तो हैं ही, कुछ ऐसे हैं, जिन्हें राजनीतिक दलों की स्वार्थ लिप्सा के कारण पारित करा पाना संभव न था. स्वास्थ्य सेवाओं में भ्रष्टाचार पर नियंत्रण के लिए तैयार विधेयक है ऐसा ही है, जिसका सीपीएन-यूएमएल और सीपीएन-माओइस्ट सेंटर जैसे दल विरोध में हैं. सभी जानते हैं कि इनके कैसे-कैसे हित इस क्षेत्र से जुड़े हुए हैं और वे कभी भी इस लाभ से वंचित नहीं होना चाहेंगे.

दूसरा, नेशनल असेंबली चुनाव संबंधी विधेयक चुनाव प्रणाली में सुधार की बातें करता है. सरकार ये दोनों कानून अब अध्यादेश के जरिए लाने जा रही है, जिन्हें राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए भेजा जा चुका है. ये महज इसलिए बेहतर नहीं हैं कि ये जरूरी कानूनी मामले हैं, बल्कि इसलिए भी कि इनके प्रावधान आम नागरिकों के हित में हैं.

स्वास्थ्य-शिक्षा सुधार अध्यादेश में चिकित्सा शिक्षा के क्षेत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार और मुनाफाखोरी को रोकने के व्यापक प्रावधान हैं. यह काठमांडू घाटी में अगले दस साल तक कोई नया मेडिकल कॉलेज खोलने पर रोक की बात करता है. इसे लेकर सबसे ज्यादा घबराहट है. काठमांडू में रसूखदारों और नेताओं ने जिस तरह मेडिकल कॉलेज खोलकर इन्हें मोटी कमाई का जरिया बना रखा है, उसमें यह विरोध स्वाभाविक है. सच तो यह है कि काठमांडू में मेडिकल कॉलेजों का जाल है, जिनका काम प्रवेश के नाम पर छात्रों से मोटी धनराशि वसूलना और फिर उन्हें उनके हाल पर छोड़ देना है. संसाधन विहीन ये कॉलेज महज छात्रों के सपनों और मरीजों का दोहन करने का जरिया बनकर रह गए हैं. ऐसे में, सख्त कानून की दरकार थी.

यह सच है कि चुनाव खत्म होने के बाद अध्यादेशों को संसद से पास कराना होगा, लेकिन फिलहाल तो यही कहा जाना चाहिए कि नेपाल सरकार ने इन विवादास्पद लेकिन व्यापक जनहित के मामलों को खासी समझदारी और संतोषजनक तरीके से सुलझाने की कोशिश की है, जिसका स्वागत होना चाहिए.

ये हमारे देश की संस्कृति है या कुसंस्कृति

हम अपने देश की महान संस्कृति का राग आलापते थकते नहीं हैं. हम छाती पीटते रहते हैं कि पश्चिम की गलीसड़ी, अनैतिक संस्कृति से भारतीय पुरातन संस्कृति की महानता नष्ट हो रही है. पर एक ही दिन, 7 सितंबर का समाचारपत्र देखिए तो हमारी संस्कृति की पोल खुल जाती है.

मुख्य समाचार, संस्कृति के दावेदारों गौरक्षकों के बारे में सुप्रीम कोर्ट का आदेश है जिस में अदालत ने राज्यों को निर्देश दिया है कि वे हर जिले में एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी की नियुक्ति करें जो गौरक्षकों के आपराधिक, हिंसात्मक कृत्यों पर नजर रखें जो गौ संस्कृति के नाम पर आम लोगों को पीटने, मारने व वाहन जलाने का तथाकथित सांस्कृतिक अधिकार रखते हैं.

सुप्रीम कोर्ट ने तो केंद्र सरकार से यह तक पूछा है कि उन (संस्कृति के रक्षक) राज्यों का क्या किया जा सकता है जो आदेश न मानें. शायद सुप्रीम कोर्ट को एहसास है कि संस्कृति रक्षकों को सुप्रीम कोर्ट असांस्कृतिक लगता है. सड़क पर गौमाता को ले जाने वालों को मार डालना कौन सी व कैसी संस्कृति है.

दूसरा समाचार है कि हमारी संस्कृति ऐसी है कि सरकार को चिंता हो रही है कि जिस रेल के डब्बों की छतों पर सोलर पैनल लगाए गए हैं उन्हें रास्ते में चोरी न कर लिया जाए. शायद, मारनेपीटने के साथ चोरी करना भी हमारी संस्कृति में शामिल है. यह ट्रेन दिल्ली से चल कर हरियाणा के फारूख नगर तक चलेगी पर रेल अधिकारी महान संस्कृति की निशानी से चिंतित हैं. जिस देश में सरकार की सार्वजनिक संपत्ति सुरक्षित न हो, वह संस्कृति का गुणगान कैसे कर सकता है?

एक समाचार है दिल्ली के निजी स्कूलों द्वारा अत्यधिक फीस लेने का. उच्च न्यायालय ने 98 स्कूलों को आदेश दिया है कि वे 75 फीसदी अतिरिक्त फीस वापस करें. जहां शिक्षा में घोटाले में हो, जहां गुरु व उन को नियुक्त करने वाले छात्रों को लूटते हों वहां कौन सी संस्कृति है और कैसी संस्कृति है.

बेंगलुरु में गौरी लंकेश की निर्मम हत्या किए जाने के बाद एक संस्कृति रक्षक निखिल दधीचि ने जो शब्द उन के लिए अपने ट्वीटर में इस्तेमाल किए हैं वे पोल खोलते हैं कि हम किस तरह की भाषा बोलते हैं. इस ट्वीटर को प्रधानमंत्री कार्यालय व मंत्री तक फौलो करते हैं.

संस्कृति का हाल यह है कि दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रसंघ के चुनाव में छात्र नेताओं ने सारे शहर को पोस्टरों व अपने नामों से गंदा कर दिया. छात्र इस आयु में झूठ बोलना सीख चुके हैं और वे पोस्टरों में अपने नाम की गलत स्पैलिंग लिखते हैं ताकि बाद में दीवारों को गंदा करने के अपराध से वे बच सकें. यह झूठ की संस्कृति पहले ही दिन से पढ़ाई जा रही है क्या?

यौन मामलों में हम अपनी संस्कृति का गुणगान कुछ ज्यादा करते हैं और पश्चिम की खुली हवा को जी भर के गालियां देते हैं पर हर रोज हमारे देश में ऐसे मामले सामने आ रहे हैं जिन में 10 से 13 वर्ष की बलात्कार की शिकार लड़कियां अदालतों के दरवाजे खटखटा रही होती हैं. अगर हमारी यौन संवेदना इतनी अच्छी है तो बच्चियों के साथ तो यौन संबंध बनने ही नहीं चाहिए. एक समाचार मुंबई के उच्च न्यायालय का इसी बारे में है.

संस्कृति का राग निरर्थक है. हर समाज में अपराधी होंगे ही. उन के लिए पुलिस, अदालतें, जेलें बनेंगी ही. हर समाज में कुछ ऐसे होंगे जो बहुमत के रीतिरिवाजों के खिलाफ होंगे. संस्कृति का नाम ले कर उन की भर्त्सना न करें. जिसे सजा देनी है दें, बाकी सहन करें. हर कोई रैजीमैंटेड नहीं हो सकता. हर कोई तथाकथित संस्कृति का गुलाम नहीं हो सकता. संस्कृति का राग कमजोर आलापते हैं जिन के पास अपनी उपलब्धियां न हों.

कानून, कैदी और पुलिस

सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा का मानना है कि देश में बहुत से कैदी अज्ञानता के कारण जेल काट रहे हैं जबकि लंबित मामले होने के बावजूद उन्हें जमानत मिल सकती थी. यदि कोई विचाराधीन कैदी अपनी अधिकतम सजा का आधा समय अदालती कार्यवाही के दौरान जेल में काट चुका हो तो उसे जमानत मिलने का प्रावधान है. पर इस बात के लिए जानकारी होना और फिर अदालत से आदेश लेने के लिए वकील करना हरेक कैदी के लिए संभव नहीं होता और वे जेल में सड़ते रहते हैं.

मुख्य न्यायाधीश ने इस गुनाह की जिम्मेदारी कैदी पर डाल दी जबकि दोष तो पुलिस अधिकारियों का है जो अदालत में कैदी के खिलाफ मुकदमा चला रहे हैं. यह उन्हें ही मालूम होता है कि अभियुक्त को किस धारा में पकड़ा गया है और कब उस धारा के अंतर्गत अधिकतम सजा का आधा समय बीत गया है. तो, यह उन का काम है कि वे अदालत को बताएं कि अब कैदी को जेल में रखने की आवश्यकता नहीं है.

नागरिक अधिकारों के प्रति पुलिस, अदालतों और सरकार का रवैया असल में आज भी 18वीं सदी का सा है जब एक बार जेल में जाने का अर्थ, वहीं मरना होता था. यदि नागरिक खुद अपनी रक्षा के उपाय न करें तो आज भी उन का वही हाल रहेगा.

लोकतांत्रिक संवैधानिक सरकार होने का अर्थ ही यह है कि पुलिस हर वह काम करे जो कानून ने उस से करने को कहा है और अपने अधिकारों का उतना ही उपयोग करे जितना कि कानून उसे इजाजत देता है. यदि वह कानून के बाहर जाती है तो आम नागरिक की तरह वह भी गुनाहगार है और उसे उसी तरह की सजा मिले जैसी आम नागरिक को मिलती है, यानी जेल में कैद.

अगर मुख्य न्यायाधीश अपनी बात के प्रति गंभीर हैं तो उन्हें पुलिस अफसरों को चेतावनी देनी चाहिए कि यदि ऐसे मामले में कैदी को खुदबखुद न छोड़ा गया तो जिम्मेदार पुलिस वालों के खिलाफ मुकदमा किया जा सकता है. पर, ऐसा होगा नहीं. सरकारें, दरअसल, इस संकल्प पर चलती हैं कि ‘किंग कैन डू नो रौंग’ अर्थात सरकार तो गलत हो ही नहीं सकती. भई, तभी तो सरकार बनाने में इतनी मारामारी होती है.

ऋचा चड्ढा ने खोली बौलीवुड की पोल

बौलीवुड में जाना और शोहरत के साथ नाम पैसा कमाना आज भी लाखों लोगों को सपना है. पर यहां तक जाना किसी भी आम इंसान के लिए आसान नहीं है. बौलीवुड जितना दूर से अच्छा लगता है उतना ही अंदर से खोखला है. किसी के लिए भी बौलीवुड में अपना मुकाम हासिल करना आसान नहीं होता है.

बौलीवुड की एक अभिनेत्री ने फिल्म इंडस्ट्री का एक ऐसा ही सच सामने रखा है, जिसके बारे में आपने और हमने कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा. जी हां, बौलीवुड की जानी-मानी एक्ट्रेस ऋचा चड्ढा ने अपने बयान में ऐसा ही चौकाने वाला खुलासा किया है. उन्होंने बौलीवुड के उस घिनौने चेहरे को सबके सामने रखा, जिसे जानकर आप हैरान रह जाएंगे.

ऋचा चड्ढा ने बताया कि बौलीवुड में जो भी आउटसाइडर्स आते हैं उन्हें शादीशुदा एक्टर्स और क्रिकेटर्स के साथ डेट पर जाने की सलाह दी जाती है और ऐसा करने के लिए मजबूर भी किया जाता है. उनसे कहा जाता है कि ऐसा करने से उनके फिल्मी करियर को आगे बढने में काफी मदद मिलेगी.

ऋचा चड्ढा ने हाल ही में अपने एक इंटरव्यू में कहा कि जब वह बौलीवुड में न्यूकमर थीं तो उन्हें भी ऐसा ही करने की सलाह दी गर्ई थी. ऐसा इसलिए बोला गया था ताकि ऋचा कम वक्त में तेजी से सफलता पा सके, पर ऋचा ऐसा कुछ भी करने को तैयार नहीं हुई और इस काम के लिए साफ इंकार कर दिया था. उन्होंने कहा था कि मैं ऐसा कोई काम नहीं करुंगी.

ऋचा ने अपने फिल्मी सफर का खुलासा करते हुए कहा कि जब वह फिल्म इंडस्ट्री में नई-नर्ई आई थीं तो उन्हें भी शादीशुदा शख्स के साथ डेट पर भेजने की बात हुई थी. उनकी पीआर एजेंसी वाले ने उन्हें पहले तो एक एक्टर को मैसेज करने के लिए बोला था, फिर एजेंसी ने उस एक्टर को डेट करने की सलाह भी दी थी. ऋचा ने फिर जब बाद में कहा कि वह एक्टर तो शादीशुदा है, तो एजेंसी ने उन्हें एक क्रिकेटर को डेट करने के लिए कहा था. ऋचा के अनुसार वह इन सारी चीजों से दूर ही रहीं थीं और यही एक बड़ी वजह है कि फिल्म इंडस्ट्री में उनके ज्यादा दोस्त नहीं है.

ऋचा ने यह भी बताया कि जब वह ‘गैंग्स आफ वासेपुर’ कर रही थी तब उनके पास मैनेजर और स्टाइलिस्ट नहीं थे. वह पार्टी में जाने से पहले जुहू के एक माल में जाकर कपड़े खरीदती थीं और वहीं से मेकअप कराकर पार्टी में जाया करती थी.

आपको बता दें कि ऋचा चड्ढा की फिल्म ‘जिया और जिया’ हाल ही में 27 अक्टूबर को रिलीज हुई है. इस फिल्म में ऋचा चड्ढा के साथ कल्कि कोचलिन और अर्सलान गोनी भी हैं. ‘जिया और जिया’ के बाद ऋचा फिल्म ‘फुकरे रिटर्न्स’ में नजर आएंगी.

जब अमरीश पुरी ने स्‍टीवन स्‍पीलबर्ग को भारत आने पर कर दिया मजबूर

अमरीश पुरी के विलेन किरदारों का जलवा देश विदेश तक था. तभी तो उन्हें हौलीवुड की फिल्म में विलेन के लिए कास्ट किया गया था. लेकिन क्या आप जानते हैं अमरीश पुरी ने हौलीवुड के जाने माने डायरेक्टर स्‍टीवन स्‍पीलबर्ग को भी भारत आने पर मजबूर कर दिया था, नहीं जानते तो कोई बात नहीं चलिए आज हम बताते हैं.

दरअसल ये वाकया साल 1984 में रिलीज हुई फिल्म ‘Indiana Jones and the Temple of Doom’ का है. इस फिल्म के डायरेक्टर स्‍टीवन स्‍पीलबर्ग थे. स्‍टीवन स्‍पीलबर्ग इस फिल्म के लिए अमरीश पुरी को कास्ट करने से पहले उनका स्क्रीन टेस्ट लाने चाहते थे.

स्क्रीन टेस्ट के लिए अमरीश पुरी को हौलीवुड से बाकायदा इनविटेशन भी भेजा गया था. लेकिन अमरीश पुरी ने ये प्रस्ताव ठुकरा दिया था. अमरीश पुरी का कहना था कि अगर वो मेरा स्क्रीन टेस्ट लेना चाहते हैं तो भारत आकर लें.

इसके बाद हुआ भी ऐसा ही, हौलीवुड के नामी डायरेक्‍टर स्‍टीवन स्‍पीलबर्ग अमरीश पुरी का स्क्रीन टेस्ट लेने के लिए भारत आए थे. बाद में अमरीश पुरी को फिल्म ‘Indiana Jones and the Temple of Doom’ में ‘मोला राम’ का रोल मिला था, जो बलि देने का काम करता था.

स्‍टीवन स्‍पीलबर्ग अमरीश पुरी की एक्टिंग के कायल थे. उन्हें अमरीश पुरी के विलेन वाले रोल काफी पसंद थे. यहां तक कि उन्होंने एक इंटरव्यू के दौरान अमरीश पुरी को दुनिया का सबसे बेहतरीन विलेन तक घोषित कर दिया था. भले ही अमरीश पुरी को दुनिया से अलविदा कहे कई बरस बीत गए हों. लेकिन आज भी उनकी फिल्में उनका हमारे बीच होने का एहसास करा ही देती हैं.

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