गड़े मुरदे उखाड़ना जरूरी नहीं

1984 के सिख दंगों के दौरान दिल्ली व आसपास के बहुत से इलाकों में मारे गए सिखों के हत्यारों में से 2-4 को ही सजा मिली है पर इस का हल्ला अभी भी मचाया जाता रहता है. यह हल्ला ठीक उस तरह का है जैसा औरतें अपने पतियों को आड़े हाथों लेने में करती हैं कि 20 साल पहले उन्होंने होली पर पड़ोसिन के ब्लाउज में रंग भरने की कोशिश की थी.

पति का गुलछर्रे कभीकभार उड़ा लेना गलत हो तो भी पत्नी जिंदगी भर उसे साइनबोर्ड की तरह अपनी जबान पर ले कर घूमेगी तो पतिपत्नी में खटास रहेगी और हल कुछ न होगा. ‘बीती ताहि बिसार दे आगे की सुधि लेय’ ही जीवन का सही फौर्मूला है. किसी गलत काम को हरदम हथियार की तरह इस्तेमाल करना एकदम गलत है.

सरकारों की तरह घरों में पति, पत्नी, बच्चे, सासें, ननदें, भाभियां, बहनोई आदि बहुत कुछ ऐसा कर देते हैं जो पीड़ा देता है, वर्षों देता है. घरों में जब बंटवारा होता है, तो बहुत सी घटनाएं होती हैं, जो दशकों तक याद रहती हैं. पतिपत्नी में तलाक होता है तो एकदूसरे पर सच्चेझूठे आरोप लगाए जाते हैं.

पर हर बार 2002 के गुजरात के मुसलिम दंगों की जवाबदेही में 1984 के सिख दंगों की बात दोहराई नहीं जा सकती. यह तो कांग्रेस की भलमनसाहत है कि 1984 के दंगों से 10-15 साल पहले सिख अलगाववादियों द्वारा की गई हत्याओं की याद नहीं दिलाती जब पूरा पंजाब देश से कट गया था. उन दिनों के लिए पूरी सिख कौम को 2017 में दोषी तो ठहराया नहीं जा सकता!

इतिहास समाजों के लिए आवश्यक है पर अपनी आगे की गलतियां सुधारने के लिए, एक के किए का बदला उस की संतानों या संतानों की संतानों से लेने के लिए नहीं. हमारे यहां धर्म के प्रचार की आड़ में इस का दुष्प्रचार रातदिन करा जा रहा है और औरतों को अपरोक्ष में सलाह दी जा रही है कि किसी को भी उस के दादापरदादा के गुनाहों के लिए दोषी ठहरा देना गलत नहीं है. यह मानसिकता बहुत से परिवारों में जहर घोलती है. यही मानसिकता तब आड़े आती है जब हिंदू कर्मकांडी घर का लड़का सिख या मुसलिम लड़की को घर लाना चाहे तो उन लोगों का इतिहास खंगालना शुरू कर दिया जाता है जिस का लड़की से कोई संबंध नहीं होता है.

अदालतों ने हाल ही में 1984 के दंगों के पीडि़तों या अपराधियों के मामले फिर से खोलने के आदेश दिए हैं. यह भर गए जख्मों को कुरेदने के बराबर है. इन्हें खोलने की कोई जरूरत नहीं. ये इतिहास के पन्नों में दफन कर दिए जाएं, क्योंकि दोषियों में अधिकांश अब मर चुके हैं और जो जिंदा हैं, वे किसी काम के नहीं. देश हो या समाज अथवा घर पुरानी बातों को जरूरत से ज्यादा तूल देना नितांत बेवकूफी है.

मेरी बीवी की कई लड़कों से दोस्ती है. ऐसे में आप बताएं मुझे क्या करना चाहिए.

सवाल
मेरी शादी को 6 महीने हो चुके हैं. मेरी बीवी मायके में रह कर अपनी पढ़ाई पूरी करना चाहती है. उस की कई लड़कों से दोस्ती है. मुझे लगता है कि कहीं वह किसी लड़के से प्यार न करने लगे. मुझे क्या करना चाहिए?

जवाब

शादी की बुनियाद यकीन पर टिकी होती है. आप को अपनी बीवी पर भरोसा करना चाहिए. उसे किसी से प्यार करना होता, तो शादी से पहले ही कर लेती. वैसे, आप उसे अपने पास रख कर भी पढ़ाई पूरी करा सकते हैं, पर वजह प्यार होनी चाहिए न कि शक.

मां-बाप पर भारी अंकिता : प्यार की अनोखी कहानी

कानपुर शहर के स्वरूपनगर इलाके में एक मोहल्ला है आर्यनगर. इस मोहल्ले में ज्यादातर उच्च या मध्यमवर्ग के लोग रहते हैं. रूपेश गौतम का परिवार आर्यनगर में धर्मशाला के पास रहता था. उन के परिवार में पत्नी प्रीति के अलावा 2 बेटियां वंदना और अंकिता थीं. वंदना ज्यादा पढ़ीलिखी तो नहीं थी, पर थी सुंदर. सयानी होते ही रूपेश गौतम ने उस का विवाह रमेश से कर दिया था. रमेश सरकारी नौकरी में था. वंदना अपने पति के साथ खुश और सुखी थी.

रूपेश गौतम की दूसरी बेटी अंकिता भी काफी सुंदर थी. अंकिता जैसेजैसे सयानी होती गई, उस के रूपलावण्य में निखार आता गया. 17 वर्ष की होतेहोते यौवन ने अंकिता की सुंदरता में चार चांद लगा दिए. अंकिता की खूबसूरती ने कई युवकों को उस का दीवाना बना दिया. सूरज भी उन्हीं दीवानों में एक था.

सूरज अंकिता के पड़ोस में ही रहता था. उस के पिता भैरोप्रसाद गौतम औटो पार्ट्स का व्यापार करते थे. जबकि सूरज इलेक्ट्रीशियन था और मकानों में बिजली की वायरिंग के ठेके लेता था. 5 भाइयों में सूरज तीसरे नंबर का था. वह हाईस्कूल से आगे नहीं पढ़ सका था. बाद में उस ने अपने एक दोस्त की सलाह पर बिजली का काम सीखा और कुशल इलेक्ट्रीशियन बन गया.

सूरज हृष्टपुष्ट सजीला नौजवान था. वह खूब कमाता था और बनसंवर कर रहता था. सूरज मन ही मन अंकिता को चाहने लगा था. अंकिता भी उस की आंखों की भाषा समझती थी. वह उसे अच्छा भी लगता था. फलस्वरूप धीरेधीरे उस के मन में भी सूरज के प्रति आकर्षण पैदा होने लगा.

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अंकिता स्वरूपनगर स्थित विद्या मंदिर इंटर कालेज में पढ़ती थी और रोजाना पैदल ही कालेज जाती थी. उस के कालेज आनेजाने के समय सूरज उस का पीछा किया करता था. उस की आंखों की भाषा पढ़ कर अंकिता भी गाहेबगाहे उसे कनखियों से देखने लगी थी. अंकिता की इसी अदा से सूरज समझ गया कि अंकिता भी उसे चाहने लगी है.

धीरेधीरे दोनों के दिलों में प्यार का समंदर उमड़ने लगा. एक दिन सूरज को अपने पीछे आता देख अंकिता ठिठक कर रुक गई. उस का दिल जोरों से धड़क रहा था. अंकिता के अचानक रुकने से सूरज भी चौंक कर ठिठक गया. अंकिता उस के दिल में समाई हुई थी. जब उस से नहीं रहा गया तो वह लंबेलंबे डग भरते हुए अंकिता के सामने जा कर खड़ा हो गया.

‘‘तुम मेरे पीछे क्यों पड़े हो?’’ अंकिता ने त्यौरियां चढ़ा कर पूछा.

‘‘तुम से कुछ कहना था अंकिता.’’ सूरज झिझकते हुए बोला.

‘‘बोलो, क्या कहना चाहते हो?’’ अंकिता ने उस की आंखों में आंखें डाल कर पूछा.

सूरज ने अपनी जेब से कागज की एक पर्ची निकाली और अंकिता को थमा कर बोला, ‘‘घर जा कर पढ़ लेना. सब समझ में आ जाएगा.’’

अंकिता ने मन ही मन मुसकराते हुए वह कागज ले लिया और बिना कुछ बोले अपने घर चली गई. हालांकि अंकिता को अनुमान था कि उस कागज में क्या लिखा होगा, फिर भी वह उसे पढ़ कर तसल्ली कर लेना चाहती थी. घर पहुंच कर उस ने कपड़े बदले और अपने कमरे में जा कर सूरज का दिया हुआ कागज निकाल कर पढ़ा. उस में लिखा था—

‘आई लव यू अंकिता. तुम्हें देखे बगैर मुझे चैन नहीं मिलता. अगर तुम मुझे न मिलीं तो मैं जिंदा नहीं रह पाऊंगा. —तुम्हारा और सिर्फ तुम्हारा सूरज गौतम.’

पत्र पढ़ कर अंकिता के दिल के तार झनझना उठे. उस की चाहत को पर लग गए. अंकिता ने उस पत्र की एकएक लाइन को कईकई बार पढ़ा. उस के मन में सतरंगी सपने तैरने लगे. दिन बीता और रात हुई तो अंकिता ने रात में सूरज के नाम एक पत्र लिखा. पत्र में उस ने अपनी सारी भावनाएं उड़ेल दीं. उस ने लिखा.

‘मैं भी तुम से बहुत प्यार करती हूं. इतना प्यार, जितना कभी किसी ने नहीं किया होगा. कह इसलिए नहीं सकी कि कहीं तुम बुरा न मान जाओ. तुम्हारे बिना मैं भी नहीं जीना चाहती. मैं तो चाहती हूं कि हर समय तुम्हारी बांहों के घेरे में बंधी रहूं.

—तुम्हारी अंकिता.’

उस दिन मारे खुशी के अंकिता को ठीक से नींद नहीं आई. अगली सुबह जब वह कालेज जाने के लिए घर से निकली तो सूरज उसे पीछेपीछे आता दिखाई दिया. नजरें मिलीं तो दोनों मुसकरा दिए. अंकिता बेहद खुश नजर आ रही थी. अंकिता ने सावधानी से अपना लिखा पत्र जमीन पर गिरा दिया और आगे बढ़ गई. पीछेपीछे चल रहे सूरज ने इधरउधर देखा और पत्र को उठा कर दूसरी तरफ चला गया. एकांत में जा कर उस ने अंकिता का पत्र पढ़ा तो वह खुशी के मारे झूम उठा. जो हाल अंकिता के दिल का था, वही हाल सूरज का भी था. अंकिता ने पत्र का जवाब दे कर उस का प्यार स्वीकार कर लिया था.

दोपहर बाद जब कालेज की छुट्टी हुई तो अंकिता ने सूरज को गेट पर इंतजार करते पाया. एकदूसरे को देख कर दोनों के दिल मचल उठे. कालेज से चंद कदमों की दूरी पर मोती झील पार्क था. दोनों पार्क में जा पहुंचे. पार्क के सुनसान कोने में बैठ कर दोनों ने अपने दिल का हाल एकदूसरे को कह सुनाया.

सूरज ने एक नजर आसपास डाली और मौका देख कर अंकिता को अपनी बांहों में भर कर उस के गालों का चुंबन अंकित कर दिया. यह उस के प्यार की मोहर थी. सूरज के चुंबन से अंकिता के गाल शर्म से गुलाबी हो उठे. वह सूरज की बांहों से निकल कर भागी तो सूरज ने दौड़ कर उसे पीछे से पकड़ लिया. दोनों देर तक एकदूसरे से छेड़छाड़ करते रहे. पार्क में कुछ देर प्यार की अठखेलियां कर के दोनों घर लौट आए.

अंकिता और सूरज के बीच प्यार का इजहार हुआ तो जैसे उन की दुनियां ही बदल गई. इस के बाद दोनों अकसर मिलने लगे. अंकिता और सूरज के दिलोदिमाग पर प्यार का ऐसा जादू चढ़ा कि उन्हें एकदूसरे के बिना सब कुछ सूनासूना सा लगने लगा. जब भी मौका मिलता, दोनों घंटोंघंटों एकांत में बैठ कर अपने ख्वाबोंख्यालों की दुनिया सजाने लगते.

अब तक दोनों ने साथसाथ जीनेमरने की कसमें भी खा लीं थीं. एक बार मन से मन मिला तो फिर दोनों के तन मिलने में देरी नहीं लगी. समय यूं ही बीतता रहा. समय के साथ अंकिता और सूरज का प्यार परवान चढ़ता रहा. इस बीच अंकिता इंटर पास कर के बीए (प्रथम वर्ष) में आ गई थी.

अंकिता और सूरज ने अपनी तरफ से पूरी कोशिश की कि उन के प्रेमसंबंधों का किसी को पता न चले. लेकिन एक दिन अंकिता के चचेरे भाई ने उसे और सूरज को मोतीझील पार्क में हंसीठिठोली करते देख लिया. वहां तो वह कुछ नहीं बोला, पर घर आ कर उस ने अंकिता की मां के कान भर दिए. अंकिता जब घर लौटी तो उस की मां प्रीति उस पर बरस पड़ी, ‘‘कहां से आ रही है?’’

‘‘कालेज से आ रही हूं.’’

‘‘कालेज की छुट्टी हुए तो घंटों बीत गए. सचसच बता कहां थी?’’

अंकिता समझ गई कि उस की चोरी पकड़ी गई है. कोई चारा न देख उस ने सिर झुका लिया. हकीकत जान कर प्रीति ने समाज और बिरादरी का हवाला दे कर अंकिता को खूब समझाया. उस ने हिदायत दी कि भविष्य में वह सूरज से न मिले. अंकिता पर लगाम कसने के लिए प्रीति ने कुछ दिनों तक उस का कालेज जाना बंद करा दिया, साथ ही उस पर निगरानी भी रखने लगी.

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कहते हैं कि लाख पहरे बैठाने के बाद भी प्यार को कैद नहीं किया जा सकता. अंकिता का प्यार भी पहरे का मोहताज नहीं बन सका. मांबाप की निगरानी के बावजूद अंकिता का सूरज से मिलना बंद नहीं हो सका. किसी न किसी बहाने वह सूरज से मिलने का मौका ढूंढ ही लेती थी. जब कभी मिलना संभव नहीं होता तो वह उस से मोबाइल फोन पर बतिया लेती थी.

उन्हीं दिनों एक दिन अंकिता कालेज से देर से घर लौटी तो उस की मां उस पर फट पड़ी, ‘‘आ गई गुलछर्रे उड़ा कर. पढ़ाई का बहाना बना कर घर से निकलती है और उस लफंगे सूरज के साथ प्यार की पींगे बढ़ाती है. आखिर तुझे हो क्या गया है? क्यों हमारी इज्जत नीलाम करने पर तुली है?’’

अंकिता कुछ देर मौन रही, फिर जब मां की बातें बर्दाश्त नहीं हुईं तो वह बोली, ‘‘मां मैं आप की इज्जत नीलाम नहीं कर रही हूं. प्यार करना कोई गुनाह नहीं है, सूरज और मैं एकदूसरे से प्यार करते है और शादी करना चाहते हैं. सूरज अच्छा लड़का है, अपनी ही जातिबिरादरी का, कमाता भी अच्छा है. आखिर उस में बुराई क्या है, जो आप लोग उस का विरोध कर रहे हैं?’’

इस पर प्रीति तमतमा कर बोली, ‘‘तो बात शादी तक जा पहुंची. देखती हूं, तू उस से कैसे ब्याह रचाती है? आज के बाद तेरी पढ़ाईलिखाई सब बंद, घर के बाहर निकलना भी बंद.’’

शाम को रूपेश गौतम घर आए तो प्रीति ने पति को सारी बात बताई. इस पर रूपेश ने भी अंकिता को जम कर फटकारा और उस के घर से बाहर निकलने पर पूरी तरह पाबंदी लगा दी.

अंकिता पर पहरा लगा तो उस का सूरज से मिलनाजुलना बंद हो गया. मिल न पाने से अंकिता और सूरज दोनों परेशान हो उठे. सूरज अंकिता से मोबाइल पर बात करने की कोशिश करता, लेकिन बात नहीं हो पाती. बात होती भी कैसे, मां ने अंकिता का न केवल फोन छीन लिया था, बल्कि उस का सिम भी निकाल कर फेंक दिया था. सूरज अंकिता के घर के आसपास मंडराता रहता. लेकिन अंकिता उसे कहीं नहीं दिखती थी. सूरज को घर के सामने मंडराता देख कर प्रीति उसे बेइज्जत करती, लेकिन सूरज कोई जवाब नहीं देता.

कहते हैं, सच्चा प्यार करने वालों को कोई न कोई राह मिल ही जाती है. अंकिता के साथ भी यही हुआ. करीब साल भर तक घर वालों की कड़ी निगरानी में रहने के बाद सब को लगा कि अब अंकिता के सिर से सूरज के प्यार का भूत उतर गया है. इसलिए उन्होंने उसे घर के बाहर जाने की छूट दे दी. वह कालेज भी जाने लगी. यह अलग बात थी कि अंकिता कालेज जाती तो उस की मां भी उस के साथ जाती थी.

सूरज को जब पता चला कि अंकिता कालेज जाने लगी है तो वह कालेज के गेट पर उस का इंतजार करने लगा. कई दिनों के बाद एक दिन सूरज की अंकिता से मुलाकात हो गई. लेकिन उस की मां साथ थी, इसलिए दोनों में बात नहीं हो सकी. कुछ देर बाद अंकिता की मां प्रीति घर चली गई तो अंकिता कालेज के गेट पर आ गई. सूरज उसी का इंतजार कर रहा था.

अंकिता सड़क पार कर के उस के पास पहुंच गई. फिर दोनों वहां से मोतीझील पार्क पहुंचे. एकांत में दोनों मिले तो बिछुड़ने का दर्द छलक पड़ा. अंकिता सूरज के सीने से लग कर सुबकने लगी. कुछ देर में आंसुओं का सैलाब थमा तो वह बोली, ‘‘सूरज, अब मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकती. मुझे ऐसी जगह ले चलो, जहां प्यार के दुश्मन न हों. अगर तुम ने जल्दी ही कोई रास्ता न निकाला तो मैं जीवित नहीं रह पाऊंगी.’’

अंकिता की बात सुन कर सूरज उसे अपनी बांहों में भर कर बोला, ‘‘धीरज रखो अंकिता, हम जल्दी ही यह शहर छोड़ देंगे. क्योंकि तुम्हारी जुदाई मुझ से भी बर्दाश्त नहीं होती. न खानेपीने में मन लगता है, न काम में.’’

‘‘पर हम घर छोड़ कर जाएंगे कहां?’’ अंकिता ने पूछा.

‘‘मैनपुरी जिले के बेवर कस्बे में मेरा एक अजीज दोस्त रहता है. उसे हम दोनों के प्रेम संबंधों की जानकारी है. उस ने हमारी मदद करने का वादा किया है. घर छोड़ने के बाद उसी का घर हमारा ठिकाना होगा.’’ सूरज ने अंकिता को बताया. आपसी सहमति से घर छोड़ने का निश्चय कर अंकिता और सूरज अपनेअपने घर चले गए. सूरज पैसे जुटाने में जुट गया, जबकि अंकिता गुपचुप तरीके से घर छोड़ने की तैयारी में लग गई. उस ने घर वालों को जरा भी आभास नहीं होने दिया कि वह घर छोड़ने वाली है.

20 जून, 2017 को प्रीति की तबीयत खराब थी. उपयुक्त मौका देख कर अंकिता ने घर छोड़ने का फैसला कर लिया. अपने फैसले के बारे में उस ने मोबाइल से सूरज को भी अवगत करा दिया और मोतीझील पार्क के गेट पर मिलने को कहा. इस के बाद अंकिता ने मां से कहा कि वह एडमिशन फार्म लेने कालेज जा रही है. 1-2 घंटे बाद वापस लौट आएगी. प्रीति ने साथ चलने को कहा तो वह बोली, ‘‘मां, तुम्हारी तबीयत ठीक नहीं है, तुम आराम करो. मैं जल्दी ही लौट आऊंगी.’’

मां को आश्वासन दे कर अंकिता घर से निकल पड़ी. वादे के मुताबिक वह मोतीझील पार्क के गेट पर जा पहुंची. वहां सूरज पहले से ही उस का इंतजार कर रहा था. वहां से दोनों रावतपुर बसस्टैंड पहुंचे और बस से बेवर के लिए रवाना हो गए.

इधर जब शाम तक अंकिता घर नहीं लौटी तो प्रीति का माथा ठनका. उस ने यह जानकारी अपने पति रूपेश गौतम को दी तो वह भी दुकान छोड़ कर घर आ गए. रूपेश ने अंकिता की खोज शुरू की, लेकिन उस का कुछ पता नहीं चला. रूपेश व प्रीति को शक हुआ कि कहीं सूरज तो उन की बेटी को बहलाफुसला कर भगा नहीं ले गया. सच्चाई का पता लगाने प्रीति उस के घर गई. पता चला कि सूरज भी घर से गायब है. इस से प्रीति को पक्का यकीन हो गया कि सूरज ही उस की बेटी अंकिता को भगा ले गया है.

21 जून को 10 बजे प्रीति अपने पति रूपेश गौतम के साथ थाना स्वरूपनगर पहुंची. थाने पर उस समय इंसपेक्टर संजय कुमार सिंह मौजूद थे. प्रीति ने उन्हें अपनी तहरीर दे दी. तहरीर में प्रीति ने लिखा था कि वह आर्यनगर धर्मशाला के पास रहती है. पड़ोस में रहने वाले भैरोप्रसाद का बेटा सूरज उस की बेटी अंकिता को बहलाफुसला कर कहीं भगा ले गया है. तहरीर के आधार पर रिपोर्ट दर्ज कर के उस की बेटी को बरामद करने की कृपा करें.

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इंसपेक्टर संजय कुमार सिंह ने तहरीर ले कर प्रीति को आश्वासन दिया कि वह शीघ्र ही उन की बेटी को बरामद कर के आरोपी को जेल भेज देंगे. आश्वासन मिलने के बाद प्रीति व रूपेश घर लौट आए. संजय कुमार सिंह ने इस मामले की जांच बेनाझाबर चौकीप्रभारी रामशरण मौर्य को सौंप दी.

चौकीप्रभारी रामशरण मौर्य ने जांच शुरू की तो पता चला कि अंकिता और सूरज एकदूसरे से प्रेम करते हैं. अंकिता अपनी मरजी से सूरज के साथ गई है. फिर भी मौर्य ने सूरज के पिता भैरोप्रसाद को चौकी बुलवा कर उन पर दबाव बनाया कि वह सूरज को घर लौट आने को कहें, वरना जेल जाने की नौबत आ सकती है. पुलिस की धमकी से भैरोप्रसाद डर गए. उन्होंने सूरज के मोबाइल पर बात करने का प्रसास किया, लेकिन बात न हो सकी.

24 जून को प्रीति और रूपेश बेटी की चिंता में डूबे थे, तभी प्रीति के मोबाइल की घंटी बजी. प्रीति ने मोबाइल उठा कर हैलो कहा तो दूसरी तरफ से आवाज आई, ‘‘मां, मैं अंकिता बोल रही हूं. मैं बेवर में सूरज के साथ राजीखुशी से रह रही हूं. मैं ने आर्यसमाज मंदिर में सूरज के साथ शादी कर ली है.’’

प्रीति ने घर वापस आने के लिए कहा तो वह बोली, ‘‘मां, अगर आप लोग जिद छोड़ कर सूरज के साथ मेरी शादी के लिए राजी हो जाओ तो मैं घर आ सकती हूं.’’

अंकिता की बात सुन कर प्रीति ने फोन काट दिया. प्रीति ने अंकिता का फोन आने की जानकारी चौकीप्रभारी रामशरण मौर्य को दी तो मौर्य ने प्रेमीयुगल से फोन कर बात की. मौर्य ने प्रेमीयुगल को घर लौट आने को कहा, साथ ही उन की मदद करने का आश्वासन भी दिया.

सूरज को चौकीप्रभारी रामशरण मौर्य की बात पर यकीन नहीं हुआ. लेकिन जब अंकिता ने सूरज को समझाया तो वह वापस लौटने को राजी हो गया. 3 जुलाई की दोपहर में सूरज और अंकिता हाथ में हाथ डाले बेनाझाबर चौकी पहुंच गए.

दोनों ने चौकीप्रभारी रामशरण मौर्य को अपनी प्रेमकहानी और आर्यसमाज मंदिर में शादी करने की बात बताई और सुरक्षा देने के साथ मदद की गुहार भी लगाई. अंकिता ने मौर्य को खुद के बालिग होने के सबूत भी दिए. सबूत देखने के बाद मौर्य ने प्रेमीयुगल को एक करने का निर्णय ले लिया. उन्होंने सबूत के तौर पर अंकिता का बयान दर्ज कर लिया.

रामशरण मौर्य ने अंकिता और सूरज के घर वालों को चौकी पर बुलवा लिया. दोनों पक्षों के बीच करीब एक घंटे तक पंचायत चली. जिस के अगुवा खुद रामशरण मौर्य बने. लंबी बहस के बाद सूरज के घर वाले तो शादी के लिए राजी हो गए, लेकिन अंकिता की मां प्रीति व पिता रूपेश गौतम राजी नहीं हुए. चूंकि अंकिता बालिग थी और सूरज से शादी को राजी थी, इसलिए मौर्य ने दोनों की शादी करवाने का निश्चय कर लिया.

चौकीप्रभारी रामशरण मौर्य ने चौकी में ही फूल मालाएं मंगवा लीं, साथ ही मिठाई व कोल्डड्रिंक भी. वधू पक्ष के लोग शादी में शामिल नहीं हुए, जबकि वर पक्ष के लोग ढोल मंजीरे के साथ चौकी आ गए. कई युवक ढोल की थाप पर थिरकने लगे. चौकीप्रभारी ने आगंतुकों का स्वागत किया. ढोल की थाप के बीच अंकिता और सूरज ने एकदूसरे को जयमाला पहनाईं. इस अनोखी शादी को देखने के लिए लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी.

जयमाला होने के बाद चौकी के बगल में स्थित धर्मशाला में अंकिता व सूरज के फेरे कराए गए. पूरे रस्मोरिवाज के साथ दोनों की शादी संपन्न हुई. चौकीप्रभारी रामशरण मौर्य ने खुद कन्यादान किया. शादी संपन्न होने के बाद मिठाई बांटी गई.

शादी के बाद अंकिता और सूरज ने चौकीप्रभारी रामशरण मौर्य को अपना दत्तक पिता माना और उन के पैर छू कर आशीर्वाद लिया. इस के बाद सूरज अपने घर वालों के साथ अपनी दुलहन अंकिता को चौकी से विदा करा कर घर ले गया. इस तरह अंकिता और सूरज के प्यार की जीत हुई.

वरुण धवन संग अब यह फिल्म बनाएंगे डेविड धवन

वरुण धवन स्टारर फिल्म ‘जुड़वा-2’ ने बौक्स औफिस पर गजब का कलेक्शन किया. 1997 में आई सलमान खान की फिल्म जुड़वा की इस रीमेक फिल्म ने भारत में 138 करोड़ रुपए की कमाई की थी. डेविड धवन निर्देशित इस फिल्म के रीमेक के शानदार प्रदर्शन के बाद अब डेविड ने अपनी 1999 में रिलीज हुई फिल्म “बीवी नंबर 1” का रीमेक बनाने का फैसला किया है. वरुण धवन के लिए साल 2017 काफी अच्छा रहा है. उनकी इस साल 2 फिल्में रिलीज हुईं- “बद्रीनाथ की दुल्हनिया” और “जुड़वा-2” वरुण की दोनों ही फिल्मों ने अच्छा प्रदर्शन किया.

साल 2018 में वह अपनी नई फिल्म के साथ वापसी कर सकते हैं. जहां तक बात 1999 में रिलीज हुई फिल्म “बीवी नंबर वन” की है तो उस वक्त फिल्म में सलमान खान, करिश्मा कपूर और सुष्मिता सेन अहम भूमिकाओं में थे.

डेविड धवन की अपने बेटे के साथ यह तीसरी फिल्म होगी. बीवी नंबर वन के रीमेक के अलावा 2018 में वरुण धवन की फिल्म “अक्टूबर” और सुई धागा भी रिलीज होनी है. सुई धागा में जहां वह एक दर्जी की भूमिका निभाते नजर आएंगे वहीं अक्टूबर में वह रोमांटिक किरदार निभाते नजर आएंगे. दोनों ही फिल्मों से वरुण का फर्स्ट लुक रिलीज कर दिया गया है.

यश राज फिल्म्स के आधिकारिक ट्विटर हैंडल से शेयर की गई इस तस्वीर में आप वरुण धवन को सिलाई मशीन चलाते देख सकते हैं. वह बेहद साधारण कपड़ों में गंभीर होकर सिलाई मशीन पर काम करते दिखाई दे रहे हैं. तस्वीर को शेयर करते हुए कैप्शन में लिखा गया है कि सुई-धागे की तैयारी शुरू. आयुष्मान खुराना स्टारर फिल्म ‘दम लगा के हईशा’ का निर्देशन कर चुके शरत कटारिया ही इस फिल्म निर्देशन करेंगे. फिल्म के प्रोडक्शन की जिम्मेदारी मनीष शर्मा के हाथों में है और फिल्म में विराट कोहली के अलावा इसमें अनुष्का शर्मा भी अहम भूमिका में होंगी.

आनंदपाल एनकाउंटर : सियासी मोहरे की मौत

समय बदल गया, लोकतंत्र के रूप में स्वतंत्र भारत के उदय होने के साथ ही सत्ता पर कब्जा पाने के लिए तिकड़मी नेताओं ने राजनीति की नई बिसात बिछा कर देश में छलकपट का खेल शुरू कर दिया था. फर्क सिर्फ इतना रहा कि सत्ता को हासिल करने के लिए छलकपट करने वाले चेहरे और कथानक बदल गए. आज की राजनीति के दौर में धार्मिक उन्माद भरना और अपराधियों का जातीयकरण कर के उन्हें राजनैतिक संरक्षण देना आज के नेताओं की राजनीति का प्रमुख हिस्सा बन गया है. देश में साफसुथरी राजनैतिक मूल्यों के आधार पर आज राजनीति करने वाले नेता कम ही रहे हैं.

राजनीति के शिखर पर पहुंचने की जल्दी में राजनीति का माफियाकरण हो गया है. देश में बिहार के धनबाद जिले से कोयला माफिया के रूप में बाहुबली नेताओं के राजनीति में आने की शुरुआत हुई थी, जो धीरेधीरे पूरे देश में फैल गई. उत्तर प्रदेश, बिहार सहित देश के अन्य राज्यों में भी बाहुबली अपराधियों ने चुनाव लड़ कर राजनीति में भागीदारी हासिल कर ली.

पहले जहां नेता अपराधियों का इस्तेमाल कर के चुनाव जीतते थे, अब अपराधी खुद ही बाहुबल, धनबल से चुनाव जीत कर सांसद और विधायक बनने लगे हैं. राजनेताओं द्वारा भष्मासुर अपराधी पैदा करने की रीति राजस्थान के नेताओं में कम ही रही है.

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अन्य राज्यों की अपेक्षा शांत माने जाने वाले राजस्थान में भी इधर नेताओं ने अपना हित साधने के लिए अपनीअपनी जाति के अपराधियों को संरक्षण देना शुरू कर दिया है. राजस्थान की जाट जाति मूलरूप से खेतीकिसानी करने वाली जाति मानी जाती है, जबकि राजपूत शासक और सामंत रहे हैं, जिस की वजह से जाट जाति राजपूतों की दबंगई का शिकार बनती रही है.

आजादी के बाद जाट कांग्रेस के समर्थक बन गए थे, जबकि राजपूत जागीरदारी छिनने की वजह से कांग्रेस के घोर विरोधी रहे हैं. राजस्थान के शेखावाटी, मारवाड़ अंचल में कांग्रेस की सरकारों के साथ मिल कर जाटों ने अपनी राजनीति खूब चमकाई. समूचे शेखावाटी, मारवाड़ इलाके में कांग्रेस पार्टी के टिकट पर जाट विधायक और सांसद का चुनाव जीतते रहे हैं.

यही वजह रही कि भाजपा ने कांग्रेस को शिकस्त देने के लिए राजपूत, बनिया और ब्राह्मणों को अपनी ओर खींचा. जाति का यह नया समीकरण भाजपा को जीत दिलाने में कामयाब भी रहा. इस में यूनुस खान के आ जाने से कुछ मुसलिमों का भी समर्थन मिल गया. यूनुस खान के विधानसभा क्षेत्र डीडवाना में मुसलिम, राजपूत और जाटों के निर्णायक वोट थे. इन में राजपूतों और मुसलिमों को जोड़ कर यूनुस खान चुनाव जीत कर विधायक बन गए. युनूस खान के विधानसभा क्षेत्र में रूपाराम डूडी जाटों के  दबंग नेता रहे हैं. उन के समय में डीडवाना विधानसभा क्षेत्र में जाट जाति के अपराधियों का बोलबाला रहा.

जाटों की दबंगई खत्म करने और राजपूतों में अपना प्रभाव जमाने के लिए यूनुस खान को एक दबंग राजपूत की जरूरत थी. उसी बीच उन के इलाके में राजपूतों में आनंदपाल सिंह अपराधी के रूप में उभरा. अपराधी प्रवृत्ति के जीवनराम गोदारा को कांग्रेस के जाट नेताओं का खुला संरक्षण मिला था.

लेकिन यूनुस खान ने आनंदपाल सिंह के बल पर क्षेत्र के जाटों की दबंगई को खत्म कर के नागौर, चुरू और झुंझनू में राजपूत, मुसलिम, बनियों और ब्राह्मणों का गठजोड़ कर इन जिलों में भाजपा को स्थापित करने के लिए आनंदपाल सिंह से मिल कर दिनदहाड़े जीवनराम गोदारा की हत्या करा दी.

इस के बाद यूनुस खान ही नहीं, नागौर और चुरू जिलों के भाजपा के राजपूत नेता खुल कर आनंदपाल सिंह को राजनीतिक संरक्षण देने लगे. आनंदपाल की गुंडई की बदौलत मकराना की मार्बल खदानों पर कब्जे करने से ले कर जमीनों पर कब्जे करने के मामलों में यूनुस खान के परिवार वालों के नामों की धमक पूरे राजस्थान में सुनी जाने लगी. सन 2013 के विधानसभा चुनाव में आनंदपाल सिंह ने खुल कर यूनुस खान को चुनाव जिताने में मदद की. चूंकि यह कहानी आनंदपाल सिंह की है, इसलिए पहले उस के बारे में जान लेना जरूरी है.

बात 27 जून, 2006 की है. राजस्थान के जिला नागौर के कस्बा डीडवाना का बाजार खुला हुआ था. मानसून ने दस्तक दे दिया था. सुबह से हलकी बूंदाबांदी हो रही थी. दोपहर 2 बजे के करीब कस्बे की गोदारा मार्केट की दुकान ‘पाटीदार बूटहाउस’ पर 4 लोग बैठे चाय पी रहे थे. उसी समय संदिग्ध लगने वाली 2 गाडि़यां दुकान के सामने आ कर रुकीं. उन में से 6 लोग उतरे. कोई कुछ समझ पाता, उस से पहले ही उन्होंने हथियार निकाल कर गोलियां चलानी शुरू कर दीं.

उन 6 लोगों में 6 फुट लंबा एक दढि़यल नौजवान भी था. सब से पहले उसी ने अपनी 9 एमएम पिस्तौल निकाल कर चाय पी रहे उन 4 लोगों में से सामने बैठे हट्टेकट्टे आदमी के सीने पर गोली दागी थी.

गोली चलाने वाले उस दढि़यल नौजवान का नाम आनंदपाल सिंह था और जिस हट्टेकट्टे आदमी के सीने में उस ने गोली दागी थी, उस का नाम जीवनराम गोदारा था.

सन 1992 में देश में राम मंदिर आंदोलन के समय नागौर की लाडनूं तहसील के गांव सांवराद के रहने वाले पप्पू उर्फ आनंदपाल सिंह की शादी थी. वह रावणा राजपूत बिरादरी से था. राजस्थान में सामंती काल में राजपूत पुरुष और गैरराजपूत महिलाओं की संतान को रावणा राजपूत कहा जाता है. इसलिए राजपूत इस बिरादरी को हिकारत की नजरों से देखते हैं.

चूंकि पप्पू असली राजपूत नहीं था, इसलिए बारात निकलने से पहले ही गांव के असली राजपूतों ने चेतावनी दे रखी थी कि अगर दूल्हा घोड़ी पर चढ़ा तो अंजाम ठीक नहीं होगा. क्योंकि घोड़ी पर सिर्फ असली राजपूत ही चढ़ सकता है.

चूंकि पप्पू घोड़ी पर चढ़ कर ही बारात निकालना चाहता था, इसलिए उस ने अपने एक दोस्त को याद किया, जिस का नाम था जीवनराम गोदारा. उस समय वह डीडवाना के बांगड़ कालेज का छात्रनेता हुआ करता था. जीवनराम खुद बारात में पहुंचा और अपने रसूख का इस्तेमाल कर के पप्पू को घोड़ी पर चढ़ा कर शान से बारात निकाली.

राजपूतों का ऐतराज अपनी जगह रह गया. इस के बाद दोनों में गाढ़ी दोस्ती हो गई. अब यहां सवाल यह उठता है कि पप्पू उर्फ आनंदपाल ने अपने ऐसे दोस्त जीवनराम गोदारा को क्यों मारा? दरअसल, यह मदन सिंह राठौड़ की हत्या का बदला था.

कहा जाता है कि कुछ महीने पहले फौज के जवान मदन सिंह की हत्या जीवनराम गोदारा ने इसलिए कर दी थी, क्योंकि जीवनराम राह चलती लड़कियों को छेड़ता था, जिस का मदन सिंह ने विरोध किया था. हत्या का तरीका भी बड़ा भयानक था. सिर पर पत्थर की पटिया से मारमार कर मदन सिंह को खत्म किया गया था.

इस हत्या ने जातीय रूप ले लिया था और सारा मामला राजपूत बनाम जाट में तब्दील हो गया था. पप्पू ने राजपूतों के मान के लिए जीवनराम की हत्या कर बदला ले लिया था. उसी पप्पू को, जिसे जीवनराम ने घोड़ी चढ़ाया था, लोग आनंदपाल सिंह के नाम से जानने लगे थे. उस के बाद वही आनंदपाल राजस्थान के माफिया इतिहास में मिथक बन गया.

आनंदपाल सिंह ऐसे ही माफिया नहीं बना था. वह पढ़नेलिखने में ठीक था. उस ने बीएड किया था. उस के पिता हुकुम सिंह चाहते थे कि वह सरकारी स्कूल में अध्यापक हो जाए. उस की शादी भी हो गई थी.

घर वालों ने उसे लाडनूं में एक सीमेंट एजेंसी दिलवा दी थी. इस की वजह यह थी कि घर वाले चाहते थे कि प्रतियोगी परीक्षाओं के साथसाथ वह अपना खर्चा भी निकालता रहे.

लेकिन आनंदपाल सिंह राजनीति में जाना चाहता था. सन 2000 में जिला पंचायत के चुनाव हुए. उस ने पंचायत समिति का चुनाव लड़ा और जीत भी गया. अब पंचायत समिति के प्रधान का चुनाव होना था. आनंदपाल सिंह ने निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में पर्चा भर दिया. उस के सामने था कांग्रेस के कद्दावर नेता हरजीराम बुरड़क का बेटा जगन्नाथ बुरड़क.

यह चुनाव आनंदपाल मात्र 2 वोटों से हार गया. लेकिन अनुभवी नेता रहे हरजीराम की समझ में आ गया कि यह नौजवान आगे चल कर उस के लिए खतरा बन सकता है. कांग्रेस सरकार में कृषि मंत्री रहे थे हरजीराम बुरड़क.

नवंबर, 2000 में पंचायत समिति की सहायक समितियों का चुनाव था. अब तक आनंदपाल और हरजीराम के बीच तकरार काफी बढ़ चुकी थी. कहा जाता है कि सबक सिखाने के लिए हरजीराम ने आनंदपाल के खिलाफ कई झूठे मुकदमे दर्ज करवा कर उसे गिरफ्तार करवा दिया.

तभी पुलिस ने आनंदपाल सिंह को ऐसा परेशान किया कि उस के कदम अपराध की दुनिया की ओर बढ़ गए. इस के बाद तो किसी की हत्या करना आनंदपाल के लिए खेल बन गया.

सीकर का श्री कल्याण कालेज स्थानीय राजनीति की पहली पाठशाला माना जाता है, जहां वामपंथी संगठन एसएफआई का दबदबा था. इस संगठन में जाटों की पकड़ काफी मजबूत थी. सन 2003 में जब वसुंधरा राजे के नेतृत्व में बीजेपी की सरकारी बनी तो यहां के छात्र नेता रह चुके कुछ नौजवान छात्र नेता राजनीतिक शह पा कर अपराध की डगर पर चल पड़े.

देखते ही देखते कई छात्र नेता शराब और  भूमाफिया बन गए. ऐसे में एक नौजवान तेजी से उभरा, जिस का नाम था गोपाल फोगावट. गोपाल एसके कालेज में पढ़ते समय बीजेपी के छात्र संगठन एबीवीपी का कार्यकर्ता हुआ करता था. वह शहर के एसके हौस्पिटल में मेल नर्स भी था. उसी बीच सीपीएम के छात्र संगठन एसएफआई के कुछ लड़के गोपाल के करीब आ कर अवैध शराब की तस्करी में जुट गए. सीपीएम ने उन लड़कों को संगठन से बाहर निकाल दिया. उन में एक लड़का था राजू ठेहट. राजू का ही एक सहयोगी और दोस्त था बलबीर बानूड़ा. सन 2004 में राजू ने पैसे के लेनदेन को ले कर बलबीर के साले विजयपाल की हत्या कर दी. इस के बाद दोनों दोस्तों के बीच दुश्मनी हो गई.

राजू ठेहट को गोपाल फोगावट का संरक्षण मिला हुआ था. बलबीर बानूड़ा उस के सामने काफी कमजोर पड़ रहा था. तब उस ने बगल के जिले नागौर में अपनी धाक जमा रहे माफिया आनंदपाल सिंह से हाथ मिला लिया. अब बलबीर को उस मौके का इंतजार था, जब वह अपने साले की मौत का बदला ले सके. उन्हें यह मौका मिला 5 अप्रैल, 2006 को  गोपाल फोगावट किसी शादी में शामिल होने के लिए अपने गांव तासर बड़ी जा रहा था. इस के लिए उस ने पहली बार सूट सिलवाया था. वह हौस्पिटल के पास ही स्थित सेवन स्टार टेलर्स की दुकान पर अपना सूट लेने पहुंचा.

जैसे ही गोपाल सूट का ट्रायल लेने के लिए ट्रायल रूम में घुसा, बलबीर बानूड़ा और उस के साथियों ने दुकान में घुस कर गोपाल को एक के बाद एक कर के 8 गोलियां मार दीं. गोलियां मार कर बलबीर बाहर निकल रहा था तो उसे लगा कि गोपाल फोगावट में अभी जान बाकी है. उस ने लौट कर 2 गोलियां उस के सिर में मारीं.

इस वारदात में आनंदपाल सिंह बलबीर के साथ था. धीरेधीरे आनंदपाल सिंह के गैंग ने शेखावाटी और मारवाड़ के बड़े हिस्से में शराब तस्करी और जमीन के अवैध कब्जे में अपनी धाक जमा ली. इस के बाद की कहानी में बस इतना ही कहा जा सकता है कि हमेशा एके47 ले कर चलने वाले इस गैंगस्टर को पकड़ने के लिए राजस्थान पुलिस को 3 हजार जवान तैनात करने पड़े. इन जवानों को खास किस्म की ट्रेनिंग भी दी गई थी. इसी के साथ उस पर 5 लाख का इनाम भी घोषित किया गया था.

वसुंधरा राजे जब पहली बार सत्ता में आई थीं, तब उन की छवि बाहरी नेता के रूप में थी. हालांकि उन की शादी राजस्थान के धौलपुर राजघराने में हुई थी. राजस्थान में राजपूतों की नेता के रूप में अपनी छवि बनाने के लिए उन्हें काफी मेहनत करनी पड़ी. आज राजपूत समुदाय वसुंधरा के पक्ष में खड़ा है. उन के सब से भरोसेमंद माने जाने वाले नेताओं में राजेंद्र सिंह राठौड़ और गजेंद्र सिंह खींवसर हैं. ये दोनों नेता राजपूत हैं.

आनंदपाल सिंह राजपूत नौजवानों में काफी लोकप्रिय था. क्योंकि जाटों के खिलाफ संघर्ष का वह प्रतीक बन चुका था. नागौर जिले के मुंडवा विधानसभा क्षेत्र के विधायक हनुमान बेनीवाल राज्य की मुख्यमंत्री के धुर विरोधी माने जाते हैं.

आनंदपाल की बदौलत यूनुस खान हनुमान बेनीवाल पर खासा नियंत्रण पाने में सफल रहे. यूनुस खान मंत्री के रूप में बीकानेर जेल में बंद आनंदपाल से निजी रूप से मिलने पहुंचे थे, जिस से राज्य की राजनीति में तीखी प्रतिक्रिया  हुई थी.

जेल में बंद खूंखार अपराधी आनंदपाल की सुरक्षा व्यवस्था में लगे पुलिस बल की कटौती यूनुस खान के प्रभाव से ही की गई थी, जिस का फायदा उठा कर एक दिन पेशी के दौरान आनंदपाल सिंह पुलिस हिरासत से भाग निकला था.

राज्य की राजनीति में राजपूत जाति का संरक्षण आनंदपाल सिंह को मिल ही रहा था. इसी तरह राजू ठेहट गिरोह को गैरभाजपा दल के नेताओं का संरक्षण मिल रहा था. बीकानेर जेल में बंद रहने के दौरान राजू ठेहट गिरोह ने आनंदपाल की हत्या की कोशिश की थी, जिस में आनंदपाल तो बच गया था, लेकिन उस का एक साथी मारा गया था. फरारी के दौरान पुलिस मुठभेड़ में नागौर जिला पुलिस के जवान खुभानाराम को घायल कर आनंदपाल फिर पुलिस पकड़ से दूर हो गया था.

लेकिन आनंदपाल सिंह भागतेभागते थक गया तो उस ने अपने वकील के माध्यम से आत्मसमर्पण करने की कोशिश की. फरारी के दौरान अपने उपकारों के बदले आनंदपाल ने यूनुस खान से आत्मसमर्पण करवाने के लिए मदद मांगी. शायद यूनुस खान ने मदद करने से इनकार कर दिया तो आनंदपाल ने यूनुस खान को देख लेने की धमकी दे दी.

यूनुस खान आनंदपाल सिंह को अच्छी तरह जानते थे कि वह धमकी को अंजाम दे सकता है, इसलिए डरे हुए यूनुस खान राज्य की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे से मिले और उन्हें अपनी दुविधा बताई. इस के बाद उन्होंने आनंदपाल सिंह की हत्या की पटकथा तैयार कर डाली.

यूनुस खान की शिकायत पर मुख्यमंत्री ने आनंदपाल का एनकाउंटर करने के लिए राज्य पुलिस के एनकाउंटर विशेषज्ञ एम.एन. दिनेश (आईजी पुलिस) को लक्ष्य दे कर एसओजी में भेज दिया. कहा जाता है कि आनंदपाल से डरे यूनुस खान मुख्यमंत्री के पास जा कर खूब रोए थे.

जिस आनंदपाल को पालपोस कर यूनुस खान ने इतना बड़ा किया था, जब वह उन पर भारी पड़ने लगा तो सत्ता के बल पर 24 जून, 2017 की रात पुलिस की मदद से उसे ठिकाने लगवा दिया.

आनंदपाल तो अपने अंजाम तक पहुंच गया, लेकिन उसे अपराधी बनाने वाले भ्रष्ट यूनुस खान सरीखे नेताओं का क्या होगा? आनंदपाल के एनकाउंटर के बाद राजस्थान में राजपूत जाति ने उसे जातीय अस्मिता से जोड़ लिया है. जबकि जाट उस की हत्या पर कई दिनों तक डीजे बजा कर खुशियां मनाते रहे.

आनंदपाल सिंह के घर वालों का कहना था कि भाजपा सरकार के गृहमंत्री चाहते थे कि आनंदपाल आत्मसमर्पण कर दे, लेकिन आनंदपाल के आत्मसमर्पण करने से यूनुस खान के तमाम राज खुल सकते थे. इसलिए आत्मसमर्पण करने को तैयार आनंदपाल को यूनुस खान के लिए मार डाला गया. आनंदपाल के मारे जाने से मंत्री यूनुस खान खुश हैं कि उन के राज अब कभी नहीं खुल पाएंगे.

यह एनकाउंटर चुरू जिले में हुआ, जो राजेंद्र राठौड़ का गृह जिला है. राजपूत बिरादरी में पैदा हुए रोष का शिकार राजेंद्र सिंह राठौड़ बन सकते हैं. राजपूतों का एक छोटा सा संगठन है श्री राजपूत करणी सेना. इस के कर्ताधर्ता हैं लोकेंद्र सिंह कालवी, जिन के पिता कल्याण सिंह कालवी राजपूतों के बड़े नेता और केंद्रीय मंत्री रहे हैं.

लोकेंद्र सिंह कालवी, उन के पिता कल्याण सिंह कालवी और करणी सेना तब चर्चा में आई थी, जब जयपुर में इस संगठन के लोगों ने फिल्म डायरेक्टर संजय लीला भंसाली के साथ बदसलूकी की थी. यह गैरराजनीतिक संगठन लगातार कई सालों से आनंदपाल की रौबिनहुड की छवि गढ़ने में लगा था. आनंदपाल के एनकाउंटर को यह संगठन भुनाने में लगा है. राजस्थान विधानसभा चुनाव सन 2018 में होने वाले हैं. हो सकता है, इस का असर चुनाव पर पड़े.

crime

यह भी हो सकता है कि इस घटना के बाद पश्चिमी राजस्थान में मदेरणा और मिर्धा परिवारों के सियासी पतन के बाद जाटों के नए नेता के रूप में उभर रहे हनुमान बेनीवाल फिर भाजपा में आ जाएं. सन 2009 तक वह बीजेपी में थे, लेकिन बाद में आनंदपाल की वजह से वह पार्टी छोड़ गए थे.

आनंदपाल के मामले को ले कर वह लगातार सरकार को घेरते रहे हैं. फिलहाल वह निर्दलीय विधायक हैं. पश्चिमी राजस्थान जाट बाहुल्य है. ऐसे में बेनीवाल किसी भी राजनीतिक पार्टी के लिए फायदेमंद हो सकते हैं.

आनंदपाल सिंह का भले ही अंत हो चुका है, पर याद करने वाले उसे अपनीअपनी तरह से याद करते रहेंगे. उस की मौत के बाद जो लोग उस के एनकाउंटर की सीबीआई जांच की मांग कर रहे हैं, राजपूत हिम्मत सिंह की पत्नी ममता कंवर ने न्याय मांगते हुए उन पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं. हिम्मत सिंह की हत्या आनंदपाल ने ही की थी. ममता कंवर ने एक लिखित संदेश और वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल किया है.

उन्होंने आनंदपाल सिंह का समर्थन कर रहे राजपूतों से पूछा है कि क्या कसूर था उन के पति राजपूत हिम्मत सिंह का, जिन की शादी हुए कुछ ही समय हुआ था और आनंदपाल सिंह ने उन्हें मार दिया था. यही नहीं, उन्होंने श्याम प्रताप सिंह रूवा, राजेंद्र सिंह राजपूत और आनंदपाल के एनकाउंटर में शामिल कमांडो सोहन सिंह तंवर पर चली गोलियों का हिसाब मांगा है.

उन का कहना है कि वह तो असली राजपूत हैं, जबकि आनंदपाल सिंह रावणा राजपूत था. क्या कारण था कि रावणा राजपूत होते हुए भी उस ने असली राजपूतों को मारा, फिर भी किसी राजपूत ने कभी जुबान नहीं खोली.

दरअसल, सन 2016 में जयपुर के विद्याधरनगर इलाके में अलंकार प्लाजा के पास खड़ी एक कार में हिम्मत सिंह राजपूत की कुछ हथियारबंद बदमाशों ने दिनदहाड़े गोली मार कर हत्या कर दी थी. इस के बाद एसओजी ने 4 लोगों को गिरफ्तार किया था. गिरफ्तार किए गए सोहन सिंह उर्फ सोनू पावटा और अजीत पावटा नागौर के पावटा के रहने वाले थे.

पूछताछ में पता चला कि ये दोनों कुख्यात बदमाश आनंदपाल सिंह के सहयोगी थे. उन्होंने स्वीकार किया है कि आनंदपाल सिंह के कहने पर उन्होंने ही हिम्मत सिंह की हत्या की थी. दोनों के खिलाफ नागौर के कुचामनसिटी, डीडवाना, मुरलीपुरा और जोधपुर के चौपासनी थाने में हत्या, हत्या के प्रयास, लूट, अपहरण, मारपीट और अवैध हथियारों के करीब 15 मुकदमे दर्ज हैं.

आनंदपाल सिंह की मौत हो चुकी है. राजस्थान के राजपूतों ने इसे अपनी शान से जोड़ लिया है. यही वजह है कि वे उस का अंतिम संस्कार तब तक न करने पर अड़े हैं, जब तक उस के एनकाउंटर की सीबीआई जांच नहीं कराई जाएगी. वैसे इस एनकाउंटर से वसुंधरा सरकार को नुकसान हो सकता है.

कट्टरता के मारे रोहिंग्या बर्मी

एक कहावत है – ‘मनुष्य इतिहास से यह सीखता है कि मनुष्य इतिहास से कुछ नहीं सीखता.’ यह कहावत भारत पर पूरी तरह लागू होती है. इतने साल गुजर जाने के बावजूद हम बंगलादेशी घुपैठियों की समस्या को हल नहीं कर पाए हैं और अब म्यांमार से आई रोहिंग्या मुसलिम शरणार्थी समस्या से जूझ रहे हैं. इस पर देश में एकराय नहीं बन पा रही है. देश के सामने एक ज्वलंत सवाल यह है कि रोहिंग्याओं का क्या करें?

अमेरिकी लेखक सेमुअल हटींगटन ने कहा था, ‘भविष्य में संघर्ष राजनीतिक विचारधाराओं के बीच नहीं, सभ्यताओं या धर्मों के बीच होगा.’ म्यांमार में यही हो रहा है. रोहिंग्या शरणार्थियों की समस्या म्यांमार में बौद्ध और मुसलिमों के बीच चल रहे हिंसात्मक संघर्ष का नतीजा है. मुसलिम म्यांमार में अलपसंख्यक हैं, बौद्ध बहुसंख्यकों के साथ उन की पटरी नहीं बैठती.

नतीजतन, रोहिंग्या कट्टरवाद और अलगाववाद के रास्ते पर चल पड़े. रोहिंग्याओं की कहानी विद्वेष और अलगाववाद के खुद ही शिकार होने

की कहानी है. इस आतंकवाद और अलगावाद ने रोहिंग्याओं को बहुसंख्यक बौद्धों, म्यांमार सरकार और वहां की सेना के मिलजुले कोप का निशाना बनाया. उन्हें म्यांमार छोड़ कर भागने के लिए मजबूर कर दिया. कोई भी पड़ोसी देश उन्हें शरण देना नहीं चाहता.

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म्यांमार की यह कहानी भारत में भी इसलिए गूंज रही है क्योंकि हजारों की संख्या में रोहिंग्याओं के शरणार्थी के रूप में भारत में आने से भारतीय राजनीति में भी यह अहम मुद्दा बन गया है. इस के इर्दगिर्द राजनीति हो रही है.

जनमत 2 हिस्सों में बंटता जा रहा है. एक तबका मानता है कि रोहिंग्याओं को मानवीय आधार पर शरण दी जाए जबकि दूसरा तबका कहता है कि रोहिंग्याओं के रिश्ते आतंकी संगठनों से हैं. उन्हें शरण देना देश की सुरक्षा के लिए खतरनाक होगा. ऐसे लोगों की भी कमी नहीं है जो मानते हैं कि मानवीयता के नाम पर हर शरणार्थी की मदद कर के देश को धर्मशाला नहीं बनाया जा सकता.

खुद भी दोषी हैं

रोहिंग्याओं को बिना देश का बेबस नागरिक कहा जाता है. इस की अजीब दास्तान है. म्यांमार में करीब 8 लाख रोहिंग्या मुसलिम रहते हैं और वे इस देश में पिछली कुछ सदियों से रहते आए हैं लेकिन बर्मा (वर्तमान में म्यांमार) के लोग और वहां की सरकार इन लोगों को अपना नागरिक नहीं मानती, बंगलादेशी मानती है. बिना किसी देश की नागरिकता के रोहिंग्या लोगों को म्यांमार में दमन का सामना करना पड़ता है.

बड़ी संख्या में रोहिंग्या लोग बंगलादेश और थाईलैंड की सीमा पर स्थित शरणार्थी शिविरों में अमानवीय स्थितियों में रहने को विवश हैं. वे अपनी इस स्थिति के लिए खुद भी कम दोषी नहीं हैं क्योंकि उन्होंने मेलजोल का नहीं, अलगाव का रास्ता चुना और उस के शिकार हो गए.

रोहिंग्याओं की कहानी अलगाववाद और उग्रवाद की लंबी दास्तान है. बौद्ध धर्म की महायान शाखा को मानने वाला म्यांमार भारत, थाईलैंड, लाओस, बंगलादेश और चीन से घिरा हुआ देश है. म्यांमार में भी मुसलिम कन्वर्जन के साथ संसार के अन्य सभी देशों में होने वाली उथलपुथल शुरू से है. मगर इस की स्थिति द्वितीय विश्वयुद्ध के काल में विस्फोटक हुई. रोहिंग्या मुसलमानों ने  शक्ति और संख्या बढ़ते ही इसलामी राष्ट्र के निर्माण के लिए जिहाद छेड़ दिया. 28 मार्च, 1942 को रोहिंग्या मुसलमानों ने म्यांमार के मुसलिमबहुल उत्तरी अराकान क्षेत्र में करीब 20 हजार बौद्धों को मार डाला था.

भारत विभाजन से पहले म्यांमार के रोहिंग्या मुसलिम नेताओं ने भारत के मोहम्मद अली जिन्ना से संपर्क किया और मायू क्षेत्र को पूर्वी पाकिस्तान में शामिल कराने के लिए उन की सहायता मांगी. इस का उद्देश्य भी अराकान के सीमांत जिले मायू को पूर्वी पाकिस्तान में मिलाना था लेकिन तब की बर्मा सरकार ने मायू को स्वतंत्र इसलामी राज्य बनाने या उसे पाकिस्तान में शामिल करने से इनकार कर दिया था.

इस पर उत्तरी अराकान के मुजाहिदों ने बर्मा सरकार के खिलाफ जिहाद की घोषणा कर दी. मायू क्षेत्र में लूट, हत्या, बलात्कार एवं आगजनी का भयावह खेल शुरू हो गया और कुछ ही दिनों में इन दोनों शहरों से बौद्धों को या तो मार डाला गया अथवा भगा दिया गया.

अपनी जीत से उत्साहित हो कर वर्ष 1947 तक पूरे देश के तकरीबन सभी मुसलमान एकजुट हो गए और मुजाहिदीन मूवमैंट के नाम से बर्मा पर मानो हमला ही बोल दिया गया. यहां से हो रही लगातार देशविरोधी गतिविधियों ने पूरे देश को परेशान कर रखा था. आखिरकार, बर्मा सरकार ने इस इलाके में सीधी सैनिक कार्यवाही शुरू कर दी.

दूसरे विश्वयुद्ध की समाप्ति और 1962 में जनरल नेविन के नेतृत्व में तख्तापलट की कार्यवाही के दौर में रोहिंग्या मुसलिमों ने अराकान में एक अलग रोहिंग्या देश बनाने की मांग रखी, लेकिन तत्कालीन बर्मी सेना के शासन ने रंगून पर कब्जा करते ही अलगाववादी और गैरराजनीतिक दोनों ही प्रकार के रोहिंग्या लोगों के खिलाफ कड़ी कार्यवाही की. सैनिक शासन ने रोहिंग्या लोगों को नागरिकता देने से इनकार कर दिया और इन्हें बिना देश वाला (स्टेटलैस) बंगाली घोषित कर दिया.

बर्मा के शासकों और सैन्य सत्ता ने इन के खिलाफ कई बार कड़ी कार्यवाही की. इन की बस्तियों को जलाया गया, इन की जमीन को हड़प लिया गया, मसजिदों को बरबाद कर दिया गया और इन्हें देश से बाहर खदेड़ दिया गया. ऐसी स्थिति में ये बंगलादेश की सीमा में प्रवेश कर जाते हैं, थाईलैंड की सीमावर्ती क्षेत्रों में घुसते हैं या फिर सीमा पर ही शिविर लगा कर बने रहते हैं.

1991-92 में दमन के दौर में करीब ढाई लाख रोहिंग्या बंगलादेश भाग गए थे. संयुक्त राष्ट्र, एमनैस्टी इंटरनैशनल जैसी संस्थाएं रोहिंग्या लोगों की नारकीय स्थितियों के लिए म्यांमार  की सरकारों को दोषी ठहराती रही हैं लेकिन सरकारों पर कोई असर नहीं पड़ता है. इन के मामले में म्यांमार की सेना ही क्या, देश में लोकतंत्र की स्थापना का श्रेय लेने वाली आंग सान सू की का भी मानना है कि रोहिंग्या लोग म्यांमार के नागरिक ही नहीं हैं.

आतंकी कनैक्शन

रोहिंग्या उग्रवादियों के रिश्ते पाकिस्तानी सैनिक गुप्तचर संगठन आईएसआई से भी रहे हैं. आईएसआई ने रोहिंग्या मुसलमानों को पाकिस्तान ले जा कर उन्हें अपने ट्रेनिंग कैंपों में उच्चस्तरीय सैनिक तथा गुरिल्ला युद्धशैली का प्रशिक्षण प्रदान किया. इस के बाद ये लड़ाई और भी हिंसक हो गई. पूरे देश में बौद्धों पर हमले होने लगे. यह अवसर उन्हें 1971 में पूर्वी पाकिस्तान के बंगलादेश के रूप में उदय के बाद फिर से मिला.

बचेखुचे जिहादियों में फिर छटपटाहट शुरू हुई और 1972 में जिहादी नेता जफ्फार ने रोहिंग्या लिबरेशन पार्टी (आरएलपी) बनाई और बिखरे जिहादियों को इकट्ठा करना शुरू किया. हथियार बंगलादेश से मिल गए और जिहाद फिर शुरू हो गया.

पश्चिम म्यांमार में हिंसा के चलते पिछले कुछ दिनों में हजारों लोग नौका से या पैदल बंगलादेश पहुंचे हैं. म्यांमार के सुरक्षा अधिकारी और अल्पसंख्यक रोहिंग्या के उग्रवादी एकदूसरे पर राखाइन प्रांत में गांवों को जला देने और अत्याचार करने का आरोप लगा रहे हैं. सेना ने कहा है कि करीब 400 लोग सशस्त्र संघर्ष में मारे गए हैं जिन में ज्यादातर उग्रवादी हैं. हिंसा के चलते बड़ी संख्या में लोग सीमा पार कर बंगलादेश पैदल चल कर पहुंच रहे हैं. इसलिए संयुक्त राष्ट्र उन्हें शरणार्थी मानता है मगर दूसरी तरफ म्यांमार इन्हें अपने देश का नागरिक ही नहीं मानता. वह इन्हें आतंकी मानता है.

कुछ समय पहले म्यांमार में रोहिंग्या विद्रोहियों के एक हमले में 90 लोगों की मौत हो गई. यह हमला राखाइन राज्य में हुआ. रोहिंग्या विद्रोहियों ने 30 पुलिस चौकियों और एक सैन्य अड्डे को निशाना बनाया. इस के बाद हुई जवाबी कार्यवाही में 98 लोग मारे गए जिन में 12 सुरक्षाकर्मी हैं. सेना का कहना है कि इस हमले में 1,000 से ज्यादा रोहिंग्या विद्रोही शामिल हो सकते हैं.

बौद्ध बनाम मुसलिम

2012 में म्यांमार में बौद्धों और रोहिंग्या मुसलिमों के बीच सांप्रदायिक दंगे हुए थे. पिछले साल अक्तूबर में भी राखाइन प्रांत में उग्र संघर्ष हुआ. इस के बाद म्यांमार सेना की कार्यवाही में करीब 87 हजार रोहिंग्या मुसलमानों को बंगलादेश भागने के लिए मजबूर होना पड़ा था. संयुक्त राष्ट्र संघ ने सेना की इस कार्यवाही को मानवता के खिलाफ अपराध बताया था.

म्यांमार में पहले मामला सरकार-सेना और रोहिंग्याओं के बीच था मगर जब से बौद्ध भिक्षु रोहिंग्याओं के खिलाफ उतर आए हैं तब से मामला बौद्ध बनाम मुसलिम का हो गया है. म्यांमार के रोहिंग्या विरोधी अभियान की बागडोर उग्रवादी बौद्ध संगठनों और उन के सूत्रधार बौद्ध भिक्षुओं के हाथों में है. बौद्ध भिक्षुओं का नाम आता है तो लगता है कोई धीरगंभीर, सरल, सीधा साधुमहात्मा होगा. बोलता होगा तो मुख से हर वक्त शांति, प्रेम और सद्भाव की बातें झरती होंगी. मगर म्यांमार के बौद्ध भिक्षु अशीन विराथू, पर ये सब बातें लागू नहीं होतीं. वे जहर उगलते हैं. इसलिए यह सवाल उठ रहा है कि बौद्ध भिक्षु शांति और अहिंसा के बजाय क्रांति पर क्यों उतर आए हैं. क्यों वे मुसलमानों के खिलाफ आग उगल रहे हैं?

कई लोगों को समझ नहीं आ रहा है कि इतना सहिष्णु और अहिंसक बौद्ध धर्म अचानक से क्यों गुस्से में है. कारण यह है कि यहां के बौद्ध और बौद्ध भिक्षु बौद्धबहुल देशों में बढ़ते इसलामी विस्तारवाद के खिलाफ हैं. इन का मानना है, एक समय था जब संपूर्ण एशिया में बौद्ध धर्म सत्ता के शिखर पर था. लेकिन इसलाम के उदय के बाद बौद्ध धर्म  ने दक्षिण एशिया के बहुत से राष्ट्र खो दिए.

विराथू कहते हैं कि उन का धर्म खतरे में है. उन का कहना है, ‘‘इसलाम पहले ही इंडोनेशिया, मलयेशिया, अफगानिस्तान और पाकिस्तान को जीत चुका है. ये सब बौद्ध देश थे. इसी तरह इसलाम दूसरे बौद्ध देशों को भी जीत सकता है.’’ ये शिकायतें उन्हें मुसलिमविरोधी बनाती हैं. वे नहीं चाहते कि यह इतिहास उन के देश में दोहराया जाए, इसलिए वे मुसलिम विरोधी अभियान छेडे़ हुए हैं.

इन बौद्ध भिक्षुओं में सब से चर्चित और उग्र है म्यांमार के अशीन विराथू. कोई उन्हें आग उगलता बौद्ध भिक्षु कहता है तो कोई बौद्ध आतंकवाद का चेहरा तो कोई बौद्ध बिन लादेन. म्यांमार में जब रोहिंग्या अलगाववाद ने उग्ररूप ले लिया तो पूरे देश में बौद्धों पर हमले होने लगे. ऐसे में सामने आए मांडले के बौद्ध भिक्षु अशीन विराथू, जिन्होंने अपने प्रभावशाली भाषणों से जनता को यह एहसास कराया कि यदि अब भी वह नहीं जागी तो उस का अस्तित्व ही मिट जाएगा.

अशीन विराथू चर्चा में तब आए जब वे 2001 में कट्टर राष्ट्रवादी और मुसलिम विरोधी संगठन ‘969’ के साथ जुड़े. वे अब इस के संरक्षक हैं. यह संगठन बौद्ध समुदाय के लोगों से अपने ही समुदाय के लोगों से खरीदारी करने, उन्हें ही संपत्ति बेचने और अपने ही धर्म में शादी करने की बात करता है. ‘969’ के समर्थकों का कहना है कि यह पूरी तरह से आत्मरक्षा के लिए बनाया गया संगठन है जिसे बौद्ध संस्कृति और पहचान को बचाने के लिए बनाया गया है.

विराथू भाषणों में जहर उगलते हैं. कई बार उन के भाषणों से ही दंगेफसाद हो जाते हैं. उन के निशाने पर रहते हैं रोहिंग्या मुसलमान. विराथू की शोहरत 2013 में टाइम मैगजीन तक पहुंच गई. मैगजीन के फ्रंट पेज पर उन की तसवीर छपी. हैडिंग  थी, ‘बुद्धिस्ट आतंकवाद का चेहरा.’ उन्होंने बौद्धों से साफ कहा कि यदि हमें अपना अस्तित्व बचाना है तो अब शांत रहने का समय नहीं रहा. देश से बौद्धों का सफाया हो जाएगा और बर्मा एक मुसलिम देश हो जाएगा.

मुसलिमों के खिलाफ आग उगलने वाले विराथू का कहना है कि मुसलिम अल्पसंख्यक बौद्ध लड़कियों को फंसा कर शादियां कर रहे हैं और बड़ी संख्या में बच्चे पैदा कर के पूरे देश की जनसंख्या संतुलन को बिगाड़ने के मिशन में दिनरात लगे हुए हैं. जिन से बर्मा की आंतरिक सुरक्षा को भारी खतरा उत्पन्न हो गया है.

विराथू ने अपने देश से हजारों  मुसलमानों को भागने पर मजबूर कर दिया. मंडाले के अपने मासोयिन मठ से लगभग 2,500 भिक्षुओं की अगुआई करने वाले विराथू के फेसबुक पेज पर हजारों फौलोअर्स हैं. उन के उपदेशों में वैमनस्यता की बात होती है और उन का निशाना मुसलिम समुदाय ही होता है, खासकर रोहिंग्या लोग. उन्होंने ऐसी रैलियों का भी नेतृत्व किया जिन में रोहिंग्या मुसलमानों को किसी तीसरे देश में भेजने की बात कही गई.

म्यांमार के अधिकांश बौद्ध आत्मरक्षा के लिए अब हिंसक तौरतरीका अपनाने में कोई परहेज नहीं कर रहे हैं. विराथू उन्हें बतला रहे हैं कि यदि हम आज कमजोर पड़े तो अपने ही देश में शरणार्थी हो जाएंगे. वैसे, बहुत सारे जानकार कहते हैं कि राखाइन में भले ही मुसलमान काफी हों मगर पूरे म्यांमार में केवल 5 प्रतिशत ही मुसलमान हैं, इसलिए विराथू बिना वजह हल्ला मचा रहे हैं.

घुसपैठ की समस्या

म्यांमार के ये विवादित और हिंसक रोहिंग्या मुसलिम पिछले कुछ दिनों से भारत में भी घुसपैठ करने के कारण विवादों में आ गए हैं. भारत में बंगलादेशी घुसपैठियों की समस्या अभी सुलझी नहीं है कि अब रोहिंग्या मुसलिमों का मुद्दा उभर रहा है.

कुछ समय पहले गृह मंत्रालय के वरिष्ठ अफसरों के मुताबिक फौरेनर्स ऐक्ट के तहत इन लोगों की पहचान कर इन्हें वापस भेजा जाएगा. बौद्धबहुल देश म्यामांर में जारी हिंसा के बाद से अब तक करीब 40 हजार रोहिंग्या मुसलिम भारत में आ कर शरण ले चुके हैं. ये लोग समुद्र, बंगलादेश और म्यामांर सीमा से लगे इलाकों के जरिए भारत में घुसपैठ करते हैं. बंगलादेश में फिलहाल 3 लाख रोहिंग्या शरणार्थी रह रहे हैं. अनुमान है कि रोहिंग्या शरणार्थी असम, पश्चिम बंगाल, केरल, आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश, दिल्ली और जम्मूकश्मीर सहित भारत के विभिन्न हिस्सों में रह रहे हैं.

अकेले जम्मू में ही 6 हजार की संख्या में रोहिंग्या शरणार्थी बसे हुए हैं. हालांकि मंत्रालय का मानना है कि सही से गिनती की जाएगी तो यह संख्या 10 से 11 हजार तक की हो सकती है.

पिछले दिनों केंद्रीय गृह सचिव की अध्यक्षता में हुई मीटिंग में भारत में अवैध रूप से बसे रोहिंग्या मुसलिमों की पहचान, गिरफ्तारी और उन्हें देश से बाहर भेजने पर काम करने की रणनीति पर चर्चा की गई. सरकार का यह फैसला महत्त्वपूर्ण है. यदि देश में इसी तरह अवैध घुसपैठिए आ कर बसते रहे तो यह देश धर्मशाला बन जाएगा और इस से देरसवेर सांप्रदायिक तनाव पैदा होगा.

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार संगठन के आंकड़ों के मुताबिक, फिलहाल देश में 14 हजार रोहिंग्या मुसलिम शरणार्थी रहते हैं. इस पर सरकार का कहना है कि वह संयुक्त राष्ट्र की ओर से इन्हें शरणार्थी कहे जाने की बात के साथ नहीं है और इन्हें देश में घुसे अवैध लोगों के तौर पर देखती है. ऐसे में फौरेनर्स ऐक्ट के तहत सरकार इन्हें हिरासत में लेने, गिरफ्तार करने, सजा देने और प्रत्यर्पण करने का अधिकार रखती है.

रोहिंग्या मुसलिमों को वापस म्यांमार भेजने की योजना पर केंद्र सरकार ने 16 पन्नों का हलफनामा दायर किया है. इस हलफनामे में केंद्र ने कहा कि कुछ रोहिंग्या शरणार्थियों के पाकिस्तान स्थित आतंकी संगठनों से संपर्क का पता चला है. ऐसे में ये राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से खतरा साबित हो सकते हैं.

भले ही केंद्र सरकार इन लोगों को देश से बाहर निकालने का प्रस्ताव तैयार करने में जुटी है लेकिन यह आसान नहीं होगा. म्यांमार इन लोगों को आधिकारिक तौर पर अपना नागरिक नहीं मानता और इन्हें बंगाली करार देता है जबकि बंगलादेश भी इन्हें अपना मानने को तैयार नहीं है.

इस बीच, प्रधानमंत्री शेख हसीना ने संयुक्त राष्ट्र में कहा कि रोहिंग्या लोग स्वदेश लौट नहीं पाएं, इस के लिए म्यांमार ने सीमा पर बारूदी सुरंगें बिछा दी हैं.

शरणार्थी मुद्दा

रोहिंग्या मुसलिमों को शरण देना भारतीय राजनीति में एक अहम राजनीतिक मुद्दा बन गया है. अफसोस की बात है कि रोहिंग्या लोगों के दुखदर्द की कहानी को घुमा कर दुनिया में मुसलमानों पर हो रहे जुल्म की कहानी के रूप में पेश किया जा रहा है और इस का इस्तेमाल मुसलिम नौजवानों के मन में यह बात बैठाने के लिए हो रहा है कि मुसलमान सताए जा रहे हैं.

दूसरी तरफ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी आरएसएस की अखिल भारतीय कार्यकारिणी के सदस्य इंदे्रश कुमार ने रोहिंग्या मुसलमानों को भारत में शरण देने के मुद्दे पर कहा कि ये अराजकतावादी और अपराधी हैं. इन्हें कोई भी देश अपनाने को तैयार नहीं है.

म्यामांर में हिंसा के चलते बंगलादेश पलायन करने वाले रोहिंग्या शरणार्थियों की संख्या 1 लाख 23 हजार है. हजारों की संख्या में लोग हर दिन जंगलों और धान के खेतों से होते हुए बंगलादेश में सुरक्षित पहुंच रहे हैं. अन्य लोग दोनों देशों के बीच स्थित नदियों को पार कर रहे हैं. हालांकि, इस कोशिश में कई लोग डूब भी गए हैं.

रोहिंग्या समुदाय का ताजा पलायन 25 अगस्त को शुरू हुआ जब रोहिंग्या उग्रवादियों ने म्यामांर की पुलिस चौकियों पर हमला किया, जिस के बाद सुरक्षा बलों को इस के जवाब में अभियान चलाना पड़ा. म्यांमार में साल 2002 में हुई हिंसा के बाद 1 लाख से अधिक रोहिंग्या बंगलादेश के शिविरों में रहने को मजबूर हैं.

केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने रोहिंग्या मुसलमानों को ले कर केंद्र सरकार का रुख साफ कर दिया है. उन्होंने कहा कि किसी भी रोहिंग्या को भारत में शरण नहीं मिलेगी. म्यांमार से घुसे लोग शरणार्थी नहीं हैं. रोहिंग्याओं के मुद्दे पर म्यांमार से बात हुई है. म्यांमार इन्हें वापस लेने को तैयार है. रोहिंग्या देश की सुरक्षा के लिए खतरा हैं. उन्होंने कहा कि इन में से कुछ लोगों के आतंकवाद से जुड़ने के सुबूत मिले हैं. भारत यदि रोहिंग्या को वापस भेजे जाने की बात करता है तो लोगों को आपत्ति क्यों है?

गृह मंत्री की उक्त बात में कुछ दम है. आज दुनिया की हालत ऐसी है कि कई देशों से शरणार्थी आ सकते हैं. यदि सब के लिए दरवाजे खोल दिए जाएं तो देश धर्मशाला बन जाएगा. देश में कई तरह के तनाव पैदा हो सकते हैं. सो, मानवीयता के नाम पर देश अपनी सुरक्षा से खिलवाड़ नहीं कर सकता.

दिशा पाटनी का हौट फोटोशूट हुआ वायरल

टाइगर श्रौफ की दोस्त और उनकी अगली फिल्म ‘बागी-2’ की हीरोइन दिशा पाटनी कुछ भी करती हैं तो वह वायरल हो जाता है. हाल ही में उन्होंने एक फोटोशूट करवाया है, और उसकी वीडियो भी वायरल हो गया है. दिशा हमेशा की तरह ग्लैमरस अंदाज में नजर आ रही हैं, बहुत ही सुंदर भी लग रही हैं. उन्होंने अपने फोटोशूट का वीडियो इंस्टाग्राम पर पोस्ट किया है.

हालांकि इन दिनों वे कई ब्रांड्स के लिए शूट कर रही हैं, और वे अपने इन ब्रांड प्रमोशन के वीडियो और तस्वीरें अपने इंस्टाग्राम एकाउंट पर जमकर शेयर भी कर रही हैं. बेशक फिल्मों में अभी तक वे कोई बड़ी करिश्मा नहीं कर सकी हों लेकिन सोशल मीडिया पर वे अपना जादू बनाए हुए हैं.

🎬BTS from the @maxim.india Covershoot!

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दिशा पाटनी हौलीवुड स्टार जैकी चैन के साथ ‘कुंग फू योगा’ और सुशांत सिंह राजपूत के साथ एम एस धोनी की बायोपिक में नजर आ चुकी हैं. इन दिनों वे बागी-2 की शूटिंग को भी अंजाम दे रही है. हाल ही में फिल्म का पहला शेड्यूल खत्म हुआ था. यही नहीं, दिशा के हाथ साउथ का एक बड़ा प्रोजेक्ट भी लग चुका है.

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वे तमिल में बन रही ऐतिहासिक फिल्म ‘संघमित्रा’ में लीड रोल में नजर आएंगी. बेशक वे सोशल मीडिया के जरिये सुर्खियां बटोर रही हैं लेकिन आने वाले समय उनके इन प्रोजेक्ट्स पर नजर रहेगी, और यह देखना दिलचस्प होगा कि वे नए दौर की हीरोइनों में किस तरह अपना स्पेस बनाती हैं.

As soon as the camera goes off “reality” 🙈🤪🤣

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दिशा पाटनी अपनी हौट तस्वीरों को लेकर अक्सर ट्रोल की जाती हैं. इस बार भी फैन्स ने उन्हें नहीं बख्शा. कुछ यूजर्स ने उन्हें साड़ी पहनने की सलाह दे डाली तो कुछ ने लिखा कि पूरे कपड़ों में ज्यादा खूबसूरत लगती हो.

कानून का बेजा इस्तेमाल करती औरतें

2013 में एक औरत आदमी मिले और उन्होंने शादी करने का फैसला कर लिया. फिर लगता है कुछ मनमुटाव हो गया तो औरत ने शिकायत दर्ज करा दी कि 18 जनवरी, 2014 को उस आदमी ने अपने 2 अन्य साथियों के साथ उसे नशीला पेय पिला कर रेप किया था.

कानूनी मशीनरी तो चल पड़ी. केस दर्ज होने के बाद वह बंदूक की गोली की तरह होता है, जो चलता रहता है. लेकिन जब शिकायती की जिरह हुई तो वह मुकर गई कि उस के साथ रेप हुआ था. वास्तव में उस ने तो 21 फरवरी, 2014 को उसी आदमी के साथ अदालती शादी भी कर ली थी.

अभियुक्त बेचारा कहता रहा कि ऐसी कोई बात हुई ही नहीं जिस में उस पर बलात्कार का आरोप लगे पर अदालत को मामले को बंद करने में भी 3 साल और लग गए. अक्तूबर, 2017 में सत्र न्यायाधीश ने मामला बंद करते हुए शिकायती औरत के खिलाफ मुकदमा दायर करने का आदेश दे दिया कि झूठी शिकायत क्यों की गई.

रेप के असली मामले तो छिपे रहते हैं. बलात्कार के नाम पर जो भी मामले सामने आते हैं उन में अधिकांश बदले की भावना के

होते हैं. ज्यादातर झूठे होते हैं और उन में अभियुक्त वर्षों जेल में सड़ता है और लाखों वकीलों पर खर्च करता है.

कानून का जैसा दुरुपयोग बलात्कार के मामले में हो रहा है वैसा अन्य किसी मामले में कहीं और नहीं हो रहा होगा. यह जघन्य अपराध है, जिस में कपटी बच निकलते हैं और कपटनियां सीना तान लेती हैं.

मेवाड़ राजघराने के लिए रखी गई ‘पद्मावती’ की स्पेशल स्क्रीनिंग

संजय लीला भंसाली की फिल्म ‘पद्मावती’ शूटिंग के वक्त से ही विवादों में रही है और जैसे-जैसे फिल्म की रिलीज डेट नजदीक आई वैसे वैसे विवाद गहराता गया. फिर सेंसर बोर्ड से सर्टिफिकेट न मिलने के कारण फिल्म की रिलीज डेट टाल दी गई. लेकिन अब ‘पद्मावती’ की रिलीज को लेकर एक बार फिर से नए सिरे से कवायद शुरू हो गई है. खबरों के मुताबिक, 27 दिसंबर को मुंबई में ‘पद्मावती’ की स्पेशल स्क्रीनिंग हो सकती है. इस स्क्रीनिंग में मेवाड़ राजघराने को फिल्म ‘पद्मावती’ दिखाई जाएगी.

बता दें कि कई राजपूत संगठनों ने फिल्म के निर्माता-निर्देशक संजय लीला भंसाली पर आरोप लगाए हैं कि उन्होंने फिल्म में ऐतिहासिक तथ्यों के साथ छेड़छाड़ की है. दीपिका फिल्म में रानी पद्मावती की भूमिका निभा रही हैं. इस वजह से विरोध कर रहे लोगों ने दीपिका और संजय लीला भंसाली को जान से मारने की धमकी तक दे दी थी.

गौरतलब है कि ‘पद्मावती’ के 3डी संस्करण का प्रमाणन संबंधी आवेदन 28 नवंबर 2017 को सीबीएफसी के समक्ष प्रस्तुत किया गया था. फिल्म चलचित्र अधिनियम 1952, चलचित्र (प्रमाणन) नियमावली 1983 तथा उसके अंतर्गत बनाए गए दिशानिर्देशों के अनुसार प्रमाणन की प्रक्रिया से गुजरेगी. इस प्रमाणन प्रक्रिया के लिए 68 दिन की समय सीमा तय की गई है.

फिल्‍म की रिलीज को लेकर कयास लगाए जा रहे हैं कि ये 5 या 12 जनवरी को रिलीज हो सकती है. इससे पहले सरकार ने सोमवार को जानकारी दी थी कि केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफसी) ने अब तक फिल्म ‘पद्मावती’ को देश में सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए प्रमाणपत्र नहीं दिया है. अब देखना ये है कि आखिर यह फिल्म कब पर्दे पर आएगी और ‘पद्मावती’ के फैंस को इसे देखने के लिए और कितना इंतजार करना पड़ सकता है.

‘गरीब और पिछड़ा होना बुरा नहीं’

कुछ करगुजरने की इच्छा हो तो परिस्थिति कितनी भी कठिन हो, आप उसे कर ही लेते हैं, क्योंकि उस में होता है आप का आत्मविश्वास जो आप को आगे बढ़ने में मदद करता है. कुछ ऐसा ही कर दिखाया है मुंबई की ‘मिसेस मोस्ट ब्यूटीफुल बौडी’ की विनर डा. वर्षा शिंदे राणे ने, जो पिछड़े किसान परिवार की होने के बावजूद अपनी मंजिल पाने में समर्थ हुईं.

महाराष्ट्र के नांदेड़ की रहने वाली वर्षा 4 भाईबहनों में एक हैं. उन के लिए अवार्ड को पाना आसान नहीं था. 2 हजार प्रतिभागियों में से केवल 635 प्रतियोगी ही चुने गए थे. इस प्रतियोगिता का उद्देश्य फ्रैश टैलेंट को ग्लैमरवर्ल्ड में लाना था. प्रतियोगिता बहुत कठिन थी. वर्षा को तो यकीन नहीं हो रहा था कि उन्हें यह खिताब मिला है. टौप 10 में पहुंचने के बाद उन की चुनौती और अधिक बढ़ गई थी. अपने बारे में वे बताती हैं, ‘‘मैं और मेरी बहन बचपन से ही फैशन टीवी देखती थी. मैं छोटे से गांव नांदेड़ की हूं, पर मुझे फैशन बहुत पसंद था. मैं फिल्में बहुत देखती थी. हर शुक्रवार को जो भी नई फिल्म रिलीज होती थी, उसे देखती थी. मेरे अंदर बहुत पैशन था. 8वीं कक्षा में रहते हुए मुझे ‘बैस्ट स्माइल’ और ‘बैस्ट टीथ’ के पुरस्कार मिल चुके हैं.’’

वे आगे कहती हैं, ‘‘मेरे गांव में सिड्को की तरफ से बच्चों की हैल्थ जांच का एक अभियान चला था. सब से अच्छी हैल्थ वाले बच्चे को पुरस्कार दिया जाना था. उस दिन मैं स्कूल नहीं गई थी. मेरी एक सहेली ने मेरे नाम का एक पास ले लिया. यह जांच रविवार को होने वाली थी. मैं वहां गई और फर्स्ट चुन ली गई. इस के बाद मुझे मुंबई के सभी शहरों में से ‘बैस्ट टीथ’ के लिए चुना गया. ऐसा करतेकरते मेरा झुकाव इस ओर होने लगा. फिर मैं ने ‘डेलीवुड मिसेज इंडिया 2017’ की प्रतियोगिता के लिए औनलाइन फौर्म भरा और इस में शामिल हुई व खिताब जीता.’’

किसान परिवार से होने की वजह से वर्षा को कई प्रकार की बातों का सामना करना पड़ा. वे बताती हैं, ‘‘मेरी क्लास की कुछ लड़कियां कहती थीं कि उन के मातापिता तो इंजीनियर, डाक्टर और बड़ी पोस्ट पर काम करते हैं, जबकि मैं एक किसान की लड़की होने पर भी अच्छेअच्छे कपड़े कैसे पहनती हूं. लेकिन, मैं ने उन्हें कोई जवाब नहीं दिया. क्योंकि मेरे मातापिता ने कभी भी मुझे एहसास नहीं होने दिया कि मैं साधारण हूं. उन्होंने मुझे हर तरह की आजादी दी और मैं अपने रंगरूप के हिसाब से अच्छेअच्छे कपड़े पहना करती थी.

‘‘मैं सोचती थी कि मैं कुछ अच्छा कर उन्हें खुशी दूंगी. 12वीं कक्षा पास करने के बाद मैं ने महाराष्ट्र के उद्रीर से आयुर्वेद में अपनी पढ़ाई पूरी की. उस दौरान तो केवल पढ़ाई में ही ध्यान दिया, लेकिन फिल्म देखने का शौक चलता रहा, क्योंकि मुझे फिल्मों से ही पहनावा, मेकअप, स्टाइल आदि का पता चलता था.’’

परिवार का सहयोग वर्षा को शुरू में नहीं मिला, क्योंकि परिवार वाले चाहते थे कि पढ़ाई पूरी कर वह अच्छी नौकरी करे. इसलिए उस ने कभी किसी से कुछ नहीं कहा. उसे डर था कि उस के मातापिता मौडलिंग के क्षेत्र में जाने से कहीं मना न कर दें. इसलिए पहली बार जिस दिन वे इवैंट में जाने वाली थीं, उस से एक दिन पहले उन्होंने मां को बताया कि उन्हें इवैंट में जाना है. मां ने थोड़े गुस्से के बाद, हां कर दी. लेकिन जब पुरस्कार मिला तो मातापिता दोनों खुश हो गए.

मौडलिंग की दुनिया के बारे में वर्षा का कहना है, ‘‘यहां काम मिलना मुश्किल होता है. साथ ही, महिलाओं के साथ इस इंडस्ट्री में शोषण भी अधिक होता है. हर विज्ञापन में महिला को दिखाया जाना बुरा नहीं है, लेकिन महिलाओं के बारे में लोगों की जो धारणा है, उसे बदलने की जरूरत है. डेलीवुड मिसेज इंडिया 2017 का खिताब जीतना मेरे लिए आसान नहीं था. बड़ेबड़े शहरों से कई महिलाएं आई थीं और वे काफी स्मार्ट भी थीं, लेकिन जब मेरा नाम आया तो मुझे खुद पर विश्वास नहीं हो रहा था.’’

वर्षा 4 साल के बच्चे की मां हैं. डिलीवरी के बाद उन्होंने स्वयं को फिट रखने के लिए काफी मेहनत की है. नियमित वर्कआउट करना, सही डाइट लेना आदि उन्होंने 1 साल तक किया है. वर्षा खुद एक डाक्टर हैं, इसलिए कब क्या खाना है, उन्हें पता है.

वे कहती हैं, ‘‘प्रैग्नैंसी के समय और डिलीवरी के बाद शरीर में कई बदलाव आते हैं. मैं ने डिलीवरी के बाद जिम जौइन किया, अपने लिए डाइट प्लान किया, इस से मैं अपने वजन को कंट्रोल कर पाई. इस के अलावा मैं ग्रीन टी, कम तेल वाला खाना खाती हूं.’’

मौडलिंग का अपना काम वर्षा अपने बच्चे के हिसाब से करती हैं. बच्चे की देखभाल उन की प्राथमिकता है. वर्षा का मानना है कि परिवार साथ हो तो महिला हर काम कर सकती है. वे एक नामचीन मौडल और ऐक्टर बनने की इच्छा रखती हैं.

डाक्टरी की पढ़ाई करने के बावजूद वर्षा का मौडल बनने का सपना कभी कम नहीं हुआ. वे प्रियंका चोपड़ा, ट्विंकल खन्ना, अक्षय कुमार को बहुत पसंद करती हैं. ट्विंकल खन्ना के ट्वीट्स वे रोज पढ़ती हैं. वे मौडलिंग के अलावा मराठी और हिंदी फिल्मों में काम करने की भी इच्छा रखती हैं.

 

वर्षा ने 21 दिसंबर, 2011 को डा. तुषार राणे से शादी की. उन की शादी अरेंज्ड थी. उन के पति कभी उन्हें किसी काम के लिए मना नहीं करते हैं, बल्कि हर काम में उन का साथ देते हैं.

वर्षा फैशनेबल हैं और हमेशा ब्रैंडेड कपड़े पहनना पसंद करती हैं. वे कहती हैं, ‘‘फैशन तो मैं ने स्कूल से ही शुरू कर दिया था. मुझे जो भी कपड़े पसंद आते थे, मैं बाजार से खरीद लाती थी. अब तो और भी नएनए फैशन को फौलो करती हूं. शौपिंग करने का मुझे बहुत शौक है. टैं्रडी चीजें बहुत खरीदती हूं. मैं फूडी हूं और हर तरह के फूड ट्राई करती हूं. समय मिले तो खाना भी बनाती हूं.’’

मौडलिंग के अलावा वर्षा को ट्रैवलिंग का शौक है. वे वर्ल्ड टूर कर हर जगह की संस्कृति से परिचित होना चाहती हैं. मराठी फिल्मों में वर्षा श्रेयस तलपडे़ और हिंदी में अक्षय कुमार के साथ अभिनय करने की इच्छा रखती हैं.

महिलाओं से उन का कहना है कि महिलाएं हर काम को शादी के बाद भी कर सकती हैं. उन्हें कभी यह नहीं सोचना चाहिए कि शादी के बाद सब खत्म हो गया है. अपने जीवन को अपने हिसाब से जीने में ही मजा है.

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