नोट न्योछारने पर दोहरापन

यह एक इंस्पैक्टर की कमजोरी या छिछोरापन नहीं, बल्कि डांस की खूबी और डांसर की अदाएं थीं, जो उस ने मजबूर व मदहोश हो कर डांसर पर रुपए न्योछावर करते हुए लुटा दिए.

यह वाकिआ 10 अप्रैल, 2016 को भिंड, मध्य प्रदेश में हुआ, जहां शहर में व्यापार मेला लगा हुआ था.

मेले में फिल्मी गानों की धुनों पर डांसर जब थिरकने लगीं, तो लड़कों ने जम कर डांस का लुत्फ उठाया. जिन की जेब में नोट थे, उन्होंने दांतों में दबा कर खूब नोट उड़ाए.

इन में से एक था इंस्पैक्टर कुशल सिंह भदौरिया, जिस की ड्यूटी इस मेले में लगी थी. दूसरे लोगों की तरह वह इंस्पैक्टर भी नाच में ऐसे डूबा कि जेब से निकाल कर नोट उड़ाने लगा और मंच पर जा कर गाना भी गाया.

एक इंस्पैक्टर के नाचने वालियों पर नोट उड़ाने की बात आम हुई, तो दूसरे दिन उसे लाइन हाजिर कर दिया गया.

क्या यह कोई गुनाह था? इस सवाल का जवाब शायद ही कोई हां में दे. वजह, यह एक शौक है. फर्क इतना है कि इसे ड्यूटी के दौरान पूरा किया गया, जिसे पुलिस महकमे की साख पर बट्टा लगा माना गया.

यही इंस्पैक्टर ड्यूटी के दौरान कहीं सत्यनारायण की कथा या सुंदरकांड के पाठ में जा कर पंडित को न्योछावर के रुपए देता, तो लोग उस की तारीफ करते नहीं थकते.

यह दोहरापन क्यों

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न्योछावर का रिवाज बहुत पुराना है और यह धार्मिक जलसों से ही पैदा हुआ है. हर मांगलिक यानी शुभ काम में लोग पैसे न्योछारते हैं. शादी हो रही हो, तो दूल्हादुलहन के सिर पर दोनों पक्षों के घर वाले पैसे न्योछावर करते हैं और पंडित समेत छोटी जाति वाले को देते हैं.

ऐसा माना जाता है कि जिस किसी को आप चाहते हैं, अगर उस के सिर पर से 3 बार कुछ रुपए घुमा कर पंडित या किसी गरीब को दे दो, तो उस शख्स का बुरा नहीं होता.

शादीब्याह में लंबे रीतिरिवाजों की एक वजह यह भी है कि इस की हर रस्म में पैसे न्योछारे जाते हैं, जिस का एक बड़ा हिस्सा पंडितजी की जेब में जाता है.

बच्चे का जन्मदिन हो तो न्योछावर, दूसरा कोई धार्मिक जलसा हो तो न्योछावर, घर में किन्नर आएं तो न्योछावर. गृह प्रवेश हो तो भी न्योछावर का रिवाज है.

लेकिन यही न्योछावर अगर नाचने वाली लड़कियों को दे दी जाए, तो देखने वालों को डांस में बेहूदगी नजर आने लगती है.

ये डांसर देखने वालों का तो भरपूर मनोरंजन करती हैं और उन्हें डांस सीखने में मेहनत भी खूब लगती है, पर पूजापाठ में पंडित रटेरटाए मंत्र पढ़ता है और यजमान की सलामती के नाम पर खूब न्योछावर बटोरता रहता है. इस पर किसी को कोई एतराज नहीं होता.

डांस और पूजा में फर्क हो सकता है, पर इन दोनों में ही पैसों के नजरिए से कोई फर्क नहीं होता. डांस देख कर लोग अपने गम और परेशानियां भूलते हुए खुश हो कर न्योछावर करते हैं और पूजापाठ और खुशी के दूसरे मौकों पर कोई अनहोनी न हो, इस के एवज में न्योछावर करते हैं.

लेकिन पैसा डांसर की जेब में जाता है, तो कइयों के पेट में मरोड़ उठने लगती है. उन्हें समाज, संस्कृति और धर्म की चिंता सताने लगती है, इसलिए वे तरहतरह की दुहाई देते हुए इस में बेहूदगी ढूंढ़ने और साबित करने लगते हैं.

जाहिर है, खोट लोगों की नजर में है, जिस के जिम्मेदार वे लोग हैं, जो चाहते हैं कि न्योछावर का पैसा सिर्फ पंडों की जेब में जाए.

जिस का पैसा उस का हक

पुराने जमाने में मुजरे इफरात से होते थे, जिन में पैसे वाले जमींदार, नवाब वगैरह नाचने वाली औरतों को खूब न्योछावर देते थे, इसलिए उन्हें ऐयाश कहा जाता था. वही लोग सुबह जब नहाधो कर धोतीकुरता पहन कर अपने माथे पर तिलक लगा कर मंदिर मेें पैसा चढ़ाते थे, तो देवता और दानवीर नजर आने लगते थे.

वे लोग इस बात की जरा भी परवाह नहीं करते थे कि कौन इन के बारे में क्या कह रहा है. वे अपने पैसे का मरजी से इस्तेमाल करते थे.

आजकल हर किसी की जेब में पैसा है, इसलिए यह हक भी उसे है कि वह पैसों को कैसे खर्च करे या लुटाए. जिस मेले में नाच हो रहा होता है, वहां का माहौल देखने के काबिल होता है.

जब डांसर ठुमके लगाती हैं, हुस्न के जलवे बिखेरती हैं और नैनों से बाण मारती हैं, तो देखने वालों का हाथ अपनी जेब की तरफ चला ही जाता है. उन की नीयत में खोट नहीं होता, बल्कि दिल में खुशी होती है, जिस के चलते वे न्योछावर करने से कतराते नहीं.

पूजापाठ और धार्मिक जलसों की तरह ही नाचनागाना कोई अपराध नहीं है. भिंड के व्यापार मेले में डांस का प्रोग्राम किसी कानून को नहीं तोड़ रहा था, न ही इंस्पैक्टर समेत दूसरे नौजवानों या बूढ़ों ने अपने पैसे लुटा कर कोई कानून तोड़ा था. यह तो साफ दिख रहा है कि वे अपनी खुशी का इजहार कर रहे थे. फिर एक को ही सजा क्यों? क्या इसलिए कि वह सरकारी मुलाजिम था और ड्यूटी पर था?

शान की बात है न्योछावर

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आज भी गांवदेहातों में रईस आदमी वही माना जाता है, जो डांसरों पर ज्यादा पैसे लुटाता है. अब यही डांस शहरों में आ कर हाट बाजारों और मेलों में दिखने लगा है, जहां जातपांत या अमीरीगरीबी नहीं चलती. कोई भी अपनी मरजी से डांसर पर पैसा न्योछावर कर सकता है, तो इसे गुनाह या ओछा काम मानना डांसर के पेशे और हक पर डाका डालने जैसी बात है.

डांस एक हुनर है. इस में डांसर को हाड़तोड़ मेहनत करनी पड़ती है, तभी तो वे देखने वालों को लुभा पाती हैं. इस पर भी दिक्कत यह कि जब तक जवानी है, तभी तक ही डांस और उस से मिलने वाली न्योछावर है.

इसी न्योछावर से कई घरों के चूल्हे जलते हैं, बच्चे स्कूल जा पाते हैं और डांसरों और उन के घर वालों की दूसरी जरूरतें पूरी हो पाती हैं. कई जातियां तो डांस की वजह से ही जानी जाती हैं.

इस दोहरेपन का मकसद ही गरीबों और छोटी जाति वाली लड़कियों के पेट पर लात मारना है, इसलिए मेलोें, हाट बाजारों और डांस बारों में होने वाले डांस को बेहूदा कहते हुए हल्ला मचाया जाता है. इस के बाद भी लोग इन्हें देखने जाते हैं, तो यह उन की मन बहलाने की जरूरत है, जिस पर कोई लगाम नहीं कसी जा सकती.

कला के शौकीन और प्रेमी हर जगह हैं, फर्क उन की माली हैसियत का है. पर इस बिना पर किसी एक को बाजारू नचनिया व दूसरे को बड़ा कलाकार कहना भेदभाव करने जैसी ही बात है.

धर्म हटाओ औरत बचाओ

जैंडर वल्नेरैबिलिटी इंडैक्स एक अर्धसरकारी संस्था प्लान इंडिया ने बनाया है और इस में जीरो से 1 तक अंक दिए गए हैं. गोवा को 0.656 स्तर दिया गया है तो दिल्ली को 0.436, उत्तर प्रदेश को 0.434 और  बिहार को 0.410. जो सुरक्षित राज्य हैं वहां औरतों को आजादी भी है, उन के साथ हिंसा भी कम होती है और वहां लड़कालड़की में भेद भी कम है. अच्छे राज्यों में औरतें अपना मनपसंद साथी चुन सकती हैं और खराब राज्यों में ऐसा करने पर मारपीट व हत्या तक हो सकती है.

इस रिपोर्ट ने एक भेद का एक कारण जो नहीं बताया वह यह कि सुरक्षित राज्यों में धर्म का बोलबाला कम है और असुरक्षित राज्यों में ज्यादा. असुरक्षित राज्यों में धर्म के चाबुक से औरतों पर रातदिन प्रहार होते हैं. उन्हें घर में भी ढंग से जीने नहीं दिया जाता, क्योंकि यही तो धर्म कहता है.

जिस समाज में सोच ‘ढोल, गंवार, शूद्र, पशु, नारी सकल ताड़ना के अधिकारी’ पर टिकी हो और जहां रातदिन धार्मिक गुणगान करा जाता हो तथा धर्माधिकारी राज कर रहे हों वहां तो ऐसा होना स्वाभाविक ही है. तुलसीदास ने ही नहीं, हमारे यहां हर पूजे जाने वाले देवीदेवता को खंगालेंगे तो स्त्री प्रताड़ना का उदाहरण सामने आ जाएगा. जो भी समाज जब भी औरतों को केवल खिलौना या गुलाम समझेगा, ऐसा होना स्वाभाविक ही है. आज इसलाम औरतों को बहुत अंकुशों में बांध रहा है और वहां औरतें घरों में भी सुरक्षित नहीं हैं. पूरा पश्चिमी एशिया धर्म की लगाई आग में जल रहा है और अंगारे कभी यूरोप, कभी अमेरिका तो कभी भारत पर भी आ गिरते हैं.

जिन देशों में धर्म का जोर कम है वे बहुत उन्नति कर रहे हैं. चीन, जापान, कोरिया पर पश्चिमी देश कभी राज नहीं कर पाए जबकि भारत, पश्चिमी एशिया और अफ्रीका पर उन्होंने आसानी से राज कर लिया.

औरतों की सुरक्षा उन के सम्मान से आती है और जिस समाज में यह न हो वह कमजोर रहता है, अपने पैरों पर खड़ा नहीं रह सकता, आक्रमणकारी से लड़ नहीं सकता.

दिल्ली में धर्म का जोर दिखता नहीं है पर जितने मंदिर यहा हैं उतने शायद बड़ेबड़े राज्यों में भी नहीं होंगे. यहां जिस तरह का धार्मिक धंधा हर रातदिन चलता है उतना कहीं और न चलता होगा. दिल्ली की उन्नति का राज उस के निवासियों की मेहनत नहीं, यहां केंद्र सरकार की सीट होना है जो देश भर से टैक्स और रिश्वत का पैसा वसूलती है और दिल्ली के नेताओं, कर्मचारियों, व्यापारियों को देती है. औरतों को तो डेढ़ रत्ती के बराबर का नहीं पूछा जाता.

काश, कोई धर्म के पागलपन का इंडैक्स बनाए तो सरकारी ओहदे वाले ही नंबर-1 दिखेंगे जो हर मूर्ति के आगे सिर टेके रहते हैं. जब तक धर्म का बोलबाला रहेगा, औरतें असुरक्षित रहेंगी.

सोफिया हयात ने शेयर की अपने हनीमून की प्राइवेट तस्वीरें

मौडल से नन बन चुकी सोफिया हयात ने इंस्टाग्राम पर इन दिनों तहलका मचा रखा है. इंस्टाग्राम पर सोफिया के एक वीडियो के चलते उन्हें ट्रोल भी किया जा रहा है. दरअसल ‘बिग बौस’ की एक्स कंटेस्टेंट रह चुकीं सोफिया हयात इन दिनों पति व्लाद स्टैन्श्यू के साथ हनीमून मनाने में बिजी हैं.

दोनों मिस्र में अपना हनीमून इन्जौय कर रहे हैं. हाल ही में सोफिया ने अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर हनीमून की कुछ फोटोज शेयर की थीं जिसमें वो अपने पति के साथ मस्ती करती नजर आ रही हैं. सोफिया ने कुछ तस्वीरें तो ऐसी भी शेयर कीं जिसमें दोनों एक दूसरे के साथ कोजी होकर किस करते भी नजर आ रहे हैं. कभी होटल रूम में तो कभी बीच पर खींची गईं तस्वीरें सोशल मीडिया पर धूम मचा रही हैं.

Beach..my baby..and the sea! Honeymoon day 1

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मिस्र में हनीमून एंज्वौय कर रही सोफिया ने इंस्टाग्राम पर एक वीडियो भी पोस्ट किया है. सोफिया ने इस वीडियो के कैप्शन में लिखा है कि चलिए कंडोम पर बात करते हैं. इस वीडियो के लिए उन्हें ट्रोल भी किया जा रहा है.

लोग लिख रहे हैं कि इस तरह से अपने प्राइवेट मोमेंट्स को पब्लिक के सामने लाना गलत है. वहीं बहुत से लोग ऐसे भी हैं जो सारी हदें पार करते हुए सोफिया पर निजी हमले कर रहे हैं और गालियां भी दे रहे हैं.

Let’s talk about condomns. Part 1 #honeymoon #condoms

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आपको बता दें कि सोफिया ने इसी साल 24 अप्रैल को हिन्दू रीति रिवाजो से लंदन में अपने बौयफ्रेंड व्लाद के साथ शादी की है. सोफिया एक पोस्ट में अपने पति को बेटा और पिता बता चुकी हैं.

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विरुष्का के बाद ‘हेट स्टोरी 2’ की एक्ट्रेस ने रचाई गुपचुप शादी

फिल्मी गलियारे अभी तक विरुष्का की गुपचुप शादी की चर्चाओं से ही सराबोर थे, ऐसे में इस साल के अन्त में बौलीवुड की एक और बोल्ड हीरोइन ने अपने फैंस से छुपकर शादी कर ली है. ये हीरोइन कोई और नहीं बल्कि टीवी और फिल्‍मों की दुनिया का जानामाना नाम एक्‍ट्रेस सुरवीन चावला हैं. एक्‍ट्रेस सुरवीन चावला ‘पार्च्‍ड’, ‘अगली’ और ‘हेट स्‍टोरी 2’ जैसी फिल्‍मों में काफी बोल्‍ड अवतार में नजर आ चुकी हैं.

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अभी तक सिंगल कहलाने वाली सुरवीर चावला ने सोशल मीडिया पर एक खूबसूरत तस्वीर पोस्ट करते हुए अपनी शादी की जानकारी फैंस को दी है.

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लाल जोड़े में पति के साथ खूबसूरत तस्वीर पोस्ट करते हुए सुरवीन ने लिखा, ‘एक साधारण सी जिंदगी के बीच में मेरी कहानी भी किसी परी से कम नहीं हैं. प्‍यार ने हमें एक परियों की सी कहानी दे दी है…’ अपने इस संदेश के साथ सुरवीन ने #Married और #GiveUsYourLove&Blessings जैसे हैशटैग भी शेयर किए हैं. सुरवीन चावला के इस एक ट्वीट ने सोशल मीडिया में अचानक से हलचल मचा दी है.

गुपचुप शादी की बात करें तो सेलिब्रिटीज में जैसे ये ट्रेंड सा बन गया है कि वो चुपचाप शादी कर लेते हैं और अचानक से सोशल मीडिया पर ये खबर देकर अपने फैंस को एक दम से चौका देते हैं.

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विरुष्का की शादी के बाद सुरवीन ऐसा करने वाली पहली सेलिब्रिटी नहीं हैं. इससे पहले एक्‍ट्रेस इलियाना डिक्रूज ने भी अपने ब्वायफ्रेंड को ‘हबी’ कहते हुए सोशल मीडिया पर टैग किया. जिसके बाद खबरें सामने आईं कि इलियाना ने भी चुपचाप शादी कर ली है. वहीं कपिल शर्मा की फिल्‍म ‘फिरंगी’ में नजर आईं एक्‍ट्रेस इशिता दत्ता ने भी एक्‍टर वत्‍सल सेठ से शादी कर ली और अब अचानक इस जोड़ी की शादी की फोटो सोशल मीडिया पर सामने आईं.

सुरवीन की 2013 में बिजनेसमैन अक्षय ठक्‍कर से एक मुलाकात हुई थी और जल्द ही दोनों में प्यार हो गया. सूत्रों के अनुसार दोनों ने 2015 में ही शादी कर ली थी, जिसमें सिर्फ परिवार वाले और उनके करीबी दोस्त ही शामिल हुए थे.

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सुरवीन ने टीवी से अपने करियर क शुरुआत की. उन्होंने 2003 से 2007 के बीच ‘कहीं तो होगा’ सीरियल में काम किया. उन्होंने एकता कपूर के शो ‘कसौटी जिंदगी की’ और ‘काजल’ में भी अभिनय किया है. सुरवीन ने बौलीवुड में पहली बार 2011 में ‘हम तुम शबाना’ से एंट्री की थी.

हिंदी फिल्मों के साथ उन्होंने पंजाबी, तमिल और तेलुगू फिल्मों में भी काम किया है. सुरवीन ने कई फिल्मों में स्पेशल डांस एपियरेंस भी दिए है, लेकिन उन्हें सबसे ज्यादा ‘हेट स्टोरी 2’ के बोल्ड रोल के लिए ही जाना जाता है. आपको बता दें कि सुरवीन जल्‍द ही एकता कपूर की वेब सीरीज ‘हक से’ में एक्‍टर राजीव खंडेलवाल के साथ नजर आने वाली हैं.

गहना वशिष्ठ का दावा, फिक्स है इस बार बिग बौस

अर्शी खान घर बिग बौस-11 से बाहर हो चुकी हैं और विकास गुप्ता की तारीफ करते थक नहीं रही हैं. मौडल और अर्शी खान की क्लासमेट रहीं गहना वशिष्ठ ने विकास गुप्ता पर आरोप लगाया है कि उसने अर्शी खान को घर से बाहर आकर शो देने का झांसा देकर जादू टोना किया है. मौडल-एक्टर ने कहा, “विकास धूर्त और मास्टरमाइंड है.

उसने अर्शी के एविक्शन को बहुत ही शातिर अंदाज में प्लान किया है, उसने अर्शी खान की हिना खान और शिल्पा शिंदे जैसी मजबूत दावेदारों के साथ दुश्मनी करवा दी. जब उसे यह बात समझ आ गई कि अर्शी, हिना खान और शिल्पा शिंदे से लड़ाई की वजह से उनके फैन्स का सपोर्ट खोने लगी हैं तो उन्होंने दूसरी राह पकड़ ली. विकास जानते थे कि शिल्पा और वे काफी मजबूत दावेदार हैं.”

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“कलर्स की क्रिएटिव टीम में विकास के कई दोस्त हैं. हो सकता है ये सारी बातें बिग बौस शुरू होने से पहले ही तय हो चुकी हो. मैं पहले दिन से कह रही हूं कि इस बार का बिग बौस फिक्स है. विकास, शिल्पा, प्रियांक और बंदगी एक दूसरे को पहले से जानते थे और सब को पता था कि वे शो में आने वाले हैं.

हिना खान को ही देखिए, उन्हें पूरा भरोसा है कि वे घर से बाहर नहीं होंगी. कल के एपिसोड में ही देखिए कि हिना लव के सामने दावा करती नजर आईं कि वे आखिर तक बाहर नहीं होंगी.” गहना का कहना एकदम सही भी है क्योंकि हिना ने लव को भी पहले ही बता दिया था कि वे 13 हफ्ते तक कहीं नहीं जा रहे हैं. ऐसा ही हुआ. कल वे 13वें हफ्ते में नौमिनेट हुए और खतरे में हैं.

“हिना, विकास और शिल्पा को पक्का है कि वे बाहर नहीं होंगे लेकिन उन्हें दूसरों को किसी तरह बाहर करना है. शिल्पा शिंदे और विकास गुप्ता की लड़ाई भी नकली थी, जिसके झांसे में घर के कई सदस्य आ गए. आकाश स्मार्ट था और वह उनकी इस प्लानिंग को बखूबी समझ गया और उनके चक्रव्यूह में नहीं फंसा.

विकास गुप्ता नए लोगों को निशाना बनाते हैं. मैं यह सब एपिसोड्स देखकर उनके विश्लेषण के बाद बता रही हूं. विकास गुप्ता ड्रैकुला हैं जो फ्रेशर कंटेस्टेंट्स को फांसते हैं और उनका खून पीते हैं और वे नए लोगों की बलि लेकर और ताकतवर होते जाते हैं.” इस तरह बिग बौस-11 के फिक्स होने का दावा काफी पुष्ट हो जाता है.

छेड़खानी बनी बड़ी परेशानी

‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ का नारा देना और बेटियों को समाज में सुरक्षा देना दोनों ही अलगअलग मुद्दे हैं. आज लड़कियां लड़कों के कंधे से कंधा मिला कर चल रही हैं. कई जगह तो वे हुनर में लड़कों से आगे हैं. पुरुषवादी समाज इस बात को स्वीकार करने को तैयार नहीं है.

रात में अकेले सफर करती लड़की हो या बाइक चलाती लड़की, देखने वाले इन को अलग नजरों से ही देखते हैं. हद तो तब हो गई जब 11 नवंबर को उत्तर प्रदेश के कानपुर के चंदारी स्टेशन के पास ट्रेन में छेड़खानी से परेशान हो कर एक महिला अपनी बेटी के साथ चलती ट्रेन से कूद गई. पढ़ाई से ले कर नौकरी करने की जरूरतों में होस्टल में रह रही लड़कियों को सहज, सुलभ मान लिया जाता है.

मजेदार बात यह है कि घरपरिवार, मकानमालिक, कालेज प्रबंधन और पुलिस तक से शिकायत करने पर गलत लोगों के खिलाफ कड़े कदम उठाए जाने के बजाय लड़कियों को नैतिक शिक्षा

दी जाने लगती है. यही वजह है कि छेड़खानी आज सब से बड़ी परेशानी बन कर उभर रही है. बहुत सारे कड़े कानूनों के बाद भी हालत सुधर नहीं रही है.

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वाराणसी के बीएचयू यानी बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में छेड़खानी की परेशानी को हल करना कुलपति प्रो. जी सी त्रिपाठी ने उचित नहीं समझा. छेड़खानी का विरोध कर रही लड़कियों पर ही लाठियां बरसा दी गईं. कुलपति से ले कर जिला प्रशासन, पुलिस, प्रदेश सरकार और केंद्र सरकार तक ने छेड़खानी के मुद्दे को दरकिनार कर घटना को राजनीतिक रंग देने का काम किया. इस के बाद भी सरकार और समाज के जिम्मेदार लोग कहते हैं कि लड़कियां छेड़खानी जैसे मसलों पर चुप क्यों रहती हैं, उन को शिकायत करनी चाहिए.

जिस लड़की ने बनारस में छेड़खानी का विरोध करने वाली लड़कियों की बात को दबाने के इन तरीकों को देखा होगा वे कभी दोबारा ऐसी आवाज को उठाने का साहस नहीं कर पाएंगी. बीएचयू के होस्टलों में रहने वाली लड़कियों को जिस तरह की प्रताड़ना का शिकार होना पड़ता है वैसे हालात कमोबेश कमज्यादा पूरे देश में हैं.

बहुत सारे उपायों के बाद भी हालात बदलते नहीं दिख रहे हैं. कालेजों के होस्टल में रहने वाली लड़कियों के मुकाबले घरों से पढ़ने वाली लड़कियों को ज्यादा अच्छा माना जाता है. किसी भी तरह की गलती के लिए होस्टल में रहने वाली लड़की को ही दोष दिया जाता है.

दूषित सामाजिक नजरिया

उत्तर प्रदेश में जब अखिलेश यादव की सरकार थी, छेड़खानी रोकने के लिए महिला हैल्पलाइन ‘वूमेन पावर लाइन 1090’ की शुरुआत की गई थी. यहां पर मोबाइल फोन नंबरों पर परेशान करने वाले के खिलाफ कार्यवाही की जाती थी. इस हैल्पलाइन नंबर पर भी धीरेधीरे संवेदनशीलता खत्म हो गई. कई बार शिकायत करने वाली लड़कियों को सलाह दी जाती थी कि वे अपना मोबाइल नंबर ही बदल लें. यह ठीक वैसी ही सलाह है जैसी कालेज में शिकायत करने वाली लड़की को वहां दी जाती है.

एक कालेज के होस्टल में रह रही दीपा कुमारी कहती है, ‘‘हमारे कमरों का दरवाजा सड़क के किनारे खुलता है. होस्टल में बाउंड्री बनी होने के बाद भी दूर खड़े लड़के गंदेगंदे इशारे करते हैं. कई बार वे सड़क किनारे हस्तमैथुन करते दिखते थे. यह बात जब हम ने अपने होस्टल में बताई तो हमारे कमरे की खिड़की को ही बंद करवा दिया गया. चेतावनी दी गई कि हम उधर देखेंगे तो सजा दी जाएगी, घर में मातापिता को चिट्ठी लिख दी जाएगी.’’

वूमेन पावर लाइन 1090 ने महिलाओं और लड़कियों के साथ हुई छेड़छाड़ की घटनाओं का अध्ययन करने के बाद पाया कि इस तरह के अपराध करने वालों में बड़ी उम्र के लोगों से ले कर घरपरिवार, दोस्त और नातेरिश्तेदार तक शामिल होते हैं. स्कूलकालेज में ही नहीं, घरपरिवारों में भी ऐसी घटनाओं से बचने के लिए लड़कियों पर ही अलगअलग तरह के प्रतिबंध लग जाते हैं.

गांवों में देखें तो अधिकतर लड़कियों की पढ़ाई इसलिए बंद करा दी जाती है कि उन के साथ ऐसी कोई घटना न घट सके. इसी डर की वजह से लड़कियों की कम उम्र में शादी तक कर दी जाती है.

समाजशास्त्री डाक्टर रीना राय कहती हैं, ‘‘जब हम ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ की बात करते हैं तो यह समझना चाहिए कि लड़कियों की भू्रणहत्या का बड़ा कारण उन की सुरक्षा होती है. लोगों को लगता है कि बेटी के साथ ऐसा कुछ हो गया तो समाज में नाक नीची हो जाएगी. इस कारण उन को पैदा ही मत होने दो. यह मुहिम तभी सफल हो सकती है जब लड़कियों को सामाजिक सुरक्षा दी जाए. छेड़छाड़ जैसी घटनाओं के होने पर लड़की को दोष न दिया जाए. इस तरह की घटनाएं होने पर बड़ेबड़े लोग लड़कियों के पहनावे, आचारविचार को ही दोष देते हैं. ऐसे में लड़कियों में डर और हीनभावना भर जाती है.

कई बार वे अपनी बात कह ही नहीं पातीं. इस का छेड़छाड़ करने वाले लाभ उठाते हैं. अगर लड़की अपनी परेशानी घटना के शुरू होने पर ही लोगों को बता दे तो इस को रोकना सरल हो जाता है. इस के लिए समाज और परिवार को लड़की का साथ देना होगा जिस से उस में साहस आ सके.’’

थाने में शिकायत करने पर लड़की को ही समझाया जाता है कि इस तरह की शिकायत से बदनामी होगी और उस की शादी होने में दिक्कत आएगी. ऐसे डर दिखाए जाते हैं. परेशानी की सब से बड़ी वजह यह है कि इस तरह की घटनाओं की शिकार लड़की को ही बदचलन मान लिया जाता है. यहां तक कि घर के लोग लड़की को साहस देने की जगह, उस को शक की नजर से देखने लगते हैं.

ऐसे में लड़की इस तरह की घटनाओं को बताने में संकोच करती है. वह तब तक ऐसी परेशानी छिपाती है जब तक छिपा सकती है. घटना छिपाने की यह प्रवृत्ति ऐसे अपराध करने वालों का साहस बढ़ाती है. इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रही निशा कहती है, ‘‘मेरे होस्टल में रहने को ले कर तमाम विरोध था. करीबी लोग ही कहते थे कि इस से मैं बिगड़ जाऊंगी. जब मैं अकेले सफर करती थी तो लोग ऐसे देखते थे जैसे मैं कोई अजूबा हूं.’’

गांव की हालत खराब

शहरों में रहने वाले परिवारों की सोच तो थोड़ा बदल भी रही है पर गांव में रहने वालों की सोच अभी भी वही है. रामपुर गांव में लड़कियों के लिए कक्षा 8 तक का ही स्कूल था. इस के बाद लड़कियों की पढ़ाई बंद करा दी जाती थी. हर जाति के परिवार अपनी लड़कियों के साथ वैसा ही व्यवहार करते थे. 1-2 परिवार ऐसे थे जिन के घरों में सुविधा थी. वे अपने घरों की लड़कियों को शहरों में रहने वाले अपने किसी रिश्तेदार के घर भेज देते थे.

दलित परिवार में रहने वाली मीना को पढ़ने का बहुत शौक था. उस के परिवार वाले भी चाहते थे कि मीना अपनी पढ़ाई पूरी करे. इस कारण वह अपने घर से 10 किलोमीटर दूर साइकिल से पढ़ने जाने लगी. इस बात को ले कर गांव के लोग तरहतरह के सवाल करने लगे. जब मीना अपनी पढ़ाई पूरी कर के नौकरी करने लगी तो लोगों ने उस की तारीफ करनी शुरू की.

होस्टल में रहने वाली लड़कियों को गांव में अच्छा नहीं माना जाता. जो परिवार अपनी लड़की का साथ भी देते हैं उन के लिए कहा जाता है कि वे अपनी लड़कियों को बिगाड़ रहे हैं.

यही वजह है कि आज भी गांव में लड़कियों की शादी जल्दी कर दी जाती है. आज के समय में गांव में शहरों की लड़कियां जा कर स्कूलों में नौकरी कर रही हैं. गांव की लड़कियों को वहां रोजीरोजगार इसलिए नहीं मिल रहा है क्योंकि वे अपनी पढ़ाई पूरी नहीं करतीं. उन की पढ़ाई केवल शादी होने तक ही होती है.

गांव की लड़कियों का शोषण अधिक होता है. धर्म के नाम पर सब से अधिक शोषण गांव की लड़कियों, औरतों का होता है. बाबाओं द्वारा इन औरतों को ही सब से अधिक निशाने पर रखा जाता है. यह सोचना पूरी तरह से गलत है कि पढ़ीलिखी लड़की बिगड़ सकती है. आज समय बदल रहा है. ऊंची पढ़ाई के लिए अब लड़कियों को शहर में जाने की जरूरत होती है.

छेड़छाड़ का सामना वैसे तो हर उम्र और आर्थिक स्तर की महिलाओं को करना पड़ता है लेकिन कामकाजी महिलाओं और होस्टल में रहने वाली लड़कियों को ले कर पुरुषों की मानसिकता ज्यादा दूषित होती है. सही मानो में लड़कियों को ज्यादा परेशानियों से मुकाबला करना होता है. जरूरत इस बात की होती है कि इन को समाज और घरपरिवार का पूरा साथ और सहयोग मिले.

कानून इन की हिफाजत करे. शिकायत होने पर इन को नैतिकता का पाठ पढ़ाने की जरूरत नहीं बल्कि कानून का पालन किए जाने की जरूरत होती है. गर्ल्स होस्टल को ले कर तमाम तरह की चटपटी बातें समाज में होती हैं. इन का प्रभाव लड़कों पर भी पड़ता है. ऐसे में लड़के यहां रहने वाली लड़कियों को आदर की नजर से नहीं देखते. इस वजह से छेड़छाड़ बढ़ती जा रही है. आज के समय में लड़कियों का होस्टल में रहना मजबूरी है. ऐसे में समाज को होस्टल में रहने वाली लड़कियों को ले कर सोच बदलनी होगी.

धार्मिक कहानियों का प्रभाव

आम जनमानस में धर्म और उस की कहानियों का बहुत प्र्रभाव पड़ता है. औरत को एक वस्तु के रूप में प्रयोग किया जाता रहा है. मर्द के गलत काम करने के बाद भी औरत को ही सजा मिलती थी. अहल्या और गौतम ऋषि का प्रकरण इस बात को सब से मजबूती से पेश करता है. इंद्र ने अहल्या के साथ छल किया. इस के बाद भी गौतम ऋषि ने अहल्या को पत्थर बनने का श्राप दे दिया. रामायण की कहानियों में सीता के उदाहरण को देखें तो अग्निपरीक्षा देने के बाद भी उन पर शक किया गया. राम को सच का पता था पर लोकलाज के कारण सीता को महल से बाहर कर दिया.

रामायण और महाभारत जैसे धार्मिक ग्रंथों में ऐसे तमाम उदाहरण हैं. जहां औरत पर ही लांछन लगता रहा है. मुगलकाल में जब राजा अपनी महिलाओं की रक्षा करने में असमर्थ रहे, तो सतीप्रथा और बालविवाह जैसे रिवाज ले आए.

धर्म में औरतों के लिए ही सारे प्रतिबंध बनाए गए. इसी तरह आज के समय में होस्टल को देखें तो लड़कों के लिए कोई नियमकानून नहीं है, लड़कियों के ऊपर ही तमाम तरह के प्रतिबंध लगाए जाते हैं.

राष्ट्रीय महिला आयोग की कार्यकारी अध्यक्ष रेखा शर्मा ने बताया कि बीएचयू में अब लड़के, लड़कियों के लिए छात्रावास में एकजैसे नियम होंगे. केवल एक जगह का ही यह मसला नहीं है, हर कालेज में अलगअलग व्यवहार होता है. इस को ले कर लड़कियां आवाज उठाती हैं, तो घर, परिवार और समाज उन की आवाज को दबा देते हैं.

बीएचयू में जिस छात्रा से छेड़छाड़ के मसले पर हंगामा हुआ, वह अपनी बात कहने के लिए राष्ट्रीय महिला आयोग की कार्यकारी अध्यक्ष रेखा शर्मा के सामने पेश ही नहीं हुई. इस तरह की घटनाओं से लड़कियों का मनोबल टूटता है. लड़कियां शिकायत करने से बचती हैं.

निजी होस्टल भी बुरी हालत में

केवल कालेज के होस्टल ही बुरी हालत में नहीं है, निजी होस्टल, जहां ज्यादातर कामकाजी महिलाएं रहती हैं, वहां भी बुरी हालत है.

नेहा कहती है, ‘‘हमारा कमरा ग्राउंडफ्लोर पर है. हम 2 लड़कियां साथ रहते हैं. हमारा बाथरूम गली के पास है. लड़कों ने मेरे बाथरूम का शीशा तोड़ दिया जिस से कि नहाते समय वे झांक सकें. जब हम ने यह बात मकानमालिक को बताई तो उन्होंने पुलिस में शिकायत करने की जगह पर खिड़की में लोहे की जाली लगवा दी.’’

नेहा के साथ रहने वाली राखी कहती है, ‘‘हम जिस औफिस में काम करते हैं वहां पर लड़के भी काम करते हैं. कभी औफिस की जरूरत से भी वे हम से मिलने चले आते हैं तो हमें उन को कमरे में बुलाने की इजाजत नहीं होती है. हमें बाहर ही खड़े रह कर बात करनी होती है.’’ इस तरह की परेशानियां कई और लड़कियों के सामने भी हैं.

पीजी के रूप में लखनऊ की गोमतीनगर कालोनी में रहने वाली शिखा कहती है, ‘‘हम जब बाजार जाते हैं तो लोग यह सोचते हैं कि होस्टल में रहने वाली लड़की है. आसानी से उपलब्ध हो सकती है. कई लोग तो इस चक्कर में इंप्रैस करने की कोशिश करते हैं. होस्टल वाली लड़कियों के चरित्र को ले कर हमेशा सवाल उठते रहे हैं.’’

धार्मिक नारों में उलझता देश

एफ ई नोरोन्हा पणजी के जानेमाने वकील हैं जिन का एक लेख अगस्त में एक पत्रिका रेनीवाकाओ  में छपा था. रेनीवाकाओ का प्रकाशन गोवा और दमन के आर्कबिशप करते हैं. अपने लेख में एफ ई नोरोन्हा ने बड़ी बेबाकी से 23 अगस्त को पणजी में होने वाले उपचुनाव के बाबत मतदाताओं से अपील की थी कि वे सांप्रदायिक ताकतों के खिलाफ वोट दें ताकि फासिस्टवादी ताकतों को देश में बढ़ने से रोका जा सके.

पणजी विधानसभा उपचुनाव में भाजपा ने मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर को उम्मीदवार बनाया था. उन पर और भगवा खेमे पर निशाना साधते नोरोन्हा ने यह भी लिखा था कि साल 2012 में गोवा को सभी भ्रष्टाचार से मुक्त कराने की बात कर रहे थे, 2014 तक इस दिशा में कोशिशें भी हुईं लेकिन इस के बाद से हम भारत में हर दिन जिस तेजी से जिस चीज को बढ़ता हुआ देख रहे हैं, वह कुछ और नहीं, बल्कि संवैधानिक प्रलय है और हम इस के गवाह हैं.

बकौल नोरोन्हा, भ्रष्टाचार बेहद खराब चीज है, सांप्रदायिकता उस से भी खराब है लेकिन नाजीवाद इन से भी खराब है. भारत में अब सब से बड़ा मुद्दा भ्रष्टाचार नहीं, बल्कि आजादी, लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता हैं.

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देश में संवैधानिक प्रलय की स्थिति है इस से सहमत हुआ जा सकता है, लेकिन मोदीराज की तुलना सीधे नाजीवाद से करना फिलहाल एक अतिशयोक्ति वाली बात लगती है. हिटलर के राज में 1939 में तकरीबन 60 लाख यहूदियों को मौत के घाट उतार दिया गया था जिन में 15 लाख बच्चे भी थे.

मोदीराज में अब तक घोषित तौर पर 60 अल्पसंख्यक भी नहीं मारे गए हैं, लेकिन दिनोदिन बढ़ते धार्मिक उन्माद के चलते इस संख्या के साथ धार्मिक और जातिगत बैर में इजाफा ही हो रहा है, जो हर लिहाज से चिंता की बात है. इसे हालिया निवृतमान उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने भी अपने अंदाज में उठाया था.

अंसारी का असर

हत्याओं के मामले में भले ही मोदीराज और नाजीवाद में कोई कनैक्शन न दिखता हो पर नोरोन्हा ने जो लिखा था उसे बीती 10 अगस्त को उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी अपने कार्यकाल के आखिरी दिन यह कहते दोहरा चुके थे कि देश के मुसलमानों में बेचैनी का एहसास और असुरक्षा की भावना है. अंसारी ने बेहद तल्ख लहजे में कहा कि भीड़ द्वारा लोगों को पीटपीट कर मार डालना और तर्कवादियों की हत्याएं होना भारतीय मूल्यों का कमजोर होना है. सामान्यतौर पर कानून लागू करा पाने में विभिन्न स्तरों पर अधिकारियों की योग्यता का चरमरा जाना है.

यह कोई गोलमोल बात नहीं थी, बल्कि हामिद अंसारी सीधेसीधे देश के बिगड़ते माहौल का जिम्मेदार उन लोगों को ठहरा रहे थे जो वंदेमातरम के हिमायती हैं, भारत माता की जय बोलने के लिए मुसलमानों के साथ दूसरे अल्पसंख्यकों को भी मजबूर करते हैं और राष्ट्रगान को आरती का दरजा देने व दिलवाने पर तुले हैं.

नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद ऐसे लोगों की तादाद में बेहताशा इजाफा हुआ है. हर दिन कोई न कोई विवाद इन मुद्दों पर देश में कहीं न कहीं हो रहा होता है. लगता ऐसा है मानो राष्ट्रवाद जबरन थोपा जा रहा है. जाहिर है ऐसा कहने में कई स्तरों पर संविधान की अनदेखी करने में हिंदूवादी डरते नहीं. नाजीवाद की बात इस लिहाज में मौजू है कि देश धीरेधीरे ही सही, उस की तरफ बढ़ तो रहा है.

हामिद अंसारी चूंकि एक महत्त्वपूर्ण संवैधानिक पद पर 10 साल रहे थे, इसलिए उन के कहने पर बवंडर मचा. भाजपा खेमे से पहली प्रतिक्रिया उन की जगह उपराष्ट्रपति बनने जा रहे वेंकैया नायडू ने यह कहते दी थी कि कुछ लोग कह रहे हैं कि अल्पसंख्यक असुरक्षित हैं, यह एक राजनीतिक प्रचार है, पूरी दुनिया के मुकाबले अल्पसंख्यक भारत में ज्यादा सुरक्षित हैं, यहां उन्हें उन का हक मिलता है.

हामिद अंसारी के बयान को राजनीतिक मानने की कई वजह हैं लेकिन वेंकैया नायडू का बयान वाकई पूरी तरह राजनीतिक था जिस में एक संदेश हिंदूवादियों के लिए यह छिपा हुआ था कि वे ऐसे किसी बयान की परवा न करते हुए अपने हिंदूवादी एजेंडे की दिशा में काम करते रहेंगे. मौब लिंचिंग के दर्जनों उदाहरण मिथ्या हैं, उन पर ध्यान न दें.

भाजपा के तेजतर्रार प्रवक्ता कट्टरवादी हिंदू नेता कैलाश विजयवर्गीय ने भी अंसारी के बयान को राजनीतिक करार देते यह जाहिर किया कि अगर उन के मन में किसी प्रकार की दहशत थी तो उन्हें अपना कार्यकाल खत्म होने से पहले इस प्रकार का बयान देना चाहिए था.

शायद ही कैलाश विजयवर्गीय बता पाएं कि उपराष्ट्रपति रहते ही हामिद अंसारी यह बयान देते तो क्या उस के माने या मंशा बदल जाते. क्या भाजपा यह मान लेती कि क्या सचमुच देश का माहौल बदला है, मुसलमानों में असुरक्षा की भावना आ रही है और देश में डर का माहौल बन रहा है.

यानी, भाजपा को छोड़ हर किसी ने अंसारी की पीड़ा को जायज बताया, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हामिद अंसारी का यह हमला बरदाश्त नहीं कर पाए. आमतौर पर असहिष्णुता और बढ़ते नवहिंदूवाद पर खामोश रहने वाले नरेंद्र मोदी ने अंसारी पर दार्शनिकों सा प्रहार करते हुए कहा कि पिछले 10 वर्षों में उन्होंने अपना दायित्व बखूबी निभाया है हो सकता है कि उन के भीतर कोई छटपटाहट रही होगी, आज के बाद उन के सामने वह संकट नहीं रहेगा. मुक्ति का आनंद मिलेगा. उन्हें अपनी मूल सोच के अनुसार कार्य करने के, सोचने के और बात कहने के मौके भी मिलेंगे.

किसे मिल रहे मौके

एक सधे हुए शतरंज के खिलाड़ी की तरह हामिद अंसारी अपनी बात कह कर चलते बने जिस पर नरेंद्र मोदी की तिलमिलाहट काबिलेगौर थी. उन्होंने अंसारी के बयान को फुजूल बताते संवैधानिक संयम से काम लिया, लेकिन बाजी तो अंसारी एक ही चाल में ही मार ले गए थे.

मुंहजबानी बातें राजनीति में आम हैं. इन पर अब कोई ज्यादा ध्यान भी नहीं देता, लेकिन अंसारी की बात में असर था जो उन्होंने नरेंद्र मोदी तक को प्रधानमंत्री पद की गरिमा की सीमाएं लांघने को मजबूर कर दिया. नरेंद्र मोदी वैसे भी मान्यताओं के बहुत कायल नहीं हैं और समय पर बात को घुमा देने में माहिर हैं.

अपने मुखिया की खीझ को समझते उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने तो यह फरमान जारी कर दिया कि स्वतंत्रता दिवस पर राज्य के सभी मदरसों में राष्ट्रगान गाया जाना अनिवार्य होगा. इस बाबत सभी मदरसों को आजादी के जलसे की वीडियो रिकौर्डिंग भेजने का हुक्म देते यह धौंस भी दी गई कि राष्ट्रगान न गाने वाले मदरसों के खिलाफ कार्यवाही की जाएगी.

आदित्यनाथ का यह फैसला जरूर कुछकुछ नाजीवाद सरीखा था, क्योंकि संविधान में कहीं नहीं लिखा कि राष्ट्रगान गाया जाना अनिवार्य है, और इसे न गाए जाने पर न गाने वाले के खिलाफ किसी तरह की कार्यवाही की जा सकती है. पर अब तो मोदी और योगी संविधान से कहीं ऊपर हैं. वे जो कह देते हैं, वही संविधान मान लिया जाता है, माहौल कुछ ऐसा ही बना दिया गया है.

मुसलमानों की छवि बिगाड़ने के लिए अव्वल तो यही हुक्म काफी था, पर आदित्यनाथ की भड़ास यहां रुकी नहीं. जेलों में जन्माष्टमी मनाए जाने पर आपत्ति कर वे भड़क कर बोले कि जब सड़क पर नमाज पढ़ना बंद नहीं किया जा सकता तो जेलों में जन्माष्टमी मनाना और कांवड़ यात्रा कैसे बंद कर दूं.

3 सालों से हिंदूवाद की यह ड्रामेबाजी तरहतरह से पेश किए जाने के अपने अलग माने हैं जिस से सरकार की नाकामियां और चुनावी वादे ढके रहें और आम लोग धार्मिक नारों व विवादों में उलझते यह भूल जाएं कि सरकार का असल काम क्या होता है. ये काम हैं जनता की बुनियादी जरूरतें पूरी करना, भूख मिटाना, भ्रष्टाचार खत्म करना, जातिगत और धार्मिक भेदभाव मिटाना और आम लोगों की शिक्षा व सेहत के लिए सटीक व सस्ती योजनाएं बनाना.

मुद्दों से भटकाव

खुलेतौर पर भाजपाराज का यह साइड इफैक्ट है कि आम लोगों का ध्यान उन के भले से जुड़े मुद्दों से भटकाया जा रहा है. बढ़ती महंगाई पर अब कोई बात नहीं करता. 3 वर्षों में कई रोजमर्राई चीजों के दाम बेतहाशा बढ़े हैं जिन में रसोई गैस, पैट्रोल, डीजल, चीनी, दाल और प्लेटफौर्म टिकट जैसी कई चीजें शामिल हैं.

लोग इस बाबत सवाल न करने लगें, इसलिए नमाज, कब्रिस्तान, राष्ट्रगान, भारत माता, कश्मीर समस्या और वंदेमातरम जैसे भावनात्मक रूप से भड़काऊ मुद्दों को कोई न कोई भाजपा नेता या आरएसएस का पदाधिकारी हवा दे देता है.

देशभर में लगातार धार्मिक स्टंट और शोबाजी बढ़ रही है. भोपाल शहर के न्यू मार्केट इलाके में गणेश की सोने की प्रतिमा की झांकी लगाई जा रही है. चंदे से भंडारों का आयोजन हो रहा है. क्विंटलों वजनी लड्डुओं का प्रसाद चढ़ा कर लोगों का ध्यान बंटाया जा रहा है. साथ ही, कई किलोमीटर लंबी चुनरी यात्राएं निकाली जा रही हैं.

यह प्रचार आस्था नहीं है, बल्कि धर्म से जुड़े मुद्दों को अब राष्ट्रवाद के नाम पर हवा दी जा रही है जिस से गोरखपुर के सरकारी अस्पताल में हुई 60 नवजातों की औक्सीजन की कमी से हुई मौतों को लोग भगवान की नाराजगी समझ स्वीकार लें. सड़क पर नमाज और जन्माष्टमी व कांवड़ यात्रा पर आदित्यनाथ भड़कते हैं तो आम गरीब, भूखानंगा हिंदू उन की फेकी अफीम चाट कर सो जाता है कि देश उस का ही है और उसी के धर्म की रक्षा कर रहा है और इस के लिए अभावों में रहना पड़े तो बात हर्ज की नहीं.

कई राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय एजेंसियों के सर्वे वक्तवक्त पर स्पष्ट करते रहते हैं कि देश में गरीबी और बेरोजगारी बढ़ रही है, भ्रष्टाचार और घूसखोरी चरम पर है. पर ये बातें झांकियों और मंदिरों की जगमगाती लाइटों के बीच धुंधला कर दम तोड़ देती हैं. ‘आरती गाओ, भजनकीर्तन करो, भगवान की जय बोलो और भोले जैसे मस्त रहो, का पाठ पढ़ाया जा रहा है जिस का नतीजा यह निकल रहा है कि मुसलमान और दूसरे अल्पसंख्यक वाकई में खुद को दोयम दरजे का समझने लगे हैं.

धर्म को राष्ट्र का पर्याय बना देने पर उतारू हो आई भाजपा कहां ले जा कर देश को छोड़ेगी, इस का अंदाजा किसी को नहीं. इसलिए भी लोगों का भरोसा भगवान और धार्मिक पाखंडों में बढ़ रहा है यानी अल्पसंख्यक ही नहीं बल्कि दलित व पिछड़े भी खुद को असुरक्षित महसूस करने लगे हैं. फर्क इतना है कि उन का डर अलग किस्म का है जो सदियों से चला आ रहा है.

इस की एक मिसाल बीती 22 अगस्त को मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले के एक स्कूल में देखने को मिली जब 6 साल की एक दलित बच्ची ने जल्दबाजी में स्कूल के बाहर ही शौच कर दिया. एक दबंग ने उस से हाथ से अपना मैला उठाने को मजबूर कर दिया था. ऐसे भेदभाव और प्रताड़ना भरे माहौल में कोई अपनी मरजी या खुशी से रहना चाहेगा, यह सोचना एक नादानी वाली बात है.

यह सब करने के लिए एक पूरी लौबी सक्रिय है जो एक नियमित अंतराल से दलितों को प्रताडि़त करती है और मुसलमानों को पीटपीट कर मारती है, क्योंकि वे दोनों कथित रूप से गाय का मांस खाते हैं या फिर उस की तस्करी करते हैं. छत्तीसगढ़ में कोई भाजपा नेता अपनी ही गौशाला में सैकड़ों गायों को भूखा मार कर उन्हें दफना डाले तो वह धर्म या गाय का गुनाहगार नहीं माना जाता क्योंकि वह मुसलमान नहीं है, वह तो हिंदू ही है.

इस भेदभाव से हामिद अंसारी की बात पर तिलमिलाहट का गहरा संबंध है. हामिद अंसारी जैसे लोग यह संदेश देने में कामयाब रहते हैं कि दरअसल, मुसलमानों की आड़ में हिंदुओं को बरगला कर भाजपा अपना हिंदू राष्ट्रवाद का एजेंडा थोप रही है. यह दरअसल, उस की प्रस्तावना है. इस निबंध के उपसंहार तक आतेआते तो नाजीवाद खुदबखुद आ जाएगा.

भूख, भय और भ्रष्टाचार के बाबत कोई सवाल न हो, इस के लिए नरेंद्र मोदी को भाजपा नेता भगवान कहते रहते हैं. भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह भोपाल में उन की चमत्कारिक छवि गढ़ते नजर आए तो एक पूर्व भाजपा सांसद कैलाश सारंग ने बाकायदा एक किताब ‘नरेंद्र से नरेंद्र तक’ का विमोचन अमित शाह से करवा कर साबित करने की कोशिश की कि ये नरेंद्र मोदी दरअसल, विवेकानंद के अवतार हैं जो 2024 तक भारत को विश्वगुरु बनवा देंगे.

तब तक लोगों को, बस, भाजपा को चुनते रहना है और इस बाबत कि त्याग तो उन्हें करना ही पड़ेगा. गरीब, दलित, आदिवासी और मुसलमान बच्चे न पढ़ पाएं, यह चिंता की बात नहीं. अस्पतालों में प्रसूताएं दम तोड़ें, यह भी हर्ज की बात नहीं. बातबात पर सरकारी दफ्तरों में घूस का बढ़ता चलन भगवान की मरजी है. दलित आदिवासी अपने कर्मों व जाति के चलते बेइज्जत किए जा रहे हैं. ये और ऐसी तमाम बातों का जिक्र प्रसंगवश हो जाता है वरना समस्या कुछ खास नहीं है. लोग राष्ट्रगान गाएं या आरती गाएं, तिरंगा फहराए या भगवा, वंदेमातरम बोलें या बमबम भोले बोलें, यह हिंदूवादी तय कर रहे हैं, क्योंकि उन्हें सच छिपाने की जिम्मेदारी दी गई है.

रही बात असुरक्षा की, तो वह कहीं है ही नहीं. चारों तरफ भगवान हैं उन के रहते असुरक्षा की बात करना उन के अस्तित्व पर संदेह करना है जो कम से कम सवर्ण हिंदू तो नहीं कर सकता. सारे फसादों की जड़ मुसलमानों को बता कर उन्हें सलीके से रहने की हिदायत और धौंस दे दी जाती है. इस से सवर्ण हिंदुओं का पेट भर जाता है, उन के घरों में दूध की नदियां बहने लगती हैं, घर में बिजली मुफ्त में जगमगाने लगती है, गाडि़यों में डीजल, पैट्रोल मुफ्त के भाव भरा जाता है, खेत लहलहा उठते हैं, गैस का सिलैंडर महीनों चलता है और गरीबी गधे के सिर से सींग जैसे गायब हो जाती है.

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2017 इसी तरह उत्तरायण हो रहा है और अभी और उम्मीद है कि धार्मिक नारों के शोर के बीच असल मुद्दे यों ही दबे रहेंगे. धार्मिक भेदभाव छोटीमोटी कंपनियों और रिहायशी कालोनियों तक में जा पहुंचा है. कुछ लोगों के लिए सुकून से जीने का बड़ा सहारा हालफिलहाल तो शायद है, लेकिन जब ये समस्याएं कैंसर की शक्ल में देश के शरीर पर मवाद बन कर फैलेंगी तब क्या होगा, यह कोई नहीं सोच पा रहा.

भाजपा ने किस विकास और अच्छे दिनों की बात की थी, यह सवाल अब कोई नहीं करता. बिहार विधानसभा में एक मुसलिम मंत्री खुर्शीद अहमद ने जेडीयूभाजपा गठबंधन के विश्वासमत हासिल करने के बाद जय श्रीराम का नारा लगाया था. इस पर फतवा जारी हो जाने पर उन्होंने माफी मांग ली थी, पर यह भी कहा था कि अगर जय श्रीराम बोलने से बिहार का विकास होता है तो मैं सुबह शाम जय श्रीराम बोलूंगा. ये मंत्रीजी चाहें तो विकास और तेज हो सकता है लेकिन इस के लिए उन्हें सुबहशाम नहीं, बल्कि पूरे चौबीसों घंटे रामराम रटना होगा.

अब सैपरेट लिविंग

क्या वाकई देश का मुसलमान उतना भयभीत और असुरक्षित हो चला है जितना कि हामिद अंसारी और कुछ बुद्धिजीवी हिंदू भी गागा कर या रोरो कर बताते रहते हैं. इस सच को नापने के लिए भले ही कोई तयशुदा पैमाना न हो, पर गौरक्षकों की हिंसा जैसे कई मसले किसी सुबूत के मुहताज नहीं.

आजादी के बाद देश गांवों में बसता था, जहां की बसाहट की अपनी अलग धार्मिक व जातिगत व्यवस्था थी और जो पूरी तरह अभी भी नहीं टूटी है. दलितों और मुसलमानों के महल्ले अलग हुआ करते थे. बात अगर नदी में नहाने या पानी भरने की भी हो, तो उन का नंबर सवर्णों के बाद आता था. शहरीकरण से बात कुछ संभलती दिखी. पर अब वह भी बिगड़ रही है और बिगाड़ने वाले धर्म के वही ठेकेदार व पैरोकार हैं जो 50-60 के दशक में हुआ करते थे. पर अब ये चूंकि सत्ता में हैं, इसलिए घोषित तौर पर फिर सनातनी व्यवस्था थोपने को आमादा हैं.

गुजरात के लिंबायत विधानसभा क्षेत्र की खूबसूरत नैननक्श वाली भाजपा विधायक संगीता पाटिल ने 22 अगस्त को एक बदसूरत बात यह कही कि उन के विधानसभा क्षेत्र में ‘डिस्टर्ब्ड एरिया ऐक्ट’ लागू किया जाए ताकि कोई भी मुसलमान, हिंदुओं के पड़ोस में घर न खरीद पाए. बकौल संगीता, मुसलमान लोग हिंदू सोसायटियों में जबरन घर खरीदते हैं और हिंदू अगर उन्हें घर न बेचें तो तरहतरह से उन्हें तंग करते हैं.

बात बहुत सीधी है कि यह विधायक हिंदू और मुसलमानों की अलगअलग बस्तियों की मांग कर रही है, जिस का मूल आधार धर्म ही है. हिंदू व मुसलमान अगर घुलमिल कर रहेंगे तो जरूर हिंदुत्व को खतरा है, इसलिए इन में वैमनस्य फैलाने की भाजपा हर मुमकिन कोशिश कर रही है. वह लोकतंत्र का गला बहुमत से घोंटना चाह रही है.

भोपाल का अशोका गार्डन इलाका भी मुसलिम बाहुल्य है जिस की एक नई पौश कालोनी में हिंदू और मुसलमानों के घर लगभग बराबर हैं.

2-3 वर्ष पहले तक हिंदुओं को खुद के हिंदू और मुसलमानों को अपने को मुसलमान होने का एहसास नहीं होता था, पर अब होने लगा है और यहां तक होने लगा है कि इन दोनों समुदायों के बच्चे पहले की तरह साथसाथ खेलते नजर नहीं आते.

यहां के रेलवे से रिटायर्ड एक मुसलिम बुजुर्ग की मानें तो अब अधिकतर मुसलमान अपने मकान बेच कर किसी मुसलिम बस्ती में जा कर बसने का मन बना रहे हैं. इस बुजुर्ग का दोटूक कहना है कि ऐसा नहीं है कि हम पर कोई बम फोड़ रहा हो या फिर जबरदस्ती झगड़ रहा हो, पर जाने क्यों, मन में एक डर सा समा गया है. हिंदुओं की नजरें और व्यवहार अब पहले जैसे नहीं रह गए हैं. बातबात में खासतौर से नरेंद्र मोदी और भाजपा को ले कर बहस छिड़ जाती है जिस पर हमें चुप रहने का एहसास करा दिया जाता है कि तुम तो मुसलमान हो उन का विरोध करोगे ही.

इस बुजुर्ग के मुताबिक, जिस महल्ले, पड़ोस, सोसायटी या शहर में हमारा सामाजिक बहिष्कार शुरू हो जाएगा वहां हमारा दम तो घुटेगा ही. क्या हमें बोलने की आजादी नहीं? क्या भाजपा दूध की धुली है या आसमान से उतरी कोई दैवीय पार्टी है जो हम उस के फैसलों व उसूलों पर एतराज नहीं जता सकते बावजूद इस के कि हम ने पिछले 2 चुनावों में भाजपा को ही वोट दिया था.

मौब लिंचिंग के बाद सैप्रेट लिविंग की यह नई व्यवस्था पनप रही है. संगीता पाटिल ने तो खुलेआम इस पर मुहर लगा कर यह जता दिया है कि अब आगेआगे देखिए, होता है क्या.

अखिला से हादिया : अंगारों से शोलों तक

अखिला से हादिया बनी केरल की लड़की कुएं से निकल कर खाई में जा रही है. अदालत में अपनी आजादी की बात करने वाली हादिया धर्म की जकड़न में खुद ही फंसती नजर आ रही है. 27 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट ने हादिया को आगे की पढ़ाई करने की अनुमति देने का फैसला सुना कर एक तरह से उसे उस के मातापिता की कैद से आजादी दिला दी और शायद अगली सुनवाई तक अदालत उसे अपने मुसलिम पति के साथ रहने की आजादी भी दे दे पर जिस तरह की मजहबी मानसिकता और वेशभूषा में वह कोर्ट में दिखाई दे रही है, वह आजादी का नहीं, गुलामी का रास्ता है, रोशनी का नहीं, अंधेरे कैदखाने का रास्ता है. हैरत यह है कि वह इस के लिए उतावली है. एक धर्म बदल कर दूसरे धर्म में जाना और स्वतंत्रता की मांग करना हैरानी की बात है क्योंकि धर्म तो औरत का गुलाम बनाए रखते हैं.

अखिला नाम बदल कर हादिया बनी यह युवती हिंदू धर्म का पाखंडी दलदल छोड़ कर मुसलिम मुल्लेमौलवियों के रहमोकरम व फतवों की गुलामी की बेडि़यां धारण कर रही है. बुर्के में कैद हो कर आजादी मांग रही है, वाह हादिया!

कोट्टायम जिले के वैकुम में थिरुमनी वेंकितापुरम गांव के एक हिंदू परिवार में जन्मी 24 वर्षीय अखिला अपने मातापिता की इकलौती बेटी है. हादिया ने 12वीं तक पढ़ाई अपने घर पर रह कर की थी. बाद में उस ने तमिलनाडु के सलेम में शिवराज होम्योपैथी मैडिकल कालेज में दाखिला लिया.

सीमा सुरक्षा बल यानी बीएसएफ से रिटायर्ड के एम अशोकन ने जनवरी 2016 को बेटी अखिला के लापता होने का मामला दर्ज कराया था. अखिला अपनी 2 सहेलियां फसीना और जसीना के साथ रह रही थी. लापता होने के कुछ दिनों बाद अखिला अपने कालेज में हिजाब पहने नजर आई. उस के हिंदू दोस्तों ने उस के पिता अशोकन को सूचना दी. अशोकन उस के निवास पर पहुंचे तो वह गायब हो चुकी थी.

पिता अशोकन ने फसीना और जसीना के पिता अबूबकर के खिलाफ मामला दर्ज कराया कि उन्होंने बेटी को गायब करा दिया है. पुलिस ने अबूबकर को गिरफ्तार भी किया पर कोई ठोस प्रमाण नहीं मिल सका और अखिला का पता नहीं लगाया जा सका.

बाद में अखिला के एक इसलामिक चैरिटेबल ट्रस्ट सत्य सरणी में रहने का पता चला. इस पर अशोकन ने केरल उच्च न्यायालय में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दाखिल की. अशोकन ने आरोप लगाया कि उन की बेटी को धर्म परिवर्तन करा कर विदेश भेजने का षडयंत्र किया गया है और शादी के नाम पर उसे आतंकवादी संगठन आईएसआईएस में धकेला जा रहा है.

अखिला सत्य सरणी संस्था के राष्ट्रीय महिला मोरचा की अध्यक्ष ए एस जैनबा के पास रह रही थी. इस अवधि में उस ने अपना नाम हादिया कर लिया. केरल उच्च न्यायालय में पेश होने के दौरान हादिया के साथ जैनबा जाती थी. हादिया ने अदालत से कहा कि वह अपनी इच्छा से जैनबा के साथ रह रही है.

अगस्त 2016 में हाईकोर्ट में अशोकन ने दूसरी याचिका दायर की जिस में कहा कि उन की बेटी को भारत से बाहर ले जाया जा रहा है. हालांकि, हादिया ने इस से इनकार कर दिया था. उस ने कहा कि उस के पास पासपोर्ट ही नहीं है.

अगली सुनवाई पर वह अपने पति शफीन जहां के साथ अदालत में नजर आई. 9 दिसंबर, 2016 को अखिला ने शफीन जहां से मुसलिम धर्म के अनुसार शादी कर ली. शफीन जहां ने कहा कि पिछले अगस्त माह में एक मुसलिम विवाह वैबसाइट के जरिए हादिया से मुलाकात हुई थी. उस समय वह खाड़ी में काम करता था. नवंबर में जब वह छुट्टी पर घर आया तो अपने दोस्त के घर पर हादिया से मिला. वह उस की पृष्ठभूमि से परिचित था और मालूम था कि अदालत में उस को ले कर बंदी प्रत्यक्षीकरण मामला चल रहा है.

अखिला ने बाद में केरल हाईकोर्ट में कहा था कि उस का पढ़ाई के समय अपनी मुसलिम दोस्तों फसीना औैर जसीना के साथ रहते हुए उस का इसलाम धर्म की ओर झुकाव हो गया. दोनों मित्रों द्वारा समय से नमाज पढ़ने और उन के अच्छे चरित्र से वह प्रभावित थी. उस ने अदालत से यह भी कहा था कि इसलामिक पुस्तकें पढ़ने और वीडियो देखने के बाद उस ने इसलाम धर्म अपनाया. वह 3 वर्षों से इसलाम का अनुसरण कर रही थी पर उस के पिता अशोकन इसलामी तरीके से प्रार्थना करने पर उसे चेतावनी देते थे.

दोस्तों के साथ रहने के दौरान फसीना के पिता अबूबकर उसे मल्लापुरम जिले के पेसिंथलाण्णा में किम नामक धार्मिक संस्था में ले कर गए पर उसे वहां प्रवेश दिए जाने से इनकार कर दिया गया. बाद में अखिला कोझिकोड में एक इसलामिक सैंटर में गई. वहां उस से एक हलफनामा लिखवाने के बाद बाहरी उम्मीदवार के तौर पर भरती कर लिया गया. हलफनामे में लिखवाया गया कि वह अपनी मरजी से इसलाम धर्म स्वीकार कर रही है.

हादिया घर छोड़ने और इसलाम अपनाने के बाद जैनबा के साथ रहने लगी. जैनबा पीएफआई की राष्ट्रीय महिला विंग की अध्यक्ष थी. एनआईए का दावा है कि पौपुलर फ्रंट औफ इंडिया यानी पीएफआई एक इसलामिक संगठन है. पीएफआई और उस के साथी भारत में आतंकवादी वारदात करने की योजना बना रहे हैं.

शादी पर विवाद

हादिया के पति शफीन जहां पर आरोप था कि वह सोशल डैमोके्रटिक पार्टी औफ इंडिया यानी एसडीपीआई का सक्रिय सदस्य है. यह संगठन पीएफआई से संबद्ध बताया जाता है. एसडीपीआई पीएफआई का राजनीतिक मोरचा है और कहा जाता है कि वह हिंदू लड़कियों को फंसा पर आतंकवादी संगठन में भरती कराता है.

केरल हाईकोर्ट में हादिया ने यह भी कहा था कि उस ने एक मुसलिम विवाह वैबसाइट पर अपना विवाह प्रस्ताव डाला था. उसी के माध्यम से शफीन जहां का प्रस्ताव आया था. शफीन कोल्लम का रहने वाला ग्रेजुएट युवा है.

शादी से नाराज अखिला के पिता अशोकन ने इसे लव जिहाद बताया था. आतंकवाद के मामलों में जांच करने वाली प्रमुख एजेंसी राष्ट्रीय जांच एजेंसी यानी एनआईए की मई 2017 में केरल उच्च न्यायालय में दी गई रिपोर्ट के आधार पर हादिया की शादी को रद्द कर दिया गया था. एनआईए द्वारा अदालत से कहा गया कि हादिया की शादी एक वैवाहिक वैबसाइट के जरिए तय की गई, वह गलत थी. असली मकसद शादी के नाम पर आतंकवादी संगठन के लिए सक्रिय सदस्यों की तलाश करना था और वह उस में फंस गई.

कोर्ट की टिप्पणी का विरोध

25 मई को केरल हाईकोर्ट की खंडपीठ ने इस निकाह को शून्य करार देते हुए हादिया को उस के हिंदू अभिभावकों की अभिरक्षा में देने का आदेश दिया था. जस्टिस सुरेंद्र मोहन और जस्टिस अब्राहम मैथ्यू ने टिप्पणी करते हुए आदेश दिया था कि 24 साल की युवती कमजोर और जल्द चपेट में आने वाली होती है और उस का कई तरीके से शोषण किया जा सकता है. शादी उस के जीवन का सब से अहम फैसला होता है, इसलिए वह सिर्फ अभिभावकों की सक्रिय संलिप्तता से ही लिया जा सकता है.

बाद में केरल हाईकोर्ट की इस विवादित टिप्पणी का विरोध हुआ और फैसला आने के बाद मुसलिम कट्टरपंथी संगठनों ने केरल हाईकोर्ट के बाहर विरोध प्रदर्शन किया था.

इस फैसले पर हादिया ने कहा था कि वह 24 वर्षीया भारतीय है. पिछले कई महीनों से वह घर में गिरफ्तार है. अदालत ने उस की आस्था और पसंद के अनुसार जीने के अधिकार को क्यों अस्वीकार कर दिया? हादिया ने अदालत से यह भी कहा था कि शिव शक्ति योग केंद्र के कार्यकर्ताओं ने उसे प्रताडि़त किया और वे उस का वापस हिंदू धर्म में परिवर्तन कराना चाहते थे. उस के पिता अशोकन ने उन लोगों से ऐसा करने का अनुरोध किया था.

शिव शक्ति योग केंद्र हिंदू लड़कियों द्वारा मुसलिम युवकों से शादी कर लेने के बाद उन्हें वापस हिंदू धर्र्म में लाने के लिए केरल में बदनाम है. इस संगठन ने केरल में ऐसे कई मामलों को अपने हाथ में लिया है.

बाद में हादिया के पति शफीन ने केरल हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी और कहा कि हाईकोर्ट ने बिना किसी कानूनी अधिकार के निकाह को शून्य करार दिया है. याचिका में कहा गया था कि यह फैसला आजाद देश की महिलाओं का असम्मान करता है क्योंकि इस ने महिलाओं के बारे में सोचविचार करने के अधिकार को छीन लिया है और यह उन्हें कमजोर करने व उन के खुद के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है, इसलिए इसे रद्द किया जाना चाहिए.

हादिया ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि उसे आजादी चाहिए. पिछली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने हादिया के पिता से उसे कोर्ट में पेश करने का आदेश दिया था. कोर्ट ने बताया था कि वह हादिया की मानसिक स्थिति के बारे में जानना चाहता है.

उधर, उस के पिता अशोकन ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल अर्जी में आरोप लगाया कि हादिया का कथित पति शफीन कट्टर दिमाग का है और उस के आतंकवादी संगठन से रिश्ते हैं. अशोकन ने आरोप लगाया कि शफीन जहां मानसी बुराक का दोस्त है जिस के खिलाफ आतंकवादियों से संबंध होने के मामले में एनआईए ने चार्जशीट दाखिल की है. बहुत सारे फेसबुक पोस्ट इस के सुबूत हैं कि मानसी बुराक की कट्टर सोच पर याचिकाकर्ता ने खुशी जताई थी. इस के अलावा वह लगातार फेसबुक पर बुराक से बातचीत करता था.

सुप्रीम कोर्ट और हादिया

27 नवंबर को सुप्रीम कोर्र्ट ने हादिया से बातचीत शुरू की. सवाल किया कि आप ने किस स्कूल से पढ़ाई की? आप ने डाक्टरी पेशे को कैसे चुना? क्या आप दूसरों को दवा भी देती हैं? आप की भविष्य की क्या योजना है?

हादिया ने कहा कि उसे 11 महीनों से मातापिता की गैरकानूनी हिरासत में रखा गया है. उस ने बीएचएमएस किया है पर वह इंटर्नशिप नहीं कर पाई. वह इसे पूरा करना चाहती है. कोर्ट ने पूछा कि अगर सरकार खर्चा दे तो क्या वह पढ़ाई जारी रखना चाहती है? इस पर हादिया ने कहा, ‘‘मेरे पति मेरा खर्च उठा सकते हैं. सरकारी पैसे की जरूरत नहीं है.’’

इस के बाद सुप्रीम कोर्ट ने हादिया को मातापिता की हिरासत से रिहा करने का आदेश दिया. कोर्ट ने कालेज में स्थानीय अभिभावक के बारे में हादिया से पूछा तो उस ने अपने पति का नाम लिया पर जज ने कहा, ‘‘पति होस्टल में नहीं रह सकता. कोई पति अपनी पत्नी का अभिभावक नहीं हो सकता. मैं भी अपनी पत्नी का अभिभावक नहीं हूं.’’

तमिलनाडु स्थित शिवराज होम्योपैथी कालेज के डीन को अभिभावक नियुक्त करते हुए अदालती पीठ ने डीन को हादिया की किसी भी समस्या को सुलझाने की छूट दी है. हादिया अपनी पढ़ाई करने के लिए उक्त कालेज चली गई है और उसे होस्टल मुहैया करा दिया गया है. वहां वह 11 महीने की इंटर्नशिप पूरा करेगी.

सुप्रीम कोर्ट में भी हादिया के पिता अशोकन ने विदेश में बसे मानसी बुराक के बारे में कहा कि वह आईएसआईएस का सदस्य है और हादिया के पति शफीन के बीच उस की बातचीत का लिखित रूप कोर्ट में पेश किया. अशोक ने अदालत से कहा कि शफीन के संबंध पौपुलर फ्रंट औफ इंडिया नाम के संगठन से हैं जो जमीनी स्तर पर सिखापढ़ा कर किशोरों को कट्टर बनाने की बड़ी साजिश कर रहा है.

उधर, एनआईए इसे लव जिहाद बताने पर अड़ा रहा. उस ने दलील दी कि ऐसे 10 और मामलों की जांचें की जा रही हैं. उस के पास ठोस सुबूत हैं.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि पहले एनआईए की जांच में कुछ जानकारियां मिलें तो फिर आगे की सुनवाई करेंगे.

सवाल यह नहीं है कि एक युवती किसी अपराधी से प्रेम या विवाह कर सकती है या नहीं? तिहाड़ जेल में बंद कुख्यात चार्ल्स शोभराज से मिलने उस की नेपाली प्रेमिका जाया करती थी और वह उस से शादी करना चाहती थी. अबू सलेम के अपराधी होते हुए भी मोनिका बेदी के साथ प्रेम संबंध बना रहा. एक बालिग युवती को अपने बारे में फैसले करने का कानूनन हक है, फिर भी अंधी आस्था में डूबी दिख रही हादिया का जीवन धर्म बदल कर शादी के बाद सुखी रह पाएगा, यह सवाल है.

एक धर्म का लबादा त्याग कर दूसरे का धारण कर पति के साथ रहने को हादिया स्वतंत्रता मान रही है. हादिया किस आजादी की बात कर रही है? वह स्त्री को शिकंजे में रखने वाले एक दकियानूसी धर्म को छोड़ कर दूसरे कट्टर मजहब की ओर जा रही है जहां चारों ओर रोशनी नहीं, अंधेरे का साम्राज्य है. एक ऐसा मजहब जहां औरत की आजादी दिवास्वप्न है.

हादिया जिस पोशाक में अदालतों में जा रही है वह पोशाक भारत की नहीं, घोर मजहबी कट्टरपंथियों द्वारा थोपी गई पैर के अंगूठे से ले कर सिर की चोटी न दिखाई देने वाली पोशाक है जो शायद उस ने खुद अपनी स्वतंत्रता से नहीं, किसी मुल्लामौलवी के हुक्म से पहनी है. यह पोशाक दकियानूसी पाकिस्तान, अफगानिस्तान, ईरान, इराक जैसे देशों में पहनी जाती है पर वहां भी अब ऐसी पोशाक औरतें त्याग रही हैं.

सवाल केवल औरत की लिबर्टी का नहीं है. वह इस तथाकथित आजादी के बाद भी क्या स्वतंत्र है?

अदालतों के सभी फैसले जरूरी नहीं कि सही हों. सुप्रीम कोर्ट तक ने अपने कुछ निर्णय कुछ सालों बाद बदले हैं. हम अदालतों को सांप्रदायिक नहीं कह रहे हैं. लेकिन सवाल यह है कि अदालतों के फैसलों से क्या औैरत को वास्तविक आजादी, राहत मिलती है?

कानून कोई गारंटी नहीं

संविधान पीठ ने इसी साल 22 अगस्त को तीन तलाक को अवैध करार देते हुए सरकार से कानून बनाने को कहा था. इस पर केंद्र ने एक बार में तीन तलाक को खत्म करने के लिए नए कानून का मसौदा तैयार किया है. ‘द मुसलिम वूमेन प्रोटैक्शन औफ राइट्स औन मैरिज बिल’ नाम से जाना जाने वाला यह कानून क्या मुसलिम औरत के परिवार के लिए उस की जिंदगी को खुशहाल बना पाने की गारंटी हो सकता है?

तीन तलाक और हादिया मामला एकजैसा ही है. सुप्रीम कोर्ट ने तीन तलाक को अमानुषिक बता कर असंवैधानिक करार तो दे दिया पर क्या औरत को तलाक नाम के खौफ से मुक्ति मिल जाएगी? सुप्रीम कोर्ट के आदेश से औरत के जीवन से तलाक यानी अलगाव यानी परिवार का टूट जाना, बिखर जाने का सिलसिला खत्म हो जाएगा?

तीन तलाक के मामले को ही लें. क्या तीन तलाक मामले में औरत की समस्या हल हो गई? 3 तलाक पर कानून बनने से क्या तलाक होने बंद हो जाएंगे? क्या फर्क पड़ता है कोई तीन बार तलाक बोले या एक बार?

सुप्रीम कोर्ट ने तीन तलाक पर कहा था कि यह औरत की स्वतंत्रता का हनन है. उसे न्याय के लिए अपील करने के अधिकारों पर अंकुश है.

सवाल यह है कि क्या हादिया को वास्तविक लिबर्टी मिल पाएगी? एक अंधरे से निकल कर दूसरी अंधेरी गुफा में चले जाना क्या स्त्री की वास्तविक तरक्की है? स्त्री को रोशनी की राह कौन दिखाएगा? हादिया एक धर्म की अंधी गुफा से निकल कर दूसरे धर्म की कालकोठरी की ओर जा रही है जहां सिर्फ अंधेरा ही अंधेरा है. एक स्त्री की जिंदगी के लिए जिस वास्तविक रोशनी की जरूरत है वह वहां नहीं है. वह रोशनी क्या अदालत दिखा पाएगी?

धर्म के दुकानदारों के स्वार्थ

ऐसे मामलों में औरतें धर्म व सांप्रदायिकता का महज हथियार बनी दिखाई देती हैं. और वह हथियार केवल धर्म के दुकानदारों के लिए फायदेमंद साबित होता है. धर्म की खाने वाले यही तो चाहते हैं. उन्हें स्त्री की आजादी से कोई मतलब नहीं है. उस की तरक्की से कोई वास्ता नहीं है. बस, उन के धर्म का परचम लहराता दिखाईर् देना चाहिए ताकि ज्यादा से ज्यादा ग्राहक उन की दुकानों पर आएं. इस पूरे मामले में हलाल सिर्फ हादिया हुई है.

आजादी कहां है? उसे अपना नाम अखिला से बदल कर हादिया करना पड़ा. इस में उस की अपनी मरजी कहां है? यह तो धर्म की मरजी है.

हादिया, असली आजादी क्या है? औरत को गुलाम बना कर रखने वाला मजहब चाहे कोई भी हो, वहां आजादी महज खामखयाली है. हादिया स्वयं मानसिक गुलामी की जकड़न में बुरी तरह फंसी दिखती है. उस की असली आजादी बुर्का उतार फेंकने में है. धर्म की संकीर्ण सोच के दायरे से बाहर निकलने में असली आजादी है. न जाने कितनी हादियाएं अब तक इस बात को समझ ही नहीं पाई हैं. इसीलिए, वे गुलाम हैं. असली आजादी धर्म से बाहर निकलने से ही हासिल हो सकती है.

नाम किसानों का, मालामाल हो रहीं बीमा कंपनियां

किसानी ऐसा व्यवसाय है जिस में मुश्किलें तो बिन बुलाए मेहमान की तरह आती ही रहती हैं. कभी बारिश ज्यादा होती है तो बाढ़ आ जाती है, नहीं तो कभी सूखा पड़ता है, कभी और कोई प्राकृतिक आपदा. सरकार के लिए इतने बड़े पैमाने पर किसानों के नुकसान की भरपाई कर पाना मुश्किल होता है. इस का एक उपाय है कि कृषि बीमा की व्यापक व्यवस्था हो ताकि किसान के नुकसान की भरपाई की जा सके.

सरकारें इस दिशा में काम कर भी रही हैं. मगर ज्यादातर किसानों को तो बीमा का नाम तक पता नहीं है. इसलिए सरकारी सब्सिडी से बीमा योजना चल रही है. इस से किसानों को लाभ हुआ भी है मगर रोना यह है कि इस बीमा योजना से जितना लाभ किसानों को मिल रहा है उस से ज्यादा लाभ बीमा कंपनियों को हो रहा है. असल में, वे मालामाल हो रही हैं. हाल ही में एक के बाद एक आए सर्वेक्षणों और रपटों से यही नतीजा निकलता है. क्या किसानों के नाम पर सरकार, बीमा कंपनियों पर मेहरबान है?

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मोदी सरकार की महत्त्वाकांक्षी प्रधानमंत्री कृषि बीमा योजना के 1 साल पूरा होने पर एक बात उभर कर आती है कि सूखे और बाढ़ के इस दौर में किसान को लाभ मिलने से ज्यादा बीमा उद्योग मालामाल हो रहा है.

एक अखबार द्वारा सूचना अधिकार के तहत एग्रीकल्चरल इंश्योरैंस कंपनी औफ इंडिया से प्राप्त जानकारी के मुताबिक, इस योजना के तहत 2017 में 22,437 करोड़ रुपए कुल बीमा प्रीमियम जमा हुआ जबकि किसानों ने 8,087 करोड़ रुपए के दावे किए. नवीनतम जानकारी के अनुसार, किसानों ने 15,000 करोड़ रुपए के दावे किए जिन में से बीमा कंपनियों ने 9,466 करोड़ रुपए के ही दावे मंजूर किए हैं. सरकार इस बीमा को 98 प्रतिशत सब्सिडाइज्ड करती है. यह प्रीमियम बीमा कंपनियों के पास ही रहता है.

इन आंकड़ों से पता चलता है, सरकार फसल बीमा से किसानों का फायदा बताती रही, लेकिन लाभ कमाया बीमा कंपनियों ने. अकेले खरीफ मौसम यानी जून से नवंबर 2016 के बीच इन कंपनियों ने 10 हजार करोड़ रुपए कमाए हैं. ये जानकारी किसी और ने नहीं, बल्कि सरकारी संस्थाओं का लेखाजोखा रखने वाले सीएजी यानी कैग ने दी है. इस में बताया गया है कि इन बीमा कंपनियों ने किसानों के नुकसान के दावों में केवल उस के एकतिहाई हिस्से का ही निबटारा किया है.

क्या कहती है रिपोर्ट

कैग की रिपोर्ट में कहा गया है, 2011 से ले कर 2016 के बीच बीमा कंपनियों को प्रीमियम राशि बिना किसी गाइडलाइन को पूरा किए ही दे दी गई. इन कंपनियों में ऐसी क्या खास बात है कि नियमों को पूरा किए बगैर ही राशि दे दी गई.

कैग ने कहा है कि प्राइवेट बीमा कंपनियों को भारीभरकम फंड देने के बाद भी, उन के खातों की औडिट जांच के लिए कोई प्रावधान नहीं रखा गया है. क्यों नहीं औडिट का प्रावधान है? जब कंपनियां सरकार के खजाने से पैसा ले रही हैं तो क्या जनता को जानने का अधिकार नहीं कि वे किसानों को भुगतान कर रही हैं या नहीं? क्या बीमा कंपनियों के डिटेल की सरकारी और पब्लिक औडिट नहीं होनी चाहिए?

पिछले दिनों जारी इस रिपोर्ट में प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के राज्य स्तर पर लागू करने में कई खामियां देखी गई हैं.

सीएसई यानी सैंटर फौर साइंस ऐंड एन्वायरमैंट के मुताबिक, ये खामियां किसानों को मिलने वाले लाभ से उन्हें वंचित कर सकती हैं. कैग ने 2011-16 के दौरान राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना (एनएआईएस), संशोधित राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना (एमएनएआईएस) और मौसम आधारित फसल बीमा योजना (डब्लूबीसीआईएस) के क्रियान्वयन का औडिट किया था. 2016 से इन योजनाओं की जगह प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना ने ले ली है.

कैग की रिपोर्ट के अनुसार, उक्त फसल बीमा योजनाओं के लिए केंद्र सरकार ने अपने हिस्से की धनराशि तो जारी कर दी लेकिन कई राज्य सरकारें समय पर अपना योगदान करने में नाकाम रही हैं. जिस के चलते पिछले साल 10 अगस्त तक एनएआईएस के तहत 7,010 करोड़ रुपए एमएनएआईएस के तहत 332 करोड़ रुपए और डब्लूबीसीआईएस के तहत 999.28 करोड़ रुपए के क्लेम अटके हुए थे.

भारतीय बीमा नियामक एवं विकास प्राधिकरण के हवाले से मिले डाटा को दिखाते हुए सीएसई ने इस बात को चिह्नित किया कि बीमा कंपनियों को प्रीमियम के तौर पर 15,891 करोड़ रुपए मिले. जबकि दावों की रकम 5,962 करोड़ रुपए थी. एक बीमा कंपनी के अधिकारी ने बताया कि 2016 में खरीफ का सीजन बेहतर था जिस से फसलों का ज्यादा नुकसान नहीं हुआ. लिहाजा, कंपनियों को उस का लाभ हुआ.

हालांकि, सरकार ने प्रीमियम के क्षेत्र में किसानों को सब्सिडी दी है. इस मामले में केंद्र और राज्य सरकारें 50-50 फीसदी की जिम्मेदारी उठाती हैं. लेकिन इस में राज्य कृषि बजट का तकरीबन

50 से 60 फीसदी हिस्सा प्रीमियम में डाल दे रहे हैं. ऐसे में किसानों के मद में खर्च होने वाली दूसरी रकम में कटौती की जा रही है. ऊपर से यह पैसा किसानों को मिलने की जगह सीधे बीमा कंपनियों के पास चला जा रहा है.

सीजीए ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि हालांकि केंद्र अपने हिस्से की रकम को समय पर भेज देता है लेकिन राज्य ऐसा नहीं कर पाते हैं. जिस के चलते किसानों को उस का फायदा दिलाने का पूरा उद्देश्य ही नाकाम हो जा रहा है.

रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि 2011-16 के दौरान जिन 9 राज्यों में योजनाओं का औडिट किया गया वहां दावों के निबटारे में 45 दिनों की तय समयसीमा के बजाय 1,060 दिन यानी करीब 3 साल का समय लगा. योजनाओं की मौनिटरिंग में भी कई खामियां सामने आई हैं. उल्लेखनीय हैकि पुरानी फसल बीमा योजनाओं की इन खामियों के चलते ही केंद्र सरकार ने 2016 के खरीफ सीजन से प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना शुरू की है जिस में पुरानी कमियों को दूर करने का दावा किया गया है.

जागरूक नहीं किसान

फसल बीमा के बारे में किसानों के बीच जागरूकता की कमी की बात भी कैग के सर्वे में उजागर हुई है. रिपोर्ट के अनुसार, सर्वे के दौरान 67 फीसदी किसानों को फसल बीमा योजनाओं की जानकारी नहीं थी.

राजनेता योगेंद्र यादव कहते हैं, ‘‘पिछले 2 वर्षों में मैं ने सरकार की फसल बीमा योजना के बारे में यह बात कई बार सुनी है कि-‘भाई साहब, यह किसान की फसल का बीमा नहीं है. यह तो बैंकों ने अपने लोन का बीमा करवाया है.’ हर सभा में मैं पूछता था, ‘क्या किसी किसान को बीमे का भुगतान हुआ?’ अधिकांश किसानों ने तो बीमे का नाम ही नहीं सुना. जो किसान क्रैडिट कार्ड वाले थे, उन में से कुछ पढ़ेलिखे किसानों को पता था कि उन के खाते से बीमे का प्रीमियम कटा है. सैकड़ों सभाओं में मुझे 1-2 से ज्यादा किसान नहीं मिले जिन्हें कभी बीमे का मुआवजा मिला. धीरेधीरे मुझे फसल बीमा का गोरखधंधा समझ आने लगा. जिस किसान ने बैंक से लोन लिया है, उस के बैंक खाते से जबरदस्ती बीमा का प्रीमियम काट लिया जाता है.’’

नियमों का उल्लंघन

सीएजी की रिपोर्ट इस आरोप को भी पुख्ता करती है कि बीमे का मुआवजा बहुत कम किसानों तक पहुंचा है. कभी सरकार ने अपने हिस्से का प्रीमियम नहीं दिया, तो कभी बैंक ने देरी की. सरकारी और प्राइवेट बीमा कंपनियों ने खूब पैसा बनाया. रिपोर्ट प्राइवेट बीमा कंपनियों के घोटाले की ओर भी इशारा करती है. सरकार ने कंपनियों को पेमैंट कर दिया, लेकिन कंपनियां ने किसान को पेमैंट नहीं किया. कंपनियों से यूटिलाइजेशन सर्टिफिकेट तक नहीं मांगा गया. नियमों का उल्लंघन करते पकड़ी गई कंपनियों को ब्लैकलिस्ट नहीं किया गया. किन किसानों को पेमैंट हुआ, उस का रिकौर्ड तक नहीं रखा गया.

अमरीक कौर पर बायोपिक फिल्म ‘‘सरदारनी’’

‘‘तेरे नाम’’, ‘‘चीनी कम’’ व ‘‘पा’’ जैसी फिल्मों के निर्माण से जुड़ी रही कंपनी ‘‘मेड फिल्म्स’’ के सुनील मनचंदा अब पंजाबी शौर्य चक्र विजेता अमरीक कौर के जीवन पर बायोपिक फिल्म ‘‘सरदारनी’’ का निर्माण कर रहे हैं. इस फिल्म के निर्देशन की जिम्मेदारी अभिषेक दुधैया उर्फ मुकेश संभाल रहे हैं.

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अभिषेक दुधैया उर्फ मुकेश की बतौर निर्देशक यह पहली फिल्म होगी, पर वह फिल्म व टीवी इंडस्ट्री से पिछले बीस वर्षों से जुड़े हुए हैं. जामनगर निवासी अभिषेक दुधैया इससे पहले‘‘तारा’, ‘सुहाग’, ‘संसार’, ‘दीवार’, ‘एहसास’, ‘सिंदूर तेरे नाम का’, ‘मिली’ सहित कई लोकप्रिय धारावाहिकों और कुछ डौक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्देशन कर चुके हैं. इतना ही नही बतौर सहायक निर्देशक मुकुल एस आनंद की फिल्म ‘‘त्रिमूति’’ और रमण कुमार के साथ बतौर सहायक निर्देशक‘‘राजा भैया’’, ‘‘वाह वाह राम जी’’और ‘‘सरहद पार’’ में काम कर चुके हैं.

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फिल्म ‘‘सरदारनी’’ की चर्चा करते हुए अभिषेक दुधैया ने कहा – ‘‘पंजाब में शौर्य चक्र विजेता अमरीक कौर किसी परिचय की मोहताज नहीं है. मगर उनके बारे में पूरे देश को जानकारी होनी चाहिए, इसी मकसद से हम लोगों ने इस फिल्म का निर्माण शुरू किया है.

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हम छह माह तक पंजाब में रहे और अमरीक कौर के संबंध में काफी शोध कार्य करके सामग्री इक्ट्ठा की. पटकथा पूरी होने के बाद हम संगीतकार सतीश चक्रवर्ती के निर्देशन में पांच गाने रिकार्ड कर चुके हैं. संगीतकार सतीश चक्रवर्ती की पहचान यह है कि वह संगीतकार ए आर रहमान के सहायक हैं. इसकी शूटिंग 2018 में पंजाब में ही की जाएगी.’’

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