औडिशन में करना पड़ा था फोन सेक्स : राधिका

बौलीवुड अभिनेत्री राधिका आप्टे अपने दोस्त और अभिनेता राजकुमार राव के साथ नेहा धूपिया के शो ‘बीएफएफ विद वोग्स’ का हिस्सा बनीं. शो में होस्ट नेहा और एक्टर राजकुमार राव के साथ राधिका ने जमकर मस्ती करने के साथ कई चौंकाने वाले खुलासे भी किये. नेहा ने राजकुमार और राधिका से कई इंटरेस्टिंग सवाल भी किए. इस दौरान राधिका आप्टे ने अपने करियर के बारे में बातचीत की और कई अनकही बातों से पर्दा हटाया.

राधिका से जब शो में सवाल किया गया कि उनके करियर का सबसे वीयर्ड औडिशन कौन-सा है, तो राधिका ने सवाल का जवाब देते हुए कहा कि फिल्म ‘देव-डी’ के लिए उन्हें फोन सेक्स करना पड़ा था, उस समय वह पुणे में रहती थीं. राधिका ने कहा इसके बाद उन्होंने कभी फोन सेक्स नहीं किया.

नेहा ने राधिका से सवाल किया कि आपने बीते सालों में पैसों के लिए कौन-सी विचित्र नौकरी की है? राधिका ने कहा, “मैंने साउथ इंडियन फिल्मों में काम किया है.” राधिका ने एक राज से पर्दा हटाते हुए यह भी बताया कि पैर में गुदगुदी करने के कारण एक तेलुगु फिल्म के सेट पर पहले ही दिन उन्होंने साउथ इंडस्ट्री के एक जाने-माने एक्टर को थप्पड़ मारा था.

बता दें कि जब एकता कपूर से इसी शो में राधिका के बारे में सवाल किया गया था तो एकता ने कहा था कौन राधिका आप्टे? इस पर राधिका आप्टे ने कहा, “मुझे नहीं पता कि उन्होंने ऐसा क्यों कहा, मैं जब उनसे मिली तो उन्होंने अच्छा बर्ताव किया.” तुषार कपूर को डेट करने के सवाल पर राधिका ने कहा, “मेरे पास तुषार का नंबर नहीं है.”

जब शो की होस्ट नेहा ने राधिका से मोस्ट ओवररेटेड एक्टर के बारे में पूछा, तो राधिका ने कहा, “शायद सुशांत सिंह.” इसके साथ ही नेहा ने राजकुमार राव से सवाल किया, “आपने किस सबसे बड़ी डिवा के साथ काम किया है तो राजकुमार ने कंगना रनौत का नाम लिया.

युवाओं का उपेक्षा वाला स्वभाव

हर युवा अपनी स्वतंत्र पहचान बनाने के लिए प्रयत्नशील रहता है. वे अकसर बहस करते रहते हैं, कार्य पर ध्यान नहीं देते. वे दूसरों के कार्यों, विचारों का विरोध कर सकते हैं. युवा अकसर दिवास्वप्न देखते हैं. अपने विचारों में खोए रहते हैं. युवाओं को अपना स्वतंत्र व्यक्तित्व व अलग अस्तित्व बनाना होता है. इस के लिए वे बड़ों, मातापिता की नसीहत, सलाह को नजरअंदाज कर सकते हैं.

अनेक युवा अपने परिवारों से ज्यादा दोस्तों के साथ समय व्यतीत करना पसंद करते हैं. लेकिन जब इन के अनादरपूर्ण, उपेक्षापूर्ण और शत्रुतापूर्ण व्यवहार से दूसरे प्रभावित होते हैं तो इन का पारिवारिक, सामाजिक, शैक्षणिक जीवन प्रभावित होता है. ऐसा व्यवहार उन के हमउम्र वालों से ज्यादा होता है. अगर किसी युवा में यह स्थिति लगातार 6 माह से ज्यादा समय तक रहती है तो यह मानसिक बीमारी मानी जाती है. इस को मनोचिकित्सक अपोजीशनल डिफिऐंट डिसऔर्डर यानी ओडीडी कहते हैं.

असहयोग की भावना

हर परिवार में गलत व्यवहार की सहनक्षमता भिन्नभिन्न होती है. कुछ परिवारों में मामूली सा अनुशासन तोड़ने को बहुत बुरा माना जाता है, जबकि ज्यादातर परिवारों में विरोधी, उपेक्षापूर्ण व्यवहार को अनदेखा कर दिया जाता है. इस तरह के व्यवहार को इन परिवारों में तभी गलत समझा जाता है, जब वह समस्याएं उत्पन्न करता है.

रोगग्रसित युवा दूसरों को सहयोग नहीं करते, दूसरों के साथ उपेक्षा, तिरस्कारपूर्ण और शत्रुतापूर्ण व्यवहार करते हैं. नतीजतन, उन की दैनिकचर्या, कार्यक्षमता प्रभावित होती है. इन को कभी भी गुस्सा आ जाता है और बड़ों से बेवजह बहस करते हैं, घर के नियममान्यताओं को तोड़ते हैं, जानबूझ कर दूसरों को नाराज करते हैं और गुस्सा दिलाते हैं.

विरोधी व्यवहार के शिकार युवा अपनी गलतियों की तोहमत दूसरों पर लगाते हैं. ये भावुक, संवेदनशील होते हैं, दूसरों की बातों को बुरा मान कर दुर्व्यवहार करते हैं, कभी भी क्रोधित हो सकते हैं. कभीकभी ये हलकाफुलका झगड़ा, मारपीट भी कर सकते हैं. इन की भाषा अश्लील व झगड़ालू होती है.

समस्या की शुरुआत अधिकांश में शिशुकाल में होती है. शिशुकाल यानी बचपन में बिना कारण रोते हैं, आसानी से शांत नहीं होते, अडि़यल होते हैं, अवज्ञाकारी होते हैं. ये खाना खाने, मल त्याग करने आदि कार्यों में मातापिता को परेशान करते हैं.

रोगग्रस्त युवा समय बरबाद करते हैं. वे बेकार में इधरउधर घूमते रहते हैं. यदि ये किसी कार्य को करने के लिए हां भी कर देते हैं तो बाद में उस कार्य के लिए अनभिज्ञता जाहिर करते हैं. ये घर, स्कूल, एवं अन्य स्थानों पर दिक्कत उत्पन्न करते हैं. इन युवाओं और परिवार के सदस्यों के बीच कमरा साफ रखने, नहाने, सही ढंग के कपड़े पहनने, अपनी देखभाल सही ढंग से करने, सही व्यवहार करने जैसी मामूली बातों में कहासुनी, बहस होती है. कभीकभी उन्हें अपनी बेइज्जती महसूस करते ये उत्तेजित हो कर लड़ाई पर पर उतारू हो जाते हैं. ये अपनी भाषा, व्यवहार के कारण पुलिस के चंगुल में फंस सकते हैं.

कारण और परिणाम

संभवतया यह रोग परिवार और बच्चों व युवाओं के आपस चक्रीय व्यवहार के कारण होता है. यदि बच्चा जिद्दी और आसानी से शांत नहीं होता तो मातापिता परेशान होते हैं, सोचने लगते हैं कि कहां गलती हुई. धीरेधीरे ये बच्चे को गलत, गंदा बच्चा समझने लगते हैं, जिस के कारण बच्चा अपने को असहाय और अनचाहा महसूस करने लगता है. नतीजतन, वह ज्यादा उग्र हो सकता है. मातापिता इन के गलत व्यवहार को अलग ढंग से नियंत्रित करने का प्रयास करते हैं, तो बच्चे सहयोग नहीं करते. जब ये बच्चे इस तरह का व्यवहार करते हैं तो मातापिता की सोच बच्चे के प्रति और ज्यादा नकारात्मक हो जाती है. बच्चों को सही आदतें, व्यवहार सिखाने के लिए मातापिता उन को बुराभला कहते हैं. पर फिर भी इन के व्यवहार में सुधार नहीं होता बल्कि उन का व्यवहार और ज्यादा उग्र हो जाता है.

युवाओं और मातापिता के संबंध जब इस तरह के हो जाते हों, तो अनुशासन नहीं रह पाता और मातापिता गुस्से में आगबबूला हो कर सजा देते हैं या कभीकभी अनदेखा कर मनमानी करने देते हैं.

रोगग्रसित बच्चे स्कूल में अध्यापक, साथियों के साथ भी इस तरह का व्यवहार करते हैं जिस के कारण इन को उन का गुस्सा, तिरस्कार, भर्त्सना सहनी पड़ती है. ये उन से बहस करते हैं, उन पर दोषारोपण करते हैं, झगड़ा भी कर सकते हैं.

भर्त्सना, तिरस्कार इत्यादि के कारण इन में हीनभावना पनप सकती है. ये खुद तथा दूसरों के लिए समस्याएं पैदा करते रहते हैं.

क्या है समाधान

यदि आशंका है कि युवा उपेक्षा रोग यानी ओडीडी ग्रस्त है तो लापरवाही न करें, मनोरोग चिकित्सक से परामर्श लें. वह विश्लेषण कर व्यवहार के मूल कारण जानने का प्रयास करेगा. रोग की पुष्टि होने पर चिकित्सक स्थिति के अनुसार उपचार विधि निर्धारण करता है.

मातापिता को बच्चों के साथ सही व्यवहार का प्रशिक्षण दिया जाता है. उन को बताया जाता है कि इन के व्यवहार पर वे कैसे प्रतिक्रिया करें. साथ ही, वे युवाओं के साथ संपर्क बनाए रखने के कैसे प्रयास करें.

इन युवाओं को मनोचिकित्सक द्वारा सिखाया जाता है कि वे कैसे अपने गुस्से को काबू करें ताकि इन का अवज्ञाकारी व्यवहार बदले. इन को समस्याओं को हल करने के सुझाव दिए जाते हैं.

मातापिता को इन युवाओं के सही व्यवहार की प्रशंसा करनी चाहिए, पुरस्कृत करना चाहिए जबकि गलत व्यवहार करने पर उन के लिए निर्धारित दंड देने का पालन करना चाहिए. पर इन को मारना, गाली देना उचित नहीं होता.

संज्ञान व्यावहारिक चिकित्सा द्वारा इन को खुद पर नियंत्रण करने, सही व्यवहार करने के लाभ बताए जाते हैं. इन को समाज में व्यवहार करने की निपुणता भी सिखाई जाती है.

कभीकभी मनोचिकित्सक इन को अवसाद प्रतिरोधी, तनाव प्रतिरोधी दवाओं के सेवन का भी परामर्श देते हैं.

ओडीडी सामान्य समस्या है. यदि बच्चे या युवा इस से ग्रसित हैं तो ये घर, स्कूल एवं अन्य स्थानों पर परेशानी पैदा कर सकते हैं, इन का विकास प्रभावित होता है. इन का उपचार संभव है. उपचार न करने पर करीब 50 प्रतिशत में यही व्यवहार वयस्क होने पर भी रहता है. इन में से करीब आधे और ज्यादा गंभीर मनोरोग कंडक्ट डिसऔर्डर से ग्रसित हो सकते हैं.

टिकटों का वैज्ञानिक विश्लेषण

गुजरात के नतीजों से उत्साहित कांग्रेस अब वैज्ञानिक विश्लेषण कर उम्मीदवारों को टिकट बांटेगी, यह खबर ही अपनेआप में अवैज्ञानिक लगती है. वजह, टिकट बंटवारे का एक बड़ा आधार जाति हुआ करती है जिस के तहत किसी भी विधानसभा क्षेत्र में खास जाति के वोटों की तादाद देख उसी जाति के मुखिया को टिकट थमा दिया जाता है.

राहुल गांधी की ताजपोशी के बाद कांग्रेस अब राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में इस टोटके को वैज्ञानिक विश्लेषण नाम देने की बात कर रही है. इस नई कथित वैज्ञानिक पद्धति के आविष्कारक राजस्थान कांगे्रस के आविष्कारक सचिन पायलट हैं जो भाजपा से दो कदम आगे चल कर अभी से टिकट बांटने की बात कर रहे हैं. इस वैज्ञानिक पद्धति और विश्लेषण के विवरण का अभी उन्होंने खुलासा नहीं किया है, लेकिन कांग्रेसी प्रयोगशाला में अब नएनए प्रयोग होने स्वाभाविक हैं क्योंकि सवाल वजूद का जो ठहरा.

प्रेम का तीसरा कोण

दिल्ली के रहने वाले साहिल और नीरज दोस्तों के साथ गरमियों की छुट्टियां बिताने 22 मई, 2017 को मनाली गए थे. उन्हें पता था कि गरमियों में वहां घूमने वालों की तादाद बढ़ जाती है, इसलिए उन्होंने होटल में कमरे पहले ही बुक करवा लिए थे. पहले दिन होटल में आराम करने के बाद अगले दिन सभी पहाड़ों की ओर घूमने निकल गए.

मैदानी इलाके में भीषड़ गरमी होने के बावजूद कुल्लू मनाली का मौसम सुहाना था. दोपहर लगभग 12 बजे तक कुदरती नजारों के फोटो और सेल्फी लेते हुए नीरज ग्रुप के साथ फालीनाला की ओर निकल गया. उसी तरफ पर्वतीय झाड़ियों से आए दुर्गंध के एक झोंके ने उन सब को कुछ सोचने पर मजबूर कर दिया.

जिधर से दुर्गंध आ रही थी, सभी दोस्त उसी ओर बढ़े. उन्हें वहां झाड़ियों में एक युवक की लाश दिखाई दी. उन्होंने शोर मचाया तो उधर से गुजरने वाले सैलानी उन के पास पहुंच गए. सभी लाश पहचानने की कोशिश करने लगे. उसी बीच किसी ने पुलिस को फोन कर दिया.

सूचना पा कर थाना मनाली पुलिस वहां पहुंच गई. थोड़ी देर बाद डीएसपी पुनीत रघु भी घटनास्थल पर पहुंच गए. मृतक की उम्र 30-35 साल रही होगी. उस के शरीर पर जींस और प्रिंटेड शर्ट थी. शरीर पर कहीं चोट का कोई निशान नजर नहीं आ रहा था, वहां संघर्ष का भी कोई निशान नहीं था. बस, जहां लाश पड़ी थी, उस के पास 3-4 लोगों के पैरों के घिसटने जैसे निशान थे.

मृतक की जेबों की तलाशी लेने पर जेब से कोई ऐसी चीज नहीं मिली, जिस से उस की शिनाख्त हो सकती. उस बीच एसपी पदम चंदर भी आ गए थे. मौकामुआयना करने के बाद उन्होंने मामले की जांच डीएसपी पुनीत रघु को सौंप दी थी. घटनास्थल की काररवाई पूरी कर के पुलिस ने लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया था. इस के बाद थाने आ कर अज्ञात के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी.

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हत्यारों का पता लगाने से पहले मृतक की शिनाख्त जरूरी थी. लिहाजा पुलिस यह पता लगाने में जुट गई कि मृतक कौन और कहां का रहने वाला था, पुलिस ने मृतक का फोटो सभी स्थानीय अखबारों में छपवा कर शिनाख्त की अपील की. इस का नतीजा यह निकला कि अगले दिन राजीव सिंह और दुर्गादत्त ने थाने आ कर बताया कि अखबार में लाश का जो फोटो छपा है, वह उन की कंपनी के कुक बिंदु सिंह का लगता है.

थानाप्रभारी ने लाश के फोटो और कपड़े उन दोनों को दिखाए तो उन्होंने कपड़े देखते ही कहा कि ये कपड़े तो बिंदु सिंह के ही हैं. इस के बाद थानाप्रभारी ने उन से पूछताछ की तो उन्होंने बताया कि वे एडी हाइड्रो प्रोजैक्ट साइंस-2011 में काम करते हैं. बिंदु सिंह भी उसी प्रोजैक्ट में बतौर कुक काम करता था. वह चक जिले के गांव तोपरा कुठेर का रहने वाला था.

कंपनी की तरफ से उसे प्रोजैक्ट के गेस्टहाउस में रहने के लिए क्वार्टर मिला था. ड्यूटी खत्म होने के बाद वह क्वार्टर पर चला जाता था. लेकिन 22 मई, 2017 की शाम के बाद उसे किसी ने नहीं देखा. रात को वह क्वार्टर पर भी सोने नहीं गया था. प्रोजैक्ट अधिकारियों ने उस की तलाश कराई. वे भी उस की तलाश कर रहे थे.

राजीव और दुर्गादत्त से बातचीत के बाद पुलिस ने कंपनी से बिंदु का पता ले कर उस के घर सूचना भिजवा दी. घर वालों ने भी पोस्टमार्टम हाउस पहुंच कर बिंदु की लाश की शिनाख्त कर दी. पोस्टमार्टम के बाद लाश घर वालों को सौंप दी गई. इस के बाद डीएसपी ने एडी हाइड्रो प्रोजैक्ट पहुंच कर मृतक के बारे में पूछताछ की. वहां से पता चला कि उस की किसी से दुश्मनी नहीं थी. हां, वह खानेपीने का शौकीन जरूर था.

सहकर्मियों ने बताया कि बिंदु जब अपने क्वार्टर पर नहीं मिला तो उन्होंने कई बार उस के मोबाइल पर संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन वह बंद मिला. इस से पुलिस को पता चला कि बिंदु के पास मोबाइल फोन था. अगर उस के पास मोबाइल फोन था तो वह कहां गया? थानाप्रभारी एक बार फिर घटनास्थल पर जा पहुंचे. उन्होंने बारीकी से छानबीन की तो उन्हें झाडि़यों के पास से एक मोबाइल फोन मिला. उन्होंने थाने लौट कर फोन का काल लौग देखा तो पता चला कि एक नंबर से बिंदु को लगातार कई फोन किए गए थे.

जांच में वह नंबर मीना नाम की युवती का पाया गया. मीना के बारे में पता लगवाया तो जानकारी मिली कि वह एक विधवा और चरित्रहीन औरत थी. उस के कई लोगों से नाजायज संबंध थे. मृतक के सहकर्मियों ने बताया कि बिंदु का मीना के साथ उठनाबैठना था. पुलिस मीना को थाने ले आई. डीएसपी पुनीत रघु की मौजूदगी में उस से पूछताछ शुरू हुई.

पहले तो मीना ने बिंदु को पहचानने से ही इनकार कर दिया था, लेकिन जब उस पर सख्ती की गई तो उस ने बिंदु की हत्या का अपराध स्वीकार कर लिया. उस ने बताया कि यह काम उस ने अपने 2 अन्य प्रेमियों की मदद से किया था.

मीना की निशानदेही पर तिब्बती कालोनी के पास से देविंदर शर्मा और जीतराम को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया. तीनों को अदालत में पेश कर के एक दिन के पुलिस रिमांड पर लिया गया. रिमांड के दौरान तीनों से पूछताछ की तो बिंदु की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह प्रेम त्रिकोण पर आधारित नाजायज संबंधों का पुलिंदा थी—

मीना हिमालय की गोद में बसे क्षेत्र मनाली के गांव शारू की रहने वाली थी. वह सुंदरता की मूरत थी. सैलानियों की सैरगाह होने के कारण पर्यटकों को देख कर बचपन से ही उस के मन में महत्त्वाकांक्षा ने अपने पांव पसारने शुरू कर दिए थे. वह यही सपने देखती थी कि उस के पास भी कोठी, लंबी कार, नौकरचाकर हों.

जब वह जवान हुई तो स्थानीय लोगों के अलावा सैलानी भी उस के सौंदर्य के दीवाने हो उठे थे. वे भी उसे सपने दिखाते थे. वह भी सपने देखती चली गई. वह सपने तो देखती, पर सपनों की ताबीर उसे कहीं दिखाई नहीं देती थी. वह आसमान की ऊंचाइयों को छूना चाहती थी पर उस के परिवार की ऐसी स्थिति नहीं थी कि उस की महत्त्वाकांक्षाएं पूरी होती.

उस के पिता मेहनतमजदूरी कर के किसी तरह घर का खर्च चलाते थे. यहां तक कि मां भी मजदूरी करती थी. एक दिन उसे अपने इस छोटे संसार में प्रेम नाम का युवक मिल गया, जिस ने वादा किया कि वह उस के सपनों को साकार करेगा. मीना ने उस के ऊपर विश्वास कर लिया और अपना घर छोड़ कर उस के साथ चली आई.

प्रेम के घर वालों ने जब मीना को नहीं स्वीकारा तो उस ने अपने परिवार से विद्रोह कर सन 2008 में मीना से मंदिर में शादी कर ली और अपने गांव बंजार में अलग मकान किराए पर ले कर रहने लगा. मीना ने सोचा था कि शायद अब उस के सपनों को ताबीर मिलेगी, पर यह उस की कल्पना थी. शादी के कुछ समय बाद ही प्रेम की अकाल मौत हो गई. उस के बाद मीना मायके लौट आई.

मायके लौट कर कुछ दिन वैधव्य गुजारने के बाद मीना के सपनों और महत्त्वाकांक्षाओं ने फिर अंगड़ाई ली. पर इस बार उस ने अपने सपनों को बेकाबू नहीं होने दिया. जीवन में अब तक के मिले अनुभव से वह यह बात अच्छी तरह समझ गई थी कि वही सपने देखने चाहिए, जो पूरे हो सकें.

उसी दौरान उस की मुलाकात बिंदु सिंह से हुई. बिंदु चंबा के तोपरा कुठेर का रहने वाला था और मनाली स्थित साइंस-2011 के अंतर्गत चलने वाले एडी प्रोजैक्ट में बतौर कुक का काम करता था. उम्र में भले ही वह उस से बड़ा था, पर दिलोजान से उस की सुंदरता और अदाओं पर फिदा था.

दोनों के बीच प्रेमसंबंध स्थापित हो गए. वह मीना से शादी करना चाहता था, पर मीना अब किसी एक की बन कर नहीं रहना चाहती थी. उस ने बिंदु के साथ शादी का वादा तो किया, पर मन से वह इस के लिए तैयार नहीं थी. वह तो बस उस के साथ मौजमस्ती कर अपना समय गुजारना चाहती थी.

उसी बीच मीना की मुलाकात देविंदर शर्मा से हुई. वह पैसे वाला था और मीना का दीवाना था. उस से भी मीना के नाजायज संबंध बन गए. मीना उस के साथ भी ऐश करने लगी. वह मीना को महंगे उपहार खरीद कर देता. 2 युवकों से संबंध होने के बावजूद मीना ने अन्य युवकों से भी संबंध बना लिए. मजे की बात यह थी कि कई युवकों से संबंध होने की भनक उस ने अपने किसी प्रेमी को नहीं लगने दी.

उस का हर प्रेमी यही समझता था कि वह केवल उसी की है. पर मीना की यह चालाकी ज्यादा दिनों तक नहीं चल सकी. एक दिन बिंदु सिंह को जब इस बात का पता चला तो उस के दिल को गहरा सदमा लगा. उस ने मीना से इस बारे में बात की तो उस ने हंसते हुए कहा, ‘‘तुम भी किस गुजरे जमाने की बात करते हो बिंदु, आजकल की दुनिया कुछ और है. तुम ने जो सुना है, वह सच है पर हकीकत यह है कि वे सब केवल मेरे दोस्त हैं और कुछ नहीं. मैं उन के साथ घूमतीफिरती हूं, ऐश करती हूं, बस और कुछ नहीं करती.’’

‘‘लेकिन किसी दूसरे युवक से तुम्हारी यह दोस्ती मुझे पसंद नहीं है.’’ बिंदु ने कहा.

‘‘क्यों? मैं तुम्हारी बीवी या गुलाम हूं, जो तुम्हारे इशारों पर नाचूंगी?’’ मीना ने तपाक से कहा.

मीना की बात सुन कर बिंदु अवाक रह गया. लेकिन उस समय उस ने चुप रहने में अपनी भलाई समझी. अगले दिन से ही वह मीना पर शादी के लिए दबाव बनाने लगा. दूसरी ओर देविंदर शर्मा भी कई दिनों से उस पर शादी के लिए दबाव डाल रहा था.

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मीना असमंजस में फंस चुकी थी. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि वह इन बातों से अपना पीछा कैसे छुड़ाए. कुछ दिनों तक तो वह दोनों को कोई न कोई बहाना बना कर टालती रही. आखिर ऐसा वह कब तक चलता. बिंदु को शक ही नहीं, पूरा विश्वास था कि मीना उसे उल्लू बना रही है.

एक दिन उस ने मीना की बांह पकड़ कर गुस्से में पूछा, ‘‘मीना, सचसच बताओ, तुम मुझ से शादी करोगी या नहीं? अब यह बहानेबाजी मुझे पसंद नहीं.’’

‘‘मैं अभी शादी नहीं करना चाहती.’’ मीना ने दोटूक कहा.

‘‘अभी करना नहीं चाहती या मुझ से करनी ही नहीं है?’’ बिंदु ने पूछा.

‘‘तुम जो भी समझो.’’ मीना ने बिंदु को टका सा जवाब दे कर चुप कराना चाहा, पर बिंदु भी उस दिन शायद कुछ और ही तय कर के आया था.

शादी की तारीख पक्की करने को ले कर दोनों में तीखी झड़प हो गई. अंत में बिंदु ने उसे धमकाते हुए कहा, ‘‘ठीक है, तुम जितना चाहो, झूठ बोलो और बहाने बनाओ, लेकिन मैं सच कह रहा हूं कि अगर एक सप्ताह में तुम ने मेरे साथ शादी नहीं की तो मैं तुम्हारी सभी वीडियो पूरे मनाली को दिखा दूंगा, तब पता चलेगा कि तुम कितनी सतीसावित्री हो.’’

बिंदु के मुंह से धमकी भरे ये शब्द सुन कर मीना भीतर तक कांप उठी. यह बात 15-16 मई के आसपास की है. अब मीना को बिंदु से डर लगने लगा था, क्योंकि उस ने उसे खूब महंगे गिफ्ट खरीदवाए थे. मीना किसी एक खूंटे से बंध कर नहीं रहना चाहती थी. वह हर हालत में बिंदु से छुटकारा पाना चाहती थी.

इस मुसीबत से पीछा छुड़ाने का उसे एक ही उपाय दिखाई दिया कि उसे रास्ते से हटवा दिया जाए. उसी शाम मीना ने देविंदर शर्मा से मिल कर बताया कि बिंदु उन के प्यार का दुश्मन बन गया है. वह कहता है कि अगर उस ने उस से शादी नहीं की तो वह उस की हत्या कर देगा.

यह सुन कर देविंदर शर्मा तैश में आ गया. उस ने गुस्से में कहा, ‘‘उस के बाप का राज है. मेरे पास आ कर तो देखे. तुम ने उसे क्या जवाब दिया?’’

देविंदर के इस सवाल पर मीना ने अपना तीर चलाते हुए कहा, ‘‘मैं क्या कहती, मैं तुम्हारी हत्या होते थोड़े ही देख सकती हूं. इसलिए मैं ने कह दिया कि मैं उस से शादी करने को तैयार हूं, पर वह देविंदर को कुछ न कहे.’’

‘‘तुम पागल तो नहीं हो गई हो, जो बेवजह उस की गीदड़भभकी से डर गई. मैं नहीं डरने वाला उस से और तुम्हें उस के साथ शादी करने की कोई जरूरत नहीं है…समझी.’’ देविंदर ने कहा.

‘‘तो फिर मैं क्या करूं? जब तक बिंदु जिंदा है, वह कभी मेरी शादी तुम्हारे साथ नहीं होने देगा.’’ मीना ने आंसू टपकाते हुए कहा.

मीना को रोता देख कर देविंदर का खून खौल उठा. उस ने कहा, ‘‘उस की ऐसी की तैसी. इस के पहले कि वह मुझे खत्म करे, मैं ही उस का काम तमाम कर यह झंझट खत्म कर दूंगा. पर पहले तुम यह बताओ कि तुम मुझ से शादी करोगी या नहीं?’’

‘‘मैं तो हमेशा से ही तुम्हारी हूं देविंदर.’’

‘‘तो फिर ठीक है.’’ देविंदर ने कहा.

बस उसी दिन से बिंदु की हत्या का तानाबाना बुना जाने लगा. इस काम के लिए देविंदर ने अपने एक दोस्त जीतराम को कुछ पैसों का लालच दे कर तैयार कर लिया. जीतराम मीना को भी जानता था. पैसों के अलावा उसे मीना के शरीर का भी लालच था.

अपनी योजना के अनुसार, 22 मई, 2017 की शाम 7 बजे मीना ने बिंदु को फोन कर के शादी की बात करने के बहाने फालीनाला के पास बुला लिया. देविंदर और उस का दोस्त जीतराम वहां एक झाड़ी की ओट में पहले ही आ कर छिप कर बैठ गए थे.

बिंदु जैसे ही फालीनाला पहुंचा, वहां पहले से मौजूद मीना उसे अपनी बातों में उलझा कर उस जगह ले गई, जहां देविंदर और जीतराम छिपे बैठे थे. इस बीच शादी की बात को ले कर मीना बिंदु से उलझने लगी. बिंदु का सारा ध्यान मीना की बातों पर था. उसी समय देविंदर और जीतराम ने उसे पीछे से दबोच लिया. बिंदु ने खुद को उन के चंगुल से छुड़ाने की कोशिश की, पर असफल रहा.

उसी बीच मीना ने अपने गले से दुपट्टा निकाल कर बिंदु के गले में डाल कर कहा, ‘‘लो देविंदर, कर दो इस की शादी. यह शादी के लिए मरा जा रहा है.’’

तभी सब ने पोजीशन बदल कर अपनाअपना मोर्चा संभाल लिया. मीना ने आगे से बिंदु के हाथ पकड़ लिए. जीतराम ने पीछे से पकड़ लिया तो देविंदर ने बिंदु के गले में पड़ा मीना का दुपट्टा पूरी ताकत से कस दिया. थोड़ी देर में उस की सांसें रुक गईं. इस के बाद वे बिंदु की लाश को वहीं छोड़ कर चले गए.

रिमांड अवधि खत्म होने पर पुलिस ने तीनों को पुन: मनाली की सक्षम अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जिला जेल भेज दिया गया.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

बगावत एक अफसर की

जनाब, आजकल हमारा मूड बड़ा उखड़ाउखड़ा रहता है. अब माना कि हमारी जरा सी तोंद निकल आई है या जरा पान के शौक में दीवार पर भूल से थूक ही दिया हो, तब भी किसी को क्या हक कि हमें पिछड़ा, 19वीं सदी का सरकारी बाबू कह कर हमारी तौहीन कर दे. खामखां हमारी इमेज तोंदवाले, मुच्छड़, पान से रंगे दांतों वाले, घड़ीघड़ी दांत खुरचते, खींसें निपोर कर हर काम में दांत से जीभ काटते किसी ढपोरशंखी सी बना दी गई है. भई, यह तो सरासर गलतबयानी है.

अब हम अपने कामों या नाकामियों में काफी मौडर्न हो गए हैं, अपनी फितरत हम ने बड़ी स्मार्ट बना ली है और ढर्रों में भी हम ने मौडर्न जान फूंक दी है. अब अमेरिका वाले डोनाल्ड ट्रंप को ही ले लीजिए, कुएं के अंदर का ट्रंप सूटबूट में कितना रोबीला गबरू जवान लगता है. देख कर कौन कहे कि साहब, जाति, प्रजाति व धर्म को ले कर जनाब इतने कूपमंडूक होंगे. उन्हें सिर्फ गोरे नजर आते हैं. भूरे, पीले, काले, दाढ़ी वाले, टोपी वाले दुश्मन हैं उन के लिए. फिर भी क्या अदा है, क्या रुतबा है, क्या स्टाइल है. स्टाइल और अदा के जलवे ने उन की ढपोरशंखी चुल्लूवाली मानसिकता को कैसा नायाब हीरो वाला ट्रंप सूट पहना कर खड़ा कर दिया है कि दुनिया को अच्छाखासा कंफ्यूजन हो रहा है कि महारथी की फितरत का विरोध करें या इंतजार ही कर लें कि और किनकिन बेहतरीन तरीकों से वे पिछड़ेपन को पेश कर सकते हैं.

भई, वे ठहरे अमेरिका वाले ट्रंप, तो हम ठहरे भारत सरकार के सरकारी अफसर मुलाजिम, क्या हम कम हैं. सरकार यों ही इतना हमें नहीं देती. गाड़ी देती है, बंगला देती है, अर्दलीचपरासी देती है. और तो और, काम लेने को तरहतरह के नियमों के चाबुक भी देती है.

अब यह तो कोई बात नहीं हुई कि इतना ठाटबाट पा कर भी हम जरा अपने कौलर में ठसक न रखें. फिर अब यह न पूछ बैठना कि कोई कितनी पढ़ाई कर के सरकारी अफसर बने या कौन कितना खिलापिला कर रिश्तोंनातों की सुरंग से अंदर घुस आए-बराबरी की बात है. कोई कैसे भी घुसा, जब सिंहासन मिल गया तो योग्यता क्या माने रखेगी? सब बराबर. समान अधिकार. हां, गलती से भी अब कर्तव्य की बात न छेड़ना, मिस्टर. हम कोई कम नहीं हैं काम करने में या कहिए कि करवाने में. काम लेने का हुनर न होता तो इतना बड़ा सिस्टम चलता कैसे. खुद ही देख लो, किस जमाने से इतना बड़ा सिस्टम इतना सिस्टमैटिक चल रहा है. सरकारें बदल जाती हैं मगर सिस्टम के अंदर की दीमक ठीक अपने सिस्टम से उसी तरह काम पे लगी हैं.

लोग कहते हैं काम नहीं होता? कैसे काम नहीं होता. अगर हम अफसर हैं तो पूछो जरा ड्राइवर से- नहीं जाता वह बीवी की शौपिंग से ले कर बच्चे के स्कूल तक. पूछो अर्दली से-हुक्म की तामील न हो तो उस की क्या लानतमलामत होती है. चाय दे, पानी दे, ये ला, वो ला, दुकान जा, बैंक जा, दौड़दौड़दौड़, क्या दौड़ लगवाता हूं. पूछो जरा चपरासी से, घर पर क्याक्या नहीं करता. घास छीलने से ले कर जूते पौलिश तक सबकुछ. हम तो क्या, हमारी बीवी और उस के रिश्तेदारों तक के हुक्म बजाने में वह उस्ताद हो गया है और वह भी हमारे दिए स्मार्टफोन के स्मार्ट तरीकों के सहारे. क्यों, कह लो हमें पिछड़ा, नकारा. हो गई न गुम सिट्टीपिट्टी.

अफसर ही क्यों, अगर हुए हमारे फाइलों वाले बाबू, तो जनाब अब भूल जाओ. पुरानी फाइलों वाले बाबू अब कहां. अब हम कागज की फाइल नहीं टरकाते साहब, अब तो कंप्यूटर पर फोल्डर और फाइल खिसकाते हैं. खींसें निपोर कर हाथ नहीं बढ़ाते. काम करवाना है तो दे दो चवन्नी.

अब हम इतने स्मार्ट तो हो ही गए हैं कि आप की स्मार्टनैस का हम बखूबी अंदाजा लगा सकें. काम करवाने के बहाने पैसे दिए नहीं, कि सेटिंग ले कर हाजिर. ये नैट बैंकिंग और स्मार्टफोन किस दिन काम आएंगे. गहरे पानी में उतरने की कला के हम फनकार हुए हैं वर्षों की साधना के बाद. यों ही न समझना हमें. मोबाइल में उंगली चलाई कि सुदामा समझ गया कि मौडर्न किशन है. आंखों का पानी उतार कर पैर नहीं, इज्जत धो देगा, हे…हे! अपना यह तरीका भी अब रहा नहीं कि ‘मोहन बाबू, इन की फाइल देख लीजिएगा’ कह कर आसामी को अगले टेबल तक सरकाएं और मोहन बाबू के हाथों की खुजली उन्हें जब तक अगली तारीख तक सरकाए, आसामी अपने गले चढ़ बैठे. अब तो उन की अर्जी को सीधे कंप्यूटर के फोल्डरों के तहखाने में डाल मंदमंद मुसकराते कह लो, ‘जी, जी, आप का केस प्रोसैस में डाल दिया है,’ हाथ मिलाया, भेदभरी निगाहें मिलाईं. अब घूमते रहो जब तक नैट ट्रांजैक्शन का फायदा हमें भी न मिल जाता. सारा लेनदेन तो कैशलैस करना जानते हैं. बीवी के भाई के अकाउंट में भी पैसा आता है और उस के भाई के भी. 5 प्रतिशत उस का 95 प्रतिशत हमारा.

और तो और, किसी डिपार्टमैंट में काम निकलवाना है, अपनी सैटिंग वहां भी मौडर्न तरीके से फिक्स रहती है. संबंधित विभाग में बैठे व्यक्ति की पूरी कुंडली निकलवाता हूं ठीक मंदिरों के तकनीकी जानकार पंडों की तरह. किस का कौन सा भाई किस के दामाद का कौन सा भतीजा है ताकि कब किस के खाला के भतीजे के चाचा का काम मैं ने या मेरे विभाग ने किया था, वह पता लगे. फिर इस बदौलत मैं उस से काम निकलवाने का हक बीपीएल कार्डधारक के हक की तरह अनायास ही पा सकूं. अब यह न सोचिएगा कि ये सब फलांफलां जगह पर चप्पल घिसते हुए फलांफलां आदमी से पूछपूछ कर मैं ने जानकारी जुटाई. नहीं जी, अब हम इतने पिछड़े नहीं रहे, अब तो हम मौडर्न तरीके से पिछड़ रहे हैं. सौ तरीके के ऐप्स डाउनलोड कर रखें हैं, हजार तरह के कौन्टैक्ट बना रखे हैं. काम से बचना हो, जवाब न देना हो, काम का झांसा दे कर फर्जीवाड़ा करना हो, सरकारी पैसे की हेराफेरी करनी हो.

भई, अब हमें पान की दुकान पर मुवक्किल को आते देख मुंह घुमा कर पीक थूकने के बहाने पहचान छिपा कर भागने की जरूरत नहीं पड़ती. सीधी उंगलियों से टेढ़ा काम हम आसानी से निबटा जाते हैं. मौडर्न तरीका, मौडर्न डिवाइस. नंबर ब्लौक, नौट सीन – हो गया काम तमाम. ढूंढ़ते रह जाओगे, समझे क्या….

खुलेपन में बुराई नहीं : अंजना सिंह

भोजपुरी फिल्मों की खास बात यह है कि इन में छोटे शहरों की लड़कियों के लिए भी दरवाजे खुले हुए हैं. यही वजह है कि उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले की रहने वाली अंजना सिंह आज भोजपुरी फिल्मों की सब से महंगी हीरोइनों में से एक हैं. अंजना सिंह पिछले 5 साल में 50 से ज्यादा फिल्में कर चुकी हैं. उन्हें भोजपुरी फिल्मों की हौट और सैक्सी हीरोइन माना जाता है. वे तकरीबन हर बड़े हीरो के साथ काम कर चुकी हैं.

फिल्म ‘जिगर’ की कामयाबी के बाद अंजना सिंह की एक और फिल्म ‘नागराज’ आने वाली है जिस में वे खूबसूरत सैक्सी नागिन का रोल अदा कर रही हैं. पेश हैं, अंजना सिंह के साथ हुई बातचीत के खास अंश :

आप का अब तक फिल्मों का सफर कैसा रहा है?

मैं ने फिल्मों में हर कामयाब स्टार के साथ काम किया है. सभी के साथ हिट फिल्में दी हैं. भोजपुरी फिल्मों ने मुझे बहुतकुछ दिया है. मैं फैशन की दुनिया से ऐक्टिंग में आई. यहां आ कर काम सीखा और कामयाबी हासिल की. मैं अब तक के अपने सफर से खुश हूं.

मैं ने दिनेशलाल के साथ फिल्म ‘जिगर’ की थी जो बहुत कामयाब रही थी. अब फिल्म ‘नागराज’ सिनेमाघरों में आने वाली है जिसे लोग जरूर पसंद करेंगे.

आप ने फिल्मों में आने का फैसला कैसे लिया था?.

मैं बहराइच के एक साधारण परिवार से हूं. 4 भाईबहनों में मैं दूसरे नंबर पर हूं. मेरा बचपन से ही हीरोइन बनने का सपना था. जब मैं 12वीं क्लास में थी उसी समय लखनऊ में ‘मिस यूपी शो’ हो रहा था. उस में हिस्सा लेने के लिए मुझे ‘मिस बहराइच’ का खिताब जीतना जरूरी था. मैं ने ‘मिस बहराइच’ का खिताब जीता और लखनऊ पहुंच गई. ‘मिस यूपी’ में मैं रनरअप रही थी. वहां से मुझे लगा था कि फैशन प्रतियोगिताओं के जरीए मैं हीरोइन बनने का अपना सपना पूरा कर सकती हूं. मैं मुंबई गई. वहां कुछ शो किए और फिर मुझे एक टैलीविजन सीरियल में काम करने का मौका मिला.

सीरियल में मेरा काम देख कर रविकिशन के साथ फिल्म ‘फौलाद’ मुझे मिली. इस के बाद मैं ने वापस मुड़ कर नहीं देखा. एक साल में सब से ज्यादा फिल्में साइन करने वाली हीरोइन के रूप में भी मुझे जाना जाता है.

भोजपुरी फिल्मों में आप को बोल्ड सीन करने के लिए ज्यादा जाना जाता है. इस की वजह?

मैं फिल्मों में अपने रोल के हिसाब से काम करती हूं. भोजपुरी फिल्मों में दर्शक थोड़े अलग होते हैं. उन में से ज्यादातर गांवदेहात के मजदूरकिसान ही होते हैं. वे मनोरंजन करने के लिए हमारी फिल्में देखते हैं. वे चाहते हैं कि उन के खरीदे गए टिकट का पूरा पैसा वसूल हो. ऐसे में भोजपुरी फिल्मों में उन की पसंद की कहानीऔर गाने रखे जाते हैं. मुझे लगता है कि फिल्म देखते समय हमारे गाने, डांस और ऐक्टिंग देख कर अगर दर्शक सीटी बजाने लगते हैं तो हम उन का मनोरंजन करने में कामयाब हो जाते हैं. दर्शक मुझे ज्यादा पसंद करते हैं, इसीलिए मुझे ज्यादा फिल्में मिली हैं.

भोजपुरी फिल्मों में खुलेपन की बहुत बुराई होती है. आप इसे कैसे देखती हैं?

भोजपुरी फिल्मों से ज्यादा खुलापन तो हिंदी फिल्मों में होता है. वहां काम करने वाले कलाकारों को अलग नजर से देखा जाता है, इसलिए उन की बुराई कम होती है. भोजपुरी फिल्मों का बड़ा दर्शक वर्ग गांवों में रहता है. गंवई बोली होने के चलते इन में कही गई हर बात लोगों को देहाती लगती है. हमारे समाज में छोटे आदमी की बुराई करने का रिवाज भी है पर मुझे भोजपुरी फिल्मों के खुलेपन में कोई बुराई नजर नहीं आती.

आप अपना खाली समय कैसे बिताती हैं?

मैं घुड़सवारी करना पसंद करती हूं. इस के अलावा ड्राइविंग, पढ़ना और घूमना मुझे अच्छा लगता है. मुझे अपने घर को सजाना पसंद है और डांस करने का भी शौक है. जब मैं फिल्मों में काम नहीं करती थी तब खूब स्टेज शो करती थी. मैं ने देशविदेश में बड़ेबड़े स्टेज शो और फैशन शो किए हैं.

मुझे लगता है कि हर लड़की को खुद पर यकीन होना चाहिए. लड़कियां जो भी काम करें मजबूत इरादे के साथ करें. समाज हमारे इसी यकीन की कद्र करता है.

श्रिया सरन ने की गुपचुप तरीके से शादी

अजय देवगन के साथ फिल्‍म ‘दृश्‍यम’ में काम कर चुकीं अभिनेत्री श्रिया सरन ने रशियन ब्‍वौयफ्रेंड संग गुपचुप शादी रचा ली है. खबरों के अनुसार, श्रिया और एंड्रे कोसचीव की शादी 12 मार्च को हुई. इस शादी में कुछ चुनिंदा कलाकार शामिल हुए थे. शादी की सभी रस्‍मों को सीक्रेट रखा गया था. शादी में अभिनेता मनोज वाजपेयी अपनी पत्‍नी के साथ पहुंचे थे.

एक रिपोर्ट के मुताबिक साउथ फिल्‍मों की मशहूर एक्‍ट्रेस श्रिया सरन ने मुंबई के लोखंडवाला में बने अपने अपार्टमेंट में शादी रचाई. खबरों के मुताबिक शादी हिंदू रीति-रिवाज से हुई. अभिनेत्री ने इस खास मौके पर पिंक कलर का आउटफिट पहना था.

श्रिया सरन के पति एंड्रे कोसचीव नेशनल लेवल के टेनिस प्‍लेयर और बिजनेसमैन हैं. बताया जा रहा है कि वेडिंग फंक्‍शन से एक दिन पहले प्रीवेडिंग पार्टी रखी गई थी. जिसमें सिर्फ करीबी रिश्‍तेदार और परिवारवाले शामिल हुए थे.

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पहले खबरें थी कि यह शादी उदयपुर में होगी, हालांकि श्रिया सरन ने इसे सिर्फ अफवाह करार दिया था. श्रिया ने अपनी निजी जिंदगी के बारे में कभी भी खुलकर बात नहीं की. फिलहाल फैंस अब एक्‍ट्रेस के औफिशियल बयान का इंतजार कर रहे हैं.

बता दें कि श्रिया ने साल 2001 में तेलुगू फिल्‍म ‘इष्‍टम’ से सिनेमा जगत में डेब्‍यू किया था. साल 2002 में आई फिल्‍म ‘संतोषम’ ने उनके करियर को एक नयी उड़ान दी. इसके बाद उन्‍होंने एक के बाद एक कई फिल्‍मों में काम किया. श्रिया ने बौलीवुड में फिल्‍म ‘तुझे मेरी कसम’ से डेब्‍यू किया था. इसके अलावा उन्‍होंने ‘आवारापन’, ‘मिशन इस्‍तानबुल’ और ‘दृश्‍यम’ जैसी फिल्‍में की.

इस अभिनेत्री के साथ रोमांस करेंगे अक्षय

बौलीवुड अभिनेता अक्षय कुमार ने बड़े पर्दे पर कौमेडी से लेकर गंभीर तक हर तरह के किरदार निभाए हैं और दर्शकों ने उन्हें हमेशा ही काफी पसंद किया है. अक्षय कुमार स्टारर हाउसफुल 4 की तैयारी धमाकेदार तरीके से शुरू हो चुकी है.

वहीं, एक्ट्रेस की बात करें तो इस बार निर्माता जैकलीन फर्नांडीज को बाहर का रास्ता दिखा सकते हैं. सूत्रों के अनुसार, फिल्म में जैकलीन नहीं.. बल्कि अक्षय कुमार के अपोजिट कृति सैनन दिखेंगी. जी हां, कृति सेनन इस फिल्म में अक्षय कुमार के साथ रोमांस करती हुई नजर आ सकती हैं. बता दें कि कृति सैनन पहली बार हाउसफुल फ्रैंचाइजी से जुड़ने वाली हैं. वहीं, पहली बार उन्हें किसी सीनियर सुपरस्टार के साथ काम करने का भी मौका मिलेगा.

अब तक इस फिल्म के लिए अक्षय कुमार, रितेश देशमुख और बौबी देओल के नाम के फाइनल होने की खबर है. खबरें तो ये भी हैं कि हाउसफुल 4 में अभिषेक के लिए रोल नहीं था. लेकिन फिल्म के निर्देशक साजिद खान और अक्षय कुमार की मांग पर जूनियर बच्चन को फिल्म में वापस लाया गया है.

रिपोर्ट्स की मानें तो इस बार इस फिल्म की कहानी पुनर्जन्म पर आधारित होगी. साजिद नाडियाडवाला ने कहा, पुनर्ज्नम पर बौलीवुड में काफी गंभीर फिल्में बन चुकी हैं, लिहाजा, मैंने सोचा कि इस पर क्यों ना कौमेडी बनाई जाए. हाउसफुल 4 पुनर्ज्नम की कहानी है. हाउसफुल 4 दो समय की कहानी है. एक वर्तमान.. और एक भूतकाल, जिसे बाहुबली युग जैसा दिखाया जाएगा. साजिद नाडियाडवाला ने कहा कि यह हमारे प्रोडक्शन की सबसे मंहगी फिल्म होगी. सभी के कौस्ट्यूम बिल्कुल बाहुबली स्टाइल में होंगे. कुछ ही महीनों में फिल्म की शूटिंग शुरू हो जाएगी.

रिपोर्ट्स की मानें तो बजट के हिसाब से यह हाउसफुल सीरिज की सबसे मंहगी फिल्म होगी. साथ ही यह बौलीवुड की सबसे मंहगी कौमेडी फिल्म भी होगी. हाउसफुल 4 की शूटिंग जून- जुलाई से शुरु कर दी जाएगी. देखना दिलचस्प होगा कि फिल्म में और दो कौन सी हीरोइने फाइनल होती हैं. बता दें, कृति ने अपने बौलीवुड करियर की शुरुआत साजिद नाडियाडवाला की फिल्म ‘हीरोपंती’ से की थी और अगर अब वह ‘हाउसफुल 4’ में नजर आती हैं तो यह उनकी साजिद नाडियाडवाला के साथ दूसरी फिल्म होगी.

गुड्स ऐंड सर्विसेस टैक्स यानी जीएसटी का कहर

गुड्स ऐंड सर्विसेस टैक्स यानी जीएसटी, राहुल गांधी के शब्दों में गब्बर सिंह टैक्स, असल में पंडों का कुंडली टैक्स है जो हर हिंदू को जन्म से ब्रेनवाशिंग द्वारा जकड़ लेता है. केंद्र सरकार बड़ेबड़े विज्ञापन दे रही है कि वन नेशन वन टैक्स के जरिए अभूतपूर्व प्रगति होगी. दरअसल, यह वैसा ही है जैसा पंडित कहते हैं कि कुंडली बनवाओ, ग्रहदोष ठीक कराओ और जीवनभर सुख पाओ.

सरकारी टैक्स और हिंदू टैक्स में समानताएं ही समानताएं हैं. लगता है वित्त मंत्रालय में कुंडली बनाने वालों की बरात बैठी है जिन के डीएनए में ही है कि हर मानव पापी है और केवल पाखंडी कर्मकांड कर के ही वह पापों का प्रायश्चित्त कर सकता है. यही नहीं, ये कर्मकांड उसे हर रोज, हर सप्ताह, हर माह, हर वर्ष करने ही होंगे और हर बार दान, दक्षिणा, आहुतियां और सब से बड़ी बात, समय देना ही होगा. जीएसटी में कुंडली में कुंडली है और ग्रहदोष पर ग्रहदोष.

जीएसटी ऐसा है जैसा अकसर हिंदी फिल्मों में दिखता है कि विवाह का शुभमुहूर्त निकला जा रहा है और वर व वधू का मंडप में होना अनिवार्य है. जीएसटी में इस तरह के प्रावधानों का अंबार है. ईवे बिल तो हर काम पंडित से पूछ कर करने वाली प्रक्रिया जैसा है जब तक कंप्यूटर पंडा हां न कहे आप बनाबनाया सामान कहीं भेज नहीं सकते.

जीएसटी के प्रवर्तक सारे देश में गौसेवकों की तरह फैलने वाले हैं. गौसेवकों के गले में भगवा दुपट्टा होता है और हाथों में डंडे, फरसे जबकि जीएसटी सेवकों के पास कंप्यूटर टैबलेट होंगे ताकि वे पता कर सकें कि सामान आवश्यक मुहूर्त में सभी विधिविधानों के बाद कंप्यूटर पंडा की अनुमति से ही निकला है या नहीं. हर गलती पर महापाप लगेगा जिस के दंड में अपना आखिरी लंगोट तक जीएसटी पुरोहितों को देना पड़ सकता है.

व्यापारियों को इस तरह के प्रपंचों की सदियों से आदत है. राजाओं ने डकैतों, दूतों और मुख्यतया शास्त्रधारी तिलक लगाए प्रतिनिधियों की नियुक्ति कर रखी थी जो हर सौदे में अपना हिस्सा रखते थे. हर व्यापारी तिजोरी पर ‘शुभलाभ’ लिखता है तो वह अपनी कर्मठता जताने के लिए नहीं, बल्कि यह जताने के लिए कि उस ने सारे विधिविधान पूरे किए हैं. अब वह जीएसटी नंबर उसी तरह लगाएगा.

टैक्स बुरा नहीं है पर यह तैमूरी या ईस्ट इंडिया कंपनी का सा न हो. जीएसटी आज हिंदू, मुगल व ब्रिटिश तीनों हुकूमतों का सम्मिलत कहर सा बन गया है.

इरफान खान ने ट्वीट कर दी अपनी बीमारी की जानकारी

इरफान खान ने अपनी बेहद दुलर्भ बीमारी का सोशल मीडिया पर खुलासा कर दिया है. राष्‍ट्रीय पुरस्‍कार विजेता इरफान खान न्‍यूरो एंडोक्राइन ट्यूमर (कैंसर) का शिकार हुए हैं. अपनी इसी बीमारी के इलाज के लिए इरफान विदेश रवाना हो चुके हैं. 5 मार्च को जैसे ही इरफान ने अपनी बीमारी का खुलासा किया, उनके फैन्‍स से लेकर बौलीवुड तक में हर कोई उनके लिए दुआएं मांगने लगा.

यह है न्‍यूरो एंडोक्राइन ट्यूमर

डौक्‍टरों द्वारा पुष्टि के बाद प्रकाशित जानकारी देने वाली वेबसाइट एसो कैंसर डौट नेट के अनुसार न्‍यूरो एंडोक्राइन ट्यूमर एक ऐसा कैंसर है जो शरीर के हार्मोन पैदा करने वाले हिस्‍सों में पनपता है. यह एक रेयर बीमारी है. न्‍यूरो एंडोक्राइन ट्यूमर शरीर के न्‍यूरो एंडोक्राइन सिस्‍टम में हार्मोन पैदा करने वाली कोशिकाओं में होता है.

जो हार्मोन पैदा करने वाली एंडोक्राइन कोशिकाओं और नर्व कोशिकाओं में होता है. न्‍यूरो एंडोक्राइन शरीर के फेफड़े, गेस्‍ट्रोइनटेस्‍टाइन ट्रैक यानी पेट और इनटेस्‍टाइन में होती हैं. न्‍यूरो एंडोक्राइन ट्यूमर कई प्रकार का होता है.

कुछ देर पहले ही इरफान ने अपनी बीमारी के बारे में ट्विटर पर बताते हुए लिखा, ‘अनिश्‍चितता हमें समझदार बनाती हैं, और मेरे पिछले कुछ दिन इसी बारे में रहे हैं. मैं समझ रहा था कि मुझे न्‍यूरो इनडोक्राइन ट्यूमर हुआ है. अभी तक यह जज्‍ब करना थोड़ा मुश्किल था लेकिन आप सब के प्‍यार ने मुझे हिम्‍मत दी है.

इसी सफर में देश से बाहर हूं मैं आप सभी से निवेदन करता हूं कि मेरे लिए दुआएं मांगते रहें. और जैसा की अफवाहें उड़ रही हैं, ‘न्‍यूरो’ का मतलब हमेशा मस्तिष्‍क नहीं होता और गूगल कर आप आसानी से इसे जान सकते हैं. जो लोग मुझसे कुछ सुनना चाह रहे थे, मैं उम्‍मीद करता हूं कि कुछ और कहानियों के साथ आपके पास लौटुंगा.’

30 से अधिक फिल्मों में कर चुके हैं काम

इरफान खान हिन्दी, अंग्रेजी फ़िल्मों, व टेलीविजन के एक अभिनेता हैं. उन्होने द वारियर, मकबूल, हासिल, द नेमसेक, रोग, पान सिंह तोमर, हिंदी मीडियम, करीब-करीब सिंगल जैसी फिल्मों मे अपने अभिनय का लोहा मनवाया. ‘हासिल’ फिल्म के लिए उन्हें वर्ष 2004 का फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ खलनायक पुरस्कार भी प्राप्त हुआ. वह बौलीबुड की 30 से ज्यादा फिल्मों मे अभिनय कर चुके हैं. इरफान ने टेलीवीजन की दुनिया में भारत एक खोज, सारा जहां हमारा, चंद्रकांता और श्रीकांत जैसे धारावाहिकों में भी काम किया है.

VIDEO : हेयरस्टाइल फौर कौलेज गोइंग गर्ल्स

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