इलाज : जिस्म से खेलने को इलाज नहीं कहते

राम स्नेही और जसोदा की बेटी मीना को अकसर पागलपन के दौरे पड़ते थे. वह गोरीचिट्टी और खूबसूरत थी. मातापिता को सयानी हो चली मीना की शादी की चिंता सता रही थी. शादी की उम्र आने से पहले उस की बीमारी का इलाज कराना बेहद जरूरी था.

राम स्नेही का खातापीता परिवार था. उन की अच्छीखासी खेतीबारी थी. उन्होंने गांवशहर के सभी डाक्टरों और वैद्यों के नुसखे आजमाए, पर कोई इलाज कारगर साबित नहीं हुआ.

मीना को पागलपन के दौरे थमे नहीं. दौरा पड़ने पर उस की आवाज अजीब सी भारी हो जाती थी. वह ऊटपटांग बकती थी. चीजों को इधरउधर फेंकती थी. कुछ देर बाद दौरा थम जाता था और मीना शांत हो जाती थी और उसे नींद आ जाती थी. नींद खुलने पर उस का बरताव ठीक हो जाता था, जैसे कुछ हुआ ही नहीं था. उसे कुछ याद नहीं रहता था.

सरकारी अस्पताल का कंपाउंडर छेदीलाल राम स्नेही के घर आया था. राम स्नेही ने पिछले साल सरकारी अस्पताल के तमाम चक्कर लगाए थे. अस्पताल में डाक्टर हफ्ते में केवल 3 दिन आते थे. डाक्टर की लिखी परची के मुताबिक छेदीलाल दवा बना कर देता था.

छेदीलाल लालची था. वह मनमानी करता था. मरीजों से पैसे ऐंठता था. पैसे नहीं देने पर वह सही दवा नहीं देता था. वह मीना की बीमारी से वाकिफ था. उसे मालूम था कि मीना की हालत में कोई सुधार नहीं हो पाया है.

राम स्नेही ने डाक्टरी इलाज में पानी की तरह रुपया बहाया था, लेकिन निराशा ही हाथ लगी थी. छेदीलाल को इस बात की भी खबर थी. ‘‘मीना को तांत्रिक को दिखाने की जरूरत है. यह सब डाक्टर के बूते के बाहर है,’’ छेदीलाल ने जसोदा को सलाह दी.

‘‘झाड़फूंक जरूरी है. मैं कब से जिद कर रही हूं, इन को भरोसा ही नहीं है,’’ जसोदा ने हामी भरी.

‘‘मैं ने एक तांत्रिक के बारे में काफी सुना है. उन्होंने काफी नाम कमाया है. वे उज्जैन शहर से ताल्लुक रखते हैं. गांवशहर घूमते रहते हैं. अब उन्होंने यहां पहाड़ी के पुराने मंदिर में धूनी रमाई है,’’ ऐसा कहते हुए छेदीलाल ने एक छपीछपाई परची जसोदा को थमाई.

उस समय राम स्नेही अपने खेतों की सैर पर निकले थे. जब वे घर लौटे, तो जसोदा ने उन को छेदीलाल की दी हुई परची थमाई और मीना को तांत्रिक के पास ले जाने की जिद पर अड़ गईं.

दरअसल, जब मीना को दौरे पड़ते थे, तब जसोदा को ही झेलना पड़ता था. वे मीना के साथ ही सोती थीं. चिंता से देर रात तक उन्हें नींद नहीं आती थी. वे बेचारी करवटें बदलती रहती थीं.

जसोदा की जिद के सामने राम स्नेही को झुकना पड़ा. जसोदा और मीना को साथ ले कर वे पहाड़ी के एक पुराने मंदिर में पहुंचे. मंदिर के साथ 3 कमरे थे. वहां बरसों से पूजापाठ बंद था. तांत्रिक के एक चेले, जो तांत्रिक का सहयोगी और सैके्रटरी था, ने उन का स्वागत किया.

तांत्रिक के सैक्रेटरी ने अपनी देह पर सफेद भभूति मल रखी थी और चेहरे पर गहरा लाल रंग पोत रखा था. सैके्रटरी ने फीस के तौर पर एक हजार रुपए वसूले और तांत्रिक से मिलने की इजाजत दे दी.

तांत्रिक ने भी अपनी देह पर भभूति मल रखी थी. चेहरे पर काला रंग पोत रखा था. दाएंबाएं दोनों तरफ नरमुंड और हड्डियां बिखेर रखी थीं. वह हवन कुंड में लगातार कुछ डाल रहा था और मन ही मन कुछ बुदबुदा भी रहा था.

‘‘जल्दी बता, क्या तकलीफ है?’’ तांत्रिक ने सवाल किया.

‘‘बेटी को अकसर मिरगी के दौरे पड़ते हैं. इलाज से कोई फायदा नहीं हुआ,’’ जसोदा ने बताया.

‘‘शैतान दवा से पीछा नहीं छोड़ता. अतृप्त आत्मा का देह में बसेरा है. सब उसी के इशारे पर होता है,’’ कह कर तांत्रिक ने मीना को सामने बिठाया. हाथ में हड्डी ले कर उस के चेहरे पर घुमाई और जोरजोर से मंत्र बोले.

‘‘शैतान से कैसे नजात मिलेगी बाबा?’’ पूछते हुए जसोदा ने हाथ जोड़ लिए.

‘‘अतृप्त आत्मा है. उसे लालच देना होगा. बच्ची की देह से निकाल कर उसे दूसरी देह में डालना होगा,’’ तांत्रिक ने बताया.

‘‘हमें क्या करना होगा?’’ इस बार राम स्नेही ने पूछा.

‘‘अनुष्ठान का खर्च उठाना पड़ेगा… दूसरी कुंआरी देह का जुगाड़ करना होगा… आत्मा दूसरी देह में ही जाएगी,’’ तांत्रिक ने बताया और दोबारा पूरी तरह से तैयार हो कर आने को कहा.

राम स्नेही सुलझे विचारों के थे. उन्होंने अपनी ओर से मना कर दिया. वैसे, वे खर्च उठाने को तो तैयार थे, लेकिन दूसरी देह यानी दूसरे की बेटी लाने का जोखिम उठाने को तैयार नहीं थे. उन की मीना की बीमारी किसी दूसरे की बेटी को लगे, वे ऐसा नहीं चाहते थे.

लेकिन जसोदा जिद पर अड़ी थीं. अपनी बेटी के लिए वे हर तरह का जोखिम उठाने को तैयार थीं. राम स्नेही ने इस बाबत सोच कर जल्दी ही कुछ करने की बात कही.

एक रात को राम स्नेही और जसोदा अपनी बेटी मीना को साथ लिए बैलगाड़ी में सवार हो कर पहाड़ी मंदिर की ओर निकल पड़े. गाड़ी में उन के साथ एक कुंआरी लड़की और थी. बैलगाड़ी में टप्पर लगा था, जिस से सवारियों की जानकारी नहीं हो सकती थी. दोनों लड़कियों को चादर से लपेट कर बिठाया गया था.

तांत्रिक के सैक्रेटरी ने देह परिवर्तन अनुष्ठान के खर्च के तौर पर 10 हजार रुपए की मांग की. राम स्नेही तैयार हो कर आए थे. उन्होंने रुपए जमा करने में कोई आनाकानी नहीं की.

‘‘अनुष्ठान देर रात को शुरू होगा और यह 3 रातों तक चलेगा…’’ सैक्रेटरी ने बताया और अनुष्ठान पूरा होने के बाद आने को कहा.

राम स्नेही और जसोदा अपने घर वापस लौट आए. जसोदा को उम्मीद थी कि तांत्रिक के अनुष्ठान से मीना ठीक हो जाएगी.

दोनों लड़कियों को एक कमरे में बिछे बिस्तरों पर बिठाया गया. अनुष्ठान से पहले उन्हें आराम करने को कहा गया. तांत्रिक ने लड़कियों के सेवन के लिए नशीला प्रसाद और पेय भिजवाया. नशीले पेय के असर में दोनों लड़कियों को अपने देह की सुध नहीं रही. वे अपने बिस्तरों पर बेसुध लेट गईं.

तांत्रिक और उस के सैक्रेटरी ने देर तक दारूगांजे का सेवन किया. नशे में धुत्त वे दोनों लड़कियों के कमरे में घुस आए. अनुष्ठान के नाम पर उन का लड़कियों के साथ गंदा खेल खेलने का इरादा था. उन को कुंआरी देह की भूख थी. वे ललचाई आंखों से बेसुध लेटी कच्ची उम्र की लड़कियों को घूर रहे थे. थोड़ी ही देर में वे उन की देह पर टूट पड़े.

मीना के साथ आई दूसरी लड़की झटके से उठी. उस ने तांत्रिक के सैक्रेटरी को जोरदार घूंसा जमाया और जोरजोर से चिल्लाना शुरू किया.

मीना ने भी तांत्रिक को झटक कर जमीन पर गिरा दिया. नशे में धुत्त तांत्रिकों को निबटने में ज्यादा परेशानी नहीं हुई. मौके पर पुलिस के कई जवान भी आ गए. उन्होंने उन दोनों को हथकड़ी पहना दी.

राम स्नेही को इस तरह के फरेब का पहले से ही डर था. उन्होंने थाने जा कर पूरी रिपोर्ट दी थी. थानेदार ने ही दूसरी देह का इंतजाम किया था. दूसरी लड़की सुनैना थाने में काम करने वाली एक महिला पुलिस की बेटी थी. उस ने जूडोकराटे की ट्रेनिंग ली हुई थी. वह इस मुहिम से जुड़ने के लिए फौरन तैयार हो गई थी.

सुनैना को नशीली चीज व पेय से बचने की हिदायत दी गई थी. उसे हमेशा सतर्क रहने और तांत्रिकों को भरमाने के लिए जरूरी स्वांग भरने की भी सलाह दी गई थी.

हथियारबंद जवानों को पहाड़ी मंदिर के आसपास तैनात रहने के लिए भेजा गया था. जवानों ने वरदी नहीं पहनी थी. जसोदा को इस मुहिम की कोई खबर नहीं थी.

सरकारी अस्पताल के कंपाउंडर छेदीलाल ने यह सारी साजिश रची थी. उस ने अपने ससुराल के गांव के 2 नशेड़ी आवारा दोस्तों चंदू लाल और मनोहर को नशे के लिए पैसे का जुगाड़ करने और जवानी के मजे लेने का आसान तरीका समझाया था.

थाने में पिटाई हुई, तो चंदू लाल और मनोहर ने सच उगल दिया. छेदीलाल को नशीली दवाओं व दिमागी मरीजों को दी जाने वाली दवाओं की अधकचरी जानकारी थी. उसे अस्पताल से गिरफ्तार कर लिया गया. तीनों को इस प्रपंच के लिए जेल की हवा खानी पड़ी. छेदीलाल को नौकरी से बरखास्त कर दिया गया. राम स्नेही को उन के रुपए वापस मिल गए.

थानेदार ने जयपुर के एक नामी मनोचिकित्सक का पता बताया. उन की सलाह के मुताबिक राम स्नेही ने मीना का इलाज जयपुर में कराने का इरादा किया. जसोदा ने हामी भरी. इस से मीना के ठीक होने की उम्मीद अब जाग गई थी.

VIDEO : टेलर स्विफ्ट मेकअप लुक

ऐसे ही वीडियो देखने के लिए यहां क्लिक कर SUBSCRIBE करें गृहशोभा का YouTube चैनल.

रेस 3 के लिये स्पेशल ट्रेनिंग ले रहीं जैकलीन

बौलीवुड अभिनेत्री जैकलीन फर्नांडीस रेमो डिसूजा की फिल्म ‘रेस-3’ को लेकर चर्चा में हैं. फिल्म में जैकलीन एक्शन करते हुए भी नजर आएंगी, एक्शन सीक्वेंस को परफेक्ट तरीके से करने के लिए जैकलीन इन दिनों स्पेशल ट्रेनिंग ले रही हैं. ट्रेनिंग वीडियो को खुद जैकलीन ने औफिशियल इंस्टाग्राम अकाउंट से शेयर किया है. वीडियो में जैकलीन बैक फ्लिप करने की कोशिश करते हुए नजर आ रही हैं. कहा जा रहा है कि फिल्म में जबरदस्त एक्शन सीन देखने को मिलेंगे. फिल्म में सलमान खान के साथ जैकलीन भी एक्शन करते हुए नजर आएंगी.

वीडियो को शेयर करते हुए जैकलीन ने कैप्शन लिखा, ”यह कोई फिजिक की बात नहीं है, फिटनेस हमेशा से मेरे लिए चैलेंज के रूप में रहा है, लेकिन फाइनली मुझे अच्छा लग रहा है. ट्रेनिंग फौर लाइफ, रेस-3”.

जैकलीन के द्वारा शेयर किए गए वीडियो वह बैक फ्लिप करने की कोशिश करते हुए नजर आ रही हैं, पहली बार वह असफल हो जाती हैं, आखिरकार दूसरी बार में वह फ्लिप करने में सफल हो जाती हैं. जैकलीन एक्शन ट्रेनर कुलदीप शशि से ट्रेनिंग ले रही हैं.

सलमान खान स्टारर फिल्म ‘रेस-3’ में जैकलीन फर्नांडीस के साथ अभिनेत्री डेजी शाह, अभिनेता बौबी देओल और अनिल कपूर नजर आएंगे. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, फिल्म की शूटिंग आखिरी चरण में हैं. फिल्म के आखिरी शेड्यूल की शूटिंग अबू धाबी में हो रही है, कहा जा रहा है कि जल्द ही फिल्म की शूटिंग पूरी हो सकती है. फिल्म इस साल ईद के मौके पर 15 जून को रिलीज होगी. जैकलीन ने हाल ही में रिलीज हुई फिलम ‘बागी-2’ में आइटम नंबर कर सुर्खियां बटोरी थीं. फिल्म में माधुरी दीक्षित पर फिल्माए गए सुपरहिट गाने ‘एक दो दिन’ के रिक्रिएट वर्जन पर ठुमके लगाती हुई नजर आई थीं.

VIDEO : टेलर स्विफ्ट मेकअप लुक

ऐसे ही वीडियो देखने के लिए यहां क्लिक कर SUBSCRIBE करें गृहशोभा का YouTube चैनल.

तिकड़म से अमीर, गरीबों को मिली गरीबी

देश में जो भी अमीरी दिख रही है, वह साफसाफ गरीबों, मेहनतकश किसानों, छोटेमझोले व्यापारियों व उद्योगपतियों से लूटपाट कर जमा किए गए पैसों की है. 10-15 करोड़ के फ्लैट, 100 करोड़ के मकान, पर्सनल जैट, फाइवस्टार कल्चर, करोड़ों के जेवर पहने बीवियां अमीरों की सूझबूझ की देन कम, उन के संपर्कों की देन ज्यादा हैं. इस देश में सत्ताधारियों की आय जनता को कुछ नया, अनूठा, विलक्षण देने की नीयत नहीं है, बल्कि उसे लूटने के नए, अभिनव, उलझे हुए तरीके ढूंढ़ने की है.

देश में शुद्ध अमीर वे हैं जो जानते हैं कि अमीरी का रास्ता धर्म या राजनीति की देन है. नीरव मोदी, मेहुल चोकसी, विक्रम कोठारी, सुब्रत राय, यूनिटैक, किंगफिशर, आईपीएल, 2जी स्कैम, कौमनवैल्थ स्कैम, कोल स्कैम, व्यापमं स्कैम सभी घरघर मोदी की तरह घरघर की पहचान बने हुए हैं. दरअसल, सत्ता और श्रद्धा दोनों का पूरा उपयोग कर के  गैरकानूनी तरीके से पैसा बनाया जा रहा है, जनता को कुछ दे कर नहीं.

आम उत्पादक या व्यापारी सीमित पैसा ही कमा पाता है इस देश में. उस पर सरकार, बैंकों, इंस्पैक्टरों की इस बुरी तरह जकड़न रहती है कि वह न कुछ नया कर पाता है न संभल पाता है. उस के पास न नेताओं पर उड़ाने के लिए कुछ होता है, न बाबाओं पर. इन को मोटी आमदनी खास तिकड़मबाजों के माध्यम से होती है जो सिस्टम को अपने हिसाब से चला कर जनता की कमाई लूट लेते हैं. अगर 4-5 वर्षों में 100-200 में से एकदो पकड़े भी जाएं तो इसे आवश्यक रिस्क फैक्टर मान कर भुला दिया जाता है. मिलिट्री की भाषा में इसे कोलैट्रल डैमेज कहा जाता है. यह सिस्टम के उपयोग की खराबी नहीं, यह किसी के गड़्ढे में भूल से गिर जाने का मामला है.

वित्त मंत्री, प्रधानमंत्री चाहे चुप रहें, उपदेशात्मक या धमकीभरे शब्दों में कुछ कह दें, इस देश में यह चलता रहेगा क्योंकि हमारी संस्कृति में लूट, बेईमानी और भेदभाव रगरग में भरा है. यहां पूजा उन्हीं की होती है जो प्रपंचों से विजय पाते हैं. उन्हीं के नाम पर झगड़ा हो रहा है. हाल के ऐसे नाम पौराणिक युग के नामों की तरह के ही हैं.

VIDEO : टेलर स्विफ्ट मेकअप लुक

ऐसे ही वीडियो देखने के लिए यहां क्लिक कर SUBSCRIBE करें गृहशोभा का YouTube चैनल.

‘स्थापित नेताओं’ को दरकिनार करती भाजपा

दूसरे दलों में तोड़फोड़ करना भाजपा के लिये सरल हो सकता है, पर दलबदल करने वाले नेताओं को संभालना भारी पड़ रहा है. उन्नाव के बहुचर्चित रेप और हत्या कांड में विधायक कुलदीप सेंगर की किरकिरी होने से विपक्ष भाजपा पर भारी पड़ गया है. पिछले कुछ सालों से भाजपा में अपने दल के ‘स्थापित नेताओं’ को दरकिनार किया जा रहा है. अपनी पार्टी के ‘स्थापित नेताओं’ की जगह दूसरे दलों के दलबदलू नेताओं को तरजीह दी जा रही है. यह भाजपा के गले की फांस बन रहे हैं.

उत्तर प्रदेश में भाजपा के 2 उपचुनाव हारने और सपा-बसपा के गठबंधन को देखते हुये इन दलबदल कर आये नेताओं का भी भाजपा से मोह भंग हो रहा है. उपेक्षा का शिकार चल रहे अब भाजपा के स्थापित नेता भी पार्टी के लिये काम करने से कतरा रहे हैं.

राज्यसभा चुनाव में भाजपा ने पार्टी में ‘स्थापित नेताओं’ को महत्व नहीं दिया. राज्यसभा चुनाव के बाद अब विधान परिषद के चुनाव में भी भाजपा अपने दल के ‘स्थापित नेताओं’ की जगह पर दूसरे दलबदलू नेताओं को महत्व दे रही है. भाजपा ने आधे से अधिक विधान परिषद के पदों पर दलबदलू नेताओं को टिकट देने की तैयार कर ली है. ऐसे में पार्टी के स्थापित नेताओं में असंतोष है. इसके बाद भी भाजपा तोड़फोड़ की राजनीति से बाज नहीं आ रही. इस बार भाजपा ने कांग्रेस प्रमुख सोनिया गांधी के चुनाव क्षेत्र रायबरेली में उनके करीबी नेताओं को भाजपा में शामिल करने का काम करने जा रही है.

जानकार लोग बताते हैं कि भाजपा में ‘योगीशाह’ की जोड़ी अपनी पार्टी के ‘स्थापित नेताओं’ को दरकिनार करना चाहती है. जिससे सभी उनकी हां में हां मिलाते रहे. दूसरी पार्टी से आने वाले दलबदलू नेता अवसर का लाभ उठाना चाहते हैं. कई बदलबदलू नेता ऐसे हैं जो चुनाव जीतने की हालत में नहीं थे, पर भाजपा की हवा में चुनाव जीत गये. अब भाजपा के खिलाफ माहौल बनता देख यह नेता सबसे पहले पार्टी छोड़ने और विद्रोह पर उतर आये हैं. उत्तर प्रदेश के 2 उपचुनाव में भाजपा विपक्षी एकता से कम अपनी पार्टी के अंतरकलह से अधिक हारी है. अब पार्टी स्तर पर इस बात को स्वीकार किया जा रहा है.

पार्टी के जिन लोगों को जमीनी सच की बात हाई कमान को देनी होती है वह भी नहीं बोलते हैं. जानकार लोग कहते हैं कि पार्टी के नेता तमाम सच को जानते हुये चुप हैं क्योंकि उनकी बात को हाईकमान के विरोध से जोड़ दिया जाता है. उन्नाव के विधायक कुलदीप सिंह के मामले में कुछ लोगों ने मामले की गंभीरता से पार्टी को अवगत कराने की कोशिश हुई थी पर सरकार में शामिल लोगों ने इन बातों को कोई तवज्जों नहीं दी. जिसकी वजह से समय पर विधायक पर अंकुश नहीं लगाया जा सका. ऐसे बहुत से मामले हैं जो गुटबाजी का शिकार हो रहे हैं. इसकी प्रमुख वजह यह है कि पार्टी अपने ‘स्थापित नेताओं’ की जगह पर दूसरे दलों के मौका परस्त लोगों पर भरोसा कर रही है.

VIDEO : टेलर स्विफ्ट मेकअप लुक

ऐसे ही वीडियो देखने के लिए यहां क्लिक कर SUBSCRIBE करें गृहशोभा का YouTube चैनल.

बहन जाह्नवी की ड्रेस पर भद्दे कमेंट से भड़के अर्जुन कपूर

बौलीवुड अभिनेता अर्जुन कपूर जितने हंसमुख फिल्मों में दिखाई देते हैं, असल जिंदगी में वह उतने ही गंभीर हैं. हाल ही में अर्जुन कपूर का गुस्सा सोशल मीडिया पर भी देखने को मिला. उन्होंने एक औनलाइन पोर्टल को ट्वीट कर जमकर लताड़ा है.

दरअसल, उस पोर्टल ने उनकी बहन जाह्नवी कपूर के ड्रेस पर भद्दा कमेंट किया था. जाह्नवी अपनी बहन खुशी और पापा बोनी के साथ अर्जुन के घर गई थीं. वहां उन्होंने पिंक कलर की एक ड्रेस पहन रखी थी. उनकी पिंक कलर की ड्रेस पर कमेंट करते हुए पोर्टल ने लिखा कि जाह्नवी ने इतनी सेक्सी ड्रेस पहनी थी कि सब कुछ दिख रहा था. इस कमेंट के बाद अर्जुन खुद को रोक नहीं पाए और वेब पोर्टल पर गलत तरीके से खबरों को मढ़ने पर भड़क उठे.

अर्जुन ने इस खबर को शेयर करते हुए काफी गुस्से में ट्वीट किया, क्या आपको पता है… एक वेबसाइट ने अटेंशन पाने के लिए ऐसी ओछी हरकत की है.. ये शर्मनाक है कि आपकी आंखें यही सब देखती है. इसी तरह हमारा देश एक यंग वुमेन को देखता है. हालांकि उनके ट्वीट के बाद पोर्टल ने खबर को डिलीट कर दिया है.

बता दें कि जाह्नवी की फिल्म ‘धड़क’ की शूटिंग शेड्यूल खत्म हो चुका है तो वहीं अर्जुन इन दिनों परिणीति चोपड़ा के साथ अपनी फिल्म ‘नमस्ते इंग्लैंड’ की शूटिंग कर रहे हैं. फिलहाल वो मुंबई में हैं जिनसे मिलने बोनी बेटी जाह्नवी और खुशी के साथ पहुंचे थे.

आपको बता दें कि पहले अर्जुन और उनकी बहन अंशुला के रिश्ते जाह्नवी और खुशी के साथ ठीक नहीं थे, लेकिन श्रीदेवी के निधन के बाद चारों भाई बहन बहुत करीब आ गए. अर्जुन की तरह ही कुछ समय पहले अंशुला ने भी इंस्टाग्राम पर एक यूजर को जाह्नवी और खुशी के बारे में अपशब्द कहने के लिए फटकार लगाई थी.

VIDEO : टेलर स्विफ्ट मेकअप लुक

ऐसे ही वीडियो देखने के लिए यहां क्लिक कर SUBSCRIBE करें गृहशोभा का YouTube चैनल.

अक्टूबर : दर्शकों के सब्र का इम्तहान

फिल्म की कहानी दिल्ली के एक फाइव स्टार होटल से शुरू होती है, जहां होटल मैनेजमेंट का कोर्स करने के बाद कुछ लड़के व लड़कियां ट्रेनी के रूप में काम कर रहे हैं. इनके साथ शर्त है कि इन्हे ट्रेनी के दौरान उपस्थित बनाए रखते हुए शिकायत का मौका नहीं देना है. बीच में खुद छोड़ कर गए या होटल प्रबंधक ने उन्हे निकाल दिया, तो उनके माता पिता को होटल प्रबंधक को तीन लाख रूपए चुकाने पड़ेंगे.

इन ट्रेनी लड़के व लड़कियों में 21 साल का दानिश वालिया उर्फ डैन (वरुण धवन) और शिवली अय्यर (बंदिता संधू) भी हैं. डैन करियर ओरिएंटेड है और ट्रेनीशिप खत्म होने के बाद वह अपना रेस्टारेंट खोलने का सपना देख रहा है. हर दिन उससे कुछ न कुछ ऐसी गड़बडी होती रहती है कि उसे डांट सुननी पड़ती है. शिवली को अक्टूबर माह में खिलने वाले एक खास फूल से काफी लगाव है. डैन व शिवली के बीच कोई अच्छी दोस्ती भी नहीं है.

31 दिसंबर की रात होटल में नए वर्ष की पार्टियां हो रही हैं. यह सारे ट्रेनी भी तीसरी मंजिल की छत पर पार्टी मना रहे हैं. कुछ लड़के व लड़कियों ने शराब पी है.शिवली ने शराब नहीं ली. अचानक वह पूछती है कि ‘डैन कहां है?’ और फिर वह छत की दीवार पर जाकर बैठ जाती है. बैठते ही वह नीचे गिर जाती है. डाक्टर व एम्बूलेंस आती है, बुरी तरह से घायल शिवली को अस्पताल ले जाया जाता है. डाक्टर घोष उसका आपरेशन करते हैं. पर वह कोमा में चली जाती है. उसे वेंटीलेटर पर रखा गया है. पता चलता है कि शिवली की मां प्रोफेसर है और उसकी एक छोटी बहन व एक भाई भी है.

पिता का आठ वर्ष पहले ही देहांत हो गया था. शिवली के चाचा नहीं चाहते कि अब शिवली के इलाज पर पैसे खर्च किए जाएं, डाक्टरों को भी शिवली के कोमा से बाहर आने व जिंदा होने की उम्मीदें कम हैं. पर मां का दिल नहीं मानता. इधर डैन भी शिवली को देखने आता है. एक दिन उसके साथी बताते हैं कि छत से गिरने से पहले शिवली ने पूछा था था कि ‘डैन कहां है?’ इस बात से डैन को लगता है कि शिवली उसे चाहती है. उसके बाद वह हर दिन अस्पताल में शिवली के पास रहने का प्रयास करता है.October Movie Review story about love

डैन बार बार कहता है कि शिवली के इलाज के लिए डाक्टरों को कुछ वक्त दिया जाना चाहिए. खैर, शिवली कोमा से बाहर आ जाती है. पर अपाहिज हो गयी है. होटल में डैन की अनुपस्थिति व गलत व्यवहार के कारण उसे होटल से निकाल दिया जाता है. इससे उसकी मां बहुत नाराज होती हैं. उन्हे तीन लाख रूपए भी चुकाने पड़ते हैं. इसी के चलते होटल वाले उसे निकाल देते हैं. डैन की मां इस बात से नाराज है कि डैन ने सही ढंग से अपनी ट्रेनिंग नहीं पूरी की और अब उन्हे तीन लाख रूपए भी चुकाने पड़ेंगे. उसके बाद शिवली की मां डैन को समझाकर काम करने के लिए कहती है.

डैन को कुलू के एक होटल में मैनेजर की नौकरी मिल जाती है. इधर शिवली हिंसक हो जाती है. अंततः डैन वापस आता है. और फिर से अस्पताल में शिवली के आस पास रहने लगता है. कुछ दिन बाद अस्पताल से शिवली को घर ले जाया जाता है. अब डैन, शिवली के घर जाकर उसकी देखभाल करता है, कभी कभी व्हील चेअर पर शिवली को बैठाकर गार्डेन में घुमाने ले जाता है. मगर कुछ दिन बाद शिवली इस संसार को छोड़कर चली जाती है. शिवली की मां अक्टूबर माह में खिलने वाले फूल का पौधा डैन को सौंपकर दिल्ली छोड़कर चेन्नई चली जाती हैं.

फिल्मकार शुजीत सरकार की फिल्म  ‘अक्टूबर’ एक अनकहे और पैशनेट प्यार की कहानी है. मगर कहानी में बहुत ज्यादा नवीनता नहीं है. इस फिल्म को देखते हुए दर्शक की नजरों के सामने 27 मई 2016 को प्रदर्शित फिल्म ‘‘वेटिंग’’ जरुर घूमती है, जिसमें नसिरूद्दीन शाह व कलकी कोचलीन की अहम भूमिकाएं थी. कहानी लगभग वही है, सिर्फ पात्रों की अदला बदली है.

खैर, शुजीत सरकार ने भी अपनी इस फिल्म में बिना शर्त वाले प्यार की बात की है, पर फिल्म उदासी लिए हुए धीमी गति से चलती है. फिल्म का क्लायमेक्स अवसाद के अलावा कुछ नहीं देता. प्यार को रूह से महसूस करने व प्यार को गहराई से समझने के लिए एक लघु फिल्म के रूप में यह फिल्म अच्छी बन सकती थी,मगर फीचर फिल्म के लिए जिस तरह से कहानी धीमी गति से बढ़ती है, जिस तरह से फिल्म में दर्द, गम व उदासी को पिरोया गया है, उससे  भी दर्शक के सब्र का बांध टूटता है. वैसे कुछ भावनात्मक दृश्य काफी अच्छे बन पड़े हैं.

आम हिंदी फिल्मों से एकदम भिन्न और पूरी फिल्म जिस तरह से सुस्त गति से आगे बढ़ती है, उसके चलते फिल्म को देखते रहने का दर्शकों का सब्र का बांध टूट जाता है. परिणामतः फिल्मकार दर्शकों को किरदारों की जिंदगी की तह में जाकर निश्छल जज्बातों से जोड़ नही पाते हैं. पैशनेट प्यार को दर्शाते समय निर्देशक व लेखक यह भूल गए कि आज तेज गति से भागती जिंदगी के दौर में दर्शक इतना सब्र नहीं दिखा सकता, जितना उन्हे दर्शकों से अपेक्षा है.October Movie Review story about love

‘कौफी डे से शुरू और कौफी डे पर खत्म होने वाले प्यार’ के युग में प्यार की गहराई को समझने का किसके पास वक्त है. इसलिए बेहतरीन कलाकारों की मौजूदगी के बावजूद इस फिल्म को बाक्स आफिस पर दर्शक मिलेंगे, ऐसी उम्मीद कम है. इतना ही नहीं फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि फिल्म का एक भी किरदार दर्शक की रूह को हिलाने का काम भी नहीं करता. कोई भी किरदार दर्शकों के दिलो दिमाग पर अमिट छाप नहीं छोड़ता है.

जहां तक अभिनय का सवाल है, तो वरुण धवन ने एक बार फिर बाजी मार ली है. डैन के किरदार को वरुण धवन ने अपने अभिनय से जीवंत कर दिया है. शिवली के किरदार में बंदिता संधू ने अपनी आंखों के भावों से काफी कुछ कहने का प्रयास किया है और एक कलाकार के रूप में वह काफी उम्मीदें जगाती है. शिवली की मां के किरदार में गीतांजली राव ने भी बेहतरीन अभिनय किया है.

कैमरामैन अविक मुखोपाध्याय की भी प्रशंसा की जानी चाहिए जिन्होंने दिल्ली को भी अति खूबसूरत तरीके से परदे पर उकेरा है.

एक घंटा पचपन मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘अक्टूबर’’ का निर्माण ‘राइजिंग सन फिल्मस’ के बैनर तले रौनी लाहिरी और शील कुमार ने किया है. फिल्म के निर्देशक शुजीत सरकार, लेखक जूही चतुर्वेदी, संगीतकार शांतनु मोयत्रा, कैमरामैन अविक मुखोपाध्याय तथा कलाकार हैं – वरुण धवन, बंदिता संधू, गीतांजली राव, साहिल वेंडालिया, प्रशांत सिंह व अन्य.

क्या सानिया मिर्जा पर बनी है फिल्म ‘राजी’, सानिया ने दिया जवाब

भारतीय टेनिस स्टार सानिया मिर्जा चर्चा में हैं. दरअसल उनके चर्चा में आने का कारण आलिया भट्ट की फिल्म ‘राजी’ है. फिल्म ‘राजी’ में आलिया भट्ट ने एक कश्मीरी मुस्लिम लड़की का किरदार निभाया है, जिसकी शादी पाकिस्तान के एक लड़के से हो जाती है. जिसके बाद ऐसी खबरें सामने आईं कि फिल्म राजी की कहानी सानिया मिर्जा की रियल लाइफ से प्रेरित है. जिस पर कई लोगों ने अपना-अपना रिएक्शन देना शुरू कर दिया. हालांकि अब सानिया मिर्जा ने इस पूरे मामले पर चुप्पी तोड़ते हुए औफिशियल ट्विटर अकाउंट पर जवाब दिया है.

दरअसल एक ट्विटर अकाउंट यूजर ने ट्वीट किया, आलिया भट्ट की फिल्म राजी की कहानी एक ऐसी भारतीय लड़की की है जिसकी शादी एक पाकिस्तानी लड़के से हो जाती है, लेकिन फिर भी वह भारत के लिए ही काम करती है. कहा जा रहा है कि फिल्म सानिया मिर्जा की बायोपिक है. हैशटैग राजी ट्रेलर. इस ट्वीट का जवाब देते हुए सानिया मिर्जा ने लिखा, उम्ममम, मुझे लगता है कि नहीं. इसके साथ ही सानिया ने एक इमोजी का भी इस्तेमाल किया है.

धर्मा प्रोडक्शन और जंगली पिक्चर्स के बैनर तले बनीं फिल्म ‘राजी’ की कहानी हरिंदर सिक्का के उपन्यास कौलिंग सहमत पर आधारित एक कश्मीरी लड़की की रियल लाइफ पर आधारित है. फिल्म में आलिया भट्ट के साथ अभिनेता विक्की कौशल भी नजर आएंगे. फिल्म की डायरेक्टर मेघना गुलजार हैं. फिल्म की कहानी की बात करें तो फिल्म में आलिया भट्ट एक सहमत नाम की लड़की के किरदार में नजर आएंगी, जिसके पिता उसकी शादी पाकिस्तान के एक अधिकारी से करा देते हैं.

देखने में सीधी-साधी सी लगने वाली सहमत पाक में अपने देश के लिए बड़ी शातिर तरीके से जासूसी करती है. मंगलवार को फिल्म का ट्रेलर रिलीज हुआ था जिसे दर्शकों ने काफी पसंद किया था, जिसके कारण फिल्म का ट्रेलर यू-ट्यूब पर ट्रेंडिग में नंबर एक भी रहा था. इसके अलावा आलिया भट्ट रणबीर कपूर के साथ फिल्म ‘ब्रह्मास्त्र’ में नजर आएंगी और रणवीर सिंह के साथ ‘गली बौय’ की भी शूटिंग में बिजी हैं.

VIDEO : एमरेल्ड ग्रीन नेल आर्ट

ऐसे ही वीडियो देखने के लिए यहां क्लिक कर SUBSCRIBE करें गृहशोभा का YouTube चैनल.

नूरजहां की मिस्टेक

किस्सा कुछ इस तरह से है कि जब मुख्यमंत्री कल्लू सिंह अपनी बीवी जलेबी देवी को अपना ताज दे कर तिहाड़ को गए, तो बहुत लोगों के मन में यह शक पैदा हो गया कि उन की पत्नी इतने बड़े पद को संभाल पाएंगी या नहीं. कल्लू सिंह 8वीं जमात से ज्यादा नहीं पढ़ सके थे, पर बोलचाल व वादविवाद में वे सब के गुरु थे.

जलेबी देवी अपने मिडिल पास शिक्षा मंत्री दुखहरन से भी कम पढ़ीलिखी थीं यानी प्राइमरी फेल थीं. पर वे बातव्यवहार, स्टाइल और अंगरेजी में दोनों से सुपीरियर पड़ रही थीं.

जनताजनार्दन या बड़े अफसरों का उन को ‘मैडम’ कहते कहते मुंह नहीं थकता था. वैसे, जलेबी देवी के इस बदलाव में आईएएस पीए संत तुषार देव यानी एसटीडी उर्फ संतू का बहुत बड़ा हाथ था.

पीए संतू जलेबी देवी को चक्करदार राजनीतिक भंवरों, नुकीली संवैधानिक चट्टानों और तूफानी विरोधी थपेड़ों से बचा कर निकाल लेता था. कम ही लोगों को पता था कि मैडम के पास ईयरफोन भी है, जिस से वे अपनी हिदायतें गाहेबगाहे डायल किया करती थीं.

फर्ज कीजिए, किसी सभा में मैडम का भाषण उबाल बिंदु पर उछाल लगाने वाला हो, तभी ईयरफोन में इंस्ट्रक्शन आ जाता ‘डाउनडाउन’ और वे तत्काल नोज डाइव मार कर नीचे आ जातीं. पर काफीकुछ रटाएसिखाए जाने के बावजूद ऐसा होता कि एसटीडी को ‘कटकट’ कह कर पैकअप कराना पड़ता.

जैसे उस दिन जब सरकारी अस्पताल के जच्चाबच्चा विंग के उद्घाटन के मौके पर जलेबी देवी ने यों कहना शुरू किया, ‘‘देवियो और सज्जनो, यहां मैटरनिटी अस्पताल खोल दिया गया है. जितने बच्चे चाहे पैदा कीजिए, कोई डर नहीं.

‘‘दाई से नाल कटवाने की जरूरत नहीं है. इन दाइयों ने हमारे 3 बच्चे मरवा दिए, नहीं तो इस समय हमारे 17 बच्चे होते. है कोई, जो आज के जमाने में इतने…’’ तभी एसटीडी को बड़े जोर से ‘कटकट’ कह कर उन के भाषण को खत्म कराना पड़ा.

शुरूशुरू में तो जलेबी देवी अपने चतुर पीए संतू की बातें मान लिया करती थीं, पर जैसेजैसे दिन बीतते गए और उन्हें अपनी पोजीशन और पावर का एहसास हुआ, तो वे उस की हिदायतें दरकिनार करने लगीं.

भला हो राज्य की भोलीभाली जनता का, जिस ने जलेबी देवी के कहे को कभी कान नहीं दिया. कान दिया तो उन के अच्छे कामों को, जिन में लगान माफी से ले कर तार काटे जाने की माफी भी शामिल थी.

तकरीबन 2 सौ लोगों को उन्होंने गबन, डकैती, बलात्कार, हत्या जैसे मामलों में जेल जाने से बचाया होगा. कितने अपढ़ बेरोजगारों को निगमों का चेयरमैन, कितने ही जाली डिगरी वालों को वाइसचांसलर बना दिया. क्या इन सब का कोई हिसाब है?

पर बुरा हो उन के विरोधियों का, जिन्हें उन के हर अच्छे काम में ऐब नजर आता. और तो और उन की अपनी पार्टी में भी पंचानन राय और तिलकुट यादव जैसे कई जयचंद थे, जिन्हें जलेबी देवी का दबदबा खाए जा रहा था.

पर धन्य हो भेड़ का दूध पीए जलेबी देवी के कलेजे का, जो सभी दांवपेंचों से बेखबर राज्य की खड़बडि़या मोटरगाड़ी को मर्सिडीज बैंज की शान से लहराए चली जा रही थीं.

जैसे आज ही अविश्वास प्रस्ताव के गहराए बादल को दरकिनार कर उन्होंने 3-4 उद्घाटन के फीते काट डाले और लच्छेदार भाषण दे डाले. हर जगह नियमपूर्वक ‘जब तक सूरज चांद रहेगा…’ वाले नारे के साथ तालियां पिटवा दीं.

भाई के दसलखी ‘ब्यूटी पार्लर’ के उद्घाटन के बाद तो उन्होंने बाकायदा अपना कायाकल्प ही करा डाला. पर ‘ब्यूटी पार्लर’ से निकलते ही एक दिक्कत आ गई. नदी पार गंजी गांव में 5 दलितों की हत्या की खबर आई.

यह सुन कर जलेबी देवी का मूड बिगड़ गया. शाम को बांगड़ू गवर्नर की इफ्तार पार्टी में बिरियानी उड़ानी थी. अब पहले गंजी गांव जाना पड़ेगा. वहां से लौटने पर पता नहीं कितना मेकअप बचा रह पाएगा.

वैसे, पुलिस महानिरीक्षक उन के वहां जाने के पक्ष में नहीं थे. पर पार्टी उपाध्यक्ष राम नगीना ने चेतावनी दी, ‘‘आप को हारना हो, तो मत जाइए.’’

जब जलेबी देवी ने अपने पीए संतू की राय ली, तो उस ने कहा, ‘‘वहां जाने में कोई हर्ज नहीं, पर मेकअप डाउन करना पड़ेगा.’’

जलेबी देवी बोलीं, ‘‘इतनी मेहनत से तो मेकअप कराया था, अब सब गंवा दें?’’

सो लेदे कर काफिला गंजी गांव की ओर बढ़ा. रास्ते में पीए संतू ने लाचारी के भाव के बावजूद जलेबी से ‘खून की आखिरी बूंद’ वाला डायलौग बारबार बुलवा कर चैक किया और कई दूसरी हिदायतें भी दीं, जैसे गले से भर्राई आवाज कैसे निकालनी चाहिए.

दोपहर बाद मुख्यमंत्री का दल घटना वाली जगह पर पहुंच गया. वहां हायतोबा मची हुई थी. प्रशासन के खिलाफ भीड़ नारे लगा रही थी. एक जगह माले नेता राम कटार माइक से आग उगल रहे थे.

भीड़ इतनी थी कि पुलिस कोई भी कार्यवाही करने से हिचक रही थी.

राम कटार ने अपना भाषण बीच में रोक कर गरजती आवाज में भीड़ से पूछा, ‘‘पहचानो… ये कौन हैं?

अरे, ये तो नूरजहां हैं.’’ भीड़ के बीच हंसी की एक लहर दौड़ गई.

‘‘बेगम नूरजहां यहां आई हैं, इंसाफ बांटने. समझे? जहांगीरी इंसाफ तो जानते ही हो, कितना मशहूर है. पहले भी नमूना देख चुके हो,’’ राम कटार चुनचुन कर जहर बुझे बाण जनता के दिल में उतार रहे थे.

‘जलेबी देवी हायहाय’ भीड़ ने नारा बुलंद किया. अफसर चौकन्ने हुए और पुलिस की एक टुकड़ी राम कटार को शांत कराने के लिए लपकाई गई, पर राम कटार लातघूंसों की मार के बावजूद माइक छीने जाने तक जलेबी देवी की अच्छी गत बना चुके थे.

‘‘बड़ी पीर है इन के जिगर में. देखते नहीं हो,’’ वे चिल्लाते रहे, ‘‘लिपस्टिकपाउडर सब गवाह हैं… मारे दुख के अपने आधे बाल कटा दिए हैं. जहांगीर होते, तो पूरा सिर मुंड़वा के आते. नूरजहां बीवी होने के नाते आधे पर काम चला रही हैं.’’

थोड़ी देर बाद राम कटार और उन के साथियों का बंदोबस्त हो जाने के बावजूद भीड़ में जोश बढ़ता जा रहा था.

पीए संतू ने राय दी कि मैडम का अब यहां रुकना ठीक नहीं. जल्द से जल्द इन्हें इस झंझट से निकाल बाहर करना चाहिए. पर राम नगीना ने जोर दिया कि यहां आ कर बिना बोले चले जाना ठीक नहीं है. जनता में गलत संदेश जाएगा.

मैडम के बोलते ही भीड़ शांत हो जाएगी, ऐसा उन्हें यकीन था. शोरगुल के बीच उन्होंने जलेबी देवी को माइक पकड़ा दिया और चिल्लाचिल्ला कर भीड़ को बता दिया कि मुख्यमंत्री आप लोगों से कुछ कहना चाहती हैं.

आखिरकार जलेबी देवी ने अभ्यास की गई भर्राई आवाज में कहना शुरू किया, ‘‘प्यारे भाइयो और बहनो…’’

कड़ी धूप में उन के ऊपर की गई कलाकारी का रंग दूरदूर तक चमक रहा था. एक किनारे पोस्टमार्टम के लिए तैयार की गई पांचों लाशें जमीन पर पड़ी थीं और दूसरी ओर…

अचानक एक जूता जलेबी देवी के सिर पर आ गिरा, जिस से उन का चश्मा दूर जा गिरा और बाल बिखर गए. जब तक वे संभलतीं, तब तक और कई जूतेचप्पलों ने उन का बाकी का हुलिया बदल दिया. पुलिस डंडा फटकारते हुए दंगाइयों की ओर बढ़ी.

गंदे नारों से आसमान गूंजने लगा. ‘हत्यारिन, चोर, पापिन…’ चोट और बेइज्जती से तिलमिलाई जलेबी देवी का सारा सब्र जाता रहा. वे गला फाड़ कर चीखीं, ‘‘मार के बिछा दो सबों को… फिर हम देख लेंगे… किसी को पहनेओढ़े नहीं देख सकते हैं… अच्छा हुआ मर गए. और भी मरे होते तो अच्छा था…’’

पीए संतू ने उन के हाथों से माइक छीन कर दूर फेंका और सिक्योरिटी वालों की मदद से उन्हें तत्काल बाहर निकाल कर रवाना किया. पर कई मीडिया वाले जलेबी देवी की चुनिंदा गालियों और उन के दलित प्रेम की बानगी अंत तक रेकौर्ड करते रहे.

शाम की खबरों में इस महाभारत की खबरें प्रसारित हो गईं और 2 सहयोगी पार्टियों की समर्थन वापसी से सरकार गिर गई.

यह अलग बात है कि 6 महीने बाद ही कल्लू सिंह की अद्भुत कुशलता के चलते जलेबी देवी फिर से पद पर आसीन हो कर जनकल्याण में जुट गईं.

लेकिन उन्होंने अपना मिस्टेक को नहीं दोहराया. अब वे खूनी घटना वाली जगहों पर बिना मेकअप वाले रूप में ही जाती हैं. गंजी गांव में तो 5 खून पर ही महाभारत मच गया था, पर अब 12-13 लाशों पर भी उतना कुहराम नहीं मचता. पीए संतू के डायरैक्शन में वे राज्य को और ज्यादा मजबूती और शांति की ओर बढ़ा रही थीं.

VIDEO : एमरेल्ड ग्रीन नेल आर्ट

ऐसे ही वीडियो देखने के लिए यहां क्लिक कर SUBSCRIBE करें गृहशोभा का YouTube चैनल.

मरक्यूरी : असली दर्द नहीं उभरा

पर्यावरण  और प्रदूषण जैसे अहम व अति ज्वलंत मुद्दे पर बनी मूक रोमांचक फिल्म ‘‘मरक्यूरी’’ की प्रस्तुतिकरण की खामियों के चलते एक बेहतरीन विषय वाली अच्छी फिल्म आम दर्शकों तक नहीं पहुंच सकती. यह पूरी तरह से पटकथा लेखक व निर्देशक की विफलता ही कही जाएगी कि वह वर्तमान समय के ज्वलंत मुद्दे पर बनी अपनी फिल्म को आम दर्शकों तक पहुंचाकर जागरुकता नहीं ला पाए. और न ही जहर उगलती रासायनिक व धातु की फैक्टरियों के खिलाफ लोगो में रोष ही पैदा हो पाता है.

मूक फिल्म ‘मरक्यूरी’ की कहानी की पृष्ठभूमि में एक केमिकल फैक्टरी के अंदर मरक्यूरी एक्सपोर के चलते धातु की विषैली गैस की वजह से फैक्टरी के आस पास के कई गांवों के इंसान, जानवर, पक्षी आदि मारे जाते हैं. उच्चतम न्यायालय के आदेश के बाद फैक्टरी हमेशा के लिए बंद हो जाती है. उसके बाद भी उस क्षेत्र में जन्म लेने वाला हर  बच्चा अंधा बहरा या गूंगा पैदा होता है. इन बच्चों की परवरिश के लिए एक सेवा भावी संस्था ‘होप स्कूल’ चलाती है. इसी होप स्कूल में अंधे व गूंगे प्रभू देवा बच्चों को संगीत सिखाते हैं, संगीत के कार्यक्रम करके लोगों का मनोरंजन करते हैं.

इसी होप स्कूल के छात्र रहे पांच युवक व युवती सनथ रेड्डी, दीपक परमेश, शशांक पुरूषोत्तम, अनीष पद्मनाभन, इंदुजा व गजराज इसी फैक्टरी वाले भुतहा शहर में आ जाते हैं. और एक मकान में रहते हुए शराब व सिगरेट पीते हैं और ऊंचा संगीत सुनते हैं. यह सभी छह साथी गूंगे हैं. इशारों में ही एक दूसरे से बात करते हैं. रात के अंधेरे में पार्टी के बाद पांच साथी कार से बाहर जंगल में घूमने निकलते हैं और बंद पड़ी फैक्टरी के पास भी जाते हैं. वापसी मे कार इंदुजा चला रही होती हैओर अपने प्रेमी के कहने पर काफी तेज गति से कार चलाती है.

उधर रात के अंधेरे में अचानक प्रभू देवा की नींद टूटती है तो वह अपनी पत्नी को सोता छोड़कर जंजीर में बंधे अपने कुत्ते को लेकर बाहर निकलते हैं. उसी वक्त यह पांचों साथी उधर से कार से गुजरते हैं, कार देखकर कुत्ता भौंकता है, इनकी कार का बैलेंस बिगड़ता है और लोहे की चैन से टकरा जाती है. जिससे कुत्ता उस जंजीर से अलग हो जाता है, पर जंजीर का एकसिरा कार के पहिए में फंस जाता है, दूसरा सिरा प्रभू देवा के हाथ में बंधा हुआ है.

यह लोग कुत्ते के डर से कार को और तेज गति से भगाते है, जंजीर के साथ ही प्रभु देवा भी जमीन पर घिसते रहते हैं और उनकी मौत हो जाती है. कुछ देर बाद वह कार रोक कर जंजीर को कार से अलग करना चाहते हैं. पर सफलता नहीं मिलती. तो वह प्रभू देवा के मृत शरीर को अपनी कार की डिक्की में डालकर आगे बढ़ते हैं और फिर फैक्टरी के पास पहुंचकर नदी के किनारे पहाड़ी पर पत्थर आदि की मदद से जंजीर को तोड़ने के बाद प्रभू देवा के मृत शरीर को दफना देते है, पर एक साथी का मोबाइल छूट जाता है.

यह सभी दूसरी रात में मोबाइल ढूढ़ने उसी स्थान पर जाते हैं, मोबाइल मिल जाता है, पर अब प्रभू देवा का भूत उनके पीछे पड़ जाता है. उसे अपनी मौत का बदला लेना है. वहां से यह सभी किसी तरह भागकर फैक्टरी के अंदर पहुंच जाते हैं, जहां प्रभू देवा का भूत एक एक कर सभी की हत्या कर देता है. जब वह इंदुजा के प्रेमी को मार रहा होता है, तब इंदुजा उसका हाथ पकड़कर बताती है कि जो कुछ हुआ अनजाने में हुआ. क्योंकि वह लोग बहरे व गूंगे हैं. होप स्कूल के साथी हैं. और यह युवक उसका प्रेमी है. तब वह भूत रुक जाता है.

भूत को अहसास होता है कि यह लोग भी उसी दर्द के मारे हुए हैं, जिस दर्द को वह सहता रहा है. यानी कि यह सभी इसी फैक्टरी की धातु के जहर के मारे हुए हैं. फिर वह भूत अपनी कहानी सुनाता है कि वह होप स्कूल में संगीत सिखाते हैं. तो इंदुजा को भी याद आ जाता है. फिर वह बताता है कि उसकी पत्नी ने उसकी आंखों का आपरेशन करवाने के लिए पैसा इकट्ठे कर लिए थे, आपरेशन होने वाले दिन से पहले की रात उसे कार चालकों ने सड़क पर घसीटते हुए मार डाला. पर प्रभू देवा के भूत को फैक्टरी की वजह से मारे गए लोग और उसके बाद पैदा हुई पीढ़ी के दर्द का ऐसा अहसास होता है कि वह इंदुजा को जिंदा छोड़ देता है.

पर उसके शरीर में प्रवेश कर अपने घर जाता है. देखता है कि उसकी पत्नी गुमुसम बैठी है. उसका कुत्ता उसे देखकर भौंकता भी है. पुलिस अपनी जांच पड़ताल मेंलगी हुई है. वह वापस कार के पास आती है और प्रभू देवा का भूत उसका शरीर छोड़ देता है. इसी के साथ इंदुजा बोलने व सुनने भी लगती है.

जहां तक अभिनय का सवाल है तो नृत्य करने वाले प्रभू देवा ने बहुत ही अच्छी परफार्मेंस दी है. इंदुजा भी अपनी परफार्मेंस से छाप छोड़ती हैं. बाकी कलाकार भी ठीक ठाक हैं.

पटकथा लेखक ने जिस अंदाज में इस मूक फिल्म की पटकथा लिखी है, उसके चलते यह फिल्म आम दर्शक की समझ से परे है. जब दर्शक बहुत ज्यादा दिमाग लगाएगा और इशारों की भाषा को समझना शुरू करेगा, तभी यह फिल्म उसकी समझ में आएगी. फैक्टरी से पैदा हुए जहर के चलते पूरे शहर/कई गांव के इंसानों,जानवर आदि के मारे जाने की कहानी तो सिर्फ अखबार की कतरनों को दिखाकर ही पेश किया गया है. बाकी पूरी फिल्म मूक है.

संवाद नहीं है, इसलिए भी दर्शक बोर होने लगता है. आज की पीढ़ी का दर्शक तेज गति से भागती फिल्म देखने का आदी है, जहां उसका ध्यान परदे पर कम, संवादों पर ही ज्यादा रहता है. आज का दर्शक टकटकी लगाकर फिल्म कम ही देखता है. दूसरी बात इंटरवल से पहले फिल्म बहुत ही शुष्क और धीमी गति से चलती है. लेकिन इंटरवल के बाद फिल्म गति पकड़ती है और रोमांचक भी हो जाती है.

इंटरवल के बाद कुछ दृश्य कमाल के बन पड़े हैं, जिसके लिए निर्देशक बधाई के पात्र हैं. मगर फिल्म का मूल मुद्दा जहर उगलती फैक्टरियों से फैलते प्रदूषण और लोगों की तबाह होती जिंदगी का दर्द व मुद्दा भी उभर नहीं पाता है. लेखक व निर्देशक ने थोड़ी और संजीदगी के पटकथा पर काम किया होता तो एक बेहतर फिल्म बन सकती थी.

लगभग दो घंटे की अवधि वाली फिल्म ‘मरक्यूरी’ का निर्माण कार्तिक सुब्बाराज और पेन कंपनी ने जयंतीलाल गाड़ा ने किया है. फिल्म के लेखक व निर्देशक कार्तिक सुब्बाराज, पार्श्वसंगीतकार संतोष नारायनन, कैमरामैन एस तिरू तथा कलाकार हैं-प्रभु देवा, सनथ रेड्डी, दीपक परमेश, शशांक पुरूषोत्तम, अनीष पद्मनाभन, इंदुजा व गजराज.

प्रियंका चोपड़ा हुईं रंगभेद की शिकार, हाथ से निकली हौलीवुड फिल्म

हौलीवुड में रंगभेद और नस्लवादी भावना के वजूद का इतिहास करीब 80 साल पुराना हो गया है और समय समय पर कलाकारों को इसका शिकार होना पड़ा है. ताजा मामले में हौलीवुड में प्रमुख भूमिका पाने वाली बौलीवुड और दक्षिण एशिया की पहली अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा के नस्‍लवाद का शिकार होने की खबरें सामने आई है. प्रियंका ने खुद अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका को दिए इंटरव्यू में इस बात का खुलासा किया है. बौलीवुड की ‘देसी गर्ल’ प्रियंका चोपड़ा ने एक अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका को दिए इंटरव्यू में बताया कि रंग के आधार पर होने वाले भेदभाव के कारण उनके हाथ से एक हौलीवुड फिल्म फिसल गयी.

प्रियंका ने कहा, यह पिछले साल की बात है जब वह एक फिल्म की शूटिंग के सिलसिले में बाहर गयी हुई थीं तब एक स्टूडियो से उनके मैनेजर से बातचीत हुई. उनके मैनेजर से कहा गया कि प्रियंका इस फिल्म के लिए उपयुक्त नहीं हैं और इसका कारण फिजिकैलिटी बताया गया. प्रियंका ने अपने मैनेजर से इस पूरे मामले को समझा, तो पता चला कि फिल्म मेकर्स का मतलब स्किन कलर से था. मेकर्स फिल्म में ऐसे कलाकार को चाहते थे जो ब्राउन न हो. प्रियंका ने कहा कि उन्हें यह सुनकर काफी हैरानी हुई और तकलीफ भी पहुंची.

बता दें कि यह पहला मामला नहीं है जब किसी सेलिब्र‍िटी को रंगभेद का शिकार होना पड़ा है. कुछ समय पहले शिल्पा शेट्टी भी रंगभेद और नस्लभेद की शिकार हुई थीं, जब वह एक अंतर्राष्ट्रीय टीवी शो बिग ब्रदर का हिस्सा बनी थीं.

यही वजह हो सकती है कि प्र‍ियंका ने अब बौलीवुड कमबैक का मन बना लिया है. क्वांटिको के मेकर्स सीजन 4 की तैयारी में लगे हैं, लेकिन प्र‍ियंका अब इसका हिस्सा नहीं होंगी. सूत्रों की मानें, तो प्रियंका अब कुछ नया करना चाहती हैं.

बता दें कि कुछ समय पहले प्र‍ियंका ने क्वांटिको के तीसरे सीजन का पोस्‍टर जारी किया था. प्रियंका इन दिनों क्वांटिको आयरलैंड में इसकी शूटिंग कर रही हैं. इस शो का आयोजन इसी साल 26 अप्रैल से किया जाएगा. प्र‍ियंका ने ट्व‍िटर पर क्वांटिको सीजन 3 का फर्स्‍ट लुक पोस्‍टर साझा किया था, जोकि बेहद दमदार है इससे पहले क्वांटिको के दो सीजन में भी प्र‍ियंका काफी प्रभावी अंदाज में दिखाई दी थीं.

VIDEO : एमरेल्ड ग्रीन नेल आर्ट

ऐसे ही वीडियो देखने के लिए यहां क्लिक कर SUBSCRIBE करें गृहशोभा का YouTube चैनल.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें