टौपलेस फोटोशूट में नजर आई टाइगर श्रौफ की बहन

बौलीवुड अभिनेता टाइगर श्रौफ की बौडी, स्टाइल और एक्शन के तो सभी दीवाने हैं. लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि उनकी बहन कृष्णा श्रौफ भी इस मामले में कुछ कम नहीं हैं. कृष्णा की खूबसूरती और हौटनेस ने इंटरनेट पर तहलका मचा रखा है. हाल ही में उनकी एक तस्वीर ने लोगों को उनकी अदाओं का दीवाना बना दिया है.

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टाइगर श्रौफ की बहन कृष्णा श्रौफ ने हाल ही में अपना एक टौपलेस फोटोशूट करवाया है. बहुत से सेलीब्रिटीज हैं जो अपनी बौडी को शो करने से जरा भी नहीं हिचकिचाते और कृष्णा भी उन्हीं में से एक हैं. कृष्णा इस फोटोशूट में अपमने हौटनेस को डिस्क्राइब कर रही हैं. उन्होंने अपनी इस टौपलेस फोटोशूट की कुछ फोटोज को शेयर कर सोशल मीडिया पर आग लगा दी है. इन फोटोज में उन्होंने कैप्शन तो नहीं लेकिन अपनी फोटोग्राफर दोस्त दिविना रिखये को क्रेडिट दिया.

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इस शूट की सबसे खास बात उनकी बौडी पर बने शानदार टैटू हैं. उनके कंधे से लेकर पीठ तक बने टैटु उनकी खूबसूरती को और बढ़ा रही है. बेड पर टौपलेस और अपने टैटुज को शो औफ करती कृष्णा के इस फोटोज मे एक्सप्रेशन भी लाजवाब हैं.

इसके पहले भी कृष्णा ने अपने इसी फोटोशूट का एक फोटो अपलोड किया था. इसके अलावा भी वे अक्सर ही सोशल मीडिया पर अपनी तस्वीरें शेयर करती रहती हैं. कृष्णा को फिल्मों में आने का शौक नहीं लेकिन वे कैमरे के पीछे रहकर एक अच्छी फिल्ममेकर बनना चाहती हैं. उन्होंने टाइगर की फिल्म मुन्ना माइकल में निर्देशक शब्बीर खान को असिस्ट भी किया था. कृष्णा एक्ट्रेस नहीं बनना चाहती लेकिन वे इंटरनेट सेंसेशन तो बन ही चुकी हैं. उम्मीद है वे जल्द ही अपनी एक फिल्म लेकर बौलीवुड में उतरे.

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अब धर्म की आग में और जलेगी दुनिया

किसी न किसी अमेरिकी राष्ट्रपति ने यह करना ही था. अमेरिका को अब एक सिरफिरा, दंभी और न देश, न जनता, न पार्टी की चिंता करने वाला राष्ट्रपति मिला है, जो मुसलिमों, लैटिनियों, मैक्सिकियों, इमिग्रैंटों, चीनियों, अखबार वालों सब से बिना चेहरे पर शिकन लाए ‘अमेरिका फर्स्ट’ कह कर कुछ भी कर सकता है. उस ने मुसलिमों के देश में प्रवेश पर पाबंदियां लगा कर यह साबित कर दिया है कि उस की पहले की बातें नरेंद्र मोदी के नारे ‘अच्छे दिन’ की तरह केवल चुनावी जुमले नहीं थे. वह अमेरिकन समाज के तानेबाने को तारतार करने की हिम्मत रखता है, उस से चाहे लाभ हो या न हो.

उस ने कुछ मुसलिम बहुल देशों से वीजा प्राप्त मुसलिमों के अमेरिका में प्रवेश पर जैसे ही प्रतिबंध लगाया. अमेरिका देश भर में मुसलिम विरोधी तत्त्व खड़े हो गए हैं. 2-4 जगह मसजिदें जला दी गई हैं. 2002 में मुसलिम आतंकवादियों द्वारा न्यूयौर्क के ट्विन टौवर पर हमले का बदला अब फिर शुरू हो गया है, क्योंकि अफगानिस्तान, इराक, लीबिया, सीरिया को तहसनहस करने के भी मुसलिम आतंकवादियों ने अपना कहर ढाहना बंद नहीं किया है.

अब हिटलरी अंदाज में इंतहाई बदला लेने का माहौल डोनाल्ड ट्रंप तैयार कर रहे हैं और अगर वे चुनाव जीत सकते हैं तो देश में ही नहीं विश्व भर में मुसलिम विरोधी माहौल पैदा कर सकते हैं, क्योंकि कितने ही देश मुसलिम आतंकवाद के शिकार हो चुके हैं.

डोनाल्ड ट्रंप गलत हैं, खब्ती हैं, मूर्ख हैं पर उन का मुकाबला अपने से कहीं ज्यादा कट्टरों से है, जो अपने गांव, शहर, देश और धर्म वालों किसी की भी चिंता नहीं करते और धर्म की आग में किसी को भी झोंकते हुए अपनेपराए को भूल जाते हैं.

अगर डोनाल्ड ट्रंप के लिए ‘अमेरिका फर्स्ट’ नारा है तो मुसलिम कट्टरपंथियों के लिए ‘इसलाम फर्स्ट’ है. अब समय आ गया है जब पश्चिमी एशिया के अमीर मुसलिम देश अफगानिस्तान, पाकिस्तान, इंडोनेशिया, मलयेशिया, सूडान, नाइजीरिया, सोमालिया, इजिप्ट, लीबिया की सरकारें यह तय करें कि इसलाम के नाम पर कहर को अपने देशों में ही समाप्त करना होगा वरना डोनाल्ड ट्रंप हर देश में पैदा हो जाएंगे.

इसलाम हो या हिंदू धर्म अथवा ईसाई धर्म, किसी में कोई हीरेमोती नहीं जड़े हैं कि उसे मानने वाले सुखी हो जाते हैं. सभी धर्म फसाद की जड़ ज्यादा हैं, प्रेम का कम.

सिरफिरा शासक डोनाल्ड ट्रंप गलत कर रहा है पर अगर गोरी चमड़ी वाले अमेरिकी उसे समर्थन दे रहे हैं तो समझा जा सकता है कि उदारता की सीमा पूरी हो चुकी है और दंभी राष्ट्रपति के नेतृत्व में अमेरिका ने इसलाम पर ही नहीं हर गैर गोरे अमेरिका में रह रहे लोगों पर भी धावा बोल दिया है.

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औरतों को सिर्फ सैक्स टौय समझते हैं ट्रंप

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के खिलाफ दुनियाभर की महिलाओं ने यों ही नहीं मोरचा खोल रखा है. दरअसल, ट्रंप अलगअलग मौकों पर महिलाओं को ले कर अपनी घटिया मानसिकता का सुबूत कुछ इस तरह देते रहे हैं कि कोई भी उन से नफरत करने लगेगा. आइए नजर डालते हैं डोनाल्ड ट्रंप के महिलाओं को ले कर कुछ विवादित व शर्मनाम बयानों पर —

–       सितंबर 2015 में तत्कालीन प्रतिद्वंद्वी कार्ली फियोरेना के बारे में डोनाल्ड ने बड़े भद्दे तरीके से बोला था कि, ‘‘जरा इन का चेहरा देखिए. क्यों इस के लिए कोई वोट करेगा. क्या आप सोच भी सकते हैं कि ऐसे चेहरे वाली हमारी अगली राष्ट्रपति होगी?’’

–       सितंबर में ही पूर्व मिस यूनीवर्स और ऐक्ट्रैस मेलिसिया माचादो को डोनाल्ड ट्रंप ने मिस पिग्गी कहा था और बाद में उन के मोटापे को ले कर भी भद्दी टिप्पणी की थी.

–       अप्रैल 2015 में एक ट्वीट किया था, जिस में कहा था कि हिलेरी क्लिंटन अपने पति को संतुष्ट नहीं कर पाती हैं, ऐसे में वे अमेरिकी राष्ट्रपति बन कर देश को कैसे संतुष्ट करेंगी.

–       7 अगस्त, 2015 को डोनाल्ड ट्रंप ने एक इंटरव्यू में एंकर मेगिन कैली के बारे में कहा कि, ‘उस की आंखों से खून आ रहा था. दरअसल, उस से हर जगह से खून बाहर आ रहा था.’

–       एक वीडियो में ट्रंप रेडियो एवं टीवी प्रस्तोता बिली बुश के साथ बातचीत के दौरान महिलाओं के बारे में, बिना सहमति के महिलाओं को छूने व उन के साथ यौन संबंध बनाने के बारे में बेहद अश्लील टिप्पणियां करते दिखाई दिए थे.

–       मार्च 2013 में ट्रंप ने कौमेडियन रोजी ओ डोनेल को ले कर अनापशनाप बोला और फिर बजाय अपनी गलती मानने के उन्होंने कहा था, ‘‘मुझे ऐसा लगता है कि वह इसी लायक है. मुझे इस बात के लिए बिलकुल भी खेद नहीं है.’’

–       डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी बेटी इवांका के बारे में कहा था कि इवांका पहले से ज्यादा कामुक लग रही है. यदि मेरी खुद की बेटी नहीं होती तो मेरा उस से जरूर अफेयर होता.

–       1991 में डोनाल्ड ट्रंप ने महिलाओं के बारे में कहा था कि अगर उन के पास खूबसूरत ‘एस’ हैं, तो अमेरिकी मीडिया उन के बारे में क्या लिखता है, उस से मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता है.

–       इन आरोपों के अलावा ट्रंप का एक और टेप सामने आया था जिस में वे 10 साल की बच्ची पर अभद्र टिप्पणी करते दिखे.

–       पीपल मैगजीन की पत्रकार ने भी ट्रंप पर जबरदस्ती किस करने का आरोप लगाया था. मैनहटन की जेसिका लीड्स के साथ डोनाल्ड ट्रंप ने 30 साल पहले एक फ्लाइट में अश्लील हरकत की थी.

–       जेसिका लीड्स अकेली नहीं हैं, पीपल मैगजीन की रिपोर्टर नताशा ने भी डोनाल्ड ट्रंप पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया था.

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नेतागिरी की आड़ में नकली नोटों का धंधा

अचानक हुए हजार व 5 सौ के नोटबंदी के फैसले के बाद पूरे देश में अफरातफरी का जो माहौल कायम हुआ, उस से उत्तर प्रदेश का मेरठ शहर भी अछूता नहीं रहा. बैंकों में भीड़ उमड़ पड़ी थी. कोई पुराने नोटों को जमा करना चाहता था तो कोई अपनी जरूरत के हिसाब से नए नोट लेना चाहता था. हर रोज बैंकों में लंबी कतारें लग रही थीं. होने वाली परेशानी से लोगों में गुस्सा भी पनप रहा था. कई दिन बीत जाने के बाद भी हालात जस के तस थे. पुलिस को भी अतिरिक्त ड्यूटी करनी पड़ रही थी. कानूनव्यवस्था की स्थिति न बिगड़े, इस के लिए बैंकों में पुलिस बल तैनात कर दिया गया था. ऐसे में ही एसएसपी जे. रविंद्र गौड़ को सूचना मिली कि कुछ लोग नए नकली नोटों का धंधा कर रहे हैं. इस के लिए उन्होंने पूरा नेटवर्क भी तैयार कर लिया है. सूचना गंभीर थी, लिहाजा जे. रविंद्र गौड़ ने इस की जानकारी एसपी (क्राइम) अजय सहदेव को दे कर सर्विलांस टीम को अविलंब काररवाई करने के आदेश दिए. थाना पुलिस को भी निर्देश दिए गए कि चैकिंग अभियान चला कर संदिग्ध लोगों की तलाश की जाए. सर्विलांस टीम ने कुछ संदिग्ध लोगों के मोबाइल नंबरों को सर्विलांस पर लगा दिया.

23 दिसंबर, 2016 की रात नेशनल हाइवे संख्या 58 दिल्लीदेहरादून मार्ग स्थित पल्लवपुरम थानाक्षेत्र के मोदी अस्पताल के सामने पुलिस चैकिंग अभियान चला रही थी. आनेजाने वाले संदिग्ध वाहनों की जांच सख्ती से की जा रही थी. दरअसल पुलिस को सूचना मिली थी कि नकली नोटों का धंधा करने वाले कुछ लोग उधर से निकलने वाले हैं. सीओ वी.एस. वीरकुमार के नेतृत्व में थाना पल्लवपुरम पुलिस और सर्विलांस टीम इस चैकिंग अभियान में लगी थी. पुलिस को एक काले रंग की इंडीवर लग्जरी कार आती दिखाई दी. कार पर किसी पार्टी का झंडा लगा था और उस के अगले शीशे पर बीचोबीच बड़े अक्षरों में वीआईपी लिखा स्टिकर लगा था.

पुलिस ने कार को रोका. उस में कुल 3 लोग सवार थे. एक चालक की सीट पर, दूसरा उस की बराबर वाली सीट पर और तीसरा पिछली सीट पर बैठा था. कार रुकवाने पर उस में सवार कुरतापायजामा और जवाहर जैकेट पहने नौजवान ने रौबदार लहजे में पूछा, ‘‘कहिए, क्या बात है, मेरी कार को क्यों रोका?’’

‘‘सर, रूटीन चैकिंग है.’’ एक पुलिस वाले ने कहा.

पुलिस वाले की यह बात उस नौजवान को नागवार गुजरी हो, इस तरह उस ने तंज कसते हुए कहा, ‘‘रूटीन चैकिंग है या आम लोगों को परेशान करने का हथकंडा. आप यह सब करते रहिए और हमें जाने दीजिए.’’

‘‘सौरी सर, हमें आप की कार की तलाशी लेनी होगी.’’ पुलिस वाले ने कहा.

पुलिस वाले का इतना कहना था कि युवक गुस्से में चीखा, ‘‘क्या मतलब है तुम्हारा, हम कोई चोरउचक्के हैं. तुम जानते नहीं मुझे. मैं लोकमत पार्टी का नेता हूं.’’

‘‘वह सब तो ठीक है सर, लेकिन यह हमारी ड्यूटी है. वैसे भी कानून सब के लिए एक है.’’

‘‘पुलिस का काम अपराधियों को पकड़ना है न कि हम जैसे लोगों को परेशान करना. मेरी पहुंच बहुत ऊपर तक है. अगर मैं अपने पावर का इस्तेमाल करने पर आ गया तो एकएक की वरदी उतर जाएगी.’’ युवक ने धमकी दी.

वह युवक चैकिंग का जिस तरह विरोध कर रहा था, उस से पुलिस को उस पर शक हुआ. एक बात यह भी थी कि कई बार शातिर लोग इस तरह की कारों का इस्तेमाल गलत कामों के लिए करते हैं. पुलिस ने तीनों युवकों को जबरदस्ती नीचे उतारा और कार की तलाशी शुरू कर दी. पुलिस को कार में एक बैग मिला. पुलिस ने जब उस बैग को खोला तो उस में 2 हजार और 5 सौ के नए नोट बरामद हुए. उन के मिलते ही पुलिस को धमका रहे युवक के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं. पुलिस ने बरामद रकम को गिना तो वह 4 लाख 27 हजार रुपए निकली. पुलिस ने उस के बारे में पूछा, ‘‘यह पैसा कहां से आया?’’

‘‘सर, ये हमारे हैं.’’ जवाब देते हुए युवक सकपकाया.

पुलिस ने नोटों पर गौर किया तो उन का कागज न सिर्फ हलका था, बल्कि रंग भी नए नोटों के मुकाबले थोड़ा फीका था. इस से पुलिस को नोटों के नकली होने का शक हुआ. दूसरी तरफ बरामद रकम के बारे में युवक कोई संतोषजनक जवाब नहीं दे सके. पुलिस ने कार की एक बार फिर तलाशी ली तो उस में से एक तमंचा और 2 चाकू बरामद हुए. पुलिस ने तीनों को हिरासत में लिया और थाने ला कर उन से पूछताछ शुरू कर दी. पहले तो उन्होंने पुलिस को चकमा देने का प्रयास किया, लेकिन जब पुलिस ने सख्ती की तो उन्होंने जो सच कबूला, उसे सुन कर पुलिस हैरान रह गई. वे तीनों नकली नोट छाप कर उन्हें बाजार में चलाने का धंधा कर रहे थे.

पुलिस से बहस करने वाला युवक ही इस धंधे का मास्टरमाइंड था. वह एक पार्टी का पदाधिकारी था और नेतागिरी की आड़ में ही नकली नोटों के इस धंधे को अंजाम दे रहा था. वह नकली नोटों के बदले जमा होने वाली असली रकम के बल पर चुनाव लड़ना चाहता था. जिन युवकों को गिरफ्तार किया गया था, उन के नाम मोहम्मद खुशी गांधी, ताहिर और आजाद थे. तीनों मेरठ के ही भावनपुर थानाक्षेत्र के गांव जेई के रहने वाले थे. पुलिस ने उन के गांव जा कर उन की निशानदेही पर खुशी के घर से प्रिंटर, स्कैनर, कटर और एक प्लास्टिक के कट्टे में भरी कागज की कतरनें बरामद कीं. बरामद सामान के साथ पुलिस उन्हें थाने ले आई. पुलिस ने तीनों युवकों से विस्तृत पूछताछ की तो एक युवा नेता के गोरखधंधे की ऐसी कहानी सामने आई, जो हैरान करने वाली थी. मुख्य आरोपी खुशी गांधी हनीफ खां का बेटा था. हनीफ के पास काफी खेतीबाड़ी थी. सुखीसंपन्न होने की वजह से गांव में उन का रसूख था. खुशी अपने 5 भाइयों में चौथे नंबर पर था. उस के बड़े भाई खेती करते थे. लेकिन खुशी का मन खेती में नहीं लगा. गलत संगत में पड़ने की वजह से उस के कदम बहक गए थे.

बेटे का चालचलन देख कर हनीफ ने उसे समझाने की हरसंभव कोशिश की, लेकिन उस के मन में तो कुछ और ही था. खुशी महत्त्वाकांक्षी युवक था. वह दिन में सपने देखता था और ऊंची उड़ान भरना चाहता था. वह इस सच को स्वीकार नहीं करना चाहता था कि बिना मेहनत के सपनों की इमारत खड़ी नहीं होती. वक्त के साथ खुशी के रिश्ते जरायमपेशा लोगों से भी हो गए. संगत अपना गुल जरूर खिलाती है. कुछ संगत तो कुछ शौर्टकट से अमीर बनने की चाहत उसे जुर्म की डगर पर ले गई. हर गलत काम दफन ही हो जाए, यह जरूरी नहीं है. आखिर एक मामले में वह पुलिस के शिकंजे में आ गया. दरअसल, 2 साल पहले मेरठ के ही टीपीनगर थानाक्षेत्र के एक तेल कारोबारी के यहां डकैती पड़ी. इस मामले में पुलिस ने खुशी को भी गिरफ्तार कर के जेल भेजा था. कुछ महीने बाद उस की जमानत हो गई थी. अच्छा आदमी वही होता है, जो ठोकर लगने पर संभल जाए. लेकिन खुशी उन लोगों में नहीं था. अपने जैसे युवकों की उस की मंडली थी. वह छोटेमोटे अपराध करने लगा था. किसी का एक बार अपराध में नाम आ जाए और उस के बाद पुलिस उसे परेशान न करे, ऐसा नहीं होता. खुशी पुलिस के निशाने पर आए दिन आने लगा तो खाकी से बचने के लिए उस ने राजनीति को हथियार बना लिया. इस के लिए उस ने अलगअलग पार्टी के नेताओं से रिश्ते बना लिए. वह रैलियों में भी जाता और लड़कों की टोली अपने साथ रखता. अपना रसूख दिखाने के लिए उस ने एक इंडीवर कार खरीद ली.

उस ने नेशनल लोकमत पार्टी का दामन थाम लिया. खुशी युवा था. पार्टी ने न सिर्फ उसे प्रदेश अध्यक्ष बना दिया, बल्कि आने वाले विधानसभा चुनाव के लिए वह पार्टी का प्रत्याशी भी बन गया. कार में सायरन व पार्टी का झंडा लगाने के साथ उस ने उस पर वीआईपी भी लिखवा दिया था. 8 नवंबर को प्रधानमंत्री की नोटबंदी की घोषणा के बाद पुरानी मुद्रा पर रोक लग गई और नई मुद्रा आनी शुरू हुई. खुशी को लगा कि अमीर बनने का यह अच्छा मौका है. उस ने सोचा कि अगर पैसा होगा तो वह चुनाव भी अच्छे से लड़ सकेगा. पैसों के लिए ही उस के मन में नकली नोट छापने का आइडिया आ गया.

उस ने अपने 2 साथियों ताहिर और आजाद से बात की. वह जानता था कि देहाती इलाकों में नई करेंसी में असली और नकली की पहचान करना आसान नहीं है. क्योंकि नए नोट अभी पूरी तरह प्रचलन में नहीं आए हैं. उस ने शहरी बाजारों में भी नकली नोट चलाने के बारे में सोच लिया. इस खुराफाती काम में उस ने जरा भी देरी नहीं की और बाजार से अच्छे किस्म का स्कैनर, प्रिंटर और कागज खरीद लाया. फिर क्या था, उस ने नए नोटों से नकली नोटों के प्रिंट निकालने शुरू कर दिए.

खुशी ने शहर जा कर खरीदारी में वे नोट चलाए तो आसानी से चल गए. इस के बाद उस के हौसले बढ़ गए और वह नकली नोट छापने और चलाने लगा. उन रुपयों से उस ने जम कर शौपिंग की. देहात के भोलेभाले लोगों को भी उस ने अपना निशाना बनाया. खुशी ने नकली नोट चलाने के लिए कुछ एजेंट बना रखे थे, जिन्हें वह 40 हजार के पुराने नोटों के बदले एक लाख के नए नकली नोट देता था. वह कार का सायरन बजाते हुए पुलिस के सामने से निकल जाता और उस पर किसी को शक नहीं होता. वह खादी की आड़ में खाकी वरदी से बचे रहना चाहता था. खुशी शातिर किस्म का युवक था. वह जानता था कि यह काम ज्यादा दिनों तक चलने वाला नहीं है, क्योंकि जल्दी ही लोग असलीनकली नोट में फर्क करना सीख जाएंगे, इसलिए वह जल्दी से जल्दी ज्यादा से ज्यादा नोट खपाने की कोशिश कर रहा था. यही वजह थी कि वह पुलिस के निशाने पर आ गया.

पूछताछ के बाद एसपी (सिटी) आलोक प्रियदर्शी ने पुलिस लाइन में प्रैसवार्ता कर के युवा नेता के कारनामों का खुलासा किया. इस के बाद पुलिस ने खुशी और उस के साथियों को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक तीनों आरोपियों की जमानत नहीं हो सकी थी.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

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अस्थमा रोगियों को हो सकती है स्लीप एपनिया

रात को सांस लेने में तकलीफ के चलते बारबार आंख खुलने की समस्या से अगर आप परेशान हैं तो इस की वजह स्लीप एपनिया हो सकती है. इस बीमारी में रात को सोते समय ऊपरी एयरवेज ब्लौक होने से सांस लेने में परेशानी होने लगती है. इस बीमारी में सांस 10 से 20 सैकंड के बीच रुकती है. लेकिन समस्या यह है कि ऐसा रात में कई बार होता है और इस वजह से रोगी रातभर सो नहीं पाता.

रात को नींद न पूरी होने के कारण उसे दिनभर नींद की झपकियां आती रहती हैं और चिड़चिड़ाहट रहती है. इस बीमारी की वजह से दुर्घटना होने का खतरा भी बढ़ जाता है.

आंकड़ों के अनुसार, औब्सट्रैक्टिव स्लीप एपनिया यानी ओएसए से 5 में से 1 वयस्क पुरुष प्रभावित है. सांस से जुड़ी बीमारियों में अस्थमा के बाद यह दूसरी ऐसी बीमारी है जिस की सब से ज्यादा पहचान हुई है. जिन लोगों को यह बीमारी होती है उन की गरदन की मांसपेशियां सोते समय शिथिल हो जाती हैं जिस से एयरवेज सिकुड़ जाते हैं और सांस लेने में तकलीफ होने लगती है.

ओएसए से उपजी बीमारियां

ओएसए से रोगी को डायबिटीज, हाई ब्लडप्रैशर, दिल की बीमारियां, स्ट्रोक और वजन बढ़ने जैसी समस्याएं हो सकती हैं. ओएसए और ब्रोनकिल अस्थमा एकदूसरे से जुड़े हुए हैं. हालिया कुछ अंतर्राष्ट्रीय अध्ययनों से पता चला है कि अस्थमा के रोगियों में ओएसए होने का खतरा ज्यादा रहता है. कई अस्थमा रोगियों को पता ही नहीं चलता कि वे ओएसए से पीडि़त हैं और इस वजह से वे ओएसए का इलाज नहीं कराते. इस कारण उन्हें बारबार अस्थमा का अटैक पड़ता है और लगातार दवाइयों की जरूरत रहती है. इसलिए, स्लीप एपनिया के बारे में जानना और इस का एडवांस तकनीकों से इलाज करा कर जिंदगी को बेहतर बनाना जरूरी है.

इलाज है जरूरी

अगर स्लीप एपनिया ज्यादा गंभीर नहीं है तो लाइफस्टाइल में बदलाव कर के ठीक किया जा सकता है. इस में वजन कम करना और सोने के तरीके को बदलने जैसे जीवनशैली से जुड़े बदलाव शामिल हैं. लेकिन गंभीर मामलों में, जहां ओएसए से डायबिटीज, हाई ब्लडप्रैशर और हार्ट अटैक जैसी बीमारियां जुड़ी हों, मैडिकल की नई तकनीकों की मदद से नजात पाया जा सकता है.

अब मैडिकल टैक्नोलौजी की सहायता से ओएसए का समय पर पता लगाया जा सकता है और इस का इलाज किया जा सकता है. मैडिकल की नई तकनीकों की मदद से स्लीप एपनिया के रोगियों की एयरवेज को खोला जाता है ताकि रोगी आसानी से सांस ले कर रातभर चैन की सांस ले सके.

उपयोगी उपकरण

सीपीएपी मशीन, मुंह के उपकरण और खासतौर पर तैयार किए गए तकियों की मदद से ओएसए को नियंत्रित किया जा सकता है. आमतौर पर मेनडीबुलर एडवांसमैंट डिवाइस यानी एमएडी का इस्तेमाल किया जाता है. इसे ऊपर व नीचे के दांतों में लगा दिया जाता है और निचले जबड़ों को आगे ला कर जीभ व तालू को स्थिर रखा जाता है, जिस से सोते समय आसानी से सांस ली जा सके.

कौंटीन्यूअस पौजिटिव एयरवे प्रैशर थेरैपी यानी सीपीएपी स्लीप एपनिया के इलाज में बेहद कारगर है. इस में नाक के ऊपर मास्क लगाया जाता है, जो नाक और मुंह में प्रैशर डालता है और इस से सोते समय सांस की नलियां खुली रहती हैं.

इस के अलावा, जीभ को स्थिर रखने का उपकरण भी इस्तेमाल किया जाता है, जो एयरवेज को खोलता है. कई तरह के तकिए भी डिजाइन किए गए हैं जिन्हें सीपीएपी मशीन के साथ या इस के बिना इस्तेमाल किया जा सकता है. जिन लोगों को सीपीएपी मशीन लगाने में मुश्किल होती है, उन के लिए कुछ नर्व स्टीमुलेशन उपकरण भी उपलब्ध हैं.

साल 2014 में शोधकर्ताओं ने नया इलाज ढूंढ़ा था जिस में जब शरीर को सांस लेने की जरूरत होगी तो सैंसर तंत्रिकाओं को स्टीमुलेट करेंगे और रोगी सांस लेने में सक्षम होगा.

सर्जरी भी है विकल्प

सर्जरी की मदद से भी ओएसए का इलाज किया जाता है. इस में ऊपरी एयरवेज, मुंह के ढांचे और मोटापे के रोगियों की बेरिएट्रिक सर्जरी कर के इलाज किया जाता है. सर्जरी रोगी की स्थिति के अनुसार ही की जाती है. हाल ही में हुई नई खोजों ने सर्जरी को काफी आसान व सुरक्षित कर दिया है जिस में लेजर एसिड युविलोपेलेटोप्लौस्टी, रेडियो फ्रिक्वैंसी एबलेशन, पेलेटल इंप्लांट और ऊपरी एयरवेज मांसपेशियों में इलैक्ट्रिकल स्टीमुलेशन शामिल हैं.

इस के अलावा, इंस्पायर नाम की थेरैपी में ब्रीदिंग सैंसर, स्टीमुलेशन लीड और छोटी बैटरी/कंप्यूटर प्रत्यारोपित किया जाता है. इस इलाज में भी काफी सफलता मिली है. सो, स्लीप एपनिया की बीमारी से जुड़े लक्षणों को पहचानें और एडवांस तकनीकों की मदद से इलाज करवाएं ताकि आप रात को चैन की नींद का लुत्फ सकें. अगर इसे सामान्य बीमारी समझ कर अनदेखा करेंगे तो बाद में यह लापरवाही बड़ी मुसीबत बन सकती है.

(लेखक नई दिल्ली स्थित नैशनल हार्ट इंस्टिट्यूट में सीनियर कंसल्टैंट हैं.)

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गर्भ के दौरान इन सेहतमंद आदतों को अपनाएं

गर्भावस्था के दौरान मां की सेहत का तुरंत और लंबे समय में बच्चे की सेहत पर गहरा प्रभाव पड़ता है. गर्भकाल की डायबिटीज और एनीमिया, यानी कि मां में एनीमिया और डायबिटीज बच्चे की सेहत पर बुरा असर डाल सकते हैं. मां में एनीमिया हो तो बच्चे का जन्म के समय 6.5 प्रतिशत मामलों में वजन कम होने और 11.5 प्रतिशत मामलों में समय से पहले प्रसव की समस्या हो सकती है. गर्भावस्था के दौरान डायबिटीज की वजह से बच्चे को 4.9 प्रतिशत मामलों में एनआईसीयू (नवजात गहन चिकित्सा इकाई) में भरती होने और 32.3 प्रतिशत मामलों में सांस प्रणाली की समस्याएं होने का खतरा रहता है.

गर्भावस्था में इन समस्याओं की वजह से पैदा हुए बच्चों में मोटापे, दिल के विकार और टाइप 2 डायबिटीज होने का खतरा उम्रभर रहता है.

गर्भावस्था के दौरान हाइपरटैंशन, जो कि 20वें सप्ताह में होता है, पर भी ध्यान देने की आवश्यकता होती है. इस से गर्भनाल (एअंबीलिकल कौर्ड) की रक्तधमनियां सख्त हो जाती हैं जिस से भू्रूण तक औक्सीजन और पोषण उचित मात्रा में नहीं पहुंच पाता. इस वजह से गर्भाशय में बच्चे की वृद्धि में रोक, जन्म के समय बच्चे का कम वजन, ब्लडशुगर में कमी और लो मसल टोन जैसी समस्याएं हो सकती हैं. कुछ मामलों में आगे चल कर किशोरावस्था में बच्चे में हाइपरटैंशन की समस्या भी हो सकती है.

मां में मोटापा हो तो गर्भावस्था में डायबिटीज होने की संभावना होती है जिस वजह से समय से पहले प्रसव और बच्चे में डायबिटीज व मोटापा होने के खतरे रहते हैं. गर्भावस्था के दौरान मां के पोषण में मामूली कमी का भी प्रतिकूल असर बच्चे की सेहत पर पड़ सकता है, जैसे कि गर्भावस्था में विटामिन डी की कमी से आगे चल कर जच्चा और बच्चा दोनों को स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं पैदा हो सकती हैं.

डा. संजय कालरा, कंसल्टैंट एंडोक्राइनोलौजिस्ट, भारती हौस्पिटल, करनाल एवं वाइस पै्रसिडैंट, साउथ एशियन फैडरेशन औफ एंडोक्राइन सोसायटीज, कहते हैं कि अगर मां को गर्भावस्था में डायबिटीज या हाइपरटैंशन हो जाए तो बच्चे की सेहत का, खासतौर पर शुरुआती दिनों में, पूरा ध्यान रखना चाहिए. बच्चे के ग्रोथ चार्ट पर नियमित ध्यान देते रहना चाहिए और रोगों की रोकथाम वाली जीवनशैली अपनानी चाहिए. आहार में आयरन, फोलेट और विटामिन बी12 की कमी की वजह से गर्भवती महिलाओं में एनीमिया होने की संभावना काफी ज्यादा होती है.

गर्भावस्था में आयरन की अत्यधिक जरूरत होने की वजह से यह समस्या और भी बढ़ जाती है. एनीमिया की वजह से गर्भनाल से भ्रूण तक औक्सीजन जाने में कमी से शिशु के विकास में कमी हो सकती है और एंडोक्राइन ग्रंथि की कार्यप्रणाली पर असर पड़ सकता है.

भारतीय महिलाओं को आयरन और हेमाटोपौयटिक (रक्तोत्पादक) विटामिन देने चाहिए ताकि गर्भावस्था से पहले और गर्भावस्था के दौरान हीमोग्लोबीन का उचित स्तर बना रहे. गर्भावस्था में डायबिटीज और हाइपरटैंशन के  आने वाले जीवन में पड़ने वाले प्रभावों से बचने के लिए मां और बच्चे दोनों को ही रोगों की रोकथाम वाली जीवनशैली अपनानी चाहिए.

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नेताजी कहिन जनता से, भूखे मत मरना

गांव में अफरातफरी  थी. लोगों की आंखें आसमान की तरफ लगी थीं. वे आसमान में पानी के लिए नहीं, बल्कि इसलिए टकटकी लगाए हुए थे, क्योंकि वहां हैलीकौप्टर से मंत्रीजी आने वाले थे. मंत्रीजी वहां इसलिए आ रहे थे, क्योंकि अखबारों में यह खबर छपी थी कि उस गांव में कुछ लोग भूख से मर गए हैं. मंत्रीजी को इस बात पर कतई यकीन नहीं था कि कोई भूख से मरा होगा. उन का मानना था कि आदमी अपने कर्मों से मरता है, भूख तो केवल एक बहाना है. इस में सरकार क्या करे. पर वे अपने मन की इन बातों को लोगों के सामने जाहिर नहीं करना चाहते थे. इस से वोट बैंक पर बुरा असर पड़ सकता था.

फिलहाल मंत्रीजी जिला हैडक्वार्टर पहुंच चुके थे. अफसरों के साथ बैठक और लंच के बाद गांव के दौरे पर जाने का कार्यक्रम था. बाहर विरोधी दल के लोग काले झंडे दिखा रहे थे. पुलिस दूर से ही उन्हें डंडे दिखा रही थी. अभी तक केवल देखनेदिखाने का ही खेल चल रहा था. आगे क्याक्या होना था, यह किसी को पता नहीं था. भीतर अफसरों के साथ मंत्रीजी की मीटिंग चल रही थी. मंत्रीजी ने मिनरल वाटर का घूंट भरा. दिन में वे केवल मिनरल वाटर ही पीते थे. उन्होंने बड़े अफसर से सवाल किया, ‘‘क्या यह सच है कि आप के जिले में लोग भूख से मरे हैं  ऐसी खबर छपने पर आप को शर्म आनी चाहिए. आप को पता है कि ऐसी खबरों से सरकार और हमारी इमेज पर कितना बड़ा धब्बा लग सकता है ’’

पीछे खड़ा एक छोटा अफसर, जिस का तबादला मंत्रीजी ने रुकवा दिया था, बुदबुदाया, ‘‘सर्फ ऐक्सल है न.’’ उधर मंत्रीजी कह रहे थे, ‘‘भूख से मरे या प्यास से, खबर तो नहीं छपनी चाहिए थी. कौन है जनसंपर्क अधिकारी  उसे तत्काल सस्पैंड करो, समझे. बोलिए, क्या कहना चाहते हैं आप ’’ उस अधिकारी ने बड़ी तमीज से अर्ज किया, ‘‘सर, यह खबर सरासर गलत है. कुछ लोग मरे जरूर हैं, पर भूख से नहीं, वे उलटीसीधी चीजें खाने से मरे हैं. इस में प्रशासन की कोई गलती नहीं है. उन की पोस्टमार्टम रिपोर्टों में भी लिखा हुआ है कि उन के पेट में आम की गुठलियां पाई गई थीं, जो जहरीली थीं.

‘‘सर, वे लोग बहुत चालाक थे, यानी आम के आम और गुठलियों के दाम. भूख से मरने का तो कोई सवाल ही नहीं उठता.’’

मंत्रीजी ने ऐसे सिर हिलाया, जैसे उन के मन की बात कह दी गई हो. वे बोले, ‘‘लगता तो यही है, यह सरकार को बदनाम करने की साजिश है. इस के पीछे पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी और विदेशियों का हाथ हो सकता है. क्या इस बारे में आप लोगों ने पता लगाया है ’’

अधिकारी महोदय ने जवाब दिया, ‘‘श्रीमानजी, हम भी इस की जांच करा रहे हैं.’’

मंत्रीजी ने पूछा, ‘‘क्या इस जिले में अनाज की कोई कमी है ’’

अधिकारी बोले, ‘‘नहीं सर, गोदाम भरे पड़े हैं. सैकड़ों टन अनाज तो बाहर ही सड़ गया है. ऐसी हालत में भूख से मरने का तो सवाल ही नहीं उठता.’’

मंत्रीजी झुंझला कर बोले, ‘‘पर सवाल तो उठ ही गया है. विरोधी लोग चीखचीख कर रोज यही सवाल उठा रहे हैं. उस का क्या करोगे ’’

अफसर समझदार था. वह जानता था कि ऐसी हालत में चुप रहना ही समझदारी है.

मंत्रीजी ने फिर पूछा, ‘‘क्या मरने वाले गरीबी रेखा से नीचे के परिवार के सदस्य थे’’

अधिकारी महोदय ने जवाब दिया, ‘‘बिलकुल नहीं श्रीमानजी, गरीबी रेखा से नीचे के परिवार के लोगों का भूख से मरना नामुमकिन है. क्योंकि इस सूची में शामिल सभी लोगों के पास 10-15 एकड़ जमीन और नौकरी है. इन में से कुछ आप के दल के हैं और कुछ दूसरे रसूख वाले लोग हैं.

‘‘भूख से मरने वालों… सौरी सर, मेरा मतलब है कि आम की गुठली खा कर मरने वालों का तो नाम भी इस सूची में नहीं था. फिर गरीबी की वजह से मरना…  श्रीमानजी, यह अफवाह है.’’

मंत्रीजी ने सिर हिलाया और बोले, ‘‘हमें भी ऐसा ही लगता है. हम ने देश की बड़ीबड़ी पत्रपत्रिकाओं में इश्तिहार दे कर देश की जनता को यह बता दिया है कि हमारे यहां अनाज की कोई कमी नहीं है. गोदाम अनाजों से भरे पड़े हैं.’’

यह सुन कर सब लोग खुश हो गए. फिलहाल अपना पेट भरने का समय हो गया था. एक अधिकारी, जो इस के इंतजाम में सुबह से ही जुटा हुआ था, बोला, ‘‘सर, लंच का समय हो गया है. लंच करने चलिए, वरना पत्रकार घेर लेंगे. हम ने उन के खानेपीने का इंतजाम अलग से किया है. हम उन्हें आप की फिक्र से भी वाकिफ करा देंगे.’’

मंत्रीजी भी थक चुके थे, इसलिए मीटिंग बरखास्त करते हुए बोले, ‘‘ठीक है, तो लंच कर लिया जाए.’’

मंत्रीजी लंच के लिए चले गए, तो उन के साथ बड़ेबड़े अफसर और उन की पार्टी के कुछ छुटभैए नेता भी डाइनिंग रूम में घुस गए.

वहां दरवाजे पर एक आदमी खड़ा था, जो चेहरा पहचान कर ही लोगों को घुसने दे रहा था. एकदो लोगों से उस की कुछ बहस भी हुई. जो घुस गए, वे अपनी कामयाबी पर इठलाने लगे. जो रह गए, वे भड़ास निकाल रहे थे.

एक आदमी कुछ ज्यादा ही बोल रहा था, ‘‘देखो, वहां लोग भूखे मर रहे हैं और यहां मुरगमुसल्लम के साथ काजूकिशमिश पर हाथ साफ किए जा रहे हैं.’’

एक अफसर ने जब यह सुना, तो हाथ पकड़ कर उसे भीतर खींच लाया और उस के मुंह में एक पूरा भुना हुआ मुरगा ठूंस दिया. उस का मुंह बंद हो गया.

मंत्रीजी चटकारे ले कर खाना खा रहे थे. वे बोले, ‘‘खाना बढि़या बना है. रसोइया होशियार लगता है.’’

खाने का इंतजाम करने वाले अफसर की बांछें खिल गईं. उस ने कहा, ‘‘जी हां सर, काफी पुराना रसोइया है. अब तक सैकड़ों मंत्रियों और अफसरों को खाना खिला चुका है.

‘‘वह जानता है कि किस मौके पर क्या पकाना चाहिए. बाढ़ के समय मछली, सूखे के समय मुरगा और चक्रवात के समय दूसरे पक्षियों के बड़े जायकेदार आइटम पकाता है.

‘‘सर, आज जो मुरगे पके हैं, वे उसी गांव से मंगाए गए थे, जिस का आप को दौरा करना है.’’

मंत्रीजी बोले, ‘‘अच्छा, उसी गांव का मुरगा है. अरे भाई, जब वहां खाने को इतने मुरगे थे, तो लोगों को आम की गुठलियां खाने की क्या जरूरत थी. मुरगा भी तो खा सकते थे,’’ कह कर मंत्रीजी ने जोरदार ठहाका लगाया.

लंच के बाद थोड़ी देर आराम कर के मंत्रीजी का हैलीकौफ्टर उड़ा. अफसरों की कारों और जीपों का काफिला लंच के फौरन बाद ही रवाना हो गया था. उस गांव के लोगों के इंतजार की घडि़यां खत्म हुईं. हैलीकौप्टर नीचे उतरा.

मंत्रीजी हैलीकौप्टर से उतर कर आए. लोग उन को देख कर खुश हो गए.

मंत्रीजी के साथ हैलीकौप्टर से बड़ेबड़े बंडल भी उतारे गए. जनता ने समझा, शायद मंत्रीजी अपने साथ राहत का सामान लाए हैं, जबकि ऐसा होता नहीं है. आमतौर पर राहत की घोषणा दौरे के बाद राजधानी में पत्रकार सम्मेलन में की जाती है. यहां भी कुछ ऐसा नहीं था. वह सामान राशन नहीं कुछ और था.

अफसरों और पार्टी कार्यकर्ताओं को मंत्रीजी निर्देश दे रहे थे, ‘‘देखिए, इन बंडलों में ‘कोई भूख से नहीं मरेगा’ इश्तिहार वाले अखबार और पोस्टर हैं, जिस में हमारी सरकार ने बताया है कि देश में कितना अनाज है. साथ ही, गरीबों को मुफ्त अनाज देने की कितनी योजनाएं हैं. इन्हें सारे गांव में बंटवा दीजिए.

‘‘ध्यान रहे, उन परिवारों को, जिन के यहां मौतें हुई हैं, ये पोस्टर काफी तादाद में दें. गरीबी रेखा से नीचे के परिवारों को इन सब की 4-4 प्रतियां दी जाएं. इस में लापरवाही हुई, तो दोषी अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्यवाही की जाएगी.

‘‘चलिए, अब मालाएं रहने भी दीजिए, गरदन दुखने लगी है. सभा की जगह कहां है  वैसे भी हमें काफी देर हो गई है.’’

आखिर मंत्रीजी सभा की जगह पर पहुंचे. सभी छुटभैए नेता सरकार और मंत्रीजी की शान में तारीफ के पुल बांध रहे थे.

उस के बाद मंत्रीजी ने माइक संभाला, ‘‘भाइयो और बहनो, जब हमें यह पता चला कि इस गांव के कुछ लोग भूख से मरे हैं, तो हमें बेहद दुख हुआ. पर यहां आ कर मालूम हुआ है कि

वे भूख से नहीं, आम की जहरीली गुठली खा कर मरे हैं, तो हमें चैन आया. उन्हें आम की गुठली नहीं खानी चाहिए थी.

‘‘देखिए, देश के गोदाम अनाजों से भरे पड़े हैं. अनाज की कोई कमी नहीं है. अनाज गोदामों में पड़ापड़ा सड़ रहा है. यह मरने वालों की जल्दबाजी है. उन्हें हमारे इश्तिहार का इंतजार करना चाहिए था.

‘‘हम लोग टैलीविजन पर और अखबारों में जनता को समझाते हैं कि गंदा पानी नहीं पीना चाहिए और उलटासीधा भोजन नहीं करना चाहिए. कितनी बड़ी कंपनियां मिनरल वाटर और फास्ट फूड बना रही हैं. हमें उन का इस्तेमाल करना चाहिए. पर जो हो गया, सो हो गया.

‘‘हमें मरने वालों को ले कर गहरी हमदर्दी है. मैं अपने साथ ढेर सारे पोस्टर और अखबार लाया हूं, जिन में देश के बड़ेबड़े नेताओं के बयान और सरकारी इश्तिहार छपे हैं कि इस देश में अनाज की कोई कमी नहीं है.

‘‘आप लोगों तक शायद ये चीजें नहीं पहुंच पाती हैं, वरना आप लोग मरते नहीं. मेरा मतलब उन लोगों से है, जो मर गए हैं.

‘‘हमारे देश में ऐसे कई संतमहात्मा हुए हैं, जो महीनों तक कुछ नहीं खाते थे या घासपात चबा कर जिंदा रहते थे. आप भी उन्हीं संतों की संतान हैं. इस तरह भूख से मरना आप को शोभा नहीं देता. इस से देश बदनाम होता है. मरने के और भी कई रास्ते हैं. ‘‘मेरी आम जनता से अपील है कि वह भूख से न मरे, क्योंकि हमारे देश के गोदामों में अनाज भरा पड़ा है. ये इश्तिहार और पोस्टर इस बात के गवाह हैं. मुझे यकीन है कि सरकार की इस कार्यवाही से अब कोई भूखा नहीं मरेगा. ‘जय हिंद’.’’ भूखे लोगों के मुंह से धीरे से ‘जय हिंद’ निकला. कुछ दिनों बाद उस गांव में कुछ और लोग मर गए. उन के पोस्टमार्टम के बाद सरकार ने बयान दिया कि उन लोगों की मौत भूख से नहीं हुई, क्योंकि उन के पेट में ‘भूख से कोई नहीं मरेगा’ के इश्तिहारों और पोस्टरों की कतरनें मौजूद थीं.

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6 साल की उम्र में हुआ मेरा रेप : डेजी ईरानी

बौलीवुड एक ऐसी जगह है जहां जितनी चकाचौंध है उसके पीछे उतने ही घरे अंधेरे भी हैं. ऐसा नहीं है कि ये सब केवल आज से हो रहा है बल्कि आज से 60 साल पहले के हालात भी ऐसे ही थी और ये दावा हम नहीं कर रहे हैं बल्कि ये कहना है फिल्म इंडस्ट्री की ही एक जानी मानी अभिनेत्री का. अपने दौर के लगभग हर बड़े सुपरस्टार के साथ स्क्रीन स्पेस शेयर कर चुकीं डेजी ईरानी ने अपने कुछ पुराने बुरे वक्त के बारे में बात करते हुए एक इंटरव्यू में बेहद चौंकाने वाले खुलासे किए हैं.

6 साल की उम्र में हुआ था रेप

डेजी ईरानी ने मिड डे से बात करते हुए बताया कि महज 6 साल की उम्र में उनके साथ रेप हुआ था. उन्होंने बताया, ”वो शख्स कहने को तो मेरा मेंटर था. वो मुझे फिल्म ‘हम पंछी एक डाल के’ की शूटिंग के लिए अपने साथ मद्रास ले गया था. उसी दौरान एक रात होटल के कमरे में उसने मुझे प्रताड़ित किया और मेरी बैल्ट से पिटाई भी की. उसने मुझे धमकी दी कि अगर मैंने किसी को भी इसके बारे में बताया तो वो मुझे जान से मार देगा और मैंने उस पर यकीन करके कभी किसी को इसके बारे में नहीं बताया.”

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उन्होंने बताया ”वो शख्स अब जा चुका है और मर गया है. उसका नाम नजर था और उसके फेमस सिंगर जोहरा बाई अंबालावाली से संबंध थे. जिससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि फिल्म इंडस्ट्री में उसके अच्छे संबंध थे. मेरी मां मुझे हर हालात में स्टार बनाना चाहती थी. मैंने मराठी फिल्म बेबी से एक्टिंग में डेब्यू किया था. इसलिए नजीर अंकल मुझे अपने साथ मद्रास ले गए थे. मुझे साफ तौर पर तो सब याद नहीं लेकिन कुछ-कुछ क्षण मुझे याद आते हैं. लेकिन एक चीज मैं अभी तक नहीं भूली और वो है वो जानलेवा दर्द और उस शख्स का चेहरा जब वो मुझे बेल्ट से मारता था. ”

कास्टिंग काउच का भी हुईं शिकार

डेजी ने अपने साथ हुई शारीरिक हिंसा और प्रताड़ना के बाद फिल्म इंडस्ट्री में होने वाले कास्टिंग काउच के बारे में भी खुलकर बात की. उन्होंने बताया ‘मैं जब 15 साल की थी. मेरी मां ने मुझे साड़ी पहनने के लिए कहा और मुझे प्रोड्यूसर मल्लिकचंद कोचर के साथ जो कि एक फिल्म बनाने की तैयारी में थे, मुझे औफिस में उनके साथ अकेला छोड़ दिया. उस वक्त उस निर्माता का दफ्तर मराठा मंदिर के पास कहीं मौजूद था. ये सब बेहद अजीब है. उस दौरान वो मेरे पास सोफे पर आकर बैठ गया और मुझे छूने लगा. मैं जानती थी वो मुझसे क्या चाहता था और उसके दिमाग में क्या चल रहा था. मैंने तुरंत अपने नए स्पंज उतारकर उसके हाथ में दे दिए.”

जीनत अमान ने कारोबारी के खिलाफ दर्ज कराया रेप का केस

मुंबई में बौलीवुड की पूर्व अभिनेत्री जीनत अमान ने एक व्‍यापारी के खिलाफ बलात्‍कार का मामला दर्ज कराया है. मुंबई के जुहू पुलिस स्टेशन पर केस दर्ज किए जाने के बाद मामला क्राइम ब्रांच को सौंप दिया गया, और पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार कर लिया है.

याद दिला दें कि पुराने जमाने की इस मशहूर फिल्‍म अभिनेत्री ने एक महीने पहले भी इसी कारोबारी पर उनका पीछा करने और उन्हें धमकाने के आरोप लगाये थे. जिसके बाद सरफराज उर्फ अमन खन्ना नामक आरोपी कारोबारी को मुंबई पुलिस ने फरवरी में हिरासत में लिया था. पुलिस ने सरफराज के खिलाफ पीछा करने 354 (D) और महिला को सरेआम धमकाने के खिलाफ 509 आईटी एक्ट के तहत मामला दर्ज किया था.

इस अभिनेत्री ने जुहू थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई थी कि सरफराज उर्फ अमन खन्ना नामक एक कारोबारी उनके घर आया और उनके गार्ड के साथ बदतमीजी और मारपीट की. उसने उन्हें भी नतीजा भुगतने की धमकी दी. अभिनेत्री ने यह भी आरोप लगाया है कि सरफराज उन्हें पिछले कुछ दिनों से व्हाट्सएप पर अश्लील मैसेज भेज रहा था. जिससे वह काफी परेशान थीं.

बता दें कि अमन खन्ना कई तरह के कारोबार करता है. वह फिल्म मेकिंग और रियल स्टेट के कारोबार में सक्रिय है. साथ ही उसे मानसिक रूप से भी परेशान बताया जा रहा है. उसके खिलाफ मुंबई के बांगुर नगर में भी कई आपराधिक मामले दर्ज हैं.

फलफूल रही है विरासत की राजनीति

भारत में ही नहीं, पूरी दुनिया में राजनीति अब पुश्तैनी पेशा बन गई है. जो भी राजनीति में एक बार सफल हो जाता है वह अपने बच्चों को अन्य व्यवसाय में भेजने के बजाय राजनीति में ही भेजना पंसद करता है. भारत में गांधी परिवार, सिंधिया परिवार, मुलायम परिवार, लालू यादव परिवार, हेमवती नंदन बहुगुणा परिवार, बाल ठाकरे परिवार, देवीलाल परिवार, बादल परिवार और करुणानिधि परिवार जैसे बहुत सारे उदाहरण भरे पड़े हैं. विश्वस्तर पर देखें तो अमेरिका, श्रीलंका, क्यूबा, उत्तर कोरिया, सिंगापुर, बंगलादेश और पाकिस्तान तक तमाम देशों में राजनीति अब विरासत की बात हो गई है. इस के अपने सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक कारण हैं.

भारत में नेहरू-गांधी परिवार की आलोचना कर राजनीति की शुरुआत करने वाले दल खुद भी परिवारवाद में डूब गए. भाजपा जैसे दल, जो परिवारवाद की आलोचना करते थे, अब वे भी परिवारवाद के शिकार हो गए हैं.

विदेशों में भी विरासत की सियासत बहुत पुरानी है. अमेरिका में बहुत पहले ही जस्टिन और एडम्स के परिवार राजनीति में एक के बाद एक कर के आगे बढ़े. इस के बाद वहां पर ही कैनेडी और क्ंिलटन परिवार इस विरासत को आगे बढ़ाने में लग गए. ये परिवार तो ऐसे हैं जिन के लोग राजनीति में आगे बढ़े और सब से बड़े पदों पर बैठे नजर आते हैं.

अमेरिका में बहुत सारे ऐसे परिवार भी हैं जिन के बच्चे सीनेट तक पहुंचे हैं. अमेरिका का एक सर्वे बताता है कि एक सामान्य बच्चे के मुकाबले नेताओं के बच्चों में सीनेटर बनने की संभावना 6,000 गुना अधिक होती है. अमेरिका के अलावा दूसरे देशों में भी हालत वैसी ही है. यही वजह है कि नेताओं के बच्चे तेजी से इस दिशा में अपना कैरियर बनाने में लगे हैं. पाकिस्तान में नवाज शरीफ परिवार और भुट्टो परिवार लोकतंत्र के समर्थक जरूर रहे हैं पर वहां भी लोकतंत्र की आड़ में परिवारवाद खूब फलफूल रहा है.

भारत के पड़ोसी मुल्क बंगलादेश और श्रीलंका में भी विरासत की सियासत का रंग देखने को मिलता है. शेख हसीना और खालिदा जिया ने बंगलादेश में परिवारवाद को बढ़ावा दिया. श्रीलंका में भंडरनायके, रणतुंगा परिवार राजनीति की मुख्यधारा में हैं. पूरी दुनिया में ऐसे देशों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है जहां लोकतंत्र में परिवारवाद पनप रहा है. इस की अपनी कुछ मूल वजहें भी हैं.

आज के समय में चुनाव लड़ना सरल नहीं है. एक बार जो नेता अपने को स्थापित कर लेता है वह ब्रैंड बन जाता है. उस के ब्रैंड के सहारे पूरा परिवार आगे बढ़ता है. ऐसे परिवार में पैदा होने वाले लोगों को जनता स्वत: राजा मान लेती है. उन के पास पैसा और चुनाव लड़ने की समझ होती है. इस के प्रभाव को ले कर पूरी दुनिया में अलगअलग तरह के विचार हैं. कुछ लोग इस को लोकतंत्र के लिए सही मानते हैं, कुछ लोग इस को खतरा मानते हैं. दोनों विचारधाराओं के बीच परिवारवाद पूरी तरह से आगे बढ़ रहा है.

परिवारवाद की नई पौधशाला

देश में नेहरूगांधी और मुलायम परिवार की परिपाटी अब हर नेता के लिए नजीर का काम कर रही है. उत्तर प्रदेश में मुलायम परिवार की सदस्य अपर्णा यादव और अनुराग यादव राजधानी लखनऊ से चुनाव मैदान में उतरे. मुलायम परिवार पहली बार पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अपने मजबूत गढ़ से बाहर निकल कर चुनाव मैदान में उतरा पर हार का सामना करना पड़ा.

चुनाव दर चुनाव राजनीति में परिवारवाद बढ़ता जा रहा है. परिवारवाद की यह बीमारी किसी एक दल की बीमारी नहीं रह गई है. हर दल इस हमाम में एक ही हालत में है. उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में बड़ी संख्या में परिवारवाद के उदाहरण दिखे. सब से बड़ी बात यह है कि 30 साल से नीचे के करीब आधा दर्जन युवा परिवारवाद के सहारे चुनाव मैदान में रहे.

परिवारवाद का विरोध करने वाली भाजपा के तमाम लोग चुनाव जीते. आजम खां-अब्दुल्ला खां, मुख्तार अंसारी-अब्बास अंसारी और स्वामी प्रसाद मौर्य-उत्कृष्ट मौर्य के रूप में 3 जोडि़यां ऐसी हैं जिन में पितापुत्र दोनों ने एकसाथ अलगअलग विधानसभा क्षेत्रों से चुनाव लड़ा. परिवारवाद के रूप में ज्यादातर नेताओं ने अपने बेटों को अपना उत्तराधिकारी बनाया है. जहां बेटे नहीं, वहां बेटियों को आगे लाया जा रहा है.

अब तक परिवारवाद के नाम पर भाईभतीजे ही चुनाव लड़ते थे. अब यह दायरा भी सिमटता जा रहा है. नेताओं को अब अपने परिवार के लोग नहीं, बल्कि करीबी लोग उत्तराधिकार के लिए चाहिए. इस में पत्नी, बेटा और बेटी सब से बड़ी चाहत बन गई हैं. पहले यह परेशानी ऊंची जातियों के लोगों में दिखती थी. अब दलित और पिछड़ी जातियों में भी यही बीमारी पनपने लगी है. बड़ी संख्या में दलित और पिछड़े नेता अपने लोगों को राजनीति में ला रहे हैं.

युवाओं ने संभाली कमान

रायबरेली जिले की रहने वाली अदिति सिंह ने अपने पिता अखिलेश सिंह की पारंपरिक सीट रायबरेली विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा और जीत हासिल की. अदिति ने अमेरिका से एमबीए की डिगरी हासिल की है.

पिता की बीमारी के बाद वे उन की विरासत को संभालने का काम कर रही हैं. राजनीति में उतरने से पहले वे लंदन के एक फैशन हाउस में काम कर रही थीं. उन्होंने अपना जौब छोड़ कांग्रेस के टिकट पर रायबरेली की सदर विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा. अदिति रायबरेली जिले के पिछड़ेपन को दूर करने के लिए काम करना चाहती हैं. जिस चुनाव में कांग्रेस के दिग्गज नेता चुनाव हारे उस चुनाव में अदिति ने जीत कर दिखा दिया कि युवाओं में कितना दम है.

अब्दुल्ला खान सपा के नेता आजम खान के बेटे हैं. वे रामपुर की स्वार-टांडा विधानसभा सीट से चुनाव जीत कर विधायक बने. आजम खान रामपुर से विधानसभा का चुनाव लड़े और जीत हासिल की. पितापुत्र की जोड़ी ने एकसाथ चुनाव मैदान में जीत हासिल की.

अब्दुल्ला के पास एमटेक की डिगरी है. 27 साल के अब्दुल्ला अपने पिता द्वारा बनाई गई जौहर यूनिवर्सिटी के सीईओ हैं. 2014 के लोकसभा चुनाव में जब चुनाव आयोग ने आजम के चुनावप्रचार करने पर बैन लगा दिया था तब अब्दुल्ला ने अकेले ही चुनावप्रचार किया था.

अब्बास अंसारी बाहुबली मुख्तार अंसारी के बेटे हैं. वे नैशनल स्तर के शूटर हैं. घोसी विधानसभा सीट से वे चुनाव लड़े और हार गए.

प्रतीक भूषण सिंह गोंडा सदर सीट से चुनाव मैदान में थे और जीत हासिल की. वे बलरामपुर से सांसद बृजभूषण के बेटे हैं. प्रतीक ने मेलबर्न से एमबीए किया है. वे रेसलर बनना चाहते थे, लेकिन घर का माहौल पौलीटिकल था. उन्होंने 2014 के लोकसभा चुनाव में अपने पिता बृजभूषण के लिए प्रचार किया था.

नितिन अग्रवाल हरदोई से सपा के नेता नरेश अग्रवाल के बेटे हैं. 34 साल के नितिन ने 2004 में पुणे से एमबीए की डिगरी हासिल की. 2012 से वे राजनीति में सक्रिय हैं. 2012 में वे पहली बार विधायक बने. नितिन ने पुणे के सिंबोएसिस इंस्टिट्यूट से एमबीए किया है. अखिलेश सरकार में नितिन मंत्री रहे.

पंकज सिंह भाजपा के प्रमुख नेता व केंद्रीय गृहमंत्री और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री राजनाथ सिंह के बेटे हैं. 30 साल के पंकज ने एमिटी यूनिवर्सिटी से एमबीए किया है. पंकज 2002 से राजनीति में सक्रिय हैं. पार्टी में वे अलगअलग पदों पर रहे हैं. पहली बार वे विधायक बने, उन्होंने नोएडा विधानसभा क्षेत्र से जीत हासिल की.

भाजपा के दूसरे प्रमुख नेता उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और राजस्थान के राज्यपाल कल्याण सिंह के पोते संदीप सिंह भी पहली बार चुनाव जीत कर विधायक बने. संदीप के पिता राजवीर सिंह एटा से सांसद हैं. संदीप ने लंदन की लीड्स बैकेट यूनिवर्सिटी से एमए किया है. वे अपने दादा कल्याण की पारंपरिक सीट से चुनाव लड़े. 26 साल के संदीप कल्याण सिंह की तीसरी पीढ़ी के सदस्य हैं. उत्तर प्रदेश की योगी सरकार में वे मंत्री बने.

तनुज पुनिया कांग्रेस के सांसद पी एल पुनिया के बेटे हैं. वे बाराबंकी की जैदपुर विधानसभा सीट से चुनाव लड़े और हार गए. तनुज ने आईआईटी रुड़की से कैमिकल इंजीनियरिंग की डिगरी हासिल की है. 32 साल के तनुज का सपना आईएएस बनने का था. लेकिन तनुज के पिता पी एल पुनिया चाहते थे कि वह राजनीति में आए, इस कारण वे राजनीति में आ गए.

उत्कृष्ट मौर्य ऊंचाहार सीट से चुनाव लड़े और हार गए. वे बसपा के नेता रहे स्वामी प्रसाद मौर्य के बेटे हैं जो अब भाजपा में हैं. 31 साल के उत्कृष्ट ने कानपुर के छत्रपति साहूजी महाराज विश्वविद्यालय से 2016 में बीए किया है.

सकते में कर्मठ कार्यकर्ता

जिस तरह से बड़ी संख्या में नेता अपने परिवार के लोगों को राजनीति में ला रहे हैं, वह कर्मठ कार्यकर्ताओं के लिए परेशानी का सबब बनता जा रहा है. अपने परिवार के लोगों को स्थापित करने के लिए नेताओं को अपनी विचारधारा को छोड़ने में भी कोई एतराज नहीं रह गया है. अब परिवार के लोगों को मनचाहा टिकट न मिलने से नेता अपने दल को छोड़ कर दूसरे दल में शामिल हो रहे हैं. उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में दलबदल कोई मुद्दा नहीं रह गया. हर दल ने दूसरे दलों के लोगों को बखूबी टिकट दिया.

जनता के लिए भी दलबदल और परिवारवाद कोई मुद्दा नहीं रह गया. अभी भी चुनाव का मुख्य मुद्दा जाति और धर्म ही है. जनता को जातिधर्म में उलझा कर नेता राजनीति को कुछ परिवारों तक समेट कर रख देने के पक्ष में लामबंद हैं. बड़े नेता अपने परिवार के लोगों को संसद और विधानसभा ले जाने के प्रयास में रहते हैं, छोटे कार्यकर्ताओं के परिवार को पंचायत और पार्षद चुनावों में मौके दे कर उन की जबान को बंद कर दिया जाता है.

सफल है विरासत की राजनीति

असल में राजनीति अब पहले की तरह सरल नहीं रह गई है. यहां धनबल और बाहुबल दोनों जरूरी हो गया है. दूसरे कैरियर के मुकाबले यहां उतारचढ़ाव थोड़ा ज्यादा हो सकता है पर मुनाफा दूसरे कैरियर के मुकाबले बहुत ज्यादा है. नेता हार कर भी नेता बना रहता है. अगर कोई किसी घोटाले या अपराध में फंस भी जाए तो भी राजनीति नेताओं के बच्चों को मरने नहीं देती. उन को सहारा दे कर मुख्यधारा में ले आती है. नेताओं के बच्चों को छोटेमोटे पद हर दल की सरकार में मिल जाते हैं. पूरे देश की विधानसभाओं में ऐसी बहुत सारी कमेटियां बनी हैं जिन में ये सदस्य बन जाते हैं, बैंकों में चेयरमैन बन जाते हैं, सार्वजनिक उपक्रमों में चेयरमैन हो जाते हैं. हजारों रास्ते ऐसे हैं जहां मुख्यधारा से कम लाभ नहीं है.

उदाहरण के लिए उत्तर प्रदेश में मुलायम परिवार की बात करें तो गांव के प्रधान से ले कर मुख्यमंत्री तक उन के परिवार के लोग कहीं न कहीं किसी न किसी पद पर बैठे हैं हालांकि मुख्यमंत्री पद अब इस परिवार के पास नहीं है. विरोधी दल के नेता भी नेताओं के परिवार पर मेहरबान होते हैं. क्योंकि उन का आपस में मिलनाजुलना होता है. उन की दुश्मनी केवल वोट मांगने के समय होती है. तमाम ऐसे नेता हैं जिन के काम विरोधी नेताओं के समय में भी असरदार तरीके से होते हैं.

राजनीति को सेवा की परिभाषा से अलग करने की जरूरत है. यह अब एक तरह का पेशा बन गया है. पार्टी चलाने के लिए पैसे की जरूरत उसी तरह से होती है जिस तरह से फैक्टरी चलाने के लिए होती है. यह भूल जाना चाहिए कि बिना पैसा लिए कोई जनता के लिए काम करेगा. केवल पार्टी की ही बात नहीं है, अगर कोई स्वयंसेवी संस्था भी चलाता है तो उस को भी संचालक से ले कर चपरासी तक का खर्च उठाना ही पड़ता है. पार्टियां भी अपने काम करने वालों को वेतन देती हैं. ऐसे में हर नेता को अच्छाखासा पैसा चाहिए. पार्टी के साथ कुछ पैसा नेता अपने व परिवार के लिए भी बचा कर रखना चाहता है, जिस से खराब समय में, जब वह सत्ता में न रहे, उस को भूखों न मरना पड़े.

पूरी दुनिया में राजनीति अब एक कैरियर की तरह हो गई है. यह सच है कि नेताओं के बच्चों के सफल होने की संभावना हजारगुना अधिक होती है पर कई बार मेहनत करने वाले और अवसर का लाभ उठाने वाले दूसरे लोग भी सफल हो जाते हैं.

यह कैरियर उसी तरह से मुश्किलभरा है जैसे एमबीए, डाक्टर या इंजीनियर बनना. इस में बुद्धि के साथ शरीर का बल भी ज्यादा चाहिए. सैकड़ों लोगों से मिलना, उन को याद रखना, उन की खुशी के लिए उन के जैसा व्यवहार करना सीखना सरल नहीं होता है. इस के अलावा झगड़े कराने से ले कर निबटाने की कला, वाकपटु होना, भाषण देना आना चाहिए. राजनीति नेता के परिवार के लोग करें या आम परिवारों के, ध्यान रखने वाली बात यह है कि समाज को सही दिशा देने का काम करें. सही नेता ही समाज को नई दिशा देते हैं, सही नेता ही सरकार को मनमानी करने से रोकते हैं, तो कभी वे सरकार भी चलाते हैं.

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