मैं 23 साल का हूं. कुछ ही महीने में मेरी शादी होने वाली है. मैं जानना चाहता हूं कि फोरप्ले क्या होता है.

सवाल
मैं 23 साल का हूं. कुछ ही महीने में मेरी शादी होने वाली है. मैं जानना चाहता हूं कि फोरप्ले क्या होता है?

जवाब
सेक्स करने से पहले बीवी को जोश में लाने की कोशिश ही फोरप्ले कहलाता है. इस के तहत बीवी के होंठों, उभारों व खास अंगों को चूमा जाता है. यही काम बीवी भी कर सकती है, पति को जोश में लाने के लिए. इस से बाद में सैक्स करने से और भी ज्यादा मजा आता है.

डायन का कलंक : दीपक ने की बसंती की मदद

आज पूरे 3 साल बाद दीपक अपने गांव पहुंचा था, लेकिन कुछ भी तो नहीं बदला था उस के गांव में. पहले अकसर गरमियों की छुट्टियों में वह अपने मातापिता और अपनी छोटी बहन प्रतिभा के साथ गांव आता था, लेकिन 3 साल पहले उसे पत्रकारिता पढ़ने के लिए देश के एक नामी संस्थान में दाखिला मिल गया था और कोर्स पूरा होने के बाद एक बड़े मीडिया समूह में नौकरी भी.

दीपक की बहन प्रतिभा को मैडिकल कालेज में एमबीबीएस के लिए दाखिला मिल गया था. इस वजह से उन का गांव में आना नहीं हो पाया था. पिताजी और माताजी भी काफी खुश थे, क्योंकि पूरे 3 साल बाद उन्हें गांव आने का मौका मिला था.

दीपक का गांव शहर से तकरीबन 15 किलोमीटर की दूरी पर बड़ी सड़क के किनारे बसा हुआ था, लेकिन सड़क से गांव में जाने के लिए कोई भी रास्ता नहीं था. गरमी के दिनों में तो लोग पंडितजी के बगीचे से हो कर आतेजाते थे, मगर बरसात हो जाने पर किसी तरह खेतों से गुजर कर सड़क पर आते थे.

जब वे गांव पहुंचे, तो ताऊ और ताई ने उन का खूब स्वागत किया. ताऊ तो घूमघूम कर कहते फिरे, ‘‘मेरा भतीजा तो बड़ा पत्रकार हो गया है. अब पुलिस भी हमारा कुछ नहीं बिगाड़ पाएगी.’’ दीपक के ताऊ की एक ही बेटी थी, जिस का नाम कुमुद था.

ताऊजी नजदीक के एक गांव में प्राथमिक पाठशाला में प्रधानाध्यापक थे. आराम की नौकरी. जब मन किया पढ़ाने गए, जब मन किया नहीं गए. वे इस इलाके में ‘बड़का पांडे’ के नाम से मशहूर थे. वे जिस गांव में पढ़ाते थे, वहां ज्यादातर दलित जाति के लोग रहते थे, जो किसी तरह मेहनतमजदूरी कर के अपना पेट पालते थे.

उन बेचारों की क्या मजाल, जो इलाके के ‘बड़का पांडे’ के खिलाफ कहीं शिकायत करते. शायद इसी का नतीजा था कि उन की बेटी कुमुद 10वीं जमात में 5 बार फेल हुई थी, पर ताऊ ने नकल कराने वाले एक स्कूल में पैसे दे कर उसे 10वीं जमात पास कराई थी.

दीपक का सारा दिन लोगों से मिलनेजुलने में बीत गया. अगले दिन शाम को वह अपने एक चचेरे भाई रमेश के साथ गांव में घूमने निकला. उस ने कहा कि चलो, अपने बगीचे की तरफ चलते हैं, तो रमेश ने कहा कि नहीं, शाम के समय वहां कोई नहीं जाता, क्योंकि वहां बसंती डायन रहती है.

दीपक को यह सुन कर थोड़ा गुस्सा आया कि आज विज्ञान कहां से कहां पहुच गया है, लेकिन ये लोग अभी भी भूतप्रेतों और डायन जैसे अंधविश्वासों में उलझे हुए हैं.

दीपक ने रमेश से पूछा ‘‘यह बसंती कौन है?’’

उस ने बताया, ‘‘अपने घर पर जो चीखुर नाम का आदमी काम करता था, यह उसी की पत्नी है.’’

चीखुर का नाम सुन कर दीपक को झटका सा लगा. दरअसल, चीखुर दीपक के खेतों में काम करता था और ट्रैक्टर भी चलाता था. उस की पत्नी बसंती बहुत सुंदर थी. हंसमुख स्वभाव और बड़ी मिलनसार. लोगों की मदद करने वाली. गांव के पंडितों के लड़के हमेशा उस के आगेपीछे घूमते थे.

दीपक ने रमेश से पूछा, ‘‘बसंती डायन कैसे बनी?’’ उस ने बताया, ‘‘उस के कोई औलाद तो थी नहीं, इसलिए वह दूसरे के बच्चों पर जादूटोना कर देती थी. वह हमारे गांव के कई बच्चों की अपने जादूटोने से जान ले चुकी है.’’

बसंती के बारे सुन कर दीपक थोड़ा दुखी हो गया, लेकिन उस ने मन ही मन ठान लिया कि उसे डायन के बारे में पता लगाना होगा.

जब थोड़ी रात हुई, तो दीपक शौच के बहाने लोटा ले कर घर से निकला और अपने बगीचे की तरफ चल पड़ा. बगीचे के पास एक कच्ची दीवार और उस के ऊपर गन्ने के पत्तों का छप्पर पड़ा था, जिस में एक टूटाफूटा दरवाजा भी था.

दीपक ने बाहर से आवाज लगाई, ‘‘कोई है?’’

अंदर से किसी औरत की आवाज आई, ‘‘भाग जाओ यहां से. मैं डायन हूं. तुम्हें भी जादू से मार डालूंगी.’’

दीपक ने कहा, ‘‘दरवाजा खोलो. मैं दीपक हूं.’’

वह औरत बोली, ‘‘कौन दीपक?’’

दीपक ने कहा, ‘‘मैं रामकृपाल का बेटा दीपक हूं.’’

वह औरत रोते हुए बोली, ‘‘दीपक बाबू, आप यहां से चले जाइए. मैं डायन हूं. आप को भी मेरी मनहूस छाया पड़ जाएगी.’’

दीपक ने कहा, ‘‘तुम बाहर आओ, वरना मैं दरवाजा तोड़ कर अंदर आ जाऊंगा.’’

तब वह औरत बाहर आई. वह एकदम कंकाल लग रही थी. फटी हुई मैलीकुचैली साड़ी, आंखें धंसी हुईं. उस के भरेभरे गाल कहीं गायब हो गए थे. उन की जगह अब गड्ढे हो गए थे.

उस औरत ने बाहर निकलते ही दीपक से कहा, ‘‘बाबू, आप यहां क्यों आए हैं? अगर आप की बिरादरी के लोगों ने आप को मेरे साथ देख लिया, तो मेरे ऊपर शामत आ जाएगी.’’

दीपक ने कहा, ‘‘तुम्हें कुछ नहीं होगा. लेकिन तुम्हारा यह हाल कैसे हुआ?’’

वह औरत रोने लगी और बोली, ‘‘क्या करोगे बाबू यह जान कर?’’

दीपक ने उसे बहुत समझाया, तो उस औरत ने बताया, ‘‘तकरीबन 2 साल पहले मेरे पति की तबीयत खराब हुई थी. जब मैं ने अपने पति को डाक्टर को दिखाया, तो उन्होंने कहा कि इस के दोनों गुरदे खराब हो गए हैं. इस का आपरेशन कर के गुरदे बदलने पड़ेंगे, लेकिन पैसे न होने के चलते मैं उस का आपरेशन नहीं करा पाई और उस की मौत हो गई.

‘‘पति की दवादारू में मेरे गहने बिक गए थे और हमारी एक बीघा जमीन जगनारायण पंडित के यहां गिरवी हो गई. अपने पति का क्रियाकर्म करने में जो पैसा लगाया था, वह सारा जगनारायण पंडित से लिया था. उन पैसों के बदले उस ने हमारी जमीन अपने नाम लिखवा ली, पर मुझे तो यह करना ही था, वरना गांव के लोग मुझे जीने नहीं देते. पति तो परलोक चला गया था. सोचा कि मैं किसी तह मेहनतमजदूरी कर के अपना पेट भर लूंगी.

‘‘फिर मैं आप के खेतों में काम करने लगी, लेकिन जगनारायण पंडित मुझे अकसर आतेजाते घूर कर देखता रहता था. पर मैं उस की तरफ कोई ध्यान नहीं देती थी.

‘‘एक दिन मैं खेतों से लौट रही थी. थोड़ा अंधेरा हो चुका था. तभी खेतों के किनारे मुझे जगनारायण पंडित आता दिखाई दिया. वह मेरी तरफ ही आ रहा था.

‘‘मैं उस से बच कर निकल जाना चाहती थी, लेकिन पास आ कर उस ने मेरा हाथ पकड़ लिया और बोला, ‘कहां इतना सुंदर शरीर ले कर तू दूसरों के खेतों में मजदूरी करती है. मेरी बात मान, मैं तुझे रानी बना दूंगा. आखिर तू भी तो जवान है. तू मेरी जरूरत पूरी कर दे, मैं तेरी जरूरत पूरी करूंगा.’

‘‘मैं ने उस से अपना हाथ छुड़ाया और उसे एक तमाचा जड़ दिया. मैं अपने घर की तरफ दौड़ पड़ी. पीछे से उस की आवाज आई, ‘तू ने मेरी बात नहीं मानी है न, इस थप्पड़ का मैं तुझ से जरूर बदला लूंगा.’

‘‘कुछ महीनों के बाद रामजतन का बेटा और मंगरू की बेटी बीमार पड़ गई. शहर के डाक्टर ने बताया कि उन्हें दिमागी बुखार हो गया है, लेकिन जगनारायण पंडित और उस के चमचे कल्लू ने गांव में यह बात फैला दी कि यह सब किसी डायन का कियाधरा है.

‘‘उन बच्चों को अस्पताल से निकाल कर घर लाया गया और एक तांत्रिक को बुला कर झाड़फूंक होने लगी. लेकिन अगले दिन ही दोनों बच्चों की मौत हो गई, तो जगनारायण पंडित ने उस तांत्रिक से कहा कि बाबा उस डायन का नाम बताओ, जो हमारे बच्चों को खा रही है.

‘‘उस तांत्रिक ने मेरा नाम बताया, तो भीड़ मेरे घर पर टूट पड़ी. मेरा घर जला दिया गया. मुझे मारापीटा गया. मेरे कपड़े फाड़ दिए गए और सिर मुंड़वा कर पूरे गांव में घुमाया गया.

‘‘इतने से भी उन का मन नहीं भरा और उन लोगों ने मुझे गांव से बाहर निकाल दिया. तब से मैं यहीं झोंपड़ी बना कर और आसपास के गांवों से कुछ मांग कर किसी तरह जी रही हूं’’.

उस औरत की बातें सुन कर दीपक की आंखें भर आईं. उस ने कहा, ‘‘मैं जैसा कहता हूं, वैसा करना. मैं तुम्हारे माथे से डायन का यह कलंक हमेशा के लिए मिटा दूंगा.’’

दीपक ने उसे धीमी आवाज में समझाया, तो वह राजी हो गई. दीपक ने गांव में यह बात फैला दी कि बसंती को कहीं से सोने के 10 सिक्के मिल गए हैं. पूरा गांव तो डायन से डरता था, लेकिन एक दिन जगनारायण पंडित उस के घर पहुंचा और बोला, ‘‘क्यों री बसंती, सुना है कि तुझे सोने के सिक्के मिले हैं. ला, सोने के सिक्के मुझे दे दे, नहीं तो तू जानती है कि मैं क्या कर सकता हूं.

‘‘जब पिछली बार तू ने मेरी बात नहीं मानी थी, तो मैं ने तेरा क्या हाल किया था, भूली तो नहीं होगी?

‘‘मेरी वजह से ही तू आज डायन बनी फिर रही है. अगर इस बार तू ने मेरी बात नहीं मानी, तो मैं तेरा पिछली बार से भी बुरा हाल करूंगा.’’

वह बसंती को मारने ही वाला था कि दीपक गांव के कुछ लोगों के साथ वहां पहुंच गया. इतने लोगों को वहां देख कर जगनारायण पंडित की घिग्घी बंध गई. वह बड़बड़ाने लगा. इतने में बसंती ने अपने छप्पर में छिपा कैमरा निकाल कर दीपक को दे दिया.

जगनारायण पंडित ने कहा, ‘‘यह सब क्या?है?’’

दीपक ने कहा, ‘‘मेरा यह प्लान था कि डायन के डर से गांव का कोई आदमी यहां नहीं आएगा, लेकिन तुझे सारी हकीकत मालूम है और तू सोने के सिक्कों की बात सुन कर यहां जरूर आएगा, इसलिए मैं ने बसंती को कैमरा दे कर सिखा दिया था कि इसे कैसे चलाना है.

‘‘जब तू दरवाजे पर आ कर चिल्लाया, तभी बसंती ने कैमरा चला कर छिपा दिया था और जब तू इधर आ रहा था, मैं ने तुझे देख लिया था. अब तू सीधा जेल जाएगा.’’

यह बात जब गांव वालों को पता चली, तो वे बसंती से माफी मांगने लगे. जगनारायण पंडित को उस के किए की सजा मिली. पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया. भीड़ से घिरी बसंती दीपक को देख रही थी, मानो उस की आंखें कह रही हों, ‘मेरे सिर से डायन का कलंक उतर गया दीपक बाबू.’

दीपक ने अपने नाम की तरह अंधविश्वास के अंधेरे में खो चुकी बसंती की जिंदगी में उजाला कर दिया था.

देवर पर भारी पड़ा भाभी से संबंध

‘‘अरे वाह देवरजी, तुम तो एकदम मुंबइया हीरो लग रहे हो,’’ सुशीला ने अपने चचेरे देवर शिवम को देख कर कहा.

‘‘देवर भी तो तुम्हारा ही हूं भाभी. तुम भी तो हीरोइनों से बढ़ कर लग रही हो,’’ भाभी के मजाक का जवाब देते हुए शिवम ने कहा.

‘‘जाओजाओ, तुम ऐसे ही हमारा मजाक बना रहे हो. हम तो हीरोइन के पैर की धूल के बराबर भी नहीं हैं.’’

‘‘अरे नहीं भाभी, ऐसा नहीं है. हीरोइनें तो  मेकअप कर के सुंदर दिखती हैं, तुम तो ऐसे ही सुंदर हो.’’

‘‘अच्छा तो किसी दिन अकेले में मिलते हैं,’’ कह कर सुशीला चली गई.

इस बातचीत के बाद शिवम के तनमन के तार झनझना गए. वह सुशीला से अकेले में मिलने के सपने देखने लगा.

नाजायज संबंध अपनी कीमत वसूल करते हैं. यह बात लखनऊ के माल थाना इलाके के नबी पनाह गांव में रहने वाले शिवम को देर से समझ आई.

शिवम मुंबई में रह कर फुटकर सामान बेचने का काम करता था. उस के पिता देवेंद्र प्रताप सिंह किसान थे.

गांव में साधारण सा घर होने के चलते शिवम कमाई करने मुंबई चला गया था. 4 जून, 2016 को वह घर वापस आया था.

शिवम को गांव का माहौल अपना सा लगता था. मुंबई में रहने के चलते वह गांव के दूसरे लड़कों से अलग दिखता था. पड़ोस में रहने वाली भाभी सुशीला की नजर उस पर पड़ी, तो दोनों में हंसीमजाक होने लगा.

सुशीला ने एक रात को मोबाइल फोन पर मिस्ड काल दे कर शिवम को अपने पास बुला लिया. वहीं दोनों के बीच संबंध बन गए और यह सिलसिला चलने लगा.

कुछ दिन बाद जब सुशीला समझ गई कि शिवम पूरी तरह से उस की गिरफ्त में आ चुका है, तो उस ने शिवम से कहा, ‘‘देखो, हम दोनों के संबंधों की बात हमारे ससुरजी को पता चल गई है. अब हमें उन को रास्ते से हटाना पड़ेगा.’’ यह बात सुन कर शिवम के पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई.

सुशीला इस मौके को हाथ से जाने नहीं देना चाहती थी. वह बोली, ‘‘तुम सोचो मत. इस के बदले में हम तुम को पैसा भी देंगे.’’

शिवम दबाव में आ गया और उस ने यह काम करने की रजामंदी दे दी.

नबी पनाह गांव में रहने वाले मुन्ना सिंह के 2 बेटे थे. सुशीला बड़े बेटे संजय सिंह की पत्नी थी. 5 साल पहले संजय और सुशीला की शादी हुई थी.

सुशीला उत्तर प्रदेश के रायबरेली जिले के महराजगंज थाना इलाके के मांझ गांव की रहने वाली थी. ससुराल आ कर सुशीला को पति संजय से ज्यादा देवर रणविजय अच्छा लगने लगा था. उस ने उस के साथ संबंध बना लिए थे.

दरअसल, सुशीला ससुराल की जायदाद पर अकेले ही कब्जा करना चाहती थी. उस ने यही सोच कर रणविजय से संबंध बनाए थे. वह नहीं चाहती थी कि उस के देवर की शादी हो.

इधर सुशीला और रणविजय के संबंधों का पता ससुर मुन्ना सिंह और पति संजय सिंह को लग चुका था. वे लोग सोच रहे थे कि अगर रणविजय की शादी हो जाए, तो सुशीला की हरकतों को रोका जा सकता है.

सुशीला नहीं चाहती थी कि रणविजय की शादी हो व उस की पत्नी और बच्चे इस जायदाद में हिस्सा लें.

लखनऊ का माल थाना इलाका आम के बागों के लिए मशहूर है. यहां जमीन की कीमत बहुत ज्यादा है. सुशीला के ससुर के पास  करोड़ों की जमीन थी.

सुशीला को पता था कि ससुर मुन्ना सिंह को रास्ते से हटाने के काम में देवर रणविजय उस का साथ नहीं देगा, इसलिए उस ने अपने चचेरे देवर शिवम को अपने जाल में फांस लिया.

12 जून, 2016 की रात मुन्ना सिंह आम की फसल बेच कर अपने घर आए. इस के बाद खाना खा कर वे आम के बाग में सोने चले गए. वे पैसे भी हमेशा अपने साथ ही रखते थे.

सुशीला ने ससुर मुन्ना सिंह के जाते ही पति संजय और देवर रणविजय को खाना खिला कर सोने भेज दिया. जब सभी सो गए, तो सुशीला ने शिवम को फोन कर के गांव के बाहर बुला लिया.

शिवम ने अपने साथ राघवेंद्र को भी ले लिया था. वे तीनों एक जगह मिले और फिर उन्होंने मुन्ना सिंह को मारने की योजना बना ली.

उन तीनों ने दबे पैर पहुंच कर मुन्ना सिंह को दबोचने से पहले चेहरे पर कंबल डाल दिया. सुशीला ने उन के पैर पकड़ लिए और शिवम व राघवेंद्र ने उन को काबू में कर लिया.

जान बचाते समय मुन्ना सिंह चारपाई से नीचे गिर गए. वहीं पर उन दोनों ने गमछे से गला दबा कर उन की हत्या कर दी.

मुन्ना सिंह की जेब में 9 हजार, 2 सौ रुपए मिले. शिवम ने 45 सौ रुपए राघवेंद्र को दे दिए. इस के बाद वे तीनों अपनेअपने घर चले गए.

सुबह पूरे गांव में मुन्ना सिंह की हत्या की खबर फैल गई. उन के बेटे संजय और रणविजय ने माल थाने में हत्या का मुकदमा दर्ज कराया. एसओ माल विनय कुमार सिंह ने मामले की जांच शुरू की.

पुलिस ने हत्या में जायदाद को वजह मान कर अपनी खोजबीन शुरू की. मुन्ना सिंह की बहू सुशीला पुलिस को बारबार गुमराह करने की कोशिश कर रही थी.

पुलिस ने जब मुन्ना सिंह के दोनों बेटों संजय और रणविजय से पूछताछ की, तो वे दोनों बेकुसूर नजर आए.

इस बीच गांव में यह पता चला कि सुशीला के अपने देवर रणविजय से नाजायज संबंध हैं. इस बात पर पुलिस ने सुशीला से पूछताछ की, तो उस की कुछ हरकतें शक जाहिर करने लगीं.

एसओ माल विनय कुमार सिंह ने सीओ, मलिहाबाद मोहम्मद जावेद और एसपी ग्रामीण प्रताप गोपेंद्र यादव से बात कर पुलिस की सर्विलांस सैल और क्राइम ब्रांच की मदद ली.

सर्विलांस सैल के एसआई अक्षय कुमार, अनुराग मिश्रा और योगेंद्र कुमार ने सुशीला के मोबाइल को खंगाला, तो  पता चला कि सुशीला ने शिवम से देर रात तक उस दिन बात की थी.

पुलिस ने शिवम का फोन देखा, तो उस में राघवेंद्र का नंबर मिला. इस के बाद पुलिस ने राघवेंद्र, शिवम और सुशीला से अलगअलग बात की.

सुशीला अपने देवर रणविजय को हत्या के मामले में फंसाना चाहती थी. वह पुलिस को बता रही थी कि शिवम का फोन उस के देवर रणविजय के मोबाइल पर आ रहा था.

सुशीला सोच रही थी कि पुलिस हत्या के मामले में देवर रणविजय को जेल भेज दे, तो वह अकेली पूरी जायदाद की मालकिन बन जाएगी, पर पुलिस को सच का पता चल चुका था.

पुलिस ने तीनों को साथ बिठाया, तो सब ने अपना जुर्म कबूल कर लिया.

14 जून, 2016 को पुलिस ने राघवेंद्र, शिवम और सुशीला को मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया. वहां से उन तीनों को जेल भेज दिया गया.

सुशीला अपने साथ डेढ़ साला बेटे को जेल ले गई. उस की 4 साल की बेटी को पिता संजय ने अपने पास रख लिया.

जेल जाते समय सुशीला के चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी. वह शिवम और राघवेंद्र पर इस बात से नाराज थी कि उन लोगों ने यह क्यों बताया कि हत्या करते समय उस ने ससुर मुन्ना सिंह के पैर पकड़ रखे थे.

एक हफ्ते के इतने पैसे मिलते हैं इन बिग बौस कंटेस्टेंट को

कलर्स के विवादित शो बिग बौस में आपको हर एपिसोड में घरवाले लड़ाई करते दिख जाते हैं. इस सीजन में सेलिब्रिटी से ज्यादा आम सदस्यों को घर के अंदर भेजा गया है. घर के अंदर सेलिब्रिटी कंटेस्टेंट के तौर पर इस समय बचे सदस्य हैं हिना खान, हितेन तेजवानी, विकास गुप्ता और शिल्पा शिंदे. इन्हें हर हफ्ते के हिसाब से बिग बौस की तरफ से पैसों का भुगतान किया जाता है. एक रिपोर्ट के अनुसार बिग बौस इन सेलिब्रिटी सदस्यों को हर हफ्ते लाखों रुपए की फीस दे रहे हैं. इनकी भुगतान राशि जानकर आप हैरान रह जाएंगे.

हिना खान

टीवी की मशहूर बहू हिना खान अपने विवादित बयानों की वजह से घर में सबसे ज्यादा चर्चित हैं. उन्होंने स्टार प्लस पर प्रसारित होने वाले शो ‘ये रिश्ता क्या कहलाता है’ में 7 सालों तक काम किया है. शो छोड़ने के बाद हिना खतरों के खिलाड़ी का हिस्सा रही हैं. अब बिग बौस में नजर आ रही हैं. उन्हें हर हफ्ते 7-8 लाख रुपए फीस दी जाती है.

हितेन तेजवानी

पिछले 15 सालों से हितेन टीवी का मशहूर चेहरा बने हुए हैं. उनकी एक बहुत अच्छी छवि है और घर के अंदर भी उन्होंने अपनी इसी छवि को बरकरार रखा है. उन्हें बिग बौस 7-7.5 लाख रुपए प्रति हफ्ते फीस देते हैं.

शिल्पा शिंदे

टीवी की अंगूरी भाभी यानी शिल्पा शिंदे की पर्दे पर एक मासूम और भोली-भाली इमेज है. घर के अंदर भी सदस्यों ने उन्हें मां का दर्जा दिया हुआ है. उन्हें बिग बौस की तरफ से हर हफ्ते 6-7 लाख रुपए मिलते हैं.

विकास गुप्ता

पहले दिन से ही बिग बौस में विकास गुप्ता और शिल्पा शिंदे की लड़ाई शो का हाइलाइट रही थी. लोगों को दोनों की यह नोंक-झोंक काफी पसंद आ रही थी. हालांकि अब दोनों दोस्त बन गए हैं. इस टीवी प्रोड्यूसर को हर हफ्ते 6-6.5 लाख रुपए मिलते हैं.

मथुरा में होली खेलेगी योगी सरकार

उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने अयोध्या और नैमिशारण्य के बाद मथुरा में होली खेलने का प्लान तैयार किया है. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अयोध्या में दीवाली के अवसर पर भव्य दीवाली पूजन का आयोजन किया था. अपने धार्मिक एजेंडे के तहत अयोध्या के बाद सीतापुर जिले के नैमिशारण्य जाकर मुख्यमंत्री योगी ने दो दिन का कार्यक्रम भनैमिषेय शंखनाद्य कार्यक्रम का समापन किया.

सरकार ने नैमिशारण्य के परिक्रमा स्थल का विकास करने के लिये 100 करोड़ का बजट भी पास कर दिया. योगी ने कहा कि अयोध्या में सरयू आरती की तरह की नैमिशारण्य में भी गोमती आरती शुरू हो. सरकार इसमें हर संभव मदद करेगी. मुख्यमंत्री ने कहा कि नदियों का प्रदूषण रोकने के लिये भीतर से इनके प्रति श्रद्वा का भाव आना चाहिये. नदियां न बचेंगी तो न हम बचेंगे और न हमारी संस्कृति. मुख्यमंत्री ने कहा कि बिना भेदभाव के सभी तीर्थस्थलों का विकास हमारा लक्ष्य है.

सवाल उठता है कि जिस देश में गंगा को सबसे पवित्र नदी का दर्जा हासिल हो वह नदी इतना प्रदूर्षित क्यों है? कई शहरों में गंगा आरती होती है. हरिद्वार, ऋषिकेश और वाराणसी इनमें सबसे प्रमुख हैं. इसके बाद भी गंगा इन शहरों में ही सबसे अधिक प्रदूषित है. राजधानी लखनऊ में गोमती नदी की आरती होती है. आरती जहां होती है, उससे कुछ ही दूरी पर गोमती नदी की गंदगी को देखा जा सकता है.

नदियों की आरती के जरिये कैसे नदियां प्रदूषण मुक्त हो सकेंगी, यह समझा जा सकता है. उत्तर प्रदेश की सरकार केवल धर्म के एजेंडे पर काम कर रही है. मंदिर, नदियां और धार्मिक त्योहार के बहाने सरकार किसी न किसी तरह से चर्चा में रहना चाहती है. दीवाली और कांवड यात्रा के बाद अब योगी सरकार धूमधाम से होली मनाने जा रही है.

मथुरा से सरकार के जुड़ने की दो खास वजहे हैं. सबसे पहली वजह अयोध्या और वाराणसी की ही तरह से मथुरा में मंदिर मस्जिद का विवाद है. यहां होली मनाकर सरकार जनमानस को यह संकेत देना चाहती है कि वह मथुरा को भी अपने एजेंडे में रखे हुये है. उत्तर प्रदेश में धार्मिक पर्यटन जिन शहरों में होता है उनमें मथुरा प्रमुख है. होली एक ऐसा त्योहार है जिससे जनमानस जुड़ा है. इससे सरकार को लोगों को खुद से जोड़ना सरल हो जायेगा.

अयोध्या में दीवाली मनाने और राम की भव्य मूर्ति लगवाने के एलान के बाद समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव ने कृष्ण की मूर्ति लगवाने की बात कही थी. योगी सरकार धर्म को लेकर किसी और पार्टी के हाथ में कोई मुद्दा नहीं देना चाहती. गुजरात चुनावों में जब कांग्रेस नेता राहुल गांधी मंदिर गये तो उनको नकली हिन्दू साबित किया जाने लगा. समाजवादी पार्टी कृष्ण को लेकर कोई कदम उठाये उससे पहले भाजपा इस पर अपना हक साबित कर देना चाहती है.

उत्तर प्रदेश में सरकार जिस तरह से धर्मिक प्रपंच का सहारा ले रही है, उससे बुनियादी मुद्दे पूरी तरह से हाशिये पर हैं. अयोध्या में दीपावली पूजन, चित्रकूट में मंदाकिनी नदी की आरती, आगरा में ताज महल का विवाद, कांवर यात्रा पर फूल वर्षा, धार्मिक शहरों को प्रमुख पर्यटन क्षेत्र के रूप में प्रचार करना और मुख्यमंत्री के सरकारी आवास को गंगा जल से पवित्र कराना कुछ ऐसे प्रपंच हैं जिनका प्रचार ज्यादा हो रहा है. सरकार इन मुद्दों पर भी केवल बातें ही कर रही है. वहां विकास की कोई योजना को लेकर मूलभूत काम नहीं कर रही.

किसी भी शहर में सड़क, बिजली, पानी का इंतजाम करना ही वहां का विकास करना नहीं होता है. लोगों को रोजगार मिले, बेरोजगारी कम हो, लोग काम धंधे में लगें, इससे ही समाज में अमनचैन आता है. सड़कें कितनी ही अच्छी बन जाये, अगर रोजगार नहीं होगा तो लोग अपराध करेंगे. अयोध्या का सच दीवाली के दिन नहीं दिखा. आयोजन की भव्य चकाचौंध में वह सच कहीं खो गया था.

भाजपा संस्थापक रहे पंडित दीनदयाल उपाध्याय की अंतोदय की परिकल्पना में भी समाज का वही अंतिम आदमी था. वह उसको ही खुशहाल बनाने का काम कर रहे थे. आजादी के बाद से हर सरकार हर बात में गरीबों के उद्वार की ही बात करती है. 70 साल के बाद भी भारत का गरीब दीयों से तेल एकत्र करता दिखता है. गरीब इस लिये गरीब हैं क्योंकि उसके पास काम नहीं है. देश में भीख मांगने वालों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है. हर जगह ऐसे लोग रोटी के एक एक टुकड़े के लिये संघर्ष करते देखे जा सकते हैं.

अगर धार्मिक प्रपंच को छोड़ कर सरकारों ने बुनियादी सुविधाओं ओर रोजगार की दिशा में काम किया होता तो गरीबी रेखा से नीचे गुजर बसर करने वालों की संख्या लगातार बढ़ती नहीं. सरकारी नीतियों से गरीबी रेखा के ऊपर और नीचे के लोग ही नहीं मध्यमवर्गीय परिवार भी गरीबी रेखा के करीब पहुंच गये हैं. बच्चे पढ़ रहे हैं, उनके पास कोई काम नहीं है. सरकारें दिखाने के लिये उनको ट्रेनिंग देने का काम करती है. इससे कितने युवाओं को रोजगार मिला यह देखने वाली बात है?

कौशल विकास को लेकर पूरे देश में बड़े जोरशोर से काम हो रहा है. कौशल विकास प्रशिक्षण पाये लोगों में से कितनों को रोजगार से जोड़ा जा सका इसका सच सामने रखना चाहिये. सरकारी आंकड़े पूरा सच नहीं दिखाते. ऐसे में सरकार को सामाजिक आंकड़ों को भी देखना चाहिये.

जिस अयोध्या के विकास के लिये पूरी सरकार एकजुट है, कम से कम वहां तो रामराज कायम दिखना चाहिये. राम को आदर्श मानने वाले नेता क्या कभी रात में अपनी पहचान बदल कर अयोध्या की गलियो का सच देखने गये है? मंत्री के लिये अफसर रेड कारपेट बिछा कर सबकुछ ठीक होने का दावा हमेशा करते हैं. नेता की जिम्मेदारी होती है कि रेड कारपेट को हटा कर नीचे छिपे सच को देखे.

संविधान ने इसी लिये उसे पढ़े लिखे अफसर से ऊपर का दर्जा दिया है. कागज में धर्म की नगरी को पर्यटन का दर्जा देने से वहां का भला नहीं होने वाली. अखिलेश सरकार के समय भी नैमिष और मिश्रिख को पर्यटन का दर्जा दिया गया था. सडके बनी, बसे चलीं, विज्ञापन छपे, इसके बाद भी यहां के हालात नहीं बदले. आज भी यहां के लोगों के पास कोई रोजगार नहीं है.

कांवर यात्रा के दौरान सरकार की तमाम सुविधाओं के बाद भी कांवर यात्रा करने वाले रास्ते भर परेशान और लोगों से मदद मांगते दिखे. सरकार ने कांवर मार्ग पर पुष्प वर्षा का वादा किया पर यह पुष्प कावंर यात्रा करने वालों के सफर को सुखद नहीं बना पाये. अगर पुष्प वर्षा से कांवर यात्रियों को सुविधा मिल जाती तो वह मदद क्यों मांगते दिखते?

धर्म के नाम पर जनता को बहुत समय तक मुद्दों से दूर नहीं रखा जा सकता है. जरूरत इस बात की है कि बेरोजगारों के लिये काम के अवसर बढ़ाये जाये. जब तक लोगों के लिये रोजगार नहीं होगा, भुखमरी बनी रहेगी. न मजदूर खुश होगा न किसान. वह ऐसे ही दीयों के बचे तेल से अपने घर की सब्जी बनाने के इंतजाम करता रहेगा. सरकार कितने भी किसानों के लोग माफ कर दे, कुछ ही दिनों में फिर से वहीं हालात बन जायेंगे.

धार्मिक प्रपंच में जुटे लोग इस तथ्य को समझ लें कि इसी देश में कहा गया है कि ‘भूखे भजन न होय गोपाला’ इसका अर्थ है कि अगर कोई भूखा है तो वह किसी भी तरह से धार्मिक प्रवचन न कर सकता है और न सुन सकता है. जिसे समय मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ दीप जला कर अयोध्या में खुशियों की दीवाली मना रहे थे, भूखे पेट रहने वालों की नजर उन दीयों पर रही होंगी, वह सोच रहे होंगे कि दीयें कितनी जल्दी बुझ जायें जिससे दीयों का तेल बचा रह सके. उनकी असल खुशी दीयों के जलने से नहीं दियों के बुझने से थी. उनकी भूख जलने वाले दीयों से नहीं बुझे दीयों से बुझी जिनसे उनको सब्जी बनाने के लिये तेल मिल सका. अयोध्या की ऐसी दीवाली के सच को समझ कर समाज के अंतिम आदमी की खुशहाली से समाज में बदलाव होगा. भूखे पेट तो धर्म की चर्चा भी नहीं होती.

टौयलेट एक घोर व्यथा : बेचारेलाल की कहानी

फिल्म ‘टौयलेट: एक प्रेमकथा’ के हीरो अक्षय कुमार हैं, जबकि टौयलेट: एक घोर व्यथा के हीरो हैं बेचारेलाल. भले ही बेचारेलाल को ले कर कोई फिल्म न बनी हो, पर आप थोड़ा सब्र कर के उन की परेशानी को उन की जगह खुद को रख कर जानने की कोशिश करें, तो एक अनदेखी फिल्म देख पाएंगे.

बेचारेलाल की बेचारगी यह है कि जिस तरह हर पल सांस लेना जरूरी है, उसी तरह उन के लिए हर आधे घंटे में मूत्र विसर्जन करना जरूरी है.

बचपन से ले कर किशोर होने तक बेचारेलाल बिस्तर ही गीला करते रहे. डाक्टरों से सलाह करने पर उन्होंने बताया कि उन का मूत्राशय छोटा है, इस वजह से यह समस्या है. बड़े होने पर उन्हें लगा कि अब तो उन के साथसाथ मूत्राशय भी बड़ा हो गया होगा, सो फिर उन्होंने डाक्टर से पूछा.

इस बीच तकनीक काफी तरक्की कर चुकी थी और डाक्टरों ने जांच कर के बताया कि प्रोस्टेट ग्रंथि के बढ़ने के चलते उन के साथ यह समस्या है.

बाद में बिस्तर गीला करने की आदत तो छूटी, पर अभी भी हर आधे घंटे पर सूसू की तलब ठीक वैसे उठती है, जैसे नेताओं को कुरसी की तलब हर 5 साल में होती है.

छोटी जगहों पर यह आदत कोई समस्या नहीं, क्योंकि उन के लिए जगह ही जगह होती है. ‘धरती मेरी माता पिता आसमां…’ गाते हुए वे कहीं भी शुरू हो जाते थे, पर बड़ेबड़े शहरों में छोटीछोटी समस्याएं भी बड़ी हो जाती हैं और बड़ा शहर भी ऐसावैसा नहीं बंबई नगरिया, जो अब मुंबई के नाम से जाना जाता है. इस के बारे में गाने भी बने हैं, ‘ये जो बंबई शहर हादसों का शहर है’ और ‘ऐ दिल है मुश्किल जीना यहां…’ वगैरह.

बेचारेलाल की दिक्कत यह है कि मुंबई की लाइफलाइन कही जाने वाली लोकल ट्रेन, जो कभीकभार किलर के किरदार में भी आ जाती है, में टौयलेट नामक किसी सुविधा का वजूद नहीं है. अगर हो भी जाए, तो कोई फायदा नहीं, क्योंकि मुसाफिर बेचारे एकदूसरे से गोंद की तरह चिपके रहते हैं. अपनी जगह से खिसकने का सवाल ही नहीं और अगर इन ट्रेनों में शौचालय का इंतजाम कर भी दिया जाए, तो उस में भी 5-10 मुसाफिर तो हर वक्त ठुंसे हुए रहेंगे ही.

फिर किसी स्टेशन पर अगर सुविधा है भी, तो अकसर आप ‘अभी कतार में हैं’ महसूस होता रहता है. अगर कतार से बचना है, तो 2 रुपए का सिक्का पास में होना चाहिए.

बेचारेलाल को दिनभर में इतने फेरे लगाने पड़ते हैं कि कितने सिक्के रखें पास में और फिर 2 रुपए देना उन के दिल को ऐसे भी गंवारा नहीं है.

आखिर वहां वे कुछ देते ही हैं, लेते तो नहीं. जिस ने कुछ दिया पैसे तो उसे मिलने चाहिए. गोबर गैस प्लांट से मिलने वाले फायदे की तर्ज पर मूत्र गैस प्लांट बनाओ और ऊर्जा बनाओ. गोमूत्र से दवा बना सकते हो, मानव मूत्र से कम से कम बायोपैट्रोलियम तो बनाओ.

फिर कई बसअड्डों पर तो यह सुविधा है ही नहीं. अगर खुले में जाने की सोचें, तो कभी विद्या बालन और कभी अक्षय कुमार की इमेज सामने आ जाती है. अमिताभ बच्चन भी मजाक उड़ाते से दिख जाते हैं, चालान का डर अलग से.

सुनने में तो यहां तक आया है कि दिल्ली में इधर आप दीवार पर ‘सूसू चित्रकारी’ कर रहे होते हैं, उधर ऊपर से ‘बरसो रे मेघामेघा’ का संगीत सुनाते हुए रेडियो स्टेशन वाले ऊपर से नकली मेघ बरसा देते हैं. अब 2 सौ मिलीलिटर सूसू क्या किया, 2 लिटर पानी से नहला दिया गया. ऐसी हालत में कोई करे तो क्या करे.

वैसे, इन रेडियो स्टेशन वालों ने पानी के इंतजाम में जितना समय और मेहनत गंवाई, उतने में तो मूत्रालय बनवा देते. पर समस्या के समाधान करने में वह मजा कहां है, जो समस्या में घिरे लोगों का मजाक उड़ाने में है.

यदि इस समस्या के समाधान पर ध्यान दिया जाता, तो आजादी के इतने साल बाद भी मनोरंजन के इतने साधन कहां रह पाते भला?

एक बार यों हुआ कि जोगेश्वरी बसअड्डे पर बेचारेलाल बस का इंतजार कर रहे थे. सूसू जोर मार रहा था. सारे बसअड्डे पर जगह छान मारी, पर कहीं भी मूत्रालय न दिखा.

इसी बीच एक होटल वाले ने आवाज दी, तो मन ही मन उसे 2-4 क्विंटल गालियां दीं. उन्हें इस बात पर दुख हुआ कि लोग खानेपीने की चीजें बेचते हैं, तो उसे निकालने का इंतजाम क्यों नहीं करते. न खाऊंगा न खाने दूंगा तो ठीक है, पर खाने दूंगा पर जाने न दूंगा, कहां तक ठीक है?

एक दिन बेचारेलाल से सूसू का जोर सहा नहीं गया. अपनी समझ से जितनी दूर हो सकता थे, बढ़ गए मूत्र विसर्जन के लिए. बसअड्डा और रेलवे स्टेशन के बीच दीवार पर कलाकारी करने लगे. पर मन में डर था, दूर खड़ी बस में कुछ जोर से बातें करने की आवाज आती, तो उन का दिल धड़कधड़क जाता और सूसू की धार बीच में ही रुक जाती.

वे पलटपलट कर उस ओर देखते रहते, जिधर से आवाज आ रही थी. वे इतनी देर से जब्त किए बैठे थे कि काम खत्म होने में भी समय लगना था. एकाएक बेचारेलाल की नजर एक वरदीधारी पर पड़ी. वह तेजी से उन की ओर ही आ रहा था. बेचारेलाल अपने काम को बीच में ही छोड़ एक ओर जा कर खड़े हो गए. चेहरे पर जितनी मासूमियत ला सकते थे, ले आए.

बेचारेलाल यों इधरउधर देखने लगे मानो वैसे ही खड़े हैं. उन्हें डर था कि वरदीधारी उन की खिंचाई करेगा और चालान काटेगा. अखबारों में खुले में शौच करने वालों के चालान काटे जाने की कई सचित्र खबरें पढ़ी थीं उन्होंने. कहीं उन का चित्र भी मुंबई के अखबार में अगले दिन न आ जाए.

वे यही सोच कर घबरा रहे थे, पर यह क्या… वरदीधारी उन की ओर न आ कर उसी दिशा में जा रहा था, जिधर वे खड़े हो कर हलके हो रहे थे. कहीं वह सुबूत इकट्ठा करने तो उधर नहीं गया है. मुंबई पुलिस के बारे में वैसे भी काफी नाम सुन चुके थे वे. तो क्या सुबूत के साथ वह उन्हें गिरफ्तार करेगा?

यह नजारा देख कर बेचारेलाल की तो सिट्टीपिट्टी गुम हो रही थी. पर वरदीधारी भी उन्हीं की तरह शायद बड़े दबाव में था. वह भी इन्हीं की तरह हलका हुआ और लौट पड़ा.

बेचारेलाल की जान में जान आई. पर बसअड्डे पर कतार में जब वे खड़े हुए, तो उन के सामने 2 समस्याएं मुंहबाए खड़ी थीं. पहली, बस आने तक फिर से उन्हें सूसू की तलब न लग जाए. दूसरी यह कि क्या सरकार के द्वारा प्रोस्टेट बढ़े हुए या दूसरी इसी तरह की समस्या से पीडि़त लोगों को कुछ छूट दी जानी चाहिए?

पर छूट मिलने की बात पर तो सभी छूट खोजने लगेंगे. जो ऊंची जाति का होने का दंभ भरते हैं, वे भी रिजर्वेशन के लिए रेल की पटरी पर बैठ जाते हैं, जाली सर्टिफिकेट बना कर रिजर्व्ड कोटे में शामिल हो जाते हैं, अच्छेखासे अमीर लोग गरीबी रेखा के नीचे सरक लेते

हैं थोड़ी सी छूट के लिए. अच्छा, इस मामले में छूट न सही, पर कम से कम खुले में शौच से छुटकारे के लिए बंद जगह का इंतजाम तो कर दिया जाए.

भारत के बाजार में चीन की मौजूदगी

राहुल गांधी ने अपने गुजरात के चुनावी दौरों में चीन व भारत के व्यापार पर काफी तंज कसे हैं. उन्हें इस बात के लिए गलत नहीं कहा जा सकता. चीन की मेजबानी में शियामेन में हाल ही में संपन्न हुए ब्रिक्स (ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका) देशों के 9वें सम्मेलन में भारत और चीन के संबंधों के बीच नए तेवर देखने को मिल चुके हैं. भारत और चीन दोनों देश आर्थिक विकास पर ध्यान देने की पुरजोर वकालत करते नजर आए. इस के पीछे जहां एक तरफ भारत की लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था जिम्मेदार है तो वहीं दूसरी तरफ चीन अपने पुनर्गठन के दौर से गुजर रहा है.

ये दोनों देश बखूबी जानते हैं कि शांति के बिना आर्थिक विकास संभव नहीं है. इसी कारण पाकिस्तान के आतंकी रुख को ले कर भी चीन में परिवर्तन आया है. भारत की कूटनीति काम आई कि एक तरफ डोकलाम विवाद पर घिरे बादल छंटने लगे, वहीं दूसरी तरफ चीन, भारत के साथ आतंकवाद को मिटाने के लिए मंच साझा करता नजर आया.

ब्रिक्स सम्मेलन के घोषणापत्र में न केवल आतंकवाद की निंदा की गई है, बल्कि हिंसा और असुरक्षा के लिए जिम्मेदार आतंकी समूहों की एक बड़ी सूची में पाकिस्तान के हक्कानी नैटवर्क, अलकायदा, लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे 4 आतंकी समूहों का नाम लिया गया.

भले ही ब्रिक्स सम्मेलन में सरकार ने चीन पर राजनीतिक जीत मान ली हो पर आर्थिक क्षेत्र में चीन अपनी अर्थव्यवस्था के साम्राज्य को बढ़ाने में ही लगा है, और राजनीतिक विश्लेषक तो यहां तक कहते हैं कि आतंकवाद विरोध पर साझा बयान दे कर चीन भारत में अपनी आर्थिक दखलंदाजी बढ़ाने की मंशा रखता है.

चीन का भारत के साथ आना सोचीसमझी रणनीति की तरफ इशारा करता है. चीन भारत को निवेश के सब से बड़े बाजार के रूप में देखता है और यहां समयसमय पर उठते स्वदेशी आंदोलन को असफल कर सरकार को बताना भी चाह रहा है कि बिना चीन की आर्थिक मदद के भारत का विकास संभव नहीं है.

माना कि सरकार अपनी अर्थव्यवस्था को एक बढ़ते दायरे में स्थापित करने की कोशिश कर रही है लेकिन क्या यह सरकार दकियानूसी सोच और विश्वबाजार में अपने को स्थापित करने के बीच संतुलन बना पाएगी. आज इस का सब से बड़ा और जीताजागता उदाहरण है देश के छोटेछोटे गलीमहल्लों में चीनी राखियों, खिलौनों और दीवाली में मिट्टी के दीयों व झालरों के विरोध का. समझ में नहीं आता कि स्वदेशी का बहाना ले कर इस फूहड़ और सस्ती राजनीतिक करने वालों की आवाज संसद के गलियारों में क्यों नहीं सुनाई देती?

सत्तारूढ़ भाजपा के कुछ आनुषंगिक संगठन जहां एक तरफ स्वदेशी की बात कर चीनी राखी के धागों का विरोध कर रहे हैं वहीं केंद्र पर बैठी आम आदमी की दुहाई देने वाली सरकार चीन का ही दामन थाम कर देश के विकास की नैया को खेना चाह रही है.

सरकार ने गरीबों के घर में गैसचूल्हे वितरित करने का प्रचारप्रसार तो बहुत कर दिया पर शायद यह ध्यान नहीं दिया कि उस चूल्हे पर जो बरतन रखा जाएगा, उस में जो पकेगा वह कहां से आएगा. आज यही गरीब किसी तरह 1,000 रुपए का चीनी सामान ले कर दिहाड़ी का ठेला लगा कर या फुटपाथ पर बैठ कर 100 रुपए का मुनाफा कमा कर जिंदा हैं. जब तक डोकलाम का मामला हल नहीं हुआ, मोदी ब्रिगेड के सिपाही छद्म और झूठे देशप्रेम का हल्लाबोल करने वाले इन छोटेछोटे मेहनतकश लोगों का स्वदेशी के माध्यम से गला घोंटने में लगे थे, जिन का देशप्रेम से कोई लेनादेना नहीं. आज यही स्वदेशी आंदोलन करने वाले अपनी जेब में चीन का ही बना मोबाइल रखे रहे हैं. सोशल मीडिया में अपनी बात रखने और कहने के लिए वे उसी चाइनीज फोन का इस्तेमाल करते रहे हैं.

चीन का भारत में निवेश

हम निर्भर से आत्मनिर्भर बने और आज पारस्परिक निर्भरता के दौर से गुजर रहे हैं. कहने का आशय यह है कि यह जमाना ग्लोबलाइजेशन के उत्कर्ष में है. क्या कारण है कि चीन का सामान आज भारत के आम आदमी की जरूरत दो तरह से बन गया है. पहला तो यह कि फुटपाथिया और दैनिक सामान बेचने वाले चीन का बना सामान बेच कर अपना गुजरबसर कर रहे हैं और दूसरी तरफ आम आदमी सस्ता सामान खरीद कर अपनी जिंदगी को बेहतर बनाने में लगा हुआ है.

मिसाल के तौर पर, जब उतनी रोशनी देने वाला एक चीनी बल्ब, भारत में बने बल्ब से काफी सस्ता मिलता है तो क्यों न वह खरीदें. इस के पीछे के सिद्धांत को शायद सरकार को समझने में कुछ देर लगे पर आम आदमी उपभोक्तावादी युग में निश्चित ही प्रतियोगी बाजार में उपलब्ध चीजों के मूल्यों को तरजीह देता है.

आज सरकार कई क्षेत्रों में चीन के सहयोग से अपना काम करने का दंभ भर रही है और ज्यादातर निवेश तो उस जगह हो रहा है जहां पर स्वदेशी का समर्थन करने वाली सरकार है.

हद तो तब हो गई जब स्वदेशी का राग अलापने वालों की नाक के नीचे चीन की एक कंपनी, चाइना रेलवे रोलिंग स्टौक को नागपुर मैट्रो के लिए 851 करोड़ रुपए का ठेका मिला. हैरानी यह भी है कि नागपुर में स्वदेशी का झंडा बुलंद करने वाले मौन क्यों हो गए? क्या यह केवल धर्मप्रचार की तरह का पर उपदेश कुशल बहुतेरे का मामला है.

इतना ही नहीं, कई चीनी कंपनियों के क्षेत्रीय कार्यालय अहमदाबाद में हैं. अब, वे महाराष्ट्र व हरियाणा की तरफ जाने लगे हैं. यह किस बात की तरफ इशारा कर रहे हैं, हमें समझना होगा. बात यहीं तक नहीं रुकी है. अब तो चीन बनाबनाया माल ही नहीं, बल्कि फरवरी 2017 की चीनी मीडिया रिपोर्ट ‘राइज ऐंड क्यूएस्टिस्ट’ के मुताबिक, चीन की 7 स्मार्टफोन कंपनियां भारत में या तो कारखाने शुरू कर चुकी हैं या शुरू करने की योजना बना रही हैं.

भारत की धरती पर चीन अपनी फैक्टरी लगा कर उत्पादन भी शुरू करेगा. इस के पीछे चीन की मंशा साफ है कि भारतीय उद्योग परिसंघ यानी सीआईआई और एवलोन कंसल्टिंग ने 2015-16 में अपनी संयुक्त रपट में अनुमान जाहिर किया था कि चीन में श्रम लागत भारत के मुकाबले 1.5 से तीनगुणा अधिक है, सो भारत में उपलब्ध कम श्रम लागत का फायदा भी चीन उठाएगा. साथ ही वह भारत में सामान बना कर पूरे विश्व में सप्लाई करेगा और ये उत्पाद ‘मेड इन इंडिया बाय चाइना’ के नाम से आएंगे.

8 जुलाई, 2015 के ‘द हिंदू’ अखबार में खबर छपी है कि कर्नाटक सरकार चीनी कंपनियों के लिए 100 एकड़ जमीन देने के लिए सहमत हो गई है.

5 जनवरी, 2016 के इंडियन ऐक्सप्रैस की खबर कहती है कि महाराष्ट्र इंडस्ट्रियल डैवलपमैंट कौर्पोरेशन ने चीन की 2 मैन्यूफैक्चरिंग कंपनियों को 75 एकड़ जमीन देने का फैसला किया है. ये कंपनियां 450 करोड़ रुपए का निवेश ले कर आएंगी.

22 जनवरी, 2016 की ट्रिब्यून की खबर है कि हरियाणा सरकार ने चीनी कंपनियों के साथ 8 सहमतिपत्र पर दस्तखत किए हैं. ये कंपनियां 10 बिलियन डौलर का इंडस्ट्रियल पार्क बनाएंगी, स्मार्ट सिटी बनाएंगी. महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़णवीस की तरह हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर भी चीन का दौरा कर चुके हैं.

24 जनवरी, 2016 की डीएनए की खबर है कि चीन का सब से अमीर आदमी हरियाणा में 60 हजार करोड़ रुपए निवेश करेगा.

अभी कुछ ही महीनों पहले डिमोनेटाइजेशन के बाद डिजिटल पेमैंट की वकालत करने वाली सरकार भी पेटीएम की तरफ मुंह ताकने लगी और भारत की सब से बड़ी डिजिटल पेमैंट कंपनी पेटीएम का 40 फीसदी का स्वामित्व चीनी ईकौमर्स फर्म अलीबाबा के ही पास है और कथिततौर पर अलीबाबा अपनी हिस्सेदारी बढ़ा कर 62 फीसदी कर रही है. चीन की चौथी सब से बड़ी मोबाइल फोन कंपनी जियोमी भारत में अपने नए कारखाने में हर सैकंड एक फोन कर निर्माण करती है.

चीन का भारत में निर्यात पिछले वर्षों में 39,765 करोड़ रुपए था. 2015 के मुकाबले निर्यात में 0.2 प्रतिशत की वृद्धि हुई थी. दूसरी तरफ भारत का चीन में निर्यात 12 प्रतिशत से गिर कर 8,017 करोड़ रुपए जा पहुंचा. यह 2 देशों के मध्य आर्थिक निर्भरता को दर्शाता है. आशय साफ है कि भारत चीन से आने वाले सामान पर ज्यादा निर्भर है. सोच सकते हैं कि कितना असंतुलन है दोनों के बीच व्यापार में.

चीन सालों से लगातार भारत के बाजार में सामान डाल कमाई कर रहा है और उस सब की अनुमति भारत सरकार के वाणिज्य मंत्रालय की नीतियों से है. मतलब, सचमुच भारत का आम आदमी झोला ले कर चीनी सामान खरीदने नहीं जाता है बल्कि सरकार ने चीन के लिए बाजार खोला हुआ है. सो, दोषी कौन – जनता या सरकार? सरकार को राष्ट्रधर्म पढ़ाना चाहिए या जनता को? कांग्रेस की सरकार के वक्त भी चीन का धंधा बढ़ा और मोदी सरकार में भी चीनी सामान पर हमारी निर्भरता साल दर साल बढ़ी है.

साथ ही, भारत का फार्मा उद्योग चीन से आयात होने वाले ड्रग्स पर बहुत अधिक निर्भर है. अब सवाल यह है कि अगर भारत में चीनी सामान का बहिष्कार हो जाता है तो उस से चीन के कुल निर्यात पर क्या असर पड़ेगा. चीन के कुल निर्यात में भारत की हिस्सेदारी 2 प्रतिशत है. साफ है कि अगर चीनी माल का भारत में बहिष्कार हो भी जाता है तो उस से चीन की अर्थव्यवस्था पर इतना असर नहीं पड़ेगा. ऐसे में अगर एकदम से भारत के बाजारों से चीनी माल गायब हो जाता है तो उस का असर भारत के आम आदमी पर ही पड़ेगा क्योंकि सस्ते चीनी सामान का सब से बड़ा उपभोक्ता वर्ग वही है.

हालांकि इस से इनकार नहीं किया जा सकता कि चीन भारत जैसा बाजार खोना नहीं चाहेगा. चीन ने भारत को अपने ऊपर निर्भर बना लिया है. वह हम पर निर्भर नहीं है, हम उस पर निर्भर हैं. हम यदि उस से सामान खरीदना बंद कर देंगे तो उस की सेहत पर ज्यादा असर नहीं पड़ेगा मगर एक तरफ भारत में लोगों को सस्ता सामान मिलना बंद होगा तो दूसरी तरफ सरकार के इंफ्रास्ट्रक्चर, पावर के बड़े प्रोजैक्टों में मुश्किल होगी.

सरकार का चीन प्रेम

देशप्रेम का दंभ भरने वाली सरकार गुजरात में लौहपुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल को भी मेड इन चाइना बनाने में तुली है और अपने ही मेक इन इंडिया के मिशन की खुलेआम धज्जियां उड़ाने में लगी है. क्या देश अपने लौहपुरुष की मूर्ति नहीं बना सकता?

देशभर से लौहपुरुष के लिए लोहा मंगाया गया था और भारत के नागरिकों ने बड़ी शिद्दत से लोहा भेजा था जिस से उस विशाल मूर्ति का निर्माण होना था, पर आज 3 हजार करोड़ रुपए का ठेका एल ऐंड टी कंपनी को दिया गया और प्रतिमा का वह हिस्सा जो कांसे का होगा, चीन के एक कारखाने टीक्यू आर्ट फाउंड्री में बनवाया गया है.

टीक्यू आर्ट फाउंड्री चीन के नैनचंग में स्थित जियांग्जी टोक्वाइन कंपनी का हिस्सा है. इस बात को कहने में कोई गुरेज नहीं है कि इंडिया मेड बाई पटेल को सरकार अब पटेल मेड बाई चायना बना कर ही छोड़ेगी और पूरे देश से भेजा गया देशप्रेम की मुहर लगा हुआ लोहा चाइना प्रेम के आगे जंग खा कर अपने को ही समाप्त कर लेगा.

न दृष्टि है न इरादा

दोहरा मापदंड अपना रही भारत सरकार क्या चाहती है, समझना होगा. चीन के साथ कारोबारी रिश्तों को सरकार और अर्थव्यवस्था की कामयाबी के रूप में पेश किया जाता है लेकिन कुछ मुट्ठीभर लोगों के माध्यम से अपना निहित साधने के लिए सरकार गलियों में जा कर चीनी लडि़योंफुलझडि़यों का स्वदेशी के नाम पर विरोध शुरू करवा कर आम जनता का ध्यान खींचने की कोशिश करती है. वह जानती है कि राष्ट्र और स्वदेशी का नशा किसी भांग के नशे से कम नहीं जिस का सहारा ले कर आम आदमी को असली उद्देश्यों के लिए किए जाने वाले आंदोलनों से बेखबर किया जाए.

विरोध कीजिए पर उन का लक्ष्य और दायरा बढ़ाना होगा, स्पष्ट और सटीक राष्ट्रप्रेम को परिभाषित करने वाले आंदोलनों को समर्थन देना होगा, न कि ऐसे छद्म देशप्रेम के साथ बंध कर अपने ही देश के आम आदमी पर कुठाराघात करना. ऐसे वैश्विक सिनैरिओ में चीनी सामान के बहिष्कारों की भारत में जो बातें हो रही हैं उन का रत्तीभर असर चीन पर इसलिए नहीं होना है क्योंकि न सरकार के पास दृष्टि है, न इरादा.

हां, सकारात्मक रूप में यदि आम आदमी के लिए कुछ किया जा सकता है तो सरकार को उस की क्रयशक्ति को बढ़ाना पड़ेगा जिस से कि आने वाले समय में गुणवत्तापरक वस्तुओं की खरीद आसान हो सके.

क्या चीनी सामान का विरोध करने वाले स्वदेशप्रेमी भारत में चीन के निवेश का विरोध करेंगे? आम आदमी की दो जून की रोटी को तो कम से कम अपने आंदोलनों से दूर रखें. आखिरकार, सरकार को भी इस बात की तसदीक करनी होगी कि आर्थिक विकास के लिए चीन से हाथ मिलाने में कोई गुरेज नहीं. यदि सरकार ऐसा मुखर हो कर नहीं बोलती, तो क्या फर्क पड़ता है, चीन के भारत में निवेश के आंकड़े तो गवाही दे ही रहे हैं.

चीन और भारत की आर्थिक असामनता

भारत एक बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था है लेकिन हमें यह भी जानना चाहिए कि जिस चीन की हम बात कर रहे हैं उस की अर्थव्यवस्था के सामने भला हम कहां ठहरते हैं. भारत की जीडीपी 20,400 करोड़ रुपए है जबकि चीन की जीडीपी 10,35,000 करोड़ रुपए है. चीन की विकास दर 7.1 फीसदी है जबकि भारत की 6.4 फीसदी है. भारत में प्रति व्यक्ति आय 1 लाख 4 हजार रुपए सालाना है तो चीन में प्रति व्यक्ति आय 4 लाख 96 हजार रुपए सालाना है. इतना ही नहीं, विदेशी मुद्रा भंडार के मामले में भी चीन से भारत काफी पीछे है. भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 13,929 करोड़ रुपए है जबकि चीन का 4,00,900 करोड़ रुपए. कुला मिला कर चीन की आर्थिक संपन्नता वहां की सरकार की दूरगामी सोच का परिणाम है.

अदालतों का वैवाहिक कानूनों में धार्मिक दखल पर अंकुश

सुप्रीम कोर्ट ने अब 18 वर्ष से कम उम्र की पत्नी के साथ शारीरिक संबंध बनाने को दुष्कर्म श्रेणी की व्यवस्था दी है. लड़की की शिकायत पर पुलिस पति पर रेप का केस दर्ज कर सकती है. यह फैसला देश के सभी धर्मों व वर्गों पर समानरूप से लागू होगा. मुसलिम पर्सनल ला में 15 वर्ष की लड़की को विवाहयोग्य माना गया है पर लड़की की शिकायत पर अब मामला दर्ज करना होगा. लड़की के विवाह की उम्र अभी तक धर्म तय करता आया है. उसी आधार पर धार्मिक वैवाहिक कानून बना दिए गए. अब उन में संशोधन किए जा रहे हैं.

मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की पीठ ने एक पारसी महिला गूलरोख एम गुप्ता की याचिका पर आदेश दिया है जिसे हिंदू युवक से शादी करने के बाद पारसी समुदाय ने पारसी मानने से इनकार कर दिया था. गूलरोख गुजरात हाईकोर्ट गईं तो वहां भी कहा गया कि जब भी महिला अपने धर्र्म से बाहर किसी व्यक्ति से शादी करती है तो उस का धर्म वही हो जाता है जो उस के पति का है.

गूलरोख ने 1991 में विशेष विवाह कानून 1954 के तहत हिंदू युवक से विवाह किया था. गूलरोख को उस के पिता के अंतिम संस्कार में यह कह कर रोक दिया गया कि वह विवाह के बाद पारसी नहीं रही. गुजरात हाईकोर्ट ने गूलरोख की याचिका खारिज कर दी और कहा कि उसे पारसी अग्निमंदिर में प्रवेश नहीं देना सही है. इस पर मामला सुप्रीम कोर्ट में गया. यहां गूलरोख की वकील इंदिरा जयसिंह ने कहा कि गुजरात हाईकोर्ट का फैसला संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 21 और 25 के खिलाफ है.

इस औरत के सामने समस्या यह है कि वह धर्म को देखे या दांपत्य को? धर्म की वजह से बने ऐसे कानूनों ने दांपत्य की जड़ें खोखली की हैं. परिवारों में जहर घोला है.

धर्म की दखलंदाजी

वैवाहिक कानूनों में धर्म की घुसपैठ के अनगिनत मामले हैं. अगर महिला या पुरुष धर्म बदले बिना शादी करते हैं तो ऐसी शादियां वैध नहीं मानी जाएंगी. ऐसा ही एक मामला मद्रास हाईकोर्ट में आया. कोर्ट ने फैसले में कहा कि एक हिंदू महिला और एक ईसाई पुरुष के बीच शादी तब तक कानूनन वैध नहीं है जब तक दोनों में से कोई एक धर्मपरिवर्तन नहीं करता. महिला के परिजनों द्वारा दाखिल बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका को खारिज करते हुए न्यायाधीश पी आर शिवकुमार और वी एस रवि ने कहा कि यदि यह जोड़ा हिंदू रिवाजों के अनुसार शादी करना चाहता है तो पुरुष को हिंदू धर्म अपनाना चाहिए और यदि महिला ईसाई रिवाजों के अनुसार शादी करना चाहती है तो उसे ईसाई धर्म ग्रहण करना चाहिए.

अगर वे दोनों बिना धर्मपरिवर्तन के अपनाअपना धर्म बनाए रखना चाहते थे तो विकल्प के रूप में उन की शादी विशेष विवाह अधिनियम 1954 के तहत पंजीकृत करानी चाहिए थी.

याचिका दाखिल किए जाने के बाद अदालत में पेश की गई महिला ने अदालत को बताया कि उस ने पलानी में एक मंदिर में शादी की थी. इस पर अदालत ने कहा कि यदि पुरुष ने धर्मपरिवर्तन नहीं किया है तो हिंदू कानून के अनुसार, शादी वैध कैसे हो सकती है.

इसी तरह विवाह के ईसाई कानून 1872 के भारतीय ईसाई विवाह अधिनियम द्वारा शासित मामले में सुप्रीम कोर्ट का एक अहम फैसला आया था. फैसले के अनुसार, पर्सनल ला के तहत चर्च से दिए गए तलाक वैध नहीं होंगे. अदालत ने फैसला सुनाते हुए कहा था कि क्रिश्चियन पर्सनल ला, इंडियन क्रिश्चियन मैरिज एक्ट 1872 और डायवोर्स एक्ट 1869 को रद्द कर प्रभावी नहीं हो सकता.

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र की उस दलील को मान लिया जिस में 1996 के सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश का हवाला दिया गया था कि किसी भी धर्र्म के पर्सनल ला देश के वैधानिक कानूनों पर हावी नहीं हो सकते. यानी, कैनन ला के तहत तलाक कानूनी रूप से मान्य नहीं होगा.

सुप्रीम कोर्ट ने उस जनहित याचिका को खारिज कर दिया जिस में चर्च से मिले तलाक को कानूनी मान्यता दिए जाने की मांग की गई थी. याचिका में कहा गया था कि चर्च से मिले तलाक पर सिविल कोर्ट की मुहर लगनी जरूरी न हो.

दरअसल, मंगलौर के रहने वाले क्लेंरैंस पायस की इस जनहित याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने विचारार्थ स्वीकार कर लिया था. ईसाइयों के धर्मविधान के अनुसार, कैथोलिक ईसाइयों को चर्च की धार्मिक अदालत में पादरी द्वारा तलाक या अन्य डिक्रियां दी जाती हैं.

सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया था कि चर्च द्वारा दी जाने वाली तलाक की डिक्री के बाद कुछ लोगों ने जब दूसरी शादी कर ली तो उन पर बहुविवाह का मुकदमा दर्ज हो गया. ऐसे में सुप्रीम कोर्ट घोषित करे कि कैनन ला यानी धर्मविधान में चर्च द्वारा दी जा रही तलाक की डिक्री मान्य होगी और उस पर सिविल अदालत से तलाक की मुहर जरूरी नहीं है.

बहुचर्चित शाहबानो को भी धार्मिक कानून की ज्यादती की शिकार बनना पड़ा. तलाकशुदा शाहबानो जब सुप्रीम कोर्ट गई तो उसे निर्वाह राशि मिल गई. सर्वाेच्च न्यायालय ने आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के तहत अधिकार को मान्यता दी. मोहम्मद अहमद खान बनाम शाहबानो बेगम मामले में इंदौर की रहने वाली 62 वर्षीय शाहबानो को उस के पति मोहम्मद अहमद ने 1972 में तलाक देने के बाद केवल मामूली सी मेहर की रकम वापस की थी. शाहबानो ने सुप्रीम कोर्ट से गुहार लगाई तो कोर्ट ने धारा 125 के तहत फैसला सुनाते हुए मोहम्मद अहमद खान को शाहबानो को खानाखर्च देने का फैसला सुनाया पर कट्टरपंथी मुसलिम संगठनों ने इसे शरीयत कानून में दखल मानते हुए तब की राजीव गांधी सरकार पर दबाव बनाया. परिणामस्वरूप, राइट टू प्रोटैक्शन औन डिवोर्स-1986 कानून बना कर फैसला बदल दिया गया.

अगर केंद्र सरकार ने दृढ़ता दिखाई होती तो इसलामिक कानूनों के जरिए महिलाओं के शोषण का मामला सालों पहले ही सुलझ गया होता पर सरकार कट्टरपंथियों के आगे झुक गई.

केंद्र सरकार मुसलिम महिलाएं (तलाक के अधिकार) बिल-1986 ले कर आई जो कि सुप्रीम कोर्ट के नियमों को बदल कर मुसलिम महिलाओं को बाकी सभी महिलाओं के अधिकारों से वंचित करता था.

अवैध विवाह

1985 में सरला बनाम यूनियन औफ इंडिया एवं अन्य का मामला सामने आया था. सरला मुद्गल सहित कई अन्य औरतों ने दूसरी शादी करने की मंशा से पुरुषों द्वारा धर्मपरिवर्तन के मामलों को चुनौती दी थी. मीना माथुर के पति जितेंद्र माथुर ने मीना को तलाक दिए बिना इसलाम धर्म स्वीकार कर मुसलिम औरत से शादी कर ली थी. 1992 में गीता रानी के पति प्रदीप कुमार ने भी इसलाम स्वीकार कर दूसरी शादी कर ली थी.

इन सभी याचिकाओं में ऐसे मामलों में रोक लगाने की सुप्रीम कोर्ट से गुहार की गई. इन मामलों में न्यायाधीश कुलदीप सिंह की पीठ ने भारतीय दंड संहिता की धारा 494 के तहत फैसला सुनाते हुए पहली बार पत्नी को तलाक दिए बिना विवाह को अवैध करार दिया था. जस्टिस कुलदीप सिंह ने कहा था कि इस तरह के मामलों पर रोक के लिए अनुच्छेद 44 पर विचार करना चाहिए.

एक एडवोकेट लिली थौमस ने वर्ष 2000 में दूसरी शादी के मकसद से इसलाम कुबूल करने को गैरकानूनी करार देने और हिंदू मैरिज एक्ट में ऐसा संशोधन करने के लिए याचिका डाली थी जिस से कि इसलाम को कुबूल कर लोग हिंदू धर्म के अनुसार ब्याहता को धोखा न दे सकें.

कुछ समय पहले हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भजनलाल के बेटे चंद्रमोहन द्वारा इसलाम धर्म अपना कर दूसरी शादी करने का मामला सामने आया था. चंद्रमोहन ने अनुराधा बाली नाम की एक महिला से शादी करने के लिए धर्म बदल लिया और अपना नाम चांद मोहम्मद कर लिया. अनुराधा बाली का नाम फिजा रखा गया. चंद्रमोहन के इस कदम से परिवार के लोग नाराज हुए और उन से रिश्ता तोड़ कर दूरी बना ली. चंद्रमोहन को संपत्ति से वंचित भी कर दिया गया.

बाद में परिवार के बढ़ते दबाव के चलते चंद्रमोहन ने फिजा को तलाक दे दिया और वापस हिंदू धर्म अपना लिया. उधर तलाक दिए जाने से नाराज अनुराधा बाली ने फरवरी 2009 में चंद्रमोहन के खिलाफ बलात्कार, धोखाधड़ी और मानहानि का मामला दर्ज कराया था. हालांकि, बाद में 16 अगस्त, 2012 को फिजा की लाश सड़ीगली अवस्था में उस के घर में मिली थी.

भारत में शादियां सदियों पुरानी धार्मिक किताबों, सड़े गले रीतिरिवाजों और रूढि़वादी परंपराओं व उन पर बने कानूनों से होती आ रही हैं. हर धर्म का अपना पर्सनल ला है जिस के अंतर्गत विवाह संपन्न होते हैं. विवाह के इन कानूनों में पतिपत्नी के बीच पंडा, पादरी, मुल्ला और परंपराएं अनिवार्य अंग हैं. विवाह को संस्कार माना गया है, करार नहीं.

पर्सनल धार्मिक कानूनों ने विवाह नाम की संस्था की नींव खोखली कर दी है. विवाह में धर्म की फुजूल उपस्थिति ने औरत की मरजी को हाशिए पर धकेल दिया है. उस के साथ भेदभाव, असमानता, कलह, हिंसा के रास्ते खोल दिए गए. सीधेसीधे 2 मनुष्यों के बीच एक करार के बजाय विवाह को अनावश्यक बाहरी आडंबरों का आवरण ओढ़ा दिया गया.

अब धीरेधीरे कई मामले सामने आ रहे हैं जिन में या तो औैरत ऐसे आवरण को उतार कर फेंक रही है या रूढि़यों से बगावत कर रही है.

साथ ही साथ, सुप्रीम कोर्ट पर्सनल ला को स्त्रियों के लिए अन्याय, शोषण का जरिया नहीं बनने देने के निर्णय सुना रहा है. सुप्रीम कोर्ट ने हाल में कुछ ऐसे ही फैसले किए हैं या ऐसे मामले संविधान पीठ को सौंपे हैं.

धर्म के नाम पर बने कानून के माध्यम से कैसे एक औरत की जिंदगी न केवल बरबाद की जा सकती है, उसे मरने पर मजबूर भी किया जा सकता है.

तीन तलाक का मामला भी धर्म पर आधारित एकपक्षीय था. इस में औरत का पक्ष सुने बिना उसे त्याग देने का एकतरफा फैसला न्याय के सिद्घांत का खुला उल्लंघन था.

औरतों के साथ भेदभाव को ले कर सुप्रीम कोर्ट ने समयसमय पर न सिर्फ टिप्पणियां की हैं, सरकार को इस दिशा में निर्देश भी दिए हैं. फरवरी 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले की सुनवाई करते हुए कहा था कि यह बहुत ही आवश्यक है कि सिविल कानूनों से धर्म को बाहर किया जाए.

मई 1995 को एक सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने समान नागरिक संहिता को अनिवार्य रूप से लागू किए जाने पर जोर दिया था. कोर्ट का कहना था कि इस से एक ओर जहां पीडि़त महिलाओं की सुरक्षा हो सकेगी, वहीं दूसरी ओर राष्ट्रीय एकता बढ़ाने के लिए भी यह आवश्यक है.

कोर्ट ने उस वक्त यहां तक कहा था कि इस तरह के किसी समुदाय के निजी कानून स्वायत्तता नहीं, अत्याचार के प्रतीक हैं. भारतीय नेताओं के द्विराष्ट्र अथवा तीन राष्ट्रों के सिद्धांत को कोर्ट ने स्वीकार नहीं किया. भारत एक राष्ट्र है और कोई समुदाय मजहब के आधार पर स्वतंत्र अस्तित्व का दावा नहीं कर सकता.

जब भी धार्मिक पर्सनल कानूनों में बदलाव की बात उठती है, हर धर्म के ठेकेदार इसे धर्म में दखलंदाजी करार देते हुए धार्मिक स्वतंत्रता पर हमला बता कर विरोध पर उतर आते हैं. इन कानूनों में महिलाओं के साथ असमानता, भेदभाव व्याप्त हैं.

अलग धर्म, अलग रीतियां

हमारे देश में अलगअलग धर्मों के  लोग रहते हैं. यहां हर समुदाय के अपने पर्सनल ला हैं. हिंदू मैरिज एक्ट, क्रिश्चियन मैरिज एक् ट 1872, इंडियन डिवोर्स एक्ट 1869, भारतीय उत्तराधिकार नियम 1925. इसी तरह पारसी मैरिज ऐंड डिवोर्स एक्ट 1936, यहूदियों का मैरिज एक्ट है. इन के उत्तराधिकार और संपत्ति कानून भी अलग हैं. मुसलमानों के भी ऐसे ही हैं. हालांकि सभी कानूनों में समयसमय पर सुधार होते रहे हैं लेकिन मुसलिमों का शरीयत कानून तो करीब 100 वर्षों से वैसा ही है.

रूढि़वादी समाज में धर्म जीवन के हर पहलू को संचालित करता रहा है. आज भी धार्मिक रीतिरिवाज वैवाहिक कानूनों के आवश्यक हिस्से हैं. हिंदू विवाह में वैवाहिक वेदी, सप्तपदी, कलश, पंडित और मंत्र जरूरी हैं. दूसरे धर्मों में पादरी जैसे धार्मिक बिचौलिए की उपस्थिति आवश्यक है.

पौराणिक काल से हिंदुओं में विवाह को एक पवित्र संस्कार माना गया है और हिंदू विवाह अधिनियम 1955 में भी इस को इसी रूप में बनाए रखने की कोशिश की गई. हालांकि विवाह पहले पवित्र एवं अटूट बंधन था, अधिनियम के अंतर्गत ऐसा नहीं रह गया. पवित्र एवं अटूट बंधन वाली विचारधारा अब शिथिल पड़ने लगी है. अब यह जन्मजन्मांतर का बंधन नहीं, विशेष परिस्थितियों के उत्पन्न होने पर वैवाहिक संबंध को तोड़ा भी जा सकता है.

शारीरिक व मानसिक निर्दयता, 2 वर्षों तक त्याग, रतिज रोग, परपुरुष या परस्त्री गमन, धर्मपरिवर्तन, पागलपन, कुष्ठ रोग, संन्यास जैसी दशा में संबंध विच्छेद हो सकता है. स्त्रियों को द्विविवाह, बलात्कार, पशुमैथुन, अप्राकृतिक मैथुन जैसे आधार पर संबंध विच्छेद करने का अधिकार प्राप्त है.

अधिनियम द्वारा अब हिंदू विवाह प्रणाली में कई परिवर्तन हुए हैं. अब हर हिंदू स्त्रीपुरुष दूसरे हिंदू स्त्रीपुरुष से विवाह कर सकता है चाहे वह किसी जाति का हो. एक विवाह तय किया गया है, दूसरा विवाह अमान्य एवं दंडनीय है. न्यायिक पृथक्करण, संबंध विच्छेद तथा विवाह शून्यता की डिक्री की घोषणा की  व्यवस्था की गई है. प्रवृत्तिहीन तथा असंगत विवाह के बाद और डिक्री पास होने के बीच उत्पन्न संतान को वैध घोषित कर दिया गया है पर इस के लिए डिक्री का पास होना आवश्यक है.

न्यायालय पर यह वैधानिक कर्तव्य नियत किया गया है कि हर वैवाहिक झगड़े में समाधान कराने का प्रथम प्रयास किया जाए. बाद में संबंध विच्छेद पर निर्वाह व्यय एवं निर्वाह भत्ता की व्यवस्था की गई है. न्यायालय को इस बात का अधिकार दिया गया है कि वह अवयस्क बच्चों की देखरेख एवं भरणपोषण की व्यवस्था करे.

इस के बावजूद हिंदुओं में विवाह को अब भी संस्कार माना जाता है, जन्मजन्मांतर का बंधन माना जाता है. पर अब विवाह में लड़ाई, झगड़ा, शोषण भी दिखता है, हत्याएं भी होती हैं. पतिपत्नी में एकदूसरे को नीचा दिखाने की होड़ भी चलती है. विवाह होने पर युवती अपने पिता का घर छोड़ती है, वह अपने मांपिता को ही नहीं, अपना गोत्र, सरनेम और अपनी तरुणता भी छोड़ती है.

समान नागरिक संहिता की मांग

पर्सनल कानूनों में धर्म के आधार पर भेदभाव की वजह से समयसमय पर समान नागरिक कानून की  मांग की जाती रही है. कई बार सुप्रीम कोर्ट के सामने भी ऐसी स्थिति आई जब सरकार से जवाब मांगना पड़ा. समान नागरिक संहिता के निर्माण की मांग 1930 के दशक में उठाई गई थी और बी एन राव की अध्यक्षता में एक कमेटी गठित की गई. समिति ने 1944 में हिंदू कोड से संबंधित मसविदा सरकार को सौंपा था पर कोई कार्यवाही नहीं की गई.

आजादी के बाद अंबेडकर की अध्यक्षता वाली समिति ने हिंदू कोड बिल में विवाह की आयु बढ़ाने, औरतों को तलाक का अधिकार देने के साथ दहेज को स्त्रीधन मानने के सुझाव दिए थे.

समान नागरिक संहिता की वकालत करने वालों का दावा है कि यह आधुनिक और प्रगतिशील देश का प्रतीक है. इसे लागू करने से देश धर्म, जाति, वर्ग के आधार पर भेदभाव नहीं करेगा.

समान नागरिक संहिता के पक्षधर लोगों की दलील है कि एक धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक देश में प्रत्येक नागरिक के लिए कानूनी व्यवस्थाएं समान होनी चाहिए. सुप्रीम कोर्ट का बारबार तर्क रहा है कि कानून बनाना सरकार का काम है, इसलिए कोई इस में हस्तक्षेप नहीं कर सकता. न ही सरकार को कानून बनाने का आदेश दिया जा सकता है पर अगर कोई पीडि़त सुप्रीम कोर्ट जाता है तो कोर्ट को उस पर सुनवाई करनी पड़ती है.

हिंदू विवाह कानून 1955 में लागू हुआ था और अब तक इस में कई संशोधन हो चुके हैं.

पितृसत्तात्मक समाज व्यवस्था विवाह नामक संस्था में पत्नी को पति के बराबर आर्थिक अधिकार देने से रोकती रही है. औरतों के प्रति ऐसी सामाजिक जड़ता की कीमत उन्हें ही सब से अधिक चुकानी पड़ती है. दहेज के नाम पर औरतों से उन का संपत्ति से अधिकार छीन लिया गया. ब्रिटिश शासन के दौरान भूमि बंदोबस्त अभियान व संपत्ति संबंधी कानूनों में बहुत से स्त्रीविरोधी फेरबदल किए गए.

इस का मतलब है कि समाज में आज भी यह धारणा मजबूत है कि शादी होने के बाद लड़की पराई हो जाती है. मायके में वह मेहमान बन कर रह जाती है.

पैतृक संपत्ति में भले ही उसे कानूनन हक हासिल हो गया है पर इस का  इस्तेमाल कितनी महिलाएं करती हैं? सामाजिक तानेबाने की जकड़न व अपने हकों को मांगने वाली जागरूकता की कमी बड़ी बाधाएं हैं.

विवाह और भाग्यवाद

धर्म के बिचौलियों को विवाह के ज्यादा अधिकार दे दिए गए. धर्र्म पर आधारित कानूनों की जंजीरों से आजादी का एकमात्र रास्ता यह है कि विवाह धार्मिक बंधनों से मुक्त हों.

विवाह की बात आती है तो अकसर कहा जाता है कि जोड़ी ऊपर से बन कर आती है. वैवाहिक जीवन भाग्य पर छोड़ दिया गया है.

हालांकि पहले नानी, दादी, ताई, चाची सिखाती थीं पर उन बातों में व्यावहारिकता कम जबकि सेवा, पूजा, भक्ति की बातें अधिक होती थीं. मसलन, पति को परमेश्वर बताया गया. पत्नी उस की दासी बन कर सेवा करने का हुक्म दिया गया. बच्चे पैदा करना और गृहस्थ संभालना कर्तव्य माना गया. इस तरह की बातें इसलिए सिखाईर् जाती रही हैं ताकि धर्म के धंधेबाजों का रोजगार चलता रहे.

दिक्क्त यह है कि समाज का बड़ा तबका विवाह, तलाक और उत्तराधिकार जैसे मामलों को धर्म से जोड़ कर देखता है. कानूनों में धार्मिक दखलंदाजी की वजह से महिलाओं के बीच आर्थिक और सामाजिक असुरक्षा में बढ़ोतरी होती जा रही है. दरअसल, विवाह एक करार है. पतिपत्नी दोनों एकदूसरे के पूरक हैं,

यह बात समाज ने उन्हें नहीं सिखाई. वैवाहिक जीवन को ले कर व्यावहारिक बातें सिखाई जानी बहुत जरूरी हैं. अफसोस यह है कि विवाह संस्था को चलाने के लिए ठोस नियमकायदे और टे्रनिंग देने वाली कोई संस्था नहीं है.

कन्यादान क्यों

धार्मिक अनुष्ठान के बाद कन्या का पिता विवाह संपन्न होने की कीमत के तौर पर अपनी बेटी को दान कर देता है. क्यों?

लिंगभेद हर कानून में है. कानूनन वैवाहिक स्थिति में स्त्री की सुरक्षा का विशेष खयाल रखा गया है. वैवाहिक मुकदमों की प्रकृति देखें तो अकसर वधू पक्ष द्वारा वर पक्ष पर दहेज प्रताड़ना, शारीरिक शोषण और पुरुष के परस्त्री से अवैध संबंध, मानसिक प्रताड़ना जैसे मामले देखे गए हैं.

असल में स्त्री के प्रति जो सामाजिक सोच बनी हुई है उस से उसे बचाने के लिए कानून में सुरक्षा देने का प्रयास किया गया. वैसे, कई बार अदालत में यह भी साबित हुआ है कि वधू पक्ष द्वारा वर पक्ष को तंग करने के लिए अकसर दहेज के मामले दर्ज कराए जाते हैं. तिहाड़ जेल के महिला सेल में छोटे से बच्चे से ले कर 80-90 साल तक की वृद्धा दहेज प्रताड़ना के आरोपों में बंद हैं.

दहेज का मतलब विवाह के समय वधू पक्ष द्वारा वर पक्ष को दी जाने वाली संपत्ति से है. दहेज को स्त्रीधन कहा गया है. विवाह के समय सगेसंबंधियों द्वारा दिया गए धन, संपत्ति एवं उपहार दहेज के अंतर्गत आते हैं. अगर विवाह के बाद पति या  उस के परिवार वालों द्वारा दहेज की मांग को ले कर दूसरे पक्ष को किसी प्रकार का कष्ट, संताप या प्रताड़ना दी जाएं तो स्त्री को यह अधिकार है कि वह उस दहेजरूपी संपत्ति को पति पक्ष से वापस ले ले.

हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 27, स्त्री को इस प्रकार की सुरक्षा प्रदान करती है. 1985 में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश फाजिल अली ने अपने एक फैसले में कहा था कि स्त्रीधन एक स्त्री की अपनी संपत्ति है. यह संपत्ति पति पक्ष पर पत्नी की धरोहर है और उस पर उस का पूरा अधिकार है. इस का उल्लंघन करना दफा 406 के तहत अमानत में खयानत का अपराध है. पर सवाल है कि आखिर लड़की को विवाह के समय यह दहेज क्यों दिया जाए?

 

ये एक्ट्रेस जिसे मानती थी पिता, वही निकला बलात्कारी

हाल ही में #MeToo कैंपेन शुरुआत हुई थी इस कैंपेन से हौलीवुड की ही अभिनेत्रियां ही नहीं बल्कि बौलीवुड की अभिनेत्रियां भी जुड़ रही हैं और यौन शोषण पर खुलकर बोल रही हैं. इसी बीच अब हौलीवुड की एक और एक्ट्रेस जेनिफर लौरेंस ने भी हाल ही में फिल्म प्रोड्यूसर हार्वे विंस्टीन को लेकर एक ऐसा बयान दिया है, जिसे सुनकर आप सब चौंक जाएंगे.

जेनिफर ने कहा कि विंस्टीन उनके लिए पिता समान थे. जेनिफर लौरेंस ने ओपरा विनफ्रे को बताया, वह उनके लिए हमेशा से अच्छे थे. उन्हें इस बात का जरा भी अंदाजा नहीं था कि जिसे वो पिता मानती हैं वह दुष्कर्मी हैं.

उन्होंने कहा कि वह मेरे लिए पिता के समान थे, इसलिए मैंने सबकुछ चलने दिया. उस वक्त मुझे लगा कि मैं इस शख्स को जानती हूं. पर जब उस पर दुष्कर्म का आरोप लगा तो मैं बिल्कुल आश्चर्यचकित रह गई थी. हम सभी इतना तो जानते थे कि वह कुत्ता है, हम जानते थे कि वह बुरा है उससे बात करना मुश्किल है, लेकिन यह नहीं पता था कि वह दुष्कर्मी भी है.

आपको बता दें कि प्रोड्सूयर हार्वे विंस्टीन के द्वारा किये गये यौन शोषण के मामले सामने आने के बाद #MeToo कैंपेन शुरू किया गया. अभी तक 80 से ज्यादा हौलीवुड एक्ट्रेस हार्वे विंस्टीन पर यौन शोषण करने का आरोप चुकी हैं, जिनमें कैट बेकिंस्ले, कारा डेलेविंगन, एंजेलिना जोली और रोज मैकगोवन जैसी अभिनेत्रियों के नाम शामिल हैं.

वासना की भेंट चढ़ी नंदिनी

1 मार्च, 2017 की सुबह सरिता की आंख खुली तो बेटी को बिस्तर पर न पा कर वह परेशान  हो उठी. उस की समझ में नहीं आया कि 6 साल की मासूम बच्ची सुबहसुबह उठ कर कहां चली गई. उस ने कई आवाजें लगाईं, जब वह नहीं बोली तो उस ने सोचा कि कहीं वह चाची के पास तो नहीं चली गई. वह देवरानी रीना के घर गई, लेकिन नंदिनी वहां भी नहीं थी.

नंदिनी के इस तरह गायब होने से रीना भी परेशान हो उठी. वह जिस हालत में थी, उसी हालत में सरिता के साथ नंदिनी की तलाश में निकल पड़ी. सरिता और उस की देवरानी रीना अकेली ही थीं. दोनों के ही पति विदेश में रहते थे. कोई मर्द न होने की वजह से नंदिनी को ले कर दोनों कुछ ज्यादा ही परेशान थीं.

धीरेधीरे नंदिनी के गायब होने की बात गांव वालों को पता चली तो सरिता से सहानुभूति रखने वाले उस के साथ नंदिनी की तलाश में लग गए. बेटी के न मिलने से सरिता काफी परेशान थी.

बेटी को तलाशती हुई वह अकेली ही गांव से करीब 3 किलोमीटर दूर कुआवल नदी पर बने पुल पर पहुंची तो वहां से नदी के किनारे एक जगह पर भीड़ लगी दिखाई दी. उत्सुकतावश सरिता वहां पहुंची तो नदी के रेत पर उसे एक बच्ची का अर्द्धनग्न शव दिखाई दिया. सरिता का कलेजा धड़क उठा, क्योंकि वह लाश उस की बेटी नंदिनी की थी.

बेटी की लाश देख कर वह चीखचीख कर रोने लगी. उस के इस तरह रोने से वहां इकट्ठा लोगों को समझते देर नहीं लगी कि लाश इस की बेटी की है. थोड़ी ही देर में यह खबर जंगल की आग की तरह हरपुरबुदहट गांव पहुंची तो गांव वाले घटनास्थल पर आ पहुंचे.

किसी ने इस बात की सूचना थाना हरपुरबुदहट पुलिस को दे दी थी. थानाप्रभारी बृजेश कुमार यादव पुलिस टीम के साथ वहां पहुंच गए. उन्होंने इस घटना की सूचना एसएसपी रामलाल वर्मा, एसपी (ग्रामीण) ज्ञानप्रकाश चतुर्वेदी और सीओ को भी दे दी थी. कुछ देर में ये पुलिस अधिकारी भी आ गए थे.

घटनास्थल और लाश की बारीकी से जांच की गई. लाश और घटनास्थल की स्थिति देख कर यही लग रहा था कि हत्या कहीं और कर के लाश वहां ला कर फेंकी गई थी. पुलिस ने घटनास्थल की काररवाई निपटा कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए बाबा राघवदास मैडिकल कालेज भिजवा दिया.

बृजेश कुमार यादव ने जांच शुरू की तो पता चला कि जमीन को ले कर गांव के ही चांदबली और उन के बेटे दुर्वासा से सरिता की रंजिश थी. सरिता ने उन पर आशंका भी व्यक्त की थी. सूचना पा कर विदेश में रह रहा सरिता का पति दिनेश कुमार भी आ गया था. उस ने बेटी की हत्या के लिए चांदबली और दुर्वासा को जिम्मेदार ठहराते हुए उन के खिलाफ तहरीर भी दे दी थी. दिनेश की तहरीर पर मुकदमा दर्ज कर पुलिस ने बापबेटे को गिरफ्तार कर लिया था.

पुलिस ने चांदबली और उस के बेटे दुर्वासा से नंदिनी की हत्या के बारे में सख्ती से पूछताछ की, लेकिन वे खुद को निर्दोष बताते रहे. जब नंदिनी की पोस्टमार्टम रिपोर्ट आई तो सारी कहानी ही बदल गई. जिस चांदबली और उस के बेटे को पुलिस जमीन के विवाद की वजह से नंदिनी की हत्या का दोषी मान रही थी, वह गलत निकला. पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार, हत्या से पहले नंदिनी के साथ दुष्कर्म भी किया गया था.

चांदबली और दुर्वासा ऐसा नहीं कर सकते थे. यह पुलिस ही नहीं, नंदिनी के घर वाले भी मान रहे थे. जब बापबेटे इस मामले में निर्दोष पाए गए तो पुलिस ने उन्हें हिदायत दे कर छोड़ दिया और इस मामले में नए सिरे से जांच में जुट गई.

बृजेश कुमार यादव ने घटना के खुलासे के लिए मुखबिरों की मदद ली. घटना के 12 दिनों बाद 12 मार्च, 2017 को एक मुखबिर ने पुलिस को सूचना दी कि गांव का ही 22 साल का गोरखप्रसाद इधर कुछ दिनों से सैक्स क्षमता बढ़ाने वाली दवाएं खा रहा है. डेढ़ साल पहले उस की पत्नी उसे छोड़ कर मायके चली गई थी. मुखबिर की इस बात से पुलिस को लगा कि हो न हो, सैक्स क्षमता बढ़ाने वाली दवा खाने वाले गोरखप्रसाद ने ही मासूम नंदिनी के साथ दुष्कर्म किया हो और पहचाने जाने के डर से उस की हत्या कर दी हो.

बृजेश कुमार यादव ने शक के आधार पर गोरखप्रसाद को पूछताछ के लिए हिरासत में ले लिया. थाने में जब उस से सख्ती से पूछताछ की गई तो उस ने मासूम नंदिनी के साथ दुष्कर्म कर हत्या की बात स्वीकार कर ली. उस ने वजह बताई कि नंदिनी की चाची रीना ने उसे धोखा दिया था, इसलिए उस ने बदला लेने के लिए यह सब किया.

‘‘नंदिनी की चाची ने तुम्हारे साथ कैसा धोखा किया?’’ बृजेश कुमार यादव ने पूछा.

‘‘सर, वह मुझ से प्यार करती थी लेकिन इधर वह मुझ से कटीकटी रहने लगी, जबकि उसी की वजह से मेरी पत्नी छोड़ कर चली गई. अब वह किसी और से प्यार करने लगी थी.’’ गोरखप्रसाद ने कहा.

गोरखप्रसाद द्वारा अपराध स्वीकार करने के बाद पुलिस उसे उस जगह पर ले गई, जहां उस ने यह सब किया था. घटनास्थल से पुलिस ने मृतका नंदिनी के कपड़े बरामद किए. इस के बाद रोजनामचे से चांदबली और दुर्वासा का नाम हटा कर गोरखप्रसाद को आरोपी बना कर उसी दिन अदालत में पेश किया गया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. गोरखप्रसाद ने पुलिस को नंदिनी की चाची रीना से प्रेम करने से ले कर उस की हत्या तक की जो कहानी सुनाई, वह इस प्रकार थी—

22 साल का गोरखप्रसाद जिला गोरखपुर के थाना हरपुरबुदहट का रहने वाला था. 2 भाईबहनों में वह सब से बड़ा था. उस के पिता खेती करते थे. इंटर तक पढ़ा गोरखप्रसाद छोटामोटा काम करता था. उस के घर से थोड़ी दूरी पर रीना का घर था. पड़ोसी होने के नाते रीना के पति विनोद से उस की खूब पटती थी. रिश्ते में वह गोरखप्रसाद का चाचा लगता था.

विनोद बड़े भाई दिनेश के साथ विदेश कमाने चला गया तो घर में रीना अकेली रह गई. जेठानी सरिता भी बेटी के साथ रहती थी. रीना का कोई बच्चा नहीं था. दोनों भाइयों के बीच नंदिनी ही एकलौती बेटी थी, इसलिए वह पूरे परिवार की दुलारी थी. विनोद के विदेश चले जाने के बाद भी गोरखप्रसाद उस के घर आताजाता रहा. इसी आनेजाने में उस की नजर रीना पर जम गई. अविवाहित गोरखप्रसाद को लगा कि रीना का पति बाहर रहता है, अगर कोशिश की जाए तो वह उस के वश में आ सकती है.

बस फिर क्या था, वह रीना को चाहतभरी नजरों से ताकने लगा. जल्दी ही रीना ने उस के मन की बात को ताड़ भी लिया. रीना भी पुरुष सुख से वंचित थी, इसलिए उसे गोरखप्रसाद का इस तरह देखना अच्छा लगा. गोरखप्रसाद गबरू जवान था, रीना भी उस पर मर मिटी. जब दोनों ओर से चाहत जागी तो वे मिलने का मौका तलाशने लगे.

एक दिन दोपहर को गोरखप्रसाद रीना के घर पहुंचा तो सरिता बेटी को ले कर कहीं गई हुई थी. घर में रीना अकेली ही थी. उसे देखते ही रीना ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘आओ…आओ, बैठो. कहो, कैसे आना हुआ?’’

गोरखप्रसाद रीना से सट कर बैठते हुए बोला, ‘‘बस, आप के दीदार करने चला आया. बताओ, कैसी हो तुम?’’

‘‘अच्छी हूं, तुम्हारे चाचा की याद में एकएक दिन काट रही हूं.’’

‘‘और दिन है कि काटे नहीं कट रहे.’’

‘‘हां, सच कहते हो. लेकिन मन की बात कहूं भी तो किस से. निगोड़ी रात है कि काली नागिन की तरह डंसती है. पति के बिना बिस्तर कांटों की तरह चुभता है.’’

‘‘चाहो तो मुझ से कह सकती हो. मैं तुम से बहुत प्यार करता हूं. आखिर मैं किस दिन के लिए हूं चाची.’’

‘‘तुम्हारी इसी अदा पर तो मैं तुम पर मर मिटी हूं. लेकिन तुम भी तो दूर से ही देख कर चले जाते हो.’’

‘‘क्यों, इस गरीब का मजाक उड़ा रही हो. मर तो मैं तुम पर गया हूं. मुझे लगता है, मैं तुम्हारे बिना जी नहीं पाऊंगा.’’

‘‘मुझे भी यही लगता है.’’ कह कर रीना ने गोरखप्रसाद को बांहों में भर लिया.

इस के बाद तो रिश्तों के बारे में न रीना ने सोचा और न गोरखप्रसाद ने. रिश्तों को तारतार करने का दोनों ने पश्चाताप भी नहीं किया. जबकि दोनों चाचीभतीजे तो थे ही, उम्र में भी 8 साल का अंतर था. एक बार मर्यादा टूटी तो सिलसिला बन गया. जब भी दोनों को मौका मिलता, जिस्म की भूख मिटा लेते.

गोरखप्रसाद ने रीना से वादा किया था कि वह उसी का हो कर रहेगा. लेकिन उस ने रीना को बताए बगैर शादी कर ली. रीना को पता तो तभी चल गया था, जब उस की शादी तय हुई थी. लेकिन शादी होने तक गोरखप्रसाद मुंह छिपाए रहा. प्रेमी की इस बेवफाई से त्रस्त रीना ने भी तय कर लिया था कि गोरखप्रसाद से ऐसा बदला लेगी कि वह सोच भी नहीं सकता.

उस ने कुछ ऐसा किया भी. उसी की वजह से शादी के एक हफ्ते बाद ही गोरखप्रसाद की पत्नी उसे छोड़ कर चली गई. उस ने आरोप लगाया कि उस का पति नामर्द है. वह उसे संतुष्ट नहीं कर पाता. इस तरह रीना ने प्रेमी से उस की बेवफाई का बदला ले लिया. जबकि रीना ने उस से अपने संबंधों के बारे में बता दिया था.

गोरखप्रसाद की पत्नी ने उस पर जो आरोप लगाया था, उस से गांव में गोरखप्रसाद की खूब बदनामी हुई. गांव वालों के सामने निकलने में उसे शर्मिंदगी महसूस होने लगी थी. पत्नी छोड़ कर चली गई तो गोरखप्रसाद रीना के घर के चक्कर लगाने लगा. रीना ने उसे प्यार तो दिया, लेकिन अब पहले वाली बात नहीं रही. शायद वह उस की बेवफाई को भुला नहीं पाई थी.

गोरखप्रसाद की इस बेवफाई से नाराज रीना ने किसी और से संबंध बना लिए थे. इसीलिए वह गोरखप्रसाद को पहले जैसा प्यार नहीं दे रही थी. रीना उस से कटीकटी रहने लगी थी. रीना का यह व्यवहार गोरखप्रसाद को अखरने लगा था. इस से उसे लगा कि पत्नी ने उस पर जो आरोप लगाया था, वह सच है. रीना भी उस की नामर्दी की वजह से उसे पहले जैसा प्यार नहीं दे रही है.

यही सोच कर गोरखप्रसाद मर्दानगी बढ़ाने के लिए नौसड़ के एक वैद्य से इलाज कराने लगा. 6 महीने तक इलाज कराने से वह खुद को शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ महसूस करने लगा था.

27 फरवरी, 2017 की रात गांव में एक बारात आई थी. बारात के साथ आर्केस्ट्रा भी था. घर से निकलने से पहले गोरखप्रसाद ने सैक्स क्षमता बढ़ाने वाली दवा खा ली और आर्केस्ट्रा देखने चला गया. दवा ने अपना असर दिखाया तो उसे रीना की याद आई. उस के जिस्म में शारीरिक सुख का कीड़ा कुलबुलाया तो वह रीना के घर जा पहुंचा.

उस समय रात के करीब 12 बज रहे थे. गहरी नींद में सोई रीना के जिस्म पर गोरखप्रसाद ने हाथ फेरा तो रीना चौंक कर उठ बैठी. गोरखप्रसाद को देख कर उस ने कहा, ‘‘इतनी रात को तुम यहां क्या कर रहे हो?’’

‘‘तुम से मिलने आया हूं.’’

‘‘देखो, अभी मेरा मन नहीं है. मुझे सोने दो.’’

‘‘मेरा बड़ा मन है. मन नहीं मान रहा.’’

‘‘मैं ने तुम्हारे मन को मनाने का ठेका ले रखा है क्या?’’

‘‘मेरी हालत पर तरस खाओ रीना, तुम्हारा प्यार पाने के लिए मन बड़ा बेचैन है. खुद को संभाल नहीं पा रहा हूं.’’

‘‘कहा न, मैं ने तुम्हारे मन को मनाने का ठेका नहीं ले रखा. जाते हो या…’’ रीना गुर्राई.

‘‘ठीक है भई, जाता हूं, नाराज क्यों हो रही हो.’’ कह कर गोरखप्रसाद रीना के पास से उठ कर आगे बढ़ा तो बरामदे में रीना की जेठानी सरिता अपनी मासूम बेटी नंदिनी के साथ सोती दिखाई दी. नंदिनी को देख कर उस की नीयत खराब हो गई, साथ ही रीना की बेवफाई भी याद आ गई. उस से बदला लेने के लिए वह दबे पांव सरिता की चारपाई के पास पहुंचा और गहरी नींद में सो रही नंदिनी को गोद में उठा कर बाग की ओर चल पड़ा.

बाग में पहुंच कर नंदिनी की आंखें खुलीं तो वह रोने लगी. गोरखप्रसाद पूरी तरह से हैवान बन चुका था. उस ने नंदिनी के कपड़े उतार दिए और जब उस के साथ जबरदस्ती की तो वह चिल्ला पड़ी. उसे चुप कराने के लिए गोरखप्रसाद ने उस का मुंह इतने जोर से दबाया कि उस की सांस थम गई. इसी के साथ उस ने पूरी ताकत से उस के सिर पर 2-3 घूंसे भी मार दिए थे. रहीसही कसर इन घूंसों ने पूरी कर दी थी.

जिस्म की आग ठंडी पड़ी तो उस ने नंदिनी को हिलाडुला कर देखा. उस के शरीर में हरकत न होते देख गोरखप्रसाद कांप उठा. उस ने सोचा कि अगर उस ने नंदिनी की लाश को यहां छोड़ दिया तो वह कभी भी पकड़ा जा सकता है. इसलिए उस ने नंदिनी की लाश को कंधे पर रखा और गांव से 3 किलोमीटर दूर ले जा कर कुआवल नदी में फेंक कर वापस आ गया. रीना ने कभी यह नहीं सोच रहा होगा कि उस का प्रेमी गोरखप्रसाद दरिंदगी की इस हद तक गुजर जाएगा और उस के घर का चिराग बुझा देगा. रीना पश्चाताप की आग में जल रही है. क्योंकि उसी के कारण मासूम बेटी नंदिनी की जान गई.

रीना का कोई दोष नहीं था, इसलिए पुलिस ने उस पर कोई काररवाई नहीं की. कथा लिखे जाने तक गोरखप्रसाद जेल में बंद था. पुलिस ने जांच पूरी कर आरोपपत्र दाखिल कर दिया था.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित. कुछ पात्रों के नाम बदले गए हैं.

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