उत्तर प्रदेश और बिहार में लोकसभा की 3 और विधानसभा की 2 सीटों के लिये हुये उपचुनाव में भाजपा को करारी मात मिली. उत्तर प्रदेश की 2 लोकसभा सीटों में गोरखपुर और फूलपुर से उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उपमुख्यमंत्री केशव मौर्य साल 2014 में सांसद बने थे. उस समय फूलपुर में केशव मौर्य को 52 फीसदी और योगी आदित्यनाथ को 51 फीसदी वोट मिले थे.
बिहार में अरहरिया लोकसभा सीट पर राष्ट्रीय लोकदल यानि आरजेडी के तस्लीमुददीन सांसद बने थे. बिहार की भभुवा और जहानाबाद में विधानसभा के उपचुनाव थे. जहानाबाद में मुद्रिका सिंह यादव आरजेडी से जीते थे और भभुवा से भाजपा के आनंद भूषण पांडेय चुनाव जीते थे. उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री और केशव मौर्य के उपमुख्यमंत्री बनने के बाद यहां उपचुनाव हुये. जबकि बिहार में तीनों सीटों से चुने गये प्रत्याशियों के न रहने से सीटे खाली हुई थी.
भाजपा के लिये उत्तर प्रदेश की गोरखपुर और फूलपुर सीट सबसे खास थी. गोरखपुर मुख्यमंत्री का क्षेत्र था. फूलपुर उपमुख्यमंत्री का क्षेत्र था. ऐसे में किसी को यह गुमान नहीं था कि भाजपा की यह हालत हो जायेगी. 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद 2017 के विधानसभा चुनाव में मिली जीत के बाद भाजपा की जीत पर किसी को कोई सुबहा नहीं रह गया था. 2017 में विधानसभा में मिली जीत के बाद भाजपा को करारी मात मिली. उत्तर प्रदेश में ही नहीं बिहार में भी भाजपा ने सरकार में शामिल होने के बाद खराब प्रदर्शन किया. उत्तर प्रदेश और बिहार के इन उपचुनावों के संकेत बड़े हैं. इनका असर मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, कर्नाटक के विधानसभा चुनाव पर पड़ेगा. उपचुनावों के नतीजों से साफ हो गया है कि ‘मोदी-योगी मैजिक’ अब अपनी चमक खो रहा है.
इसके लिये भाजपा की नीतियां, भाजपा नेताओं की हठधर्मिता, केवल धर्म का प्रचार जिम्मेदार है. 2014 के लोकसभा चुनावों में भाजपा ने विकास की बात कही थी. चुनाव जीतने के बाद भाजपा सरकार अपनी बात पर कायम न रह कर केवल धर्म को बेचने लगी. धर्म का सहारा लेकर केवल मंदिर, आश्रम, बाबा सरकार पर हावी होने लगे. उत्तर प्रदेश में तो योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री ही बना दिया. उनकी योग्यता धार्मिक चेहरा होना ही था. भाजपा दलित और पिछड़ों को साथ लेकर नहीं चल पाई. खासकर दलितों को लेकर जो माहौल बना, उसने दलित पिछड़ों को एकजुट होने पर विवश कर दिया. ऐसे में जब बसपा और सपा करीब आये, तो भाजपा के लिये मुश्किल हो गया.
हिन्दू रक्षा के नाम पर जिस तरह गुंडे तत्व सक्रिय हुये उससे प्रदेश की कानून व्यवस्था बिगड़ गई. लोगों ने कानून की परवाह करनी बंद कर दी. दीवार से लेकर हर तरफ भगवा रंग फैलने लगा. जिस विकास की बात करके 2014 का लोकसभा चुनाव जीता वह दरकिनार हो गया. देश में बेरोजगारी फैलने लगी. जीएसटी और नोटबंदी ने लोगों को भुखमरी के करीब ला खड़ा किया. इसका गुस्सा अब बाहर आने लगा है. भाजपा पार्टी में लोकतंत्र की जगह पर तानाशाही फैल गई, जिससे परेशान भाजपा के लोगों ने उपचुनाव में वोट डालने और डलवाने का काम नहीं किया. जिसकी वजह से मतदाता वोट के लिये नहीं गया और भाजपा को करारी हार का सामना करना पड़ा.
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21वींसदी को युवाओं की सदी माना जाता है. इन युवाओं में विशेषरूप से उस पीढ़ी की चर्चा होती है, जो 1980 से 1995 के बीच जन्मी है. यही पीढ़ी इस वक्त पढ़लिख कर अपनी काबिलीयत दिखाने के लिए भारत समेत पूरी दुनिया में आतुर है. इस पीढ़ी को वाई जैनरेशन या फिर सहस्राब्दि युवा (मिलेनियल्स) कह कर संबोधित किया जाता है. इन 20 से 35 वर्ष की उम्र के बीच करीब 35-36 करोड़ मिलेनियल्स के बल पर भारत खुद को एक युवा देश कहता है. दुनिया के दूसरे देशों में भी इन की यह कह कर चर्चा की जाती है कि अब दुनिया बनाने या बिगाड़ने की जिम्मेदारी इन्हीं मिलेनियल्स के कंधों पर है. पर जिम्मेदारी के जिस जिक्र के साथ इन सहस्राब्दि युवाओं की ओर देखा जाता है, उसे ले कर कई संदेह पूरी दुनिया समेत भारत में भी पसरे हुए हैं.
बदलती सोच के नए युवा
यह सिर्फ कहने की बात नहीं है कि आज जमाना बदल चुका है. अगर किसी युवक या किसी युवती से पूछा जाए कि कैसा चल रहा है, तो वे यही कहेंगे, मस्ती है, कोई टैंशन नहीं. चाहे उन की जिंदगी में पढ़ाई और कैरियर को ले कर काफी तनाव हो, पर उन की कोशिश होती है कि वे हमेशा अपना मुसकराता चेहरा सामने रखें. उन के मन में यह भरोसा बना हुआ है कि आज नहीं तो कल, उन्हें भी अपने टैलेंट को दिखाने का मौका मिलेगा और तब वे दिखा देंगे कि वे क्या हैं.
ऐसा वे साबित भी करते हैं. परिवार नई तकनीक से जुड़ी चीजों की लेटैस्ट जानकारी इन्हीं किशोरों या युवाओं के पास होती है बल्कि कहना चाहिए कि मोबाइल या स्मार्टफोन के नएनए फंक्शंस से ले कर ऐप्स के बारे में बड़े लोग इन्हीं से सीखते हैं.
फैशन हो या फिल्म, फेसबुक हो या ट्विटर, सोशल मीडिया के हर प्लेटफौर्म के बारे में सब से पहले इसी नई पीढ़ी को नई बातें पता चलती हैं. पर इस के बावजूद, आजकल के किशोरों व युवाओं को समझाने व सिखाने की जरूरत महसूस होती है.
ये हैं तोहमतें
जैसे कहा जाता है कि यह नई पीढ़ी बहुत जल्दबाज है. जितनी जल्दी पैसा कमाना, उतनी ही जल्दी पैसा उड़ाना, इस पीढ़ी की यह खास पहचान मानी जाती है. कोई भी काम करने के लिए नौजवान शौर्टकट तलाश करते हैं. इस पीढ़ी के मन में बड़ों के लिए सम्मान नहीं होता. कुछ तो ऐसे आरोप भी लगाते हैं कि मिलेनियल्स असल में खुद में मगन रहने वाले ऐसे युवाओं की भीड़ है जिसे देश और समाज के कायदों व रीतियों की कोई परवा नहीं होती.
इसी आधार पर दावा किया जाता है कि ये नौजवान न तो कैरियर को ले कर गंभीर हैं और न जिंदगी को ले कर. मांबाप इन के कैरियर के लिए दिनरात मेहनत करते हैं, अपना पैसा इन पर फूंकते हैं, फिल्म, स्पोर्ट्स और मोबाइल फोन जैसे इन के महंगे शौक पूरे करते हैं, पर इस के बदले ये अपने पेरैंट्स को क्या देते हैं?
इन बिंदुओं को ले कर सिर्फ भारत में ही नहीं, अमेरिका, ब्रिटेन जैसे विकसित देश भी चिंतित हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि अगर हमारी नई पीढ़ी इस तरह बेपरवाह रहेगी तो देश का भविष्य चौपट हो सकता है. इन्हीं वजहों से तकरीबन पूरी दुनिया में इस नई पीढ़ी को एक किस्म की नाउम्मीदी से देखा जाता रहा है. कहा जाता रहा है कि अगर इस पीढ़ी ने कैरियर के चुनाव, उस के स्थायित्व और समाज के प्रचलित कायदों को ले कर संजीदगी नहीं दिखाई, तो समाज और देश के बिखराव तक की नौबत आ सकती है.
इन बातों को ले कर पेरैंट्स परेशान रहते हैं. उन्हें लगता है कि आजकल बच्चों में वह समझदारी नहीं है, जिस के बल पर वे दुनिया का सामना कर पाएं और बड़ों की दिखाई राह पर संभलते हुए चलना सीख पाएं. 2015 में भारत समेत 12 देशों में कराए गए एक सर्वेक्षण ‘आईकी प्ले रिपोर्ट’ में ऐसी ही चिंताएं अभिभावकों ने अपने बच्चों के बारे में जताई थीं.
आईकी प्ले रिपोर्ट
पारिवारिक जीवन के कई पक्षों पर किए गए सर्वेक्षण में जो खुलासे हुए थे, उन से ऐसा लगा था कि भारतीय पेरैंट्स दुनिया के सब से दुखियारे मांबाप हैं, क्योंकि वे अपने बच्चों के लिए कुछ ज्यादा नहीं कर पा रहे हैं.
एक ओर बच्चे कहीं बाहर घूमनेखेलने जाने के बजाय स्मार्टफोन या टीवी से चिपके रहते हैं, तो दूसरी ओर मांबाप को यह चिंता सताती है कि वे अपने बच्चों को ज्यादा वक्त नहीं दे पाते हैं. इस रिपोर्ट से ये मुख्य बातें पता चली थीं, जो इस प्रकार हैं :
मौके हैं बेशुमार
अगर यह देखें कि सहस्राब्दि युवाओं के पास आज क्या है, तो इस मामले में पाएंगे कि उन्हें असल में किसी चीज की कमी नहीं है.
पिछली पीढि़यों के मुकाबले वाई जनरेशन कही जाने वाली इस पीढ़ी के पास पढ़ाई और कैरियर के ऐसे नए मौके हैं, जिन के बारे में पहले कभी सोचा तक नहीं गया था. जैसे, भारत के संदर्भ में देखें तो पिछले दोढाई दशकों में जिस आईटीबीपीओ सैक्टर में हमारे युवाओं ने कामयाबी के नए मोरचे खोले थे, अब हाल के वर्षों में औनलाइन बिजनैस के सहारे मिलेनियल्स ने सफलता की नई इबारत रची है.
जगने लगी है उम्मीद
हाल में कुछ ताजा सर्वेक्षण ऐसे आए हैं, जो इन धारणाओं को तोड़ते और वाई जैनरेशन कही जाने वाली इस पीढ़ी के प्रति नजरिया साफ करने की जरूरत महसूस कराते प्रतीत हो रहे हैं. जैसे, 25 देशों में 19 हजार कामकाजी सहस्राब्दि युवाओं के बीच 2016 के शुरुआती महीनों में कराए गए सर्वेक्षण में ह्यूमन रिसोर्स कंसल्टिंग फर्म मैन पावर ग्रुप ने पाया कि नौकरी के पारंपरिक तौरतरीकों को ले कर यह नौजवान पीढ़ी कतई जल्दबाज नहीं है. ये नौजवान नौकरी खोजते वक्त पैसे से ज्यादा तवज्जुह उस के स्थायित्व यानी जौब सिक्योरिटी को देते हैं. भारत के संदर्भ में इस सर्वेक्षण ‘मिलेनियल्स कैरियर्स 20:20 विजन’ का नतीजा यह है कि इन सहस्राब्दि युवाओं में से 39 फीसदी 65 साल से ज्यादा उम्र तक काम करना चाहते हैं. सर्वे में शामिल 25 फीसदी मिलेनियल्स तो 70 साल की उम्र के बाद भी काम करते रहने के इच्छुक हैं. इस तरह साबित हुआ है कि हरेक 10 में से 4 सहस्राब्दि युवा कैरियर की लंबी पारी खेलना चाहते हैं. इस से यह साबित हुआ है कि नए अवसरों की तलाश के साथसाथ यह नई पीढ़ी कुछ अरसा पहले टाइम मैगजीन द्वारा मैंमैं करने वाली पीढ़ी के रूप में संबोधित की गई यह पीढ़ी, धारणा के उलट समाज के प्रचलित कायदों पर ही अमल करना चाहती है.
मिलेनियल्स को ले कर अमेरिका में जो सर्वे आधारित अध्ययन हुआ है, वह तो इन के बारे में और भी चौंकाने वाली जानकारी दे रहा है. वहां ऐसा अध्ययन प्यू रिसर्च सैंटर द्वारा किया गया.
इस अध्ययन में सब से ज्यादा चौंकाने वाला संकेत यह है कि आधुनिक इतिहास में पहली बार यह सहस्राब्दि अमेरिकी युवा अपने मांबाप या रिश्तेदारों के पास उन के ही घर में रहने को ज्यादा तरजीह दे रहा है, बजाय हमउम्र लाइफपार्टनर के. यह बदलाव कितना उलटफेर भरा है. यह इस से समझा जा सकता है कि 60 के दशक (पिछली सदी) में इस उम्र (20-35) के महज 13 फीसदी युवा ही अपने अभिभावकों के पास रहने की समझदारी दिखाते थे, लेकिन अब ऐसे युवाओं की तादाद अमेरिका में 22 फीसदी है. इसी समयांतराल में कई और क्रांतिकारी तब्दीलियां प्यू रिसर्च में नजर आई हैं.
जैसे, अब शादी की उम्र बढ़ गई है. पहले जहां महिलाओं में औसतन 20 और पुरुषों में औसतन 22 वर्ष की उम्र में लोग शादी कर लेते थे, वहीं अब यह औसत महिलाओं में 27 और पुरुषों में 29 वर्ष है. इसी तरह कभी शादी न करने वालों की तादाद इस दौरान बढ़ी है. पहले जहां 10 में से 1 ही युवा ही शादी न करने का जोखिम लेता था, वहीं अब हर 5 में से 1 युवा ऐसा करने लगा है. शादी लंबे वक्त तक टालने के इस ट्रैंड के पीछे भी संकेत यही निकलता है कि युवाओं को लाइफपार्टनर से ज्यादा मांबाप और रिश्तेदारों का आकर्षण अपनी ओर खींचने लगा है. जो आधुनिकता के उलट एक रूढि़वादी या पारंपरिक युवा की छवि समाने रखता है.
यह सही है कि आज के किशोर या युवा नौकरी की मजबूरी में अपने घरपरिवार से दूर भले ही हो जाएं, पर मौका मिलते ही वे अपने मांबाप और बड़ेबुजुर्गों के साथ रहना चाहते हैं. युवतियां भी परिवार के साथ रहना चाहती हैं क्योंकि उन का मानना है कि हर सुखदुख में परिवार ही सब से बड़ी ताकत होता है. इस मामले में भारत पूरी दुनिया से थोड़ा अलग है. यहां शादी के बाद परिवारों का बिखराव आमतौर पर नौकरी की मजबूरी में होता है, अन्यथा लड़कियां अपने सासससुर और देवरननद के साथ रहना चाहती हैं.
असल में, आज का युवा भावुक होने के साथसाथ प्रैक्टिकल भी है, क्योंकि उसे मालूम है कि मांबाप से अलग अपना परिवार बसाना और घर चलाना आसाना नहीं है. इसीलिए वह मातापिता के साथ रहना चाहता है. जरूरत के वक्त उन की मदद लेना और देना चाहता है. यही नहीं, जो सपना मांबाप ने उन के लिए देखा था, अगर मांबाप किसी कारण से उसे पूरा नहीं कर पाए, तो उसे वह अपने दम पर पूरा करना चाहता है.
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यह नहीं मालूम कि उन का असली नाम ‘स्वामी’ था या ‘बोतलानंद’ या फिर दोनों ही थे. सच तो यह है कि उन में ‘बोतल’ जैसा खिंचाव था. जैसे शराबी किसी शराब की बोतल की ओर खिंचा चला आता है ठीक उसी तरह उन के भक्त भी अपना दिमाग अलमारी में बंद कर उन के पैरों में लमलेट हो जाया करते थे.
गजब का चमत्कार था उन में. हर समस्या का चुटकी बजाते इलाज, वह भी बहुत सस्ता, आसान और टिकाऊ. भक्त चाहें तो ‘तनमनधन’ से फीस अदा कर सकते थे. कोई दबाव, डर, धमकी कुछ भी तो नहीं था. सारा खेल श्रद्धा पर टिका था. हमें तो लगता है कि अगर कश्मीर, आतंकवाद या पाकिस्तान को सबक सिखाने जैसे मसले हों या घोर गरीबी, बेरोजगारी जैसे मुद्दे, स्वामी बोतलानंद महाराज के पास इन का भी कोई शर्तिया इलाज जरूर होगा.
सरकार को एक बार उन से जरूर इन मसलों पर सलाह लेनी चाहिए, यह हमारा सुझाव है. सस्ते में और मजेमजे में इतनी बड़ी समस्याओं का इलाज हो जाए तो इस में बुराई क्या है? यही तो हम सब चाहते भी हैं. खैर, अब मूल मुद्दे पर आते हैं कि स्वामीजी के नामकरण का आखिर राज क्या था? हर आम आदमी को यह नाम अटपटा लगेगा लेकिन यह पक्का है कि इस के मूल में कुछ न कुछ शुभ संकेत जरूर छिपा होगा.
जैसे कोई भी चमत्कारी बाबाओं की लीलाओं की थाह कभी नहीं पा सकता, ठीक वैसे ही स्वामी बोतलानंद महाराज को समझना आसान नहीं था. नाम हो या उन के कारनामे, सबकुछ किसी गहरे राज में लिपटी मुश्किल पहेली सा था. ऐसा लगता है कि स्वामी बोतलानंद महाराज नाम का सही मतलब सिर्फ और सिर्फ सच्चे भक्त ही समझ सकते हैं जो सिर्फ सुनते हैं, कभी सवाल नहीं करते.
हर चीज को तर्क की कसौटी पर कसना भी ठीक नहीं है. क्या तर्क से कभी किसी का भला हुआ है? उलटे लोग धर्मकर्म से कटते चले जाते हैं, श्रद्धा का नाश हो जाता है. स्वामी बोतलानंद महाराज का आश्रम कहो या कुटिया शहर से दूर सुनसान जगह पर बनी थी लेकिन सरकारी कृपा से वहां देशीविदेशी शराब के ठेके जरूर खुले हुए थे, इसलिए वह सुनसान जगह आबाद रहती थी.
इसे स्वामी बोतलानंद महाराज का कल्याणकारी काम माना जाए जो उन्होंने ऐसी सुनसान जगह को आबाद किया. पीने के शौकीन भक्तों के लिए तो यह सोने पर सुहागा जैसा है. पूरा पैकेज एक छत के नीचे. महाराज बोतलानंद स्वामी के दर पर कोई भेदभाव नहीं, कोई रोकटोक भी नहीं. कायदेकानून का वहां न कोई वजूद और न ही जरूरत.
अब आप को दिव्य स्वामी बोतलानंद महाराज के दर्शन भी करा देते हैं. उन की कुटिया में लेदे कर एक बिछौना नजर आता था. उसी पर महाराज कभी बैठे, कभी लेटे तो कभी आधी नींद की हालत में मिलते थे.
पूरी कुटिया बोतलों से अटी नजर आती थी. खालीभरी बोतलों के बीच महाराज झूमते हुए प्रवचन करते रहते थे. कुछ नासमझों को उन की यह अदा रोनापीटना लग सकती है लेकिन बंदर अदरक का स्वाद नहीं जानता इसलिए बंदरों की सोच पर हमें कुछ कहना भी नहीं है. धर्म और श्रद्धा की बात हो तो सवाल खड़े करना घोर पाप है. यहां जो है, जैसा है, बस मान लो. स्वामी बोतलानंद महाराज की कुटिया गरीबों और अमीरों से भरी रहती थी. भक्तों की ऐसी जबरदस्त भीड़ हर किसी के हिस्से में नहीं आती.
स्वामी बोतलानंद महाराज की एक खूबी यह भी थी कि वे कभी किसी भक्त को ‘न’ नहीं कहते थे. शायद ही उन के मुंह से कभी ऐसे शब्द निकले हों, ‘तुम्हारा काम नहीं होगा… यह सोच अच्छी नहीं है…’ जैसी जो भी इच्छा भक्त जाहिर करते महाराज तुरंत उन्हें आशीर्वाद दे देते.
अब सब से निराली खूबी देखिए. स्वामी बोतलानंद महाराज न संन्यासी का चोला धारण करते थे और न ही लंबे केश, जटाजूट. मतलब एक संन्यासी की इमेज से वे कोसों दूर थे. एक आम शराबी की तरह जो हर वक्त मदहोश रहता है. जिसे न तन का होश और न मन का. सबकुछ कुदरती रूप में देशी स्टाइल में चलता था.
यह बड़ी अच्छी बात है. फालतू के दिखावे, बाहरी आडंबर का क्या करना? जैसे हैं, उसी रूप को सच में दिखा दें, यह भी कम ईमानदारी नहीं है, वरना धर्म के कारोबार में मार्केटिंग इतनी हावी हो गई है कि हकीकत का पता पुलिस केस होने पर ही पता चलता है, इसलिए हम उन के इस रूप को दिल से नमस्कार करते हैं. उन्हें जमीन पर लेट कर प्रणाम करते हैं. सभी भक्तजन एक बार जोर से जयकारा लगाएं, ‘‘बाबा बोतलानंद महाराज की जय.’’
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खातेपीते खुशहाल घरों की सुंदर, स्लिम, स्मार्ट और पूरी दुनिया को ठेंगे पर रखने की कूवत वाली भरीपूरी स्त्रियां स्कूटर या कार चलाना सीखें, इस से अच्छी बात नहीं हो सकती. अपनी श्रीमती की 2 दर्जन से ऊपर कच्चीपक्की सुंदर, सलोनी और चुस्तचालाक सहेलियों को स्कूटर, कायनी और कार सिखाने का श्रेय इस महाबदौलत को जाता है. सब तरफ स्कूटर सीखने की धुन सवार थी और हम में भी अजीब सी सनक थी कि घरबाहर सबकुछ भुला कर चुलबुली व हसीन अप्सराओं को स्कूटर सिखाते रहो, बस.
हमारा तो सिद्धांत था कि न जाने किस भेस में मिल जाएं भगवान. एक लेडी अगर स्कूटर सीखने में दक्ष हो गई तो 2 दिन पहले ही किसी दूसरी जगह से संदेश आ जाता और हम अपना फटीचर सा स्कूटर उठा कर सुबहसुबह उधर लपक लेते. अंधे को और चाहिए भी क्या-2 आंखें. हुस्न का जादू हमारे चारों ओर बिखरा रहता और हमारी आंखें तृप्त रहतीं. जानकार लोग अच्छी तरह जानतेसमझते हैं कि स्कूटर सीखना और सिखाना बहुत मेहनत, लगन और सब्र के काम हैं. सीखने वाली अगर नादान, फक्कड़ और अल्हड़ स्त्री हो तो मामला और भी पेचीदा व जिम्मेदारीवाला हो जाता है.
जरा सी घबराहट, हड़बड़ी या जल्दबाजी सीखने वाली की टांगें या बाहें तुड़वा सकती है. बड़ी सावधानी से हर दिशा में कदम बढ़ाया जाता है. हम 1-2 हफ्ते तक सीखने वाली की तरफ मंदमंद मुसकराहट फेंकते हैं. उस की सुंदरता की तारीफ में ऊंचेऊंचे जुमले फेंकते हैं, जैसे परसों तुम्हारा पीकौक ब्लूसूट गजब ढा रहा था या तुम्हारी नाक पर छोटा सा डायमंड का कोका बहुत जंच रहा है. हैरानी तो हमें तब होती जब वह स्त्री हमारे तारीफ के अनुरूप ही कपड़े व गहने पहनने लगती. और भी कई तरह के टैस्ट हम उन पर करते तब जा कर इश्क में कुछ निखार आता. अब और क्याक्या बताएं. इतने पतले पापड़ बेलबेल कर हमारी कमर टूट जाती मगर कई चुस्त व चंट लेडी ‘थैंक्यू, भाईसाहब’ कह कर ये जा और वो जा, निकल लेती. बहुत बार तो अंधे के पैरों तले बटेर खुद ही आ गिरता और कई बार पहाड़ खोद डालते पर मरा हुआ चूहा भी हाथ न लगता. माया महाठगनि हम जानि.
स्त्रियों में भेड़चाल बहुत होती है. जहां 4 सहेलियां जुड़ीं, वहीं यह प्रश्न उछलता था, ‘अरे मोना, तूने तो कमाल कर दिया. मैं ने सुना कि कल मेघा की किट्टी पार्टी में तू अकेली कायनी चला कर इतनी दूर से आई. तुम्हारे तो पंख लग गए. कोई रोकनेटोकने वाला नहीं. तेरा तो अच्छा सोशल सर्कल बन जाएगा. हम तो ज्यादातर घर में बैठी कुढ़ती रहती हैं. स्कूटर व कायनी तो हमारे घर में भी खड़े हैं मगर कोई चलाना सिखाए तब न? हम तो पति के मुहताज हो कर 2-4 जगह चली भी जाएं तो क्या खाक मजा आता है. तेरी तो समय ही पलट गया. सच्ची बता, तूने कायनी चलाना कब सीखा, किस ने सिखाया, लाइसैंस कहां से बनवाया?’
उत्तर मिलता, ‘अरे, वो हैं न स्वीटी के हस्बैंड, उन की जानपहचान बहुत है. मेरा ड्राइविंग लाइसैंस भी घर बैठे ही बन गया. बहुत प्यार से स्कूटर चलाना सिखाते हैं. हींग लगे न फिटकरी और रंग भी चोखा. हैं भी बड़े स्मार्ट और समझदार.’ उन सुस्तीभरे सस्ते दिनों में अपने पास एक पुराना सा खटारा स्कूटर था और मन में ढेर सारी बेईमानी व बेशर्मी थी. अपना एक सूत्रीय आदर्श वाक्य था-फालतू का कोई लोचा नहीं. प्यारमुहब्बत के बदनाम पचड़े में हम नहीं पड़ते थे. स्त्री अगर स्कूटर सीखने के दौरान देहस्पर्श के सुख से हमें महरूम न करे तो समझ लो हमारी गुरुदक्षिणा वसूल हो गई. और अगर कोई सडि़यल जलकुकड़ी बातबात पर विरोध व्यक्त करे तो फिर सारी उम्मीदें अगले उम्मीदवार पर रखनी पड़ती हैं.
हमारी श्रीमती ताने देदे कर थक गई, ‘बच्चों के स्कूल की रिपोर्ट देखी है कभी आप ने. मर कर पास होते हैं. मैं सब जानती हूं कि आजकल आप क्याक्या और कहांकहां गुल खिला रहे हैं. घर के काम को छोड़ कर मेरी सहेलियों को स्कूटर सिखाने के बहाने गुलछर्रे उड़ाते फिरते हैं आप. कितनी शर्म आती है मुझे जब लोग ताना देते हैं कि तुम्हारे पति को कोई और कामधंधा नहीं है आजकल. जब देखो गांधी ग्राउंड या नेहरू पार्क में लोगों की पत्नियों को स्कूटर सिखा रहे होते हैं. प्यार अंधा होता है मगर पड़ोसी तो अंधे नहीं होते.’
सबकुछ चुपचाप सहना पड़ता है. प्यार के मामले में कितनी भी गोपनीयता रख लो मगर इश्क और मुश्क कहां छिपते हैं. अब ओखली में सिर दे ही दिया हो तो फिर मूसलों से क्या डरना. उन दिनों नारीमुक्ति आंदोलन अपने चरम पर था. स्त्रीमुक्ति का सब से प्रभावशाली प्रतीक था- स्कूटर. अर्थात घर की चारदीवारी से विद्रोह. स्कूटर सीखने की अदम्य इच्छा रखने वाली नवयौवना का सब से अधिक विरोध उस का पति तथा विशेषरूप से उस की सास करती थी. उन्हें डर था कि स्कूटर सीखा नहीं कि बंद पिंजरे की चिडि़या आजाद हो जाएगी. काबू में नहीं रहेगी. जाएगी कहीं और आ कर बताएगी कि मंदिर गई थी.
जब भी कोई सुकुमारी स्कूटर सीखने की जिद करती तो उसे एक ही रटारटाया उत्तर मिलता था, ‘क्या करोगी इस उम्र में स्कूटर सीख कर? तुम को कौन सा दफ्तर, स्कूल या कचहरी जाना है. वैसे भी तुम्हारे बेटे बबलू को तो चलाना आता ही है. वही ले जाएगा तुम्हें बाजार. फिर तुम्हें स्कूटर सिखाएगा कौन? मालूम है लाइसैंस बनवाने में कितने झंझट हैं. पहले 6 महीने तक कच्चा बनवाओ और फिर डीसी दफ्तर में जा कर पुलिस वालों को टैस्ट दो. बबलू तो ट्यूशन के चक्कर में इधरउधर भटकता है और तुम्हारे पति सुरेश को तो दुकान से ही फुरसत नहीं है. फिर तुम्हें स्कूटर चलाना सिखाएगा कौन?’ पूरे महल्ले में एकमात्र मैं ही ऐसा नायक था जिस के पास इस कौन का उत्तर था और बड़ा संतोषजनक उत्तर था. मैं कोई कमउम्र का लंपट भी नहीं था कि लोगों को बेवजह शक हो. अच्छाखासा इज्जतदार और अधेड़ पक्की हुई उम्र का संजीदा आदमी था मैं. स्त्रियों की राय तो मैं नहीं जानता मगर आसपास और जानपहचान के आदमी मुझे औसतन अच्छी नजर से देखते थे. इसलिए स्त्रियों के मामले में मेरी साख अच्छी थी.
मुझे न तो दफ्तर जाना होता था और न किसी दुकान पर. मांबाप की अच्छीखासी जायदाद थी जहां से अच्छा किराया आ जाता था. इधर मैं ने समय पर ज्योतिष विज्ञान में डिगरी प्राप्त कर ली थी. अच्छे मोटे ग्राहक चंगुल में फंस जाते थे. अपनी व्यस्त दिनचर्या में से स्कूटर सिखाने के लिए समय हम निकाल ही लेते थे.
सिखाने वाला एक था और सीखनेवालियों की संख्या में लगातार बढ़ोतरी हो रही थी. एक अनार और सौ बीमार वाली अजीब अटपटी स्थिति थी. फिर भी हम खुश थे. अभी एक शोख हसीना को स्कूटर चलाना सिखा रहे होते तो दूसरी जगह से किसी मित्र या परिचित का फोन आ जाता, ‘यार, मेरी पत्नी कई दिनों से मेरे पीछे पड़ी है. मैं ने उस से वादा किया है कि नया कायनी ले कर दूंगा. तुम्हारे पास वक्त है, स्कूटर चलाना सिखा दो उसे. लाइसैंस भी बनवा देना. खर्चा मैं दे दूंगा. तुम्हें तो पता ही है कि मैं तो टूर पर रहता हूं.’ नारीमुक्ति की इतनी तेज आंधी चल रही थी कि सुबह हम सुनीता को स्कूटर चलाना सिखाते, दोपहर को संगीता को और शाम को अनीता के पहलूनशीं होते. किसी सुपरस्टार हीरो की तरह 3-3 शिफ्टों में काम मिल रहा था हमें. हमारी तो पांचों उंगलियां घी में थीं. दुनिया के सभी गमों से बेखबर हमें बस एक ही धुन थी कि शहर की सभी चुलबुली व तेजतर्रार स्त्रियां स्कूटर चलाना सीख जाएं तथा अपनी गुलामी की जंजीरें हम से खुलवा लें.
इन दिनों हम कार चलाना सिखा रहे हैं. जिनजिन प्यारी सखियों ने हम से स्कूटर चलाना सीखा था वही अब कार चलाना भी सीख रही हैं. कल जब नारीमुक्ति आंदोलन का इतिहास लिखा जाएगा तब उस में हमारा नाम स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाएगा. हमारे कंपीटिशन में 3-4 ड्राइविंग स्कूल हैं मगर हम में और उन में जमीनआसमान का अंतर है. हम मुफ्त में सिखाते हैं और बड़े प्यार व लगन से सिखाते हैं. सारे महल्ले में सब से खटारा कार हमारे पास है. नौसिखिए को नई कार से सीखने कौन देता है भला. हमारा कलेजा और जिगर देखिए- कार हमारी, वक्त हमारा और पैट्रोल भी हमारा. जनून की हद है यह.
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देश में आज भी ऐसी कई रूढि़यां हैं जिन पर समाज ज्यादा बोलने से कतराता है. इन्हीं में से एक है माहवारी, जिसे लोग औरतों से जुड़ा मुद्दा होने के चलते शर्म की बात मानते हैं, जबकि माहवारी औरतों के सेहतमंद होने और उन के मां बनने के काबिल होने की एक निशानी है. इस के बावजूद औरतों को माहवारी के दौरान गंदे कपड़े इस्तेमाल करने व साफसफाई न रखने से इंफैक्शन और गर्भाशय के कैंसर जैसी कई गंभीर बीमारियों तक से जूझना पड़ता है.
जो लोग माहवारी को ले कर थोड़ेबहुत जागरूक हैं, वे आज भी दुकानों से सैनेटरी पैड खरीदने में झिझक महसूस करते हैं और खरीदे गए सैनेटरी पैड को काली पन्नी या अखबारी कागज में लपेट कर ही घर ले जाते हैं. लोगों में माहवारी और साफसफाई के प्रति इतनी चुप्पी के बावजूद अचानक इन दिनों सोशल मीडिया पर लोगों के हाथों में सैनेटरी पैड लिए उन की सैल्फी व फोटो खूब वायरल हो रहे हैं. यह सब करना इतना आसान नहीं था. जो काम सालों से सरकार की मुहिम नहीं कर पाई वह माहवारी से जुड़ी एक फिल्म ने कर दिखाया.
इस फिल्म का नाम है ‘पैडमैन’ जिस के हीरो अक्षय कुमार हैं. उन्होंने माहवारी के मुद्दे को बड़ी ही गंभीरता से उठाया है.
यह फिल्म दक्षिण भारत के एक शख्स अरुणाचलम मुरुगनंथम की जिंदगी पर बनी है. इस फिल्म ने रिलीज होने के पहले ही लोगों की रूढि़वादी सोच को बदलने में कामयाबी हासिल कर ली थी. इस फिल्म की कहानी और डायलौग दोनों ही बेहद कसे हुए हैं. इस फिल्म से अक्षय कुमार ने लोगों की माहवारी को ले कर शर्म को दूर करने की भरपूर कोशिश की है. फिल्म में यह बताने की कोशिश भी की गई है कि औरत के लिए शर्म से बढ़ कर कोई बीमारी ही नहीं है.
इस फिल्म में एक जगह अक्षय कुमार अपनी बहनों को सैनेटरी पैड देते हैं तो उन्हें सुनने को मिलता है कि बहन को कोई ऐसी चीज भी देता है क्या? अक्षय कुमार जवाब देते हैं, ‘‘नहीं देता है पर देना चाहिए. राखी बांधी थी न तो रक्षा का वचन निभा रहा था.’’
इस डायलौग से यह जाहिर होता है कि माहवारी को ले कर हमारे समाज की क्या सोच है. फिल्म ‘पैडमैन’ ने इस सोच को पूरी तरह से नकारा है. आज इसी का नतीजा है कि जिस सैनेटरी पैड को लोग दुकानों से खरीदते समय सौ बार सोचते थे वही लोग आज सैनेटरी पैड को हाथ में ले कर फोटो खींच रहे हैं, इस के फायदे गिना रहे हैं.
सोच और शौचालय पिछले साल अक्षय कुमार की ही एक और फिल्म ‘टौयलेट : एक प्रेम कथा’ आई थी. इस फिल्म में खुले में शौच की समस्या को उठाया गया था. पाखंड और मनुवादी सोच पर भी करारी चोट की गई थी.
इस फिल्म का एक डायलौग ‘हां भाभी चलो, सवा 4 हो गए, सब इंतजार कर रहे हैं लोटा पार्टी में तुम्हारे वैलकम का’ साबित करता है कि ज्यादातर रूढि़यों का सामना औरतों को ही करना पड़ता है. इस फिल्म में पाखंड को ले कर बोले गए डायलौग ‘जिस आंगन में तुलसी लगाते हैं वहां शौच करना शुरू कर दें’ से यह जाहिर होता है कि आंखों पर चढ़ी अंधविश्वास की पट्टी बेहतर सेहत की राह में एक बड़ा रोड़ा है.
इस फिल्म की हीरोइन भूमि पेडनेकर एक जगह कहती हैं, ‘‘मर्द तो घर के पीछे बैठ जाते हैं, पर हम तो औरतें हैं हमें तो हर चीज के लिए ज्यादा मेहनत करनी पड़ेगी.’’ अक्षय कुमार भी कहते नजर आते हैं, ‘‘अगर बीवी पास चाहिए तो घर में संडास चाहिए.’’
इन डायलौगों से यह जाहिर होता है कि आज भी लोग लाखों रुपए लगा कर आलीशान मकान बनवा लेते हैं, लेकिन कुछ हजार रुपए लगा कर शौचालय बनवाने में फेल हो जाते हैं. इस सिलसिले में हीरो जफर खान का कहना है कि सामाजिक मुद्दों पर कहानी लिखने वालों की कमी और फिल्म में लगाए गए पैसे डूबने के डर से इस तरह की फिल्में बहुत कम बन पाती हैं. लेकिन जब भी इस तरह की फिल्में बनती हैं तो दर्शक उस फिल्म में दिखाई गई समस्या को खुद से जोड़ कर देखना शुरू कर देते हैं. यही वजह है कि इस तरह की फिल्में कम बजट की होने के बावजूद अच्छी कमाई करती हैं.
पाखंड पर करारा वार धर्म और पाखंड की पोल खोलती एक फिल्म ‘पीके’ आई थी जिस में आमिर खान ने दमदार ऐक्टिंग की थी. इस फिल्म के जरीए यह बताने की कोशिश की गई थी कि चमत्कार नाम की कोई चीज नहीं होती है. फिल्म में उन तथाकथित साधुसंतों को कठघरे में खड़ा किया गया था, जो चमत्कार दिखा कर लोगों को बेवकूफ बनाते हैं.
फिल्म ‘पीके’ ने तर्क के सहारे धर्म और पाखंड के नाम पर दुकान चलाने वालों की बोलती बंद कर दी थी. धार्मिक मूर्तियों की एक दुकान पर आमिर खान कहते हैं कि क्या मूर्ति में ट्रांसमीटर लगा है जो भगवान तक उस की आवाज पहुंचेगी? जब भगवान तक आवाज नहीं पहुंचती, तो मूर्ति की क्या जरूरत? इसे साबित करने के लिए वे कालेज में एक पेड़ के नीचे पड़े एक पत्थर पर लाल रंग पोत देते हैं जिस पर छात्र अपने पास होने की मन्नतें मांगते नजर आते हैं. फिल्म ‘ओह माई गौड’ में धर्म के उन ठेकेदारों पर निशाना साधा गया था जो धर्म की अपनी दुकान को बचाए रखने के लिए क्या कुछ नहीं करते हैं.
इस फिल्म में परेश रावल ने सभी तबकों को कठघरे में खड़ा किया था. फिल्म यह संदेश देने में कामयाब रही थी कि धर्म का डर इनसान खुद अपने मातापिता से सीखता है और आगे चल कर अपनी आने वाली पीढि़यों को भी सिखाता है. इस देश में धर्म का डर दिखा कर सौदे तय किए जाते हैं, तावीजगंडे पहना कर अमीर बनने के ख्वाब दिखाए जाते हैं. धर्म और आस्था के नाम पर लोग भी लुटने को तैयार रहते हैं. औरतों की अस्मत तक लूटी जाती है, लेकिन लोग धर्म के डर से मुंह खोलने से कतराते हैं.
इस मसले पर हीरो रविशंकर मिश्रा का कहना है कि फिल्मों में दिए गए संदेशों का असर दर्शकों के दिमाग पर तब आसानी से होता है, जब समाज में फैली कुरीतियों और समस्याओं से जुड़ी कहानी हो.
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दिल्ली हाईकोर्ट ने ‘पद्मावत’ फिल्म के सतीप्रथा को महामंडित करने के आरोप में दर्ज एक याचिका पर आपत्ति जताते हुए कहा है कि याचिकाकर्ता को क्या दूसरी संगीन सामाजिक विकृतियां नहीं दिखाई दे रही हैं जो उस ने इस तरह की फालतू याचिका दर्ज की है. हमारे यहां न्यायालयों में सार्वजनिक मामलों की आड़ में जम कर जनहित याचिकाएं और प्राथमिकियां देशभर में दर्ज कराई जा रही हैं. खाली बैठेठाले वकील और आनंद लेने वाले उन के क्लाइंट बड़े नामों के खिलाफ याचिकाएं या प्राथमिकियां दर्ज करा देते हैं.
आधेअधूरे तथ्यों वाली ये याचिकाएं या प्राथमिकियां चाहे कितनी ही कमजोर क्यों न हों, लेकिन फिर भी ये फिल्म निर्माता, प्रसिद्ध व्यक्ति या लेखक, प्रकाशक, संपादक के लिए परेशानी खड़ी कर देती हैं. याचिकाकर्ता या शिकायतकर्ता तो अपने शहर में मामला दर्ज करता है पर जिसे सफाई देनी होती है उसे सैकड़ों मील से आना पड़ता है. कई बार वारंट, गैरजमानती वारंट तक जारी कर दिए जाते हैं. इस के चलते क्रिएटिव व्यक्ति अपना काम छोड़ता है जबकि निठल्ला ठट्ठा मार कर हंसता है.
अफसोस यह है कि अदालतों में इस तरह के ज्यादातर मामलों में फैसला 10-15 वर्षों में आता है और इतने साल बाद यदि मामला खारिज हो तो शिकायतकर्ता का कुछ नहीं बिगड़ता. आपराधिक प्राथमिकी वाले शिकायतकर्ता शुरू में ही गायब हो जाते हैं या किसी ऐरेगैरे वकील पर छोड़ देते हैं. वहीं, दूसरे पक्ष को बारबार अदालत में सिर्फ हाजिरी के लिए खड़ा होना पड़ता है.
यह कहना तो सही है कि न्याय मिलता है पर कानून और अदालत के साथ खिलवाड़ करने वाले को क्या उसी मामले में वही न्यायालय सजा देता है? आमतौर पर न्यायालय मामला खारिज करते हुए कानून का पहिया चलाने वाले को कोई दंड नहीं देता. आजकल कभीकभार 20-25 हजार रुपए का जुर्माना लगाया जाने लगा है पर यदि वह व्यक्ति न दे तो बहुत ही कम नियम हैं उस से पैसा वसूलने के. जिसे जुर्माने का पैसा मिलना होता है वह वसूलने के लिए और खर्च करने को तैयार नहीं होता.
कानून व अदालतों से खिलवाड़ करने वालों के खिलाफ सख्ती बरती जानी चाहिए ताकि व्यर्थ के मुकदमे दायर न हों. फालतू की याचिकाओं और प्राथमिकियों पर पहले ही दिन अदालत को दूसरे पक्ष के नोटिस दिए बि?ना फैसले सुनाने की परंपरा प्रारंभ करनी चाहिए और केवल संगीन मामले, जिन में जिम्मेदार व्यक्ति या संस्थाएं अदालत में गुहार लगाने आए हों, स्वीकार किए जाने चाहिए.
अदालतों से न्याय मिल जाता है पर कठिनाई कानून के फैसलों से नहीं, प्रक्रिया से है जिस के दौरान अब लाखों खर्च होते हैं और कई बार जेल तक जाने की नौबत आ जाती है. दरअसल, मौलिक स्वतंत्रताओं को जर्जर करने में सरकार से ज्यादा अब आम व्यक्ति जिम्मेदार साबित हो रहा है.
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सवाल मेरे आप से 2 सवाल हैं. पहला यह कि क्या वीर्यपात से पहले पुरुष से अलग हो जाने पर बगैर गर्भनिरोध भी काम चल सकता है? दूसरा यह कि स्त्री के शारीरिक मिलन में एचआईवी एड्स होने का रिस्क किसे अधिक होता है?
जवाब
यद्यपि कुछ दंपती गर्भनिरोध युक्तियों से बचने के लिए यह तरीका अपनाते हैं कि वीर्यपात होने से पहले स्त्री पुरुष से अलग हो जाती है, पर यह तरीका जरा भी भरोसे का नहीं है. उस में भूल होने का हमेशा खतरा रहता है. यौनोत्तेजना के क्षणों में स्खलन से पहले भी वीर्य की बूंद छूटने से गर्भ ठहर सकता है. समय से अलग न हो पाने पर तो अवांछित गर्भ ठहरने की तब तक चिंता बनी रहती है जब तक कि अगला महीना नहीं हो जाता. अत: गर्भनिरोध के लिए कोई बेहतर विधि अपनाना ही अच्छा है.
जहां तक स्त्रीपुरुष के शारीरिक मिलन में एचआईवी एड्स होने के रिस्क का सवाल है, तो दोनों में से कोई भी एचआईवी से संक्रमित है तो दूसरे को रोग हो सकता है, लेकिन पुरुष से स्त्री में एचआईवी विषाणु जाने का रिस्क अधिक होता है. इस का ठोस कारण भी है. शारीरिक मिलन के बाद पुरुष से स्खलित हुआ वीर्य लंबे समय तक स्त्री की योनि में रहता है. यदि यह वीर्य एचआईवी से संक्रमित है, तो वायरस के स्त्री में पैठ करने का रिस्क बढ़ जाता है.
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एक झूठ को छिपाने के लिए सौ झूठ बोलने पड़ते हैं, फिर भी सच्चाई सामने आ जाती है. यह कहावत सदियों से चली आ रही है. अब इसी को केंद्र में रखकर निर्माता संजीव कुमार व रोहित कुमार तथा निर्देशक गुरप्रीत सोंध ‘‘रंगरेजा फिल्मस’’ के बैनर तले एक हास्य फिल्म ‘‘शादी तेरी बजाएंगे हम बैंड’’ लेकर आ रहे हैं.
फिल्म ‘‘शादी तेरी बजाएंगे हम बैंड’’ की कहानी के केंद्र में दिल्ली में रह रहे शेरसिंह (राहुल बग्गा) और प्रीति (सृष्टि माहेश्वरी) की हैं. शेरसिंह के पिता शमशेर सिंह (मुश्ताक खान) लव मैरिज यानी प्रेम विवाह के सख्त खिलाफ हैं. मगर शेर सिंह अपने दोस्तों गोगा (रोहित कुमार) और बंटी(दिलबाग सिंह) के कहने पर अपने पिता को बताए बिना प्रीति से शादी कर लेता है.
शेरसिंह व प्रीति अपनी शादी के मजे ठीक से लूट पाते उससे पहले ही शमसेर सिंह दिल्ली उनके घर पर आ धमकते हैं. प्रीति को देखकर उनका दिमाग गर्म हो जाता है. फिर शुरू होता है झूठ पर झूठ बोलने का सिलसिला. शेरसिंह ने प्रीति का परिचय गोगो की पत्नी के रूप में करवाता है, पर उसी वक्त गोगो अपनी प्रेमिका गुंजन(आफरीन अल्वी) के साथ पहुंचता है.
तभी शमशेर ऐलान करते हैं कि उन्होंने अपने बेटे शेरसिंह की शादी के लिए एक खूबसूरत लड़की कोमल भाटी(राधा भट्ट) को पसंद किया है. पर झूठ पर झूठ बोलने के कारण इनके बीच गलतफहमियां इस कदर उलझती हैं कि मसला सेल्फी डौन (राजपाल यादव) तक पहुंच जाता है. अंततः सभी की जिंदगी में खुशियां वापस आ ही जाती हैं.
अपनी इस फिल्म की चर्चा करते हुए निर्देशक गुरप्रीत सौंध कहते हैं – ‘‘हमारी फिल्म में इस बात का रेखांकन है कि सच्चाई छिपाए नहीं छिपती, फिर चाहे जितने झूठ बोलकर छिपाने की कोशिश की जाए. इसके लिए हमने अपनी फिल्म में उन्ही प्रसंगों को वरीयता दी है, जो आए दिन हमारे आस पास की जिंदगी में घटित होते रहते हैं. दलेर मेंहदी द्वारा स्वरबद्ध फिल्म का शीर्षक गीत फिल्म की हाईलाइट्स है. यह फिल्म एक मनोरंजक हास्य फिल्म है.’’
सेल्फी डौन का किरदार निभाने वाले अभिनेता राज पाल यादव कहते हैं – ‘‘यह फिल्म हर इंसान का मनोरंजन करेगी, सभी को हंसाएगी. मगर हर किसी को अपना दिमाग घर पर रखकर यह फिल्म देखना जाना चाहिए.’’
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हेमंत कटारे मध्य प्रदेश में भिंड जिले की अटेर विधानसभा सीट से कांग्रेस के विधायक हैं. इस सीट से साल 2013 में उन के पिता सत्यदेव कटारे जीते थे जो विधानसभा में विपक्ष के नेता थे.
पिता की मौत से उपजी हमदर्दी और कांग्रेस के दिग्गज नेता व गुना के सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया से नजदीकियों का फायदा हेमंत कटारे को उपचुनाव में मिला और उन्होंने भाजपा के वजनदार उम्मीदवार अरविंद भदौरिया को 800 वोटों के अंतर से हरा दिया.
हेमंत कटारे जीत कर भोपाल आए तो उन का स्वागत किसी हीरो की तरह धूमधड़ाके से हुआ. कई पत्रकारों ने उन के इंटरव्यू लिए थे. उन में से एक थी 21 साला खूबसूरत प्रिंशु सिंह जो कुछ करगुजरने की चाह लिए पत्रकारिता की पढ़ाई करने भोपाल आई थी.
प्रिंशु सिंह भोपाल की माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता यूनिवर्सिटी के आखिरी साल में थी और पिछले साल उस ने पढ़ाई में गोल्ड मैडल हासिल किया था.
यह प्यार था या…
हेमंत कटारे और प्रिंशु सिंह की नजर पहली दफा जो मिली तो वे दोनों दोस्त बन गए और फिर आम प्रेमियों की तरह भोपाल में छिप कर इधरउधर मिलने लगे.
हेमंत कटारे इस प्यार को छिपाए रखना चाहते थे क्योंकि उन के राजनीतिक कैरियर की अभी शुरुआत थी. प्यार उजागर होता तो बदनामी भी होती. दो टूक कहा जाए तो वे इश्क की रंगीनियों में तो रहना चाहते थे लेकिन प्रिंशु सिंह से शादी नहीं करना चाहते थे और इस बाबत उन्होंने प्रिंशु सिंह से कोई वादा भी नहीं किया था.
आजकल के ज्यादातर नौजवान प्यार तो किसी और से करते हैं पर शादी किसी और से करते हैं. इसी दौरान दोनों मरजी से हमबिस्तरी का भी लुत्फ उठा लें तो भी बात हैरत की नहीं रह जाती.
प्यार में दिक्कत तब खड़ी होती है जब दोनों में से कोई एक जज्बातों और हमबिस्तरी की कीमत मांगते हुए दूसरे को ब्लैकमेल करने लगे, धमकी देने लगे या फिर डर के मारे किसी तरह का जिस्मानी नुकसान पहुंचाए.
प्यार अगर वक्तीतौर पर जिस्मानी सुख भोगने का जरीया हो और वक्त रहते ही आशिकमाशूक अपने रास्ते अलग न करें तो तय है कि वे किसी हादसे या आफत की गिरफ्त में आने वाले होते हैं. ऐसा ही कुछ इस मामले में भी हुआ.
जब खुले राज तो
मध्य प्रदेश की सियासत में जनवरी और फरवरी के महीने में हेमंत कटारे और प्रिंशु सिंह की मुहब्बत के चर्चे अलगअलग अंदाज से किसी टैलीविजन सीरियल की तरह होते रहे जिन्हें आम लोगों ने भी चटकारे ले कर दिलचस्पी से सुना.
14 जनवरी, 2018 को प्रिंशु सिंह ने एक वीडियो वायरल करते हुए हेमंत कटारे पर इलजाम लगाए कि वे उस का बलात्कार करते रहे हैं. प्रिंशु सिंह ने यह भी दावा किया कि उस के पास हेमंत कटारे के ऐसे वीडियो और आडियो हैं जिन से यह साबित होता है कि हेमंत कटारे उसे प्यार के झांसे में ले कर धोखा देते रहे हैं और अब उसे डराधमका रहे हैं.
वीडियो वायरल हुआ तो हाहाकार मच गया. वजह, इलजाम पत्रकारिता की एक छात्रा ने विधायक पर लगाया था. शुरुआत में तो लोग इसे प्रिंशु सिंह की सनक और ब्लैकमेलिंग समझते रहे पर दाल में काला है यह खुद हेमंत कटारे ने साबित कर दिखाया.
तीसरे दिन ही हेमंत कटारे ने भी खुद का बनाया एक वीडियो वायरल किया जिस में वे कह रहे हैं कि प्रिंशु सिंह उन्हें ब्लैकमेल कर रही है और 2 करोड़ रुपए न देने पर उन की राजनीतिक और निजी जिंदगी तबाह करने की धमकी दे रही है.
इस वीडियो में हेमंत कटारे ने विक्रमजीत सिंह नाम के एक शख्स का भी जिक्र किया कि उस ने प्रिंशु सिंह की तरफ से पैसे मांगे थे.
विक्रमजीत सिंह भोपाल के एक कार शोरूम जीवन मोटर्स में काम करता है और भारतीय जनता पार्टी का छोटामोटा नेता भी है इसलिए मामला मुहब्बत का कम सियासत का ज्यादा हो चला.
हेमंत कटारे को विक्रमजीत सिंह और प्रिंशु सिंह मिल कर ब्लैकमेल कर रहे थे या नहीं यह राज अब देर से ही सही पर खुलेगा जरूर लेकिन प्रिंशु सिंह को हेमंत कटारे से इस तरह के सख्त जवाब की उम्मीद नहीं थी.
हेमंत कटारे ने पुलिस में शिकायत भी दर्ज करा दी थी और प्रिंशु सिंह की गिरफ्तारी के बाद वीडियो वायरल किया था.
पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराने के बाद हेमंत कटारे ने प्रिंशु सिंह को भोपाल के कारोबारी इलाके एमपी नगर के पास चेतक ब्रिज पर बुलाया और उसे एडवांस में 5 लाख रुपए दिए.
इस तयशुदा जगह पर पुलिस वाले सादी वरदी में पहले से ही तैनात थे जिन्होंने प्रिंशु सिंह को नकद 5 लाख रुपए के साथ गिरफ्तार कर ब्लैकमेलिंग के इलजाम में जेल भेज दिया.
हेमंत कटारे का वीडियो वायरल हुआ तो एक तरह से यह साफ हो गया कि प्रिंशु सिंह उस से सौदेबाजी कर रही थी और उस सौदे की दलाली विक्रमजीत सिंह कर रहा था.
रोजे गले पड़े
प्रिंशु सिंह के जेल चले जाने के बाद हेमंत कटारे ने छुटकारे की मीलों लंबी सांस ली कि चलो पिंड छूटा. पर तब तक राज्य की सियासत में काफी भूचाल आ चुका था. भाजपाई तो खामोश थे लेकिन कांग्रेसी दिग्गज नेता अजय सिंह राहुल और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अरुण यादव के अलावा ज्योतिरादित्य सिंधिया ने भी हेमंत कटारे को बेगुनाह बताते हुए इस मामले को भाजपा की साजिश बताया.
जेल जा कर प्रिंशु सिंह खामोश नहीं बैठी बल्कि पेशी के दिन उस ने अदालत में पत्रकारिता यूनिवर्सिटी से आए अपने दोस्तों से कहा कि वह बेगुनाह है. हेमंत कटारे और पुलिस वाले मिले हुए हैं.
प्रिंशु सिंह का दूसरा वीडियो उस की गिरफ्तारी के बाद वायरल हुआ था जिस में वह अपने पहले के वीडियो के बाबत बारबार माफी मांगती नजर आ रही थी कि उस ने यों ही मजाक में वीडियो वायरल कर दिया था, क्योंकि हेमंत कटारे ने उस से मिलने की पेशकश बड़ी बेरुखी से ठुकरा दी थी.
यह वीडियो तब वायरल हुआ जब प्रिंशु सिंह जेल में थी और पुलिस उस का मोबाइल फोन जब्त कर चुकी थी. फिर वीडियो कैसे बना और वायरल हुआ इस बाबत प्रिंशु सिंह साफसाफ कुछ नहीं बोली तो अंदाजा यह लगाया गया कि विक्रमजीत सिंह ने बचाव के लिए यह वीडियो पहले से ही तैयार कर रखा था कि अगर हेमंत कटारे झांसे या धमकी में न आए तो मामले पर लीपापोती यों ही हंसीमजाक में की जा सके.
जेल से प्रिंशु सिंह ने हेमंत कटारे पर फिर पुराने इलजाम दोहराए और जमानत की मांग की जो उसे मिल भी गई. बारी अब खुद को सयाना समझ रहे हेमंत कटारे की थी जिन के खिलाफ पुलिस ने प्रिंशु सिंह की शिकायत पर बलात्कार और अपहरण का मामला दर्ज कर लिया.
वारंट जारी होते ही हेमंत कटारे फरार हो गए और खुद की बेगुनाही साबित करने का वीडियो वायरल करते रहे.
इधर विक्रमजीत सिंह ने भी एक वीडियो वायरल कर डाला कि वह तो हेमंत कटारे के कहने पर इन दोनों के बीच बात बनाने की कोशिश कर रहा था.
बकौल विक्रमजीत सिंह, हेमंत कटारे ने एक कांग्रेसी नेता के जरीए उसे कहलवाया था कि मामला रफादफा करवाओ, क्योंकि उन की सगाई हो चुकी है और अप्रैल में शादी होने वाली है.
यानि कुछ ऐसा था जिस से हेमंत कटारे डर रहे थे, लेकिन वह जो भी था इतना नहीं था कि उस की कीमत 2 करोड़ रुपए दी जाए पर सौदा 50 लाख रुपए में तय हुआ था.
पुलिस ने बिगाड़ी बात
देखा जाए तो यह प्यार में सौदेबाजी का मामला था जिस में प्रिंशु सिंह हेमंत कटारे की जिंदगी से हट जाने और राज छिपाए रखने की कीमत मांग रही थी. चूंकि यह काम वह अकेले नहीं कर सकती थी इसलिए उस ने अपने दोस्त विक्रमजीत सिंह को साथ मिला लिया था.
प्रिंशु सिंह को उम्मीद थी कि पहला वीडियो वायरल होते ही हेमंत कटारे डर के मारे उस की मांगें मान लेंगे और उसे तगड़ी रकम मिल जाएगी, लेकिन मामला पुलिस में पहुंचा तो फिर इन दोनों के हाथ में कुछ नहीं रह गया.
पुलिस वालों ने इस मामले में दोनों तरफ से मलाई काटी और चाटी. पहले प्रिंशु सिंह को गिरफ्तार कर हेमंत कटारे को बेफिक्र कर दिया गया और फिर उन्हें ही गिरफ्तार कर हमेशा के लिए उन के दामन पर दाग लगा दिया.
इधर प्रिंशु सिंह की मां भोपाल आईं और उन्होंने भी वीडियो के जरीए कहा कि उन की बेटी बेकुसूर है, उस के साथ कोई गंदा काम नहीं हुआ है. विक्रमजीत सिंह ने प्रिंशु सिंह को बहकाया है.
किस ने किस को कितना बहलाया था यह सब अब अदालत में तय होगा. एक तरफ मां हेमंत कटारे को क्लीन चिट दे रही हैं तो बेटी खुलेआम उन्हें बलात्कारी बता रही है.
हेमंत कटारे को एक लड़की से सैक्सी चैटिंग भारी पड़ गई या सचमुच उन के प्रिंशु सिंह से जिस्मानी रिश्ते थे, ऐसे कई राज अब अदालत में खुलेंगे. जाहिर है कि कई राज दफन भी रहेंगे.
हेमंत कटारे की फरारी ने उन्हें शक के दायरे में ला खड़ा कर दिया. कल तक कंधे से कंधा मिला कर चल रहे कांग्रेसी अब उन से किनारा करने लगे हैं.
महंगा पड़ा नौसिखियापन
हेमंत कटारे की समझ पर जवानी का जोश भारी पड़ा और वे सियासत का पहला सबक भी नहीं समझ पाए कि इस में कोई किसी का सगा नहीं होता. इस नौसिखिएपन और नासमझी की सजा वे भुगत भी रहे हैं. कल तक जिन विधायक के साथ गनमैनों और समर्थकों का कारवां चला करता था, वे अब तनहाई में दिन काट रहे हैं.
मुद्दे की बात प्यार में बेईमानी है जो प्रिंशु सिंह ने भी की थी और हेमंत कटारे ने भी. पर दोनों को बेईमानी का भी सलीका नहीं आता था.
मामूली खातेपीते घर की प्रिंशु सिंह रातोंरात नाम कमा लेना चाहती थी जो उसे मिला तो पर इस तरीके से कि शायद ही कोई मीडिया हाउस अब उसे नौकरी दे. उस के एक दोस्त के मुताबिक प्रिंशु सिंह की शादी 23 फरवरी को होनी थी जो इस मामले की वजह से खटाई में पड़ गई है.
हेमंत कटारे का राजनीतिक कैरियर भी डांवांडोल हो गया है. जो साख उन के पिता ने कमाई थी वह एक नासमझी के चलते धूल में मिल गई है.
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‘कौआ चला हंस की चाल, भूल गया अपनी भी चाल’. यह कहावत उत्तर प्रदेश शिक्षा बोर्ड के इम्तिहानों पर पूरी तरह से खरी उतरती है. खुद को सीबीएससी बोर्ड की तरह बदलने के चक्कर में यह बोर्ड अपनी ही जड़ों से कटता जा रहा है. ऐसे में उस का यह दावा भी खोखला लगता है कि वह इम्तिहान कराने वाला सब से बड़ा शिक्षा बोर्ड है.
केवल सीबीएससी बोर्ड से एक महीना पहले इम्तिहान कराने और उन का नतीजा लाने से हालात नहीं बदलने वाले. असल सुधार तो तब होगा जब उत्तर प्रदेश शिक्षा बोर्ड अपने स्कूलों, इम्तिहानों में पूछे जाने वाले सवालों और पढ़ाने के तौरतरीकों में बदलाव लाएगा. नेताओं के विदेशों में दौरा करने और इम्तिहान दिलाने के अपने सिस्टम का गुणगान करने से हालात नहीं बदलेंगे.
छात्रों का इम्तिहान छोड़ने वाला मुद्दा खुशी की नहीं शर्म की बात है. इस पर गंभीरता से विचार होना चाहिए, नहीं तो आने वाले दिनों में इम्तिहान पास करने वाले छात्र भी केवल ‘पकौड़ा कारोबार’ करने के ही लायक ही रहेंगे.
उत्तर प्रदेश शिक्षा बोर्ड का दावा है कि वह दुनिया में सब से बड़े इम्तिहान का आयोजन करता है. इस वाहवाही की हकीकत यह है कि दुनिया में यह पहला इम्तिहान होगा जहां पर 10 लाख, 62 हजार, 506 छात्रों ने इम्तिहान छोड़ दिया.
उत्तर प्रदेश शिक्षा बोर्ड और उत्तर प्रदेश की योगी सरकार इस को अपनी वाहवाही से जोड़ कर देख रही है. सरकार का कहना है कि इस बार इम्तिहानों में नकल पर रोक लगी तो इस वजह से नकल करने वाले छात्रों ने इम्तिहान छोड़ दिया है. सवाल उठता है कि छात्र नकल करने के लिए मजबूर ही क्यों होते हैं?
उत्तर प्रदेश में सरकारी शिक्षा सिस्टम पूरी तरह से खोखला हो चुका है. प्राइमरी से ले कर 12वीं जमात तक एकजैसा हाल है. बिना पढ़े हुए बच्चों को प्रश्नपत्र का हर सवाल मुश्किल लगता है. ऐसे में वे नकल की तरफ भागने लगते हैं.
हमारे देश में एकजैसा शिक्षा सिस्टम नहीं है. अमीर के लिए बेहतर और गरीब के लिए बदतर शिक्षा सिस्टम है. 12वीं जमात के बाद नौकरी की रेस में दोनों को एकजैसे इम्तिहान और इंटरव्यू से गुजरना पड़ता है, जिस में गरीब शिक्षा सिस्टम में पढ़ने वाला छात्र तरक्की की रेस से बाहर हो जाता है.
देश में कुछ सालों के अंदर ही सीबीएससी यानी सैंट्रल बोर्ड औफ सैकेंडरी ऐजूकेशन और आईसीएसई यानी इंडियन सर्टिफिकेट औफ सैकेंडरी ऐजूकेशन का दबदबा बढ़ा है. केवल उत्तर प्रदेश ही नहीं, बल्कि पूरे देश के अलगअलग राज्यों में वहां के शिक्षा बोर्डों की हालत खराब हो चुकी है. उत्तर प्रदेश में उत्तर प्रदेश शिक्षा बोर्ड से मंजूरी मिले स्कूल लगातार बंद होते जा रहे हैं. उन में पढ़ने वाले बच्चों की तादाद कम होती जा रही है.
उत्तर प्रदेश शिक्षा बोर्ड के स्कूलों में पढ़ने वाले ज्यादातर बच्चे कमजोर घरों के हैं. वे सरकार से मिल रही मदद के लिए इन स्कूलों में पढ़ने आते हैं. सरकार भी चाहती है कि समान शिक्षा ले कर ये बच्चे अमीर बच्चों से मुकाबला न कर पाएं इसलिए यहां सुधार होता नहीं दिखाया जाता है.
उत्तर प्रदेश के पुराने शिक्षा बोर्ड के मुकाबले सीबीएससी और आईसीएसई लोकप्रिय इसलिए हुए हैं, क्योंकि ये प्रतियोगी इम्तिहानों के लैवल को ध्यान में रख कर अपने कोर्स को तैयार कर इम्तिहान कराते हैं.
उत्तर प्रदेश शिक्षा बोर्ड में जब ज्यादा से ज्यादा हासिल किए गए अंक 75 फीसदी होते थे तो सीबीएससी में 90 से ज्यादा फीसदी नंबर मिलते थे. पिछले कुछ सालों से उत्तर प्रदेश शिक्षा बोर्ड की लगातार बुराई हो रही है. ऐसे में वहां भी बच्चों को ज्यादा नंबर देने का सिलसिला शुरू हो गया है.
पहले जहां केवल साइंस सब्जैक्ट में ही प्रैक्टिकल होते थे अब हाईस्कूल में हिंदी सब्जैक्ट में 30 नंबर का प्रैक्टिकल होने लगा है. ऐसे में बच्चों को बिना किसी तैयारी के ही ज्यादा नंबर मिलने लगे हैं.
इन सब्जैक्ट के प्रैक्टिकल के लिए बच्चों को केवल सब्जैक्ट से संबंधित फाइल तैयार कर लिखना होता है. पहले से तैयार इस फाइल पर ही हाईस्कूल के बच्चों को 30 में से कम से कम 25 नंबर मिलने लगे हैं. ऐसे में बच्चे अच्छे नंबरों से पास होने लगे हैं. अब उत्तर प्रदेश शिक्षा बोर्ड के छात्र भी 80 फीसदी से ऊपर नंबर पा कर सीबीएससी के बच्चों से मुकाबला करने लगे हैं.
खोखली नींव पर…
उत्तर प्रदेश में हर साल तकरीबन 26 लाख बच्चे हाईस्कूल यानी 10वीं जमात और 14 लाख बच्चे इंटर यानी 12वीं जमात के इम्तिहानों में हिस्सा लेते हैं. इन आंकड़ों को देखें तो साफ है कि 10वीं जमात से 12वीं जमात तक पहुंचने के बीच ही ज्यादातर छात्र पढ़ाई छोड़ देते हैं.
गरीब घरों के ये छात्र 10वीं जमात के बाद मेहनतमजदूरी करने में लग जाते हैं. वे सरकारी मदद के बाद भी अपनी आगे की पढ़ाई जारी नहीं रख पाते हैं.
उत्तर प्रदेश शिक्षा बोर्ड ने अपनी खामियों को छिपाने के लिए ‘नकल कारोबार’ को बढ़ाने का काम किया. नेताओं ने भी इसे वोट बैंक से जोड़ दिया.
यह सिलसिला साल 1980 के बाद से धीरेधीरे पनपने लगा जो समय के साथ एक बड़े कारोबार में बदल गया. कल्याण सिंह जब पहली बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने थे तो उन्होंने नकल करने को संज्ञेय अपराध बना दिया था. नकल करने वाले बच्चों को जेल भेज दिया था. उस समय भी यह नहीं सोचा गया था कि बच्चे नकल करते क्यों हैं?
बाद की सरकारों ने इस कानून को खत्म कर बच्चों को जेल जाने से बचाया पर इस से सिस्टम में सुधार नहीं आया. ‘नकल कारोबार’ संगठित हो कर आगे बढ़ने लगा. नकल वाले इम्तिहान कराने के अलग स्कूल खुलने लगे. वहां नकल कराने के नाम पर महंगी फीस वसूल होने लगी. बच्चे ही नहीं उन के मांबाप, शिक्षा विभाग के अफसर, नेता, समाज के लोग सब इस में शामिल हो गए.
उत्तर प्रदेश सरकार ने सरकारी स्कूलों में पढ़ाने के लिए शिक्षा मित्रों की भरती शुरू की. राजनाथ सिंह उस समय उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री थे. शिक्षा मित्रों की भरती में मैरिट को बेस बनाया गया. मैरिट में वही बच्चे आगे आए जिन्होंने नकल के सहारे ज्यादा नंबर पाए थे.
सरकारी नौकरी में मैरिट को बेस बनाने के बाद नकल कारोबार बहुत तेजी से आगे बढ़ने लगा. अब बिना पढ़े ही बच्चे 75 से 85 फीसदी नंबर पाने लगे. मैरिट में यही बच्चे आगे आ कर नौकरी के दावेदार हो गए.
सरकारी नौकरी में मैरिट का यह खेल आगे भी जारी रहा, जो गले की हड्डी बन गया. शिक्षा मित्रों के रूप में स्कूलों में पढ़ाने वाले टीईटी यानी शिक्षक पात्रता इम्तिहान पास करने में फेल होने लगे.
दिखावा हैं सुधार के कदम
सरकारी स्कूलों में शिक्षा सिस्टम में सुधार के नाम पर सरकार के दावों और उन की हकीकत में बहुत फर्क है. कई बार ऐसे मसले सामने आए जब छात्रों को पढ़ाने वालों का टैस्ट हुआ तो वे ही पूछे गए सवालों के सही जबाव नहीं दे पाए. ऐसे में प्रदेश में शिक्षा सिस्टम की पोल खुलने लगी. प्रदेश में सामूहिक नकल, प्रश्नपत्र का लीक होना, परीक्षा केंद्रों में गलत प्रश्नपत्र पहुंचना, कौपियां ले कर भाग जाना जैसी घटनाएं होने लगीं.
उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने शिक्षा में सुधार के लिए जो कदम उठाए हैं उन में सब से पहले इम्तिहानों को सीबीएससी से पहले कराने की वाहवाही लूटने का काम हुआ. 10वीं और 12वीं जमात के जो इम्तिहान हर साल मार्च महीने में होते थे, इस बार फरवरी महीने में ही करा दिए गए. लिहाजा, इस साल बच्चों को पढ़ने का पूरा समय भी नहीं मिला.
साल 2017-18 के शिक्षा सत्र की शुरुआत अप्रैल, 2017 से हुई थी. गांवों में अप्रैलमई महीने में खेतीकिसानी होती है. ज्यादातर मातापिता इस काम में लगे होते हैं. ऐसे में वे अपने बच्चों को समय से स्कूल में दाखिले के लिए नाम नहीं लिखवा पाते.
जुलाई में जब स्कूल खुलते हैं तो बच्चों का दाखिला फिर से शुरू होता है, जो 15 अगस्त तक चलता है. ऐसे में बच्चों की पढ़ाई 15 अगस्त के बाद ही शुरू होती है.
अगस्त से फरवरी महीने के बीच साल के 6 महीने बच्चों की पढ़ाई के लिए मिले. इस में दशहरा, दीवाली, क्रिसमस और जाड़ों की छुट्टियों समेत शनिवार और रविवार की छुट्टी कोे निकाल दें तो आधा समय ही बचता है.
ऐसे में केवल 90 दिन ही सही तरह से बच्चों को पढ़ाई हो पाई. 11 महीने की पढ़ाई का बोझ 3 महीने में पूरा होगा तो बच्चे नकल के लिए मजबूर हो जाएंगे न?
नाम न छापने की शर्त पर हाईस्कूल के इम्तिहान आयोजित कराने वाले एक प्रिंसिपल ने बताया कि सरकार अपनी वाहवाही के लिए तुगलकी फैसले करती है. 10वीं और 12वीं जमात के बच्चों ने इम्तिहान छोड़ा वह शर्म की बात है. नकल इसलिए होती है क्योंकि शिक्षा में सुधार का फैसला शिक्षाविद नहीं अफसर करते हैं.
कभी यह नहीं सोचा जाता कि उत्तर प्रदेश शिक्षा बोर्ड के अलावा बाकी इम्तिहानों में नकल क्यों नहीं होती है? सीसीटीवी, बायोमीट्रिक्स अटैंडैंस वगैरह सिस्टम में सुधार का हिस्सा हैं, शिक्षा में सुधार का नहीं.
आज इन स्कूलों में पढ़ाने वाले टीचरों की अलगअलग परेशानियां हैं. सरकार के हर काम में स्कूल टीचर ही आसानी से मुहैया होते हैं. उन के पास पढ़ाने के अलावा भी बहुत सारे काम हैं, जिस की वजह से वे पढ़ाने के काम को छोड़ कर दूसरे काम करते हैं.
जो मांबाप अपने बच्चों की पढ़ाईलिखाई के लिए सचेत हैं वे प्राइवेट स्कूल में जाना चाहते हैं. सरकार को शिक्षा और सिस्टम दोनों में सुधार करना होगा केवल सिस्टम सुधारने से कोई हल नहीं निकलेगा.
नहीं होती बेहतर तैयारी
स्कूली इम्तिहानों में छात्रों से जिस तरह से मुश्किल सवाल पूछे जाते हैं टीचर क्लास में उन की तैयारी नहीं कराते. गांवों में पढ़ने वाले बच्चे इतने अमीर नहीं होते हैं कि वे ट्यूशन ले सकें. ऐसे में नकल के भरोसे इम्तिहान देना उन की मजबूरी हो जाती है.
बच्चों को लगता है कि अगर वे अच्छे नंबरों से इम्तिहान पास कर लेंगे तो उन को रोजगार मिल जाएगा, इसलिए वे ऐसे स्कूलों की तलाश में रहते हैं, जहां नकल की सुविधा होती है.
नकल की सुविधा देने के लिए शिक्षा विभाग से ले कर नेता तक जिम्मेदार होते है. ज्यादातर स्कूल ऐसे ही नेताओं के होते हैं जो पार्टी को चंदा देते हैं, अफसरों को घूस देते हैं. इस पैसे को कमाने के लिए वे बच्चों को नकल करा कर पैसे वसूल करते हैं.
उत्तर प्रदेश में शिक्षा विभाग के हर अफसर को यह पता है कि कहां पर नकल का कारोबार चलता है. साल 2017-18 के शिक्षा सत्र के इम्तिहान के नतीजे अप्रैल महीने में आएंगे. इस साल पास होने वालों की तादाद और उन को मिलने वाले नंबर पिछले सालों के मुकाबले कम होंगे. ऐसे में एक बार फिर से नकल पर चर्चा शुरू होगी.
दरअसल, जब तक शिक्षा सिस्टम में सुधार की बात नहीं होगी तब तक नकल रोकने की बात करना बेमानी है. कोई बच्चा नकल करना सीख कर नहीं आता, हमारी शिक्षा का सिस्टम और पढ़ाई का ढंग उस को नकल करना सिखाता है.
कैसेकैसे सवाल
– हिंदी
‘प्रगतिशील लेखक संघ’ की स्थापना कब हुई?
‘आन का मान’ नाटक के कथानक पर प्रकाश डालिए.
‘राजमुकुट’ नाटक की कथा संक्षेप में लिखिए.
उत्तर प्रदेश शिक्षा बोर्ड की 12वीं जमात के इम्तिहान में सामान्य हिंदी के प्रश्नपत्र से ये कुछ सवाल हैं. इन सवालों से इम्तिहान देने वालें को क्या हासिल होगा? सामान्य हिंदी के सलेबस में ऐसे सवाल होने चाहिए जिन से बच्चे को ठीक से हिंदी व्याकरण सिखाई जा सके. उस की हिंदी पढ़ने में दिलचस्पी बढ़ सके.
50 नंबर के प्रश्नपत्र को हल करने के लिए 3 घंटे का समय दिया जाता है. हिंदी के प्रश्नपत्र में पूछे जाने वाले सवाल ही ऐसे होते हैं कि 15 मिनट तो छात्र को समझने में लगते हैं. यह केवल हिंदी के प्रश्नपत्र का हाल नहीं है, हर सब्जैक्ट की यही हाल है. हर सब्जैक्ट में ऐसेऐसे सवाल होते हैं जिन का छात्र के भविष्य से कोई मतलब नहीं होता है.
– राजनीतिशास्त्र
दबाव समूह एवं राजनीतिक दल का एक अंतर लिखिए?
सवैधानिक उपचारों के अधिकारों को समझाएं?
समानता के 2 प्रकार बताएं?
साल 2006 में राजनीतिशास्त्र में पूछे गए इन सवालों से पता चलता है कि इन की क्या उपयोगिता है. प्रश्नपत्रों की बात तो जाने दीजिए ‘दवाब समूह’ क्या है यह आम आदमी भी नहीं बता सकता. हर सब्जैक्ट में ऐसेऐसे सवालों की भरमार होती है. ऐसे सवाल ही बच्चों में नकल को बढ़ावा देने का काम करते हैं.
प्राइमरी स्कूल से ही शुरू हों सुधार
समाजसेवी और ‘मैग्सेसे अवार्ड’ विजेता डाक्टर संदीप पांडेय कहते हैं, ‘‘10वीं और 12वीं जमात के बच्चे नकल इसलिए करते हैं क्योंकि प्राइमरी जमातों से ही उन की पढ़ाई का लैवल बहुत नीचा होता है. सरकारी स्कूलों की हालत खराब है. वहां गरीब घरों के बच्चे पढ़ते हैं इसलिए उन स्कूलों के सुधार में किसी की दिलचस्पी नहीं रह गई है. हालत यह है कि प्राइमरी स्कूल में पढ़ाने वाले बहुत से टीचर तक अपने बच्चों को इन स्कूलों में नहीं पढ़ाना चाहते. जब स्कूल टीचर को ही अपने स्कूल पर भरोसा नहीं तो दूसरे लोगों की बात कौन करे.
‘‘कोर्ट ने अपने आदेश में कहा है कि सरकारी नौकरी करने वालों के लिए जरूरी नियम बनाया जाए कि वे अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में पढ़ाएं. सरकार ने इस आदेश को दरकिनार कर दिया. जब तक असरदार लोगों का ध्यान इन स्कूलों की तरफ नहीं जाएगा यहां सुधार नहीं होगा.
‘‘सरकार ने शिक्षा अधिकार कानून बना कर प्राइवेट स्कूलों में गरीब बच्चों को पढ़ाने का हक दिया पर इस का सही से पालन नहीं हो रहा है. आज जरूरत इस बात की है कि देश में एकसमान शिक्षा व्यवस्था लागू हो, तभी छात्रों का भला होगा.’’
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