अब काला धंधा बनती जा रही है शिक्षा

शिक्षा महंगी होती जा रही है और उस में भरपूर बेईमानी भी घुस रही है. पहले शिक्षा देने वाले अपने धंधों में चाहे बेईमानियां करते हों वे स्कूल, कालेजों को दान भी देते थे और उन के प्रबंध में समय भी. अब उलटा हो गया है और शिक्षा चाहे सरकारी हो या प्राइवेट दोनों में धांधली ही धांधली है. मध्य प्रदेश का व्यापम घोटाला इसी का नतीजा है. दिल्ली के समीप गुड़गांव में अंसल विश्वविद्यालय में आजकल हंगामा मचा हुआ है. अंसल विश्वविद्यालय अंसल बिल्डरों द्वारा चलाया जा रहा है और उन्होंने शिक्षा में भी छात्रों को अट्रैक्ट करने के लिए वे ही गुर अपनाए थे जो वे अपने फ्लैटों और प्लाटों को बेचने में अपनाते हैं : सब्जबाग दिखा कर पैसा वसूल करो.

छात्रों को कहा गया था कि उन्हें स्विमिंग पूल, जिम और स्पोर्ट्स सैंटर दिया जाएगा और उस के लिए मोटा पैसा ले लिया गया. पर छात्रों के हितों को तो आजकल के शिक्षा प्रबंधक ध्येय समझते ही नहीं हैं. उन्होंने छात्रों के फ्लैटों को खरीदारों के बराबर मान कर वादों को टरकाना शुरू कर दिया और नतीजा यह हुआ है कि अंसल विश्वविद्यालय के छात्र हड़ताल व धरने पर बैठे हैं. यह कई निजी विश्वविद्यालयों में हो रहा है, क्योंकि वहां प्रबंधक शिक्षा के माध्यम से अगली पीढ़ी को तैयार करने नहीं आ रहे, अपने लिए पैसा बनाने के लिए शिक्षा का इस्तेमाल कर रहे हैं.

शिक्षा आज देश का एक बड़ा काला धंधा बन गया है. आज के मातापिता जानते हैं कि शिक्षा ही बच्चों का भविष्य बना सकती है और इसलिए बच्चों की पढ़ाई पर पेट काट कर खर्च कर रहे हैं, पर शिक्षा देने वाले इसे मातापिता की मजबूरी मान कर उन्हें लूटने में लग गए हैं. सरकारी शिक्षा में कौपीइंग, एबसैंटिज्म और ट्यूशन की भरमार है तो निजी में फीस के नाम पर डोनेशन और चार्जेज का बोलबाला है.

प्रबंधक चाहे सरकारी शिक्षा के हों या निजी शिक्षा के, नई पीढ़ी के प्रति अपने उत्तरदायित्व को भूल चुके हैं और उसे कमाई और सिर्फ कमाई का धंधा मान कर चलते हैं. अफसोस यह है कि मातापिता अपने को इतना लाचार व असहाय समझते हैं कि हर पग पर कंप्रोमाइज करने को तैयार हैं. वे किसी भी गलत काम पर हल्ला नहीं मचाते.

गनीमत है कि देश की आबादी इतनी ज्यादा है कि कामचलाऊ संख्या में प्रतिभाशाली छात्र निकल ही आ रहे हैं. तभी तो 95 और 98% वालों को भी दाखिला नहीं मिल रहा है, पर यह भी संभव है कि जो 95 व 98% वाले बेईमान शिक्षा के प्रौडक्ट हों और डिग्री की प्रतिष्ठा को भी नष्ट कर रहे हों, पर इतना जरूर है कि हमारे युवाओं ने इन विषम स्थितियों में भी कुछ लाभ तो कमा लिया कि अमेरिका की सिलीकौन वैली भारतीयों  से भरी पड़ी है और अमेरिका में डौनल्ड ट्रंप के निशाने पर मुसलिम आतंकवादी कम और भारतीय मेधावी छात्र ज्यादा हैं. अगर हमारे शिक्षा प्रबंधक जरा से देशभक्त हो जाएं तो वे अगली पीढ़ी ऐसी तैयार कर सकते हैं कि भारत ही भारत दिखे.

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बलात्कार : कानून के साथ सोच भी बदले

सामूहिक बलात्कार नारी अस्मिता को तोड़ने के लिए होते हैं. स्त्री को भोग और दान समझने की प्रवृत्ति इस को बढ़ावा देने का काम करती है. ऐसे मामलों में समाज औरत को ही दोषी मानता है. अहल्या से ले कर द्रौपदी तक तमाम उदाहरण धर्मग्रंथों में मौजूद हैं. वर्तमान समाज में फूलन देवी, बिलकीस बानो और निर्भया जैसे बहुत सारे ऐसे मामले हैं. इन तमाम घटनाओं के बाद भी समाज की सोच में बदलाव नहीं आता दिख रहा है. बलात्कार जैसे अपराध को कम करने के लिए सिर्फ सख्त कानून बनाने भर से काम नहीं चलेगा बल्कि समाज को अपनी सोच भी बदलनी होगी.

दिल्ली में निर्भया बलात्कार और हत्याकांड के मामले में अदालत का फैसला मील का पत्थर माना जा सकता है. निर्भया कांड ने पूरे देश को हिला कर रख दिया था. यह ऐसा मामला था जिस ने अदालत से ले कर देश की संसद तक को जनता की पीड़ा को सुनने के लिए झकझोर कर रख दिया था. हजारों लोगों ने निर्भया को ले कर संसद का घेराव किया.

संसद ने जहां इस कांड के बाद नाबालिग अपराध को नए सिरे से परिभाषित किया वहीं निचली अदालत से ले कर ऊपरी अदालत तक हर जगह एकजैसा ही फैसला दिया गया.

निर्भया को ले कर केवल दिल्ली में ही धरनाप्रदर्शन नहीं हुए, पूरे देश में तमाम सामाजिक संस्थाओं ने जनता को आगे कर के निर्भया के दर्द का साझा किया. 2012 से हर 16 दिसंबर को निर्भया दिवस के रूप में याद किया जाता है.

5 वर्षों के बाद इस मामले में बड़ी अदालत का फैसला आया और अपराधियों को फांसी की सजा सुनाई गई. यह सच है कि न्यायपालिका ने अपनी जिम्मेदारी निभाई है. अब बाकी समाज के सामने जिम्मेदारी निभाने का वक्त है. अदालत का यह फैसला तभी सफल होगा जब लोग इस से सबक लेंगे. बलात्कार केवल कानून से जुड़ा मसलाभर नहीं है. समाज का दायित्व सब से बड़ा है. सब से जरूरी है कि समाज से उस मानसिकता को खत्म किया जाए जिस के कारण बलात्कार जैसे कांड होते हैं. मात्र कानून से इस सामाजिक बुराई और अपराध की प्रवत्ति को खत्म नहीं किया जा सकता.

नहीं बदल रही धर्म की सोच

सामाजिक बुराई को खत्म करने के लिए सब से पहले उस से जुड़ी सोच को खत्म करने की जरूरत है. सामाजिक बुराई समाज से तब तक खत्म नहीं हो सकती जब तक उस से जुड़ी मानसिकता खत्म नहीं हो जाती. इस के लिए जरूरी है कि महिलाओं को बराबरी का हक दिया जाए. धर्म के नाम पर महिलाओं को जिस तरह से पीछे ढकेला जाता है, उस सोच को खत्म किया जाए.

हमारे देश में प्रगतिशील न्याय व्यवस्था तो है पर अभी भी धर्म का शिकंजा इतना मजबूती से गले में पड़ा है कि हमें इस से छुटकारा नहीं मिल पा रहा है. हम खुद को प्रगतिशील कहते हैं पर हमारा समाज प्रगतिशील नहीं है. बलात्कार कई बार पुरुषवादी सत्ता को कायम रखने के लिए किया जाता है.

कबीलाई संस्कृति के दौर में बदला लेने के लिए औरत पर हमला किया जाता था. रामायण से ले कर महाभारत और अन्य धार्मिक ग्रंथ इस बात के गवाह हैं. महाभारत में द्रौपदी को भरी सभा में अपमानित करना ऐसी ही पुरुषवादी सत्ता की सोच थी जो विरोधियों से बदला लेने के लिए द्रौपदी को दांव पर लगा देती है. लड़ाई कौरव और पांडवों के बीच थी. पांडवों को अपमानित करने के लिए द्रौपदी को दांव पर लगाया गया.

रामायण में भी ऐसे कई उदाहरण हैं. राम को सबक सिखाने के लिए सीता का अपहरण और सूर्पणखा को सबक सिखाने के लिए उस की नाक को काटना पुरुषवादी सत्ता के ही उदाहरण हैं. नाक काटना औरत के लिए अपमान का द्योतक था. यह सिलसिला आधुनिक समाज में भी कायम है. ऐसी सोच बदलने की जरूरत है. बदला देने के लिए औरत का अपमान बंद होना चाहिए. औरत का अपमान बंद होने से अपराध में कमी आएगी.

आज अगर किसी को सबक सिखाना है तो उस की औरत को अपमानित किया जाता है. बड़े अपराधों की बात को दरकिनार भी कर दिया जाए तो हम रोज ऐसे काम करते हैं जो औरतों के लिए अपमान का कारण बनते हैं. लड़ाईझगड़े में ऐसी गालियों का प्रयोग करते हैं जो औरतों से जुड़ी होती हैं. गाली हम पुरुष को देते हैं पर वह होती महिलाओं के लिए है. महिलाओं को जिस तरह से रोजमर्रा की जिंदगी में अपमान सहन करना पड़ता है उसे कानून से नहीं, समाज में सुधार लाने से ही दूर किया जा सकता है.

हावी है पुरुषवादी सोच

सामूहिक बलात्कार की घटनाएं पुरुषवादी सोच को जाहिर करती हैं. ऐसे ज्यादातर मामले सबक सिखाने जैसी प्रवृत्ति को भी दिखाते हैं. गुजरात दंगों में बिलकीस बानो का मसला ऐसा ही बड़ा मसला था. जिस में गर्भवती बिलकीस बानो का बलात्कार होता है. उस के गर्भ में पल रहे बच्चे को पेट से निकाल कर पत्थर पर पटक कर मार दिया गया. उस के परिवार के साथ बलात्कार और हत्या जैसा अपराध किया गया.

ऐसे तमाम उदाहरण मौजूद हैं जहां पर सबक सिखाने के लिए औरतों के साथ ऐसे जघन्य अपराध होते हैं. जातीय हिंसा और भेदभाव की घटनाओं में ऐसे उदाहरण देखने को मिलते रहते हैं. उत्तर प्रदेश में कई साल पहले बेहमई कांड हुआ था. जहां फूलन देवी के साथ सामूहिक बलात्कार हुआ. उस के बाद फूलन देवी दस्यू सरगना बनीं और अपने साथ हुए अपमान का बदला लेने के लिए उन्होंने सामूहिक नरसंहार किया.

फूलन देवी बाद में संसद की सदस्य भी बनीं. उन पर फिल्म से ले कर तमाम तरह की किताबें भी लिखी गईं. फूलन की ही तरह निर्भया मसले ने भी पूरे देश को झकझोर दिया. 1981 के फूलन देवी बलात्कार कांड से ले कर 2012 में निर्भया कांड तक एकजैसे ही हालात देखने को मिले. जिस से यह लगता

है कि तमाम तरह के कानूनी झगड़ों और फैसलों के बाद भी समाज अपना दायित्व निभाने में सफल नहीं हो सका है.

गुजरात दंगों की बिलकीस बानो को भी देखें तो यही सामने आता है. इन प्रमुख तीनों घटनाओं की पृष्ठभूमि भले ही अलगअलग हो पर हालात एकजैसे ही थे. बलात्कार केवल नारी अस्मिता से जुड़ा है. पुरुष अपनी सत्ता को बरकरार रखने के लिए इस तरह का कृत्य करते हैं.

बलात्कार में दोषी पुरुष होता है पर सजा अधिकतर औरत को ही मिलती है. गौतम ऋषि की पत्नी अहल्या के साथ धोखा देने का काम इंद्र ने किया था लेकिन गौतम ऋषि ने सजा इंद्र के बजाय पत्नी अहल्या को दी, उस को पत्थर की शिला में बदल दिया.

औरतों को ही दोषी मानना

बलात्कार की शिकार औरतों के लिए समाज में मानसम्मान हासिल करना बहुत मुश्किल काम होता जा रहा है. लखनऊ की रहने वाली देविका (बदला नाम) के साथ उस के भाई और पिता ने बलात्कार किया. देविका ने इस की शिकायत उस समय के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से की. इस के बाद पिता और भाई को जेल हो गई. उस की मां और दूसरे भाई ने उसे सहयोग करने के बजाय घर से निकाल दिया. देविका एक शेल्टरहोम में रहने लगी. सरकार से मिली सहायताराशि से उस ने ब्यूटीपार्लर खोल लिया.

देविका कहती है, ‘‘मुझे ब्यूटीपार्लर के लिए दुकान मिलनी मुश्किल थी. जब लोगों को पता चलता था कि मैं बलात्कार की शिकार हूं, लोगों का व्यवहार बदल जाता है. बड़ी मुश्किल से ब्यूटीपार्लर के लिए जगह मिली.’’

देविका 27 साल की है. वह अपनी शादी का घर बसाना चाहती है. इस के लिए उस ने कई बार प्रयास भी किया. जैसे ही लोगों को यह पता चलता है कि वह रेप विक्टिम है, लोग शादी करने से मुकर जाते हैं. ऐसे मसले एक नहीं, कई हैं. बात केवल बलात्कार की शिकार लड़कियों की ही नहीं है. अगर लड़की से छेड़छाड़ की बात शादी के समय पता चलती है तो लोग उस से भी बचना ही चाहते हैं. बलात्कार और छेड़छाड़ जैसी घटनाएं औरतों के चरित्र से जोड़ कर देखी जाती हैं.

असल में ये आपराधिक घटनाएं हैं. इन को अपराध की घटनाओं के रूप में ही देखा जाए तो मसले आसानी से सुलझ सकते हैं. इस तरह की घटनाओं में न केवल लड़कियों की ही गलती मानी जाती है बल्कि उन से ही उम्मीद की जाती है कि वे अच्छे से कपड़े पहनें. ठीक तरह से रहें. देर रात घर से बाहर न निकलें.

कौमार्य का दबाव

समाज के दबाव के चलते कई बार मातापिता अपने बच्चों, खासकर लड़कियों, को टोकाटाकी करते हैं. जिसे वे अपने ऊपर दबाव मानती हैं. असल में मातापिता इस तरह की टोकाटाकी इसलिए करते हैं चूंकि लड़कियों के ऐसे शिकार होने से वे सामाजिक रूप से दबाव में आ जाते हैं. लड़की के लिए ऐसी घटनाएं लांछन की तरह होती हैं, जिसे समाज भूलता नहीं. ऐसे में लड़की का आने वाला जीवन प्रभावित हो जाता है.

आज के दौर में भी शादी से पहले लड़कों को इस बात की चिंता होती है कि उस की होने वाली पत्नी का कौमार्य सुरक्षित है या नहीं. अगर शादी के बाद सुहागरात में लड़के को यह पता चलता है कि उस की पत्नी का कौमार्य सुरक्षित नहीं है, सुहागरात में रक्तस्राव नहीं हुआ तो लड़की के चरित्र पर उंगली उठ जाती है. कई बार इस तरह की शंका से दांपत्य जीवन प्रभावित हो जाता है.

धर्म नारी के निजी मामलों में दखल करता है. जिस से सब से अधिक परेशानी का सामना महिलाओं को करना पड़ता है. महिलाओं के कपड़ों से ले कर रहनसहन और आचारविचार को तय करने का काम धर्म के ठेकेदार करते हैं. जिस से यह लगता है कि वह औरतों को अपने जाल में उलझा कर रखना चाहता है. बात केवल एक धर्म की ही नहीं है, हर धर्म में महिलाओं को हाशिए पर रखा जाता है. जबकि, यह दिखावा बारबार किया जाता है कि धर्म महिलाओं को इज्जत देता है.

असल में वह महिलाओं को बराबर का हक नहीं देता. धर्म के ठेकेदारों को यह लगता है कि अगर महिलाओं को बराबरी का हक मिल गया तो वे धर्म के आडंबर से बाहर हो जाएंगी, जिस से धर्म की उन की सत्ता खतरे में पड़ जाएगी.

तीन तलाक को ले कर केंद्र की भाजपा सरकार ने कदम उठा कर यह दिखाने की कोशिश की है कि इस से मुसलिम औरतों के हालात बदल जाएंगे. तीन तलाक की ही तरह से हिंदू और दूसरे समुदाय की महिलाओं के मुद्दे भी हैं जिन में तलाक लेना बहुत मुश्किल काम होता है. ऐसे में बहुत तरह के दांपत्य अपराध होते हैं.

कई बार तलाक चाहने वाली महिलाएं अपने पतियों पर ही गलत तरह से सैक्स करने या सैक्स के नाम पर परेशान करने जैसे आरोप लगा कर तलाक लेने की बात कहती हैं. अगर तलाक लेने की प्रक्रिया को सरल कर दिया जाए तो बहुत तरह की परेशानियों से बचा जा सकता है. बहुत सारे दहेज के मुकदमों की वजह तलाक का जल्द न मिलना होता है.

एकदूसरे का सम्मान करें

दांपत्य में पत्नी को तमाम तरह के व्रत करने के लिए कहा जाता है, जिस के जरिए औरतों को सिखाया जाता है कि उन के लिए पति ही परमेश्वर है, उसे भगवान की तरह मानसम्मान देना चाहिए. असल में आज इस बात को समझाने की जरूरत है कि पतिपत्नी दोनों बराबर हैं. दोनों को एकदूसरे का मानसम्मान करना चाहिए. जब तक एकदूसरे का सम्मान नहीं होगा, दांपत्य में तनाव, झगड़े और अपराध खत्म नहीं होंगे.

शादी के पहले और शादी के बाद महिलाओं की आजादी का सम्मान जरूरी है. बलात्कार और छेड़छाड़ जैसी घटनाएं एक दुर्घटना मात्र हैं. इन को ले कर महिलाओं के जीवन पर दबाव नहीं डालना चाहिए. ऐसी महिलाओं को जब सामान्य मान कर समाज में सही स्थान दिया जाएगा तभी सही मानो में निर्भया कांड के बाद आए फैसले से बदलाव हो सकेगा. कानून के साथ समाज को अपनी सोच बदलने की जरूरत है.

इन का कहना है

बलात्कार केवल महिलाओं के शरीर पर ही अपना असर नहीं डालता, वह महिलाओं के दिमाग पर भी असर डालता है. महिला को लगता है कि अब उस के लिए समाज में कोई जगह नहीं बची है. उसे समाज गलत निगाहों से देखेगा. घरपरिवार के लोग भी यह नहीं मानते कि उस की गलती नहीं रही होगी. ऐसे में सब से जरूरी है कि कानून के साथ समाज भी पीडि़ता के साथ खड़ा हो. अभी यह देखा जाता है कि इस तरह की घटनाओं की शिकार महिलाओं को अलगथलग रह कर जीवन गुजारना पड़ता है. दूसरी ओर जहां भी वह अपनी बात रखने जाती है लोग उस को सौफ्ट टारगेट समझने की कोशिश करते हैं. जिस संवेदनशीलता की उम्मीद समाज से होनी चाहिए, पीडि़ता के साथ वह नहीं होती है.

– अनुपमा सिंह, अनुपमा फाउंडेशन, लखनऊ

औरतों के प्रति होने वाले अपराध के मामलों में कानून में लगातार सुधार हुआ है. इस से अब यह उम्मीद जगी है कि कानून के पास आने पर औरतों को सही न्याय मिलेगा. यह सच है कि न्याय जितना जल्दी मिलना चाहिए, नहीं मिल रहा है. इस की कई वजहें हैं. विरोधी पक्ष न्याय व्यवस्था की खामी का लाभ उठा कर फैसले में देरी करवाता है. अभी भी अपराध के बाद होने वाली पुलिस की विवेचना बहुत वैज्ञानिक आधार पर नहीं होती. जिस से अपराधी को लाभ मिलता है. निर्भया कांड में दिल्ली पुलिस ने बहुत ही अच्छी तरह से विवेचना की है, जिस से अपराधियों को सही दंड मिल सका. इस तरह हर मामले में विवेचना शुरू हो जाए तो न्याय मिलने में समय नहीं लगेगा.

– श्वेता तिवारी, अधिवक्ता, लखनऊ

आमतौर पर महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराध को ले कर महिलाओं को ही दोषी ठहरा दिया जाता है, यह गलत है. फैशन, फिल्म, औरतों के कपड़े किसी भी तरह के महिला अपराध के लिए जिम्मेदार नहीं होते हैं. यह सोच धर्मवादी और पुरुषवादी सत्ता समझाने की कोशिश करती है. मीडिया भी कईर् बार ऐसी घटनाओं के लिए औरतों को ही दोष देता है. निर्भया कांड में भी यह तर्क दिया गया कि उसे रात में अकेले अपने दोस्त के साथ जाने की क्या जरूरत थी. इस तरह के तर्क देने से गलत संदेश जाता है. अपराधियों को अपने बचाव का मौका मिलता है. ऐसे मामलों में दोषियों का सामाजिक बहिष्कार होना जरूरी है.

– रिचा शर्मा, अभिनेत्री, मुंबई

आज के समय में केवल घर के बाहर ही नहीं, घर के अंदर भी महिलाओं के साथ ऐसे हादसे पेश आने लगे हैं जहां उन को शारीरिक व मानसिक रूप से शोषण का शिकार होना पड़ता है. हमारे पास ऐसे तमाम केस आए जिन में युवा विधवा औरतों के साथ घर में शारीरिक शोषण होता है. जब ये औरतें हालात के खिलाफ आवाज उठाने की कोशिश करती है तो उन को तरहतरह से परेशान किया जाता है. एक घर में बड़े बेटे की पत्नी की मृत्यु के बाद छोटे बेटे की पत्नी के साथ दोनों भाइयों के संबंध रखने की शिकायत आई. मसला बड़े घर का था तो काफी प्रयास के बाद सुलह हो सकी. जिन औरतों के बच्चे नहीं होते, वे तो दूसरी शादी कर भी सकती हैं पर बच्चों के होने के बाद दूसरी शादी भी संभव नहीं रह जाती. ऐसे में समाज को अपनी सोच बदलनी चाहिए, तभी हालात में सुधार हो सकेगा.

– अजय पटेल, समाजसेवी, वाराणसी

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बौलीवुड में आने के लिए सनी लियोन को करना पड़ा था ये काम

बौलीवुड एक्ट्रैस सनी लियोन का पोर्न स्टार से इंडस्ट्री तक का सफर काफी मुश्किलों भरा रहा है. भले ही आज सनी लियोन काफी पापुलर है पर इस दौरान उन्हें यहां तक पहुंचने के लिए बहुत कुछ झेलना पड़ा. इंडस्ट्री में आने के बाद भी लोग उन्हें लोग एक पोर्न स्टार ही समझते थे और उनके साथ काम करने में झिझकते थे.

पोर्न स्टार से इंडस्ट्री तक का सफर

मैग्जीन के लिए न्यूड पोज

पोर्न इंडस्ट्री में अपने करियर की शुरुआत में सनी लियोन ने पेंटहाउस नाम की एडल्ट मैग्जीन के लिए पोज दिए. जिसके बाद उनके पास नए प्रस्तावों की झड़ी सी लग गई. सनी लियोन को मैग्जीन के लिए न्यूड पोज देने में काफी स्कोप नजर आया. इसमें पैसा और देश विदेश घूमने के अवसर भी बहुत थे. शायद यही वजह थी कि उन्होनें पोर्न फिल्मों की दुनिया में अपने कदम आगे बढ़ा दिए थे.

न्यूड डांस की तस्वीरें

सनी लियोन की न्यूड डांस की कुछ तस्वीरें वायरल हुईं थी. बताया गया था कि यह तस्वीरें मुंबई से पुणे हाइवे स्थित एक होटल की हैं. यह तस्वीरें पूरी तरह से न्यूड थीं.

लैस्बियन

सनी लियोन की पहली पोर्न फिल्म साल 2005 में रिलीज हुई थी. पोर्न इंडस्ट्री में कदम रखने के बाद सनी लियोन ने ये ऐलान किया था कि वो पोर्न फिल्मों में सिर्फ समलैंगिक संबंधों वाले सीन ही करेंगीं. फिर सनी उस वक्त सुर्खियों में आईं जब एक फिल्म में उन्होंने एक लड़की के साथ लिपलौक किया. बताया जाता है कि इस फिल्म में उन्होंने अपनी कोस्टार संध्या को लिपलौक किया. ‌फिल्मी गलियारों में इस बात की चर्चा होती रही कि आखिर सनी को ऐसा करने की क्या जरूरत पड़ गई. वह इस सीन के कारण काफी ट्रोल भी हुई थी.

बिग बौस’ के सीजन पांच में सनी लियोन की वाइल्ड कार्ड एंट्री

साल 2011 में कलर्स चैनल के रियालिटी शो ‘बिग बौस’ के सीजन पांच में सनी लियोन की वाइल्ड कार्ड के जरिए एंट्री हुई थी. यहां आने से पहले उनका नाम बहुत ही कम लोग जानते थे. इस शो में आने के बाद ही लोगों को पता चला था कि वो एक पोर्न स्टार हैं. रिएलिटी शो बिग बौस ने सनी की जिंदगी को अचानक से बदल कर रख दिया.

इस रियालिटी शो ने भारत में सनी लियोन के लिए ना सिर्फ टेलिविजन की राह बनाई बल्कि उनके लिए बौलीवुड के दरवाजें भी खोल दिए. दरअसल इस शो के एक एपिसोड में फिल्म निर्देशक महेश भट्ट मेहमान बन कर आएं थे और उन्होंने शो के दौरान ही सनी लियोन को अपनी आने वाली फिल्म के लिए चुन लिया था. भारत में टेलीविजन शो बिग बौस के जरिए चर्चा में आईं सनी लियोन ने बौलीवुड में कई मशहूर आइटम सान्ग्स किए और बाकायदा फिल्मों में हीरोइन बनी. शुरुआत में लोग कहते थे कि बड़े हीरो उनके साथ काम नहीं करेंगे, लेकिन शाहरुख ने उन्हें अपनी फिल्म ‘रईस’ के खास गीत में लिया. सलमान ने ‘बिग बौस’ में मेहमान बनाया और आमिर ने कह दिया कि वो सनी के साथ काम करने को तैयार हैं.

फिल्म ‘जिस्म 2′ के जरिए बौलीवुड में एंट्री

फिल्म ‘जिस्म 2’ के जरिए सनी लियोन ने बौलीवुड में एंट्री की थी. साल 2012 में रिलीज हुई ‘जिस्म 2’ बौक्स आफिस पर बुरी तरह फ्लाप साबित हुई थी लेकिन सनी लियोन का करियर बौलीवुड में फिट हो गया और उन्हें एक के बाद एक फिल्में भी मिलती चली गई.

सनी लियोन अब तक जैकपाट, रागिनी एमएमएस 2 ..हेट स्टोरी 2 ..मस्तीजादे समते करीब 15 फिल्मों में काम कर चुकी हैं.

टीवी पर बैन

सनी लियोन एक और बड़ी वजह से चर्चाओं में आईं थी. इसके बारे में ये बताया जा रहा था कि कपिल शर्मा ने कहा कि अब सनी लियोन को छोटे पर्दे पर नहीं ला सकते वहां फैमिली होती है. कहा जाता है कि कपिल ने सनी को अपने शो में आने से मना कर दिया था.

राखी से विवाद

बौलीवुड एक्ट्रैस राखी सावंत भी अपने विवादों के कारण काफी चर्चा में रहती हैं. लेकिन वह इंटरव्यूज के दौरान सनी को काफी गलत बताती हैं. बीते समय राखी ने एक इंटरव्यू के दौरान सनी को ये तक बोल दिया था कि वह उनका बैंड बजा देंगी. उन्होंने ये भी कहा था कि अगर सनी शार्ट कपड़े पहनती हैं तो वह भी इससे ज्यादा शार्ट कपड़े पहनेंगी और सनी को इंडस्ट्री से भगा देंगी.

बेटी के कारण विवाद

सनी उस वक्त भी काफी सुर्खियों में आई जब उन्होंने बेटी निशा को गोद लिया. इस कारण उन्हें ट्रोल भी होना पड़ा था. लोगो का कहना था कि सनी अपनी बेटी को भी अपनी ही तरह पोर्न स्टार बनाएंगी.

बता दें कि अमेरिका के जिस पोर्न इंडस्ट्री में सनी लियोन ने काम किया है वहां काम करने वाले कलाकारों को एडल्ट स्टार के नाम के साथ ही अच्छे अभिनय के लिए अवार्ड भी दिए जाते हैं लेकिन भारत जैसे देश में ऐसी फिल्मों को इज्जत की नजर से नहीं देखा जाता है. ऐसे में जब सनी लियोन ने पोर्न फिल्मों से सीधे हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में एंट्री मारी तो उनके लिए बौलीवुड की ये राह काभी चुनौती भरी बन गई थी.

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नेता भी दें जनता को अपनी कमाई का हिसाब

खबरों के मुताबिक, आयकर विभाग सात सांसदों और 98 विधायकों की संपत्ति के ब्यौरे में पायी गयी असंगति की जांच कर रहा है. विभाग ने यह बात सर्वोच्च न्यायालय में एक हलफनामे के जरिये कही है. केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड ने अदालत से यह भी कहा है कि अन्य 42 विधायकों और 9 सांसदों की संपत्ति के ब्योरे की शुरुआती जांच जारी है.

जन-प्रतिनिधियों की शिक्षा, आमदनी, सार्वजनिक पृष्ठभूमि को जानना मतदाता के लिए जरूरी है, ताकि वह अपनी पसंद का चुनाव करने से पहले तमाम पहलुओं पर सोच-विचार कर सके. ऐसी सूचनाओं के सार्वजनिक होने से जवाबदेही कायम होती है. उम्मीदवार द्वारा दी गयी सूचनाओं के आधार पर प्रश्न किये जा सकते हैं और गलत पाये जाने पर उचित कार्रवाई के लिए दबाव बनाया जा सकता है.

सार्वजनिक जीवन में पारदर्शिता लाने और भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिहाज से ऐसे उपाय को अहम मान कर नागरिक संस्थाओं ने बहुत प्रयास किये. आखिरकार 2000 के नवंबर महीने में दिल्ली उच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया कि चुनाव में मतदाता उम्मीदवार के बारे में सही फैसला ले सके, इसके लिए बहुत जरूरी है कि हर प्रत्याशी के अतीत के बारे में वह आगाह हो. प्रत्याशी के अतीत के बारे में जानकारी के उपलब्ध न होने को अदालत ने लोकतंत्र के लिए घातक माना था.

उसने इसी सोच से चुनाव आयोग से कहा कि चुनाव लड़ रहे उम्मीदवार अपनी संपत्ति, अपनी शिक्षा तथा अपने खिलाफ दर्ज मुकदमों या सजा आदि के ब्योरे जगजाहिर करें. सर्वोच्च न्यायालय ने मई, 2002 के फैसले में भी यही बात कही थी. इसके बाद चुनाव आयोग ने चुनाव लड़ रहे उम्मीदवारों के लिए विशिष्ट जानकारियों का सार्वजनिक करना अनिवार्य कर दिया.

डेढ़ दशक में इसके कुछ सुफल सामने आये हैं. फर्जी डिग्री के आधार पर अपनी उच्च शिक्षा के बारे में दावे करनेवाले जन-प्रतिनिधियों पर सार्वजनिक रूप से सवाल उठाये गये हैं, कुछ मामलों में इस्तीफा भी हुआ है. लेकिन, संपत्ति के ब्योरे के आधार पर जन-प्रतिनिधियों के खिलाफ विशेष कुछ होता नजर नहीं आ रहा था. आयकर विभाग की जांच की पहल से सार्वजनिक जीवन में पारदर्शिता की मुहिम को नयी ऊर्जा मिलेगी.

आगे आयकर विभाग पर इस बात का लोकतांत्रिक दबाव बनाया जा सकता है कि वह जांच के घेरे में आये जन-प्रतिनिधियों के नाम सार्वजनिक करे, ताकि मतदाता को उनकी पार्टी और सरकार में उनकी भागीदारी के बारे में भी पता चल सके. उम्मीद है कि जांच और कार्रवाई में बहुत सारा वक्त बर्बाद नहीं किया जायेगा.

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चर्चा गुणदोषों पर होती तो अच्छा होता

जिंदगी और मौत पर किसी का बस नहीं है. यह पुरानी कहावत है. पर मौत को भुनाना तो अपने बस में है ही न? फिल्मी तारिका श्रीदेवी की सिर्फ 54 साल की उम्र में दुबई के एक होटल के कमरे में बाथटब में हुई मौत ने घंटों टीवी चैनलों को और कई दिनों तक समाचारपत्रों में सुर्खियों को चमकाने का मौका दे डाला. उन की मौत पर इस तरह की आलतूफालतू बातें हुईं मानो देश में कोई भूचाल आ गया हो.

श्रीदेवी की मौत चाहे हादसा थी, प्राकृतिक थी या फिर सुनियोजित, एक व्यक्तिगत मामले से ज्यादा नहीं थी. बोनी कपूर व श्रीदेवी कपूर में अगर अनबन थी भी और उस की मृत्यु में कोई रहस्य छिपा हुआ भी था तो भी इस बात को इतना तूल देने की जरूरत न थी. यह एक खाली बैठे समाज की पहचान है, जिसे दूसरों के गमों और गलतियों में मजा आता है ताकि वह अपने गम भुला सके.

श्रीदेवी मौत के समय एक रिटायर्ड ऐक्ट्रैस थीं. 12 साल बाद घरगृहस्थी के चक्कर से निकल कर श्रीदेवी ने ‘इंग्लिशविंग्लिश’ व ‘मौम’ फिल्मों में बेहतरीन काम किया पर फिर भी वे अपनी पुरानी जगह न ले पाईं. वे न मृत्यु के समय मर्लिन मुनरो थीं और न मधुबाला.

श्रीदेवी ने बहुत सी अच्छी फिल्मों में काम किया पर उन की कम ही फिल्मों ने कोई सामाजिक असर छोड़ा. आखिरी 2 फिल्मों में मांओं और पत्नियों के रोल में वे प्रेमिकाओं और नर्तकियों से अच्छा प्रभाव दिखा सकीं. दोनों फिल्में सामाजिक मामलों पर थीं और मां को अपने विशिष्ठ स्थान दिखाने वाली थीं. उन का प्रभाव था पर ‘चांदनी’, ‘सदमा’, ‘मिस्टर एक्स’ में उन के रोल अच्छे होते हुए भी वे लंबा प्रभाव न छोड़ पाईं. ‘लमहे’ का विषय जरूर चौंकाने वाला था और आशा थी कि उसे दूसरी फिल्मों से ज्यादा सफलता मिलेगी पर उस फिल्म को भारतीय दर्शक पचा न पाए. अपनी मां के प्रेमी से प्रेम करना लोगों को इंसैस्ट की तरह लगा था.

एक अभिनेत्री की मृत्यु उस के काम की समीक्षा करने का एक और मौका होता है और जो चर्चा कई दिनों तक होती रही वह फिल्मों, व्यक्तित्त्व, गुणदोषों पर होनी चाहिए थी पर होती इस बात पर रही कि मौत कैसे हुई?

कोई नकली बाथटब को दिखा रहा है, कोई शराब की बात कर रहा है तो कोई और ऊंची उड़ान उड़ रहा है. फिल्मी तारिका की इतनी चीरफाड़ की गई जितनी शायद पोस्टमार्टम में भी न की गई होगी.

बेहद प्रसिद्ध तारिकाओं के गुजरने के बाद एक जनून सा छाता है और वह स्वाभाविक है पर उसे संयम से देखा जाना चाहिए, गपोड़ी किस्सों के लिए अवसर नहीं.

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रमन सिंह का 8 करोड़ का अंधविश्वास

छत्तीसगढ़ आदिवासी बाहुल्य होने के चलते ही गरीब राज्य माना जाता है. मुख्यमंत्री रमन सिंह के ठाटबाट कभी किसी सुबूत के मुहताज नहीं रहे. चुनावी साल में रमन सिंह ने नया कारनामा 16 पजेरो कारें खरीदने का कर दिखाया है जिन की कीमत 8 करोड़ रुपए है. एक सी दिखने वाली इन कारों का नंबर भी एकसा सीजी-02-एआर 0004 है.

सुरक्षा के लिहाज से खरीदी गईं इन बुलैटप्रूफ कारों को ले कर चर्चा है कि इन्हें एक तांत्रिक के कहने पर खरीदा गया और 0004 नंबर इसलिए रखा गया कि राज्य में भाजपा चौथी बार भी सत्ता में आए और रमन सिंह फिर से मुख्यमंत्री बनें.

छत्तीसगढ़ में इस साल सूखा पड़ा है और मनरेगा में मजदूरों को मजदूरी नहीं मिल रही. ऐसे में ये महंगी कारें गरीब आदिवासियों की नजरों में खटकते खतरे का संकेत हैं कि शौक इतनी बड़ी चीज का नहीं होना चाहिए.

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जिंदगी जब जीने की राह दिखाए

विश्व के सब से बड़े आर्ट फैस्टिवल एडिनबर्ग फ्रिंज में जब मुंबई के रेड लाइट एरिया की 15 कलाकारों ने ‘लाल बत्ती ऐक्सप्रैस टू’ नामक नाटक का मंचन किया, तो सभी दर्शक दंग रह गए. एनजीओ ‘क्रांति’ की इन लड़कियों की उम्र 15 से 23 वर्ष है. इन्होंने अपने संवाद और नृत्य द्वारा खुद पर होने वाले जुल्म, शोषण और डिप्रैशन की कहानी दर्शकों के आगे नाटक के जरिए इस तरह पेश की कि वे अपने अनुभव भी उन के साथ बांटने लगे.

अच्छी बात यह रही कि इन क्रांतिकारी लड़कियों ने इस नाटक द्वारा समाज और दुनिया के आगे एक क्रांति लाने की कोशिश की है, जिस में वे सफल रहीं और विश्वपटल पर 1 लाख शोज में उन का 10वां स्थान रहा. यह नाटक इन क्रांतिकारी लड़कियों द्वारा ही लिखा व निर्देशित किया गया है. पूरे यूरोप में इन लड़कियों ने इस नाटक के 57 परफौर्मेंस दिए. इतना ही नहीं, इस नाटक को बीबीसी ने भी दिखाया, जो उन के पिछले 10 वर्षों के रिकौर्ड को तोड़ कर सब से अधिक दर्शकों का हकदार बना.

हर जगह मिली प्रशंसा

यह नाटक अलग तरह का है, जिस में नाटक के दौरान कुछ दर्शकों को उस में शामिल कर पात्र के अनुसार अभिनय करने के लिए कहा जाता है. इस में पहले उन्हें कुछ जानवर बनने के लिए कहते हैं. लेकिन ज्यों ही उन्हें सैक्सवर्कर बनने के लिए कहा जाता है, वे चुप हो जाती हैं. यह भाव और यह सोच दर्शकों को सोचने पर मजबूर करते हैं कि आखिर वे खुद ऐसा क्यों सोचते हैं. कितना मुश्किल होता है एक सैक्सवर्कर बनना और शायद यही वजह है कि यह नाटक हर जगह पसंद किया जा रहा है.

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यह सच है कि हमारे देश में सैक्सवर्कर्स की दुर्दशा से कोई अनजान नहीं है. पतली और तंग गुमनाम गलियों में इन की जिंदगी की सचाई काफी भयावह है. गरीबी और बीमारी से लड़ रही इन महिलाओं से सैक्सुअल सुखप्राप्ति के लिए लोग आते हैं. इन में गरीब से ले कर रईसजाद तक सभी वर्ग, जाति और धर्म के लोग होते हैं. काम उन का होता है पर बदनामी इन महिलाओं को मिलती है. इस से भी बदतर होती है इन के बच्चों की जिंदगी, जिन्हें न तो कोई नाम मिलता है, न प्यार और न ही सही भविष्य.

यूनाइटेड नैशंस की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 3 मिलियन कमर्शियल सैक्सवर्कर्स हैं जिन से करीब 40 प्रतिशत बच्चे जन्म लेते हैं. इन बच्चों को न तो कोई काम मिलता है, न बैंक लोन और न ही पासपोर्ट. इस दलदल से सैक्सवर्कर्स और उन की लड़कियों का निकलना भी मुश्किल होता है. रोबिन चौरसिया और बानी दास की संस्था ‘क्रांति’ इस दिशा में काम कर रही है.

‘क्रांति’ की पहल

क्रांति की संस्थापिका बानी दास बताती हैं, ‘‘एक एनजीओ के कैंपस में मुंबई के कमाठीपुरा रेड लाइट एरिया से लड़कियों को ला कर रखा जाता था. पुलिस छापा मार कर 13-14 वर्ष की लड़कियों को यह कह कर लाती थी कि इन्हें शिक्षा दे कर आत्मनिर्भर बनाया जाएगा, लेकिन वहां पढ़ाई के नाम पर कुछ भी नहीं होता था. एक कक्षा में 80 लड़कियों को एकसाथ बैठा दिया जाता था.

‘‘ये लड़कियां अलगअलग उम्र की होती थीं. उन में कुछ पढ़ीलिखी होती थीं तो कुछ अनपढ़ थीं. ऐसी लड़कियां अपने मनमुताबिक न तो काम कर सकती थीं, न ही आगे बढ़ सकती थीं और उन्हें एहसास कराया जाता था कि वे सैक्सवर्कर्स की बेटियां हैं और उन्हें पुलिस द्वारा ‘रेड’ कर लाया गया है. उन के पास यही विकल्प है. उन का कोई सपना नहीं हो सकता. उन्हें एक लैवल तक पढ़ालिखा कर अचारपापड़ बनाने, सिलाई करने या छोटेमोटे काम में लगा दिया जाता था.

‘‘लेकिन मैं ने पाया कि इन में से कुछ लड़कियां काफी प्रतिभावान हैं और वे आगे पढ़लिख कर अच्छा काम कर सकती हैं. ऐसे में मेरी मुलाकात रोबिन चौरसिया से हुई, जो अमेरिका से मुंबई आ कर कुछ सामाजिक काम करना चाहती थीं. उन की भी सोच मेरी ही तरह थी.’’

रोबिन और बानी की जोड़ी चाहती थी कि वह केवल बच्चों को शिक्षा ही न दे, बल्कि उन की प्रतिभा को निखारने और उन की इच्छाओं को भी फलनेफूलने दे. साल 2007 में उन दोनों ने कमाठीपुरा की 4 बच्चियों को ले कर क्रांति एनजीओ की स्थापना की.

संस्था की सहसंस्थापिका रोबिन चौरसिया कहती हैं, ‘‘लाल बत्ती ऐक्सप्रैस टू नाटक के मंचन का उद्देश्य यह था कि इन लड़कियों की समस्या को किसी रचनात्मक माध्यम से लोगों तक पहुंचाया जाए और लोगों में इन के प्रति जो भ्रांतियां हैं, उन्हें दूर किया जाए. मुंह से कह कर एक बार में केवल एक व्यक्ति को ही समझाया जा सकता है. इस के अलावा इन बच्चों की इच्छा थी कि सैक्सवर्कर्स क्या हैं? उन का जीवन क्या है? उन के बच्चों की गलती क्या है? वे आजाद क्यों नहीं घूमफिर सकतीं? आदि सवालों को सब के सामने लाना, लेकिन कैसे लाएं? समस्या यह थी. सैक्सवर्कर की बेटी का नाम सुनते ही लोग उसे अलग नजर से देखते हैं.

‘‘ये लड़कियां बताना चाहती थीं कि अगर कोई महिला मजदूरी करती है तो उसे वर्कर की संज्ञा दी जाती है. वैसे ही हमारी मां भी पेट पालने के लिए यह काम करती हैं. इस में बुराई क्या है? इस बात को वे एक रिसोर्स के सहारे लोगों में जागरूकता फैलाने के लिए लाना चाहती थीं और इस के लिए इन लड़कियों ने नाटक का सहारा लिया. अगर 500 लोग भी साथ बैठ कर 50 मिनट के इस नाटक को देखते हैं और इस से केवल 5 लोगों के विचारों में भी यदि फर्क आ जाए, तो बड़ी बात होगी.

साल 2013 में पहली बार इसे मुंबई में मंच पर दिखाया गया था, जिस की दर्शकों ने खूब तारीफ की थी.

प्रतिभा को पहचान

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रोबिन आगे बताती हैं, ‘‘मेरी अमेरिका में बहुत जानपहचान है. कुछ बच्चे पढ़ाई पूरी करने के लिए अमेरिका गए हैं, लेकिन जिन्हें पढ़ाई का शौक नहीं है और वे अभिनय करते हैं, उन्हें भी आगे बढ़ने का मौका देना चाहिए. यह सोच कर साल 2015 में मैं ने अमेरिका में इस नाटक के मंचन का प्रस्ताव रखा और इस में कामयाब हुई. 15 सदस्यों की इस नाटक टीम की परफौर्मेंस सभी ने पसंद की. न्यूयौर्क, शिकागो, येलो स्टोन आदि करीब 5 शहरों में इस नाटक का मंचन किया गया था. इस काम में एक महिला निर्देशक जया अय्यर ने भी काफी साथ दिया. वे अभिनय को एक थेरैपी बताती हैं और उसी के अनुसार अभिनय करने में लड़कियों की मदद करती हैं.

‘‘नाटक का नाम पहले ‘लाल बत्ती’ था, अब इसे ‘लाल बत्ती ऐक्सप्रैस टू’ नाम दिया गया है. इस की वजह यह है कि ये लड़कियां मानती हैं कि उन की लाइफ एक ऐक्सप्रैस टे्रन की तरह है, जिस में कई लोग चढ़ते, उतरते हैं और इस जर्नी में काफी लोगों का साथ भी रहता है. यह नाटक केवल आईओपनर ही नहीं था, बल्कि कई लोगों की निजी जिंदगी से जुड़े उन के भाव भी प्रकट कर रहा था, जैसे कि कई बार महिलाएं सामने आ कर कहती हैं कि उन के साथ भी सैक्सुअल हेरेसमैंट हुआ है, जिसे वे आज तक बता नहीं पाई हैं और अब ये छोटी लड़कियां खुल कर स्टेज पर इसे बता रही हैं. इस तरह की बातें सभी के लिए प्रेरणादायक रहीं.’’

थेरैपी द्वारा मानसिक उपचार

कम उम्र में जब सैक्सुअल हेरेसमैंट होता है, तो बच्चा उसे अपनी गलती मान, अकेले रहने की कोशिश करता है. कई बार तो मां और घर वाले भी उसे चुप रहने की सलाह देते हैं, जबकि गलती उस की नहीं, शोषण करने वाले की होती है. यहां बच्चों को थेरैपी द्वारा उन की खोई हुई मानसिक शक्ति को फिर से वापस लाया जाता है.

क्रांति की सब से पुरानी और 10 वर्षों से क्रांतिकारी रही श्वेता कट्टी के साथ भी बचपन में सैक्सुअल अब्यूज हुआ था, लेकिन क्रांति ने उस की जिंदगी बदल दी. साल 2014 में यूएन यूथ करेज अवार्ड मिलने के साथ अमेरिका जा कर पढ़ने वाली वह पहली रेड लाइट एरिया की लड़की थी.

वहां रहने वाली कविता बताती है, ‘‘मैं कमाठीपुरा से यहां 18 साल की उम्र में आई थी. मैं ने 12वीं की परीक्षा दी, कमाठीपुरा में आगे पढ़ाई की कोई सुविधा नहीं है और उस उम्र में वहां रहना भी मुश्किल था. मैं वहां दादी के साथ 4 साल की उम्र से रह रही थी. उन्होंने ही मुझे पाला है. दादी की आर्थिक स्थिति काफी खराब थी. वे आगे मुझे रख नहीं पा रही थीं. मैं दादी से बहुत जुड़ी हुई थी और उन्हें छोड़ कर नहीं आना चाहती थी. मेरी हाफसिस्टर श्वेता क्रांति में सालों से रहती है, उस ने ही मुझे यहां आने की सलाह दी.

‘‘कमाठीपुरा में रहने वाली सभी लड़कियां सोचती हैं कि जल्दी से कुछ छोटीमोटी जौब कर, शादी कर यहां से निकल जाओ. मैं ऐसा नहीं चाहती थी. मैं अपने तरीके से जिंदगी जीना चाहती थी. 7 साल की उम्र में मेरे साथ भी सैक्सुअल अब्यूज हुआ है. मैं ने इस बारे में कभी किसी को नहीं बताया क्योंकि मुझे डरा कर रखा गया था.

‘‘जहां मैं रहती थी, वहां सैक्सवर्कर, डब्बे वाले और सामान्य सरकारी लोग रहते थे. वहां पास के एक अंकल मुझे अपनी गोदी में बिठा कर गलत तरीके से हर जगह छूते थे और मुझ से भी छूने के लिए कहते थे, जो मुझे अच्छा नहीं लगता था. उन्होंने कहा था कि अगर मैं इस बात को किसी से बताऊंगी तो वे मुझे जान से मार देंगे.

‘‘थोड़ी बड़ी होने के बाद मुझे सहीगलत का फर्क समझ में आया. वह दर्द और गुस्सा आज तक मेरे मन से गया नहीं है, पर क्रांति संस्था में आ कर मुझे अपनी पहचान मिली है. मैं चाहती हूं कि बचपन से ही मातापिता अपनी बच्चियों को बताएं कि गुड टच और बैड टच क्या होता है. मेरी दादी भी पहले सैक्सवर्कर ही थीं और बाद में कुछ घरों में काम किया करती थीं लेकिन मेरी मां सैक्सवर्कर नहीं थीं. मां की जब शादी हुई और मैं पैदा हुई, उसी दौरान मेरे पिता को एचआईवी होने से उन की मृत्यु हो गई. पिता के परिवार वालों ने 23 साल की उम्र में मां को ही पिता की मृत्यु का दोषी ठहराया. तब मेरी दादी ने मुझे अपने पास रख लिया और पढ़ाया. मां को उन के मायके भेज दिया गया.

‘‘मुझे याद है, दादी वेश्यालय की हैड थीं और वहां जा कर वेश्याओं की बच्चियों को संभाला करती थीं. मैं भी वहीं दादी के साथ रहती थी. मुझे याद आता है जब मैं बचपन में वहां की लड़कियों को शाम को पेटी निकाल कर, गजरा लगा कर सजते हुए देखती थी, तब बड़ा अच्छा लगता था. बाद में दादी भी वहां से हट गईं और कमाठीपुरा में दूसरी जगह रहने लगीं. मैं अभी भी यह सोचने पर मजबूर होती हूं कि मैं और मेरी दादी यहीं क्यों रहीं, कहीं और क्यों नहीं चली गईं. कभी दादी से पूछा भी तो उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया.

‘‘यह भी सही था कि किसी सैक्सवर्कर को आम लोगों के साथ रहने का अधिकार नहीं होता. इस के अलावा कभी किसी सैक्सवर्कर ने मुझे उस फील्ड में नहीं धकेला. वे चाहती थीं कि मैं कोई अच्छा काम कर घर बसा लूं क्योंकि उन्हें जीने की जो आजादी नहीं मिली वह मुझे मिले. बड़ी होने पर मैं ने कई बार एनजीओ के साथ काम किया, पर मैं आगे नहीं बढ़ पा रही थी.

‘‘12 साल बाद मैं मां से मिलने कर्नाटक गई थी. दादी से मिलने भी मैं वहीं जाती हूं. मैं अब गायिका बनना चाहती हूं. मैं पढ़ना पसंद नहीं करती. मैं एक अलग संस्था मेटा क्रांति से जुड़ कर कमाठीपुरा की लड़कियों को पढ़ाना चाहती हूं, ताकि वे आगे बढ़ें.’’

सैक्स : एक जरूरत

कविता आगे कहती है, ‘‘भारत में सैक्स को एक टैबू बना कर रखा गया है, जबकि यहां जनसंख्या बहुत अधिक है और सैक्सुअल अपराध भी अधिक होते हैं. दरअसल, सैक्स शरीर की एक जरूरत है, इस पर खुल कर बातचीत होनी चाहिए.’’

यहां रहने वाली 17 वर्षीया रानी 5 वर्ष पहले क्रांति में आई थी. उस की मां कर्नाटक में देवदासी थी. पिता की मृत्यु के बाद उस के सौतेले पिता ने उस की मां को पहले पुणे, फिर मुंबई के कमाठीपुरा में ला कर डाल दिया. वह कहती है, ‘‘मेरे पिता रोज मुझे मारते थे. वहां मैं नरक जैसे हालात में जी रही थी. मैं ने अपनी इच्छा से क्रांति को चुना है. पुलिस वाले भी हमें वहां से छुड़ाने आते थे, लेकिन सब दिखावा होता था. वे वहां की महिलाओं से पैसा वसूल कर निकल जाते थे.

‘‘मेरी मां आज भी जो कमाती हैं, उस में से कुछ हिस्सा पुलिस वालों को देना पड़ता है. हर व्यक्ति से वे लोग कम से कम 2,000 रुपए ऐंठते हैं. मेरे साथ भी 7 साल की उम्र में मेरे कजिन ने यौनशोषण किया और इस बारे में घर वालों को बता कर भी कुछ लाभ नहीं हुआ. मुझे तो एक बार ऐसा लगने लगा था कि मैं ही गलत हूं. अपनेआप से घृणा होने लगी थी, लेकिन क्रांति की बानी से मिल कर मैं यहां पहुंची और डांस थेरैपी से ठीक हुई.’’

अपनी पहचान को बनाए रखने और अपनेआप को समझने में क्रांति संस्था बहुत बड़ा काम कर रही है. वित्तीय सहायता के बारे में पूछे जाने पर बानी कहती हैं, ‘‘हमें वित्तीय सहायता बहुत कम मिलती है.

3 महीने में एक छोटी ग्रांट ग्लोबल की तरफ से वुमन राइट्स और वुमन शिक्षा के लिए मिलती है. कुछ लोग तो सीधे स्कूलकालेज में पढ़ने वाले बच्चों की फंडिंग करते रहते हैं. इस के लिए काफी मेहनत करनी पड़ती है. लोगों को बताना पड़ता है कि वे कैसे क्या कर रही हैं.

‘‘सरकार की तरफ से यह संस्था फंडिंग नहीं चाहती, क्योंकि इस से सरकार की दखलंदाजी अधिक हो जाती है. सरकार काम से अधिक पाबंदी लगाती है और सही काम नहीं करने देती. केवल 20 रुपए एक लड़की के खाने के लिए देती है, बाकी पैसे की व्यवस्था खुद करनी पड़ती है. इतना ही नहीं, अगर कभी रेड लाइट एरिया में रेड हुई, तो पकड़ी गई सारी लड़कियों को मेरे यहां बिना पूछे डाल देगी, जिन्हें 3 सप्ताह तक यहां रखना पड़ता है, जिस से यहां का माहौल बिगड़ता है. कहीं जानेआने के लिए सरकार की अनुमति लेनी पड़ती है.

बानी कहती हैं, ‘‘क्रांति इन लड़कियों का घर है और इस में बच्चों को मैं पूरी आजादी देना चाहती हूं. मेरी एक बेटी है. मैं अपनी बेटी की तरह सारी लड़कियों को देखती हूं. मेरे यहां की 20 क्रांतिकारी लड़कियां ही आगे और 20 को सुधार सकती हैं, यही मेरा लक्ष्य है. हम गुणवत्ता को अधिक महत्त्व देते हैं.’’

अलग कहानी अलग वेदना

यहां रहने वाली हर लड़की की अपनी कहानी और मनोवेदना है, जो हृदय विदारक है. आंखों में आंसू लिए 18 वर्ष की अस्मिता बताती है, ‘‘बचपन में मेरा यौनशोषण हुआ. हमारे जानने वाले, जो हमारी देखभाल करते थे, मां के काम पर जाने के बाद मेरे साथ गंदी हरकतें करते थे. मैं ने इस बारे में अपनी बड़ी बहन और मां को बताया था लेकिन उन्होंने चुप रहने की सलाह दी. मेरी मां एक कंपनी में काम करती थीं. मेरा वहां से निकलना बहुत मुश्किल था. मैं 2 साल पहले 16 साल की उम्र में क्रांति में आई हूं. जो माहौल मुझे वहां नहीं मिला, वह यहां मिला है. यहां मुझे सबकुछ करने की आजादी है. क्रांति में मैं ने अपनेआप को पाया है.’’

यहां यौनशोषण से ग्रसित लड़कियों को एक थेरैपी दी जाती है, जिस से वे फिर से अपने अस्तित्व को पा सकें. अस्मिता की जिंदगी में काफी बदलाव आ गया है. पहले उस के अंदर जो डर था, अब नहीं है, उसे पहचान मिली है. वह मैंटली चैलेंज्ड बच्चों के साथ काम करना चाहती है.

अस्मिता कहती है, ‘‘मेरे हिसाब से पूरे विश्व में यौनशोषण का सामना बहुत सारी लड़कियों को करना पड़ता है. उन से मेरा कहना है कि रेप या यौनशोषण के लिए अपनेआप को दोषी समझ कर कभी आत्महत्या न करें. ऐसा मानसिक विकृति वाले लोग ही करते हैं. आप इस से निकल कर नई जिंदगी शुरू करें.’’

अस्मिता की तरह 20 साल की पिंकी की जिंदगी भी बहुत भयावह थी. 9 साल की उम्र में उस की शादी करा दी गई थी. उस के चाचा और पति ने बारबार उसे मानसिक व शारीरिक रूप से अब्यूज किया. परिणामस्वरूप, 10 साल की कच्ची उम्र में उसे ऐबौर्शन कराना पड़ा. आज यहां पर उसे सुकून की जिंदगी मिली है.

रहने का आसरा

क्रांति में आने के लिए लड़कियों के और उन की मांओं के लगातार फोन आते रहते हैं, पर संस्था के पास जगह की कमी है. बानी और रोबिन कमाठीपुरा की और लड़कियों को भी शरण देना चाहती हैं. इस के लिए उन्हें खुद का घर बनाने की इच्छा है, क्योंकि अभी 20 लड़कियों के लिए उन्होंने 5 मकान बदले हैं और किराए के मकान में केवल 20 ही लड़कियों को रखने की परमिशन मिलती है. इतना ही नहीं, अधिकतर लोग इन्हें घर देने से भी मना कर देते हैं.

रोबिन कहती हैं, ‘‘ये लड़कियां सैक्सवर्कर्स की बेटियां हो सकती हैं, पर इन की सोच आम लड़कियों से अलग और अच्छी है. मेरी पूरी जिंदगी इन्हें हौसला और अच्छी जिंदगी देने में ही बीतेगी, यही मेरा मकसद है.’’

आज 3 क्रांतिकारियों ने पढ़ाई पूरी कर ‘मेटा क्रांति’ नामक संस्था बनाने की सोच बनाई है. इन लड़कियों का उद्देश्य है सैक्सवर्कर्स की लड़कियों को शिक्षा दे कर उन्हें आगे बढ़ाने में मदद करना. इन में कोई ड्रम, तो कोई संगीत या पेंटिंग में माहिर हैं. इन लड़कियों की कोशिश रहेगी कि उन के इस हुनर के जरिए कमाठीपुरा से आने वाली सभी लड़कियों के मनोबल को आर्ट थेरैपी द्वारा ऊंचा उठाया जाए ताकि वे मानसिक तनाव से अपनेआप को मुक्त कर सकें.

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क्या आपने देखा दिशा पटानी का ये अंदाज

बौलीवुड एक्ट्रेस दिशा पटानी ने फिल्म ‘एमएस धोनी’ में एक छोटा सा रोल निभाया था और उसके बाद से ही वह देशभर में अपनी एक स्माइल की वजह से फेमस हो गईं. इसके बाद से दिशा लगातार अपनी तस्वीरों को लेकर सुर्खियों में रहती है. दिशा जल्द ही अपने कथित ब्वौयफ्रेंड टाइगर श्रौफ के साथ ‘बागी 2’ में नजर आने वाली हैं. यह फिल्म इसी हफ्ते 30 मार्च को सिनेमाघरों में रिलीज होने वाली है.

दिशा पटानी की तस्वीरें सोशल मीडिया पर आए दिन वायरल होती रहती हैं. इस बार हम आपको उनकी कुछ ऐसी तस्वीरें दिखाने जा रहे हैं, जिसमें उनके अंदाज काफी अलग-अलग हैं. हाल ही में दिशा पटानी ने बाताया था कि डांस के दौरान उनके सह कलाकार टाइगर श्रौफ का मुकाबला करना मुश्किल है. टाइगर को हिंदी फिल्म उद्योग में सर्वश्रेष्ठ डांसर माना जाता है.

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दिशा ने ‘बागी 2’ में टाइगर के साथ डांस के अनुभव के बारे में कहा था, “मैं ‘बागी 2’ के लिए बहुत उत्साहित हूं. मुझे कड़ी मेहनत करनी पड़ी क्योंकि वह बहुत मेहनती है और उनके ऊर्जा के स्तर का सामना करना बहुत कठिन है. यह मुश्किल था, लेकिन हमने तालमेल बैठाया.”

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दिशा ने ‘बागी 2’ के निर्देशक अहमद खान के साथ काम के बारे में कहा, “वह अद्भुत हैं और बहुत प्यारे हैं. फिल्म में जो भी प्रस्तुति दी है, उसकी वजह वही हैं.” अपने नृत्य कौशल के लिए पहचानी जाने वाली दिशा रोजाना व्यायाम के साथ डांस करती हैं. वह आए दिन इंस्टाग्राम पर डांस वीडियोज पोस्ट करती रहती हैं.

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दिशा ने यह भी बताया था, “यह मेरा शौक है. मुझे डांस पसंद है और मैं नृत्य की अलग-अलग शैलियां सीखना चाहती हूं.”

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इन फिल्मों में बोल्ड हुई बाहुबली की मां, बौलीवुड स्टार्स के साथ किया लिपलौक

फिल्‍म ‘बाहुबली 2’ ने अभी तक के भारतीय सिनेमा के इतिहास के सारे रिकार्ड तोड़ दिए हैं. यही कारण है कि इस फिल्‍म का हर किरदार लोगों के दिल और दिमाग पर छा गया है. इसी फिल्‍म का एक किरदार है राजमाता शिवगामी का. राजमाता शिवगामी का वह डायलाग तो आपको याद ही होगा, ‘मेरा वचन ही है शासन..’ इस फिल्‍म में प्रभास की मां शिवगामी का किरदार निभाकर सुर्खियां बटोरने वालीं राम्या कृष्णन 13 साल की उम्र में तमिल फिल्म ‘वेल्लई मानसु’ से बतौर चाइल्ड आर्टिस्ट डेब्यू किया था. इतना ही नहीं, राम्‍या लोकप्रिय हिन्दी शो ‘शक्तिमान’ में भी नजर आ चुकी हैं.

वो अब तक 200 से भी ज्यादा तमिल, तेलुगु, कन्नड़ और मलयालम फिल्मों में काम कर चुकीं हैं. वैसे राम्या बौलीवुड फिल्मों में भी कुछ कम एक्टिव नहीं रहीं. उन्होंने यहां भी कई बड़े बौलीवुड स्टार्स के साथ काम किया और बोल्ड सीन्स दिए. इस पैकेज में हम आपको बता रहे हैं राम्या की ऐसी ही कुछ फिल्मों में बारे में जिसमें उन्होंने काफी ज्यादा बोल्ड और इंटीमेट सीन्स दिए.

जब विनोद खन्ना के साथ किया लिपलौक

1993 में आई फिल्म ‘परंपरा’ में राम्या कृष्णन और विनोद खन्ना के बीच शानदार कैमेस्ट्री देखने को मिली थी. इतना ही नहीं राम्या कृष्णन को इस फिल्म में काफी बोल्ड दिखाया गया था, जिसे लेकर वह चर्चाओं में रहीं. फिल्म में उन्होंने बौलीवुड सुपरस्टार रहे विनोद खन्ना के साथ न सिर्फ लिपलौक किया था बल्कि कई इंटीमेट सीन्स भी दिए थे.

फिल्म में लता मंगेशकर की आवाज में गाया हुआ गाना ‘तू सावन मैं प्यार पिया’ फिल्माया गया था. जिसमें विनोद खन्ना और राम्या ने काफी बोल्ड सीन्स दिए थे. जानकर हैरानी होगी कि विनोद, राम्या से करीब 24 साल बड़े थे.

1988 में आई फिल्म ‘दयावान’  में भी वह फिरोज खान और विनोद खन्ना के साथ नजर आ चुकी हैं.

अनिल कपूर के साथ भी बोल्ड हुईं राम्या

राम्या ने अनिल कपूर से साथ भी बोल्ड सीन्स किये हैं. दरअसल 1995 में आई फिल्म त्रिमूर्ति में राम्या को एक वैंप का रोल आफर किया गया था. इस रोल के लिए उन्होंने अनिल कपूर के साथ बोल्ड सीन्स की शूटिंग भी कर ली थी, लेकिन बाद में फिल्म से ये रोल ही हटा दिया गया. इसी वजह से बाद में राम्या का फिल्म में कहीं नाम ही नहीं आया. हालांकि इन सीन्स के फोटोज बोल्ड होने की वजह से काफी चर्चाओं में रहे.

नाना पाटेकर और राम्या

1998 में फिल्म ‘वजूद’ में वो नाना पाटेकर के साथ राम्या बेडरूम सीन्स देते हुए, लिपलौक करतीं और इंटीमेट होतीं नजर आई थीं. इस फिल्म में राम्या ने काफी बोल्ड सीन्स दिए थे.

अमिताभ बच्चन के साथ राम्या कृष्णन

फिल्म ‘बनारसी बाबू’ के बाद डायरेक्टर डेविड धवन ने एक्शन कामेडी फिल्म ‘बड़े मिया छोटे मिया’ बनाई. जिसमें उन्होंने राम्या को अमिताभ बच्चन की लेडी लव बनाया था. फिल्म के सान्ग ‘धिन तक धिन तक’ में राम्या व्हाइट कलर की शार्ट ड्रेस में अमिताभ के साथ फ्लर्ट करतीं दिखाई दीं.

शाहरुख खान के साथ राम्या

फिल्म ‘चाहत’ में राम्या, शाहरुख खान के साथ भी रोमांस कर चुकी हैं. इस फिल्म में शाखरुख से राम्या को प्यार हो जाता है. ऐसे में वो उन्हें इम्प्रेस करने के लिए बोल्ड डांस करती हैं.

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सिंपल अंदाज में दिखीं प्रिया प्रकाश वारियर, वीडियो वायरल

पिछले कुछ दिनों से इंटरनेट पर छाई एक्ट्रेस प्रिया प्रकाश वारियर ने जैसे करोड़ों युवाओं के दिल पर कब्जा कर लिया है. उनका वीडियो इतनी तेजी से वायरल होता है कि लोग उन्हें अब वायरल गर्ल के नाम से जानने लगे हैं. कई वीडियो वायरल होने के बाद प्रिया का नाम काफी मशहूर हो चुका है. अब उनका एक और वीडियो सबके सामने आया है. इस वीडियो में प्रिया सिंपल लुक में बहुत ज्यादा खूबसूरत नजर आ रही हैं.

50 लाख से भी ज्यादा हैं इंस्टाग्राम फौलोअर्स

प्रिया के इस वीडियो को उनके ही किसी एक फैन द्वारा इंस्टाग्राम पर शेयर किया गया है. वीडियो में प्रिया पिंक कलर के टौप और ब्लैक कलर के पैंट में नजर आ रही हैं. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार प्रिया ने अपने वीडियो के जरिए इंस्टाग्राम से कमाई करने वाली कई सेलिब्रिटी को पीछे छोड़ दिया है. दरअसल, प्रिया प्रकाश के कई वीडियो वायरल होने के बाद उनके इंस्टाग्राम फौलोअर्स की संख्या 50 लाख से भी ज्यादा हो चुकी है. इतनी बड़ी संख्या में फौलोअर होने के बाद प्रिया ने अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर कई बड़े ब्रैंड का प्रमोशन करना शुरू कर दिया है. एक रिपोर्ट के अनुसार प्रिया प्रकाश एक इंस्टाग्राम पोस्ट के लिए 8 लाख रुपये चार्ज लेती हैं.

कई बड़े ब्रांड से मिल रहे हैं विज्ञापन के प्रस्ताव

इसके अलावा कई बड़े ब्रांड प्रिया प्रकाश के पास विज्ञापन का प्रस्ताव लेकर पहुंच रहे हैं. खबरों की मानें तो प्रिया सोशल मीडिया के माध्मय से कमाई करने वाली कई सेलिब्रिटी को पीछे छोड़ चुकी हैं. प्रिया प्रकाश की लोकप्रियता का अंदाजा आप इसी से लगा सकते हैं कि इंटरनेट पर छाने के बाद उन्होंने गूगल सर्च के मामले में सबसे ज्यादा सर्च की जाने वाली सनी लियोनी और दीपिका पादुकोण को भी पीछे छोड़ दिया. एक ही दिन में उनके 6 लाख से भी ज्यादा फौलोअर बने थे. फिलहाल उनके फौलोअर की संख्या 51 लाख तक पहुंच गई है.

बेहद खुश हैं प्रिया प्रकाश

प्रिया फौलोअर के मामले में अमेरिकन रियल्टी टीवी स्टार काइली जेनर और फुटबौल स्टार क्रिस्टियानो रोनाल्डो की बराबरी कर ली है. यह दो सेलीब्रिटी ही एक दिन में 6 लाख से ज्‍यादा फैन्‍स बनाने में सफल रहे हैं. प्रिया प्रकाश के इंटरनेट स्टार बनने के बाद जब मीडिया ने उनसे बात की तो उन्होंने कहा मेरे लिए यह बहुत सुखद है. मुझे नहीं पता कि मैं अपनी खुशी का इजहार कैसे करूं. उन्होंने बताया इस कामयाबी के बाद खुशी मनाने के लिए मेरे कौलेज में एक इवेंट आर्गेनाइज किया गया था. यह मेरे लिए नया अनुभव है. मैं यही उम्मीद करती हूं कि सभी लोगों का सपोर्ट मेरे साथ बना रहे.

ठुकरा दिए कई फिल्मों के औफर

आपको बता दें कि वीडियो वायरल होने के बाद प्रिया को कई बड़ी फिल्मों के औफर की गए लेकिन उन्होंने उस फिल्म का हिस्सा बनने से इंकार कर दिया. बता दें कि प्रिया प्रकाश मलयालम फिल्म ‘उरु अदार लव (Oru Adaar Love)’ के वीडियो में नजर आने के बाद उनके आंखों के एक्सप्रेशन की जमकर तारीफ हुई थी. इसके बाद ही वह इंटरनेट पर छा गई थीं.

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