देश में आज भी ऐसी कई रूढि़यां हैं जिन पर समाज ज्यादा बोलने से कतराता है. इन्हीं में से एक है माहवारी, जिसे लोग औरतों से जुड़ा मुद्दा होने के चलते शर्म की बात मानते हैं, जबकि माहवारी औरतों के सेहतमंद होने और उन के मां बनने के काबिल होने की एक निशानी है. इस के बावजूद औरतों को माहवारी के दौरान गंदे कपड़े इस्तेमाल करने व साफसफाई न रखने से इंफैक्शन और गर्भाशय के कैंसर जैसी कई गंभीर बीमारियों तक से जूझना पड़ता है.
जो लोग माहवारी को ले कर थोड़ेबहुत जागरूक हैं, वे आज भी दुकानों से सैनेटरी पैड खरीदने में झिझक महसूस करते हैं और खरीदे गए सैनेटरी पैड को काली पन्नी या अखबारी कागज में लपेट कर ही घर ले जाते हैं. लोगों में माहवारी और साफसफाई के प्रति इतनी चुप्पी के बावजूद अचानक इन दिनों सोशल मीडिया पर लोगों के हाथों में सैनेटरी पैड लिए उन की सैल्फी व फोटो खूब वायरल हो रहे हैं. यह सब करना इतना आसान नहीं था. जो काम सालों से सरकार की मुहिम नहीं कर पाई वह माहवारी से जुड़ी एक फिल्म ने कर दिखाया.
इस फिल्म का नाम है ‘पैडमैन’ जिस के हीरो अक्षय कुमार हैं. उन्होंने माहवारी के मुद्दे को बड़ी ही गंभीरता से उठाया है.
यह फिल्म दक्षिण भारत के एक शख्स अरुणाचलम मुरुगनंथम की जिंदगी पर बनी है. इस फिल्म ने रिलीज होने के पहले ही लोगों की रूढि़वादी सोच को बदलने में कामयाबी हासिल कर ली थी. इस फिल्म की कहानी और डायलौग दोनों ही बेहद कसे हुए हैं. इस फिल्म से अक्षय कुमार ने लोगों की माहवारी को ले कर शर्म को दूर करने की भरपूर कोशिश की है. फिल्म में यह बताने की कोशिश भी की गई है कि औरत के लिए शर्म से बढ़ कर कोई बीमारी ही नहीं है.
इस फिल्म में एक जगह अक्षय कुमार अपनी बहनों को सैनेटरी पैड देते हैं तो उन्हें सुनने को मिलता है कि बहन को कोई ऐसी चीज भी देता है क्या? अक्षय कुमार जवाब देते हैं, ‘‘नहीं देता है पर देना चाहिए. राखी बांधी थी न तो रक्षा का वचन निभा रहा था.’’
इस डायलौग से यह जाहिर होता है कि माहवारी को ले कर हमारे समाज की क्या सोच है. फिल्म ‘पैडमैन’ ने इस सोच को पूरी तरह से नकारा है. आज इसी का नतीजा है कि जिस सैनेटरी पैड को लोग दुकानों से खरीदते समय सौ बार सोचते थे वही लोग आज सैनेटरी पैड को हाथ में ले कर फोटो खींच रहे हैं, इस के फायदे गिना रहे हैं.
सोच और शौचालय पिछले साल अक्षय कुमार की ही एक और फिल्म ‘टौयलेट : एक प्रेम कथा’ आई थी. इस फिल्म में खुले में शौच की समस्या को उठाया गया था. पाखंड और मनुवादी सोच पर भी करारी चोट की गई थी.
इस फिल्म का एक डायलौग ‘हां भाभी चलो, सवा 4 हो गए, सब इंतजार कर रहे हैं लोटा पार्टी में तुम्हारे वैलकम का’ साबित करता है कि ज्यादातर रूढि़यों का सामना औरतों को ही करना पड़ता है. इस फिल्म में पाखंड को ले कर बोले गए डायलौग ‘जिस आंगन में तुलसी लगाते हैं वहां शौच करना शुरू कर दें’ से यह जाहिर होता है कि आंखों पर चढ़ी अंधविश्वास की पट्टी बेहतर सेहत की राह में एक बड़ा रोड़ा है.
इस फिल्म की हीरोइन भूमि पेडनेकर एक जगह कहती हैं, ‘‘मर्द तो घर के पीछे बैठ जाते हैं, पर हम तो औरतें हैं हमें तो हर चीज के लिए ज्यादा मेहनत करनी पड़ेगी.’’ अक्षय कुमार भी कहते नजर आते हैं, ‘‘अगर बीवी पास चाहिए तो घर में संडास चाहिए.’’
इन डायलौगों से यह जाहिर होता है कि आज भी लोग लाखों रुपए लगा कर आलीशान मकान बनवा लेते हैं, लेकिन कुछ हजार रुपए लगा कर शौचालय बनवाने में फेल हो जाते हैं. इस सिलसिले में हीरो जफर खान का कहना है कि सामाजिक मुद्दों पर कहानी लिखने वालों की कमी और फिल्म में लगाए गए पैसे डूबने के डर से इस तरह की फिल्में बहुत कम बन पाती हैं. लेकिन जब भी इस तरह की फिल्में बनती हैं तो दर्शक उस फिल्म में दिखाई गई समस्या को खुद से जोड़ कर देखना शुरू कर देते हैं. यही वजह है कि इस तरह की फिल्में कम बजट की होने के बावजूद अच्छी कमाई करती हैं.
पाखंड पर करारा वार धर्म और पाखंड की पोल खोलती एक फिल्म ‘पीके’ आई थी जिस में आमिर खान ने दमदार ऐक्टिंग की थी. इस फिल्म के जरीए यह बताने की कोशिश की गई थी कि चमत्कार नाम की कोई चीज नहीं होती है. फिल्म में उन तथाकथित साधुसंतों को कठघरे में खड़ा किया गया था, जो चमत्कार दिखा कर लोगों को बेवकूफ बनाते हैं.
फिल्म ‘पीके’ ने तर्क के सहारे धर्म और पाखंड के नाम पर दुकान चलाने वालों की बोलती बंद कर दी थी. धार्मिक मूर्तियों की एक दुकान पर आमिर खान कहते हैं कि क्या मूर्ति में ट्रांसमीटर लगा है जो भगवान तक उस की आवाज पहुंचेगी? जब भगवान तक आवाज नहीं पहुंचती, तो मूर्ति की क्या जरूरत? इसे साबित करने के लिए वे कालेज में एक पेड़ के नीचे पड़े एक पत्थर पर लाल रंग पोत देते हैं जिस पर छात्र अपने पास होने की मन्नतें मांगते नजर आते हैं. फिल्म ‘ओह माई गौड’ में धर्म के उन ठेकेदारों पर निशाना साधा गया था जो धर्म की अपनी दुकान को बचाए रखने के लिए क्या कुछ नहीं करते हैं.
इस फिल्म में परेश रावल ने सभी तबकों को कठघरे में खड़ा किया था. फिल्म यह संदेश देने में कामयाब रही थी कि धर्म का डर इनसान खुद अपने मातापिता से सीखता है और आगे चल कर अपनी आने वाली पीढि़यों को भी सिखाता है. इस देश में धर्म का डर दिखा कर सौदे तय किए जाते हैं, तावीजगंडे पहना कर अमीर बनने के ख्वाब दिखाए जाते हैं. धर्म और आस्था के नाम पर लोग भी लुटने को तैयार रहते हैं. औरतों की अस्मत तक लूटी जाती है, लेकिन लोग धर्म के डर से मुंह खोलने से कतराते हैं.
इस मसले पर हीरो रविशंकर मिश्रा का कहना है कि फिल्मों में दिए गए संदेशों का असर दर्शकों के दिमाग पर तब आसानी से होता है, जब समाज में फैली कुरीतियों और समस्याओं से जुड़ी कहानी हो.
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दिल्ली हाईकोर्ट ने ‘पद्मावत’ फिल्म के सतीप्रथा को महामंडित करने के आरोप में दर्ज एक याचिका पर आपत्ति जताते हुए कहा है कि याचिकाकर्ता को क्या दूसरी संगीन सामाजिक विकृतियां नहीं दिखाई दे रही हैं जो उस ने इस तरह की फालतू याचिका दर्ज की है. हमारे यहां न्यायालयों में सार्वजनिक मामलों की आड़ में जम कर जनहित याचिकाएं और प्राथमिकियां देशभर में दर्ज कराई जा रही हैं. खाली बैठेठाले वकील और आनंद लेने वाले उन के क्लाइंट बड़े नामों के खिलाफ याचिकाएं या प्राथमिकियां दर्ज करा देते हैं.
आधेअधूरे तथ्यों वाली ये याचिकाएं या प्राथमिकियां चाहे कितनी ही कमजोर क्यों न हों, लेकिन फिर भी ये फिल्म निर्माता, प्रसिद्ध व्यक्ति या लेखक, प्रकाशक, संपादक के लिए परेशानी खड़ी कर देती हैं. याचिकाकर्ता या शिकायतकर्ता तो अपने शहर में मामला दर्ज करता है पर जिसे सफाई देनी होती है उसे सैकड़ों मील से आना पड़ता है. कई बार वारंट, गैरजमानती वारंट तक जारी कर दिए जाते हैं. इस के चलते क्रिएटिव व्यक्ति अपना काम छोड़ता है जबकि निठल्ला ठट्ठा मार कर हंसता है.
अफसोस यह है कि अदालतों में इस तरह के ज्यादातर मामलों में फैसला 10-15 वर्षों में आता है और इतने साल बाद यदि मामला खारिज हो तो शिकायतकर्ता का कुछ नहीं बिगड़ता. आपराधिक प्राथमिकी वाले शिकायतकर्ता शुरू में ही गायब हो जाते हैं या किसी ऐरेगैरे वकील पर छोड़ देते हैं. वहीं, दूसरे पक्ष को बारबार अदालत में सिर्फ हाजिरी के लिए खड़ा होना पड़ता है.
यह कहना तो सही है कि न्याय मिलता है पर कानून और अदालत के साथ खिलवाड़ करने वाले को क्या उसी मामले में वही न्यायालय सजा देता है? आमतौर पर न्यायालय मामला खारिज करते हुए कानून का पहिया चलाने वाले को कोई दंड नहीं देता. आजकल कभीकभार 20-25 हजार रुपए का जुर्माना लगाया जाने लगा है पर यदि वह व्यक्ति न दे तो बहुत ही कम नियम हैं उस से पैसा वसूलने के. जिसे जुर्माने का पैसा मिलना होता है वह वसूलने के लिए और खर्च करने को तैयार नहीं होता.
कानून व अदालतों से खिलवाड़ करने वालों के खिलाफ सख्ती बरती जानी चाहिए ताकि व्यर्थ के मुकदमे दायर न हों. फालतू की याचिकाओं और प्राथमिकियों पर पहले ही दिन अदालत को दूसरे पक्ष के नोटिस दिए बि?ना फैसले सुनाने की परंपरा प्रारंभ करनी चाहिए और केवल संगीन मामले, जिन में जिम्मेदार व्यक्ति या संस्थाएं अदालत में गुहार लगाने आए हों, स्वीकार किए जाने चाहिए.
अदालतों से न्याय मिल जाता है पर कठिनाई कानून के फैसलों से नहीं, प्रक्रिया से है जिस के दौरान अब लाखों खर्च होते हैं और कई बार जेल तक जाने की नौबत आ जाती है. दरअसल, मौलिक स्वतंत्रताओं को जर्जर करने में सरकार से ज्यादा अब आम व्यक्ति जिम्मेदार साबित हो रहा है.
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सवाल मेरे आप से 2 सवाल हैं. पहला यह कि क्या वीर्यपात से पहले पुरुष से अलग हो जाने पर बगैर गर्भनिरोध भी काम चल सकता है? दूसरा यह कि स्त्री के शारीरिक मिलन में एचआईवी एड्स होने का रिस्क किसे अधिक होता है?
जवाब
यद्यपि कुछ दंपती गर्भनिरोध युक्तियों से बचने के लिए यह तरीका अपनाते हैं कि वीर्यपात होने से पहले स्त्री पुरुष से अलग हो जाती है, पर यह तरीका जरा भी भरोसे का नहीं है. उस में भूल होने का हमेशा खतरा रहता है. यौनोत्तेजना के क्षणों में स्खलन से पहले भी वीर्य की बूंद छूटने से गर्भ ठहर सकता है. समय से अलग न हो पाने पर तो अवांछित गर्भ ठहरने की तब तक चिंता बनी रहती है जब तक कि अगला महीना नहीं हो जाता. अत: गर्भनिरोध के लिए कोई बेहतर विधि अपनाना ही अच्छा है.
जहां तक स्त्रीपुरुष के शारीरिक मिलन में एचआईवी एड्स होने के रिस्क का सवाल है, तो दोनों में से कोई भी एचआईवी से संक्रमित है तो दूसरे को रोग हो सकता है, लेकिन पुरुष से स्त्री में एचआईवी विषाणु जाने का रिस्क अधिक होता है. इस का ठोस कारण भी है. शारीरिक मिलन के बाद पुरुष से स्खलित हुआ वीर्य लंबे समय तक स्त्री की योनि में रहता है. यदि यह वीर्य एचआईवी से संक्रमित है, तो वायरस के स्त्री में पैठ करने का रिस्क बढ़ जाता है.
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एक झूठ को छिपाने के लिए सौ झूठ बोलने पड़ते हैं, फिर भी सच्चाई सामने आ जाती है. यह कहावत सदियों से चली आ रही है. अब इसी को केंद्र में रखकर निर्माता संजीव कुमार व रोहित कुमार तथा निर्देशक गुरप्रीत सोंध ‘‘रंगरेजा फिल्मस’’ के बैनर तले एक हास्य फिल्म ‘‘शादी तेरी बजाएंगे हम बैंड’’ लेकर आ रहे हैं.
फिल्म ‘‘शादी तेरी बजाएंगे हम बैंड’’ की कहानी के केंद्र में दिल्ली में रह रहे शेरसिंह (राहुल बग्गा) और प्रीति (सृष्टि माहेश्वरी) की हैं. शेरसिंह के पिता शमशेर सिंह (मुश्ताक खान) लव मैरिज यानी प्रेम विवाह के सख्त खिलाफ हैं. मगर शेर सिंह अपने दोस्तों गोगा (रोहित कुमार) और बंटी(दिलबाग सिंह) के कहने पर अपने पिता को बताए बिना प्रीति से शादी कर लेता है.
शेरसिंह व प्रीति अपनी शादी के मजे ठीक से लूट पाते उससे पहले ही शमसेर सिंह दिल्ली उनके घर पर आ धमकते हैं. प्रीति को देखकर उनका दिमाग गर्म हो जाता है. फिर शुरू होता है झूठ पर झूठ बोलने का सिलसिला. शेरसिंह ने प्रीति का परिचय गोगो की पत्नी के रूप में करवाता है, पर उसी वक्त गोगो अपनी प्रेमिका गुंजन(आफरीन अल्वी) के साथ पहुंचता है.
तभी शमशेर ऐलान करते हैं कि उन्होंने अपने बेटे शेरसिंह की शादी के लिए एक खूबसूरत लड़की कोमल भाटी(राधा भट्ट) को पसंद किया है. पर झूठ पर झूठ बोलने के कारण इनके बीच गलतफहमियां इस कदर उलझती हैं कि मसला सेल्फी डौन (राजपाल यादव) तक पहुंच जाता है. अंततः सभी की जिंदगी में खुशियां वापस आ ही जाती हैं.
अपनी इस फिल्म की चर्चा करते हुए निर्देशक गुरप्रीत सौंध कहते हैं – ‘‘हमारी फिल्म में इस बात का रेखांकन है कि सच्चाई छिपाए नहीं छिपती, फिर चाहे जितने झूठ बोलकर छिपाने की कोशिश की जाए. इसके लिए हमने अपनी फिल्म में उन्ही प्रसंगों को वरीयता दी है, जो आए दिन हमारे आस पास की जिंदगी में घटित होते रहते हैं. दलेर मेंहदी द्वारा स्वरबद्ध फिल्म का शीर्षक गीत फिल्म की हाईलाइट्स है. यह फिल्म एक मनोरंजक हास्य फिल्म है.’’
सेल्फी डौन का किरदार निभाने वाले अभिनेता राज पाल यादव कहते हैं – ‘‘यह फिल्म हर इंसान का मनोरंजन करेगी, सभी को हंसाएगी. मगर हर किसी को अपना दिमाग घर पर रखकर यह फिल्म देखना जाना चाहिए.’’
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हेमंत कटारे मध्य प्रदेश में भिंड जिले की अटेर विधानसभा सीट से कांग्रेस के विधायक हैं. इस सीट से साल 2013 में उन के पिता सत्यदेव कटारे जीते थे जो विधानसभा में विपक्ष के नेता थे.
पिता की मौत से उपजी हमदर्दी और कांग्रेस के दिग्गज नेता व गुना के सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया से नजदीकियों का फायदा हेमंत कटारे को उपचुनाव में मिला और उन्होंने भाजपा के वजनदार उम्मीदवार अरविंद भदौरिया को 800 वोटों के अंतर से हरा दिया.
हेमंत कटारे जीत कर भोपाल आए तो उन का स्वागत किसी हीरो की तरह धूमधड़ाके से हुआ. कई पत्रकारों ने उन के इंटरव्यू लिए थे. उन में से एक थी 21 साला खूबसूरत प्रिंशु सिंह जो कुछ करगुजरने की चाह लिए पत्रकारिता की पढ़ाई करने भोपाल आई थी.
प्रिंशु सिंह भोपाल की माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता यूनिवर्सिटी के आखिरी साल में थी और पिछले साल उस ने पढ़ाई में गोल्ड मैडल हासिल किया था.
यह प्यार था या…
हेमंत कटारे और प्रिंशु सिंह की नजर पहली दफा जो मिली तो वे दोनों दोस्त बन गए और फिर आम प्रेमियों की तरह भोपाल में छिप कर इधरउधर मिलने लगे.
हेमंत कटारे इस प्यार को छिपाए रखना चाहते थे क्योंकि उन के राजनीतिक कैरियर की अभी शुरुआत थी. प्यार उजागर होता तो बदनामी भी होती. दो टूक कहा जाए तो वे इश्क की रंगीनियों में तो रहना चाहते थे लेकिन प्रिंशु सिंह से शादी नहीं करना चाहते थे और इस बाबत उन्होंने प्रिंशु सिंह से कोई वादा भी नहीं किया था.
आजकल के ज्यादातर नौजवान प्यार तो किसी और से करते हैं पर शादी किसी और से करते हैं. इसी दौरान दोनों मरजी से हमबिस्तरी का भी लुत्फ उठा लें तो भी बात हैरत की नहीं रह जाती.
प्यार में दिक्कत तब खड़ी होती है जब दोनों में से कोई एक जज्बातों और हमबिस्तरी की कीमत मांगते हुए दूसरे को ब्लैकमेल करने लगे, धमकी देने लगे या फिर डर के मारे किसी तरह का जिस्मानी नुकसान पहुंचाए.
प्यार अगर वक्तीतौर पर जिस्मानी सुख भोगने का जरीया हो और वक्त रहते ही आशिकमाशूक अपने रास्ते अलग न करें तो तय है कि वे किसी हादसे या आफत की गिरफ्त में आने वाले होते हैं. ऐसा ही कुछ इस मामले में भी हुआ.
जब खुले राज तो
मध्य प्रदेश की सियासत में जनवरी और फरवरी के महीने में हेमंत कटारे और प्रिंशु सिंह की मुहब्बत के चर्चे अलगअलग अंदाज से किसी टैलीविजन सीरियल की तरह होते रहे जिन्हें आम लोगों ने भी चटकारे ले कर दिलचस्पी से सुना.
14 जनवरी, 2018 को प्रिंशु सिंह ने एक वीडियो वायरल करते हुए हेमंत कटारे पर इलजाम लगाए कि वे उस का बलात्कार करते रहे हैं. प्रिंशु सिंह ने यह भी दावा किया कि उस के पास हेमंत कटारे के ऐसे वीडियो और आडियो हैं जिन से यह साबित होता है कि हेमंत कटारे उसे प्यार के झांसे में ले कर धोखा देते रहे हैं और अब उसे डराधमका रहे हैं.
वीडियो वायरल हुआ तो हाहाकार मच गया. वजह, इलजाम पत्रकारिता की एक छात्रा ने विधायक पर लगाया था. शुरुआत में तो लोग इसे प्रिंशु सिंह की सनक और ब्लैकमेलिंग समझते रहे पर दाल में काला है यह खुद हेमंत कटारे ने साबित कर दिखाया.
तीसरे दिन ही हेमंत कटारे ने भी खुद का बनाया एक वीडियो वायरल किया जिस में वे कह रहे हैं कि प्रिंशु सिंह उन्हें ब्लैकमेल कर रही है और 2 करोड़ रुपए न देने पर उन की राजनीतिक और निजी जिंदगी तबाह करने की धमकी दे रही है.
इस वीडियो में हेमंत कटारे ने विक्रमजीत सिंह नाम के एक शख्स का भी जिक्र किया कि उस ने प्रिंशु सिंह की तरफ से पैसे मांगे थे.
विक्रमजीत सिंह भोपाल के एक कार शोरूम जीवन मोटर्स में काम करता है और भारतीय जनता पार्टी का छोटामोटा नेता भी है इसलिए मामला मुहब्बत का कम सियासत का ज्यादा हो चला.
हेमंत कटारे को विक्रमजीत सिंह और प्रिंशु सिंह मिल कर ब्लैकमेल कर रहे थे या नहीं यह राज अब देर से ही सही पर खुलेगा जरूर लेकिन प्रिंशु सिंह को हेमंत कटारे से इस तरह के सख्त जवाब की उम्मीद नहीं थी.
हेमंत कटारे ने पुलिस में शिकायत भी दर्ज करा दी थी और प्रिंशु सिंह की गिरफ्तारी के बाद वीडियो वायरल किया था.
पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराने के बाद हेमंत कटारे ने प्रिंशु सिंह को भोपाल के कारोबारी इलाके एमपी नगर के पास चेतक ब्रिज पर बुलाया और उसे एडवांस में 5 लाख रुपए दिए.
इस तयशुदा जगह पर पुलिस वाले सादी वरदी में पहले से ही तैनात थे जिन्होंने प्रिंशु सिंह को नकद 5 लाख रुपए के साथ गिरफ्तार कर ब्लैकमेलिंग के इलजाम में जेल भेज दिया.
हेमंत कटारे का वीडियो वायरल हुआ तो एक तरह से यह साफ हो गया कि प्रिंशु सिंह उस से सौदेबाजी कर रही थी और उस सौदे की दलाली विक्रमजीत सिंह कर रहा था.
रोजे गले पड़े
प्रिंशु सिंह के जेल चले जाने के बाद हेमंत कटारे ने छुटकारे की मीलों लंबी सांस ली कि चलो पिंड छूटा. पर तब तक राज्य की सियासत में काफी भूचाल आ चुका था. भाजपाई तो खामोश थे लेकिन कांग्रेसी दिग्गज नेता अजय सिंह राहुल और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अरुण यादव के अलावा ज्योतिरादित्य सिंधिया ने भी हेमंत कटारे को बेगुनाह बताते हुए इस मामले को भाजपा की साजिश बताया.
जेल जा कर प्रिंशु सिंह खामोश नहीं बैठी बल्कि पेशी के दिन उस ने अदालत में पत्रकारिता यूनिवर्सिटी से आए अपने दोस्तों से कहा कि वह बेगुनाह है. हेमंत कटारे और पुलिस वाले मिले हुए हैं.
प्रिंशु सिंह का दूसरा वीडियो उस की गिरफ्तारी के बाद वायरल हुआ था जिस में वह अपने पहले के वीडियो के बाबत बारबार माफी मांगती नजर आ रही थी कि उस ने यों ही मजाक में वीडियो वायरल कर दिया था, क्योंकि हेमंत कटारे ने उस से मिलने की पेशकश बड़ी बेरुखी से ठुकरा दी थी.
यह वीडियो तब वायरल हुआ जब प्रिंशु सिंह जेल में थी और पुलिस उस का मोबाइल फोन जब्त कर चुकी थी. फिर वीडियो कैसे बना और वायरल हुआ इस बाबत प्रिंशु सिंह साफसाफ कुछ नहीं बोली तो अंदाजा यह लगाया गया कि विक्रमजीत सिंह ने बचाव के लिए यह वीडियो पहले से ही तैयार कर रखा था कि अगर हेमंत कटारे झांसे या धमकी में न आए तो मामले पर लीपापोती यों ही हंसीमजाक में की जा सके.
जेल से प्रिंशु सिंह ने हेमंत कटारे पर फिर पुराने इलजाम दोहराए और जमानत की मांग की जो उसे मिल भी गई. बारी अब खुद को सयाना समझ रहे हेमंत कटारे की थी जिन के खिलाफ पुलिस ने प्रिंशु सिंह की शिकायत पर बलात्कार और अपहरण का मामला दर्ज कर लिया.
वारंट जारी होते ही हेमंत कटारे फरार हो गए और खुद की बेगुनाही साबित करने का वीडियो वायरल करते रहे.
इधर विक्रमजीत सिंह ने भी एक वीडियो वायरल कर डाला कि वह तो हेमंत कटारे के कहने पर इन दोनों के बीच बात बनाने की कोशिश कर रहा था.
बकौल विक्रमजीत सिंह, हेमंत कटारे ने एक कांग्रेसी नेता के जरीए उसे कहलवाया था कि मामला रफादफा करवाओ, क्योंकि उन की सगाई हो चुकी है और अप्रैल में शादी होने वाली है.
यानि कुछ ऐसा था जिस से हेमंत कटारे डर रहे थे, लेकिन वह जो भी था इतना नहीं था कि उस की कीमत 2 करोड़ रुपए दी जाए पर सौदा 50 लाख रुपए में तय हुआ था.
पुलिस ने बिगाड़ी बात
देखा जाए तो यह प्यार में सौदेबाजी का मामला था जिस में प्रिंशु सिंह हेमंत कटारे की जिंदगी से हट जाने और राज छिपाए रखने की कीमत मांग रही थी. चूंकि यह काम वह अकेले नहीं कर सकती थी इसलिए उस ने अपने दोस्त विक्रमजीत सिंह को साथ मिला लिया था.
प्रिंशु सिंह को उम्मीद थी कि पहला वीडियो वायरल होते ही हेमंत कटारे डर के मारे उस की मांगें मान लेंगे और उसे तगड़ी रकम मिल जाएगी, लेकिन मामला पुलिस में पहुंचा तो फिर इन दोनों के हाथ में कुछ नहीं रह गया.
पुलिस वालों ने इस मामले में दोनों तरफ से मलाई काटी और चाटी. पहले प्रिंशु सिंह को गिरफ्तार कर हेमंत कटारे को बेफिक्र कर दिया गया और फिर उन्हें ही गिरफ्तार कर हमेशा के लिए उन के दामन पर दाग लगा दिया.
इधर प्रिंशु सिंह की मां भोपाल आईं और उन्होंने भी वीडियो के जरीए कहा कि उन की बेटी बेकुसूर है, उस के साथ कोई गंदा काम नहीं हुआ है. विक्रमजीत सिंह ने प्रिंशु सिंह को बहकाया है.
किस ने किस को कितना बहलाया था यह सब अब अदालत में तय होगा. एक तरफ मां हेमंत कटारे को क्लीन चिट दे रही हैं तो बेटी खुलेआम उन्हें बलात्कारी बता रही है.
हेमंत कटारे को एक लड़की से सैक्सी चैटिंग भारी पड़ गई या सचमुच उन के प्रिंशु सिंह से जिस्मानी रिश्ते थे, ऐसे कई राज अब अदालत में खुलेंगे. जाहिर है कि कई राज दफन भी रहेंगे.
हेमंत कटारे की फरारी ने उन्हें शक के दायरे में ला खड़ा कर दिया. कल तक कंधे से कंधा मिला कर चल रहे कांग्रेसी अब उन से किनारा करने लगे हैं.
महंगा पड़ा नौसिखियापन
हेमंत कटारे की समझ पर जवानी का जोश भारी पड़ा और वे सियासत का पहला सबक भी नहीं समझ पाए कि इस में कोई किसी का सगा नहीं होता. इस नौसिखिएपन और नासमझी की सजा वे भुगत भी रहे हैं. कल तक जिन विधायक के साथ गनमैनों और समर्थकों का कारवां चला करता था, वे अब तनहाई में दिन काट रहे हैं.
मुद्दे की बात प्यार में बेईमानी है जो प्रिंशु सिंह ने भी की थी और हेमंत कटारे ने भी. पर दोनों को बेईमानी का भी सलीका नहीं आता था.
मामूली खातेपीते घर की प्रिंशु सिंह रातोंरात नाम कमा लेना चाहती थी जो उसे मिला तो पर इस तरीके से कि शायद ही कोई मीडिया हाउस अब उसे नौकरी दे. उस के एक दोस्त के मुताबिक प्रिंशु सिंह की शादी 23 फरवरी को होनी थी जो इस मामले की वजह से खटाई में पड़ गई है.
हेमंत कटारे का राजनीतिक कैरियर भी डांवांडोल हो गया है. जो साख उन के पिता ने कमाई थी वह एक नासमझी के चलते धूल में मिल गई है.
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‘कौआ चला हंस की चाल, भूल गया अपनी भी चाल’. यह कहावत उत्तर प्रदेश शिक्षा बोर्ड के इम्तिहानों पर पूरी तरह से खरी उतरती है. खुद को सीबीएससी बोर्ड की तरह बदलने के चक्कर में यह बोर्ड अपनी ही जड़ों से कटता जा रहा है. ऐसे में उस का यह दावा भी खोखला लगता है कि वह इम्तिहान कराने वाला सब से बड़ा शिक्षा बोर्ड है.
केवल सीबीएससी बोर्ड से एक महीना पहले इम्तिहान कराने और उन का नतीजा लाने से हालात नहीं बदलने वाले. असल सुधार तो तब होगा जब उत्तर प्रदेश शिक्षा बोर्ड अपने स्कूलों, इम्तिहानों में पूछे जाने वाले सवालों और पढ़ाने के तौरतरीकों में बदलाव लाएगा. नेताओं के विदेशों में दौरा करने और इम्तिहान दिलाने के अपने सिस्टम का गुणगान करने से हालात नहीं बदलेंगे.
छात्रों का इम्तिहान छोड़ने वाला मुद्दा खुशी की नहीं शर्म की बात है. इस पर गंभीरता से विचार होना चाहिए, नहीं तो आने वाले दिनों में इम्तिहान पास करने वाले छात्र भी केवल ‘पकौड़ा कारोबार’ करने के ही लायक ही रहेंगे.
उत्तर प्रदेश शिक्षा बोर्ड का दावा है कि वह दुनिया में सब से बड़े इम्तिहान का आयोजन करता है. इस वाहवाही की हकीकत यह है कि दुनिया में यह पहला इम्तिहान होगा जहां पर 10 लाख, 62 हजार, 506 छात्रों ने इम्तिहान छोड़ दिया.
उत्तर प्रदेश शिक्षा बोर्ड और उत्तर प्रदेश की योगी सरकार इस को अपनी वाहवाही से जोड़ कर देख रही है. सरकार का कहना है कि इस बार इम्तिहानों में नकल पर रोक लगी तो इस वजह से नकल करने वाले छात्रों ने इम्तिहान छोड़ दिया है. सवाल उठता है कि छात्र नकल करने के लिए मजबूर ही क्यों होते हैं?
उत्तर प्रदेश में सरकारी शिक्षा सिस्टम पूरी तरह से खोखला हो चुका है. प्राइमरी से ले कर 12वीं जमात तक एकजैसा हाल है. बिना पढ़े हुए बच्चों को प्रश्नपत्र का हर सवाल मुश्किल लगता है. ऐसे में वे नकल की तरफ भागने लगते हैं.
हमारे देश में एकजैसा शिक्षा सिस्टम नहीं है. अमीर के लिए बेहतर और गरीब के लिए बदतर शिक्षा सिस्टम है. 12वीं जमात के बाद नौकरी की रेस में दोनों को एकजैसे इम्तिहान और इंटरव्यू से गुजरना पड़ता है, जिस में गरीब शिक्षा सिस्टम में पढ़ने वाला छात्र तरक्की की रेस से बाहर हो जाता है.
देश में कुछ सालों के अंदर ही सीबीएससी यानी सैंट्रल बोर्ड औफ सैकेंडरी ऐजूकेशन और आईसीएसई यानी इंडियन सर्टिफिकेट औफ सैकेंडरी ऐजूकेशन का दबदबा बढ़ा है. केवल उत्तर प्रदेश ही नहीं, बल्कि पूरे देश के अलगअलग राज्यों में वहां के शिक्षा बोर्डों की हालत खराब हो चुकी है. उत्तर प्रदेश में उत्तर प्रदेश शिक्षा बोर्ड से मंजूरी मिले स्कूल लगातार बंद होते जा रहे हैं. उन में पढ़ने वाले बच्चों की तादाद कम होती जा रही है.
उत्तर प्रदेश शिक्षा बोर्ड के स्कूलों में पढ़ने वाले ज्यादातर बच्चे कमजोर घरों के हैं. वे सरकार से मिल रही मदद के लिए इन स्कूलों में पढ़ने आते हैं. सरकार भी चाहती है कि समान शिक्षा ले कर ये बच्चे अमीर बच्चों से मुकाबला न कर पाएं इसलिए यहां सुधार होता नहीं दिखाया जाता है.
उत्तर प्रदेश के पुराने शिक्षा बोर्ड के मुकाबले सीबीएससी और आईसीएसई लोकप्रिय इसलिए हुए हैं, क्योंकि ये प्रतियोगी इम्तिहानों के लैवल को ध्यान में रख कर अपने कोर्स को तैयार कर इम्तिहान कराते हैं.
उत्तर प्रदेश शिक्षा बोर्ड में जब ज्यादा से ज्यादा हासिल किए गए अंक 75 फीसदी होते थे तो सीबीएससी में 90 से ज्यादा फीसदी नंबर मिलते थे. पिछले कुछ सालों से उत्तर प्रदेश शिक्षा बोर्ड की लगातार बुराई हो रही है. ऐसे में वहां भी बच्चों को ज्यादा नंबर देने का सिलसिला शुरू हो गया है.
पहले जहां केवल साइंस सब्जैक्ट में ही प्रैक्टिकल होते थे अब हाईस्कूल में हिंदी सब्जैक्ट में 30 नंबर का प्रैक्टिकल होने लगा है. ऐसे में बच्चों को बिना किसी तैयारी के ही ज्यादा नंबर मिलने लगे हैं.
इन सब्जैक्ट के प्रैक्टिकल के लिए बच्चों को केवल सब्जैक्ट से संबंधित फाइल तैयार कर लिखना होता है. पहले से तैयार इस फाइल पर ही हाईस्कूल के बच्चों को 30 में से कम से कम 25 नंबर मिलने लगे हैं. ऐसे में बच्चे अच्छे नंबरों से पास होने लगे हैं. अब उत्तर प्रदेश शिक्षा बोर्ड के छात्र भी 80 फीसदी से ऊपर नंबर पा कर सीबीएससी के बच्चों से मुकाबला करने लगे हैं.
खोखली नींव पर…
उत्तर प्रदेश में हर साल तकरीबन 26 लाख बच्चे हाईस्कूल यानी 10वीं जमात और 14 लाख बच्चे इंटर यानी 12वीं जमात के इम्तिहानों में हिस्सा लेते हैं. इन आंकड़ों को देखें तो साफ है कि 10वीं जमात से 12वीं जमात तक पहुंचने के बीच ही ज्यादातर छात्र पढ़ाई छोड़ देते हैं.
गरीब घरों के ये छात्र 10वीं जमात के बाद मेहनतमजदूरी करने में लग जाते हैं. वे सरकारी मदद के बाद भी अपनी आगे की पढ़ाई जारी नहीं रख पाते हैं.
उत्तर प्रदेश शिक्षा बोर्ड ने अपनी खामियों को छिपाने के लिए ‘नकल कारोबार’ को बढ़ाने का काम किया. नेताओं ने भी इसे वोट बैंक से जोड़ दिया.
यह सिलसिला साल 1980 के बाद से धीरेधीरे पनपने लगा जो समय के साथ एक बड़े कारोबार में बदल गया. कल्याण सिंह जब पहली बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने थे तो उन्होंने नकल करने को संज्ञेय अपराध बना दिया था. नकल करने वाले बच्चों को जेल भेज दिया था. उस समय भी यह नहीं सोचा गया था कि बच्चे नकल करते क्यों हैं?
बाद की सरकारों ने इस कानून को खत्म कर बच्चों को जेल जाने से बचाया पर इस से सिस्टम में सुधार नहीं आया. ‘नकल कारोबार’ संगठित हो कर आगे बढ़ने लगा. नकल वाले इम्तिहान कराने के अलग स्कूल खुलने लगे. वहां नकल कराने के नाम पर महंगी फीस वसूल होने लगी. बच्चे ही नहीं उन के मांबाप, शिक्षा विभाग के अफसर, नेता, समाज के लोग सब इस में शामिल हो गए.
उत्तर प्रदेश सरकार ने सरकारी स्कूलों में पढ़ाने के लिए शिक्षा मित्रों की भरती शुरू की. राजनाथ सिंह उस समय उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री थे. शिक्षा मित्रों की भरती में मैरिट को बेस बनाया गया. मैरिट में वही बच्चे आगे आए जिन्होंने नकल के सहारे ज्यादा नंबर पाए थे.
सरकारी नौकरी में मैरिट को बेस बनाने के बाद नकल कारोबार बहुत तेजी से आगे बढ़ने लगा. अब बिना पढ़े ही बच्चे 75 से 85 फीसदी नंबर पाने लगे. मैरिट में यही बच्चे आगे आ कर नौकरी के दावेदार हो गए.
सरकारी नौकरी में मैरिट का यह खेल आगे भी जारी रहा, जो गले की हड्डी बन गया. शिक्षा मित्रों के रूप में स्कूलों में पढ़ाने वाले टीईटी यानी शिक्षक पात्रता इम्तिहान पास करने में फेल होने लगे.
दिखावा हैं सुधार के कदम
सरकारी स्कूलों में शिक्षा सिस्टम में सुधार के नाम पर सरकार के दावों और उन की हकीकत में बहुत फर्क है. कई बार ऐसे मसले सामने आए जब छात्रों को पढ़ाने वालों का टैस्ट हुआ तो वे ही पूछे गए सवालों के सही जबाव नहीं दे पाए. ऐसे में प्रदेश में शिक्षा सिस्टम की पोल खुलने लगी. प्रदेश में सामूहिक नकल, प्रश्नपत्र का लीक होना, परीक्षा केंद्रों में गलत प्रश्नपत्र पहुंचना, कौपियां ले कर भाग जाना जैसी घटनाएं होने लगीं.
उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने शिक्षा में सुधार के लिए जो कदम उठाए हैं उन में सब से पहले इम्तिहानों को सीबीएससी से पहले कराने की वाहवाही लूटने का काम हुआ. 10वीं और 12वीं जमात के जो इम्तिहान हर साल मार्च महीने में होते थे, इस बार फरवरी महीने में ही करा दिए गए. लिहाजा, इस साल बच्चों को पढ़ने का पूरा समय भी नहीं मिला.
साल 2017-18 के शिक्षा सत्र की शुरुआत अप्रैल, 2017 से हुई थी. गांवों में अप्रैलमई महीने में खेतीकिसानी होती है. ज्यादातर मातापिता इस काम में लगे होते हैं. ऐसे में वे अपने बच्चों को समय से स्कूल में दाखिले के लिए नाम नहीं लिखवा पाते.
जुलाई में जब स्कूल खुलते हैं तो बच्चों का दाखिला फिर से शुरू होता है, जो 15 अगस्त तक चलता है. ऐसे में बच्चों की पढ़ाई 15 अगस्त के बाद ही शुरू होती है.
अगस्त से फरवरी महीने के बीच साल के 6 महीने बच्चों की पढ़ाई के लिए मिले. इस में दशहरा, दीवाली, क्रिसमस और जाड़ों की छुट्टियों समेत शनिवार और रविवार की छुट्टी कोे निकाल दें तो आधा समय ही बचता है.
ऐसे में केवल 90 दिन ही सही तरह से बच्चों को पढ़ाई हो पाई. 11 महीने की पढ़ाई का बोझ 3 महीने में पूरा होगा तो बच्चे नकल के लिए मजबूर हो जाएंगे न?
नाम न छापने की शर्त पर हाईस्कूल के इम्तिहान आयोजित कराने वाले एक प्रिंसिपल ने बताया कि सरकार अपनी वाहवाही के लिए तुगलकी फैसले करती है. 10वीं और 12वीं जमात के बच्चों ने इम्तिहान छोड़ा वह शर्म की बात है. नकल इसलिए होती है क्योंकि शिक्षा में सुधार का फैसला शिक्षाविद नहीं अफसर करते हैं.
कभी यह नहीं सोचा जाता कि उत्तर प्रदेश शिक्षा बोर्ड के अलावा बाकी इम्तिहानों में नकल क्यों नहीं होती है? सीसीटीवी, बायोमीट्रिक्स अटैंडैंस वगैरह सिस्टम में सुधार का हिस्सा हैं, शिक्षा में सुधार का नहीं.
आज इन स्कूलों में पढ़ाने वाले टीचरों की अलगअलग परेशानियां हैं. सरकार के हर काम में स्कूल टीचर ही आसानी से मुहैया होते हैं. उन के पास पढ़ाने के अलावा भी बहुत सारे काम हैं, जिस की वजह से वे पढ़ाने के काम को छोड़ कर दूसरे काम करते हैं.
जो मांबाप अपने बच्चों की पढ़ाईलिखाई के लिए सचेत हैं वे प्राइवेट स्कूल में जाना चाहते हैं. सरकार को शिक्षा और सिस्टम दोनों में सुधार करना होगा केवल सिस्टम सुधारने से कोई हल नहीं निकलेगा.
नहीं होती बेहतर तैयारी
स्कूली इम्तिहानों में छात्रों से जिस तरह से मुश्किल सवाल पूछे जाते हैं टीचर क्लास में उन की तैयारी नहीं कराते. गांवों में पढ़ने वाले बच्चे इतने अमीर नहीं होते हैं कि वे ट्यूशन ले सकें. ऐसे में नकल के भरोसे इम्तिहान देना उन की मजबूरी हो जाती है.
बच्चों को लगता है कि अगर वे अच्छे नंबरों से इम्तिहान पास कर लेंगे तो उन को रोजगार मिल जाएगा, इसलिए वे ऐसे स्कूलों की तलाश में रहते हैं, जहां नकल की सुविधा होती है.
नकल की सुविधा देने के लिए शिक्षा विभाग से ले कर नेता तक जिम्मेदार होते है. ज्यादातर स्कूल ऐसे ही नेताओं के होते हैं जो पार्टी को चंदा देते हैं, अफसरों को घूस देते हैं. इस पैसे को कमाने के लिए वे बच्चों को नकल करा कर पैसे वसूल करते हैं.
उत्तर प्रदेश में शिक्षा विभाग के हर अफसर को यह पता है कि कहां पर नकल का कारोबार चलता है. साल 2017-18 के शिक्षा सत्र के इम्तिहान के नतीजे अप्रैल महीने में आएंगे. इस साल पास होने वालों की तादाद और उन को मिलने वाले नंबर पिछले सालों के मुकाबले कम होंगे. ऐसे में एक बार फिर से नकल पर चर्चा शुरू होगी.
दरअसल, जब तक शिक्षा सिस्टम में सुधार की बात नहीं होगी तब तक नकल रोकने की बात करना बेमानी है. कोई बच्चा नकल करना सीख कर नहीं आता, हमारी शिक्षा का सिस्टम और पढ़ाई का ढंग उस को नकल करना सिखाता है.
कैसेकैसे सवाल
– हिंदी
‘प्रगतिशील लेखक संघ’ की स्थापना कब हुई?
‘आन का मान’ नाटक के कथानक पर प्रकाश डालिए.
‘राजमुकुट’ नाटक की कथा संक्षेप में लिखिए.
उत्तर प्रदेश शिक्षा बोर्ड की 12वीं जमात के इम्तिहान में सामान्य हिंदी के प्रश्नपत्र से ये कुछ सवाल हैं. इन सवालों से इम्तिहान देने वालें को क्या हासिल होगा? सामान्य हिंदी के सलेबस में ऐसे सवाल होने चाहिए जिन से बच्चे को ठीक से हिंदी व्याकरण सिखाई जा सके. उस की हिंदी पढ़ने में दिलचस्पी बढ़ सके.
50 नंबर के प्रश्नपत्र को हल करने के लिए 3 घंटे का समय दिया जाता है. हिंदी के प्रश्नपत्र में पूछे जाने वाले सवाल ही ऐसे होते हैं कि 15 मिनट तो छात्र को समझने में लगते हैं. यह केवल हिंदी के प्रश्नपत्र का हाल नहीं है, हर सब्जैक्ट की यही हाल है. हर सब्जैक्ट में ऐसेऐसे सवाल होते हैं जिन का छात्र के भविष्य से कोई मतलब नहीं होता है.
– राजनीतिशास्त्र
दबाव समूह एवं राजनीतिक दल का एक अंतर लिखिए?
सवैधानिक उपचारों के अधिकारों को समझाएं?
समानता के 2 प्रकार बताएं?
साल 2006 में राजनीतिशास्त्र में पूछे गए इन सवालों से पता चलता है कि इन की क्या उपयोगिता है. प्रश्नपत्रों की बात तो जाने दीजिए ‘दवाब समूह’ क्या है यह आम आदमी भी नहीं बता सकता. हर सब्जैक्ट में ऐसेऐसे सवालों की भरमार होती है. ऐसे सवाल ही बच्चों में नकल को बढ़ावा देने का काम करते हैं.
प्राइमरी स्कूल से ही शुरू हों सुधार
समाजसेवी और ‘मैग्सेसे अवार्ड’ विजेता डाक्टर संदीप पांडेय कहते हैं, ‘‘10वीं और 12वीं जमात के बच्चे नकल इसलिए करते हैं क्योंकि प्राइमरी जमातों से ही उन की पढ़ाई का लैवल बहुत नीचा होता है. सरकारी स्कूलों की हालत खराब है. वहां गरीब घरों के बच्चे पढ़ते हैं इसलिए उन स्कूलों के सुधार में किसी की दिलचस्पी नहीं रह गई है. हालत यह है कि प्राइमरी स्कूल में पढ़ाने वाले बहुत से टीचर तक अपने बच्चों को इन स्कूलों में नहीं पढ़ाना चाहते. जब स्कूल टीचर को ही अपने स्कूल पर भरोसा नहीं तो दूसरे लोगों की बात कौन करे.
‘‘कोर्ट ने अपने आदेश में कहा है कि सरकारी नौकरी करने वालों के लिए जरूरी नियम बनाया जाए कि वे अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में पढ़ाएं. सरकार ने इस आदेश को दरकिनार कर दिया. जब तक असरदार लोगों का ध्यान इन स्कूलों की तरफ नहीं जाएगा यहां सुधार नहीं होगा.
‘‘सरकार ने शिक्षा अधिकार कानून बना कर प्राइवेट स्कूलों में गरीब बच्चों को पढ़ाने का हक दिया पर इस का सही से पालन नहीं हो रहा है. आज जरूरत इस बात की है कि देश में एकसमान शिक्षा व्यवस्था लागू हो, तभी छात्रों का भला होगा.’’
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मोहनलालगंज राजधानी लखनऊ से तकरीबन 23 किलोमीटर दूर है. वह विधानसभा और लोकसभा क्षेत्र भी है. राजधानी लखनऊ का एक बड़ा ग्रामीण इलाका इस में आता है. यह लखनऊ और रायबरेली के बीच बसा एक खास इलाका है.
इस ब्लौक की प्रमुख विजय लक्ष्मी हैं. साल 2016 में वे ब्लौक प्रमुख चुनी गई थीं. वे तय समय पर अपने दफ्तर में क्षेत्र की समस्याएं सुनती हैं. इस के अलावा गांवगांव दौरा कर के लोगों की परेशानियां हल करने की कोशिश करती हैं.
वे जब तक दफ्तर में रहती हैं तब तक कोई न कोई अपनी फरियाद ले कर उन के पास आता ही रहता है. ज्यादातर लोग राशनकार्ड, आवास, हैंडपंप, खड़ंजा, बिजली, पुलिस और तहसील की अपनी परेशानियां ले कर उन के पास आते हैं. पेश हैं, विजय लक्ष्मी से की गई बातचीत के खास अंश:
आप का राजनीति में कैसे आना हुआ?
मेरी ससुराल गांव बिंदौआ में है. वहां बीडीसी यानी ब्लौक डैवलपमैंट कमेटी के चुनाव होने वाले थे. पंचायत चुनावों में रिजर्वेशन के चलते वह महिला सीट हो गई थी.
मेरे पति वकील हैं. उन के कहने पर मैं ने पहले बीडीसी का चुनाव लड़ा. उस में 3 गांवों के लोग वोट डालते हैं. जब मैं ने अपना प्रचार शुरू किया था तो मुझे कोई जानकारी नहीं थी. लोगों से बात करना नहीं आता था. पति और कुछ करीबी लोगों ने इस में मेरी पूरी मदद की. लोगों के बीच बोलना सिखाया.
मैं ने बहुत मेहनत कर के चुनाव लड़ा और जीत गई. ब्लौक प्रमुख का चुनाव आया तो मैं निर्विरोध ब्लौक प्रमुख बन गई.
ब्लौक प्रमुख बनने के बाद आप की जिंदगी में क्या खास बदलाव हुआ?
पहले मैं केवल घरपरिवार और बच्चे ही देखती थी. मेरी 2 बेटियां और एक बेटा है. मैं उन को खुद ही पढ़ाती थी. मेरे बच्चे अपनी क्लास में हमेशा अव्वल आते हैं. अब बच्चों और परिवार के साथ क्षेत्र की जनता भी मेरी जिंदगी में शामिल हो गई है. मैं तय समय पर ब्लौक दफ्तर में बैठती हूं, लोगों से मिलती हूं.
चुनाव लड़ते समय मुझे लगता था कि ब्लौक प्रमुख बन कर मैं बहुत सारी परेशानियां दूर कर दूंगी पर कुरसी पर बैठ कर लगा कि ब्लौक प्रमुख से जनता को जिस तरह की उम्मीदें होती हैं, उन को पूरा करने के लिए ब्लौक प्रमुख को और ज्यादा हक मिलने चाहिए.
आप के पति विधायक कैसे बने?
साल 2017 के विधानसभा चुनावों में समाजवादी पार्टी ने चुनाव से पहले मेरे पति अंबरीश पुष्कर को टिकट दिया था. विधानसभा में बड़ा क्षेत्र आता है. ऐसे में हम लोगों के पास चुनाव प्रचार का समय कम था.
मोहनलालगंज विधानसभा से पहले भी सपा की महिला विधायक थीं. उन का टिकट कट चुका था. ऐसे में पार्टी के कुछ लोग सहयोग नहीं कर रहे थे. हम सब ने मिल कर चुनाव लड़ा. भारतीय जनता पार्टी की आंधी के बीच हम लोग चुनाव
जीते और अंबरीश पुष्कर विधायक बन गए. पति के चुनाव प्रचार का बड़ा जिम्मा मेरे कंधों पर भी था. जीत के बाद अच्छा लगा.
आप की शादी कैसे हुई थी?
शादी के पहले हम लोगों की कालेज में मुलाकात हुई थी. तब हम ने शादी करने का फैसला किया था. हम एक ही जाति से थे, इस के बाद भी बड़ी मुश्किल से परिवार के लोग इस शादी के लिए राजी हुए.
शादी के बाद मेरी पढ़ाई बहुत आगे नहीं बढ़ सकी. मैं ने बीए कर लिया था, पर एमए नहीं कर पाई. शादी के बाद केवल मैं ने ही परेशानियां नहीं उठाईं, अंबरीश ने भी मेरा साथ देने के लिए बहुत मेहनत की. कुछ दिन शादीब्याह और
दूसरे अवसरों में विडियोग्राफी भी की. फिर एलएलबी कर के वे मोहनलालगंज तहसील में ही वकालत करने लगे. अच्छी बात यह है कि वे मुझे पूरा सहयोग करते हैं. राजनीति में वे मेरे पहले गुरु हैं.
परिवार और राजनीति में आप इतना तालमेल कैसे करती हैं?
मैं अपने समय को मैनेज करती हूं. बेटियां और पति मेरा पूरा साथ देते हैं. आज भी मैं घर का खाना खुद बनाती हूं.
मुझे घूमने और फिल्में देखने का बहुत शौक है. अब कई बार पति वक्त नहीं निकाल पाते हैं, ऐसे में बच्चों के साथ घूमने चली जाती हूं.
मैं गांव की औरतों के सशक्तीकरण, सेहत और पढ़ाईलिखाई के लिए बहुत काम करना चाहती हूं. सच तो यह है कि गांव की औरतें भी बहुत हुनरमंद हैं पर उन को मौके कम मिलते हैं.
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नीरव मोदी और मेहुल चौकसी की हीरों का व्यापार करने वाली कंपनियों का बैंकों को मोटा चूना लगा कर विदेश भाग जाना इस देश के लिए नया नहीं है. समाज और सरकार से बेईमानी करना हमारी रगरगमें भरा है और हमारा धर्म हिंदू धर्म हरदम इस बेईमानी को सही ठहराने के उपाय बताता रहता है. देशभर के उद्योगपति यदि अकसर मंदिरों, आश्रमों, मठों, बाबाओं के चरणों में दिखते हैं तो इसीलिए कि वे अपने कुकर्मों से भयभीत रहते हैं. उन्हें जताया जाता है कि हर तरह के कुकर्म का प्रायश्चित्त धर्म में है – पैसा चढ़ाओ, मुक्ति पाओ.
कांग्रेस की सरकारें हों या भाजपा की, वे इसी को भुनाती रहती हैं. ईश्वर में स्पष्ट विश्वास न करने वाली कम्युनिस्ट व समाजवादी सरकारें भी कुंभ मेले, छठपूजा व इफ्तार पार्टियां कराती रहती हैं ताकि नेताओं को अपनी बेईमानियों को पाप को धोने का मौका मिलता रहे. ईमानदारी से भी लाखों, करोड़ों, अरबों रुपए कमाए जा सकते हैं, लेकिन यह सोच इस देश में है ही नहीं.
नीरव मोदी ने सरकारी बैंकों के माध्यम से पैसा लूटा क्योंकि सरकार ही मोटा पैसा बनाने का सर्वोत्तम सहारा है. हर बड़ी कंपनी को जरा सा कुरेदेंगे तो पता चलेगा कि या तो उस ने सरकार से सस्ते में जमीन और कर्ज लिया या मोटे पैसे देने वाले ठेके लिए. आधुनिक तकनीक विकसित कर रही इनफोसिस और टाटा कंसल्टैंसी जैसी कंपनियां सरकार के लिए कंप्यूटर सिस्टम बनाने में अरबों रुपए कमा रही हैं. आप को जो हर रोज कंप्यूटर पर बैठ कर व्यापार करने, भुगतान करने या खरीदारी करने के आदेश दिए जा रहे हैं वे इसलिए ताकि हार्डवेयर व सौफ्टवेयर कंपनियों को मोटा लाभ मिल सके.
नीरव मोदी ने पंजाब नैशनल बैंक के अधिकारियों को पटा कर 11,000 करोड़ रुपए का गबन किया है पर दूसरे बैंकों का जो लाखों करोड़ रुपए मारे गए कर्जों में फंसा है वह भी उसी तर्ज पर है. इन सब कंपनियों के मालिकों की नेताओं के साथ खूब बनती थी. इन नेताओं को शुरुआती दिनों में सरकार में पैर जमाने के लिए पैसा और पहुंच इन्हीं मालिकों ने मुहैया कराई थी. ‘एक पैसा दोगे, ऊपर वाला एक लाख देगा’ पंक्ति की तर्ज पर ही नीरव मोदी ने नेताओं को सहयोग दिया होगा. जब इस कांड का पता चलने लगा था तब भी दोनों मोदी देवास, स्विट्जरलैंड में साथसाथ थे और उन की गु्रप फोटो खूब वायरल भी हो रही है.
नीरव मोदी जैसों की पोलपट्टी खुल नहीं रही थी क्योंकि मीडिया पर भी ये मेहरबान थे. इन के जरिए मीडिया वालों को काफी विज्ञापन मिलते हैं और पार्टियों में प्रवेश भी. सरकार की शह पर नीरव मोदी जैसे शातिर देशभर में भरे हैं जो ऊपर से व्यापार करते नजर आते हैं पर असल में हेराफेरी करने में लगे रहते हैं.
बैंकों ने अपने कुछ अधिकारियों पर जिम्मेदारी डाल कर इस नीरव मोदी कांड से बचना चाहा है क्योंकि वे जानते हैं कि आखिरकार सब मुक्त हो जाएंगे. यदि कुछ दिनों जेल में रहना भी पड़ा तो कोई बात नहीं. घर वालों को अरबों रुपए तो मिल ही जाएंगे. ‘न खाऊंगा, न खाने दूंगा’ के पीछे छिपा सच है, ‘पता ही न चलने दूंगा कि खाया या नहीं.’
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बौलीवुड में अलग तरह की फिल्मों और अभिनय के लिए मशहूर राधिका आप्टे स्वभाव से काफी तेज तर्रार हैं. सोशल मीडिया पर ट्रोलर्स से भिड़ंत में इसका नजारा आपने कई बार देखा होगा. पर क्या वह किसी को थप्पड़ भी मार सकती हैं? ये सवाल थोड़ा सा अटपटा जरूर है, पर आपको बता दें कि राधिका फिल्म की शूटिंग के सेट पर एक तमिल स्टार को जोरदार तमाचा लगा चुकी हैं. ऐसा हम नहीं कह रहे हैं, बल्कि खुद राधिका आप्टे ने इस बात का खुलासा किया है.
दरअलस, राधिका आप्टे हाल ही में राजकुमार राव के साथ नेहा धूपिया के टौक शो में पहुंची थीं. इस शो के दौरान उन्होंने बहुत से चौकाने वाले खुलासे किए. राधिका ने शो के दौरान बताया कि उन्होंने साउथ के एक पौपुलर स्टार को अपने साथ बदसलूकी करने पर फिल्म के सेट पर ही थप्पड़ मारा था. उन्होंने बताया, सेट पर मेरा पहला दिन था. इसी दौरान साउथ के एक फेमस एक्टर ने अजीब तरह से मेरे पैरों को टच करना शुरू कर दिया. शुरुआत में मैं हैरान थी. हम पहले कभी नहीं मिले थे. मैंने उसे उसकी हरकत पर एक थप्पड़ मार दिया.
यहां आपको यह भी बता दें कि इस शो के दौरान जब नेहा ने राधिका से पूछा कि उनके मुताबिक अब किस एक्टर या फिल्ममेकर को रिटारयमेंट ले लेना चाहिए तो इस पर जवाब देते हुए उन्होंने रामगोपाल वर्मा का नाम लिया. उन्होंने कहा कि अब रामगोपाल वर्मा ने बहुत काम कर लिया है और उन्हें अब रिटायरमेंट ले लेना चाहिए.
राधिका ने 2012 में प्रकाश राज की फिल्म धोनी से तमिल फिल्मों में डेब्यू किया था. इसके बाद उन्होंने साउथ की कई फिल्में की. इनमें रजनीकांत के साथ उनकी ब्लौकबस्टर फिल्म ‘कबाली’ भी शामिल है. इसमें राधिका आप्टे ने रजनीकांत की पत्नी की भूमिका की थी. इस वक्त राधिका आप्टे, नेटफ्लिक्स की पहली ओरिजनल इंडियन सीरीज ‘सेकर्ड गेम्स’ में नजर आएंगी. इसमें सैफ अली खान और नवाजुद्दीन सिद्दीकी भी होंगे. इससे पहले राधिका आर बाल्की की फिल्म पैडमैन में अक्षय कुमार के साथ नजर आई थीं.
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‘आमिर’ और ‘नो वन किल्ड जेसिका’ जैसी फिल्मों के सर्जक राज कुमार गुप्ता इस बार 1980 के लखनऊ के हाई प्रोफाइल इनकम टैक्स छापे पर आधारित फिल्म ‘‘रेड’’ लेकर आए हैं. फिल्म को यथार्थ परक बनाते समय फिल्मकार यह भूल गए कि फिल्म में मनोरंजन भी चाहिए. फिल्म ‘‘रेड’’ देखकर इस बात का अहसास होता है कि यह फिल्म एक अतीत की सत्य कथा को पेश करने के नाम पर सरकारी एजेंडे का प्रचार करने के साथ ही खास सरकार को खुश करने का भी प्रयास है. परिणामतः फिल्म नीरस व शुष्क हो गयी है.
फिल्म की कहानी 1981 के लखनऊ में पड़े हाई प्रोफाइल इनकम टैक्स छापे पर सच्ची कथा है, जब इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री थी. आयकर विभाग में कार्यरत औफिसर अमय पटनायक (अजय देवगन) का तबादला लखनऊ हो जाता है. अमय पटनायक ना सिर्फ ईमानदार बल्कि अति आदर्शवादी हैं. सुबह साढ़े चार बजे उठना, घड़ी देखकर हर काम को पूरी मुस्तैदी के साथ अंजाम देना. अब तक 49 बार उनका तबादला हो चुका है और अमय पटनायक को इसकी आदत पड़ चुकी है. लेकिन इससे उनकी पत्नी मालिनी (इलियाना डिक्रूज) कभी खुश नहींहोती.
मालिनी को बार बार सामान बांधकर एक शहर से दूसरे शहर में भटकना पसंद नहीं. मालिनी अपने पति को समझाती है कि बहुत ज्यादा ईमानदार न बनो, पर अंत में वह एक आज्ञाकारी पत्नी की ही तरह काम करती है. लखनऊ पहुंचते ही अमय को जानकारी मिलती है कि एक सांसद रामेश्वर सिंह (सौरभ शुक्ला) ने जबरदस्त टैक्स चोरी की है. रामेश्वर सिंह के घर में उनकी मां, भाई, बहन, भाभी सहित परिवार का लंबा चौड़ा कुनबा है. रामेश्वर सिंह ताकतवर हैं. उन पर कोई हाथ नहीं डालता. पर अमय अपने सहयोगियों के साथ रामेश्वर सिंह के घर पर छापा मारते हैं.
रामेश्वर सिंह भी खुद को ईमानदार समझते हैं, इसलिए वह कहते है कि मैं एक ही जगह पर बैठा हूं, जाकर तलाशी ले लो. कुछ नहीं मिलेगा. पहले तो कुछ नहीं मिलता है. पर अचानक मकान की छत पर अमय के हाथ एक कागज आता है और उस कागज में बने नक्शे के आधार पर नए सिरे से तलाशी लेने पर 420 करोड़ की नकदी व जेवर आदि मिलते हैं. उसके बाद अमय पर कई तरह के दबाव आते हैं. यहां तक कि प्रधानमंत्री खुद अमय को फोन करके कहती हैं कि मामले को रफा दफा कर दें, पर अमय किसी की सुनते नहीं हैं.
अमय अपनी जांच जारी रखते हैं, पर अंत में जब सच सामने आता है, तो कुछ अलग ही होता है.
इनकम टैक्स औफिसर के किरदार में अजय देवगन के अभिनय में उनकी पिछली कई फिल्मों का दोहराव ही है. वह एक ही तरह के मैनेरिज्म के साथ परदे पर नजर आते हैं. अजय देवगन ‘गंगाजल’, ‘सिंघम’ सहित कई फिल्मों में सिस्टम के खिलाफ जाकर एक ईमानदार अफसर के किरदार निभा चुके हैं. ‘रेड’ में कुछ भी नया नहीं कर पाए. हर सीन में वह महज फिल्मी हीरो के रूप में ही नजर आते हैं. उनका किरदार स्थिर सा लगता है.
इलियाना डिक्रूज के हिस्से करने को कुछ है ही नहीं. निर्देशक ने उनकी प्रतिभा का बेजा इस्तेमाल किया है. कथानक मे इलियाना डिकूजा के किरदार की कोई गुंजाइश ही नहीं थी. सौरभ शुक्ला ने साबित कर दिखाया कि उनके अभिनय का कोई सानी नहीं है. अमित सयाल, गायत्री अय्यर सहित बाकी सभी कलाकारों की प्रतिभा का दुरुपयोग ही किया गया है.
पटकथा व निर्देशन के स्तर पर भी काफी कमियां हैं. एक सत्य कथा को भी नाटकीय ढंग से पेश नहीं कर पाए राज कुमार गुप्ता. फिल्म बेवजह लंबी, रबर की तह खींची गयी है. फिल्म की कहानी लखनऊ शहर की है, मगर फिल्म से लखनऊ गायब है. चंद पुरानी इमारतें दिखाकर यह कहना कि यह लखनऊ शहर है, अजीब सा लगता है. लखनऊ की संस्कृति तहजीब कुछ भी फिल्म का हिस्सा नहीं है. ‘आमिर’ व ‘नो वन किल्ड जेसिका’ जैसी धारदार फिल्में बना चुके राज कुमार गुप्ता की इस फिल्म में कोई धार नहीं है. यह फिल्म मनोरंजन के नाम पर भी शून्य है. राज कुमार गुप्ता को नहीं भूलना चाहिए कि इनकम टैक्स रेड पर ही बनी फिल्म ‘स्पेशल 26’ में नाटकीयता के साथ साथ रोमांच व मनोरंजन भी था.
फिल्म का गीत संगीत भी कमजोर है. यहां तक कि फिल्म का पार्श्व संगीत भी फिल्म को नाटकीय नहीं बना पाता.
119 मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘रेड’’ का निर्माण अभिषेक पाठक, कुमार मंगत पाठक, भूषण कुमार, किशन कुमार ने किया है. निर्देशक राज कुमार गुप्ता, कहानीकार रितेश शाह,पटकथा लेखक राज कुमार गुप्ता व रितेश शाह, संगीतकार अमित त्रिवेदी, कैमरामैन अल्फांसो राय तथा कलाकार हैं – अजय देवगन, इलियाना डिक्रूज, सौरभ शुक्ला, गायत्री अय्यर,अमित सयाल, अक्षय वर्मा, अमित बिमोरेट व अन्य.
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