सफलता की गारंटी नहीं होते ब्यूटी पेजेंट्स

हौलीवुड की सुपरस्टार ऐक्ट्रैस हेली बेरी सब से ज्यादा कमाई करने वाले सितारों की लिस्ट में कई सालों तक टौप पर रहीं. लेकिन उन के बारे में यह बात बहुत कम लोग जानते हैं कि इस जेम्स बौंड गर्ल को साल 1986 की मिस वर्ल्ड की प्रतियोगिता में 6वां स्थान दे कर एक तरह से अयोग्य घोषित कर दिया गया था. जबकि उस साल की विजेता रही मिस वर्ल्ड जिसेले लारोंडे को त्रिनिदाद टोबैगो की पहली मिस वर्ल्ड होने गौरव मिला.

साल 1986 से अब तक करीब 30 साल से भी ज्यादा गुजर चुके हैं. उस साल की मिस वर्ल्ड जिसेले कहीं गुमनामीभरा जीवन जी रही हैं जबकि हेली बेरी आज भी दुनिया में कामयाब सितारा की हैसियत रखती हैं.

इस तुलना का उद्देश्य किसी खास शख्सियत की असफलता को आंकना या किसी को महिमामंडित करने का नहीं, बल्कि यह बताना भर है कि मिस वर्ल्ड, मिस यूनीवर्स, मिस प्लेनेट, मिस अर्थ, मिस इंडिया, मिस एशिया पैसिफिक, मिस इंडिया वर्ल्ड, मिस इंडिया यूनिवर्स जैसी ब्यूटी पेजेंट्स यानी सौंदर्य प्रतियोगिताओं के विजेता होने का मतलब यह नहीं कि अब आप का कैरियर हवाई स्पीड से आसमान को छू लेगा.

ब्यूटी कौंटैस्ट्स की 90 प्रतिशत विजेता महिलाओं का कैरियर किसी खास मुकाम पर नहीं पहुंच सका है जैसा कि उन के जीतने के समय प्रतीत होता है. भारत में भले ही इन सौंदर्य प्रतियोगिताओं को कामयाबी और शोहरत की गारंटी मानने की गलतफहमी हो लेकिन आंकड़े और असलियत कुछ और ही बयां करते हैं.

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रिऐलिटी शो सरीखी है इन की जीत

भारत की ओर से इस साल मिस वर्ल्ड का खिताब जीत कर आईं मानुषी छिल्लर अभी पूरे देश में सितारा बनी हुई हैं. सरकार उन के नाम पर एक के बाद एक इनाम और तोहफों की बारिश कर रही है. निजी कंपनियां कई मौडलिंग असाइंमैंट देने के लिए बेताब हैं और फिल्म इंडस्ट्री  कतार में खड़ी है कि वह मानुषी को फिल्मों में लौंच कर के ही दम लेगी.

लेकिन क्या इतना सबकुछ होने के बावजूद इस बात की गारंटी है कि मानुषी छिल्लर अपनी मौजूदा जीत की कामयाबी और सितारा कद को बरकरार रख पाएंगी? बिलकुल नहीं. ज्यादातर मामलों में तो ऐसा ही देखा गया है. दुनियाभर में जितने भी ब्यूटी पीजेंट हुए हैं उन में ज्यादातर की विजेता बहुत जल्दी ही कामयाबी की लाइमलाइट से बाहर हो गईं जबकि अन्य क्षेत्रों से आई महिलाओं ने ज्यादा नाम व शोहरत कमाई. यह हाल सिर्फ विदेश का ही नहीं, बल्कि भारत समेत दुनिया के हर देश का है.

सच तो यह है कि इन की जीत किसी रिऐलिटी शो सरीखी है जहां बड़े स्तर पर आयोजन होता है. दुनियाभर के दर्शक और जज आप का टैस्ट लेते हैं. जीतने पर एक बड़ी रकम और कुछ दिनों के लिए सुर्खियां मिलती हैं. लेकिन इस के बाद इन विजेताओं का कैरियर किस दिशा में जाता है, इस बात को किस को पड़ी होती है. स्पौंसर्ड कंपनियां, आयोजक और सैटेलाइट चैनल अपना मुनाफा कमा कर चलते बनते हैं और विजेता ग्लैमर व कामयाबी की लाइमलाइट में अंधा हो जाता है. वरना याद कीजिए कितने कौंटैस्ट, रिऐलिटी शोज और टैलेंट कंपीटिशंस के विनर्स अपनी कामयाबी को कायम रख पाए हैं? गिनती के नाम होंगे.

इन टैलेंट शोज की तरह ही मिस वर्ल्ड और मिस यूनीवर्स प्रतियोगिताएं आयोजित होती हैं, बड़ेबड़े सौंदर्य उत्पाद स्पौंसर करते हैं और रंगारंग जलसे में एक देश का प्रतिभागी जीत जाता है. लेकिन उस जीत के बाद उस प्रतिभागी का कैरियर गुमनामी की किस मांद में जा कर दम तोड़ देता है, इस की परवा किसी को नहीं रहती.

कितनी मिस वर्ल्ड व मिस यूनीवर्स कामयाब हैं?

सच को किसी सुबूत की जरूरत नहीं होती. जरा कुछ मिस वर्ल्ड या ब्यूटी पेजेंट्स के कैरियर पर नजर डाल लेते हैं, सब साफ हो जाएगा. अब तक भारत की ओर से कुल 6 महिलाओं ने मिस वर्ल्ड जैसे खिताब अपने नाम किए हैं. वर्ष 1966 में भारत की रीता फारिया पहली मिस वर्ल्ड बनीं. भारत और एशिया की पहली मिस वर्ल्ड होने का गौरव हासिल करने वाली रीता पेशे से डाक्टर हैं. खिताब जीतने के बाद उन से लोगों ने उम्मीदें लगाई थीं कि ये दुनिया में कुछ बड़ा करेंगी लेकिन मैडिकल पेशे को ही अपनाया और शादी कर के आयरलैंड में शिफ्ट हो गईं. बीच के कुछ साल उन्होंने  कुछ ब्यूटी कौंटैस्ट में बतौर जज सक्रियता दिखाई लेकिन आज उन्हें अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर न के बराबर ही देखा जाता है.

फारिया के बाद लगभग 28 साल बाद 1994 में ऐश्वर्या राय ने मिस वर्ल्ड का खिताब जीता. यह वही साल था जब सुष्मिता सेन भी मिस यूनीवर्स बन दुनियाभर में सुर्खियां बटोर रही थीं. लेकिन उस के बाद क्या हुआ. दोनों ने बौलीवुड में कैरियर आजमाया. सुष्मिता सेन का कैरियर कुछ फिल्में करने के बाद खत्म हो गया और अब वे इक्कादुक्का ब्यूटी इवैंट्स में शिरकत करती दिखती हैं जबकि ऐश्वर्या राय बच्चन आज भले ही नामी हस्ती बन गई हैं लेकिन प्रतियोगिता जीतने के बाद उन्हें अचानक से कोई कामयाबी नहीं मिली थी. खिताब जीतने के बाद कई सालों तक वे रीजनल फिल्मों यानी तमिल और तेलुगु में संघर्ष करती रहीं, फिर जा कर उन्हें हिंदी फिल्मों में काम मिला. बौलीवुड में सितारा हैसियत हासिल करने में उन्हें कई साल लग गए. जाहिर है इस में उन की अपनी मेहनत ज्यादा थी, खिताब जीतने की भूमिका कम.

ऐश्वर्या के बाद डायना हेडन ने 1997 में फेमिना मिस इंडिया वर्ल्ड का ताज जीता, और फिर एक ही साल में मिस वर्ल्ड का ताज जीता. ऐसा कर के, वे 1966 व 1994 में रीता फारिया और ऐश्वर्या राय के बाद, मिस वर्ल्ड प्रतियोगिता जीतने वाली तीसरी भारतीय बनीं. लेकिन जितनी तेजी से डायना ने कामयाबी हासिल की, उतनी ही तेजी से कैरियर के मोरचे पर वे औंधेमुंह गिर गईं. फ्लौप फिल्म ‘अब बस’, ‘ओथेलो’ के फिल्मी संस्करण, ‘तहजीब’, ‘बिग बौस’ के बाद वे फिल्म इंडस्ट्री से गायब हो गईं. फिल्म ‘अब बस’ (2004) से  जोरदार वापसी करने की कोशिश की थी. यह फिल्म हौलीवुड की सुपरहिट फिल्म ‘इनफ’ का रीमेक थी. पर इस फिल्म के बाद दर्शकों ने डायना को ही ‘अब बस’ कह दिया. इन दिनों वे किसी एनजीओ से  जुड़ी हैं.

डायना के बाद साल 1999 में युक्ता मुखी ने भी मिस वर्ल्ड का खिताब जीता. खिताब ने युक्ता को बौलीवुड मे एंट्री करने का सीधा रास्ता दिखाया. पर उन की फिल्म ‘प्यासा’ बौक्स औफिस पर एक बूंद पानी को तरस गई और कैरियर वहीं खत्म हो गया. न्यूयौर्क के रईस बिजनैसमैन प्रिंस टूली के साथ शादी रचा ली, थोड़े ही समय बाद युक्ता ने अपने पति प्रिंस टूली पर मारपीट करने और अप्राकृतिक यौनसंबंध बनाने का आरोप लगा कर पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराई है. खैर यह मामला तलाक पर जा कर खत्म हुआ.

वर्ष 2000 में प्रियंका चोपड़ा (मिस वर्ल्ड) और लारा दत्ता (मिस यूनीवर्स) ने इस खुशी को दोहराया. प्रियंका चोपड़ा ने भी कई सालों का संघर्ष और रिजैक्शन झेला और फिल्मी कैरियर बनाया, वरना साल 2000 में ही खिताब जीतते वे स्टार बन जातीं. उन के साथ ही मिस यूनीवर्स रहीं लारा दत्ता ने प्रियंका के साथ ही फिल्म ‘अंदाज’ से कैरियर स्टार्ट किया और वे अब ‘सिंह इज ब्लिंग’ जैसी फिल्म में सहयोगी भूमिकाएं करने की मजबूर हैं. जाहिर है कैरियर औसत रहा उनका.

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अन्य ब्यूटी पेजेंट्स भी ढाक के तीन पात

मिस वर्ल्ड खिताबों से परे अन्य ब्यूटी पेजेंट्स की बात करें तो यहां भी बहुत कम सुंदरियां हैं जिन्होंने अपने कैरियर में कुछ उल्लेखनीय किया, वरना सब खिताब के जीत के बोझ तले दब गईं. अभिनेत्री सेलिना जेटली को देख लीजिए, साल 2001 में फेमिना मिस इंडिया यूनिवर्स चुनी गईं, उस के बाद फिल्मों में ‘जानशीन’ से डैब्यू किया और कुछेक फिल्मों के बाद घरगृहस्थी संभालने को मजबूर हैं. मिस इंडिया वर्ल्ड 2010 मनस्वी मामगई,  मिस इंडिया इंटरनैशनल नेहा हिंगे का नाम भी अब कहां सुनने को मिलता है. साल 2000 में दीया मिर्जा  फेमिना मिस इंडिया में मिस एशिया पैसिफिक बनीं. उस के बाद वे मिस एशिया पैसिफिक भी चुनीं गईं. बाकी की कहानी सब को पता है.

फिल्म, राजनीति और विवाद भी काम न आए

गुल पनाग ने 1999 में मिस इंडिया का खिताब जीता और मिस यूनिवर्स में वे टौप टैन में आईं. बाद में मिस इंडिया गुल पनाग ने ‘मनोरमा सिक्स फीट अंडर’, ‘हैलो’, ‘धूप’ जैसी फिल्मों में काम किया. कहानी वही पुरानी. फिल्मों से राजनीति में आईं. आम आदमी पार्टी के साथ जुड़ीं और एक अन्य अभिनेत्री किरण खेर से जा भिड़ीं. लेकिन असफलता ही हाथ लगी उन के. फिलहाल शौर्ट फिल्में कर कैरियर की गाड़ी किसी तरह खींच रही हैं.

गुल पनाग की तरह पूर्व मिस इंडिया नफीसा अली ने भी 2005 में दक्षिण कोलकाता से चुनाव लड़ा. लेकिन वे हार गईं. उन्होंने फिर 2009 में समाजवादी पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ने की घोषणा की. लेकिन इस के बाद वे फिर से कांग्रेस पार्टी से जुड़ गईं और सोनिया गांधी से सपा के टिकट पर चुनाव लड़ने के लिए माफी भी मांगी.

नफीसा अली ने कई बौलीवुड फिल्मों में काम किया. लेकिन कभी पहली कतार की सफल अभिनेत्रियों में उन का नाम नहीं आया.

मधु सप्रे ने 1992 में मिस यूनिवर्स कौंटैस्ट में भारत का प्रतिनिधित्व किया. इस प्रतियोगिता में वे तीसरे स्थान पर रहीं. एक समय मौडलिंग जगत में उन के खूब चर्चे हुए थे एक विवादास्पद विज्ञापन में मिलिंद सोमन के साथ नग्न फोटोशूट को ले कर. फिलहाल, असफल कैरियर के साथ मधु सप्रे इटली में रह रही हैं और कभीकभी रैंप पर भी दिख जाती हैं.

मनप्रीत बरार ने 1995 में मिस इंडिया का खिताब जीता. मिस यूनिवर्स प्रतियोगिता में वे दूसरे स्थान पर रहीं. मेहर जेसिया ने 1986 में मिस इंडिया का खिताब जीता. उन्होंने फिल्म अभिनेता अर्जुन रामपाल से शादी की. इन का कैरियर भी मौडलिंग जगत तक सीमित रहा.

कई बार असफलता से भी ज्यादा बुरा हश्र हुआ है ब्यूटी पेजेंट्स का. मसलन, नफीसा जोसफ ने 12 साल की उम्र में मौडलिंग की दुनिया में कदम रखा और मिस इंडिया के मुकाम तक पहुंचीं. 2007 में मुंबई के अपने मकान में शादी टूटने की वजह से उन्होंने आत्महत्या कर ली.

2002 में मिस इंडिया चुनी गईं नेहा धूपिया, 2003 में मिस इंडिया का खिताब जीतीं. निकिता आनंद 2008 में मिस इंडिया वर्ल्ड चुनी गईं. पार्वथी ओमनाकुट्टन नायर 15 साल की उम्र में मिस इंडिया यूनिवर्स (1965) चुनी गईं. इन सब ने मौडलिंग व फिल्मी क्षेत्र में हाथ आजमाए लेकिन असफल रहीं. 2004 में फेमिना मिस इंडिया चुनी गईं सयाली भगत, 2004 में मिस इंडिया कौंटैस्ट जीत चुकीं तनुश्री दत्ता का भी ऐसा ही हश्र हुआ.

ग्लैमर बनाम संघर्ष और मेहनत

ऐसा नहीं है कि ब्यूटी पेजेंट्स में भाग लेने और जीतने वाली प्रतिभाशाली नहीं होतीं, इसीलिए कैरियर के मोरचे पर उतनी कामयाब नहीं हो पातीं. दरअसल, हर कामयाब इंसान के पीछे उस का संघर्ष, रिजैक्शन, धैर्य और सूझबूझ का हाथ होता है. जो इन सब से गुजर कर मंजता है वह ही कामयाबी की लंबी पारी खेलता है.

लेकिन इन ब्यूटी पेजेंट्स में किसी भी प्रतियोगी विजेता को रातोंरात इतना बड़ा स्टार बना दिया जाता है कि उसे संघर्ष की अहमियत ही समझ नहीं आती. घर बैठे ही ढेरों औफर्स की लाइन लग जाती है और कम समय में बिना किसी मेहनत व संघर्ष से जब काम आता है तो सहीगलत का चुनाव करने की सोच मंद पड़ जाती है. यही कुछ शुरुआती गलत फैसले स्टारडम की शुरुआती झलक दिखा कर इन्हें असफलता की राह पर ढकेल देते हैं. इसीलिए कई मौडल और ऐक्ट्रैस ने ब्यूटी खिताब तो खूब जीती होती हैं लेकिन अपनी जीत को वे कामयाब कैरियर में तबदील करने में पूरी तरह से चूक जाती हैं.

बहुत कम होती हैं जो प्रियंका चोपड़ा, ऐश्वर्या राय या हेली बेरी की तरह लंबा संघर्ष कर सफलता हासिल करती हैं. ज्यादातर खिताबी ग्लैमर और स्टारडम के नशे में चूर हो कर संघर्ष और रिजैक्शन का सामना नहीं कर पातीं और नतीजतन, आरंभिक चमकदमक के बाद की उन की जिंदगी अपेक्षाकृत गुमनामी या असफलता की डगर में गुजरती है. आने वाली पीढ़ी और लड़कियों को सलाह है कि जो ऐसे दावे करते हैं कि एक बार ब्यूटी प्रतियोगिता जीत गए तो आप का कैरियर सैट हो जाएगा, उन की न सुनें. हर प्रतियोगिता में भाग लें और जीतें लेकिन कामयाबी के मूलभूत सिद्धांतों को अनदेखा न करें.

कैसे होता है चयन

मिस इंडिया प्रतियोगिता विश्व सौंदर्य प्रतियोगिता में शिरकत करने वाली भारतीय सुंदरियों का चयन करती है. इस प्रतियोगिता से 3 सुंदरियों को चुना जाता है जो मिस वर्ल्ड, मिस इंटरनैशनल और मिस अर्थ में भारत का प्रतिनिधित्व करती हैं. शुरूशुरू में इस तरह का कोई नियम नहीं था कि मिस इंडिया एक ही साल में मिस यूनिवर्स और मिस वर्ल्ड प्रतियोगिता में भाग नहीं ले सकती. लेकिन बाद में जब फेमिना ने मिस इंडिया चुनने का जिम्मा संभाला तो इस में तबदीली की गई. अब इस प्रतियोगिता के विनर को मिस यूनिवर्स और रनरअप को मिस वर्ल्ड कौंटैस्ट में भेजा जाने लगा.

रोचक तथ्य

  • 1995 से मिस इंडिया प्रतियोगिता में एक विनर चुनने का रिवाज समाप्त हो गया. यहां से 3 विनर चुनने की प्रथा शुरू हुई. अब तीनों ही विनर को बराबर की प्राइज मनी और ईनाम मिलते हैं. और इन्हें मिस इंडिया वर्ल्ड, मिस इंडिया यूनिवर्स और मिस इंडिया अर्थ का नाम दिया जाता है.
  • मिस यूनिवर्स प्रतियोगिता में इंदरानी रहमान भारत का प्रतिनिधित्व करने वाली पहली महिला थीं. भारत ने पहली बार 1953 में मिस यूनिवर्स प्रतियोगिता में शिरकत की.
  • मिस वर्ल्ड प्रतियोगिता में भारत ने पहली बार 1959 में भाग लिया. फ्लेयूर इजेकियल मिस वर्ल्ड प्रतियोगिता में शिरकत करने वाली पहली भारतीय थीं.
  • अब तक भारत ने दुनिया को सर्वाधिक मिस वर्ल्ड दिए हैं. इस मामले में भारत वेनेजुएला की बराबरी पर है. भारतीय सुंदरियों ने 1966, 1994, 1997, 1999 और 2000 व 2017 में मिस वर्ल्ड प्रतियोगिता जीती है.
  • भारत की ओर से मिस वर्ल्ड प्रतियोगिता के लिए 1963, 1964, 1965 और 1967 में किसी प्रतियोगी को नहीं भेजा गया.
  • दिसंबर 2009 में दक्षिण अफ्रीका के जोहांसबर्ग में संपन्न हुए मिस वर्ल्ड प्रतियोगिता में प्रियंका चोपड़ा जज के रूप में शामिल हुईं.
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पैरों में दर्द हो तो लापरवाही न बरतें

आप ने अकसर अपने मित्रों, पड़ोसियों व रिश्तेदारों को पैरों में दर्द होने की शिकायत करते सुना होगा. कुछ लोगों के पैरों में दर्द चलने से शुरू हो जाता है. जब वे चलना बंद कर देते हैं तो विश्रामावस्था में पैरों से दर्द गायब हो जाता है और दोबारा चलने से फिर वही दर्द उभरता है. कभीकभी बुजुर्ग लोग अकसर पैरों में दर्द होने की शिकायत करते हैं.

कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जिन के पैरों में दर्द चलने से कम हो जाता है पर लेटने पर दर्द की तीव्रता बढ़ जाती है. अगर आप डायबिटीज के मरीज हैं या धूम्रपान, सिगरेट, बीड़ी व हुक्का के आदी हैं या फिर तंबाकू और उस से बने पदार्थों जैसे जर्दायुक्त पान मसाला, खैनी, चैनी, मैनपुरी या जाफरानी पत्ती के आदी हैं और साथ ही साथ पैरों में दर्द को ले कर परेशान हैं तो होशियार हो जाइए, वरना देरसवेर पैर गंवाने पड़ सकते हैं.

अकसर लोगों को यह भ्रम रहता है कि मधुमेह का पैरों से कोई संबंध नहीं है, मधुमेह का रोग सिर्फ हृदय से संबंधित है. उसी तरह से धूम्रपान के आदी लोग यह  समझते हैं कि धूम्रपान से सिर्फ फेफड़ों को नुकसान पहुंचता है और कैंसर हो सकता है. पर लोग यह नहीं जानते कि धूम्रपान के आदी व तंबाकू के व्यसनी लोगों में पैरों में गैंगरीन होने का खतरा हमेशा मंडराता रहता है. डायबिटीज का मरीज अगर धूम्रपान भी करता है या तंबाकू का सेवन करता है तो वह वही कहावत हो गई, ‘करेला वो भी नीम चढ़ा.’ मधुमेह व धूम्रपान दोनों मिल कर पैरों का सत्यानाश कर देते हैं. इसलिए, टांगों व पैरों को स्वस्थ व क्रियाशील रखने के लिए इन दोनों पर अंकुश रखना अत्यंत आवश्यक है.

पैरों में दर्द क्यों

अपने देश में पैरों में दर्द होने का सब से बड़ा कारण टांगों की रक्त धमनियों की बीमारी है. ये रक्त धमनियां पैरों को औक्सीजनयुक्त शुद्ध खून की सप्लाई करती हैं जिस से पैर अपना कार्य सुचारु रूप से कर सकें और आवश्यकता पड़ने पर शुद्ध खून की ज्यादा मात्रा पैरों को उपलब्ध करा सकें. पर जब ये रक्त धमनियां किसी वजह से शुद्घ रक्त की आवश्यक मात्रा टांगों को नहीं पहुंचा पाती हैं तो टांगों में चलने से दर्द शुरू हो जाता है, क्योंकि चलने से या पैरों का व्यायाम करने से शुद्ध औक्सीजन की मांग अचानक बढ़ जाती है जो रुग्ण धमनी पूरा नहीं कर पाती है.

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डायबिटीज व धूम्रपान टांगों में दर्द के बड़े कारण

पैरों की रक्त धमनी के ठीक से काम न करने के कई कारण होते हैं, जैसे मधुमेह रोग जिस में रक्त धमनी की दीवारों पर लगातार चरबी व कैल्शियम जमा होने लगता है जिस से रक्त प्रवाह बाधित हो जाता है. रक्त धमनी के बीमार होने का दूसरा कारण धूम्रपान व तंबाकू का सेवन है. तंबाकू में एक रासायनिक तत्त्व निकोटिन पाया जाता है जो धमनी की छोटीछोटी शाखाओं में सिकुड़न ला देता है और पैर को जाने वाले रक्त प्रवाह को काफी हद तक कम कर देता है. अगर डायबिटीज व धूम्रपान के मरीज को पैर में दर्द होना शुरू हो जाए तो बिना किसी देरी के वैस्क्युलर का कार्डियो वैस्क्युलर विशेषज्ञ से परामर्श लें और रक्त धमनी की जांच करवाएं.

वेन्स का रोग भी पैरों में दर्द का कारण

पैरों में दर्द उभरने का दूसरा मुख्य कारण वेन्स यानी शिरा का रोग है. जब टांगों को रक्त धमनियों द्वारा पहुंचाया गया शुद्ध खून औक्सीजन देने के बाद अशुद्घ हो जाता है तो यही वेन्स दोबारा से उस अशुद्ध खून को फेफड़े तक पहुंचाने का काम करती हैं या फिर दूसरे शब्दों में कहें तो पैरों में ड्रैनेज सिस्टम का निर्माण करती हैं.

जब किसी वजह से ये वेन्स खून को टांगों से ऊपर फेफड़े की तरफ नहीं पहुंचा पाती हैं तो ये अशुद्ध खून टांगों व पैरों में इकट्ठा होना शुरू हो जाता है और जब इन शिराओं के रोग से पीडि़त मरीज चलता है तो इकट्ठे हुए अशुद्ध खून की मात्रा और बढ़ जाने की वजह से पैरों में दर्द व थकान शुरू हो जाती है. इन शिराओं के रोगों में सब से बड़ा कारण सीवीआई यानी क्रोनिक वेन्स इन्सफीशिएंसी का रोग है. इस रोग में अशुद्ध खून ऊपर की ओर चढ़ता तो है लेकिन शिराओं के अंदर स्थित कपाटों के कमजोर होने की वजह से चढ़े हुए खून की कुछ मात्रा फिर से नीचे आ जाती है और यही कारण है कि इकट्ठे हुए अशुद्ध खून की मात्रा बढ़ जाने का.

वेरिकोस वेन्स भी पैरों में दर्द पैदा कर सकती हैं

पैरों में दर्द होने का एक महत्त्वपूर्ण कारण टांगों की वेरिकोस वेन्स हैं. वेरिकोस वेन्स आज के आधुनिक युग में टांगों पर कहर बरपा रही हैं. जैसेजैसे विलासिता और आरामतलबी के नएनए रास्ते ढूंढ़े जा रहे हैं. वैसेवैसे टांगों में वेरिकोस वेन्स विविध रूपों में प्रकट हो रही हैं. इस की शुरुआत नीले रंग वाली मकड़ी के जालेनुमा रूप में शुरू होती है. ये मकड़ी के जाले शुरुआती दिनों में जांघ पर या घुटने के पीछे पाए जाते हैं. अगर समय पर सावधानी न बरती गई तो उचित परामर्श के अभाव में ये विकराल रूप धारण कर लेती हैं और अंत में इस की परिणति टांगों में गहरे काले निशान व लाइलाज घाव के रूप में होती है. अगर ज्यादा देर बैठने से पैर दर्द व भारीपन महसूस होने लगता है और पैरों में नीले रंग की नसें दिखने लगें तो तुरंत किसी वैस्क्युलर सर्जन से परामर्श ले लें.

शिराओं में खून का जमाव

पैरों में दर्द होने का तीसरा कारण शिराओं यानी वेन्स के अंदर खून के कतरे जमा हो जाना है, जिस की वजह से शिराओं का काफी हिस्सा पूरी तरह से बंद हो जाता है, रक्त के ऊपर चढ़ने की क्रिया बाधित हो जाती है. भारतीयों में लापरवाही की वजह से ये खून के कतरे स्थायी रूप से शिराओं में अपना डेरा बना लेते हैं और पैरों में बराबर दर्द बना रहता है. ऐसी परिस्थितियों में टांगों व पैरों में दर्द तो बना ही रहता है, साथसाथ टांगों व पैरों में सूजन भी आ जाती है. इसलिए टांगों के दर्द से पीडि़त मरीज हाथ पर हाथ धर कर न बैठें और समय रहते किसी जनरल सर्जन या हड्डी विशेषज्ञ के बजाय किसी वैस्क्युलर व कार्डियो वैस्क्युलर सर्जन को दिखाएं.

कभीकभी वृद्धावस्था में पैरों की मांसपेशियों में अकड़न यानी क्रैम्स होते हैं जो विशेषतया रात के समय उभरते हैं और टांगों में दर्द होता है. कभीकभी घुटने में औस्टियो आर्थ्राइटिस या घुटने की झिल्ली में सूजन यानी साइनोवाइटिस की वजह से भी चलने में टांगों में दर्द होता है.

टांगों में दर्द होने पर कहां जाएं

टांगों में दर्द होने पर किसी जनरल सर्जन या हड्डी विशेषज्ञ के बजाय किसी वैस्क्युलर सर्जन से परामर्श लें और उन की निगरानी में रक्त धमनियों या शिराओं की जांच कराएं. इन की जांचों के लिए डौपलर स्टडी, एमआर वीनोग्राम, एमआरआर्टिरियोग्राफी व एंजियोग्राफी, डिजिटल सब्ट्रैक्शन एंजियोग्राफी की जरूरत पड़ती है. इसलिए ऐसे किसी अस्पताल में जाएं जहां किसी वैस्क्युलर सर्जन की चौबीसों घंटे उपलब्धता हो व इन सब जांचों की सुविधा हो, क्योंकि इन सब जांचों के आधार पर ही इलाज की सही दिशा तय होती है.

पैरों में दर्द के लिए अगर रुग्ण धमनियां जिम्मेदार हैं तो पैरों में रक्त प्रवाह को फिर बहाल करने के लिए कई सारी विधाओं का सहारा लेना पड़ता है, जैसे धमनी पुनर्निर्माण, धमनी बाईपास व एंजियोप्लास्टी, स्टेटिंग. अगर टांग में दर्द का कारण शिराओं का रोग है तो वौल्व पुनर्निर्माण, धमनी बाईपास व एंजियोप्लास्टी, स्टेटिंग. अगर टांग में दर्द का कारण शिराओं का रोग है तो वौल्व पुनर्निर्माण व वेन्स बाईपास सर्जरी का सहारा लेना पड़ता है. शिराओं के रोग में ज्यादातर मामलों में अन्य तरकीबें, जैसे क्रमित दबाव जुराबें, न्यूमेटिक कौंप्रैशन डिवाइस व कुछ विशेष व्यायाम व आसन लाभदायक होते हैं.

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रौबिनहुड बनने के चक्कर में

दिल्ली के बेहद पौश माने जाने वाले महारानी बाग निवासी गौरव कुमार बिजनैस के सिलसिले में सिंगापुर गए हुए थे. कोठी में उन की पत्नी स्वाति अकेली ही थीं. साफसफाई का काम करने वाली मार्गरिटा 23 मई, 2017 को बैडरूम की सफाई कर रही थी तो उसे लगा कि बैडरूम की खिड़की का शीशा अपनी जगह से थोड़ा हटा हुआ है. देख कर ही लगता था कि किसी ने शीशे को बाहर से खोलने की कोशिश की थी.

मार्गरिटा ने यह बात स्वाति को बताई तो उन्होंने भी शीशे को गौर से देखा. सचमुच खिड़की का शीशा अपनी जगह से हटा हुआ था. उन्होंने अन्य नौकरों को बुला कर दिखाया तो सभी ने एक राय से कहा कि कुछ गड़बड़ जरूर है. स्वाति ने नौकरों की मदद से कोठी के सामान की जांच की तो सब कुछ अपनी जगह था.

गौरव कुमार का औफिस कोठी में ही था. औफिस के रिसैप्शन पर रखी सेफ में काफी कैश रखा रहता था. स्वाति ने सेफ खोली तो उस में रखे करीब 3 लाख रुपए और 250 यूएस डौलर गायब थे. स्वाति ने फोन कर के यह बात पति को बताई तो उन के कहने पर स्वाति ने तुरंत कपड़े बदले और मार्गरिटा तथा अन्य नौकरों को साथ ले कर थाना न्यू फ्रैंड्स कालोनी जा पहुंची.

थानाप्रभारी सुशील कुमार से मिल कर उन्होंने अपनी कोठी पर घटी वारदात के बारे में बताया. थानाप्रभारी ने मामले को गंभीरता से लेते हुए ड्यूटी अफसर को केस दर्ज करने का आदेश दे दिया.

ड्यूटी अफसर ने इस मामले को भादंवि की धारा 457, 180 के अंतर्गत दर्ज कर लिया. तत्पश्चात इस केस की जांच एएसआई सुरेश कुमार को सौंप दी गई. सुरेश कुमार शाम को महारानी बाग स्थित गौरव कुमार की कोठी पर गए. उन्होंने घटनास्थल का मुआयना करने के साथ स्वाति से पूछताछ की. स्वाति ने उन्हें बैडरूम में ले जाकर वह खिड़की भी दिखाई, जिस का शीशा हटा कर चोर बैडरूम में दाखिल हुआ था.

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सुरेश कुमार ने उस खिड़की को गौर से देखा, जिस का शीशा बड़ी सफाई से हटा कर चोर अंदर आया था. उसे देख कर सुरेश कुमार को समझते देर नहीं लगी कि चोरी करने वाला काफी शातिर था. उन्होंने फोन कर के क्राइम टीम को बुला लिया और सारे सबूत जुटाए. क्राइम टीम ने चोर के फिंगरप्रिंट्स तथा पैरों के निशान भी उठाए. इस काररवाई के बाद सुरेश कुमार थाने लौट आए.

उन्होंने अपनी रिपोर्ट थानाप्रभारी सुशील कुमार को दे दी. थानाप्रभारी ने इस घटना की सूचना वरिष्ठ अधिकारियों को दी. चोरी का यह मामला दिल्ली जैसे महानगर के लिए कोई बड़ा तो नहीं था, लेकिन चूंकि इस तरह के कई मामले अन्य थानों में लगातार दर्ज हुए थे, इसलिए महत्त्वपूर्ण भी था और अपराध के नजरिए से गंभीर भी.

इस घटना की सूचना मिलने के बाद दक्षिणपूर्वी दिल्ली के डीसीपी रोमिल बानिया ने इस केस को हल करने की जिम्मेदारी औपरेशन सेल के एसीपी के.पी. सिंह को सौंप कर चोरों को जल्दी से जल्दी पकड़ने का आदेश दिया.

एसीपी के.पी. सिंह ने चोरों को पकड़ने के लिए दिल्ली के दक्षिणपूर्वी जिले के स्पैशल स्टाफ के इंसपेक्टर राजेंद्र सिंह, एसआई प्रवेश कसाना, एएसआई दयानंद, हैडकांस्टेबल नरेश कुमार और दयानंद की एक टीम बनाई. वह खुद भी टीम के साथ उन चोरों की तलाश में जुट गए, जो दक्षिणपूर्वी दिल्ली की पौश कालोनियों में चोरियां कर रहे थे. इन चोरों के निशाने पर कोठियां ही होती थीं.

इंसपेक्टर राजेंद्र सिंह अपनी टीम के साथ महारानी बाग स्थित स्वाति की कोठी पर पहुंचे और उन से सारी जानकारी ली. अपना बयान दर्ज कराने के दौरान स्वाति ने उन्हें एक मोबाइल फोन देते हुए बताया कि यह फोन उन्हें बैडरूम में मिला था. हो सकता है, यह फोन उसी चोर का हो, जिस ने उन के यहां चोरी की थी.

मोबाइल फोन को देख कर राजेंद्र सिंह को लगा, इस से उन की राह आसान हो गई है. वह सैमसंग कंपनी का कीमती मोबाइल फोन था. मोबाइल एसआई प्रवेश कसाना को सौंप कर राजेंद्र सिंह कोठी के अन्य नौकरों से पूछताछ की. इस के बाद वह अपनी टीम के साथ वापस लौट आए.

मोबाइल नंबर की काल डिटेल्स निकलवा कर जांच की गई तो पता चला कि वह मोबाइल फोन इरफान नाम के किसी व्यक्ति का था. उस के दूसरे नंबरों के बारे में पता कर के उन्हें सर्विलांस पर लगा दिया गया. एसआई प्रवेश कसाना यह देख कर हैरान थे कि चोर न केवल बारबार अपना नंबर बदल रहा था, बल्कि वह अपना मोबाइल फोन भी कुछ ही दिनों में बदल देता था.

राजेंद्र सिंह ने चोर के ठिकाने का पता लगाने की जिम्मेदारी एसआई प्रवेश कसाना को सौंप रखी थी. वह उस चोर के बारे में पता करने के लिए रातदिन एक किए हुए थे. आखिर जुलाई के पहले सप्ताह में उन्होंने चोर का पता लगा ही लिया. उस का नाम इरफान ही था और वह बिहार के जिला सीतामढ़ी के गांव जोगिया का रहने वाला था. उस समय उस की लोकेशन उस के गांव की ही मिल रही थी.

6 जुलाई को स्पैशल स्टाफ की यह टीम बिहार के जिला सीतामढ़ी पहुंची और स्थानीय पुलिस की मदद से इरफान को उस के घर से गिरफ्तार कर लिया. थाने ला कर उस से पूछताछ की गई तो उस ने न्यू फ्रैंड्स कालोनी सहित दिल्ली में हुई कई अन्य चोरियों का अपराध स्वीकार कर लिया.

8 जुलाई को सीतामढ़ी की अदालत में पेश कर के इरफान को ट्रांजिट रिमांड पर दिल्ली लाया गया और दिल्ली की साकेत अदालत में पेश कर के चोरी का सामान बरामद करने के लिए उसे 7 दिनों के पुलिस रिमांड पर लिया गया. रिमांड अवधि के दौरान इरफान से की गई पूछताछ और चोरी के सामानों की बरामदगी की जो कहानी सामने आई, वह काफी दिलचस्प थी—

रफान उर्फ उजाला उर्फ आर्यन खन्ना बिहार के जिला सीतामढ़ी के थाना पुकरी के छोटे से गांव जोगिया का रहने वाला था. उस के परिवार में अब्बा मोहम्मद आबिद, मां रेहाना तथा 2 भाई सलमान और गुलफाम थे. गांव में इरफान का छोटा सा मकान था. पूरा परिवार उसी में रहता था. पिता की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी. गांव में मेहनतमजदूरी कर के वह किसी तरह परिवार को पाल रहे थे. जहां घर का खर्चा ही मुश्किल से चल रहा हो, वहां आबिद अपने बच्चों को पढ़ानेलिखाने की कहां से सोचता. उस के तीनों बेटे स्कूल तो गए, पर 8वीं से ज्यादा कोई नहीं पढ़ सका.

गरीबी की मार ने इरफान और उस के भाइयों को कमउम्र में ही रोजीरोटी की तलाश में घरपरिवार छोड़ कर बाहर जाने को मजबूर कर दिया. एकएक कर के तीनों भाई मांबाप को छोड़ कर नौकरी की तलाश में दिल्ली आ गए.

सब से पहले सलमान दिल्ली आया. वह बैग और पर्स बनाने का काम करने लगा. दिल्ली में पैर जमाने के बाद उस ने छोटे भाई गुलफाम को भी अपने पास बुला लिया. दोनों भाई दिल्ली से घर रुपए भेजने लगे तो घर की आर्थिक स्थिति कुछ संभल गई. धीरेधीरे सब कुछ ठीक हो गया. इस के बाद एकएक कर के तीनों भाइयों की शादियां भी हो गईं.

सब से छोटा इरफान गांव में ही बीवी के साथ रहता था. वह वहीं छोटामोटा काम कर के और बड़े भाइयों की मदद से अपना गुजारा कर रहा था. लेकिन जब वह एक बेटी का बाप बना तो जिम्मेदारी बढ़ने से वह भी गांव छोड़ कर दिल्ली चला आया और भाइयों के साथ बैग, लेडीज पर्स और बटुए बनाने का काम सीख कर काम करने लगा.

इरफान के ही गांव का सलीम भी दिल्ली में रहता था. ये सभी दिल्ली के तुर्कमान गेट में रहते थे. एक ही गांव के होने के कारण कुछ ही दिनों में सलीम और इरफान में गहरी दोस्ती हो गई. दोनों अपनी कोई भी बात एकदूसरे से नहीं छिपाते थे.

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इरफान ने कुछ दिनों तक तो बैग, पर्स आदि बनाने का काम किया, उस के बाद उस ने सलीम के साथ मिल कर बाहरी दिल्ली के बवाना में बैग और पर्स की दुकान खोल ली. दोनों ने इस उम्मीद से दुकान खोली थी कि इस से उन्हें ठीकठाक कमाई होगी, लेकिन 2 साल तक दुकान चलाने के बाद फायदा होने की कौन कहे, उन्हें काफी नुकसान हो गया. मजबूरन उन्हें दुकान बंद करनी पड़ी.

इस बीच इरफान एक और बच्ची का बाप बन गया था. खर्चा बढ़ गया था, जबकि कमाई का साधन खत्म हो गया था. वह घर रुपए नहीं भेज पाया तो परेशान हो कर उस की पत्नी दोनों बेटियों को उस के हवाले कर के मायके चली गई. इरफान दोनों बेटियों को मां को सौंप कर दिल्ली चला आया.

इरफान का दोस्त सलीम काम करने के अलावा छोटीमोटी चोरियां भी करता था, लेकिन वह कभी पकड़ा नहीं गया. उस ने इरफान को भी चोरी करने की सलाह दी. इरफान को थोड़ा डर तो लगा, लेकिन और कोई रास्ता न देख वह सलीम के साथ चोरी में किस्मत आजमाने के लिए तैयार हो गया. सलीम ने उसे चोरी के सारे गुर बता दिए.

उस के पास मोटरसाइकिल थी, जिस से वह ऐसे घरों की तलाश में निकलता था, जिस में रहने वाला परिवार कहीं बाहर गया होता था. इरफान उस घर में घुसता और सारा माल समेट कर कुछ दूरी पर इंतजार कर रहे सलीम को फोन कर देता. सिगनल मिलते ही वह उसे लेने पहुंच जाता. कुछ घरों में चोरी करने के बाद जब इरफान के हाथ काफी रकम और सोने के गहने लगे तो उन्हें बेच कर दोनों ठाठ की जिंदगी जीने लगे. अब दोनों की लाइफस्टाइल भी बदल गई थी.

इरफान बचपन से ही कपड़ों का शौकीन था. वह फिल्मी हीरो जैसे कपड़े पहनना चाहता था, लेकिन पैसों के अभाव में उस का यह शौक पूरा नहीं हो रहा था. लेकिन जब चोरी से पैसे आए तो सब से पहले उस ने ब्रांडेड कपड़े, महंगा स्मार्ट फोन और घूमने के लिए नई मोटरसाइकिल खरीदी. यही नहीं, पत्नी तो थी नहीं, इसलिए वह बाजारू लड़कियों के साथ अय्याशी करने लगा. उसे कोई रोकनेटोकने वाला था नहीं, इसलिए उस के मन में जो आता, वह वही करता था.

इरफान और सलीम ने चोरी को ही अपनी कमाई का जरिया बना लिया था. यह सौ फीसदी मुनाफे का धंधा था. चूंकि वे दोनों कभी पकडे़ नहीं गए, इसलिए उन की हिम्मत बढ़ती गई. इरफान काफी खुश था. वह जब भी गांव जाता, काफी बनठन कर जाता. उस के हावभाव और शाही खर्च देख कर गांव वाले हैरान थे. सभी को यही लगता था कि इरफान बहुत बड़ा बिजनैसमैन है. गांव वालों की नजरों में खुद को बड़ा आदमी दिखाने के लिए वह गांव वालों की भलाई के काम करने लगा. उस ने कई गरीब लड़कियों की शादी कराई, गांव में बीमार लोगों के इलाज के लिए हेल्थ कैंप लगवाए.

इरफान द्वारा किए गए कामों से घरघर में उस की चर्चा होने लगी. जिस का उस ने इलाज करवाया, जिन गरीबों की बेटियों की शादियां करवाईं, उन की नजर में वह भगवान तो नहीं, लेकिन वे उसे उस से कम भी नहीं मानते थे.

वह गांव में अकसर नेताओं की तरह कुरतापैजामा पहनता था, जबकि दिल्ली में अपटूडेट शहरी बन कर रहता था. उस ने दिल्ली में अपने लिए कार भी खरीद ली थी और शाहीन बाग में किराए का मकान भी ले लिया था.

उसे बेटियों की पढ़ाई की चिंता हुई तो उन का दाखिला दिल्ली के किसी अच्छे स्कूल में कराने के लिए वह उन्हें दिल्ली ले आया. लेकिन काफी प्रयास के बाद भी किसी अच्छे स्कूल में उन का दाखिला नहीं हो सका. मजबूर हो कर वह उन्हें अपनी मां के पास गांव छोड़ आया.

इरफान दिलफेंक और अय्याश युवक था. अय्याशी के लिए वह दिल्ली और मुंबई के डांस बारों के चक्कर लगाने लगा. अगर कभी उसे किसी डांसर से अपनी पसंद का गाना सुनना होता तो इस के लिए वह 10-20 हजार रुपए देने से भी पीछे नहीं हटता था.

वह लाखों रुपए दोस्तों और लड़कियों पर खर्च कर देता था. रुपयों के लालच में दिल्ली ही नहीं, मुंबई में भी उस की कई गर्लफ्रैंड थीं. जिन से वह अलगअलग समय पर मिल कर मौज करता था.

2 साल पहले उस की मुलाकात आगरा की रेशमा से हुई थी. वह अपनी छोटी बहन शबनम के साथ बिहार के दरभंगा में प्रोग्राम देने गई थी. इरफान भी वहां गया था. इरफान ने रेशमा और शबनम के एकएक ठुमके पर हजारों रुपए लुटा दिए थे. उस के ठाठबाट और शाही खर्च देख कर रेशमा उस पर मर मिटी.

प्रोग्राम खत्म होने के बाद रेशमा इरफान से मिली. इस मुलाकात में इरफान भी रेशमा को दिल दे बैठा. रेशमा भोजपुरी फिल्मों में छोटेमोटे रोल भी करती थी. इस के बाद इरफान कई बार रेशमा के साथ मुंबई गया, जहां दोनों ने खूब सैरसपाटे किए. इरफान के रुपए खत्म हो जाते तो वह चोरी करने दिल्ली आ जाता. एक बार उस ने जालंधर में भी चोरी की थी.

22 मई की रात को उस ने महारानी बाग के बिजनैसमैन गौरव कुमार की कोठी में चोरी की. माल समेटने के दौरान उस का मोबाइल गिर गया, जिस से सुराग लगा कर स्पैशल स्टाफ की टीम उस के गांव जा पहुंची और उसे गिरफ्तार कर लिया.

पुलिस ने उस की निशानदेही पर 250 ग्राम सोना बरामद किया है. उस के साथ धर्मेंद्र को भी गिरफ्तार किया गया है. इरफान चोरी का सारा सामान उसे ही बेचता था.

रिमांड अवधि खत्म होने पर इरफान को दिल्ली की साकेत की अदालत में पेश किया गया, जहां से उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक वह जेल में था.

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बहुमंजिली इमारतें और सरकार की योजना

देश के शहरों में ऊंचे मकानों के बारे में सरकार अब एक सकल योजना पर विचार कर रही है. सरकार का विचार है कि बजाय शहरों को चारों ओर फैलाने के, उन्हें ऊंचा करना ठीक होगा ताकि कम जमीन पर ज्यादा लोगों को बसाया जा सके. आजकल ज्यादातर शहरों में एक या दोमंजिले मकान ही हैं और हाल ही में 4 मंजिलों की इजाजत दी गई है.

यूरोप के देशों में सदियों से 4-5 मंजिले मकान बनाने का रिवाज रहा है और वहां ही लिफ्ट ईजाद की गई थी. लकड़ी के बहुमंजिले मकान चीन व जापान में बहुत बनते थे पर हमें, वास्तु का पंडिताई ज्ञान चाहे हो, वास्तुकला का व्यावहारिक ज्ञान नहीं था और ऊंचे मकान बनाना खतरे से खाली न था.

देश की अव्यवस्था का आलम यह है कि मकान की जमीन मालिक की है पर पुलिस, कौर्पोरेशन, बैंक और अब पर्यावरण सुरक्षा, पुरातत्त्व सुरक्षा वाले भी उस पर जमने लगे हैं. नतीजा यह है कि मकान गांवों में बनते हैं जहां वे बेतरतीब होते हैं और कुछ सालों में स्लम सा बन जाते हैं और जहां सड़कें न के बराबर होने की वजह से जाने के लिए घंटों लगते हैं.

ऊंचे मकान हों तो लोग 5-6 मंजिल उतर कर पैदल ही दफ्तरों तक पहुंच सकते हैं. पटरी बनाने की लागत सड़क, बस, ट्रेन और मैट्रो बनाने की अपेक्षा बहुत कम होती है. नागरिकों को साफ हवापानी मिले, इस के लिए बनाए गए ज्यादातर नियम गले की हड्डियां बने हुए हैं. नागरिकों को अपने फैसले खुद लेने ही नहीं दिए जा रहे.

जहां बहुमंजिली इमारतें बनी हैं, जैसे मुंबई, वहां वर्षों तक रिहायशी मकानों की कमी नहीं थी और सड़कों पर भीड़ भी नहीं थी. 1947 तक मुंबई की सड़कें 4-5 मंजिलों वाले मैरीन ड्राइव, बैलार्ड एस्टेट, कोलाबा, फोर्ट एरिया में साफ, बिना एन्क्रोचमैंट वाली थीं. जब देशी शासक आए तो उन्हें हर लहर को गिनने के बहाने ऊपरी कमाई के अवसर ढूंढ़ने थे और इसीलिए बहुमंजिले मकानों पर रोक लगी.

शहरों, छोटीबड़ी बस्तियों में ऊंचे मकानों की इजाजत हमेशा होती तो सड़कों पर आज की तरह की भीड़ न होती. लोग गाडि़यां खरीदते ही नहीं. एक मकान में 100 घर होते तो भाईचारा ज्यादा रहता. बच्चों को दोस्त मिलते, बुढ़ापे में अकेलापन न महसूस होता.

ऊंची बिल्ंिडगों की लागत शुरू में चाहे ज्यादा हो, आखिरकार वे फायदेमंद ही होंगी. सरकार को खुलेमन से इन नियमों में ढील देनी चाहिए. सिवा सीवर के प्रबंध करने के सरकार को कहीं कोई बंदिश नहीं लगानी चाहिए. धूप व हवा की जरूरत से ज्यादा उस से बचने के लिए छत जरूरी है. यह तभी संभव है जब सरकार सारे नियम वापस ले और जनता को अपने ऊपर छोड़ दे.

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तो इस एक्टर को डेट कर रही हैं नेहा कक्कड़

बौलीवुड में अक्सर अफेयर की खबरें आती रहती हैं. सेलेब्स एक दूसरे के साथ वक्त बिताते हैं, उन्हें अपना हमसफर बनाना चाहते हैं पर ना जाने किस वजह से दुनिया के सामने अपने जिंदगी से जुड़े इस खास इंसान को जग जाहिर करने से डरते हैं. बौलीवुड इंडस्ट्री में तो जैसे चुपके चुपके प्यार करने का ट्रेंड सा बन गया है. जब सेलेब्स कई जगहों पर साथ दिखने लगते हैं, तब उनके साथ रहने की खबरें पुख्ता होने लगती है.

चुपके चुपके प्यार करने वालो की लिस्ट में अब एक और नाम जुड़ गया है. ये नाम कोई और नहीं बल्कि बौलीवुड की फैमस स्‍टार सिंगर नेहा कक्‍कड़ का है. हाल ही में नेहा कक्कड़ के रिलेशन का भी खुलासा हो गया है. मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो नेहा कक्कड़ एक्टर हिमांश कोहली को डेट कर रही हैं. नेहा अक्सर ही अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर हिमांश के साथ फोटो शेयर करती रहती हैं.

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हिमांश फिल्म ‘यारियां’ से फेमस हुए थे. नेहा ने इस फिल्म का गाना ‘ब्लू है पानी पानी’ गाया था. यह गाना काफी हिट भी हुआ था. नेहा और हिमांश की अफेयर की खबरों ने तब और जोर पकड़ा जब किस डे के मौके पर गाल पर किस करते हुए नेहा ने हिमांश के साथ फोटो पोस्‍ट की थी. साथ ही दोनों ने टेडी डे भी सेलीब्रेट किया था. हिमांश ने नेहा को बहुत बड़ा टेडी गिफ्ट किया था. नेहा ने हिमांश के बर्थडे पर उन्हें सोशल मीडिया पर विश किया था. वहीं हिमांश ने भी एक पोस्ट लिखा था, ‘मुझे याद नहीं कि मैंने पिछली बार कब इतना एंज्वाय किया था. यह लड़की किसी को भी पागल बना सकती है.’

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बता दें इंस्टाग्राम पर हिमांश के 47 हजार फौलोवर हैं वहीं नेहा कक्कड़ के फौलोवर की संख्या 90 लाख है. जब नेहा के फौलोवर 90 लाख हुए थे तो हिमांश ने उन्हें बधाई दी थी. वहीं जब हिमांश के गाने ‘मुसाफिर’ को 5 करोड़ व्यूज मिले थे तो नेहा ने उन्हें विश किया था.

नेहा इनदिनों अपने रिलेशनशिप की खबरों के अलावा अपने एक वीडियो को लेकर भी चर्चा में हैं, जिसमें वे मलयाली एक्ट्रैस प्रिया प्रकाश वारियर की कौपी कर रही हैं. इस वीडियो को लोग बेहद पसंद कर रहे हैं. इस वीडियो को देखकर तो ऐसा ही लग रहा है जैसे नेहा सोशल मीडिया पर हिमांश से अपने प्यार का इजहार कर रही हों.

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नेहा की प्रोफेशनल लाईफ की बात करें तो वे इन दिनों यंगस्टर्स की पसंद बनी हुई हैं. कुछ दिनों पहले ही उनका गाना ‘छोटे-छोटे पैग’ रिलीज हुआ था जो काफी वायरल भी हुआ. इसके अलावा ‘मिले हो तुम हमको, माही वे, नैना’ उनके काफी हिट गाने रहे हैं.

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विदेशी पूंजी निवेश और व्यापारियों की दशा

केंद्र सरकार ने कुछ क्षेत्रों में 49 प्रतिशत तक विदेशी पूंजी निवेश किए जाने की अनुमति दी है. यह उस अनुमति से अलग है जिस में विदेशी कंपनियां विदेशी पूंजी के साथ भारत में पूरी तरह व्यापार व उत्पादन कर सकती हैं.

सिद्धांत के अनुसार किसी देश को अपनी भौगोलिक सीमाएं आर्थिक लेनदेन के लिए बंद नहीं करनी चाहिए. जब तक विश्व व्यापार है, तैयार सामान आए, पूंजी आए, निवेश आए, फैक्टरियां आएं, दुकानें आएं, सब एकसमान हैं. एक जगह का सामान सदियों से बहुत दूर तक बिकता रहा है. मोहनजोदड़ो की मुहरें अरब व यूरोप के देशों तक में मिली हैं. विश्व व्यापार भाईचारा, दोस्ती तो बढ़ाता ही है, यह तकनीक के अदलबदल का रास्ता भी खोलता है. इस पर किसी तरह का बंधन गलत है.

कठिनाई यह है कि जब लंबे समय तक आप व्यापार के एक ढर्रे के आदी हो चुके हों और बाहर के पैसे वाले व्यापारियों को देश में व्यापार करने के लिए खुली छूट दे दी जाए जो लंबे समय तक इंतजार करने को और हानि उठाने को तैयार हैं, तो देशी व्यापारी बेमौत मर जाएगा. भारतीय व्यापारी बहुत थोड़ी सी पूंजी पर काम करता है. 90 प्रतिशत व्यापारी कम पढ़ेलिखे हैं. वे बहीखाता तक नहीं बना सकते. उन्हें पत्र लिखना भी नहीं आता. इन्हें उन लोगों के सामने खड़ा कर दिया जाता है जिन के पास तकनीक है, हुनर है.

चूहे बड़ेबड़े दरवाजे काट देते हैं पर एक बिल्ली के आते ही वे मारे जाते हैं. भारतीय व्यापारी भी ऐसे ही हैं जो अपने ग्राहकों व उत्पादकों की अज्ञानता का लाभ उठा कर सस्ता व घटिया सामान बेचते हैं जबकि पैसे पूरे वसूल करते हैं. वे विदेशी कंपनियों के आगे टिक ही नहीं पाएंगे. विदेशी गाडि़यां आने से बिड़ला की ऐंबैसेडर गाड़ी गायब हो गई जबकि बिड़ला समूह विशाल है, पैसे वाला है.

आज कितने ही देशों से कल तक के जानेमाने देशी उत्पाद गायब हो गए हैं. विदेशी कंपनियां खुदरा व्यापार आदि में आएंगी तो देश का व्यापारी, जो पहले ही जीएसटी व नोटबंदी की मार से कराह रहा है, और ज्यादा रोने लगेगा. उस का विनाश हो जाएगा. व्यापार का यह एक तरह से ब्राह्मणीकरण है जिस में पंडों ने विदेशी व्यापारी को प्रमुखता दी है क्योंकि वह मोटा चढ़ावा चढ़ा रहा है. भारत सरकार के अफसर और नेता सोचते हैं कि उन के बेटेबेटी विदेशी कंपनियों में काम करेंगे तो उन्हें ज्यादा पैसे मिलेंगे, देशी व्यापारियों के यहां काम करेंगे तो दुत्कारे जाएंगे.

आज व्यापारिक फैसले देश का व्यापारी वर्ग नहीं ले रहा, वे नेता और अफसर ले रहे हैं जो व्यापारियों को वर्णव्यवस्था के अनुसार निचले स्तर पर रखते हैं.

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‘लड़कियों को न्यूड सीन के लिए मजबूर किया जाता है’

जानी-मानी फिल्म अदाकारा सिएरा पेटन ने खुलासा किया है कि कैसे करियर की शुरुआत कर रही लड़कियों को न्यूड सीन करने के लिए मजबूर किया जाता है. एक खबर के मुताबिक, सिएरा जब महज 18 साल की थीं, तब उन्हें साल 2007 में आई फिल्म ‘फ्लाइट औफ फ्यूरी’ में मशहूर अभिनेता स्टीवन सीगल के साथ काम करने का मौका मिला था.

रोमानिया में प्रोफेशनल एक्टिंग जौब के रूप में यह उनकी पहली फिल्म थी. इस फिल्म की शूटिंग के दौरान सेट पर जाने से पहले न तो फिल्म के प्रोड्यूसर और न ही एजेंट ने उन्हें फिल्म की स्क्रिप्ट दिखाई थी. सिएरा ने पहली बार स्क्रिप्ट हवाई जहाज में पढ़ी थी. इस स्क्रिप्ट को पढ़ने के बाद उन्होंने पाया कि उसमें एक ऐसा सीन है, जिसमें अभिनेत्री को नहाने के बाद नग्नावस्था में बाहर आते हुए दर्शाया जाएगा.

इस पर बात करते हुए सिएरा ने कहा, “मैं बहुत अचंभित हो गई थी और मेरी प्रतिक्रिया ऐसी थी कि ‘यह मेरा किरदार है’. मेरे दिल ने धड़कना शुरू कर दिया था.” रिपोर्ट के मुताबिक, सिएरा सेट पर किसी को नहीं जानती थीं और उस समय उनके पास इतने पैसे भी नहीं थे कि वे इंटरनेशनल फोन कर किसी अपने से बात कर सकें.

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सिएरा ने फैसला किया कि उन्हें हार नहीं माननी है और कामयाबी के शिखर को छूना है. सिएरा ने हिम्मत जुटाई और उन्होंने स्टीवन सीगल के ट्रेलर में जाकर उनसे संपर्क किया. फिल्मों में आने का अवसर देने के लिए सीगल का शुक्रिया अदा करने के बाद सिएरा ने उनसे कहा कि उन्हें न्यूड सीन के बारे में नहीं बताया गया था और यह सीन करने में वे असहज हैं.

सिएरा की बात सुनने के बाद सीगल ने उन्हें बाहर भेज दिया और कुछ पुरुषों को अपने ट्रेलर में बुलाया. इसके बाद अभिनेता ने सिएरा से बातचीत करने के लिए उन्हें फिर से बुलाया. सभी के सामने उन्होंने कहा कि क्या सच में यह न्यूड सीन नहीं कर रही हैं? क्या ये केवल अपना टौप नहीं निकाल सकती? वहां मौजूद अन्य लोगों में से किसी एक व्यक्ति ने कहा, “तुम जानती हो, तुम्हें इसके लिए हायर करने के लिए हमने अपनी गर्दन तक को दांव पर लगा रखा है.”

अभिनेत्री के अनुसार, फिल्म और टीवी जगत में न्यूड सीन्स को करने के लिए अभिनेत्रियों को मजबूर किया जाता है. अभिनेत्रियों को गाली-गलौच से लेकर धमकियों तक का सामना करना पड़ता है. दिसम्बर 2017 के एक खबर के अनुसार, मशहूर अभिनेत्री सलमा हायेक ने कहा था कि प्रोड्यूसर हार्वे वींस्टन ने उन्हें धमकी दी थी कि वे 2002 में आई फिल्म ‘फ्रीडा’ का प्रोडक्शन बंद कर देंगे, अगर वे एक अन्य महिला के साथ पूरी तरह से न्यूड होकर सेक्स सीन नहीं करेंगी. इसी तरह अभिनेत्री साराह जेसिका पार्कर और डेबरा मेसिंग ने भी एक अन्य प्रोड्यूसर पर इसी तरह के आरोप लगाए थे.

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बोल्ड सीन्स से चर्चाओं में हैं उर्वशी

बौलीवुड को नई बोल्ड अदाकारा मिल गई है. हेट स्टोरी 4 में बोल्ड सीन्स देने वाली उर्वशी इन दिनों काफी सुर्खियां बटोर रही हैं. उर्वशी ने हाल ही में रिलीज हुई अपनी फिल्म हेट स्टोरी 4 में काफी हौट और बोल्ड सीन्स किये हैं, जिसकी वजह से हर कोई उनकी अदाओं का दिवाना हो गया है.

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इस फिल्म में अपने बोल्ड किरदार की वजह से चर्चा में आई उर्वशी के बारे में बहुत सी दिलचस्प जानकारियां लोगों को नहीं पता है, जैसे कि वो एक राष्ट्रीय स्तर की खिलाड़ी भी रह चुकी हैं. आइए जानते हैं उर्वशी के बारे में ऐसी ही कुछ दिलचस्प बातें…

उर्वशी मूल रूप से उत्तराखंड की हैं. वह एक्टिंग से पहले स्पोर्ट्स में थी. उन्होंने स्पोर्ट्स में भी काफी नाम कमा चुकी हैं. बता दें कि उर्वशी नेशनल बास्केटबौल प्लेयर रह चुकी हैं. नेशनल लेवल की एथलीट से एक्ट्रेस बनीं उर्वशी कई स्पोर्ट्स मैग्जीन की कवरगर्ल भी रह चुकी हैं.

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बेहद मासूम नजर आने वाली उर्वशी अब ग्लैमरस गर्ल बन चुकी हैं. उर्वशी ने एक इंटरव्यू में इस बात का भी खुलासा किया था कि एक्टिंग करियर में एंट्री करने को लेकर उनके दोस्तों और परिवार का दबाव हमेशा से उनपर रहा है. मिस इंडिया रह चुकी उर्वशी, हनी सिंह के गाने लव डोज में भी नजर आ चुकी हैं.

ब्यूटी विद ब्रेन मानी जाने वाली उर्वशी ने खुद इस बात का जिक्र एक इंटरव्यू में किया था कि वह साइंस स्टूडेंट थीं और उन्होंने IIT का एग्जाम भी पास कर लिया था.

बता दें कि उर्वशी ने अपने करियर की शुरुआत सनी देओल की फिल्म ‘सिंह साहब द ग्रेट’ से की थी. उसके बाद वह  कई सारी फिल्मों जैसे ‘ग्रेट ग्रैंड मस्ती’, ‘सनम रे’ में नजर आईं.

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मी टू को न बनाएं इतना बड़ा इश्यू

औस्कर अवार्ड विजेता हौलीवुड निर्देशक हार्वे वेंस्टीन ने जब यह स्वीकार किया कि एक अभिनेत्री द्वारा लगाए गए आरोप सही हैं तब बहुत सारी दूसरी औरतें भी ‘मी टू’ यानी मैं भी शिकार हूं कहने के लिए खड़ी हो गईं. अमेरिका के समाज में महिलाओं ने भले ही यह स्वीकार कर खुलेआम इस अभियान को चलाया हो पर भारत में अभी कोई भी खुल कर इस विषय में बात नहीं करना चाहता.

भारत में मी टू कैंपेन को चलाने वाली महिलाओं की संख्या कम है. औफ द रिकौर्ड बात करने वाली महिलाओं की संख्या अधिक है. फिल्मों और फैशन की दुनिया में बात करने पर पता चलता है कि यहां के हालात अभियान से कहीं अधिक गंभीर हैं. यहां मी टू को इश्यू बनाना उतना सरल भी नहीं है. यह कई तरह की बाधाएं खड़ी करने वाला अभियान हो सकता है. शायद यही वजह है कि भारत में इस अभियान को लोगों ने स्वीकार नहीं किया है.

मी टू के जरिए सभ्य समाज की पोल खुल रही है. सफल महिलाएं तक यह बता रही हैं कि उन को भी कभी न कभी मी टू का शिकार होना पड़ा है. मी टू का मतलब छेड़छाड़ से सैक्स तक की घटनाओं से जुड़ा है. असल में मी टू के लिए पढ़ेलिखे और अनपढ़ जैसी कोई सीमारेखा नहीं है. पहले इन बातों को लोग छिपाते थे, अब इन को बताने लगे हैं. कहा यह जा रहा है कि मी टू जैसे कैंपेन से महिलाओं से छेड़छाड़ की घटनाएं रुकेंगी. अमेरिका जैसे देश में जहां छेड़छाड़ को छिपाया नहीं जाता वहां भी ऐसी घटनाएं घट रही हैं.

भारत से ले कर अमेरिका तक मी टू अभियान में ज्यादातर मामले फिल्मी दुनिया के ही आ रहे हैं. कुछ मामले महिला खिलाडि़यों के हैं. हौलीवुड के प्रख्यात फिल्म निर्माता हार्वे वेंस्टीन के खिलाफ महिलाओं के यौन उत्पीड़न के मामले सुर्खियों में हैं. बताया जाता है कि वेंस्टीन फिल्म अभिनेत्रियों को मजबूर करते थे.

अमेरिका के ओहायो सुप्रीम कोर्ट के जज ने अपने बयान में कहा कि उन के 50 से अधिक महिलाओं से संबंध रहे हैं. जज बिल ओ नील ने फेसबुक पर यह शेयर किया था. नील ने बताया कि उन के पिछले 50 सालों में 50 बेहद सुंदर महिलाओं से यौनसंबंध रहे हैं. 70 साल के जज नील ने 2 महिलाओं के नाम लिख कर इस बात का जिक्र किया था. नील ने लिखा कि इन खूबसूरत 50 महिलाओं में निजी सचिव से ले कर विधायक यानी सीनेटर तक शामिल हैं. नील ने एक सीनेटर को अपना पहला और सगा प्यार बताया. नील के इस बयान की बाद में आलोचना भी हुई. तब नील ने माफी भी मांगी.

अमेरिका से अलग नहीं भारत के हालात

अमेरिका में पिछले दिनों यौनशोषण के कई मामले सामने आए. इन में अमेरिका के कई जानेमाने नाम सामने आए. जिन दिनों अमेरिका में ये नाम उभरे, भारत में मी टू अभियान सामने आया. भारत में कई अभिनेत्रियों ने इस मुहिम का हिस्सा बनते हुए बताया कि वे भी मी टू की शिकार हुई हैं. असल में भारत में इस बात को केवल सुर्खियों में बने रहने के लिए प्रयोग किया गया. यही वजह है कि इसे छेड़छाड़ तक ही सीमित रखा गया.

भारत की फिल्मी दुनिया से ले कर राजनीति और दूसरे हलकों में ऐसे किस्से दबी जबान से कहेसुने जाते रहे हैं. फिल्मी दुनिया में इसे ‘कास्ंिटग काउच’ और कंप्रोमाइजिंग का नाम दिया गया. यहां हीरो ही नहीं, फिल्मों के निर्माता और निर्देशक पर ऐसे आरोप लगे. फिल्मों में काम देने के बहाने यौन संबंधों के लिए दबाव बनाया गया.

खुलेआम इस तरह की घटनाओं पर कम ही लोग खुल कर बोलते हैं. ज्यादातर ऐसे बयान तब ही सामने आते हैं जब कोई आपराधिक घटना घट जाए या फिर वादा कर के उस को पूरा न किया जाए. केवल फिल्मों में ही नहीं, राजनीति में भी ऐसी घटनाओं की लंबी लिस्ट है. यौनशोषण से शुरू हुई घटनाएं अकसर हत्या जैसी जघन्य अपराधों में बदल जाती हैं.

उत्तर प्रदेश में मधुमिता हत्याकांड और कविता चौधरी हत्याकांड इस के प्रत्यक्ष उदाहरण रहे हैं. कई दूसरे नेताओं के महिला नेताओं से संबंध चर्चा का विषय रहे हैं. यह बात और है कि हमारे देश में इसे खुल कर स्वीकार नहीं, किया जाता, छिपाने का प्रयास किया जाता है. जिस के कारण हत्या जैसी जघन्य घटनाएं घट जाती हैं.

भारत में जब सोशल मीडिया पर मी टू अभियान की शुरुआत हुई तो बहुत सारी महिलाएं सामने आईं. 2006 में शुरू हुए इस अभियान को 15 अक्तूबर, 2017 को अलाइशा मिलानो ने इसे फिर से चर्चा में ला दिया. इस अभियान से लोग जुड़े जरूर, पर केवल दिखावा भर के लिए.

धर्म का असर

यौनशोषण की घटनाएं भारत में हर तरफ होती हैं. इन की चर्चा नहीं होती. इस पर बात करते हुए बिहार की राजधानी पटना की एक अभिनेत्री कहती है, ‘‘हमारे जीवन पर धर्म की कहानियों का बहुत असर है. गौतम की पत्नी अहल्या से छल करने वाले इंद्र के बजाय अहल्या को ही दोष दिया गया है. उसे ही पत्थर बनना पड़ा है. आज भी पुरुष का कोई दोष नहीं माना जाता है.

‘‘अहल्या ही नहीं, सीता को भी देखें, तो यही घटना सामने आई. सीता को अग्निपरीक्षा देने के बाद भी समाज से बाहर निकलना पड़ा. ये कहानियां आज भी दिलोदिमाग पर हावी हैं. इन सब से यहां औरत को ही गलत माना जाता है. इसी वजह से शोषण का शिकार होने के बाद भी कोई औरत अपनी बात कहना नहीं चाहती. उसे इस बात का डर होता है कि ऐसे मामले सामने आने के बाद लोग उसे काम देना बंद कर देंगे.’’

पटना की रहने वाली यह अभिनेत्री टीवी सीरियलों में काम करने मुंबई आई थी. यहां आ कर उस के सामने ऐसे प्रस्ताव आने लगे कि जब तक समझौता नहीं करोगी, रोल नहीं मिलेंगे. वह कहती है, ‘‘प्रोड्यूसर से ले कर हीरो तक इस चाहत में रहते हैं. ऐसे कलाकारों की ही सिफारिश करते हैं जो उन के साथ संबंध बनाने में राजी हों.’’

हिंदी सिनेमा में यह कोई चर्चा का विषय नहीं रह गया है. मी टू अभियान में ये अपनी बात क्यों नहीं कहतीं? इस सवाल पर नाम न छापने की शर्त पर वह कहती है, ‘‘मी टू का शिकार तो बहुत हैं. सच कहेंगी तो काम नहीं मिलेगा, कैरियर के सभी रास्ते बंद हो जाएंगे.’’

भोजपुरी फिल्मों की 2 प्रमुख अभिनेत्रियों से बात की तो वे बोलीं, ‘‘भोजपुरी फिल्मों की हालत सब से अधिक खराब है. यहां छोटेछोटे शहरों की लड़कियां काम करने आती हैं. पैसे से भी वे उतना मजबूत नहीं होतीं और परिवार के लोग उन का साथ नहीं देते. ऐसे में काम करना उन की मजबूरी हो जाती है.’’

इन दोनों ने बताया कि भोजपुरी फिल्मों में हीरो अपनी जोड़ी बना कर काम करते हैं. जो लड़की समझौता करती है उस की सिफारिश की जाती है. जो लड़की समझौते के लिए तैयार नहीं होती, उस के साथ काम करने से मना कर दिया जाता है. यही वजह है कि नई लड़कियां यहां कम आती हैं. ऐसी आवाज उठाने वाली लड़कियों के काम करने के रास्ते बंद हो जाते हैं.

घटते अवसर

लड़कियों की सुरक्षा के लिए काम कर रही समाजसेवी विनीता ग्रेवाल कहती हैं, ‘‘एक ऐसी ही घटना की शिकार लड़की हमारी संस्था में आई. हम ने उस की कांउसलिंग कर के एक शौप पर नौकरी में रखवा दिया. इस बात की जानकारी एक समाचारपत्र में छपी तो शौप के मालिक को यह पता चल गया.

‘‘नतीजतन, उस ने लड़की को उस का वेतन दिया और आगे न आने के लिए कह दिया. जब हम ने इस बारे में पूछा तो उस ने बहाना बना दिया. दूसरी लड़कियों ने बताया कि जब दुकानदार को यह पता चला कि लड़की इस तरह की घटनाओं को तूल दे देती है तो उस ने उसे जौब से हटाने का फैसला ले लिया. उसे लगता था कि ऐसी लड़की से शौप की इमेज खराब हो जाती है.’’

विनीता ग्रेवाल ने एक लड़की को ब्यूटीपार्लर चलाने के लिए शौप किराए पर दिलाई. मकानमालिक को जैसे ही इस बात का पता चला कि लड़की इस तरह से विवादों में उलझी है, उस ने दुकान देने से मना कर दिया. विनीता कहती हैं, ‘‘हमारे समाज में लोग ऐसी लड़कियों से दूर रहना चाहते हैं जो मी टू घटनाओं का शिकार होती हैं. इस तरह की शिकार लड़कियों को ही गलत माना जाता है. यही वजह है कि समाज में बहुत सारी घटनाओं के घटने के बाद भी महिलाएं सामने आ कर कुछ कहने से बचती हैं.’’

यह बात केवल आम लोगों की नहीं है. संसद में जब महिला सुरक्षा बिल पास हो रहा था, कई नेताओं ने इस बात के तर्क दिए कि इस तरह का बिल आने के बाद लड़कियों के लिए काम के अवसर कम हो जाएंगे. यह चिंता गलत नहीं थी. कौर्पोरेट वर्ल्ड में अघोषित पौलिसी बन गई, जिस में  लड़कियों की जौब औफिस वर्क के लिए ही होने लगी. टूरिंग जौब से लड़कियों को दूर किया जाने लगा.

एक कंपनी की एचआर मैनेजर ने बताया कि टूर के समय अगर 2 या 3 लड़के हैं तो वे एक रूम में रह लेंगे. काम के समय देर को ले कर कोई परेशानी नहीं होगी. लड़की के होने से कंपनी को काम से ज्यादा चिंता लड़की की रखनी पड़ती है. लड़की की शिकायत पर कंपनी की छवि तो खराब होती ही है, उसे कानूनी दांवपेंच में भी फंसना पड़ता है. ऐसे में एचआर का प्रयास यह होने लगा कि लड़की के बजाय काम करने के लिए लड़कों को ही रखा जाए. इस से लड़कियों के सामने कैरियर के औप्शंस कम होते जा रहे हैं.

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आम आदमी की खाल उधेड़ते प्राइवेट अस्पताल

1972 के अर्थशास्त्र के नोबेल पुरस्कार विजेता अमेरिका के कैनेथ एरो ने 1963 में ही चेतावनी दे दी थी कि स्वास्थ्य सेवा को बाजार के हवाले कर देना आम लोगों के लिए घातक साबित होगा.

इस चेतावनी का दुनियाभर में जो भी असर हुआ हो लेकिन हमारे देश में स्वास्थ्य सेवाओं का स्वास्थ्य उद्योग में तबदील हो जाना क्या और कैसेकैसे गुल खिला रहा है, इस की ताजी बानगी बड़े वीभत्स, शर्मनाक और अमानवीय तरीके से बीती 1 दिसंबर को सामने आई.

दिल्ली के शालीमार बाग इलाके में स्थित मैक्स सुपर स्पैशलिटी हौस्पिटल के डाक्टरों ने एक दंपती को उन के जुड़वा बच्चों को पोलिथीन में पैक कर यह कहते थमा दी थी कि ले जाइए, ये दोनों मर चुके हैं.

जानना और समझना जरूरी है कि मैक्स सुपर स्पैशलिटी अस्पताल के डाक्टरों ने किस तरह की लापरवाही और अमानवीयता दिखाई थी जिस ने पूरे देश को झिंझोड़ कर रख दिया था. हालांकि महंगे पांचसितारा प्राइवेट अस्पतालों में होती आएदिन की लूटखसोट का यह पहला या आखिरी मामला नहीं था जिस ने सहज ही कैनेथ एरो की चेतावनी याद दिला दी, बल्कि ऐसा हर समय देश में कहीं न कहीं हो रहा होता है. और डाक्टरों को लुटेरा व हत्यारा तक कहने में लोगों को कोई संकोच या ग्लानि महसूस नहीं होती.

जबकि जिंदा था बच्चा

 शिकायतकर्ता पति या पिता आशीष की मानें तो उस ने 6 महीने की गर्भवती पत्नी वर्षा को उक्त अस्पताल में भरती किया था. भरती करने के बाद मैक्स के डाक्टरों ने गर्भस्थ जुड़वा शिशुओं के जिंदा रहने यानी बचने की संभावना महज 10-15 फीसदी ही बताई थी. निम्न मध्यवर्गीय आशीष यह सुन कर मायूस और परेशान हो उठा.

डरा कर पैसे ऐंठने के भी विशेषज्ञ हो चले डाक्टरों का यह दांव खाली नहीं गया. उन्होंने पुचकारते हुए आशीष से कहा कि खतरा टल सकता है यदि वर्षा को 35-35 हजार रुपए की कीमत वाले 3 इंजैक्शन लगाए जाएं. लगभग 1 लाख रुपए की रकम आशीष के लिए मामूली और गैरमामूली दोनों नहीं थी. पत्नी और बच्चों की सलामती के लिए वह इस बाबत तैयार हो गया तो उक्त 3 इंजैक्शन वर्षा को लगा दिए गए.

ये इंजैक्शन लगने के बाद ही चमत्कारिक ढंग से बच्चों के बचने की संभावना डाक्टरों ने बताई तो आशीष को 1 लाख रुपए खर्च करने का कोई मलाल नहीं हुआ. पैसा हाथ का मैल है, आताजाता रहता है, यह प्रचलित बात आशीष को भी मालूम थी कि जान अगर एक दफा चली जाए तो फिर कुछ नहीं हो सकता.

मैक्स अस्पताल में जाने से पहले वर्षा का नियमित चैकअप पश्चिम विहार इलाके के अट्टम नर्सिंग होम में होता था. जब भी वर्षा यहां आई तब डाक्टरों ने जांच के बाद यही कहा था कि सबकुछ नौर्मल और ठीकठाक है.

इस पर आशीष और वर्षा खुशी से फूले नहीं समाते थे. पहली दफा मांबाप बनने जा रहे नवदंपतियों की तरह उन्होंने होने वाले बच्चों के लिए खिलौने खरीदने भी शुरू कर दिए थे और बैडरूम में बच्चों के हंसते, खिलखिलाते पोस्टर भी लगा लिए थे. वर्षा के मायके वाले भी खुशखबरी सुनने का इंतजार करते अपने रस्मोरिवाज निभाने की तैयारियों में जुटे थे. आशीष और वर्षा की शादी को अभी 3 साल ही हुए थे.

नवंबर के तीसरे हफ्ते में वर्षा फिर से अट्टम नर्सिंग होम गई तो वहां की लेडी डाक्टर स्मृति ने परिवारजनों को मैक्स अस्पताल ले जाने की सलाह दी. उन के मुताबिक, वर्षा के वाटर बेग से लीकेज होने लगी थी.

आशीष या उस के पिता इस चिकित्सकीय भाषा को नहीं समझते थे. उन्हें तो बस वर्षा और होने वाले बच्चों की सलामती से सरोकार था. लिहाजा, वे भागेभागे मैक्स अस्पताल गए और 1 लाख रुपए के इंजैक्शन फिर लगवा लिए. अब खतरा टल गया है, यह बात ये लोग मैक्स जैसे नामी अस्पताल के डाक्टरों के मुंह से सुन कर ही वापस जाना चाहते थे.

खतरा कितना था और था भी या नहीं, यह इन्हें नहीं मालूम था. अस्पताल प्रबंधन के लालच का अंदाजा भी उन्हें कतई नहीं था. पहली दफा महंगे स्टार अस्पताल में इलाज के लिए जाने वाले कम पैसे वालों के साथ ऐसा न हो, तो जरूर बात हैरत की होती.

पहले तो उषारानी नाम की डाक्टर ने इन्हें यह कहते डराया कि बच्चों को जन्म के बाद 12 हफ्तों तक उन्हें नर्सरी में रखना पड़ेगा. हैरानपरेशान आशीष और उस के पिता कैलाश मैक्स अस्पताल के चाइल्ड स्पैशलिस्ट डाक्टर ए सी मेहता से मिले तो उन्होंने उषारानी की बात की पुष्टि करते सधे और कारोबारी ढंग से बताया कि शुरू के 4 दिन बच्चों को नर्सरी में रखने के 1 लाख रुपए प्रतिदिन और बाद में 50 हजार रुपए प्रतिदिन लगेंगे.

इतनी बड़ी रकम इन लोगों के पास नहीं थी. फिर भी, उन्होंने सोचा कि कहीं न कहीं से इंतजाम कर लेंगे. 29 नवंबर को वर्षा की मैक्स में ही अल्ट्रासाउंड जांच हुई थी जिस में बच्चों के पूरी तरह स्वस्थ होने की बात कही गई थी. इस से आशीष और उस के परिवारजनों ने राहत की सांस ली थी.

30 नवंबर को सुबह 7.30 बजे वर्षा ने पहले एक बेटे और फिर 12 मिनट बाद एक बेटी को जन्म दिया. सुबह 8 बजे परिवारजनों को बच्चे देखने की अनुमति मिली पर यह बता दिया गया था कि बेटी मृत पैदा हुई है और बेटा जिंदा है.

इन लोगों ने यह सोचते तसल्ली कर ली कि चलो, एक तो बचा. लेकिन फिर साढ़े 12 बजे के लगभग अस्पताल प्रबंधन की तरफ से बेटे के भी मर जाने की बात कही गई. जल्द ही आशीष के हाथ में 2 पैकेट यह कहते थमा दिए गए कि ये रहे आप के बच्चे.

कल तक जो आशीष अपनी फैमिली कंप्लीट हो जाने की आस लगाए बैठा था, उस का दिल पार्सल बना कर दी गई बच्चों की लाशें देख हाहाकार कर रहा था. उस का तो सबकुछ एक झटके में लुट गया था पर इस वक्त तक उसे यह नहीं मालूम था कि यह बेरहम लुटेरा कोई न दिखने वाला भगवान नहीं, बल्कि वे डाक्टर हैं जिन्हें भगवान के बाद दूसरा दरजा हर कोई देता है.

पैकेटों में पैक अपने नवजात बच्चों की लाशें ले कर आशीष अपने ससुर प्रवीण के साथ टैक्सी में बैठ कर चंदर विहार श्मशान की तरफ चल पड़ा.

कैसे अपने सपनों को दफन किया जाता है, यह उस से बेहतर कोई भी नहीं बता सकता. बीच में रास्ते में मधुबन चौक के पास लाश वाला पैकेट हिला, तो प्रवीण ने कहा, ‘लगता है बच्चा जिंदा है.’

यह हैरतअंगेज बात इस लिहाज से थी कि जिस बच्चे को मैक्स के डाक्टर मरा बता चुके हों वह जिंदा कैसे हो सकता है. आशीष ने इसे वहम समझा और उसे लगा कि गाड़ी हिलने की वजह से पैकेट हिला होगा, इसलिए प्रवीण को ऐसा लगा.

लेकिन बात सच थी. प्रवीण के हाथों में रखा पैकेट वाकई हिल रहा था, लग ऐसा रहा था, मानो बच्चा पांव झटक रहा हो. दोनों ने वक्त न गंवाते पैकेट खोलना शुरू किया जिसे बांधने में कोई लापरवाही नहीं की गई थी. पैकेट 5 परतों में बांधा गया था जिसे खोलने में लगभग 3 मिनट लग गए.

बच्चा वाकई जिंदा था, उसे ले कर वे तुरंत नजदीक के पीतमपुरा स्थित अग्रवाल अस्पताल ले गए. वहां तुरंत बच्चे को भरती किया गया और तुरंत ही उस का इलाज भी शुरू हो गया. अग्रवाल अस्पताल में मौजूद डाक्टर संदीप अग्रवाल ने बच्चे के जिंदा होने की पुष्टि की, साथ ही, यह भी बताया कि इंफैक्शन के चलते उस के बचने की उम्मीद कम है.

6 दिन इलाज हुआ पर बेटा बचा नहीं. इस के बाद सामने आई मैक्स की लारवाही या हैवानियत, कुछ भी कह लें, एक ही बात है. संदीप उस के घर वाले और नातेरिश्तेदार धरनाप्रदर्शन करने लगे तो दिल्ली हिलने लगी. ये लोग इंसाफ के साथसाथ उन 2 डाक्टरों को सजा दिए जाने की मांग कर रहे थे जिन्होंने बच्चे को मृत बता कर उन्हें दफनाने के लिए दे दिया था. इस बाबत आशीष ने शालीमार बाग थाने में एफआईआर दर्ज कराई. पुलिस ने आईपीसी की धारा 308 के तहत मामला दर्ज किया.

मामले ने तूल पकड़ा तो दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन ने पत्रकारवार्त्ता बुला कर बताया कि इस मामले की गंभीरता से जांच की जाएगी. इस बाबत जांच कमेटी गठित कर दी गई है. उस की रिपोर्ट आते ही कार्यवाही हुई. दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने मैक्स अस्पताल का लाइसैंस रद्द कर दिया. इस पर दिल्ली मैडिकल एसोसिएशन यानी डीएमए ने एतराज जताते, बल्कि सरकार को धमकी देते, कहा कि अगर मैक्स का लाइसैंस रद्द करने का फैसला वापस नहीं लिया गया तो डीएमए कामकाज ठप कर देगा और डाक्टर्स काम नहीं करेंगे.

मैक्स के हक में डीएमए ने तर्क दिए जिन के माने सिर्फ इतने भर थे कि हम चोरी भी करेंगे और फिर सीनाजोरी भी. बच्चा प्रीमैच्योर था और सरकार ने एक हजार परिवारों की रोजीरोटी पर संकट खड़ा कर दिया है, जैसी बातें आशीष के इस बयान के सामने कुछ भी नहीं थीं कि उस के बच्चे को 3 घंटे इलाज नहीं मिला, उसे किसी सामान की तरह पैक कर दिया गया था जबकि वह जिंदा था.

कानूनन डाक्टरों को काफी छूटें मिली हुई हैं, पर इस मामले में उन की करतूत छिपाए नहीं छिप रही है. न तो चिकित्सकीय दृष्टि से वे खुद को सच साबित कर पा रहे हैं और न ही कानूनी लिहाज से कोई राहत उन्हें मिलने की संभावना दिख रही.

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने मैडिकल माफिया से एक आम परिवार के हक में सीधे टकराने की हिम्मत दिखाई. यह वाकई तारीफ की बात है जिस से देशभर के लोगों को उम्मीद बंधी कि अगर सभी राज्य सरकारें सख्त हो जाएं तो ऐसी नौबत ही क्यों आए. हालांकि, कुछ ही दिनों बाद मैक्स अस्पताल का लाइसैंस बहाल कर दिया गया.

इसी तरह गुरुग्राम स्थित फोर्टिस अस्पताल में डेंगू से बच्ची की मौत और इलाज के लिए 16 लाख रुपए का बिल वसूलने के आरोप में वहां के एक डाक्टर के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई गई.

हरियाणा के स्वास्थ्य मंत्री अनिल विज ने कहा कि जांच पैनल की रिपोर्ट के आधार पर आपराधिक धाराएं जोड़ी जाएंगी.

उदाहरणों से भयावह आंकड़े

 ऐसी नौबत जबतब आती रहती है जिस में प्राइवेट अस्पतालों पर लूटखसोट करने का आरोप सच साबित होता है. मृत व्यक्ति को 7 दिन वैंटीलेटर पर रखा, जीवित को मृत बता दिया, जब तक बिल अदा नहीं किया तो शव नहीं दिया गया या फिर दिल्ली के नजदीक ही गुरुग्राम में डेंगू पीडि़त एक बच्ची के इलाज का बिल 15 लाख रुपए आया जैसी खबरें अब चौंकाती नहीं हैं बल्कि बताती हैं कि लोकतांत्रिक सरकारें राजशाही से ज्यादा खोखली हैं.

हालांकि यह मसला भी सोचनीय है कि जब हमें चिकित्सा सुविधा पास के सामान्य या सरकारी अस्पतालों में मिल जाती है तो फिर लोग उन मल्टी स्पेशिऐलिटी वाले अस्पताल का रुख करते ही क्यों हैं जहां के खर्चे व मैंटिनैंस चार्जेज इतने भारी होते हैं.

मैक्स सरीखे लग्जरी अस्पतालों में हर तरह की सर्जरी के अलावा बड़ेबड़े मर्ज का इलाज करने के लिए बहुमंजिला होटल जैसी सुविधाएं दी जाती हैं. लोग मामूली बुखार से ले कर बड़े मर्ज के इलाज के लिए यहां आ कर भीड़ बढ़ाते हैं जबकि 60 प्रतिशत बीमारियां तो आप के नजदीकी अस्पताल में कर्म खर्चे पर ही ठीक हो सकती हैं. या फिर ऐसे अस्पताल का रुख करें जहां सिर्फ उसी विशेष बीमारी का इलाज होता हो. इस से अतिरिक्त टैस्ट करवाने या पैसे ऐंठने के विकल्प ही खत्म हो जाएंगे और फिर ये अस्पताल भी अपनी मनमानी के बिल नहीं जोड़ेंगे.

लोग महंगे अस्पतालों में जा कर लुट रहे हैं तो कोई भी यह कह कर पल्ला नहीं झाड़ सकता कि आखिरकार लोग वहां इलाज के लिए जाते ही क्यों हैं. यह एक संवेदनशील बात है जो सच के करीब लगती है, लेकिन इस का सीधा संबंध सरकार से भी है जो शिक्षा और स्वास्थ्य के प्रति जवाबदेह होती है.

लोग महंगे अस्पतालों में जाते ही क्यों हैं, इस की जगह अगर यह सवाल पूछा जाए कि अस्पताल इतने महंगे क्यों हैं, तो जवाब की तरफ बढ़ने में सहूलियत रहेगी.

पेंच इतना भर नहीं है कि बड़े अस्पतालों की लागत और खर्च भी ज्यादा होते हैं और वे सरकार को टैक्स भी ज्यादा देते हैं और तमाम बड़े नेता व अफसरों का लगभग मुफ्त के भाव इन में इलाज होता है. सच यह है कि सरकार के निकम्मेपन के चलते पिछले 20 सालों से ब्रैंडेड अस्पतालों की शृंखला खूब फलफूल रही है जिन में निचुड़ता आखिरकार आम आदमी ही है.

साल 2017 की शुरुआत में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने ब्रैंडेड अस्पताल संचालकों के कान उन के नाम के साथ करतूतें गिनाते खींचे थे. वह भी एक मीटिंग में, तो उन की घुड़की से अस्पताल संचालक सहमे थे.

पर हर जगह ऐसा नहीं होता. वजह, स्वास्थ्य सेवाओं को मुनाफाखोरों के हवाले करने की जिम्मेदार सरकार  लूटखसोट पर अंकुश लगाने के लिए कोई पहल नहीं करती. अस्पतालों में दवाओं के दाम अलगअलग हैं, सेवाओं की फीस अलगअलग हैं, और इस के बाद भी कोई मरीज अगर लापरवाही के चलते मर जाए तो प्राइवेट अस्पतालों को आमतौर पर कोई सजा क्यों नहीं होती, इन सवालों के जवाब आंकड़ों से गिनाए जाएं तो समझ आता है कि सरकार की नीतियां भी कम दोषी या जिम्मेदार नहीं.

बात कम हैरत की नहीं कि देश में कुल 19,817 सरकारी अस्पताल हैं जबकि प्राइवेट अस्पतालों की तादाद 80,671 है. इंडियन मैडिकल एसोसिएशन के मुताबिक, देशभर में रजिस्टर्ड एलोपैथिक डाक्टरों की संख्या 10,22,859  में से महज 1,13,328 डाक्टर ही सरकारी अस्पतालों में हैं यानी 90 फीसदी डाक्टर प्राइवेट सैक्टर में हैं.

देश की 75 फीसदी आबादी इस लिहाज से प्राइवेट अस्पतालों में इलाज कराने को मजबूर कर दी गई है. यानी घोषित तौर पर स्वास्थ्य सेवाओं का निजीकरण हो चुका है जिस की चांदी कोई दर्जनभर ब्रैंडेड अस्पतालों की शृंखला, जिसे चेन कहा जाता है, काट रही है. सरकार स्वास्थ्य पर प्रतिव्यक्ति महीनेभर में 100 रुपए भी खर्च नहीं करती है.

जब बुनियादी सेवाएं बिकने लगती हैं तो वे पूरी तरह पूंजीपतियों की मुट्ठी में कैद हो कर रह जाती हैं. चूंकि कोई कुछ नहीं बोलता, उलटे, बतौर फैशन, यह कहा जाता है कि अगर जेब में पैसा है तो महंगे अस्पतालों में इलाज से हर्ज क्या.

हर्ज यह है कि फिर सरकार अपने बजट में कटौती करने लगती है. साल 2000 से ले कर 2017 तक स्वास्थ्य का सरकारी बजट 2,472 करोड़ से बढ़ कर 48,871 करोड़ रुपए हुआ लेकिन इन्हीं 17 सालों में प्राइवेट अस्पतालों का कारोबार साढ़े 6 लाख करोड़ का रिकौर्ड आंकड़ा छू रहा है जो साल 2000 में केवल 50 हजार करोड़ रुपए था.

यह पैसा कोई आसमान से नहीं बरस रहा, न ही प्राइवेट अस्पतालों के कारोबारी अपनी जेब से लगा रहे, बल्कि यह आशीष जैसे आम मेहनतकश लोगों की जेबकतरी का नतीजा है जिस पर कभीकभार कोई बड़ा हादसा होने पर ही हायहाय मचती है. मैक्स ग्रुप का सालाना टर्नओवर 17 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा है, कैसे है, यह भी आशीष जैसे पीडि़त नहीं समझ पाते कि सरकारी अस्पतालों पर जानबूझ कर पसराई गई बदहाली इस की बड़ी जिम्मेदार होती है जो यह कहती है कि अगर अपने जिंदा बच्चे को जिंदा चाहिए तो 50 लाख रुपए जमा करो.

हर कोई जानता है कि सरकारी अस्पताल में जाने पर डाक्टर के मिलने की गारंटी नहीं, लेकिन प्राइवेट अस्पताल में है जहां हर विजिट के 500 रुपए से ले कर 1,500 रुपए डाक्टर को देने पड़ते हैं. यह डाक्टर सरकारी अस्पताल के ही सुविधाभोगी चैंबर में बैठा या तो टीवी देखता रहता है या फिर वीडियो गेम खेल रहा होता है पर इस सवाल का जवाब कोई नहीं देता कि चंद कदमों की दूरी नापने के 500 रुपए क्यों. इसी एक डाक्टर से अस्पताल उस की 20 विजिट पर 10 हजार रुपए रोज कमाता है. ऐसे 10 डाक्टर हों तो यह आंकड़ा एक लाख रुपए रोजाना का होता है.

लूटखसोट के इस कारोबार में हर कोई हाथ धो रहा है. हर छोटे शहर में कई नर्सिंगहोम होने लगे हैं जो कुछ दिन मरीज की जेब कुतरने के बाद इलाज पूरा न हो पाने पर उसे नजदीक के बड़े शहर में भेज देते हैं. बोलचाल की भाषा में इसे रैफर करना कहा जाता है. बडे़ जेबकतरे अपनी शानोशौकत, चमकदमक और हैसियत के मुताबिक जरूरतमंद मरीजों की बचीखुची रकम लूट लेते हैं. मरीज ठीक हो जाए तो ठीक, वरना कहने को परंपरागत भारतीय जुमला ‘हरि इच्छा’ तो है ही.

लैबों की लूट

 पैथोलौजी की दरें बंधी हैं. मामूली बुखार में भी कई तरह की जांचें प्राइवेट अस्पताल में गंगाडुबकी की तरह अनिवार्य होती हैं. कमीशनखोरी पैथौलाजी में भी खूब चलती है. तरहतरह के माफिया देशभर में सक्रिय हैं-किडनी माफिया, हार्ट माफिया, कैंसर माफिया और अब तो पेंक्रियाज माफिया तक होने लगे हैं.

देशभर में सरकारी बसें अब गांवदेहातों की तरफ ही चलती दिखती हैं क्योंकि घाटे के चलते वहां कोई प्राइवेट ट्रांसपोर्टर जाने को तैयार नहीं होता. ठीक यही हाल स्वास्थ्य सेवाओं का है. सरकार ने अस्पताल खोलना कम कर दिया है और अस्पतालों की बदहाली बढ़ा दी है ताकि मरीज घबरा कर प्राइवेट अस्पतालों की तरफ भागें.

कहने का मतलब यह नहीं कि प्राइवेट अस्पताल न हो, वे हों, पर लूटखसोट करने का हक उन से छीना जाना चाहिए.

अस्पतालों की लूटखसोट अब भी कम होगी, ऐसा कहने की कोई वजह नहीं. प्राइवेट स्कूलों की तरह उन्हें फीस कम करने के लिए सरकार मजबूर नहीं कर सकती और करेगी भी तो वे हजार नए रास्ते ढूंढ़ लेंगे. इन को ठिकाने लगाने का इकलौता रास्ता सरकार के पास यह है कि ये अस्पताल रोज का हिसाब सार्वजनिक करें जैसा कि जीएसटी लागू होने के बाद हर छोटेबड़े व्यापारी को करना पड़ रहा है, तभी इन की पूरी पोल खुलेगी.

मरीज भी अपने कानूनी अधिकारों को जानें

निजी अस्पतालों में जिस तरह से मरीजों को ठगा जाता है, उन से बचने के लिए हमारी न्यायिक प्रणाली में कुछ कानून भी हैं जिन का उपयोग कर के आप अपने मरीज के खर्चे और अस्पताल द्वारा उठाए जा रहे कदमों की जानकारी ले सकते हैं. सुप्रीम कोर्ट की अधिवक्ता ऋचा पांडे ने मरीज के हित में बनाए गए कानूनों की व्याख्या की.

एमआरटीपी एक्ट 1969 : इस के तहत कोई भी अस्पताल चाहे वह सरकारी हो या प्राइवेट, किसी भी खास जगह या दुकान से दवाइयां खरीदने के लिए बाध्य नहीं कर सकता. इस कानून के तहत दवा विक्रेताओं के बीच प्रतिस्पर्धा होनी चाहिए.

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986 : हमारे देश में पेशेंट राइट नाम का कोई कानून नहीं है जबकि कई देशों में मरीजों के हित के लिए कानून बनाए गए हैं और सजा का भी प्रावधान है. लेकिन हम यहां स्वास्थ्य सेवा के उपभोक्ता होने के नाते देश के उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम (1986) कानून के तहत अपने अधिकार की लड़ाई लड़ सकते हैं.

सूचना का अधिकार कानून 2005 : 2005 के बाद जो आम लोगों के हाथों में हथियार आया है वह है, सूचना का अधिकार. इस कानून के तहत सब से पहले हमें डाक्टर और अस्पताल से ये जानने का अधिकार है कि मरीज पर किस तरह का उपचार चल रहा है, जांच में क्या निकल कर आया और दवाइयों से कितना सुधार है. मरीज के परिजन और मरीज इस की जानकारी अस्पताल से मांग सकते हैं. सूचना के अधिकार का उपयोग कर के आप जो डाक्टर आप का इलाज कर रहा है उस की योग्यता, डिगरी की जानकारी की मांग भी कर सकते हैं.

क्लिनिकल इस्टैब्लिशमैंट एक्ट 2010 : इस कानून को देश के सभी राज्यों ने लागू नहीं किया है. इस अधिनियम के तहत हर अस्पताल, क्लिनिक या फिर नर्सिंग होम को रजिस्टर करना अनिवार्य होता है. साथ ही, एक गाइडलाइन के तहत हर बीमारी के इलाज और टैस्ट की प्रक्रिया निर्धारित है. और ऐसा न करने पर इस एक्ट में जुर्माने का प्रावधान भी है.

प्रोफैशनल कंडक्ट ऐंड ऐथिक्स एक्ट : आईएमए ने भी डाक्टरों के लिए कुछ दिशानिर्देश जारी किए हैं जिस में अगर आप को इमरजैंसी में इलाज की जरूरत है तो कोई डाक्टर इस के लिए आप को मना नहीं कर सकता जब तक फर्स्ट एड दे कर मरीज की स्थिति खतरे से बाहर न कर लें.

इंडियन जर्नल औफ मैडिकल ऐथिक्स : कोई मरीज नहीं चाहता कि उस की बीमारी का पता परिवार वालों को चले तो डाक्टर कभी भी उस बीमारी की परिवारवालों से चर्चा नहीं करेंगे. साथ ही, अस्पताल में ऐडमिट मरीज अपनी बीमारी के बारे में सैकंड ओपिनियन या दूसरे डाक्टर की सलाह ले सकता है. ऐसा करने से कोई भी अस्पताल या डाक्टर रोक नहीं सकता. लेकिन अगर दूसरे डाक्टर की ओपेनियन पहले से अलग है तो किसी भी डाक्टर को दोषी नहीं ठहराया जा सकता.

किसी भी मरीज की सर्जरी के पहले यह डाक्टर की जिम्मेदारी है कि वह औपरेशन, सर्जरी के पहले मरीज के परिजन को संभावित खतरों की पूरी सही जानकारी दे और एग्रीमैंट लैटर पर उन के साइन ले. मरीज को दूसरे अस्पताल में शिफ्ट करने या डाक्टर बदलने के लिए अस्पताल को समय से रहते इस की सूचना मरीज के परिवारवालों को देनी चाहिए. मरीज के केस से जुड़ी पूरी प्रक्रिया सभी खर्चे के ब्योरे सहित अस्पताल से मरीज व उस के परिजन ले सकते हैं.

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