मरोड़ दी आध्यात्म की टांग

आर्ट औफ लिविंग का हुनर और आकर्षक आयुर्वेदिक दवाइयां बेच रहे आध्यात्मिक गुरु श्रीश्री रविशंकर किस कोने में खिसियाए से बैठे अपना गम मिटा रहे हैं, यह किसी को नहीं पता पर यह हर किसी को मालूम है कि उन्हें आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने बुरे तरीके से लताड़ते हुए जता दिया था कि बातबात में सुलह की सरपंची ठीक नहीं होती.

हुआ यों था कि रविशंकर को गलतफहमी हो आई थी कि अगर पहल और मध्यस्थता की जाए तो राममंदिर विवाद सुलझ भी सकता है. जोशजोश में वे लखनऊ जा कर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सहित अयोध्या के संतों, महंतों और मुसलिम धर्मगुरुओं से मिले भी.

इस पर मोहन भागवत ने सर्द लहजे में इशारा कर दिया कि वे मंदिर विवाद के फटे में टांग न अड़ाएं. इस बेइज्जती से रविशंकर को सुकून से रहने का फार्मूला मिल गया कि उन्हें मंदिर विवाद सुलझाने के लिए तो पैदा नहीं किया गया था.

VIDEO : फेस मेकअप का ये है सबसे आसान तरीका

ऐसे ही वीडियो देखने के लिए यहां क्लिक कर SUBSCRIBE करें गृहशोभा का YouTube चैनल.

मेरी दोस्ती एक लड़के से है. पिछले कुछ दिनों से मुझे अवौइड करने लगा है. क्या करूं.

सवाल
मैं 28 वर्षीय कामकाजी, अविवाहित युवती हूं. पिछले दिनों फेसबुक पर मेरी दोस्ती एक लड़के से हुई. हम रोज मैसेंजर पर बात करते. लेकिन पिछले कुछ दिनों से वह मुझे अवौइड करने लगा है. मेरे मेसैजेस का ठीक से जवाब भी नहीं देता. मुझे समझ नहीं आता मेरी गलती क्या है? मैं खुद को उस से भावनात्मक रूप से जुड़ा हुआ पाती हूं इसलिए उस का यह व्यवहार मुझे दुखी करता है. मैं ने उस से कई बार उस के इस व्यवहार का कारण जानने की कोशिश की पर वह हमेशा कुछ नहीं कह कर बात टाल देता है. मैं उस के इस व्यवहार का क्या अर्थ समझूं?

जवाब
वह लड़का सिर्फ आप के साथ टाइम पास कर रहा था. अब उस को आप में कोई रुचि नहीं रही इसलिए वह ऐसा व्यवहार कर रहा है. आप भी उस की तरह तू न सही और सही…की तर्ज पर आगे बढ़ जाएं. आप उस से जितना ज्यादा जुड़ी रहेंगी खुद को दुखी करेंगी.

हसबैंड बनाम बौयफ्रैंड में संगीता ने किसे चुना

जिस विलासिता और सुखसुविधाओं वाली जिंदगी के लिए मध्यम वर्गीय युवतियां मन्नतें मांगा करती हैं, वह संगीता कोहली को बैठेबिठाए मिल गई थी. एक ऐसी जिंदगी, जिस में पैसों की कोई कमी नहीं थी. धनियामिर्ची का हिसाबकिताब नहीं रखना था. महंगे कपड़े और खूब गहने थे. आलीशान मकान और बड़ीबड़ी गाडि़यां थीं. रोज शाम को शौपिंग हो सकती थी. 35 वर्षीया संगीता ने कभी सपने में भी यह सब नहीं सोचा था, जो अब उसे हासिल था. मांसल सौंदर्य की मालकिन संगीता मामूली खातेपीते परिवार की युवती थी. शादी से पहले वह जबलपुर के एक अस्पताल में रिसैप्शनिस्ट थी. सपने देखना गुनाह नहीं होता, इसलिए वह धनाढ्य ससुराल और रईस पति के ख्वाब देख लेने में कोई संकोच नहीं करती थी. एक दिन करिश्माई तरीके से उस की यह हसरत पूरी हो गई थी. उसे लगा कि कहने वाले गलत नहीं कहते कि जिंदगी में कभीकभी चमत्कार भी होते हैं. अब से कोई 13 साल पहले अस्पताल में एक खूबसूरत नौजवान मरीज इलाज के लिए आया था, ज स का नाम था रंजन ग्रोवर. वह 8 दिनों तक अस्पताल में भरती रहा. इस दौरान उस की तन की बीमारी तो ठीक हो गई, लेकिन मन का रोग प्यार लग गया. रंजन को संगीता से प्यार हो गया था. संगीता भी उसे चाहने लगी थी. पहले प्यार, उस के बाद इजहार हुआ तो शादी होने में देर नहीं लगी. रंजन ने संगीता को पाने के लिए किसी की भी परवाह नहीं की और इस बात को साबित कर दिखाया कि प्यार जातिपांत, ऊंचनीच कुछ नहीं देखता. संगीता के लिए रंजन का प्यार और शादी किसी सपने से कम नहीं थी.

कटनी के खानदानी कारोबारी करोड़पति रंजन ग्रोवर ने जब संगीता को जीवनसंगिनी के रूप में चुना तो उस की तो मानो जिंदगी ही बदल गई. उस का नाम भी बदल कर संगीता ग्रोवर हो गया. जबलपुर के प्रेमनगर के साधारण मकान में रहने वाली संगीता कटनी स्थित अपनी ससुराल के महल जैसे मकान में आई तो मैडम और मालकिन कहने वाले नौकरों की कतार लगी थी.

महाकौशल इलाके के तमाम पैसे वाले लोग इस शानदार शादी में शरीक हुए थे, जिन के लाए महंगे तोहफे देख कर ही संगीता की आंखें फटी की फटी रह गई थीं. जिस जिंदगी और दुनिया के बारे में उस ने फिल्मों और टीवी सीरियलों में देखा था, उस का हिस्सा बन कर वह अपनी किस्मत पर इतरा रही थी.

मध्यवर्गीय युवती खूबसूरत होने के साथसाथ महत्वाकांक्षी भी हो तो सोने पे सुहागा वाली कहावत को चरितार्थ करने वाली बात होती है. लेकिन कई बार यह बात नीम चढ़े करेले वाली भी साबित होती है. अभावों की जिंदगी से भाव की जिंदगी और दुनिया में आ कर उस से तालमेल बैठा पाना एकदम से आसान काम नहीं होता.

तमाम ऐशोआराम हों, लेकिन पति का प्यार और साथ धीरेधीरे छूटने लगे तो हालत पानी में रहने वाली प्यासी मछली की तरह हो जाती है. यही बीते 10 सालों से संगीता के साथ हो रहा था. जिस ने एकएक कर के 2 बेटों को जन्म दिया था, पर जाने कब और कैसे पति बेगाना होता गया, इस का उसे पता ही नहीं चला.

रंजन की रहनसहन की अपनी एक अलग स्टाइल थी. वह वर्जनाओं में जीने वाला युवक नहीं था. चूने की खदानों के लिए मशहूर महाकौशल इलाके के कटनी जिले के करोड़पति कारोबारियों की अपनी एक अलग दुनिया है, जिस में वे खुल कर जाम छलकाते हैं और देश की नीतियोंरीतियों पर बहस करते हैं.

वे अपने कारोबार की समीक्षा करते हैं और परेशान करने वाले अधिकारियों और नेताओं को सबक सिखाने के तौरतरीकों पर विचार करते हैं और फिर रात होतेहोते नशे में लड़खड़ाते लुढ़कने लगते हैं. पत्नी और नौकरों के सहारे वे कब घर पहुंच कर बिस्तर में घुस जाते हैं, इस का अहसास या अंदाजा उन्हें नहीं होता.

धनाढ्य वर्ग की जिंदगी के इस रंगीन पहलू का अपना एक अलग सच और वजह है, जो अलगअलग शहरों और इलाकों में अलगअलग तरीके से देखने में आता है. संगीता को शुरूशुरू में यह अच्छा लगा था, क्योंकि वह ऐसी ही किसी जिंदगी के ख्वाब देखती थी, जिस में सब कुछ हो.

सब कुछ हो, पर शर्त यह थी कि पति ऐसा न हो. संगीता ने कभी ऐसा नहीं सोचा था. मध्यमवर्गीय सपने और संस्कार ऐसी 2 समानांतर रेखाएं होती हैं, जो कभी कहीं जा कर नहीं मिलतीं. जिंदगी की यह ज्योमेट्री जब हकीकत में बदलने लगी तो संगीता घबरा उठी. दोनों बेटे अब बडे़ हो गए थे. लेकिन इतने बड़े भी नहीं कि बगैर मां के रह पाएं. रुद्राक्ष अभी 12 साल का था तो शिवांग 10 साल का.

बीते 3-4 सालों से संगीता को लग रहा था कि रंजन उस से दूर होने लगा है और पहले सा प्यार नहीं करता. अगर कारोबार के सिरदर्द इस की वजह होते तो पहले भी थे, पर तब तो रंजन बड़े रोमांटिक तरीके से पेश आता था. वजहें कुछ और थीं, जिस से संबंधों में पहले सी गर्माहट नहीं रह गई थी और दांपत्य दरकने लगा था.

अब संगीता को रहरह कर नौसिखिया आशिक रंजन याद आता था, जो अस्पताल में भरती रह कर उस की नजदीकियां पाने के मौके ढूंढा करता था. उसे इंप्रेस करने के लिए नएनए तरीके इस्तेमाल किया करता था. बड़ा और आलीशान मकान अब संगीता को सोने का पिंजरा लगने लगा था. अपने भीतर आते खालीपन से लड़ने में खुद को वह असमर्थ पा रही थी.

पति था, लेकिन कहने भर को था. भावनात्मक रूप से तो वह कब का उस से दूर हो चुका था. दिल में उमड़तीघुमड़ती बातें, जिन्हें भड़ास कहना बेहतर होगा को संगीता किसी के साथ शेयर करना चाहती थी, पर अब सुनने वाला कोई नहीं था. और जो सहेलियां थीं, उन में से अधिकांश इसी हालत का शिकार थीं और उन्होंने हालातों से समझौता कर लिया था.

संगीता को शक ही नहीं, बल्कि यकीन हो चला था कि रंजन भी दूसरे रईसजादों की तरह जिंदगी की राह भटक चुका है. शराब को एक बार सोसाइटी ड्रिंक मान भी लिया जाए, पर वह तो कालगर्ल्स के पास जाने लगा था. यह सोचते ही संगीता के तनबदन में आग लग जाती थी. शायद यह उस की खूबसूरती की अनदेखी और बेइज्जती थी कि पति इतनी सुंदर पत्नी के होते यहांवहां मुंह मारता फिरे.

संगीता को भरोसा ही नहीं होता था कि यह वही रंजन है, जो पहली बार प्रेग्नेंट होने की खबर सुन कर कैसे उछलने लगा था और अब 2 बच्चों के बाद एकदो नहीं, बल्कि 5 बार उस का अबौरशन करा चुका था. उस ने कई बार रंजन को समझाने की कोशिश की, पर एवज में हमेशा झिड़कियां और नसीहतें सुनने को मिलीं कि मुझे मत सिखाओ कि मुझे क्या करना है. ऐसे बेरुखे जवाब सुन कर संगीता का पारा और चढ़ जाता था.

संगीता की मजबूरी बड़े होते दोनों बेटे थे, इसलिए अकसर वह चुप रह जाया करती थी. हर रोज की कलह का बच्चों पर बुरा असर पड़ेगा, यह भी वह खूब समझती थी, पर क्या करे, यह उस की समझ में नहीं आ रहा था. तय था, वह कमजोर पड़ने लगी थी. डगमगाते आत्मविश्वास को वह संभालने की जितनी कोशिश करती, उतनी ही अनुपात में बिखरती भी जाती थी. कल तक जो ऐश्वर्य, वैभव लुभाता था, वही अब उसे काटने लगा था.

पति की सभ्य आवारगी या अय्याशी से समझौता कर लेना संगीता को हार लग रहा था, इसलिए उस ने एक खतरनाक फैसला ले लिया कि क्यों न बच्चों सहित खुदकुशी कर ली जाए या फिर ऐसा कुछ किया जाए, जिस से रंजन को सबक मिले. इस खतरनाक सोच ने दांपत्य की कड़वाहट और बढ़ा दी.

कशमकश की घुटन से या कैद से छुटकारा पाने के लिए संगीता को बेहतर लगा कि कुछ किया जाए और कुछ ऐसे अंदाज में किया जाए कि पति का बदनुमा चेहरा बेनकाब हो जाए. उस की करतूतें दुनिया के सामने आ जाएं और उसे अपने किए की सजा भी मिले. बेटे भी आगे चल कर पिता की राह जाएंगे, यह सोच कर ही उस के अंदर बैठी मां कांप उठती थी. उच्च वर्ग के वैभव व विलासिता पर मध्यमवर्गीय संस्कार भारी पड़ने लगे.

उसी दौरान उस की मुलाकात सतीश कोटवानी से हुई. वह भी कटनी का ही रहने वाला खूबसूरत स्मार्ट युवक था, जिस से संगीता की पहचान फेसबुक के जरिए हुई थी. कब यह परिचय हायहैलो की औपचारिकताएं लांघ कर इतना गहरा गया कि एकदम अनौपचारिक और अंतरंग हो गया, इस का अहसास भी संगीता को अन्य नवयुवतियों की तरह नहीं हुआ.

बात केवल फेसबुक या मोबाइल फोन तक ही सीमित नहीं रही, वह सतीश से मिलने भी लगी थी और मिलने चोरीछिपे न जाना पड़े, इस के लिए उस ने उस के साथ एक जिम और फिर कोचिंग क्लास जौइन कर ली थी. अब कोई खास परदेदारी संगीता और सतीश के बीच नहीं रह गई थी.

कल तक कहेसुने और अंदाजों की बिना पर जो आरोप संगीता रंजन पर लगाती थी, अगर यह सब कुछ सही था तो वह भी यही कुछ कर रही थी. इस में उसे कुछ गलत नजर नहीं आ रहा था. सतीश का जल्द ही ग्रोवर परिवार में बहैसियत दोस्त आनाजाना शुरू हो गया था. इस पर रंजन या ससुराल के किसी दूसरे सदस्य ने ऐतराज नहीं जताया तो यह उन का बड़प्पन ही था. संगीता के पति रंजन से कड़वे रिश्तों की बात जरा भी सतीश से छिपी नहीं रह गई थी. संगीता ने सतीश को जब यह बताया कि वह किस तरह पति को सबक सिखाना चाहती है तो वह अनमना हो उठा. एक अच्छे दोस्त की भूमिका निभाते हुए उस ने संगीता को ऊंचनीच समझाई, पर वह अपनी जिद पर अड़ी रही.

वह 22 दिसंबर का दिन था, जब संगीता दोनों बेटों सहित कार द्वारा कटनी से जबलपुर पहुंची. कार हमेशा की तरह ग्रोवर परिवार का भरोसेमंद ड्राइवर सूर्यप्रकाश पांडेय चला रहा था, जो मैडम के मिजाज को बेहतर समझने लगा था. जबलपुर में दाखिल होते ही संगीता ने ड्राइवर को समदडिया मौल चलने को कह कर यह बता दिया कि वह वहां मैटिनी शो देखेगी.

इसी बीच वह कुछ देर के लिए एक सहेली के साथ रुकी, फिर एक पुराने परिचित की दुकान पर कार रुकवा कर उस ने कुछ दवाइयां खरीदीं. समदडिया ग्रुप महाकौशल इलाके का जानामना नाम है. यह सिविक सैंटर में बना है, जो जबलपुर का अपने आप में एक लैंडमार्क हो गया है. सूर्यप्रकाश ने कार पार्किंग में खड़ी की तो संगीता दोनों बेटों के साथ मौल में चली गई.

सूर्यप्रकाश पांडेय के अंदाजे के मुताबिक संगीता को 5-6 बजे तक वापस आ जाना चाहिए था. लेकिन जब वह 7-8 बजे तक नहीं आई तो उसे चिंता होने लगी. शायद मैडम और बच्चे शौपिंग में लग गए होंगे, यह सोच कर उस ने और इंतजार करना ही मुनासिब समझा. उस ने रात 9 बजे तक इंतजार किया.

10 बजतेबजते सूर्यप्रकाश का सब्र टूटने लगा तो उस ने डरतेडरते संगीता के मोबाइल पर फोन किया तो वह स्विच औफ मिला. कुछ नहीं सूझा तो वह मालकिन को ढूंढने मौल में जा घुसा, पर काफी देर ढूंढने के बाद भी संगीता और बच्चे कहीं नहीं दिखे तो वह घबरा गया. कुछ सोच कर उस ने तय किया कि इस की खबर मैडम की मां सुषमा कोहली को प्रेमनगर स्थित उन के घर जा कर दी जाए.

ऐसा ही उस ने किया भी. बुजुर्ग सुषमा सब कुछ तो नहीं, काफी कुछ बेटीदामाद के संबंधों के बारे में जानती थीं. संगीता गायब है और उस का फोन भी बंद है, यह सोच कर ही वह किसी अनहोनी की आशंका से कांप उठीं और तुरंत ओमती थाने पहुंच कर बेटी की गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखा दी. फोन पर यह खबर दामाद रंजन को भी उन्होंने दे दी. रंजन तुरंत कटनी से जबलपुर के लिए रवाना हो गए.

ओमती थानाप्रभारी अरविंद चौबे का माथा ठनका. क्योंकि मामला एक संभ्रांत करोड़पति परिवार की बहू और 2 बेटों के गायब होने का था, जिस में अपहरण की आशंका भी थी. वह तुरंत समदडिया मौल पहुंचे और किसी सुराग की उम्मीद में गार्डों से ले कर समदडिया मौल के मुलाजिमों से संगीता और उस के बच्चों के बाबत पूछताछ की.

लेकिन कोई खास बात हाथ नहीं लगी, सिवाय इस तसल्ली के कि उन का अपहरण नहीं हुआ है. क्योंकि जबलपुर जैसे बड़े शहर के व्यस्ततम इलाके के मौल से एक साथ 3 लोगों का अपहरण इतनी शांति से संपन्न हो जाना संभव नहीं था. सीसीटीवी फुटेज से पता चला कि संगीता दोपहर 3 बजे के लगभग मौल के दूसरे दरवाजे से बाहर गई थीं.

पर वह है कहां, इस सवाल का जवाब ढूंढने की चुनौती अब पुलिस वालों के सामने थी. इधर जैसे ही मीडिया वालों को एक धनाढ्य परिवार की बहू के मौल से बगैर कुछ बताए लापता हो जाने की खबर मिली, संगीता और उस के गुमशुदा बेटों को ले कर खासा बवाल मच गया. तरहतरह के सवाल न्यूज चैनल्स पर पूछे जा रहे थे और आशंकाएं भी जताई जा रही थीं. दूसरे दिन के समाचार पत्र भी संगीता ग्रोवर की रहस्यमय गुमशुदगी से रंगे पड़े थे.

संगीता के मायके व ससुराल वालों ने भी उसे खोजना शुरू कर दिया था. परिचितों के अलावा संगीता की सभी सहेलियों से पूछताछ की गई, पर कोई भी उस के बारे में खास जानकारी नहीं दे सका.

दूसरे दिन दोपहर 12 बजे जा कर इस राज से परदा हटा, जब यह अफवाह उड़ी कि संगीता ग्रोवर ने खुदकुशी कर ली है. दरअसल लगभग 12 बजे दोपहर को एसपी कटनी को कोरियर द्वारा संगीता का 12 पृष्ठों का सुसाइड नोट मिला, जिस में विस्तार से संगीता ने अपने ससुर को संबोधित करते हुए अपनी व्यथा लिखी थी और पति रंजन ग्रोवर पर तरहतरह के गंभीर अरोप लगाए थे.

आमतौर पर इतना लंबा सुसाइड नोट कोई नहीं लिखता कि वह उपन्यास जैसा हो, इसलिए पुलिस वाले इस बात को ले कर निश्चिंत हो चुके थे कि संगीता ने बेटों सहित खुदकुशी नहीं की है. पर वह है कहां, यह जानना जरूरी हो चला था, जिस से जबलपुर कटनी में बढ़ते बवाल और सवालों की रफ्तार को रोका जा सके.

अपनी खोजबीन में पुलिस टीम जबलपुर के डुमना एयरपोर्ट गई और वहां के सीसीटीवी फुटेज खंगाले तो संगीता दोनों बेटों सहित दिल्ली जाने वाली हवाई जहाज में सवार होती दिखी, साथ ही दिखा रंजन ग्रोवर का दोस्त या संगीता का प्रेमी सतीश कोटवानी. टिकिटों की खोजबीन की गई तो 2 अहम बातें ये पता चलीं कि टिकिट 15 दिसंबर को ही बुक करा लिए गए थे और संगीता नाम बदल कर सफर कर रही थी.

उस का टिकिट जसप्रीत कोटवानी के नाम से बुक था. बताने और छिपाने को अब कुछ खास नहीं रह गया था, सिवाय इस के कि संगीता पति के दोस्त या अपने प्रेमी सतीश कोटवानी के साथ अपनी मरजी से दिल्ली गई या भागी थी और इस की वजह भी उस ने विस्तार से अपने सुसाइड नोटनुमा पत्र में लिख दिया था.

संगीता का पकड़ा जाना जरूरी था, इसलिए एसपी एम.एस. सिकरवार की हिदायत पर टीआई अरविंद चौबे ने पुलिस की एक टीम तुरंत दिल्ली के लिए रवाना कर दी. संगीता के मोबाइल फोन की लोकेशन भी दिल्ली की ही मिल रही थी.

यह पुलिस टीम दिल्ली पहुंच भी नहीं पाई थी कि संगीता के मोबाइल फोन की लोकेशन गुजरात के भावनगर की मिलने लगी. पुलिस वाले कटनी के व्यापारियों के बढ़ते गुस्से के चलते परेशान थे, इसलिए खासतौर से उन्होंने संगीता और सतीश के मोबाइल ट्रेस किए हुए थे. दिल्ली के बजाए चारों भावनगर में हैं, यह जान कर पुलिस वालों को तुरंत समझ आ गया कि इतनी जल्दी ये लोग रेल या सड़क के रास्ते तो दिल्ली से भावनगर जा नहीं सकते, जाहिर है उन्होंने फिर हवाई यात्रा की है. नाकाम चालाकी दिखाते हुए संगीता और सतीश, दोनों ने अपने सिम बदल लिए थे. पर वे मोबाइल फोन पुराना ही इस्तेमाल कर रहे थे, इसलिए उन के ईएमआईई नंबरों के जरिए उन की लोकेशन आसानी से पकड़ में आ रही थी.

तीसरे दिन पुलिस टीम ने भावनगर जा कर एक फाइव स्टार होटल से इन लोगों को पकड़ लिया. यहां भी संगीता जसप्रीत कोटवानी के नाम से ही ठहरी थी. भावनगर से अलगअलग कारों से उन्हें जबलपुर लाया गया तो मामले की सनसनी खत्म हुई, जिस का सार यह था कि खोदा पहाड़ निकली चुहिया. क्योंकि ऐसा तो आजकल बेहद आम हो चला है कि लड़कियां या बहुएं कभीकभार अपने यार के साथ भाग जाती हैं. जबलपुर आ कर संगीता ने ससुराल और पति के पास जाने से सख्ती से इनकार कर दिया तो उसे अपनी मां के पास भेज दिया गया. सतीश को उस के घर जाने दिया गया. दोनों बालिग थे और अपनीअपनी मरजी से गए थे, इसलिए उस पर किसी तरह का कोई आपराधिक कृत्य नहीं बनता था.

जबलपुर में भी संगीता अपने सुसाइड नोट वाले कथनों पर अड़ी रही, जो अब बयानों की शकल में दर्ज हुए कि उस का पति रंजन क्रूर और अय्याश है. पति से वह किस हद तक नफरत करने लगी थी, यह उस के लिखने में भी झलकता था कि उस के हाथों अंतिम संस्कार होना भी उसे गवारा नहीं. रंजन ने 5 बार उस का अबौरशन करवाया और कुछ दिनों पहले कान्हा किसली नेशनल पार्क में उसे शराब पी कर दोस्तों के साथ नाचने को मजबूर किया. अपने ससुर को संबोधित करते हुए उस ने यह भी लिखा था कि जब आप झूठे गवाह खड़े कर के हत्या के मामले से अपने भांजे को रिहा करवा सकते हैं तो बेटे की करतूत ढंकने के लिए क्या कुछ नहीं कर सकते. संगीता को डर था कि अगर वह कटनी या जबलपुर में आत्महत्या करती तो सच दुनिया के सामने नहीं आ पाता और यह सच उतना वीभत्स नहीं होता, जितना कि वह बताना चाह रही थी. पीनापिलाना आजकल आम बातें हैं. रही बात पतिपत्नी के बीच कलह की तो सिवाय बारबार गर्भपात कराए जाने के दूसरे आरोप बहुत ज्यादा गंभीर नहीं हैं.

रंजन ज्यादती और गलती कर रहा था, इस में कोई शक नहीं, पर वे कितनी गंभीर थीं, इस का फैसला अब अदालत में होगा, जहां काम भावुकता से नहीं, बल्कि गवाहों और सबूतों की बिना पर होता है. जबलपुर वापस आ कर जितना जहर पति के खिलाफ संगीता ने उगला, उस से ज्यादा अपने दोस्त सतीश की वकालत की. वह यह कहती रही कि सतीश की वजह से ही वह और उस के बेटे जिंदा बच पाए, नहीं तो उस ने खुदकुशी का इरादा कर लिया था. जाहिर है, उस की मुमकिन कोशिश यह है कि कोई उस की और सतीश की दोस्ती को गलत नजरिए से न देखे. उलट इस के पति की लड़कियों से दोस्ती को ले कर वह दुखी रहती थी तो यह दोहरापन नहीं तो और क्या है.

VIDEO : ये हेयरस्टाइल आपके लुक में लगा देगी चार चांद 

ऐसे ही वीडियो देखने के लिए यहां क्लिक कर SUBSCRIBE करें गृहशोभा का YouTube चैनल.

राधिका आप्टे ने बिकनी फोटो पर ट्रोलर्स को दिया जवाब

‘पैडमैन’ अभिनेत्री राधिका आप्टे सोशल मीडिया पर काफी एक्टिव रहती हैं और फैंस के लिए अपनी तस्वीरें भी शेयर करती रहती हैं. कुछ समय पहले राधिका ने इंस्टाग्राम पर एक बिकनी फोटो शेयर की थी. फोटो में राधिका हाथ में वाइन का गिलास पकड़े हुए भी नजर आ रही थीं.

जिसके बाद यूजर्स ने उनको ट्रोल करना शुरू कर दिया था. लोगों ने कमेंट कर कहा आपको देश के युवा भी फौलो करते हैं इसलिए कम से कम उनका तो ख्याल करिए. वहीं कुछ लोगों ने लिखा, “अपनी प्राइवेट लाइफ को पब्लिक मत करिए.” राधिका ने हाल ही में दिए एक इंटरव्यू में ट्रोल्स को करारा जवाब दिया है.

राधिका ने इटरव्यू में कहा, “मुझे समझ नहीं आता किसी के कुछ कहने पर मैं ट्रोल कैसे हो सकती हूं. यह बकवास है. क्या लोग मुझसे इस बात की उम्मीद करते हैं कि मैं बीच में साड़ी पहन कर जाऊं.” जब राधिका से सवाल किया गया कि इस परिस्थिति को कैसे हैंडल करना चाहिए, तो राधिका ने कहा, ”मुझे नहीं पता, मैं उनके साथ कोई डील नहीं करना चाहती. राधिका आप्टे के अलावा भी बौलीवुड में ऐसी कई अभिनेत्रियां हैं जो अपनी बिकनी तस्वीरों के कारण ट्रोल्स का निशाना बन चुकी हैं.

#holiDay #timeoff #goa #sea #sunset #friends @marc_t_richardson #afteraswim

A post shared by Radhika (@radhikaofficial) on

राधिका ने इंस्टाग्राम पर फोटो को शेयर करते हुए हैशटैग के साथ कैप्शन लिखा, “हौलीडे, टाइमऔफ गोवा, सुमद्र और दोस्त.” फोटो में राधिका अपने दोस्त के साथ नजर आ रही हैं. राधिका की फोटो पर लोगों ने तंज कसते हुए लिखा, पैडमैन देख लो और ये देख लो तो वहीं एक अन्य यूजर ने लिखा, ऐसे किसी के साथ कही भी मत बैठ जाया करो.

राधिका आप्टे को हाल ही में रिलीज हुई फिल्म ‘पैडमैन’ में देखा गया था. फिल्म में राधिका आप्टे फिल्म के मेल लीड किरदार अक्षय कुमार की पत्नी की भूमिका में नजर आई थीं. दर्शकों ने फिल्म को पौजिटिव रिस्पांस दिया. राधिका आप्टे फिलहाल एक बेवसीरीज की शूटिंग में बिजी हैं. राधिका नेटफिल्क्सि इंडियाज की पहली सीरीज ‘स्केयर्ड गेम्स’ में नजर आने वाली हैं.

ऐश्वर्या की बोल्ड फिल्म का निर्देशन करेंगे रोहन सिप्पी

बौलीवुड में लंबे समय से चर्चा रही है कि सिद्धार्थ आनंद एक बोल्ड रोमांचक फिल्म निर्देशित करने जा रहे हैं, जिसमें ऐश्वर्या राय बच्चन की मुख्य भूमिका होगी.

bollywood

बहरहाल, अब यह फिल्म शुरू हो रही है. मगर अब सिद्धार्थ आनंद, ‘क्रियाज इंटरटेनमेंट’ की प्रेरणा अरोड़ा के साथ मिलकर इस फिल्म का सिर्फ निर्माण करेंगे. फिल्म के निर्देशन की जिम्मेदारी रोहन सिप्पी संभालेंगे. इस तरह रोहन सिप्पी और ऐश्वर्या राय बच्चन पूरे 15 साल बाद एक साथ काम करने जा रहे हैं.

bollywood

ज्ञातब्य है कि रोहन सिप्पी ने सबसे पहले 2003 में प्रदर्शित फिल्म ‘‘कुछ ना कहो’’ में ऐश्वर्या राय बच्चन को निर्देशित किया था. वैसे 2005 में रोहन सिप्पी ने ऐश्वर्या राय बच्चन के पति व अभिनेता अभिषेक बच्चन को फिल्म ‘‘ब्लफ मास्टर’’ में निर्देशित किया था.

bollywood

सूत्रों का दावा है कि ऐश्वर्या राय बच्चन ने रोहन सिप्पी के निर्देशन में इस रोमांचक व अति बोल्ड फिल्म में काम करने के लिए न सिर्फ हामी भरी है, बल्कि फिल्म ‘फन्ने खां’ की शूटिंग पूरी करके अब इस फिल्म के लिए तैयारी भी शुरू कर दी है.

मैं पत्नी के साथ सैक्स संबंध बनाते समय खुद में पहले जैसा जोश नहीं पाता. क्या करूं.

सवाल
मैं 45 वर्षीय पुरुष हूं, पत्नी की उम्र 35 वर्ष है. मेरे 2 बेटे हैं. घर देहरादून में है और मैं मिजोरम में नौकरी करता हूं. मेरी समस्या यह है कि पिछले दिनों जब मैं घर गया तो पत्नी के साथ सैक्स संबंध बनाते समय खुद में पहले जैसा जोश नहीं पाया. मुझे लगा मेरे साथ कोई शारीरिक परेशानी हो गई है. मैं डरने लगा हूं कि क्या मैं पहले की तरह सैक्सुअली ऐक्टिव हो पाऊंगा. मेरे स्पर्म काउंट को ले कर तो कोई समस्या नहीं है? क्या मुझे किसी डाक्टर से संपर्क करना चाहिए? सलाह दें.

जवाब

अभी आप की उम्र 45 वर्ष ही है, इसलिए अपने सैक्सुअली ऐक्टिव होने को ले कर मन में कोई डर या वहम न पालें. वैसे भी उम्र का सैक्स से कोई लेनादेना नहीं है. कई बार लोगों के मन में सैक्स को ले कर वहम हो जाता है कि अब पहले जैसा जोश नहीं रहा, पत्नी को खुश कर पाएंगे या नहीं. इन्हीं सब डर की वजह से वे सैक्स के प्रति मन चुराने लगते हैं. हो सकता है आप के साथ भी कुछ ऐसा ही हो, फिर भी आप अपनी तसल्ली के लिए किसी यूरोलौजिस्ट से मिल कर अपनी समस्या का समाधान कर लें.

अपना ही तमाशा बनाने वाली एक लड़की

राजस्थान में कड़ाके की सर्दी पड़ रही थी. कई जगह पारा माइनस तक पहुंच गया था. ऐसी ठंड में 10 जनवरी को  सुबह करीब 5 बजे जयपुर में पुलिस कंट्रोल रूम के फोन की घंटी बजी. सुबहसुबह कंट्रोल रूम में हीटर पर हाथ सेंक रहे ड्यूटी अफसर ने फोन उठाया. दूसरी ओर से किसी लड़की ने रोते हुए धीमी सी आवाज में कहा, ‘‘हैलो.’’

‘‘हां बोलिए, मैं पुलिस कंट्रोल रूम से ड्यूटी अफसर बोल रहा हूं.’’

‘‘सर, मेरे साथ 4 लड़कों ने गैंगरेप किया है. रेप के बाद वे लड़के मुझे एमएनआईटी के पास फेंक गए हैं. मेरे कपड़े भी फटे हुए हैं.’’ लड़की ने सुबकते हुए कहा, ‘‘सर, उन बदमाशों ने मेरी जिंदगी बरबाद कर दी. मुझे कहीं का नहीं छोड़ा.’’

गैंगरेप की बात सुन कर ड्यूटी अफसर ने लड़की से उस का नामपता पूछ कर उसे सांत्वना देते हुए कहा, ‘‘तुम वहीं रुको, हम पुलिस की गाड़ी भेज रहे हैं.’’

सुबहसुबह गैंगरेप की सूचना मिलने पर कंट्रोल रूम में मौजूद पुलिसकर्मी परेशान हो उठे थे. ड्यूटी अफसर ने तुरंत वायरलैस संदेश दे कर पैट्रोलिंग पुलिस टीम को मौके पर जाने को कहा. इस के बाद पुलिस अधिकारियों को वारदात की सूचना दी गई. एमएनआईटी यानी मालवीय नैशनल इंस्टीट्यूट औफ टेक्नोलौजी राजस्थान का जानामाना इंस्टीट्यूट है, जो जयपुर के बीच मालवीय नगर, झालाना डूंगरी में स्थित है.

कड़ाके की ठंड में सुबह 5 बजे लोगों का घर में रजाई से बाहर निकलने का मन नहीं होता. लेकिन ठंड हो या गरमी, पुलिस को तो अपनी ड्यूटी करनी ही होती है. सूचना पा कर जयपुर (पूर्व) के पुलिस अधिकारी मौके पर पहुंच गए.

एमएनआईटी के सामने पुलिस अधिकारियों को वह लड़की मिल गई. उस के कपड़े फटे हुए थे और वह ठंड से कांप रही थी. उस के बदन पर काफी कम कपड़े थे. वह केवल एक कार्डिगन पहने थी, जिस से सर्दी से बचाव संभव नहीं था. उस ने बताया कि उस के साथ 4 लड़कों ने सामूहिक दुष्कर्म किया है. लड़की की हालत देख कर पुलिस अधिकारियों को उन दरिंदों पर बहुत गुस्सा आया.

पुलिस अधिकारियों ने लड़की को सांत्वना दे कर पुलिस की गाड़ी में बिठाया और सदर थाने ले गए. थाने पहुंच कर सब से पहले अर्दली से उस लड़की के लिए गरमागरम चाय मंगवाई गई, साथ ही एक महिला कांस्टेबल से उस की गरम जैकेट ले कर लड़की को पहनने को दी गई, ताकि ठंड से उस का बचाव हो सके. कमरे में हीटर भी जला दिया गया, ताकि कुछ गरमाहट आ सके.

चाय पी कर और जैकेट पहन कर लड़की के शरीर में कुछ गरमाहट आई. लड़की कुछ सामान्य हुई तो पुलिस अधिकारियों ने उस से वारदात के बारे में पूछा. लड़की ने बताया कि उस का नाम उर्वशी है और वह जयपुर के जगतपुरा में अपने पिता व भाई के साथ रहती है. वे लोग कुछ महीने पहले ही जयपुर आए हैं. जबकि मूलरूप से उस का परिवार उत्तर प्रदेश के मैनपुरी का रहने वाला है. उर्वशी ने आगे बताया कि वह 9 जनवरी को अलवर में स्टाफ सेलेक्शन कमीशन (एसएससी) की प्रतियोगी परीक्षा दे कर ट्रेन से जयपुर वापस आई थी.

ट्रेन से जयपुर जंक्शन पर उतर कर वह शाम करीब सवा 7 बजे स्टेशन से बाहर निकली. उसे जगतपुरा स्थित अपने घर जाना था. इस के लिए वह किसी सवारी का इंतजार कर रही थी, तभी एक औटो वाला जगतपुरा की आवाज लगाता हुआ सुनाई दिया. उस ने औटो वाले से पूछा कि जगतपुरा फाटक चलोगे तो उस ने कहा, ‘‘20 रुपए लगेंगे.’’

वह उस औटो में बैठ गई. औटो में पहले से ही 3 लड़के बैठे थे. औटो वाला सिंधी कैंप, नारायणसिंह सर्किल से होते हुए 2-3 घंटे तक घुमाता रहा. बाद में वह उसे एक ग्राउंड में ले गया, जहां उन लोगों ने उस के कपड़े फाड़ दिए. इस के बाद औटो में बैठे तीनों लड़कों और औटो वाले ने उस के साथ दुष्कर्म किया. दुष्कर्म करने वाले 2 लड़के आपस में एकदूसरे का नाम संदीप और ब्रजेश ले रहे थे. उन दरिंदों ने उसे जान से मारने की नीयत से एक बोतल में भरा सफेद रंग का पेय भी पिलाया. वह पेय पीने के बाद उस ने उल्टी कर दी. लड़कों की उम्र 20-25 साल थी. बाद में वे चारों उसे औटो में बैठा कर अनजान जगह पर छोड़ गए.

जाने से पहले उन लड़कों ने उसे धमकी दी थी कि उन्होंने उस की वीडियो क्लिप बना ली है, किसी को बताया तो वे नेट पर डाल देंगे. उन सब के जाने के बाद उस ने वहां एक राहगीर से पूछा तो उस ने बताया कि यह जगह एमएनआईटी के पास है. इस के बाद वह एक बुजुर्ग की मदद से बस शेल्टर पर पहुंची और पुलिस कंट्रोल रूम के 100 नंबर पर फोन किया.

इतनी सर्द सुबह उर्वशी के साथ हुई दरिंदगी की दास्तां सुन कर पुलिस अधिकारियों की आंखों में खून उतर आया. अधिकारियों ने उर्वशी से पूछ कर उस के घर वालों को सूचना दे कर उन्हें थाने बुलवा लिया. बेटी के साथ हुई दरिंदगी की बात जान कर उर्वशी के पिता फफकफफक कर रो पड़े. वह कुछ बोल नहीं पाए. पता चला कि वह मानसिक रूप से कमजोर थे. उर्वशी का छोटा भाई भी पिता के साथ थाने आया था.

पुलिस ने उर्वशी से उस के साथ दरिंदगी की लिखित रिपोर्ट ले कर सदर थाने में भादंवि की धारा 328, 367, 376डी व 34 के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया. सदर थाने में रिपोर्ट इसलिए दर्ज की गई, क्योंकि लड़की का अपहरण रेलवे स्टेशन इलाके से हुआ था. हालांकि उर्वशी जहां मिली थी, वह इलाका जवाहरनगर सर्किल थाने के तहत आता था.

रिपोर्ट दर्ज होने के बाद पुलिस उर्वशी को बनीपार्क स्थित सेटेलाइट अस्पताल ले गई. अस्पताल में उस की बोर्ड से मैडिकल जांच कराई गई. जांच में उस के साथ दुष्कर्म की पुष्टि हुई.

नए साल के पहले पखवाड़े में राजधानी जयपुर में शाम को युवती का अपहरण करने के बाद रात भर उस से सामूहिक दुष्कर्म की घटना ने पुलिस अधिकारियों को हिला दिया था. जयपुर पुलिस कमिश्नर संजय अग्रवाल ने इस घटना को गंभीरता से लिया. उन्होंने अतिरिक्त पुलिस कमिश्नर जयपुर (प्रथम) प्रफुल्ल कुमार के निर्देशन में जयपुर कमिश्नरेट, जयपुर पश्चिम एवं जयपुर पूर्व के अधिकारियों की टीमें गठित कर दीं. प्रफुल्ल कुमार ने पुलिस उपायुक्त (पश्चिम) अशोक कुमार गुप्ता के नेतृत्व में पुलिस उपायुक्त (पूर्व) कुंवर राष्ट्रदीप, पुलिस उपायुक्त (अपराध) विकास पाठक, अतिरिक्त पुलिस उपायुक्त (पश्चिम) रतन सिंह, अतिरिक्त पुलिस उपायुक्त (पूर्व) हनुमान सहाय मीणा, सहायक पुलिस आयुक्त (सदर) नीरज पाठक, प्रशिक्षु आईपीएस सुश्री तेजस्विनी गौतम, सहायक पुलिस आयुक्त (झोटवाड़ा) आस मोहम्मद, सहायक पुलिस आयुक्त राजपाल गोदारा, थानाप्रभारी (चौमूं) जितेंद्र सिंह सोलंकी, थानाप्रभारी (हरमाड़ा) लखन सिंह खटाना, थानाप्रभारी (सदर) रड़मल सिंह, थानाप्रभारी (करघनी) अनिल जसोरिया, थानाप्रभारी (बनीपार्क) धर्मेंद्र शर्मा सहित एक दरजन थानाप्रभारियों के नेतृत्व में अलगअलग टीमें बना कर जांच शुरू कर दी.

पुलिस को सब से पहले उस औटो वाले का पता लगाना था, जिस में बैठ कर उर्वशी ने जाने की बात कही थी. इस के बाद उस जगह का पता लगाना था, जहां उस के साथ सामूहिक दुष्कर्म हुआ था. इसी के साथ उर्वशी से दरिंदगी करने वाले संदीप और ब्रजेश सहित अन्य आरोपियों का पता लगाना था.

पुलिस ने जांच शुरू करते हुए सब से पहले रेलवे स्टेशन और उस के आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की रिकौर्डिंग खंगाली. एक रिकौर्डिंग में उर्वशी रेलवे स्टेशन से बाहर जाती नजर आ रही थी. रेलवे स्टेशन के बाहर 3 जगह पर सीसीटीवी कैमरे लगे थे, लेकिन वे खराब थे.

पुलिस ने औटो चालकों से पूछताछ शुरू की. जयपुर में करीब 8 हजार औटो हैं, लेकिन उन में किसी का भी वेरिफिकेशन नहीं है. उर्वशी ने पुलिस को हरेपीले औटो के बारे में बताया था. ये हरेपीले औटो सीएनजी से चलते हैं. ऐसे औटो की संख्या भी हजारों में है. पुलिस ने युवती के मोबाइल नंबर की काल डिटेल्स निकलवा कर उस की भी जांच की, साथ ही मोबाइल टावर के आधार पर आरोपियों का पता लगाने की भी कोशिश की गई.

अपराधों के मामले में राजस्थान पहले ही सुर्खियों में है. इस घटना से जयपुर में कानूनव्यवस्था पर सवालिया निशान लग गए थे. दिन भर इलैक्ट्रौनिक चैनलों पर युवती से दरिंदगी की खबरें चलती रहीं. लोगों में भी सरकार के प्रति आक्रोश उभरने लगा. उसी दिन शाम को दीनदयाल वाहिनी के कार्यकर्ताओं ने छात्रा से सामूहिक दुष्कर्म की घटना के विरोध में स्टैच्यू सर्किल पर कैंडल मार्च निकाला.

11 जनवरी को देश भर की मीडिया में छात्रा से सामूहिक दुष्कर्म की घटना सुर्खियों में छाई रही. इस से पुलिस की किरकिरी हुई. सरकार की भी बदनामी हुई. स्थिति को देखते हुए पुलिस महानिदेशक मनोज भट्ट ने जयपुर के पुलिस कमिश्नर संजय अग्रवाल को आरोपियों का जल्द से जल्द पता लगाने को कहा. रात भर की जांच के बाद दूसरे दिन सुबह से ही पुलिस की अलगअलग टीमें मामले की तह में जाने के लिए पूरे उत्साह से जुट गईं. आरोपी औटोचालक का पता लगाने के लिए पूरे शहर में अभियान चलाया गया. औटोचालक यूनियनों के पदाधिकारियों से बात की गई. उर्वशी ने रेलवे स्टेशन से औटो में बैठने के बाद सिंधी कैंप, नारायण सिंह सर्किल आदि जिन रास्तों से औटो के जाने की बात बताई थी, उन तमाम रास्तों की सीसीटीवी फुटेज खंगाली गई.

पुलिस की एक टीम पीडि़त छात्रा उर्वशी को ले कर शहर में उस जगह का पता लगाने का प्रयास करती रही, जहां पीडि़ता ने सामूहिक दुष्कर्म की बात बताई थी. पीडि़ता को उस के बताए रास्ते में आने वाले पार्क व जगहजगह खाली पड़े प्लौट, पार्क दिखाए गए, लेकिन उर्वशी ने किसी भी प्लौट या पार्क की पहचान नहीं की.

इस तरह दिन भर खाक छानने के बाद भी कोई नतीजा नहीं निकला. इस बीच राज्य महिला आयोग ने स्वत: संज्ञान ले कर पुलिस महानिदेशक को छात्रा से सामूहिक दुष्कर्म के आरोपियों को शीघ्र गिरफ्तार करने को कहा, साथ ही सार्वजनिक स्थानों पर लगे सीसीटीवी कैमरे चालू हैं या नहीं, इस की भी रिपोर्ट मांगी.

दूसरे दिन का नतीजा शून्य रहने पर जांच में लगे पुलिस अधिकारियों ने मीटिंग कर के पूरे मामले पर फिर से गंभीरता से विचार किया. इस विचारविमर्श में यह बात सामने आई कि ट्रेन से स्टेशन पर उतरते ही उर्वशी ने अपने भाई को फोन कर के कहा था कि घर पहुंचने में देर हो जाएगी, वह खाना खा कर सो जाए.

उस ने घर लेट पहुंचने की बात क्यों कही थी? इस के अलावा अकेली लड़की होने के बावजूद वह औटो में 3 लड़कों के साथ क्यों बैठी? इतनी कड़ाके की ठंड में रात भर वह पार्क में कैसे रही? दुष्कर्म करने वाले उसे पार्क में छोड़ कर क्यों नहीं गए? उन्होंने उसे एमएनआईटी पर ले जा कर क्यों छोड़ा? आरोपी उस का मोबाइल छीन कर क्यों नहीं ले गए?

ये सवाल उभरे तो पुलिस ने नए सिरे से जांच करने का फैसला किया. इस के अलावा यह भी आशंका जताई गई कि कहीं कोई व्यक्ति अलवर से ही तो उर्वशी का पीछा नहीं कर रहा था, जिस ने जयपुर पहुंच कर अपने साथियों की मदद से दरिंदगी की हो. इस का पता लगाने के लिए एक पुलिस टीम अलवर स्टेश्न पर सीसीटीवी कैमरों की जांच के लिए भेजी गई.

तीसरे दिन पुलिस ने नए सिरे से जांच शुरू की. उर्वशी के मोबाइल की काल डिटेल्स खंगाली गई. उस की 9 जनवरी को जिन लोगों से बातें हुई थीं, उन से पूछताछ की गई. उर्वशी से भी अलगअलग तरीके से पूछताछ की गई. उस के परिचित युवकों से भी पूछताछ की गई. इस सारी मशक्कत से पुलिस को उम्मीद की कुछ किरणें नजर आईं तो वह उसी दिशा में आगे बढ़ती गई. युवती के परिवार के बारे में जांच के लिए एक टीम उत्तर प्रदेश के मैनपुरी शहर भेजी गई.

पुलिस अब कामयाबी की दिशा में आगे बढ़ रही थी. पुलिस ने उन दोनों युवकों संदीप और ब्रजेश का भी पता लगा लिया, जिन के नाम उर्वशी ने बताए थे. पुलिस अब आरोपियों को गिरफ्तार करने के लिए सबूत जुटाने में लग गई. तीसरे दिन रात भर और चौथे दिन दोपहर तक की जांच के बाद पुलिस ने उर्वशी द्वारा बताए गए गैंपरेप की गुत्थी सुलझा ली. 13 जनवरी को जयपुर पुलिस कमिश्नर संजय अग्रवाल ने प्रैस कौन्फ्रैंस की, जिस में गैंगरेप के मामले का परदाफाश किया गया.

पुलिस कमिश्नर ने बताया कि उक्त युवती ने नर्सिंग के छात्र को ब्लैकमेल कर के 5 लाख रुपए वसूलने के लिए अपहरण और गैंगरेप की झूठी कहानी अपने बौयफ्रैंड के साथ मिल कर रची थी. पुलिस ने इस मामले में उर्वशी और उस के बौयफ्रैंड ऋषिराज मीणा को गिरफ्तार कर लिया था. पुलिस कमिश्नर ने बताया कि करीब 3 सौ पुलिस अधिकारियों ने करीब 80 घंटे तक लगातार जांच कर के जानकारी जुटाई और इस मामले का परदाफाश किया.

पुलिस की ओर से उर्वशी व ऋषिराज मीणा से की गई पूछताछ और व्यापक जांच में जो कहानी उभर कर सामने आई, वह अनैतिक काम से लोगों को ब्लैकमेल कर के पैसा कमाने की कहानी थी.

उर्वशी अपने पिता व भाईबहनों के साथ उत्तर प्रदेश के मैनपुरी में रहती थी. उस की मां की कुछ समय पहले मौत हो गई थी. उस के पिता मानसिक रूप से कमजोर थे. परिवार की आर्थिक स्थिति ज्यादा अच्छी नहीं थी. उर्वशी के 2 भाई और 2 बहनें हैं.

करीब 2 साल पहले घर में उर्वशी का अपने अविवाहित भाई से झगड़ा हो गया था. तब वह नाराज हो कर अपनी बुआ के पास काशीपुर चली गई थी. काशीपुर में रहते हुए वह प्राइवेट ग्रैजुएशन की तैयारी करने लगी, साथ ही वह सरकारी नौकरी पाने के लिए प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने लगी.

करीब 5-6 महीने पहले ऋषिराज मीणा किसी काम से काशीपुर गया था, जहां उस की मुलाकात उर्वशी से हुई. उर्वशी उसे स्वच्छंद लड़की लगी. 2-4 दिन वहां रहने के दौरान ऋषिराज की उर्वशी से घनिष्ठता हो गई. दोनों ने एकदूसरे के मोबाइल नंबर ले लिए. बाद में ऋषिराज जयपुर आ गया. इस के बाद भी उर्वशी और ऋषिराज में लगातार बातें होती रहीं.

उर्वशी आगरा जा कर रहने लगी तो उस दौरान भी ऋषिराज की उस से लगातार बातें होती रहीं. कई बार बातोंबातों में उर्वशी ने ऋषिराज को अपनी पारिवारिक स्थिति अच्छी नहीं होने और नौकरी करने की बात बताई. इस पर ऋषिराज ने उसे जल्दी ही रेलवे में नौकरी लगवाने का विश्वास दिलाया.

घटना से करीब ढाई-3 महीने पहले ऋषिराज ने उर्वशी को फोन कर के कहा कि वह जयपुर आ जाए. वह उसे किराए का मकान दिलवा देगा. जयपुर में रहेगी तो नौकरी तलाशने में आसानी रहेगी. ऋषिराज के कहने पर उर्वशी जयपुर आ गई. ऋषिराज ने जगतपुरा की सरस्वती कालोनी में उसे किराए का मकान दिलवा दिया. ऋषिराज तो उर्वशी का पहले से ही परिचित था. जयपुर में उस की कई अन्य युवकों से भी दोस्ती हो गई. युवकों से दोस्ती के चलते मकान मालिक ने उसे निकाल दिया.

उर्वशी ने ऋषिराज को समस्या बताई तो उस ने जगतपुरा में ही जगदीशपुरी कालोनी में उसे किराए का दूसरा मकान दिलवा दिया. कुछ समय बाद उर्वशी अपने पिता व छोटे भाई को भी जयपुर ले आई. जयपुर आ कर वह प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने लगी. उस ने कुछ समय पहले स्टाफ सेलेक्शन कमीशन की परीक्षा के लिए फार्म भरा था.

उस का परीक्षा केंद्र अलवर में पड़ा था. 9 जनवरी को उस की परीक्षा थी. इस के लिए वह जयपुर से अलवर गई. परीक्षा समाप्त होने के बाद वह 9 जनवरी को अलवर से शाम को मुजफ्फरनगर-पोरबंदर एक्सप्रैस टे्रन में सवार हो कर शाम सवा 7 बजे जयपुर जंक्शन पर उतरी. ट्रेन से उतर कर उर्वशी ने करीब 7 बज कर 20 मिनट पर अपने छोटे भाई को फोन कर के कहा कि उसे घर पहुंचने में देर हो जाएगी. वे लोग खाना खा कर सो जाएं. वह जब घर आएगी तो दरवाजा खटखटा देगी.

उर्वशी जयपुर जंक्शन से औटो में बैठ कर जगतपुरा पहुंची. वहां उसे ऋषिराज मीणा मिला. ऋषिराज ने औटो का 180 रुपए किराया चुकाया और उसे अपनी पल्सर बाइक पर बैठा कर जगतपुरा में ही प्रेमनगर स्थित अपने फ्लैट नंबर 280 पर ले गया. तय योजना के अनुसार, उर्वशी ने रात करीब 10 बजे अपने परिचित युवक संदीप लांबा को अपने पास बुला लिया.

संदीप को उर्वशी ने 9 जनवरी को दिन में ही फोन कर के कहा था कि रात को उस के घर वाले घर पर नहीं रहेंगे, इसलिए वह रात को उस के घर आ जाए. जयपुर जंक्शन से औटो में जगतपुरा जाते समय भी उर्वशी ने संदीप को बता दिया था कि वह रात को 280 प्रेमनगर, जगतपुरा आ जाए.

उर्वशी के इस तरह बुलाने से संदीप लांबा खुश था. संदीप ने अपनी गर्लफ्रैंड उर्वशी के पास जाने के लिए अपने एक मित्र पोलू जाट से 5 सौ रुपए उधार लिए और सजधज कर अपने कमरे से निकला. संदीप नर्सिंग के द्वितीय वर्ष का छात्र था. वह जयपुर में गुर्जर की थड़ी पर किराए के मकान में रहता था. उस की उर्वशी से दोस्ती इस घटना से करीब एक महीने पहले हुई थी.

दोनों एक महीने से फोन पर संपर्क में थे. संदीप ने घर से निकल कर उर्वशी के लिए चौकलेट खरीदी. इस के बाद वह लो फ्लोर बस से रात करीब 10 बजे जगतपुरा पहुंचा. रात का समय होने और उस फ्लैट की सही लोकेशन न मिलने पर संदीप ने उर्वशी को 3-4 बार फोन किया. इस पर उर्वशी उसे लेने के लिए पैदल ही जगतपुरा रेलवे लाइन तक अकेली आई.

रेलवे लाइन से वह संदीप को अपने साथ ऋषिराज के प्रेमनगर स्थित फ्लैट पर ले गई. संदीप के पहुंचने पर ऋषिराज फ्लैट में छिप गया. उर्वशी संदीप को एक कमरे में ले गई, जहां बिस्तर लगा था. कमरे की बिजली जल रही थी. कमरे की बिजली जली होने पर संदीप को कुछ शक हुआ, लेकिन उर्वशी ने उसे बातों में लगा लिया. इस के बाद उर्वशी और संदीप उस कमरे में एक साथ रहे. इस दौरान उन्होंने कई बार शारीरिक संबंध बनाए.

सुबह करीब 3 बजे जब दोनों थक गए तो शांत हुए. उर्वशी ने संदीप का मोबाइल ले कर यह कहते हुए उस का सारा रिकौर्ड डिलीट कर दिया कि किसी को पता लग जाएगा. बाद में उर्वशी ने संदीप के पर्स की तलाशी ली और उस के डेबिट व क्रेडिट कार्ड देखे. इस के बाद उर्वशी ने पुलिस में मुकदमा दर्ज कराने की धमकी दे कर उस से मोटी रकम मांगी.

संदीप के इनकार करने पर उर्वशी ने उस का एटीएम कार्ड ले लिया और उस का पासवर्ड भी पूछ लिया. इस के बाद उसे घर से निकल जाने को कहा. वह वहां से निकला तो करीब आधे घंटे बाद उर्वशी ने उसे फोन कर के जल्दी से रकम का इंतजाम करने को कहा.

संदीप के जाने के बाद उसी फ्लैट में छिपा ऋषिराज मीणा कमरे में आ गया. सुबह करीब 5 बजे वह उर्वशी को मोटरसाइकिल पर बिठा कर एमएनआईटी के समने ले गया. वहां उस ने उर्वशी के मुंह पर कीटनाशक एल्ड्रीन का घोल लगाया और उस के कपड़ों पर भी कीटनाशक छिड़क दिया. ऋषिराज ने उर्वशी से कहा कि वह पुलिस कंट्रोल रू म को फोन कर के अपने साथ गैंगरेप होने की सूचना दे.

यह कह कर ऋषिराज वहां से चला गया. उस के जाने के बाद उर्वशी ने पुलिस कंट्रोल रूम को फोन किया था. उर्वशी को एमएनआईटी छोड़ने के बाद ऋषिराज अपने फ्लैट पर पहुंचा और सामान समेट कर कमरे को खाली कर के फरार हो गया.

शुरुआती पूछताछ में उर्वशी ऋषिराज के बारे में कोई जानकारी होने से इनकार करती रही, लेकिन जब मोबाइल लोकेशन के आधार पर उसे पकड़ कर दोनों का आमनासामना कराया गया तो उर्वशी ने सारा सच उगल दिया.

पूछताछ में पता चला कि दोनों ब्लैकमेलिंग करने के लिए पहले युवकों को ढूंढते थे और फिर पुलिस में मुकदमा दर्ज कराने की धमकी दे कर उन से रकम ऐंठते थे. इस मामले में उर्वशी ने रिपोर्ट दर्ज कराते समय संदीप और ब्रजेश का नाम लिया था.

संदीप ने उर्वशी से उस की सहमति से शारीरिक संबंध बनाए थे. लेकिन संदीप से उर्वशी को कुछ नहीं मिला तो उस ने पुलिस के सामने संदीप का नाम ले लिया. संदीप खुद को बैंक मैनेजर का लड़का बताता था, इसलिए उर्वशी को उस से मोटी रकम मिलने की उम्मीद थी.

संदीप लांबा को जब इस षडयंत्र का पता चला तो उस ने जवाहर सर्किल थाने में खुद के साथ ब्लैकमेलिंग व आपराधिक षडयंत्र की लिखित रिपोर्ट दी. जांच में यह भी सामने आया कि उर्वशी ब्रजेश से भी पहले से ही अच्छी तरह परिचित थी. उन की फोन पर बातें होती रहती थीं. ऋषिराज ने ही ब्रजेश को उर्वशी से मिलवाया था. उर्वशी ब्रजेश को फोन कर के बुलाती थी, लेकिन वह उन के झांसे में नहीं आया.

पुलिस का कहना था कि ऋषिराज मीणा ने उर्वशी के साथ मिल कर लोगों को दुष्कर्म के केस में फंसाने की धमकी दे कर उन्हें ब्लैकमेल कर के मोटी रकम ऐंठने की योजना बनाई थी. ऋषिराज संदीप और ब्रजेश से करीब 5 लाख रुपए में सौदा करना चाहता था. इन पैसों से वह अपना कोई व्यापार करना चाहता था.

पुलिस ने षडयंत्र रच कर गैंगरेप की मनगढं़त कहानी बना कर झूठा मुकदमा दर्ज कराने, अवैध व फरजी आईडी से अलगअलग सिम व मोबाइल रखने और ब्लैकमेलिंग कर के धन ऐंठने के आरोप में उर्वशी और ऋषिराज मीणा को 13 जनवरी को गिरफ्तार कर लिया.

पुलिस ने इन के कब्जे से 6 मोबाइल फोन और 15 सिम बरामद किए. ऋषिराज मीणा सवाई माधोपुर जिले के वजीरपुर थाना इलाके के बढोद गांव के रहने वाले रामफल मीणा का बेटा था. उस के खिलाफ चोरी व गबन के 2 मामले पहले से दर्ज हैं.

पुलिस जांच में सामने आया है कि उर्वशी के जयपुर आने के बाद से ऋषिराज उस के साथ रिलेशनशिप में रह रहा था. उस ने लोगों को फंसाने के लिए घटना से 20 दिनों पहले ही प्रेमनगर में 8 हजार रुपए महीने पर किराए का फ्लैट लिया था. वह जल्दी ही उर्वशी से शादी करना चाहता था और उर्वशी के माध्यम से लोगों को दुष्कर्म के केसों में फंसा कर ब्लैकमेल करने के बाद मोटी रकम ऐंठ कर पैसे वाला बनना चाहता था.

इस के लिए उस ने उर्वशी का ब्रेनवाश भी कर दिया था. उर्वशी भी सहयोग करने के लिए तैयार हो गई थी. जांचपड़ताल में यह भी सामने आया है कि ऋषिराज और उर्वशी मिल कर आगरा और मैनपुरी में ब्लैकमेलिंग की 5 वारदात कर चुके थे. उर्वशी जब काशीपुर छोड़ कर आगरा आ गई थी तो ऋषिराज उस से मिलने आगरा जाया करता था.

पुलिस ने 14 जनवरी को ऋषिराज व उर्वशी को मजिस्ट्रैट के सामने पेश कर के एक दिन के रिमांड पर लिया. पूछताछ में पता चला कि उर्वशी और उस के पिता के 4 बैंक खातों में करीब 5 लाख रुपए की रकम जमा है. पुलिस को शक है कि यह राशि ब्लैकमेलिंग की है.

उर्वशी ने इस रकम के बारे में पुलिस को बताया कि उस के पिता ने गांव में जमीन बेची थी, जबकि मैनपुरी से पुलिस को पता चला कि उर्वशी के पिता ने अभी तक कोई जमीन नहीं बेची है. उर्वशी के परिवार की आर्थिक स्थिति इतनी अच्छी नहीं है कि बैंक खातों में 5 लाख रुपए जमा कर सके. इसलिए पुलिस इस रकम के बारे में भी जांच कर रही है.

पुलिस ने रिमांड अवधि पूरी होने पर 15 जनवरी को दोनों आरोपियों को फिर मजिस्ट्रैट के सामने पेश किया. मजिस्ट्रैट ने ऋषिराज व उर्वशी को न्यायिक अभिरक्षा में जेल भेज दिया है. पुलिस उर्वशी की ओर से सदर थाने में दर्ज कराए गए मामले और जवाहर सर्किल थाने में संदीप लांबा की ओर से दर्ज कराए गए मामले की जांचपड़ताल कर रही है.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित, उर्वशी परिवर्तित नाम है.

याद रखें, जीवन में अवसर कभी न खोएं

जीवन उतना सरल नहीं है जितना आज के किशोरों को लगता है. एक समय था जब किशोरों को अपने घरों में ही भाईबहनों व रिश्तेदारों के साथ प्रतियोगिता का सामना करना पड़ता था. हां, उन दिनों घर आज की तरह सूने नहीं होते थे. फिर भी सत्य यह है कि किशोर आज ज्यादा पा रहे हैं और यह हमेशा मिलता रहेगा, सुरक्षा रहेगी, सोचना गलत है. बड़े पेड़ के वे दिन सब से खतरनाक होते हैं जब उस का तना एक लाठी या डंडे के लायक हो जाए. तभी उस को उखाड़े जाने के अवसर ज्यादा होते हैं. इसी तरह गरमियों में भी उगते सूरज की रोशनी भाती है पर वह ज्यादा देर तक लुभावनी नहीं रहती. किशोरावस्था में वह मजबूती नहीं होती जो परिपक्वता आने पर मिलती है.

इसलिए जीवन की कठिनाइयों को झेलने की ट्रेनिंग लेना हर समय जरूरी है. किशोरों का तो यही काम होना चाहिए कि वे किसी भी अवसर को न खोएं. घर के छोटेबड़े कामों के साथ चैलेंजिंग, रोमांचक, अनूठे कामों को भी इस दौर में करें. इतना पढ़ें कि हर लाइब्रेरी छोटी पड़ जाए. इतना नाचें कि हर स्टेज छोटा पड़ जाए. इतना चढ़ें कि पहाड़ बौना दिखे. इतना तैरें कि हर स्विमिंग पूल गुसलखाने का टब लगे. इतना लिखें कि कागज की कमी पड़ जाए.

माना कि आज सरकार को किशोरों की चिंता नहीं है. किशोरों को तो सरकार की तरफ से छोटे बच्चों को मिलने वाली सुविधाएं भी नहीं मिलतीं. वे अधर में रहते हैं. मातापिता समझते हैं पर जानते नहीं कि इन सुनहरे वर्षों का इस्तेमाल कैसे हो जबकि समाज को और सरकार को अपने भ्रष्टाचार से ही फुरसत नहीं होती.

सरकार को तो सड़कें बनवाने या कूड़ा उठवाने से ही समय नहीं मिलता कि वह किशोरों के लिए कुछ सोच सके, मातापिता इन नौनिहालों को ले कर चिंतित रहते हैं कि कल इन का क्या होगा. नतीजा यह है कि इन सुनहरे सालों के बाद आने वाली गरमी में सारे सपने सूखे पत्तों की तरह झड़ जाते हैं. इसलिए जरूरी है कि किशोर खुद को पहचानें और स्वयं अपना लक्ष्य तैयार करें. खुद अपने समय का सदुपयोग करें.

इस समय छुट्टियों की तैयारी करें. देशविदेश जाएं. पीठ पर बैकपैक ले कर गांवगांव घूमें. लोगों से मिलें. लोगों के लिए काम करें. उन से कुछ सीखें. कुछ बनाने की कोशिश करें. चाहे चित्रकारी हो या कारपेंटरी, यह समय हर चीज पर हाथ आजमाने का है और अगर स्कूल से छुट्टी मिली है तो उसे सोने में सुहागा समझें.

गरमी, बरसात की चिंता किए बिना अपने नए लक्ष्य बनाएं और उन्हें पूरा करने में लग जाएं. आज तकनीक ने किशोरों को बहुत कुछ हाथ में दे दिया है. इस का भरपूर लाभ उठाएं. चूकें नहीं. समय जाया न करें, बल्कि समय का सदुपयोग कर अपनी राह प्रशस्त करें.

जनाधार बचाने में असफल मायावती

5 हजार साल से अधिक के इतिहास में 2007 में शायद पहली बार देश के किसी हिस्से में दलितों की अगुआई में बहुमत से सरकार बनी थी. दलित और उस से जुड़े लोग इसे बदलाव की नई बयार के रूप में देख रहे थे. इस के पहले तक दलित ऊंची जातियों के नीचे काम करता था. उस को सत्ता तो दूर, बराबर में बैठने और खाने व पीने का भी अधिकार नहीं था. न वह ऊंची जातियों की तरह खुशियां मना सकता था और न ही दुखों को जाहिर कर सकता था.

जब देश आजाद हुआ तब यह लगा कि शायद दलितों को बराबरी का हक मिल जाएगा. लोकतंत्र के नाम पर दलितों को ऊंची जातियों के पीछे चलने का ही हक मिला था. आजादी के कुछ समय पहले से ही दलित समाज के हित के लिए बाबा साहब भीमराव अंबेडकर ने एक नई राजनीतिक ताकत को जुटाने का प्रयास शुरू किया था.

चुनावी बदलाव के बाद लोगों को यकीन हो चला था कि बहुमत की सरकार बनाने के बाद मायावती दलितों की भलाई के काम करेंगी. लेकिन यह भ्रम जल्दी ही टूट गया. नतीजतन, मायावती से लोगों का ऐसा मोहभंग हुआ कि बसपा अपने सब से बुरे दौर में वापस चली गई.

2007 में बहुमत की सरकार बनाने का लाभ मायावती दलितों की भलाई में नहीं लगा सकीं. न वे दलितों के हालात बदल सकीं, न ही दलित समाज को सही राह दिखाने में सफल रहीं. यही वजह थी कि 5 साल सरकार चलाने के बाद मायावती को चुनावदर चुनाव हार का सामना करना पड़ा.

अपनी स्थापना के बाद से बसपा आज सब से खराब हालत में है. सोचने वाली बात यह है कि मायावती इस हालत से निबटने में खुद को बेसहारा पा रही हैं. वे विरोधी दल के रूप में संघर्ष करती नजर नहीं आ रही हैं. मायावती को अभी भी यह लग रहा है कि दूसरों से नाराज हो कर लोग उन की छत्रछाया में अपनेआप आ जाएंगे. यह सच है कि मायावती देश के बड़े दलित और कमजोर वर्ग के उत्थान का जरिया बन सकती थीं. इतिहास ने उन को जो मौका दिया था, उस में वे चूक गईं.

सत्ता न बन सकी बदलाव का जरिया

दलित समाज में अंधविश्वास, जातिबिरादरी, अशिक्षा और छुआछूत जैसी बुराइयों को दूर करने के लिए कई सामाजिक संगठनों ने काम शुरू किया. बामसेफ और डीएस-4 ने भी कांशीराम की अगुआई में नई मुहिम शुरू कर दी थी. वे मानते थे कि सत्ता में भागीदारी कर के ही समाज को बदला जा सकता है.

अपनी राह को मजबूत करने के लिए कांशीराम ने 1984 में बहुजन समाज पार्टी का गठन किया. बामसेफ और डीएस-4 की ताकत के बल पर यह पार्टी बहुत ही जल्द दलितों के बीच अपनी पैठ बनाने में सफल रही. 1991 में बसपा ने पहली बार उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में हिस्सा लिया और अपने 12 विधायकों को जीत दिलाने में सफलता हासिल की. सालदरसाल उस की ताकत भी बढ़ने लगी थी. 1993 में 67, 1996 में 68, 2002 में 98 विधायक बनाने में बसपा सफल रही थी.

1990 के दशक में प्रदेश में जातीय और धार्मिक आधार पर वोटों का धुव्रीकरण शुरू हुआ. इस की वजह से पहली  बार अयोध्या विवाद को सीढ़ी बना कर भारतीय जनता पार्टी सत्ता तक पहुंची थी. कांग्रेस के साथ रहने वाली बाकी ऊंची जातियां भाजपा के साथ आ खड़ी हुई थीं. केंद्र में उस समय के प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने मंडल कमीशन लागू कर के पिछड़ों की चेतना को जगा दिया था.

बसपा के संस्थापक कांशीराम को उस समय यह लगा कि अगर ऊंची जातियों को सत्ता से बाहर करना है तो दलित और पिछड़ों का गठजोड़ बनाना पड़ेगा. इसी के चलते बसपा और सपा का 1993 में गठजोड़ हुआ था. यह स्वाभाविक गठजोड़ था जो सदियों से वंचित शूद्रों यानी पिछड़ों और अछूतों यानी दलितों के बीच था. यह गठजोड़ एक अभूतपूर्व उत्पादक वर्ग पैदा कर सकता था और कम से कम उत्तर प्रदेश को नई चेतना व अर्थव्यवस्था दे सकता था पर यह चालबाजी व मूर्खता के कारण औंधेमुंह गिर गया. बसपा ने इस तरह के गठजोड़ कर के सत्ता पर तो कब्जा कर लिया पर सत्ता के जरिए व्यवस्था बदलने का उस का सपना पूरा नहीं हो सका. बाद में भी सत्ता को हासिल करने के लिए जो भी समझौते पार्टी ने किए वे उस के लिए घातक साबित हुए. बसपा के लिए गठजोड़ के साथ सत्ता हासिल करना दोधारी तलवार बन गई.

फिर न बन सका दलित-पिछड़ा गठजोड़

बसपा के सहयोग से समाजवादी पार्टी के मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री बने. कांशीराम की भावनाओं को मुलायम समझ नहीं पाए और यह कोशिश करने लगे कि बसपा को तोड़ दिया जाए. दूसरी तरफ भाजपा बसपा को अपनी ओर मिलाने के लिए बेताब थी. नतीजा यह हुआ कि सपा और बसपा का गठजोड़ टूट गया. दलित और पिछड़ों की अगुआई करने वाली बसपा और सपा के बीच दूरियां इतनी बढ़ गईं कि दोबारा ये दल आपस में कभी मिल ही नहीं पाए.

सत्ता पर कब्जा करने के लिए बसपा ने पिछड़ों का साथ छोड़ कर अगड़ों का सहारा लिया. अगड़ों और पिछड़ों का यह गठबंधन बसपा को रास आया और बसपा नेता मायावती 3 बार मुख्यमंत्री बनीं. मायावती मुख्यमंत्री तो बन गईं पर बसपा में ऊंची जातियों का प्रवेश हुआ तो उन का जनाधार धीरेधीरे खिसकने लगा. मायावती के लिए दलित-अगड़ा गठजोड़ ‘केर बेर के संग’ साबित हुआ.

कांशीराम के बाद मायावती जब बसपा की राष्ट्रीय अध्यक्ष बनीं तो उन्होंने ऊंची जातियों की अगुआई करने वाली भाजपा के अगड़ी जातियों के वोटबैंक ब्राह्मण, बनिया और ठाकुरों को पार्टी से जोड़ने का काम किया. इस का सब से बड़ा असर यह दिखा कि मायावती की अगुआई में बसपा पहली बार प्रदेश की नंबर-1 पार्टी बन गई. इस समय यह लगा कि बसपा नेता मायावती ने बड़ी चतुराई से प्रदेश के राजनीतिक हालात को अपनी ओर मोड़ने में सफलता हासिल कर ली.

मायावती अपनी सफलता को बहुत दिनों तक बरकरार नहीं रख पाईं. दलित व पिछड़ा गठजोड़ एक बार टूटा तो फिर नहीं बन सका. अगर दलित-पिछड़ा गठजोड़ कायम रहता तो बसपा और सपा दोनों की आज जैसी हालत न होती. मायावती की व्यक्तिगत तानाशाही सोच इस राह में सब से बड़ा रोड़ा है तो वहीं समाजवादी पार्टी के संरक्षक मुलायम सिंह यादव परिवार के साथ उन की दूरी दलित-पिछड़ा गठजोड़ की राह में सब से बड़ा रोड़ा है. अपनी राजनीतिक अदूरदर्शिता के चलते मुलायम परिवार के बिखरने का लाभ उठाने में भी मायावती चूक गईं.

सोशल इंजीनियरिंग से बिगड़ी बात

बसपा को पता था कि वह सत्ता पर तब तक कब्जा नहीं कर सकती जब तक दूसरी जातियां उस के साथ न आ जाएं. इसलिए उस ने दलित और अगड़ी जातियों के गठजोड़ का नया फार्मूला बनाया. इस का सब से बड़ा आधार यह था कि अगर बसपा को 24 फीसदी दलितों का वोट मिल जाए और 8 फीसदी दूसरी जिताऊ जातियों का वोट मिल जाए तो 32 फीसदी वोट उस का हो जाएगा और फिर वह सरकार बनाने में सफल हो जाएगी.

14वीं विधानसभा के चुनाव में बसपा ने ब्राह्मणों को 86, ठाकुरों को 67 और बनियों को 31 टिकट दे कर अपना फार्मूला पेश किया. इस का परिणाम यह रहा कि देश में पहली बार दलितों को सत्ता में कब्जा करने का पूरा अधिकार मिल गया. 2007 में बसपा का यह प्रयोग उस को बहुमत की सरकार बनाने में मददगार जरूर साबित हुआ पर यह बसपा की जड़ों को हिला गया.

कांशीराम अपनी बातों में ब्राह्मणवादी व्यवस्था को नीबू का रस कहते थे. दलितों को समझाते हुए वे कहते थे, ‘जिस तरह से नीबू का थोड़ा सा रस पूरे दूध को फाड़ देता है उस तरह  ब्राह्मणवादी व्यवस्था समाज को जाति और धर्म के रूप में अलगअलग कर देती है. छुआछूत की सब से बड़ी वजह यही व्यवस्था होती है.’ जब तक मायावती सरकार में रहीं तब तक उन को भी इस बात का एहसास नहीं हुआ कि सोशल इंजीनियरिंग के रूप में जिन अगड़ी जातियों, खासकर ब्राह्मणों, को बसपा से जोड़ लिया है, वे बसपा को बांटने में लगी हैं. वे इस बात से खुश थीं कि कई ब्राह्मण नेता उन के पैर छू रहे थे. वे खुद को दलितों की देवी मान बैठीं. उन को लगा कि उन का मान और सम्मान पूरे देश के दलितों के लिए जरूरी हो गया है. मायावती की यह सोच उन को जमीन से दूर करती गई.

बसपा को मजबूत करने के लिए मायावती ने सोचा कि दूसरे दलित संगठनों और राजनीतिक दलों को कमजोर कर दिया जाए तो बसपा कभी कमजोर नहीं होगी. दलित बसपा को छोड़ कर कहीं और नहीं जा सकता. मायावती यह भूल गईं कि सोशल इंजीनियरिंग के प्रभाव में दलित भी आ चुका है. उसे यह भी लगने लगा कि ऊंची जातियों की तरह से समाज में रहने के लिए उसे ऊंची जातियों सा व्यवहार करना चाहिए. इस में सब से बड़ा खतरा पूजापाठ से होने लगा.

मायावती ने दलित महापुरुषों के साथ कई पार्कों में अपनी खुद की मूर्तियां लगवा दीं. ऐसे में दलित खुद उसी मूर्तिपूजा की व्यवस्था में फंस गया जिस से निकालने के लिए डाक्टर अंबेडकर और कांशीराम ने पूरे समाज को जागरूक किया था. दलितों का मूर्तिपूजा और कर्मकांड की तरफ दोबारा आकर्षित होना बसपा पर भारी पड़ा.

समाज को जोड़ने में असफल

मायावती की छवि कमजोरों की मददगार की बनी. ‘चढ़ गुंडों की छाती पर, वोट लगा दो हाथी पर’ का नारा बताता है कि बाहुबलियों को ले कर बसपा नेता मायावती का क्या रुख था. बसपा की नेता मायावती ने मुख्यमंत्री बनने के बाद अपनी अलग छवि बनाई थी. एक कुशल प्रशासक के रूप में उन की आज भी तारीफ होती है.

मायावती के राज में बड़े से बड़ा बाहुबली भी घबरा जाता था. राजा भैया के अलावा दूसरे नेता मुख्तार अंसारी, अखिलेश सिंह, अतीक अहमद भी मायाराज में खुश नहीं थे. अपनी इस छवि को वे आगे कायम रखने में सफल नहीं हुईं. जब मायावती ने मुख्तार अंसारी की तारीफ शुरू की, उन की छवि को नुकसान पहुंचने लगा. कांशीराम ने जब मायावती को बसपा की विरासत सौंपी थी तो उन का सपना था कि वे पूरे वंचित समाज को एकजुट कर आगे बढ़ें. मायावती ने शुरुआती दौर में यह काम किया भी. बाद में उन की तानाशाही शैली से दलित समाज बिखरने लगा.

मायावती का जन्म 15 जनवरी, 1956 को गाजियाबाद जिले के छोटे से बादलपुर गांव, जो अब गौतमबुद्ध नगर जिले में है, में प्रभुदयाल और रामरती के घर में हुआ था. मायावती के 9 भाईबहन हैं. मायावती ने मेरठ विश्वविद्यालय से बीएड और दिल्ली विश्वविद्यालय से कानून की डिगरी हासिल की. दिल्ली के प्राइमरी स्कूल में बच्चों को पढ़ाने की नौकरी भी की. उस समय मायावती दिल्ली के इंद्रपुरी इलाके में छोटे से घर में रहती थीं.

1984 में मायावती की मुलाकात कांशीराम से हुई. इस के बाद बहुजन समाज पार्टी बनी तो मायावती उस की शुरुआती सदस्य बनीं. मायावती ने अपने बचपन में भेदभाव और छुआछूत को करीब से देखा था. ऐसे में उन का पूरा प्रयास था कि वे इस वर्ग के उत्थान की दिशा में काम करेंगी. कांशीराम ने मायावती को समाज के लिए काम करने और राजनीतिक सत्ता हासिल करने के लिए तैयार किया.

1984 में ही मायावती ने पहली बार कैराना लोकसभा से निर्दलीय के रूप में चुनाव लड़ा. इस चुनाव में उन को 44 हजार वोट ही मिले. वे चुनाव हार गईं. 1989 में मायावती ने बिजनौर क्षेत्र से पहली बार चुनाव जीता. 1998 और 1999 में अकबरपुर से लोकसभा, 1994 में राज्यसभा, 1996 और 2002 में वे विधायक भी बनीं. 1995 में मायावती पहली बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं. 1997 और 2002 में भी मायावती मुख्यमंत्री बनीं. सितंबर 2007 में मायावती बसपा की राष्ट्रीय अध्यक्ष बनीं. मायावती चौथी बार मुख्यमंत्री बनने वाली देश की पहली महिला नेता बनीं.

मायावती के पहले वाले 3 कार्यकालों में जनता ने देखा है कि प्रदेश में कानून व्यवस्था का राज रहा. नौकरशाही पर लगाम लगाने में वे सब से आगे रहीं. हथियार ले कर सड़कों पर घूमने वालों की तादाद घट गई थी. मायावती कुशल प्रशासक तो बनीं पर उन में तानाशाही सोच का भी जन्म हो गया. सत्ता हासिल करने के लिए मायावती ने दलित-अगड़ा गठजोड़ तैयार कर के सोशल इंजीनियरिंग का फार्मूला तो तैयार कर लिया पर दलित समाज को एकजुट रखने में वे असफल रहीं. बसपा में दलितों के साथ अति पिछड़ी जातियां भी थीं, जो समाज में दलित जैसी हालत में ही थीं. मायावती इन को अपने साथ ले कर चलने में सफल नहीं हुईं. इन जातियों के नेता धीरेधीरे बसपा से अलग होने लगे. नेताओं के साथ उन से जुड़े लोग भी बसपा से दूर होने लगे. मायावती इन बातों को समझने को तैयार नहीं थीं.

हार से नहीं लिया सबक

2009 के लोकसभा चुनाव में मायावती ने प्रधानमंत्री बनने का सपना देखना शुरू कर दिया था. उस के पीछे की सोच थी कि जिस तरह से विधानसभा चुनाव में बसपा के पक्ष में वोट पड़े हैं, अगर वोटिंग का यही ट्रैंड रहा तो बसपा को लोकसभा की 35 से 40 सीटें उत्तर प्रदेश से मिल जाएंगी. असल में विधानसभा चुनावों के 2 वर्षों के अंदर ही बसपा से लोगों का मोहभंग हो चुका था. मायावती और उन के रणनीतिकार यह समझने को तैयार नहीं थे.

2009 के लोकसभा चुनावों का परिणाम बसपा की आशा के अनुकूल नहीं रहा. इस के बाद भी बसपा ने इस खतरे की घंटी को सुनने में चूक की. वह यह मानने को तैयार नहीं थी कि दलित वोट पार्टी से खिसकता जा रहा है. इस का परिणाम यह हुआ कि 2012 के विधानसभा चुनाव में उसे उस से बड़ी हार का सामना करना पड़ा. अपने तानाशाही रुख को छोड़ने को मायावती अब भी तैयार नहीं हैं. विरोधी पार्टी के रूप में जिस तरह से बसपा को संघर्ष करना चाहिए वह इस के लिए तैयार नहीं है.

विधानसभा चुनाव में सपा ने बसपा को चारोंखाने चित कर दिया. बसपा तब भी यह स्वीकार करने को तैयार नहीं थी कि उस का बेस वोट खिसक चुका है. परिणाम यह हुआ कि 2014 के लोकसभा चुनाव में बसपा को एक भी सीट पर विजय हासिल नहीं हुई. बसपा को इस बात का गुमान था कि लोकसभा चुनाव में भले ही बसपा को वोट नहीं मिले हों, पर विधानसभा चुनाव में बसपा की सरकार बनेगी. समाजवादी पार्टी में बिखराव का लाभ उठाने में भी मायावती असफल रहीं. जिस के कारण लोकसभा की ही तरह विधानसभा चुनाव में भी पार्टी को बुरी हार का सामना करना पड़ा. जिस का प्रभाव यह रहा कि बसपा के पास मायावती की राज्यसभा सीट बचाने लायक विधायक नहीं बन सके. 1993 के बाद पहली बार मायावती किसी सदन की नेता नहीं बन पाईं. जिस बसपा को 2007 में प्रचंड बहुमत मिला वह 10 वर्षों के अंदर प्रदेश में सब से नीचे के पायदान पर पहुंच गई. इस में मायावती की रणनीति का सब से बड़ा दोष रहा है.

जरूरी है दलित-पिछड़ा गठजोड़

दलित और पिछड़ों की अगुआई करने वाली बसपा और सपा दोनों ही उत्तर प्रदेश की राजनीति में हाशिए पर पहुंच गई हैं. दोनों के अपनेअपने बेस वोट पार्टियों से छिटक चुके हैं. भाजपा ने अपने नवहिंदुत्व के सहारे दलित और पिछड़ों को मूर्तिपूजा व धार्मिक कर्मकांडों से जोड़ने में सफलता हासिल कर ली है. भाजपा ने गाय, गंगा और अयोध्या जैसे मुद्दों को उठा कर हिंदुत्व की नई बहस छेड़ कर दलितपिछड़ों को खुद से जोड़ने में सफलता पा ली है.

अब चुनाव का मुद्दा जाति से हट कर धर्म पर टिक गया है. धर्म के नाम पर दलितपिछड़ा वर्ग सपाबसपा से दूर भाजपा के पक्ष में खड़ा हो जाता है. सपा व बसपा दोनों को इस बात का भ्रम था कि ज्यादा से ज्यादा मुसलिमों को टिकट दे कर वे मुसलिम वोट को अपने पक्ष में कर सकती हैं. सपा व बसपा के इस कदम से इन पार्टियों के विरोध में हिंदू वोट एकजुट हो गया. पहले हिंदुत्व के नाम पर अगड़ी जातियां ही भाजपा के पक्ष में खड़ी होती थीं, अब दलित और पिछड़ी जातियां भी भाजपा के पक्ष में खड़ी हो गई हैं.

दलित और पिछड़ों के बीच धार्मिक महत्त्व का बढ़ना खतरे की घंटी है. सपा व बसपा दोनों के बड़े नेता इस बात को समझने को तैयार नहीं हैं. उन में विचारक तो हैं ही नहीं. जो विचारक हैं भी, उन्हें ये नेता बुद्धिजीवी मान कर अछूत मानते हैं और चार हाथ दूर रखते हैं. उन्होंने अपने को चाटुकारों से घेर रखा है जो जाति विशेष का खयाल रखते हैं, जनता में समरसता आने में विश्वास नहीं रखते. इसलिए वे खुद हिंदुत्व को अपना कर भाजपा की कार्बन कौपी बनने की तैयारी में हैं. सपा व बसपा के मुख्य नेताओं को लगता है कि धार्मिक कर्मकांड से वे भाजपा को उस की ही भाषा में मात दे सकते हैं. वे यह भूल जाते हैं कि धार्मिक कर्मकांड की राह पर चल रहे वे ‘माया मिला न राम’ वाली हालत में पहुंच जाएंगे. अयोध्या में राम की मूर्ति लगवाने के विवाद पर जब सपा नेता अखिलेश यादव से सवाल किया गया तो वे बोले, ‘जब हम सत्ता में आएंगे तब इस से बड़ी मूर्ति लगवा देंगे.’ असल वे उस शर्म को भूल गए जिस ने शंबूक के वेद पढ़ने पर आपत्ति की थी.

अखिलेश जिस तरह से समाजवादी विचारधारा से दूर हो गए हैं, उसी तरह मायावती बहुजन की विचारधारा को दरकिनार कर चुकी हैं. विचारधारा छोड़ चुके ये दल केवल राजनेता बन कर रह गए हैं. जिस का लाभ लेते हुए भाजपा ने अपने नवहिंदुत्व का प्रचार किया. नतीजतन, दलित और पिछड़े दोनों ही मूर्तिपूजा के समर्थक बन कर हिंदुत्व की विचारधारा पर चल पड़े. उन्हें मनुवाद से होने वाले नुकसान की समझ नहीं है. वे अगड़ा बनने के लिए उन की ही तरह से पूजापाठ में लग गए हैं. उन्हें इस बात का आभास नहीं कि पूजापाठ से सामाजिक समरसता नहीं आएगी, पूजापाठ में लग कर भी दलित समाज मुख्यधारा का अंग नहीं बन सकेगा. जबकि भाजपा इस का लाभ उठा कर अपना राजनीतिक उल्लू सीधा करती रहेगी.

मायावती की कमियां

–       कुरसी से हटने के बाद उत्तर प्रदेश से दूरी बना लेती हैं. उन का संघर्ष केवल प्रैस कौन्फ्रैंस तक सीमित रह जाता है. बसपा और उस के कार्यकर्ता बगैर सेनापति के संघर्ष करने में असफल.

–       बसपा का कार्यालय अपने लोगों का मददगार नहीं बनता. किले की तरह बना पार्टी कार्यालय अपनों को संरक्षण देने में असफल.

–       मायावती के तानाशाही रुख से दलितों की छोटीछोटी कई जातियां और उन के नेता पार्टी से दूर होते गए. बसपा ने नया वोटबैंक नहीं बनाया.

–       मायावती दलितों में कर्मकांड और धार्मिक कुरीतियों के सच को उजागर करने में असफल. जिस मूर्तिपूजा का बसपा विरोध करती थी, मायावती ने उस का समर्थन किया.

–       अंबेडकर और कांशीराम के कर्मकांडविरोधी विचारों को फैलाने में बसपा असफल. इसी के चलते दलित कर्मकांड और उस के जाल में उलझ गए.

–       तानाशाही व्यवहार को छोड़ने में मायावती असफल. जनता, नेताओं और दूसरे लोगों से सीधे संपर्क नहीं करतीं.

VIDEO : रोज के खाने में स्वाद जगा देंगे ये 10 टिप्स

ऐसे ही वीडियो देखने के लिए यहां क्लिक कर SUBSCRIBE करें गृहशोभा का YouTube चैनल.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें