लाल ड्रेस में गजब दिख रही हैं हिना खान, देखें तस्वीरें

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फेमस टीवी एक्ट्रेस हिना खान इन दिनों अपने हौट अवतार की वजह से चर्चा में हैं. पिछले दिनों उन्होंने अपनी कुछ ग्लैमरस तस्वीरें सोशल मीडिया पर शेयर की थीं जिसके बाद वह चर्चा में आ गई थीं. वहीं उस फोटोशूट की तस्वीरों के बाद हिना अपने बोल्ड अवतार को लेकर एक बार फिर सुर्खियों में हैं. हाल ही में हिना ने अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर एक फोटो शेयर की है जिसमें वह बेहद ग्लैमरस नजर आ रही हैं.

इस फोटो को शेयर करते हुए हिना ने कैप्शन दिया यह फोटो सिर्फ तुम्हारे लिए है. इसे पढ़कर सबको लगा कि वह अपने बौयफ्रेंड रौकी जैसवाल की बात कर रही हैं, लेकिन ऐसा नहीं है हिना ने यह किसी और के लिए पोस्ट की है.

अक्सर अपने बौयफ्रेंड रौकी के साथ नजर आने वाली हिना ने अपनी बोल्ड फोटो शेयर करते हुए लिखा, ‘यह खास तौर पर तुम्हारे लिए है. मैं अपना खयाल रख रही हूं. मैं अच्छे से खा रहीं हूं और एक्सरसाइज भी कर रही हूं’. इस फोटो में हिना लाल रंग के क्रौप टौप में नजर आ रही हैं. उन्होंने ला फ्रंट ओपन स्कर्ट भी पहनी है. हिना फोटो में काफी हौट नजर आ रही हैं.

उन्होंने यह फोटो अपने फिटनेस ट्रेनर विक्की डोगरा के लिए शेयर की है. फोटो में हिना काफी फिट भी नजर आ रही हैं. हिना टीवी इंडस्ट्री में अपनी फिटनेस को लेकर काफी चर्चा में रहती हैं. यहां तक की वह रिएलिटी शो बिग बौस सीजन 11 के दौरान भी ज्यादातर समय जिम में बिताया करती थीं.

इससे पहले भी हिना का ग्लैमरस रूप उनकी फोटो में दिखाई दिया था. वह डेनिम शौर्ट और काले लौन्ग बूट्स में पोज देती दिखीं थीं. खबरों की मानें तो हिना इन दिनों एक पंजाबी एल्बम भसूड़ी को शूट कर रही हैं. वह इस एल्बम में काफी बोल्ड और बिंदास लुक में नजर आने वाली हैं. इसमें हिना के साथ सिंगर सोनू ठकराल नजर आएंगे. हिना ने इस एल्बम के शूट की भी कुछ फोटो को सोशल मीडिया पर शेयर किया था. बता दें हिना को टीवी इंडस्ट्री में स्टार प्लस के शो ये रिश्ता क्या कहलाता है में उनके द्वारा निभाए गए अक्षरा के किरदार के लिए जाना जाता है.

सरकारी अस्पताल की हवा से सिट्टीपिट्टी गुम

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पहले सरकार से हर रोज कोई न कोई शिकायत रहती थी. अब केवल खुद से रहने लगी है. आज तक न तो सरकार से मुझे अपनी शिकायतों का हल मिला, न ही खुद से.

सरकार द्वारा जनता की शिकायतों के हल के लिए खुले हर ‘शिकायत निवारण कक्ष’ के बाहर जब तक टांगों में दम रहा, मैं घंटों खड़ा रहा. बहुत बार तो ‘शिकायत निवारण कक्ष’ के मुंह पर

जंग लगे ताले ही लटके मिले और जो कभीकभार कोई ‘शिकायत निवारण कक्ष’ खुला भी मिला तो वहां पहले से ही शिकायत करने वालों की इतनी लंबी लाइन थी कि शिकायत लिखवाने में ही हफ्तों लग जाएं. ऐसी शिकायत का हल दोबारा जन्म लेने के बाद भी मिल जाए, तो भी तालियां.

जब मैं ने महसूस किया कि मेरी अपने से शिकायतें कुछ ज्यादा ही बढ़ रही हैं तो पड़ोस के एक गुणी ने मुझे सलाह दी, ‘‘देखो बंधु, मैं एक बार फिर चेतावनी दे रहा हूं कि जब तक तुम्हारा समय पूरा नहीं हो जाता, ऊपर मत चल पड़ना. अगर ऐसा किया तो वहां शरणार्थी शिविर में रहना पड़ेगा और तुम शरणार्थी शिविरों की बदहाल जिंदगी के बारे तो जानते ही हो. फिर मत कहना कि… इसलिए जब तक समय पूरा नहीं हो जाता, जैसेतैसे दम साधे जीने की कोशिश करते रहो दोस्त. यही तुम्हारे लिए बेहतर है.

‘‘तो क्यों न अब ऐसा करो कि अपना बचा समय काटने के लिए खुद को सरकारी अस्पताल में चैक करा आओ. ऐसे में थोड़ा बदलाव भी हो जाएगा और अस्पताल की भागदौड़ में 2-4 पुराने दोस्त भी मिल जाएंगे. घर में वैसे भी तुम अकेले पड़ेपड़े सड़ते रहते हो.’’

उस गुणी की सलाह मुझे नेक लगी और मैं सरकारी अस्पताल को कूच कर गया.

अस्पताल गया तो पता चला कि अपने प्राइवेट क्लिनिक से बड़े दिनों बाद डाक्टर साहब वहां आए थे. हो सकता है, उन के हाथों ही मेरी मौत लिखी थी.

मेरे ऊपर जाने सौरी खुद को चैक करवाने की बारी आई तो मैं डाक्टर के पास हो लिया.

वे मुझे बड़े ही बुझे मन से चैक करते हुए पूछने लगे, ‘‘क्या बात है? सरकारी अस्पताल ही क्यों आए हो? घर में चैन से नहीं मर सकते थे क्या?

‘‘आजकल अजीब सा फैशन हो गया है जनता में. हर कोई घर में मरने के बदले अस्पताल में आ कर मरना चाहता है. पता नहीं, अस्पताल आ कर मरने में ऐसा क्या खास है कि… चलो, उस तरफ को लेट जाओ.’’

dमैं ने उन के कहे ओर लेटते हुए कहा, ‘‘असल में सर क्या है न कि लोगों में किसी ने यह अफवाह फैला दी है कि जो सरकारी अस्पताल में मरता है वह सीधा बैकुंठ को जाता है.’’

वे चौंके, ‘‘सच?’’

‘‘जी हुजूर, वरना सारी उम्र अपने घर में तिलतिल कर मरने के बाद आप के अस्पताल में मरने कौन बेवकूफ आता.’’

‘‘यहां आने के लिए क्या महसूस किया तुम ने?’’ डाक्टर ने पूछा.

‘‘डाक्टर साहब, मन की बात कहूं तो अब सांस लेने का भी मन नहीं कर रहा है. खून की कमी तो मुझ में है ही, उस के बाद भी सिस्टम के खटमलों ने मुझे इतना चूसा कि…’’ मैं ने लंबी सांस लेने की नाजायज कोशिश की.

‘‘सिस्टम में खटमल? पर सरकार तो कहती है कि सिस्टम अब खटमल फ्री हो गया है. जरा और जोर लगा कर जीने की हिम्मत करो,’’ डाक्टर बोले.

‘‘नहीं सर, सच पूछो तो अभी आप के सरकारी अस्पताल के बिस्तर भी खटमल फ्री नहीं हुए हैं. पिछली दफा जब खून की कमी होने पर खून चढ़वाने आया था तो यहां से डिस्चार्ज होते वक्त 2 ग्राम खून कम हो गया था. सिस्टम की बात तो आप छोडि़ए.’’

‘‘काफी निचुड़े हुए लगते हो?’’ डाक्टर साहब ने हंसते हुए मुझे दूसरी ओर को पलटा, ‘‘तो इस के सिवा और क्याक्या महसूस करते हो तुम?’’

‘‘खैर, भूख तो बहुत पहले कभी लगती थी डाक्टर साहब. जब कुछ खाने को नहीं मिला तो अब उस ने भी लगना बंद कर दिया है. शुरूशुरू में जब चक्कर आते थे तो मैं तो नहीं, पर मेरी आत्मा बहुत परेशान होती थी. पर जब लगातार चक्कर पर चक्कर आने लगे तो उस ने मेरे चक्करों के बारे में सोचना ही छोड़ दिया.

‘‘शुरूशुरू में टांगों में कंपन हुई तो मैं बहुत घबराया. अब तो रोज ही टांगों में कंपन रहती है तो मैं ने इसे ऊपर वाले का उपहार मान लिया.’’

‘‘बड़ी हिम्मत वाले हो यार तुम. जीना है तो और हिम्मत वाले बनो,’’ डाक्टर साहब ने पीठ के बदले मेरा पेट थपथपाने के बाद पूछा, ‘‘तो अब…?’’

‘‘कुछ दिनों से सांस लेने में दिक्कत हो रही थी. जब दिक्कत कुछ ज्यादा ही हो गई तो… पर मैं वह बंदा हूं साहब, जो बिना किसी की परवाह किए शुद्ध जल के बिना जी सकता है. शुद्ध अन्न के बिना जी सकता है, शुद्ध मन के बिना भी जी सकता है. लेकिन हवा के बिना जब जीना मुश्किल लगा तो…’’

‘‘पर यार…’’

‘‘क्या सर…’’ मैं ने इतना ही कहा था कि तभी सायरन बजा तो मुझे छोड़ कर भागते डाक्टर साहब से मैं ने पूछा, ‘‘यह सायरन कैसा है सर? कोई बड़ी मुसीबत आ गई है क्या?’’

‘‘बचना है तो भाग, अस्पताल की हवा खत्म हो गई है.’’

‘‘अब सर…?’’

‘‘जो मरीज ठीक होना चाहें उन्हें मेरी सलाह है कि वे कुछ दिन अस्पताल से बाहर भी रहा करें,’’ कहते हुए उन्होंने अस्पताल से नौ दो ग्यारह होने के लिए कमर कसी.

‘‘मतलब?’’ मैं ने फिर पूछा.

‘‘नो मोर बकवास. जान बचानी है तो भाग पेशेंट भाग,’’ कह कर डाक्टर साहब नजर नहीं आए.

नकल पर फैसले से सकते में बोर्ड परीक्षार्थी

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उत्तरप्रदेश में बोर्ड की परीक्षाओं में 10 लाख विद्यार्थियों का परीक्षा देने से इनकार करना चौंकाने वाली बात है. उत्तर प्रदेश बोर्ड की परीक्षाओं में सख्ती के कारण ऐसा हुआ है, क्योंकि सरकार ने फैसला किया है कि वह परीक्षा में नकल नहीं होने देगी और उत्तरपुस्तिकाओं में भी हेरफेर नहीं होने देगी. इन 10 लाख विद्यार्थियों के कई साल और परीक्षाओं में धांधली के लिए दिए गए पैसे मिट्टी में मिल गए. गरीब घरों से आने वाले इन 10 लाख छात्रछात्राओं की जो झूठी आस थी कि वे नकल कर के मिले प्रमाणपत्रों के सहारे शायद कभी कोई सरकारी नौकरी पा सकेंगे, अब समाप्त हो गई है.

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने यह काम अनुशासन लाने के लिए किया, यह मानना गलत होगा. परीक्षाओं में नकल करवाने का धंधा सुनियोजित है और इसे बड़ी सावधानी से सालदरसाल उस तरह लागू किया जाता है जैसे कांवड़ यात्रा का आयोजन किया जाता है.

स्कूलों में प्रवेश के साथ ही लाखों दलितों व पिछड़ों को समझा दिया जाता है कि उन को शिक्षा देना सरकार का काम नहीं. शिक्षक सरकार से गुरु होने की दक्षिणा पाने के लिए स्कूल आते हैं और उसी दक्षिणा में शिष्यों के योगदान को भी स्वीकार करते हैं, पर बदले में शिक्षा देना उन का कर्तव्य नहीं है. द्रोणाचार्य ने एकलव्य से दक्षिणा ली थी, उसे शिक्षा नहीं दी थी.

12वीं पास होने का अधिकार हर ऐरीगैरी जाति को कैसे दिया जा सकता है? 12वीं तक की कक्षाओं में अध्यापक हैं, स्कूल भवन हैं, मिड डे मील है, खेलों के लिए पैसा है, अध्यापकों के लिए मोटा वेतनमान है, निरीक्षकों के लिए वाहनों की सुविधाएं हैं, बड़े एयरकंडीशंड औफिसों में महंतनुमा डायरैक्टर हैं. अगर कुछ नहीं है तो वह है शिक्षा और परीक्षा के लिए अगर वह नहीं, तो परीक्षा देने कौन, कैसे आएगा.

इन 10 लाख विद्यार्थियों की परीक्षा देने की हिम्मत नहीं हुई तो इस की जिम्मेदारी उन के गुरुओं की है. हालांकि हिंदू माहात्म्य में गुरु गलत नहीं हो सकता. वे शिष्यों का जीवन बरबाद कर सकते हैं पर उन को कोई फटकार भी नहीं लगा सकता, योगी आदित्यनाथ के राज में तो बिलकुल भी नहीं.

यह नकल कराने की और दक्षिणा पाने की प्रथा अरसे से चली आ रही है. योगी सरकार इसे समाप्त नहीं करना चाहती होगी. वह इसे खास ओर मोड़ना चाहती होगी ताकि सारा धनधान्य सत्ताधारी के आश्रमवासी, ऋषिमुनियों को मिले, दूसरों को नहीं. चिंता न करें, जल्दी ही दक्षिणा पाने की नई योजना महंतों की ओर से आएगी. बस, थोड़ा इंतजार करिए. मुक्ति पाने के लिए तो कई जन्मों का इंतजार करना पड़ता है

संविदा नियुक्ति में अपनों को रेवड़ी

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मध्य प्रदेश में संविदा नियुक्ति नियम 2017 के वजूद में आते ही उन हजारोंलाखों लोगों की बांछें खिल गईं जो भारतीय जनता पार्टी या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े हैं. इस नियम के तहत सरकार जिसे चाहे संविदा पर सरकारी नौकरी दे सकती है. नियम को बनाने और लागू करने में सरकार ने गजब की फुरती दिखाई और महज एक महीने के गहन चिंतन के बाद ही इसे अमलीजामा पहना दिया.

यह पहला मौका होगा जब गैर सरकारी लोग बगैर किसी प्रवेशपरीक्षा या योग्यता के सरकारी नौकरी के पात्र होंगे.  इस अनूठे नियम में हैरानी की एक बात यह भी है कि इस में शैक्षणिक योग्यता का जिक्र  नहीं है  यानी इकलौती योग्यता किसी मंत्री का मुंहलगा होना होगा. ऐसी और भी कई विसंगतियां इस नियम में हैं जो सरकार की मंशा पर सवालिया निशान लगाती हैं. नए नियम का मसौदा इतनी चतुराई से बनाया गया है कि सरकार जिसे चाहे, सरकारी नौकरी दे कर उपकृत कर सकती है.

यह है नियम

सरकार ने पूरी कोशिश की है कि संविदा नियुक्ति नियम देखने में आसान न लगें, पर बारीकी से इसे देखें तो साफ नजर आता है कि इस नियम की आड़ में कानूनीतौर पर मनमानी करने को मंजूरी दे दी गई है.

अभी तक राज्य में संविदा नियुक्ति का कोई नियम नहीं था. हालांकि, सामान्य प्रशासन विभाग ने साल 2011 में कुछ दिशानिर्देश जारी किए थे पर वे इतने अस्पष्ट थे कि हर एक सरकारी विभाग ने अपनी सहूलियतों व जरूरतों के मुताबिक भरती नियम बना लिए थे, जिस का खमियाजा सरकार अभी तक भुगत रही है. ये संविदा कर्मचारी कभी भी नियमतीकरण के अलावा अन्य मांगों को ले कर सड़कों पर हड़ताल, धरनाप्रदर्शन व हंगामा करते नजर आते हैं जिस से कामकाज ठप ही होता है.

सरकार ने अब तय किया है कि आम लोगों को भी यह मौका दिया जाए.  निचले से ले कर ऊपरी रसूखदार पदों तक सरकार हर किसी को नौकरी देगी.  बिलकुल राजशाही न दिखे, इस के लिए मामूली सी शर्त यह होगी कि जिस पद पर उसे नियुक्ति देना है, उसे पहले संविदा पद घोषित किया जाएगा. प्राप्त आवेदनों पर मंत्रिमंडल फैसला लेगा कि नौकरी किसे दी जाए.

सितंबर के आखिर में इस नियम के वजूद में आने के बाद से ही मंत्रियों के बंगलों पर चहलपहल व रौनक और बढ़ गई है. हर कोई चाहता है कि अगले साल चुनाव के पहले उसे संविदा वाली नौकरी मिल जाए. इस के बाद जो होगा, देखा जाएगा. मंत्रियों ने भी बाकायदा वफादारों को भरोसा देना शुरू कर दिया है कि चिंता मत करो, अगली कैबिनेट बैठक में ही काम हो जाएगा. दिलचस्प हालत तो यह है कि सरकारी नौकरी चाहने वाले लोग खुद ही खाली पदों की जानकारी ले जा कर मंत्रियों को दे रहे हैं.

गौरतलब है कि सरकार संविदा नियुक्ति तभी देगी जब नियमित पद खाली हों और उन के लिए काबिल उम्मीदवार न मिल रहे हों. हर एक विभाग में छोटे से ले कर बडे़ पद लाखों की तादाद में खाली पड़े हैं. बावजूद इस के कि इन के लिए शिक्षित और काबिल लोगों की कमी नहीं, सीधी भरती के बंद होेने और पदोन्नति में आरक्षण का कानूनी विवाद होने के चलते भरतियां नहीं हो रही हैं.

ऐसे में उन लोगों की चांदी हो आना तय दिख रहा है जो मंत्रियों, भाजपा के बड़े नेताओं और आरएसएस के चहेते हैं.  वे आकाओं के लिए मुद्दत से फर्श उठाने से ले कर रैलियों की भीड़ बढ़ाने तक में अपना योगदान देते रहे हैं. नए नियम के तहत, न केवल सरकारी विभाग बल्कि मुख्यमंत्री और मंत्री भी अपने स्टाफ में बाहरी लोगों को रख सकेंगे. अभी तक होता यह था कि मंत्रियों के स्टाफ में प्रतिनियुक्ति पर सरकारी कर्मचारीअधिकारी के लिए जाने का ही प्रावधान था. वह अब इस फैसले से खत्म हो गया है.

खामियां ही खामियां

हैरानी नहीं होनी चाहिए अगर जल्द ही कोई चाय, ठेला या खोमचा वाला खाद्य निरीक्षक या अधिकारी बन जाए या फिर शराब की दुकान में काम करने वाला कर्मचारी आबकारी निरीक्षक के पद पर शोभायमान दिखे. ऐसा इसलिए कि मसौदे में कहीं इस बात का जिक्र नहीं है कि उम्मीदवार की शैक्षणिक योग्यता, अनुभव और उम्र कितनी होनी चाहिए.

खुद को पाकसाफ दिखाने के लिए सरकार ने यह जरूर कहा है कि इन गैरसरकारी संविदा पर नौकरी वालों को महंगाई भत्ता नहीं दिया जाएगा और उन्हें पद का न्यूनतम वेतन ही दिया जाएगा लेकिन इन्हें अवकाश सरकारी कर्मचारियों की तरह ही दिए जाएंगे.  अगर महिला की भरती होती है तो उसे मातृत्व अवकाश दिया जाएगा. यानी कोई महिला भरती होने के बाद चौथे महीने में ही गर्भवती हो जाती है तो उसे सालभर का वेतन बैठेबिठाए दिया जाएगा.

सरकारी नौकरी हर किसी की ख्वाहिश होती है. वजह, इस में काम कम और दाम ज्यादा होते हैं. ऐसा कोई सरकारी पद नहीं है जिस में घूस खाने के इंतजाम न हों. ऐसे में न्यूनतम वेतन की बात बेमानी है. उलटे, घूसखोरी बढ़ने की आशंका ज्यादा है. जो भी सिफारिश से या घूस दे कर आएगा, उस का पहला काम और कोशिश ज्यादा से ज्यादा पैसा बना लेने की होगी. सरकार ने इन लोगों की जवाबदेही भी तय नहीं की है, न ही यह कहा है कि अच्छा प्रदर्शन न करने पर इन्हें सेवा से हटाया जा सकता है.

जाहिर है यह सिर्फ अपनों को रेवडि़यां बांटने की कवायद है जिस में मंत्रियों को तो खुली छूट दे दी गई है कि वे जिसे चाहें, नौकरी पर रख लें. ऐसे में भाजपा कार्यकर्ताओं और स्वयंसेवकों के सपने अंगड़ाई ले रहे हैं जो बात कतई हैरानी की नहीं.

रेवडि़यां ही रेवडि़यां

अब होगा यह कि ये नए सरकारी दामाद जम कर पैसा काटेंगे. किसी का ध्यान इस तरफ नहीं जा रहा कि इस नए नियम में आरक्षण का जिक्र भी कहीं नहीं है. मुमकिन है तमाम कर्मचारी अनारक्षित कोटे के हों.  आरक्षण पर हायहाय करने वाले भी इस में कुछ नहीं कर पाएंगे.  एक तरह से यह दलितों और आदिवासियों की अनदेखी ही है.

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के गृहनगर विदिशा के भाजपा कार्यकर्ता तो इस फैसले से कुछ ज्यादा ही उत्साहित हैं उन्होंने फिर गणेश परिक्रमा शुरू कर दी है. ऐसे ही एक कार्यकर्ता ने इस प्रतिनिनिधि को बताया कि उस की नौकरी तो पक्की है. 40 वर्षीय यह कार्यकर्ता बचपन से भाजपा में है और सीएम हाउस में उस की खासी पूछपरख है. अब इसे और ऐसे लोगों को अगर नौकरी मिली, तो तय है कि यह जनता के पैसे की खुली बरबादी होगी जो भाजपा के प्रचारप्रसार के एवज में बांटी जाएगी.

इन रसूखदार सरकारी नौकरों पर विभाग के अफसरों का हुक्म और हिदायतें चलेंगी, ऐसा लग नहीं रहा.  सरकार ने जानबूझ कर इस बात का भी उल्लेख नहीं किया है कि राजनीतिक दलों और विचारधाराओं से जुड़े लोगों को संविदा वाली नौकरी नहीं दी जाएगी जिस से संदेशा यह जा रहा है कि ये नौकरियां उन्हीं लोगों को दी जाएंगी जो सत्तारूढ़ दल और आरएसएस जैसी किसी विशेष विचारधारा से जुड़े हैं.

शुरुआती दौर में ही हर कोई मानने लगा है कि यह नियम अपनों को उपकृत करने के लिए बनाया गया है जिस से चुनाव में भाजपा को फायदा हो. अभी तक सरकारी अधिकारी जिस दल की विचारधारा से सहमत होते थे, उसे खुल कर बयां नहीं करते थे, पर अब साफ दिख रहा है कि सरकारी दफ्तर राजनीति के अड्डे बन जाएंगे जिन में सरकारी नौकर बनने वाले नेता जनता के पैसे पर पलेंगे. 10-15 फीसदी अगर ईमानदारी से ले भी लिए गए तो उन से कोई फर्क नहीं पड़ने वाला.

बेहतर तो यह होता कि सरकार कौर्पोरेट और प्राइवेट कंपनियों से कर्मचारियों की भरती करती जो कड़ी मेहनत करते हैं और घूस वगैरा भी नहीं लेते. इन लोगों को अपने काम का अच्छा अनुभव होता है. पर सरकार की मंशा सिर्फ रेवडि़यां बांटने की ही है, तो कोई क्या कर लेगा.

सामान्य प्रशासन विभाग के एक अधिकारी का नाम न छापने की शर्त पर कहना है कि बात, ‘अभी गांव बसा नहीं कि भिखारी पहले आ गए’ जैसी है. अभी किसी पद के लिए विज्ञापन नहीं दिया गया है लेकिन विभिन्न विभागों में आवेदन जमा होने लगे हैं. इस अधिकारी के मुताबिक, हर एक नया कर्मचारी हर साल 3 से 8 लाख रुपए तक खजाने के खाली करेगा.

अभी एक साल के लिए भरती होेने जा रही है. नए सरकारी नौकर तो चाहेंगे ही कि अगली बार भी भाजपा ही सत्ता में आए ताकि उन की नौकरी आगे भी चलती रहे. हैरानी की एक बात इस फैसले पर विपक्ष की खामोशी है.

युवा बनाम वृद्ध : उम्र के सिनेमाई फासले

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मणिरत्नम की फिल्म ‘युवा’ में जब युवा दल का नेता अपने साथियों के साथ चुनावी जीत हासिल करने के बाद संसद प्रांगण में दाखिल होता है तो वहां पहले से मौजूद वरिष्ठ व वृद्ध नेताओं और मंत्रियों के हावभाव देख कर युवा बनाम वृद्ध के बीच के अहं, संघर्ष, वैचारिक असमानता और तल्खियोेंभरे रिश्ते बखूबी जाहिर होते हैं. भारतीय सिनेमा में उम्र के इस फासले के टकराव को वैचारिक, सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और आपराधारिक मोरचे पर मिर्चमसाले के तड़के के साथ पेश करना बेहद कामयाब फार्मूला रहा है.

कभी नायक नायिका के अमीरी के नशे में चूर वृद्ध पिता से टकराता है तो कभी युवा नायक पुलिस या सैनिक की वरदी में उम्रदराज विलेन से दोदो हाथ करता नजर आता है. कई दफा रोमांस की पिच पर एक हसीना के प्यार में पागल युवा और वृद्ध नायक मजेदार चूहेबिल्ली का खेल खेलते दिखते हैं. कभीकभी तकरार चुनावी पगडंडियों से गुजरती हुई पार्लियामैंट तक पहुंच जाती है. और इस सारे क्रम में जैनरेशन गैप के चलते दोनों के बीच की भिड़ंत का इमोशन प्रभावी तरीके से उभरता है. यही वजह है कि बदलते दौर के सिनेमा में सबकुछ बदला लेकिन यंग गन को ओल्ड बैरल के सामने हमेशा दोदो हाथ कर दिखाया गया.

ऐसा नहीं है कि दोनों हमेशा टकराते ही रहते हैं. फिल्म ‘पिंक’ में एक नए तरीके से युवावृद्ध को संवेदनशील तार में पिरोते देखा गया. युवा अपराधी 3 लड़कियों से न सिर्फ छेड़छाड़ करते हैं बल्कि उन में से एक लड़की के साथ बलात्कार भी करते हैं. जब लड़कियां राजनीतिक रसूख के सामने घुटने तोड़ रही होती हैं तभी एक बुजुर्ग वकील उन के लिए अदालत की चौखट पर इंसाफ की बहस करता है और उन्हें न्याय दिलाता है.

युवा बनाम वृद्ध के फार्मूले की बदौलत सिनेमाघरों में जो संख्या युवाओं की होती है, लगभग उसी तादाद में बुजुर्ग भी दिख जाते हैं. आगे कुछ ऐसी ही फिल्मों व किरदारों की चर्चा करते हैं जहां उम्र के सिनेमाई फासले अपनीअपनी उम्र के फायदे और नुकसानों के साथ एकदूसरे के सामने डट कर खड़े हैं.

उपेक्षित बुजुर्ग, स्वच्छंद युवा

रजत कपूर की फिल्म ‘दत्तक’ पितापुत्र के रिश्ते को नए तरीके से परिभाषित करती है. उस में युवा और बुजुर्ग के बीच संघर्ष की कोई आर्थिक, आपराधिक या सियासी वजह नहीं है. मामला उपेक्षा का है. जब देश के महल्ले वृद्धाश्रम बनते जा रहे हैं और युवा कैरियर की स्वच्छंदता के नाम पर अपनी दुनिया में मसरूफ हों तो बुजुर्ग कहां जाएं, इस मुद्दे को फोकस में ले कर फिल्म की कहानी आगे बढ़ती है.

विदेश से कई सालों बाद लौटा पुत्र अपने बुजुर्ग पिता की तलाश में भारत लौटा है और इस क्रम में उसे अपने पिता के साथ वृद्ध आश्रम में अंतिम दिनों के साथी रहे बुजुर्ग से उन के आखिरी दिनों का पता चलता है. जब उसे पता चलता है कि उस के पिता की मृत्यु उस का इंतजार करतेकरते हो गई तो वह अपराधबोध से ग्रस्त हो जाता है लेकिन एक क्रांतिकारी फैसला भी लेता है. पुत्र पिता की जगह उस बुजुर्ग को अपने साथ ले जाता है, इस तर्क के साथ कि जब पुत्र को दत्तक लिया जा सकता है तो पिता को क्यों नहीं?

बेहद अहम मसलों को रेखांकित करती इस फिल्म के प्लौट को कई और फिल्मों में देखा गया. मसलन, ‘अवतार’, ‘बागबान’, ‘उम्र’, और ‘आ अब लौट चलें’ आदि में युवाओं द्वारा उपेक्षित बुजुर्गों का दर्द बयां हुआ. ‘पूरब और पश्चिम’ और ‘नमस्ते लंदन’ में दिखाया गया कि किस तरह युवा अपनी स्वच्छंद जिंदगी के लिए बुजुर्ग मातापिता को अकेलेपन की अंधेरी गुफा में धकेल रहा है.

रोमांस में जब चीनी हो कम

रुपहले परदे पर रोमांस सब से बड़ा बिकाऊ और हिट फार्मूला रहा है. रोमांस में मजेदार परिस्थितियां अकसर उम्र के फासलों को ले कर पैदा होती हैं. हीरो और हीरोइन के बीच जातपांत और अमीरीगरीबी का मामला किसी तरह सुलझ भी जाए लेकिन अगर दोनों के बीच उम्र का अंतर है तो मामला रोचक होना तय है.

फिल्म ‘चीनी कम में’ जब 60 पार कर चुके खड़ूस शेफ का दिल 30 पार लड़की पर आ जाता है तो उम्र की उस दीवार को तोड़ने में नायक के पसीने छूट जाते हैं. पहले कम उम्र की लड़की को कन्ंिवस करो, फिर उम्र में खुद से छोटे अपने ससुर का आमरण अनशन तुड़वाओ और न जाने क्याक्या, बस इस तिकड़म में अमिताभ बच्चन, तब्बू और परेश रावल की जुगलबंदी दर्शकों को मजेदार और मनोरंजक लगती है.

इसी थीम को दोहराया गया राम गोपाल वर्मा की विवादित फिल्म ‘निशब्द’ में. फर्क इतना था कि यहां नायक तो 60 साल का बूढ़ा है लेकिन दिल जिस पर आया है उस की उम्र स्वीट 16 की है. साल 2003 में सुभाष घई की फिल्म ‘जौगर्स पार्क’ में एक रिटायर्ड जज खुद से आधी उम्र की लड़की के इश्क में पड़ जाता है. लिहाजा, उसे अपनी बीवी और बच्चों के सामने फजीहत का शिकार होना पड़ता है. उम्र का फासला लोगों को उन के प्यार की गहराई नहीं समझने देता. इस के उलट, ‘श्रीमान आशिक’ और ‘इक्के पे इक्का’ जैसी हास्य फिल्मों में बुजुर्ग हीरो दिल में रोमांस की चाह लिए युवा का रूप धर नायिका का दिल जीतने की मजेदार तिकड़में भिड़ाता है.

ऐसा नहीं है कि हर बार नायक ही बुजुर्ग होता है. कई बार नायिका बुजुर्ग या उम्रदराज होती है और कम उम्र के नायक का दिल उस पर आ जाता है. याद आती है यश चोपड़ा की बहुचर्चित फिल्म ‘लमहे’. फिल्म के फर्स्ट हाफ में अपने से बड़ी उम्र की औरत के प्यार में खोया नायक जब अपने प्यार को नहीं हासिल कर पाता है तो ताउम्र अविवाहित रहने का फैसला करता है.

कहानी में ट्विस्ट तब आता है जब नायक के प्रेम को अस्वीकृत करने वाली औरत की कमसिन बेटी उम्रदराज हो चुके उसी नायक की तरफ आकर्षित होने लगती है जो उस की मां से प्रेम करता था. उम्र के अनूठे मोड़ में उलझी इस प्रेमकहानी को रिलीज के समय भले ही दर्शकों का वाजिब प्यार न मिला हो पर आज इस फिल्म को क्लासिक का दरजा हासिल है.

इन मसलों को हास्य के हलकेफुलके अंदाज में ‘हसीना मान जाएगी’ में देखा गया जब एक उम्रदराज बूआ का दिल युवा पर आ जाता है. ‘सात खून माफ’ में यह मामला जरा डार्क थीम में लिपटा था. इस तरह जबतब रोमांस की रोड पर उम्र का ब्रेकर लगा है, हालात जरा इश्किया हो ही जाते हैं.

उफ…ये तुम्हारे आदर्श…

रोमांस से आगे बढ़ते हैं तो फिल्मी परदे पर युवा और वृद्ध के बीच सियासी, सामाजिक व आदर्शवाद का संघर्ष होने लगता है. विचारधारा का टकराव कभी भ्रष्टाचार और उसूलों को ले कर होता है तो कभी जिंदगी जीने के तरीके व नियमकानून  को मानने या न मानने को ले कर. कई दफा युवा सोच सही साबित होती है तो कई बार वृद्ध के अनुभव युवाओं पर भारी पड़ते हैं.

फिल्म ‘बुद्धा इन ट्रैफिक जाम’ में बुजुर्ग प्रोफैसर और युवा मैनेजमैंट के स्टूडैंट का वैचारिक टकराव काबिलेगौर है. एक पूंजीवाद का समर्थन है तो दूसरा वाम विचारधारा का है. इसी तरह का द्वंद्व सुधीर मिश्रा ने फिल्म ‘हजारों ख्वाहिशें ऐसी’ में दर्शाया था. जहांनक्सल और पूंजीवाद की जमीन पर युवाओं का उम्रदराज व भ्रष्ट व्यवस्था से विरोध था.

फिल्म ‘पीकू’ में पितापुत्री की जोड़ी अपनेअपने नजरिए को ले कर तकरार भी करती है और प्यार भी. यश चोपड़ा की ही एक और फिल्म  ‘मोहब्बतें’ में जहां युवा संगीतकार शिक्षक कालेज में प्यार के सभी दरवाजे छात्रों के लिए खोलना चाहता है, वहीं पिं्रसिपल कठोर अनुशासन का समर्थक है. हालांकि फिल्म के आखिर में युवा दिल और सोच के आगे कठोर दिल पिघल जाता है.

अमिताभ और अक्षय कुमार की3 फिल्में ‘एक रिश्ता,’ ‘खाकी’ और ‘वक्त’ में युवा बनाम वृद्ध के संघर्ष के3 अलगअलग आयाम दिखे. फिल्म ‘एक रिश्ता’ में बुजुर्ग पिता अपने युवा पुत्र पर भरोसा नहीं दिखाता और किसी के बहकावे में आ कर उसे घर से बाहर निकाल देता है. यहां दोनों के बीच संघर्ष कारोबार के संचालन को ले कर है. जबकि फिल्म ‘खाकी’ में दोनों के बीच संघर्ष ईमानदारी और बेईमानी को ले कर है. यहां युवा करप्ट है और वृद्ध पुलिस अफसर ईमानदार. जबकि ‘वक्त’ में युवा पुत्र कामचोर है और बुजुर्ग पिता अपनी जिंदगी के बचे चंद दिनों में अपने पुत्र को काबिल और जिम्मेदार बनाने के लिए अनूठा प्रयोग कर रहा है.

भ्रष्टाचार के धरातल में कमल हासन की फिल्म ‘हिंदुस्तानी’ अनोखी पहल थी. यहां बुजुर्ग स्वतंत्रतासेनानी समाज में फैले करप्शन को खत्म करने के लिए हिंसक तरीके अपना रहा है और इस राह में आने वाले अपने इकलौते व भ्रष्ट पुत्र को भी मृत्युदंड देने से पीछे नहीं हटता. इस फिल्म में पितापुत्र दोनों किरदार कमल हासन ने बखूबी निभाए.

आदर्श और उसूलों की युवा बनाम वृद्ध का संघर्ष ‘शक्ति’, ‘सारांश’, ‘मैं ने गांधी को नहीं मारा’, ‘गांधी-माई फादर’, ‘ऐलान’ जैसी कई फिल्मों में रोचक अंदाज में प्रदर्शित हुआ. फिल्म ‘शक्ति’ में अमिताभ और दिलीप कुमार की जोड़ी पितापुत्र के रूप में दिखी. जहां दोनों में संघर्ष इस बात को ले कर है कि फर्ज की खातिर पुलिस पिता ने बेटे के जीवन की परवा नहीं की. परिणामस्वरूप बेटा खफा हो कर अपराध के रास्ते पर निकल कर पिता के सामने कानून का दुश्मन बन कर खड़ा हो जाता है.

यंगिस्तान की राजनीति

अकसर हमारे नेताओं की इस बात को ले कर तीखी आलोचना होती है कि वे राजनीति में युवाओं को आगे नहीं लाना चाहते और खुद ही कुरसियों पर जमे रहना चाहते हैं. इस बाबत कई युवा नेताओं और बुजुर्ग नेताओं के बीच अमर्यादित बयानबाजी भी देखी गई है.

फिल्म ‘यंगिस्तान’ में एक मंत्री की अचानक हुई मौत के चलते जब उस के नौसिखिए बेटे को मंत्री बनाया जाता है तो पार्टी में पहले से मौजूद बुजुर्ग नेताओं की प्रतिक्रिया नकारात्मक रहती है. फिल्म में युवा नेता के नए सियासी तरीकों और बुजुर्गों के अडि़यल स्वभाव पर तीखा कटाक्ष किया गया है.

इस मामले में सब से रोचक फिल्म जो याद आती है वह है अनिल कपूर अभिनीत ‘नायक’. निर्देशक शंकर की इस फिल्म में युवा और ईमानदार राजनीति बनाम करप्ट और बुजुर्ग खलनेता के बीच जबरदस्त टक्कर दिखाई गई है. युवा नायक न्यूज चैनल के दफ्तर में रिपोर्टर कम कैमरामैन है और उस के सामने है वृद्ध राजनेता खलनायक बतौर सीएम. हालात कुछ ऐसे बनते हैं कि एक लाइव इंटरव्यू के दौरान सीएम नायक को एक दिन का सीएम बनने की चुनौती देता है. फिर इसी अजीबोगरीब उठापटक में शुरू होती है युवा बनाम वृद्ध की सियासी जंग.

मणिरत्नम की फिल्म ‘युवा’ में अजय देवगन, अभिषेक बच्चन और विवेक ओबेराय युवा शक्ति को अपनेअपने तरीके से प्रतिबिंबित करते हैं और उन के रास्ते में बाधक बनते हैं बुजुर्ग राजनेता.

उम्र से आंखमिचौली

दिलचस्प बात यह है कि तमाम सिनेमाई प्रयोगों में ज्यादातर वृद्ध व सशक्त किरदार अपेक्षाकृत युवा अभिनेताओं ने अदा किए. अपनी उम्र से कई गुना बड़े किरदारों को युवा ऐक्टर्स ने संजीदगी से जिया. ‘सारांश’ फिल्म में60 पार की भूमिका के लिए नैशनल अवार्ड पाने वाले अनुपम खेर उन दिनों 28 साल के भी नहीं थे. इसी तरह कमल हासन ‘हिंदुस्तानी’ में 80 साल के फ्रीडम फाइटर का रोल 40 साल की उम्र में विश्वसनीयता से निभाते हैं.

भारत-पाक क्रौसबौर्डर लव ड्रामा ‘वीर जारा’ में शाहरुख खान और प्रिटी जिंटा को बुजुर्ग किरदारों में देखा गया. सुपरस्टार राजेश खन्ना ने भी जवानी के दिनों में ‘अवतार’ और ‘आप की कसम’ जैसी फिल्मों में बुजुर्ग किरदार सफलतापूर्वक अदा किए. फिल्म ‘गांधी- माइफादर’ में गांधी का किरदार निभाने वाले दर्शन जरीवाला, रिचर्ड एटंबर्ग की औस्कर विजेता फिल्म ‘गांधी’ में बेन किंग्सल ने भी यही काम किया.

इस तरह की फिल्मों में सब से ज्यादा प्रयोग अगर किसी अभिनेता ने किए हैं तो वे संजीव कुमार हैं. संजीव कई फिल्मों में अपनी उम्र से बड़े किरदारों में दिखे. अलगअलग फिल्मों में अभिनेत्री जया बच्चन के पति, पिता, ससुर और प्रेमी की भूमिका निभाने वाले संजीव अकेले ऐक्टर थे.

फिल्म ‘पा’ में अमिताभ बच्चन ने बेहद अनूठा प्रयोग किया. इस फिल्म में वे 10 साल के प्रोजोरिया से पीडि़त लड़के की भूमिका 60 साल में करते दिखे. और तो और, अपने रियल लाइफ पुत्र अभिषेक बच्चन के बेटे बने नजर आए.

उम्र का जो फासला रुपहले परदे पर मेकअप की परतों के तले होता है, असल जिंदगी में कुछ और हो जाता है. असल जिंदगी में जहां अभिनेता अक्षय खन्ना जैसे युवा सितारे उम्रदराज लगते हैं तो वहीं सलमान खान, अनिल कपूर और जैकी श्रौफ जैसे उम्रदराज सितारे युवा अभिनेताओं को टक्कर देते हुए अभी तो हम जवान हैं के फलसफे को चरितार्थ कर रहे हैं.

अब श्रीदेवी को ही ले लीजिए. अमिताभ बच्चन और राजेश खन्ना के साथ काम करने वाली अभिनेत्री ने जब फिल्म ‘इंग्लिश विंग्लिश’ से जोरदार वापसी की तो अपने यंगलुक्स और सैक्सी फिगर से कमसिन अभिनेत्रियों को टक्कर दे गईं. अमिताभ बच्चन जब ‘बुड्ढा होगा तेरा बाप’ में दिखते हैं तो लगता नहीं है कि उन की उम्र 60 पार है. ड्रीमगर्ल हेमा मालिनी भी कई युवा अभिनेत्रियों को कौंपलैक्स देने के लिए काफी हैं.

माधुरी दीक्षित, रेखा, सिमी ग्रेवाल और जूही चावला ने भी खुद को काफी हद तक जवान बना रखा है. इस लिस्ट में ऐश्वर्या, रवीना टंडन, शिल्पा शेट्टी, आसिफ शेख और सोनाली बेंद्रे के नाम भी लिए जा सकते हैं.

संतुलन की सीढ़ी

कुल मिला कर भारतीय सिनेमा में जब भी युवा और वृद्ध किरदार आमनेसामने आए हैं, दर्शकों का खूब मनोरंजन हुआ है. उम्र का यह फिल्मी फासला और संघर्ष कभी हंसाता है, कभी रुलाता है तो कभी सामाजिक सरोकार से जुडे़ कई अहम और गंभीर सवाल खड़े कर देता है. समझने वाली बात तो यह है कि ये फिल्मी किरदार हमारी असल जिंदगी से प्रेरित या आधारित होते हैं.

समाज के किसी न किसी कोने में उम्र का फासला लिए 2 जैनरेशन एकदूसरे से संघर्ष करती दिख जाती हैं. कभी दफ्तरों में बौस-कर्मचारी की तरह, कभी खेल के मैदान में कोच-खिलाड़ी की तरह तो कभी राजनीतिक मोरचे पर.

कार्य के हर क्षेत्र में वृद्ध और युवा एकदूसरे को ज्यादा उपयोगी और सक्रिय दिखाने की होड़ में भिड़ते हैं, प्रतिस्पर्धा करते हैं. कभी युवा का उत्साह और ऊर्जा जीतती है तो कभी बुजुर्गियत का अनुभव बाजी मार जाता है. लेकिन, उम्र का यह फासला हमारे देश, समाज और पारिवारिक संरचना के संतुलन की सीढ़ी का काम भी करता है.

वृद्धों की जेब से मालामाल बौक्स औफिस

एकल सिनेमा यानी सिंगल स्क्रीन सिनेमा का दौर अब लगभग खत्म हो चुका है. पुराने सिंगल स्क्रीन या तो तोड़ कर मौल, मल्टीप्लैक्स की शक्ल ले चुके हैं या फिर स्टोरहाउस बनने पर मजबूर हैं. इस बदलाव ने फिल्मों की कमी और बौक्स औफिस के गणित को भी बदल कर रख दिया है.

90 के दशक तक फिल्म का टिकट औसतन 5 रुपए से 30 रुपए तक था. मल्टीप्लैक्स सिनेमाघरों के आने के बाद अब वही टिकट 500 रुपए तक पहुंच गया है. जाहिर है इतना पैसा युवा दर्शक आसानी से नहीं जुटा पाते, जिन में स्कूल छात्र, कोचिंग स्टूडैंट, साधारण नौकरीपेशा शामिल हैं.

अब फिल्म दर्शकों में पैसे वाले युवा कम हैं और वृद्घ प्रौढ़ दर्शक ज्यादा हैं जो मल्टीप्लैक्स में पैसा खर्च कर सकते हैं. इसलिए उन के मतलब की सस्ती फिल्में भी जोरदार कमाई कर जाती हैं और युवा व बच्चों को ध्यान में रख कर बनाई गई फिल्में पिट जाती हैं.

‘सीक्रेट सुपरस्टार’, ‘रिदम’, ‘स्निफ’, ‘आवाज’, ‘सिक्सटीन’, ‘कच्चा लिम्बू’, ‘स्टैनली का डिब्बा’ जैसी कई फिल्में आईं जो छात्र जीवन और संघर्ष पर आधारित थी, दर्शकों को मल्टीप्लैक्स नहीं खींच पाईं, क्योंकि इन फिल्मों के दर्शक युवा थे. वहीं पिछले 1-2 सालों में प्रदर्शित हुई फिल्मों बाहुबली-2, ‘टौयलेट एक प्रेमकथा’, ‘काबिल’, ‘रईस’, ‘जौली एलएलबी-2’, ‘पीकू’, ‘प्रेम रतन धन पायो’,  ‘सरबजीत’, ‘साला खड़ूस,’ ‘अजहर’, ‘मदारी’, ‘तलवार’, ‘सुलतान’, ‘बजरंगी भाईजान’, ‘बाहुबली’, ‘पिंक’, ‘तीन’, ‘बाजीराव मस्तानी’, ‘दिल धड़कने दो’, ‘गब्बर इज बैक’, ‘एयरलिफ्ट’, ‘बेबी’, ‘मांझी-द माउंटेन मैन’, ‘रूस्तम’, ‘कबाली’, ‘घायल वंस अगेन’, ‘जय गंगाजल’, ‘गंगाजल,’ ‘बुड्ढा होगा तेरा बाप’, ‘वेलकम बैक’, ‘बदलापुर’, ‘दृश्यम’ ने जोरदार कमाई की. ऐसा इसलिए क्योंकि ये सभी फिल्में या तो पारिवारिक थीं या फिर अपने मैच्योर या सस्ते कंटैंट की वजह से वृद्घ दर्शकों की जेबें ढीली कर लेती हैं.

एक फिल्म के लिए 250 से 500 रुपए तक के टिकट के अलावा करीब 500 रुपए तक के स्नैक्स. आनेजाने का खर्चा मिला कर लगभग 1,000 रुपए खर्च करना, जाहिर है युवाओं की पौकेट पर भारी पड़ता है. वे या तो नई फिल्मों के स्मार्टफोन पर पायरेटेड वर्जन देख कर मन बहला लेते हैं या फिर टीवी प्रीमियर के भरोसे बैठे रहते हैं. लेकिन वृद्घ दर्शक जो किसी मल्टीनैशनल कंपनी के एमडी, मैनेजर, सीनियर पोस्ट पर काम करते हैं, आसानी से इतने पैसे मल्टीप्लैक्स में जा कर खर्च करने की कूवत रखते हैं.

इस के अलावा सामाजिक ढांचे में भी बदलाव आया है. एक दौर था जब बड़ेबूढ़े सिनेमाघरों से अपने बच्चों को दूर रखते थे. तर्क था कि फिल्में देखने से बच्चे बिगड़ जाते हैं. इस के चलते सिनेमाघरों में जाना उन दिनों आपराधिक कृत्य सरीखा था. अब वृद्घों की मानसिकता बदली है. लिहाजा, वे अब फिल्मों को देखना वीकैंड होलीडे समझते हैं और अपनी जेब से पैसे खर्च कर पूरे परिवार को मल्टीप्लैक्स की सैर कराते हैं.

फिल्म एक्सपर्ट मानते हैं कि हिंदी में ज्यादातर सुपरहिट फिल्में फैमिली ओरिएंटेड रही हैं. इस के पीछे की वजह यही है कि उन के दर्शक वयोवृद्ध थे. सिर्फ युवाओं ने किसी फिल्म को सुपरहिट कराया हो, ऐसी कोई फिल्म नहीं है. ‘प्रेम रतन धन पायो’ इस बात की तसदीक करती है.

फिल्म उन्हीं घिसेपिटे फैमिली ड्रामा, मूल्य, भाईबहन का प्यार, जायदाद का बंटवारा, पारिवारिक साजिश और राजश्री के प्रचलित फार्मूलों पर चलती है. यह बेसिरपैर का मसला बूढ़े दर्शकों को आज भी भाता है. वे उसे अपने परिवार से जोड़ कर देखते हैं और अपने बच्चों को ऐसी फिल्में दिखाने पर जोर देते हैं. फिल्में तभी बड़ी हिट होती हैं जब उन्हें फैमिली दर्शक मिलते हैं. सूरज बड़जात्या की फिल्में रूढि़वादी और पारंपरिक होती हैं और इसी कारण पारंपरिक व रूढि़बद्ध बूढ़े दर्शकों को पसंद आती हैं.

इस बदलाव को भांपते हुए फिल्मकार इसी उम्र के दर्शकों को ध्यान में रख कर सस्ती और गैरसामाजिक सरोकार की सस्ती फिल्में बनाते हैं और बूढ़े दर्शक सिनेमाघरों में आ कर अपनी जेबें ढीली कर जाते हैं.

बूढों के सहारे फिल्म उद्योग

राजनीति में राहुल गांधी (47 साल) और अखिलेश यादव (44 साल) जैसे 40 पार नेताओं को युवा नेता बता कर खूब पोस्टरबाजी की जाती है, युवा कार्यकर्ताओं व वोटर्स को रिझाया भी जाता है. दरअसल, राजनीति में कद्दावर व भीड़ खींचने वाले 30-35 साल के कन्हैया कुमार या हार्दिक पटेल जैसे युवा नेता न के बराबर हैं. सो, पार्टियों को इन अधेड़ कथित युवा राजनेताओं का सहारा लेना पड़ता है.

राजनीति की ही तरह, हिंदी फिल्म को भी अब बूढ़े स्टार्स का ही सहारा है. फिल्मों को भी बूढ़ों का सहारा लेना पड़ रहा है क्योंकि यहां भी युवा स्टार्स की बेहद कमी है. वृद्घ स्टार हैं कि रिटायर नहीं हो रहे हैं और ज्यादा से ज्यादा फिल्में करने को तैयार हैं. इसलिए बूढ़े सितारे ही दर्शकों को सिनेमाघर पर खींच रहे हैं. यहां तो राजनीति से भी बुरा हाल है. क्योंकि यहां का युवा सितारा कथित तौर पर 50 साल का है. 25-30 साल के युवा अभिनेता या तो टीवी सीरियल्स और मौडलिंग वर्ल्ड में खपाए जा रहे हैं या फिर इंटरनैट की वैब सीरीज में काम करने को मजबूर हैं. फिल्मों में तो 50-60 साल के अभिनेता ही सुपरस्टार बने हुए हैं. वृद्ध स्टार आज साल में 3-4 फिल्में करने से गुरेज नहीं करते. मौजूदा ज्यादातर स्थापित स्टार 80-90 के दशक से फिल्मों में घिसे जा रहे हैं.

सलमान खान की उम्र 52 साल की है और वे ‘सुलतान’ फिल्म में 30 साल के लड़के का रोल कर रहे हैं. ऐसे ही अक्षय कुमार 50 के हो चुके हैं लेकिन फिल्म ‘खट्टा मीठा’ में छात्र की भूमिका मजे से निभाते हैं, ‘स्पैशल 26’ में भी वे यही काम करते हैं. आमिर खान, जिन की उम्र 52 साल है, फिल्म ‘3 इडियट्स’ में मैनेजमैंट के अपनी उम्र से आधे के छात्र के किरदार में दिखते हैं. इसी तरह अधेड़ हो चुके शाहरुख खान 52 साल के हो चुके हैं लेकिन दीपिका पादुकोण और आलिया भट्ट के साथ मजे से काम कर रहे हैं. इसी तरह संजय दत्त 58 साल के हो चुके हैं. सैफ अली खान 46 साल के हैं और आसानी से 25-30 साल की अभिनेत्रियों के साथ रोमांस कर रहे हैं.

अक्षय कुमार, सलमान, अजय देवगन, सुनील शेट्टी, शाहरुख खान, सैफ अली आदि स्टार्स 50 के आसपास हैं और 1990 से फिल्मों में सक्रिय हैं. फिर भी युवा स्टार्स उन के सामने कहीं से भी टिक नहीं पाते. या कह सकते हैं कि इन के होते उन्हें मौका ही नहीं मिल रहा. नतीजतन, ये सभी उम्रदराज स्टार बौलीवुड को अपनी मुट्ठी में कैद किए हैं.

इस मामले में अमिताभ बच्चन का भी जवाब नहीं. जनाब 75 साल के हो चुके हैं. इस उम्र के ज्यादातर बुजुर्ग अपने नातीपोतों के साथ घर में खाली वक्त बिताते हैं लेकिन अमिताभ बच्चन साल में ‘पिंक,’ ‘तीन’ और ‘पीकू’ जैसी फिल्में कर युवा कलाकारों से ज्यादा मेहनताना जेब में अंटी कर लेते हैं. 75 साल के होते हुए वे खुद को बूढ़ा मानने के लिए तैयार नहीं हैं. ‘बूड्ढा होगा तेरा बाप’ जैसी फिल्मों में खुद को युवाओं का स्टार साबित करने की कोशिश करते दिख जाते हैं. बिग बी की तरह नाना पाटेकर, अनिल कपूर, आदित्य पंचोली, आसिफ शेख, जैकी श्रौफ, अरबाज खान के भी नाम लिए जा सकते हैं.

इन सब स्टार्स से अपेक्षाकृत स्टार की बात करें तो शाहिद कपूर, विवेक ओबेराय, आफताब शिवदासानी, अर्जुन कपूर, ऋतिक रोशन, रणवीर सिंह, रणबीर कपूर, वरुण धवन, सिद्धार्थ मल्होत्रा, जिमी शेरगिल के नाम आते हैं. हालांकि ये भी 30 से 40 साल के हैं और युवा होने के मूल मापदंड से काफी दूर हैं, फिर भी रुपहले परदे पर 20-25 साल के युवा किरदारों को कर लेते हैं. हालांकि ये हमेशा दूसरी श्रेणी के ही स्टार रहे हैं. पहली कतार में 50 साला स्टार ही आते हैं. उन की फिल्में भी करोड़ों का कारोबार करती हैं. उन के अपने प्रोडक्शन हाउस भी हैं.

कमोबेश यही हाल अभिनेत्रियों के मामले में भी है. दीपिका पादुकोण, करीना कपूर, कैटरीना कैफ, ऐश्वर्या राय, तब्बू, प्रियंका चोपड़ा, विद्या बालन, रानी मुखर्जी, अमीषा पटेल, काजोल जैसी बड़ी अभिनेत्रियां 35-40 साल की हैं और युवा अभिनेत्रियां इन की सहेली, साइडकिक के रोल करने को मजबूर हैं. आलिया भट्ट व श्रद्धा कपूर जरूर युवा हैं लेकिन इन के नाम अपवाद सरीखे हैं.

दरअसल, बूढ़े हो चुके ये स्टार जब अपनी फिल्मों में युवा किरदारों में स्वीकृत हो जाते हैं तो अन्य फिल्मकार उन भूमिकाओं के लिए युवा कलाकारों को नहीं लेते. वजह, युवा स्टार के बजाय उम्रदराज स्टार की फिल्म सिनेमाहौल तक ज्यादा भीड़ लाती है.

साऊथ इंडियन फिल्म इंडस्ट्री का भी बुरा हाल है. वहां तो रजनीकांत (66), बालकृष्ण (57), चिरंजीवी (62), वेंकटेश (56), ममूटी (66), मोहन लाल (57) साल के हैं लेकिन अपनी हर फिल्म में 25-30 साल की हीरोइन के साथ रोमांस करते हैं और दर्शकों को भी सिनेमाघर के आगे ढोलनगाड़े बजाने पर मजबूर कर देते हैं. कमोबेश हर भाषा की फिल्मनगरी में बूढ़े स्टार्स राज कर रहे हैं और युवा स्टार्स की कमी बनी हुई है.

बोरिस बेकर : अय्याशी ने बनाया दिवालिया

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अगर कोई यह कहे कि वह बोरिस बेकर को नहीं जानता तो तय है कि उस की दिलचस्पी लौन टेनिस में कतई नहीं है. करोड़ों लोगों की दिलचस्पी टेनिस में पैदा करने वाले बोरिस बेकर को हाल ही में एक ब्रिटिश कोर्ट ने दिवालिया घोषित कर दिया तो टेनिस पे्रमियों के जेहन में सहज ही सन 1985 के विंबलडन की यादें ताजा हो आईं.

उस समय तक भारत में टीवी काफी लोकप्रिय हो चुका था और उसी के जरिए लोग जान रहे थे कि दुनिया के सब से दूसरे महंगे खेल टेनिस को, जिस का अपना अलग ही आकर्षण था. सन 1985 का विंबलडन टूर्नामेंट कई मायनों में अहम और दिलचस्प था. फाइनल मुकाबला तब के धाकड़ खिलाड़ी केविन कुर्रान और बोरिस बेकर के बीच था.

केविन कुर्रान की जीत तय मानी जा रही थी, क्योंकि उन का मुकाबला एक ऐसे लड़के से था, जो पहली दफा पेशेवर टूर्नामेंट खेल रहा था. दूसरे केविन कुर्रान क्वार्टर फाइनल में जान मैकेनरो और सेमी फाइनल में जिमी कानर्स जैसे नामी खिलाडि़यों को हरा कर फाइनल तक पहुंचे थे. ये दोनों ही खिलाड़ी समीक्षकों, दर्शकों और सटोरियों की निगाह में खिताब के प्रबल दावेदार और हकदार थे, लेकिन केविन कुर्रान ने बाजी पलट दी थी.

सुनहरे घने बालों वाले बोरिस की चमकती भूरी आंखें और भौहें हर किसी को भाई थीं, पर वह केविन कुर्रान को हरा कर टेनिस का यह सब से बड़ा खिताब अपने नाम कर पाएंगे, इस में हर किसी को शक था. इस टूर्नामेंट में बोरिस बेकर की हैसियत एक गैर वरीयता प्राप्त खिलाड़ी की थी, जिस के बारे में माना जा रहा था कि वह थोड़ा संयोग और थोड़ी सी प्रतिभा और खेल तकनीक के दम पर फाइनल तक आ पहुंचे हैं.

उस किशोर में ऊर्जा थी, पर उस का सब से बड़ा हथियार तेज सर्विस थी, जिस के चलते सामने कोर्ट में खड़े प्रतिद्वंद्वी खिलाड़ी को गेंद दिखती ही नहीं थी. लंदन के विंबलडन कोर्ट में मुकाबला शुरू होते ही रोमांच छा गया था. मुकाबला तजुर्बे और जोश के बीच था. जैसे ही पहला सेट बोरिस बेकर ने 6-3 के अंतर से आसानी से जीता, दर्शकों ने बूमबूम बेकर चिल्लाना शुरू कर दिया.

बूमबूम का यह खिताब बोरिस बेकर को उन की तेज सर्विस के लिए दिया गया था. लेकिन दूसरे सेट में केविन ने बेकर की सर्विस तोड़ते हुए 7-6 से जीता तो दुनिया भर के टेनिस प्रेमियों की सांस रुक गई. कल का आया लड़का एक झटके में विंबलडन जीत ले जाएगा, यह बात किसी को सहज पच नहीं रही थी. तीसरा सेट, जो दोनों के लिए निर्णायक साबित होता, पिछले 2 सेटों के मुकाबलों से ज्यादा कठिन था.

स्कोर जब 6-6 की बराबरी पर आया तो स्टेडियम में बैठे दर्शक सकते में आ गए. ड्यूज में बोरिस बेकर ने चतुराई दिखाते हुए 7-6 से यह सेट जीता तो लगभग साफ हो गया कि विंबलडन 1985 का पुरुष एकल खिताब पहली बार जर्मनी के खाते में जा रहा है. और ऐसा हुआ भी. 3 सेट्स में पस्त पड़ चुके केविन की थकान का फायदा बोरिस बेकर नाम के इस लडके ने उठाया और चौथा सेट थोड़े संघर्ष के बाद 6-4 से जीत कर एक ऐसा इतिहास रच दिया, जो आज तक लोगों को रोमांचित कर रहा है.

पहली बार टेनिस पर से अमेरिकी दबदबा जब टूटा था, जिस का श्रेय बोरिस बेकर से ज्यादा अफ्रीकी मूल के केविन कुर्रान को जाता है, जिन्होंने टेनिस से कौनर्स, बोर्ग और मैकेनरो युग को विदा कर दिया था. जान मैकेनरो ने सन 1984 में और कौनर्स ने सन 1982 में विंबलडन खिताब जीते थे. दूसरे ग्रैंड स्लैम टूर्नामेंट यूएस, फें्रच और आस्टे्रलियाई ओपन भी इन्हीं के नाम रहते थे.

बहरहाल, एक दिन में ही बोरिस बेकर दुनिया में छा गए. उन की इस उपलब्धि पर जर्मनी में जोरदार और शानदार जश्न मनाया गया. जब वह यह खिताब ले कर अपने देश पहुंचे तो उन का स्वागत पोप सरीखा किया गया. इस के वह हकदार भी थे.

बोरिस बेकर अब जिज्ञासा और उत्सुकता का विषय बन चुके थे. जिन के बारे में लोगों के पास यही जानकारियां थीं कि उन का जन्म जर्मनी के लीमेन गांव के एक मध्यमवर्गीय परिवार में 22 नवंबर, 1967 को हुआ था. कैथोलिक धर्म के अनुयायी बोरिस बेकर के पिता कार्ल हाइंज पेशे से आर्किटैक्ट थे और उन की एक ही संतान थी बोरिस बेकर.

कार्ल हाइंज ने ब्लौ वाइज टेनिस सैंटर बनाया था. उसी में बोरिस ने महज 8 साल की उम्र से टेनिस में हाथ आजमाने शुरू किए थे. उस समय यानी 90 के दशक की शोहरतशुदा महिला खिलाड़ी स्टेफी ग्राफ भी इसी मैदान में अभ्यास करती थीं. खेल में व्यस्तता के चलते बोरिस हाईस्कूल तक ही पढ़ पाए थे.

17 साल की उम्र में विंबलडन जैसा अहम खिताब जीतने के बाद बोरिस के सामने चुनौती थी कि वह साबित करें कि सन 1985 की खिताबी जीत इत्तफाक नहीं थी. बहुत जल्द उन्होंने अपनी प्रतिभा दिखा भी दी. सन 1986 का विंबलडन बोरिस बेकर ने फिर जीता और हर ग्रैंड स्लैम प्रतियोगिता में नामी खिलाडि़यों को धूल चटा कर टेनिस में नए युग की शुरुआत की. सन 1986 का डेविस कप में उन का मुकाबला जान मैकेनरो से हुआ, जो टेनिस के इतिहास का सब से लंबा मैच था. 6 घंटे और 22 मिनट तक चले इस मैच में बोरिस ने जान मैकेनरो को 4-6, 15-13, 8-10, 6-2 और 6-2 से हराया था. सन 1985 से ले कर सन 1999 तक का समय बोरिस बेकर के कैरियर का सब से सुनहरा और कामयाब समय था.

सन 1991 के आस्टे्रलियाई ओपन में जब उन्होंने चेकोस्लोवाकिया के इवान लैंडल को हराया था, तब यह मान लिया गया था कि वाकई बोरिस बेकर सर्वश्रेष्ठ हैं. इसी मैच के बाद उन्हें पहली बार पहली वरीयता मिली थी, जो हर एक टेनिस खिलाड़ी का खवाब होती है.

अपने कैरियर के दौरान बोरिस बेकर ने रिकौर्ड 49 एकल और 15 युगल खिताब जीते, जिन में बार्सिलोना ओलंपिक भी शामिल है. दौलत और शोहरत, दोनों बोरिस बेकर पर बरसे, लेकिन टेनिस खिलाड़ी की मियाद बहुत ज्यादा नहीं होती. इस खेल में हर साल एक नया स्टार उभरता है और पुराना डूबता है. 14 साल टेनिस के आसमान पर चमकने के बाद बोरिस ने सन 1999 में संन्यास ले लिया.

अब तक थकान उन पर हावी हो चली थी और व्यक्तिगत जीवन में भी वह लड़खड़ाने लगे थे. आमतौर पर होता यह है कि दौलत और शोहरत को पाने या बनाए रखने में कम पढ़ेलिखे खिलाडि़यों को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है. खेलतेखेलते सेलीब्रेटी हो जाने वाले खिलाड़ी सार्वजनिक जिंदगी जीते हैं, उन का व्यक्तिगत जीवन बचता नहीं, जिस के लिए एक हद तक वह खुद भी जिम्मेदार होते हैं.

बोरिस बेकर कुछकुछ मनमौजी और दार्शनिक अंदाज के युवा थे. लापरवाही और रोमांस उन की फितरत में शामिल थे, जिन्हें ले कर उन के मुख्य और पहले कोच गुथर वोश्च बेहद चिंतित रहते थे. एक अच्छे कोच का काम सिर्फ खेल निखारना ही नहीं, बल्कि खिलाड़ी को व्यावहारिक और संतुलित बनाए रखना भी होता है.

बोरिस बेकर चोरीछिपे ही नहीं, खुलेआम भी फ्लर्ट करते रहते थे. कई लड़कियां उन की जिंदगी में आईं और गईं, पर यह सब कुछ मौजमस्ती थी, जिसे तात्कालिक अनुबंध कहा जा सकता है.

बारबार टोकने के बाद भी जब बोरिस बेकर अपनी उन हरकतों, जो उन्हें बदनाम कर सकती थीं, से बाज नहीं आए तो गुथर वोश्च ने एक बार खुल कर कहा भी था कि यह आशिकी एक दिन बोरिस को बरबाद कर देगी. कोच गुथर की टोकाटाकी से आजिज आ कर बोरिस ने अपने इस कोच को पद से हटा दिया था.

अब तक बोरिस बेकर का जीवन ठीकठाक गुजर रहा था. बोरिस बेकर के प्रेमप्रसंगों को चटखारे ले कर सुनने वाले जर्मनी की जनता उस वक्त हैरान रह गई थी, जब उन्होंने एक अश्वेत युवती बारबरा फेल्टस से शादी करने की घोषणा की थी. बारबरा पेशे से एक्ट्रेस और फैशन डिजाइनर थीं.

रंगभेद की बीमारी से जर्मनी अछूता नहीं था, इसलिए अपने स्टार प्लेयर और वंडर किंग को एक काली लड़की से शादी करने का फैसला उसे गंवारा नहीं हुआ. बोरिस बेकर और बारबरा फेल्टस की शादी को ले कर जर्मनी में काफी विरोध प्रदर्शन हुए. सार्वजनिक विरोधों से बेकर घबराए नहीं, उलटे जैसेजैसे विरोध बढ़ता गया, वैसेवैसे बारबरा से शादी करने का उन का इरादा और भी दृढ़ होता गया.

आखिरकार एक अफ्रीकी फोटोग्राफर हारलेन फेल्टस की बेटी बारबरा फेल्टस बोरिस बेकर से शादी कर बारबरा बेकर बन गई. दिसंबर, 1993 में कोर्ट में दोनों ने शादी कर ली. चूंकि इस वक्त में बोरिस का खेल शबाब पर था, इसलिए इस शादी का विरोध जल्द ठंडा पड़ गया.

बोरिस और बारबरा की वैवाहिक जिंदगी के शुरुआती 6 साल ठीकठाक गुजरे बारबरा ने 2 बच्चों को जन्म दिया. पहले बेटे का नाम नूह और दूसरे का नाम एलियास वाल्थासार रखा गया. बोरिस बेकर का खेल और कैरियर दोनों अब ढलान पर थे. उन्होंने टेनिस से बेशुमार दौलत कमा ली थी. अब उन का नाम टेनिस प्रेमियों की जुबान से उतरने लगा था.

मुमकिन है, शोहरत के आदी हो गए बोरिस अवसाद में आ गए हों और इसी अवसाद से उन के और बारबरा के बीच तलाक जैसी अप्रिय नौबत आ गई हो. हालांकि इस नौबत की बुनियाद उन की शादी के बाद सन 1995 में ही तब रख गई थी, जब शादी के कुछ महीनों बाद ही इन दोनों की एक नग्न तस्वीर ‘स्टर्न’ नाम की पत्रिका में छपी थी.

इस पर काफी बवंडर मचा था, पर इस फोटो का रहस्य खुला नहीं था. संभावना इस बात की ज्यादा थी कि बोरिस को अंदाजा हो गया था कि यह हरकत किस की हो सकती थी, पर अपनी शंका के प्रति वह आश्वस्त नहीं थे, इसलिए खामोश रहे. लेकिन ‘स्टर्न’ के कवर पेज पर सपत्नीक छपी नग्न तसवीर से वह काफी व्यथित और उद्वेलित हुए थे.

यह सन 1998 की बात है, जब बारबरा दूसरी बार गर्भवती हो कर लंदन के एक अस्पताल में भर्ती थीं. बोरिस हालांकि एक आदर्श पति की तरह उन का ख्याल रखते थे, पर उन दोनों के बीच की खटपट सामने आने लगी थी. पत्नी को अस्पताल में भर्ती करा कर बोरिस आदतन शराब पीने एक रेस्टोरेंट में गए, जहां एक वैट्रेस एंजेला एरमाकोवा से उन की आंखें लड़ गईं.

आंखों ही आंखों में एक करार हुआ. बोरिस बेकर और एंजेला ने कुछ घंटे तनहाई में गुजारे. यह अभी तक रहस्य है कि उन का मिलन झाडू रखने वाले कमरे में हुआ था या टायलेट की सीढि़यों पर. इस दौरान दोनों में शारीरिक संबंध बने, जो कतई नई या हैरानी की बात नहीं थी. लेकिन यह मिलन पूर्वनियोजित भी नहीं था.

अगर होता तो तय था कि बोरिस बेकर जैसा सधा खिलाड़ी कंडोम इस्तेमाल करने की ऐहतियात जरूर बरतता. बात ‘रात गई बात गई’ के तर्ज की थी. बोरिस वापस लौट आए और भूल गए कि बीती रात क्या हुआ था. इसी दौरान बोरिस को कहीं से अपुष्ट ही सही, अहम खबर यह मिली कि शादी के बाद ‘स्टर्न’ में छपी उन की और बारबरा की नग्न तस्वीर के पीछे बारबरा के पिता हारलेन का हाथ था, वह सन्न रह गए. पर कोई प्रमाण न होने से खामोश रहे.

एंजेला ने ठीक 9 महीने बाद बोरिस को बताया कि वह उन के बच्चे की मां बनने वाली है तो वह और बौखला उठे. जिंदगी में कुछ भी ठीकठाक नहीं चल रहा था. कल का बूमबूम बेकर, जिस की सर्विस और फोरहैंड रिटर्न पर करोड़ों लोग तालियां बजाते थे, नेपथ्य में कहीं थे. बोरिस बेकर अब तनहा थे और सुकून चाहते थे, जो उन्हीं की हरकतों के चलते उन्हें नहीं मिल रहा था.

बोरिस और एंजेला के संबंधों की खबर भी ढकीमुंदी नहीं रह गई थी. जब इस चटपटी खबर को मीडिया ने उठाया कि एंजेला बोरिस बेकर के बच्चे की मां बनने वाली है तो तिलमिलाई बारबरा ने उन्हें तलाक का नोटिस थमा दिया. शायद बोरिस बेकर को यकीन नहीं हो रहा था कि इस उम्र में एक बार के मिलन से भी कोई महिला उन से गर्भवती हो सकती है, इसलिए उन्होंने इस आरोप को नकार दिया कि एंजेला उन के बच्चे की ही मां बनने वाली है.

इस बाबत उन्होंने प्राइवेट जासूसों की सेवाएं भी लीं, पर कोई ठोस नतीजा नहीं निकला. बात बिगड़ी तो डीएनए जांच तक जा पहुंची, इस पर घबराए बोरिस ने स्वीकार कर लिया कि एंजेला से हुई बेटी उन की ही है. गलत नहीं कहा जाता कि हर मर्द चाहे वह कामयाब हो या नाकामयाब, किसी न किसी औरत को दिल से चाहता जरूर है. यही बोरिस के साथ हुआ.

वह वाकई बारबरा को चाहते थे, इसलिए उन्हें तलाक नहीं देना चाहते थे. उधर एंजेला प्रकरण के बाद बारबरा पति की गलती माफ नहीं कर पा रही थीं. उन के और बेकर के तलाक का मुकदमा अदालत में चला. मुकदमे के पहले बोरिस फ्लोरिडा में बारबरा को मनाने उन के घर गए, पर बेइज्जत कर भगा दिए गए.

कुछ ही सालों पहले तक करोड़ों प्रशंसकों के दिल में धड़कने वाले बोरिस बेकर अब बेहद दयनीय हालत में थे. टेनिस के खेल के लिहाज से अधेड़ावस्था में की गई अय्याशी की कीमत उन्हें चुकानी पड़ रही थी, जिस का दर्द कम से कम उस शराब के नशे से तो दूर होने वाला नहीं था, जिस में वह खुद को हर शाम डुबो लेते थे.

म्यूनिख की एक अदालत में यह मुकदमा चला और चर्चित इसलिए हुआ कि इस का सीधा प्रसारण हुआ था.

जनवरी, 2001 में अदालती फैसले के तहत बोरिस बेकर और बारबरा बेकर का विवाह विच्छेद हो गया. इस तलाक के लिए बोरिस बेकर को पत्नी को 90 करोड़ रुपए देने पड़े. अलावा इस के मियामी का उन का बड़ा आलीशान घर भी बारबरा को दे दिया गया. 2 करोड़ का कानूनी खर्च भी बोरिस बेकर को बारबरा को देना पड़ा.

बोरिस बेकर ने जिंदगी की एक लड़ाई हारी थी, पर हिम्मत नहीं हारी थी. तलाक के बाद जैसेतैसे उन्होंने खुद को संभाला और सन 2003 से बीबीसी के लिए टेनिस की कामेडी करने लगे. दूसरे व्यवसायों में भी उन्होंने अपनी जमापूंजी लगाई. सन 2003 में ही उन्हें इंटरनेशनल टेनिस के हाल औफ फेम से नवाजा गया.

कारोबार में वह शुरू में कामयाब रहे. कपड़ों का व्यापार भी उन्होंने किया, मर्सिडीज कारों के भी 3 शोरूम खोले और खासा पैसा कमाया. हेयर कंपनी जैसी नामी कंपनी से भी बोरिस बेकर जुड़े. सन 2006 में नामी टेलीकौम कंपनी वोडाफोन से भी उन्होंने एक करार किया, जिस के तहत उन्हें एक साल में 300 संदेशों के जवाब देने होते थे.

इस सब के बाद भी अब तक वह गुमनाम से हो चुके थे. ज्यादा पैसा कमाने की गरज से बोरिस बेकर ने जमीनों की खरीदफरोख्त का धंधा शुरू किया. जर्मनी से इंग्लैंड और फिर स्विट्जरलैंड जा बसे बोरिस बेकर जर्मन फुटबाल क्लब बेयर्न म्यूनिख के भी सलाहकार बन गए. सन 2002 में टैक्स चोरी के एक मामले में वह पकड़े गए थे, पर किसी तरह बिना किसी सजा या जुर्माने के बच निकले.

बहुत सी कमियों और हादसों को झेलने के बाद जिंदगी ढर्रे पर आने लगी तो बोरिस बेकर ने सन 2009 में दूसरी शादी करने का फैसला लिया. इस के पहले सन 2003 में अपनी आत्मकथा ‘द प्लेयर’ शीर्षक वाली पुस्तक उन्होंने लिखी, जिसे पाठकों ने नकार दिया. इस पुस्तक में अपनी जिंदगी और खेल की कई अहम घटनाओं का जिक्र उन्होंने किया है. एंजेला, जो बाद में रशियन मौडल बनी, से संबंधों का जिक्र भी इस में है.

बोरिस बेकर का टेनिस की दुनिया में नाम एक बार फिर सुर्खियों में तब आया, जब सन 2013 में सर्बिया के स्टार खिलाड़ी नोवाक जोकोविच ने उन्हें अपना कोच बनाया. एक कोच की भूमिका में वह कामयाब भी रहे और उन की मांग भी बढ़ने लगी.

सन 2009 में बोरिस बेकर ने डच मौडल शार्लेलि लिली केरसेनबर्ग से शादी कर ली, जिस से उन्हें एक बेटा हुआ. लिली एक खूबसूरत और सैक्सी खुले खयालों वाली महिला हैं.

जुलाई, 2017 में ही समुद्र किनारे उन्हें नहाते देखा गया था, तब वह टौप लेस थीं. ये तस्वीरें वायरल हुई थीं. लिली और बोरिस की पटरी कैसी बैठ रही है, यह बात तब उजागर हुई, जब अदालत ने बोरिस बेकर को दिवालिया घोषित कर दिया.

लंदन की एक अदालत ने जब दलीलें देते हुए उन्हें दिवालिया घोषित कर दिया, तब वह अदालत में मौजूद नहीं थे. बोरिस ने व्यवसाय के लिए बैंकों से 28 करोड़ रुपए बतौर कर्ज ले रखे थे. यह कर्ज उन्होंने 2 साल पहले लिए थे. दरअसल, बेकर के खिलाफ दिवालिएपन की दरख्वास्त आर्वथनाट लेथम नाम की कंपनी ने दी थी. इस पर बेकर के वकील की दलील यह थी कि उन के मुवक्किल को 28 दिनों की मोहलत दी जाए  वह यह रकम चुका देगा.

इस दलील से अदालत की रजिस्ट्रार क्रिस्टीन डेरेट ने इत्तफाक न रखते हुए कहा कि बड़े खेद के साथ उन्हें कहना पड़ रहा है कि बोरिस बेकर यह पैसा नहीं लौटा पाएंगे. यह कोई आम बात नहीं है कि एक पेशेवर व्यक्ति अक्तूबर, 2015 से कर्ज नहीं लौटा पा रहा है, जो पुराना कर्ज है. क्रिस्टीन ने खुद को बोरिस बेकर का बड़ा प्रशंसक भी बताया था. अदालती फैसले पर बड़बोले बेकर ने टिप्पणी की कि उन के पास पैसा है और वह इसे लौटाने वाले थे.

पर साफ दिख रहा है कि बोरिस बेकर वाकई दिवालिया हो चुके हैं. इस पर अफवाह यह है कि अब लिली भी उन से तलाक चाहती हैं. अगर ऐसा हुआ तो जाहिर है, उन्हें दूसरी पत्नी को भी हर्जाने में या गुजारे के लिए भारीभरकम रकम देनी पड़ेगी. हालांकि सब कुछ सामान्य बताते हुए बेकर लिली के साथ सार्वजनिक स्थानों पर घूमतेफिरते दिखे, साथ में उन का 7 साल का बेटा भी था.

अब अंत जो भी हो, लेकिन यह साबित हो गया है कि बूमबूम बेकर दौलत और शोहरत संभालने में नाकाम साबित हुए हैं, इस की वजह उन का रोमांटिक और अय्याशमिजाज होना है. टेनिस के सब से कामयाब और होनहार स्टार का यह अंत और अंदाज एक सबक भी है कि सफलता स्थाई नहीं होती. इसे संभाल कर रखना पड़ता है.

मुमकिन है, तरस खा कर लिली तलाक न लें, क्योंकि अभी भी बोरिस बेकर के पास काफी जायदाद है, जिस में उन्हें ज्यादा फायदा दिख रहा होगा. टेनिस की बारीकियां समझने वाले बोरिस बेकर त्रियाचरित्र के शिकार हुए साफसाफ दिख रहे हैं.

बारबरा, एंजेला और लिली उन की भावनात्मक और शारीरिक कमजोरियों का फायदा उठाती रहीं, सच्चा प्यार उन्हें इन में से किसी ने नहीं किया.

एक आयटम नंबर के लिए 30 लाख रुपये लेती हैं मुमैथ खान

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इन दिनों तेलुगु की कंटेस्टेंट मुमैथ खान सुर्खियों में हैं. हाल ही में उनका नाम ड्रग केस में भी आया है. पिछले महीने की खबरों के अनुसार इस मामले में उनसे पूछताछ भी की जाएगी. कम ही लोग जानते हैं कि मुमैथ आइटम गर्ल के साथ एक्ट्रेस भी हैं. वे साउथ में काफी मशहूर हैं.

मुमैथ ने करीब 15 हिंदी, तेलुगु, तमिल और कन्नड़ फिल्मों में काम किया है. यहां तक कि वे बॉलीवुड में सलमान खान के साथ फिल्म ‘लकी’ और संजय दत्त की फिल्म ‘मुन्नाभाई एमबीबीएस’ में भी नजर आ चुकी हैं.

अपने रिलेशनशिप के दौरान करा चुकी हैं सर्जरी

– मुमैथ ने अपने एक इंटरव्यू में बताया था कि वो चार लोगों के साथ लिव-इन रिलेशन में रह चुकी हैं. हालांकि, उनका रिश्ता किसी से भी ज्यादा समय तक नहीं चल पाया.

– मुमैथ ने कहा था, “मैंने अपने रिलेशन के लिए एक सर्जरी करवाई थी, इस सर्जरी में 27 लाख रुपए खर्च हुए थे. इस सर्जरी में मेरे दिमाग में 9 महंगे टाइटेनियम के तार लगाए गए थे. लेकिन अब मैं रिलेशन के लिए पैसे वेस्ट करने वाली नहीं हूं.”

– मुमैथ को लंबे समय से कोई आइटम नंबर ऑफर नहीं किया गया है. इसलिए कुछ समय पहले उन्होंने एक इवेंट मैनेजमेंट फर्म शुरू की. फिलहाल, यही उनकी इनकम का सोर्स है.

पाकिस्तानी है मुमैथ खान की फैमिली

– मुमैथ ने करीब 120 से ज्यादा हिट आइटम नंबर दिए हैं.

– मुमैथ का जन्म मुंबई में हुआ था, लेकिन उनका परिवार पाकिस्तान से है. हालांकि, वो पाकिस्तान छोड़कर मुंबई में आकर रहने लगे थे.

– मुमैथ चार बहने हैं. उनकी बड़ी बहन जॉबिन भी फिल्म इंडस्ट्री से ताल्लुक रखती हैं. उन्होंने कई फिल्मों में कैमियो किया है.

इस फिल्म में किया था पहला आइटम नंबर

– मुमैथ ने अपने करियर की शुरुआत फिल्म ‘कांटे’ के गाने ‘इश्क समंदर’ से की थी.

– उनका सॉन्ग ‘आ रे प्रीतम प्यारे’ भी काफी हिट हुआ था.

– मुमैथ उन एक्ट्रेसेस में शुमार हैं जो सिर्फ आइटम नंबर के जरिए स्टार बन गई हैं.

एक गाने के लिए 30 लाख लेती हैं मुमैथ

– हम आपको बता दें कि मुमैथ ने जब अपना करियर शुरू किया था तो उन्हें एक गाने के लिए सिर्फ 750 रुपए मिलते थे.

– धीरे-धीरे मुमैथ इतनी पॉपुलर हो गईं कि उन्होंने अपनी फीस बढ़ाकर 30 लाख रुपए कर दी.

– अब वे 5 मिनट के एक गाने के 30 लाख रुपए चार्ज करती हैं.

कई कॉन्ट्रोवर्सीज में भी घिर चुकीं मुमैथ

– मुमैथ अपनी फिल्मों के साथ काफी विवादों में भी रही हैं.

– साल 2008 की एक न्यू ईयर पार्टी में मुमैथ परफॉर्म कर रही थीं. वहां एक शख्स ने उनके सीने पर शराब गिरा दी. इस वाकए के बाद उन्होंने शो कैंसल कर दिया था और वे तुरंत वहां से चली गई थीं.

– हम आपको बता देना चाहते हैं कि मुमैथ हॉलीवुड सिंगर शकीरा और बेयॉन्स से काफी प्रभावित हैं और वे उनकी ही तरह सुपरस्टार बनना चाहती थीं.

जौन अब्राहम के साथ डेब्यू को तैयार हैं नेहा शर्मा की बहन

बौलीवुड फिल्म ‘तुम बिन-2’ की लीड अभिनेत्री नेहा शर्मा की बहन आयशा शर्मा जल्द ही बौलीवुड जगत में कदम रखने जा रही हैं. अपनी डेब्यू फिल्म में आयशा बौलीवुड अभिनेता जौन अब्राहम के साथ स्क्रीन शेयर करते हुए नजर आएंगी. यह एक थ्रिलर फिल्म होगी.

फिल्म भूषण कुमार टी-सीरिज और निखिल अडवाणी के जरिए प्रोड्यूस की जाएगी ‘कांटे’ और ‘क्या कूल हैं हम 3’ जैसी फिल्मों के डायरेक्टर मिलाप ही इस फिल्म को डायरेक्ट करेंगे. आयशा और जौन की कुछ तस्वीरें सोशल मीडिया पर शेयर की जा रही हैं. फोटो में जौन और आयशा एक साथ नजर आ रहे हैं. सोशल मीडिया में शेयर की जा रही एक फोटो में आयशा ब्लैक कलर की ड्रेस में सीरियल मोड में नजर आ रही हैं, वही दूसरी तस्वीर में आयशा और जौन मुस्कुराते हुए पोज देते हुए नजर आ रहे हैं.

हाल ही में दिए एक इंटरव्यू में आयशा ने बौलीवुड डेब्यू के बारे में बातचीत की थी. आयशा ने कहा, ”मैं बौलीवुड में लौन्च के मामले में एक बेहतर फिल्म के लिए नहीं कह सकता थी. मेरे लिए यह गर्व की बात है कि मैं जौन अब्राहम और मनोज बाजपेयी के साथ स्क्रीन शेयर करुंगी, इसके साथ ही यह बहुत चैलेंजिग भी है.

मैं आशा करती हूं कि मैं अपने रोल के न्याय कर सकूंगी जो मिलाप सर ने मेरे लिए लिखा है. मुझे इस बात की भी उम्मीद है कि निखिल सर और टी-सीरीज मुझे एक बेहतर पोजिशन दी है.”

वहीं फिल्म के डायरेक्टर मिलाप जावेरी ने कहा, ”आयशा ने किंगफिशर कैलेंडर के लिए काम किया है, जिसके बाद वह सभी की विशलिस्ट में आ गईं थीं. मुझे लगता है कि आयशा मेरी फिल्म के लिए परफेक्ट हैं. जब वह स्क्रीन टेस्ट के लिए आई थीं मैं उनसे तभी प्रभावित हो गया था.

वह एक आत्मविश्वास से भरी हुईं अभिनेत्री हैं और वह शानदार परफौर्मेंस देंगी.” बता दें कि आयशा शर्मा की बहन नेहा शर्मा कई बौलीवुड फिल्मों में नजर आ चुकी हैं. ‘तुम बिन 2’, ‘मुबारकां’, ‘सोलो’, ‘क्रूक’, ‘क्या सुपर कूल हैं हम’, ‘जयंता भाई की लव स्टोरी’, ‘यंगिस्तान’ जैसी फिल्मों में काम कर चुकी हैं.

आज मिल कर एक जख्म कुरेदा जाए

VIDEO : सिर्फ 1 मिनट में इस तरह से करें चेहरे का मेकअप

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क्या पत्रकारिता बन रही है पत्थरकारिता

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न स्याही के हैं दुश्मन न सफेदी के हैं दोस्त,

हम को आईना दिखाना है दिखा देते हैं.

पत्रकारिता को ले कर कहा गया यह शेर देश के जानेमाने पत्रकारों द्वारा बड़ी शान के साथ अकसर उन के भाषणों में पढ़ा जाता रहा है. पर आज यही लाइनें अपने वजूद पर ही सवाल उठा रही हैं.

आज चारों तरफ यह सवाल किया जा रहा है कि क्या पत्रकार, संपादक, मीडिया ग्रुपों के मालिक व पत्रकारिता से जुड़े लेखक, स्तंभकार, समीक्षक वगैरह अपनी जिम्मेदारियों को पूरी ईमानदारी के साथ निभा रहे हैं? क्या वाकई आज के दौर का मीडिया सरकार, शासनप्रशासन व सिस्टम को आईना दिखाने का काम ईमानदारी से कर रहा है?

क्या आज अपनी लेखनी, अपनी आवाज, अपनी नेकनीयती व पूरी जिम्मेदारी के साथ पत्रकारों द्वारा दर्शकों या पाठकों को ऐसी सामग्री परोसी जा रही है जिस से जनता को फायदा हो सके?

क्या लोकतंत्र का चौथा खंभा पूरी तरह से पक्षपाती तो नहीं हो चुका है? क्या ज्यादातर मीडिया ग्रुपों के मालिक पैसा कमाने की गरज से सत्ता की गोद में जा बैठे हैं? क्या आजकल एक अच्छे पत्रकार की कसौटी उस की काबिलीयत या पत्रकारिता की अच्छी जानकारी होने के बजाय उस का अच्छा दिखना, उस की खूबसूरती, उस के चीखनेचिल्लाने का ढंग व अपने मालिक के प्रति उस की वफादारी ही रह गया है?

आजकल टैलीविजन के खबरिया चैनलों को ही देखा जाए तो अनेक चैनलों के अनेक एंकर व खबरें पढ़ने वाले गंभीरता से अपना कार्यक्रम पेश करने के बजाय जानबूझ कर चीखनेचिल्लाने का नाटक करते देखे जा सकते हैं. किसी गंभीर बहस या किसी साधारण से मुद्दे को चीखचिल्ला कर व उस कार्यक्रम में भड़काऊ किस्म के सवाल दाग कर ये नए जमाने के एंकर महज अपने कार्यक्रम की टीआरपी बढ़ाना चाहते हैं. टीआरपी का बढ़ना या घटना अच्छी पत्रकारिता के लिए जरूरी नहीं है बल्कि यह कारोबार व मार्केटिंग से जुड़ी चीज है. पर टैलीविजन एंकरों के भड़काऊ व आगलगाऊ अंदाज ने इन दिनों जनता को अपनी ओर इस तरह खींच रखा है कि दर्शक दूसरे मनोरंजक कार्यक्रमों से ज्यादा अब टैलीविजन की खबरें सुनने व देखने लगे हैं. यही वजह है कि खबरें पेश करने के दौरान इन टैलीविजन चैनलों की मुंहमांगी मुराद पूरी हो रही है और बढ़ती टीआरपी की वजह से ही खबरें दिखाने के दौरान या किसी गरमागरम बहस के बीच उन्हें भरपूर इश्तिहार हासिल हो रहे हैं.

दूसरी ओर इन दिनों यह भी देखा जा रहा है कि ज्यादा से ज्यादा लेखक व पत्रकार सत्ता की खुशामद करने या उसे खुश करने में लगे हुए हैं. इन में से कई तो ऐसे भी हैं जो खुद को समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष या वामपंथी या मध्यमार्गी विचारधारा का लेखक तो बताते हैं, पर अगर आप उन की टैलीविजन पर बहस सुनें या उन की लेखनी पढ़ें तो आप को यही पता चलेगा कि ऐसे कई लोग किसी अवार्ड या दूसरे लालच में सत्ता की भाषा बोलते दिखाई देने लगते हैं.

पत्रकारों के इसी लालच व मीडिया ग्रुपों के मालिकों की सौ फीसदी होती जा रही कारोबारी सोच ने ही ऐसे हालात पैदा कर दिए हैं कि अब पत्रकारिता को ‘पत्थरकारिता’ कहना ही ज्यादा ठीक लगता है.

अगर आप को उकसाऊ व भड़काऊ पत्रकारिता के कुछ जीतेजागते उदाहरण देखने हों तो अनेक टैलीविजन चैनलों के कार्यक्रमों के शीर्षक से ही यह पता चल जाएगा कि फलां कार्यक्रम में क्या पेश किया जाने वाला है. उदाहरण के तौर पर ‘हल्ला बोल’, ‘सनसनी’, ‘दंगल’, ‘टक्कर’, ‘ताल ठोंक के’ जैसे कार्यक्रमों के शीर्षक क्या पत्रकारिता के उसूलों पर खरा उतरते हैं? या फिर नमकमिर्च लगे हुए ऐसे शीर्षक केवल टीआरपी बढ़ाने के लिए बनाए जाते हैं?

जाहिर है कि जब शीर्षक ऐसे होंगे तो कार्यक्रम पेश करने वाला इस शीर्षक व अपने मालिक की टीआरपी बढ़ाने के मकसद से अपनी बात शालीनता के साथ कहने के बजाय गरजता और बरसता हुआ ही दिखाई देगा.

सूत्र तो यह भी बताते हैं कि टैलीविजन पर होने वाली कई बहसों खासतौर पर मंदिरमसजिद, हिंदूमुसलिम, तीन तलाक के मुद्दे के अलावा दूसरे धार्मिक मुद्दों जैसे गाय, गंगा, लव जिहाद, गौरक्षक वगैरह में एंकरों द्वारा जानबूझ कर कार्यक्रम में भाग लेने वाले लोगों से ऐसे सवाल किए जाते हैं जिस से उन्हें गुस्सा आए और वे ऐसे जवाब दे डालें जो झगड़े की वजह बन सकें.

टैलीविजन पर जब कभी 2 पक्ष आपस में किसी मुद्दे पर बहस में भिड़ जाते हैं उस समय एंकर की ओर से उन्हें और ढील दे दी जाती है, जबकि अगर एंकर चाहे तो उसी समय उन का माइक बंद कर सकता है और दूसरे मेहमान की ओर रुख कर सकता है. पर एंकर जानबूझ कर 2 लोगों में बहस कराता है ताकि दर्शकों को उस चटकारेबाजी में मजा आ सके.

इन दिनों पूरे देश में ऐसे ही एक टैलीविजन शोमैन रोहित सरदाना के खिलाफ जबरदस्त गुस्सा देखा जा रहा है. उस के खिलाफ सैकड़ों एफआईआर दर्ज होने की खबरें हैं. कई जगह हिंदूमुसलिम सभी ने मिल कर रोहित सरदाना के खिलाफ ज्ञापन दिए हैं.

फिल्म ‘पद्मावत’ को ले कर खड़े हुए बवाल के बारे में भी ऐसी ही बातें कही जा रही हैं. अगर आज पत्रकारिता भी इसी फार्मूले का सहारा ले कर आगे बढ़ने की कोशिश कर रही है तो यह देश का सब से बड़ा नुकसान है. आज हमारे समाज में एकदूसरे के लिए बैर का ऐसा ही माहौल बनता दिखाई दे रहा है.

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