राजस्थान हाईकोर्ट में मनु की मूर्ति : इंसाफ के दरवाजे पर निशाना

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राजस्थान देश का अकेला ऐसा राज्य है जिस के हाईकोर्ट में ‘मनुस्मृति’ लिखने वाले मनु की मूर्ति लगी हुई है. गौरतलब है कि ‘मनुस्मृति’ में औरतों व शूद्रों के बारे में बेहद गलत बातें लिखी गई हैं.

डाक्टर भीमराव अंबेडकर के मुताबिक, ‘मनुस्मृति’ जाति की ऊंचनीच भरी व्यवस्था को मजबूत करती है, इसलिए उन्होंने 25 दिसंबर, 1927 को सरेआम ‘मनुस्मृति’ को जलाने की हिम्मत दिखाई थी.

मगर यह बेहद दुख की बात है कि औरतों और दलितों के विरोधी और इनसानी बराबरी के दुश्मन मनु की मूर्ति कोर्ट में लगी हुई है, जबकि उसी कोर्ट के बाहर अंबेडकर की मूर्ति लगाई गई है जो अनदेखी का शिकार है.

मनु की इसी मूर्ति को ले कर राज्य में 28 साल बाद एक बार फिर से बवाल शुरू हो गया है. राज्य के दलित और महिला संगठनों ने मनु की मूर्ति को हाईकोर्ट से हटाने के लिए राज्यभर में आंदोलन का ऐलान किया है. इस बीच राजस्थान सरकार ने हाईकोर्ट में मनु की मूर्ति के बाहर भारी फोर्स तैनात की हुई है.

दलित और महिला संगठनों का कहना है कि जिस मनु ने औरतों और जाति व्यवस्था के बारे में एतराज वाली बातें कही हैं, उस की मूर्ति की छाया में हाईकोर्ट बिना किसी का पक्ष लिए फैसला कैसे दे सकता है?

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साल 1989 में न्यायिक सेवा संगठन के अध्यक्ष पदम कुमार जैन ने राजस्थान हाईकोर्ट के कार्यवाहक चीफ जस्टिस एमएम कासलीवाल की इजाजत से मनु की इस बड़ी मूर्ति को लगवाया था.

तब राज्यभर में हंगामा मचा था और राजस्थान हाईकोर्ट की प्रशासनिक पीठ ने इसे हटाने के लिए रजिस्ट्रार के जरीए न्यायिक सेवा संगठन को कहा था, लेकिन तभी हिंदू महासभा की तरफ से आचार्य धर्मेंद्र ने मनु की मूर्ति हटाने के खिलाफ हाईकोर्ट में स्टे और्डर की याचिका लगा दी थी कि एक बार लगाई गई मूर्ति हटाई नहीं जा सकती.

तब से ले कर आज तक केवल 2 बार ही इस मामले की सुनवाई हुई है. जब भी सुनवाई होती है कोर्ट में टकराव का माहौल बन जाता है और मामला बंद कर दिया जाता है.

इस मामले में कोर्ट ने गृह विभाग के सचिव के जरीए नोटिस भेज कर भारत सरकार को भी पक्षकार बनाने को कहा था, लेकिन मामले की गंभीरता को देखते हुए केंद्र सरकार खुद को इस विवाद से दूर रखे हुए है.

इनसानियत के माथे का कलंक

हाईकोर्ट के बिल्डिंग प्लान में ऊंचनीच व छुआछूत की जहरीली व्यवस्था के जनक मनु की मूर्ति लगाने का कोई प्रस्ताव नहीं था. पर भारतीय सनातनी समाज के मन में मनु बहुत गहरे समाया रहा है, इसलिए जाति और वर्ण की ऊंचनीच भरी व्यवस्था को सही बताने वाले मनु को कभी महर्षि कहा जाता है, तो कभी वह भगवान मनु के रूप में इज्जत पाता है.

अंबेडकरवादी और प्रगतिशील मानवतावादी लोगों व दूसरे संगठनों ने मनु की मूर्ति के अनावरण के कार्ड छप कर बंट जाने के बावजूद 28 जून, 1989 को तब के कार्यवाहक चीफ जस्टिस मिलापचंद जैन के हाथों होने वाले अनावरण समारोह को नहीं होने दिया था. कुछ ‘भीम सैनिक’ तो रात के वक्त छैनीहथौड़े भी ले कर पहुंच गए थे लेकिन वे कामयाब नहीं हो सके थे.

जब जयपुर हाईकोर्ट में लगाई गई मनु की मूर्ति का विरोध बढ़ा तो न केवल अनावरण रुका, बल्कि राजस्थान हाईकोर्ट की फुल बैंच ने प्रशासनिक मीटिंग में एक प्रस्ताव पास किया कि ‘मनु के प्रति कोई अनादर भाव रखे बिना ही इस मामले के विवाद को देखते हुए यह प्रस्तावित किया जाता है कि मूर्ति को राजस्थान हाईकोर्ट परिसर से हटा लिया जाए.’

अपने इस प्रस्ताव की पालना के लिए हाईकोर्ट की फुल बैंच ने राजस्थान हाईकोर्ट न्यायिक सेवा संगठन व लौयंस क्लब से गुजारिश की थी कि वे मूर्ति को हटा लें.

वे मूर्ति हटाते इस से पहले ही विश्व हिंदू परिषद के केंद्रीय मार्गदर्शक मंडल के सदस्य आचार्य धर्मेंद्र अपने पुरखे संघप्रिय मनु को बचाने के लिए इस मामले में कूद पड़े. आर्यसमाजी सामवेदी भी आ गए और अपनी लाश पर मूर्ति हटने की बात करने लगे.

मिलीभगत की मिसाल यह है कि जिस दिन स्टे के लिए याचिका लगी, उस के दूसरे ही दिन कोर्ट से स्टे भी मिल गया. तब से मनु की मूर्ति बिना लोकार्पित हुए ही यहां खड़ी है.

तमाम मनुवादी आज भी मनु के पक्ष में खुल कर खड़े हैं. पिछली सुनवाई 13 अक्तूबर, 2016 को हुई थी. राजस्थान हाईकोर्ट का नजारा देखने लायक था. बार तक जाति के आधार पर बंटा नजर आया. मनु समर्थक वकीलों ने विरोधी पक्ष के वकीलों को बोलने तक नहीं दिया था.

मनु विरोधियों का कहना है कि रोजरोज चिढ़ाते मनु का हम कुछ नहीं कर पा रहे हैं, क्योंकि मनुवाद फिर से बेहद मजबूत रूप से दोबारा उभर रहा है. इस की वजह यह है कि दलित बहुजनों को मनु, मनुस्मृति, मनुमूर्ति और मनुवाद से अब कोई तकलीफ नहीं लगती है. अब वे वारत्योहार बतौर रस्म ‘जय भीम’ व ‘जयजय भीम’ चिल्लाते हैं, मोटी तनख्वाह, तगड़ा फंड या बड़ा पद पाते हैं. उन के लिए अंबेडकर का दर्शन महज प्रदर्शन की चीज है. अब वे बाबा साहब अंबेडकर के नाम पर अपना मतलब साधने से नहीं चूकते हैं. यह अपराध पहले भी किया गया था और अब भी किया जा रहा है.

प्रधानमंत्री के पकौड़े का गणित

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देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पकौड़े बेचने वालों को कारोबारी बताया, तो पूरी भारतीय जनता पार्टी यह साबित करने में जुट गई कि पकौड़े बेचने से अच्छा कोई कारोबार नहीं है. वहीं विपक्ष इस बात पर जोर देने लगा कि प्रधानमंत्री ने पकौड़े को कारोबार से जोड़ कर कारोबारियों की बेइज्जती की है.

कांग्रेस नेता पी. चिदंबरम ने कहा कि अगर पकौड़े बेचने वाले कारोबारी हैं तो भीख मांगना भी रोजगार है. उत्तर प्रदेश में तो समाजवादी पार्टी के नेता और कुछ दूसरे संगठन सड़कों पर आ कर पकौड़े बेचने लगे. खबरें तो यह भी बनने लगीं कि इंजीनियरों द्वारा बनाए गए पकौड़े हाथोंहाथ बिक गए.

पूरे देश में अलगअलग तरह के पकौड़े बेचे जाते हैं. हर जगह पर इन को बेचने के तरीके अलग होते हैं. ज्यादातर पकौड़े सड़क किनारे बनी दुकानों, फुटपाथों पर बेचे जाते हैं. दफ्तर, स्कूल, कचहरी, अस्पताल, रेलवे स्टेशन और मेले वाली जगहों पर ये ज्यादा बिकते हैं. ज्यादातर इन को चाय के साथ खाया जाता है.

कुछ जगहों पर रसेदार सब्जी भी पकौड़ों के साथ परोसी जाती है. कुछ दुकानदार तीखीमीठी चटनी का इस्तेमाल करते हैं.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकसभा सीट वाराणसी में लहुरावीर चौराहे पर दिन में पकौड़े बेचने की एक दुकान चलती है. यहां ब्रैड के जले हुए किनारे को बेसन में घोल कर पकौड़े बना दिए जाते हैं.

पकौड़े बेचने वाले ज्यादातर सही क्वालिटी का बेसन इस्तेमाल नहीं करते हैं. कई लोग आटे में पीला रंग मिला कर उस को बेसन जैसा तैयार कर लेते हैं. बेसन के मुकाबले आटा सस्ता पड़ता है.

पकौड़े की लागत की बात करें तो 3 चीजों पर सब से ज्यादा खर्च होता है: गैस या भट्ठी, बेसन और जिस चीज का पकौड़ा बनना हो. ज्यादातर दुकानदार सीजन की सस्ती चीजों का इस्तेमाल कर के पकौड़े तैयार करते हैं, जिस से लागत कम और मुनाफा ज्यादा हो सके.

अच्छी दुकान वाला भी 200 से 250 पकौड़े ही पूरे दिन में बेच पाता है. ऐसे में वह रोज के 2 हजार से 4 हजार रुपए कमा पाता है.

एक दुकानदार के पास पकौड़े बनाने से ले कर बेचने तक 4 से 6 लोगों की जरूरत होती है. ये लोग पकौड़ा बनाने की सामग्री तैयार करने, पकौड़ा बनाने, ग्राहक को देने और बरतन साफ करने तक में लगे होते हैं.

इन पर आने वाला खर्च अगर निकाल दिया जाए तो 2 हजार से 4 हजार रुपए के पकौड़े रोज बेचने वाला अपने लिए 3 सौ से 4 सौ रुपए भी बड़ी मुश्किल से बचा पाता है.

पकौड़े बेचने वालों को भले ही सरकार को टैक्स न देना पड़ता हो, पर पुलिस, नगरनिगम और इलाकों के गुंडों को टैक्स देना पड़ता है. इसी वजह से ये लोग परेशान रहते हैं. शहरों में भट्ठी का इस्तेमाल कम होता है, गैस का इस्तेमाल ज्यादा होता है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भले ही यह कहें कि पकौड़ा बेचना आसान काम और मुनाफे का काम है, सचाई यह है कि आज भीड़भाड़ वाली जगह पर पकौड़े की दुकान खोलने की जगह ही मिलना मुश्किल है.

आलू के पकौड़े का खर्च 40 पकौड़े के लिए जरूरी सामान व दूसरे खर्च

सामान                        कीमत

1 किलो बेसन       :       60 रुपए

2 किलो आलू        :       20 रुपए

बेसन के लिए मिर्चमसाला        :       20 रुपए

1 सिलैंडर 3 दिन के लिए :       13 सौ रुपए

दुकान का किराया  :       5 से 10 हजार प्रतिमाह

4 मजदूरों की तनख्वाह   :       16 से 20 हजार रुपए

लव यू ! रेस्ट इन पीस : प्यार का अंत

3 जुलाई, 2017 को आतिश नाइक पत्नी तनुजा के साथ अपने गांव वरड़गांव आया था. तनुजा को घर में ही छोड़ कर वह दोपहर को होटल से खाना लाने गया तो शाम तक नहीं लौटा. इस बीच तनुजा भी घर से बाहर नहीं निकली तो पड़ोस में रहने वाली आतिश की चाची मोहिनी को चिंता हुई. क्या बात है, जानने के लिए उन्होंने आतिश के मोबाइल पर फोन किया तो उस का फोन बंद था.

उन्होंने आतिश के घर का दरवाजा खटखटाया तो अंदर से कोई आवाज नहीं आई. किसी अनहोनी की आशंका से उन का दिल बैठने लगा. जब आतिश से संपर्क नहीं हो सका और तनुजा ने भी दरवाजा नहीं खोला तो घबरा कर मोहिनी ने गोवा के मडगांवराय में रहने वाली आतिश की बहन को फोन कर के यह बात बता दी.

चाची की बात सुन कर आतिश की बहन घबरा गई. उस ने भी भाई को फोन किया, लेकिन संपर्क नहीं हो सका. इस के बाद वह पति के साथ वरड़ गांव के लिए रवाना हो गई. गांव पहुंच कर आतिश की बहन दूसरी चाबी से घर का ताला खोल कर अंदर दाखिल हुई तो वहां का मंजर देख उस के पैरों तले से जमीन खिसक गई. अंदर की स्थिति हैरान कर देने वाली थी. उस ने तुरंत पुलिस कंट्रोल रूम को सूचना दे दी.

घटनास्थल चूंकि फोंडा पुलिस थाने के अंतर्गत आता था. पुलिस कंट्रोल रूम से यह सूचना थाना फोंडा को मिली तो थानाप्रभारी सुदेश आर. नाइक तुरंत इंसपेक्टर परेश सिनारी, नितिन हरर्णकर आदि के साथ घटनास्थल के लिए रवाना हो गए. घटनास्थल थाने से ज्यादा दूर नहीं था, इसलिए पुलिस टीम 20 मिनट में वहां पहुंच गई. तब तक गांव के तमाम लोग इकट्ठा हो चुके थे.

पड़ोस में रहने वाली आतिश नाइक की चाची मोहिनी नाइक ने पुलिस को बताया कि आतिश अपनी पत्नी तनुजा के साथ उसी दिन सुबह करीब 8 बजे आया था और उन से अपने घर की चाबी ले गया था. घर के अंदर जाने के बाद दोनों के बीच कहासुनी होने लगी थी. पता नहीं वे किस बात पर झगड़ रहे थे. उन के लड़नेझगड़ने की आवाजें घर के बाहर तक आ रही थीं. पतिपत्नी के बीच इस तरह की कहासुनी होती रहती है, इसलिए उन्होंने इस बात पर ध्यान नहीं दिया था.

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दोपहर करीब 12 बजे वह आतिश और तनुजा को खाने के लिए बुलाने गईं तो आतिश दरवाजे पर ताला लगा कर कहीं जा रहा था. उन्होंने उस से खाने के लिए पूछा तो उस ने कहा, ‘‘तनुजा नानवेज खाना चाहती है, इसलिए होटल से नानवेज लाने जा रहा हूं. तनुजा सोई हुई है, इसलिए दरवाजे पर ताला लगा दिया है.’’

दोपहर का गया आतिश शाम तक लौट कर नहीं आया तो उन्होंने यह बात आतिश के बहनबहनोई को बता दी. पुलिस टीम घर में दाखिल हुई तो कमरे में खाट पर तनुजा की लाश सीधी अवस्था में पड़ी थी. उस के सीने पर एक तकिया रखा था.

इस से लगा कि तनुजा की हत्या उसी तकिए से की गई थी. तकिए के बीचोबीच एक दिल बना था, जिस में ‘लव यू’ लिखा था. इस के अलावा तकिए के एक कोने में ‘रेस्ट इन पीस’ लिखा हुआ था. कातिल ने लव यू लिख कर अपने मन का दर्द जाहिर किया था और रेस्ट इन पीस लिख कर शांति से आराम करने को कहा था. शायद हत्या करने वाला मृतका से काफी दुखी था.

सूचना पा कर एसपी कार्तिक कश्यप और डीएसपी सुनीता सावंत भी घटनास्थल पर आ गई थीं. इन्हीं के साथ फोरैंसिक टीम भी आई थी. फोरैंसिक टीम का काम खत्म हो गया तो अधिकारियों ने घटनास्थल और लाश का निरीक्षण किया. इस के बाद जरूरी काररवाई कर के लाश को पोस्टमार्टम के लिए अस्पताल भिजवा दिया गया.

मोहिनी नाइक की ओर से हत्या का मुकदमा दर्ज कर पुलिस ने मामले की जांच शुरू कर दी. हत्या का शक आतिश नाइक पर था. लेकिन वह फरार था. उस का पता नहीं चल रहा था. उस का फोन भी बंद था.

पुलिस आतिश को खोज रही थी, तभी पता चला कि उस ने अपनी बहन और बहनोई को फोन कर के कहा है कि उसी ने तनुजा की हत्या की है और वह गांव आ रहा है. यह पता चलते ही पुलिस सतर्क हो गई. फोंडा बसअड्डा और आतिश के घर के आसपास पुलिस लगा दी गई.

फोंडा आने वाली हर बस पर पुलिस की नजर थी. एक बस से जैसे ही आतिश उतरा, पुलिस ने उसे हिरासत में ले लिया. डीएसपी सुनीता सावंत के सामने उस से पूछताछ शुरू हुई तो उस ने बिना हीलाहवाली के तनुजा की हत्या का अपराध स्वीकार कर लिया. उस ने पत्नी की हत्या की जो कहानी बताई, वह इस प्रकार थी—

26 साल के आतिश नाइक के मातापिता की मौत तभी हो गई थी, जब वह 4 साल का था. मांबाप की मौत के बाद उसे गोवा के तटवर्ती इलाके मड़गांवराय में रहने वाली उस की बहन और बहनोई ने पालापोसा. आतिश की बहन और बहनोई जिस मोहल्ले में रहते थे, उसी मोहल्ले में तनुजा का भी परिवार रहता था.

वैसे तनुजा के घर वाले मूलरूप से कर्नाटक के कारवार शहर के रहने वाले थे. रोजीरोटी की तलाश में वे गोवा के मड़गांवराय आए थे. तनुजा और आतिश हमउम्र थे. चूंकि दोनों के परिवार आसपास रहते थे, इसलिए उन के बीच पारिवारिक संबंध थे. आतिश और तनुजा एक ही क्लास में पढ़ते थे, इतना ही नहीं दोनों स्कूल भी साथसाथ आतेजाते थे.

पढ़ाई के मामले में तनुजा आतिश से होशियार थी. आतिश का मन पढ़ाई में कम लगता था, नतीजा यह हुआ कि वह 10वीं में फेल हो गया. फेल होने के बाद उस ने पढ़ाई छोड़ दी और अपने बहनोई के साथ धंधे में लग गया, जबकि तनुजा पढ़ती रही. आतिश ने पढ़ाई भले छोड़ दी थी, लेकिन उस का तनुजा से मिलनाजुलना बरकरार था.

दोनों ने जवानी की दहलीज पर कदम रखा तो उन्हें एकदूसरे से प्यार हो गया. उन के दिलों में प्यार के अंकुर फूटे तो वे एकदूसरे को जीवनसाथी के रूप में देखने लगे. उन्हें लगता था, जैसे वे दोनों एकदूसरे के लिए ही बने हैं. दोनों सारी मर्यादाओं को ताक पर रख कर साथसाथ पार्क, पिकनिक, सिनेमा और रेस्टोरेंट जाने लगे.

समय के साथ दोनों का प्यार बढ़ता गया. आतिश ने अपना खुद का कैटरिंग का काम शुरू कर दिया, जो अच्छा चल निकला. तनुजा ने भी अच्छे नंबरों से 12वीं पास कर ली. अब दोनों शादी के बारे में सोचने लगे. लेकिन जब इस बात की जानकारी तनुजा के घर वालों को हुई तो वे सन्न रह गए. जबकि आतिश के घर वालों पर इस बात का किसी तरह का कोई असर नहीं हुआ.

तनुजा के घर वाले उस के भविष्य को ले कर परेशान थे. उन्होंने तनुजा को आतिश से मिलनेजुलने से रोका. तनुजा ने घर वालों की बात पर ध्यान न देते हुए कहा, ‘‘आखिर आतिश में बुराई क्या है, हम दोनों एकदूसरे से प्यार करते हैं. उस का कामधंधा भी ठीक चल रहा है.’’

तनुजा की इस बात पर उस के पिता ने कहा, ‘‘बेटा, उस में कोई बुराई नहीं है, लेकिन तुम यह क्यों नहीं समझतीं कि वह तुम्हारे काबिल नहीं है. वह 10वीं फेल है. तुम्हारा भविष्य और कैरियर दोनों उज्ज्वल हैं. तुम पढ़लिख कर आगे बढ़ सकती हो. तुम्हें अच्छी नौकरी और शादी के लिए अच्छा परिवार मिल सकता है. हम जो भी कह रहे हैं, तुम्हारे भले के लिए कह रहे हैं.’’

‘‘लेकिन पापा…’’ तनुजा अपनी बात पूरी कर पाती, उस के पहले ही उस के पिता ने कहा, ‘‘देखो बेटी, अब तुम बच्ची नहीं हो, 20-22 साल की हो गई हो. तुम खुद सोचसमझ सकती हो, मेरी भी कुछ मानमर्यादा है, समाज है. हम बस यही चाहते हैं कि तुम कोई ऐसा कदम मत उठाना, जिस से समाज और सोसायटी में मेरा और परिवार का सिर शर्म से झुक जाए.’’

तनुजा अजीब स्थिति में फंस गई थी. एक तरफ मातापिता और परिवार था तो दूसरी ओर प्यार था. कुछ दिनों तक तनुजा के दिलोदिमाग में मंथन चलता रहा. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे. आखिर उस ने परिवार के बजाय प्यार को ज्यादा महत्त्व दिया और घर वालों से बगावत कर के सन 2015 में आतिश से प्रेम विवाह कर लिया. इस विवाह में आतिश का पूरा परिवार उस के साथ था, जबकि तनुजा के परिवार का कोई भी सदस्य शादी में शामिल नहीं हुआ था. विवाह के बाद दोनों किराए का मकान ले कर रहने लगे. दोनों काफी खुश थे. उन्हें किसी से कोई शिकायत नहीं थी. आतिश अपने काम में रम गया तो तनुजा ने गृहस्थी संभाल ली.

लेकिन तनुजा जल्द ही घरगृहस्थी के कामों से ऊब गई. आतिश के काम पर जाने के बाद वह घर में अकेली रह जाती थी, जिस से उस का मन नहीं लगता था. ऐसे में उस ने आगे की पढ़ाई करने का फैसला लिया. उस के इस फैसले पर आतिश ने भी मोहर लगा दी. उस ने मड़गांवराय के एक कालेज में तनुजा का दाखिला करा दिया.

दाखिला होने से तनुजा बहुत खुश हुई. आतिश उस की पढ़ाई में हर तरह से सहयोग कर रहा था. लेकिन समय के साथ दोनों के बीच दूरियां बढ़ने लगीं. इस की वजह यह थी कि तनुजा अब कालेज के माहौल में रम गई थी. उस का आचारविचार और व्यवहार बदल गया था.

उस के कई नए दोस्त और सहेलियां बन गई थीं. वह उन के बीच समय भी बिताने लगी थी. घर और आतिश के प्रति वह लापरवाह हो गई थी. कालेज से घर आने के बाद भी वह घंटों मोबाइल से चिपकी रहती, बिना बताए यारदोस्तों के साथ पार्टी और पिकनिक पर चली जाती.

यह सब देख कर आतिश के मन में तरहतरह के सवाल उठने लगे. वह उस पर शक करने लगा. उसे डर लगने लगा कि कहीं वह तनुजा को खो न दे. अपने इस डर को दूर करने के लिए जब भी वह उस से बात करने की कोशिश करता, तनुजा उस पर बरस पड़ती और ताने मारने के साथसाथ उस का अपमान भी करने से नहीं चूकती.

कभीकभी वह यह भी कह देती कि मेरे मांबाप ठीक ही कहते थे कि तुम मेरे लायक नहीं हो. पता नहीं मुझे क्या हो गया था कि मैं ने तुम जैसे कम पढ़ेलिखे से विवाह कर लिया. मेरा एहसान मानने के बजाय तुम मुझ पर संदेह करते हो. न तुम्हारे पास कोई अच्छी सर्विस है और न ही भविष्य उज्ज्वल है. इस के बावजूद मैं तुम पर भरोसा करती हूं, पर तुम्हें मुझ पर भरोसा नहीं है.

दोनों के बीच विवाद बढ़ जाता तो तनुजा लड़झगड़ कर कुछ दिनों के लिए अपने मायके चली जाती. कुछ दिनों बाद आतिश ससुराल जा कर उसे मना कर ले आता. मातापिता के समझाने के बाद तनुजा का रवैया कुछ दिनों तक तो ठीक रहता, लेकिन फिर वैसा ही हो जाता. धीरेधीरे तनुजा का व्यवहार और ताने आतिश की बरदाश्त से बाहर होते गए.

पहली जुलाई, 2017 को तनुजा कालेज से काफी देर से घर आई. घर आते ही वह मोबाइल फोन से चिपक गई तो आतिश का धैर्य जवाब दे गया. उसे यकीन हो गया कि उस का किसी से अफेयर चल रहा है. उस ने उस से कालेज से देर से आने और आते ही फोन करने के बारे में पूछा तो वह ठीक से जवाब देने के बजाय उसे ही चुप कराने लगी. इस से आतिश का रहासहा धैर्य भी जवाब दे गया. उस ने उसी समय एक खतरनाक फैसला ले लिया.

3 जुलाई, 2017 को आतिश गांव घुमाने के बहाने तनुजा को वहां ले गया. उसे मालूम था कि गांव वाले घर की एक चाबी चाची मोहिनी के पास रहती है. चाची ही उस के घर और काश्तकारी की देखरेख करती थीं. गांव पहुंच कर आतिश ने बीती बातों का जिक्र फिर से छेड़ दिया. वह उस पर कालेज छोड़ने और दोस्तों से ज्यादा बातें न करने का दबाव बनाने लगा, जबकि तनुजा यह नहीं चाहती थी. उसे अपनी कालेज लाइफ भी देखनी थी.

वह कह रही थी कि उस के दोस्त सिर्फ दोस्त हैं. इस के अलावा उन का उस से कोई और रिश्ता नहीं है. लेकिन संदेह का कीड़ा आतिश के दिमाग में घुस कर कुछ इस तरह हावी हो गया था कि उस की सोचने और समझने की शक्ति खत्म हो गई थी. उसे अब तनुजा की किसी भी बात पर भरोसा नहीं हो रहा था, जिस की वजह से आतिश ने सोते समय तनुजा के मुंह पर तकिया रख कर उस की हत्या कर दी.

पत्नी की हत्या कर के वह कुछ देर तक बुत बना उसे देखता रहा. इस के बाद उस ने तनुजा के पर्स से लिपस्टिक निकाली और तकिए के कवर पर दिल का आकार बना कर उस के अंदर ‘लव यू’ और तकिए के एक कोने में ‘रेस्ट इन पीस’ लिख दिया. इस के बाद जब वह बाहर आ कर मुख्य दरवाजे पर ताला लगा रहा था, तभी उस की चाची मोहिनी आ गईं. उस ने चाची को बताया कि वह तनुजा के लिए होटल से नानवेज लाने जा रहा है.

आतिश वहां से सीधे कर्नाटक के वेलगांव में रहने वाले अपने एक दोस्त के यहां चला गया. लेकिन वहां उसे सुकून नहीं मिला. उस के सामने बारबार तनुजा का सुंदर चेहरा घूम रहा था. अगले दिन सुबह उस ने अपनी बहन को फोन कर के अपना गुनाह कबूल करते हुए कहा कि अब वह भी अपने जीवन का अंत करने जा रहा है, क्योंकि तनुजा के बिना उस के जीवन में कुछ नहीं बचा है.

उस के बहनबहनोई ने उसे समझाते हुए ऐसा करने से मना किया और उसे गांव लौट आने को कहा. उन के समझाने पर आतिश जब अपने गांव पहुंचा तो उस की ताक में बैठी पुलिस ने उसे पकड़ लिया. आतिश ने अपना अपराध स्वीकार कर के पूरी बात पुलिस को बता दी.

विस्तार से पूछताछ के बाद पुलिस ने आतिश के खिलाफ तनुजा की हत्या का मुकदमा दर्ज कर उसे अदालत में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक वह जेल में था. मामले की जांच थानाप्रभारी सुरेश नाइक कर रहे थे.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

तिनके की तरह बिखरा परिवार

21 जून, 2017 की सुबह करीब 6 बजे की बात है. पूर्वी दिल्ली के सीमापुरी थाना के एएसआई हीरालाल नाइट ड्यूटी पर थे. उन्हें पुलिस कंट्रोल रूम से सूचना मिली कि दिलशाद गार्डन के पी ब्लौक के फ्लैट नंबर-पी 13 में हिंसक वारदात हो गई है. मामले की सूचना दर्ज कर वह हैडकांस्टेबल कर्मवीर को साथ ले कर मोटरसाइकिल से घटनास्थल की ओर रवाना हो गए.

घटनास्थल थाने से करीब एक किलोमीटर दूर था, इसलिए वह 10 मिनट के अंदर ही वहां पहुंच गए. फ्लैट के बाहर खड़े लोग कानाफूसी कर रहे थे. हीरालाल ने उन में से किसी से घटना के बारे में पूछा तो पता चला कि उस फ्लैट में रहने वाले विनोद बिष्ट ने अपनी पत्नी रेखा के ऊपर कातिलाना हमला किया है.

हीरालाल फ्लैट के अंदर पहुंचे तो उन्हें कमरे के फर्श पर खून ही खून फैला दिखाई दिया. वहां मौजूद लोगों ने उन्हें बताया कि गंभीर रूप से घायल रेखा और उस के बेटे विनीत को पीसीआर वैन गुरु तेगबहादुर (जीटीबी) अस्पताल ले गई है. घटनास्थल की निगरानी के लिए एएसआई हीरालाल ने हैडकांस्टेबल कर्मवीर को वहीं छोड़ दिया और खुद जीटीबी अस्पताल पहुंच गए.

अस्पताल पहुंचने पर उन्हें पता चला कि रेखा ने अस्पताल पहुंचने से पहले ही दम तोड़ दिया था. उस के बेटे विनीत का इलाज चल रहा था. हीरालाल विनीत से मिले. उस ने बताया कि मां को बचाने की कोशिश में उस के पिता ने उस के ऊपर भी चापड़ से वार कर दिया था, जिस से उस की हथेली कट गई थी. उन्होंने घायल विनीत का बयान दर्ज कर लिया.

विनीत का बयान ले कर एएसआई हीरालाल ने घटना की सूचना थानाप्रभारी संजीव गौतम को फोन द्वारा दे दी. इस के बाद अन्य औपचारिक काररवाई पूरी कर के उन्होंने रेखा की लाश को पोस्टमार्टम के लिए जीटीबी अस्पताल की मोर्चरी में रखवा दिया.

थानाप्रभारी संजीव गौतम ने घटना की जानकारी एसीपी हरेश्वर वी. स्वामी और डीसीपी नूपुर प्रसाद को दी और खुद घटनास्थल के लिए चल दिए. थानाप्रभारी विनोद बिष्ट के पड़ोसियों से घटना के संबंध में पूछताछ कर रहे थे, तभी क्राइम इनवैस्टीगेशन टीम, एसीपी हरेश्वर वी. स्वामी के साथ डीसीपी नूपुर प्रसाद भी पहुंच गईं. दोनों अधिकारियों ने घटनास्थल का मुआयना किया और जीटीबी अस्पताल में भरती विनीत से मिलने पहुंच गए.

क्राइम इनवैस्टीगेशन टीम ने घटनास्थल से सबूत जुटाए. विनीत से बात कर के साफ हो गया था कि घर के मुखिया विनोद बिष्ट ने ही वारदात को अंजाम दिया था, इसलिए पुलिस ने विनोद के खिलाफ भादंवि की धारा 302, 324 के तहत मामला दर्ज कर लिया.

विनोद बिष्ट फरार हो चुका था. उस की गिरफ्तारी के लिए डीसीपी नूपुर प्रसाद ने एसीपी हरकेश्वर वी. स्वामी के निर्देशन में सीमापुरी थाने और स्पैशल स्टाफ की एक टीम का गठन किया, जिस में थानाप्रभारी संजीव गौतम, अतिरिक्त थानाप्रभारी जे.के. सिंह, एसआई राहुल, गौरव, एएसआई हीरालाल, हैडकांस्टेबल कर्मवीर, कांस्टेबल जगवीर एवं स्पैशल स्टाफ के एएसआई अशोक राणा आदि को शामिल किया.

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अतिरिक्त थानाप्रभारी जे.के. सिंह ने आरोपी के भाई मदन बिष्ट को पूछताछ के लिए थाने बुलाया. उस से विनोद के मोबाइल नंबर, दोस्तों के नाम तथा उस के छिपने के संभावित जगहों के बारे में पूछताछ की गई तो उस ने बताया कि वह पौड़ी गढ़वाल स्थित अपने पैतृक घर जा सकता है.

एसीपी के निर्देश पर पुलिस टीमों को बसअड्डों तथा रेलवे स्टेशनों पर भेजा गया, मगर विनोद पुलिस के हत्थे नहीं चढ़ा. पुलिस टीमें खाली हाथ लौट आईं. पुलिस ने अपने मुखबिरों को भी सतर्क कर दिया था. मुखबिर की सूचना पर अतिरिक्त थानाप्रभारी जे.के. सिंह अपनी टीम के साथ विनोद के फ्लैट के निकट पहुंच कर उस का इंतजार करने लगे.

कुछ देर बाद किसी ने बताया कि पार्क के पास एक आदमी छिपा बैठा है. पुलिस टीम ने वहां पहुंच कर उस आदमी को हिरासत में ले लिया. वह कोई और नहीं, विनोद बिष्ट ही था. उस की पीठ पर एक पिट्ठू बैग था. बैग की तलाशी ली गई तो उस में से एक खून सनी शर्ट और एक चापड़ बरामद हुआ. पुलिस टीम उसे ले कर थाने आ गई. थाने में जब विनोद से पूछताछ की गई तो उस ने अपना जुर्म स्वीकार कर पत्नी की हत्या करने की जो वजह बताई, वह इस प्रकार थी—

मूलरूप से उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल का रहने वाला विनोद अपने परिवार के साथ पिछले 30 सालों से दिल्ली के दिलशाद गार्डन के पी ब्लौक में रह रहा था. उस के परिवार में पिता सतीश बिष्ट, माता शकुंतला देवी, भाई मदन बिष्ट, उस की पत्नी कुसुम और विनोद की पत्नी रेखा तथा 2 बेटे थे.

उस का बड़ा बेटा विनीत पढ़ने में ठीकठाक था. वह 10वीं में पढ़ रहा था, जबकि छोटा बेटा संचित छठीं कक्षा में पढ़ता था. विनोद की सन 2001 में रेखा से शादी हुई थी.

शादी के बाद से पतिपत्नी अपने फ्लैट में खुशहाल जीवन गुजार रहे थे. विनोद कृष्णानगर के गुरमीत टेंटहाउस में मैनेजर था, जहां उसे अच्छा वेतन मिलता था. किसी बात की कमी न होने के कारण उस के दोनों बच्चे अच्छे स्कूलों में पढ़ रहे थे.

विनोद की ड्यूटी अकसर रात में होती थी. ऐसे में वह सुबह घर लौटता था. छोटा भाई मदन बिष्ट अपने परिवार के साथ पड़ोस में ही रहता था. दोनों भाई दिल्ली में ही रह रहे थे. उन्हें गांव जाने का मौका न के बराबर मिलता था, इसलिए कुछ सालों पहले विनोद ने अपने मातापिता को भी अपने पास दिल्ली बुला लिया था.

विनोद के बड़े बेटे विनीत को 10वीं में अच्छे नंबर मिले थे. बेटे के अंक देख कर विनोद और रेखा काफी खुश थे और उस के भविष्य की रूपरेखा तय करने में जुटे थे.

वैसे तो विनोद और रेखा का दांपत्य ऊपर से शांत और स्वच्छ नजर आ रहा था. लेकिन हकीकत कुछ और थी. रेखा की उम्र 36 साल के आसपास थी. लेकिन मौडर्न लाइफस्टाइल और आकर्षक डिजाइनर कपड़ों में वह मुश्किल से 25 साल की लगती थी. वह रोजाना अपने छोटे बेटे को स्कूल छोड़ने जाती थी, जहां और भी कई बच्चों के मातापिता आते थे.

उसी कालोनी का रहने वाला विकास भी अपने बेटे को स्कूल छोड़ने जाता था. उसे रेखा बहुत अच्छी लगती थी. वह चोरीछिपे उसे निहारता रहता था. रेखा उसे इस तरह चोरीछिपे ताकते हुए देखती तो उसे मन ही मन अजीब सी खुशी मिलती. विकास ऊंची कदकाठी का तनदुरुस्त युवक था. शक्लसूरत अच्छी होने के साथ वह खुद को मेंटेन रखता था. कुछ दिनों तक रेखा ने उसे ज्यादा तवज्जो नहीं दी. वह उस की नजरों को नजरअंदाज करती रही.

पर रेखा ज्यादा दिनों तक अपने इस रुख पर कायम नहीं रह सकी. विकास की चाहत ने उस के दिल में घंटी बजानी शुरू कर दी. वह भी कनखियों से उसे देखने लगी. एक दिन दोनों की नजरें मिलीं तो रेखा ने मुसकरा दिया. इस के बाद विकास की हिम्मत बढ़ गई. उस के समीप आ कर उस ने पूछा, ‘‘कहां से आती हैं आप?’’

रेखा ने भी उसे निराश नहीं किया. जवाब में उस ने कहा, ‘‘पी ब्लौक से.’’

इस के बाद दोनों इधरउधर की बातें करने लगे. जाते समय दोनों ने एकदूसरे को अपनेअपने मोबाइल नंबर दे दिए.

इस के बाद उन्हें जब भी मौका मिलता, अपने दिल की बातें कर लेते. रात को विनोद घर पर नहीं होता था और रेखा के बच्चों का बैडरूम अलग था. अकेली तनहाई में जब रेखा को नींद न आती तो वह मोबाइल पर विकास से मीठीमीठी बातें कर के अपने दिल की आग को शांत करने की कोशिश करती.

दोनों जवान और खूबसूरत होने के साथ एकदूसरे के प्रति आकर्षित थे. कुछ ही दिनों में दोनों ने मोबाइल पर समय तय कर के  मिलना शुरू कर दिया. रेखा को घर के कामकाज से बाहर जाना ही पड़ता था. ऐसे में वह विकास को फोन कर देती थी. विकास उस से मिलने आ जाता था.

मुलाकातों का सिलसिला चल निकला तो दोनों करीब आ गए और उन के बीच शारीरिक संबंध भी बन गए. इस के बाद रेखा के स्वभाव में परिवर्तन यह आ गया कि उस ने पति की ओर ध्यान देना बंद कर दिया.

रेखा के बदलते रंगढंग देख कर विनोद को उस पर शक होने लगा. वह दिन में घर पर ही रहता था, इसलिए उस ने उस की हरकतों पर नजर रखनी शुरू कर दी. एक दिन उस ने रेखा के मोबाइल फोन के सारे नंबर चैक किए. जब भी उसे कोई अंजान नंबर दिखाई दे दिया, उस ने पूरी तसल्ली के साथ उस नंबर के बारे में पूछा. रेखा निडर हो कर जवाब दे रही थी, पर विनोद महसूस कर रहा था कि रेखा उस से कुछ छिपा रही है.

शक की दीवार रिश्तों के बीच आई तो दांपत्य में कड़वाहट घुलने लगी. उन के बीच अविश्वास की खाई चौड़ी होती गई. परिणामस्वरूप अकसर दोनों के बीच किसी न किसी बात को ले कर लड़ाईझगड़ा होने लगा.

कुछ दिनों पहले विनोद के मातापिता पौड़ी गढ़वाल चले गए. इसी बीच एक दिन रेखा बेटे को स्कूल से लाने गई तो उसे विकास मिल गया. विकास से बातें कर रेखा अपने सारे दुख दूर कर लेती थी. वह विकास से बातें कर रही थी कि उस के मोबाइल पर विनोद का फोन आ गया. वह पति का फोन रिसीव कर उस से बातें करने लगी. बीचबीच में वह अपने साथ चल रहे प्रेमी विकास से भी बातें करती रही.

वह प्रेमी से जो बातें कर रही थी, उसे विनोद भी सुन रहा था. विनोद ने उन बातों को अपने फोन में रिकौर्ड कर लिया था. रेखा की इन बातों से विनोद समझ गया कि रेखा का जरूर किसी से संबंध है. वह घर आई तो विनोद ने बेटे को दूसरे कमरे में भेज कर रेखा को अपने पास बिठा कर मोबाइल की रिकौर्डिंग सुनाई. रिकौर्डिंग में कुछ ऐसी बातें भी थीं, जो कोई औरत अपने पति या प्रेमी से ही कर सकती थी.

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रिकौर्डिंग सुन कर रेखा सन्न रह गई. विनोद ने उस दिन रेखा को जम कर पीटा. शाम को उस ने रेखा को नया मोबाइल नंबर दिला दिया, साथ ही उस ने उसे चेतावनी दी कि अब अगर उस ने उस से बात की तो ठीक नहीं होगा. फोन नंबर बदलने के कारण उस की प्रेमी से बात नहीं हो पा रही थी. इस की वजह यह थी कि विकास का नंबर उसे याद नहीं था और विनोद ने फोन से उस का नंबर डिलीट कर दिया था. रेखा को प्रेमी से बात किए बिना चैन नहीं मिल रहा था. इसलिए उस ने अपना नया नंबर विकास को दे दिया. वह फिर प्रेमी से मिलने लगी. यानी उस ने प्रेमी से मिलनाजुलना नहीं छोड़ा.

विनोद को जब पता चला कि रेखा अब भी प्रेमी से मिलती है तो उसे बहुत गुस्सा आया. उस ने रेखा से साफ कह दिया कि अगर उसे उस के साथ रहना है तो ठीक से रहे अन्यथा अपने प्रेमी के साथ रहने चली जाए. वह उसे कुछ नहीं कहेगा.

लेकिन रेखा भी अब ढीठ हो गई थी. उस ने विनोद की बात एक कान से सुनी अैर दूसरे से निकाल दी. लिहाजा उन के बीच कलह बढ़ने लगी. जब भी दोनों के बीच ज्यादा झगड़ा होता, रिश्तेदार बीचबचाव कर के सुलह करा देते. इस की वजह से घरेलू कलह का मामला कभी थाने तक नहीं पहुंचा.

20 जून, 2017 मंगलवार को दिलशाद गार्डन में स्थानीय साप्ताहिक बाजार लगा था. बाजार में रेखा को विकास मिल गया. दोनों आपस में बातें करने लगे. उसी बीच वहां विनोद पहुंच गया. उस ने रेखा और विकास को देखा तो उस का गुस्सा सातवें आसमान पर जा पहुंचा. लेकिन गुस्से को काबू कर वह अपने फ्लैट पर आ गया. रेखा घर लौटी तो उस ने दोटूक कहा, ‘‘तुम अब मेरे साथ नहीं रह सकती. तुम मेरा घर छोड़ कर उसी कमीने के साथ रंगरलियां मनाने चली जाओ.’’

इस पर रेखा ने कहा कि वह घर छोड़ कर नहीं जाएगी और जो उस का मन करेगा, वही करेगी. पत्नी की बात सुन कर विनोद को गुस्सा तो बहुत आया, पर वह कुछ सोच कर गुस्से को पी गया.

अगले दिन छोटे बेटे को स्कूल से लाने के लिए विनोद खुद गया और उसे उस के ननिहाल छोड़ कर अकेला घर आया. विनोद का साला भी दिलशाद गार्डन में ही रहता था. रेखा ने बेटे को मायके में छोड़ आने की बात पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया. शाम को दोनों में काफी लड़ाई हुई. इस के बाद विनोद ड्यूटी पर कृष्णानगर चला गया. वहां वह रात भर शराब पीता रहा. योजना बना कर उस ने मीट काटने वाला चापड़ अपने बैग में छिपा कर रख लिया और सुबह 5 बजे घर पहुंचा.

योजना को अंजाम देने के लिए विनोद ने छोटे भाई के कमरे की कुंडी बाहर से बंद कर दी. इस के बाद उस ने रेखा से दरवाजा खोलने को कहा. जैसे ही रेखा ने फ्लैट का दरवाजा खोला, विनोद ने उसे मारना शुरू कर दिया. रेखा ने बेटे विनीत को बचाने के लिए आवाज दी. उसी समय विनोद ने छिपाया चापड़ निकाल लिया.

खतरा भांप कर रेखा बचने के लिए बाहर भागी, लेकिन विनोद चौकन्ना था. वह किसी कीमत पर रेखा को छोड़ना नहीं चाहता था. उस ने चापड़ से रेखा के सिर पर वार कर दिया. रेखा के सिर से खून का फव्वारा फूट पड़ा. वह वहीं फर्श पर गिर पड़ी.

विनीत ने मम्मी को बचाने के लिए हाथ आगे बढ़ाया तो चापड़ उस के हाथ पर लग गया. पापा की इस हरकत से डर कर विनीत चाचा मदन को बुलाने बाहर भागा. उस गुस्से में विनोद ने रेखा के ऊपर 35 वार किए. विनीत चाचा के कमरे की बाहर से लगी कुंडी खोल कर उन्हें बुला लाया. रेखा की चीखपुकार सुन कर पड़ोसी भी वहां आ गए थे. लोगों को देख कर विनोद वहां से भाग निकला.

आनंद विहार के पास एक सुनसान पब्लिक टायलेट में जा कर उस ने अपना रक्तरंजित शर्ट बदला और उसे पिट्ठू बैग में रख लिया. दिन भर उस ने कौशांबी में गुजारा. शाम को उसे अपने घायल बेटे विनीत की चिंता हुई तो वह उस के बारे में जानने के लिए फ्लैट पर आ रहा था. वह अपने कपड़े और नकदी ले कर पौड़ी गढ़वाल भाग जाना चाहता था, लेकिन अतिरिक्त थानाप्रभारी जे.के. सिंह की टीम ने उसे फ्लैट पर पहुंचने से पहले ही गिरफ्तार कर लिया.

22 जून को पत्नी के के हत्यारे विनोद को कड़कड़डूमा की अदालत में पेश किया गया, जहां से उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. आखिर रेखा की चरित्रहीनता ने एक हंसतेखेलते परिवार को बरबाद कर दिया.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

जानिए खुद को कैसे फिट रखती हैं कैटरीना कैफ

VIDEO : बिजी वूमन के लिए हैं ये ईजी मेकअप टिप्स

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बौलीवुड एक्ट्रेस कैटरीना कैफ के लाखों फैन्स सिर्फ उनकी फिटनेस और हेल्दी बौडी के दीवाने हैं. कैटरीना को अक्सर जिम में पसीना बहाते हुए देखा जाता है. वह अक्सर अपनी बौडी और खुद को फिट रखने के लिए घंटो जिम में वर्क आउट कर पसीना बहाती है.

इन दिनों कैटरीना के सिर पर एक्सरसाइज के नाम पर पावरलिफ्टिंग का खुमार चढ़ा हुआ है. खुद अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर फोटो और वीडियो को शेयर करके कैटरीना ने इसकी पुष्टि की है. अगर आप भी कैटरीना की तरह पावरलिफ्टिंग करने की सोच रहे हैं तो इससे पहले इस एक्सरसाइज के फायदों के बारे में जान लीजिए.

स्ट्रेंथ बढ़ाने में मददगार

पावरलिफ्टिंग उन लोगों के लिए एक बेहतर एक्सरसाइज मानी जाती है जो अपनी बौडी स्ट्रेंथ को बढ़ाना चाहते हैं. इस एक्सरसाइज को करने से टांगों, पीठ और अपर बौडी की मसल्स की स्ट्रेंथ बढ़ाती है. ऐसा माना जाता है कि पावरलिफ्टिंग में शामिल स्कवौटिंग टांगों के लिए सबसे ज्यादा फायदेमंद होती है.

फैट घटाने में मददगार

पावरलिफ्टिंग से शरीर में जमा एक्सट्रा फैट घटता है. कुछ ट्रेनर्स का मानना है कि ज्यादा लंबे समय तक इस एक्सरसाइज को करने से मेटाबौलिज्म पर असर पड़ता है जिससे वजन घटता है.

एथलेटिक के लिए मददगार

पावरलिफ्टिंग खिलाड़ियों के लिए बेस्ट एक्सरसाइज कही जाकी है, क्योंकि इस एक्सरसाइज को करने से खिलाड़ी ज्यादा ऊंची छलांग लगा पाते हैं. इसके साथ ही पावरलिफ्टिंग खिलाड़ियों में फाइटिंग और मार्शल की क्षमता में बढ़ावा देता है.

बेस्ट फिटनेस तरीका

पावरलिफ्टिंग शरीर की कमजोर हड्डियों को मजबूत करने और शरीर के अंगों को संभालने वाले टिशू को फिट रखने में मजबूत करता है. इस एक्सरसाइज को करने से शरीर का हर हिस्सा मजबूत होता है.

चंद्रमुखी चौटाला ने अपनाया बिकनी अवतार

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छोटे पर्दे की फेमस अदाकारा चंद्रमुखी चौटाला यानी कि कविता कौशिक इन दिनों अपनी बोल्ड तस्वीरों की वजह से लगातार सुर्खियों में हैं. जी हां, कविता कौशिक ने इंस्टाग्राम अकाउंट पर कुछ बोल्ड तस्वीरें शेयर कर चर्चा में आ गई हैं. इन तस्वीरों में वह अपने पति रोनित विश्वास के साथ नजर आ रही हैं. बता दें कि कविता पिछले दिनों अपनी शादी की पहली सालगिरह के मौके पर गोवा गईं थीं. जहां उन्होंने पति के साथ जमकर मस्ती की.

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सोशल मीडिया पर शेयर की गई ज्यादातर तस्वीरों में वह बिकिनी पहने हुए और समुद्र की लहरों के बीच मस्ती करती नजर आ रही हैं. इन्ही में से एक तस्वीर में वह एक नए तरीके से यानी कि बिकिनी में योगा करते हुए नजर आ रही हैं. सोशल मीडिया पर फैन्स उनके इन तस्वीरों को काफी पसंद कर रहे हैं और तारीफों के पूल बांध दिए हैं. कुछ यूजर्स उन्हें हौट और सेक्सी बता रहे हैं. वहीं कुछ फैन्स उनके अपकमिंग शो के बारे में सवाल कर रहे हैं.

इसके साथ ही कविता को कुछ भद्दे कमेंट्स भी किए जा रहे हैं. कुछ इंस्टाग्राम यूजर्स का कहना है कि ‘तुम खूबसूरत हो लेकिन अब करियर में बहुत देर हो गई है’. वहीं कुछ लोगों ने इन बोल्ड तस्वीरों पर कमेंट करते हुए पूछा कि ‘आखिर यह फोटो कौन खींच रहा है?’.


ऐसी खबर भी है कि कविता शादी के एक साल बाद वेबसीरीज से कमबैक करने की तैयारी कर रही हैं. बता दें कविता को टीवी शो एफआईआर में उनके किरदार चंद्रमुखी चौटाला के लिए जाना जाता है. शो में उनके हरियाणवी अंदाज को काफी पसंद किया जाता था.

ऊंचे बिगड़ैल हुए बेलगाम

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इलाहाबाद के एक रेस्त्रां में ऊंची जातियों के बिगड़ैलों का एक दलित को पीटपीट कर मार डालने का मामला एक भयंकर खतरे का एक और एहसास है. इस से पहले हैदराबाद में रोहित वेमूला की खुदकुशी का मामला हुआ था. ऊना में दलितों को मारने का मामला हुआ था. राजस्थान के राजसमंद में एक लव जेहाद के नाम पर दलित को मारने की घटना हुई थी.

मोबाइलों से बनी ऐसी फिल्मों का अंबार लग चुका है जिन में दलितों को बुरी तरह मारा जा रहा है. औरतों और लड़कियों के बलात्कार के वीडियो भी वायरल होते रहे हैं.

सदियों से अछूतों के नाम से जाने जाने वाले दलित अब बराबरी की मांग कर रहे हैं और पढ़ने व कमाने के मौके पा कर देश की मुख्यधारा में शामिल होने की कोशिश कर रहे हैं पर मंदिर, पूजा, पाखंड की राजनीति ऊंची जाति बनाम नीची जाति की रणनीति बनने लगी है और दलितों को दबानेकुचलने की कोशिशें हो रही हैं. ऊंची जातियां चाहती हैं कि उन्हें सस्ते, असहाय, हुक्म मानने वाले मजदूर लगातार मिलते रहें और उन्हें डर लगता है कि अगर कल को दलित बराबर हो गए तो समाज का सदियों का बना ढांचा टूट जाएगा.

चूंकि इन दलितों के पास वोट का हक है और इन के नेता अपनी पहचान का फायदा उठाने से चूक नहीं रहे हैं और दलित अपने से ऊंची जातियों, चाहे वे बैकवर्ड कहलाती हों या राजपूत, वैश्य और ब्राह्मण, से भी कोई मेलजोल नहीं बना पा रही है.

इलाहाबाद के रेस्त्रां की घटना एक खौलते रुख की निशानी है. ऊंची जातियां चाहे वे सवर्ण हों या गैरसवर्ण सोचती हैं कि दलितों को वैसा ही रहना चाहिए जैसे वे सदियों रहे. दलित जातियां संख्या, चुनावी राजनीति और अब आरक्षण से मिली नौकरियों और पढ़ाई के बल पर बराबरी की सी मांग कर रही हैं. यह ऊंचों को सहन नहीं हो रहा और हर शहर, कसबे, गांव में इलाहाबाद जैसी घटनाओं की भरमार होने लगी है जिन में से कुछ ही सुर्खियां बनती हैं.

यह नहीं भूलना चाहिए कि देश की कामकाजी जनता मोटेतौर पर दलितों की है. सवर्ण तो कभी भी मेहनत का काम करते ही नहीं थे. ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य अपने हाथ से काम करना अपमान समझते रहे हैं. पहले पिछड़े वर्गों के लोग खेतों, कारखानों और खानों में मेहनत का काम करते थे पर अब इन की गिनती कम होने लगी है क्योंकि इन के पास जमीन आ गई?है. देश की तरक्की का दारोमदार आज दलितों पर है. उन से मेहनत करा सकते हो तो देश को चीन बना सकते हो. उन्हें जानवर की तरह रखोगे तो सारा देश गरीब बना रहेगा. उन से मारपीट करना अपने हाथों को जख्मी करना है. हो सकता है वे सहम जाएं, हो सकता है आपसी फूट की वजह से वे अपने हक न मांग सकें, हो सकता है पढ़े न होने के कारण वे पाखंडों में फंस जाएं पर इस सब से देश को नुकसान होगा.

देश की हर गली में तूतूमैंमैं हो, हर नुक्कड़ पर 2-4 गुट एकदूसरे को मारने की फिराक में खड़े हों, अदालतें ऊंचेनीचों के झगड़े निबटाने में लगी रहें, संसद में अत्याचारों की आवाजें ज्यादा गूंजें, तो देश आगे बढ़ने से रहा, उन्नति के सपने साकार होने से रहे.

दलितों के साथ बढ़ रहे अत्याचारों के पीछे वह पाखंडी सोच है जिसे हर रोज बढ़ावा दिया जा रहा है. संस्कृति की दुहाई दे कर जो बात हर बार याद दिलाई जाती है वह यही है कि समाज में अलगअलग खेमे भगवान की देन हैं, पिछले जन्मों के पापों के फल हैं. उन पर उंगली न उठाइए क्योंकि यही इस समाज का दस्तूर है. यहां हरेक को बोलने, चलनेफिरने में अपनी पैदाइश का खयाल रखना होगा. सिर्फ पढ़ाई कर लेने से जाति नहीं सुधर जाती. ऊंचों की सेवा करो तभी कल्याण होगा, यह सोच देश को उसी गड्ढे में फिर धकेल देगी जहां से निकलने की कोशिशें हो रही हैं.

यहूदियों ने सहीं सदियों यातनाएं

दुनिया में अत्याचारों और उनके प्रतिकार संघर्ष के किस्से, कहानियां तो सब ने बहुत सुनीपढ़ी होंगी, लेकिन क्या कोई विश्वास करेगा संसार में यहूदी कौम ऐसी है जिस ने एकदो सदी नहीं, बल्कि 3,500 सालों तक अत्याचार सहा है और अपने अदम्य साहस, संघर्ष, बलिदान के दम पर आज इसराईल देश के रूप में एक मिसाल कायम कर दी है. वह देश जिसे दुनिया में सब से स्वाभिमानी, सब से खतरनाक माना जाता है. जो कभी कुछ कहता नहीं, बल्कि करके दिखाता है. वह ईंट का जवाब पत्थर से देता है.

यहूदियों के जीवट, अदम्य साहस, असंभव को संभव करने का जज्बा, दृढ़ इच्छाशक्ति और राष्ट्रप्रेम की परिणति है कि 14 मई, 1948 को यहूदियों का स्वतंत्र राष्ट्र कायम हुआ जो आज पूरी दुनिया के लिए उदाहरण बन गया है.

आक्रमक तेवरों का इसराईल इतना खतरनाक क्यों बना, इस की वजह उस के अतीत के संघर्ष की गाथाओं में छिपी है. हर राजवंश ने यहूदियों को उस की धरती से बारबार खदेड़ कर दरदर की ठोकरें खाने को मजबूर कर दिया. नरसंहार का क्रम तभी रुका जब स्वतंत्र इसराईल का अस्तित्व स्थापित हुआ. याकूब के एक पुत्र का नाम यहूदा अथवा जूडा था. सो उस के वंशज यहूदी अथवा ज्यूज कहलाए.

यहूदियों के अतीत की जानकारी उनके धर्मग्रंथों विशेष कर बाइबिल के पूर्वार्ध ओल्ड टैस्टामैंट से मिलती है. एक रोचक तथ्य देखें, येरुशलम 3 धर्मों यहूदी, ईसाई और इसलाम के उदय से जुड़ा है. इन तीनों धर्मों को संयुक्त रूप से इब्राहिमी धर्म भी कहा जाता है. इस का कारण इब्राहीम का तीनों धर्मों के मूल से जुड़ा होना है. अब्राहम को अपने क्रांतिकारी विचारों के कारण उर (सूमेरियन सभ्यता का प्राचीन नगर) से निर्वासित हो आजीवन संघर्ष झेलना पड़ा. उस के बाद हजरत मूसा यहूदियों के सब से महान स्मृतिकार हुए. उन्होंने 1500 ई.पू. में असीम कष्ट संघर्ष सहन कर टुकड़ों में बंटी यहूदी जाति, जो अत्याचार सहती आ रही थी, को मिला कर एक जगह फिलिस्तीन में बसा दिया.

यहूदी अब इसे अपनी मातृभूमि, अपना देश समझने लगे, जिसे इसराईल नाम दिया गया. कालांतर में हजरत दाऊद और उनके पुत्र सुलेमान के समय यहूदियों ने खूब तरक्की की. उन का व्यापार अरब, एशिया, अफ्रीका, यूरोप और भारत तक फैल गया.

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937 ई.पू. सुलेमान की मृत्यु से यहूदियों के बुरे दिन फिर से शुरू हो गए. उनके मरते ही इसराईल और जूडा (यहूदा) फिर से बंट गए. जिन्हें 884 ई.पू. में उमरी नामक शासक ने मिल कर यहूदी एकता स्थापित की. उन की मृत्यु के बाद फिर आत्मघाती कलह शुरू हो गई.

722 ई.पू. में असीरिया ने यहूदियों की फूट का फायदा उठा कर उन की जगह पर कब्जा कर लिया. इस आक्रमण में हजारों यहूदियों का कत्लेआम हुआ. हजारों को बंदी बना कर असीमिया भेज दिया गया. कालांतर में यहूदी 610 ई.पू. में खल्दियों के अधीन आ गए.

ईरानी आधिपत्य

550 ई.पू. ईरान में हखमनी राजवंश सत्ता में आया और यहूदियों पर अब ईरानियों का आधिपत्य स्थापित हो गया. लेकिन ईरानी शासकों की उदारता रही जिस से यहूदियों ने इस कालखंड में खूब विकास उत्कर्ष किया. येरुशलम के नष्ट हुए मंदिर को फिर से बचाने की छूट व बंदियों को मुक्ति मिल गई. शताब्दियों बाद यहूदियों को खुशी का अवसर मिला जिस का दोनों फिरकों ने महत्त्व समझा. उसी समय यहूदी धर्म परिपक्व रूप से संकलित हुआ.

यूनानी अत्याचार

330 ई.पू. सिकंदर ने ईरान जीत कर हखमनी राजवंश का खात्मा कर दिया. उस के सेनापति टौलेमी प्रथम ने इसराईल और यहूदा पर अधिकार कर लिया. एक बार फिर 198 ई.पू. एंटीओकस चतुर्थ ने येरुशलम को लूट कर यहूदियों के शहर नेस्तनाबूद कर दिए. यहूदियों के प्रदेश यूनानी साम्राज्य में मिला दिए गए और मौत व जुल्म का तांडव शुरू हुआ. यहूदी धर्म पर प्रतिबंध लगा दिया गया. यूनानी देवताओं की पूजा जबरन शुरू कराई गई. 142 ई.पू. में एक यहूदी सेनापति साइमन ने यूनानी शासन से यहूदियों को मुक्ति दिलाई. यह आजादी 63 ई.पू. तक बनी रही.

रोमन सम्राटों के अत्याचार

66 ई.पू. में रोमन सेनापति पांपे ने येरुशलम सहित यहूदी प्रदेशों पर अधिकार स्थापित कर अत्याचारों की अमानवीय शृंखला शुरू की. हजारों यहूदी बंदी बनाए गए और 12,000 को मौत के घाट उतार दिया गया. अत्याचारों की इस कड़ी में 135 ई.पू. में रोमन सम्राट ने येरुशलम मंदिर को ध्वस्त कर, एकएक यहूदी को खोजखोज कर मार डालने का प्रयास किया. येरुशलम की जगह एक नया रोमन शहर बसाया गया जहां यहूदियों का प्रवेश पूरी तरह वर्जित कर दिया गया. यहूदी फिर से दरदर की ठोकरें खाने लगे. समय ने पलटा खाया और पहले ईसाई सम्राट कोंटेसटाइन ने रोमन शहर का नाम फिर से येरुशलम कर दिया. छठी सदी तक यहूदी रोम तथा कालांतर में बेजेंटाइन साम्राज्य के अधीन रहे.

अरब और यहूदी

इसलाम के उदय के बाद अरबों ने रोमन साम्राज्य का खात्मा किया. तब फिलिस्तीन जिस में इसराईल और यहूदा शामिल थे, अरबों के अधीन आ गए. सुखद पहलू यह रहा कि खलीफा उमर ने यहूदी पैगंबर दाऊद का प्रार्थनास्थल यहूदियों को सौंप दिया. 1099 में ईसाइयों ने इसराईल पर कब्जा कर लिया. एक बार फिर से विध्वंस का दौर चला जिस में लाखों यहूदियों को जान से हाथ धोना पड़ा.

क्रूसेड यानी धर्मयुद्ध

1147 से 1204 तक ईसाइयों के स्वयंसेवकों, जिनमें बच्चे भी शामिल थे, ने इसराईल को जीतने की कोशिश की जो धर्मयुद्ध कहलाया. यह संघर्ष लंबा चला लेकिन येरुशलम पर वे अधिकार स्थापित नहीं कर पाए.

मध्यकाल में मंगोल शासक हलाकू और समरकंद के तैमूर ने येरुशलम को नेस्तनाबूद कर दिया. हिंसा के तांडव को झेलते हुए यहूदी 19वीं सदी तक मिस्र और तुर्की के प्रभुत्व में रहे. प्रथम विश्वयुद्ध (1941-1918) के समय इसराईल तुर्कों के अधीन था.

स्वतंत्र इसराईल की नींव

तुर्की चूंकि मिस्र राष्ट्र के खिलाफ लड़ा था, इसलिए प्रथम विश्वयुद्ध में तुर्की की पराजय के बाद इसराईल पर ब्रिटेन का अधिकार कायम हो गया. 2 नवंबर, 1917 को ब्रिटिश विदेश मंत्री वालफोर ने ऐतिहासिक घोषणा की, ‘इसराईल को ब्रिटिश सरकार यहूदी राष्ट्र बनाना चाहती है, जिस में पूरी दुनिया से यहूदी आ कर बस सकते हैं.’ इस घोषणा के बाद पूरी दुनिया से यहूदियों का पलायन इसराईल में होने लगा.

होलोकास्ट – यहूदी नरसंहार

द्वितीय विश्वयुद्ध के पूर्वकाल में वह दौर शुरू हुआ जिस में जरमनी के नाजी तानाशाह हिटलर ने यहूदियों के संपूर्ण खात्मे का प्रयास किया. उस जुल्मोसितम की दास्तान से इतिहास भी शरमाता है. होलोकास्ट समूची यहूदी प्रजाति को जड़मूल से नष्ट करने का हिटलर का योजनाबद्ध कार्य था. वह जरमनी में जरमन जाति की श्रेष्ठता का नस्लवादी साम्राज्य स्थापित करना चाहता था. उस के विचार में यहूदी इंसानों की श्रेणी में नहीं थे, इसलिए उस की नफरत और हिंसा चरम पर जा पहुंची. हिसाब लगाया गया, यदि गोली मार कर यहूदियों का खात्मा किया तो यह बहुत खर्चीला काम होगा. इसलिए सस्ते उपाय खोजे गए ताकि कम लागत से यहूदियों की जान लेकर उनका नामोनिशान मिटाया जा सके.

1939 ई. में अंतिम हल (फाइनल सौल्यूशन) शुरू हुआ. इस में जहरीले गैस चैंबरों में हजारोंलाखों यहूदियों को जबरन ठूंस कर मारा जाने लगा. औस्विज ऐसा ही एक कुख्यात कत्लगाह कैंप था. अनुमान है कि उस दौर में लगभग 60 लाख यहूदियों को मौत के घाट उतारा गया. करीब एकतिहाई आबादी हिटलर के पागलपन का श्किर बनी. इस संगठित जनसंहार का प्रबंधन और कार्यप्रणाली मानव सभ्यता के लिए कलंक है. यहूदियों का दोष सिर्फ इतना था कि वे यहूदी पैदा हुए थे.

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हिटलर को यहूदियों से नफरत के कारण

इस विषय पर इतिहास में अनेक व्याख्याएं मिलती हैं. धार्मिक, ऐतिहासिक, जातीय, नस्लभेद, मनोवैज्ञानिक व वैचारिक घृणा इस नृशंस कृत्य की वजह बने थे. हिटलर जरमन नस्ल की सर्वश्रेष्ठता स्थापित करने पर तुला था. उसे यहूदियों की काबिलीयत तथा उन का प्रभुत्व सहन नहीं था. वह यहूदियों को विश्वासघाती और प्रथम विश्वयुद्ध में जरमनी की पराजय का कारण मानता था.

विनाशकारी आर्थिक मंदी के समय जब जरमन नागरिक भूख से मर रहे थे तब यहूदी संपन्नता का जीवन जी रहे थे. हिटलर यह भूल गया कि यह उन की मेहनत, समर्पण का परिणाम था न कि उनका षड्यंत्र. ऐसा भी माना जाता है कि हिटलर के बचपन के अनुभव भी यहूदियों के प्रति घृणा के कारण बने. हिटलर के समय रूढि़वादी ऐंटी सिमिटिक विचारधारा लोकप्रिय थी जिसमें जरमनी को हर बुराई या दुरावस्था का कारण यहूदियों को माना जाने लगा था. उनके नागरिक होने अथवा इंसान होने पर ही सवाल उठाए जाने लगे थे.

हिटलर का मानसिक संतुलन प्रथम विश्वयुद्ध के बाद हताश सिपाहियों की मनोदशा यहूदियों को षड्यंत्रकारी मानने लगी थी. इसलिए वह उनके खून का प्यासा बन गया. भीषण रक्तपात से उसे असीम सुकून मिलता था. जरमनी की कुल आबादी में यहूदी एक प्रतिशत भी नहीं थे, लेकिन उन का जरमनी में हर क्षेत्र में बोलबाला था. यही उनके पतन का कारण बन गया.

ऐन फ्रैंक

यहूदी संघर्ष और हिटलर के अमानवीय जनसंहार की गाथा ऐन फैंरक नाम के उल्लेख के बिना अधूरी है. उस दौर के यहूदियों के दर्द, सहनशक्ति, प्रतिकार, अदम्य साहस की अनुभूति ऐन फ्रैंक से होती है. 12 जून, 1929 में फ्रैंरकफर्ट में जन्मी ऐनेलीज मेरी फ्रैंक को 1933 में नाजी अत्याचारों के कारण अपने परिवार के साथ जरमनी छोड़ना पड़ा. एम्सटर्डम में शरण लेने के बाद नाजियों ने उन पर वहां भी जुल्म ढाए. उस का परिवार नाजियों के यातना शिविरों में मरखप गया. मरने से पूर्व उस ने एकएक कर अपने परिवार के सदस्यों को यातना शिविरों में दम तोड़ते देखा. यातना शिविरों के अत्याचारों को अपनी गुप्त डायरी में लिख कर छिपा दिया. यह 1947 में प्रकाशित हुई जिस ने तकरीबन 67 भाषाओं में अनुवाद होने तथा दुनिया में सब से ज्यादा पढ़ी जाने वाली रचना का गौरव हासिल किया. अंगरेजी में इसे ‘द डायरी औफ ए यंग गर्ल’ शीर्षक से छापा गया.

इस डायरी में उसके 12 जून, 1942 से 1 अगस्त, 1944 के बीच के घटनाक्रम का जिक्र है. इस से नाजीदल के भीषण अत्याचारों की जानकारी मिलती है. इस डायरी से प्रेरित हो कर साहित्य, फिल्म और कलाकृतियां निर्मित हुई हैं. वह होलोकास्ट की सब से जीवंत शिकार बन गई. वह उन 10 लाख यहूदी बच्चों में है जो हिटलर के पागलपन का शिकार हुए.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इसराईल यात्रा से जहां एक ओर कूटनीति की नई इबारतें लिखी गई हैं वहीं इसराईल एक बार फिर से विश्व रंगमंच पर छा गया है. इसराईल के विषय में जिज्ञासा बढ़ गई है. यह सच है कि इसराईल दुनिया का एकमात्र राष्ट्र है जो अलगथलग हो कर भी अपने दम पर आतंकवाद के खिलाफ मिसाल बना हुआ है.

प्रेम कहानी का दर्दनाक अंत

29 जुलाई, 2017 की रात साहिल उर्फ शुभम वोल्वो बस पकड़ कर लखनऊ से जौनपुर जा रहा था. उसके साथ उस का भाई सनी भी था. रात गहराते ही बस की लगभग सभी सवारियां सो गई थीं. रात 2 बजे फोन की घंटी बजी तो साहिल की आंखें खुल गईं. उसने मोबाइल स्क्रीन देखी, नंबर उस की भाभी शिवानी का था. उसने जैसे ही फोन रिसीव कर के कान से लगाया, दूसरी ओर से शिवानी ने रोते हुए कहा, ‘‘साहिल, राहुल अब नहीं रहा. मैं भी उसके बिना नहीं रह सकती.’’

‘‘कैसे, क्या हुआ, कहां है राहुल?’’ साहिल ने परेशान हो कर पूछा.

‘‘राहुल ने फांसी लगा कर आत्महत्या कर ली है. वह परदे की रस्सी बना कर उसी से लटक गया है.’’ शिवानी ने रोतेरोते कहा.

उस समय साहिल लखनऊ से काफी दूर बस में था. वह खुद कुछ कर नहीं सकता था, इसलिए वह सोचने लगा कि शिवानी की मदद कैसे की जाए. एकाएक उस की समझ में कुछ नहीं आया तो उसने कहा, ‘‘भाभी, आप जल्दी से राहुल भैया को उतारिए.’’

‘‘साहिल, मैं हर तरह से कोशिश कर चुकी हूं, पर उतार नहीं पाई. मैंने घर से बाहर जाकर कालोनी वालों को आवाज भी लगाई, पर कोई भी मेरी मदद के लिए नहीं आया. अब तुम्हीं बताओ मैं क्या करूं. मैं राहुल के बिना कैसे रहूंगी?’’ शिवानी ने रोते हुए साहिल से मदद मांगी.

‘‘भाभी, मैं तो लखनऊ से बहुत दूर हूं. आप एक काम करें, वहीं मेज पर लाइटर रखा होगा, आप उस से परदे की गांठ में आग लगा दीजिए, परदा जल कर टूट जाएगा. आप इतना कीजिए, तब तक मैं मदद के लिए किसी से बात करता हूं.’’

कह कर साहिल ने फोन काट दिया. इस के बाद उसने अपने कुछ दोस्तों को फोन किए, पर किसी से बात नहीं हो सकी. इस के बाद उसने लखनऊ पुलिस को फोन किया. उस वक्त रात के करीब ढाई बजे थे. लखनऊ पुलिस को फोन कर के साहिल ने बताया कि उसका भाई राहुल और भाभी शिवानी विनयखंड, गोमतीनगर के मकान नंबर 3/137 में रहते हैं, जो होटल आर्यन के पास है. उसके भाई को कुछ हो गया है. वह जौनपुर से विधायक और एक बार सांसद रह चुके कमला प्रसाद सिंह का पोता है.

कमला प्रसाद सिंह की जौनपुर में अच्छी साख थी. वह 2 बार जिला पंचायत अध्यक्ष रह चुके थे. जमुई में उनका इंटर कालेज भी है. उन के 2 बेटे विनय और अनिल हैं. राहुल अनिल का बड़ा बेटा था. पुलिस को जैसे ही पता चला कि विधायक और सांसद रहे कमला प्रसाद सिंह के घर का मामला है तो पुलिस तुरंत हरकत में आ गई.

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पुलिस की पीआरवी टीम के कमांडर रामनरेश गौतम सबइंसपेक्टर सुशील कुमार और ड्राइवर निहालुद्दीन के साथ विनयखंड पहुंच कर आर्यन होटल के पास मकान नंबर 3/137 खोजने लगे. रात का समय था, कालोनी में सन्नाटा पसरा था, इसलिए मकान मिल नहीं रहा था.  पुलिस को फोन करने के बाद साहिल ने शिवानी को फोन किया. लेकिन उस का फोन बंद हो चुका था. साहिल ने इस बात की जानकारी घर वालों को भी दे दी थी. जैसे ही घर वालों को इस घटना का पता चला, उन्होंने शिवानी को फोन करने शुरू कर दिए. लेकिन तब तक शिवानी का फोन बंद हो चुका था. इस से सब परेशान हो गए.

साहिल ने एक बार फिर पुलिस को फोन किया. पुलिस ने बताया कि वे मकान तलाश रहे हैं, लेकिन मकान मिल नहीं रहा है. इस पर साहिल ने कहा, ‘‘मेरे मकान का दरवाजा खुला होगा, क्योंकि भाभी ने बताया था कि वह दरवाजा खोल कर बाहर आई थीं.’’

जैसे फिल्मों और क्राइम सीरियलों में पुलिस समय पर नहीं पहुंचती, उसी तरह यहां भी हुआ. उधर साहिल से बात करने के बाद शिवानी ने अपना मोबाइल फोन बंद कर लिया था. वह लाइटर से परदे को जला रही थी, तभी राहुल की गरदन में फंसा फंदा खुल गया और वह नीचे गिर गया. उसके शरीर में कोई हरकत होती न देख शिवानी परेशान हो गई. उसे समझते देर नहीं लगी कि राहुल मर गया है.

पति को मरा देख कर वह वहां रखी प्लास्टिक की कुरसी पर चढ़ गई और परदे के दूसरे छोर में फंदा बना कर गले में डाला और पैर से कुरसी गिरा दी. इस के बाद वह भी लटक गई. थोड़ी देर पहले जो हाल राहुल का हुआ था, वही हाल शिवानी का भी हुआ. इस तरह पुलिस के पहुंचने से पहले ही उसने भी मौत को गले से लगा लिया.

आखिरकार पुलिस तलाश करती हुई उस घर तक पहुंच गई, जिस का मेनगेट और दरवाजा खुला था. पुलिस ने खिड़की से झांक कर देखा तो पता चला कि एक औरत रस्सी से लटक रही थी और एक पुरुष की लाश फर्श पर पड़ी थी. पुलिस ने कमरे के दरवाजे को धक्का दिया तो वह खुल गया.

मामला एक सांसद के परिवार का था. इसलिए मौके पर पहुंची पुलिस टीम ने तत्काल एएसपी (उत्तरी) अनुराग वत्स, सीओ (गोमतीनगर) दीपक कुमार सिंह, थाना गोमतीनगर के थानाप्रभारी विश्वजीत सिंह को भी इस घटना की सूचना दे दी. उस समय सभी अधिकारी गश्त पर थे, इसलिए सूचना मिलते ही घटनास्थल पर पहुंच गए.

पुलिस ने जल्दी से लाश उतार कर फर्श पर लेटा दी. पुलिस की गाड़ी देख कर कालोनी वाले भी इकट्ठा होने लगे थे. पुलिस को उन से पूछताछ में पता चला कि ज्यादातर यह मकान खाली ही रहता था. कभीकभी ही कोई उसमें रहने आता था. इसलिए आसपास रहने वालों से उन लोगों का कोई खास संबंध नहीं था. आमनेसामने पड़ जाने पर दुआसलाम जरूर हो जाती थी.

सांसद के पौत्र और पौत्रवधू की मौत की खबर पाकर पूरी कालोनी में हड़कंप मच गया था. पुलिस ने घर वालों से बातचीत कर के सच्चाई का पता लगाने की कोशिश की. लेकिन कोई ऐसी बात सामने नहीं आई, जिससे आत्महत्या पर शक किया जा सकता. पोस्टमार्टम रिपोर्ट से भी स्पष्ट हो गया था कि मामला आत्महत्या का ही है. पोस्टमार्टम के बाद शिवानी और राहुल की लाशें जौनपुर के लाइनबाजार स्थित कमला प्रसाद सिंह के घर पहुंचीं तो वहां हड़कंप मच गया. घर के सभी लोगों का रोरो कर बुरा हाल था. जौनपुर में ही दोनों का अंतिम संस्कार कर दिया गया.

मामले की जांच के लिए पुलिस ने शिवानी और साहिल के मोबाइल नंबर की काल डिटेल्स निकलवाई तो उससे भी पहले से दिए गए बयान और हालात मिलते नजर आए. शिवानी और राहुल के बीच दोस्ती कालेज में पढ़ाई के दौरान हुई थी. जल्दी ही यह दोस्ती प्यार में बदल गई थी. उसके बाद दोनों ने शादी करने का फैसला कर लिया.

शिवानी के पिता सेना से रिटायर हो चुके थे. वह लखनऊ के कैंट एरिया में रहते थे. सन 2015 में घर वालों की मर्जी से शिवानी और राहुल की शादी हुई थी. राहुल जौनपुर के केराकत इंटर कालेज में क्लर्क था. शादी के बाद राहुल परिवार के साथ जौनपुर में रहता था. वहीं से वह केराकत जाकर अपनी नौकरी करता था.

कभीकभी राहुल लखनऊ भी आता रहता था. लखनऊ में वह जमीन का कारोबार करने लगा था, जिस से उसे अलग से आमदनी होने लगी थी. लखनऊ के विनयखंड स्थित मकान का उपयोग किसी के आनेजाने पर ही होता था. प्राप्त जानकारी के अनुसार, 2 दिन पहले ही राहुल लखनऊ आया था. जबकि शिवानी पहले से अपने मायके में रह रही थी. क्योंकि कुछ महीनों से राहुल और शिवानी के बीच संबंध ठीक नहीं थे.

पढ़ाई के दौरान एकदूसरे पर जान छिड़कने वाले राहुल और शिवानी के बीच कुछ समय से तनाव रहने लगा था. दोनों को एकदूसरे से दूर रहना गंवारा नहीं था, इसलिए पढ़ाई के बाद कैरियर बनाने के बजाय दोनों ने शादी करली थी. शादी के बाद राहुल ने जौनपुर के केराकत स्थित एक इंटर कालेज में नौकरी करली थी, जिस की वजह से उसे जौनपुर में रहना पड़ रहा था, जबकि शिवानी को वहां रहना पसंद नहीं था. इस बात को लेकर अकसर दोनों में कहासुनी होती रहती थी.

प्यार के बाद दोनों को ही शादी की हकीकत उतनी प्यारी नहीं लग रही थी, जितनी लगनी चाहिए थी. जौनपुर में मन न लगने से शिवानी लखनऊ में अपने मातापिता के यहां रह रही थी. राहुल जब भी लखनऊ आता, विनयखंड के मकान में ही रुकता था. उसके आने पर शिवानी भी आ जाती थी.

राहुल गुस्सैल स्वभाव का था, इसलिए जराजरा सी बात में दोनों के बीच लड़ाई हो जाती थी. शिवानी राहुल को बहुत प्यार करती थी, जिस की वजह से वह उसके गुस्से के बाद भी उससे अलग नहीं रहना चाहती थी. जबकि शिवानी कभी खुद के बारे में सोचती थी तो उसे लगता था कि अपने कैरियर को लेकर उसने जो सपने देखे थे, वे सब बिखर गए. इसे ले कर वह भी तनाव में रहती थी.

शिवानी अपनी खुद की पहचान बनाना चाहती थी, पर शादी के बाद इस बात का कोई मतलब नहीं रह गया था. उस का यह द्वंद्व उसके संबंधों पर भारी पड़ रहा था. शिवानी राहुल से कभी कुछ कहती तो आपस में बहस के बाद दोनों में लड़ाई हो जाती थी. ऐसे में तनाव कम होने के बजाय और बढ़ जाता था.

29 जुलाई, 2017 की शाम को साहिल उर्फ शुभम अपने चचेरे भाई सनी के साथ राहुल से मिलने विनयखंड स्थित घर पर आया. भाइयों के आने की खुशी में पार्टी हुई, जिस में शराब भी चली. पुलिस को वहां मेज पर सिगरेट का एक खाली पैकेट, एक भरा पैकेट, शराब और बीयर की खाली बोतलें मिली थीं. बैड का बिस्तर भी बेतरतीब था. साहिल और सनी के जौनपुर चले जाने के बाद भी राहुल संभवत: शराब पीता रहा था.

यह बात शिवानी को अच्छी नहीं लगी होगी. उसने रोका होगा तो दोनों में बहस होने लगी होगी. नशे में होने की वजह से राहुल को गुस्सा आ गया होगा. इस के बाद शिवानी अपने कमरे में जाकर सो गई होगी. रात में 2 बजे के करीब जब उसकी नींद खुली होगी तो उसने देखा होगा कि राहुल परदे की रस्सी का फंदा बना कर उस में लटका है. पति को उस हालत में देखकर शिवानी की कुछ समझ में नहीं आया होगा. नशे में गुस्से की वजह से राहुल ने यह कदम उठा लेगा, यह शिवानी ने कभी नहीं सोचा था. वह परेशान हो गई होगी.

बहुत सारी शिकायतों के बाद भी शिवानी राहुल के बिना जिंदगी नहीं गुजार सकती थी. शायद यही वजह थी कि उसने भी उसके साथ मरने का फैसला कर लिया. परदे से बनी जिस रस्सी के फंदे पर लटक कर राहुल ने अपनी जान दी थी, उसी के दूसरे सिरे पर फंदा बना कर शिवानी ने भी लटक कर जान दे दी. साथ जीनेमरने की कसम खाने वाली शिवानी ने अपना वचन निभा दिया.

राहुल और शिवानी की मौत अपने पीछे तमाम सवाल छोड़ गई है. प्यार करना, उसके बाद शादी करना कोई गुनाह नहीं है. प्यार के बाद शादी के बंधन को निभाने के लिए पतिपत्नी के बीच जिस भरोसे, प्यार और संघर्ष की जरूरत होती है, वह राहुल और शिवानी के बीच नहीं बन पाया. लड़ाईझगड़े में जान देने जैसे फैसले मानसिक उलझन की वजह से होते हैं. अगर राहुल ने नशे में यह फैसला नहीं लिया होता तो वह भी आज जिंदा होता और शिवानी भी.

राहुल की मौत के बाद शिवानी ने भी खुद को खत्म कर लिया. उन दोनों के इस फैसले से उनके परिवार वालों पर क्या गुजरेगी, उन दोनों ने नहीं सोचा. इस तरह की मौत का दर्द परिवार वालों को पूरे जीवन दुख देता रहता है. ऐसे में अगर पतिपत्नी के बीच कोई अनबन होती है तो जल्दबाजी में कोई फैसला लेना ठीक नहीं होता.

‘वीरे दी वेडिंग’ के बाद इस फिल्म में दिखेंगी करीना

बौलीवुड अभिनेत्री करीना कपूर के फैंस के लिए अच्छी खबर है. करीना के फैंस को अब उनकी फिल्मों के लिए और इंतजार नहीं करना पड़ेगा, ऐसा इसलिए क्योंकि लंबे वक्त से बड़े पर्दे से गायब करीना अब बैक टू बैक धमाका करने वाली हैं. करीना तैमूर अली खान के जन्म के बाद फिल्म ‘वीरे दी वेडिंग’ के साथ से अपनी वापसी कर रहीं है. करीना ने इस फिल्म के बाद कोई और फिल्म साइन नहीं किया था. अब खबरें हैं कि अजय देवगन की मराठी फिल्म के हिंदी रीमेक में करीना नजर आ सकती हैं.

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, आशुतोष गोवारिकर मराठी फिल्म ‘आपला मानुस’ हिंदी रीमेक बनाना चाहते हैं और इसमें वह करीना कपूर को लीड ऐक्ट्रेस के तौर पर कास्ट करना चाहते हैं. बताया जा रहा है कि इसके लिए उन्होंने हाल ही में करीना से मुलाकात भी की.

रिपोर्ट्स की मानें तो करीना को यह प्रौजेक्ट बेहद पसंद आया है और इसकी स्क्रिप्ट पर काम चल रहा है. को-स्टार्स व स्क्रिप्ट के फाइनल होते ही वह इस फिल्म साइन कर देंगी.

बता दें, ‘आपला मानुस’ इसी साल 9 फरवरी को रिलीज हुई थी जिसे अजय देवगन ने प्रौड्यूस किया था. यह पहला मौका था जब अजय ने किसी मराठी फिल्म को प्रौड्यूस किया हो. इस फिल्म का डायरेक्शन सतीश रजवाड़े ने किया था और इसमें नाना पाटेकर, इरावती हर्षे और सुमित राघवन जैसे ऐक्टर्स ने काम किया था.

बता दें, करीना कपूर की आखिरी फिल्म 2016 में उड़ता पंजाब थी. जहां उन्होंने एक डाक्टर की भूमिका निभाई थी. फिलहाल करीना कपूर खान अपनी आने वाली फिल्म ‘वीरे दी वेडिंग’ की शूटिंग में व्यस्त हैं जिसमें वह सोनम कपूर, स्वरा भास्कर, शिखा तल्सानिया जैसे ऐक्टर्स के साथ नजर आएंगी.यह फिल्म 1 जून 2018 को रिलीज होगी.

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