युवाओं के लिए क्यों नहीं बनता सिनेमा

‘‘किताबों के  बजाय युवाओं का झुकाव सिनेमा की ओर अधिक है.’’ यह बात जब साहित्य अकादमी व पदमश्री पुरस्कार से सम्मानित लेखक रस्किन ब्रैंड कहते हैं तो अंदाजा लग जाता है कि इस देश में फिल्मों को ले कर युवाओं में जबरदस्त क्रेज है. कुछ समय पहले पाकिस्तानी सांसदों ने भी कहा था कि उन के देश में हिंदी फिल्मों की बाढ़ आ गई है और इन्हें देख कर युवाओं का दिमाग खराब हो रहा है.

यह बातें 2 अहम मसलों की तरफ इशारा करती हैं. पहला यह कि यूथ व टीनेजर्स का फिल्मों से स्ट्रौंग कनैक्शन है और दूसरा यह कि ज्यादातर फिल्में युवाओं को मनोरंजन के नाम पर सिर्फ सैक्स, अपराध, नशा, कामचोरी के शौर्टकट्स और हिंसा का कू़ड़ा परोस रही हैं.

यूथ सिनेमा के नाम पर जिन फिल्मों को मल्टीप्लैक्स में बेचा जा रहा है उन में न तो  यूथ या टीनेजर्स को इंस्पायर करने वाली कहानी या संदेश होते हैं और न ही उन में उन की उम्र के मुताबिक मुद्दे होते हैं. और तो और इन फिल्मों में काम करने वाले सारे ऐक्टर, अक्षय कुमार, सलमान खान, शाहरुख खान, संजय दत्त और आमिर खान सभी 40-50 साल से ऊपर के हैं, खुद को यूथ आइकन मानते हैं. जाहिर है यूथ को फिल्मों में उन की उम्र के हिसाब से न तो कहानियां मिल रही हैं, न ही ऐक्टर्स.

औप्शंस से दूर युवा

इस साल रिलीज हुई फिल्मों का यूथ से दूरदूर तक का नाता नहीं था. इस के बावजूद अगर सिनेमाघरों में युवा लंबी कतारों में टिकट लेने के लिए खड़े होते हैं तो सिर्फ इसलिए कि उन के पास कोई औप्शन नहीं बचा है. साल 2017 में रिलीज फिल्मों में कमाई के हिसाब से टौप ग्रोसर फिल्मों में ‘टौयलेट एक प्रेमकथा’, ‘बाहुबली 2’, ‘रईस’, ‘जौली एलएलबी 2’, ‘काबिल’, ‘बद्रीनाथ की दुल्हनिया’, ‘हैरी मेट सेजल’ और ‘हिंदी मीडियम’ जैसे नाम प्रमुख हैं. इन फिल्मों में युवाओं के मतलब की कहानियां सिरे से गायब हैं.

कोई फिल्म शराब किंग की लाइफ को ग्लैमरस स्टाइल में पेश कर रही है तो कोई बीवी के रेप के रिवेंज पर बेस्ड है. कोई फिल्म कोर्टकचहरी के पेचीदा मसलों पर है तो कोई राजामहाराजाओं के फर्जी इतिहास में लिपटे धार्मिक अंधविश्वास को बढ़ावा देती है. यह बात सिर्फ इस साल रिलीज फिल्मों पर लागू नहीं होती, बल्कि हर साल ऐसी ही फिल्में रिलीज और कामयाब होती हैं. कुल मिला कर यूथ के पास जो भी फिल्में देखने के लिए बतौर विकल्प आती हैं, उन में उन की दिलचस्पी के फैक्टर्स बिलकुल ही गायब होते हैं.

यूथ की प्रौब्लम्स, इश्यूज और गाइडैंस

आज का यूथ किन समस्याओं से दोचार है? बेरोजगारी से परेशान है. उसे नौकरी मिल भी रही है तो उस की काबिलीयत के हिसाब से कमतर है. रोमांस और लव के मोरचे पर भी यूथ लड़खड़ा जाता है. लव, सैक्स और धोखे में गर्लफ्रैंड बौयफ्रैंड के उलझे रिश्ते कब अपराध या गलत रास्ते की तरफ मुड़ जाते हैं, उन्हें पता ही नहीं चलता.

इंटरनैट और सोशल मीडिया के जाल में फंस कर युवा किताबों और अपने सामाजिक व पारिवारिक जिम्मेदारियों से दूर हो रहा है. वह फेसबुक की दुनिया में फैले वर्चुअल रिश्तों को हकीकत मान कर असली रिश्तों व जिम्मेदारियों से कट रहा है. जौब और एजुकेशन के बढ़ते तनाव के चलते वह सुसाइड कर रहा है. मोबाइल गैजेट से घिरा युवा कम उम्र में ही वयस्कों को होने वाली बीमारियों को न्योता दे रहा है. ‘ब्लू व्हेल्स’ सरीखे हिंसक वीडियो गेम्स में उलझ कर युवा जान गंवा रहा है. पौकेटमनी के लिए वह गलत संगत में लूटपाट करने से नहीं चूकता है. कोचिंग, कैरियर के मकड़जाल में फंस कर युवा अपने भविष्य को ले कर पसोपेश में है.

अब जरा सोच कर देखिए, इन में किस मुद्दे पर युवाओं के लिए किसी फिल्मकार या सुपरस्टार ने कोई फिल्म बनाई है? उपरोक्त तमाम समस्याओं या उलझनों से निकालने के सुझाव देती कोई फिल्म याद नहीं आती. कोई फिल्म यह नहीं बताती कि बेहतर कैरियर की दिशा में क्या करना चाहिए. न यह बताती है कि प्रेम के पेचीदा रिश्तों की गांठ कैसे सुलझाई जाए. शिक्षा और रोजगार के बढ़ते बोझ और डिप्रैशन से बाहर निकलने का सही रास्ता भी नहीं दिखाती कोई फिल्म. टूटते रिश्तों, दोस्ती के सही माने और परिवार को जोड़ कर साफसुथरा मनोरंजन दिखाने वाली फिल्में नहीं बना रहा कोई.

फिल्म ‘हिंदी मीडियम’ को अपवाद मान सकते हैं, लेकिन ऐसी फिल्में हमेशा ऊंट के मुंह में जीरा समान ही होती हैं. कभीकभार 10 साल में एक बार ‘थ्री इंडियट्स’ या ‘ओह माई गौड’ सरीखी फिल्में आ जाना या ‘कच्चा लिम्बू’, ‘निल बटे सन्नाटा’, ‘मुझ से फ्रैंडशिप करोगे’, ‘गिप्पी’, ‘चारफुटिया छोकरे’ और ‘पुरानी जींस’ जैसी अननोटिस फिल्में देश के इतने बड़े यूथ के लिए ना काफी हैं.

ऐसे में किस तरह उम्मीद की जा सकती है कि युवाओं को सार्थक मनोरंजन मिलेगा? दरअसल, फिल्मकार आज के यूथ और टीनेजर की समस्या समझना ही नहीं चाहते. और जब तक वे उन की समस्या समझेंगे नहीं, तब तक मनोरंजन के साथ सही गाइडैंस, सही रास्ता दिखाने वाली फिल्में कैसे बनाएंगे?

मौजमस्ती, दारू, जुआ, अपराध और कैजुअल सैक्स

युवाओं के लिए सकारात्मक और सार्थक मनोरंजन से लैस, गाइड करने वाली फिल्मों का न बनना जितनी बड़ी समस्या है, उस से भी बड़ी समस्या यह है कि बौलीवुड समेत हर रीजन या लैंग्वेज का सिनेमा यूथ को 4 बोतल वोडका पी कर सारी रात पार्टी करने की सलाह दे रहा है.

फिल्मों के गाने हों या कहानी, हर जगह यूथ को रेव पार्टियों में दारू पी कर गर्लफ्रैंड की बांहों में झूमते ऐसे दिखाया जाता है मानो देश का हर युवा बड़ी आसानी से इतने महंगे शौक पाल सकता है. इन फिल्मों की देखादेखी यूथ भी ऐसे शौक पालने के चक्कर में कभी घर में चोरी करता है तो कभी बाहर.

एक बार नशे और सैक्स की बदनाम  गली में फंसा युवा जब तक संभलता है, तब तक काफी देर हो चुकी होती है. फिल्म ‘बेफिक्रे’ से ले कर ‘नील और निक्की’ तक ‘उड़ता पंजाब’ से ले कर ‘आशिकी 2’, ‘ये जवानी है दीवानी’ के नशेड़ी हीरो आज युवाओं के आइक्रेस हैं तो समझा जा सकता है कि इन आइकंस से युवा भला क्या सबक लेते होंगे.

युवाओं को भटकाएं नहीं

फिल्मकार युवाओं के लिए बेहतर फिल्में नहीं बना सकते तो न सही, लेकिन जिंदगी को लड़की, दारू और पार्टी में डुबाने की फिलौसफी बेचना कहां तक जायज है? सलमान खान से ले कर संजय दत्त और शाहरुख खान सरेआम नशा करते हैं, धूम्रपान करते हैं. सोशल मीडिया पर नशे में गालियां देते और अश्लील हरकतें करते इन के वायरल वीडियो हर युवा के स्मार्टफोन पर जमा हैं.

नतीजतन, युवा भी ऐसे ही लाइफस्टाइल को फौलो करने लगते हैं. रातभर गर्लफ्रैंड के साथ रेव पार्टी करना, सैक्स पार्टीज में पैसे और समय बरबाद करना, कहीं न कहीं वे फिल्मों से ही सीखते हैं. फिल्मों में तो हीरो तमाम गलतियां कर आखिर में सुधर जाता है और हैपी एंडिंग हो जाती है, लेकिन असल जिंदगी में हैपी एंडिंग नहीं होती. कोई युवा फिल्मी स्टाइल में बैंक या एटीएम लूट रहा है तो कोई अपनी नकली किडनैपिंग का प्लौट रच रहा है. फिल्में जो उन्हें दिखाती हैं, वे वही सीख लेते हैं.

स्क्रीन कौर्नर में चेतावनी काफी नहीं

धूम्रपान या शराब पीने वाले सीन में स्क्रीन के कौर्नर में सिर्फ चेतावनी देना काफी नहीं होता. युवा जब अपने चहेते फिल्मस्टार्स को नशे में डूबा हुआ देखते हैं तो वे उन के हेयरस्टाइल, फैशन और हर शौक को फौलो करने की आदत के चलते इस गलत शौक को भी अपना लेते हैं. आशा है कि पहलाज निहलानी की जगह आए प्रसून जोशी इस बात को समझेंगे.

सामान्यतया बड़ों की तुलना में छोटे बच्चे, किशोर और युवा फिल्मेनिया की चपेट में आते हैं. कुछ फिल्मों से समाज तथा युवावर्ग पर अच्छा प्रभाव भी पड़ता है लेकिन ज्यादातर फिल्में उलटा और शौर्टकट रास्ता ही सुझाती हैं. जिन फिल्मों में युवावर्ग में देशभक्ति, राष्ट्रीय एकता और मानव मूल्यों का प्रसार करने वाला कथानक होना चाहिए, उन में अश्लील डांस और नशे की वकालत होती है. जिन फिल्मों में जातिप्रथा, दहेजप्रथा, भ्रष्टाचार, कामचोरी और भाईभतीजावाद जैसी सामाजिक कुरीतियों को दूर करने की प्रेरणा होनी चाहिए, वहां संपत्ति विवाद, गुलामी, लंपट चरित्रचित्रण और धर्म व अपराध का महिमामंडन होता है. यही वजह है कि आज यूथ को सही दिशा देने वाला सिनेमा कहीं नहीं दिखता.

दायित्व समझें फिल्मकार

फिल्मकारों को यह पता होना चाहिए कि युवा देश का भविष्य निर्माता है, उन पर फिल्मों के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए ऐसी फिल्मों का निर्माण होना चाहिए, जिन में मनोरंजन व मार्गदर्शन दोनों का सम्मिलित पुट हो. युवाओं के अति संवेदनशील मन को सामाजिक व नैतिक गुणों से भरपूर फिल्मों के माध्यम से जिम्मेदार नागरिक के रूप में तैयार किया जा सकता है. जब तक फिल्म निर्माता युवापीढ़ी के प्रति अपने इस दायित्व को नहीं समझेंगे तब तक युवाओं के लिए मनोरंजन की दुनिया सिवा अंधेरे और बर्बादीभरे रास्तों के कुछ भी नहीं  होगी.

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“क्वांटिको” से फिर वापसी कर रही हैं प्रियंका, लुक है दमदार

बौलीवुड एक्ट्रेस प्रियंका चोपड़ा एक बार फिल्म टीवी शो क्वांटिको से छोटे पर्दे पर वापसी करने जा रही हैं. वह इस शो के पहले और दूसरे सीजन का हिस्सा रह चुकी हैं. तीसरे सीजन में वह एक बार फिर ऐलन पैरिश के किरदार में नजर आएंगी. शो का टीजर वीडियो रिलीज कर दिया गया है, और इसे खुद एक्ट्रेस प्रियंका चोपड़ा ने अपने वैरिफाइड ट्विटर हैंडल से रिलीज किया है.

पिछले दो सीजन्स की तुलना में एफबीआई एजेंट ऐलन पैरिश को आप अलग अंदाज में देखेंगे. वह शर्ट में काफी बोल्ड अंदाज में अंगूर के खेतों में घूमती नजर आ रही हैं. वह कह रही हैं कि पिछले तीन सालों से मैंने इस जगह को अपने घर की तरह समझा है. यह जगह खामोशी, प्यार और सरल सुखों से भरी हुई है. लेकिन एक ट्रेंड एजेंट के तौर पर मैंने एक चीज सीखी है कि मुझे हमेशा तैयार रहना चाहिए.

क्वांटिको के इस सीजन की शुरुआत एबीसी टीवी चैनल पर 26 अप्रैल से हो रही है और इस टीजर वीडियो में आपको सिर्फ प्रियंका सामने नजर आएंगी. वीडियो को हजारों की तादात में लोगों ने लाइक और शेयर किया है. प्रियंका जय गंगाजल के बाद से किसी भी भारतीय फिल्म में नजर नहीं आई हैं और अब तक वह इस शो के सभी सीजन्स के साथ जुड़ी रही हैं. जहां तक बात है उनके फिल्मी करियर की तो आखिरी बार वह फिल्म बेवाच में काम करती नजर आई थीं और इसके बाद कहा यह जा रहा है कि वह जल्द ही उनकी नई हौलीवुड फिल्म की भी घोषणा कर सकती हैं.

प्रियंका के बौलीवुड फैन्स काफी वक्त से उनकी किसी हिंदी फिल्म का इंतजार कर रहे हैं लेकिन इस बारे में अब तक उन्होंने कोई भी घोषणा नहीं की है. प्रियंका हालांकि अपने सोशल मीडिया अकाउंट्स के माध्यम से अपने फैन्स से लगातार जुड़ी रहती हैं. देखना होगा कि उनके फैन्स को किसी हिंदी फिल्म के बारे में प्रियंका से खबर मिलती है.

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हाशिए पर लोकतंत्र

रामायण में शूर्पणखा की नाक कटने वाला प्रसंग पसंदीदा प्रसंगों में से एक है. गांवदेहातों में आज भी जिस किसी महिला को बेइज्जत करना होता है उसे नकटी कह दिया जाता है. यह कोई नहीं सोचता कि अप्रितम सौंदर्य की स्वामिनी शूर्पणखा की गलती आखिर क्या थी. उस ने तो जंगल में

2 सुकुमारों को देख कर उन्हें प्रपोज भर किया था. यह बात हर साल 14 फरवरी को वैलेंटाइन डे के मौके पर सोशल मीडिया पर वायरल जरूर होती है.

लेकिन इस दफा वैलेंटाइन डे के 10 दिन पहले ही, दूसरे तरीके से शूर्पणखा वाला प्रसंग संसद से वायरल हुआ जब राज्यसभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, राज्यसभा के सभापति वेंकैया नायडू से यह गुजारिश करते नजर आए थे कि आप रेणुकाजी को कुछ मत कहिए क्योंकि ‘रामायण’ सीरियल के बाद ऐसी हंसी सुनने का सौभाग्य आज मिल रहा है.

नरेंद्र मोदी की मंशा चंद घंटों में देशभर में फैलाने में भाजपा आईटी सैल के मुखिया अमित मालवीय ने गजब की फुरती दिखाई और ट्वीट कर लोगों से पूछा कि आप को किस किरदार की याद आई. कुछ देर बाद खुद अमित मालवीय ने ही रामायण में शूर्पणखा की नाक कटने वाला फोटो साझा कर डाला जिस से एक कांग्रेसी नेत्री की नाक कटने जैसी सुखद अनुभूति सभी को हो.

रहीसही कसर केंद्रीय राज्यमंत्री किरण रिजीजू ने पूरी कर डाली. उन्होंने बाकायदा रामायण सीरियल का वह दृश्य फेसबुक कर शेयर किया जिस में राम के आदेश पर लक्ष्मण अट्टहास लगाती शूर्पणखा की नाक तलवार से काट रहा है.

देखते ही देखते रेणुका चौधरी और शूर्पणखा की यह तुलना वक्त काटने का जरिया बन गई. राज्यसभा का संदर्भ प्रसंग भूलभाल कर लोग शूर्पणखा की हंसी और कटी नाक पर चर्चा करने लगे और यही  नरेंद्र मोदी चाहते थे कि लोग संसद की कार्यवाही को गंभीरता से न लें, बल्कि शूर्पणखा जैसे ढेरों पौराणिक पात्रों व मनोरंजक प्रसंगों में उलझे रहें.

किसी महिला को सरेआम शूर्पणखा करार देने में पुरुषों को किस तरह का सुख मिलता है, यह बात जब मनोविज्ञान से स्नातकोत्तर रेणुका चौधरी को समझ आई तो उन्होंने विरोध की सियासी रस्म निभाई और फिर चुप हो गईं. यह जरूर उन्हें समझ आ गया होगा कि संसद में जानबूझ कर लोकतंत्र को किनारे करते हुए पौराणिकवाद लाया गया था यह कोई पहला मौका नहीं था. जब नरेंद्र मोदी ने किसी पौराणिक पात्र को यों बीच में घसीटा हो.

इस से पहले पिछले साल 4 अक्तूबर को दिल्ली में कंपनी सैके्रटरीज के स्वर्ण जयंती समारोह को संबोधित कर रहे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बेहद असहज दिख रहे थे. इस दिन विकास के आंकड़े दिखाते उन्होंने दावा किया था कि देश की अर्थव्यवस्था सही रास्ते पर बढ़ रही है पर कुछ लोग शल्य की तरह निराशा फैला रहे हैं.

शल्य का नाम लेना भर था कि अर्थव्यवस्था के मुद्दे पर बेहोश से पड़े देश में गजब की फुरती आ गई. न्यूज चैनल्स ने तो गजब ढा दिया. उन्होंने शल्य की ऐसी शल्यचिकित्सा कर डाली कि लोगों को बीआर चोपड़ा कृत टीवी सीरियल महाभारत याद हो आया.

अर्थव्यवस्था, जीडीपी, नोटबंदी और जीएसटी से ताल्लुक रखती दूसरी कई अहम बातों और तथ्यों को किनारे करते मीडिया शल्य का महिमामंडन और चित्रण करने लगा कि वह महाभारत का एक पात्र था और कर्ण का सारथी था. यह फलां का मामा और ढिकानी का भाई था.

कई चैनल्स ने तो बाकायदा प्रधानमंत्री के भाषण के बीचबीच में बीआर चोपड़ा के महाभारत सीरियल की क्लिपिंग्स जोड़तोड़ कर दिखाई. देखते ही देखते देश वर्तमान से निकल कर द्वापर युग में पहुंच गया. छोटे परदे पर घोड़े हिनहिनाने लगे. तीर, तलवार, भाले और त्रिशूल चलने लगे. ढालें दिखने लगीं और कुरुक्षेत्र में लड़ रहे कौरवपांडवों के बीच के सैनिकों का बहता खून नजर आने लगा.

नरेंद्र मोदी की इस मंशा को भारी शोरशराबे के बीच चैनल्स ने विस्तार दिया था कि दरअसल में वे क्यों पूर्व वित्तमंत्री यशवंत सिन्हा की तुलना शल्य से कर रहे हैं. शल्य योद्धाओं में निराशा फैलाने के लिए कुख्यात था. कर्ण जैसे बहादुर और प्रतिभावान योद्धा को वह हतोत्साहित करता रहता था, जिस के चलते कर्ण अपनी युद्धकला भूल गया था और कौरवों को हार का सामना करना पड़ा था.

शल्य की शल्यचिकित्सा

थोड़ा झिझकते कुछ न्यूज चैनल्स और दूसरे दिन अखबारों के विश्लेषकों ने संकेतों में यह बात कहने की कोशिश की कि क्यों प्रधानमंत्री को खुद की तुलना कर्ण से करनी पड़ी और वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में शल्य के उल्लेख के माने क्या हैं. कर्ण क्षत्रिय होते हुए भी जिंदगीभर सूत पुत्र कहलाते रहे. उन्हें सवर्णों द्वारा तिरस्कृत किया जाता रहा और शल्य का झुकाव पांडवों की तरफ होते हुए भी उस की पूछपरख बनी रही.

इसी दौरान एक और बात प्रमुखता से की गई कि शल्य जो भी था और जैसा भी था वह जानतासमझता था कि कौरव छल कर रहे हैं. अधर्म कर रहे हैं. बेईमानी कर रहे हैं इसलिए हारेंगे.

लिहाजा, वह कौरवों से धर्म की राह पर चलने के लिए कहता रहता था यानी वह गलत कुछ नहीं करता था. धर्म की बात कहने और बताने वाला कोई भी हो वह भला गलत कैसे हो सकता है?

यशवंत सिन्हा ने दरअसल एक अंगरेजी अखबार में लिखे अपने लेख में कहा था कि वित्तीय कुप्रबंधन, नोटबंदी और जीएसटी के लचर क्रियान्वयन ने भारतीय अर्थव्यवस्था का बेड़ा गर्क कर दिया है और (वास्तविक) आर्थिक वृद्धि दर निचले स्तर पर पहुंच गई है. वित्तमंत्री अरुण जेटली पर निशाना साधते यशवंत सिन्हा ने कहा था कि वे 24 घंटे लगातार काम करने के बावजूद अपने कार्य के प्रति न्याय करने में विफल रहे हैं.

अपनी मंशा का खुलासा करते उन्होंने न केवल नरेंद्र मोदी और अरुण जेटली बल्कि अपनी ही पार्टी भाजपा पर भी गंभीर आरोप लगाते कहा था कि वास्तव में 2014 के चुनाव के पहले ही अरुण जेटली को वित्तमंत्री बनाना तय हो गया था. इन्हीं जेटली ने अर्थव्यवस्था को ध्वस्त कर दिया.

केंद्र सरकार की अर्थनीति पर ताबड़तोड़ प्रहार भी यशवंत सिन्हा ने तकनीकी तौर पर किए थे. बकौल यशवंत सिन्हा अरुण जेटली, खुशनसीब वित्तमंत्री हैं कि उन के कार्यकाल में कच्चे तेल के दाम गिरे. इस का फायदा उठाते वे गैरनिष्पादित परिसंपत्तियां (एनपीए) को नियंत्रित कर सकते थे पर हालत यह है कि सरकार के आंकड़ों में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की मौजूदा वृद्धि दर 5.7 प्रतिशत दिख रही है लेकिन वास्तव में वह 3.7 प्रतिशत है.

नोटबंदी के फैसले को उन्होंने आर्थिक आपदा बताते लिखा था कि निजी निवेश घट रहा है, कृषि की स्थिति बहुत खराब है, विनिर्माण उद्योग में मंदी है, लोगों की नौकरियां खत्म हो गई हैं और जीएसटी के लचर क्रियान्वयन से उद्योग और व्यापार जगत में उथलपुथल मच गई है. अस्तित्व के संकट से जूझते लघु उद्योग क्षेत्र को तत्काल राहत पैकेज की जरूरत है. सरकार बड़े वित्तीय संकट के कगार पर है.

ऐसे गुम हुई मुद्दे की बात

यशवंत सिन्हा के गंभीर आरोपों में दम था, आंकड़े थे, तर्क और तथ्य भी थे. नरेंद्र मोदी की दूसरी दिक्कत यह थी कि यह आरोप उन्हीं की पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व वित्तमंत्री ने लगाए थे जिन्हें अनदेखा नहीं किया जा सकता था, क्योंकि इस पर त्राहित्राहि कर रहे आम लोग भी गंभीर हो चले थे और इस बाबत उत्सुक होते सरकार से जवाब की उम्मीद कर रहे थे.

चालाकी कह लें या खूबसूरती से नरेंद्र मोदी ने शल्य का जिक्र करते पूरी बाजी ही उलट दी जिस से मीडिया और जनता का ध्यान शल्य और भीष्म पर केंद्रित हो गया.

नरेंद्र मोदी की यह मजबूरी हो गई थी कि वे यशवंत सिन्हा के आरोपों को जैसे भी हो किनारे करें नहीं तो लेने के देने पड़ जाते. ठीक यही हालत गोरखपुर के सरकारी अस्पताल में बड़ी संख्या में हुई बच्चों की मौतों के बाबत देश के सब से बड़े राज्य उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की थी.

मासूमों की मौत पर योगी आदित्यनाथ ने बेहद गोलमाल लहजे में कहा था कि औक्सीजन की कमी से एक भी मौत नहीं हुई. सिर्फ सनसनी फैलाई गई. इस से सरकारी अस्पताल में गरीबों को मिल रही सेवा से भरोसा टूटा. गरीब प्राइवेट अस्पतालों में जाने को मजबूर हो रहा है. यह जघन्य पाप है.

अगर योगी आदित्यनाथ साफसाफ भी कहते कि बच्चे औक्सीजन की कमी से नहीं, बल्कि पूर्वजन्म के पापों के चलते बेवक्त मरे तो यकीन मानें किसी को हैरत नहीं होती. वजह, उन की छवि  मुख्यमंत्री की कम संन्यासी और महंत की ज्यादा है जो भगवा कपड़े पहने धर्म की भाषा बोलते रहते हैं.

योगी अकसर यह बताने में कोई झिझक या शर्म नहीं करते बल्कि गर्व महसूस करते हैं कि मुख्यमंत्री के रूप में वे वही काम कर रहे हैं जो एक संन्यासी के रूप में करना चाहते हैं. फिर क्यों मठ से निकल कर वे सीएम हाउस आ गए. इस बात का जवाब वे शायद ही दे पाएं. उन की निगाह में उन का काम लोककल्याण का है.

धन्य हैं योगी आदित्यनाथ जो एक गंभीर लापरवाही को भी पापपुण्य के तराजू पर तोलते हुए अपनी कमजोरी और लचर प्रशासनिक क्षमता को ढकते रहे. क्या वे बच्चे पूर्वजन्म के पापी थे जो उन्होंने इस तरह औक्सीजन की कमी के चलते मौत की सजा भुगती. योगी की नजर में तो ऐसा ही हुआ है.

एक कर्मठ प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री कर्म में विश्वास करता है. वह मानता है कि कर्म करना उस के हाथ में है उस का फल देना भगवान का काम है. अब अगर लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था के चलते लोग कंगाल हो चले हैं तो विलाशक वे अपने पापों की सजा भुगत रहे हैं. 100-50 बच्चे अस्पताल के पलंग पर दम तोड़ दें तो यह भी उन के पूर्वजन्म के पापों की सजा है. इस में किसी सत्तारूढ़ मंत्री या नेता की क्या गलती, क्योंकि यह सब तो ईश्वर द्वारा पूर्व नियोजित है.

और भी हैं उदाहरण

अकेले नरेंद्र मोदी या योगी आदित्यनाथ ही नहीं, बल्कि भाजपा शासित राज्यों के अधिकांश मंत्री और नेता इस भाषा और व्यवस्था का उल्लेख कर पल्ला झाड़ने से नहीं चूकते.

ऐसा ही एक ऊटपटांग बयान अगस्त 2017 में मध्य प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री शरद जैन ने दिया था. पूरे देश सहित मध्य प्रदेश में भी स्वाइन फ्लू नाम की बीमारी से मौतें हो रही हैं और सरकार अपने अस्पतालों और स्वास्थ्य सेवाओं को दुरुस्त करने में नाकाम साबित हो रही है. पर वे भगवा मंत्री भी क्या जो अपनी या सरकार की गलती स्वीकारने की हिम्मत दिखाए. उलटे, इन्हें ढंकने के लिए इन मंत्रीजी ने बड़ा सटीक और लाजवाब बयान यह दे डाला कि मौत और जिंदगी किसी इंसान के नहीं, बल्कि भगवान के हाथों में है. हम तो आखिरी सांस तक मरीज की सेवा के लिए तैयार हैं. शरद जैन का यह सनातनी और पौराणिक कथन तरहतरह से मजाक में दोहराया भी गया था.

असम के स्वास्थ्य मंत्री हेमंत बिस्व सरमा तो शरद जैन से चार कदम आगे निकल कर नवंबर 2017 में सार्वजनिक रूप से यह कह बैठे थे कि कुछ लोग कैंसर जैसी घातक बीमारियों से इसलिए ग्रस्त हैं क्योंकि उन्होंने अतीत में पाप किए हैं और यह ईश्वर का न्याय है.

इस मूर्खतापूर्ण और बेहूदे बयान की निंदा विरोधियों ने तो की ही, कैंसर से जूझ रहे कई मरीजों ने भी इस पर अपना एतराज दर्ज कराया. इस मंत्री के बयान से कैंसर के मरीजों पर क्या गुजरी होगी, इस का अंदाजा हर कोई नहीं लगा सकता कि कैसे लोकतंत्र में उस का ही कोई पैरोकार उन्हें इलाज व हिम्मत बंधाने के बजाय पापी कह रहा है.

अब भला कोई क्या बहस या तर्क करेगा. कौन मंत्री या सरकार से पूछेगा कि आप की सेवाएं इतनी चरमराई हुई हैं औरआप हैं कि अपनी कमजोरी और लापरवाही को हरि इच्छा की आड़ में ढंकने की नाकाम कोशिश कर रहे हैं.

धरमकरम व टोनेटोटके

बदहाल अर्थव्यवस्था, औक्सीजन की कमी से बच्चोें की मौतें और स्वाइन फ्लू से मरते लोग तो अपने कर्मों की सजा भुगत ही रहे हैं लेकिन कर्ज में डूबे और लगातार घाटा उठाते किसान अगर खुदकुशी कर रहे हैं तो क्या यह भी भगवान की मरजी है?

किसानों से ज्यादा तरस तो उन नेताओं पर आता है जो कुदरती कहर से बचने के लिए पंडेपुजारियों की तरह टोनेटोटके करने और धरमकरम करने की सलाह देने लगते हैं. फरवरी के पहले हफ्ते में जब मध्य प्रदेश में हुई ओलावृष्टि से फसलें बरबाद हुईं तो सीहोर के पूर्व भाजपा विधायक रमेश सक्सेना ने किसानों को रोजाना हनुमान चालीसा पढ़ने की नसीहत दे डाली. उन्होंने वजह यह बताई कि हनुमान चालीसा का पाठ करने से प्राकृतिक आपदाएं नहीं आतीं.

अब तक लोग यही समझते थे कि हनुमान चालीसा से भूतप्रेत ही भागते हैं पर नई बात यह कि इस से ओले नहीं गिरते. अंधविश्वास फैलाते इन मूढ़ नेताओं को कभी अक्ल आएगी, ऐसा लगता नहीं. पर इस विधायक के बयान की खिल्ली उड़ी तो उसे भाजपा के ही कुछ नेताओं ने मुंह बंद रखने का पैगाम भिजवाया दिया.

साल 2016 में पंजाब के तत्कालीन कृषि मंत्री सुरजीत सिंह ने बजाय परेशान किसानों के जख्मों पर मलहम लगाने के बेरहमी से उन के जख्मों पर नमक छिड़कते कहा था कि किसान अगर आत्महत्या कर रहे हैं तो यह भगवान की मरजी है. यह और बात है कि अब पंजाब में भाजपा गठबंधन सत्ता में नहीं है लेकिन केंद्र सरकार चाहे तो इस मंत्री के उक्त वक्तव्य को राष्ट्रीय दर्शन घोषित कर किसान खुदकुशी के कलंक से छुटकारा पा सकती है.

सुरजीत सिंह कितने भाग्यवादी और आशावादी हैं, इस का अंदाजा उन के एक और बयान से लगाया जा सकता है कि पंजाब में ही एक चलती बस में 17 साल की एक लड़की छेड़छाड़ का शिकार हुई थी तब भी उन्होंने इसे भगवान की मरजी करार दिया था.

जाहिर है किसान इन मंत्रीजी की नजर में पापी हैं इसलिए खुदकुशी करने के लिए मजबूर होते हैं. यह उन के पूर्वजन्म के पापों की सजा है और छेड़छाड़ की शिकार किशोरी ने भी अपने पापों की सजा भुगती. जरूर ऊपर उस ने पूर्वजन्म में ऐसा उलटासीधा कुछ किया होगा जो धर्म के लिहाज से स्त्री को नहीं करना चाहिए.

इस लिहाज से तो जम्मूकश्मीर की हिंसा भी भगवान की मरजी मानी जानी चाहिए. आतंकवादी तो निमित्त मात्र हैं. उन के हाथों जो लोग मारे गए या मारे जा रहे हैं वे दरअसल में अपने पापों की सजा भुगत रहे हैं. फिर आतंकवाद पर हायहाय क्यों? इस थ्योरी के लिहाज से इंडियन पीनल कोड की तो कोई जरूरत ही नहीं क्योंकि हर अपराध भगवान की मरजी से होता है और उस के अपने कारण होते हैं जिन का संबंध पूर्व या वर्तमान जन्म के कर्मों और पापों से होता है.

इसीलिए बैकफुट पर भाजपा

ढीले पड़ते भाजपाई तेवरों की एक बड़ी वजह यही पौराणिकवादी राजनीति और नेताओं की धार्मिक छवि है. इन में से कुछ आक्रामक हैं तो कुछ थोड़े नरम और नम्र हैं पर उन की कार्यशैली भिन्न नहीं है. ये सभी देशभर के नामी मंदिरों में जा कर देवीदेवताओं के आगे माथा टेकते हैं और चुनाव के वक्त जनता को भगवान बताने लगते हैं तो उन का दोहरापन छुपाए नहीं छिपता.

देश अगर पिछड़ा है, भाग्यवादी और जड़ हो रहा है तो इस में धर्मगुरुओं के अलावा इन पापपुण्य वाले नेताओं का भी कम योगदान नहीं जो पौराणिक पात्रों का सहारा ले कर अपना बचाव करते हैं और जरूरत पड़ने पर कर्म और भाग्य के सिद्धांत का पहाड़ा दोहराते अपनी कमजोरियों पर धर्म का परदा डालते रहते हैं. पर अब यह खेल भी जनता समझने लगी है तो इन का आत्मविश्वास भी डगमगाता दिख रहा है.

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प्राण जाए पर…सामान न जाए

घुमरी बाबा किसी यजमान के यहां से श्राद्धभोज का खाना खा कर और साथ ही घर वालों के लिए गठरी में खाना बांध कर अपने घर को लौट रहे थे.

उन्होंने भोज में पूरी, सब्जी, दही, लड्डू, जलेबी वगैरह चीजें खूब डट कर खाई थीं. पेट निकल कर मटका हो गया था. हाथपैर भारी लग रहे थे.

घुमरी बाबा गहरी नींद सोते थे. भरपेट खाना खाने के बाद उन की आंखें खुलनी मुश्किल हो जाती थीं. बाबा का कहना था कि ‘मर कर टर जाओ और खा कर पसर जाओ’. उस दिन भी वे रास्ते में एक पेड़ की छांव में सिरहाने गठरी रख कर पसर गए और पलभर में खर्राटे भरने लगे.

घुमरी बाबा अभी कुछ ही देर तक सो पाए थे कि कहीं से एक सांड़ आ गया और बाबा की गठरी के पास पहुंच गया. उस ने गठरी समेत उस में रखा खाना चबा लिया.

गठरी चबाते समय उस में रखी जलेबी का रस बाबा की चुटिया पर गिर गया, इसलिए उस बेशर्म सांड़ ने बाबा की चुटिया भी चबानी शुरू कर दी.

बाबा की नींद खुली, तो सिरहाने सांड़ को देख कर वे घबरा गए और धीरेधीरे गुहार करने लगे, ‘‘दुहाई प्रभु, दुहाई, जान बचा लो…’’

सांड़ ने शायद बाबा की गुहार सुन ली. उस ने चूसी हुई चुटिया को उगल दिया व अलग हट कर खड़ा हो गया.

सांड़ के अलग हटते ही बाबा उसे कोसने लगे, ‘‘यह नीच सांड़ नहीं, कुत्ता है. सांड़ जाति के लिए कलंक है.’’

सांड़ कुछ ही देर बाद पागुर करने लगा. बाबा अब वहां से खिसकने की ताक में लग गए. उन्होंने देखा कि सांड़ का सारा ध्यान पागुर करने में लगा हुआ है. घुमरी बाबा धीरे से उठ कर खिसकते हुए गांव वाले रास्ते की ओर बढ़ते गए. कुछ देर बाद बाबा ने पलट कर देखा, तो सांड़ को अपनी ओर पीछेपीछे आता हुआ पाया.

घबरा कर बाबा दौड़ने लगे. वे दौड़ भी रहे थे और पलटपलट कर बारबार पीछे देख भी रहे थे. तभी अचानक वह एक कुएं में गिर पड़े.

बाबा काफी डर गए. उन्हें लगा कि अब बचना मुश्किल है. वे किसी तरह से हाथपैर मार कर अपने को बचाने की कोशिश करने लगे.

कुएं के आसपास कुछ किसान अपने खेतों में काम कर रहे थे. कुएं में किसी के गिरने की आवाज सुन कर वे गुहार लगाते हुए वहां आ पहुंचे.

गांव के और लोग भी वहां कुएं के पास पहुंच गए. कुएं का पानी काफी ऊपर तक था. उस में से हाथ बढ़ा कर भी घुमरी बाबा को खींचा जा सकता था.

कुछ लोग बाबा को बांस और रस्सी के सहारे निकालना चाहते थे, मगर कमल काका ने हाथ से खींचने की कोशिश की, लेकिन उन्हें कामयाबी नहीं मिली. तब तक बाबा के हाथपैर भी जवाब देने लगे थे.

लोग सोच रहे थे कि अब क्या किया जाए कि तभी नागा सिंह वहां आ पहुंचा. वह काफी लंबातगड़ा था. वह तुरंत घुटनों के बल बैठ गया और कुएं में हाथ लटका कर बोला, ‘‘बाबा, अपना हाथ दो. जल्दी से अपना हाथ दो.’’

नागा सिंह बराबर कह रहे थे, मगर बाबा ने अपना हाथ नहीं दिया. तभी बाबा के एक पड़ोसी को कुछ याद आया.

पड़ोसी ने नागा सिंह से कहा, ‘‘अरे नागा भाई, घुमरी बाबा पुरोहिती करने वाले पंडित हैं. जिंदगीभर उन्होंने केवल लिया है, दिया नहीं. देने के नाम पर उन्हें कंपकंपी छूटने लगती है. वह मर जाएंगे, मगर कुछ देंगे नहीं. उन्हें अगर बचाना है, तो कहो कि बाबा, आप मेरा हाथ लो.’’

नागा सिंह ने कहा, ‘‘बाबा, आप मेरा हाथ लो, जल्दी मेरा हाथ लो…’’ और सचमुच बाबा ने लपक कर नागा का हाथ पकड़ लिया.

नागा सिंह ने सहीसलामत बाबा को कुएं से बाहर निकाल लिया. बाबा ने कुएं में से निकल कर किसी को धन्यवाद नहीं दिया, बल्कि इधरउधर ताकते हुए गाली दी, ‘‘कहां है वह सांड़ का पिल्ला? वह नीच, मेरा सब माल खा गया. पूरी, सब्जी, लड्डू, जलेबी के साथ गमछा भी खा गया.’’

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अंधविश्वासी जनता और चतुर समर्थक

देश के पूर्वोत्तर में जो चुनावी सफलता भारतीय जनता पार्टी को मिली थी और जिस तरह उस ने मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी को हार का तोहफा दिया, वह अप्रत्याशित है. भारतीय जनता पार्टी की त्रिपुरा विजय का कारण उस की छिपी पैदल सेना है

जो अन्य दलों के पास न के बराबर है. भाजपा को असली समर्थन लाखों मंदिरों, मठों, आश्रमों, ज्योतिषाचार्यों आयुर्वेदिक दवा निर्माताओं, योग गुरुओं, वास्तु विशेषज्ञों, कुंडली पढ़ने वालों, विवाह कराने वालों, पिंडदान कराने वालों से मिलता है. भाजपा ने जाति का भेद बरकरार रखते हुए दलितों यानी पिछड़ों और पिछड़ों के संपन्न वर्गों को अपनेअपने देवीदेवता और आश्रम दे कर उन्हें जोड़ लिया है.

आज धर्म का धंधा विशाल हो गया है. ये सभी भाजपा के समर्थक हैं. इन का अस्तित्व ही भाजपाई सोच पर निर्भर है. देश की अंधविश्वासी जनता इन पर भरोसा करती है और ये भाजपा में अंधविश्वास रखते हैं.

ममता बनर्जी हों, मायावती हों, अखिलेश यादव हों, राहुल गांधी हों, हार्दिक पटेल हों या हों कन्हैया कुमार, सभी इस फौज के आगे जीरो हैं. चुनावी रण में यही फौज सब से अधिक उपयोगी है. भाजपा उक्त फौज वालों के लिए लगातार आय का इंतजाम कर रही है और अब वे भाजपा के लिए वोट जुटा रहे हैं. जनता को, दरअसल, ये सब चूस रहे हैं, निकम्मा बना रहे हैं, भटका रहे हैं, पर भाजपा यह बताएगी नहीं, और दूसरी पार्टियां यह बताने की हैसियत नहीं रखतीं. बिहार व उत्तर प्रदेश के उपचुनावों में भाजपा की हार इसलिए हुई कि इस फौज के आगे जनता ने सिर नहीं झुकाया.

दूसरी पार्टियां जब तक दिनरात बढ़ती इस फौज का मुकाबला तार्किक, व्यावहारिक, वैज्ञानिक सोच को जनता के आगे रख कर नहीं करेंगी, वे पूर्णतया सफल नहीं होंगी. वैसे यह फौज अनुत्पादक है, जनता को मूर्ख बनाने वाले निकम्मों की है पर फिर भी कोई इस फौज की पोल खोलने को तैयार नहीं. इस फौज की बेईमानी नीरव मोदी जैसों से 100 गुना ज्यादा है. पार्टियां इन का समर्थन करती रही है.

अखिलेश यादव और मायावती भाजपा की लगातार जीत से घबरा कर एकजुट हो गए, लेकिन इन दोनों के सहायकों में इस फौज के छिपे सिपाही मौजूद हैं. वे समयसमय पर अंदर से पलीता जरूर लगाएंगे. राहुल गांधी तो स्वयं फौज के हिस्सेदार हैं क्योंकि अपने जन्म से ही कांग्रेस इस फौज का हिस्सा रही है और भाजपा, उसी कांग्रेस का कट्टररूप भर है.

विपक्षी दलों को अगर एक होना है तो उन्हें इस फौज को नियंत्रित करना होगा, इस की चालबाजी का भंडाफोड़ करना होगा ताकि भाजपा को इस फौज के बचाव में आ कर इस की मिल्कीयत को मानना पड़े. यह आसान नहीं है. वैसे इस फौज पर नियंत्रण होने से जनता को तुरंत लाभ मिलेगा और वह धार्मिक धंधों के चक्रव्यूह से निकल सकेगी. पर इस के लिए जो तार्किक सोच चाहिए वह दिख नहीं रही.

आज देश को अंधविश्वासों के जंजाल से निकालना जरूरी है, हमारी प्रगति उसी पर निर्भर है. 2018 में हम 1518 की सोच से काम नहीं कर सकते.

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चुपके से नैनों के तीर तुम चलाती हो क्यों

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मिसिंग : सशक्त कहानी का बंटाधार

यदि आप फिल्म देखकर मनोरंजन पाने की बजाय विचलित यानी कि अपना मन अशांत करना चाहते हैं, तो आपको फिल्म ‘‘मिंसिंग’’ जरूर देखनी चाहिए. मनोरंजन, रहस्य व रोमांच विहीन फिल्म है ‘‘मिसिंग’’.

फिल्म ‘‘मिसिंग’’ की कहानी के केंद्र में सुशांत दुबे (मनोज बाजपेयी) और अपर्णा (तब्बू) हैं. सुशांत दुबे शादीशुदा हैं. उनका अपना चार साल का बेटा भी है. वह अपने ससुर की कंपनी में ही नौकरी करते हैं. सुशांत दुबे की पत्नी काम्या दुबे उन पर हमेशा शक करती रहती हैं. जब कंपनी के काम से सुशांत दुबे मारीशस जाने लगते हैं, तो काम्या उनके साथ चलने की जिद करती है, पर सुशांत कह देते हैं कि कंपनी के काम से जा रहे हैं, इसलिए वह उन्हे वहां समय नही दे पाएंगे.

सुशांत एक शिप से मारीशस के लिए रवाना होते हैं. शिप के अंदर उनकी मुलाकात अपर्णा  से होती है. अपर्णा बताती है कि उसका अपने पति विशाल से तलाक होने वाला है. विशाल उसे व उनकी बेटी तितली को नुकसान पहुंचना चाहते हैं, इसलिए वह अपनी तीन वर्ष की बेटी तितली के साथ मारीशस जा रही है. तितली बीमार है. सुशांत उसकी मदद करने के लिए अपर्णा को उनकी बेटी तितली के साथ अपने साथ उसी रिसोर्ट में लेकर आते हैं, जहां उनके लिए अपना कमरा बुक है. रात एक बजे रिसोर्ट पहुंचते हैं और पूरा सूट बुक कराते हैं.

सुशांत ने रिसोर्ट के रजिस्टर में श्री और श्रीमती दुबे लिखते हैं. रात में तितली अलग कमरे में सो रही होती है और सुशांत दुबे, अपर्णा के साथ रंगरलियां मनाते हैं. सुबह पता चलता है कि तितली गायब हो चुकी है. पहले सुशांत व अपर्णा पूरे रिर्सोट में ढूढ़ते हैं, फिर रिसोर्ट के कर्मचारी तितली को ढूंढ़ते हैं, पर तितली का कहीं पता नही चलता. सुशांत नही चाहता कि  पुलिस को सूचना दी जाए, क्योंकि उसे डर है कि सच उजागर होने पर उसकी पत्नी काम्या नाराज होगी. पर अपर्णा पुलिस में शिकायत दर्ज करा देती हैं.

bollywood film reviewमारीशस पुलिस आफिसर नंदलाल बुद्धू (अन्नू कपूर) अपनी पूरी जांच टीम के साथ रिसोर्ट पहुंच जाते हैं. सुशांत व अपर्णा से सवाल जवाब होते हैं, पर पुलिस आफिसर उनके जवाब से संतुष्ट नहीं होता है. सुशांत कई तरह के झूठ पर झूठ बोलता है. अंत में सुशांत दुबे, पुलिस आफिसर को बताता है कि तितली गायब नहीं हुई है. क्योंकि उनकी तितली नामक बेटी है ही नहीं. अपर्णा तो मां ही नहीं बन सकती. पर उसे इसी बात का सदमा लगा है और वह मनोवैज्ञानिक रूप से बीमार है. उसे हर दिन ढेर सारी दवाएं लेनी पड़ती हैं.

बेटी तितली को होना महज उसकी दिमागी उपज है. (फिल्म में इस दृश्य के वक्त यदि दर्शकों को फिल्म ‘बागी 2’ की याद आ जाए, तो कुछ भी गलत नहीं होगा. जिस तरह की बातें सुशांत, अपर्णा को लेकर पुलिस आफिसर से कहता है, उसी तरह की बातें फिल्म ‘बागी 2’ में शेखर अपनी पत्नी नेहा के बारे में रौनी से कहता है.) जबकि अपर्णा दावा करती है कि तितली है और बहुत बीमार है.

जब रिसोर्ट  की रिशेपसनिस्ट नैना दावा करती है कि उसने अपर्णा के हाथ में बीमार तितली को देखा था, तब सुशांत पुलिस आफिसर से सच बता देता है कि अपर्णा उसकी पत्नी नहीं है. उसके बाद घटनाक्रम तेजी से बदलते हैं. सुशांत दुबे की सलाह पर सुशांत दुबे के साथ अपर्णा भी अपना सामान लेकर रिसोर्ट से भागते हैं. रास्ते में अपर्णा, सुशांत की हत्या कर देती है. इधर एक बुजुर्ग तितली की तलाश में आते हैं, तो पता चलता है कि 34 वर्ष की अपर्णा का ही नाम तितली है. वह दिमागी रूप से बीमार है और पिछले तीन वर्ष से एक पागल खाने में उसका इलाज चल रहा था, जहां से कल रात वह भागी है.

मनोवैज्ञानिक रहस्य व रोमांच प्रधान फिल्म के रूप में प्रचारित की गयी फिल्म ‘मिसिंग’ से रोमांच का दूर दूर तक कोई नाता नहीं है.

फिल्म के साथ सबसे बड़ी समस्या यह है कि फिल्म को मारीशस के अति खूबसूरत हनीमून रिसोर्ट में फिल्माया गया है, जहां लोग हनीमून मनाने के लिए इकट्ठे होते हैं. ऐसी लोकेशन पर डरावने व रहस्य रोमांच प्रधान दृश्य उभर ही नहीं सकते. इसके अलावा बेटी तितली के गुम हो जाने पर जिस तरह के भाव सुशांत यानी कि मनोज बाजपेयी और अपर्णा यानी कि तब्बू के चेहरे पर आने चाहिएं, वह भी नहीं आते. उन्हे देखकर दर्शक के मन मे उकने प्रति सहानुभूति भी नहीं पैदा होती,बल्कि वह जिस तरह से खूबसूरत लोकेशन में बेटी की तलाश के लिए घूमते नजर आते हैं, उससे तो हंसी ही आती है.

कहानी व पटकथा के स्तर पर पूरी फिल्म निराश करती है. फिल्म जैसे जैसे आगे बढ़ती है, वैसे वैसे इसके पात्र, परिस्थितयां व कहानी का प्लाट घटिया होता जाता है. लेखक व निर्देशक दोनों ही रूप में मुकुल अभ्यंकर विफल हुए हैं. उनमें परिपक्वता ही नहीं हैं. उन्होंने एक सशक्त कहानी का बंटाधार कर दिया. अफसोस की बात यह है कि अति खूबसूरत लोकेशन व उत्कृष्ट कलाकारों की मौजूदगी के बावजूद फिल्म देखने योग्य नहीं बनी.

जहां तक अभिनय का सवाल है, तो मनोज बाजपेयी निराश ही करते हैं. उनका फलर्ट करने के दृश्य राम गोपाल वर्मा की फिल्म ‘कौन’ की याद दिलाते हैं. तब्बू के अभिनय की सराहना की जानी चाहिए. उन्होंने एक दुःखी मां के किरदार के साथ न्याय किया है, मगर परदे पर जो ऊर्जा नजर आनी चाहिए, वह उनमें भी नजर नहीं आती. इसकी वजह कमजोर पटकथा व निर्देशन हो सकता है. अन्नू कपूर भी निराश करते हैं. तितली के गुम हो जाने की तलाश में आए मौरीशस पुलिस अफसर के किरदार में अन्नू कपूर की कार्यशैली महज हंसाने के कुछ नहीं करती. वह कहीं से भी पुलिस जांच अधिकारी नहीं लगते. यह कहना ज्यादा सही होगा कि पुलिस अफसर के किरदार में अन्नू कपूर का चयन ही गलत है.  फिल्म का संगीत भी घटिया है.

दो घंटे की अवधि वाली फिल्म ‘‘मिंसिंग’’ का निर्माण शबाना रजा बाजपेयी, अधिकारी ब्रदर्स, आनंद पंडित, रूपा पंडित, शीतल भाटिया व  विक्रम मल्होत्रा ने किया है. लेखक व निर्देशक मुकुल अभ्यंकर, संगीतकार एम एम करीम, कैमरामैन सुदीप चटर्जी तथा कलाकार हैं – मनोज बाजपेयी, तब्बू, अन्नू कपूर व अन्य.

ब्लैकमेल : इरफान खान का जानदार अभिनय

पत्नी को पर पुरुष के साथ हमबिस्तर होते रंगे हाथों पकड़ने के  बाद पत्नी या उसके प्रेमी की हत्या करने की बजाय अलग तरह से बदला लेने की कहानी के साथ ‘‘देहली बैली’’ फेम निर्देशक अभिनय देव सही न्याय नहीं कर पाए हैं.

टौयलेट पेपर सेल्समैन देव (इरफान खान) एक दिन शाम को निर्णय लेता है कि आज वह काम से जल्दी छुट्टी लेकर अपनी पत्नी रीना (कीर्ति कुल्हारी) के लिए फूलोंका गुलदस्ता लेकर जाएगा. उनकी शादी को सात वर्ष पूरे हो चुके हैं. मगर देव को नहीं पता है कि उनकी पत्नी रीना का किसी रंजीत (अरूणोदय सिंह) नामक युवक से अवैध संबंध है.blackmail movie review

जब वह अपने घर पहुंचता है, तो अपनी पत्नी रीना को पर पुरुष के संग हमबिस्तर पाता है. जब देव को अपनी पत्नी के प्रेमी रंजीत (अरूणोदय सिंह) के बारे में पता चलता है, तो वह उसे ब्लैकमेल करना शुरू करता है. पर रंजीत, देव की पत्नी को ब्लैकमेल करना शुरू करता है. उधर रंजीत की पत्नी डौली (दिव्या दत्ता) हमेशा उस पर हावी रहती है. धीरे धीरे देव के औफिस के दूसरे लोगों को देव की ब्लैकमेलिंग योजना के बारे में पता चल जाता है. उसके बाद सभी किसी न किसी मसले के लिए एक दूसरे को ब्लैकमेल करना शुरू कर देते हैं. उसके बाद सिलसिलेवार तरीके से कई घटनाएं होती हैं.

फिल्म की पटकथा ह्यूमरस और मजेदार नहीं है. वास्तव में फिल्म शुरू होने पर जो उम्मीद जगाती है, वह बहुत जल्द खत्म हो जाती है. इसकी मूल वजह यह है कि निर्देशक व पटकथा लेखक को यही समझ में नहीं आया कि किसी अद्भुत विचार को किस तरह से दृश्यों के माध्यम से पेश किया जाए. आगे व्याभिचार के चलते जो अपराध होते हैं, उसकी वजह से हास्य दृश्य बेमानी हो जाते हैं.

कुछ हास्य घटनाक्रम काफी अच्छे बन पड़े हैं. लेकिन इंटरवल से पहले फिल्म घिसटते घिसटते आगे बढ़ती है. इतना ही नहीं रोचकता भी कम है. इंटरवल के बाद फिल्म कुछ ज्यादा ही थकाने वाली हो जाती है. ‘कोई दूध का धुला नहीं’ यानी कि हर इंसान ग्रे शेड्स लिए होता है, इस सोच के साथ हास्य के दृश्यों का संयोजन करना आसान होता है, पर यहां भी यह फिल्म विफल रहती है. कुल मिलाकर ‘ब्लैकमेल’ एक दिलचस्प फिल्म नहीं बन पाती है.

अभिनय देव का निर्देशन ठीक ठाक है. उन्होने इंसानी जीवन के डार्क पक्ष को ही उकेरने का प्रयास किया है. अपनी पहली फिल्म ‘‘देहली बेली’’ के मुकाबले इस बार वह कमतर ही हैं. फिल्म की लंबाई कुछ ज्यादा हो गयी है. एडीटिंग टेबल पर इसे कसने की जरुरत थी.

जहां तक अभिनय का सवाल है तो इरफान खान एक बार फिर अपने अभिनय की छाप छोड़ने में कामयाब रहे हैं. विलेन के  किरदार में अरूणोदाय सिंह हर फिल्म में कुल मिलाकर एक जैसा ही अभिनय करते हुए नजर आते हैं. कीर्ति कुल्हारी का अभिनय ठीक ठाक ही है. पर अहम सवाल है कि इरफान खान अकेले अपने बलबूते पर फिल्म को कितनी सफलता दिला पाएंगे? फिल्म का गीत संगीत आकर्षित नहीं करता.

दो घंटे 19 मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘ब्लैकमेल’’ का निर्माण भूषण कुमार, किशन कुमार, अभिनय देव व अपूर्वा सेन गुप्ता ने किया है. फिल्म के निर्देशक अभिनय देव, लेखक  परवेज शेख और प्रदुम्न सिंह, पार्श्व संगीतकार मिक्की मैक्कलेरी व पार्थ पारेख, संगीतकार अमित त्रिवेदी, गुरूरंधावा व बादशाह, कैमरामैन जय ओझा तथा कलाकार हैं – इरफान खान, कीर्ति कुल्हारी, दिव्या दत्ता, अरूणोदय सिंह, ओमी वैद्य, अनुजा साठे, प्रदुम्न सिंह, गजराव राव व खास नृत्य में उर्मिला मांतोडकर.

जाह्नवी के हाथ से निकली ‘सिम्बा’

हाल ही में अभिनेत्री जाह्नवी कपूर का रणवीर सिंह के साथ रोहित शेट्टी की फिल्म ‘सिम्बा’ में होने की खबरें आ रही थी. लेकिन अचानक से इसी बीच एक और खबर आई कि रोहित शेट्टी ने फिल्म ‘सिम्बा’ में सारा अली खान को ले लिया है और जाह्नवी इस फिल्म से हाथ धो बैठी हैं. बताया जा रहा है कि जाह्नवी के हाथ से इस प्रोजेक्ट के निकलने की जिम्मेदार वह खुद ही हैं.

खबरों के मुताबिक सिम्बा के लिए हीरोइन की चर्चा काफी लंबे समय से चली आ रही थी. सिम्बा की स्क्रिप्ट जाह्नवी और सारा दोनों को ही सुनाई गई थी. रणवीर चाहते थे कि फिल्म में दीपिका उनसे रोमांस करें, जबकि रोहित की पहली पसंद जाह्नवी ही थी. फिल्म साइन करने से पहले ही जाह्नवी ने ये लीक कर दिया कि उन्हें फिल्म ‘सिम्बा’ औफर हुई है. इतना ही नहीं उन्होंने फिल्म साइन किए बिना ही ये भी कहना शुरू कर दिया कि वे रणवीर सिंह के साथ काम करने को लेकर काफी नर्वस हैं. ये तब की बात है जब फिल्म की लीड एक्ट्रेस को लेकर मेकर्स ने कोई भी फैसला नहीं लिया था.

रोहित शेट्टी को जाह्नवी का ये अनप्रोफेशनल रवैया पसंद नहीं आया और उन्होंने जाह्नवी को फिल्म से बाहर का रास्ता दिखा दिया. इसी बीच करण जौहर ने सारा को ‘सिम्बा’ का औफर दे दिया जिसे लपकने में सारा ने देर नहीं लगाई और इस तरह से हीरोइनों की इस दौड़ में सैफ की बेटी सारा बाजी मार गईं. वहीं जाह्नवी कपूर ने अपनी नासमझी की वजह से इस बड़े औफर को खो दिया.

बता दें कि सारा के लिए भी ये फिल्म काफी महत्वपूर्ण है. इससे पहले सारा केदारनाथ से बौलीवुड में एंट्री करने वाली थीं, लेकिन डायरेक्टर और प्रोड्यूसर के चलते फिल्म की शूटिंग बीच में ही रोक दी गई. फिल्म ‘सिम्बा’ के जरिए सारा पहली दफा रणवीर सिंह और रोहित शेट्टी साथ में काम करने जा रही हैं. 28 दिसंबर को रिलीज होने वाली फिल्म सिम्बा तेलुगु फिल्म ‘टेम्पर’ की हिंदी रीमेक होगी. वहीं जाह्नवी कपूर फिलहाल ईशन खट्टर के साथ फिल्म ‘धड़क’ की शूटिग में लगी हैं. इसे भी करण जौहर ही बना रहे हैं. जाह्नवी और ईशान की यह फिल्म 20 जुलाई को रिलीज होने वाली है.

जनून : इश्क जब हद से गुजर जाए

रिया बेतहाशा भाग रही थी उस साए से बचने के लिए, मगर उस की पुकार सुनने वाला वहां कोई नहीं था. भयभीत हिरनी की तरह शिकारी से बचने के लिए उस ने मदद के वास्ते अपनी नजरें चारों तरफ दौड़ाईं. मगर कहीं कोई नजर नहीं आया. पूरा शहर जैसे रातोंरात वीरान हो गया था. अब तक वह नकाबपोश उस के बेहद करीब पहुंच चुका था, भागने का कोई रास्ता अब बचा नहीं था. खुद को बचाने की कोशिश में उस ने पूरी ताकत लगा कर उस नकाबपोश का मुकाबला करना चाहा, मगर उस की कोशिशें उस दरिंदे की ताकत के सामने हार गईं. कपड़ों की तह में छिपा खंजर निकाल उस ने रिया पर हमला बोल दिया. दर्द में तड़पती हुई वह खून से लथपथ जमीन पर गिर पड़ी.

‘‘मुझे बचा लो, मां, मुझे बचा लो,’’ वह बदहवास लहजे में चीख रही थी. ‘‘रिया उठ, रिया क्या हुआ? रिया, रिया,’’ कोई उसे झंझोड़ कर उठाने की कोशिश कर रहा था.

उस ने आंखें खोलीं तो देखा, वह अपने कमरे के बिस्तर पर लेटी हुई थी. उस की कुरती पसीने से भीगी हुई थी, पूरा शरीर अब भी थरथर कांप रहा था. ‘‘कोई बुरा सपना देखा क्या? बाप रे, कितनी जोर से चीखी तुम, मैं तो डर ही गई थी.’’ रूममेट शिखा हैरानपरेशान उस के सिरहाने खड़ी थी.

‘‘बहुत डरावना सपना देखा, यार. कोई मेरी जान लेने की कोशिश कर रहा था,’’ रिया ने माथे का पसीना पोंछते हुए कहा. ‘‘सपना ही था न, खत्म हो गया, बस. अब उठ कर जल्दी से तैयार हो जा वरना आज फिर क्लास लगेगी,’’ शिखा ने कहा.

मगर रिया अभी तक उस सपने के सदमे में थी. कुछ देर तक वह यों ही चुपचाप बैठी रही. फिर उन बुरे खयालों को दिमाग से झटक कर वह बाथरूम में घुस गई. उस की एयरहोस्टैस की ट्रेनिंग को अभी कुछ ही अरसा गुजरा था. इस नए शहर में उस के लिए सबकुछ नया था. शहर की तेजतर्रार जिंदगी के साथ रिया अभी कदम से कदम मिला कर चलना सीख रही थी. अपने घरपरिवार से दूर इस बड़े शहर में आने का उस का एक ही मकसद था, अपने भविष्य को सुनहरा बनाना और इस के लिए वह जीजान से मेहनत भी कर रही थी.

उस के छोटे से कसबे में इतनी सुविधाएं नहीं थीं कि रिया अपने सपनों की उड़ान भर पाती. 12वीं की परीक्षा अच्छे अंकों में पास करने के बाद उस के हौसले और मजबूत हो गए थे. कुछ करने की तमन्ना उस के मन में शुरू से ही थी. छोटी सी रिया जब अपनी छत पर से गुजरने वाले हवाईजहाजों को देखती तो उस का जी चाहता कि वह भी किसी जहाज में बैठ कर आसमान की ऊंचाइयों से नीचे झांके, अपना छोटा सा घरआंगन और आंगन में अपने परिवार वालों को ऊपर से देख कर हाथ लहराए. बड़ी मानमनौवल के बाद उस के बाबूजी किसी तरह राजी हुए थे और मां तो इस खयाल से ही डर रही थी कि उस की बिटिया इतने बड़े शहर में अकेले कैसे रहेगी. यह रिया का ही जनून था जो उस ने अकेले अपने दम पर ट्रेनिंग इंस्टिट्यूट में दाखिला लेने के लिए भागदौड़ की थी.

घर छोड़ते वक्त मां के आंसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे. बाबूजी ने किसी तरह पैसों का इंतजाम किया था. कर्ज का बोझ और गरीबी की लाचारी उन के चेहरे पर हर वक्त झलकती थी. रिया मांबाप की सारी परेशानियां समझती थी, इसीलिए नौकरी कर के वह अपने परिवार का सहारा बनना चाहती थी. बड़ी बहादुरी से उस ने अपने आंसू रोक कर मां को तसल्ली दी कि बस, एक बार अच्छी सी नौकरी मिल जाए तो वह बाबूजी के सारे कर्ज उतार देगी. इतना सुख देना चाहती थी अपने मांबाप को वह कि लोग उस की मिसाल दें.

शहर में अकेले रहने की चुनौतियां कुछ कम नहीं थीं. शिखा से उस की मुलाकात इंस्टिट्यूट में ही हुई थी. एक ही इंस्टिट्यूट में होने के कारण दोनों का मकसद भी एक था और साथ में रहने से उन दोनों के खर्चे बचते. दोनों ने फैसला लिया कि वीमेन होस्टल के बजाय एक कमरा किराए पर ले कर रहा जाए. एक ढंग का कमरा तो मिला मगर मकानमालकिन उम्रदराज और कुछ खब्ती निकली. उस की शर्त थी कि किसी तरह का कोई बवाल या हुड़दंग नहीं होना चाहिए और 3 महीने का अग्रिम किराया एकमुश्त देना होगा. इतना खर्च करना उस की जेब पर भारी पड़ रहा था, लेकिन यह तसल्ली थी कि एक सुरक्षित माहौल में रह कर दोनों अपनी ट्रेनिंग पूरी कर सकती हैं.

जल्द ही रिया ट्रेनिंग इंस्टिट्यूट के होनहार छात्रों में शुमार हो गई. उस का एक ही लक्ष्य था और उस के लिए वह पूरी लगन के साथ अपनी पढ़ाई में ध्यान देती थी. इसी दौरान उस के बहुत से नए दोस्त भी बन गए. उन दोस्तों की संगत में उसे बड़े शहर के बहुत से अनछुए पहलुओं को जानने का मौका मिला. दोस्तों के साथ मिल कर मौजमस्ती करना, पब और डिस्को जाना आदि बातें अब उस की जिंदगी का हिस्सा थीं. कभी सादगी से रहने वाली रिया अब किसी फैशन पत्रिका की मौडल सी नजर आने लगी थी. यह कायाकल्प उस के ग्लैमर से भरे एयरहोस्टैस की नौकरी की पहली जरूरत भी थी.

रिया में खूबसूरती के साथसाथ आत्मविश्वास भी गजब का था. उसे पसंद करने वालों में उस के कई पुरुष मित्र थे. ट्रेनिंग में साथी लड़के उस की एक नजर के लिए तरसते और वह जैसे जान के भी अनजान बन जाती. प्यार के चक्कर में पड़ कर वह अपनी मंजिल से भटकना नहीं चाहती थी. अपने पैरों पर खड़ी होने का सपना ही उस का पहला प्यार था जिसे हर हाल में उसे पूरा करना था. मां का उदास चेहरा याद आते ही एक आग सी लग जाती उस के तनबदन में और वह खुद को दोगुनी ऊर्जा से भर कर ट्रेनिंग में झोंक देती.

रिया की सहेली का खास दोस्त था विवेक, जिस के जन्मदिन की पार्टी में रिया और बाकी दोस्त आमंत्रित थे. पैसे वाले बाप के बेटे विवेक को पार्टियां देने और खूबसूरत लड़कियों से दोस्ती करने का शौक था. इन पार्टियों का सारा खर्च उस के कारोबारी पिता के लिए किसी मामूली जेबखर्च से अधिक नहीं होता था, जहां शराब पानी की तरह बहाई जाती और जवानी के जोश में डूबे कमउम्र लड़केलड़कियां देर रात तक हुड़दंग मचाते. फाइवस्टार होटल की दावत के अनुरूप कपड़े खरीदने के लिए रिया ने पूरे 2 महीने तक कंजूसी कर के पैसे बचाए थे. कपड़े, मेकअप से ले कर नए जूते तक खरीद डाले थे उस ने. पहली बार किसी फाइवस्टार होटल के नजारे देख कर उस की आंखें चुंधिया गईं. शानोशौकत क्या होती है, यह उसे आज एहसास हुआ.

विवेक अपने दोस्तों के साथ बैठ कर जाम पे जाम चढ़ाए जा रहा था. रिया की तरह ही कई बला की खूबसूरत लड़कियां वहां मेहमान थीं और महफिल की शान में चारचांद लगा रही थीं. विवेक रिया को ललचाई नजरों से घूर रहा था. रिया ने हाथ मिला कर उसे जन्मदिन की बधाई दी तो बहुत देर तक उस ने रिया का हाथ नहीं छोड़ा. उत्तेजक संगीत की धुन में कई जवान जोड़े डांसफ्लोर पर थिरक रहे थे. शिखा ने हाथ पकड़ कर रिया को डांसफ्लोर की तरफ खींचा. ‘‘नहींनहीं, मुझे नाचना नहीं आता,’’ रिया ने प्रतिरोध में हाथ छुड़ाया.

‘‘कम औन रिया, चल न, बड़ा मजा आएगा,’’ शिखा पूरे मूड में थी. ‘‘यार, मुझे नहीं आता नाचना. मेरा मजाक बन के रह जाएगा,’’ रिया को झिझक हो रही थी.

‘‘चल मेरे साथ, मैं सिखा दूंगी,’’ रिया के मना करने के बावजूद शिखा उसे अपने साथ ले चली. कुछ ही देर में रिया भी उसी मस्ती के माहौल में डूबने लगी. एक सुरूर सा उस के तनमन पर छाने लगा. उस का चेहरा लाखों में एक था, उस पर कमसिन उम्र और मासूम अदाएं. सुर्ख लाल रंग की मिनी ड्रैस में वह आज कहर ढा रही थी. उस की छठी इंद्रिय अनजान नहीं थी इस बात से कि न जाने कितनी ही बेकरार नजरें उसे निहार रही थीं.

मगर, एक जोड़ी आंखें उस का पीछा तब से कर रही थीं जब से उस ने यहां कदम रखा था. रिया पर से वे आंखें एक पल को भी नहीं हटी थीं. मगर इस से बेखबर रिया डांसफ्लोर पर किसी नागिन सी झूम रही थी. ‘‘गला सूख रहा है. मैं अभी आई कुछ पी कर,’’ शिखा उस के कान में लगभग चीखती हुई बोली.

‘‘मेरे लिए भी कुछ लेते आना,’’ रिया ने भी चिल्ला कर कहा. पुरजोर बजते कानफोड़ू संगीत में कुछ सुनाई नहीं दे रहा था. ‘‘ठीक है,’’ कह कर शिखा होटल के बार की तरफ बढ़ गई.

‘‘मे आई हैव द प्लेजर टू डांस विद यू,’’ उस अजनबी ने रिया के पास आ कर पूछा. रिया औपचारिकता से मुसकरा दी तो वह अजनबी उस के साथ थिरकने लगा.

वह रिया को टकटकी लगाए देखे जा रहा था, कभी उस के एकदम पास आ जाता, कभी उस की गरम सांसें रिया के चेहरे से टकरा जातीं. वह जितना दूर जाने की कोशिश करती, वह उस के उतने ही करीब आ रहा था. रिया अब असहज होने लगी, सारा मजा किरकिरा हो चला था. न जाने क्या था उन आंखों की गहराई में कि उस का मन चाहा कि वह फौरन वहां से हट जाए. हाथ में बियर का बड़ा सा मग ले कर शिखा लौटी तो रिया ने चैन की सांस ली.

‘‘बहुत देर से डांस कर रही हूं, मैं थक गई हूं, अब चलते हैं,’’ रिया उस के कान में फुसफुसाई. पार्टी देर तक चलने वाली थी मगर शिखा के साथ रिया वहां से चली आई. वे 2 आंखें अब भी रिया का पीछा कर रही थीं.

अपने कमरे में बिस्तर पर लेटते ही रिया को गहरी नींद ने आ घेरा. न जाने कितनी देर से उस के मोबाइल की घंटी बज रही थी. नींदभरी आंखें मलतेमलते उस का हाथ अपने मोबाइल तक पहुंचा. ‘‘हैलो,’’ उस ने फोन उठाया, ‘‘हैलो, हैलो.’’

दूसरी तरफ से कोई जवाब न पा कर उसे झल्लाहट हुई. कुछ देर खामोशी रही और दूसरी तरफ से फोन कट गया. रात के 2 बज रहे थे. न जाने किस का फोन था. उस ने करवट बदली और एक बार फिर से नींद की आगोश में चली गई.

सुबहसुबह शिखा ने चहकते हुए उसे उठाया, ‘‘उठ रिया देख तेरे लिए क्या आया है?’’

‘‘क्या है?’’ खीझ कर रिया उठ बैठी. ‘‘कोई तुम्हारे लिए यह रख कर गया है दरवाजे पर. कौन है मैडम, हमें कभी बताया नहीं,’’ शरारती लहजे में शिखा खिलखिला रही थी.

दिलकश महकते फूलों से सजा हुए एक बुके था, साथ में लगा हुए एक छोटा सा कार्ड. रिया ने उलटपलट कर उस गुलदस्ते को देखा, कार्ड पर उस का नाम लिखा था फौर रिया विद लव. ‘‘मुझे नहीं पता यह किस ने भेजा और क्यों?’’ रिया का दिमाग चकराया. आज तो उस का जन्मदिन भी नहीं था, फिर किस ने उसे फूल भेजे हैं.

‘‘यार, नहीं बताना चाहती तो ठीक है, नाटक क्यों कर रही है,’’ शिखा बुरा लगने के अंदाज में बोली. दोनों की दोस्ती इतनी गहरी थी कि दोनों एकदूसरे से कुछ नहीं छिपाती थीं कभी. रिया ने शिखा का मूड ठीक करने के लिए उसे कस कर आलिंगन में भर लिया. ‘‘सच में मुझे कुछ नहीं पता, ये फूल किस ने भेजे.’’ उस ने कसम खाने के लिए गले को छुआ.

‘‘फिर तो बड़ी अजीब बात है कि कोई यों ही फूल भेज रहा है,’’ शिखा कंधे उचका कर बोली. ‘‘तू उदास मत हो, क्या पता कल तेरे नाम का बुके आ जाए,’’ रिया ने चुहल की और दोनों जोरों से हंस पड़ीं.

बुके उठा कर रिया ने अपनी मेज पर सजा दिया. मगर यह सिलसिला सिर्फ फूलों तक नहीं थमा. रोज कोई चुपके से उस के दरवाजे पर उपहार रख के चला जाता था. रिया को लगा कोई उस के साथ शरारत कर रहा है. वह उपहारों को उठा लेती, शिखा के साथ मिल कर उन्हें खोलती और दोनों एकदूसरे को छेड़ कर खूब हंसतीं. मगर, मामला अब धीरेधीरे गंभीर हो चला. तोहफे अब भी आते थे लेकिन रिया को अब हंसी नहीं आती थी, बल्कि एक अजीब सा खौफ उस के मन में छाने लगा. कोई जानपहचान वाला उसे तंग करने के लिए यह सब नहीं कर रहा था.

फूलों और तोहफों के सिलसिले ने जब थमने का नाम नहीं लिया तो रिया के मन का डर बढ़ने लगा. वह हर वक्त यही खैर मनाती कि उसे आज कोई फूल या उपहार न मिले दरवाजे पर. मगर वहां कुछ न कुछ रोज ही रखा रहता. लाल रंग के दिल के आकार के तकिए, महंगी विदेशी ब्रैंड की चौकलेट्स और बड़ेबड़े गिफ्टकार्ड जिन पर उस का नाम सजा होता. लेकिन कौन था इन तोहफों को भेजने वाला, यह राज था. एक दिन घर लौटते वक्त उसे लगा कि कोई उस का पीछा कर रहा है. उस ने कई बार पलट कर देखा, 2-3 बार अलगअलग दुकानों में बेमतलब घुस गई. लोगों की भीड़ में आखिर वह किस पर शक करती.

‘शायद मेरा वहम है,’ उस ने खुद को ही तसल्ली दी. रोज की तरह रिया ने जब सुबह का अखबार उठाने के लिए दरवाजा खोला तो पाया वहां आज फिर एक डब्बा रखा हुआ था. वह समझ गई कि उस में क्या होगा. सिर से पैर तक एक बिजली सी उस के तन में कौंध गई. आज उस का गुस्सा सातवें आसमान पर था. उस ने डब्बा उठाया और बगैर खोले गैस का चूल्हा जला कर उस पर रख दिया. शिखा ने गैस पर आग की लपटें देखीं. वह तुरंत भागती हुई आई और चूल्हा बुझा कर डब्बे पर पानी की बालटी उड़ेल दी. ‘‘यह क्या कर रही है रिया,होश में तो है? अभी पूरा घर ही जल जाता.’’

‘‘मैं तंग आ गई हूं, शिखा. अब बरदाश्त नहीं होता. न जाने कौन है जो मुझे चैन से जीने नहीं दे रहा. अब तो सुबह के खयाल से ही डर लगता है. वही फूल, वही सब रोजरोज नहीं झेला जाता.’’ रिया फफकफफक कर रोने लगी. उस के सब्र का बांध टूट गया था. उस की इस हालत पर शिखा बहुत परेशान हो उठी. आखिर वह भी एक लड़की थी. रिया के दुख से वह वाकिफ थी.

शिखा ने उसे अपने आलिंगन में ले लिया, फिर बोली, ‘‘चुप हो जा, रिया. तू रो मत. जो भी तेरे साथ ये सब कर रहा है, अब बचेगा नहीं. तू आज ही मेरे साथ पुलिस स्टेशन चल. तुझे तंग करने वाले को अब पुलिस ही सबक सिखाएगी.’’ ‘‘नहीं, मैं पुलिस के पास नहीं जाऊंगी. बात मेरे घर वालों तक पहुंच जाएगी.’ मांबाबूजी का चेहरा रिया की आंखों के आगे तैर गया.

‘‘तू नहीं जानती, शिखा, मेरे मांबाबूजी को. बहुत कमजोर दिल के हैं वे लोग. फौरन मुझे वापस बुला लेंगे. और मेरे सारे सपने अधूरे…’’ कहते हुए रिया की रुलाई फूट पड़ी. रिया के पास बैठ कर बड़ी देर तक शिखा उसे हौसला बंधाती रही. उस का दिमाग रिया की परेशानी दूर करने का उपाय ढूंढ़ रहा था.

मानसिक तनाव की वजह से रिया का मन अब ट्रेनिंग में नहीं लग रहा था, उसे यों लगता था मानो कोई उस के हर पल की खबर रख रहा है. रातों को अजीबअजीब से सपने आते. मन का डर उस के चेहरे पर दिखने लगा. चेहरे पर हरदम बनी रहने वाली मुसकान अब गायब हो गई थी. एक दिन उस की ट्रेनर मिस सिन्हा ने उसे अपने पास बुलाया, ‘‘क्या बात है, रिया? कई दिनों से देख रही हूं आजकल तुम कुछ खोईखोई सी रहती हो, क्लास में भी अब पहले जैसा उत्साह नहीं दिखाती? एनी प्रौब्लम?’’

रिया इस प्रश्न से सकपका गई. यह बात अगर जगजाहिर हुई तो उस का मखौल बन कर रह जाएगा. ‘‘नो, मैम, सब ठीक है. कोई प्रौब्लम नहीं है,’’ रिया ने मुसकरा कर कहा. ‘‘हूं, आई होप सो,’’ मिस सिन्हा बोलीं.

एक सीसीटीवी कैमरा घर के गेट पर लगाने का खयाल शिखा के दिमाग में आया. रिया को भी यह बात दुरुस्त लगी. जो भी गिफ्ट रखने दरवाजे के पास आएगा, उन्हें कैमरे में उस की तसवीर दिख जाएगी. उन्होंने मकानमालकिन से कैमरा लगवाने की बात की तो उस ने शकभरी नजर से दोनों को घूरा. दोनों ने महल्ले में बढ़ती चोरी की वारदात का जिक्र किया तो वह मान गई.

यह अजीब इत्तेफाक था कि सीसीटीवी कैमरे के लगते ही फूल और गिफ्ट आने एकाएक बंद हो गए. हफ्ता बगैर किसी परेशानी के गुजर गया. घर से इंस्टिट्यूट तक वह मैट्रो ट्रेन में सफर करती थी. मैट्रो की भीड़ में अपने लिए जगह तलाश करती रिया को अचानक किसी ने नाम ले कर पुकारा. रिया ने चौंक कर पुकारने वाले की तरफ देखा. कुछ जानापहचाना सा लगा उसे वह लड़का जो उस के लिए एक सीट खाली करा कर उसे बैठने का इशारा कर रहा था.

‘‘थैंक्स,’ रिया ने मुसकरा कर शुक्रिया अदा किया.‘ आप मेरा नाम कैसे जानते हैं?’’ रिया ने पूछा. ‘‘उस दिन पार्टी में मैं आप से मिला था.’’

रिया को याद आया. यह वही लड़का था जो उस दिन विवेक के जन्मदिन की पार्टी में उस के साथ डांस कर रहा था. रोहित ने उसे बताया कि वह किसी पौलिटैक्निक कालेज का छात्र है. उन की मुलाकात अब रोज ही होने लगी. रिया के लिए वह हमेशा कोई सीट खाली करा देता ताकि वह आराम से सफर कर सके. उस की तहजीब और शराफत से रिया के मन में अब उस की छवि बदल गई थी.

पार्टी में रिया को रोहित बदतमीज किस्म का लगा था पर कुछ दिनों में रोहित की शराफत और तहजीबभरे रवैए से रिया प्रभावित हुए बिना न रह सकी. रिया रोहित पर आंख मूंद कर विश्वास करने लगी थी. रिया की हर छोटीबड़ी मुश्किल में रोहित हमेशा मदद के लिए आगे रहता था. उसे सताने वाला न जाने कहां गायब हो गया था. उस के लिए अब कोई फूल या उपहार रख कर नहीं जाता था. उन पुरानी बातों को भूल कर रिया एक बार फिर से अपनी पढ़ाई में दिलोजान से जुट गई. उसे लगने लगा कि जिंदगी में अब सब ठीक चल रहा है.

एक दिन भीड़ में किसी उचक्के ने रिया को छूने की कोशिश की तो रिया ने विरोध किया. रोहित उस के साथ ही खड़ा था. उस ने तैश में आ कर उस गुंडे का कौलर पकड़ लिया. नौबत मारपीट तक आ गई तो रिया घबरा गई. उस ने किसी तरह रोहित को समझाबुझा कर मामला शांत करवाया.

दोनों अपने गंतव्य स्टेशन पर ट्रेन से उतर गए. ‘‘तुम्हें क्या जरूरत थी इस तरह उस गुंडे से उलझने की?’’ रिया बोली तो रोहित बोल पड़ा, ‘‘हिम्मत भी कैसे हुई उस की तुम्हें हाथ लगाने की? और क्या करता मैं? चुपचाप तमाशा देखता?’’ ‘‘तो क्या उस की जान ले लेते?’’ रिया खीझ कर बोली.

‘‘अगर तुम न रोकती तो मैं सच में उस की जान ले लेता,’’ रोहित ने जवाब दिया. रिया अवाक रह गई. उस ने रोहित की तरफ देखा. उस का चेहरा गुस्से में लाल था. ‘‘क्या बोल रहे हो, रोहित? मामूली बात पर कोई किसी की जान लेता है क्या?’’ रिया को हंसी आ रही थी उस की बातों पर.

‘‘रिया, अगर कोई भी तुम्हें छुए तो मैं…’’ कहतेकहते रोहित अचानक चुप हो गया. फिर नरम लहजे में बोला, ‘‘मेरे दोस्तों के साथ कोई बदतमीजी करे तो मुझे गुस्सा आ जाता है.’’ ‘‘हाऊ स्वीट, तुम सच में कितने अच्छे हो जो दोस्तों की इतनी परवा करते हो,’’ रिया ने उस का गाल पकड़ कर खींचा.

उसे हमेशा घर के पास तक छोड़ने के बाद रोहित वापस चला जाता था. हाथमुंह धो कर जब रिया फारिग हुई तो उस की नजर उस किताब पर पड़ी जो वह अपने साथ ले आई थी. यह किताब हमेशा रोहित के हाथ में रहती थी. उस गुंडे से हाथापाई के दौरान किताब रोहित के हाथों से गिर पड़ी थी जिसे रिया ने उठा लिया था और बातोंबातों में उसे देना भूल गई थी. उस ने यों ही किताब के पन्ने पलटे. कुछ पन्नों पर कुछ लिखावट की गई थी. एक पन्ने पर उसे अपना नाम लिखा हुआ मिला. उस ने गौर से देखा, लिखावट कुछ जानीपहचानी लगी. कुछ और पन्ने रिया ने पलटे, ज्यादातर पन्नों पर उस का नाम था और उस के नाम के साथ एक और नाम लिखा हुआ था. 2 नामों को एकसाथ दिल के आकार में जोड़ कर लिखा गया था.

उस ने उन लिखे हुए अक्षरों को बारबार देखा. कोई संदेह नहीं था कि किताब में लिखे शब्दों की लिखावट उन गिफ्टकार्ड के अक्षरों से हुबहू मिलती थी. रिया सन्न रह गई. अचानक सारा राज ताश के पत्तों की तरह उस के सामने खुल गया. रिया के लिए यकीन करना मुश्किल था कि वह रोहित ही था जो उसे गुमनाम तोहफे भेजा करता था. खौफ की ठंडी लहर उस की रीढ़ की हड्डी से गुजर गई. जिस डर पर काबू पाने में उसे इतना वक्त लगा था वह अब एक नाम और चेहरे के साथ उस की जिंदगी में लौट आया था.

इस वक्त वह घर पर बिलकुल अकेली थी. शिखा अपनी पारिवारिक व्यस्तता के चलते कुछ दिनों के लिए शहर से बाहर गई थी. मगर क्यों? उस ने मेरे साथ ऐसा क्यों किया? उस के मन में ऐसे तमाम सवाल उमड़ रहे थे जिन का जवाब सिर्फ रोहित दे सकता था.

उस ने ठान लिया कि वह रोहित को बेनकाब कर के रहेगी. इतने दिनों से वह रिया का दोस्त बन कर उस के भरोसे का फायदा उठा रहा था. जो उस का गुनाहगार था उसे ही रिया अपना सब से बड़ा हमदर्द समझती रही. अगले दिन रिया बहुत देर तक बेसब्री से रोहित का इंतजार करती रही. मैट्रो में सफर करने वालों की भीड़ एक के बाद एक आ कर गुजर गई मगर रोहित उसे कहीं नजर न आया. अंत में निराश हो कर वह अपने इंस्टिट्यूट के लिए चल पड़ी.

देर शाम घर वापस आते हुए रिया को कई बार लगा कि कोई उस का पीछा कर रहा है. वह गली के पास मुड़ी और एक खंभे की आड़ में छिप गई. बहुत हुआ लुकाछिपी का खेल. आज तो वह उस साए को धर दबोचेगी. रिया ने पूरी हिम्मत जुटा ली, चाहे कुछ हो जाए वह जान कर रहेगी कि आखिर कौन उस का पीछा करता है.

जैकेट के हेडकवर से चेहरे को छिपाए उस शख्स ने गली में कदम रखा ही था कि रिया ने झपट कर उस का नकाबरूपी हुड खींच लिया. उस शख्स को जब तक संभलने का मौका मिलता, उस का चेहरा बेनकाब हो चुका था.

‘‘रोहित.’’ रिया को एक और झटका मिला, ‘‘अच्छा तो छिपछिप कर मेरा पीछा करने वाले भी तुम ही हो और मुझे वो फूल और गिफ्ट भी तुम ही भेजते थे.’’ सिर झुकाए रोहित चुपचाप रिया के सामने खड़ा था.

‘‘अब चुप क्यों हो? जवाब दो,’’ उसे नफरत से देखते हुए रिया ने कहा. ‘‘मुझे माफ कर दो, रिया. ये सब मैं ने तुम्हारे प्यार को पाने के लिए किया. बहुत प्यार करता हूं मैं तुम से.’’

‘‘तुम ने यह सोचा भी कैसे? तुम सिर्फ मेरे दोस्त थे और अब आज से हमारा दोस्ती का रिश्ता भी खत्म हो गया. आज के बाद मुझ से मिलने की कोशिश भी मत करना.’’ ‘‘प्लीज रिया, ऐसा मत करो. देखो, मान जाओ. न जाने कब से मैं तुम्हारे प्यार के लिए तरस रहा हूं,’’ रोहित गिड़गिड़ाया.

‘‘नहीं रोहित, मेरी जिंदगी में प्यारमुहब्बत के लिए कोई जगह नहीं है. मेरे लिए सब से जरूरी मेरा परिवार और मेरा कैरियर है. पर तुम नहीं समझोगे ये सब,’’ रिया अब तक अपने गुस्से को सब्र में बंधे हुए थी. ‘‘रिया, मेरा प्यार कुबूल कर लो, प्लीज,’’ रोहित उस से प्यार की भीख मांग रहा था.

रिया रोहित के छल और फरेब से पहले ही आहत थी. उस ने रोहित के घडि़याली आंसुओं की कोई परवा नहीं की. जनून में आ कर रोहत ने रिया का रास्ता रोक लिया. ‘‘रिया, अगर तुम ने मेरा प्यार कुबूल नहीं किया तो मैं खुद को मार डालूंगा,’’ धमकी भरे अंदाज में रोहित ने कहा.

‘‘तो मार डालो खुद को,’’ रिया ने दांत भींच कर सख्ती से कहा और एक जोर का धक्का दे कर रोहित को अपने रास्ते से हटाया. ‘‘ठीक है, रिया, मैं मरूंगा तो तुम्हें भी मरना होगा, तुम मेरी नहीं हो सकती तो किसी और की भी नहीं हो पाओगी.’’

रोहित की जबान से इतनी खतरनाक धमकी सुन कर रिया सन्न रह गई. उस ने पलट कर रोहित को देखा. अंधेरे में रोहित के इरादे खूंखार लग रहे थे. उस ने अपने कपड़ों में छिपा बड़ा सा खंजर निकाल लिया. उस की आंखों में वहशीपन देख कर रिया के चेहरे का रंग उड़ गया. ‘‘नहीं रोहित, प्लीज मुझे जाने दो,’’ रिया गिड़गिड़ाई. रोहित के हाथ में चाकू देख कर रिया के पसीने छूट गए, किस हद तक जा सकता है वह, उस ने सोचा नहीं था.

रोहित उस की तरफ खतरनाक इरादे से बढ़ता ही जा रहा था. वह पूरी ताकत के साथ रोहित से बचने के लिए भाग रही थी. दूरदूर तक कोई मदद नहीं दिख रही थी. वह चीख कर मदद की गुहार लगा रही थी. रोहित किसी साए की तरह उस के पीछे लगा हुआ था. कुछ ही दूर पर उसे अपना घर नजर आया. दोगुनी ताकत लगा कर वह दौड़ रही थी. किसी तरह वहां तक पहुंच जाए एक बार उस की सांसें उखड़ने लगी थीं. मगर उस के पैर नहीं रुके.

किसी जानवर की सी ताकत से उस का पीछा करता रोहित उस के पास पहुंच गया था. रिया ने उसे परे धकेलने के लिए जोर लगाया. रोहित ने उस का हाथ अपनी मजबूत गिरफ्त में ले लिया. बेबस रिया उस की गिरफ्त से छूटने के लिए छटपटाने लगी. वह बारबार मदद के लिए पुकार रही थी. तभी रोहित ने खंजर से उस पर वार कर दिया. विस्फारित नजरों से रिया ने अपने ही खून को पानी की तरह बहते देखा. वह अर्धमूर्छित हालत में जमीन पर गिर पड़ी. उस की आंखें मुंदने लगी. मां का आंचल उस की आंखों में तैरने लगा. उस के बाद उसे कुछ होश न रहा.

पूरे शहर में इस घटना की चर्चा थी. न्यूज चैनलों से ले कर गलीमहल्लों के नुक्कड़ों पर लोग इस खौफनाक वारदात के बारे में ही बातें कर रहे थे. महज 20 साल की एक महत्त्वाकांक्षी, होनहार लड़की किसी सिरफिरे दरिंदे के जनून का शिकार हो गई. अस्पताल के डाक्टरों के मुताबिक, रिया को करीब 10 से 12 बार चाकू से गोदा गया था. पुलिस पोस्टमौर्टम रिपोर्ट का इंतजार कर रही थी.

रिया के घर वाले सदमे में थे और मां को बारबार बेहोशी के दौरे पड़ रहे थे. शिखा और रिया के दोस्तों से पूछताछ के नतीजे में पुलिस ने रोहित को गिरफ्तार कर लिया था. शिखा को अपनी गलती पर बारबार पछतावा हो रहा था, आखिर क्यों उस ने उस दिन पुलिस स्टेशन में जा कर रिपोर्ट दर्ज नहीं करवाई. अगर उस दिन वह रिया की बात न मान कर पुलिस स्टेशन में शिकायत कर देती, तो शायद रोहित बहुत पहले ही गिरफ्तार हो चुका होता और आज उस की सब से अजीब दोस्त रिया जिंदा होती. एक सिरफिरे के जनून ने एक मासूम कली को खिलने से पहले ही कुचल डाला था.

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