आखिर बलात्कारी मानसिकता कैसे खत्म हो

16 दिसंबर, 2012 की रात दिल्ली में 23 वर्षीय पैरामैडिकल की छात्रा के साथ हुए सामूहिक दुष्कर्म की घटना ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था, जिस के फलस्वरूप अधिकांश जनमानस आंदोलित हो उठा था. लेकिन उस के बाद भी मासूम बच्चियों से ले कर प्रौढ़ों तक कई सामूहिक बलात्कार की घटनाएं घटीं. इस बात पर कोई विचार नहीं किया जा रहा है कि आखिर बलात्कारियों की संख्या क्यों बढ़ रही है? ऐसे कौन से कारण हैं जिन से कोई किशोर या प्रौढ़ अपनी मानमर्यादा व आचारविचार छोड़ कर दुष्कर्म जैसा कुकृत्य कर बैठता है? इस का मुख्य कारण केवल कामवासना है या महिलाओं के खिलाफ आक्रोश की अभिव्यक्ति?

खुलापन और आधुनिकता इस अंध यौन लिप्सा के सामने असहाय क्यों हैं? पहले किशोरकिशारियों के आपस में न मिल पाने को दोष दिया जाता था, तो अब कहा जा रहा है कि युवतियां बिंदास व उन्मुक्त हो रही हैं तथा युवाओं से अधिक घुलमिल रही हैं, जिस कारण वे कभी रेप तो कभी गैंगरेप या फिर कभी अपने ही किसी रिश्तेदार की शिकार हो जाती हैं.

नैशनल इलैक्शन वाच और एसोसिएशन फौर डैमोक्रेटिक रिफौर्म की एक रिपोर्ट के अनुसार पिछले 5 साल में देश के विभिन्न राजनीतिक दलों ने 260 ऐसे उम्मीदवारों को अपनी पार्टियों से चुनाव लड़ने के लिए टिकट दिए जिन पर दुष्कर्म व महिला उत्पीड़न जैसे संगीन आरोप थे. इन प्रमुख राजनीतिक दलों में कांग्रेस सब से आगे है, उस ने 26 बलात्कारियों को टिकट दिया है. इस के बाद भाजपा ने 24 को, बसपा ने 18 को और सपा ने 16 आरोपियों को टिकट दिया.

बढ़ती हताशा और हमारी सोच

केंद्र और राज्य सरकारों के पास वर्तमान युवापीढ़ी को शिक्षित करने के लिए न तो कोई योजना है और न ही सामाजिक संस्कार व रोजगार देने की कोई व्यवस्था. कुछ लोग आधुनिकता को कोस रहे हैं जोकि हकीकत से कोसों दूर है, क्योंकि बलात्कार अनादिकाल से अस्तित्व में है.

बदलती प्रवृत्ति

लिव इन रिलेशनशिप व समलैंगिकता को अपराधमुक्त किया जाना भी इस का एक कारण है. जो लोग यह सवाल उठाते हैं कि दबीढकी महिलाओं के साथ बलात्कार क्यों होते हैं, तो उन्हें सैक्स सर्वे पर गौर करना चाहिए, जिन में बताया जाता है कि कुछ पुरुषों को महिलाओं का उन्नत सीना आकर्षित करता है तो कुछ को उन के हिप्स आकर्षित करते हैं. यहां तक कि कुछ पुरुष तो किसी महिला की चाल पर ही फिदा हो जाते हैं.

परपीड़न की प्रवृत्ति भी एक कारण है. इस प्रवृत्ति के लोग, दूसरों को कष्ट पहुंचा कर खुद आनंदित होते हैं. अभी तक घटी सामूहिक दुष्कर्म की घटनाओं में इस प्रवृत्ति की स्पष्ट झलक मिलती है. नशे की बढ़ती प्रवृत्ति भी एक कारण है. नशे का आदी मानव अपना आपा खो बैठता है तथा उस की यौन उत्तेजना में बढ़ोतरी हो जाती है. वर्तमान में किशोर तो किशोर किशोरियां भी जाम से जाम टकरा रही हैं.

महिलाओं में बढ़ती जागरूकता

महिलाओं के लिए काम करने वाले गैर सरकारी संगठन ‘जागोरी’ का कहना है कि चूंकि अब भारतीय महिलाओं में जागृति आ रही है और वे यौन उत्पीड़न के खिलाफ आवाज उठा रही हैं इसलिए कुछ परंपरागत मर्द इसे पचा नहीं पा रहे हैं, इसलिए वे इन साहसी महिलाओं को सबक सिखाने के लिए बर्बर तरीके अपना रहे हैं.

भारत की निर्वाचित सरकारें केवल आर्थिक बदलाव लाना चाहती हैं. स्वतंत्रता के बाद हमारे देश में विदेशी पूंजी के साथ ही वहां की विकृत संस्कृति भी आ धमकी है, जिस के चलते हमारी दमित इच्छाएं सामने आने लगी हैं तथा हमारे मनोविकार भी बढ़ते चले जा रहे हैं. हम अपने परंपरागत नैतिक मूल्यों व समृद्ध संस्कृति को ले कर बहुत ही आत्ममुग्ध हैं, जबकि हमारी सांस्कृतिक परंपराएं अब केवल सांस्कृतिक समारोहों और साहित्य तक ही सीमित रह गई हैं, जोकि आज के इंटरनैट के युग में बहुत पिछड़ी मानी जाती हैं. जिस कारण आज का युवक गलत आचरण करने से भी नहीं हिचकता.

लचर कानून व्यवस्था व संसाधनों का अभाव

शासनप्रशासन की लचर कानून व्यवस्था, रात को प्रकाश का उचित प्रबंध न होना तथा बिजली की कमी, सार्वजनिक परिवहन का उचित प्रबंध न होना, सड़कों का उचित रखरखाव न होना, चिकित्सा सुविधाओं और शिक्षण संस्थाओं का अभाव भी इस के मुख्य कारण हैं.

शहरी गरीबों में बढ़ती हताशा और लंपटपन के कारण उन में असंवेदनशीलता भी बढ़ रही है, जिस कारण वे अपने जैसी ही किसी गरीब या कामकाजी युवती के साथ बलात्कार या दूसरी तरह की हिंसा करते वक्त शर्मशार नहीं होते.

वरिष्ठ मनोचिकित्सक डा. अरुणा ब्रूटा मानती हैं कि शहरों में जिस तरह से आर्थिक असमानता बढ़ रही है, उस से भी आम लोगों में कुंठा बढ़ रही है. शहरी पुरुष वर्ग ज्यादा आक्रामक और हिंसक हो गया है. सदियों से पुरुष महिलाओं का शोषण करता आया है. उन्हें भोग की वस्तु माना जाता है. पुरुषों के इस नजरिए के चलते भी महिलाओं से बलात्कार के मामले होते हैं.

अब युवतियां बड़ी संख्या में घरपरिवार से बाहर निकल कर कामकाजी दुनिया में अपनी पैठ मजबूत कर रही हैं. ऐसे में पहले से ही कुंठित युवाओं में युवतियों के प्रति जलन का भाव भी बढ़ रहा है. इसलिए वे मौका मिलते ही युवतियों को कमतर साबित करने की कोशिश करते हैं. कईर् बार इस की परिणति बलात्कार जैसे घिनौने अपराध के रूप में होती है.

मीडिया

हमारे देश का चाहे प्रिंट मीडिया हो या इलैक्ट्रौनिक, सभी जगह उत्तेजक दृश्य व अन्य सामग्री की कोईर् कमी नहीं है. विज्ञापन चाहे किसी भी वस्तु का हो, लेकिन उस में नारी की कामुक अदाएं व उस के अधिक से अधिक शरीर को दिखाने पर जोर रहता है. फुटपाथ पर अश्लील साहित्य व ब्लू फिल्मों की सीडी, डीवीडी आसानी से उपलब्ध हो जाती हैं. बाकी कसर मोबाइल व इंटरनैट ने पूरी कर दी है. जहां प्रतिदिन हजारों नाबालिग अश्लील सामग्री का अवलोकन करते हैं.

भारतीय सिनेमा में बलात्कार के दृश्यों को बहुत ही ग्लैमराइज तरीके से तथा बढ़ाचढ़ा कर दिखाया जाता है. कुछ युवा इन फिल्मी दृश्यों से प्रेरणा ले कर बलात्कार जैसी घटनाओं को अंजाम देते हैं.

यौन शिक्षा का अभाव

यह एक शाश्वत सत्य है कि मानव जीवन की एक बुनियादी आवश्यकता है सैक्स. समाज ने इस के लिए विवाह के रूप में एक उचित व्यवस्था की है. विवाह के बाद स्त्री व पुरुष दोनों ही अपनी इस आवश्यकता की पूर्ति कर सकते हैं, लेकिन वर्तमान में हमारे समाज में युवाओं के मुकाबले युवतियों की संख्या दिन पर दिन कम होती जा रही है. कुछ युवतियां व युवक शादी के बंधन में बंधना ही नहीं चाहते. वे शिक्षा व रोजगार में स्थायित्व पाने के फेर में भी अपनी सैक्स जैसी बुनियादी आवश्यकता को पूरा नहीं कर पाते.

घटिया शिक्षा पद्धति की वजह से अल्प मानसिक विकास के कारण भी कई युवा ड्रग्स, शराब और ग्लैमर के नशे में बलात्कार को रोमांच का हिस्सा मान लेते हैं. असामान्य यौन प्रवृत्ति के युवक, युवतियों के विरुद्ध हिंसा करने लगते हैं.

बलात्कारी का व्यवहार

दिल्ली की स्वयंसेवी संस्था ‘स्वचेतन’ द्वारा पिछले 5 साल में जेल में बंद 242 बलात्कारियों का अध्ययन किया गया. ज्यादातर बलात्कारी पकड़े जाने से पूर्व बलात्कार कर चुके थे और इन सभी के मन में महिलाओं के प्रति गहरी नफरत थी. वे महिलाओं के प्रति अपमानजनक और अश्लील गालियों का प्रयोग करते थे तथा इन में अपने शिकार पर यौन फंतासियां आजमाने की कभी न मिटने वाली भूख थी.

आंकड़ों की जबानी

पिछले 40 वर्षों में दुष्कर्म की घटनाएं 873.3% बढ़ी हैं तथा पीडि़त महिलाओं में आधी से अधिक की उम्र 18 से 30 साल के बीच होती है. 1971 में दुष्कर्मियों को सजा देने की दर 41% थी वहीं 2014 में यह दर घट कर मात्र 24.7% रह गई.

राष्ट्रीय अपराध रिकौर्ड ब्यूरो के अनुसार वर्ष 2011 में महिलाओं के साथ हुए अपराधों का विवरण इस प्रकार है : बलात्कार 24,206, उत्पीड़न 42,968, यौन शोषण 8,570 तथा घरेलू हिंसा के 99,135 मामले प्रकाश में आए, जबकि केंद्रीय गृह मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार देश में 2009 से 2011 के बीच बलात्कार के 67 हजार से अधिक मामले दर्ज हुए. इन में से केवल 26% मामलों का ही निष्कर्ष निकल पाया.

वर्ष 2011 में बलात्कार की 26,206 घटनाएं हुईं, जिन में मात्र 26.4% को सजा हुई. छेड़छाड़ की 35,565 घटनाओं में से 25% को सजा हुई. शारीरिक शोषण के 42,968 मामलों में से केवल 27% को सजा हुई जबकि वर्ष 2011 में औरतों के साथ हर 26वें मिनट में छेड़छाड़, हर 34वें मिनट में बलात्कार, हर 42वें मिनट में अपहरण और हर 93वें मिनट में औरत की हत्या की गई. 2011 में औरत विरोधी अपराधों में 2010 के मुकाबले 20% की वृद्धि हुई है.

यदि 21वीं सदी के पहले दशक के शुरूव अंत की तुलना करें तो भी स्थिति काफी गंभीर है.

समाधान

 नारी को वह सम्मान देना होगा जिस की वह हकदार है और यह तभी होगा जब हम युवाओं के मन में यह कूटकूट कर भर दें कि एक आदर्श समाज निर्माण के लिए महिलाओं का सम्मान करना अति आवश्यक है. इस के लिए स्कूलों में नैतिक शिक्षा को लागू करना होगा. इस के लिए यह भी आवश्यक है कि उन्हें अच्छा साहित्य पढ़ने को मिले.

–  टीवी चैनलों पर अच्छे कार्यक्रम दिखाए जाएं जिस से युवाओं की नकारात्मक सोच में बदलाव हो.

– खेलकूद से भी बुरी प्रवृत्तियों का शमन किया जा सकता है. इस के बाद भी अगर कोई बलात्कार करता है तो बलात्कारी का अंगोच्छेद कर देना या रासायनिक विधि से उसे हमेशा के लिए नपुंसक बना देना चाहिए. शोहरत व दौलत के बल पर जो लोग कानून का गलत इस्तेमाल कर रहे हैं उन्हें हर हाल में रोकना होगा. राजनीति में बढ़ती चरित्रहीनता व अपराधीकरण को रोकना होगा.

– बलात्कारी मनोवृत्ति के फैलाव को रोकने के लिए नैतिक शिक्षा का विस्तार व सामाजिक मूल्यों का विकास अति आवश्यक है. सामाजिक मूल्यों के विकास में लोक संस्कृति, इतिहास तथा साहित्य की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है, इसलिए इन को बढ़ावा देना भी जरूरी है.

बेटी के नाम पर कलंक है हरमीत कौर

पंजाब के जिला गुरदासपुर के कस्बाथाना धारीवाल के रहने वाले जाट सरदार पलविंदर सिंह के परिवार में पत्नी परमजीत कौर के अलावा 20 साल की बेटी हरमीत कौर थी. वह पंजाब पुलिस में हवलदार थे और इन दिनों पीएसी की 75वीं बटालियन की ओर से धार्मिक गुरु बाबा भनियार वाले की सुरक्षा में तैनात थे. वह शरीफ, ईमानदार और जांबाज सिपाही थे. पलविंदर सिंह एक जिम्मेदार पिता और पति ही नहीं, समाजसेवक भी थे. उन्होंने कई रक्तदान कैंप अपने खर्चे पर लगवाए थे और जरूरतमंद लोगों के लिए सैकड़ों यूनिट खून जमा करा कर प्रशासन को दिया था. बाबा भनियार वाले की सुरक्षा में तैनाती के बाद से वह काफी व्यस्त हो गए थे. वह महीने, डेढ़ महीने में ही घर आ पाते थे.

28 अगस्त, 2016 को वह 4 दिनों की छुट्टी ले कर घर आए थे. सोमवार की रात को खाना खा कर वह आंगन में ही चारपाई डाल कर सो गए थे, जबकि पत्नी और बेटी अपनेअपने कमरों में जा कर सो गई थीं. रात करीब 2 बजे कमरे में सो रही परमजीत कौर को आंगन में सो रहे पति के कराहने की आवाज सुनाई दी तो वह कमरे से निकल कर पति के पास आ गई. उस समय पलविंदर सिंह तड़पते हुए छाती को जोरजोर से मसल रहे थे.

परमजीत कौर को लगा कि पति को हार्ट अटैक आया है, वह भी उन के सीने को सहलाने लगी. तभी उन्होंने देखा कि पति के नाक और मुंह से खून निकल रहा है. यह देख कर वह घबरा गईं और जल्दी से जा कर पड़ोस में रहने वाले जेठ मंगल सिंह को बुला लाई. पत्नी के साथ वह तुरंत आ गए. लेकिन जब वह आए तो पलविंदर एकदम शांति से बिस्तर पर लेटे थे. उन्होंने उन्हें हिलाडुला कर भी देखा. ऐसा लगा, जैसे उन में जान ही नहीं है. अब तक मंगल सिंह का बेटा और पलविंदर की बेटी हरमीत कौर भी वहां आ गई थी.

पलविंदर को उठा कर गाड़ी में डाल कर गुरदासपुर के सिविल अस्पताल ले जाया गया, जहां डाक्टरों ने चैकअप कर के उन्हें मृत घोषित कर दिया. घर वालों ने बताया था कि यह मौत हार्ट अटैक से हुई है, लेकिन चैकअप करने वालों डाक्टरों को यह मौत हार्ट अटैक से नहीं लगी तो उन्होंने इस की सूचना थाना धारीवाल पुलिस को दे दी. सूचना मिलने के कुछ देर बाद ही थानाप्रभारी इंसपेक्टर कुलवंत सिंह अधीनस्थों के साथ सिविल अस्पताल पहुंच गए थे.

पलविंदर की लाश कब्जे में ले कर कुलवंत सिंह ने परमजीत कौर से पूछताछ की तो उन्होंने उन से भी बताया कि रात में सोने के दौरान उन की हार्ट अटैक से मौत हो गई थी. इस के बाद कुलवंत सिंह ने सीआरपीसी की धारा 174 के तहत काररवाई करते हुए मौत की पुष्टि के लिए लाश को कब्जे में ले कर पोस्टमार्टम के लिए मोर्चरी में रखवा दिया.

पर परमजीत कौर का कहना था कि उस के पति की मौत हार्ट अटैक से हुई है तो पोस्टमार्टम कराने की क्या जरूरत है, अंतिम संस्कार के लिए लाश उन के हवाले कर दी जाए. इस बात को ले कर परमजीत कौर और हरमीत कौर ने अस्पताल में अच्छाखासा हंगामा भी किया, लेकिन कुलवंत सिंह ने यह कह कर उन्हें शांत करा दिया कि सच्चाई का पता लगाने के लिए यह जरूरी है. यह 30 अगस्त, 2016 की बात है.

सिविल अस्पताल के डाक्टरों ने एक पैनल बना कर उसी दिन पलविंदर सिंह की लाश का पोस्टमार्टम कर के रिपोर्ट पुलिस को सौंप दी, जो काफी चौंकाने वाली थी. रिपोर्ट के अनुसार मृतक का गला किसी तेजधार हथियार से काटा गया था. श्वांस नली कटने से पलविंदर की मौत हुई थी.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट से कुलवंत सिंह को यह मामला काफी संदिग्ध लगा. उन्हें परमजीत का बयान रहस्यमय लगने लगा, इसलिए उन्होंने तुरंत एएसआई जसबीर सिंह और हैडकांस्टेबल गुरमुख सिंह को मृतक पलविंदर सिंह के घर भेज कर घटनास्थल को सील करा दिया, जिस से घटनास्थल पर किसी चीज से छेड़छाड़ न की जा सके. इस के बाद उन्होंने इस घटना की सूचना अपने अधिकारियों को दे दी थी.

चूंकि मामला विभाग के एक पुलिसकर्मी की रहस्यमयी मौत का था,इसलिए सूचना मिलते ही एसएसपी जगदीप सिंह, एसपी प्रदीप मलिक, डीएसपी ए.डी. सिंह मृतक पलविंदर सिंह के घर पहुंच गए थे. क्राइम टीम, डौग स्क्वायड को भी बुलवा लिया गया था.

पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का बारीकी से मुआयना किया तो उन्हें यह मामला हत्या का लगा. क्योंकि पलविंदर सिंह जिस बिस्तर पर सोए थे, वह खून से तर था. नाक और कान से इतना खून नहीं निकल सकता था.

एसएसपी जगदीप सिंह के आदेश पर थाना धारीवाल पुलिस ने पलविंदर सिंह की हत्या का मुकदमा अज्ञात के खिलाफ दर्ज कर के जांच शुरू कर दी. कुलवंत सिंह को लगा था कि परमजीत कौर को या तो कुछ पता नहीं है या फिर वह झूठ बोल रही है. क्योंकि हार्ट अटैक से हुई मौत और हत्या में जमीनआसमान का फर्क होता है.

उन्होंने एएसआई जसबीर सिंह, विजय कुमार, हैडकांस्टेबल ओंकार सिंह, गुरमुख सिंह, कुलविंदर सिंह, कांस्टेबल मंजीत को मिला कर एक टीम बनाई और उसे सच्चाई का पता लगाने के लिए लगा दिया. पड़ोसियों से की गई पूछताछ में कुलवंत सिंह को पता चला कि पलविंदर सिंह की बेटी हरमीत कौर से किसी बात को ले कर अकसर कहासुनी होती रहती थी.

ऐसी ही एक हैरान करने वाली जानकारी यह भी मिली कि हरमीत कौर का किसी लड़के से प्रेमसंबंध चल रहा था और वह उस से शादी करना चाहती थी. जबकि पलविंदर सिंह इस शादी के लिए राजी नहीं थे, लेकिन उन की पत्नी परमजीत कौर राजी थी. इसी बात को ले कर अकसर घर में झगड़ा होता रहता था.

कुलवंत सिंह ने इस बात को ध्यान में रख कर जांच शुरू की. महिला सिपाही सुरजीत कौर ने हरमीत कौर से थोड़ी सख्ती से पूछताछ की तो उस ने अपना अपराध स्वीकार करते हुए बताया कि अपने प्रेमी के साथ मिल कर उसी ने वासनापूर्ति के लिए जिस बाप ने अंगुली पकड़ कर चलना सिखाया, पढ़ालिखा कर समाज में जीने का मकसद दिया, उसी को मार दिया था.

इस के बाद परमजीत कौर ने भी स्वीकार कर लिया था कि उस ने भी बेटी को बचाने के लिए झूठ बोला था. कुलवंत सिंह ने उसी दिन हरमीत कौर की निशानदेही पर गांव दोस्तपुर से हरमीत कौर के प्रेमी गुरप्रीत सिंह उर्फ गोपी तथा उस के दोस्त मनजिंदर सिंह को गिरफ्तार कर सभी को जिला मजिस्ट्रैट के सामने पेश कर विस्तृत पूछताछ के लिए 2 दिनों के पुलिस रिमांड पर ले लिया था.

रिमांड अवधि के दौरान सभी से हुई पूछताछ में पलविंदर सिंह की हत्या की जो कहानी प्रकाश में आई, वह अधिक लाडप्यार में बिगड़ी औलाद और स्वार्थ की खोखली नींव पर टिके रिश्ते की कहानी थी—

हरमीत कौर बचपन से ही पलविंदर सिंह की बेहद लाडली थी. वह बेटी को दुनिया की तमाम खुशियां देना चाहते थे, इसीलिए उन्होंने उस की पढ़ाई महंगे स्कूलों में कराई. वह चाहते थे कि हरमीत कौर उच्च शिक्षा हासिल कर आईपीएस बने. लेकिन कालेज में कदम रखते ही हरमीत कौर उन के अरमानों पर पानी फेर कर आधुनिकता के रंग में रंग कर आशिकी के चक्कर में पड़ गई.

हरमीत कौर सुंदर तो थी ही, उस की बातचीत की शैली और व्यक्तित्व भी काफी प्रभावशाली था. उस के चाहने वाले तो बहुत थे, पर उस का दिल गुरप्रीत सिंह उर्फ गोपी पर आ गया.  धीरेधीरे उन का प्यार परवान चढ़ने लगा. नजदीकियां बढ़ीं तो दोनों में शारीरिक संबंध भी बन गए. फिर तो हरमीत को इस का ऐसा चस्का लगा कि वह गुरप्रीत से बाहर तो मिलती ही थी, घर भी बुलाने लगी.

क्योंकि घर में उसे पूरी तरह एकांत मिलता था. उस की मां का अलग कमरा था. वह ज्यादातर अपने कमरे में ही रहती थीं. पलविंदर महीने, डेढ़ महीने में आते थे. ऐसे में हरमीत मरजी की मालिक बन गई थी. यही नहीं, वह दिन पर दिन जिद्दी भी होती जा रही थी.

अपने इसी जिद्दी स्वभाव की वजह उस ने तय कर लिया था कि वह शादी करेगी तो गुरप्रीत से ही करेगी. पलविंदर सिंह बेटी के इस फैसले और हरकत से अंजान उस के भविष्य को संवारने के लिए एकएक पैसा जोड़ रहे थे. जिस दिन उन्हें हरमीत की इस आवारगी का पता चला, गहरा आघात लगा.

पहले तो उन्होंने पत्नी परमजीत को आड़े हाथों लिया, उस के बाद हरमीत कौर की खबर ली. उन्होंने साफसाफ कह दिया कि इश्कमुश्क और शादीब्याह को दिमाग से निकाल कर अपनी पढ़ाई पर ध्यान दे. अब अगर उन्होंने सुन लिया कि वह उस लड़के से मिली है तो ठीक नहीं होगा.

लेकिन जिद्दी हरमीत कौर ने पिता की बातों पर जरा भी ध्यान नहीं दिया और बेहिचक पहले की ही तरह गुरप्रीत से मिलती रही. ऐसे में ही किसी दिन उस ने गुरप्रीत से कहा, ‘‘पापा के जीते जी तो हम दोनों कभी शादी कर नहीं सकते, क्यों न हम दोनों भाग कर शादी कर लें?’’

‘‘घर से भाग कर शादी करने के लिए काफी रुपयों की जरूरत होती है, जो हमारे पास नहीं है.’’ गुरप्रीत ने कहा तो हरमीत ने उसे समझाते हुए कहा, ‘‘तुम रुपयों की चिंता मत करो. मेरे पापा ने मेरे भविष्य के लिए बहुत रुपए जमा कर रखे हैं.’’

हरमीत कौर ने गुरप्रीत के साथ भागने की कई बार कोशिश की, लेकिन हर बार वह यह सोच कर शांत बैठ गई कि अंजान जगह पर अंजान लोगों के बीच वह कैसे रह पाएगी? एक दिन किसी ने पलविंदर को हरमीत और गुरप्रीत के मिलने की जगह और समय बता दिया तो पलविंदर ने दोनों को रंगेहाथों पकड़ लिया.

इस बार उस ने हरमीत कौर को लताड़ा ही नहीं, 2-4 थप्पड़ जड़ कर हाथ जोड़ कर रोते हुए कहा, ‘‘मेरे सपने और अपना भविष्य बरबाद मत कर बेटी. मैं यह सब सह नहीं पाऊंगा और आत्महत्या कर लूंगा.’’

हरमीत कौर को पिता पर दया आने के बजाय घृणा हो गई. उस के मन में आया कि पिता की सर्विस रिवौल्वर से गोली मार उन्हें खत्म कर दे. बाद में कह देगी कि किसी बदमाश ने उन पर हमला किया है. इस के बाद दिनरात वह केवल एक ही बात सोचने लगी कि प्रेम कहानी में रोड़ा बन रहे पिता को कैसे रास्ते से हटाया जाए?

एक दिन पलविंदर सिंह पत्नी के साथ सो रहा था, तभी रात 1 बजे उसे हरमीत कौर के कमरे से खटरपटर की आवाजें आती सुनाई दीं. वह उठ कर बाहर आया तो उस के कमरे से एक साए को निकल कर दीवार फांदते देखा.

पलविंदर सिंह समझ गया कि वह गुरप्रीत ही था. अगले दिन ड्यूटी पर जाने से पहले पलविंदर ने हरमीत को खूब समझाया. अंत में उस ने यह भी बताया कि रात को उस ने सब कुछ देख लिया है. वह यह सब बंद कर दे, वरना परिणाम बहुत भयानक होगा.

बस, उसी दिन हरमीत कौर ने तय कर लिया कि अब चाहे कुछ भी हो, वह पिता को जिंदा नहीं छोड़ेगी. उसी दिन गुरप्रीत से मिल कर उस ने पिता की हत्या की योजना बना डाली.

चूंकि गुरप्रीत यह काम अकेला नहीं कर सकता था, इसलिए उस ने अपने जिगरी दोस्त मनजिंदर सिंह को अपने साथ मिला लिया. उस ने इस काम के लिए उसे कुछ पैसे भी देने को कहा. हरमीत कौर ने कुछ रुपए गुरप्रीत को दिए, जिस से उस ने एक तेजधार वाला दातर खरीदा और कुछ रुपए मनजिंदर को दे दिए.

अब उन्हें इंतजार था पलविंदर सिंह के छुट्टी आने का. 29 अगस्त को वह छुट्टी पर घर आए और हरमीत कौर पर नजर रखने के लिए अपना बिस्तर आंगन में लगाया.

हरमीत कौर ने रात 9 बजे गुरप्रीत को पिता के घर आने और आंगन में सोने की सूचना दे दी. रात करीब 1 बजे हरमीत कौर ने उठ कर बाहर के दरवाजे की कुंडी खोल दी, जिस से गुरप्रीत को अंदर आने में परेशानी न हो. रात 2 बजे के करीब गुरप्रीत अपने दोस्त मनजिंदर के साथ हरमीत के घर पहुंचा तो वह उसे बरामदे में खड़ी मिली.

बिना आवाज किए तीनों पलविंदर सिंह की चारपाई के पास पहुंचे. मनजिंदर और हरमीत कौर ने गहरी नींद सो रहे पलविंदर सिंह के हाथपैर पकड़ लिए तो गुरप्रीत ने दातर से उस की श्वांस नली काट दी, जिस से उस की तुरंत मौत हो गई. पलविंदर सिंह की हत्या कर के गुरप्रीत और मनजिंदर चले गए तो हरमीत कौर मां के साथ मिल कर पिता की हार्ट अटैक से हुई मौत का नाटक करने लगी.

पूछताछ के बाद पुलिस ने वह दातर बरामद कर लिया था, जिस से पलविंदर सिंह की हत्या की गई थी. इस के बाद 3 सितंबर, 2016 को सभी अभियुक्तों को अदालत में पेश किया गया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया.

इस तरह स्वार्थी रिश्तों ने खून को पानी बना दिया और एक कानून के रक्षक की बेटी यह भी नहीं सोच सकी कि चाहे कितना भी झूठ क्यों न बोला जाए, सच से आखिर परदा उठ कर ही रहता है.

 – कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

दकियानूसी समाज में चिनगारी हैं फोगट बहनें

हरियाणा की कुश्ती पदक विजेता गीता फोगट, जिस पर आमिर खान की फिल्म ‘दंगल’ बनी थी, को 2010 के कौमनवैल्थ खेलों में स्वर्ण पदक जीतने पर वह वाहवाही नहीं मिली थी, जो फिल्म ने दिलाई है. अब गीता और बबीता फोगट घरघर का नाम बन गई हैं और लड़कियों की नई आशा बन गई हैं. हिंदी फिल्में इस प्रकार का सामाजिक बदलाव कम करा पाती हैं, पर इस बार ऐसा हो गया है.

हरियाणा में एक पिता ने अपनी 2 बेटियों को कुश्ती में महारत दिलाने का संकल्प लिया था, यही अपनेआप में बड़ी बात है. इस देश में जहां औरतों को सदियों से बोझ समझा जाता रहा है, वहां एक पिता का बेटियों को कुश्ती में अपनी मरजी से डालना आश्चर्य ही है.

अब फिल्म ‘दंगल’ के बाद इन लड़कियों को नई पहचान मिलने लगी है और वे रोल मौडल बन रही हैं. महिला कुश्ती में वैसे तो लड़कियां ही होंगी, पर हरियाणा के पिछड़े गांवों में से इस तरह लड़कियों का बाहर निकलना एक सामाजिक बदलाव की निशानी है.

यह बदलाव असल में बहुत गहरे जाना जरूरी है. औरतों और लड़कियों को सामाजिक व धार्मिक रीतिरिवाजों से इस तरह बांध दिया जाता है कि वे खूंटे से बंधी गाय की तरह हो जाती हैं, जिन का काम केवल दूध देना भर रह जाता है. लड़कियों का व्यक्तित्व तो खो ही जाता है, देश को उत्पादन की एक भरपूर सक्षम इकाई से भी हाथ खो देना पड़ता है.

यह नहीं भूलना चाहिए कि कमजोर इनसान चाहे मर्द हो या औरत, पूरे समाज पर बोझ होता है. किसी समाज की अमीरी उस की उत्पादकता पर निर्भर होती है और यदि लड़कियों को घर में बंद कर के पूजापाठ, सिर्फ चूल्हेचौके और बच्चे पैदा करने पर लगा दिया जाए, तो परिवार ही नहीं पूरा देश पीछे रह जाता है. धर्म ने साजिश कर के सदियों से औरतों को कमजोर रखा, ताकि वे मर्दों की सेवा करते रहें और कोई मांग न करें. ऐसा समाज गुलामी को तख्त पर बैठा देता है और उसे अपनी खुद की गुलामी का एहसास भी नहीं रहता.

फोगट बहनें महिला कुश्ती में नाम कमा कर एक दकियानूसी समाज में चिनगारी का काम कर रही हैं. अगर वे दूसरे पाखंडों का भी इसी तरह विरोध करें, तो ही उन का काम सफल होगा. फिल्म ‘दंगल’ में उन का ट्रेनिंग के दौरान लड़कों को भी पछाड़ना असल चैलेंज है और यह हर स्तर पर होना जरूरी है.

हिचकीः नकल के लिये अकल की जरूरत होती है

टारेंट सिंड्रोम से पीड़ित रहे अमरीकन मोटीवेशनल प्रवक्ता और शिक्षक ब्रैड कोहेन तमाम मुसीबतों का सामना करते हुए सफल शिक्षक बने थे. फिर उन्होंने अपनी कहानी पर एक किताब भी लिखी, जिस पर अमरीका में 2008 में एक फिल्म ‘‘फ्रंट आफ द क्लास’ बनी थी, उसी के अधिकार लेकर ‘यशराज फिल्मस’ ने फिल्म ‘हिचकी’ का निर्माण किया है. मगर यह फिल्म रानी मुखर्जी के अभिनय को नजरंदाज करने पर शून्य हो जाती है. अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि रानी मुखर्जी महज अपने अभिनय के बल पर इस फिल्म को बौक्स औफिस पर कितनी सफलता दिला पाएंगी?

फिल्म ‘‘हिचकी’’ की कहानी टारेंट सिंड्रोम की बीमारी से पीड़ित शिक्षक नैना माथुर(रानी मुखर्जी) के इर्दगिर्द घूमती है. इस बीमारी की वजह से उन्हें बार बार हिचकी आती है. इसके चलते बचपन में उन्हें 12 स्कूल बदलने पड़े और अब जब वह शिक्षक के तौर पर विद्यार्थियों को पढ़ाना चाहती हैं, तो उसे 18 स्कूलों ने नौकरी देने से इंकार कर दिया. जबकि नैना माथुर के पास कई डिग्रियां हैं. पर वह हार नहीं मानती. जबकि नैना माथुर सभी को टारेंट सिंड्रोम के बारे में विस्तार से बताती भी है. अंततः पांच साल के संघर्ष के बाद नैना माथुर को एक कैथोलिक स्कूल में नौकरी मिल जाती है. इस स्कूल के संस्थापक को भी बोलने की समस्या थी. इस स्कूल में शिक्षा के अधिकार के तहत भर्ती गरीब बच्चों की कक्षा नौ एफ को भौतिक शास्त्र पढ़ाने का अवसर नैना माथुर को मिलता है. नैना माथुर इन बच्चों को आम प्रचलित पद्धति की बजाय अनोखे तरीके से पढ़ाती हैं. इस कक्षा के बच्चे झोपड़पट्टी के हैं, तो स्वाभाविक तौर पर वह अपनी शिक्षक को परेशान भी करते हैं और नैना माथुर,आतिष(हर्ष मयार) सहित 14  विद्रोही व शरारती बच्चों से निपटती भी हैं.

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नकल के लिए अकल की जरुरत होती है. पर फिल्म ‘हिचकी’ के लेखक व निर्देशक के पास शायद यह अक्ल भी नहीं रही. यह फिल्म 2008 में बनी अमरीकन फिल्म ‘‘फ्रंट आफ द क्लास’’ की अति घटिया नकल है. वास्तव में फिल्म के निर्देशक सिद्धार्थ पी मल्होत्रा ने फिल्म को बेवजह अति नाटकीय/मेलोड्रमैटिक बनाने के चक्कर में फिल्म की ऐसी की तैसी कर दी, जिसे रानी मुखर्जी का उत्कृष्ट अभिनय भी नहीं बचा पाया. मजेदार बत यह है कि इसी विषय पर दक्षिण भारत में एक हौरर फिल्म बनी थी, जिसे हिंदी में ‘मोहन वदनी’ के नाम से डब किया गया. इस फिल्म की हीरोईन भी यही बीमारी है, जिसकी मौत कक्षा के अंदर होती है और उसकी आत्मा स्कूल में भटकती रहती है. यह फिल्म भी टारेंट सिंड्रोम पर जागरूकता लाने में असफल है.

लेखकीय यानी कि कथा कथन और निर्देशकीय कमजोरी के चलते फिल्म ‘‘हिचकी’’ अपने पूरे मकसद से भटक गयी. इसे अपने दमदार अभिनय की बदौलत रानी मुखर्जी भी नहीं बचा पाएंगी? फिल्मकार ने शिक्षक व विद्यार्थी के बीच ऐसा आदर्शवाद परोसा है, जो कि पूरी तरह से बनावटी लगता है, परिणामतः दर्शकों का फिल्म के मूल मकसद से ध्यान हट जाता है. यानी कि फिल्म‘‘हिचकी’’ टारेंट सिंड्रोम जैसी बीमारी को लेकर जागरूकता नही पैदा कर पाती. यहां तक कि छात्र व शिक्षक के बीच का रिश्ता भी जबरन थोपा हुआ नजर आता है. इंटरवल से पहले दर्शक नैना माथुर के साथ जुड़े रहते हैं, मगर इंटरवल के बाद आने वाले उतार चढ़ाव, फिल्म में आने वाले मोड़ का आकलन दर्शक पहले ही लगा लेता है, जिसके चलते इंटरवल के बाद फिल्म दर्शकों को बोर करती है. इतना ही नहीं खलनायक के रूप में नीरव कावी जो कुछ करते हुए नजर आते हैं, वह भी अनावश्यक लगता है. फिल्म का क्लायमेक्स भी अति बनावटी है. लेखक व निर्देशक दोनों ही रूप में सिद्धार्थ पी मल्होत्रा असफल रहे हैं.

फिल्म का गीत संगीत फिल्म के कथानक के साथ तारतम्य नही बैठाता. फिल्म के कैमरामैन बधाई के पात्र हैं.

रानी मुखर्जी ने नैना माथुर के किरदार को पूरे सम्मानजनक तरीके से परदे पर अपने अभिनय से पेश करते हुए टारेंट सिंड्रोम को जिया है. दर्शक नैना माथुर के पढ़ाने की अपरंपरागत शैली के सम्मोहन में जरुर बंधता है. दर्शक सिर्फ रानी मुखर्जी के अभिनय के लिए ही इस फिल्म को देखने जा सकता है.

एक घंटे 58 मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘हिचकी’’ का निर्माण ‘यशराज फिल्मस’ ने किया है. फिल्म के लेखक सिद्धार्थ पी मल्होत्रा व अंकुर चैधरी, पटकथा लेखक अंकुर चैधरी, अंबर हड़प व गणेश पंडित, संगीतकार हितेष सोनिक, कैमरामैन अविनाश वरूण व कलाकार हैं – रानी मुखर्जी, हर्ष मयार, नीरज कावी, सुप्रिया पिलगांवकर, सचिन पिलगांवकर, कुणाल शिंदे, शिवकुमार सुब्रमणियम, सुप्रिया बोस, जन्नत जुबेर रहमानी व अन्य.

जब बिदिता बाग से नाराज होकर उनके पिता ने घर छोड़ा था?

फिल्म ‘‘बाबू मोशाय बंदूक बाज’’ से चर्चा में आईं अदाकारा बिदिता बाग ने 2011 में अभिनय जगत में कदम रखा था. 2011 से अब तक उन्होंने करीबन एक दर्जन से अधिक फिल्में की होंगी, जो कि सिनेमाघरों तक नही पहुंच पाई, जबकि कई अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में यह फिल्में काफी चर्चा बटोर चुकी हैं. अब बिदिता बाग का करियर काफी तेज गति से आगे बढ़ रहा है. इन दिनों वह निर्माता नीरज भारद्वाज व श्वेता ठाकोर तथा निर्देशक मनोज सिंह की फिल्म ‘‘माया’’ सहित कई फिल्में कर रही हैं. बिदिता बाग ने बिना प्रोस्थेटिक मेकअप का प्रयोग किए फिल्म ‘‘दयाबाई’’ में 16 से 77 वर्ष तक का किरदार निभाया है.

बिदिता बाग के पिता सराकरी नौकरी करने के साथ ही कला से भी जुड़े रहे हैं. वह अमैच्योर थिएटर करने के साथ ही अपने आस पास के बच्चों को थिएटर की ट्रेनिंग भी देते रहे हैं. इसके बावजूद उन्हें पसंद नहीं था कि उनकी बेटी बिदिता बाग फिल्मों से जुड़े. इसलिए जब बिदिता बाग ने बौलीवुड से जुड़ने का ऐलान किया, तो उनके पिता ने काफी विरोध किया था, यहां तक बिदिता के पिता ने बिदिता के निर्णय से नाराज होकर घर छोड़ दिया था.

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अपने पिता की नाराजगी की चर्चा करते हुए खुद बिदिता बाग कहती हैं- ‘‘जब मैने अभिनय को करियर बनाने का निर्णय लिया तो नाराज होकर मेरे पिताजी ने घर छोड़ दिया था. पूरे 45 दिन वह घर नहीं आए. शायद वह कभी घर वापस ना आते लेकिन मेरे फूफाजी को कैंसर हो गया और उनका इलाज हमारे घर से ही हो रहा था. उनकी हालत बिगड़ रही थी. इस वजह से काफी समझाने पर पिताजी घर वापस आए थे.

मेरे पिताजी मुझसे बहुत ज्यादा भावनात्मक रूप से जुड़े हुए हैं और मेरे अभिनेत्री बनने में सबसे ज्यादा समस्या उन्होंने ही खड़ी की. वही मेरे सबसे बडे़ आलोचक हैं. वह अभी भी सोचते हैं कि मैं अभिनय छोड़ कर नौकरी कर लूं. वह चाहते हैं कि भविष्य सुरक्षित हो जाए. भारतीय सिनेमा में सबसे बड़ी कमी यह है कि हम कलाकारों को पैसे समय पर नही मिलते और पैसे डूब जाते हैं. कलाकार के तौर पर हमें पैसे बार बार मांगने पड़ते हैं. तो मेरे पापा कहते हैं कि ऐसा काम करने से क्या फायदा काम करो पैसे ना मिले. ’’

फिल्म ‘‘मनमर्जियां’’ को लेकर उत्साहित है पूरी टीम

‘देव डी’ और ‘गैंग आफ वासेपुर’ सहित कई सफल फिल्मों के सर्जक अनुराग कश्यप काफी खुश और उत्साहित हैं. काफी लंबे समय बाद उन्हें खुश होने का यह अवसर मिला है आनंद एल राय की कंपनी ‘‘कलर येलो प्रोडक्शंस’’ के साथ जुड़ने की वजह से. इससे पहले अनुराग कश्यप निर्देशित कई फिल्में बाक्स आफिस पर लगातार असफल होती रही और लोग मानने लगे थे कि अनुराग कश्यप चुक गए हैं.

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मगर जब आनंद एल राय के साथ मिलकर अनुराग कश्यप ने फिल्म‘‘मुक्काबाज’’ का निर्माण व निर्देशन किया, तो इस फिल्म की सफलता ने उनके अंदर एक नई उर्जा का संचार किया. अब वह‘कलर येलो प्रोडक्शंस’ की ही प्रेम कहानी प्रधान फिल्म ‘‘मनमर्जियां’’ निर्देशित कर रहे हैं.

7 सितंबर 2018 को प्रदर्शित करने के हिसाब से बनायी जा रही फिल्म ‘‘मनमर्जियां’’ की कहानी अमृतसर की है. इस संजीदा प्रेम कहानी मे अभिषेक बच्चन, तापसी पन्नू और विक्की कौशल की मुख्य भूमिकाएं हैं. इस फिल्म में अभिषेक बच्चन पगड़ी पहने सरदार की भूमिका में हैं. ‘दिल वही चाहता है, जो वह चाहता है’इस टैग लाइन वाली इस प्रेम कहानी में कई जटिल इमोशंस भी नजर आएंगे.

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‘‘कलर येलो प्रोडक्शंस’’की सीईओ कनुप्रिया कहती हैं- ‘‘अनुराग कश्यप  के साथ हाथ मिलाकर हम काफी रोमांचित हैं. वह संजीदा प्रेम कहानियां पेश करने में माहिर हैं. हमें पता है कि इतने वर्षों में दर्शकों की रूचि भी काफी बदली है. ‘कलर येलो प्रोडक्शंस’और ‘ईरोज’को यकीन है कि हमारी फिल्म ‘मनमर्जियां’ उस दिशा में एक बड़ा कदम है.’’

ईरोज इंटरनेशनल और आनंद एल राय प्रस्तुत फिल्म ‘‘मनमर्जियां’’का निर्माण ‘फैंटम फिल्मस’के साथ मिलकर ‘कलर येलो प्रोडक्शंस’कर रहा है. फिल्म के निर्देशक अनुराग कश्यप, लेखक कनिका ढिल्लों तथा कलाकार हैं- अभिषेक बच्चन, तापसी पन्नू और विक्की कौशल.

लालू प्रसाद यादव की जेल गार्डनिंग

बिहार के महाचर्चित चारा घोटाले का समापन राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव को साढे़ 3 साल की सजा के साथ हुआ जिन्हें हजारीबाग जेल में मालीगिरी का काम सौंपा गया है. अब लालू साढ़े 3 साल जेल की बगिया संजोते क्यारियां बनाएंगे, सागसब्जी और फलफूल लगाएंगे और फिर निराईगुड़ाई भी करेंगे जिस से फसल में खरपतवार न उगे. इन्हीं खरपतवारों में से एक घास भी होती है जिसे चारे के लिए इस्तेमाल किया जाता है.

भा जाए तो जेल गार्डनिंग भी किचन गार्डनिंग की तरह रुचिकर काम है जिस में माली अपने रोपे पौधों को रोज बढ़ते देख खुश होता है. फिर लालू को तो इस बाबत 93 रुपए रोज की दिहाड़ी भी मिलेगी. इस मेहनताने का वे एक अलग सुख भोगेंगे. बस, वे यह ध्यान रखें कि अब कैसे भी हो, चारा न उग पाए और हाईकोर्ट उन्हें रहम खा कर जमानत दे दे.

महंगा है कैंसर का इलाज

रवि प्रकाश के 7 साल के बच्चे को ब्लड कैंसर था. उत्तर प्रदेश के बलरामपुर जिले का रहने वाला रवि प्रकाश पेश से किसान था. गांव में उस की 4 बीघा खेती की जमीन थी. बलरामपुर जिला अस्पताल से वह लखनऊ मैडिकल कालेज बच्चे के इलाज के लिए आ गया. यहां आ कर उसे पता चला कि वह बीपीएल कार्डधारक नहीं है यानी सरकार उसे गरीबीरेखा से नीचे का नहीं मानती, इसलिए उस के बच्चे का ‘कैंसर कार्ड’  नहीं बन सकता. ऐसे में कैंसर के इलाज में सरकार द्वारा मिलने वाली सहायता उस को नहीं मिल सकेगी.

अब रवि प्रकाश के सामने 2 तरह की परेशानियां थीं. एक तो, उसे बच्चे का इलाज कराना था. दूसरे, इलाज के लिए पैसों का इंतजाम करना था. रवि प्रकाश के परिवार में 2 बच्चे और पत्नी थी. दोनों ही बच्चे बड़े थे, स्कूल जाते थे. दोनों के स्कूल का खर्च भी कंधों पर था. पत्नी घर पर रहती थी. सब से छोटे बेटे प्रमोद के इलाज को ले कर पूरा परिवार अस्तव्यस्त हो गया था. रवि प्रकाश अपनी पत्नी के साथ लखनऊ मैडिकल कालेज आ गया था. उस के दोनों बच्चे रिश्तेदारों के भरोसे गांव में थे.

कैंसर का इलाज लंबा चलता है. ऐसे में समय और पैसा दोनों देना पड़ता है. रवि प्रकाश की सब से पहले किसानी प्रभावित हुई. वह समय पर फसल नहीं बो पाया. इस के बाद पैसों की जरूरत को ले कर उस ने अपने खेत गिरवी रख दिए. खेत को गिरवी रखने से मिले पैसों से बेटे का इलाज होने लगा. कुछ दिनों वह मैडिकल कालेज में रहता, फिर उसे गांव जाना पड़ता. जब डाक्टर बुलाता, उसे वापस आना पड़ता. 5 वर्षों के इलाज में रवि प्रकाश पूरी तरह से टूट गया था. अब उसे लगने लगा कि यह बच्चा तो बचेगा ही नहीं, उस के बचाने के चक्कर में जमीन गिरवी चली गई, सो अलग. अब परिवार कैसे चलेगा. अब वह रात में लखनऊ में ही रिकशा चलाने लगा. बच्चे के इलाज में गांव का किसान शहर में मजदूर बन गया. इस के बाद भी बच्चा सही नहीं हो सका.

रवि प्रकाश अकेला नहीं है. कैंसर का महंगा इलाज हर वर्ग के लोगों को तोड़ देता है. इस का कोई अनुमानित खर्च नहीं है. रोग की जांच से ले कर इलाज तक अलगअलग अस्पतालों की अलगअलग फीस है. कीमोथेरैपी, दवाओं का खर्च, दवाओं के शरीर पर होने वाले प्रभाव को दूर करने का इलाज सब की अलगअलग कीमतें होती हैं.

लखनऊ के ही पीजीआई में दिल्ली की एक प्राइवेट कंपनी में काम करने वाले नीरज अपना इलाज कराने आए. नीरज मार्केटिंग विभाग में थे. अच्छी सैलरी पाते थे. नीरज के लिवर में कैंसर था. 35 साल की उम्र में नीरज को कैंसर की खबर ने तोड़ दिया. उस की 10 साल पुरानी नौकरी थी. नीरज ने शुरुआत में दिल्ली में अपना इलाज शुरू कराया. वहां उसे इलाज के लिए छुट्टी लेनी पड़ती थी. शुरुआत में उस की कंपनी से कुछ छुट्टियां मिल गईं. इलाज लंबा चलता देख कंपनी ने छुट्टी देने से मना कर दिया. नीरज को उस की कंपनी ने नौकरी छोड़ने पर मजबूर कर दिया. नौकरी में बचाया पैसा खत्म हो चुका था. पीजीआई में उसे बताया गया कि कम से कम 4 लाख रुपए का खर्च आएगा.

नीरज ने अपने हिस्से का पैतृक आवास बेच दिया. उस से मिले पैसों से अपना इलाज शुरू कराया. अब उस का परिवार किराए के कमरे में रहता था. वहां ही रह कर वह अपना इलाज करा रहा था. 3 वर्षों के प्रयासों के बाद भी नीरज का इलाज पूरा नहीं हो सका. ऐसे में वह जिंदगी की जंग हार गया. नीरज के पीछे उस का 10 साल का बेटा और पत्नी बेसहारा हो गए. पत्नी ने लखनऊ में एक दुकान पर सेल्स का काम करना शुरू किया. आज वह  अपनी और बेटे की परवरिश को ले कर परेशान है. वह कहती है, ‘‘नीरज ने जो भी कमाया और बचाया था, वह सब उस की बीमारी में खर्च हो गया. कैंसर की बीमारी से हम भिखारी हो गए. नीरज को बचा पाए होते तो शायद अफसोस न होता.’’

कैंसर के इलाज में टूटते परिवार

कैंसर के इलाज में टूटते परिवारों की दर्दनाक कहानी का अंत नहीं है. अस्पतालों में ऐसे परिवारों से मिलने के बाद समझ आता है कि कैंसर सिर्फ मरीज के लिए जानलेवा ही नहीं होता, यह पूरे परिवार की खुशियों को छीन भी लेता है है. मरीज के जाने के बाद परिवार सड़क पर बदहाल होता है. उसे समझ नहीं आता के वह अपनी जिंदगी कहां से शुरू करे. लखनऊ के मैडिकल कालेज में कैंसर पीडि़त परिवारों को सही से खाना तक नहीं मिल पाता.

लखनऊ के मैडिकल कालेज में ‘प्रसादम सेवा’ चलाने वाले विशाल सिंह कहते हैं, ‘‘हमारी संस्था कैंसर पीडि़त परिवार वालों के तीमारदारों यानी घर के लोगों को दिन का खाना खिलाने का काम करती है. हमारे पास आए परिवारों को देख कर पता चलता है कि कैंसर की मार केवल बीमार पर नहीं पड़ती, बल्कि पूरा परिवार भुक्तभोगी होता है. हम समाज के सहयोग से रोज 250 लोगों को खाना खिलाने का काम करते हैं. यहां लोग उत्तर प्रदेश, नेपाल, बिहार और बंगाल तक से आते हैं.’’

कैंसर की बीमारी बच्चों से ले कर बड़ों तक किसी को भी हो सकती है. इस के इलाज में नियमित जांच और दवाएं जरूरी होती हैं. इस के साथ ही साथ, मरीज को तनाव से मुक्त रहना, अपने शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाना भी होता है. कैंसर के प्रकार और बीमारी की स्टेज के अनुसार खर्च बढ़ता रहता है. खर्च का अनुमान लगाना संभव नहीं होता है.

सरकार इस के इलाज में सहायता देती है पर यह कुछ मरीजों तक ही सीमित रह जाती है. कैंसर के खिलाफ लड़ाई जीतने में अच्छे इलाज और आत्मविश्वास का बहुत महत्त्व होता है. कैंसर के इलाज में इतना खर्च हो जाता है कि गरीब परिवार तो छोड़ दीजिए, सामान्य परिवार तक टूट जाते हैं.

भारत में लगभग 25 लाख लोग कैंसर से ग्रस्त हैं और हर साल 7 लाख से अधिक नए मामले रजिस्टर होते हैं. सभी प्रकार के कैंसरों में, पुरुषों में मुंह व फेफड़ों का कैंसर और महिलाओं में सर्विक्स व स्तन कैंसर देश में होने वाली सभी संबंधित मौतों में लगभग 50 प्रतिशत के लिए दोषी हैं.

इंडियन मैडिकल एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष डा. के के अग्रवाल ने कहा, ‘‘हमारे देश में कैंसर का फैलाव एकसमान नहीं है. ग्रामीण और शहरी सैटिंग के आधार पर लोगों को प्रभावित करने वाले कैंसर के प्रकार में अंतर है. हम ने देखा है कि ग्रामीण महिलाओं में सर्विक्स कैंसर सब से अधिक व्यापक है, जबकि शहरी महिलाओं में स्तन कैंसर बड़े पैमाने पर है. पुरुषों के मामले में, ग्रामीण लोगों को मुंह का कैंसर प्रमुख रूप से होता है, जबकि शहरी पुरुष फेफड़ों के कैंसर से अधिक प्रभावित होते हैं. कैंसर एक महामारी की तरह बनता जा रहा है.

‘‘विडंबना यह है कि कैंसर की दवाएं बहुत महंगी हैं और आम आदमी की पहुंच से परे हैं. इस प्रकार, कैंसर की दवाइयां किफायती दामों  पर उपलब्ध कराने के लिए मूल्य नियंत्रण बहुत आवश्यक है. कैंसर के शुरुआती निदान को सुनिश्चित करने के लिए सरकार को भी पर्याप्त कदम उठाने चाहिए क्योंकि यह एक सिद्ध तथ्य है कि शीघ्र निदान से कई जानें बचाई जा सकती हैं.’’

कैंसर की प्रमुख जांच

कैंसर की प्रमुख जांच में मैमोग्राफी और पैप स्मियर शामिल होती हैं. मैमोग्राफी में स्तन के तंतु की एक्सरे के जरिए जांच की जाती है. पैप स्मियर जांच को पैपेनिकोला भी कहते हैं. गर्भाशय या सेरविक्स टिशू ले कर इस जांच को किया जाता है. इस के अलावा कैंसर की जांच के लिए शरीर के प्रभावित हिस्से का एक्सरे किया जाता है.

कैंसर का रोग जिस स्थान पर हुआ वह इस बात का मुख्य कारक होता है कि इलाज कैसे होगा? इस के साथ ही साथ मरीज की हालत कैसी है, यह भी महत्त्वपूर्ण होता है. इस के इलाज में रेडियम किरणों का प्रयोग किया जाता है. ये किरणें शरीर के कैंसर कोष को खत्म करने का काम करती हैं.

कैंसर के इलाज में रेडियम का प्रयोग काफी सावधानी से किया जाता है. कैंसर की शुरुआती अवस्था में सर्जरी सब से प्रभावशाली होती है. तब तक कैंसर शरीर में फैला नहीं होता है.

कीमोथेरैपी में कैंसर का इलाज दवाओं द्वारा किया जाता है. कैंसर के इलाज में 50 से अधिक प्रभावशाली दवाओं का प्रयोग किया जाता है. बहुत सारे इलाजों के आने के बाद, कैंसर सौ फीसदी ठीक हो जाएगा, यह नहीं कहा जाता है.

कैंसर से ठीक होने के बाद भी लोग सामान्य जीवन बिताने में लंबा समय ले लेते हैं. महंगा होने के बाद भी कैंसर का इलाज पूरी तरह से ठीक होने वाला नहीं है. यही वजह है कि मरीज तो हाथ से जाता ही है, परिवार भी इलाज के बोझ से कर्जदार हो जाता है, सो अलग.

टीवी व स्मार्टफोन नहीं पेरैंट्स हैं जिम्मेदार

साल के आखिरी महीने यानी दिसंबर 2017 में दिल्ली से सटे गौतमबुद्धनगर के ग्रेटर नोएडा में गौड़ सिटी सोसायटी में 15 वर्षीय किशोर बेटे ने अपनी मां और बहन की सिर्फ इस बात पर हत्या कर दी कि उसे पढ़ाई पर मां की डांट और छोटी बहन को मिल रहे ज्यादा प्यार पर बहुत गुस्सा आता था. जरा सोचिए, क्या एक 15 साल का मासूम मन इतना हिंसक हो सकता है कि अपने ही घर में यह खूनी खेल खेले. सच तो यही है, यही हुआ है. लेकिन सवाल है, क्यों?

पेन स्टेट शेनंगो में मानव विकास और परिवार पर किए गए अध्ययन के सहयोगी प्रोफैसर विलियम मैकग्यूगन के मुताबिक, जो मातापिता अपने बच्चों को नजरअंदाज करते हैं वे बच्चे हिंसक प्रवृत्ति के होते हैं. और यह बात दुनिया के हर देश, हर परिवार व समाज पर लागू होती है. आज परिवार और पेरैंट्स के सामने भी यही समस्या सब से बड़ी बन कर उभरी है कि उन के बच्चे हिंसक होते जा रहे हैं. गौड़ सिटी वाले मामले में भी जाहिर है बच्चे को लगता था कि उस की मां उसे नजरअंदाज करती थी. इस का मतलब उपरोक्त अध्ययन बिलकुल सही इशारा कर रहा है कि अगर बच्चे पेरैंट्स द्वारा नजरअंदाज किए जाएंगे तो इस के परिणाम हिंसक होंगे.

पेरैंट्स की गलती

अभिभावक और बाल मनोवैज्ञानिक तकनीक, स्मार्टफोन और इंटरनैट के सिर सारा दोष यह कह कर मढ़ देते हैं कि जब से ये गैजेट और इंटरनैट बच्चों के हाथ आया है, तभी से बच्चे हिंसक व गुस्सैल होते जा रहे हैं. हो सकता है किसी हद तक यह बात सच हो लेकिन फिर भी यह अधूरा सच होगा क्योंकि जब बच्चे का जन्म होता है और वह धीरेधीरे बढ़ता है तब तक उसे तकनीक और इंटरनैट की दुनिया से कोई वास्ता नहीं होता. लेकिन जब वह खिलौने, चित्र और आवाजें पहचानने लगता है तो अभिभावक उस के साथ समय बिताने के बजाय उसे टीवी के कार्टून्स, इंटरनैट के वीडियो और स्मार्टफोन के संसार से परिचित करा देते हैं. हां, सिर्फ परिचय के लिए ही नहीं कराते, बल्कि दैनिक स्तर पर उन्हें उस की लत लगा देते हैं ताकि उन्हें अपने कामों की फुरसत मिल सके.

जब यह लत बच्चे के मन को घेर रही हो

ती है, उस समय पेरैंट्स यह सोच कर खुश हो रहे होते हैं कि उन का बच्चा मोबाइल में बिजी हैं और उन्हें अपने लिए या औफिस के काम के लिए समय मिल रहा है. हालांकि, जब वे बच्चे के साथ थोड़ा सा समय साथ बिताने के लिए उस से गैजेट छीनना चाहते हैं तब वह रोनेचिल्लाने लगता है. और अब वह उन के बिना खेलने से भी इनकार कर देता है. तब जा कर पेरैंट्स को इस बात का एहसास होता है कि उन्होंने बच्चे को समय न दे कर बड़ी भूल की है.

आत्महत्या और यौनशोषण

जब बच्चों को चिकित्सक या काउंसलर की जरूरत पड़ने लगे तो समझ जाइए कि हालत इस से भी बदतर हो सकती है. मोबाइल गेम्स एडिक्शन उसे हिंसक कृत्यों, आत्महत्या या यौनशोषण का शिकार भी बना सकती है.

अमेरिका में हुई सैंटर्स फौर डिजीज कंट्रोल ऐंड प्रिवैंशन की रिसर्च बताती है कि किशोर उम्र के बच्चों में आत्महत्या की दर 2 दशकों तक गिरने के बाद 2010 से 2015 के बीच बढ़ गई.

ये संकेत बताते हैं कि इंटरनैट, स्मार्टफोन और सोशल मीडिया का बढ़ता इस्तेमाल इस की एक वजह हो सकती है. 17 साल की काइतलिन हर्टी अमेरिका के कोलोराडो हाईस्कूल की सीनियर छात्र है, उस के मुताबिक, ‘‘कई घंटों तक इंस्टाग्राम की फीड को देखने के बाद मुझे मेरे बारे में बहुत बुरा महसूस हुआ, मैं खुद को अलगथलग महसूस कर रही थी.’’ जाहिर है यह अकेलापन ही कई बार अवसाद या आत्महत्या की मनोदशा की ओर ढकेल देता है.

क्लिनिकल साइकोलौजिकल साइंस जर्नल में छपी रिसर्च के आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि 36 फीसदी किशोरों ने अत्यंत निराशा व दुख की अवस्था का सामना करने के साथ ही आत्महत्या पर विचार करने की बात भी मानी. रिसर्च यह साफ करती है कि जो लोग सोशल मीडिया का कम इस्तेमाल करते हैं उन के मुकाबले इन लड़कियों के तनाव में रहने की प्रवृत्ति 14 प्रतिशत ज्यादा दिखाई दी.

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रिसर्च की लेखिका ज्यां ट्वेंगे सैन डिएगो की यूनिवर्सिटी में मनोविज्ञान की प्रोफैसर हैं. उन का कहना है, ‘‘हमें यह सोचना बंद करना होगा कि मोबाइल फोन नुकसानदेह नहीं है. यह कहने की आदत बनती जा रही है कि अरे, ये तो सिर्फ अपने दोस्तों से संपर्क रख रहे हैं. बच्चों के स्मार्टफोन और सोशल मीडिया के इस्तेमाल पर नजर रखना जरूरी है और साथ ही, उसे उपयुक्तरूप से सीमित करना भी.’’

इंटरनैट के सहारे बढ़ता बालशोषण भी एक बड़ी समस्या है. एंटीवायरस मेकर्स कंपनी मैकऐफी की ओर से कराए गए सर्वेक्षण में कहा गया है कि इंटरनैट पर छोटे बच्चों के शिकारी खुलेआम घूम रहे हैं. वे लोग ऐसे बच्चों को बहलाफुसला कर उन से अपना मतलब साधते हैं. इंटरनैट पर दोस्ती बढ़ाने के बाद उन का यौनशोषण किया जाता है और कई मामलों में इसी के जरिए अपहरण भी कर लिया जाता है.

दरअसल, अब बच्चों के पास स्मार्टफोन से ले कर आईपैड तक हैं जिन से सोशल नैटवर्किंग साइटों पर लौगइन किया जा सकता है. बच्चे इन उपकरणों की सहायता से चौबीसों घंटे इंटरनैट से जुड़े रहते हैं. इन सब से बचने के लिए पेरैंट्स को बच्चे के साथ लगातार संवाद बरकरार रखना जरूरी है. वरना, वे वर्चुअल दुनिया में खो कर आत्महत्या या यौनशोषण की ऐसी अंधेरी गली में खो जाएंगे जहां से वापस आना उन के लिए आसान नहीं होगा.

पढ़ने की आदत डालें

इंटरनैट के आगे बेबस होने के बजाय अगर अभिभावक ठान लें तो बच्चों को इंटरनैट के संसार से बाहर कर उन्हें किताबी दुनिया में ला सकते हैं. इस के लिए उन में पढ़ने की आदत विकसित करनी होगी क्योंकि किताबें किसी भी बच्चे के मन को दूषित नहीं करती हैं, न ही भटकाती हैं.

जब पत्रिका और अखबार घर पर बच्चे पढ़ते हैं तो उन्हें सिर्फ सार्थक जानकारियां मिलती हैं और वे रचनात्मक बातें सीखते हैं लेकिन अब मोबाइल हाथ में होने से उन से किताबें व पत्रिकाएं छीन ली गई हैं. अगर अभिभावक चाहें तो उन्हें फिर से किताबों के रोचक संसार से जोड़ सकते हैं. इस से वे सकारात्मक और ज्ञानवर्धक बातें ही सीखेंगे और नुकसानदेह तकनीकी दखल उन की जिंदगी से दूर होगा.

टैक्नो नजर जरूरी

अगर बच्चे गैजेट की दुनिया से बाहर ही नहीं आना चाहते हैं और इंटरनैट के मोह में पूरी तरह फंस चुके हैं तो उन्हें इस से बचाने के लिए आप को टैक्नोसेवी होना पड़ेगा और कुछ सिक्योरिटी फिल्टर लगाने होंगे ताकि वे गलत दिशा में न भटकें. कई बार बच्चे पेरैंट्स को तकनीकी भाषा के जाल में फंसा कर यह समझा देते हैं कि वे स्मार्टफोन पर स्कूल का प्रोजैक्ट या पढ़ाई कर रहे हैं. इसलिए पेरैंट्स भी अपडेट रहें तकनीकी मोरचे पर बच्चों का मार्गदर्शन करने के लिए.

यह बात सच है कि कई बार जानकारियां जमा करने के लिए इंटरनैट की जरूरत पड़ जाती है और अब बच्चे लाइब्रेरी में जा कर इनसाइक्लोपीडिया या मोटीमोटी किताबों में जानकारी खोजने के बजाय एक क्लिक पर हासिल कर लेना ज्यादा समझदारी का काम समझते हैं.

सब से सही तो यह रहेगा कि जब वे गैजेट का इस्तेमाल करें, आप उन के साथ ही बैठें. छोटी आयु के बच्चों को मातापिता या अन्य किसी बड़े पारिवारिक सदस्य के साथ बैठा कर ही सर्फिंग करानी चाहिए और उन को एक निश्चित समय तक ही इन का प्रयोग करने दें. इंटरनैट पर कई तरह के फिल्टरिंग और ब्लौकिंग सिस्टम भी हैं, जिन में सुविधा होती है कि आप ऐच्छिक साइट्स ही खोल सकें और अनचाही व अनुपयोगी वैबसाइट्स सर्फ ही न की जा सकें.

बेशक बच्चों की शैक्षिक यात्रा में आज कंप्यूटर, इंटरनैट और स्मार्टफोन जरूरी टूल्स बन चुके हैं लेकिन जानकारियों के अथाह सागर और मनोरंजन के सोर्स के रूप में इंटरनैट बच्चों के लिए कहीं घातक न हो जाए, इस के लिए तो पेरैंट्स को ही सजग रहना होगा.

हर चीज के अच्छे और बुरे दोनों पहलू होते हैं. अगर अच्छे पहलू को आप फौलो करते हैं, तो आप को उस का सही फायदा मिलता है और अगर बुरे पहलू को फौलो करते हैं, तो नुकसान और भटकाव के अलावा आप को कुछ नहीं मिलता.

आजकल के बच्चों में स्मार्टफोन और सोशल मीडिया की आदत को देखते हुए यह लाइन उन पर बिलकुल फिट बैठती है. अभिभावक होने के नाते अब बेहतरी इसी में है कि बच्चे को समय दें और उन के साथ कदम से कदम मिला कर तकनीकी चुनौतियों का सामना करें.

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वर्चुअल जगत का मनोवैज्ञानिक पहलू

मैंटल हैल्थ व बिहेवियर साइंस से जुड़े विशेषज्ञ भी मानते हैं कि कच्ची उम्र के बच्चे, जो सही और गलत में फर्क नहीं कर पाते, इंटरनैट के जंगल में भटक जाते हैं. स्मार्टफोन में दिखने वाली असीमित सामग्री बच्चों के मन में उथलपुथल पैदा कर देती है. बच्चे व युवा इन जानकारियों का इस्तेमाल रचनात्मक कार्यों में न के बराबर कर पाते हैं और सारा दिन फेसबुक, ट्विटर, स्काइप व सब से गंभीर पोर्नोग्राफिक साइटों को ब्राउज करने में लगे रहते हैं.

कोई क्लास बंक करता है तो कोई औनलाइन गेम खेलने व इंटरनैट ब्राउज करने में समय बिताता है. और तो और, सड़क पर भी वह मोबाइल पर गेम खेलने में व्यस्त रहता है. कई बार तो बच्चे अपने पेरैंट्स के साथ मनोचिकित्सक या डाक्टर के पास जाते हैं तो पता चलता है कि वे तो पूरी तरह वर्चुअल दुनिया में खोए हैं.

पेरैंट्स को समझना चाहिए कि बच्चों को इंटरनैट की दुनिया में धकेलने की गलती उन्होंने की है. और अब चिकित्सक या काउंसलर की जरूरत पड़ी है तो इस के लिए वे ही जिम्मेदार हैं. बेहतर यही है कि बच्चों को मोबाइल से दूर रखें. सप्ताह में एक दिन सिर्फ छुट्टी के दिन ही मोबाइल उन के हाथ में दें. मोबाइल सिर्फ फोन या शब्दकोष की तरह इस्तेमाल हो. बच्चा इंटरनैट पर क्या ब्राउज करता है, उस पर भी नजर रखें. बच्चों को तकनीक का सही इस्तेमाल करना सिखाएं. उन्हें किताबें या कहानियों को पढ़ना सिखाएं.

इंटरनैट व स्मार्टफोन के जंगल

बच्चों के हिंसक प्रवृत्ति के होने का एक पहलू यह भी है कि आजकल के पेरैंट्स ही बच्चों को टीवी, हिंसक गेम्स, स्मार्टफोन की असीमित दुनिया व इंटरनैट के जंगल में भटकने के लिए छोड़ते हैं जिस के परिणाम आज हादसों की शक्ल में सामने आ रहे हैं. कभी वे ब्लू व्हेल्स जैसे हिंसक गेम्स की चपेट में आ कर आत्महत्या कर रहे हैं तो कहीं चैटिंग और पोर्न के जाल में फंस कर अपने मासूम मन के अलावा अपने भविष्य के साथ भी खिलवाड़ कर रहे हैं.

इंटरनैट में लिप्त बच्चों का बचपन रचनात्मक कार्यों की जगह स्मार्टफोन और इंटरनैट के जंगल में गुम हो रहा है. सूचना तकनीक से बच्चे और युवा इस कदर प्रभावित हैं कि एक पल भी वे स्मार्टफोन से खुद को अलग रखना गवारा नहीं समझते. इन पर हर समय एक तरह का नशा सा सवार रहता है. इसे ‘इंटरनैट एडिक्शन डिस्और्डर’ भी कहा जाता है.

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