जीवन को गुलाम बना देता है धर्म

सुप्रीम कोर्ट चाहे लाख कह ले कि हर वयस्क को प्रेम व विवाह का मौलिक अधिकार है और किसी बजरंगी, किसी खाप, किसी सामाजिक या धार्मिक गुंडे को हक नहीं कि इस अधिकार को छीने, मगर असल में धार्मिक संस्थाएं विवाह के बीच बिचौलिए का हक कभी नहीं छोड़ेगी. विवाह धर्म की लूट का वह नटबोल्ट है जिस पर धर्म का प्रपंच और पाखंड टिका है और इस में किसी तरह का कंप्रोमाइज कोई भी धर्म नहीं सहेगा, सुप्रीम कोर्ट चाहे जो कहे.

जो भी धर्म के आदेश के खिलाफ जा कर शादी करेगा, सजा सिर्फ उसे ही नहीं, बल्कि पूरे परिवार और रिश्तेदारों को भी मिलेगी. सब को कह दिया जाएगा कि इस परिवार से कोई संबंध न रखो. कोई पंडित, मुल्ला, पादरी शादीब्याह न कराएगा. श्मशान में जगह नहीं मिलेगी, लोग किराए पर मकान नहीं देंगे, नौकरी नहीं मिलेगी.

धर्म का जगव्यापी असर है. जब लोग 7 समंदर पार रहते हुए भी कुंडली मिलान के बाद विवाह करते हों, गोरों व कालों की कुंडली भी बनवा लेते हों ताकि सिद्ध किया जा सके कि धर्म, रंग और नागरिकता अलग होने के बावजूद विवाह विधिविधान से हुआ है, तो क्या किया जा सकता है. सुप्रीम कोर्ट की फुसफुसाहट हिंदुत्व के नगाड़ों के बीच खो जाएगी.

पारंपरिक शादियां चलती हैं, तो इसलिए कि शादी चलाना पतिपत्नी के लिए जरूरी होता है, उन का कुंडली, जाति, गोत्र, सपिंड, धर्म से कोई मतलब नहीं होता. शादी दिलों का व्यावहारिक समझौता है. एकदूसरे पर निर्भरता तो प्राकृतिक जरूरत है ही, सामाजिक सुरक्षा के लिए भी जरूरी है और इस के लिए किसी धर्मगुरु के आदेश की जरूरत नहीं. यदि प्यार हो, इसरार हो, इकरार हो, इज्जत हो तो कोई भी शादी सफल हो जाती है. बच्चे मातापिता पर अपनी निर्भरता जता कर किसी भी बंधन को, शादी को ऐसे गोंद से जोड़ देते हैं कि सुप्रीम कोर्ट, कानून या कुंडली की जरूरत नहीं.

कुंडली, जाति, गोत्र, सपिंड के प्रपंच पंडितों ने जोड़े हैं, ये धर्म की देन हैं, प्राकृतिक या वैज्ञानिक नहीं. शादी ऐसा व्यक्तिगत कृत्य है जो व्यक्ति के जीवन को बदल देता है और धर्म इस अवसर पर मास्टर औफ सेरिमनीज नहीं मास्टर परमिट गिवर बन कर पतिपत्नी को जीवन भर का गुलाम बना लेता है.

शादी में धर्म शामिल है, तो बच्चे होने पर उसे बुलाया जाएगा और तभी उसे धर्म में जोड़ लिया जाएगा ताकि वह मरने तक धर्म के दुकानदारों के सामने इजाजतों के लिए खड़ा रहे.

विधर्मी से विवाह पर धर्म का रोष यही होता है कि एक ग्राहक कम हो गया है. चूंकि दूसरे धर्म का ग्राहक भी कम होता है, दोनों धर्मों के लोग एकत्र हो कर इस तरह के विवाह का विरोध करते हैं. आमतौर पर शांति व सुरक्षा तभी मिलती है जब पति या पत्नी में से एक धर्म परिवर्तन को तैयार हो.

अगर उसी धर्म में गोत्र या सपिंड का अंतर भुला कर शादी हो रही हो तो धर्म के दुकानदारों के लिए दोनों को मार डालने के अलावा कोई चारा नहीं होता. शहरों में तो यह संभव नहीं होता पर गांवों में इसे चलाना आसान है, संभव है और लागू करा जा सकता है.

सुप्रीम कोर्ट चाहे जितना कह ले, जब तक देश में धर्म के दुकानदारों का राज है और आज तो राज ही वे कर रहे हैं, सुप्रीम कोर्ट का आदेश केवल नरेंद्र मोदी के अच्छे दिन आ चुके हैं, जैसा है.

बड़ा फील करने के अवसर पगपग पर

हर आदमी बड़ा होना, बड़ा बनना चाहता है. लेकिन हर आदमी बड़ा बन नहीं सकता. यदि सभी बड़े बन जाएं तो फिर कोई बड़ा नहीं रहेगा क्योंकि कोई छोटा नहीं बचेगा. आदमी जो मुकाम हासिल नहीं कर पाता है, वह उस के अवचेतन में बैठ जाता है और समयसमय पर प्रकट होता है. कोई सोते में सपने देखता है तो कोई जागते में देखता है. वैसे, जो बड़ा नहीं बन पाया उस के लिए हर जगह अवसर उपलब्ध हैं कि वह अपनेआप को दूसरों से बड़ा फील करे. एक उदाहरण ले लें, एक प्रसिद्ध गायक का कार्यक्रम शहर के औडिटोरियम में चल रहा था. हजारों की भीड़ होने से जगह की मारामारी हो रही थी. कुरसियां भीड़ से काफी कम थीं. जो पहले आ गए वे कुरसी पा गए. जो देर से आए उन्हें यहांवहां खड़ा होना पड़ा. अब जो कुरसी में बैठे थे वे इन खड़े लोगों से अपने को बड़े समझने लगे. यह भाव उन में ज्यादा झलक रहा था जिन की कुरसी के बिलकुल पास 10-15 लोग खड़े थे. वे अब कार्यक्रम कम देख रहे थे, खड़े लोगों को ज्यादा देख रहे थे. यहां अवसर था छोटे होते हुए भी अपने को बड़ा फील करने का. एकदो चवन्नी के चलन से बाहर होने के बाद भी अपनेआप को हजार रुपए के सिक्के के बराबर समझ रहे थे. बड़े होने के अवसर बड़ा न होते हुए भी हर जगह हैं.
दूसरी स्थिति लीजिए, आप भद्र पुरुष हैं. अचानक शहर से बाहर जाना पड़ा. ट्रेन में आरक्षण नहीं मिला. आप को स्लीपर में बिना आरक्षण के जाना पड़ा. ट्रेन में खचाखच भीड़ थी. कई लोग अर्थ पर थे, मतलब फर्श पर. आप जिस बर्थ पर बैठे, वह आरक्षित थी. बैठे हुए सज्जन ने पहले तो कोई प्रतिक्रिया नहीं की लेकिन बाद में पूछ बैठे कि आप का बर्थ नंबर कौन सा है. आप ने कहा कि अभी तो टीटीई का इंतजार कर रहे हैं. आप ने उसे बड़ा फील करने का अवसर प्रदान कर दिया. वह बड़ा फील कर रहा था लगातार और आप उस के रहमोकरम पर थे. आप जब कभी अर्थ पर बैठे लोगों और कभी इस को देखते तो आप को लगता कि वह आप से बड़ा है. उस के चेहरे के हावभाव से ऐसा लगता भी था. ऐसे ही स्थिति सिटी बसों में भी बनती है यदि आप को खड़ा होना पड़े और कोई बैठा हो. लेकिन यहां बड़ा होने का खयाल बहुत कम समय के लिए रहता है. जो आज सीट पर बैठा है वह कल खड़ा हो कर छोटा फील कर सकता है.
छोटा होते हुए बड़ा फील करने के बड़े अवसर हैं. आप सिनेमा देखने सपरिवार गए हैं. लाइन में लगे हैं टिकट लेने के लिए और आप के पहले वाले को टिकट मिल गया है. आप के आते ही टिकटखिड़की धड़ाम से बंद हो जाती है. अब जिसे टिकट मिल गया है उस के चेहरे पर मुसकान है. आप के चेहरे पर मायूसी. वह बड़ा फील कर रहा है. छोटा आदमी हो सकता है, फेरी लगा कर पेट भरता हो या गुब्बारे बेचता हो लेकिन इस समय उस का मुंह प्रसन्नता की हवा से गुब्बारे की तरह फूल कर कुप्पा हो गया है. आज सपरिवार वह इस हिट मूवी को देखेगा और आप टिकटरूपी खेल में हिटविकेट हो गए हैं. आप की पत्नी का भी मुख फूल कर कुप्पा हो गया है लेकिन यह नाराजगी की हवा भरने से हुआ है.
यही तत्काल के आरक्षण की लाइन में भी होता है. आप सुबह 6 बजे से जा कर लाइन में लग गए हैं. आप के पहले 4 बजे से ही कई लोग लगे हैं. 8 बजे खिड़की छपाक से खुलती है, काम शुरू हो गया है. कैसे पता चला? रेलवे के चरमराते हुए डौट मैट्रिक्स प्रिंटर की कर्णभेदी ध्वनि लय में सुनाई दे रही है.
लाइन में सब बराबर हैं रिकशे वाला, आटो वाला, फेरी वाला, बाबू, अधिकारी, व्यापारी, प्रोफैशनल. लेकिन आप के नंबर आने के पहले 4 आदमी और हैं. आप व पीछे के सभी हाथ मलते रह गए जब छपाक से खुली खिड़की धड़ाम से बंद हो गई. ऐसी कि लगा कि धड़कन न बंद हो जाए. अब जो आदमी आरक्षण करवा कर जा रहा था, वह आप जैसे छोटे रह गए लोगों के सामने अपने को बड़ा समझेगा ही. आप बड़े बाप की औलाद हो, कार से कालेज आते हो. आप के कालेज का आज रिजल्ट आया है. आप सैकंड ग्रेड में आए हैं जबकि रामरतन मोची का साइकिल में आने वाला लड़का फर्स्ट ग्रेड में है. अब उस का समय है बड़ा फील करने का.
बड़ा फील करने का अवसर तो किसी होटल बुक करते समय भी उपलब्ध है. सीजन है, होटल्स बुक हैं. पर्यटकों से भरे पड़े हैं. आप भी पहुंच गए हैं. होटलों के चक्कर काट रहे हैं. कहीं कमरा नहीं मिला. 7वीं होटल में आए हैं. एक ही कमरा बचा है. एक अनार और 4 बीमार, 3 और लोग कमरे को खोजते आ गए हैं. एक ज्यादा व्यावहारिक निकला. ऐसे मौके पर उस ने बिना कमरे को देखे ही हां कर बुक कर दिया. अब आप तीनों छोटों के सामने वह अंदर ही अंदर मुसकराता हुआ बड़ा फील कर रहा है.
भगवानों की दुकानों में भी लोग अपने को बड़ा फील करते हैं या करवाते हैं. कहने को यहां सब बराबर होने चाहिए लेकिन कई लोग खुद दुकानदार पंडों को पैसा दे कर उन से वीआईपी पास बनवा लेते हैं और लाइन से हट कर सीधे पूजा के प्रोडक्ट के सामने पतली गली से पहुंच जाते हैं. श्रद्धालुओं की भारी भीड़ देखते ही रह जाती है और ये अपने को बड़ा फील करने लगते हैं. बड़ा फील करने के अवसर हर जगह हैं. बड़ा बनना बड़ा कठिन है, बड़ा फील करना बड़ा आसान है. बस, मौका मिलना चाहिए. ठीक है समय ने आप को अभी तक छोटा ही रखा है. लेकिन बड़ा फील करने, थोड़ी देर के लिए बड़ा बन जाने के अवसर पगपग पर हैं.
वैसे भी, इस देश में आम आदमी छोटा ही रह जाता है ताउम्र. यहां बड़ा माना जाता है उस को जिस के पास धनदौलत हो, भले ही वह घोटालेबाजी से, कालाबाजारी से या सरकारी धन में पलीता लगा कर की गई कमाई हो. और यहां बड़ा बनने के अवसर अधिकारी, ठेकेदार, नेता व दलालों को ज्यादा मिलते हैं. तो फिर, बड़ा फील करने के जितने अवसर मिलते हैं उन को एंजौय करने में ही समझदारी है.

औकात : सतिया के बदन से खेल पाया प्रधान

रामसकल का अपने गांव और आसपास के इलाके में रुतबा था. कुछ समय पहले घर की माली हालत अच्छी नहीं थी, लेकिन रामसकल के 2 भाइयों के बैंकौक जा कर पैसा कमाने से पासा पलट गया और पतझड़ बने घर में हरियाली छा गई.

पैसों की कमी नहीं होने पर रामसकल एक ईंट भट्ठा खोल कर घर पर ही पैसों की बरसात करने लगे. घर के बाहर समाज में सब से अच्छे बरताव से रहना उन की दिनचर्या बन गई. इस तरह चारों दिशाओं से इज्जत और दौलत मिलने लगी.

गांव में प्रधान के चुनाव का समय आ गया था. रामसकल के मन में भी प्रधान बनने के अंकुर फूटने लगे थे.

कुछ लोगों से इस बारे में बात भी की. सभी लोग रजामंद हुए और खुश भी, क्योंकि रामसकल दीनदुखियों की मदद करते थे. सब को लगता था कि अगर वे प्रधान बन जाएंगे, तो गांव की हालत सुधर जाएगी.

धीरेधीरे चुनाव का समय आ गया. जोरशोर से चुनाव का प्रचार हो रहा था. रामसकल का गांव 7 मोहल्लों में बंटा हुआ था. उन के विपक्ष में दूसरे मोहल्लों के 3 उम्मीदवार खड़े थे. जब चुनाव का नतीजा आया, तो रामसकल भारी वोटों से जीते थे.

सभी लोगों ने उन्हें फूलमालाओं से लाद दिया था. कुछ लोग उन्हें अपने कंधों पर उठा कर नाचने लगे. जीत की खुशी में शाम को उन के घर जम कर पार्टी हुई. जो जैसा था वैसा शाकाहारी, मांसाहारी और शराब का मजा लिया.

समय का पहिया अपनी रफ्तार से चलता रहा. रामसकल घरघर जा कर सभी की समस्याओं को सुनते और हल करते.

रामसकल ने गांव के ही बैजू को अपना पर्सनल सैके्रटरी बनाया था. वह था तो बहुत चालाक, लेकिन शराब और शबाब उस की कमजोरी थी.

इन 5 सालों में रामसकल प्रधान ने तमाम काम कर दिखाए. पैसे की कमी थी नहीं कि वे सरकारी पैसा चुराते.

जब आदमी के पास शोहरत और दौलत होती है, तब अहंकार का भी जन्म होता है. रामसकल लगातार 3 बार प्रधान बन चुके थे. इन 15 सालों से प्रधान रहते हुए उन को भी अहंकार ने घेर लिया था.

दरअसल, उन के सैके्रटरी बैजू का संबंध गांव की ही एक विधवा औरत से था. एक दिन शराब के नशे में बैजू ने अपनी प्रेमिका सतिया का जिक्र उन से कर दिया.

यह सुन कर प्रधान रामसकल की भी लार टपकने लगी. उसी दिन से वे सतिया को पाने के लिए बिस्तर पर करवटें बदलने लगे. लेकिन समाज में अपनी इज्जत भी तो देखनी थी.

लेकिन उन से रहा नहीं गया. एक दिन बैजू को चुपके से 5 हजार रुपए देते हुए प्रधान रामसकल ने अपनी इच्छा जाहिर कर दी.

बैजू तो जैसे खुश हो कर बोला, ‘‘किसी को कानोंकान खबर भी नहीं होगी और आज ही शाम को मैं इंतजाम कर दूंगा.’’

शाम होते ही बैजू सतिया को ईंट के भट्ठे पर ले आया. शराब और मुरगा खानेपीने के बाद आधी रात तक प्रधान ने सतिया के बदन से खेल कर अपने मन की प्यास बुझा ली. इस के बाद बैजू से उसे उस के घर छोड़ आने को कहा.

अब तो जब भी प्रधान रामसकल का मूड सतिया से खेलने का होता, तो ईंटभट्ठे पर उस से मिलते. बाद में बैजू भी सतिया की जवानी का मजा ले कर उसे घर छोड़ देता.

सतिया का घर गांव के किनारे रास्ते पर ही था, इसलिए कोई ध्यान नहीं देता था कि वह कहां आतीजाती है.

जब तक आदमी कीचड़ से बचता है, तब तक साफसुथरा रहता है, लेकिन जब एक बार कीचड़ में पैर पड़ जाता है, तो कीचड़ की परवाह नहीं करता. यही हाल अब प्रधान रामसकल का भी हो चुका था.

वे औरत के नशे में आ कर जनता की समस्याओं की अनदेखी करने लगे थे. एक बार उन्होंने गांव के कोटेदार काशीनाथ सिंह को भी जनता के सामने खूब खरीखोटी सुनाई, जबकि उस की कोई गलती नहीं थी.

इस बात से गुस्साई जनता ने कोटेदार काशीनाथ सिंह के बेटे महावीर सिंह को अब की चुनाव में खड़ा कर के भारी वोटों से जिता दिया और रामसकल को औकात दिखा दी.

प्रधान रामसकल की हालत खिसियानी बिल्ली की तरह हो गई थी. उन का सारा अहंकार बर्फ की तरह पिघल कर बह गया था. हाथ आई तो सिर्फ बदनामी.

शिक्षित युवाओं का आतंक

आज पूरी दुनिया में आतंक पसरा हुआ है. अब तो शिक्षित युवा भी आतंक फैला रहे हैं. सितंबर माह में ही जम्मूकश्मीर के बनिहाल में एसएसबी पर हुए जानलेवा आतंकी हमले में शामिल 2 आतंकी तो पहले ही गिरफ्त में आ गए थे जबकि तीसरे आतंकी आकिब वाहिद को बाद में अरेस्ट किया गया. आकिब अनंतनाग के डिगरी कालेज में बीएससी का छात्र है. इसी तरह ढाका में हुए आतंकी हमले में यही बात सामने आई थी कि जिन हमलावरों की पहचान हुई है, वे सभी अमीर घरों से संबंध रखते थे और अच्छे, जानेमाने स्कूलोंकालेजों में पढ़े थे. 2 हमलावर, जिन की मौत गोलीबारी में हुई, वे अच्छे खातेपीते परिवार के थे. इन में से एक निबस इसलाम, देश के एक अभिजात निजी विश्वविद्यालय, नार्थसाउथ यूनिवर्सिटी से पढ़ा था, वहीं दूसरा हमलावर मीर सबीह और रोशन इम्तियाज भी देश के सब से बढि़या स्कूलों में पढ़े थे.

रोशन इम्तियाज की पहचान बंगलादेश ओलिंपिक एसोसिएशन के उपमहासचिव इम्तियाज खान बाबुल के बेटे के रूप में हुई. अब यह बात गलत साबित हो रही है कि इसलामिक स्टेट और अलकायदा की पहुंच केवल गरीब घरों के युवाओं तक है. अब इन में अमीर और पढ़ेलिखे घराने के युवा भी शामिल हो रहे हैं. एक समय कहा जाता था कि कम पढ़ेलिखे युवा ही आतंकवादियों के झांसे में आ कर आतंक के रास्ते पर चलते हैं, लेकिन अब आतंक की राह पकड़ने वाले नौजवान अनपढ़जाहिल नहीं, बल्कि शिक्षित और डिगरीधारी हैं, जो अपने आकाओं के इशारे पर दुनियाभर में मारकाट मचा रहे हैं.

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बेकार हैं ऐसी डिगरियां

दिल्ली, अहमदाबाद, बेंगलुरु, जयपुर और वाराणसी में हुए बम धमाकों को अंजाम देने वाले खूंखार आतंकियों के मामले में जो समानता सामने आई थी उस ने सब को चौंका दिया. ये सभी आतंकी न केवल पढ़ेलिखे बल्कि इन के पास इंजीनियरिंग, मैनेजमैंट और आईटी की डिगरियां भी थीं. कुछ समय पहले पुणे की एक पढ़ीलिखी युवती के बारे में खबर सुर्खियों में आई थी, जिस में मैडिकल की पढ़ाई करने की इच्छा रखने वाली यह छात्रा सोशल नैटवर्किंग के जरिए आतंकी संगठन के संपर्क में आई और सीरिया जाने को तैयार हो गई.

ऐसे अनगिनत मामले हैं जो साफसाफ इशारा करते हैं कि इन युवाओं को दीनहीन समझने की जरूरत नहीं है. हमारे समाज, परिवार और देश के लिए ये युवा खलनायक बन चुके हैं. ऐसे युवाओं को सही रास्ते पर लाने की जरूरत है. पारिवारिक जागरूकता भी इस का अहम पहलू है. यहां जरूरी यह है कि ऐसी बातें सामने आने पर परिवार उन्हें दबाने की कोशिश न करे बल्कि इन का हल खोजे. ऐसे कृत्यों में चालाकी दिखाने का कोई लाभ नहीं है, क्योंकि आतंक की राह पर चल रहे युवा अपने परिवार का भी भला नहीं करेंगे.

मां तक का गला रेत डाला

यह विडंबना ही है कि खुद एक स्तरीय जिंदगी जी रहे युवा दूसरों के परिवार उजाड़ने के लिए हथियार उठा रहे हैं. ढाका के रेस्तरां में हुए आतंकी हमले में एक ऐसी मां का भी गला रेत दिया गया, जिस की कोख में 7 महीने का गर्भ पल रहा था.

आखिर बर्बरता की राह पकड़ चुके ये युवा चाहते क्या हैं? इन युवाओं को जिस उम्र में अपने देश की बेहतरी और सकारात्मक बदलाव की सोच रखनी चाहिए थी उस उम्र में ये सबकुछ उजाड़ने पर तुले हैं. इन से सहानुभूति रखने वाले लोगों को भी यह सोचना चाहिए कि उन की ये हरकतें न जाने कितने बच्चों का भविष्य बरबाद कर रही हैं. आज ऐसे सिरफिरों के संगठन न केवल दुनिया के लिए नासूर बन गए हैं बल्कि ये अपने परिवारों को भी पीड़ा दे रहे हैं. ढाका आतंकी हमले में वहीं की सत्तारूढ़ पार्टी के नेता का बेटा कुछ समय पहले ही घर से लापता हुआ था. उस की गुमशुदगी की रिपोर्ट भी थाने में लिखवाई गई थी. ऐसे युवाओं के मातापिता यह समझ लें कि ऐसे बच्चे अपनों के भी नहीं होते.

बेगुनाहों का कत्लेआम

बेगुनाहों के कत्लेआम को अंजाम देने वाले ये कुत्सित मानसिकता के युवा आज खुद अपने देशों के लिए ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया के लिए खौफ का कारण बन गए हैं. कई संगठित गिरोह इन्हें अपने मनसूबे पूरे करने के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं. अब तक ऐसे कई मामले सामने आए हैं जिन में आईएसआईएस जैसे आतंकी संगठन भारत ही नहीं, पूरी दुनिया में अपनी पैठ बनाने के लिए उतावले हैं. वे सोशल नैटवर्किंग साइट्स के माध्यम से नौजवानों से संपर्क कर उन्हें बरगलाने का काम कर रहे हैं. कभी जिहाद के नाम पर तो कभी मोटी रकम का लालच दे कर यह काम किया जा रहा है. यह विडंबना ही है कि पढ़ेलिखे युवा भी इन के जाल में फंस रहे हैं.

यह कैसी जन्नत

अगर हम जीवन के किसी भी पहलू को देखें तो आतंकी मानसिकता वाले ऐसे शातिर युवा प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सभी को प्रभावित करते हैं. यही कारण है कि आतंकवाद के मार्ग पर चलने वाले ये युवा न केवल सभी देशों की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बड़ी चुनौती हैं बल्कि सामाजिक व मानवीय मोरचे पर भी चिंतनीय हैं.

ग्लोबल टैरर इंडैक्स के अनुसार, आज दुनिया के एकतिहाई देश आतंकी हिंसा के शिकार हैं. यह ऐसा दंश है जो किसी देश के पूरे सामाजिक, आर्थिक और पारिवारिक ढांचे की नींव हिला देता है. कई अमीर घरों तक इसलामिक स्टेट और अलकायदा की पहुंच ने यह मिथक तोड़ दिया है कि वैश्विक आतंकवाद में सिर्फ गरीब घरों के युवा ही शामिल हैं.

पढ़ेलिखे, समृद्ध पृष्ठभूमि के कई युवाओं को आतंकी गतिविधियां आकर्षित कर रही हैं. वे इसलाम की खातिर और जन्नत के  नाम पर दुनिया में कहीं भी हमला करने को तैयार हैं. इन का जाल अब एशिया से ले कर पश्चिमी देशों तक फैल गया है. इन के पास पैसा ही नहीं, दिमागी क्षमता भी बहुत अधिक है. सोशल साइट्स ने इन की पहुंच दूरदराज के पढ़ेलिखे युवाओं तक कर दी है जो आज यह पूरी दुनिया के लिए नई चुनौती बन गई है.

बेटा घर नहीं लौटा

बंगलादेश के एक हमलावर की उम्र महज 18 साल थी. खातेपीते परिवार का यह युवक कैसे कट्टरपंथियों के हत्थे चढ़ गया? इसी सवाल का जवाब उस के पिता खोज रहे हैं. रमजान के महीने का आखिरी जुम्मा था. मीर हैयत कबीर उम्मीद लगाए बैठे थे कि शायद आज उन का बेटा घर लौट आएगा. पिछले 4 महीने से बेटे की कोई खबर नहीं थी. उन्हें यह भी समझ नहीं आ रहा था कि वह खुद ही घर छोड़ कर चला गया या किसी के कब्जे में है.

एक दिन खबर आई कि 18 साल का मीर सामेह मुब्बशीर ढाका में पुलिस के हाथों मारा गया. वह उन 5 बंदूकधारियों में से एक था, जिन्होंने ढाका के एक रेस्तरां पर हमला कर 20 लोगों की जान ली थी. पिता सदमे में हैं, समझ नहीं पा रहे हैं कि उन के बेटे ने यह राह क्यों चुनी.

मुब्बशीर ने अपना बचपन गरीबी या मुश्किलों के बीच नहीं बिताया था. वह ढाका का रहने वाला था और अच्छे परिवार से था. रोज स्कूल जाने वाला, कम बोलने वाला. ‘कहीं तो कुछ गलत हुआ है, कहीं कुछ गड़बड़ हुई है,’ अपने आंसू रोकते हुए पिता बारबार यही दोहरा रहे थे. उन्हें बारबार अखबारों और टीवी पर अपने बेटे का नाम देखने को मिल रहा था, लेकिन उन्हें यकीन नहीं हो रहा था कि उन का बेटा आतंकियों से जा मिला और मारा गया.

मुब्बशीर का बचपन सामान्य उच्च मध्यवर्गीय परिवार में बीता था. उसे डायनासौर पसंद था. वह जानवरों के नाम याद करता था. एक बार वह परिवार के साथ ताजमहल देखने भारत आया था. उस से प्रभावित हो कर वह मुगल राजाओं और दुर्गा की तसवीरें बनाने लगा था. स्कूल में उस ने 1971 की जंग और आजादी के बारे में पढ़ा, तो इतिहास में रुचि बढ़ गई. उसे कार्टून देखने का बहुत शौक था. वह अंगरेजी फिल्में भी देखा करता था. स्कूल में बच्चे उसे मां का लाड़ला कह कर चिढ़ाते थे.

वह घर के पास वाली मसजिद में जाता और दिन में 5 बार नमाज भी पढ़ता. उस के पिता बताते हैं कि गायब होने से पहले उन्हें उस के रवैए में कोई खास बदलाव देखने को तो नहीं मिला, लेकिन उन का ध्यान इस ओर जरूर गया था कि बेटे ने फेसबुक का इस्तेमाल कम कर दिया था और अब वह हर वक्त पढ़ता रहता था.

मुब्बशीर की ही तरह बाकी हमलावर भी बंगलादेश के अच्छे स्कूलों में पढ़े थे और अच्छे परिवारों से नाता रखते थे. ऐसे में पूरा देश इस वक्त यही सवाल कर रहा है कि इन युवाओं के साथ आखिर हुआ क्या.

एक अन्य आतंकी की पहचान 22 साल के निबस इसलाम के रूप में की गई, जिस ने मलयेशिया की मोनाश यूनिवर्सिटी से बैचलर्स की पढ़ाई की थी. वहां सालाना फीस 9 हजार डौलर है. ऐसे में अब गरीबी और अनपढ़ता को आतंकवाद के लिए जिम्मेदार नहीं माना जा सकता.

हाल ही में आतंकवादियों की जो नई खेप आई है, वह हमारे देश की खराब उपज है. आज राजनीतिक हालात बदलते जा रहे हैं, ऐसे में यह युवापीढ़ी अपनेआप को असुरक्षित महसूस कर रही है. इन को सही दिशा देने की जरूरत है.

दुर्वासा बनते अन्ना हजारे

द्वापर युग में एक थे भीष्म पितामह, जिन्हें इच्छामृत्यु का वरदान मिला हुआ था. पांडवों ने बड़ी मिन्नतें कर उन का वध किया तब कहीं जा कर वे हस्तिनापुर पर काबिज हो पाए थे. किंवदंती यह है कि खुद भीष्म ने उन्हें अपनी मौत का तरीका बताया था. मौजूदा बात एकदम इस के उलट है. समाजसेवी अन्ना हजारे ने जोरदार दहाड़पत्र के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से पूछा है कि आप ही बताइए कि 23 मार्च से दिल्ली में आंदोलन और अनशन किस जगह पर करूं.

अब अन्ना हजारे पूरी तरह नरेंद्र मोदी पर हमलावर होते उन पर तरहतरह के आरोप लगा रहे हैं कि उन की सरकार भ्रष्टाचार रोकने में नाकाम रही है और जन लोकपाल विधेयक को उन्होंने कमजोर कर दिया है. बकौल अन्ना हजारे, उन्होंने 30 चिट्ठियां नरेंद्र मोदी को लिखीं पर उन्हें एक का भी जवाब नहीं मिला. अब गेंद मोदी के पाले में है कि अन्ना के इस आखिरी आंदोलन का शिकार बनने की जगह का चुनाव वे खुद करें.

सैल्फी का जानलेवा जनून

आज के दौर में सैल्फी युवाओं व किशोरों के लिए फैशन व जनून बन गई है. वे अपनी मनचाही तसवीरें खींचते हैं और सोशल नैटवर्किंग साइट्स के अलावा व्हाट्सऐप पर अपने दोस्तों से शेयर करते हैं. इस में उन की खुशियां, फैशन और भाव झलकते हैं. इस में कोई दो राय नहीं कि अपनी तसवीरें लेने का सब से बेहतरीन और आसान तरीका सैल्फी ही है.

यह सुनहरा पहलू है, लेकिन दूसरा चिंताजनक पहलू यह है कि भारत में सैल्फी से होने वाली मौतों का आंकड़ा तेजी से बढ़ रहा है. स्थिति उन के लिए और भी खतरनाक है जो सैल्फी के लिए सारी हदों को लांघ जाते हैं. वे भूल जाते हैं कि जिंदगी की अहमियत एक सैल्फी से कहीं ज्यादा होती है.

खतरनाक सैल्फी लेने की होड़ में कब किस की सैल्फी आखिरी साबित हो जाए इस को कोई नहीं जानता. इस के खतरनाक रूप सामने आने के बाद युवाओं को खतरों से बचाने के लिए अब कानून का सहारा लेना पड़ रहा है. रेलवे ने पटरियों को ‘नो सैल्फी जोन’ घोषित कर दिया है. ऐसा करने वालों को जेल की हवा खाने के साथ जुर्माना भी भरना पड़ सकता है. यात्रियों को खतरों से आगाह भी किया जाएगा.

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युवाओं के लिए बनी खतरा

जब वर्ष 2005 में सैल्फी शब्द सामने आया, तो शायद ही किसी ने सोचा होगा कि वह इतना चर्चित हो जाएगा और खतरा भी बनेगा. शब्द की तेजी से हुई चर्चाओं का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वर्ष 2013 तक यह सब से ज्यादा चर्चित हो गया.

औक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी ने सैल्फी को वर्ल्ड औफ द ईयर तक चुना. यह युवाओं के दिमाग पर छा गया. हर हाथ में मोबाइल और सैल्फी का फैशन पंख लगा कर चल रहा है. इस के लिए दीवानगी है. नेताओं और फिल्मों ने भी इस को बढ़ावा दिया. नौबत ऐसी आ गई कि रेलवे को ‘नो सैल्फी’ की गाइडलाइन जारी करनी पड़ गई. ऐसी नौबत आने के पीछे भी बड़े कारण रहे.

ट्रेन में सफर करते समय खतरनाक तरीके से व पटरी पर सैल्फी लेना युवाओं की मौत का सबब बन गया. पहले हुए कई गंभीर हादसों की कड़ी में ताजा कई हादसे भी जुड़ते गए. मुंबईहावड़ा ऐक्सप्रैस में बिलासपुर के निपनिया के पास बोगी के गेट से बाहर लटक कर रेलवे पुल और अपनी सैल्फी लेते एक युवक का संतुलन बिगड़ गया और वह नदी में जा गिरा.

इसी तरह दुर्ग में भी ऐसा ही हादसा हुआ. खारून पुल के पास सैल्फी लेता एक युवक पैर फिसलने से गिर गया. वह दरवाजे पर लटक कर सैल्फी ले रहा था.

उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में तो चलती ट्रेन के आगे सैल्फी लेने की चाहत में एक किशोर ने अपनी जान गवां दी. गीता कालोनी का रहने वाला कार्तिक कक्कड़ 10वीं का छात्र था. वह पढ़ाईलिखाई, खेलकूद में अव्वल था. उसे सैल्फी लेने का बहुत शौक था. वह तरहतरह की सैल्फी दोस्तों तक पहुंचाता था. एक दिन सुबह कार्तिक अपने दोस्तों समीर, प्रत्यूष व रोहित के साथ लढ़ौरा रेलवे फाटक पर सैल्फी लेने पहुंच गया. उस की ख्वाहिश थी कि सैल्फी चलती ट्रेन के आगे ली जाए ताकि रियल लुक आ सके.

उसे हरिद्वारअजमेर ऐक्सप्रैस ट्रेन आती दिखी, तो वह ट्रैक पर आ गया और सैल्फी लेने लगा. ट्रेन की रफ्तार का उसे अनुमान नहीं था. ट्रेन चालक ने उसे हटाने के लिए कई बार हौर्न दिया, लेकिन वह नहीं हटा. आखिर कार्तिक ट्रेन की चपेट में आ गया. करीब सौ मीटर दूर जा कर चालक ने ट्रेन रोकी. अगले हिस्से में फंसे उस के शरीर के टुकड़ों को निकाला गया. मौके पर उस के शरीर के हिस्से, मोबाइल के टुकड़े, जूते बिखर चुके थे. इस खौफनाक मंजर ने हर किसी को दहला दिया. एक सैल्फी के लिए उसे जान से हाथ धोना पड़ा. इस से उस के परिवार को जो दर्द मिला उस की भरपाई शायद ही कभी हो सके.

इसी दिन मिर्जापुर जिले में भी 2 युवाओं को चलती ट्रेन से सैल्फी लेना भारी पड़ गया. दरअसल, विनोद व जितेंद्र नामक युवक दिल्लीगुवाहटी ब्रह्मपुत्र मेल के बराबर में पटरियों पर खड़े हो कर सैल्फी ले रहे थे. तभी दूसरी तरफ से सिंगरौलीवाराणसी इंटरसिटी ट्रेन आ गई और वे उस की चपेट में आ गए. दोनों की मौके पर ही मौत हो गई. इस हादसे का दर्शक बनने की कोशिश एक अधेड़ यात्री को भी भारी पड़ गई. ब्रह्मपुत्र मेल में सवार यह यात्री करीब सौ मीटर दूर ट्रेन पहुंचने पर दरवाजे पर खड़े हो कर नीचे झांकने लगा, तभी उस का पैर फिसल गया और ट्रेन की चपेट में आ कर उस ने जान गवां दी.

एक साल पहले सैल्फी के चक्कर में मथुरा में 3 युवकों याकूब, इकबाल व अफजल को अपनी जान गंवानी पड़ी. तीनों जानलेवा जोखिम उठा कर चलती ट्रेन के सामने सैल्फी लेने लगे. चालक के हौर्न देने पर भी वे नहीं हटे और ट्रेन की चपेट में आ गए. इन के अलावा और भी कई अफसोसजनक हादसे हुए.

ऐसे हादसों के मद्देनजर ही रेलवे ट्रैक व दरवाजों पर खड़े हो कर सैल्फी लेने पर रोक लगाने का फैसला किया गया. रेल अधिकारियों के साथ जीआरपी व आरपीएफ के अधिकारियों की कई दौर की बैठक हुईं. उत्तर रेलवे दिल्ली मंडल ने सैल्फी लेने को प्रतिबंधित कर दिया. रेलवे का मकसद हादसों को रोकने के साथ ही यात्रियों को जागरूक करना है.

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असुरक्षित और जानलेवा जोखिम वाली सैल्फी के जनून में देश में मौतें बढ़ रही हैं. अमेरिकी अखबार वाशिंगटन पोस्ट की एक रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले साल दुनियाभर में सैल्फी से होने वाली मौतों में से 27 हादसे भारत में हुए. बढ़ते हादसों से मुंबई पुलिस ने शहर के 16 जगहों पर नो सैल्फी जोन बना दिए. हादसों के बाद यह निर्णय लिया गया. पुलिस अब खतरनाक सैल्फी लेने वालों पर नजर रखती है. इसी तरह गोआ में भी कुछ स्थानों पर सैल्फी लेने पर रोक लगानी पड़ी. कई बार युवा साहसिक सैल्फी के लिए जोखिम उठाते हैं. अमेरिकी मनोचिकित्सक एसोसिएशन ने तो जरूरत से ज्यादा सैल्फी की आदत को एक मानसिक बीमारी माना है.

ऐसे जनूनी किशोरों व युवाओं की कमी नहीं जो सैल्फी लेने का कोई मौका नहीं चूकते. एडवैंचर्स सैल्फी उन्हें वाहवाही लूटने का माध्यम भी लगती है. ऐसी सैल्फी सोशल साइट्स के जरिए वे दोस्तों को पहुंचा कर ज्यादा से ज्यादा प्रतिक्रिया चाहते हैं. अलग अंदाज की सैल्फी की होड़ है. नेता भी सैल्फी को युवाओं के साथ जुड़ने का माध्यम बनाने लगे हैं. फिल्मों ने भी इसे खूब बढ़ावा दिया. बजरंगी भाईजान फिल्म का गाना ‘चल बेटा सैल्फी लेले रे…’ सिर चढ़ कर बोला. अभिनेता, अभिनेत्रियों और नेताओं की सैल्फी आती रहती हैं जो चर्चा का केंद्र भी बनती हैं.

कानपुर शहर के गंगाबैराज पर सैल्फी लेने के चक्कर में 6 दोस्तों की, पैर फिसलने से एकसाथ जान चली गई. एक अन्य युवक उन्हें बचाने के चक्कर में डूब गया.

सैल्फी के चक्कर में होने वाले हादसों पर डा. फरीदा खान कहती हैं, ‘‘सैल्फी की वजह से होने वाली मौतें झकझोर कर देने वाली हैं. हादसों से युवाओं को सबक लेना चाहिए. देखादेखी वे क्रेजी न बनें. ऐसी जिज्ञासा से दूर ही रहें जिस से जान का खतरा हो. अभिभावकों को भी अपने बच्चों को जागरूक करना चाहिए. जब जिंदगी ही नहीं होगी तो सैल्फी कहां से आएगी.’’

बकौल उत्तर रेलवे के दिल्ली मंडल के पीआरओ अजय माइकल, ‘‘सैल्फी लेने वालों पर रोक लगाने के लिए जागरूकता अभियान चलाए जाएंगे. यात्रियों को खतरों के बारे में आगाह किया जाएगा. जांच अभियान चलाने वाले पुलिसकर्मियों को निर्देश दिए जाएंगे कि वे लोगों को समझाएं. न मानने की दशा में उन पर कार्यवाही करें. सैल्फी के संबंध में यात्रियों की शिकायत को भी गंभीरता से लिया जाएगा.’’

सैल्फी लेना चलन है, इस से बचा नहीं जा सकता, लेकिन उन खतरों से जरूर बचा जा सकता है जिन के जनक युवा खुद बन जाते हैं. अपनी सैल्फी को ज्यादा पौपुलर करने के चक्कर में जोखिम उठा कर जान से ही हाथ धोने पड़ जाएं, तो ऐसी सैल्फी को कौन पसंद करेगा. साधारण सी बात है कि जान से ज्यादा कीमत तो किसी सैल्फी की नहीं हो सकती. जरूरत सावधान रहने की है. ऐसे जनून में कतई न पड़ें जो जान पर भी भारी पड़ जाए

रिवौल्वर के साथ सैल्फी, गई जान

पंजाब के पठानकोट के 15 वर्षीय किशोर रमनदीप को अपनी सैल्फी लेने का शौक था. उस ने बेहद रोमांचक सैल्फी लेने की सोची. इस का विकल्प उसे अपने घर में ही नजर आ गया. एक दिन उस ने अपने पिता की घर में रखी 32 बोर की लाइसैंसी रिवौल्वर उठाई और कनपटी पर लगा दी. वह रिवौल्वर के साथ सैल्फी लेने लगा. इसी बीच लोडेड रिवौल्वर का ट्रिगर दब गया और गोली चल गई. गोली लगते ही वह नीचे गिर पड़ा. मातापिता घर पर नहीं थे. गोली चलने की आवाज सुन कर घर पहुंचे पड़ोसियों ने उसे गंभीर हालत में अस्पताल पहुंचाया. गोली उस के सिर में घुसी थी. बाद में उसे लुधियाना के अस्पताल में रैफर किया गया, लेकिन उस की मौत हो गई. अलगअलग अंदाज की सैल्फी का जनून मौत का कारण भी बन जाता है.

विदेशी उच्चशिक्षा बनाम लचर भारतीय शिक्षा

भारत में एक ओर उच्चशिक्षा के स्तर को ले कर सवाल उठते रहे हैं तो दूसरी ओर पढ़ने के लिए छात्र बड़ी संख्या में विदेशों का रुख कर रहे हैं. भारतीय छात्रों के माध्यम से अमेरिकी अर्थव्यवस्था को अरबों डौलर मिल रहे हैं. इस का बुरा प्रभाव हमारी अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है.

प्रतिभा किसी एक ही देश की परिरक्षित निधि नहीं है. प्रत्येक देश के अपनेअपने क्षेत्र के प्रवीण व्यक्ति होते हैं, जैसे वैज्ञानिक, प्रौद्योगिकी विशेषज्ञ, साहित्य या कलाओं के विद्वान, चित्रकार, कलाकार आदि. असाधारण प्रतिभा संपन्न ऐसे पुरुष और स्त्रियां अपने देश की  प्रगति व समृद्धि में योगदान तो देते ही हैं साथ ही, अपनी विशिष्टता वाले क्षेत्र में भी उत्कर्षता लाते हैं.

यह कोई असामान्य बात नहीं है कि इन योग्य व्यक्तियों में से कुछ लोगों को अपने ही देश में संतोषजनक काम नहीं मिल पाता या किसी न किसी कारण वे अपने वातावरण से तालमेल नहीं बिठा पाते. ऐसी परिस्थितियों में ये लोग बेहतर काम की खोज के लिए या अधिक भौतिक सुविधाओं के लिए दूसरे देशों में चले जाते हैं.

उच्चशिक्षा पर सवाल

अपने कुशल और प्रतिभासंपन्न व्यक्तियों की हानि से विकासशील देश सब से अधिक प्रभावित हुए हैं. इस का मुख्य कारण यह है कि विकासशील देशों में वेतन और अन्य सुविधाओं के रूप में प्राप्त होने वाले लाभ कम हैं. इन में भारत भी एक है.

भारत में उच्चशिक्षा के स्तर को ले कर हमेशा ही सवाल उठते रहते हैं. अंतर्राष्ट्रीय रेटिंग में भारतीय विश्वविद्यालय पहले 100 संस्थानों में अपनी जगह क्यों नहीं बना पाते हैं? शीर्ष भारतीय संस्थानों में कोई मौलिक शोधकार्य क्यों नहीं होता है? दाखिले में आरक्षण का मुद्दा, ऊंचे अंक हासिल करने के बावजूद दाखिले से वंचित रह जाना, शिक्षक और छात्रों का बिगड़ा हुआ अनुपात, प्रोफैसरों और कुलपतियों की राजनीतिक नियुक्तियां और किस तरह से उच्चशिक्षा के संस्थान अकादमिक भ्रष्टाचार और औसत दरजे के डिगरीधारकों के उत्पादन की फैक्टरियां बन गए हैं. इन सवालों में एक बड़ा सवाल अब यह भी जुड़ गया है कि इतनी बड़ी संख्या में भारतीय छात्र विदेशों का रुख क्यों कर रहे हैं? इतना ही नहीं, इन छात्रों के साथ फीस और पढ़ाई का पैसा भी बह कर विदेशों में जा रहा है.

ओपन डोर संस्था की एक रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी कालेजों में दाखिला लेने वाले भारतीय छात्रों में 25 फीसदी की वृद्धि हुई है. अमेरिकी अर्थव्यवस्था में उन्होंने 5 अरब रुपए का योगदान दिया है.

सिर्फ अमेरिका ही नहीं, बल्कि पिछले कुछ वर्षों में यूरोप और आस्ट्रेलिया जाने वाले छात्रों में भी नाटकीय ढंग से वृद्धि हुई है, जबकि इसी दौर में भारत में बड़ी संख्या में उच्च शिक्षण संस्थान और विश्वविद्यालय खुले हैं. आखिर ये छात्र देश के उच्च शिक्षण संस्थानों में क्यों नहीं पढ़ना चाहते?

ब्रेनड्रेन की बड़ी वजह

आज भारत की उच्चशिक्षा व्यवस्था विश्व की बड़ी व्यवस्थाओं में एक मानी जाती है. 2030 तक भारत में कालेज जाने की उम्र वाले 14 करोड़ से अधिक लोग होंगे और ये विश्व का सब से जवान देश माना जाएगा.

ताजा हालात में भारत के लिए यह चुनौती होगी कि वह किस तरह से इन संभावित विद्यार्थियों को स्वदेश में ही रोके और उन की प्रतिभा व योग्यता का अपने यहां अधिकतम इस्तेमाल कर सके ताकि वे मेक इन इंडिया में अपना सहयोग कर सकें.

ब्रेनड्रेन की सब से बड़ी वजह है कि विदेशी डिगरी खासतौर पर अमेरिकी डिगरी से नौकरी पाना आसान है. आर्थिक उदारीकरण के बाद मध्यवर्गीय परिवारों की आय का स्तर बढ़ा है और उन की दृष्टि में भारतीय उच्चशिक्षा प्रणाली में सीमित अवसर हैं.

भारत में चुनिंदा विश्वविद्यालयों में ही पढ़ाई का स्तर ठीक है और सीमित सीटों के कारण वहां दाखिला दुष्कर होता जा रहा है. ज्यादातर छात्र विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित पढ़ने के लिए बाहर जाते हैं. बेशुमार सरकारी स्कौलरशिप और अनुदान से छात्रों का बाहर जा कर पढ़ने का सपना पूरा होना आसान हो गया है.

मानव संसाधन विकास मंत्रालय और एसोचैम जैसे संस्थानों को इस बात पर ध्यान देने की जरूरत है कि इसे कैसे रोका जाए. ब्रेनड्रेन अब निश्चित रूप से घाटे का सौदा बनता जा रहा है. प्रतिभा पलायन रोकने के लिए आईआईटी और आईआईएम जैसे और संस्थान स्थापित किए जाने की जरूरत है. विदेशी विश्वविद्यालयों को भारत में अपने कैंपस खोलने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए. उन के लिए कर रियायतें और प्रोत्साहन दिए जाने चाहिए जिस से हमारे देश का शिक्षा स्तर ऊपर हो. इस से ब्रेनड्रेन पर भी लगाम लगेगी.

दूसरी तरफ उच्चशिक्षा के लिए सिर्फ सरकार पर ही निर्भर रहना उचित नहीं है बल्कि उद्योग और अकादमिक सहयोग से नई संस्थाएं स्थापित करनी चाहिए और उन का स्तर बढ़ाया जाना चाहिए.

कदम उठाए सरकार

सरकार द्वारा उच्चशिक्षा की फीस भी बढ़ाई जाए, क्योंकि जो छात्र विदेशों में इतना खर्च करने के लिए तैयार हैं वे अच्छी शिक्षा के लिए स्वदेश में भी खर्च कर सकते हैं. जहां तक गरीब छात्रों का सवाल है, उन के लिए अमेरिका की तरह गारंटी प्रणाली की स्थापना की जाए जहां उन्हें बिना अभिभावकों की सुरक्षा के भी सस्ता लोन मिल सके.

विदेशों में पढ़ने के लिए उदार भाव से दी जा रही सरकारी छात्रवृत्तियों और अनुदानों में कटौती भी की जा सकती है. अभी ब्राजील ने ऐसा किया है और उस के बाद वहां के छात्रों के विदेश जाने में कमी आई है.

आज विदेश का रुख करने वाले छात्रों के लिए एक आकर्षक विकल्प देश में ही पैदा करने की जरूरत है. आज अधिकांश सरकारी संस्थानों में शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार के लिए आमूलचूल बदलाव की जरूरत है. शिक्षा माफिया के काले धन पर भी सर्जिकल स्ट्राइक की जरूरत है. ये शिक्षा व्यवस्था को दीमक की तरह चाट रहे हैं.

विज्ञान, चिकित्सा या ज्ञान के किसी अन्य क्षेत्र का विशेषज्ञ कम वेतन और अन्य कठिनाइयों को भी सह सकता है, यदि उस की योग्यता को अच्छी मान्यता मिले. उस के काम का ठीक मूल्यांकन हो. अच्छे तरह साधनसंपन्न प्रयोगशाला या पुस्तकालय राष्ट्रीय प्रतिभाओं में से अधिकांश को अपनी मातृभूमि छोड़ने से रोक देंगे, चाहे विदेशों में  उन्हें कितना ही अधिक वेतन क्यों न मिले.

विकसित देशों के रहनसहन के ऊंचे स्तर ने विकासशील क्षेत्रों के लोगों को सदा ही अत्यधिक आकृष्ट किया है और प्रतिभाशाली लोग और विशेषज्ञ भी इस मोहजाल से अपनेआप को नहीं बचा पाए.

इस का परिणाम यह हुआ कि विकासशील देशों के अधिकांश प्रतिभासंपन्न व्यक्ति रहनसहन के इस स्तर को प्राप्त करने में प्रसन्नता का अनुभव करने लगे जोकि विकसित देशों के एक साधारण नागरिक को भी उपलब्ध होती है. इसलिए ऐसी सुविधा देश में ही उपलब्ध कराने की योजना बनाई जाए.

महाराष्ट्र सरकार ने दी दिनरात शौपिंग की इजाजत

महाराष्ट्र सरकार ने लोगों को काम करने में आजादी देते हुए दुकानों और मौलों को 24 घंटे खुला रखने की इजाजत दे कर सही किया है. पहले कर्मचारियों के हितों के नाम पर दुकानों के घंटे बांधे गए थे ताकि मालिक उन से रातदिन काम न ले सकें. यह कानून बिजली के आने से पहले तो शायद ठीक था पर जब से पूरे शहर ही नहीं, कसबे और गांव भी रातदिन रोशनी में जगमगा रहे हैं, तो यह निरर्थक है.

इस बदलाव के बाद अब व्यवसायियों पर निर्भर है कि वे अपने प्रतिष्ठानों को कब खोलें और कब बंद करें. पहले जहां लोग सुबह जल्दी दुकानें खोलते थे और जल्दी बंद करते थे, अब उलटा होने लगा है. ज्यादातर बाजार निर्धारित 9-10 बजे की जगह 11-11:30 बजे तक खुलते हैं और देररात तक खुले रहते हैं.

आज लोगों को घर से काम की जगह तक जाने में एक तरफ से 1 से 2 घंटे लगाने पड़ रहे हैं. ऐसे में उन के पास रात को ही शौपिंग का समय बचता है. दिन में बच्चों की देखरेख, स्कूल होमवर्क में व्यस्त गृहिणियों तक को फुरसत नहीं मिलती कि वे आराम से शौपिंग कर सकें. रात को यह सुविधा मिलने का अर्थ है कि बच्चों को सुला कर घर से आराम से निकला जा सकता है.

दरअसल, अभी भी सरकारों ने नागरिकों की रोजमर्रा की जिंदगी में बहुत से अंकुश लगा रखे हैं. कुछ कर्मचारियों के हितों के नाम पर हैं, कुछ सामाजिक व्यवस्था के नाम पर, कुछ कानून बनाए रखने के नाम पर. अब समय आ गया है कि लोग छोटे समूहों में अपने नियम खुद तय करें. दुकानों का समय दुकानों के मालिक अकेले या बाजार में व्यापारियों के साथ मिलजुल कर तय करें.

पार्किंग भी कुछ ऐसा ही मामला है. इसे घरों और दुकानों को तय करना चाहिए, ट्रैफिक पुलिस या कौर्पाेरेशनों को नहीं. केवल सड़कों पर असुविधा न हो, इस के लिए बंधन हों पर जहां सीमित आनाजाना है वहां जनता खुद तय करे. यह सोच कि सरकारी दफ्तर में बैठा अफसर या चुना हुआ नेता ज्यादा जानकार है, बंद होनी चाहिए.

व्यक्तिगत मामलों में सरकार का दखल न हो क्योंकि हर दखल का मतलब है रिश्वतखोरी और तरफदारी की एक खिड़की खोल देना. रिश्वत की दलदल के कारण यहां कानूनों की भरमार है जो तेजी से बढ़ रहे हैं. रातभर दुकानें खोेले जाने की अनुमति मिलना एक राहत है. पक्की बात है कि इस में भी सरकारी अगरमगर जरूर होंगे जो जल्दी ही दिखेंगे.

मृत्यु पूर्व हरिद्वार जांच

ताउम्र व्यवस्था के खिलाफ लड़तेलड़ते मरने को आ गया तो अचानक याद आया कि मरने के बाद मैं कहीं जाऊं या न, कम से कम हरिद्वार तो जाना ही पड़ेगा. तो जिंदगी में क्यों न कम से कम वहां की स्थितियों का जायजा ले लिया जाए, ताकि मरने के बाद व्यवस्था से अपने को एक और शिकायत न हो.

सच पूछो तो मैं मरने से उतना नहीं डरता जितना धर्म से डरता हूं. यह धर्म ही है जो समाज में कभी भी, कुछ भी करने का माद्दा रखता है. कहते हैं, धर्म जोड़ता है पर मैं ने तो इसे तोड़तेमरोड़ते ही बहुधा देखा. एक ही आदमी को सैकड़ों हिस्सों में टांकते देखा. मरने के बाद बंदा ही जाने कि वह कहां जाता है, कहीं जाता भी है या नहीं, पर हम फिर भी लाख सैक्युलर, समाजवादी होने के बाद भी उस के जीतेजी उस के बारे में उतने चिंतित नहीं होते जितने चिंतित उस के मरने के बाद होते हैं.

बस, यही सोच सारे कामधाम छोड़ हरिद्वार के लिए बस पकड़ी और नाक की सीध में सीधे हरिद्वार जा पहुंचा. वहां पहुंचते ही एक पहुंचे हुए पंडितजी टकरा गए. गोया, वे मेरा ही इंतजार कर रहे हों. आत्माओं के प्रति उन के मन में इंतजार देख मन बागबाग हो उठा. मुझे सिर से पांव तक तोलनेदेखने के बाद वे अलापे, ‘‘कहो जजमान, कैसे आना हुआ?’’

‘‘बस, यों ही चला आया. यहां की व्यवस्था देखने. सोचा, मरने के बाद हांडीलोटे में पड़े तो सभी आप के दर्शन करते ही हैं, जीतेजी भी जो आप से एकबार साक्षात्कार हो जाए तो…’’ मैं ने कहा तो वे चौंक कर बोले, ‘‘मान गया तुम्हारा दुस्साहस, हे जीव! जो जिंदा रहते ही हमारे से मिलने चले आए. यहां तो जीव मरने के बाद भी आने से, हम से मिलने से डरता है जबकि तुम जिंदा ही चले आए?’’

‘‘पंडितजी, इसलिए आया हूं कि मरने के बाद यहां कि सुव्यवस्था देख परेशान न होना पड़े. पहले ही कहीं की व्यवस्था के बारे में पता हो तो कुछ भी घटते देखते मन नहीं दुखता. बस, इसीलिए…’’

‘‘गुड, वैरी गुड, बहुत दूरदर्शी मालूम होते हो?’’ कह वे अपनी राह होने को हुए तो मैं ने उन्हें तनिक रोकते पूछा, ‘‘माफ करना, पर सुना है जीवों को स्वर्ग पहुंचाने वाला रास्ता यहीं से शुरू होता है?’’

‘‘हां, कोई शक?’’

‘‘नहीं, आप पर शक कर नरक को जाना है क्या? बंदा अपने कर्मों से स्वर्ग को जाए या न, पर आप के बूते नरक को जा जरूर सकता है. मैं चाहता था कि जो आप की मेहरबानी हो तो…इस नरक में रहतेरहते असल में बहुत तंग आ गया हूं.’’ कह मैं ने जेब में हाथ डाला तो वे बोले, ‘‘नहीं, हम विधि के विधान के खिलाफ कुछ नहीं कर सकते. इसलिए बेहतर होगा अपना हाथ जेब से निकाल लो. बंदे के मरने के बाद तो हम खुद ही उस के लाख जेब पकड़े रखने के बाद भी उस की जेब में हाथ डाल लेते हैं. हमारी एक जीव ट्रांसपोर्ट कंपनी है, आइएसओ. पर हमारा कायदा है कि हम मरने के बाद ही जीव को स्वर्ग को भेजते हैं.’’

‘‘क्यों? जिंदा जीव क्यों नहीं? जिंदा जीव के पास दिमाग और आंखें तो दोनों होती हैं?’’

‘‘होती हैं, इसलिए तो यह नहीं हो सकता. जिंदा आदमी के पास पर वे आंखें नहीं होतीं जिन से स्वर्गनरक का रास्ता दिखे. नश्वर आंखें तो अपने स्वार्थ से आगे रत्तीभर नहीं देख सकतीं. स्वर्गनरक का रास्ता मरने के बाद ही जीव को दिखता है. जीवित की आंखों और दिमाग पर माया के बहुत भारी परदे पर परदे पड़े होते हैं,’’ उन्होंने सतर्क तर्क दिया.

‘‘पर मेरी आंखें तो सब देख सकती हैं,’’ मैं ने अपनी आंखों पर ठोक बजा कर दावा प्रस्तुत किया तो वे बोले, ‘‘बस, यहीं तो जीव धोखा खा जाता है, बुद्धू. सब्सिडी वाले राशन के चलते राशनकार्ड पर अंकित आटेदाल के अतिरिक्त और कुछ, असल में, बंदे को दिखता ही नहीं, चाहे वह कितनी ही कोशिश क्यों न कर ले. धर्म के विनाश का कारण भी यही तर्क है.

‘‘जीव दूसरों की आंखों से अधिक जब अपनी आंखों पर विश्वास करता है तभी तो सारे तीर्थ करने के बाद भी जीव नरक में औंधेमुंह जा कर पड़ता है. तुम्हें भी स्वर्ग का द्वार हम दिखाएंगे तो जरूर लेकिन तुम्हारे मरने के बाद ही. एक बार मर कर आओ, तो फिर देखना हमारा कमाल. पुश्तों से पूरी ईमानदारी से यह काम कर रहे हैं. पर क्या मजाल जो किसी ने भी एक शिकायत की हो कि हम ने उसे स्वर्ग भेजा लेकिन वह नरक में जा पहुंचा.

‘‘पूरे देश में एक भी केस ऐसा निकाल कर बता दो तो अपनी मूंछें कटवा कर रख दूं. यह लो उस्तरा और यह लो मेरा कार्ड. जरूरत पड़े आ जाना. हम मोक्ष के लिए आतुर जीवों की दिनरात सेवा में हाजिर रहते हैं.’’ बंदे ने अपनी जेब से विजिटिंग कार्ड और उस्तरा निकाला लेकिन मुझे देने के बजाय अपनी जेब के हवाले कर मुझे खैनी से सड़े दांत दिखाते, खिसियानी हंसी हंसता रहा.

हर घाट पर घूमतेघूमते स्वर्ग को भेजी जा रही आत्माओं को ठूंसठूंस कर रिकशा में बैठातेबैठाते देखने के बाद कुशाघाट पर जा पहुंचा. अब तक मेरे मन में पापपुण्य सावन के झूलों की तरह हिलोरें मारने लग गए थे. मुझे लग रहा था कभी पेटभर रोटी न खाने वाला भी पाप तले दब सा रहा है. मैं ने वहीं घाट पर अपने कपड़े उतारे और अवांछित पापों से मुक्ति के लिए गंगा में डुबकी लगाने को हुआ कि कहीं से आवाज आई, लगा, जैसे कोई मेरा नाम ले कर मुझे पुकार रहा हो. इधरउधर देखा, तो कोई नजर नहीं आया. फिर नाक पकड़ हिम्मत कर डुबकी लगाने को हुआ कि लगा, जैसे कोई मेरा नाम ले रहा हो. मैं ने डुबकी लगाने को पकड़ी नाक छोड़ी और कहा, ‘कौन?’

‘मैं, गंगा.’

‘गंगा में गंगा?’ मैं चौंका.

‘हां गंगा,’ पहले तो विश्वास ही न हुआ क्योंकि धर्म के नाम पर, भगवान के नाम पर विश्वास करने लायक अब कुछ बचा ही नहीं है. पर जब गंगा ने दृढ़ता से कहा तो सामने साक्षात् गंगा को पा, लगा मैं सशरीर मोक्ष पा गया.

‘पर तुम यहां पंडोंपापियों के मेले में क्या कर रहे हो?’

‘सोचा, बहती गंगा में मैं भी नहा ही लूं.’

‘तुम्हें तो नहा कर मुक्ति मिल जाएगी पर मेरा क्या होगा? कभी इस बारे में भी सोचा? अब मैं कहां नहाने जाऊं? है कहीं कोई ऐसी नदी?’ गंगा ने उदास हो पूछा तो मुझे काटो तो खून नहीं. कुछ देर तक एकटक मुझे देखने के बाद गंगा ने कहा, ‘नहीं सोचा, तो अब सोचो.’

‘सरकारी स्तर पर तो, हे गंगा, हम सोचसोच कर हार गए. अब किसी को स्वच्छ नहीं होना हो तो हम भी क्या करें?’ मैं ने अपनी जिम्मेद?ारी से बचने की कोशिश की तो वह बोली, ‘अपने स्तर पर भी कुछ सोचो तो बात बने. अपनी मुक्ति की बात तो युगों से करते रहे हो, मेरी मुक्ति की बात करो तो मेरा भी कल्याण हो,’ कह अंतर्ध्यान हुईं तो पीछे मुड़ कर देखा, एक पंडा मेरे कपड़े चुरा, बदहवास दौड़े जा रहा था.

इस एक्ट्रेस से निर्देशक ने मांगी थी न्यूड तस्वीर

टीवी सीरियल ‘ससुराल सिमर का’ और ‘कैसी हैं ये यारियां’ में अपने अभिनय और फैशन सेंस से क्रिस्नन बरेटो दर्शकों का दिल जीत चुकी हैं. क्रिस्नन बरेटो ने हाल ही में एक चौंका देने वाला खुलासा किया है. क्रिस्नन ने कास्टिंग डायरेक्टर पर धोखाधड़ी का आरोप लगाया है. क्रिस्नन बरेटो का आरोप है कि डायरेक्टर ने उनसे न्यूड तस्वीरों की मांग की थी. क्रिस्नन बरेटो ने व्हाट्सऐप पर हुई बातचीत के स्क्रीनशौट्स भी शेयर किए हैं.

एक रिपोर्ट के अनुसार, क्रिस्नन बरेटो ने कहा कि कंपनी ओमनीकौम मीडिया ग्रुप के नाम से चल रही है. प्रीती सिंह ने पहली बार संपर्क किया था. उसने शूट के लिए संपर्क किया. कई तस्वीरों को शेयर करने के बाद प्रीती ने मुझसे प्रोजेक्ट हेड हर्ष शर्मा से संपर्क करने के लिए कहा और बताया कि वह ओमनीकौम मीडिया ग्रुप की मुंबई शाखा का प्रबंधन कर रहे हैं और वही अंतिम आठ लड़कियों का चयन भी करेंगे. इसके बाद में मुझे एक मैसेज मिला, जिसमें मुझसे 100 प्रतिशत सेक्सी, बोल्ड, हौट और आकर्षक तस्वीरें शेयर करने की बात कही गई.

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अभिनेत्री प्रीती से वह लगातार शूट और हर्ष शर्मा द्वारा फाइनल करने की बात पूछती रही. हालांकि, प्रीती की ओर से संतोषजनक जवाब नहीं मिला. इसके बाद क्रिस्नन को मामला कुछ संदिग्ध लगा और बाद में पता चला कि वह फंस गई. किस्नन ने आगे कहा, ”मैं स्ट्रगलर नहीं हूं और काम पाने के लिए ऐसे तरीकों की जरूरत नहीं है.

It helps to have superhuman energy and stamina

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लेकिन इंडस्ट्री में ऐसी कई लड़कियां हैं, जिन्होंने अभी शुरुआत की है या फिर इस इंडस्ट्री में आने का विचार कर रही हैं. प्रीती सिंह और हर्ष शर्मा जैसे नकली लोग किसी भी असली प्रतिभा को इंडस्ट्री में काम दिलाने की बात कर अपमानित कर रहे हैं, क्योंकि न्यूकमर्स के लिए नकली और वास्तविक कास्टिंग निर्देशकों के बीच अंतर करना मुश्किल हो जाता है.” क्रिस्नन ने कहा, ”मैं अकेली नहीं हूं जिससे उन्होंने मुझसे संपर्क किया. मेरी सहेली डिंपल को भी सेम मैसेज और औफर दिया गया था.”

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