ब्लौक प्रमुख के हक बढ़ने चाहिए : विजय लक्ष्मी

मोहनलालगंज राजधानी लखनऊ से तकरीबन 23 किलोमीटर दूर है. वह विधानसभा और लोकसभा क्षेत्र भी है. राजधानी लखनऊ का एक बड़ा ग्रामीण इलाका इस में आता है. यह लखनऊ और रायबरेली के बीच बसा एक खास इलाका है.

इस ब्लौक की प्रमुख विजय लक्ष्मी हैं. साल 2016 में वे ब्लौक प्रमुख चुनी गई थीं. वे तय समय पर अपने दफ्तर में क्षेत्र की समस्याएं सुनती हैं. इस के अलावा गांवगांव दौरा कर के लोगों की परेशानियां हल करने की कोशिश करती हैं.

वे जब तक दफ्तर में रहती हैं तब तक कोई न कोई अपनी फरियाद ले कर उन के पास आता ही रहता है. ज्यादातर लोग राशनकार्ड, आवास, हैंडपंप, खड़ंजा, बिजली, पुलिस और तहसील की अपनी परेशानियां ले कर उन के पास आते हैं. पेश हैं, विजय लक्ष्मी से की गई बातचीत के खास अंश:

आप का राजनीति में कैसे आना हुआ?

मेरी ससुराल गांव बिंदौआ में है. वहां बीडीसी यानी ब्लौक डैवलपमैंट कमेटी के चुनाव होने वाले थे. पंचायत चुनावों में रिजर्वेशन के चलते वह महिला सीट हो गई थी.

मेरे पति वकील हैं. उन के कहने पर मैं ने पहले बीडीसी का चुनाव लड़ा. उस में 3 गांवों के लोग वोट डालते हैं. जब मैं ने अपना प्रचार शुरू किया था तो मुझे कोई जानकारी नहीं थी. लोगों से बात करना नहीं आता था. पति और कुछ करीबी लोगों ने इस में मेरी पूरी मदद की. लोगों के बीच बोलना सिखाया.

मैं ने बहुत मेहनत कर के चुनाव लड़ा और जीत गई. ब्लौक प्रमुख का चुनाव आया तो मैं निर्विरोध ब्लौक प्रमुख बन गई.

ब्लौक  प्रमुख बनने के बाद आप की जिंदगी में क्या खास बदलाव हुआ?

पहले मैं केवल घरपरिवार और बच्चे ही देखती थी. मेरी 2 बेटियां और एक बेटा है. मैं उन को खुद ही पढ़ाती थी. मेरे बच्चे अपनी क्लास में हमेशा अव्वल आते हैं. अब बच्चों और परिवार के साथ क्षेत्र की जनता भी मेरी जिंदगी में शामिल हो गई है. मैं तय समय पर ब्लौक दफ्तर में बैठती हूं, लोगों से मिलती हूं.

चुनाव लड़ते समय मुझे लगता था कि ब्लौक प्रमुख बन कर मैं बहुत सारी परेशानियां दूर कर दूंगी पर कुरसी पर बैठ कर लगा कि ब्लौक प्रमुख से जनता को जिस तरह की उम्मीदें होती हैं, उन को पूरा करने के लिए ब्लौक प्रमुख को और ज्यादा हक मिलने चाहिए.

आप के पति विधायक कैसे बने?

साल 2017 के विधानसभा चुनावों में समाजवादी पार्टी ने चुनाव से पहले मेरे पति अंबरीश पुष्कर को टिकट दिया था. विधानसभा में बड़ा क्षेत्र आता है. ऐसे में हम लोगों के पास चुनाव प्रचार का समय कम था.

मोहनलालगंज विधानसभा से पहले भी सपा की महिला विधायक थीं. उन का टिकट कट चुका था. ऐसे में पार्टी के कुछ लोग सहयोग नहीं कर रहे थे. हम सब ने मिल कर चुनाव लड़ा. भारतीय जनता पार्टी की आंधी के बीच हम लोग चुनाव

जीते और अंबरीश पुष्कर विधायक बन गए. पति के चुनाव प्रचार का बड़ा जिम्मा मेरे कंधों पर भी था. जीत के बाद अच्छा लगा.

आप की शादी कैसे हुई थी?

शादी के पहले हम लोगों की कालेज में मुलाकात हुई थी. तब हम ने शादी करने का फैसला किया था. हम एक ही जाति से थे, इस के बाद भी बड़ी मुश्किल से परिवार के लोग इस शादी के लिए राजी हुए.

शादी के बाद मेरी पढ़ाई बहुत आगे नहीं बढ़ सकी. मैं ने बीए कर लिया था, पर एमए नहीं कर पाई. शादी के बाद केवल मैं ने ही परेशानियां नहीं उठाईं, अंबरीश ने भी मेरा साथ देने के लिए बहुत मेहनत की. कुछ दिन शादीब्याह और

दूसरे अवसरों में विडियोग्राफी भी की. फिर एलएलबी कर के वे मोहनलालगंज तहसील में ही वकालत करने लगे. अच्छी बात यह है कि वे मुझे पूरा सहयोग करते हैं. राजनीति में वे मेरे पहले गुरु हैं.

परिवार और राजनीति में आप इतना तालमेल कैसे करती हैं?

मैं अपने समय को मैनेज करती हूं. बेटियां और पति मेरा पूरा साथ देते हैं. आज भी मैं घर का खाना खुद बनाती हूं.

मुझे घूमने और फिल्में देखने का बहुत शौक है. अब कई बार पति वक्त नहीं निकाल पाते हैं, ऐसे में बच्चों के साथ घूमने चली जाती हूं.

मैं गांव की औरतों के सशक्तीकरण, सेहत और पढ़ाईलिखाई के लिए बहुत काम करना चाहती हूं. सच तो यह है कि गांव की औरतें भी बहुत हुनरमंद हैं पर उन को मौके कम मिलते हैं.

VIDEO : आप भी बना सकती हैं अपने होठों को ज्यूसी

ऐसे ही वीडियो देखने के लिए यहां क्लिक कर SUBSCRIBE करें गृहशोभा का YouTube चैनल.

सरकार के सहारे देश को लूट रहे हैं ये लोग

नीरव मोदी और मेहुल चौकसी की हीरों का व्यापार करने वाली कंपनियों का बैंकों को मोटा चूना लगा कर विदेश भाग जाना इस देश के लिए नया नहीं है. समाज और सरकार से बेईमानी करना हमारी रगरगमें भरा है और हमारा धर्म हिंदू धर्म हरदम इस बेईमानी को सही ठहराने के उपाय बताता रहता है. देशभर के उद्योगपति यदि अकसर मंदिरों, आश्रमों, मठों, बाबाओं के चरणों में दिखते हैं तो इसीलिए कि वे अपने कुकर्मों से भयभीत रहते हैं. उन्हें जताया जाता है कि हर तरह के कुकर्म का प्रायश्चित्त धर्म में है – पैसा चढ़ाओ, मुक्ति पाओ.

कांग्रेस की सरकारें हों या भाजपा की, वे इसी को भुनाती रहती हैं. ईश्वर में स्पष्ट विश्वास न करने वाली कम्युनिस्ट व समाजवादी सरकारें भी कुंभ मेले, छठपूजा व इफ्तार पार्टियां कराती रहती हैं ताकि नेताओं को अपनी बेईमानियों को पाप को धोने का मौका मिलता रहे. ईमानदारी से भी लाखों, करोड़ों, अरबों रुपए कमाए जा सकते हैं, लेकिन यह सोच इस देश में है ही नहीं.

नीरव मोदी ने सरकारी बैंकों के माध्यम से पैसा लूटा क्योंकि सरकार ही मोटा पैसा बनाने का सर्वोत्तम सहारा है. हर बड़ी कंपनी को जरा सा कुरेदेंगे तो पता चलेगा कि या तो उस ने सरकार से सस्ते में जमीन और कर्ज लिया या मोटे पैसे देने वाले ठेके लिए. आधुनिक तकनीक विकसित कर रही इनफोसिस और टाटा कंसल्टैंसी जैसी कंपनियां सरकार के लिए कंप्यूटर सिस्टम बनाने में अरबों रुपए कमा रही हैं. आप को जो हर रोज कंप्यूटर पर बैठ कर व्यापार करने, भुगतान करने या खरीदारी करने के आदेश दिए जा रहे हैं वे इसलिए ताकि हार्डवेयर व सौफ्टवेयर कंपनियों को मोटा लाभ मिल सके.

नीरव मोदी ने पंजाब नैशनल बैंक के अधिकारियों को पटा कर 11,000 करोड़ रुपए का गबन किया है पर दूसरे बैंकों का जो लाखों करोड़ रुपए मारे गए कर्जों में फंसा है वह भी उसी तर्ज पर है. इन सब कंपनियों के मालिकों की नेताओं के साथ खूब बनती थी. इन नेताओं को शुरुआती दिनों में सरकार में पैर जमाने के लिए पैसा और पहुंच इन्हीं मालिकों ने मुहैया कराई थी. ‘एक पैसा दोगे, ऊपर वाला एक लाख देगा’ पंक्ति की तर्ज पर ही नीरव मोदी ने नेताओं को सहयोग दिया होगा. जब इस कांड का पता चलने लगा था तब भी दोनों मोदी देवास, स्विट्जरलैंड में साथसाथ थे और उन की गु्रप फोटो खूब वायरल भी हो रही है.

नीरव मोदी जैसों की पोलपट्टी खुल नहीं रही थी क्योंकि मीडिया पर भी ये मेहरबान थे. इन के जरिए मीडिया वालों को काफी विज्ञापन मिलते हैं और पार्टियों में प्रवेश भी. सरकार की शह पर नीरव मोदी जैसे शातिर देशभर में भरे हैं जो ऊपर से व्यापार करते नजर आते हैं पर असल में हेराफेरी करने में लगे रहते हैं.

बैंकों ने अपने कुछ अधिकारियों पर जिम्मेदारी डाल कर इस नीरव मोदी कांड से बचना चाहा है क्योंकि वे जानते हैं कि आखिरकार सब मुक्त हो जाएंगे. यदि कुछ दिनों जेल में रहना भी पड़ा तो कोई बात नहीं. घर वालों को अरबों रुपए तो मिल ही जाएंगे. ‘न खाऊंगा, न खाने दूंगा’ के पीछे छिपा सच है, ‘पता ही न चलने दूंगा कि खाया या नहीं.’

VIDEO : ये मेकअप बदल देगी आपके चेहरे की रंगत

ऐसे ही वीडियो देखने के लिए यहां क्लिक कर SUBSCRIBE करें गृहशोभा का YouTube चैनल.

जब राधिका आप्टे ने जड़ा इस स्टार को थप्पड़

बौलीवुड में अलग तरह की फिल्मों और अभिनय के लिए मशहूर राधिका आप्टे स्वभाव से काफी तेज तर्रार हैं. सोशल मीडिया पर ट्रोलर्स से भिड़ंत में इसका नजारा आपने कई बार देखा होगा. पर क्या वह किसी को थप्पड़ भी मार सकती हैं? ये सवाल थोड़ा सा अटपटा जरूर है, पर आपको बता दें कि राधिका फिल्म की शूटिंग के सेट पर एक तमिल स्टार को जोरदार तमाचा लगा चुकी हैं. ऐसा हम नहीं कह रहे हैं, बल्कि खुद राधिका आप्टे ने इस बात का खुलासा किया है.

दरअलस, राधिका आप्टे हाल ही में राजकुमार राव के साथ नेहा धूपिया के टौक शो में पहुंची थीं. इस शो के दौरान उन्होंने बहुत से चौकाने वाले खुलासे किए. राधिका ने शो के दौरान बताया कि उन्होंने साउथ के एक पौपुलर स्टार को अपने साथ बदसलूकी करने पर फिल्म के सेट पर ही थप्पड़ मारा था. उन्होंने बताया, सेट पर मेरा पहला दिन था. इसी दौरान साउथ के एक फेमस एक्टर ने अजीब तरह से मेरे पैरों को टच करना शुरू कर दिया. शुरुआत में मैं हैरान थी. हम पहले कभी नहीं मिले थे. मैंने उसे उसकी हरकत पर एक थप्पड़ मार दिया.

यहां आपको यह भी बता दें कि इस शो के दौरान जब नेहा ने राधिका से पूछा कि उनके मुताबिक अब किस एक्टर या फिल्ममेकर को रिटारयमेंट ले लेना चाहिए तो इस पर जवाब देते हुए उन्होंने रामगोपाल वर्मा का नाम लिया. उन्होंने कहा कि अब रामगोपाल वर्मा ने बहुत काम कर लिया है और उन्हें अब रिटायरमेंट ले लेना चाहिए.

राधिका ने 2012 में प्रकाश राज की फिल्म धोनी से तमिल फिल्मों में डेब्यू किया था. इसके बाद उन्होंने साउथ की कई फिल्में की. इनमें रजनीकांत के साथ उनकी ब्लौकबस्टर फिल्म ‘कबाली’ भी शामिल है. इसमें राधिका आप्टे ने रजनीकांत की पत्नी की भूमिका की थी. इस वक्त राधिका आप्टे, नेटफ्लिक्स की पहली ओरिजनल इंडियन सीरीज ‘सेकर्ड गेम्स’ में नजर आएंगी. इसमें सैफ अली खान और नवाजुद्दीन सिद्दीकी भी होंगे. इससे पहले राधिका आर बाल्की की फिल्म पैडमैन में अक्षय कुमार के साथ नजर आई थीं.

VIDEO : आप भी बना सकती हैं अपने होठों को ज्यूसी

ऐसे ही वीडियो देखने के लिए यहां क्लिक कर SUBSCRIBE करें गृहशोभा का YouTube चैनल.

रेड : प्रभावित नहीं करते अजय देवगन

‘आमिर’ और ‘नो वन किल्ड जेसिका’ जैसी फिल्मों के सर्जक राज कुमार गुप्ता इस बार 1980 के लखनऊ के हाई प्रोफाइल इनकम टैक्स छापे पर आधारित फिल्म ‘‘रेड’’ लेकर आए हैं. फिल्म को यथार्थ परक बनाते समय फिल्मकार यह भूल गए कि फिल्म में मनोरंजन भी चाहिए. फिल्म ‘‘रेड’’ देखकर इस बात का अहसास होता है कि यह फिल्म एक अतीत की सत्य कथा को पेश करने के नाम पर सरकारी एजेंडे का प्रचार करने के साथ ही खास सरकार को खुश करने का भी प्रयास है. परिणामतः फिल्म नीरस व शुष्क हो गयी है.

फिल्म की कहानी 1981 के लखनऊ में पड़े हाई प्रोफाइल इनकम टैक्स छापे पर सच्ची कथा है, जब इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री थी. आयकर विभाग में कार्यरत औफिसर अमय पटनायक (अजय देवगन)  का तबादला लखनऊ हो जाता है. अमय पटनायक ना सिर्फ ईमानदार बल्कि अति आदर्शवादी हैं. सुबह साढ़े चार बजे उठना, घड़ी देखकर हर काम को पूरी मुस्तैदी के साथ अंजाम देना. अब तक 49 बार उनका तबादला हो चुका है और अमय पटनायक को इसकी आदत पड़ चुकी है. लेकिन इससे उनकी पत्नी मालिनी (इलियाना डिक्रूज) कभी खुश नहींहोती.

मालिनी को बार बार सामान बांधकर एक शहर से दूसरे शहर में भटकना पसंद नहीं. मालिनी अपने पति को समझाती है कि बहुत ज्यादा ईमानदार न बनो, पर अंत में वह एक आज्ञाकारी पत्नी की ही तरह काम करती है. लखनऊ पहुंचते ही अमय को जानकारी मिलती है कि एक सांसद रामेश्वर सिंह (सौरभ शुक्ला)  ने जबरदस्त टैक्स चोरी की है. रामेश्वर सिंह के घर में उनकी मां, भाई, बहन, भाभी सहित परिवार का लंबा चौड़ा कुनबा है. रामेश्वर सिंह ताकतवर हैं. उन पर कोई हाथ नहीं डालता. पर अमय अपने सहयोगियों के साथ रामेश्वर सिंह के घर पर छापा मारते हैं.bollywood movie review

रामेश्वर सिंह भी खुद को ईमानदार समझते हैं, इसलिए वह कहते है कि मैं एक ही जगह पर बैठा हूं, जाकर तलाशी ले लो. कुछ नहीं मिलेगा. पहले तो कुछ नहीं मिलता है. पर अचानक मकान की छत पर अमय के हाथ एक कागज आता है और उस कागज में बने नक्शे के आधार पर नए सिरे से तलाशी लेने पर 420 करोड़ की नकदी व जेवर आदि मिलते हैं. उसके बाद अमय पर कई तरह के दबाव आते हैं. यहां तक कि प्रधानमंत्री खुद अमय को फोन करके कहती हैं कि मामले को रफा दफा कर दें, पर अमय किसी की सुनते नहीं हैं.

अमय अपनी जांच जारी रखते हैं, पर अंत में जब सच सामने आता है, तो कुछ अलग ही होता है.

इनकम टैक्स औफिसर के किरदार में अजय देवगन के अभिनय में उनकी पिछली कई फिल्मों का दोहराव ही है. वह एक ही तरह के मैनेरिज्म के साथ परदे पर नजर आते हैं. अजय देवगन ‘गंगाजल’, ‘सिंघम’ सहित कई फिल्मों में सिस्टम के खिलाफ जाकर एक ईमानदार अफसर के किरदार निभा चुके हैं. ‘रेड’ में कुछ भी नया नहीं कर पाए. हर सीन में वह महज फिल्मी हीरो के रूप में ही नजर आते हैं. उनका किरदार स्थिर सा लगता है.

इलियाना डिक्रूज के हिस्से करने को कुछ है ही नहीं. निर्देशक ने उनकी प्रतिभा का बेजा इस्तेमाल किया है. कथानक मे इलियाना डिकूजा के किरदार की कोई गुंजाइश ही नहीं थी. सौरभ शुक्ला ने साबित कर दिखाया कि उनके अभिनय का कोई सानी नहीं है. अमित सयाल, गायत्री अय्यर सहित बाकी सभी कलाकारों की प्रतिभा का दुरुपयोग ही किया गया है.

पटकथा व निर्देशन के स्तर पर भी काफी कमियां हैं. एक सत्य कथा को भी नाटकीय ढंग से पेश नहीं कर पाए राज कुमार गुप्ता. फिल्म बेवजह लंबी, रबर की तह खींची गयी है. फिल्म की कहानी लखनऊ शहर की है, मगर फिल्म से लखनऊ गायब है. चंद पुरानी इमारतें दिखाकर यह कहना कि यह लखनऊ शहर है, अजीब सा लगता है. लखनऊ की संस्कृति तहजीब कुछ भी फिल्म का हिस्सा नहीं है. ‘आमिर’ व ‘नो वन किल्ड जेसिका’ जैसी धारदार फिल्में बना चुके राज कुमार गुप्ता की इस फिल्म में कोई धार नहीं है. यह फिल्म मनोरंजन के नाम पर भी शून्य है. राज कुमार गुप्ता को नहीं भूलना चाहिए कि इनकम टैक्स रेड पर ही बनी फिल्म ‘स्पेशल 26’ में नाटकीयता के साथ साथ रोमांच व मनोरंजन भी था.

फिल्म का गीत संगीत भी कमजोर है. यहां तक कि फिल्म का पार्श्व संगीत भी फिल्म को नाटकीय नहीं बना पाता.

119 मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘रेड’’ का निर्माण अभिषेक पाठक, कुमार मंगत पाठक, भूषण कुमार, किशन कुमार ने किया है. निर्देशक राज कुमार गुप्ता, कहानीकार रितेश शाह,पटकथा लेखक राज कुमार गुप्ता व रितेश शाह, संगीतकार अमित त्रिवेदी, कैमरामैन अल्फांसो राय तथा कलाकार हैं – अजय देवगन, इलियाना डिक्रूज, सौरभ शुक्ला, गायत्री अय्यर,अमित सयाल, अक्षय वर्मा, अमित बिमोरेट व अन्य.

VIDEO : ये मेकअप बदल देगी आपके चेहरे की रंगत

ऐसे ही वीडियो देखने के लिए यहां क्लिक कर SUBSCRIBE करें गृहशोभा का YouTube चैनल.

मेरी साली ने एक दिन जबरदस्ती मेरे साथ सेक्स किया. अब वह रोजाना संबंध बनाने को कहती है. मैं क्या करूं.

सवाल
मैं 28 साल का हूं. मेरी शादी को 4 साल हो चुके हैं. मेरी छोटी साली भी हमारे साथ रहती है.

एक दिन बीवी घर पर नहीं थी और मैं टीवी देख रहा था, तभी साली अचानक कमरे में आई और मुझे गिरा कर चूमने लगी. मेरे मना करने पर भी उस ने अपने सारे कपड़े उतार दिए और उस ने वह सब कर डाला, जो अमूमन बीवी करती है.

अब वह मुझ से रोजाना संबंध बनाने को कहती है और रात में भी अपने साथ सोने को कहती है. मना करने पर अपनी बहन को बताने की धमकी देती है. मैं क्या करूं?

जवाब
आप का तो घर बैठे ही बंपर ड्रा निकल आया, मगर यह बम की तरह खतरनाक भी हो सकता है. साली कहीं पेट से हो गई, तो और बवाल हो जाएगा. बीवी को पता चलेगा, तो भी फसाद ही होगा.

बेहतर यही होगा कि आप किसी बहाने से साली को वापस उस के घर भेज दें और हो सके तो अपना तबादला कहीं दूर करा लें.

ये भी पढ़ें…

क्या उस रात जीजा ने लिए साली से मजे

अमर की शादी में स्टेज पर जब वर और वधू को मालाएं पहनाई जा रही थीं, तभी दुलहन की बगल में खड़ी एक खूबसूरत लड़की ने मुसकराते हुए अपनी एक आंख दबा दी, तो अमर झेंप गया था. शर्मीला होने के चलते अमर दोबारा उस लड़की को देखने की हिम्मत नहीं जुटा पाया, परंतु शादी के बाद जब विदाई का समय आया, तब वही लड़की चुहलबाजी करते हुए बोली, ‘‘मुझे अच्छी तरह से पहचान लीजिए जीजाजी. मैं हूं आप की साली रागिनी. दीदी को ले जाने के बाद मुझे भूल मत जाइएगा.’’

‘‘नहीं भूलूंगा रागिनी. भला साली को भी कोई भूल सकता है,’’ अमर ने धीरे से मुसकराते हुए कहा.

‘‘क्यों नहीं, जब घरवाली साथ में हो, तो साली को कौन याद करता है?’’ रागिनी ने हंसते हुए कहा.

‘‘मैं हूं न तुम्हें याद करने वाला. अब फिक्र क्यों करती हो?’’ कहते हुए अमर अपनी बीवी दिव्या के साथ घर से बाहर निकल आया.

कुछ दिनों के बाद रागिनी अपने पिता के साथ दिव्या से मिलने उस के घर आई और एक हफ्ते के लिए वहीं रह गई, जबकि उस के पिता बेटी से मिलने के बाद उसी रात अपने घर वापस आ गए.

रागिनी अमर के बरताव से काफी खुश थी. वह उस से घुलमिल कर बातें करना चाहती थी, पर संकोची होने के चलते अमर खुल कर उस से बातें नहीं कर पाता था. वह केवल मुसकरा कर ही रह जाता था, तब रागिनी झुंझला कर रह जाती थी.

एक दिन दिव्या के कहने पर अमर रागिनी को घुमाने ले गया. जब वह रागिनी को ऐतिहासिक जगहों की सैर करा रहा था, तब वह अमर के संग ऐसे चिपक कर चल रही थी, मानो उस की बीवी हो.

रागिनी के बदन के छू जाने से अमर अंदर ही अंदर सुलग उठता. उस की नजर रागिनी के गदराए जिस्म पर पड़ी.

अमर को अपनी तरफ घूरता देख रागिनी ने शरारत भरे अंदाज में पूछ ही लिया, ‘‘क्या देख रहे हो जीजाजी?’’

यह सुन कर थोड़ा झिझकते हुए अमर बोला, ‘‘तुम्हारे करंट मारने वाले जिस्म को देख रहा हूं रागिनी. तुम बहुत खूबसूरत हो.’’

‘‘सच? तो फिर हासिल क्यों नहीं कर लेते?’’ रागिनी मुसकराते हुए बोली.

‘‘क्या…? यह तुम कह रही हो?’’ अमर ने हैरानी से पूछा.

‘‘हां, इस में हर्ज ही क्या है? आखिर साली भी तो आधी घरवाली होती है. उसे भी तो शादी से पहले तजरबा होना चाहिए,’’ रागिनी बोली.

‘‘लेकिन, यह तो गलत बात होगी, रागिनी. तुम्हारी दीदी के साथ धोखा होगा. नहींनहीं, मुझे कुछ करने के लिए उकसाओ मत,’’ अमर बोला.

‘‘आप भी बहुत भोले हैं, जीजाजी. मैं आप को दीदी के सामने कुछ करने के लिए थोड़े ही उकसा रही हूं, बल्कि अकेले में…’’ कहते हुए रागिनी ने अपनी बात अधूरी छोड़ दी.

उस की बातें सुन कर अमर कुछ पलों के लिए सिहर उठा. फिर खुद पर काबू पाते हुए वह बोला, ‘‘तुम तो बड़ी नटखट हो साली साहिबा. किसी का ईमान डिगाना तो कोई तुम से सीखे, लेकिन मैं तुम्हारी दीदी के साथ धोखा नहीं कर सकता.’’

अमर की बातें सुन कर रागिनी फिर झुंझला उठी, पर उस ने अपनी झुंझलाहट का एहसास नहीं होने दिया, बल्कि मन ही मन कहने लगी, ‘देखती हूं कि कब तक तुम मेरे हुस्न के जलवे से बचते हो. मैं ने भी तुम को अपनी बांहों में नहीं लिया, तो मेरा नाम भी रागिनी नहीं.’

घूमफिर कर घर आने के बाद दिव्या ने रागिनी से पूछा, ‘‘घूम आई रागिनी? कैसा लगा जीजाजी का साथ?’’

‘‘यह भी कोई पूछने वाली बात है, दीदी. प्यारेप्यारे जीजाजी का साथ हो, फिर तो… वाह, बड़ा मजा आया. क्यों जीजाजी?’’ खुशी से चहकते हुए रागिनी ने ही सवाल कर दिया.

‘‘यह तो मुझ से बेहतर तुम ही बता सकती हो साली साहिबा,’’ बड़ी मुश्किल से अमर बोला.

‘‘मुझे तो सचमुच में बड़ा मजा आया जीजाजी,’’ कहते हुए रागिनी ने धीरे से एक आंख दबा दी, जिसे दिव्या नहीं देख पाई, पर अमर का दिल धड़क गया.

रात के समय अमर और दिव्या अपने कमरे में सो रहे थे, तभी उन्हें दूसरे कमरे से रागिनी की जोरदार चीख सुनाई दी. वे दोनों दौड़ेदौड़े उस के कमरे में पहुंचे.

रागिनी अपना पेट पकड़ कर जोरों से कराह रही थी. अपनी छोटी बहन का यह हाल देख दिव्या घबरा कर पूछने लगी, ‘‘क्या हुआ रागिनी? बता, मेरी बहन?’’

‘‘पेट में दर्द हो रहा है दीदी,’’ कराहते हुए रागिनी ने बताया.

‘‘पेट में तेज दर्द है? इतनी रात गए, मैं क्या करूं? आप ही कुछ कीजिए न,’’ घबराती हुई दिव्या ने अमर से कहा.

‘‘घबराओ मत. मेरे पास पेटदर्द की दवा है. तुम अलमारी में से जल्दी दवा ले कर आओ,’’ अमर ने दिव्या से कहा.

यह सुन कर दिव्या अपने कमरे में दौड़ीदौड़ी गई. तब अमर ने रागिनी से अपनापन दिखाते हुए पूछा, ‘‘पेट में जोर से दर्द हो रहा है?’’

‘‘हां, जीजाजी,’’ रागिनी बोली.

‘‘घबराओ मत. दवा खाते ही दर्द ठीक हो जाएगा. थोड़ा हौसला रखो,’’ हिम्मत बंधाते हुए अमर ने कहा.

थोड़ी ही देर में दिव्या दवा ले आई और अपने हाथों से रागिनी को खिला दी. फिर भी वह कराह रही थी.

चूंकि रात काफी हो गई थी, इसलिए अमर ने दिव्या से कहा कि तुम जा कर सो जाओ. मैं रागिनी की देखभाल करूंगा.

पहले तो वह अपनी बहन को छोड़ कर जाने के लिए तैयार नहीं हुई, लेकिन अमर के समझाने पर वह सोने के लिए चली गई.

काफी देर बाद रागिनी ने कराहना बंद कर दिया, मानो उसे आराम मिल गया हो. तब अमर ने सोचा कि उस से कह कर वह भी अपने कमरे में सोने के लिए चला जाए.

अभी वह रागिनी से जाने की इजाजत ले ही रहा था कि उस ने अमर के गले में अपनी दोनों बांहें डाल दीं और उसे अपने ऊपर खींच लिया.

फिर वह यह कहते हुए जोरों से उसे भींचते हुए बोली, ‘‘इतनी जल्दी भी क्या है, जीजाजी. सारी रात तो अपनी ही है. आखिर इसी के लिए तो मैं ने पेट में दर्द होने का बहाना किया था, ताकि सारी रात तुम मेरे करीब रहो.’’

‘‘क्या…? तुम ने मुझे पाने के लिए पेटदर्द का बहाना किया था? बड़े ही शर्म की बात है कि तुम ने हम लोगों के साथ छल किया. मुझे तुम से ऐसी उम्मीद नहीं थी,’’ गुस्से से बिफरते हुए अमर ने कहा और उस से अलग हो गया.

‘‘तो फिर मुझ से कैसी उम्मीद थी जीजाजी? आप भी बच्चों जैसी बातें कर रहे हैं, लेकिन मेरी बेचैनी नहीं समझ रहे हैं. मैं आप के लिए कितना तरस रही हूं, तड़प रही हूं, पर आप कुछ समझते ही नहीं.

‘‘साली पर भी तो कुछ जिम्मेदारी होती है आप की? क्या मैं प्यासी ही यहां से चली जाऊंगी?’’ थोड़ा झुंझलाते हुए रागिनी बोली.

‘‘तुम्हारे मुंह से ये बातें अच्छी नहीं लगतीं रागिनी. मैं तुम्हारा जीजा हूं तो क्या हुआ, उम्र में तो बड़ा हूं. कम से कम इस का तो लिहाज करो. क्यों मुझे मुसीबत में डालती हो?’’ कहते हुए अमर दरवाजे की तरफ देखने लगा कि कहीं दिव्या तो नहीं आ गई.

लेकिन, दिव्या दरवाजे की ओट में खड़ी हो कर दोनों की बातें ध्यान से सुन रही थी. उसे यकीन ही नहीं हो रहा था कि उस की छोटी बहन इस तरह की हरकतें कर सकती है.

दिव्या खड़ीखड़ी उन की बातें सुनने लगी. रागिनी उलाहना देते हुए कह रही थी, ‘‘मुझे खुश कर के आप तबाह नहीं, बल्कि खुश होंगे, जीजाजी. क्यों बेकार में इतना कीमती समय बरबाद कर रहे हैं?

‘‘मेरे प्यासे मन को क्यों नहीं बुझा देते? मैं आप का यह एहसान जिंदगीभर नहीं भूलूंगी. आइए, और मुझे अपनी बांहों में जकड़ लीजिए. देखिए, यहां दीदी भी नहीं हैं, केवल आप, मैं और यह अकेलापन है.’’

‘‘जानता हूं, फिर भी मैं तुम्हारी दीदी के साथ बेवफाई नहीं कर सकता, इसलिए होश में आओ रागिनी. तुम अपनेआप को संभालो, क्योंकि हर काम का एक समय होता है. इसलिए अपनी इज्जत संभाल कर रखो, जो तुम्हारे होने वाले पति की अमानत है.

‘‘मैं तुम्हारे पिताजी से कह कर जल्दी ही तुम्हारी शादी करवा दूंगा,’’ समझाते हुए अमर ने कहा.

‘‘शादी के बारे में जीजाजी बाद में सोचा जाएगा, पहले आप मुझे अपनी बांहों में तो ले लीजिए. देखते नहीं कि मेरा अंगअंग टूट रहा है,’’ कहते हुए रागिनी एक बार फिर अमर से लिपट गई.

अमर ने गुस्से में उस के गाल पर एक जोरदार तमाचा जड़ दिया और बोला, ‘‘कितने भरोसे से तुम्हारे पिताजी ने तुम्हें हमारे पास छोड़ा है और मैं उन का भरोसा तोड़ दूं? तुम्हारी दीदी भी मुझ पर कितना भरोसा करती है. मैं उस का भी भरोसा तोड़ दूं?

‘‘नहीं, मैं ऐसा हरगिज नहीं कर सकता. हां, तुम्हारे संग हंसीमजाक और छेड़छाड़ कर सकता हूं. लेकिन यह भी एक हद तक ही.

‘‘खैर, रात बहुत हो चुकी है, अब सो जाओ, पर अपने इस जीजाजी को माफ करना, क्योंकि मैं ने तुम पर हाथ उठाया है,’’ रुंधे गले से अमर ने कहा और वहां से जाने लगा.

तभी रागिनी अमर का हाथ पकड़ कर रोते हुए कहने लगी, ‘‘माफी आप को नहीं, मुझे मांगनी चाहिए, जीजाजी. क्योंकि मुझे गलतफहमी थी.

‘‘मैं ने अपनी सहेलियों से सुन रखा था कि जीजासाली के रिश्तों में सबकुछ जायज होता है. लेकिन आप के नेक इरादे देख कर अब मुझे एहसास हुआ है कि मैं ही गलत थी.

‘‘अपनी इन हरकतों के लिए मैं शर्मिंदा हूं कि मैं ने आप को बहकाने की कोशिश की. पता नहीं, कैसे मैं इतनी बेशर्म हो गई थी. क्या आप अपनी इस साली को माफ नहीं करेंगे जीजाजी?’’ कह कर रागिनी ने अपना सिर झुका लिया.

‘‘क्यों नहीं, माफ तो अपनों को ही किया जाता है और फिर तुम तो मेरी साली हो,’’ कहते हुए अमर ने प्यार से उस के गालों को थपथपा दिया.

अमर सोने के लिए रागिनी के कमरे से निकल कर अपने कमरे की ओर चल दिया. उस से पहले ही दिव्या कमरे में पहुंच कर पलंग पर ऐसे सो गई, जैसे कुछ जानती ही न हो. लेकिन उसे अपने पति पर गर्व जरूर हो रहा था कि वह बहकने वाला इनसान नहीं, बल्कि सही रास्ता दिखाने वाला इनसान है.

अगले दिन सुबह रागिनी काफी खुश नजर आ रही थी. उस ने चहकते हुए दिव्या से कहा, ‘‘दीदी, अब मैं घर जाना चाहती हूं, क्योंकि मेरी पढ़ाई का नुकसान हो रहा है. क्यों जीजाजी, मुझे पहुंचाएंगे न घर?’’

अमर ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘हांहां, क्यों नहीं. जीजा अपनी साली की हर बात का खयाल नहीं रखेगा, तो और कौन रखेगा. मैं तुम्हें घर छोड़ कर आऊंगा.’’

उन दोनों की बातें सुन कर दिव्या सोचने लगी कि क्या यह वही कल वाली रागिनी है या कोई और?

VIDEO : ऐसे करेंगी मेकअप तो बन जाएंगी पार्टी की शान

ऐसे ही वीडियो देखने के लिए यहां क्लिक कर SUBSCRIBE करें गृहशोभा का YouTube चैनल.

अपमानित करने का एक परंपरागत भारतीय तरीका

अपमानित करने का एक परंपरागत भारतीय तरीका है न बुलाना यानी कि हुक्कापानी बंद करना, जिस का ताजा शिकार या पीड़ित दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल हैं. बीती 25 दिसंबर को उत्तर प्रदेश के नोएडा को दक्षिण दिल्ली से जोड़ने वाली मजेंटा लाइन मैट्रो का उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया जिन्होंने गुजरात में नीच कहे जाने को खूब भुनाया. इस अहम मौके पर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को जानबूझ कर नहीं बुलाया गया जिस पर आम आदमी पार्टी की तिलमिलाहट व्यक्त भी हुई.

साबित तो हो गया कि भाजपा केजरीवाल से किस हद तक ईर्ष्या रखती है. ताज्जुब इस बात का है कि यहां तो ड्राइवरलैस मैट्रो के उद्घाटन पर बैर छिपाने की जरूरत भी नहीं समझी गई. अब यह दिल्ली की जनता तय करेगी कि यह उस का भी अपमान था या नहीं.

VIDEO : हेयरस्टाइल स्पेशल

ऐसे ही वीडियो देखने के लिए यहां क्लिक कर SUBSCRIBE करें गृहशोभा का YouTube चैनल.

खुश रहने के ये हैं हैल्दी और मस्त फंडे

हर किसी के जीवन में समस्याएं होती हैं, अगर आप उन से उबर गए तो आप की लाइफ हैप्पी वरना टैंशन ही टैंशन. आप को अपनी लाइफ को हैप्पी व हैल्दी बनाने के लिए वजह ढूंढ़नी पड़ेंगी. जिंदगी में खुश रहना चाहते हैं तो आप को यह करना पड़ेगा :

अच्छा खाना खाएं : जरूरी नहीं है कि आप ऐसा पौष्टिक व स्वस्थ भोजन करें जो आप को पसंद न हो, लेकिन ऐसा कुछ खाएं जो पौष्टिकता व स्वाद दोनों में अच्छा हो. अपने लिए अच्छा खाना तैयार कर के उस खाने का मजा उठाएं.

व्यायाम जरूर करें : दिन में वक्त निकाल कर 10 मिनट तक व्यायाम करें. यह आप के शरीर में कोई बहुत बड़ा बदलाव तो नहीं लाएगा लेकिन इस से आप को बेहतर होने का एहसास होगा. दरअसल, कुछ न करने से कुछ करना बेहतर है. थोड़ाथोड़ा अधिक समय व्यायाम करने में लगाएं तो आप का शरीर उक्त व्यायाम को स्वीकार करने लगेगा. इस से आप खुद को पहले से बेहतर महसूस करेंगे और आप को अच्छी नींद आने लगेगी.

अगर आप बहुत अधिक वजन उठाते हैं तो व्यायाम करें. यह कुछ अलग होगा और आप को अच्छा भी महसूस होगा. कुछ अलग करना हमेशा ही अच्छा होता है.

society

थोड़ाथोड़ा कर के खाएं : 5 बार खाने की कोशिश करें. बहुत लोग 5 बार से अधिक खाने की सलाह देते हैं. कई लोग 5 बार खाना नहीं खाते हैं. यह जरूरी नहीं है कि आप कितना खाते हैं लेकिन कोशिश यह करें कि आप बारबार खाएं यानी दिन में 5 बार.

पढ़ने की क्रिया : जब हम किसी परेशानी या तनाव में होते हैं, तो उस में खुद को खो देना आसान होता है. इस से उबरने का एक अच्छा तरीका है कि अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में थोड़े समय की छुट्टी जरूर लें और अपनी पसंद की किताब या पत्रिकाएं पढ़ें.

एडल्ट कलरिंग : यह भी एक अच्छा तरीका है. अपने लिए कलरिंग बुक लाएं और अपने बच्चे के साथ मिल कर कलरिंग करें. इस से आप को बहुत खुशी मिलेगी.

थोड़ी सफाई करें : सफाई करना एक बहुत बड़ा काम हो सकता है, पर थोड़ी सी सफाई, जैसे अपने पुराने कपड़े फेंकना, जो किताबें आप नहीं पढ़ते हैं उन्हें किसी चैरिटी शौप में दे देने जैसा काम जरूर करें.

चैरिटी में पैसे दें : यह सुनने में बहुत अजीब लगेगा कि मैं क्या दान कर सकती हूं लेकिन कुछ ऐसी चीजें दान में दें जो आप के लिए बहुत महत्त्व रखती हों.

गाना सुनें : गाड़ी चलाते समय अपना पसंदीदा गीतों का अलबम या गाना चलाएं. सोचिए यह कितना अच्छा होगा कि जब आप का समय खराब चल रहा हो और एमदम से आप का पसंदीदा गाना आ जाए.

वाक करने जाएं : चाहे वैसा भी मौसम क्यों न हो, कोई भी मौसम खराब नहीं होता. अगर बहुत ठंड है तो गरम कपड़े पहनें और अगर बारिश का मौसम हो तो वाटरप्रूफ कपड़े पहनें. अगर मौसम अच्छा न हो तो घर वापस आ कर अपना मनपसंद पेय पिएं.

किसी का दिन अच्छा बनाएं : किसी जरूरतमंद की सहायता करें, चाहे वह पैसे से हो या आप के साथ से. कोशिश करें कि जरूरतमंद व्यक्ति की आप भरपूर सहायता कर सकें.

आर्ट गैलरी में जाएं : अगर आप को आर्ट का शौक है तो उस को असलियत में देखना बहुत अलग अनुभव होता है. कभीकभी उस के रंग आप को इतना आकर्षित करते हैं कि आप मंत्रमुग्ध हो कर किसी और ही दुनिया में खो जाते हैं.

बबल बाथ लें : अगर आप के पास बाथटब है तो बहुत सारे बबल्स, कैंडल्स और हलके कुनकुने पानी में अच्छा सा बाथ लें. यह आप को रीफ्रैश करेगा. बाथटब न हो तो थोड़ा ज्यादा देर तक पानी के नीचे बैठ कर उस का आनंद लें.

society

आदत को बदलें : अगर आप खाना खाते समय एक ही जगह पर बैठते हैं तो जगह बदल दें. बदलाव अच्छा होता है.

कुछ लोगों से बात करना बंद करें : अगर आप का दोस्त उतना खास नहीं रहा तो अब समय आ गया है कि आप उन से दूर हो जाएं. अगर आप चाहते हैं तो आप उसे सोशल मीडिया पर म्यूट कर दें. आप को ऐसे लोगों की अपनी जिंदगी में जरूरत नहीं जिन से आप को और दुख महसूस होता हो.

लुक्स के ऊपर समय दें : उम्रदराज हैं, व्यस्क बच्चों के मातापिता हैं तो मेकअप का इस्तेमाल करें जो आप की पसंद हो. स्मार्ट बनना पागलपन नहीं होता, बल्कि ऐसा करने से आप को बहुत अच्छा लगेगा. घर से बाहर जाने से पहले अपने को शीशे में जरूर देखें.

छुट्टी प्लान करें : काम से फुरसत लें. थोड़े समय के लिए छुट्टी पर जाएं, अपनी पसंद का स्थान चुनें और कुछ समय अपनों के साथ बिताएं.

पिकनिक पर जाएं : गरमी में किसी गार्डन में पिकनिक मनाने जाएं तो चादर या दरी बिछा कर बैठें. ताजी हवा मूड को भी ताजा कर देगी.

एक्टिविटीज सोचें : हर रोज दिन के अंत में 3 ऐसी चीजों के बारे में सोचें जो अच्छी हों, अच्छी तरह से उन को याद करें और खुद को बधाई दें. यह चाहे छोटी हों या बड़ी, इस से फर्क नहीं पड़ता. बस, अच्छे समय और अच्छी बातों को याद करें.

अच्छे टीवी शो देखें : अपने मनपसंद टीवी शो को रिकौर्ड करें और समय मिलने पर उसे अकेले में सोफे पर बैठ कर या चाय, कौफी पीते वक्त देखें.

दोस्त से मिलें : अपने किसी दोस्त से मिलें और उस के साथ बैठ कर चाय, कौफी पिएं.

काम से ब्रेक लें : काम करते समय ब्रेक लें. अपनी डैस्क पर ब्रेक लेना बंद करें, अच्छी तरह से ब्रेक लें.

दिन की शुरुआत मुसकराहट से : अपने दिन की शुरुआत स्माइल से करें. आप के लिए यह खास नाश्ता है.

कविता लिखें : जब भी आप तनाव में हों या कुछ ऐसी भावनाएं जिन्हें आप निकालना चाहते हों तो कविताएं लिखें. ऐसा करने से आप बहुत शांत महसूस करेंगे. अगर आप लिख नहीं सकते तो किसी और की लिखी कविता पढ़ें.

कुछ अलग सौंग सुनें : आस्ट्रेलियन फिल्म डाइरैक्टर बाज लुहरमैन का ‘ऐवरीबौडिज फ्री टू वियर सनस्क्रीन’ गाना सुनें. अगर आप ने कभी पहले यह गाना नहीं सुना तो जरूर इस गाने को सुनें नहीं तो अपनी पसंद का गाना सुनें.

कुछ इस तरह एंजौय करें : कुछ ऐसा करें जो आप को पसंद हो. ऐसी कौन सी चीज है जो आप बचपन में पसंद करते थे, क्यों न उस काम को दोबारा शुरू करें. ऐसा करने से आप का तनाव कम होगा.

किसी की मदद लें : किसी की मदद लें. जब चीजें कठिन होती हैं तो आप अकसर किसी से मदद मांगना भूल जाते हैं. अधिकतर लोग आप की मदद करने से मना नहीं करेंगे और हो सकता है कि बहुत से लोगों को यह पता ही नहीं चले कि आप को किसी की जरूरत है. लेकिन कोई भी आप की मदद करने से इनकार नहीं करेगा. ऐसा करने से अप महसूस करेंगे कि आप के ऊपर से तनाव कितना कम हो गया.

अब आप को पता चल गया होगा कि जिंदगी में कैसे खुश रहें. इन सब बातों को जीवन में शामिल करने, व्यवहार में लाने में शुरू में परेशानी हो सकती है, परंतु कुछ समय बाद आप महसूस करेंगे कि आप बहुत खुशी से जीवन जी रहे हैं.

VIDEO : हेयरस्टाइल स्पेशल

ऐसे ही वीडियो देखने के लिए यहां क्लिक कर SUBSCRIBE करें गृहशोभा का YouTube चैनल.

इस देश में राजपुरोहित है अफसरशाही

अफसरशाही को साधना हर नेता के बस का नहीं है. अरविंद केजरीवाल तो इस मामले में एकदम निखट्टू साबित हो रहे हैं. दिल्ली में बहुत भारी बहुमत से विधानसभा चुनाव जीतने के बाद भी उन का ज्यादा समय अफसरों और उन के सरगना उपराज्यपाल से जूझने में बीतता है. हद तो हाल में हो गई जब रात को एक मीटिंग में आम आदमी पार्टी के विधायकों की मुख्य सचिव से हाथापाई तक हो गई.

ऐसे मामलों में दूसरे राज्यों में मुख्यमंत्री बीचबचाव कर के मामला ठंडा कर देते हैं. पर अरविंद केजरीवाल ठहरे अक्खड़ नेता और उन्होंने पूरी अफसरशाही से बिगड़ना शुरू कर दिया है.

हमारे देश में अफसरशाही का ढांचा बहुत मजबूत है. यह हमारे शास्त्रों के ब्राह्मणों के रुतबे और हकों की तरह का बना हुआ है जो सत्ता में सीधे न होते हुए भी हर काम में अपनी टांग अड़ाए ही नहीं रखते, हर काम अपनी मरजी से ही कराते हैं. पुराने राजाओं को जैसे राजपुरोहित अपनी उंगलियों पर नचाते थे वैसे ही ये अफसर नेताओं को नचाते हैं.

अरविंद केजरीवाल समझ रहे हैं कि ये अफसर राजपुरोहित नहीं हैं और यह उन की भूल है. राजपुरोहित अपने अपमान का बदला लेने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं और यही वे अब केजरीवाल के साथ कर रहे हैं. केजरीवाल अपनी राजनीतिक सफलता के बल पर अपने को जनता का हितैषी मान रहे हैं जबकि सच यह है कि बिना अफसरशाही की रजामंदी के वे एक पत्ता भी बदल नहीं सकते. मुख्य सचिव का उदाहरण तो एक सबक है जो सरकार के लिए जानलेवा भी हो सकता है. अगर ‘पद्मावत’ फिल्म देखी है तो उस में राजपुरोहित को पद्मावती व रावल रतन सिंह से नाराज हो कर अलाउद्दीन खिलजी को भड़काने और चित्तौड़ पर विधर्मी के हमले व कब्जे का पूरा किस्सा दर्शाया गया है. यह बारबार हुआ है. 1947 के बाद भी हुआ?है. आज भी हो रहा है.

अरविंद केजरीवाल को समझना चाहिए था कि वे अपनी ताकत जनता के हितों में लगाएं, अफसरशाही को साध कर, नाराज कर के नहीं. अफसरशाही से उलझना इस देश में तो नामुमकिन है.

अफसरशाही अपनेआप को देश का स्टील फ्रेम कहती है और मानती है कि उसी की बदौलत देश एक है. यह चाहे सच न भी हो तो भी उस से उलझना गलत है.

VIDEO : ऐसे करेंगी मेकअप तो बन जाएंगी पार्टी की शान

ऐसे ही वीडियो देखने के लिए यहां क्लिक कर SUBSCRIBE करें गृहशोभा का YouTube चैनल.

जैसी करनी, वैसी भरनी

पहली मई, 2017 को सोबरन सिंह अदालत के कटघरे में खड़ा था. उस दिन उस की जिंदगी का अहम फैसला होने वाला था. उस की आंखों में याचना थी. अपराध ऐसा था, जिसे सुन कर लोगों के रोंगटे खड़े हो जाएं. फिर भी उसे उम्मीद थी कि सामने डायस पर बैठे जज साहब उसे जीवनदान दे देंगे. आखिर गलती किस से नहीं होती. लेकिन उस ने जो किया था, उसे गलती नहीं, गुनाह कहते हैं. विवाह से ले कर जुर्म करने तक का घटनाक्रम किसी चलचित्र की तरह उस की आंखों के सामने घूम गया था. जब 15 साल पहले उस की शादी ममता से हुई तब वह बहुत खुश था. ममता उत्तर प्रदेश के जिला फर्रुखाबाद के गांव समसुइया निवासी सतीशचंद्र की बेटी थी.

शादी के बाद ममता अपनी ससुराल रूपपुर पहुंची तो घर खुशियों से भर उठा. बहू के आने पर बूढ़ी सास को राहत मिली थी, क्योंकि उन का बड़ा बेटा पन्नालाल पत्नी को ले कर अलग रहता था. वह छोटे बेटे सोबरन के साथ रहती थीं. आते ही ममता ने घर संभाल लिया. समय के साथ ममता 3 बेटियों और 2 बेटों की मां बनी.

घर में खुशहाली थी. सोबरन ठीकठाक कमाता था, इसलिए आराम से गुजारा हो रहा था. भाई पन्नालाल पड़ोस में ही रहता था, लेकिन उस से उस के संबंध अच्छे नहीं थे.

अचानक ममता को पति में बदलाव महसूस होने लगा. वह घर खर्च के लिए जो पैसे देता था, उस में कमी कर दी थी. पूछने पर कहता कि आजकल काम ठीक नहीं चल रहा है. कभी पैसे गिर जाने का बहाना बना देता. ममता की समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे?

ममता को लग रहा था कि कुछ गड़बड़ जरूर है. उस ने पता लगाया कि पति कहांकहां बैठता है. उसे पता चला कि वह गांव के कुछ आवारा और शराबी लोगों के साथ उठताबैठता है और उन्हीं के साथ ढाबे पर खापी कर आता है. ममता ने पति से कहा, ‘‘तुम अपनी कमाई शराब और ढाबे पर खाने में खर्च देते हो, मैं इन बच्चों को क्या खिलाऊं, यह घर कैसे चलाऊं?’’

पत्नी की यह बात सोबरन को बहुत बुरी लगी. उस ने गुस्से में कहा, ‘‘तू कौन होती है, मुझ से सवाल करने वाली? मैं कमाता हूं, मेरी मरजी कि मैं अपनी कमाई किस तरह और किस पर खर्च करूं.’’

‘‘तुम अपनी कमाई शराब में उड़ा दो और बच्चे भूखे रहें, इस बात को मैं सहन नहीं कर सकती.’’ ममता ने कहा.

‘‘ओह, तो तू अब मुझ पर हुकुम चलाएगी.’’ कह कर सोबरन ममता पर टूट पड़ा. ममता हैरान रह गई. सोबरन ने पहली बार उस पर हाथ उठाया था. पत्नी की पिटाई कर के वह सीधे ठेके पर गया और नशे में झूमता हुआ घर लौटा. उस की इस हरकत से ममता और बच्चे सहम उठे थे.

crime

उस दिन के बाद सोबरन किसी न किसी बात को ले कर ममता की पिटाई करने लगा. ममता पति की इस हरकत से परेशान रहने लगी. एक दिन वह अपनी बुआ सुदामा के घर गई, जो मैनपुरी के नगला पजावा में रहती थी. उस ने बुआ को सारी बात बताई तो सुदामा भी परेशान हो उठी. सुदामा का बेटा रजनेश भी वहीं था. उस ने कहा कि वह सोबरन जीजा को समझाएगा.

एक दिन रजनेश रूपपुर गया और सोबरन को समझाने की कोशिश की तो उस ने कहा, ‘‘अगर तुम्हें अपनी बहन और बच्चों की इतनी ही फिक्र है तो ले जाओ उन्हें अपने घर.’’

रजनेश की समझ में नहीं आ रहा था कि इस स्थिति में वह क्या करे? बहन के घर में कलह बढ़ रही थी और वह कुछ कर नहीं पा रहा था. आखिर सभी ने ममता और उस के बच्चों को उन के हालात पर छोड़ दिया.

ममता ने भी तय कर लिया कि सोबरन जिस हालत में रखेगा, वह उसी हालत में रहने की कोशिश करेगी. पर उस ने यह कभी नहीं सोचा था कि पति की इन हरकतों से जीवन में ऐसा तूफान आएगा कि सब तबाह हो जाएगा.

सोबरन दिनोंदिन शराब का आदी होता जा रहा था. नशा उसे वहशी बना रहा था. नशे में एक दिन उस ने पिता की झोपड़ी में आग लगा दी. उस समय झोपड़ी में उस के पिता और बच्चे सो रहे थे. गांव वालों ने बड़ी मुश्किल से आग बुझा कर उन्हें बाहर निकाला.

गांव वालों की नजर में सोबरन हिंसक और एक शराबी था. सभी उस से दूरियां बनाने लगे थे. गांव वालों की नफरत भी सोबरन को अपराधी बनने की ओर ले जा रही थी. उस के हिंसक स्वभाव की वजह से पत्नी और बच्चे घर में सहमे रहते थे.

सोबरन इतना क्रूर हो जाएगा, यह किसी ने नहीं सोचा था. 29 जून, 2014 की शाम को सोबरन नशे में लड़खड़ाता हुआ घर आया तो उस के डर से सभी बच्चे छिप गए.

ममता ने पति को धिक्कारा कि कुछ तो शरम करे, बच्चों को पेट भर खाना नहीं मिलता और वह है कि उसे पीने से ही फुरसत नहीं है. इस पर सोबरन ने गुस्से में ममता को एक थप्पड़ जड़ दिया. संयोग से उसी समय उस के पिता बाबूराम सामने आ गए तो सोबरन ने हंसते हुए कहा, ‘‘चल बापू, आज तू भी शराब पी ले. तू भी देख, इसे पीने पर कैसा मजा आता है.’’

इस के बाद बापबेटे ने मिल कर शराब पी और फिर किसी बात पर दोनों में झगड़ा होने लगा. नतीजतन दोनों में मारपीट शुरू हो गई. बेटे का गुस्सा देख कर बाबूराम डर गया और पत्नी के साथ बाहर चला गया.

सोबरन को लगा कि इतना पीने के बाद भी अभी नशा नहीं चढ़ा है. उस ने ममता से पैसे मांगे. ममता ने पैसे देने से मना कर दिया. वह उसे पीटने लगा. ममता क्या करती, उस ने सौ रुपए निकाल कर दे दिए. सोबरन उस समय जैसे दानव बन गया था. उस की नजर अपनी 11 साल की बेटी सपना पर पड़ी तो उसे पास बुला कर कहा, ‘‘ये पैसे अंदर रख दे.’’

सपना पैसे ले कर अंदर चली गई. पीछेपीछे सोबरन भी गया और सपना को पीटने लगा. बेटी को पिटता देख ममता डर गई और अकेली ही पड़ोसी के घर में जा छिपी. बाकी बच्चे एक चारपाई पर लेटे चादर के अंदर से सब देख रहे थे. सपना को बचाने वाला वहां कोई नहीं था.

सपना चीखचिल्ला रही थी, लेकिन सोबरन को उस पर तनिक भी दया नहीं आ रही थी. वह उसे पीटते हुए खेतों की ओर खींच कर ले गया. कुछ देर बाद सपना को गोद में लेकर लौटा और जमीन पर पटक दिया. सपना बेहोश थी. 7 साल की पूनम ने अपनी आंखों से अपनी बड़ी बहन को तड़पते देखा. उस ने देखा कि पिता ने किस तरह उस की गरदन पर पैर रख कर तब तक दबाए रखा, जब तक तड़पतड़प कर उस की सांसें बंद नहीं हो गईं. सपना की आंखों, कानों और मुंह से खून निकल रहा था. वह मर चुकी थी.

बेटी को मौत के घाट उतार कर भी सोबरन पर कोई असर नहीं हुआ. वह पूरी तरह बेखौफ था. वह छत पर गया और वहीं से ममता को आवाज दी कि सपना को बुखार है, आ कर उसे दवा दे दे.

यह सुन कर ममता भागी चली आई. वह नहीं जानती थी कि कसाई उसे भी हलाल करने को तैयार है. ममता के आते ही सोबरन उसे डंडे से पीटते हुए बाहर ले आया. बाहर ला कर उसे ईंट से मारा और नाले में डुबो दिया. इतने से भी मन शांत नहीं हुआ तो घसीट कर घर ले आया. तब तक ममता भी दम तोड़ चुकी थी.

सोबरन को लगा कि दोनों मर चुकी हैं तो लाशों को एकएक कर के सीढि़यों से घसीटता हुआ छत पर ले गया और बड़े भाई पन्नालाल की छत पर डाल दिया. इस के बाद उस ने रात भर पूरे घर की सफाई की और खून के निशान मिटाए. सुबह होने पर उस ने बच्चों को धमकाया कि अगर उन्होंने किसी को कुछ बताया तो उन का भी यही हाल होगा.

इस के बाद सोबरन मोटरसाइकिल ले कर निकल गया. जाने से पहले 7 साल की बेटी पूनम से कहा कि वह तारीख पर कोर्ट जा रहा है. उस के जाते ही पूनम रोने लगी. उस के रोने की आवाज सुन कर पड़ोसी और मोहल्ले के लोग आ गए. रोतेरोते उस ने सारी बात उन लोगों को बताई तो लोगों ने छत पर जा कर देखा. वहां सचमुच मांबेटी की लाशें पड़ी थीं.

गांव के किसी आदमी ने रजनेश को फोन कर के सारी बात बता दी. बहन और भांजी की हत्या की खबर सुन कर रजनेश के पैरों तले से जमीन खिसक गई. मां को सारी बात बता कर वह तुरंत थाना करहल गया और थानाप्रभारी को सारी बात बताई.

हत्या का पता चलते ही थानाप्रभारी पुलिस टीम के साथ रूपपुर गांव पहुंच गए. वहां गांव वालों की भीड़ इकट्ठा थी. पुलिस ने पन्नालाल की छत से ममता और 11 साल की सपना की लाशें बरामद कर लीं.

ममता और सपना की बेरहमी से की हत्या से पूरा गांव सहमा था. दोनों के शरीर पर चोटों के निशान थे. जरूरी काररवाई कर के पुलिस ने दोनों लाशों को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. घटना की चश्मदीद गवाह पूनम थी. पूछताछ के लिए पुलिस पूनम को अपने साथ थाने ले आई.

रजनेश की ओर से सोबरन के खिलाफ भादंवि की धारा 302, 201 के तहत मुकदमा दर्ज करा दिया गया. पुलिस ने चश्मदीद गवाह पूनम के बयान दर्ज कर लिए. पूनम के दिल में क्रूर पिता के प्रति इतनी नफरत थी कि उस ने अपने बयान में बताया कि अब वह अपने पिता की शक्ल भी नहीं देखना चाहती. वह उसे फांसी पर लटका देखना चाहती है.

ममता और सपना की जघन्य हत्या ने पूरे परिवार को हिला कर रख दिया था. सोबरन को पुलिस ने उसी दिन गिरफ्तार कर लिया. गिरफ्तारी के समय उस के चेहरे पर जरा भी शिकन नहीं थी. पूरे मामले की जांच कर 23 अगस्त, 2014 को थानाप्रभारी बलबीर सिंह ने सोबरन के खिलाफ चार्जशीट दाखिल कर दी.

इस के बाद मामले की सुनवाई शुरू हुई तो रजनेश ने तय कर लिया कि कुछ भी हो, वह सोबरन को जेल से बाहर नहीं आने देगा. सभी रिश्तेदार सोबरन से नफरत करने लगे थे. रजनेश ने मन लगा कर मुकदमे की पैरवी की. यही वजह थी कि सोबरन की जमानत अर्जी हाईकोर्ट तक खारिज हो गई.

दोहरे कत्ल का यह मामला अपर जिला जज एवं सत्र न्यायाधीश (प्रथम) गुरुप्रीत सिंह बावा की अदालत में पहुंचा. माननीय न्यायाधीश ने मामले को बहुत गंभीरता से लिया. पत्नी और बेटी के कातिल सोबरन के खिलाफ काफी मजबूत सबूत थे. कातिल की बेटी पूनम घटना की चश्मदीद गवाह थी, उस ने अदालत को घटनाक्रम बता दिया था. उस के बयान से ही पता चल रहा था कि वह अपने शराबी पिता से कितनी नफरत करती थी.

गवाहियां पूरी हो चुकी थीं. अगले दिन फैसला सुनाया जाना था. घर वाले चाहते थे कि सोबरन को फांसी हो. लगभग 3 साल तक मुकदमा चला. फैसले की तारीख अदालत ने तय कर दी थी. 1 मई, 2017 को फैसला सुनाया जाना था. मृतका ममता के मांबाप सुदामा के यहां नगला पजावा मैनपुरी आ गए थे. सभी के चेहरे पर चिंता की लकीरें थीं. पुलिस मुलजिम सोबरन को कोर्टरूम ले आई और उसे कटघरे में खड़ा कर दिया गया. वह काफी बेचैन लग रहा था.

11 बजे माननीय न्यायाधीश गुरुप्रीत सिंह बावा अदालत में आए तो सन्नाटा सा छा गया. जज साहब ने अपना फैसला सुनाया. उन्होंने कहा कि मुलजिम ने जो अपराध किया है, वह समाज के लिए घातक है. अत: आरोपी सोबरन सिंह दया का पात्र नहीं है. अदालत ने उस के अपराध को अतिजघन्य माना और भारतीय दंड विधान की धारा 302 के अंतर्गत उसे फांसी की सजा दी.

अदालत के इस फैसले को सुन कर सोबरन फूटफूट कर रोने लगा. पुलिसकर्मियों ने उसे मुश्किल से शांत किया. इस फैसले से सोबरन के घर वालों और ममता के घर वालों ने राहत की सांस ली. सतीशचंद्र और तारावती अपनी बेटी और धेवती के कातिल को दी जाने वाली सजा से संतुष्ट हैं. बेटी और धेवती की याद में उन की आंखों में आंसू आ गए. उन्होंने सिर्फ इतना ही कहा, ‘‘जैसी करनी, वैसी भरनी.’’

सोबरन निचली अदालत के फैसले के खिलाफ ऊपरी अदालत में अपील करेगा या नहीं, यह पता नहीं. पर यह फैसला समाज के लिए एक सबक  जरूर है.

VIDEO : हेयरस्टाइल स्पेशल

ऐसे ही वीडियो देखने के लिए यहां क्लिक कर SUBSCRIBE करें गृहशोभा का YouTube चैनल.

फौजिया को क्या मिला कंदील बलोच बन कर

पाकिस्तानी पंजाब के जिला डेरा गाजीखान में 1 मार्च, 1990 को बलोच परिवार में पैदा हुई फौजिया अजीम की 5 बहन थीं और 6 भाई. बचपन से ही वह अपनी उम्र के बच्चों से हर मामले में आगे थी. पढ़ाई में वह ठीक थी. उस की आकांक्षाएं बहुत ऊंची थीं. बचपन से ही उस की खूबसूरती आंखों में बस जोने वाली थी. साधारण तरीके से बात करते हुउ भी उस की भावभंगिमाएं अलग ही नजर आती थीं.

फौजिया अपनी फ्रैंडस से अकसर कहा करती थी कि वह बड़ी हो कर पहले मौडल बनेगी और फिर अदाकारा. हकीकत यह है कि उस वक्त वह खुद नहीं जानती थी कि यह उस की महत्वाकांक्षा थी, या फिर शेखी बघारने की बालसुलभ प्रवृत्ति. लेकिन इस तरह की बातों से उस ने अपने लिए अच्छीखासी समस्या खड़ी कर ली. फौजिया की फ्रैंड्स घर जा कर उस की इन बातों को अपने परिवार में बताया करती थीं.

परिणाम यह निकला कि उन के परिवारों के बुजुर्ग यह सोच कर खौफजदा होने लगे कि कल को अगर उन की लड़़कियां भी फौजिया के नक्शेकदम पर चलने को आमादा हो गईं तो उन की बच्चियों का क्या होगा? लिहाजा वे बेटियों के सामने फौजिया की गलत तसवीर पेश कर के उन के भविष्य का स्याह पक्ष दिखलाने की कोशिश करते और उस से दूर रहने को कहते. फौजिया की आजाद सोच को ले कर होने वाले विरोध संबंधी कुछ शिकायतों का सामना उस के पिता मोहम्मद अजीम को भी करना पड़ा. सुन कर वह काफी परेशान हुए. लेकिन अपनी बेटी से प्यार और सकारात्मक सोच की वजह से उन्होंने फौजिया को कुछ नहीं कहा.

खानदान बाद की बात होती तो मोहम्मद अजीम संभाल लेते, लेकिन वे शिया सोच वाले अपने उस समुदाय के बनाए नियमों से बाहर जाने की सोच नहीं भी सकते थे, जो अपने कट्टरपन के लिए जाना जाता था.

दूसरा कोई चारा न देख, मोहम्मद अजीम ने बेटी का निकाह आशिक हुसैन से पढ़वा दिया. उस वक्त फौजिया की उम्र 18 साल थी. निकाह के साल भर के भीतर वह एक बेटे की मां बन गई. लेकिन अपने शौहर से उस की ज्यादा दिनों तक नहीं निभी. वह जब भी अपने अब्बू के पास आती थी तो शौहर के बारे में उन्हें बताती थी कि वह हमेशा उस से बुरा व्यवहार करता है.

finance

मोहम्मद अजीम बेटी को समझाया करते थे कि जैसे भी हो अपने शौहर का दिल जीतने की कोशिश करे और उस के साथ रहती रहे. अब तो वैसे भी वह एक बच्चे की मां बन गई है.

लेकिन फौजिया के लिए वह वक्त यूं ही बेकार गुजरने वाला नहीं, बल्कि बेशकीमती था. जिस समय वह अपनी प्रतिभा को उभारने के लिए ऊंची उड़ान भरने की सोच सकती थी. उस वक्त उस के पंख काट कर वैवाहिक जीवन में बांध दिया गया था.

इस मुद्दे पर फौजिया ने पूरी गहराई से सोचा. आखिर वह इस निष्कर्ष पर पहुंची कि अगर उसे जिंदगी में ऊंचा उठने के सपने पूरे करने हैं तो सारे बंधन तोड़ कर एक बार खुले आसमान में उड़ान भरनी होगी.

और उस ने ऐसा ही किया भी…

उस रोज उस के निकाह को ठीक एक साल हुआ था. जब वह अपने शौहर व बच्चे को छोड़ कर अपनी ससुराल को हमेशा के लिए अलविदा कह गई.

ऐसे में न तो उस ने किसी अपने से सहारे की दरकार की, न किसी रिश्ते के साथसाथ पुराने नाम को अपने साथ घसीटा. अब उस ने अपना पुराना नाम बदल कर नया नाम रखा- कंदील बलोच. इस के साथ ही उस ने अपना गैटअप भी पूरी तरह बदल लिया. अपनी इस नई पहचान के साथ वह मौडलिंग की दुनिया में कूद गई.

कंदील का अर्थ होता है—प्रकाश. फौजिया को यह नाम बहुत रास आया. कुछ ही दिनों में न केवल उस का यह नाम बल्कि उस की प्रतिभा भी प्रकाश में आ गई. हालांकि मौडलिंग में उसे बड़ी कंपनियों के अनुबंध मिलने शुरू नहीं हुए थे, लेकिन वह दिन पर दिन इस क्षेत्र में लोकप्रिय होती जा रही थी. उस ने कुछ नाटकों व धारावाहिकों में अभिनय कर के काफी वाहवाही लूटी थी. वह गाती भी बहुत अच्छा थी. चर्चा यह थी कि वह जल्दी ही बड़े पर्दे पर दिखाई देगी.

अमूमन यह सब हो जाने के बाद ही कलाकार वांछित लोकप्रियता की सीढि़यां चढ़ने लगता है. मगर कंदील बलोच एक ऐसा ब्रांड नेम बनता जा रहा था जो इस मुकाम पर पहुंचने से पहले ही काफी प्रसिद्धि बटोरने लगा था.

कंदील की लोकप्रियता की मुख्य वजह थी आज के जमाने का ब्रह्मास्त्र कहलाए जाने वाला सोशल मीडिया. अपने फेसबुक एकाउंट से ले कर ट्विटर तक के सहारे वह अनगिनत लोगों से जुड़ती जा रही थी. वक्त के साथ उसे चाहने वालों की संख्या भी खूब बढ़ रही थी.

कंदील पहले अपनी सफलताओं का ब्यौरा ही फेसबुक पर साझा किया करती थी, जिन पर उसे खूब लाइक्स और कमेंटस मिला करते थे. फिर एक दौर ऐसा भी आया जब उस ने अपने थोड़े बोल्ड फोटो अपलोड करने शुरू कर दिए. साथ ही उस ने ट्विटर पर भी अजीबोगरीब जुमले कसने शुरू कर दिए. इस से जहां वह कुछ ज्यादा ही चर्चा में आने लगी, वहीं उस के विरोध में भी आवाजें उठने लगीं.

इन में कुछ आवाजें उस के अपनों की भी थीं. जो भी था, कंदील बलोच अपने तरीकों से खुद को स्थापित करने में लगी थी. उस का कहना था कि पाकिस्तान में औरतों की आजादी के लिए वह अपनी एक अलग जंग छेड़ेगी.

बांग्लादेश की चर्चित लेखिका तस्लीमा नसरीन को कंदील ट्विटर पर फौलो करती थी. दूसरी ओर कंदील के अपने फेसबुक एकाउंट पर उस के 7 लाख फौलोअर्स थे और ट्विटर पर थे 43 हजार. यह अपने आप में एक बड़ी बात थी.

कंदील के आचरण का एक पहलू यह भी सामने आया कि वह हर लिहाज से बेबाक थी. एक वीडियो में उस ने भारतीय प्रधानमंत्री को ‘डार्लिंग मोदी’ व ‘चाय वाला’ कह डाला था. हालांकि बाद में उस ने दूसरा वीडियो जारी कर के अपनी इस बेहूदगी पर माफी मांगते हुए यह भी कहा कि वह पीएम मोदी की दिल से इज्जत करती है और उन से संबंधित पूर्व में दी अपनी स्टेटमेंट पर बेहद शर्मिंदा है.

finance

मार्च, 2015 में टी-20 क्रिकेट वर्ल्ड कप के दौरान कंदील ने शाहिद अफरीदी को औफर दी कि अगर पाकिस्तानी टीम ने इस मैच में भारतीय टीम को हरा दिया तो वह उस के सामने स्ट्रिप डांस करेगी.

लेकिन जब भारतीय खिलाडि़यों के हाथों पाकिस्तानी टीम हार गई तो उस ने विराट कोहली को मैसेज भेजा ‘विराट बेबी, अनुष्का शर्मा ही क्यों?… फीलिंग इन लव…’

कई बार उस ने पूर्व क्रिकेटर एवं विपक्षी नेता इमरान खान के साथ निकाह करने की इच्छा भी जताई थी. तब तो हद हो गई, जब उस ने एक मुस्लिम धर्मगुरू के साथ अपनी विवादास्पद तसवीरें सोशलमीडिया पर पोस्ट कर दीं. अहम बात यही थी कि रूढि़वादी मुस्लिम देश में रह कर कंदील को सोशल मीडिया पर खुलेपन वाले वीडियो पोस्ट करने के लिए जाना जाता था. यहां तक कि उसे पाकिस्तान की पूनम पांडे भी कहा जाने लगा था.

इस तरह कंदील बलोच अपने बोल्ड अंदाज और विवादों में रहने की वजह से अकसर मीडिया में छाई रहती थी. भले ही अलग तरह से सही, दिन पर दिन उस की लोकप्रियता में इजाफा होता जा रहा था. इसी तरह वक्त अपनी रफ्तार से आगे बढ़ता जा रहा था. कंदील बलोच को लोकप्रियता हासिल करते एक लंबा अरसा गुजर गया.

लेकिन 2016 आतेआते उसे इस तरह की धमकियां मिलने लगीं कि अगर उस ने प्रसिद्धि हासिल करने का अपना यह शर्मनाक रास्ता बंद नहीं किया तो उसे भारी परेशानी का सामना करना पड़ सकता है, जिस में उस की जान भी जा सकती है. उसे अकसर धमकियों भरे फोन भी आने लगे थे.

कंदील ने पहले तो इस सब की परवाह नहीं की. वह ऐसी धमकियां को गीदड़भभकियां कहते हुए अपने ट्विटर पर साहसिक अंदाज में ट्वीट करती रही. एक ट्वीट में उस ने लिखा—‘आज के युग की एक महिला के तौर पर हमें अपने लिए खड़े होना है, दूसरी तमाम महिलाओं की आजादी के लिए.’ फिर एक दफा उस ने ट्वीट किया—‘जिंदगी ने कम उम्र में ही मुझे सबक सिखा दिया था. एक साधारण सी लड़की से आत्मनिर्भर महिला बनने का मेरा सफर इतना आसान नहीं था. अगर आप में इच्छाशक्ति है तो कोई भी आप को नहीं झुका सकता. मैं हक के लिए लडूंगी और अपने लक्ष्य तक जरूर पहुंचूंगी, इसे पाने से कोई मुझे रोक नहीं सकता.’

अपनी एक फेसबुक पोस्ट में कंदील ने लिखा, ‘भले ही मुझे कितनी ही बार गिराया जाए मैं गिर कर भी हर बार उठ खड़ी होऊंगी. मैं एक फाइटर हूं, वनमैन आर्मी. उन महिलाओं को मैं प्रेरणा देती रहूंगी, जिन के साथ बुरा व्यवहार होता है. मुझ से कोई कितनी भी नफरत करता रहे, मैं अपने चेहरे पर आत्मविश्वास लिए इसी रफ्तार से आगे बढ़ती रहूंगी. कुछ लोग कहते हैं कि मैं पाकिस्तान को बदनाम कर रही हूं. लेकिन मैं रुकूंगी नहीं. इतना तो तय है कि मैं सिर पर दुपट्टा भी नहीं लेने वाली हूं.’

लेकिन कंदील को धमकियां देने वाले पीछे नहीं हटे. अब तो फोन पर उस से साफसाफ कहा जाने लगा कि जितना फुदकना है फुदक ले, तेरी जिंदगी अब चंद रोज की है. इस से कंदील थोड़ा भयभीत हुई. जून, 2016 के आखिरी ह़फ्ते में उस ने सुरक्षा हासिल करने के लिए गृहमंत्री, एफआईए (फेडरल इन्वेटिगेशन अथौरिटी) के महानिदेशक एवं इस्लामाबाद के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक को पत्र लिखे.

लेकिन इस से पहले कि उस की सुरक्षा के लिए कुछ हो पाता, 16 जुलाई की सुबह कंदील बलोच जिला मुल्तान के शहर करीमाबाद स्थित पिता के घर में अपने बिस्तर पर मृत पाई गई.

कंदील के पिता की तबीयत कुछ दिनों से नासाज चल रही थी, जिन की खैरियत जानने और ईद की मुबारकबाद देने वह 15 तारीख को उन के यहां आई थी. रात में हंसीखुशी का माहौल रहा. कंदील के छोटे भाई वसीम अजीम ने बहन के घर आने पर कुछ ज्यादा ही खुशी का इजहार किया था. मगर सुबह वह अपने बिस्तर पर मृत पाई गई.

कंदील के पिता मोहम्मद अजीम ने इस मौत को कत्ल की संज्ञा देते हुए पुलिस के पास जो एफआईआर लिखवाई, उस में अपने ही 2 बेटों वसीम अजीम व असलम शाहीन को नामजद किया.

मामला दर्ज कर के 16 जुलाई की शाम को पुलिस ने दोनों भाइयों को गिरफ्तार कर लिया. प्रारंभिक पूछताछ में ही वसीम ने अपना गुनाह कबूल करते हुए माना कि कंदील की हत्या उस ने अपने 3 दोस्तों के साथ मिल कर की है, इस में उस के भाई का कोई हाथ नहीं है. लिहाजा असलम शाहीन को छोड़ दिया गया.

वसीम ने अपना अपराध कुबूलते हुए पुलिस को बताया कि वह कंदील के फेसबुक पोस्ट और विवादित वीडियो से बहुत परेशान था. वह समाज, कौम और यहां तक कि अपने समुदाय की भी परवाह नहीं करती थी. इसे ले कर उस के कई दोस्तों ने उसे खूब जलील किया कि कंदील पूरी तरह बिगड़ चुकी है. वह अपने दोस्तों को समझाया करता था कि इस सब से वह खुद बहुत परेशान है, लेकिन जब भी उसे मौका मिलेगा, वह उन की मौजूदगी में ही अपनी बहन की हत्या करेगा.

society

वसीम ने बताया, ‘‘मैं ने कंदील को गुप्त रूप से धमकियां दे कर समझाने और हड़काने की कोशिश की. मगर वह नहीं मानी. 15 तारीख को वह खुद हमारे यहां चली आई. मैं ने उस के आने पर खुशी का इजहार करने का नाटक किया. इस से उसे मुझ पर जरा भी शक नहीं हुआ. रात में मैं ने कंदील के खाने में नशे की गोली मिला दीं. बिस्तर पर लेटते ही वह गहरी नींद में चली गई.

घर में सभी के सो जाने के बाद आधी रात में मैं ने अपने दोस्तों हक नवाज अब्दुल बासित और जफर खोसा को बुलाया और हम सब ने मिल कर कंदील की गला दबा कर हत्या कर दी. मुझे अपनी बहन को मारने का कोई अफसोस नहीं है.’’

पुलिस ने वसीम के दोस्तों को भी गिरफ्तार कर लिया. पूछताछ के बाद सभी को जेल भेज दिया गया. पुलिस ने समयावधि के भीतर चारों अभियुक्तों के खिलाफ आरोपपत्र तैयार कर अदालत में दाखिल कर दिया. इस के बाद 8 दिसंबर, 2016 को अदालत ने चारों के खिलाफ आरोप तय कर दिए.

मगर इस के बाद अचानक मोहम्मद अजीम ने केस वापस लेने की अर्जी लगा दी, जो अंतिम रूप से नामंजूर तो हुई ही अदालत ने इस सिलसिले में मोहम्मद अजीम के खिलाफ काररवाई करने की संस्तुति भी कर दी. तदनंतर, पाकिस्तान की अदालतों में हड़ताल चलती रही, जिस वजह से यह केस लटकता गया. अब इस में फिर से सुनवाई शुरू हो गई है.

बहरहाल, कंदील बलोच को ले कर लेखिका तस्लीमा नसरीन की यह टिप्पणी काबिलेगौर है कि कुछ लोगों के अनुसार कंदील अमेरिका की किम कार्दशियां की तरह थी, जिस ने अपना जिस्म दिखा कर नाम कमाया. जो काम करते हुए किम ने अमेरिका में करोड़ों डौलर कमाए, वही काम करते हुए पाकिस्तान में कंदील बलोच को अपनी जान गंवानी पड़ी.

पाकिस्तान में वह खूब लोकप्रिय थी, भले ही वह सस्ती लोकप्रियता रही हो. क्या सस्ती लोकप्रियता वाली शख्सियतों को जीने का अधिकार नहीं है? कल को कंदील के हत्यारों को भले ही बड़ी से बड़ी सजा मिले, लेकिन मुख्य मुद्दा यह है कि फौजिया को कंदील बलोच बन कर आखिर क्या मिला?

VIDEO : ऐसे करेंगी मेकअप तो बन जाएंगी पार्टी की शान

ऐसे ही वीडियो देखने के लिए यहां क्लिक कर SUBSCRIBE करें गृहशोभा का YouTube चैनल.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें