ऊंची जातियों की वजह से चारों ओर गंदगी

VIDEO : सिर्फ 1 मिनट में इस तरह से करें चेहरे का मेकअप

ऐसे ही वीडियो देखने के लिए यहां क्लिक कर SUBSCRIBE करें गृहशोभा का YouTube चैनल.

सफाई मुहिम के नाम पर चल रहा ‘स्वच्छ भारत अभियान’ बीते 3 साल में तकरीबन 6 अरब, 33 करोड़, 98 लाख रुपए खर्च कर चुका है. इस के अलावा ‘निर्मल गांव स्कीम’ में खरबों रुपए गंवई इलाकों में खप चुके हैं. इस के बावजूद गंदगी की समस्या जस की तस है. जहांतहां गंदगी के बड़ेबड़े अंबार दिखाई देते हैं. चंद जगहों को छोड़ कर ज्यादातर सार्वजनिक इलाकों में फैली गंदगी हमें आईना दिखाती है.

बसअड्डे, रेलवे स्टेशन, कचहरी,  सिनेमाहाल, सरकारी दफ्तर, गलीमहल्ले, फुटपाथ, फलसब्जी की मंडी वगैरह में धूलपत्थर, कीचड़ व कूड़ाकचरा फैला मिलता है. सार्वजनिक शौचालयों का तो बहुत ही बुरा हाल रहता है.

हम हिंदुओं को साफसुथरा दिखना तो भाता है, लेकिन खुद साफसफाई करने में शर्म महसूस होती है. गंदगी साफ करना तो दूर ज्यादातर लोगों को काम करने तक की आदत नहीं है.

गंदगी से है प्यार

साधुसंत, पंडेपुजारी और भिखारी जानबूझ कर गंदे बने रहते हैं. बदन पर राख लपेटना, सिर पर जटाएं रखना, दाढ़ीमूंछ बढ़ाना उन की पहचान बन गया है. हालांकि साफ रहना मुश्किल या महंगा नहीं है, लेकिन कारीगर, मिस्त्री, हलवाई, रिकशाठेली वाले और मजदूर गंदे रहने के आदी हैं. गंदी जगहों पर लगे खोमचों पर लोग खाते रहते हैं. सभी इस के आदी हो चुके हैं.

लोगों पर निकम्मापन इतना हावी है कि उन्हें गंदगी में रहना मंजूर है, लेकिन वे अपने आसपास सफाई नहीं करते.

धर्म और जाति के नाम पर सदियों तक ऊलजुलूल पट्टी पढ़ाने का नतीजा है कि ज्यादातर अगड़े, अमीर व पढ़ेलिखे लोग भी सफाई के कामों से बचते हैं और हुक्म दे कर कमजोर दलितों व मातहतों का जबरन शोषण करते रहते हैं.

society

सफाई के दुश्मन

उन लोगों की गिनती कम नहीं है जो खुद गंदगी साफ करने को अपनी शानोशौकत के खिलाफ समझते हैं. जाति व्यवस्था के हिसाब से हमारे समाज में गंदगी साफ करने व सेवाटहल का जिम्मा उन जातियों को सौंपा गया जो सदियों से नीचे व पीछे रही हैं. ऊपर से जुल्म यह है कि वे लोग अगड़ों की गंदगी तो साफ करें, लेकिन खुद साफ न रहें.

दलितों को साफ रहने की कोई सहूलियत नहीं दी गई. उन्हें अपढ़, गंदा व अछूत बनाए रखने की मंशा से उन के पढ़नेलिखने, नहाने व साफ कपड़े पहनने तक पर पाबंदियां लगाई गईं. वे चारपाई पर नहीं बैठ सकते थे. उन्हें कुओं व नल से पीने या नहाने का साफ पानी तक नहीं भरने दिया गया. वे बैंडबाजे के साथ बरात नहीं निकाल सकते थे.

धर्म की आड़ में…

गंदा बनाए रखने की गरज से दलितों को बस्ती से बाहर ऐसी जगहों पर रहने को मजबूर किया गया, जहां इलाके का कूड़ा व मैला इकट्ठा होता था ताकि वे खराब आबोहवा में रह कर गंदे, बीमार और कमजोर बने रहें. पहले अगड़े व पंडेपुजारी ऐसा चाहते थे, अब नेता ऐसा चाहते हैं ताकि वोट पाने के लिए कमजोर तबकों को भेड़बकरी की तरह हांका जा सके.

पंडेपुजारी कहते हैं कि शूद्र जाति में जन्म लेना पिछले जन्मों में किए गए पापों का नतीजा है, इसलिए यह फल तो उन्हें भोगना ही पड़ेगा. उन्हें दबाए रखने के लिए उन से बेगारी कराई जाती थी और फिर बड़े अहसान के साथ उन्हें खाने के लिए बचीखुची जूठन, रहने के लिए जानवरों का तबेला व पहनने को फटीपुरानी उतरन थमा दी जाती थी.

यह सब इसलिए किया गया ताकि निचले तबके के लोग गंदगी व गुरबत में जीने के आदी हो जाएं. उन का जमीर मर जाए, खुद पर से यकीन उठ जाए और वे खुद को दूसरों के रहमोकरम पर छोड़ दें.

पिछड़ों के खिलाफ यह साजिश थी ताकि वे कमजोर रहें. चूंचपड़ करने की हिम्मत न करें. चुपचाप अगड़ों की गंदगी साफ करने के अलावा उन की खिदमत करें.

ऊंची जाति वाले एक ओर जल, वायु व अग्नि को देवता, धरती, गाय व गंगा को माता व पत्थर को भगवान कहते हैं, चूहे, कुत्ते व बैल को देवताओं का वाहन बता कर पूजते हैं, सब में भगवान व सब को बराबर मानने की दुहाई देते हैं, वहीं दूसरी ओर इनसानों को शूद्र, चांडाल व नीच कह कर उन के साथ गैरबराबरी का शर्मनाक बरताव करते हैं. यह पाखंड है.

देश की गलत इमेज

चंद बड़े शहरों की चमचमाती सड़कों व अमीरों की पौश कालोनियों की बात अलग है, लेकिन सिर्फ उन से ही तो पूरे हिंदुस्तान की तसवीर नहीं बन सकती. गरीब लोग तो कम जगह व भारी गंदगी के चलते बदबूदार सीलन से भरे माहौल में सांस लेते हैं, जीते, खाते व रहते ही हैं, लेकिन गंदगी की एक बड़ी वजह यह भी है कि वे सफाई के बारे

में जागरूक दिखाई नहीं देते हैं, इसलिए घरेलू, खेतीबारी व कलकारखानों से निकले कूड़ेकचरे का निबटारा सही नहीं होता.

ऊंची जाति के लोग आज भी यही मानते हैं कि सफाई के काम से उन का कोई लेनादेना नहीं है. गंदगी साफ करना सिर्फ दलितों की जिम्मेदारी है. अमीर मुल्कों में ऐसा नहीं है. सिंगापुर में कुत्ता घुमाने वाले लोग अपने साथ 2 पौलीथिन लाते हैं. एक हाथ में पहनते हैं और दूसरे में सड़क पर की गई कुत्ते की गंदगी उठा कर साथ ले जाते हैं.

अपने देश में उलटा चलन है. यहां दिल्ली सरकार के रैनबसेरों में मुफ्त में रात गुजारने वाले लोग बिना सोचेसमझे कहीं भी पेशाब या शौच करने बैठ जाते हैं. बेघर, बेकार, मुफ्तखोरों को सोने के साथ नाश्ते की सहूलियतें देने वाली सरकार को उन से कम से कम उस जगह के आसपास की गंदगी तो साफ करानी चाहिए जहां वे रहते व सोते हैं. ओहदेदारों को सफाई के मुद्दे पर झाड़ू हाथ में ले कर फोटो खिंचवाने का तो शौक है, लेकिन इस बारे में नया सोचने की फुरसत नहीं है.

बदइंतजामी का आलम

आबादी का एक बड़ा हिस्सा आज भी इस बात से वाकिफ नहीं है कि गंदगी को दूर करने के लिए कचरे का निबटान कैसे किया जाना चाहिए? अमीर मुल्क कूड़ेकचरे को रीसाइकिल कर के बिजली, खाद व दूसरी कई चीजें बनाते हैं. नई तकनीक से कचरे को दोबारा इस्तेमाल करना जरूरी है, लेकिन इस पर कोई ध्यान नहीं देता. नगरपालिका की गाडि़यां जब कचरा ढोती हैं तो अकसर वह पूरे रास्ते में बिखरता हुआ चला जाता है.

हमारे देश में एक ओर सुपर कंप्यूटर व मंगलयान की बातें होती हैं, वहीं दूसरी ओर बहुत से लोग साफसफाई के मामले में भी धार्मिक अंधविश्वासों के शिकार हैं. मसलन, हज्जाम के पास जाने के लिए भी दिन तलाशे जाते हैं. बहुत से लोग मंगल व शनिवार को बाल व नाखून कटाने से परहेज करते हैं.

तमाम औरतें गुरुवार को इसलिए सिर व कपड़े नहीं धोतीं कि ऐसा करने से पैसे का नाश होता है. ऐसी बातें सफाई से जुड़ी हमारी पिछड़ी सोच की बानगी हैं.

गंदगी की समस्या की जड़ में निकम्मापन तो है ही, हमारे धार्मिक अंधविश्वास भी इस की बड़ी वजह हैं. नतीजतन, नदियों में कलकारखानों के गंदे पानी के अलावा अधजली लाशें, पूजा का सामान व मूर्तियों का विसर्जन करने का चलन आज भी आम है.

लेकिन गंदगी की समस्या को दूर करना नामुमकिन नहीं है, बशर्ते सभी लोग मानें कि तरक्की के लिए खुद साफ रहना व अपने आसपास सफाई रखना जरूरी है.

भाजपा कर रही है भगवा रंग की राजनीति

VIDEO : सिर्फ 1 मिनट में इस तरह से करें चेहरे का मेकअप

ऐसे ही वीडियो देखने के लिए यहां क्लिक कर SUBSCRIBE करें गृहशोभा का YouTube चैनल.

‘पार्टी विद अ डिफरैंस’ की बात करने वाली भारतीय जनता पार्टी अब बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी की तर्ज पर रंगों को ले कर राजनीति कर रही है. भाजपा केवल उत्तर प्रदेश ही नहीं, बल्कि पूरे देश को भगवा रंग में रंगा देखना चाहती है. उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद सरकार के हर काम में भगवा रंग छाया है.

सरकारी प्रचारप्रसार से ले कर सरकारी बिल्डिंग तक के रंग बदलने लगे हैं. मुख्यमंत्री आवास, मुख्यमंत्री सचिवालय, सूचना विभाग की प्रचार सामग्री से ले कर थाने की इमारत के रंग यहां तक कि परिवहन महकमे की बसों के रंग भी बदले गए हैं.

उत्तर प्रदेश में इस से पहले समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने भी पार्टी के रंग में प्रदेश को रंगने का काम किया था. उस समय भाजपा इस बात की बुराई करती थी. अब वह  खुद पार्टी के भगवा रंग में पूरे प्रदेश को रंग रही है तब उस का कहना यह है कि भगवा ऊर्जा का रंग होता है.

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ संत समाज से हैं. वे भगवा कपड़े पहनते हैं. जब वे मुख्यमंत्री बने तो उन के सरकारी आवास को उन के रहनसहन के हिसाब से बनाया जाने लगा. हवनपूजन कर के मुख्यमंत्री आवास ही नहीं, बल्कि उस के सामने की सड़क तक को शुद्ध किया गया. इस के लिए गोरखपुर से खासतौर पर पुजारी बुलाए गए.

योगी आदित्यनाथ संत हैं, ऐसे में यह बात जनता ने स्वीकार कर ली. इस के बाद मुख्यमंत्री सचिवालय और सरकारी बसों के रंग बदले गए. सरकारी प्रचार और दूसरे आयोजनों की कलर स्कीम बदल दी गई. इस के बाद हर सरकारी काम में भगवा रंग का असर पड़ने लगा. जहां भी नया रंगरोगन शुरू हुआ, भगवा रंग छा गया.

politics

बुराई से बदल गया रंग

उत्तर प्रदेश के विधानसभा भवन के एक तरफ भाजपा का प्रदेश कार्यालय है, जिस की बाहरी दीवार भगवा रंग में रंगी है. बीच में विधानसभा का नया लोकभवन है, जो राजस्थानी पत्थर से बना है. इस के आगे उत्तर प्रदेश हज कमेटी का भवन है, जिस की दीवार सफेद रंग से रंगी थी. 3 जनवरी, 2018 को नए साल में इस की दीवार को भगवा रंग में रंग दिया गया. हज कमेटी का संबंध मुसलिम समाज से है. ऐसे में भगवा रंग रंगने की बुराई होने लगी.

भाजपा के मुसलिम नेताओं ने भी यह कहना शुरू कर दिया कि भगवा रंग ऊर्जा का रंग है. इस में कोई हर्ज नहीं. भाजपा में शामिल तमाम मुसलिम नेता भगवा रंग में रंग चुके हैं. भगवा गमछा और सदरी इन के पहनावे की खास पोशाक बन गई है.

समाज के दूसरे तबके में हज कमेटी के दफ्तर को भगवा रंग में रंगने की बुराई शुरू हो गई. भाजपा के रणनीतिकारों ने भी इस को सही कदम नहीं माना. ऐसे में दूसरे दिन भगवा रंग को वापस सफेद किया गया. सरकार ने इस मुद्दे पर कोई बातचीत नहीं की. यह कह कर सफाई दी कि रंगरोगन करने वाले ठेकेदार ने गलती से इसे कर दिया था.

यह बात हजम होने वाली नहीं है. लोकसभा चुनाव से ले कर विधानसभा और निकाय चुनाव तक भाजपा को केवल हिंदुत्व का ही साथ काम आया है. यह हिंदुत्व का ही उभार था जिस के दबाव में जनता नोटबंदी, जीएसटी और महंगाई जैसे मुद्दों को छोड़ भाजपा को वोट दे आई. ऐसे में भाजपा पूरे देश में इस भगवा रंग का प्रचार करना चाहती है. यही वजह है कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को चुनावी प्रचार में उत्तर प्रदेश से बाहर प्रमुखता के साथ बुलाया गया. गुजरात, हिमाचल प्रदेश और कर्नाटक में वे पार्टी के स्टारप्रचारक बन गए. योगी सरकार में मुख्यमंत्री के प्रभाव का पूरा देश गवाह है, ऐसे में बिना सरकार की जानकारी में आए हज कमेटी की दीवार सफेद से भगवा कैसे हो सकती है? यह विचार का विषय है.

अलग होती हैं पार्टी और सरकार

इस देश का संविधान पार्टी और सरकार को अलग मानता है. संविधान मानता है कि चुनाव लड़ने के बाद जीत कर सरकार बनाने वाले विधानसभा सदस्य देश और प्रदेश की जनता का खयाल रखने वाले होते हैं. उन के लिए पार्टी और गैरपार्टी का कोई मतलब नहीं होता है. उन को सभी को समान नजर से देखना चाहिए. जनता को भी सरकार पर पूरा हक होता है. यही वजह है कि किसी भी सरकार में उस का रंग अलग होता है.

हाल के कुछ सालों में अलगअलग दलों ने पार्टी के रंग में सरकार को रंगने का प्रयास शुरू किया. उस समय उन सरकारों की भरपूर आलोचना भी हुई. भाजपा भी इस बात की समर्थक थी कि सरकार और पार्टी का रंग अलग होना चाहिए.

उत्तर प्रदेश में कल्याण सिंह, रामप्रकाश गुप्त और राजनाथ सिंह की सरकारें रही हैं. उन के समय में सरकार पर कभी भगवा रंग नहीं चढ़ा. योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद सरकार पर भगवा रंग चढ़ने लगा, जो किसी भी तरह से संविधान के अनुकूल नहीं कहा जा सकता है.

जिस बात के लिए भाजपा कभी सपा व बसपा को गलत बताती थी, आज खुद उसी राह पर है. भाजपा इस बात को समझती है कि देश में केवल एक वर्ग का साथ ले कर वह सरकार कायम नहीं रख पाएगी. इस कारण ही वह मुसलिम कानून में सुधार कर खुद को उदारवादी दिखना चाहती है. तीन तलाक कानून से ले कर मदरसों में शिक्षा के आधुनिकीकरण के पीछे यही सोच साफ दिखती है.

भाजपा एक तरफ हिंदुत्व में पुरानी सनातनी कानून की पक्षधर दिखती है तो दूसरी तरफ मुसलिमों में वह उदारवादी सोच के साथ दिखना पसंद करती है. ये विरोधी काम एकसाथ करना कठिन है. इस को बनाए रखने के लिए ही वह भगवा रंग का सहारा ले रही है, जिस से उसे हिंदुत्व को ले कर कुछ कहना न पड़े और लोगों को भगवा में हिंदुत्व का उभार दिखता रहे.

भाजपा नेता कृष्णा शाही, आशनाई में गंवाई जान?

उस दिन जुलाई, 2017 की 18 तारीख थी. बिहार के गोपालगंज के फुलवरिया के बसवरिया मांझा गांव में लालबाबू  राय के घर तेरहवीं का भोज था. इस भोज में शहर के बड़ेबड़े लोग आए थे. हथुआ चौनपुर गांव के रहने वाले भारतीय जनता पार्टी के कद्दावर नेता कृष्णा शाही भी इस आयोजन में शामिल होने आए.

कृष्णा शाही लालबाबू राय के पोते आदित्य राय को दिल से चाहते और मानते थे, इसलिए उन के दादाजी के इस कार्यक्रम में उन का शामिल होना जरूरी था. करीब 20 सालों से दोनों परिवारों के बीच घरेलू संबंध थे और सुखदुख में एकदूसरे के यहां आनाजाना था.

खैर, आयोजन संपन्न हुआ तो नातेरिश्तेदारों को छोड़ कर सभी लोग अपनेअपने घर लौट गए. कृष्णा शाही रात को वहीं रुक गए. रात साढ़े 10 बजे उन की पत्नी शांता शाही ने फोन किया तो उन्होंने पत्नी को बताया कि आदित्य ने उन्हें अपने घर रोक लिया है. सुबह जल्दी घर लौट आऊंगा, क्योंकि पार्टी के काम से पटना जाना है. उन्होंने ड्राइवर सुनील को सुबह आने को कह दिया.

कृष्णा शाही को उस दिन पार्टी के काम से पटना जाना था. उन का ड्राइवर मुंहअंधेरे ही उन्हें लेने पहुंचा. लेकिन आदित्य राय ने बताया कि नेताजी तो रात को ही चले गए थे. ड्राइवर ने वापस लौट कर यह बात कृष्णा शाही की पत्नी शांता को बताई तो वह चौंकीं. उन्होंने पति को फोन किया. लेकिन उन के दोनों फोन बंद मिले. इस से शांता घबरा गईं. उन्होंने पति से बात करने की कई बार कोशिश की, लेकिन हर बार उन का फोन बंद मिला. जब शांता की समझ में कुछ नहीं आया तो उन्होंने यह बात अपने जेठ उमेश शाही को बताई और उन से पति के बारे में पता लगाने को कहा.

उमेश शाही ने अपने छोटे भाई के मोबाइल पर फोन किया तो उन्हें भी फोन बंद मिला. उमेश के घर से आदित्य राय का घर 4-5 किलोमीटर दूर था. उमेश शाही बडे़ भाई दिनेश तथा कुछ अन्य लोगों को साथ ले कर आदित्य के घर बसवरिया मांझा गांव जा पहुंचे.

वहां पहुंच कर उन्होंने आदित्य राय को बुला कर पूछा, ‘‘कृष्णा कहां है आदित्य? अभी तक घर नहीं पहुंचा और उस का फोन भी बंद है?’’

‘‘नेताजी तो रात में ही यहां से घर चले गए थे.’’ आदित्य ने बताया.

‘‘यह क्या कह रहे हो तुम, कृष्णा रात में ही घर चला गया था तो अब तक पहुंचा क्यों नहीं?’’

यह सुन कर आदित्य भी चौंका.

इस के बाद आदित्य और उमेश के बीच कृष्णा शाही को ले कर बहस छिड़ गई. धीरेधीरे वहां गांव के लोग जुटने लगे. कृष्णा शाही कोई मामूली आदमी नहीं थे. वह बीजेपी के नेता और प्रदेश भाजपा व्यवसायी प्रकोष्ठ के अध्यक्ष थे, साथ ही अपने क्षेत्र में काफी लोकप्रिय भी थे.

crime

आदित्य की बातें सभी को बड़ी अजीब लगीं. उस की जुबान उस का साथ नहीं दे रही थी. उमेश ने यह बात भांप ली. वैसे भी वह समझ नहीं पा रहे थे कि कृष्णा रात को अगर उन के यहां सोया था तो कहां चला गया? मामला संदिग्ध लग रहा था, इसलिए सुबह 8 बज कर 10 मिनट पर उन्होंने कृष्णा शाही के रहस्यमय ढंग से गायब होने की सूचना फुलवरिया थाने को दे दी.

सूचना मिलते ही थानाप्रभारी प्रेमप्रकाश राय ने यह जानकारी एसपी रविरंजन कुमार को दी. एसपी रविरंजन के आदेश पर कई थानों की पुलिस मौके पर पहुंच गई. हथुआ के डीएसपी मोहम्मद इम्तियाज भी वहां आ गए.

भारतीय जनता पार्टी के कद्दावर नेता कृष्णा शाही के रहस्यमय ढंग से गायब होने की सूचना जल्द ही उन के समर्थकों तक भी पहुंच गई. सैकड़ों की संख्या में उन के समर्थक आदित्य राय के गांव मांझा पहुंच गए. कृष्णा शाही की खोजबीन शुरू हुई. जहांजहां उन के ठहरने के अड्डे थे, वहांवहां तलाश की गई, लेकिन उन का कहीं पता नहीं चला. उन की खोजबीन करतेकरते 10-11 बज गए.

गांव का एक युवक यूं ही बड़का शिव मंदिर के पास वाले कुएं में झांकने लगा. भीतर का दृश्य देख कर वह चौंका. कुएं के पानी में एक जोड़ी चप्पल तैर रही थी. युवक उलटे पांव आदित्य के घर की ओर भागा, जहां भीड़ जमा थी.

युवक ने कुएं में चप्पल देखने की बात कही तो सब लोग कुएं की ओर दौड़े. कुएं के भीतर पानी के ऊपर तैर रही चप्पल को देख कर उमेश शाही पहचान गए. वे चप्पलें उन के छोटे भाई कृष्णा की थीं, जो वह घर से पहन कर निकले थे. उन्हें समझते देर नहीं लगी कि किसी ने कृष्णा की हत्या कर के लाश कुएं में फेंक दी है.

3 पुलिसकर्मियों को कुएं के भीतर उतारा गया. काफी खोजबीन के बाद कृष्णा की लाश पानी में नीचे मिल गई. बाहर निकाला गया तो लाश की कमर पर गमछे में भारी पत्थर बंधा मिला.

कृष्णा शाही की लाश मिलते ही वहां का माहौल गरम हो गया. चूंकि पुलिस फोर्स मौके पर मौजूद थी, इसलिए वह स्थिति को नियंत्रित किए हुए थी. कृष्णा का शव मिलने की बात सुन कर हजारों लोग बसवरिया मांझा गांव पहुंच गए. उग्र लोगों ने आदित्य राय के घर में तोड़फोड़ करनी शुरू कर दी. बाहर पड़ी कुर्सियों को तोड़ कर फेंका जाने लगा. घर के सामान उठा कर बाहर फेंक दिए गए. हंगामा कर रहे लोगों को रोकने के लिए कई थानों की पुलिस को तैनात किया गया. एसपी रविरंजन कुमार और डीएम भी घटनास्थल पर पहुंच गए.

स्थिति पर काबू पाने के बाद पुलिस ने सुरक्षा के मद्देनजर आदित्य राय के घर को चारों ओर से कब्जे में ले लिया, ताकि कोई भी अप्रिय घटना न घट सके. पुलिस ने कृष्णा शाही की लाश का मुआयना किया तो मृतक के जिस्म पर कहीं भी चोट का कोई निशान नहीं पाया गया. हां, मृतक का होंठ जरूर नीला पड़ा हुआ था. इस से पुलिस ने अनुमान लगाया कि कृष्णा की मौत जहर से हुई होगी.

मृतक के बड़े भाई उमेश शाही चीखचीख कर कह रहे थे कि सत्ता पक्ष (जनता दल यूनाइटेड) के विधायक अमरेंद्र पांडेय उर्फ पप्पू पांडेय ने साजिश रच कर मेरे भाई की हत्या करवाई है. साजिश में आदित्य भी शामिल है.

खैर, पुलिस ने कृष्णा शाही की लाश पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल गोपालगंज भिजवा दी. इस के साथ ही पुलिस ने आदित्य राय एवं 4 महिलाओं को पूछताछ के लिए हिरासत में ले लिया और थाने लौट आई.

उमेश शाही ने भाई की हत्या में 6 लोगों के खिलाफ लिखित तहरीर दी. इन 6 आरोपियों के नाम आदित्य राय, जदयू विधायक अमरेंद्र पांडेय उर्फ पप्पू पांडेय, सतीश पांडेय, उन के पुत्र जिला परिषद के चेयरमैन मुकेश पांडेय, चौनपुर गांव के निवासी यशवंत राय, सुशील उर्फ राजन थे.

मृतक के भाई उमेश शाही का आरोप था कि आरोपियों ने साजिश कर के उन के भाई कृष्णा की हत्या की है. पुलिस ने तहरीर के आधार पर सभी आरोपियों के खिलाफ भादंवि की धारा 302, 201 और 120बी के तहत नामजद मुकदमा दर्ज कर लिया.

20 जुलाई को कृष्णा शाही के पोस्टमार्टम की रिपोर्ट पुलिस को मिल गई. रिपोर्ट में उन की मौत की वजह खाने में जहर मिला होना बताया गया था. पुख्ता जांच के लिए विसरा सुरक्षित रख लिया गया था.

हिरासत में लिए गए आदित्य और चारों महिलाओं से कड़ाई से पूछताछ की गई. आदित्य राय हर बार अपना बयान बदलता रहा. कभी वह शाही के घर से पैदल निकलने की बात कहता तो कभी किसी अनजान व्यक्ति का फोन आने पर रात में अकेले ही चले जाने की बात बताता.

कड़ाई के बावजूद महिलाओं ने भी अपना मुंह नहीं खोला. जब पुलिस ने थोड़ी और सख्ती की तो आखिर आदित्य ने घुटने टेकते हुए कह ही दिया, ‘‘हां, मैं ने ही खाने में जहर दे कर शाही की हत्या की है. जब से मैं ने फोन पर उन के और अपनी बहन के प्रेमसंबंध की बातें सुनी थीं, तभी से मेरे तनमन में आग लगी हुई थी. उस ने दोस्ती में जो दगाबाजी की, उसी से नाराज हो कर मैं ने उस की हत्या कर दी. मुझे इस का कोई पछतावा नहीं है.’’

आदित्य के अपराध स्वीकार करने के बाद उस के घर से जिन महिलाओं को हिरासत में लिया गया था, उन्हें छोड़ दिया गया. यह 19 जुलाई, 2017 की बात है.

12 घंटे के भीतर भाजपा नेता कृष्णा शाही हत्याकांड का परदाफाश हो गया था. एसपी रविरंजन कुमार ने अपने औफिस में प्रैस कौन्फ्रैंस कर के पत्रकारों को बताया कि भाजपा नेता कृष्णा शाही की हत्या अवैध संबंधों की वजह से की गई थी.

मामले की जांच के दौरान पुलिस को पता चला कि जिस युवती से कृष्णा शाही के अवैध संबंध थे, वह उन के बेहद करीबी आदित्य राय की तीसरे नंबर की बहन रागिनी (बदला हुआ नाम) थी. इस की जानकारी होते ही आदित्य राय आगबबूला हो गया और भाजपा नेता को सबक सिखाने की फिराक में रहने लगा.

अपने दादाजी के तेरहवीं के मौके पर उस ने अच्छा मौका देख कृष्णा शाही के खाने में जहर दे कर उन की हत्या कर दी और लाश पास के कुएं में फेंक दी. आरोपी आदित्य राय ने पत्रकारों द्वारा पूछे गए सवालों के जवाब में अपना अपराध स्वीकार करते हुए पूरी घटना विस्तार से बता दी.

उसी दिन शाम को पुलिस ने आरोपी आदित्य राय को अदालत में पेश किया, जहां से उसे 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया.

33 वर्षीय कृष्णा शाही मूलरूप से बिहार के गोपालगंज के थाना हथुआ के गांव चौनपुर के रहने वाले थे. 5 भाईबहनों में वह सब से छोटे थे. उन से 2 बड़े भाई दिनेश और उमेश शाही थे. बड़ी बहनों की शादियां हो चुकी थीं. तीनों भाइयों में खूब निभती थी, इसीलिए उन का परिवार संयुक्त था.

कृष्णा शाही के पिता का नाम मैनेजर शाही था. 20 साल पहले 13 जनवरी, 1996 में गांव से थोड़ी दूर स्थित मठिया टोला जाते समय नक्सलियों के माले गु्रप ने उन की बम फेंक कर हत्या कर दी थी. उस समय कृष्णा शाही की उम्र 13 साल के करीब रही होगी. पिता की हत्या का सब से ज्यादा दुख कृष्णा को हुआ था.

मैनेजर शाही चौनपुर इलाके में एक बड़ा नाम था. वह पूरी तरह समाजसेवा के लिए समर्पित थे. चौनपुर गांव से सटे कई गांवों के लोग मुश्किल के समय मैनेजर शाही को याद करते थे. वह बड़ी दिलेरी से उन की समस्याओं का समाधान करते थे. दिन हो या रात, वह बिना परवाह किए फरियादियों के साथ बेहिचक कहीं भी चले जाते थे.

यह बात उन दिनों की है, जब बिहार में नक्सलियों के आतंक की फसल लहलहा रही थी. बंदूकों की तड़तड़ाहट और बमों की दुर्गंध से प्रदेश के नागरिकों का जीना दूभर हो गया था. नक्सलियों के फरमान पत्थर की लकीर की तरह हुआ करते थे. उन के फैसले किसी कीमत पर नहीं बदलते थे. ऐसा ही कुछ मैनेजर शाही के साथ भी हुआ. मैनेजर शाही नक्सलवादियों के फरमान की चिंता किए बगैर उन से लोहा ले रहे थे.

13 जनवरी, 1996 को एक फरियादी की मदद करने के लिए मैनेजर शाही मठिया टोला के लिए घर से निकले थे. मुखबिरों ने नक्सलियों को उन के घर से निकलने की खबर दे दी थी. सूचना मिलते ही नक्सली संगठन मठिया टोला में घात लगा कर बैठ गया. जैसे ही मैनेजर शाही मठिया टोला पहुंचे, उन्होंने बम फेंक कर उन के चिथड़े उड़ा दिए और फरार हो गए.

कृष्णा शाही ने पिता के अधूरे सपनों को पूरा करने की कसम खा ली थी. पिता की मौत के बाद मैनेजर शाही के तीनों बेटे पिता के पदचिह्नों पर चल निकले. तब तक कृष्णा बड़े हो गए थे. शाही परिवार की राजनीति में पैठ थी.

राजनीति की डगर पर पांव रखने के बाद कृष्णा ने रामविलास पासवान की पार्टी लोक जनशक्ति पार्टी का दमन थाम लिया. वह युवा और ऊर्जावान थे. उन्होंने अपनी जमीनी पकड़ मजबूत बनाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी. अपनी लगन और मेहनत की बदौलत कृष्णा ने राजनीति में अपनी अच्छी साख बना ली.

सन 2006 में कृष्णा शाही की मेहनत एक बड़ा परिवर्तन लाई. उन के बड़े भाई उमेश शाही ने राजनीति के धुरंधर खिलाड़ी माने जाने वाले विधायक अमरेंद्र पांडेय उर्फ पप्पू पांडेय के कब्जे से हथुआ के चौनपुर की पंचायत सीट झटक ली और सरपंच बन गए. जबकि सन 2000 में पंचायत की इस सीट पर अमरजीत यादव सरपंच थे. अमरजीत यादव अमरेंद्र पांडेय का खास आदमी था. चौनपुर की सरपंच सीट हाथ से निकल जाने के बाद अमरेंद्र बौखला गए. यहीं से अमरेंद्र पांडेय और कृष्णा शाही के बीच दुश्मनी की तलवारें खिंच गईं.

crime

तुलिसिया के विधायक अमरेंद्र पांडेय गोपालगंज, हथुआ के नयागांव के निवासी थे. रामाशीष पांडेय के 2 ही बेटे थे सतीश पांडेय और अमरेंद्र पांडेय. गोपालगंज जिले के माफिया डौन सतीश पांडेय की अपने इलाके में तूती बोलती थी. वह ढाई दशक पूर्व उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों की पुलिस के लिए सिरदर्द बने माफिया डौन श्रीप्रकाश शुक्ला गैंग के सक्रिय सदस्य थे. उन्हें राजद के पूर्व मंत्री बृजबिहारी प्रसाद की हत्या में नामजद आरोपी बनाया गया था.  बाद में उन्हें इस केस में जमानत मिल गई थी. बिहार के चर्चित पुरखास नरसंहार में भी उन्हें आरोपी बनाया गया था, लेकिन बाद में वह इस में बरी हो गए थे.

जरायम की काली दुनिया से निकल कर सतीश पांडेय राजनीति के सहारे विधान परिषद तक पहुंचने के ख्वाब देखने लगे थे. उन्होंने सन 2000 के विधानसभा चुनाव में दरौली विधानसभा क्षेत्र से चनुव लड़ा, लेकिन उन्हें पराजय का सामना करना पड़ा. उस के बाद उन्होंने अपने छोटे भाई अमरेंद्र पांडेय को राजनीति में उतार दिया.

विधायक अमरेंद्र पांडेय की क्षेत्र में अपनी ही सरकार चलती थी. उन के जीवन से जुड़े इतिहास के कई काले पन्ने अतीत में दबे हुए थे. बात 27 मई, 2012 की है. गोपालगंज जिला के हथुआ प्रखंड मुख्यालय में शराब की दुकान चलाने वाले अनिल साह की रात में गोली मार की हत्या कर दी गई थी.

अनिल साह की हत्या के मामले में कुचाईकोट विधानसभा क्षेत्र से जदयू विधायक अमरेंद्र पांडेय, उन के पिता रामाशीष पांडेय, बहनोई जलेश्वर पांडेय, भाभी और पूर्व जिला परिषद अध्यक्ष उर्मिला पांडेय सहित 7 लोगों के खिलाफ स्थानीय थाने में प्राथमिकी दर्ज कराई गई थी.

अनिल साह के परिजनों ने खुल कर आरोप लगाया था कि विधायक अमरेंद्र पांडेय ने साह से 50 लाख रुपए रंगदारी मांगी थी और रुपए न मिलने पर शराब की दुकान बंद करने को कहा था. इस घटना के विरोध में स्थानीय लोगों ने मृतक के शव के साथ हथुआ सड़क को 2 घंटे तक जाम कर रखा था.

बहरहाल, कृष्णा शाही लोक जनशक्ति पार्टी को छोड़ कर बहुजन समाज पार्टी में चले गए. सन 2009 में कृष्णा शाही ने हथुआ विधानसभा से बसपा के टिकट पर चुनाव लड़ा, जिस में वह हार गए. चुनाव हारने के बाद कृष्णा ने बसपा से नाता तोड़ कर भारतीय जनता पार्टी से नाता जोड़ लिया. भाजपा में आने के बाद कृष्णा शाही ने अपनी पूरी ऊर्जा क्षेत्र के विकास में लगा दी. अपनी मेहनत और लगन की बदौलत वह व्यापारी प्रकोष्ठ के प्रदेश अध्यक्ष चुने गए.

इस बीच कृष्णा शाही और विधायक अमरेंद्र पांडेय की दुश्मनी खुल कर सामने आ गई. शाही इस की चिंता छोड़ कर क्षेत्र के लोगों की सेवा में जुटे रहे. सन 2012 में फिर मुखिया का चुनाव हुआ. इस बार चौनपुरा मुखिया सीट को महिला सीट कर दिया गया था, इसलिए इस सीट पर न तो कृष्णा लड़ सके और न उन के बडे़ भाई.

शाही ने अपनी पत्नी शांता शाही को मुखिया पद के लिए चुनाव लड़ाया. शांता भारी मतों से जीतीं और सरपंच बन गईं. शांता की जीत से पांडेय खेमे में भूचाल आ गया, क्योंकि इस से शाही का राजनीतिक कद और बढ़ गया था.

कृष्णा शाही की राजनीति में सक्रियता से विरोधियों की फेहरिस्त लंबी होती जा रही थी. राजनीतिक प्रतिद्वंदिता बढ़ने के साथ अदावत भी बढ़ी. उन की हत्या की आशंका से उन के घर वाले चिंतित भी रहा करते थे. परिजनों का चिंता करना गलत नहीं था. शाही की जान की सुरक्षा को ले कर उन की चिंता तब और बढ़ गई, जब गोरखपुर के कुख्यात अपराधी चवन्नी सिंह को गोपालगंज की पुलिस ने गिरफ्तार किया.

उस से पूछताछ में पता चला कि उसे एक विधायक ने कृष्णा शाही की हत्या की सुपारी दी थी. देखें तो समय रहते पुलिस ने कृष्णा शाही को बचा लिया था. इस के बाद उन पर मंडराते खतरे को देख कर जिला प्रशासन ने उन्हें सुरक्षा के लिए 4 अंगरक्षक दे दिए थे.

इस कहानी की दूसरी कड़ी आदित्य राय से हो कर आगे बढ़ती है. 30 वर्षीय आदित्य राय गोपालगंज के फुलवरिया थाना के बसवरिया मांझा गांव का रहने वाला था. उस के पिता अवधेश राय विदेश में नौकरी करते थे. अवधेश राय के 5 बच्चों में बेटा आदित्य राय एकलौता था.

आदित्य राय की सगी बुआ कृष्णा शाही के गांव चौनपुर में ब्याही थीं. उन्हीं के यहां आनेजाने में आदित्य की जानपहचान शाही परिवार से हुई थी, यह 17-18 साल पहले की बात है. तब आदित्य की उम्र 15-16 साल थी. दोनों परिवारों के बीच घनिष्ठ रिश्ता बन गया था, जो अभी तक चलता चला आ रहा था.

आदित्य के पिता भले ही विदेश में नौकरी करते थे, लेकिन उन का परिवार गांव में ही रहता था. आदित्य के अलावा उस की 4 बहनें थीं. अवधेश राय की अनुपस्थिति में उन के परिवार की देखभाल कृष्णा शाही के घर वाले करते आ रहे थे. ये लोग दुखसुख की हर घड़ी उन के परिवार के साथ खड़े रहते थे. शाही की अनुपस्थिति में उन की पत्नी शांता को कहीं जाना होता या कोई जरूरी काम पड़ जाता तो आदित्य उन के लिए तैयार रहता.

इतना ही नहीं, आदित्य और उस की 2 बहनों की शादी भी कृष्णा के घर वालों ने ही कराई थी. कृष्णा शाही का आदित्य के यहां रातोदिन का उठनाबैठना था. इसी उठनेबैठने में कृष्णा शाही की नीयत रागिनी को देख कर डोल गई. सामान्य कदकाठी और साधारण नैननक्श की रागिनी कृष्णा शाही के दिल में उतर गई. वह उस से प्रेम करने लगे. रागिनी भी सयानी थी. मर्दों की नजरों की भाषा वह समझने लगी थी. उस ने शाही की नजरों को पढ़ लिया था.

रागिनी जान गई थी कि कृष्णा शाही उस पर फिदा हैं. वह भी उन्हें अपना दिल दे बैठी. मौका मिलते ही उन्होंने अपनेअपने प्यार का इजहार  कर दिया. इस के बाद वे छिपछिप कर मिलने लगे. यह सिलसिला सालों तक चलता रहा. किसी को कानोंकान इन के प्यार की खबर नहीं लगी.

घटना से 15 दिनों पहले यानी 3 जुलाई, 2017 को आदित्य के दादा लालबाबू राय की मौत हो गई थी. अंतिम संस्कार में कृष्णा शाही ने बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया था और आर्थिक मदद भी की थी. इस के अगले दिन आदित्य कमरे में कोई काम कर रहा था, तभी उस ने रागिनी को किसी से फोन पर बातें करते सुना. रागिनी उस से प्यारमोहब्बत की बातें कर रही थी. उस की बातें सुन कर आदित्य का पारा सातवें आसमान पर जा पहुंचा. इस के बावजूद कुछ कहने के बजाय वह परदे की ओट से उस की बातें ध्यान से सुनने लगा.

रागिनी भाजपा नेता कृष्णा शाही से प्यार की बातें कर रही थी. उस की बातें सुन कर आदित्य गुस्से से पागल हो उठा. वह यह सोच कर परेशान था कि शाही ने उस के साथ दोस्ती में दगा की है. बस उसी दिन से वह भाजपा नेता कृष्णा शाही को सबक सिखाने की योजना बनाने लगा. यह बात उस ने अपने तक ही सीमित रखी, ताकि शाही को निपटाने के बाद पुलिस उस पर शक न कर सके.

18 जुलाई, 2017 को आदित्य राय के दादा लालबाबू की तेरहवीं थी. शाही उस दिन पूरे समय आदित्य के साथ थे. उन्हें देख कर आदित्य को गुस्सा तो बहुत आ रहा था, पर उसे मौके की तलाश थी. क्योंकि वह जानता था कि शाही को किसी भी तरह का नुकसान पहुंचाने का हश्र क्या हो सकता है. वह कोई मामूली आदमी नहीं थे, इसलिए जो भी कदम उठाना था, सोचसमझ कर उठाना था.

7 बजे शाम तक कृष्णा शाही आदित्य के घर रहे. मेहमानों को भोजन कराने के बाद वह जरूरी काम की बात कह कर चले गए. जातेजाते रागिनी से कह गए थे कि वह रात को आएंगे, तभी खाना भी खाएंगे. यह बात आदित्य ने सुन ली थी. बस, उस ने रात में ही उन का काम तमाम करने का निर्णय ले लिया. उन के जाने के बाद आदित्य बड़का गांव बाजार गया और कीटनाशक दवा की एक शीशी खरीद लाया. रात साढ़े 10 बजे कृष्णा शाही अपनी कार से आदित्य के यहां पहुंचे. उन्होंने ड्राइवर को यह कह कर घर भेज दिया कि सुबह आ कर उन्हें ले जाएगा.

आदित्य उन्हें देख कर खुश हुआ. वह उन्हें पुराने घर न ले जा कर नए घर ले गया. उन्हें वहां बैठा कर आदित्य पुराने घर से एक थाली में खाना परोस कर लाया. उसी खाने में उस ने बाजार से लाया कीटनाशक मिला दिया. शाही खाना खा कर सो गए. सोते समय ही उन की मौत हो गई.

रात में सब सो गए तो आदित्य उन की लाश को कंधे पर लाद कर घर से कुछ दूरी पर स्थित कुएं पर ले गया, जहां उस ने उन की कमर से एक भारी पत्थर बांध कर लाश को कुएं में फेंक दिया. इस के बाद उस ने उन की लाल रंग की हवाई चप्पल भी ला कर कुएं में फेंक दी और घर जा कर आराम से सो गया.

सुबह 4 बजे कृष्णा शाही का ड्राइवर सुनील उन्हें ढूंढते हुए आदित्य के घर पहुंचा और उसे जगा कर कृष्णा शाही को जगाने के लिए कहा. क्योंकि उन्हें किसी काम से पटना जाना था. लेकिन आदित्य ने कहा कि वह तो यहां आए ही नहीं थे, जबकि सुनील खुद ही उन्हें छोड़ कर गया था.

आदित्य का यह जवाब उसे काफी अटपटा लगा. कुछ कहने के बजाय वह लौट गया और सारी बात शांता शाही को बताई. शांता ने पति के दोनों नंबरों पर फोन किया. दोनों ही नंबर बंद थे. इस के बाद उन्होंने जेठ उमेश शाही को सारी बात बता कर पति के बारे में पता लगाने को कहा. उमेश शाही ने भाई के बारे में पता किया तो उन की लाश कुएं में मिली.

23 जुलाई को कृष्णा शाही की हत्या के मामले में एक नया मोड़ आ गया. शांता शाही ने एसपी के घटना के खुलासे को चुनौती दी कि उन के पति के चरित्र पर जो दाग लगाया गया है, वह सरासर बेबुनियाद है. आदित्य के परिवार से उन का बीसों साल से पारिवारिक संबंध रहा है. उस की 2 बहनों की शादी उन्होंने ही करवाई थी, तब क्यों किसी ने उन के पति के चरित्र पर अंगुली नहीं उठाई, अब कैसे उन का संबंध आरोपी की बहन रागिनी से हो गया. इसे वह पुलिस की मनगढं़त कहानी बता रही हैं.

उन का कहना है कि आदित्य को मोहरा बनाया गया है, जबकि उन के पति की हत्या राजनीतिक विद्वेष की वजह से हुई है. वह पति की हत्या का दोषी जदयू के विधायक अमरेंद्र पांडेय उर्फ पप्पू पांडेय और उन के परिवार को मानती हैं.

पुलिस जो कह रही है कि आदित्य ने उन के खाने में जहर मिला दिया था, यह झूठ है. घटना मंगलवार को घटी थी, उस दिन शाहीजी का व्रत था. व्रत में वह खाना कैसे खा सकते थे. दूसरी बात यह कि शाहीजी का वजन 95-96 किलोग्राम था, जबकि आदित्य काफी कमजोर है. वह अकेला शाहीजी की लाश को कैसे अपने कंधे पर उठा कर ले गया, तीसरी बात घटना वाली रात साढ़े 10 बजे उन की पति से बात हुई थी. उन्होंने बताया था कि आदित्य ने यह कह कर रोक लिया है कि रात काफी हो गई है, वह यहीं सो जाएं.

जबकि आदित्य का कहना था कि शाहीजी उन के वहां आए ही नहीं थे. आखिर उस ने ऐसा क्यों कहा, यह जांच का विषय है. इन तमाम सवालों के जवाब देने में पुलिस प्रशासन विफल है. निश्चय ही शाहीजी की हत्या में आदित्य के साथ और भी कई लोग शामिल थे, जिन्हें पुलिस बचा रही है. इसलिए वह इस घटना की सीबीआई जांच कराने की मांग कर रही हैं.

मृतक के भाई उमेश शाही ने डीजीपी पी.के. ठाकुर से मिल कर घटना की जांच सीबीआई से कराने की मांग की है. कथा लिखे जाने तक सीबीआई जांच की संस्तुति नहीं हुई थी. दूसरी ओर एसपी रविरंजन कुमार का कहना है कि घटना का खुलासा सही किया गया है. हत्या अवैध संबंधों की वजह से ही हुई है. हत्यारे को गिरफ्तार कर के जेल भेज दिया गया है. बाकी जिन 5 आरोपियों के नाम उमेश शाही की ओर से दिए गए हैं, जिन के बारे में जांच चल रही है. दोषी पाए जाने पर उन के खिलाफ भी काररवाई की जाएगी.

कथा लिखे जाने तक आरोपी आदित्य राय जेल में था. पुलिस अब तक कृष्णा शाही के दोनों मोबाइल फोन के बारे में पता नहीं लगा सकी है.

– कथा परिजनों एवं पुलिस सूत्रों पर आधारित

खिलाड़ियों का खिलाड़ी : भ्रष्टाचार की कहानी

.इसी साल जनवरी की बात है. देश की नामी कंपनी एसपीएमएल इंफ्रा लिमिटेड (पुराना नाम सुभाष प्रोजैक्ट्स ऐंड मार्केटिंग लिमिटेड) के गुड़गांव के सैक्टर-32 स्थित औफिस के लैंडलाइन पर फोन आया तो औपरेटर ने फोन रिसीव करते हुए कहा, ‘‘गुड मौर्निंग एसपीएमएल.’’

दूसरी ओर से फोन करने वाले ने रौबीली आवाज में कहा, ‘‘मैं एंटी करप्शन ब्यूरो (एसीबी) जयपुर से एसपी शंकरदत्त शर्मा बोल रहा हूं.’’

‘‘यस सर, बताइए, हमारी कंपनी आप की क्या सेवा कर सकती है?’’

‘‘आप की कंपनी के डाइरेक्टर ऋषभ सेठी अभी फरार हैं, इसलिए किसी जिम्मेदार आदमी से मेरी बात कराइए.’’ दूसरी ओर से उसी तरह रौबीली आवाज में कहा गया.

‘‘सर, सेठी साहब तो नहीं हैं, लेकिन उन के रिश्तेदार औफिस में आए हुए हैं. आप कहें तो उन से बात करा दूं?’’ औपरेटर ने फोन करने वाले से नम्रता से पूछा.

‘‘सेठी के रिश्तेदार का नाम क्या है?’’ फोन करने वाले ने पूछा.

‘‘सर, उनका नाम सनी पांड्या है. आप कहें तो मैं आप की उन से बात करा दूं.’’ औपरेटर ने कहा.

‘‘ठीक है, आप मिस्टर सनी पांड्या से मेरी बात कराइए.’’ फोन करने वाले ने कहा.

औपरेटर ने इंटरकौम द्वारा सनी पांड्या को बता कर लाइन दे दी कि जयपुर से एसीबी के एसपी शंकरदत्त शर्मा उन से बात करना चाहते हैं. लाइन कनेक्ट होते ही फोन करने वाले ने पुलिसिया अंदाज में कहा, ‘‘पांड्या साहब, आप ऋषभ सेठी के रिश्तेदार हैं, इसलिए आप को तो पूरे मामले का पता ही होगा?’’

‘‘साहब, मुझे ज्यादा तो पता नहीं है कि क्या मामला है. सिर्फ इतना पता है कि जयपुर एंटी करप्शन ब्यूरो कुछ जांच कर रही है.’’ सनी पांड्या ने कारोबारी अंदाज में कहा.

‘‘पांड्या साहब, ऐसा कैसे हो सकता है कि आप को मामले की जानकारी न हो. आप से कुछ बात करनी है. आप अपना मोबाइल नंबर बताइए.’’ दूसरी ओर से कहा गया.

‘‘साहब, मेरा मोबाइल नंबर आप नोट कर लीजिए,’’ पांड्या ने अपना मोबाइल नंबर बताते हुए कहा, ‘‘लेकिन मेरा इस मामले में किसी तरह का कोई लेनादेना नहीं है.’’

crime

‘‘वह तो मुझे पता है कि आप का इस मामले में कोई लेनादेना नहीं है,’’ फोन करने वाले ने कहा, ‘‘मैं आप के रिश्तेदार के भले की बात करने वाला हूं. खैर, मैं आप को बाद में फोन करता हूं.’’

इतना कह कर फोन काट दिया गया. फोन कटने के बाद पांड्या साहब सोचने लगे कि एसीबी के एसपी साहब ने फोन क्यों किया? कुछ देर तक वह इसी विषय पर सोचते रहे. उन्हें पता था कि एसपीएमएल इंफ्रा कंपनी राजस्थान के जलदाय विभाग के अधिकारियों एवं कर्मचारियों को रिश्वत दे कर काम कराने के आरोप में फंसी हुई है.

अभी पांड्या इसी मसले पर विचार कर रहे थे कि उन के मोबाइल पर फोन आया. उन्होंने फोन रिसीव किया तो फोन करने वाले ने कहा, ‘‘पांड्या साहब, मैं जयपुर से एसीबी का एसपी शंकरदत्त शर्मा बोल रहा हूं. उस समय एक जरूरी फोन आ गया था, इसलिए बात नहीं हो सकी थी.’’

‘‘जी बताइए, कैसे याद किया?’’ पांड्या ने पूछा.

‘‘एसपीएमएल कंपनी का जो मामला एसीबी में चल रहा है, उस की जांच मैं ही कर रहा हूं,’’ फोन करने वाले ने कहा, ‘‘मैं इस मामले को रफादफा कर सकता हूं. रिश्वत देने के प्रकरण से ऋषभ सेठी और कंपनी के अन्य डाइरेक्टरों के नाम भी इस मामले से निकाल दूंगा.’’

‘‘सर, इस के लिए हमें क्या करना होगा?’’ पांड्या ने पूछा.

‘‘इस के लिए आप को 10 करोड़ रुपए देने होंगे.’’ फोन करने वाले ने कहा.

‘‘सर, यह रकम तो बहुत ज्यादा है.’’ पांड्या ने कहा.

‘‘आप के रिश्तेदार सेठीजी करोड़ों रुपए के बिल पास कराने के लिए इंजीनियरों को लाखोंकरोड़ों रुपए की घूस दे देते हैं. फिर आप को 10 करोड़ रुपए ज्यादा कैसे लग रहे हैं?’’ फोन करने वाले ने कहा.

‘‘सर, ऐसी बात नहीं है,’’ पांड्या ने सफाई देते हुए कहा, ‘‘इतनी बड़ी रकम हम नहीं दे सकेंगे.’’

‘‘ठीक है, आप को एक दिन की मोहलत देता हूं. आप ऋषभ सेठी से बात कर लें,’’ फोन करने वाले ने कहा, ‘‘मैं आप को कल फिर फोन करूंगा. तब बता देना कि क्या विचार है.’’

इस के बाद फोन कट गया. पांड्या फिर सोच में डूब गए. उन्हें बड़ा अजीब लग रहा था कि एसपी स्तर का एक आईपीएस अधिकारी खुद फोन कर के उन से मामला रफादफा करने के लिए 10 करोड़ रुपए घूस मांग रहा था. जिस नंबर से पांड्या के मोबाइल पर फोन आया था, उस नंबर के बारे में उन्होंने पता कराया.

अरबों रुपए के टर्नओवर वाली एसपीएमएल कंपनी के अधिकारियों के लिए किसी फोन नंबर के बारे में पता कराना चुटकी बजाने जैसा काम था. कुछ ही देर में उन्हें पता चल गया कि एसीबी के एसपी शंकरदत्त शर्मा के मोबाइल नंबर से ही उन के मोबाइल पर फोन आया था.

अब शक करने जैसी कोई बात नहीं थी. उन्होंने कंपनी के अधिकारियों से बात की. उस के बाद तय किया गया कि अगर एसपी साहब मामला रफादफा करने की बात कह रहे हैं तो उन से बात आगे बढ़ाई जाए.

अगले दिन सनी पांड्या को एसपी साहब के फोन का इंतजार था. जैसे ही एसपी शंकरदत्त शर्मा का फोन आया, उन्होंने तुरंत फोन रिसीव कर लिया तो दूसरी ओर से कहा गया, ‘‘पांड्या साहब कैसे हैं? मैं एसपी शंकरदत्त शर्मा बोल रहा हूं.’’

‘‘मैं तो ठीक हूं साहब,’’ पांड्या ने कहा, ‘‘मैं ने कंपनी के अधिकारियों से बात की है. अगर आप मामला रफादफा करते हैं तो वे ज्यादा से ज्यादा 2 करोड़ रुपए दे सकते हैं.’’

‘‘पांड्या, शायद तुम्हारी कंपनी के अधिकारियों को पुलिस की ताकत का अहसास नहीं है. अभी तो कंपनी के 2 ही एजीएम गिरफ्तार हुए हैं. जल्दी ही ऋषभ सेठी और केशव गुप्ता भी गिरफ्तार कर लिए जाएंगे. उस के बाद तुम्हें पता चलेगा कि हम लोग क्या चीज हैं.’’ फोन करने वाले ने धमकाते हुए कहा.

‘‘साहब, बाद का किस ने देखा है. जो होना है, होता रहेगा. लेकिन फिलहाल हम 2 करोड़ रुपए से ज्यादा नहीं दे सकेंगे.’’ पांड्या ने कहा.

‘‘पांड्या, काम करने के तो मैं 10 करोड़ रुपए ही लूंगा, बाकी तुम्हारी मरजी है.’’ दूसरी ओर से फोन करने वाले ने दोटूक लहजे में कहा.

‘‘साहब, हमारी हैसियत इतनी ही है.’’ पांड्या ने विनती करते हुए कहा.

‘‘ठीक है, जैसी तुम्हारी इच्छा.’’ कह कर दूसरी ओर से फोन काट दिया गया.

इस बारे में क्या हुआ, यह जानने से पहले हम थोड़ा आगे की कहानी जान लें, जिस के लिए हमें करीब एक साल पीछे जाना होगा. आइए जानें कि शंकरदत्त शर्मा किस मामले की बात कर रहे थे.

एसीबी ने जयपुर में राजस्थान के जलदाय विभाग के चीफ इंजीनियर आर.के. मीणा को 10 लाख रुपए और एडिशनल चीफ इंजीनियर सुबोध जैन को 5 लाख रुपए की रिश्वत लेने के आरोप में 19 जुलाई, 2016 को गिरफ्तार किया था. आरोप था कि यह रिश्वत एसपीएमएल कंपनी के अधिकारियों ने इन दोनों इंजीनियरों को दी थी.

एसीबी ने उसी दिन दोनों आरोपी इंजीनियरों के जयपुर स्थित आवासों की तलाशी ली तो चीफ इंजीनियर आर.के. मीणा के घर से एसीबी को 12.41 लाख रुपए नकद और प्रौपर्टी के कागजात मिले थे. एडिशनल चीफ इंजीनियर सुबोध जैन के आवास से 9 लाख रुपए नकद, प्रौपर्टी के दस्तावेज एवं ढाई लाख रुपए से ज्यादा की ज्वैलरी मिली थी. दोनों के एकएक बैंक लौकर भी मिले थे.

सुबोध जैन राजस्थान की पिछली कांग्रेस सरकार में पीडब्ल्यूडी मंत्री प्रमोद जैन भाया के ओएसडी (औफिसर औन स्पैशल ड्यूटी) भी रहे थे. वह सरकार की ओर से विभिन्न मामलों की स्टडी के लिए जापान सहित कई देशों की यात्रा कर चुके थे.

जलदाय विभाग की ओर से जैन को आईएएस कैडर देने का प्रस्ताव भेजा गया था. अगर वह गिरफ्तार न होते तो बेटे को वकालत की मास्टर डिग्री की पढ़ाई के लिए एडमिशन दिलाने 22 जुलाई, 2016 को सिंगापुर जाने वाले थे. रिश्वत की रकम वह सिरहाने रख कर सोते थे. एसीबी की काररवाई के दौरान वह बैड पर मुंह ढक कर पड़े थे.

दोनों इंजीनियरों के पकड़े जाने से एक दिन पहले चंबल नादौती वाटर सप्लाई योजना सवाई माधोपुर के सुपरिंटेंडेंट इंजीनियर उदयभानु माहेश्वरी ने इसी कंपनी के अधिकारियों से 15 लाख रुपए की रिश्वत ली थी. उस समय वह एसीबी की पकड़ में नहीं आए थे. हालांकि कुछ दिनों बाद उन्होंने एसीबी के सामने आत्मसमर्पण कर दिया था. एसीबी ने उन्हें भी गिरफ्तार कर लिया था.

इस मामले में एसीबी ने जलदाय विभाग के 3 इंजीनियरों आर.के. मीणा, सुबोध जैन और उदयभानु माहेश्वरी के अलावा एसपीएमएल कंपनी के डाइरेक्टर ऋषभ सेठी और वाइस प्रेसीडेंट केशव गुप्ता सहित 4 लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया था. इन में केशव गुप्ता कंपनी का राजस्थान का काम संभालते थे.

सब से पहले 2 इंजीनियरों की गिरफ्तारी के तुरंत बाद पूछताछ में ऋषभ सेठी का नाम सामने आने पर उच्चाधिकारियों ने अलवर से एसीबी की टीम को ऋषभ सेठी को गिरफ्तार करने के लिए गुड़गांव भेज दिया था. अलवर की एसीबी टीम गुड़गांव के थाना सुशांतलोक पुलिस को साथ ले कर एसपीएमएल कंपनी के औफिस पहुंची, लेकिन तब तक सेठी फरार हो चुके थे.

एसीबी की जांच में सामने आया कि एसपीएमएल कंपनी के अधिकारियों ने जलदाय विभाग के अधिकारियों को अपने करोड़ों रुपए के बिल पास करवाने, वर्क और्डर जारी करवाने एवं कंपनी के प्रोजैक्ट्स में सहयोग करने के लिए रिश्वत दी थी. रिश्वत की यह राशि एसपीएमएल कंपनी के वाइस प्रेसीडेंट केशव गुप्ता के कहने पर कंपनी के सहायक महाप्रबंधक प्रफुल्ल मोरेश्वर ने जलदाय विभाग के अधिकारियों को दी थी.

यह बात भी सामने आई थी कि जलदाय विभाग के कुछ अधिकारी प्रोजैक्ट हासिल करने वाली कंपनियों एवं फर्मों से 15 फीसदी तक कमीशन के रूप में लेते थे. एसपीएमएल कंपनी को भरतपुर में पाइपलाइन बिछाने एवं मेंटीनेंस का 250 करोड़ रुपए का टेंडर मिलने वाला था. इस के अलावा राजस्थान के अन्य जिलों में एक हजार करोड़ रुपए से ज्यादा के प्रोजैक्ट मिलने वाले थे.

इस हिसाब से रिश्वत की राशि करोड़ों रुपए में होती है. प्रोजैक्ट हासिल करने के लिए कंपनी के प्रतिनिधियों की जलदाय विभाग के कई अधिकारियों से बातचीत चल रही थी. कंपनी तथा जलदाय विभाग के अधिकारियों के फोन एसीबी ने सर्विलांस पर लगा रखे थे. इसी से रिश्वत के इस खेल का खुलासा हुआ था. एसीबी ने रिश्वत देने के आरोप में एसपीएमएल कंपनी के सहायक महाप्रबंधक प्रफुल्ल मोरेश्वर को 19 जुलाई, 2016 को गिरफ्तार कर लिया था.

एसपीएमएल कंपनी बौंबे स्टौक एक्सचेंज व एनएसई में सूचीबद्ध है. कंपनी ने दिल्ली सहित देश के विभिन्न राज्यों में जलदाय, सीवरेज सहित इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़े कई बड़े प्रोजैक्ट हासिल कर रखे थे. राजस्थान में इस कंपनी के हजारों करोड़ रुपए के नएपुराने प्रोजैक्ट चल रहे थे. रिश्वत मामले में नाम आने से इस कंपनी के शेयर के भाव तुरंत गिर गए थे.

कंपनी ने मार्च, 2016 में समाप्त वित्त वर्ष में 1407 करोड़ रुपए की कुल संचालन आय अर्जित की थी. कंपनी ने सन 2016 में ही टाटा प्रोजैक्ट्स के साथ मिल कर राजस्थान अरबन ड्रिंकिंग वाटर, सीवरेज ऐंड इंफ्रास्ट्रक्चर कार्पोरेशन से प्रदेश के 11 शहरों में सीवरेज सिस्टम के निर्माण और ट्रीटेड वेस्ट वाटर से जुड़े 1275 करोड़ रुपए के प्रोजैक्ट हासिल किए थे.

बाद में एसीबी ने इस मामले में एसपीएमएल कंपनी के जयपुर औफिस में काम करने वाले सहायक महाप्रबंधक आकाशदीप तोतला को नवंबर, 2016 के पहले सप्ताह में गिरफ्तार कर लिया था. इस रिश्वत प्रकरण में नामजद किए गए मुख्य सूत्रधार एसपीएमएल कंपनी के डाइरेक्टर ऋषभ सेठी एवं वाइस प्रेसीडेंट केशव गुप्ता की गिरफ्तारी के लिए एसीबी ने कई बार गुड़गांव सहित अन्य जगहों पर छापे मारे, लेकिन वे पकड़ में नहीं आए.

बाद में एसीबी ने अदालत से सेठी और गुप्ता की गिरफ्तारी के लिए वारंट हासिल कर लिए थे. कंपनी के ये दोनों अधिकारी फरार थे. यह उसी बीच की बात है, जब शंकरदत्त शर्मा के नाम से सनी पांड्या के पास फोन आया था. पांड्या ने एसपीएमएल कंपनी के अधिकारियों के जरिए पता कराया कि क्या एसीबी के एसपी शंकरदत्त शर्मा इस तरह फोन कर के 10 करोड़ रुपए मांग सकते हैं?

कंपनी के अधिकारियों ने बताया कि एसपी शंकरदत्त शर्मा ईमानदार अधिकारी हैं. वह इस तरह की हरकत कतई नहीं कर सकते. अगर लेनदेन से काम बनता तो उन के 2 अफसरों को गिरफ्तार न किया जाता और न ही कंपनी के डाइरेक्टर और वाइस प्रेसीडेंट के खिलाफ एफआईआर दर्ज होती.

काफी सोचविचार कर एक दिन बाद सनी पांड्या ने सीबीआई में इस की शिकायत कर दी और वह रिकौर्डिंग भी सौंप दी, जो उन्होंने 10 करोड़ रुपए मांगने वाले से बात की थी. सीबीआई ने पांड्या की ओर से सौंपी गई रिकौर्डिंग को सुन कर जांच शुरू कर दी, क्योंकि उसे यह मामला संदिग्ध लग रहा था. शुरुआती जांच के बाद सीबीआई ने इस मामले की जानकारी राजस्थान के एंटी करप्शन ब्यूरो यानी एसीबी के पुलिस महानिदेशक को दे दी.

पेचीदा एवं तकनीकी मामला होने की वजह से एसीबी के आईजी सचिन मित्तल ने इस मामले की जांच शुरू कर दी. एसपी शंकरदत्त शर्मा के मोबाइल नंबर एवं एसीबी मुख्यालय के लैंडलाइन नंबरों की काल डिटेल्स निकलवाई गई तो साफ हो गया कि एसपी शंकरदत्त शर्मा के नाम से किसी अन्य आदमी ने फरजी तरीके से फोन कर के 10 करोड़ रुपए मांगे थे.

सवाल यह था कि जब एसपी शंकरदत्त शर्मा ने ऋषभ सेठी के रिश्तेदार सनी पांड्या को फोन नहीं किया था तो उन के मोबाइल पर शंकरदत्त शर्मा का नंबर डिसप्ले कैसे हो रहा था?

इस मामले में एसीबी के अधिकारियों ने टेलीकौम के तकनीकी विशेषज्ञों से जानकारी मांगी तो पता चला कि आजकल विदेशी सौफ्टवेयर के जरिए स्पूफिंग काल किए जा सकते हैं. स्पूफिंग काल गेटवे के जरिए होती है. इसे वायस ओवर इंटरनेट प्रोटोकाल (वीओआईपी) काल भी कहते हैं.

दरअसल, कई विदेशी कंपनियां ऐसा सौफ्टवेयर तैयार कर के उन के सर्वर बेचती हैं, जिन के जरिए कोई भी अपने मोबाइल से फोन कर सकता है, लेकिन फोन रिसीव करने वाले के पास नंबर वह डिसप्ले होगा, जो इस सौफ्टवेयर का उपयोग करने वाला चाहेगा. अगर किसी का मोबाइल स्विच औफ है तो भी उस के नंबर से इस सौफ्टवेयर द्वारा फोन किया जा सकता है.

crime

इस का टेलीकौम कंपनियों के पास कोई रिकौर्ड नहीं होता. केवल सौफ्टवेयर बनाने वाली कंपनियों के सहयोग से ही जिस नंबर व मोबाइल फोन से फोन किया गया था, उस का आईपी एड्रैस पता किया जा सकता है. सरकारी सुरक्षा एजेंसियों के लिए भी यह काम बहुत आसान नहीं है.

भारत में स्पूफिंग काल के कोई 2-4 मामले ही अब तक सामने आए हैं. राजस्थान में इस तरह का यह पहला मामला था. जांच में पता चला कि फोन हांगकांग की एक गेटवे सर्विस प्रोवाइडर कंपनी के जरिए किए गए थे. वे फोन दुनिया के 9 देशों के गेटवे सर्विस प्रोवाइडरों के जरिए रूट की गई थीं.

एसीबी के अधिकारियों ने अमेरिका, यूके, दक्षिणी अफ्रीका और चीन सहित 9 देशों की कंपनियों का सहयोग लिया. इस में कई महीने लग गए.

लंबी जांच के बाद एसीबी को उस मोबाइल नंबर का आईपी एड्रैस मिल गया. यह एयरटेल का सिम था, जो श्रीगंगानगर के साहिल राजपाल के नाम आवंटित था. इस के बाद एसीबी ने साहिल के मोबाइल नंबर को सर्विलांस पर लगा दिया.

इस बीच एसीबी को जलदाय विभाग सहित दूसरे विभागों के अधिकारियों से भी कई और शिकायतें मिलीं. इन शिकायतों में भी बताया गया था कि एसीबी के एसपी शंकरदत्त शर्मा या किसी अन्य अधिकारी के नाम से उन्हें फोन कर के उन से रिश्वत की मांग की जा रही है.

इन शिकायतों के साथ एसीबी को 5 मोबाइल काल रिकौर्डिंग भी मिली, जिन में फोन करने वाले ने रिश्वत मांगी थी. जलदाय विभाग के एक इंजीनियर सी.एल. जाटव से एसीबी के एसपी शंकरदत्तर शर्मा के नाम से फोन कर के डेढ़ लाख रुपए ले भी लिए गए थे.

उन्होंने एसीबी के अधिकारियों को बताया कि एसपी शंकरदत्त शर्मा के मोबाइल नंबर एवं एसीबी के लैंडलाइनों से किसी ने उन के मोबाइल पर फोन कर के खुद को एसपी शंकरदत्त शर्मा बता कर जलदाय विभाग के घूसकांड से नाम निकालने के लिए 10 लाख रुपए मांगे थे. जाटव ने डेढ़ लाख रुपए दे भी दिए थे. इस के बाद भी बारबार पैसों के लिए एसीबी के नंबरों से फोन आ रहे थे.

एसीबी के अधिकारियों ने उन के फोन नंबर की काल डिटेल्स निकलवाई तो उस में शंकरदत्त शर्मा और एसीबी औफिस के लैंडलाइन नंबर मिल गए, लेकिन शंकरदत्त शर्मा की काल डिटेल्स में सी.एल. जाटव के नंबर नहीं मिले. यह भी कड़वा सच था कि उन का नाम जलदाय घोटाले में था ही नहीं, लेकिन साहिल के एसीबी का एसपी बन कर कई बार धमकाने से वह डर गए थे और डेढ़ लाख रुपए एसपी साहब के नाम पर दे भी दिए थे.

व्यापक जांच के बाद श्रीगंगानगर के साहिल राजपाल का नाम सामने आया तो एसीबी ने उस के बारे में पता किया. पता चला कि वह राजस्थान के पूर्वमंत्री और आजकल भाजपा के वरिष्ठ नेता राधेश्याम गंगानगर का पोता है.

साहिल के राजनीतिक परिवार से जुड़ा होने की जानकारी एसीबी के अधिकारियों ने उच्चाधिकारियों को दे दी.

वहां से हरी झंडी मिलने के बाद एसीबी ने 9 अगस्त, 2017 को जयपुर के जालूपुरा स्थित एक विधायक के सरकारी आवास से साहिल राजपाल को गिरफ्तार कर लिया. साहिल पूर्वमंत्री राधेश्याम गंगानगर के दूसरे बेटे वीरेंद्र राजपाल का बेटा था. वह इंग्लिश औनर्स से ग्रैजुएट था. एसीबी ने साहिल के खिलाफ 25 पेज की एफआईआर दर्ज की थी. इस एफआईआर के साथ फरवरी, 2017 से अब तक जुटाए गए दस्तावेजों के करीब 200 पेज लग चुके हैं.

पूछताछ में साहिल ने एसीबी के अधिकारियों को बताया कि उस ने जनवरी, 2017 से जुलाई तक विभिन्न सरकारी विभाग के अफसरों को विदेशी सौफ्टवेयर के जरिए एसीबी के लैंडलाइन एवं एसीबी अफसरों के मोबाइल नंबरों से न जाने कितने फोन किए हैं. वह अपने या किसी दूसरे के मोबाइल फोन से अफसरों को फोन करता था, लेकिन रिसीव करने वाले के मोबाइल पर एसीबी के नंबर डिसप्ले होते थे.

5 दिनों के रिमांड के दौरान पूछताछ में साहिल ने एसीबी को बताया कि उस ने जलदाय विभाग के एडिशनल चीफ इंजीनियर, 2 सुपरिंटेंडेंट इंजीनियरों और करीब 10 अन्य इंजीनियरों तथा रसद विभाग के अधिकारियों से एसीबी के एसपी के नाम से करीब 20 करोड़ रुपए मांगे थे.

वह एसपी शंकरदत्त शर्मा बन कर अधिकारी से पैसे मांगता था और उन का ड्राइवर बन कर पैसे लेने जाता था. उस ने एसीबी के अधिकारियों और जलदाय विभाग के इंजीनियरों के फोन नंबर विभागीय वेबसाइट से हासिल किए थे. स्पूफिंग काल के लिए उस ने एसटीडी बूथ से आईएसडी काल भी किए थे. उस ने कई बार एसटीडी बूथों से चंडीगढ़, गुड़गांव और दिल्ली फोन कर के अधिकारियों के नंबर लिए थे. एसीबी ने इन बूथों की भी जांच की है. चेन्नै से भी स्पूफिंग काल करने का पता चला है.

साहिल किसी भी अधिकारी को स्पूफिंग काल करने से पहले डायरी में लिख कर उस का अभ्यास करता था, ताकि पुलिसिया लहजे से बातचीत करने में कोई गलती न हो. एसीबी को उस के आवास से ऐसी 2 डायरियां मिली हैं, जिन में एसीबी के एसपी शंकरदत्त शर्मा के नाम से शुरुआत कर के कई बातें लिखी गई हैं.

डायरियों में कई नाम मिले हैं, जिन से अंदाजा लगाया जा रहा है कि साहिल ने उन्हें स्पूफिंग काल कर के पैसों की मांग की होगी. पुलिस ऐसे पीडि़तों का पता लगाने का प्रयास कर रही है. हालांकि एसीबी के पास अभी कुछ ही शिकायतें आई हैं. ज्यादातर पीडि़त अभी सामने नहीं आए हैं.

एसीबी को जालूपुरा स्थित विधायक के आवास की तलाशी में शराब की 34 बोतलें मिली थीं, जिन में विदेशी शराब भी थी. एसीबी की सूचना पर थाना जालूपुरा पुलिस ने शराब की उन बोतलों को जब्त कर लिया था और साहिल के खिलाफ अवैध रूप से शराब रखने का मामला दर्ज किया था. यह सरकारी आवास विधायक मोहनलाल गुप्ता के नाम से आवंटित था. इस में विधायक गुप्ता नहीं रहते थे. वहां साहिल रुका हुआ था.

पूछताछ में पता चला है कि साहिल राजपाल का श्रीगंगानगर में प्रौपर्टी का कारोबार था. प्रौपर्टी में मंदी के कारण उसे लाखों रुपए का घाटा हो गया था. घाटा पूरा करने के लिए उस ने जयपुर जा कर दिमाग लगाना शुरू किया. उस बीच मीडिया में जलदाय विभाग की रिश्वतखोरी की खबरें सुर्खियों में थीं.

साहिल हौलीवुड फिल्में खूब देखता था. इन्हीं फिल्मों से उसे आइडिया आया कि उन लोगों को ब्लैकमेल किया जा सकता है, जो भ्रष्टाचार के मामले में फंसे हैं. ऐसे लोग जांच एजेंसियों के शिकंजे से निकलने के लिए मोटी रकम देने को जल्दी तैयार हो जाते हैं.

इस के लिए साहिल ने एसीबी के एसपी व अन्य अफसरों के नाम का उपयोग किया. राजनीतिक परिवार से जुड़ा होने की वजह से साहिल की श्रीगंगानगर में पुलिस अधिकारियों से भी अच्छी सांठगांठ थी. वह पैसे ले कर पुलिसकर्मियों व दूसरे विभागों के कर्मचारियों के तबादले कराता था. हालांकि लोग तबादलों के लिए राधेश्याम गंगानगर के पास आते थे.

राज्य में भाजपा की सरकार होने और भाजपा का वरिष्ठ नेता होने की वजह से लोग अधिकारियों पर उन का प्रभाव होने की बात मान कर तबादलों के लिए निवेदन करते थे.

वहीं साहिल के ताया रमेश राजपाल भाजपा के जिला उपाध्यक्ष हैं. इस कारण भी लोग मानते थे कि इस परिवार का अधिकारियों पर रुतबा है. तबादले के लिए दादा और ताया के पास आने वाले लोगों को मौका मिलने पर साहिल अपना शिकार बनाता था.

5 दिनों का रिमांड पूरा होने के बाद 14 अगस्त को एसीबी ने साहिल को अदालत में पेश कर 7 दिनों का रिमांड और लिया. एसीबी उस की एक साल की मोबाइल नंबर की काल डिटेल्स निकलवा कर चैक कर रही है. इस के अलावा बैंक से उस के खातों की भी डिटेल मांगी गई है. एसीबी उस के साथियों के बारे में भी पता कर रही है.

विधि विज्ञान प्रयोगशाला से जांच कराने के लिए उस की आवाज के नमूने लिए गए हैं. एसीबी ने जलदाय विभाग के इंजीनियर सी.एल. जाटव और एसपीएमएल कंपनी के डाइरेक्टर ऋषभ सेठी के रिश्तेदार सनी पांड्या के बयान दर्ज किए हैं.

दोनों ने एसीबी को वह रिकौर्डिंग भी सौंप दी थी, जो उन्होंने फोन पर एसपी के नाम से रकम मांगने के दौरान बातचीत की तैयार की थी.

इन रिकौर्डिंग की आवाज से साहिल की आवाज का मिलान किया जाएगा. एसीबी ने इन रिकौर्डिंग की ट्रांस्क्रिप्ट तैयार की है. पूर्वमंत्री राधेश्याम गंगानगर का कहना है कि उन का पोता ऐसा नहीं कर सकता. उन के परिवार को न्याय मिलेगा. न्याय प्रणाली पर उन्हें पूरा भरोसा है.

साहिल का कहना है कि इस मामले में उसे फंसाया गया है. सियासी गलियारों में कहा जा रहा है कि साहिल की गिरफ्तारी का असर राधेश्याम गंगानगर के राजनीतिक कैरियर पर भी पड़ सकता है.

साहिल के ताया रमेश राजपाल भाजपा जिला उपाध्यक्ष होने की वजह से अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव की तैयारी में जुटे थे. साहिल के पिता वीरेंद्र राजपाल गंगानगर क्लब के अध्यक्ष रहे हैं.

भारतपाक विभाजन के समय पाकिस्तान से आ कर श्रीगंगानगर में बसे राधेश्याम यहां की राजनीति की धुरी रहे हैं. कांग्रेस से 3 बार विधायक और एक बार राज्यमंत्री रहे राधेश्याम ने सन 2008 में टिकट कटने के बाद भाजपा का दामन थाम लिया था. वह चाहे सत्ता में रहे हों या न रहे हों, उन के परिवार का विवादों से पुराना नाता रहा है.

कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष सचिन पायलट ने इस मामले की उच्चस्तरीय जांच की मांग करते हुए भाजपा से जवाब मांगा है. जयपुर की पूर्व महापौर और प्रदेश कांग्रेस महासचिव ज्योति खंडेलवाल ने जयपुर के किशनपोल के विधायक मोहनलाल गुप्ता की भूमिका को भी संदिग्ध बताते हुए मामले की सीबीआई से जांच कराने की मांग की है.

– कथा एसीबी सूत्रों एवं अन्य रिपोर्ट्स पर आधारित

चौपाल : चौधरी का क्या था फरमान

VIDEO : सिर्फ 1 मिनट में इस तरह से करें चेहरे का मेकअप

ऐसे ही वीडियो देखने के लिए यहां क्लिक कर SUBSCRIBE करें गृहशोभा का YouTube चैनल.

चौधरी नत्था सिंह के घर एक बैठक चल रही थी. एक मैनेजर और कई दूसरे लोग चौधरी नत्था सिंह के ड्राइंगरूम में बैठे सलाहमशवरा कर रहे थे. चौधरी नत्था सिंह जिले के गांवों के चमड़े के ठेकेदार थे. मरे हुए जानवरों का चमड़ा निकलवा कर और उन के अंगों का कारोबारी इस्तेमाल कर के चौधरी साहब करोड़ों रुपए सालाना कमाते थे.

हैरत की बात यह थी कि वे खुद कुछ नहीं करते थे. सभी गांवों में उन के द्वारा बहाल 10-20 दलित तबके के लोग अपने गांवों के मरे हुए जानवरों की लाश उठाते थे और उन का चमड़ा, सींग, चरबी वाला मांस वगैरह चौधरी साहब के गोदाम में भेज देते थे. महीने में 2 बार उन को उन के काम का नकद भुगतान कर दिया जाता था.

चौधरी साहब के पास 2 ट्रैक्टरट्रौली समेत एक जीप और एक दूसरी शानदार कार थी. उन के 6-6 फुट के 2 नौजवान भतीजे लाइसैंसी रायफल ले कर हमेशा उन के साथ रहते थे.

चौधरी साहब की गांवों के दलितों पर इतनी मजबूत पकड़ थी कि पूरे जिले के सांसद, विधायक, डीएम, एसपी उन के साथ अदब और इज्जत के साथ पेश आते थे. वे शहर में एक बड़ी सी कोठी में शान से रहते थे. गांव में उन का 5 बीघे का गोदाम है और तकरीबन 50 बीघा खेती की जमीन वे अपने ही तबके के दूसरे किसानों से खरीद चुके थे.

चौधरी साहब के ज्यादातर दलितों पर सैकड़ों एहसान थे. दवादारू से ले कर पुलिस केसों में उन की मदद करना और शादी में हजारों रुपए की मदद करना उन का शौक ही नहीं, रोजमर्रा का काम था.

किसी से न डरने वाले चौधरी साहब के पास खबर आई कि उन के 2 कामगार जब गाय का चमड़ा निकाल रहे थे, तब कुछ ऊंची जाति वालों ने, जो अपने को गौरक्षक कहते थे, उन्हें बुरी तरह से मारा था. उन में से एक की अस्पताल में मौत हो गई थी.

इलाके के सभी दलित गुस्से में थे. डीएम और एसपी चौधरी साहब से तुरंत मिलना चाहते थे.

चौधरी साहब को याद आई वह पंचायत, जो आजादी के 2 साल बाद ही उन के गांव में दलितों की चौपाल पर हुई थी. तब वे तकरीबन 6 साल के थे. जाट जमींदारों के जोरजुल्मों से तंग आ कर दलितों ने लाठीभाले उठा लिए थे, उन के खेतों में काम करना बंद कर दिया था. आखिर में जाटों द्वारा माफी मांगने पर ही दलितों ने काम करना शुरू किया था.

आज शाम 5 बजे दलितों की चौपाल पर ही इस बात का फैसला होगा… चौधरी साहब ने मजबूती से अपनी बात कही और डीएम व एसपी को संदेश भिजवा दिया. शाम को उन के गांव में माहौल बहुत गरम था.

51 गांवों के दलित लाठीभाले ले कर दलितों की चौपाल पर डटे थे. सैकड़ों की तादाद में हथियारबंद दलित चौपाल के आसपास पूरे महल्ले और घरों की छतों पर मौजूद थे. हवा में इतना जहर घुला था कि कोई भी छोटी सी चिनगारी बड़ा दंगा करा सकती थी. गांव के समझदार लोग चौधरी नत्था सिंह का इंतजार कर रहे थे.

‘जय भीम’ के नारे साथ ही चौधरी नत्था सिंह चौपाल पर पहुंचे थे. डीएम, एमपी, स्कूल के हैडमास्टर निर्मल सिंह, गांव के प्रधान पंडित जयप्रकाश सभी मौजूद थे.

सभी दलित खतरनाक नारे लगाने लगे ‘खून का बदला खून…’ पंचायत में मौजूद लोगों को पसीना आ रहा था. पुलिस के 50-60 जवान अपनी जगह मुस्तैद थे.

अचानक चौधरी नत्था सिंह खड़े हुए. उन की बुलंद आवाज बिना माइक के गूंज उठी, ‘‘गाय का दूध पी कर, घी खा कर, ताकत हासिल करने वाले गौरक्षको सुनो, आज से अपनी मरी हुई गौमाता का अंतिम संस्कार हम नहीं करेंगे. जिस मां का दूध पी कर तुम हम पर जोरजुल्म करते हो, उस के मरने के बाद उस की खाल भी तुम्हीं निकालोगे. कोई भी दलित आज से गौमाता की खाल नहीं निकालेगा, न ही उस की लाश उठाएगा.’’

यह सुन कर ऊंची जाति वालों को जैसे सांप सूघ गया. 2 दिन बाद ही सब ने देखा कि पंडित जयप्रकाश अपने बेटे के साथ मिल कर अपने घेर में एक कब्र खोद रहे थे… अपनी मरी हुई गौमाता का अंतिम संस्कार करने के लिए.

एचआईवी की सिरिंज और एड्स का मुकाबला

VIDEO : सिर्फ 1 मिनट में इस तरह से करें चेहरे का मेकअप

ऐसे ही वीडियो देखने के लिए यहां क्लिक कर SUBSCRIBE करें गृहशोभा का YouTube चैनल.

एचआईवी का संक्रमण आज भी देशभर के आम लोगों के लिए आफत है. बिना सावधानी बरते सैक्स करने से तो यह होता ही है, अस्पतालों में जहां लोग इलाज के लिए जाते हैं, वहां से भी एचआईवी ला सकते हैं. हमारे गांवों, देहातों, कसबों में सैक्स की खुली बिक्री होती रहती है और कंडोम खरीदना, हमेशा साथ रखना और जरूरत के समय बारबार बदलना एक आफत का काम है और जो जबरन और ज्यादा सैक्स के आदी हो चुके हैं, उन से तो यह उम्मीद करना बेकार है.

यह आदमी से औरत में, औरत से बच्चों और बच्चों से दूसरों तक हो सकता है. कई छोटे बच्चों को यदि एक ही सिरिंज से इंजैक्शन दिया जाए तो बिना किसी अपने दोष के वे एचआईवी फैलाने का जरीया बन सकते हैं. लखनऊ के उन्नाव जिले में जिस शातिर नीमहकीम की वजह से सैकड़ों लोग एड्स के बीमार हो गए हैं उन में 5 साल के बच्चे तक हैं और अब वे समाज, स्कूल, खेल के मैदान से निकाल दिए गए हैं. उन्हें अपने घर छोड़ने पड़ रहे हैं.

अफ्रीका के जंगलों से आया यह रोग पहले केवल समलैंगिकों में था पर धीरेधीरे सब तरह के लोगों में फैलने लगा है और इस की अचूक दवा अभी तक नहीं मिली है. हमारे गांवों में तो इस का इलाज ही नहीं किया जाता, उसे पापी मान कर मरने के लिए छोड़ दिया जाता है और समाज के श्मशान में जलाने तक नहीं दिया जाता. ऊपर से पाखंड की दुकानदारी हमारे यहां गांवगांव में खूब पनप रही है. वैबसाइट पर नीचे वाला उपचार दिया गया है: ‘‘भगवान सूर्य ने ही पतंजलि ऋषि को वैज्ञानिक क्रिया बताई थी कि सूर्य नमस्कार प्रतिदिन 13 बार करने से रीढ़ की हड्डी में स्थित स्वाधिष्ठान चक्र में दिव्य ऊर्जा का विस्फोट होने लगता है जिस से एड्स के कीटाणु तेजी से मरने लगते हैं.’’

उन्नाव का नीमहकीम पकड़ा गया है पर सैकड़ों नहीं हजारों नीमहकीम भगवा दुपट्टा ओढ़े इस तरह का इलाज देशभर में कर रहे हैं और पागल बेवकूफ जनता पहले इन के चक्कर में बीमारी छिपाए रखती है फिर गांव तक छोड़ देने को मजबूर हो जाती है. अकसर गांव वाले छोड़े गए इन मकानों को आग लगा देते हैं और फिर दबंग लोग जमीन पर कब्जा कर लेते हैं. एड्स का भी नाजायज फायदा जम कर उठाया जा रहा है.

असल में तो इस देश को गरीबी, बेअक्ली के एड्स ने घेर रखा है. इस एड्स ने 125 करोड़ लोगों को बीमार कर रखा है, असल एड्स क्या मुकाबला करेगा.

जब बॉलीवुड की हसीनाओं को उनके कपड़ों ने दिया धोखा, देखें वीडियो

VIDEO : सिर्फ 1 मिनट में इस तरह से करें चेहरे का मेकअप

ऐसे ही वीडियो देखने के लिए यहां क्लिक कर SUBSCRIBE करें गृहशोभा का YouTube चैनल.

बॉलीवुड की हसीनाओं को आपने भी रैप वॉक करते बहुत देखा होगा. कई बार इन बॉलीवुड हसीनाओं के कपड़े रैंप पर वॉक करते हुए सबसे बड़ी उलझन बन जाते हैं और कई बार उन्हें इसी उलझन की वजह से सबके सामने शर्मिंदा भी होना पढ़ता है.

आज हम आपको ऐसे ही कुछ रैंप वॉक से जुड़ी कुछ ऐसी चीजें दिखाने जा रहे हैं जिसको शायद ही आपने कभी पहले देखा हो.

परी : डराती नहीं है ये फिल्म

फिल्म की टैग लाइन बताती है कि यह परी लोक की कथा नहीं है. मगर फिल्म की टैग लाइन यह नहीं कहती कि इस फिल्म को देखने के लिए समय व पैसा बर्बाद न करें. सुपरनेच्युरल पौवर वाली हौरर फिल्म में शुरू से अंत तक जंगल, रात का अंधेरा, खून, शैतान, गंदगी, जंजीरो में बंधी औरतों के अलावा कुछ नहीं है. कहानी के नाम पर पूरी फिल्म शून्य हैं. फिल्मकार ने जबरन डरावनी आवाजें डालने की कोशिश की है, मगर दर्शक डरने की बजाय हंसता है.

फिल्म की कहानी शुरू होती है कोलकाता से, जहां अरनब (परमब्रता चटर्जी) शादी के लिए पियाली को  देखने जाता है. पियाली (रिताभरी चक्रवर्ती) डाक्टरी की पढ़ाई पूरी कर इंटर्नशिप कर रही है. वापसी में वह अपने माता पिता से कह देता है कि उसे लड़की पसंद है. तभी कार के सामने एक बूढ़ी औरत आ जाती है और उसकी मौत हो जाती है. bollywoodपता चलता है कि वह रुखसाना (अनुष्का शर्मा) की मां है, जिसे उसकी मां जंगलों के बीच में एक झोपड़े के अंदर लोहे की जंजीर से बांधकर रखती है. रुखसाना की मां की अंतिम क्रिया में रुखसाना की अरनब मदद करता है. उसके बाद वह रुखसाना को उसके घर पर छोड़ देता है. पता चलता है कि अस्पताल का एक कर्मचारी उस बुढ़िया के शरीर पर निशान देखकर प्रोफेसर (रजत कपूर)को खबर करता है. फिर प्रोफेसर अपने कुछ आदमियों के साथ रुखसाना को मारने पहुंचता है, पर रुखसाना वहां से भागकर अरनब के घर पहुंच जाती है.

अरनब उसे अपने घर में कुछ समय रहने के लिए कह देता है. अरनब, रुखसाना के व्यवहार से अचंभित है. पर धीरे धीरे दोनों एक दूसरे से प्यार करने लगते हैं. प्रोफेसर, अरनब को समझाता है कि रुखसना औलाद चक्र की अंतिम शैतान है. वह इफीरात /बुरी आत्मा की बेटी है, जो कि अपनी नस्ल को आगे बढ़ाना चाहती है. यह उससे प्यार करेगी, एक माह के अंदर ही बच्चे को जन्म देगी और अरनब को खत्म कर देगी. यह शैतान है, मगर इंसान की तरह रहते हैं. इनके अंदर जहर होता है. यह गुस्से में अपना जहर दूसरे इंसान को काटकर उगलते हैं. यदि ऐसा न करें, तो यह खुद अपने जहर से मर जाएं.bollywood

पहले अरनब को यकीन नहीं होता. पर रुखसाना की बनायी एक तस्वीर को वह गूगल पर खोजता है, अब अरनब, प्रोफेसर के हाथों रुखसाना को सौंपता है. पर प्रोफेसर मारा जाता है. रुखसाना एक बच्चे को जन्म देती है, उसके बाद सारा सच अरनब को बताकर अपने जहर से खुद मर जाती है. मरने से पहले रुखसाना बता देती है कि उसका बच्चा पवित्र है, उसमें शैतानी अंश नहीं है.

निर्देशक व पटकथा लेखक के तौर पर प्रोसित राय फिल्म व कहानी के साथ न्याय करने में बुरी तरह से विफल रहे हैं. इंटरवल से पहले तो दर्शक समझ ही नहीं पाता कि आखिर यह सब हो क्या रहा है? पूरी कहानी मूर्खतापूर्ण ही है. लेखक व निर्देशक ने फिल्म की कहानी का संदर्भ बांगलादेश के जन्म के समय की घटना को उठाकर उसमें शैतानी पक्ष जोड़ कर हौरर फिल्म बनाने का असफल प्रयास किया है. क्योंकि फिल्मकार अपनी कहानी के साथ दर्शक को ठोस सच का यकीन नहीं दिला पाता. बल्कि एक अच्छी प्रेम कहानी का भी दुःखद अंत दिखाकर डरावनी नहीं, बल्कि एक उदास फिल्म बना डाली.

हम अपने पाठकों को बांगलादेश के जन्म के समय की उस घटना के बारे में याद दिला देते हैं. 1971 से पहले पश्चिमी पाकिस्तान और पूर्वी पाकिस्तान हुआ करता था. 1971 के युद्ध में जब पूर्वी पाकिस्तान, बांगलादेश बना, उस वक्त पाकिस्तानी सैनिकों ने बांगलादेश की औरतों से शारीरिक संबंध बनाते हुए वहां पर पाकिस्तानी नस्ल को बढ़ाने का अभियान चलाया था. इसका  पता चलते ही बांगलादेश के एक संगठन ने ऐसी औरतों की तलाश कर उनके गर्भ को गिराना शुरू किया था.bollywood

फिल्म ‘‘परी’’ के निर्देशक प्रोसित राय और निर्माता व अभिनेत्री अनुष्का शर्मा की सोच पर हंसी आती है. इनके लिए 21वीं सदी में भी बिजली की गड़गड़ाहट, दरवाजों के चरमराने की आवाज, अति गंदे चेहरे व खोपड़ी में काला बुरखा पहने औरतें, खून आदि का होना यानी कि हौरर फिल्म हो गयी.

फिल्म में अरनब और पियाली के बीच एक संवाद है कि ‘हर इंसान के अंदर राक्षस का अंश होता है?’ यदि फिल्मकार ने इस बात को भी ठीक से फिल्म में पिरोया होता, तो शायद परी अच्छी फिल्म बन जाती.bollywood

जहां तक अभिनय का सवाल है, तो अनुष्का शर्मा ने खून की प्यासी रुखसाना के किरदार को अपनी तरफ से निभाने का प्रयास जरूर किया है, मगर फिल्म की कहानी, पटकथा व उनके किरदार को इतना घटिया लिखा गया है, कि उनकी मेहनत रंग नहीं ला पाती. फिल्म में अनुष्का शर्मा चमगादड़ की की तरह उछलते, कूदते, उड़ते, खिड़की पर उलटा लटके, कुत्ते को काटते हुए दिखायी देती हैं, मगर उस वक्त भी दर्शक के शरीर में  सिहरन/ कंपकपी पैदा नहीं होती. फिर भी अनुष्का शर्मा इस बात के लिए बधाई की पात्र हैं कि उन्होंने कुछ नया करने का प्रयास किया है.bollywood

परमब्रता चक्रवर्ती के अरनब के किरदार को लेखक ने कोई तवज्जो नहीं दी, तो फिर वह बेचारे क्या करते? कुछ दृश्यों में अनुष्का शर्मा व परमब्रता चटर्जी के बीच की केमिस्ट्री खूबसूरत लगती है. रजत कपूर ने बुरी आत्मा की तलाश में जुटे बांगलादेशी प्राफेसर के किरदार को सही ढंग से निभाया है. कैमरामैन बधाई के पात्र हैं. गीत संगीत बेकार है.

दो घंटे 14 मिनट की अवधि की फिल्म ‘‘परी’’ का निर्माण अनुष्का शर्मा ने किया है. फिल्म के निर्देशक प्रोसित राय, लेखक प्रोसित राय व अभिषेक बनर्जी, संगीतकार अनुपम राय तथा कलाकार हैं-अनुष्का शर्मा, परमब्रता चटर्जी, रजत कपूर, रिताभरी चक्रवर्ती, मानसी मुलतानी व अन्य.

क्या आपने देखा रानी चटर्जी का ये हॉट बैडरूम रोमांस

VIDEO : सिर्फ 1 मिनट में इस तरह से करें चेहरे का मेकअप

ऐसे ही वीडियो देखने के लिए यहां क्लिक कर SUBSCRIBE करें गृहशोभा का YouTube चैनल.

बॉलीवुड सिनेमा हमेशा से हॉलीवुड की नकल करता रहा है, लेकिन अगर बात भोजपुरी सिनेमा की करें तो भोजपुरी सिनेमा भी इसमें पीछे नहीं है. पिछले साल आयी फिल्म इच्छाधारी पूरी तरह से हॉलीवुड फिल्म की नकल कर बनाई गई है.

इसके ट्रेलर को ही देखकर दर्शक रोमांचित हो जाते हैं, जिसमें सिनेमा की नायिका और सांप को रोमांस करते हुए दिखाया गया है. फिल्म काफी सफल रही है, हाउसफुल रही इस फिल्म को दर्शकों को भरपूर प्यार मिला. 2016 में आई थी ये फिल्म जिसका नाम इच्छाधारी है, जिसमें मुख्य भूमिकाओं में रानी चटर्जी और यश कुमार  हैं, जिसमें दोनों इच्छाधारी नाग-नागिन हैं.

दोनों मनुष्य का रूप धारण कर शहर आ जाते हैं और यहां आने के बाद उन्हें जिन कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, वही इस फिल्म की कहानी है. इस फिल्म में जेल में बंद यश को रानी आवाज देती है तो वो नाग का रुप धारण कर रानी के बेडरूम में पहुंच जाता है.

बेडरूम में रानी पीले रंग की ड्रेस पहने रहती है जहां पहुंचकर नाग के साथ उसका रोमांस फिल्माया गया है. नाग उसे चुंबन लेता है और उससे प्यार करता है. ये रोमांटिक सीन अधिक रोमांचकारी है. इस फिल्म का वीडियो सोशल मीडिया पर काफी वायरल हुआ था, इसे आज भी लोग देखते हैं. इसे काफी लाइक्स और व्यूज मिले थे.

भोजपुरी फिल्में अपनी कहानी और कुछ हॉट सीन्स की वजह से हमेशा से ही चर्चा में रहते हैं. यह फिल्म भी कुछ इसी तरह के सीन्स के लिए चर्चा में है. इसी तरह की एक फिल्म बॉलीवुड में भी आई थी जिसमें मल्लिका शेरावत थीं, यह फिल्म भी इसी से प्रेरित थी. ये दोनों फिल्में हॉलीवुड की फिल्म स्नेक्स आन प्लेन से प्रभावित हैं.

रंग बिरंगी होली और होंठों की प्यास

VIDEO : बिजी वूमन के लिए हैं ये ईजी मेकअप टिप्स

ऐसे ही वीडियो देखने के लिए यहां क्लिक कर SUBSCRIBE करें गृहशोभा का YouTube चैनल.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें