मंदबुद्धि बच्चे : उपेक्षा नहीं तराशिए प्यार से

मानसिक रूप से विकलांग मीना ऐसी बच्ची है जो अपने घर में आने वाले हर परिचित, अपरिचित व्यक्ति से लिपटचिपट जाती है. वह उस शख्स से तब तक लिपटी रहती है जब तक वह आगंतुक वहां रहता है. दरअसल, इस तरह से मीना अपनी भावनाएं व्यक्त करते हुए हर आने वाले से कहती है कि मुझे प्यार कीजिए, मुझे प्यार से सहलाइए.

मीना जैसे न जाने कितने बच्चे समाज व परिवार की उपेक्षा के शिकार होते हैं. यही वजह है कि ये प्यार के लिए बेहद तरसते हैं. वे प्यार की चाह में हर किसी को हसरतभरी निगाह से ताकते हैं, उन से लिपटते हैं, उन्हें छूते हैं. इस एहसास से कि शायद उन्हें भी बदले में भरपूर स्नेह और अपनापन मिले.

छत्तीसगढ़ के रायपुर की एक जगह बाल जीवन ज्योति बालगृह ऐसे बच्चों की शरणस्थली है. मीना यहीं रहती है. मीना जैसे करीब 23 बच्चों की मानसिक विकलांगता को यहां कम करने का प्रयास किया जा रहा है.

ऐसे बच्चों को पिछले 9 वर्षों से प्रशिक्षित कर रही सीता साहू कहती हैं कि ये बच्चे कठोर भाषा नहीं, सिर्फ और सिर्फ प्यार की भाषा समझते हैं. प्रेम से ही इन्हें काबू कर कुछ सिखाया व पढ़ाया जा सकता है.

कठिनाइयां कम नहीं

बाल जीवन ज्योति संस्था की सुप्रिटैंडैंट संगीता जग्गी कहती हैं, ‘‘ऐसे बच्चों, खासतौर से लड़कियों, की परवरिश में कई तरह की कठिनाइयां आती हैं. लड़कियों को पीरियड के समय कुछ समझ नहीं आता. उन के कपड़े खराब हो जाते हैं. इन की सारी चीजों को केयरटेकर को समझना पड़ता है और उन्हें संभालना पड़ता है. लड़कियों की सुरक्षा पर हमें खास ध्यान रखना पड़ता है.’’

ऐसे बच्चों को संभालना, उन्हें दैनिक क्रियाकलाप सिखाना आसान नहीं है. इस के लिए विशेष ट्रेनिंग की जरूरत होती है. ये बच्चे सुखदुख को महसूस करते हैं, लेकिन गुस्सा ज्यादा करते हैं. ये अपने कपड़े फाड़ डालते हैं, एकदूसरे से मारपीट करते हैं और रोकटोक करने पर गुर्राते हैं. कुल मिला कर इन्हें सहीगलत की पहचान नहीं होती.

छत्तीसगढ़ परिषद के मुख्य कार्यपालन अधिकारी भवानी शंकर तिवारी कहते हैं, ‘‘ऐसे बच्चे रोज एक ही चेहरा देखते हैं. जब नए चेहरे उन के सामने आते हैं, तो उन्हें बेहद खुशी मिलती है.

‘‘लोग अपनी जिम्मेदारी समझते हुए ऐसे बच्चों के साथ समय बिताएं, यह जरूरी है. ऐसे बच्चे अपने दैनिक क्रियाकलाप ठीक से कर लें, यही इन की शिक्षा है.’’

ऐसे बच्चे कठिनाइयों और तकलीफों में जीवन जीने वाले बच्चे होते हैं. गरीब परिवारों में ऐसे बच्चों की आजीविका चलाना कठिन होता है. छत्तीसगढ़ शासन ऐसे बच्चों के विकास के लिए प्रयास कर रहा है, लेकिन यह पर्याप्त नहीं है. इस के लिए समाज को भी आगे आना होगा

सुशील भी इन बच्चों में एक है. इस के साथ मुश्किल यह है कि यह 2 लोगों को हंस कर बातें करते नहीं देख सकता. जहां 2 लोगों को ऐसा करते देखता है, उसे गुस्सा आता है और वह उन्हें मारने को दौड़ पड़ता है.

अभिभावकों की स्थिति

रायपुर के श्यामलाल और शारदा ऐसे दंपती हैं जिन की पहली संतान रीना मानसिक विकलांगता की शिकार है. दोढाई वर्षों बाद जब ये इस सच्चाई से रूबरू हुए तो उन्हें काफी तकलीफ हुई.

शारदा ने हिम्मत नहीं हारी. वह उन संस्थानों में गई जहां ऐसे बच्चों का शिक्षण प्रशिक्षण होता है. रायपुर के आकांक्षा स्कूल से इन्हें बहुत संबल मिला. खुद भी इन्होंने घर में ही दैनिक क्रियाकलाप सिखाने का प्रयास जारी रखा. शारदा बताती है, ‘‘रीता को सही तरीके से आटा गूंधना सिखाने में उन्हें एक वर्ष का समय लगा.’’ शारदा के अनुसार, ‘‘ऐसे बच्चों को सिखाने के लिए, उन्हें किसी मुकाम तक पहुंचाने के लिए बहुत हिम्मत और धैर्य की जरूरत होती है.’’

महक और मोहन भाईबहन हैं. मानसिक विकलांगता के चलते इन के मांबाप को कई परेशानियों से गुजरना पड़ा. ये बच्चे एक जगह बैठ कर खाना नहीं खाते, किसी अन्य बच्चे के साथ खेलनाकूदना पसंद नहीं करते. कोई इन्हें पागल कहता है तो कोई बंदर. यह सब देखसुन कर मातापिता को बड़ी तकलीफ होती है. ऐसी स्थिति में मातापिता इन बच्चों को संस्था में रखना ठीक समझते हैं. यहां इन की बेहतर देखभाल होती है.

क्यों होता है ऐसा

ऐसे बच्चों पर रिसर्च कर चुकीं डा. सिम्मी श्रीवास्तव बताती हैं कि भारत में 2 प्रतिशत ऐसे बच्चे हैं. ऐेसे बच्चों के पैदा होने के पीछे कई वजहें होती हैं, जैसे गर्भ को क्षति पहुंचना, कुपोषण, शराब का सेवन, बिना डाक्टर की सलाह के दवा लेना, डिप्रैशन, कम उम्र में शादी होना आदि.

बाल रोग विशेषज्ञ मानते हैं, ‘‘ऐसे बच्चों की पैदाइश के पीछे कई कारण होते हैं. जैनेटिक दोष, जींस में खराबी, रेडिएशन की इंजुरी आदि के चलते भी बच्चे ऐसे पैदा होते हैं.

पहला बच्चा अगर मानसिक रूप से विकलांग है तो दूसरा बच्चा ऐसा न हो, इस के लिए सावधानी बरतनी चाहिए. डाक्टर के अनुसार, ‘‘दूसरे बच्चे के पैदा होने से पहले डाक्टर्स के संपर्क में रहना चाहिए. गर्भवती मां के पेट से पानी निकाल कर जांचा जाता है. जींस में खराबी पाए जाने पर उसे दवा द्वारा ठीक किया जा सकता है ताकि दूसरा बच्चा मंदबुद्धि पैदा न हो.’’

भावुक व शौकीन भी

मीना बेहद शौकीन बच्ची है. वह बोलती नहीं है, इशारे से बताती है. खाने की शौकीन मीना खाना बनाने वाली दीदियों से अपनी पसंद की सब्जी की खासतौर पर फरमाइश करती है.

अजय और रोहित बेहद भावुक हैं. इन की समझ इतनी विकसित नहीं है, फिर भी ये अपने मम्मीपापा को याद करते हैं. अजय तो इस वजह से अनमना सा रहता है, लेकिन रोहित कान पर फोन रखने का एहसास कर के मम्मीमम्मी कहता है.

हुनरमंद होते हैं ऐसे बच्चे

रौशन खेलकूद में अच्छा है. जब तेज दौड़ता है या क्रिकेट के खेल में विकेट लेता है, तो न सिर्फ उसे तालियां मिलती हैं, बल्कि प्रोत्साहन के रूप में उपहार भी मिलते हैं.

सकीना ‘मैय्या यशोदा…’ गाने पर जब थिरकती है तो उस की लचक देखते ही बनती है. इन बच्चों को देख कर लगता ही नहीं कि ये सामान्य बच्चों से कमतर हैं.

बाल जीवन ज्योति संस्था में रहने वाले इन बच्चों का हुनर देख कर आंखों पर विश्वास नहीं होता. खूबसूरत डिजाइनर दीये, राखी, लिफाफे और पेंटिंग्स बना कर न सिर्फ ये अपनी प्रतिभा को साबित करते हैं, बल्कि कद्रदानों से मिले पैसों से इन की जरूरतें भी पूरी होती हैं.

आत्मनिर्भरता की ओर कदम

असामान्य बच्चों की 3 श्रेणियां होती हैं- माइल्ड, माइनर और सीवियर. इस में माइल्ड कैटेगरी के बच्चों का आईक्यू सब से बेहतर होता है. ऐसे प्रतिभाशाली बच्चे कुछ हद तक आत्मनिर्भर होते हैं.

रीता समानी गर्ल्स शौप में कार्य करती है. जब यह कार्य के एवज में थोड़ाबहुत धनार्जन करती है तो इस के मम्मीपापा श्यामलाल और शारदा खुशी से फूल उठते हैं. रीता हालांकि संपन्न परिवार से है, फिर भी जितना कमाती है उसे जमा करती है और वक्त आने पर अपने छोटे भाईबहनों को उपहार दे कर खुशी से फूली नहीं समाती.

रीता समानी को देख कर मानसिक रूप से विकलांग बच्चों के मातापिता को हौसला मिलता है. यदि वे भी हिम्मत और धैर्य के साथ अपने बच्चों को प्रशिक्षित करें तो वे भी न सिर्फ सामान्य जीवन जी सकते हैं, बल्कि किसी मुकाम तक पहुंच सकते हैं.

समाज व सरकार का दायित्व

ऐसे बच्चों के संपूर्ण विकास के लिए छत्तीसगढ़ सरकार काफी सतर्क और जागरूक दिखाई पड़ती है. राज्य सरकार ने 1995 में निशक्त जन अधिनियम पारित किया, जिस का क्रियान्वयन 1996 में हुआ. जिला अधिकारी गांवगांव जा कर ऐसे बच्चे चिह्नित करते हैं, फिर उन्हें निशक्त जन का प्रमाणपत्र दिया जाता है. उस प्रमाणपत्र के आधार पर ये शासन द्वारा दी जा रही सुविधाओं का लाभ उठा सकते हैं.

हर नागरिक की समाज के प्रति जवाबदेही होती है. अभाव और गरीबी में जीने वाले उपेक्षित बच्चों की आवश्यकतानुसार उन की जरूरतें पूरी करना हम सब का उत्तरदायित्व है. प्यार से महरूम बच्चों को गंदे, पागल या असभ्य कह कर झिड़किए मत, बल्कि उन्हें प्यार से सहला दीजिए.

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बेपटरी जिंदगी और लापरवाह अफसर

रेलवे की सुरक्षा और क्षमता बढ़ाने के लिए बजट में इस बार 1.48 लाख करोड़ रुपए खर्च करने का प्रस्ताव रखा गया है.  इस पैसे का इस्तेमाल सुरक्षा, इन्फ्रास्ट्रक्चर व रेलवे को हाइटैक बनाने में किया जाएगा. लेकिन, बजट के बाद संसद की लोकलेखा समिति की सदन में पेश की गई रिपोर्ट पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं.

मल्लिकार्जुन खड़गे की अध्यक्षता वाली लोकलेखा समिति ने रेलवे की कार्यप्रणाली की कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि 150 खतरनाक चिह्नित पुलों, पटरियों तथा ट्रेनों की गति पर प्रतिबंध लगाने के बावजूद रेलवे बोर्ड को 31 पुलों को मंजूरी देने में 213 महीने यानी 17 साल से अधिक का समय लग गया.

घटिया गुणवत्ता

लोकलेखा समिति ने रेलवे बोर्ड पर अपनी टिप्पणी में कहा है कि ब्रिटिश शासनकाल में बनाए गए कुछ पुल अच्छी स्थिति में हैं पर आजादी के बाद बनाए व मरम्मत किए गए पुल घटिया गुणवत्ता वाले हैं. रेल पटरियों का भी ऐसा ही हाल है. यह सब रेल अधिकारियों व ठेकेदारों की मिलीभगत से हुआ है. रिपोर्ट में कुशल कर्मचारियों की कमी पर भी सवाल उठाए गए हैं.

ऐसे में महज रेल बजट बढ़ा देने से क्या यात्रियों की सुरक्षा व्यवस्था पर भरोसा किया जा सकता है? रेल दुर्घटनाओं का ग्राफ लगातार बढ़ रहा है.

अव्यवस्था की मार

रेलयात्रा में लगातार जानमाल का खतरा बना हुआ है. रेल व्यवस्था राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी और निकम्मे अधिकारियों, कर्मचारियों के चलते भारी अव्यवस्था के दौर से गुजर रही है लेकिन फिर भी बुलेट ट्रेन चलाए जाने का शोर है. यात्रियों की जान की सुरक्षा को ले कर कोई गंभीर नहीं है. सरकार और उस के मुलाजिम दोनों ‘मनसा वाचा कर्मणा’ चोर हैं. यही कारण है कि पिछले कुछ महीनों से होने वाले रेल हादसों की अहम वजह स्टाफ का नकारापन रहा है, मगर सरकार द्वारा इन नकारे स्टाफ पर कोई कार्यवाही नहीं की गई है.

सरकार संसद के भीतर तो यह स्वीकार करती है कि रेल दुर्घटनाओं में रेलकर्मी दोषी हैं, मगर उन को गिरफ्तार करवाने, कठोर सजा दिलवाने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाती. लगता है कि सरकार मरने वाले यात्रियों को पिछले जन्म का फल मान कर पौराणिक सोच को पोषित करना चाहती है, बस.

लापरवाही की हद

सरकारी आंकड़े खुद चीख रहे हैं कि रेल हादसों के लिए स्टाफ की लापरवाही जिम्मेदार है, फिर भी सरकार है कि उन दोषी रेल अधिकारियों, कर्मचारियों पर कोई आपराधिक कार्यवाही करने से बचती है. मात्र अनुशासनात्मक कार्यवाही कर अगली बार फिर मौत पर मातम मनाती है और आखिर में मौत के मुलाजिमों को मुक्त कर देती है. यही कारण है कि अब तक स्टाफ की कमी से हुई दुर्घटनाओं में कार्यवाही का कोई बड़ा उदाहरण स्थापित नहीं हो सका कि जिस से स्टाफ सहमा हो और रेल दुर्घटनाएं रुकी हों.

होते होते बचा हादसा

25 सितंबर, 2017 (एक ही ट्रैक पर आई 3 ट्रेनें) : इलाहाबाद के निकट एक ही ट्रैक पर आई दूरंतो ऐक्सप्रैस सहित 3 ट्रेनें एकसाथ टकराने से बालबाल बच गईं.

29 सितंबर, 2017 को बिना गार्ड के रवाना हुई ट्रेन :  उत्तर प्रदेश के उन्नाव में गंगा घाट रेलवेस्टेशन से मालगाड़ी को बिना गार्ड के ही रायबरेली के लिए रवाना कर दिया गया.

हादसों की वजह सिर्फ स्टाफ

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार में 3 वर्षों तक रेलमंत्री रहे सुरेश प्रभु के कार्यकाल में छोटे बड़े कुल 300 रेल हादसे हुए, जिनमें से सिर्फ साल 2017 में जनवरी से अगस्त तक 31 हुए. तब के रेलमंत्री सुरेश प्रभु ने दुर्घटनाओं के बाबत नैतिक आधार पर इस्तीफा देने की पेशकश की, जिस के बाद तत्कालीन ऊर्जा मंत्री पीयूष गोयल को यह मंत्रालय मिला. मगर हादसे हैं कि अब भी थमने का नाम नहीं ले रहे.

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19 जुलाई, 2017 को संसद में सुरेश प्रभु ने रेलवे स्टाफ की लापरवाही की वजह से हुई दुर्घटनाओं के बाबत बताया था कि साल 2015-2016 में हुए कुल 107 हादसों में 55 और साल 2016-2017 में 85 हादसों में से 56 हादसे सिर्फ स्टाफ की लापरवाही से हुए. इसी तरह नीति आयोग की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2012 से साल 2016-2017 तक प्रत्येक 10 रेल दुर्घटनाओं में से 6 स्टाफ की चूक की वजह से हुई हैं. नीति आयोग की ही एक अन्य रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2017 में 31 मार्च तक 104 विभिन्न दुर्घटनाओं में 66 दुर्घटनाएं स्टाफ की लापरवाही से हुई हैं.

गुनाहगारों को सजा नहीं

रेलवे की बड़ी दुर्घटनाओं में जांच के लिए संसद ने एक कानून बना कर रेलवे संरक्षा आयोग बनाया है. निष्पक्ष जांच के लिए इस आयोग को केंद्रीय नागरिक उड्यन मंत्रालय के अधीन रखा गया है. इस आयोग का मुखिया संरक्षा आयुक्त होता है, जो रेलवे के अलग अलग जोन का काम देखने वाले 5 आयुक्तों के साथ काम करता है. संरक्षा आयोग के पास इतना काम होता है कि लंबे अरसे तक जांच ही चलती रहती है. दूसरा, इस आयोग का इतिहास है कि इस के आयुक्त ज्यादातर रेलवे के ही लोग होते हैं, इस से भी जांच का कार्य काफी हद तक प्रभावित होता है.

यही कारण है कि बड़ी से बड़ी दुर्घटनाओं में दोषियों पर आज तक कोई ठोस कार्यवाही नहीं की जा सकी है, जिस से स्टाफ की लापरवाही से दुर्घटनाएं होती रहती हैं. फलस्वरूप, रेलयात्रियों की जान जाने पर दोषी सजा नहीं, मजा काटता है.

पानी में जनता की गाढ़ी कमाई

रेलवे के दोषी अधिकारियों, कर्मचारियों पर कोई कठोर कार्यवाही न करने के कारण दुर्घटनाओं के साथ साथ इन से होने वाला आर्थिक नुकसान भी बढ़ता चला जा रहा है, जो जनता की गाढ़ी कमाई है.

संसद में हुई बहस के दौरान जो आंकड़े बताए गए हैं (आशंका है कि सरकारी स्वभाव के अनुसार बहुतकुछ छिपा भी लिया गया हो), उन के अनुसार, रेल दुर्घटनाओं के कारण साल 2014-2015 में 70.07 करोड़ रुपए का आर्थिक नुकसान हुआ है.

सुरक्षा के बजाय दूध, दवाई और वाईफाई का झांसा : मोदी सरकार अच्छे दिन के जुमले से सत्ता में तो आ गई मगर रेलयात्रा के दौरान होने वाले मौतरूपी मर्ज को जड़ से न दूर कर, ट्वीट करने पर दूध और दवाई मुहैया कराने की वाहवाही लूटने में लग गई. इस के साथ ही बुलेट ट्रेन चलाने का दावा, ट्रेन में वाईफाई उपलब्ध करवाने का दावा और अब तो ट्रेन में ही शौपिंग कराने का दावा करने में लगी है. जबकि यात्री सुरक्षित अपने गंतव्य तक पहुंच पाएगा, यह सुनिश्चित नहीं है.

नियम है, नकेल नहीं

रेलवे के एक रिटायर्ड जनरल मैनेजर ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि भारतीय रेलवे की नियम पुस्तिका के अनुसार, ट्रैक के रखरखाव हेतु प्रतिदिन 3-4 घंटे निर्धारित हैं, मगर ऐसा हो नहीं पाता. ज्यादातर नियम स्टाफ की लापरवाही की भेंट चढ़ जाते हैं. कभी कभी ट्रैक के खाली न होने या फिर ट्रेन के विलंब से चलने की वजह से भी ऐसा होता है. वे बताते हैं कि भारतीय रेल की प्रक्रिया बहुत अच्छी तरह से सुपरिभाषित, लिखित और वितरित की जाती है, यदि उसका सही से पालन हो जाए तो शायद ही कोई दुर्घटना हो.

सुरक्षा सुस्त, किराया चुस्त

हाल के दिनों में रेलवे ने टिकट में फ्लैक्सी रेट जैसे नए नए शिगूफे छोड़ कर जम कर आमदनी बढ़ाई है. अकसर रेलयात्री यह कहते हुए मिल जाते हैं कि प्रथम श्रेणी की यात्रा का खर्च उतनी ही दूरी के विमान यात्रा के खर्च के लगभग बराबर है.

ऐसे में प्रश्न यह उठता है कि जब मुसाफिर का मुख्य मकसद एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचना है तो क्या रेलवे उस स्थान तक सुरक्षित पहुंचाने की गारंटी भी गंभीरता से लेता है. जवाब है, नहीं. तथ्य यह है कि 1 रुपए में मात्र 7 पैसा ही रख रखाव के लिए लगाया जाता है, बाकी दूसरे कामों में इस्तेमाल हो जाता है. हालांकि, साल 2014-2015 के मुकाबले सुरक्षा पर खर्च होने वाली रकम को साल 2017-2018 में 42,430 करोड़ रुपए से बढ़ा कर 65,241 करोड़ रुपए कर दिया गया है.

लाइफलाइन नहीं, किलरलाइन

रेलवे देश की लाइफलाइन कहलाती है, मगर इस के राजनीतिकरण ने इसे लगभग ‘किलरलाइन’ में तबदील कर दिया है. देखने में आता है कि गठबंधन सरकारों में यह मंत्रालय किसी मजबूत दल की झोली में ही रहा और ज्यादातर काम राष्ट्रीय स्तर पर न हो कर, क्षेत्रीय स्तर पर ही किए गए. पूर्व में अलग से पेश होने वाले रेलवे बजट में पश्चिम बंगाल, बिहार, रायबरेली, अमेठी जैसे क्षेत्रों को खास सौगातें मिलती रही हैं.

ऐसे में हाल ही में हुई रेल दुर्घटनाओं के ऊपर अगर लालू प्रसाद यादव यह तंज कसते हैं कि खूंटा बदलने से नहीं, संतुलित आहार देने व खुराक बदलने से भैंस ज्यादा दूध देगी तो इसे महज एक राजनीतिक बयान नहीं समझा जाना चाहिए, बल्कि इस को समग्र परिप्रेक्ष्य में देखना चाहिए. वास्तव में किसी मंत्री का मंत्रालय बदल देने से रेलवे का भला नहीं हो पाएगा. बेहतर होगा कि रेलवे में भ्रष्टाचार, गैरजिम्मेदाराना कार्यसंस्कृति समाप्त हो और रेलवे स्टाफ व मंत्रालय जनता के प्रति जवाबदेह बनें.

अब तक के जितने भी रेल मंत्री बने हैं, सभी ने रेल सुरक्षा पर बड़ी बड़ी बातें की हैं. फिलहाल वर्तमान रेल मंत्री पीयूष गोयल ने रेल की बदहाल स्थिति पर कोई सुधारात्मक कदम उठाया है, ऐसा तो लगता नहीं.

हाल में हुए प्रमुख रेल हादसे

हाल में स्टाफ के नकारेपन से कई दुर्घटनाएं हुईं. हद तो तब हो गई जब एक ही दिन में 4-4 रेल हादसे हुए और मोदी सरकार ने उन पर कोई कार्यवाही नहीं की.

24 नवंबर, 2017 : उत्तर प्रदेश के मानिकपुर में वास्कोडिगामापटना सुपरफास्ट ट्रेन की 12 बोगियां बेपटरी हो गईं, जिस से पितापुत्र समेत 3 यात्रियों की मौत हो गई और 9 यात्री घायल हो गए.

29 सितंबर, 2017 : मुंबई के एलफिंस्टन रोड उपनगरीय रेलवे स्टेशन के फुटओवर ब्रिज पर मची भगदड़ से 22 लोगों की मौत हो गई और 32 लोग घायल हो गए.

6 सितंबर, 2017 (एक ही दिन में 4 हादसे) : नए रेलमंत्री पीयूष गोयल की ताजपोशी के एक ही दिन बाद 4 रेल हादसे देश के अलगअलग हिस्सों में हुए. पहली घटना उत्तर प्रदेश के सोनभद्र में घटी जिस में शक्तिपुंज ऐक्सप्रैस के 7 डब्बे बेपटरी हो गए. दूसरी, नई दिल्ली के मिंटो ब्रिज स्टेशन के निकट रांचीदिल्ली राजधानी ऐक्सप्रैस का इंजन और पावरकार उतर गया. तीसरी, महाराष्ट्र में खंडाला के निकट मालगाड़ी पटरी से उतर गई. चौथी, फरुखाबाद और फतेहगढ़ के पास दिल्लीकानपुर कालिंदी ऐक्सप्रैस क्षतिग्रस्त होने से बच गई.

17 अगस्त, 2017 : उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर के निकट खतौली में पुरीउत्कल ऐक्सप्रैस के हादसे में 23 लोगों की जानें गईं, जबकि 150 से ज्यादा लोग घायल हुए.

22 अगस्त, 2017 : उत्तर प्रदेश के औरैया में कैफियत ऐक्सप्रैस के डंपर से टकराने के कारण 9 कोच पटरी से उतर गए, दर्जनों यात्री घायल हो गए.

21 मई, 2017 : उत्तर प्रदेश के उन्नाव स्टेशन के पास लोकमान्य तिलक सुपरफास्ट ट्रेन के 8 कोच पटरी से उतर गए, जिस में 30 यात्री गंभीर रूप से घायल हो गए.

15 अप्रैल, 2017 : मेरठलखनऊ राजधानी ऐक्सप्रैस के 8 कोच रामपुर के पास पटरी से उतर गए. इस में लगभग 1 दर्जन यात्री घायल हुए.

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दलित उत्पीड़न से धूमिल होती समाज की छवि

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से महज 58 किलोमीटर की दूरी पर उन्नाव शहर है. यहां के वारासगवर इलाके के सथनी गांव में 22 फरवरी को 19 साल की मोनी नामक लड़की को जिंदा जला दिया गया.

मोनी साइकिल से एक दिन अपने गांव से बाजार की तरफ जा रही थी. इतने में कुछ लड़के साइकिल से आए और उसे खेतों में खींच ले गए, फिर उस पर पैट्रोल छिड़क कर आग लगा दी. जान बचाने के लिए लड़की सड़क की ओर भागी पर उस की मदद करने वाला कोई न था. बदमाश लड़की को जलता छोड़ कर भाग गए. लड़की जल कर मर गई.

पुलिस ने 2 दिनों बाद विकास नामक एक लड़के को पकड़ कर जेल भेज दिया. विकास पर आरोप है कि उस की मोनी से दोस्ती थी. दोस्ती में दरार पड़ी तो उस ने यह कांड कर दिया. किसी लड़की को आज के सभ्य समाज में जिंदा जलाने की घटना क्रूर राजाओं और तानाशाहों की याद दिलाती है.

केंद्र और प्रदेश में सरकारें चला रही भारतीय जनता पार्टी के लिए उन्नाव महत्त्वपूर्ण जिला है. भाजपा के साक्षी महाराज यहां से सांसद है. उन के क्षेत्र में दलित लड़की की बर्बर हत्या से पता चलता है कि दबंगों का मनोबल कितना बढ़ा हुआ है.

प्रदेश सरकार में महत्त्वपूर्ण पद संभाल रहे विधानसभा अध्यक्ष हृदय नारायण दीक्षित का कार्यक्षेत्र भी उन्नाव ही है. एक ओर केंद्र से ले कर प्रदेश तक दोनों सरकारें ‘बेटी बचाव बेटी पढ़ाओ’ की बात कर रही हैं, तो वहीं दूसरी ओर इन्हीं सरकारों के दौर में लड़कियां जलाई जा रही हैं.

उन्नाव की घटना से कुछ ही दिनों पहले उत्तर प्रदेश की शिक्षानगरी कहे जाने वाले इलाहाबाद शहर में एक दलित युवक को एक रैस्टोरैंट में पीटपीट कर मार डाला गया. मारपीट की छोटी सी वजह थी. दोनों घटनाओं में सरेआम लोगों ने अकेले को मारा. उन्नाव की मोनी को पैट्रोल छिड़क कर जलाया गया तो इलाहाबाद के युवक को नाली के किनारे पीटपीट कर मार डाला गया. युवक के मरने के बाद भी उस को पीटा जाता रहा.

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एनकाउंटर को सही ठहराते हुए उन्नाव और इलाहाबाद की घटनाएं पूरी तरह से बर्बरता से भरी हैं. यह तब है जब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ कहते हैं, ‘‘बदमाशों को उन की ही भाषा में जवाब दिया जाए.’’ पुलिस ने कुछ एनकाउंटर्स कर सनसनी फैलाने की कोशिश की पर दबंगों पर असर पड़ता तो ऐसी घटनाएं न घटतीं.

हिंदुत्व के नाम पर दबंगई

योगीराज में ये हिंदुत्व की रक्षा के नाम पर चोला बदल चुके हिंदू रक्षा के नाम पर दबंग और गुंडे सक्रिय हो गए हैं. ये भगवा गमछाधारी बन गए हैं. अब इन को किसी पार्टी के झंडे तक की जरूरत नहीं रह गई है. ऐसे दबंग नेताओं के लिए भीड़ जुटाने में भी आगे हो जाते हैं. जहां अच्छे काम में 5 लोग एकसाथ नहीं खड़े होते वहां ये लोग हत्या जैसे जघन्य अपराध करने पर भी बहुत सारे लोगों को तैयार कर लेते हैं.

उन्नाव और इलाहाबाद दोनों शहरों की ही घटनाओं में दबंगों का साथ देने वाले दूसरे लोग भी थे. कासगंज में हुए दंगे में भी ऐसे ही दबंग शामिल थे.

इन को कानून की परवा नहीं होती. कासगंज में धारा 144 लागू होने के बाद भी तिरंगा यात्रा निकालने की अनुमति लेने की जरूरत नहीं समझी गई.

प्रदेश में अगर कानून का राज होता तो लोगों में जरूर कानून का डर होता और एक के बाद एक बर्बर घटनाएं नहीं घटतीं. गौरक्षा और धर्म के नाम पर कानून तोड़ने वाले जब बचने लगे तो दूसरे दबंगों का भी मनोबल बढ़ने लगा. ये अब उद्दंड हो गए हैं. हर गांव गली में जाति की खाई लगातार गहरी होती जा रही है.

ऐसे में जब लोगों को यह लगता है कि सामने वाला उस से नीची जाति का है तो वह और भी ज्यादा हिंसक हो कर उस को पीटने लगता है. दलितों के साथ हो रही घटनाओं के पीछे पाखंडी सोच का बड़ा हाथ है. इस को रोज बढ़ावा दिया जा रहा है.

धर्म की आड़ में प्रवचनों द्वारा लोगों को लगातार यह बताया जा रहा है कि समाज में अलगअलग खेमे भगवान की देन हैं. यह पिछले जन्मों में किए गए पापों का फल है. दबंगई करनेवाले जानते हैं कि उन पर उंगली नहीं उठाई जाएगी क्योंकि यह समाज का दस्तूर है.

दलितों को आज भी धार्मिक कहानियों में यही समझाया जाता है कि सवर्णों व उच्च जाति की सेवा करो, तभी कल्याण होगा. यही सोच एक दलित लड़की को जिंदा जलाने को प्रेरित करती है. आज तक जिन बाबाओं के आश्रमों का परदाफाश हुआ वहां सब से अधिक दलित लड़कियां ही पाई गईं. इस से भी समाज में ऊंचनीच के अंतर को समझा जा सकता है.

खामोश हैं दलित संगठन

दलितों के संगठन इन घटनाओं पर चुप्पी साधे हुए हैं. बहुजन समाज पार्टी की चुप्पी सब से बड़ी है. इस तरह की घटनाओं पर भाजपा के नेता कौशल किशोर दोनों ही जगहों पर गए और वहां पीडि़त परिवारों की मदद का पूरा भरोसा दिलाया. दलितों के मुखर न होने की प्रमुख वजह यह है कि भाजपा ने हिंदुत्व के नाम पर इन को अपने साथ कर लिया था.

देश और प्रदेश के तमाम बडे़ दलित नेता भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़े और अब वे भाजपा के साथ हैं. ऐसे में वे चुप हैं. दलित संख्या में अधिक हैं. ऐसे में नेता उन को साथ रख कर वोट लेने तक उन के साथ रहते हैं. बाद में वे उन की मूल समस्याओं पर चुप हो जाते हैं. दलित अपने से ऊंची जातियों से मेलजोल नहीं रख पाते हैं. ऊंची जातियों वालों का मानना है कि दलितों को वैसे ही रहना चाहिए जैसे वे सदियों से रहते आए हैं.

आज जिस तरह दबंगों के हौसले बुलंद हैं उस से सरकार की छवि खराब हो रही है. इलाहाबाद और उन्नाव की दोनों ही घटनाओं में पुलिस ने पहले मुकदमा दर्ज नहीं किया. इलाहाबाद और उन्नाव की घटनाओं के वीडियो और फोटो जब सोशल मीडिया पर वायरल हुए तब पुलिस हरकत में आई.

थाना स्तर पर आज भी दलित पीडि़त के पक्ष में कोई कार्यवाही नहीं होती है. सरकार यह कह कर अपना पल्ला झाड़ती रहती है कि वह प्रेमप्रसंग है, वह पारिवारिक विवाद है वगैरहवगैरह. असल में तो यह वर्णवाद है, वह भी सदियों पुराना.

सरकार के संरक्षण से बढ़ रही दबंगई

–आर एस दारापुरी (पूर्व आईपीएस, सदस्य – उत्तर प्रदेश स्वराज समिति)

उत्तर प्रदेश में दलितों के प्रति बढ़ रही हिंसक घटनाओं पर जहां बहुत सारे दलित नेता और दल चुप्पी साधे हैं वहीं अवकाशप्राप्त आईपीएस अधिकारी और उत्तर प्रदेश स्वराज समिति के सदस्य आर एस दारापुरी पूरी तरह से मुखर हैं. वे कहते हैं, ‘‘दलितों पर हिंसक घटनाओं की शुरुआत मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के शपथ लेते ही शुरू हो गई थी. जब सहारनपुर के शब्बीरपुर गांव में कहा गया, ‘अगर यूपी में रहना है तो योगीयोगी कहना है’. इस नारे में ही बाद में वंदेमातरम भी जोड़ दिया गया. यही नहीं, वहां बाबासाहेब को ले कर भी आपत्तिजनक टिप्पणियां की गईं. इस से हिंदुत्व के नाम पर काम करने वालों का हौसला बढ़ गया.

‘‘सरकार के इस कदम से खुली गुंडई, हिंसा और दबंगई को संरक्षण मिलने लगा. कई तरह की वाहनियां और सेनाएं अपनाअपना विरोध प्रदर्शन करने लगीं. इस से समाज का माहौल खराब हुआ. समाज में कानून का भय खत्म हो गया. समाज में एक हिंसक वातावरण बन गया है जो पूरे समाज के लिए घातक है.’’

दलित आंदोलन की चुप्पी पर दारापुरी ने कहा, ‘‘बसपा के समय से दलित आंदोलन कमजोर हो गया था. बाबासाहेब हमेशा कहते थे कि हिंदूराष्ट्र समाज के लिए घातक होगा. यहां पर शंबूक और बाली की तरह लोगों के वध होंगे. सीता की तरह महिलाओं के साथ अन्याय होगा. वे हमेशा देश में हिंदूराष्ट्र की स्थापना का विरोध करते रहे.

‘‘कांशीराम आंदोलन की जगह उस तरह काम करते थे जिस में दलित कमजोर बन कर उन के पीछेपीछे चलता रहे. जिस वजह से आज भी दलित मुखर हो कर अपनी बात नहीं कह पा रहा है. आज वह फिर से बसपा का साथ छोड़ ऊंची जातियों की अगुआई करने वालों के पीछे खड़ा हो गया है. इस के साथ ही भाजपा ने दलित नेताओं को अपने पक्ष में कर लिया, इसलिए दलित चुप हैं. उन को समझ में ही नहीं आ रहा है कि वे क्या करें?’’

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नरेंद्र मोदी की पकौड़ा राजनीति के माने

वर्ष 2014 में लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान देश की जनता बड़े मुग्धभाव से नरेंद्र मोदी की तरफ देखती थी. वे कांग्रेसी नेताओं से बेहतर, लच्छेदार भाषण देते थे, उम्मीदें बंधाते थे और सब्जबाग दिखाने के तो वे विशेषज्ञ हैं. तब लगता था कि कोई जादूगर पाशा या जादूगर सरकार मंच पर है जो अपनी छड़ी घुमाएगा और देखते ही देखते देश की तकदीर बदल जाएगी. खेत लहलहाने लगेंगे, उत्पादन चारगुना बढ़ जाएगा, बैंक खातों में नोट बरसने लगेंगे, आतंकी सहम कर भाग जाएंगे और इस से भी ज्यादा अहम बात यह, कि हर हाथ के लिए काम होगा. यानी कोई बेरोजगार नहीं रहेगा.

उस दौरान नरेंद्र मोदी बड़े फख्र से खुद को जब चाय वाला कहते थे तो जनता उन पर बलिहारी जाती थी कि देखो, इतने नीचे से वे इतने ऊंचे तक आ गए यानी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बन गए. नतीजतन, देशवासियों ने उन के हाथों में देश सौंप कर बेफिक्र होते अच्छे दिनों का इंतजार करने लगे.

उन के प्रधानमंत्रित्वकाल के 4 वर्ष बीत जाने के बाद भी अच्छे दिन नहीं आए तो अब लोगों को शक हो रहा है कि यह कैसा जादू है जिस के चलते सबकुछ उलटापुलटा हो रहा है, किसान पहले से ज्यादा खुदकुशी करने लगे हैं. जो नोट बड़े जतन से अपने खर्चों में से कटौती कर बचा कर रखे थे वे तक नोटबंदी के चलते छू हो गए थे. जीएसटी के कारण कारोबारी बेकार होते जा रहे हैं. आतंकी देश के सैनिकों की खुलेआम हत्याएं करने लगे हैं जिस से शहीदों की तादाद बढ़ रही है, यह तो हमारी सेना की देशभक्ति और पे्रम है कि वह विद्रोह तो दूर की बात है, कोई एतराज भी दर्ज नहीं कराती. फसलों की पैदावार तो कहीं बढ़ी नहीं और नौजवान थोक में बेरोजगार हो कर हताशा का शिकार हो चले हैं.

2 आरजू में और 2 साल इंतजार में कटे, लेकिन इस दौरान बुरा यह हुआ कि जनता का ब्लडप्रैशर कभी लो और कभी हाई होने लगा कि अब आगे क्या होगा. होने के नाम पर कुछ नहीं होना, यह तो सभी को समझ आ गया पर न होने के नाम पर अब क्या होगा, यह सोचसोच कर लोग हैरानपरेशान हैं.

नरेंद्र मोदी ने जनता की नब्ज टटोली तो वे चिंता में पड़ गए जो नए बजट को देख गश खाने लगी थी. ऐसे में एक दिन  उन का ध्यान पकौड़ों की तरफ गया तो वे अपने सुनहरे अतीत में खो गए जिसे सिगमंड फ्रायड जैसे मनोविज्ञानी अतीत और बचपन में जीना कहते रहे हैं.

हर कोई जानता है कि यह पकौड़ा एक परंपरागत भारतीय व्यंजन है जो बेसन व तेल के मिश्रण से तैयार किया जाता है. छोटे साइज का पकौड़ा, पकौड़ी कहलाता है. इसे आलू, प्याज, पनीर सहित गिलकी व पालक तक से बनाया जाता है. भारतीय इसे बड़े चाव से खाते हैं.

होली के दिनों में भांग के पकौड़े खाने का रिवाज है, जिन के सेवन से लोग 2014 के सम्मोहित दौर में पहुंच जाते हैं. भांग का पकौड़ा बड़ा असरकारी होता है. फागुन के मदमस्त माहौल में तो इस का असर हजारगुना तक बढ़ जाता है.

पकौड़े की एक खूबी यह है कि इसे एक बार खाओ तो मन नहीं भरता. लिहाजा, लोग ठूंसठूंस कर पकौड़े खाते हैं और दूसरे दिन स्वच्छ भारत अभियान पर पलीता लगाते नजर आते हैं. आयुर्वेदिक चूर्णों की बिक्री में पकौड़ों के सेवन का बड़ा योगदान है.

देश के बेरोजगार होते नौजवानों की चिंता का हल प्रधानमंत्रीजी को यों ही पकौड़े में नहीं दिख गया कि उन्होंने युवाओं को पकौड़ा बेचने का मशवरा दे डाला. पकौड़ा बेचने की सलाह पर व्यापक और देशव्यापक प्रतिक्रियाएं हुईं और इतनी हुईं कि अगर पकौड़े में चेतना होती तो वह घबरा कर खुदकुशी कर लेता. देश की सारी समस्याएं पकौड़े में सिमट कर रह गईं. जनता ने अभी राफेल डील के बाबत मुंह खोला ही था कि उस में पकौड़े ठूंस दिए गए.

जो राजनीति कल तक चायमय थी, वह पकौड़ामय हो गई. पकौड़े पर शोध होने लगे लेकिन इधर युवाओं को यह मशवरा नागवार गुजरा कि हम डिगरी ले कर पकौड़ा बेचने जैसा क्षुद्र उद्यम क्यों करें, यह तो शर्म की बात है. इस पर भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने बिदकते युवाओं को समझाया कि पकौड़े बेचना कोई शर्म की बात नहीं. वे नहीं बता पाए कि यह फख्र की बात कैसे है. चूंकि पार्टी के मुखिया ने कहा था, इसलिए इसे बाद में तरहतरह से जगहजगह कई भाजपाई दरबारियों ने दोहराया कि पकौड़ा बेचना शर्म या हर्ज की बात नहीं.

हम ऐसा कुछ नहीं कर पा रहे हैं जिस से नौकरियां और रोजगार के मौके पैदा हों, यह बात शीर्ष नेताद्वय ने बड़े फागुनी अंदाज से कही थी कि अगर नौकरीरोजगार नहीं मिल रहे तो पकौड़े बेचो. यह इन की गलती नहीं थी, बल्कि मौसम की थी, होली के महीनाभर पहले से ही मानवदिल हंसीमजाक के लिए मचलने जो लगता है.

राजनीति का एक अलिखित सिद्धांत है कि जब सत्तापक्ष हाथ पर हाथ धरे बैठा रहता है तब विपक्ष सुस्त पड़ जाता है. इधर मोदी और शाह ने पकौड़ा उछाला, तो विपक्ष ने उसे लपक कर पकड़ लिया. तरहतरह की दिलचस्प बयानबाजियां हुईं. जगहजगह सार्वजनिक रूप से पकौड़े तल कर विरोध जताया गया. पकौड़ामय हो चले देश को एक काम मिल गया. सोशल मीडिया के सूरमा पोर्न साइट्स और धर्म को भूलभाल कर पकौड़े को ले कर पोस्ट डालने लगे. पकौड़े ने इतनी प्रसिद्धि अपने उद्भव के बाद कभी हासिल नहीं की थी जितनी साल 2018 के फरवरी महीने में की.

इन महावीरों ने साल 2018-19 के बजट को पकौड़ा बजट घोषित कर दिया. बुद्धिजीवी और विद्वान भी पकौड़ाचिंतन में व्यस्त हो गए. कइयों ने तो पकौड़े पर सब्सिडी की मांग कर डाली और कुछ लोग पकौड़े को भी आधार से लिंक करने की बात करने लगे. एक पोस्ट में तो पकौडे़ बनाने का राष्ट्रीय व्यावसायिक चित्रण यह बताते किया गया कि पकौड़ा बेचने का आइडिया मोदी ने दिया, इस के लिए गैस रिलायंस वाला अंबानी देगा, फौर्च्यून का तेल अडानी देगा और रामदेव पंतजलि का बेसन मुहैया कराएगा.

कुछ अर्थशास्त्रियों ने भी अपना ज्ञान बघारा कि जब सभी लोग पकौड़े बेचने लगेंगे तो उन्हें खरीदेगा कौन और क्या पकौड़े के स्टौल (हकीकत में ठेला या खोमचा) लगाने के लिए सरकार कर्ज देगी. पकौड़ा व्यवसाय को ले कर लोग आशान्वित भी हैं कि मुमकिन है ज्यादा पकौड़े बेचने वाले को सरकार पद्मश्री दे.

धर्म के जानकारों ने धर्मग्रंथ छान मारे पर किसी वेदपुराण, संहिता या उपनिषद में पकौडे़ का जिक्र नहीं मिला. फिर भी, उन्होंने मान लिया कि पकौड़ा सनातनी व्यंजन है. इधर, पूछा यह भी जा रहा है कि पकौड़े न खाने वालों को कहीं राष्ट्रद्रोही तो करार नहीं दिया जाएगा और क्या भगवा रंग के पकौड़े बनाने, खाने व बेचने वालों को देशभक्त का खिताब दिया जाएगा?

कुछ अदूरदर्शी लोगों की राय यह है कि जल्द ही बाबा रामदेव पंतजलि  बेसनी पकौड़ा लौंच कर सकते हैं क्योंकि वे मैदा के घोर दुश्मन हैं. नई पीढ़ी पिज्जा, चाउमीन और नूडल्स खा कर अपनी सेहत खराब कर रही है, उस से बचने का एकमात्र तरीका पकौड़ा है जो आखिरकार एक आयुर्वेदिक पकवान है. इस का इकलौता आधार यह है कि इसे पीढि़यों से देश खा रहा है और अफ्रीका या यूरोप ने अभी पकौड़े पर अपनी दावेदारी नहीं जताई है.

हैरानी नहीं होनी चाहिए अगर जल्द ही कोई प्रदेश पकौड़े की बढ़ती लोकप्रियता देख अपनी दावेदारी इस पर ठोक दे. रसगुल्ला ओडिशा की डिश है या पश्चिम बंगाल की, यह तय करने में अदालतों को पसीने आ गए थे.

हरहर पकौड़ा, घरघर पकौड़ा के लगते नारों के बीच अच्छी बात यह है कि पकौड़ा एक धर्मनिरपेक्ष और जातिवाद से मुक्त व्यंजन है. पकौड़े का वंशवाद से भी कोई संबंध नहीं है. मायावती जैसी नेत्री यह आरोप नहीं लगा सकतीं कि चूंकि पकौड़ा मनुवाद का प्रतीक है, इसलिए इसे प्रोत्साहन दिया जा रहा है. वामपंथी भी पकौड़े पर खामोश रहने को विवश हैं, क्योंकि इस का सामंतवाद, जमींदारी  या शोषण से कोई संबंध अभी तक सामने नहीं आया है. पकौड़ा दिल्ली के छोलेकुलचे और भठूरों के खिलाफ भी कोई साजिश नहीं है.

पकौड़े की राजनीति के अपने अलग नजरिए हैं. लोग जिस दिलचस्पी से पकौड़ापकौड़ा खेल रहे हैं, मुमकिन है इसे प्रसाद के रूप में देवीदेवताओं को चढ़ाया जाने लगे. कुछ शिक्षाविदों की राय है कि पकौड़ा निर्माण और विपणन को स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल किया जाना चाहिए, जिस से देश का भविष्य स्वावलंबी बने. देश के बच्चे अब डाक्टर, इंजीनियर या साइंटिस्ट बनने के सपने नहीं देखते, बल्कि वे पकौड़ाबाज बनने की ख्वाहिश पालने लगे हैं. ऐसे में देश का भविष्य वाकई उज्ज्वल है, यही कहा जाएगा.

नरेंद्र मोदी वाकई अतिमानव हैं जो देश का मनोरंजन करने के लिए नईनई तरकीब पेश करते रहते हैं. उन के सामने कर्नाटक, त्रिपुरा, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान विधानसभा के चुनावों की चुनौती है. उन्हें देश को विश्वगुरु भी बनाना है. उन के चिंतन में बाधा डाल  रहे लोग पकौड़ाचिंतन में व्यस्त हो गए हैं, यह किसी उपलब्धि से कम बात नहीं.

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नेताओं के बेसिरपैर के बोल

धर्म की खातिर किस तरह झूठ बोला जा सकता है इस का एक चौंकाने वाला उदाहरण पेश किया विज्ञान एवं तकनीकी मंत्री डा. हर्षवर्धन ने. ये जनाब महान वैज्ञानिक व भौतिकी विद्वान स्टीफन हाकिंग को श्रद्धांजलि देते समय कहने लगे कि इन वैज्ञानिक ने भी माना था कि वेदों का ज्ञान उन के और अल्बर्ट आइंस्टीइन के ज्ञान से कहीं अधिक है.

जब मंत्री से पूछा गया कि इस का संदर्भ क्या है तो उन्होंने बड़ी ही ढिठाई से उत्तर दिया कि ढूंढ़ लो खुद. ऐसा ही हमारे पंडेपुजारी रोज करते हैं. अब औरतों के टीका लगाने को ही ले लीजिए. यह धार्मिक रिवाज बेसिरपैर का है पर इस की वैज्ञानिकता सिद्ध करने के लिए कह डाला गया है कि जहां यह टीका लगता है वहां नसों का केंद्र है. इस से ऊर्जा नष्ट नहीं होती है. उस से खून का दौरा मुंह की पेशियों तक चालू रहता है. यह किस तरह के शोध से पता चला, यह बताने की जरूरत तो है ही नहीं.

नदियों के ऊपर से गुजरते हुए सैकड़ों लोग बसों, गाडि़यों और खिड़कियां खुली हों तो ट्रेनों से पानी में पैसे फेंकते हैं. वैज्ञानिकता सिद्ध करने के लिए मनगढ़ंत कह दिया गया है कि  इस से कौपर को पानी में डाला जाता है ताकि पानी के विभिन्न गुणों का संतुलन बना रहे.

मंदिर जाने के लिए भी वैज्ञानिकता की खोज कर ली गई, जो शायद नासा के वैज्ञानिकों को भी शर्मसार कर दे. कह डाला गया है कि जहां मंदिर में मूर्ति स्थापित होती है, वहां गोपुरम होता है जो पृथ्वी की चुंबकीय शक्ति को एकत्रित कर लेता है और मूर्ति के माध्यम से मंदिर में जाने वालों को ऊर्जा देता है.

इस प्रकार के बहुत से झूठ रोज गढ़े जाते हैं ताकि इस वैज्ञानिक युग में भी धार्मिक पागलपन को बनाए रखा जा सके. ये मंत्री ही ऐसे नहीं हैं, जो इस तरह की मूर्खतापूर्ण बातें कहते हैं, हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक कह चुके हैं कि गणेश तो प्लास्टिक व ट्रांसप्लांट सर्जरी का कमाल है, जो हमारे पुराणों में पहले से ही मौजूद है.

यह जानने के लिए कोई तैयार नहीं कि इस सब ज्ञानविज्ञान को हम पहले से ही जानते हैं तो आज दुनिया के सब से पीछे वाले देशों में क्यों हैं? हमारी अर्थव्यवस्था बड़ी है पर अपनी अधिक भूमि और अधिक जनसंख्या के कारण वरना करोड़ों लोग यहां आज भी जानवरों की तरह रहने को मजबूर हैं.

असल में इस प्रकार का धार्मिक दुष्प्रचार औरतों पर भारी पड़ता है, जो इन अंधविश्वासों को मान कर शारीरिक, मानसिक गुलामी झेलने को मजबूर कर दी जाती हैं. कभी उन्हें भूखा रहना पड़ता है, कभी नंगे पांव चलना पड़ता है, कभी रात भर गला फाड़ कर चिल्लाना पड़ता है, तो कभी घंटों बैठ कर ध्यान लगाने या प्रवचन सुनने के नाम पर समय बरबाद करना पड़ता है. उन्हें डा. हर्षवर्धन जैसे लोगों के बेसिरपैर के बोल सुनने पड़ते हैं.

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एक्टर के साथ किस करूं या न्यूड सीन दूं मेरे पति को आपत्ति नहीं: सुरवीन चावला

सुरवीन चावला अपने बोल्ड अंदाज के कारण अक्सर सुर्खियों में रहती हैं. ‘हेट स्टोरी-2’ अभिनेत्री शादीशुदा होने का खुलासा कर सबको चौंका चुकी हैं. हाल ही में दिए इंटरव्यू में सुरवीन ने पहली बार अपनी मैरिड लाइफ पर खुलकर बात की. सुरवीन का कहना है कि शादी के बाद कुछ नहीं बदला है, बल्कि उनकी जिदंगी और बेहतर हो गई है. सुरवीन का कहना है कि वह अपने को-एक्टर को किस कर सकती हैं, कैमरे के सामने न्यूड हो सकती हैं, मेरे पति कुछ नहीं कहेंगे.

एक्ट्रेस सुरवीन चावला ने जनवरी में इस बात से पर्दा हटाया था कि साल 2015 में ही इटली में अपने लौन्ग टाइम बौयफ्रेंड अक्षय ठक्कर के साथ शादी कर चुकी हैं. हाल ही में दिए इंटरव्यू में सुरवीन ने मैरिड लाइफ के बारे में बात करते हुए कहा, ”शादी के बाद उनकी जिंदगी में कोई परिवर्तन नहीं आया है, बल्कि उनकी लाइफ और बेहतर हो गई है.

मुझे नहीं पता कि शादी की खबर से लोग इतने हैरान क्यों हुए?” सुरवीन ने आगे कहा, ”अब वो दिन चले गए हैं जब अभिनेत्रियां अपने प्रोफेशनल लाइफ के लक्ष्य को पूरा कर ही शादी करती थीं. बहुत सारी अभिनेत्रियों ने शादी के बाद अच्छा मुकाम हासिल किया है.”

सुरवीन ने कहा, मैं करियर में अच्छा कर रही थी, मैं एक महत्वाकांक्षी लड़की हूं, इसका मतलब यह नहीं है कि मेरा शादी करने का कोई प्लान नहीं है. जब किसी लड़के के साथ मैं सहज महसूस करती हूं तो मैं शादी के लिए इंतजार क्यों करुं? मेरे काम के प्रति मेरे पति काफी सपोर्टिंव हैं.

शादी की बात अगर है तो मैं कहूंगी कि सही समय पर शादी कर लेनी चाहिए. सुरवीन ने आगे कहा, वह अपने पति के साथ खुश हैं. मैं अपने को-एक्टर को किस कर सकती हूं और कैमरे के सामने न्यूड हो सकती हूं, वह सब कुछ कर सकती हूं जो स्क्रिप्ट की डिमांड होगी, मेरे पति कुछ भी नहीं कहेंगे.

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जागो ठेकेदार लगी है कतार

शनिवार की एक रात. रेलवे प्लेटफार्म पर गहमागहमी का माहौल. सैकड़ों लोग ट्रेनों से उतर रहे थे या फिर ट्रेन पकड़ने का इंतजार कर रहे थे. पर एक जगह नजारा कुछ और ही था. वहां लोग कतार लगाए खड़े थे. यह उन के लिए शनि की साढ़ेसाती का प्रकोप था या और कुछ, पता नहीं.

जिस काम के लिए वे सब कतार में खड़े थे, वह ऐसा कुदरती काम है जिसे नित्यक्रिया कहते हैं. मतलब, वे मुंबई सैंट्रल टर्मिनल पर बने एक शौचालय के बाहर खड़े थे.

वैसे, ‘आप कतार में हैं’ की आवाज तभी अच्छी लगती है जब आप सामान्य हालात में होते हैं या फिर कोई मीठी आवाज की औरत ऐसा बोलती है. शौचालय की कतार में खड़े हो कर किसी को यह सुनना अच्छा नहीं लगेगा.

हुआ यों कि शौचालय के मुलाजिम और ठेकेदार रेलवे की चादरें ‘चादर बिछाओ बलमा…’ गीत गाते हुए रेलवे के कंबल ओढ़ कर निद्रा देवी के आगोश में चले गए. इधर शौच के लिए जाने वाले लोग कतार में लगे अपने आगे के लोगों को गिनते रहे और अंकगणित के सवाल हल करते रहे कि अगर एक आदमी को शौच करने में तकरीबन 5 मिनट लगते हैं तो उन के आगे खड़े 7 लोगों को कितना समय लगेगा और उन के लिए वह सुनहरा वक्त कब आएगा जब वे खुद को एक बहुत बड़े तनाव से मुक्त कर सकेंगे.

वे बारबार अपनी जेब में रखा 2 का सिक्का छू कर तसल्ली कर रहे थे कि ऐन वक्त पर छुट्टे न होने के चलते उन्हें फिर से कतार में न लगना पड़े.

चाहे सदी के महानायक कहते रहें कि ‘अब इंडिया शौच करेगा तो दरवाजा बंद कर के’, पर शौचालय के अंदर जा कर कोई दरवाजा बंद कर के ही सो जाए तो इंडिया शौच कैसे करेगा? हांय? ऐसे में तो शौचालय तो शयनालय यानी सोने की जगह बन जाएगा.

बेचारे शौच के मारे मुसाफिरों का ‘तेरे द्वार खड़ा इक जोगी…’ गातेगाते गला बैठ गया. सिक्के को दबातेदबाते हाथ में छाले पड़ गए, पर दरवाजा अली बाबा के खजाने के दरवाजे की तरह खुलने का नाम ही नहीं ले रहा था.

उस दरवाजे को खोलने का ‘खुल जा सिमसिम’ टाइप कोडवर्ड क्या था, किसी को नहीं पता था. रेलवे के अफसरों से शिकायत करने पर शौच जाने वालों को कभी इस अफसर के पास तो कभी उस अफसर के पास भेजा जाता रहा.

अब सोचिए कि उन भुक्तभोगियों की क्या हालत हो रही होगी. ऐसे विकट हालात में 2-4 कदम चलना भी मुश्किल होता है और उन बेचारों को दरदर की ठोकरें खानी पड़ रही थीं.

अब भैया, कुछ इमर्जैंसी वाले काम ऐसे होते हैं जिन की जरूरत कभी भी पड़ सकती है और हलका होना भी उन में से एक है.

कहा भी गया है कि ग्राहक, मौत और शौच कभी भी आ सकता है. वैसे कहा सिर्फ ग्राहक और मौत के लिए गया है, पर अभी भी देश में विकास पर बहुत ज्यादा ध्यान दिया जा रहा है, इसलिए शौच को मौत के साथ जोड़ कर कहावत का विकास किया गया है.

जब गाड़ी 24 घंटे चलाते हो, मुसाफिर 24 घंटे रेलवे स्टेशन पर आजा सकते हैं, तो शौचालय को कैसे बंद कर सकते हो?

यह कहां का नियम है कि रात के 12 बजे से सुबह के 5 बजे तक शौच नहीं कर सकते? अब लगता है कि शौच घोटाला भी कुछ दिनों में सामने आएगा. शौचालय के ठेकेदार लोग, आप अपनी रोजीरोटी पर खुद क्यों रोक लगा रहे हो?

जिस तरह ‘पैसे लो जूते दो’ की रट दुलहन के देवर लगाते हैं, उसी तरह एक शौच जाने वाले की यही गुजारिश है, ‘वाईफाई ले लो, पर शौचालय दे दो…’

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उत्तर प्रदेश में सामूहिक विवाह घोटाला

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सत्ता के सिंहासन पर बैठने के बाद अक्टूबर, 2017 को प्रदेश की गरीब बेटियों के सामूहिक विवाह की योजना का ऐलान किया था. इस योजना के मुताबिक गांवदेहात के अर्जी देने वालों की 46,880 रुपए और शहरी इलाके से अर्जी देने वालों की 56,460 रुपए सालाना आमदनी होने का प्रावधान रखा गया था.

उत्तर प्रदेश सरकार की इस योजना के लिए 250 करोड़ रुपए के बजट को मंजूरी दी गई थी और 10 हजार कुंआरे जोड़ों की शादी कराने का टारगेट रखा गया था.

फरवरी, 2018 तक उत्तर प्रदेश के 55 जिलों में 5,937 जोड़ों की शादी करा कर जिलों के कलक्टरों ने अपनी पीठ तो थपथपा ली लेकिन मुख्यमंत्री की नजर में अच्छा बनने की खुशी ज्यादा लंबी नहीं थी. जल्दी ही यह बात सामने आ गई कि इस सामूहिक विवाह योजना में घोटाला किया गया है.

जैसा कि हमेशा ही होता है, चाहे सरकार की कोई भी कल्याणकारी योजना क्यों न हो, नौकरशाही को अपनी जेब भरने का मौका मिल ही जाता है. इसी तरह उत्तर प्रदेश में गरीब बेटियों की सामूहिक विवाह योजना में सरकारी अफसरों के लालच और लापरवाही ने पलीता लगा दिया.

फरवरी, 2018 से उत्तर प्रदेश के कई जिलों में ऐसी शादियां शुरू होनी थीं. जिलों में अर्जियां मांगी जाने लगीं. जो योजना बीडीओ व नगरपालिका अफसरों की देखरेख में पूरी की जानी चाहिए थी, वह ग्राम प्रधानों और दलालों के हत्थे चढ़ गई.

18 फरवरी, 2018 को शामली के एक बैंक्वेट हाल में 92 जोड़ों के विवाह का आयोजन था. इन में 42 जोड़े हिंदू और 50 जोड़े मुसलिम थे.

मुख्यमंत्री की इस योजना के मुताबिक प्रति विवाह पर 35 हजार रुपए सरकारी खर्चे का प्रावधान है. इस में दुलहन के खाते में 20 हजार रुपए जाने थे और विवाह में कपड़े, गहने और बरतन दिए जाने थे.

इस सामूहिक विवाह आयोजन में जिले के सभी बड़े अफसर शामिल हुए थे और मुख्य अतिथि के रूप में राज्यमंत्री सुरेश राणा भी आए थे.

सबकुछ ठीकठीक ही हो जाता, अगर टैलीविजन चैनल वाले और अखबार रिपोर्टर शादी कराने आए जोड़ों से बात न करते.

जब मीडिया वालों को पता चला कि इन में से तकरीबन 1 दर्जन जोड़े ऐसे हैं जो पहले से ही शादीशुदा हैं, तो वहां हड़कंप मच गया. एक जोड़े की शादी 6 फरवरी को हो गई थी तो दूसरे जोड़े की 8 दिसंबर को. एक जोड़े ने तो 2 दिन पहले ही गृहस्थ जीवन में कदम रखा था.

जब ऐसे जोड़ों से बात की गई तो पता चला कि वे सरकार द्वारा दी जाने वाली माली इमदाद पाने के लिए दोबारा शादी करने को तैयार हो गए थे.

जब बात कलक्टर तक पहुंची तो उन्होंने यह कह कर पल्ला झाड़ लिया कि उन्हें इस बारे में कुछ नहीं मालूम. वे मामले की जांच कराएंगे.

24 फरवरी, 2018 को ग्रेटर नोएडा के वाईएमसीए क्लब में 66 जोड़ों के विवाह का आयोजन किया गया था. वहां मीडिया कुछ ज्यादा ही सतर्क था. विवाह के पंडाल में अजीब सी सुगबुगाहट थी.

पता चला कि गांव नंगला चीती, थाना दनकौर के नरेंद्र सिंह ने पहले से ही अफसरों को शिकायतपत्र दिया था कि इस मामले में प्रधानपति धर्मेंद्र सिंह ने फर्जीवाड़ा कर के कई अयोग्य जोड़ों का रजिस्ट्रेशन कर दिया था.

नरेंद्र सिंह की शिकायत रंग लाई. पता चला कि इन में से कई जोड़ों के तो 3-3, 4-4 बच्चे भी हैं. यही नहीं, खुद ग्राम प्रधान बबीता ने अपने पति धर्मेंद्र से दोबारा शादी रचा ली थी. जांच के आदेश के बाद पता चला कि 11 जोड़ों की शादी पहले हो चुकी थी.

गांव प्रधान रविंद्र सिंह और 2 लोगों को तुरंत गिरफ्तार कर लिया गया. समाज कल्याण अधिकारी आनंद कुमार ने दनकौर थाने में नंगला चीती की ग्राम प्रधान बबीता और उस के पति धर्मेंद्र सिंह समेत 9 जोड़ों के खिलाफ धारा 420, 409 और 34 के तहत मामला दर्ज करा दिया.

जब सीडीओ अनिल कुमार सिंह और समाज कल्याण अधिकारी आनंद कुमार ने गांव नंगला चीती जा कर पूछताछ की तो पता चला कि 3 जोड़ों ने तो अपने भाईबहनों के नाम से रजिस्ट्रेशन कराया था और शादीशुदा होने के बावजूद भाईबहनों के नाम पर दोबारा शादी रचाई और सरकारी खजाने की लूट में हिस्सेदार बने.

नंगला चीती गांव की 2 सगी बहनों निशि और बबीता की शादी 12 मार्च को तय थी लेकिन उन्होंने अपने भाई रविंद्र और विनीत के साथ अपना नाम रजिस्टर करा दिया था.

गांव नंगला चीती के सोनी पत्नी रंजीत, सोनिया पत्नी बंटी, पूनम पत्नी हरिओम, फूला पत्नी पवन, पिंकी पत्नी मोहित, लक्ष्मी पत्नी सोविंद्र और सविता पत्नी नवीन, बबीता पत्नी रविंद्र और नीशू पत्नी विनीत ने पैसे के लिए दोबारा फर्जी विवाह कर न केवल सरकारी योजना हड़पने की योजना बनाई बल्कि विवाह जैसे पवित्र संस्कार का भी मजाक उड़ाया.

औरैया और इटावा में तो अफसरों के पास लूट का यह अच्छा मौका था. उन्होंने सामान की खरीद टैंडर से नहीं, बल्कि जन सेवा शादी ग्रामोद्योग के जरीए की. दुलहन को दी गई चांदी की पायल और बिछुओं पर से चांदी के पानी का रंग क्या उतरा अफसरों की सारी पोल खुल गई.

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सत्ता संभालते हो पंडिताई ऐलान किया था कि अपराधियों और भ्रष्टाचारियों के लिए उन के राज्य में कोई जगह नहीं है. पिछले दिनों ऐनकाउंटर योजना में बड़ेबड़े गुंडों को बिना अपराध साबित हुए मरवा दिया गया. पर अभी तक 50 साल से ऊपर के मुलाजिमों के कर्मों की स्क्रीनिंग रफ्तार नहीं पकड़ पाई है और किसी भ्रष्ट अफसर और मुलाजिम को जिले में सेवामुक्त करने का मामला भी सामने नहीं आया है इसलिए वे बेखौफ हो कर वही चाल चल रहे हैं जो पिछली सरकारों में चलते थे.

अभी प्रदेश के 22 जिले बाकी हैं, जहां सामूहिक विवाह का आयोजन होना है. इस फर्जीवाड़े से कमाने के मौकों का वहां के अफसर व सरपंच बेचैनी से इंतजार कर रहे हैं. उन्हें मालूम है कि सरकार जो चाहे नियम बना ले, लागू तो उन्हें ही करने हैं और वे कमाई कर ही लेंगे.

मजेदार बात है कि एक भी ब्राह्मण श्रेष्ठ ने 2-2 बार हो रही शादी की पोल नहीं खोली और शादी कराने से इनकार नहीं किया.

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मुझे मगरमच्छों में रहना आता है : मंजरी फडनिस

हिंदी फिल्म ‘रोक सको तो रोक लो’ से अपने कैरियर की शुरुआत करने वाली मंजरी फडनिस ने बंगला, तमिल, तेलुगु, मलयालम और मराठी फिल्मों में भी काम किया है. हालांकि उन की पहली फिल्म कुछ खास नहीं चली थी, पर फिल्म ‘जाने तू या जाने ना’ में इमरान खान की प्रेमिका के रूप में उन के काम की काफी तारीफ हुई थी और फिल्म भी हिट रही थी. इश्तिहारों के अलावा मंजरी फडनिस ने शौर्ट फिल्मों में भी काम किया है. मंजरी फडनिस अब फिल्म ‘बाबा ब्लैक शीप’ में भी दिखाई दीं. पेश हैं, उन से हुई बातचीत के खास अंश:

फिल्म ‘बाबा ब्लैक शीप’ में काम करने की क्या वजह रही?

इस फिल्म की कहानी मुझे दिलचस्प लगी थी इसलिए मैं ने हां कर दी.

आप को फिल्मों में आने की प्रेरणा कहां से मिली?

मेरा फिल्मों में आना इत्तेफाक नहीं था, न ही बचपन से सोचा था. मैं एक आर्मी अफसर की बेटी हूं और पहले 3 साल तक पिता की पोस्टिंग के साथ मुंबई में रह चुकी थी. उस दौरान मैं मुंबई को थोड़ाबहुत जान चुकी थी. बचपन से मुझे स्कूल के स्टेज पर ऐक्टिंग करना पसंद था, पर वही मेरे लिए सबकुछ होगा, मैं ने ऐसा कभी नहीं सोचा था, क्योंकि मेरे परिवार से कोई भी फिल्म इंडस्ट्री से नहीं था.

मैं पढ़ाई में अच्छी थी और मनोवैज्ञानिक बनना चाहती थी. 11वीं क्लास में पढ़ते समय मुझे लगा कि मैं फिल्म कलाकार बन सकती हूं. 12वीं क्लास के बाद मैं मुंबई आई और पोर्टफोलियो दिया. इस तरह मुझे पहली फिल्म के लिए काम मिला था.

फिल्मों में काम मिलने से पहले और काम मिलने के बाद इंडस्ट्री के बारे में आप की सोच में कितना बदलाव आया?

पहले जब मैं ने अपने मातापिता से कहा कि मैं फिल्मों में ऐक्टिंग करूंगी, तो वे हंसे. उन्हें लगा कि मैं मजाक कर रही हूं. उन्होंने सहयोग भी इस बात पर दिया कि थोड़े दिनों बाद मैं खुद ही इस सोच को बदल दूंगी, पर मुझे पता था कि मैं क्या कर रही हूं. हां, यह जरूर हुआ था कि जब मैं मुंबई आ रही थी, तो सभी रिश्तेदारों ने बहुत सी बातें की थीं, लेकिन मेरे मातापिता को मुझ पर विश्वास था. यहां सब लोग अच्छे मिले, जिन्होंने मुझे आगे बढ़ने में मदद की. गलत लोग हर जगह होते हैं और मुझे उन से निबटना बखूबी आता है.

क्या आप को कभी कास्टिंग काउच का सामना करना पड़ा?

हां, जरूर करना पड़ा, पर सीधेतौर पर नहीं. जैसे कि कुछ लोग कहते थे कि आप मुझे पसंद हो और मैं आप को और अच्छी तरह समझना चाहता हूं. यह सही है कि इंडस्ट्री में कोई आप को किसी काम को करने के लिए दबाव नहीं बना सकता. आप की मरजी से ही सब होता है. अगर मैं ने किसी को कुछ मना भी कर दिया हो तो वह काम नहीं मिलता. मैं ने बहुत सारे काम छोड़े भी हैं, पर उस से मुझे कुछ फर्क नहीं पड़ता. मुझे मगरमच्छों के बीच में रहना आता है.

आप की जिंदगी की टर्निंग पौइंट फिल्म कौन सी है?

मेरी जिंदगी की टर्निंग पौइंट फिल्म ‘जाने तू या जाने ना’ थी. आज से 10 साल पहले मैं शूटिंग के लिए बैंकौक में थी और फिल्म रिलीज के एक हफ्ते बाद जब मैं मुंबई आई तो सब लोग मुझे देख कर इतने खुश हुए कि मैं बयां नहीं कर सकती.

आप को परिवार का कितना सहयोग मिला?

मैं अपने मातापिता की एकलौती औलाद हूं, लेकिन बहुत सालों से अकेली ही मुंबई में रह रही हूं. वे पुणे में रहते हैं. उन का मेरे लिए बहुत सहयोग रहा है.

आप ने इस मुकाम तक पहुंचने में कितनी जद्दोजेहद की है?

जद्दोजेहद तो चलती ही रहती है. उस का रूप बदलता है. नए होने पर पहले काम का मिलना जरूरी होता है. पहली फिल्म मुझे मुंबई शिफ्ट होने से पहले ही मिल गई थी. फिल्म नहीं चली तो जद्दोजेहद बदली और दूसरी फिल्म के लिए चुनौती आई. फिल्म ‘जाने तू या जाने ना’ मिली और फिर रास्ता आसान हुआ.

क्या कोई ड्रीम प्रोजैक्ट है?

मुझे बायोपिक नूर इनायत खान करने की इच्छा है. राजकुमार हिरानी की फिल्म करने की भी इच्छा है. मैं रोमांटिक और कौमेडी फिल्में करना पसंद करती हूं.

आप कितनी फैशनेबल हैं? क्या आप खानेपीने की शौकीन भी हैं?

मुझे फैशन ज्यादा पसंद नहीं, पर मैं मिठाई खाना बहुत पसंद करती हूं. मेरी मम्मी रुचि फडनिस तरहतरह के व्यंजन बनाना पसंद करती हैं.

आप को सुपर पावर मिले तो क्या बदलना चाहेंगी?

मैं नेताओं की सोच को जरूर बदलना चाहूंगी और सारे रेपिस्टों को मार देना चाहूंगी.

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छोटे दुकानदारों पर सरकार की गाज

सरकार देशी व विदेशी बड़ीबड़ी दुकानों को खोलने की खुली छूट ही नहीं दे रही, उन में विदेशी पूंजी लगाने की दावत भी दे रही है. इन बड़ी दुकानों, जिन्हें मौल कहा जाता है, को भारत एक बड़ा सुलभ बाजार दिख रहा है जहां अरबों का सामान बेचा जा सकता है क्योंकि यहां की जनसंख्या बहुत ज्यादा है और सुदूर गांवों तक थोड़ाबहुत पैसा आने लगा है.

ये दुकानें लगने को अच्छी लगती हैं. एक ही जगह सैकड़ों चीजें मिल जाएंगी. हर चीज को दिखा कर रखा जा रहा है. ज्यादातर माल नया. सही पैकिंग. दाम फिक्स. कोई मोलभाव नहीं. कभीकभार दुकान की अपनी ही स्कीम में किसी बची चीज पर बेहद कम दामों की छूट. दुकान में ही खानेपीने की जगह. मौज ही मौज.

पर ये मौल, मल्टी ब्रांड स्टोर, सुपर बाजार या किसी और नाम से इन्हें जानिए, देश की ज्यादातर जनता के लिए जख्म पर नमक छिड़कने का काम करेंगे. देश की अर्थव्यवस्था ऐसी है कि यहां ऊपर से नीचे तक उधारी जम कर चलती है. यहां बैंक हैं उधार देने के लिए पर अब तो साफ हो गया है कि बैंक सिर्फ बेईमान भगौड़े धन्ना सेठों को कर्ज देते हैं जिन में से कुछ भाग भी जाते हैं.

छोटे दुकानदार अपनी दुकानदारी उधार के बल पर ही चलाते हैं पर वे गरीब किसानमजदूर को भी उधार देते हैं. ये मल्टी ब्रांड मौल बैंकों से अरबों रुपए उधार लेंगे पर किसी को उधार देंगे नहीं. ये अपने सप्लायर्स से उधार माल खरीदेंगे पर ग्राहक को उधार पर नहीं देंगे. ये चूंकि पूरे बाजार पर कब्जा कर लेंगे, सप्लायर्स जो छोटे दुकानदारों को उधार पर सामान देते रहते हैं, उधारी बंद कर देंगे.

छोटे दुकानदार जो भारतीय जनता पार्टी की आंख मूंद कर पैरवी करते हैं, समझ ही नहीं रहे हैं कि पार्टी की मंशा तो इन्हें कंगाल बनाना है और इसीलिए विदेशी कंपनियों को लाया जा रहा है.

सरकार ने नोटबंदी इन्हीं व्यापारियों की कमर तोड़ने के लिए की थी. मकसद था कि छोटा व्यापार मर जाए ताकि बड़े वालमार्ट जैसे स्टोर खुल जाएं. विदेशी न हों तो रिलायंस, बिग बाजार, विशाल जैसे ही चलेंगे पर ये सब न छोटे दुकानदारों को माल उधार देंगे, न ग्राहक को. छोटा व्यापारी मुहताज रहे, हरदम पूजापाठ में लगा रहे कि उस का कल सुधर जाए.

उधारी पर व्यापार चलाना गलत है पर लगभग हर देश में व्यापार बैंकों से लिए गए कर्ज पर ही चलता है. भारत में भी ऐसा ही है पर सरकार नीरव मोदियों और विजय माल्याओं जैसों को कर्ज दिलवाना चाहती है खेत राम या गेंदा मल को नहीं.

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