जागो ठेकेदार लगी है कतार

शनिवार की एक रात. रेलवे प्लेटफार्म पर गहमागहमी का माहौल. सैकड़ों लोग ट्रेनों से उतर रहे थे या फिर ट्रेन पकड़ने का इंतजार कर रहे थे. पर एक जगह नजारा कुछ और ही था. वहां लोग कतार लगाए खड़े थे. यह उन के लिए शनि की साढ़ेसाती का प्रकोप था या और कुछ, पता नहीं.

जिस काम के लिए वे सब कतार में खड़े थे, वह ऐसा कुदरती काम है जिसे नित्यक्रिया कहते हैं. मतलब, वे मुंबई सैंट्रल टर्मिनल पर बने एक शौचालय के बाहर खड़े थे.

वैसे, ‘आप कतार में हैं’ की आवाज तभी अच्छी लगती है जब आप सामान्य हालात में होते हैं या फिर कोई मीठी आवाज की औरत ऐसा बोलती है. शौचालय की कतार में खड़े हो कर किसी को यह सुनना अच्छा नहीं लगेगा.

हुआ यों कि शौचालय के मुलाजिम और ठेकेदार रेलवे की चादरें ‘चादर बिछाओ बलमा…’ गीत गाते हुए रेलवे के कंबल ओढ़ कर निद्रा देवी के आगोश में चले गए. इधर शौच के लिए जाने वाले लोग कतार में लगे अपने आगे के लोगों को गिनते रहे और अंकगणित के सवाल हल करते रहे कि अगर एक आदमी को शौच करने में तकरीबन 5 मिनट लगते हैं तो उन के आगे खड़े 7 लोगों को कितना समय लगेगा और उन के लिए वह सुनहरा वक्त कब आएगा जब वे खुद को एक बहुत बड़े तनाव से मुक्त कर सकेंगे.

वे बारबार अपनी जेब में रखा 2 का सिक्का छू कर तसल्ली कर रहे थे कि ऐन वक्त पर छुट्टे न होने के चलते उन्हें फिर से कतार में न लगना पड़े.

चाहे सदी के महानायक कहते रहें कि ‘अब इंडिया शौच करेगा तो दरवाजा बंद कर के’, पर शौचालय के अंदर जा कर कोई दरवाजा बंद कर के ही सो जाए तो इंडिया शौच कैसे करेगा? हांय? ऐसे में तो शौचालय तो शयनालय यानी सोने की जगह बन जाएगा.

बेचारे शौच के मारे मुसाफिरों का ‘तेरे द्वार खड़ा इक जोगी…’ गातेगाते गला बैठ गया. सिक्के को दबातेदबाते हाथ में छाले पड़ गए, पर दरवाजा अली बाबा के खजाने के दरवाजे की तरह खुलने का नाम ही नहीं ले रहा था.

उस दरवाजे को खोलने का ‘खुल जा सिमसिम’ टाइप कोडवर्ड क्या था, किसी को नहीं पता था. रेलवे के अफसरों से शिकायत करने पर शौच जाने वालों को कभी इस अफसर के पास तो कभी उस अफसर के पास भेजा जाता रहा.

अब सोचिए कि उन भुक्तभोगियों की क्या हालत हो रही होगी. ऐसे विकट हालात में 2-4 कदम चलना भी मुश्किल होता है और उन बेचारों को दरदर की ठोकरें खानी पड़ रही थीं.

अब भैया, कुछ इमर्जैंसी वाले काम ऐसे होते हैं जिन की जरूरत कभी भी पड़ सकती है और हलका होना भी उन में से एक है.

कहा भी गया है कि ग्राहक, मौत और शौच कभी भी आ सकता है. वैसे कहा सिर्फ ग्राहक और मौत के लिए गया है, पर अभी भी देश में विकास पर बहुत ज्यादा ध्यान दिया जा रहा है, इसलिए शौच को मौत के साथ जोड़ कर कहावत का विकास किया गया है.

जब गाड़ी 24 घंटे चलाते हो, मुसाफिर 24 घंटे रेलवे स्टेशन पर आजा सकते हैं, तो शौचालय को कैसे बंद कर सकते हो?

यह कहां का नियम है कि रात के 12 बजे से सुबह के 5 बजे तक शौच नहीं कर सकते? अब लगता है कि शौच घोटाला भी कुछ दिनों में सामने आएगा. शौचालय के ठेकेदार लोग, आप अपनी रोजीरोटी पर खुद क्यों रोक लगा रहे हो?

जिस तरह ‘पैसे लो जूते दो’ की रट दुलहन के देवर लगाते हैं, उसी तरह एक शौच जाने वाले की यही गुजारिश है, ‘वाईफाई ले लो, पर शौचालय दे दो…’

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उत्तर प्रदेश में सामूहिक विवाह घोटाला

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सत्ता के सिंहासन पर बैठने के बाद अक्टूबर, 2017 को प्रदेश की गरीब बेटियों के सामूहिक विवाह की योजना का ऐलान किया था. इस योजना के मुताबिक गांवदेहात के अर्जी देने वालों की 46,880 रुपए और शहरी इलाके से अर्जी देने वालों की 56,460 रुपए सालाना आमदनी होने का प्रावधान रखा गया था.

उत्तर प्रदेश सरकार की इस योजना के लिए 250 करोड़ रुपए के बजट को मंजूरी दी गई थी और 10 हजार कुंआरे जोड़ों की शादी कराने का टारगेट रखा गया था.

फरवरी, 2018 तक उत्तर प्रदेश के 55 जिलों में 5,937 जोड़ों की शादी करा कर जिलों के कलक्टरों ने अपनी पीठ तो थपथपा ली लेकिन मुख्यमंत्री की नजर में अच्छा बनने की खुशी ज्यादा लंबी नहीं थी. जल्दी ही यह बात सामने आ गई कि इस सामूहिक विवाह योजना में घोटाला किया गया है.

जैसा कि हमेशा ही होता है, चाहे सरकार की कोई भी कल्याणकारी योजना क्यों न हो, नौकरशाही को अपनी जेब भरने का मौका मिल ही जाता है. इसी तरह उत्तर प्रदेश में गरीब बेटियों की सामूहिक विवाह योजना में सरकारी अफसरों के लालच और लापरवाही ने पलीता लगा दिया.

फरवरी, 2018 से उत्तर प्रदेश के कई जिलों में ऐसी शादियां शुरू होनी थीं. जिलों में अर्जियां मांगी जाने लगीं. जो योजना बीडीओ व नगरपालिका अफसरों की देखरेख में पूरी की जानी चाहिए थी, वह ग्राम प्रधानों और दलालों के हत्थे चढ़ गई.

18 फरवरी, 2018 को शामली के एक बैंक्वेट हाल में 92 जोड़ों के विवाह का आयोजन था. इन में 42 जोड़े हिंदू और 50 जोड़े मुसलिम थे.

मुख्यमंत्री की इस योजना के मुताबिक प्रति विवाह पर 35 हजार रुपए सरकारी खर्चे का प्रावधान है. इस में दुलहन के खाते में 20 हजार रुपए जाने थे और विवाह में कपड़े, गहने और बरतन दिए जाने थे.

इस सामूहिक विवाह आयोजन में जिले के सभी बड़े अफसर शामिल हुए थे और मुख्य अतिथि के रूप में राज्यमंत्री सुरेश राणा भी आए थे.

सबकुछ ठीकठीक ही हो जाता, अगर टैलीविजन चैनल वाले और अखबार रिपोर्टर शादी कराने आए जोड़ों से बात न करते.

जब मीडिया वालों को पता चला कि इन में से तकरीबन 1 दर्जन जोड़े ऐसे हैं जो पहले से ही शादीशुदा हैं, तो वहां हड़कंप मच गया. एक जोड़े की शादी 6 फरवरी को हो गई थी तो दूसरे जोड़े की 8 दिसंबर को. एक जोड़े ने तो 2 दिन पहले ही गृहस्थ जीवन में कदम रखा था.

जब ऐसे जोड़ों से बात की गई तो पता चला कि वे सरकार द्वारा दी जाने वाली माली इमदाद पाने के लिए दोबारा शादी करने को तैयार हो गए थे.

जब बात कलक्टर तक पहुंची तो उन्होंने यह कह कर पल्ला झाड़ लिया कि उन्हें इस बारे में कुछ नहीं मालूम. वे मामले की जांच कराएंगे.

24 फरवरी, 2018 को ग्रेटर नोएडा के वाईएमसीए क्लब में 66 जोड़ों के विवाह का आयोजन किया गया था. वहां मीडिया कुछ ज्यादा ही सतर्क था. विवाह के पंडाल में अजीब सी सुगबुगाहट थी.

पता चला कि गांव नंगला चीती, थाना दनकौर के नरेंद्र सिंह ने पहले से ही अफसरों को शिकायतपत्र दिया था कि इस मामले में प्रधानपति धर्मेंद्र सिंह ने फर्जीवाड़ा कर के कई अयोग्य जोड़ों का रजिस्ट्रेशन कर दिया था.

नरेंद्र सिंह की शिकायत रंग लाई. पता चला कि इन में से कई जोड़ों के तो 3-3, 4-4 बच्चे भी हैं. यही नहीं, खुद ग्राम प्रधान बबीता ने अपने पति धर्मेंद्र से दोबारा शादी रचा ली थी. जांच के आदेश के बाद पता चला कि 11 जोड़ों की शादी पहले हो चुकी थी.

गांव प्रधान रविंद्र सिंह और 2 लोगों को तुरंत गिरफ्तार कर लिया गया. समाज कल्याण अधिकारी आनंद कुमार ने दनकौर थाने में नंगला चीती की ग्राम प्रधान बबीता और उस के पति धर्मेंद्र सिंह समेत 9 जोड़ों के खिलाफ धारा 420, 409 और 34 के तहत मामला दर्ज करा दिया.

जब सीडीओ अनिल कुमार सिंह और समाज कल्याण अधिकारी आनंद कुमार ने गांव नंगला चीती जा कर पूछताछ की तो पता चला कि 3 जोड़ों ने तो अपने भाईबहनों के नाम से रजिस्ट्रेशन कराया था और शादीशुदा होने के बावजूद भाईबहनों के नाम पर दोबारा शादी रचाई और सरकारी खजाने की लूट में हिस्सेदार बने.

नंगला चीती गांव की 2 सगी बहनों निशि और बबीता की शादी 12 मार्च को तय थी लेकिन उन्होंने अपने भाई रविंद्र और विनीत के साथ अपना नाम रजिस्टर करा दिया था.

गांव नंगला चीती के सोनी पत्नी रंजीत, सोनिया पत्नी बंटी, पूनम पत्नी हरिओम, फूला पत्नी पवन, पिंकी पत्नी मोहित, लक्ष्मी पत्नी सोविंद्र और सविता पत्नी नवीन, बबीता पत्नी रविंद्र और नीशू पत्नी विनीत ने पैसे के लिए दोबारा फर्जी विवाह कर न केवल सरकारी योजना हड़पने की योजना बनाई बल्कि विवाह जैसे पवित्र संस्कार का भी मजाक उड़ाया.

औरैया और इटावा में तो अफसरों के पास लूट का यह अच्छा मौका था. उन्होंने सामान की खरीद टैंडर से नहीं, बल्कि जन सेवा शादी ग्रामोद्योग के जरीए की. दुलहन को दी गई चांदी की पायल और बिछुओं पर से चांदी के पानी का रंग क्या उतरा अफसरों की सारी पोल खुल गई.

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सत्ता संभालते हो पंडिताई ऐलान किया था कि अपराधियों और भ्रष्टाचारियों के लिए उन के राज्य में कोई जगह नहीं है. पिछले दिनों ऐनकाउंटर योजना में बड़ेबड़े गुंडों को बिना अपराध साबित हुए मरवा दिया गया. पर अभी तक 50 साल से ऊपर के मुलाजिमों के कर्मों की स्क्रीनिंग रफ्तार नहीं पकड़ पाई है और किसी भ्रष्ट अफसर और मुलाजिम को जिले में सेवामुक्त करने का मामला भी सामने नहीं आया है इसलिए वे बेखौफ हो कर वही चाल चल रहे हैं जो पिछली सरकारों में चलते थे.

अभी प्रदेश के 22 जिले बाकी हैं, जहां सामूहिक विवाह का आयोजन होना है. इस फर्जीवाड़े से कमाने के मौकों का वहां के अफसर व सरपंच बेचैनी से इंतजार कर रहे हैं. उन्हें मालूम है कि सरकार जो चाहे नियम बना ले, लागू तो उन्हें ही करने हैं और वे कमाई कर ही लेंगे.

मजेदार बात है कि एक भी ब्राह्मण श्रेष्ठ ने 2-2 बार हो रही शादी की पोल नहीं खोली और शादी कराने से इनकार नहीं किया.

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मुझे मगरमच्छों में रहना आता है : मंजरी फडनिस

हिंदी फिल्म ‘रोक सको तो रोक लो’ से अपने कैरियर की शुरुआत करने वाली मंजरी फडनिस ने बंगला, तमिल, तेलुगु, मलयालम और मराठी फिल्मों में भी काम किया है. हालांकि उन की पहली फिल्म कुछ खास नहीं चली थी, पर फिल्म ‘जाने तू या जाने ना’ में इमरान खान की प्रेमिका के रूप में उन के काम की काफी तारीफ हुई थी और फिल्म भी हिट रही थी. इश्तिहारों के अलावा मंजरी फडनिस ने शौर्ट फिल्मों में भी काम किया है. मंजरी फडनिस अब फिल्म ‘बाबा ब्लैक शीप’ में भी दिखाई दीं. पेश हैं, उन से हुई बातचीत के खास अंश:

फिल्म ‘बाबा ब्लैक शीप’ में काम करने की क्या वजह रही?

इस फिल्म की कहानी मुझे दिलचस्प लगी थी इसलिए मैं ने हां कर दी.

आप को फिल्मों में आने की प्रेरणा कहां से मिली?

मेरा फिल्मों में आना इत्तेफाक नहीं था, न ही बचपन से सोचा था. मैं एक आर्मी अफसर की बेटी हूं और पहले 3 साल तक पिता की पोस्टिंग के साथ मुंबई में रह चुकी थी. उस दौरान मैं मुंबई को थोड़ाबहुत जान चुकी थी. बचपन से मुझे स्कूल के स्टेज पर ऐक्टिंग करना पसंद था, पर वही मेरे लिए सबकुछ होगा, मैं ने ऐसा कभी नहीं सोचा था, क्योंकि मेरे परिवार से कोई भी फिल्म इंडस्ट्री से नहीं था.

मैं पढ़ाई में अच्छी थी और मनोवैज्ञानिक बनना चाहती थी. 11वीं क्लास में पढ़ते समय मुझे लगा कि मैं फिल्म कलाकार बन सकती हूं. 12वीं क्लास के बाद मैं मुंबई आई और पोर्टफोलियो दिया. इस तरह मुझे पहली फिल्म के लिए काम मिला था.

फिल्मों में काम मिलने से पहले और काम मिलने के बाद इंडस्ट्री के बारे में आप की सोच में कितना बदलाव आया?

पहले जब मैं ने अपने मातापिता से कहा कि मैं फिल्मों में ऐक्टिंग करूंगी, तो वे हंसे. उन्हें लगा कि मैं मजाक कर रही हूं. उन्होंने सहयोग भी इस बात पर दिया कि थोड़े दिनों बाद मैं खुद ही इस सोच को बदल दूंगी, पर मुझे पता था कि मैं क्या कर रही हूं. हां, यह जरूर हुआ था कि जब मैं मुंबई आ रही थी, तो सभी रिश्तेदारों ने बहुत सी बातें की थीं, लेकिन मेरे मातापिता को मुझ पर विश्वास था. यहां सब लोग अच्छे मिले, जिन्होंने मुझे आगे बढ़ने में मदद की. गलत लोग हर जगह होते हैं और मुझे उन से निबटना बखूबी आता है.

क्या आप को कभी कास्टिंग काउच का सामना करना पड़ा?

हां, जरूर करना पड़ा, पर सीधेतौर पर नहीं. जैसे कि कुछ लोग कहते थे कि आप मुझे पसंद हो और मैं आप को और अच्छी तरह समझना चाहता हूं. यह सही है कि इंडस्ट्री में कोई आप को किसी काम को करने के लिए दबाव नहीं बना सकता. आप की मरजी से ही सब होता है. अगर मैं ने किसी को कुछ मना भी कर दिया हो तो वह काम नहीं मिलता. मैं ने बहुत सारे काम छोड़े भी हैं, पर उस से मुझे कुछ फर्क नहीं पड़ता. मुझे मगरमच्छों के बीच में रहना आता है.

आप की जिंदगी की टर्निंग पौइंट फिल्म कौन सी है?

मेरी जिंदगी की टर्निंग पौइंट फिल्म ‘जाने तू या जाने ना’ थी. आज से 10 साल पहले मैं शूटिंग के लिए बैंकौक में थी और फिल्म रिलीज के एक हफ्ते बाद जब मैं मुंबई आई तो सब लोग मुझे देख कर इतने खुश हुए कि मैं बयां नहीं कर सकती.

आप को परिवार का कितना सहयोग मिला?

मैं अपने मातापिता की एकलौती औलाद हूं, लेकिन बहुत सालों से अकेली ही मुंबई में रह रही हूं. वे पुणे में रहते हैं. उन का मेरे लिए बहुत सहयोग रहा है.

आप ने इस मुकाम तक पहुंचने में कितनी जद्दोजेहद की है?

जद्दोजेहद तो चलती ही रहती है. उस का रूप बदलता है. नए होने पर पहले काम का मिलना जरूरी होता है. पहली फिल्म मुझे मुंबई शिफ्ट होने से पहले ही मिल गई थी. फिल्म नहीं चली तो जद्दोजेहद बदली और दूसरी फिल्म के लिए चुनौती आई. फिल्म ‘जाने तू या जाने ना’ मिली और फिर रास्ता आसान हुआ.

क्या कोई ड्रीम प्रोजैक्ट है?

मुझे बायोपिक नूर इनायत खान करने की इच्छा है. राजकुमार हिरानी की फिल्म करने की भी इच्छा है. मैं रोमांटिक और कौमेडी फिल्में करना पसंद करती हूं.

आप कितनी फैशनेबल हैं? क्या आप खानेपीने की शौकीन भी हैं?

मुझे फैशन ज्यादा पसंद नहीं, पर मैं मिठाई खाना बहुत पसंद करती हूं. मेरी मम्मी रुचि फडनिस तरहतरह के व्यंजन बनाना पसंद करती हैं.

आप को सुपर पावर मिले तो क्या बदलना चाहेंगी?

मैं नेताओं की सोच को जरूर बदलना चाहूंगी और सारे रेपिस्टों को मार देना चाहूंगी.

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छोटे दुकानदारों पर सरकार की गाज

सरकार देशी व विदेशी बड़ीबड़ी दुकानों को खोलने की खुली छूट ही नहीं दे रही, उन में विदेशी पूंजी लगाने की दावत भी दे रही है. इन बड़ी दुकानों, जिन्हें मौल कहा जाता है, को भारत एक बड़ा सुलभ बाजार दिख रहा है जहां अरबों का सामान बेचा जा सकता है क्योंकि यहां की जनसंख्या बहुत ज्यादा है और सुदूर गांवों तक थोड़ाबहुत पैसा आने लगा है.

ये दुकानें लगने को अच्छी लगती हैं. एक ही जगह सैकड़ों चीजें मिल जाएंगी. हर चीज को दिखा कर रखा जा रहा है. ज्यादातर माल नया. सही पैकिंग. दाम फिक्स. कोई मोलभाव नहीं. कभीकभार दुकान की अपनी ही स्कीम में किसी बची चीज पर बेहद कम दामों की छूट. दुकान में ही खानेपीने की जगह. मौज ही मौज.

पर ये मौल, मल्टी ब्रांड स्टोर, सुपर बाजार या किसी और नाम से इन्हें जानिए, देश की ज्यादातर जनता के लिए जख्म पर नमक छिड़कने का काम करेंगे. देश की अर्थव्यवस्था ऐसी है कि यहां ऊपर से नीचे तक उधारी जम कर चलती है. यहां बैंक हैं उधार देने के लिए पर अब तो साफ हो गया है कि बैंक सिर्फ बेईमान भगौड़े धन्ना सेठों को कर्ज देते हैं जिन में से कुछ भाग भी जाते हैं.

छोटे दुकानदार अपनी दुकानदारी उधार के बल पर ही चलाते हैं पर वे गरीब किसानमजदूर को भी उधार देते हैं. ये मल्टी ब्रांड मौल बैंकों से अरबों रुपए उधार लेंगे पर किसी को उधार देंगे नहीं. ये अपने सप्लायर्स से उधार माल खरीदेंगे पर ग्राहक को उधार पर नहीं देंगे. ये चूंकि पूरे बाजार पर कब्जा कर लेंगे, सप्लायर्स जो छोटे दुकानदारों को उधार पर सामान देते रहते हैं, उधारी बंद कर देंगे.

छोटे दुकानदार जो भारतीय जनता पार्टी की आंख मूंद कर पैरवी करते हैं, समझ ही नहीं रहे हैं कि पार्टी की मंशा तो इन्हें कंगाल बनाना है और इसीलिए विदेशी कंपनियों को लाया जा रहा है.

सरकार ने नोटबंदी इन्हीं व्यापारियों की कमर तोड़ने के लिए की थी. मकसद था कि छोटा व्यापार मर जाए ताकि बड़े वालमार्ट जैसे स्टोर खुल जाएं. विदेशी न हों तो रिलायंस, बिग बाजार, विशाल जैसे ही चलेंगे पर ये सब न छोटे दुकानदारों को माल उधार देंगे, न ग्राहक को. छोटा व्यापारी मुहताज रहे, हरदम पूजापाठ में लगा रहे कि उस का कल सुधर जाए.

उधारी पर व्यापार चलाना गलत है पर लगभग हर देश में व्यापार बैंकों से लिए गए कर्ज पर ही चलता है. भारत में भी ऐसा ही है पर सरकार नीरव मोदियों और विजय माल्याओं जैसों को कर्ज दिलवाना चाहती है खेत राम या गेंदा मल को नहीं.

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भुगता रेल की छत को आंगन बनाने का खमियाजा

बिहार में पटना से सटे मसौढ़ी इलाके के लखनौर गांव का रहने वाला 30 साला जितेंद्र रविदास पिछले 10 सालों से रोज सुबह पटना आ कर मजदूरी करता था और शाम को वापस गांव लौट जाता था. एक महीने पहले ही उस ने अपने 3 बच्चों को स्कूल में दाखिल कराया था.

जितेंद्र रविदास की बीवी फुमतिया देवी रोते हुए कहती है कि अब उन की देखभाल कौन करेगा? वजह, ट्रेन के ओवरहैड वायर की चपेट में आने से जितेंद्र रविदास की मौत जो हो गई है.

हरवंशपुर गांव का रहने वाला 50 साला नरेश प्रसाद अपने 3 बेटों के साथ मजदूरी करने रोज पटना जाता था. रोज की तरह वह अपने एक बेटे नीतीश के साथ मजदूरी करने पटना पहुंचा था. शाम को घर लौटते समय ट्रेन में काफी भीड़ होने की वजह से वह ट्रेन की छत पर जा बैठा. उस के साथ सैकड़ों दूसरे मुसाफिर भी ट्रेन की छत पर बैठे हुए थे.

नरेश प्रसाद को ट्रेन की छत पर बैठने का खमियाजा अपनी जान दे कर चुकाना पड़ा. इस हादसे में उस का बेटा नीतीश बच गया, क्योंकि वह डब्बे के अंदर बैठा हुआ था.

नालंदा जिले के हिलसा ब्लौक के दामोदरपुर गांव का रहने वाला 32 साला विजय कुमार 10 दिनों से पटना में अपनी बहन के घर पर रह रहा था. वह अपने बहनोई रवींद्र बिंद के साथ मजदूरी करने जाता था. वह अपने बहनोई के साथ ट्रेन की छत पर बैठा हुआ था. हाई वोल्टेज करंट लगने से विजय ने मौके पर ही दम तोड़ दिया, जबकि उस का बहनोई बुरी तरह से झुलस गया.

विजय की बीवी फुलमंती देवी पेट से है और वह गांव में ही रहती है. अब उस की जिंदगी में घोर अंधेरा छा गया है और उस का बेटा इस दुनिया में आने से पहले ही अनाथ हो गया है.

पटनागया रेलखंड पर 14 जुलाई, 2016 की रात पटनागया ममू ट्रेन में करंट दौड़ने से 3 मुसाफिरों की मौके पर ही मौत हो गई और 24 बुरी तरह से झुलस गए. चारों तरफ चीखपुकार और रोनाधोना मच गया.

अंधेरा होने की वजह से पहले तो लोगों की समझ में कुछ नहीं आया कि माजरा क्या है. ट्रेन की छत से गिरतेकूदते लोगों को देख प्लेटफार्म पर खड़े लोगों में भगदड़ मच गई.

नीमा हाल्ट के पास मोरहर नदी के पास ट्रेन का पेंटो ओवरहैड वायर में फंस कर ट्रेन की छत पर गिर गया, जिस से ट्रेन में सवार मुसाफिर हाई वोल्टेज करंट की चपेट में आ गए. ट्रेन पोटही स्टेशन से चली थी और नदवां स्टेशन की ओर जा रही थी.

मौके पर मौजूद लोगों ने बताया कि ओवरहैड वायर के टूटने से ट्रेन की छत पर बैठे लोग इस की चपेट में आ गए. इस से पूरी ट्रेन में करंट दौड़ गया. ट्रेन में सवार मुसाफिर इधरउधर भागने लगे और अफरातफरी मच गई.

रेलवे के मुताबिक, शाम के तकरीबन सवा 7 बजे ट्रेन के इंजन को बिजल सप्लाई करने वाला पेंटो टूट गया. इस का पता चलने पर ट्रेन के ड्राइवर सी. कुंजूर उसे अगले हाल्ट पर ले जाने लगे, ताकि उस की मरम्मत की जा सके. इसी दौरान ट्रेन की छत पर सवार लोग ओवरहैड वायर की चपेट में आ गए.

इतने बड़े हादसे के बाद वारदात वाली जगह पर कुहराम मचा हुआ था और हादसे के बारे में रेलवे पुलिस और रेलवे के अफसर अलगअलग बयान देने में लगे रहे.

रेलवे पुलिस का कहना है कि ट्रेन जब मोरहर नदी के पास पहुंची, तो पहले से झुका हुआ ओवरहैड वायर टूट कर गिर गया, जिस से हादसा हुआ. वहीं रेल अफसरों का कहना है कि मुसाफिर ओवरहैड वायर की चपेट में आए, जिस से खंभे पर लगे विटी इंसुलेटर को हैवी अर्थ मिला, जिस से वह टूट गया.

सीनियर सैक्शन इंजीनियर हरेंद्र सिंह के मुताबिक, इंसुलेटर के टूटने की तेज आवाज को सुन कर ड्राइवर ने ट्रेन रोकने की कोशिश की और टैंटोग्राफ को नीचे किया गया.

हादसे के खौफनाक मंजर को सुनते हुए कई मुसाफिरों के रोंगटे खडे़ हो जाते हैं. हादसे के समय ट्रेन में सवार मंगतू यादव ने बताया कि तकरीबन 4-5 मिनट तक ट्रेन में करंट दौड़ता रहा और मुसाफिर झटका दर झटका खाते रहे. हाई वोल्टेज तार ट्रेन के पीछे की 3 बोगियों में सटा हुआ था.

करंट के झटकों से किसी को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि अचानक क्या हो गया? लोग इधरउधर भागने लगे. डब्बे के अंदर भी चीखपुकार मची हुई थी.

हल्ला सुन कर ड्राइवर ने गाड़ी रोकी, तो लोग बदहवास गाड़ी से उतर कर भागने लगे, जिस से कई लोग गिर कर चोट खा बैठे. ट्रेन की छतों से कई सवारियां पके हुए फलों की तरह दनादन गिरने लगीं.

पटना जंक्शन के 10 नंबर प्लेटफार्म से पैसेंजर ट्रेनें चलती हैं और किसी भी पैसेंजर ट्रेन के प्लेटफार्म पर लगते ही सैकड़ों मुसाफिर धड़ाधड़ डब्बों की छतों पर चढ़ने लगते हैं.

मीठापुर रेल ओवरब्रिज के नीचे भी मुसाफिरों में छतों पर चढ़ने को ले कर अफरातफरी सी मची रहती है. यह रोज का वाकिआ है. मुसाफिरों को छतों पर बैठने से रोकने वाला कोई नहीं होता है. रेलवे पुलिस के जवान और अफसर देख कर भी अनदेखा कर चलते बनते हैं.

मुसाफिरों का कहना है कि पटना से ज्यादातर पैसेंजर ट्रेनें शाम 6 बजे से 7 बजे के बीच खुलती हैं. उस समय पटना के आसपास के 100-120 किलोमीटर की दूरी पर रहने वाले लोगों को घर लौटने की जल्दबाजी होती है. डब्बे के अंदर ज्यादा भीड़ होने की वजह से ज्यादातर मुसाफिर छतों पर सवार हो जाते हैं.

ट्रेनों में डेढ़ हजार मुसाफिरों के लिए ही जगह होती है और रोजाना उस में भेड़बकरियों की तरह ठूंस कर साढ़े 3 हजार से ज्यादा मुसाफिर सफर करते हैं. ऐसे में डब्बों के भीतर जगह मिलना नामुमकिन होता है. नतीजतन, सैकड़ों मुसाफिर जान पर खेल कर ट्रेन की छतों और 2 डब्बों के जौइंट पर बैठ कर सफर करते हैं.

सीनियर कमांडैंट संतोष कुमार कहते हैं कि ऐसी वारदात दोबारा न हो, इस के लिए पंचायतों के मुखिया के साथ मिल कर जागरूकता मुहिम चलाई जाएगी. मुखिया अपनीअपनी पंचायतों के लोगों को समझाएंगे कि ट्रेन की छतों पर सफर न करें.

ट्रेन के दरवाजे पर लटकना, बेवजह चेन खींच कर ट्रेन को जहांतहां रोक देना गैरकाननी के साथसाथ जानलेवा भी है.

उन्होंने दावा किया कि 1 जुलाई, 2016 से 15 जुलाई, 2016 के बीच ट्रेन की छत पर चढ़ कर सफर करने वाले 33 लोगों को पटना रेलवे स्टेशन पर पकड़ा गया था.

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अवैद्द संबंधों ने उजाड़ दिया परिवार

विश्वप्रसिद्ध पर्यटनस्थल मांडू के नजदीक के एक गांव तारापुर में पैदा हुई पिंकी को देख कर कोई सहसा विश्वास नहीं कर सकता था कि वह एक आदिवासी युवती है. इस की वजह यह थी कि पिंकी के नैननक्श और रहनसहन सब कुछ शहरियों जैसे थे. इतना ही नहीं, उस की इच्छाएं और महत्वाकांक्षाए भी शहरियों जैसी ही थीं, जिन्हें पूरा करने के लिए वह कोई भी जोखिम उठाने से कतराती नहीं थी.

बाज बहादुर और रानी रूपमती की प्रेमगाथा कहने वाले मांडू के आसपास सैकड़ों छोटेछोटे गांव हैं, जहां की खूबसूरत छटा और ऐतिहासिक इमारतें देखने के लिए दुनिया भर से प्रकृतिप्रेमी और शांतिप्रिय लोग वहां आते हैं. वहां आने वाले महसूस भी करते हैं कि यहां वाकई प्रकृति और प्रेम का आपस में गहरा संबंध है.

यहां की युवतियों की अल्हड़ता, परंपरागत और आनुवांशिक खूबसूरती देख कर यह धारणा और प्रबल होती है कि प्रेम वाकई प्रेम है, इस का कोई विकल्प नहीं सिवाय प्रेम के. नन्ही पिंकी जब मांडू आने वाले पर्यटकों को देखती और उन की बातें सुनती तो उसे लगता कि जैसी जिंदगी उसे चाहिए, वैसी उस की किस्मत में नहीं है, क्योंकि दुनिया में काफी कुछ पैसों से मिलता है, जो उस के पास नहीं थे.

मामूली खातेपीते परिवार की पिंकी जैसेजैसे बड़ी होती गई, वैसेवैसे यौवन के साथसाथ उस की इच्छाएं भी परवान चढ़ती गईं. जवान होतेहोते पिंकी को इतना तो समझ में आने लगा था कि यह सब कुछ यानी बड़ा बंगला, मोटरगाड़ी, गहने और फैशन की सभी चीजें उस की किस्मत में नहीं हैं. लिहाजा जो है, उसे उसी में संतोष कर लेना चाहिए.

लेकिन इस के बाद भी पिंकी अपने शौक नहीं दबा सकी. घूमनेफिरने और मौजमस्ती करने के उस के सपने दिल में दफन हो कर रह गए थे. घर वालों ने समय पर उस की शादी धरमपुरी कस्बे के नजदीक के गांव रामपुर के विजय चौहान से कर दी थी. शादी के बाद वह पति के साथ धार के जुलानिया में जा कर रहने लगी थी.

पेशे से ड्राइवर विजय अपनी पत्नी की इस कमजोरी को जल्दी ही समझ गया था कि पिंकी के सपने बहुत बड़े हैं, जिन्हें पूरा करने के लिए बहुत दौलत चाहिए. उन्हें कमा कर पूरे कर पाना कम से कम इस जन्म में तो उस के वश की बात नहीं है. इस के बाद भी उस की हर मुमकिन कोशिश यही रहती थी कि वह हर खुशी ला कर पत्नी के कदमों में डाल दे.

इस के लिए वह हाड़तोड़ मेहनत करता भी था, लेकिन ड्राइवरी से इतनी आमदनी नहीं हो पाती थी कि वह सब कुछ खरीदा और हासिल किया जा सके, जो पिंकी चाहती थी. इच्छा है, पर जरूरत नहीं, यह बात विजय पिंकी को तरहतरह से समयसमय पर समझाता भी रहता था.

लेकिन अपनी शर्तों पर जिंदगी जीने की आदी होती जा रही पिंकी को पति की मजबूरी तो समझ में आती थी, लेकिन उस की बातों का असर उस पर से बहुत जल्द खत्म हो जाता था. शादी के बाद कुछ दिन तो प्यारमोहब्बत और अभिसार में ठीकठाक गुजरे. इस बीच पिंकी ने 2 बेटों को जन्म दिया, जिन के नाम हिमांशु और अनुज रखे गए.

विजय को जिंदगी में सब कुछ मिल चुका था, इसलिए वह संतुष्ट था. लेकिन पिंकी की बेचैनी और छटपटाहट बरकरार थी. बेटों के कुछ बड़ा होते ही उस की हसरतें फिर सिर उठाने लगीं. बच्चों के हो जाने के बाद घर के खर्चे बढ़ गए थे, लेकिन विजय की आमदनी में कोई खास इजाफा नहीं हुआ था.

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अकसर अपनी नौकरी के सिलसिले में विजय को लंबेलंबे टूर करने पड़ते थे. इस बीच पिंकी की हालत और भी खस्ता हो जाती थी. पति इस से ज्यादा न कुछ कर सकता है और न कर पाएगा, यह बात अच्छी तरह उस की समझ में आ गई थी. अब तक शादी हुए 17 साल हो गए थे, इसलिए अब उसे विजय से ऐसी कोई उम्मीद अपनी ख्वाहिशों के पूरी होने की नहीं दिखाई दे रही थी.

लेकिन जल्दी ही पिंकी की जिंदगी में एक ऐसा मोड़ आ गया, जो अंधा भी था और खतरनाक भी. यह एक ऐसा मोड़ था, जिस का सफर तो सुहाना था, परंतु मंजिल मिलने की कोई गारंटी नहीं थी. इस के बाद भी पिंकी उस रास्ते पर चल पड़ी. उस ने न अंजाम की परवाह की न ही पति और बच्चों की. इस से सहज ही समझा जा सकता है कि इच्छाओं और गैरजरूरी जरूरतों के सामने जिम्मेदारियों ने दम तोड़ दिया था. पिंकी को संभल कर चलने के बजाय फिसलने में ज्यादा फायदा नजर आया.

विजय का एक दोस्त था दिलीप चौहान. वह बेरोजगार था और काम की तलाश में इधरउधर भटक रहा था. काफी दिनों बाद दोनों मिले तो विजय को उस की हालत पर तरस आ गया. उस ने धीरेधीरे दिलीप को ड्राइविंग सिखा दी. धार, मांडू और इंदौर में ड्राइवरों की काफी मांग है, इसलिए ड्राइविंग सीखने के बाद वह गाड़ी चलाने लगा. दोस्त होने के साथसाथ विजय अब उस का उस्ताद भी हो गया था.

ड्राइविंग सीखने के दौरान दिलीप का विजय के घर आनाजाना काफी बढ़ गया था. एक तरह से वह घर के सदस्य जैसा हो गया था. जब विजय दिलीप को ड्राइविंग सिखा रहा था, तभी पिंकी दिलीप को जिस्म की जुबान समझाने लगी थी. उस के हुस्न और अदाओं का दीवाना हो कर दिलीप दोस्तीयारी ही नहीं, गुरुशिष्य परंपरा को भी भूल कर पिंकी के प्यार में कुछ इस तरह डूबा कि उसे भी अच्छेबुरे का होश नहीं रहा.

ऐसे मामलों में अकसर औरत ही पहल करती है, जिस से मर्द को फिसलते देर नहीं लगती. दिलीप अकेला था, उस के खर्चे कम थे, इसलिए वह अपनी कमाई पिंकी के शौक और ख्वाहिशों को पूरे करने में खर्च करने लगा. इस के बदले पिंकी उस की जिस्मानी जरूरतें पूरी करने लगी. जब भी विजय घर पर नहीं होता या गाड़ी ले कर बाहर गया होता, तब दिलीप उस के घर पर होता.

पति की गैरहाजिरी में पिंकी उस के साथ आनंद के सागर में गोते लगा रही होती. विजय इस रिश्ते से अनजान था, क्योंकि उसे पत्नी और दोस्त दोनों पर भरोसा था. यह भरोसा तब टूटा, जब उसे पत्नी और दोस्त के संबंधों का अहसास हुआ.

शक होते ही वह दोनों की चोरीछिपे निगरानी करने लगा. फिर जल्दी ही उस के सामने स्पष्ट हो गया कि बीवी बेवफा और यार दगाबाज निकला. शक के यकीन में बदलने पर विजय तिलमिला उठा. पर यह पिंकी के प्रति उस की दीवानगी ही थी कि उस ने कोई सख्त कदम न उठाते हुए उसे समझाया. लेकिन अब तक पानी सिर के ऊपर से गुजर चुका था.

चूंकि पति का लिहाज और डर था, इसलिए पिंकी खुलेआम अपने आशिक देवर के साथ रंगरलियां नहीं मना रही थी. फिर एक दिन पिंकी कोई परवाह किए बगैर दिलीप के साथ चली गई. चली जाने का मतलब यह नहीं था कि वह आधी रात को कुछ जरूरी सामान ले कर प्रेमी के साथ चली गई थी, बल्कि उस ने विजय को बाकायदा तलाक दे दिया था और उस की गृहस्थी के बंधन से खुद को मुक्त कर लिया था.

कोई रुकावट या अड़ंगा पेश न आए, इस के लिए वह और दिलीप धार आ कर रहने लगे थे. पहले प्रेमिका और अब पत्नी बन गई पिंकी के लिए दिलीप ने धार की सिल्वर हिल कालोनी में मकान ले लिया था. मकान और कालोनी का माहौल ठीक वैसा ही था, जैसा पिंकी सोचा करती थी.

यह पिंकी के दूसरे दांपत्य की शुरुआत थी, जिस में दिलीप उस का उसी तरह दीवाना था, जैसा पहली शादी के बाद विजय हुआ करता था. पति इर्दगिर्द मंडराता रहे, घुमाताफिराता रहे, होटलों में खाना खिलाए और सिनेमा भी ले जाए, यही पिंकी चाहती थी, जो दिलीप कर रहा था. खरीदारी कराने में भी वह विजय जैसी कंजूसी नहीं करता था.

यहां भी कुछ दिन तो मजे से गुजरे, लेकिन जल्दी ही दिलीप की जेब जवाब देने लगी. पिंकी के हुस्न को वह अब तक जी भर कर भोग चुका था, इसलिए उस की खुमारी उतरने लगी थी. लेकिन पत्नी बना कर लाया था, इसलिए पिंकी से वह कुछ कह भी नहीं सकता था. प्यार के दिनों के दौरान किए गए वादों का उस का हलफनामा पिंकी खोल कर बैठ जाती तो उसे कोई जवाब या सफाई नहीं सूझती थी.

जल्दी ही पिंकी की समझ में आ गया कि दिलीप भी अब उस की इच्छाएं पूरी नहीं कर सकता तो वह उस से भी उकताने लगी. पर अब वह सिवाय किलपने के कुछ कर नहीं सकती थी. दिलीप की चादर में भी अब पिंकी के पांव नहीं समा रहे थे. गृहस्थी के खर्चे बढ़ रहे थे, इसलिए पिंकी ने भी पीथमपुर की एक फैक्ट्री में नौकरी कर ली. क्योंकि अपनी स्थिति से न तो वह खुश थी और न ही संतुष्ट.

इस उम्र और हालात में तीसरी शादी वह कर नहीं सकती थी, लेकिन विजय को वह भूल नहीं पाई थी, जो अभी भी जुलानिया में रह रहा था. पिंकी को लगा कि क्यों न पहले पति को टटोल कर दोबारा उसे निचोड़ा जाए. यही सोच कर उस ने एक दिन विजय को फोन किया तो शुरुआती शिकवेशिकायतों के बाद बात बनती नजर आई.

ऐसा अपने देश में अपवादस्वरूप ही होता है कि तलाक के बाद पतिपत्नी में दोबारा प्यार जाग उठे. हां, यूरोप जहां शादीविवाह मतलब से किए जाते हैं, यह आम बात है. विजय ने दोबारा उस में दिलचस्पी दिखाई तो पिंकी की बांछें खिलने लगीं. पहला पति अब भी उसे चाहता है और उस की याद में उस ने दोबारा शादी नहीं की, यह पिंकी जैसी औरत के लिए कम इतराने वाली बात नहीं थी.

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वह 28 जुलाई की रात थी, जब दिलीप रोजाना की तरह अपनी ड्यूटी कर के घर लौटा. उसे यह देख हैरानी हुई कि उस के घर में धुआं निकल रहा है यानी घर जल रहा है. उस ने शोर मचाना शुरू किया तो देखते ही देखते सारे पड़ोसी इकट्ठा हो गए और घर का दरवाजा तोड़ दिया, जो अंदर से बंद था.

अंदर का नजारा देख कर दिलीप और पड़ोसी सकते में आ गए. पिंकी किचन में मृत पड़ी थी, जबकि विजय बैडरूम में. जाहिर है, कुछ गड़बड़ हुई थी. हुआ क्या था, यह जानने के लिए सभी पुलिस के आने का इंतजार करने लगे. मौजूद लोगों का यह अंदाजा गलत नहीं था कि दोनों अब इस दुनिया में नहीं हैं.

हैरानी की एक बात यह थी कि आखिर दोनों मरे कैसे थे? पुलिस आई तो छानबीन और पूछताछ शुरू हुई. दिलीप के यह बताने पर कि मृतक विजय उस की पत्नी पिंकी का पहला पति और उस का दोस्त है, पहले तो कहानी उलझती नजर आई, लेकिन जल्दी ही सुलझ भी गई.

दोनों लाशों को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया. पुलिस वालों ने दिलीप से पूछताछ की तो उस की बातों से लगा कि वह झूठ नहीं बोल रहा है. उस ने पुलिस को बताया था कि वह काम से लौटा तो घर के अंदर से धुआं निकलते देख घबरा गया. उस ने मदद के लिए गुहार लगाई. इस के बाद जो हुआ, उस की पुष्टि के लिए वहां दरजनों लोग मौजूद थे.

दरवाजा सचमुच अंदर से बंद था, जिसे उन लोगों ने मिल कर तोड़ा था. सभी ने बताया कि पिंकी की लाश जली हालत में किचन में पड़ी थी और विजय की ड्राइंगरूम में. उस के गले में साड़ी का फंदा लिपटा था. पिंकी के चेहरे पर चोट के निशान साफ दिखाई दे रहे थे.

जल्दी ही इस दोहरे हत्याकांड या खुदकुशी की खबर आग की तरह धार से होते हुए समूचे निमाड़ और मालवांचल में फैल गई, जिस के बारे में सभी के अपनेअपने अनुमान थे. लेकिन सभी को इस बात का इंतजार था कि आखिर पुलिस कहती क्या है.

धार के एसपी वीरेंद्र सिंह भी सूचना पा कर घटनास्थल पर आ गए थे. उन्होंने घटनास्थल का बारीकी से जायजा लिया. पुलिस को दिए गए बयान में पिंकी की मां मुन्नीबाई ने बताया था कि पिंकी और विजय का वैवाहिक जीवन ठीकठाक चल रहा था, लेकिन दिलीप ने आ कर न जाने कैसे पिंकी को फंसा लिया.

जबकि दिलीप का कहना था कि उसे इस बात की जानकारी नहीं थी कि उस की गैरमौजूदगी में पिंकी पहले पति विजय से मिलतीजुलती थी या फोन पर बातें करती थी. पिंकी के भाई कान्हा सुवे ने जरूर यह माना कि उस ने पिंकी को बहुत समझाया था, पर वह नहीं मानी. पिंकी कब विजय को तलाक दे कर दिलीप के साथ रहने लगी थी, यह उसे नहीं मालूम था.

तलाक के बाद दोनों बेटे विजय के पास ही रह रहे थे. विजय के भाई अजय के मुताबिक हादसे के दिन विजय राजस्थान के प्रसिद्ध धार्मिकस्थल सांवरिया सेठ जाने को कह कर घर से निकला था.

वह छोटे बेटे अनुज को अपने साथ ले गया था. अनुज को उस ने एक परिचित की कार में बिठा कर अपनी साली के पास छोड़ दिया था, जो शिक्षिका है.

अब पुलिस के पास सिवाय अनुमान के कुछ नहीं बचा था. इस से आखिरी अंदाजा यह लगाया गया कि विजय पिंकी के बुलाने पर उस के घर आया था और किसी बात पर विवाद हो जाने की वजह से उस ने पिंकी की हत्या कर के घर में आग लगा दी थी. उस के बाद खुद भी साड़ी का फंदा बना कर लटक गया. फंदा उस का वजन सह नहीं पाया, इसलिए वह गिर कर बेहोश हो गया. उसी हालत में दम घुटने से उस की भी मौत हो गई होगी.

बाद में यह बात भी निकल कर आई कि विजय पिंकी से दोबारा प्यार नहीं करने लगा था, बल्कि उस की बेवफाई से वह खार खाए बैठा था. उस दिन मौका मिलते ही उस ने पिंकी को उस की बेवफाई की सजा दे दी. लेकिन बदकिस्मती से खुद भी मारा गया.

सच क्या था, यह बताने के लिए न पिंकी है और न विजय. पोस्टमार्टम रिपोर्ट के मुताबिक दोनों की मौत दम घुटने से हुई थी, लेकिन पिंकी के पेट पर एक धारदार हथियार का निशान भी था, जो संभवत: तवे का था. विजय के सिर पर लगी चोट से अंदाजा लगाया गया कि खुद को फांसी लगाते वक्त वह गिर गया था, इसलिए उस के सिर में चोट लग गई थी.

यही बात सच के ज्यादा नजदीक लगती है कि विजय ने पहले पिंकी को मारा, उस के बाद खुद भी फांसी लगा ली. लेकिन क्यों? इस का जवाब किसी के पास नहीं है. क्योंकि वह वाकई में पत्नी को बहुत चाहता था, पर उस की बेवफाई की सजा भी देना चाहता था. जबकि पिंकी की मंशा उस से दोबारा पैसे ऐंठने की थी. शायद इसी से वह और तिलमिला उठा था.

पिंकी समझदारी से काम लेती तो विजय की कम आमदनी में करोड़ों पत्नियों की तरह अपना घर चला सकती थी. पर अपनी शर्तों पर जिंदगी जीने की जिद और ख्वाहिशें उसे महंगी पड़ीं, जिस से उस के बच्चे अनाथ हो गए. अब उन की चिंता करने वाला कोई नहीं रहा.

दिलीप कहीं से शक के दायरे में नहीं था. उस का हादसे के समय पहुंचना भी एक इत्तफाक था. परेशान तो वह भी पिंकी की बढ़ती मांगों से था, जिन से इस तरह छुटकारा मिलेगा, इस की उम्मीद उसे बिलकुल नहीं रही होगी.

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बेईमान अफसरशाही से कैसे मिलेगा छुटकारा

अफसर बेईमान हैं. चपरासीबाबू से ले कर कलक्टर और कमिश्नर तक बेईमान हैं. हमारी व्यवस्था पर रिश्वत दाग है. ऐसे में आम आदमी कहां जाए? किस का दरवाजा खटखटाए? छोटेबड़े काम के लिए पैसे मांगे जाते हैं. अफसरशाही समय के साथसाथ तानाशाह हो रही है

आजादी को मिले 68 साल हो गए हैं. देश ने तरक्की के डग तो भरे हैं, लेकिन हमारे अफसरों ने लोकतंत्र का बेजा फायदा उठाया है. वे कानून की लचीली गलियों, लालफीताशाही, लचर व्यवस्था के चलते सालों तक फाइलों को अटकातेदबाते रहते हैं.

बच्चों का जन्मतिथि प्रमाणपत्र बनवाने से ले कर वृद्धावस्था पैंशन, विधवा पैंशन और तमाम तरह के कामों में आम आदमी को प्रशासन के चक्कर लगाने पड़ते हैं, पर कहीं कोई सुनवाई नहीं होती है.

जनसुनवाई में मामले इस तरह अटकाए जाते हैं कि सालों तक नहीं सुलझते. अफसरों के खिलाफ कार्यवाही करने के दर्जनों कानून हैं, लेकिन जिन कानूनों को अफसर बनाते हैं, उन की तंग गलियों का सहारा ले कर वे बच निकलते हैं. अफसरशाही की चेन इतनी लंबी और मजबूत है कि अगर उन पर आंच भी आती है, तो सारे अफसर एक हो जाते हैं.

भ्रष्टाचार की शुरुआत गांव के पटवारी, ग्रामसेवक से शुरू होती है, जो बीडीओ, कोष अधिकारी, एसडीएम, एडीएम से ले कर कलक्टर, कमिश्नर तक एकदूसरे से जुड़ी रहती है.

एकएक जिले में जनसुनवाई के हजारों से ज्यादा मामले लंबित रहते हैं. अफसरों में इच्छाशक्ति की कमी है. वे काम करना ही नहीं चाहते हैं. अगर कोई अच्छा काम करता भी है, तो उसे छुटभैए मुलाजिम सहयोग नहीं करते हैं.

देश की आजादी के बाद भी गांवों की तसवीर नहीं बदली है. देश की 85 फीसदी जनता को पीने का साफ पानी नहीं मिलता है. 75 फीसदी लोग रोजाना 80 रुपए से कम की आमदनी वाले हैं.

रोजगार के लिए लोग फुटपाथों पर संघर्ष करते हैं और गैरकानूनी कह कर सालों की रोजीरोटी पर बुलडोजर व जेसीबी चला दी जाती है. बहुमंजिला इमारतों के खिलाफ कभी कोई कार्यवाही नहीं होती है. पैसा देने और लेने की संस्कृति ने जीना मुहाल कर दिया है.

अफसरशाही ने देश के संविधान का मखौल बना कर रखा है. कानून के दांवपेंच आम आदमी नहीं समझता. उसे तो काम से मतलब है, लेकिन बिना पैसों के लिएदिए काम नहीं होता है. 10 में से 7 लोग प्रशासन से पीडि़त हैं. लोग दो जून की रोटी के लिए संघर्ष करते हैं, मगर अफसर उन से भी चौथ वसूल करते हैं.

लोग इज्जत के साथ जीना चाहते हैं, मगर उन्हें बेइज्जत होना पड़ता है. कलक्टर तक गरीब को पहुंचने ही नहीं दिया जाता है. कमिश्नर भी गरीब की कब सुनता है. नेता आते हैं, तो पूंछहिलाऊ प्रशासन उन के आगेपीछे घूमता है. तसवीर का दूसरा रूप बता कर हकीकत की अनदेखी की जाती है.

कहने को देश में शिक्षा के अधिकार का कानून है, पर अब तक कितने बच्चे पढ़े हैं? कानून बनने से ले कर अब तक 42 फीसदी बच्चे इस के लाभ से दूर हैं.

रोजीरोटी और रोजगार का संकट बरकरार है. अफसरों के बंगले बन रहे हैं. बैंक बैलैंस बढ़ रहे हैं. कलक्ट्रेट और इनकम टैक्स महकमे का चपरासी लखपतिकरोड़पति बन जाता है और आम आदमी जहर का घूंट पी कर रह जाता है.

अगर सरकार कोई कदम उठाती भी है, तो अफसरशाही उसे कामयाब नहीं होने देती. योजनाएं बनती हैं, पर कागजों पर. बंद कमरों में. उन्हें चलाने वाले मनमानी कर रहे हैं. ऐसी मनमानी से देश का भला होने वाला नहीं है.

जब बात कार्यवाही की आती है, तो अफसरशाही बचने का पिछला दरवाजा निकाल लेती है. कर्मचारी आंदोलन कर बेईमान कर्मचारियों को बचा लेते हैं. इस देश में सरकार चल रही है, मगर अफसरशाही की.

अफसरशाही देश के नेताओं को अपने इशारों पर नचा रही है. 15 अगस्त और 26 जनवरी पर नेताओं के भाषण नौकरशाह लिखते हैं. देश की सही तसवीर दिखाने वाले अफसर होते हैं, मगर वे ही गलत तसवीर पेश कर जनता के साथ धोखा करते हैं. सरकारी अफसरों से हर कोई परेशान है.

अफसरों और मुलाजिमों ने मिल कर देश का भला नहीं किया है. कमिश्नर मीटिंगों में मसरूफ रहते हैं. गरमी आती है और पानी की सुविधा को ले कर कलक्टर और कमिश्नर अफसरों और मुलाजिमों की क्लास लेते हैं, लेकिन करोड़ों का बजट सब मिल कर खा जाते हैं.

आज भी 45 फीसदी गांवों में बिजली नहीं पहुंची है. जंगल महकमा आजादी के इतने सालों में 0.15 फीसदी जमीन पर पेड़ नहीं लगा पाया है. हर महकमा भ्रष्ट है. जहां पैसों का बड़ा बजट, वहां बड़ी हेराफेरी. गांवों की तरक्की के नाम पर करोड़ों का बजट, मगर आम आदमी हमेशा की तरह आज भी परेशान है.

प्रधानमंत्री रह चुके राजीव गांधी कहा करते थे कि वे केंद्र से एक रुपया गांव की तरक्की के लिए भेजते हैं, मगर वह सही हाथों तक पहुंचतेपहुंचते 10 पैसे रह जाता है. यह हालत अच्छी नहीं है. प्रधानमंत्री रह चुके अटल बिहारी वाजपेयी का भी कहना है कि बेईमान अफसरशाही देश की राजनीति को खराब कर रही है.

किसान गेहूं पैदा करते हैं, लेकिन अफसर उन्हें उन का वाजिब दाम नहीं दिलाते. मुनाफा बिचौलिए खा जाते हैं. अन्नदाता किसान खुदकुशी करने को मजबूर हैं. विदेशों में निर्यात के नाम पर किसानों के साथ नाइंसाफी की जाती है. बिना जरूरत और बिना काम का सामान विदेशों से मंगा लिया जाता है. सब कमीशन का खेल है.

हालत यह है कि रक्षासुरक्षा से ले कर आम आदमी के काम की चीजों की खरीदफरोख्त में कमीशन खाने का खेल चलता है. अगर कहें कि अफसरशाही ने इस देश की राजनीति को खराब किया है, तो गलत नहीं होगा.

स्कूलों के लिए जमीन आवंटित होती है, तो कमीशन. होटलों के लिए जमीन आवंटित होती है, तो रिश्वत. हर छोटेमोटे काम के लिए लेनदेन की संस्कृति ने देश की इमेज तो खराब की ही है, साथ ही आम आदमी का भी नुकसान किया है.

आज भी महानगरों में लोग फुटपाथ पर जूते सिलने का काम करते हैं. पटरी पर पान की दुकानें चलती हैं. एकएक रुपए के लिए गरीब संघर्ष करता है, मगर उसे अपने बेटाबेटी को पढ़ाने का हक नहीं है. गरीब अपनी बेटी की धूमधाम से शादी करने का सपना नहीं देख सकता है. क्यों? क्योंकि देश में भ्रष्टाचार हद पर है.

इस भ्रष्टाचार की वजह भी अफसरशाही ही है. नेताओं को तो ये अफसर अपने इशारों पर नचाते हैं. जब तक अफसरशाही में फैला भ्रष्टाचार खत्म नहीं होगा, तब तक देश का भला नहीं हो सकता है.

  • डीके पुरोहित

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अपने भाई की शादी में जमकर नाची सपना चौधरी

छोटे पर्दे पर रियलिटी शो ‘बिग बौस 11’ का हिस्सा बनने के बाद सपना चौधरी आज पूरे देशभर में एक जाना माना नाम है. हरियाणा की रहने वाली सपना बिग बौस के घर में आने से पहले भी अपने राज्य में काफी मशहूर थीं और अपने डांस के लिए जानी जाती थीं.

हालांकि, बिग बौस में आने के बाद उन्होंने अपनी पहचान को बतौर आर्टिस्ट बदला और अब वह अपनी नई पहचान के साथ देशभर में मशहूर हैं. हाल ही में उन्होंने अपने भाई की शादी में जमकर डांस किया और सोशल मीडिया पर उनका यह वीडियो काफी तेजी से वायरल हो रहा है.

इस वीडियो में सपना काफी मस्ती से डांस करती हुई नजर आ रही हैं. गौरतलब है कि सपना के भाई की शादी में ‘बिग बौस 11’ के दूसरे एक्स कंटेस्टेट्स भी शामिल हुए थे और सबने यहां जम कर मस्ती की थी. शादी में मेहजबी सिद्दीकी, अर्शी खान और आकाश ददलानी शामिल हुए थे और सोशल मीडिया पर सबने अपने-अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर अपनी तस्वीरें शेयर की हैं. इन तस्वीरों में सपना, मेहजबी और अर्शी के साथ मस्ती करती हुईं नजर आ रहीं हैं.

Ummaaaaahhhhhh love you @itssapnachoudhary lovely night with your family 🤣😃😄

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गौरतलब है कि सपना जल्द रिलीज होने वाली अभय देओल और पत्रलेखा की फिल्म ‘नानू की जानू’ में आइटम सौन्ग करते हुए नजर आएंगी. इसके अलावा कुछ वक्त पहले उन्होंने एक भोजपुरी फिल्म के गाने में डांस किया था. बिग बौस के घर से बाहर आने के बाद से सपना की जिंदगी पूरी तरह से बदल गई है और अब वह किसी बौलीवुड स्टार से कम नहीं हैं.

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रोशनी की नई नजीर है ये लड़की

लेदर की ब्लैक जैकेट, हाई हील बूट, जींस और सिर पर हिजाब पहन कर जब वह 250 सीसी वाली 2 लाख रुपए की होंडा सीबीआर स्पोर्ट्स बाइक ले कर सड़क पर निकलती है तो शायद ही कोई ऐसा हो जो उस की तरफ मुड़ कर न देखे. जी हां, यह है रोशनी मिसबाह. जामिया मिलिया इसलामिया यूनिवर्सिटी की एमए की छात्रा, गाजियाबाद की रहने वाली.

यह पढ़ कर आप एक बार जरूर सोचेंगे कि जिस इसलाम में महिलाओं पर तमाम तरह की पाबंदियां हैं, क्या उस इसलाम में ऐसा संभव है? लेकिन आप यह भूल रहे हैं कि खुली सोच वाला, पढ़ालिखा इसलामिक तबका बहुत तेजी से बदल रहा है. अपने बच्चों के भविष्य और कैरियर को ले कर उन्हें चिंता भी होने लगी है और उन्हें कुछ बनाने की दिल में चाह भी है.

इस तरह की सोच देश के लिए भी अच्छी है और इस्लाम के लिए भी. क्योंकि आगे बढ़ने वाले ही देश के लिए कुछ कर पाते हैं. लेकिन इस का मतलब यह कतई नहीं है कि इस विचार धारा के लोग अपने धर्म को भूलने या नुकसान पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं. रोशनी मिसबाह को ही ले लीजिए. वह बिना हिजाब पहने घर से नहीं निकलती, जिसे इसलाम में महिलाओं के जरूरी माना गया है. न ही वह दूसरी लड़कियों की तरह मौडर्न है.

अरेबिक एंड कल्चरल स्टडीज में एमए कर रही रोशनी मिसबाह अपने बाइकिंग शौक और अपनी रिलीजियस वैल्यू के चलते सोशल मीडिया पर तो चर्चित है ही, युवा लड़कियों के लिए भी प्रेरणा है. उसे हिजाबी बाइकर के नाम से जाना जाता है. वह बाइक राइडर्स ग्रुप जैसे विंड चेजर्स और दिल्ली रौयल एनफील्ड राइडर्स की मेंबर है. रोशनी मिसबाह का यह शौक एक तरह से बचपन में ही शुरू हो गया था.

दरअसल, उस के पिता को भी बाइक का शौक था. जब मिसबाह 9वीं क्लास में थी तो उस के पिता उसे अपनी बुलेट मोटरसाइकिल पर पीछे बैठा कर स्कूल छोड़ने जाया करते थे. तब रोशनी सोचा करती थी कि जिस बाइक पर पीछे बैठने में इतना मजा आता है, उसे चलाने में कितना आनंद आता होगा.

एक दिन उस के पिता उसे अपने दोस्त की पल्सर बाइक पर बैठा कर कहीं ले जा रहे थे तो रोशनी ने थोड़े संकोच से कहा, ‘मैं चलाऊं पापा.’ इस पर उस के पिता ने बिना किसी संकोच या डर के बेटी के हाथ में मोटरसाइकिल का स्टीयरिंग थमा दिया और खुद पीछे बैठ गए. बस, इस के बाद रोशनी बाइक चलाने लगी.

बहरहाल, 22 वर्षीय रोशनी दिल्ली के बाइकरनी ग्रुप की सब से कम उम्र की सदस्या है. यह ग्रुप महिला मोटरसाइकिलस्टों के जरिए लिंग समानता लाने का संदेश देने का प्रयास करता है.

रोशनी गाजियाबाद के बिजनैसमैन की बेटी है. उस का परिवार धार्मिक रूप से रुढि़वादी परिवार है. रोशनी बाइक जरूर चलाती है, लेकिन अपनी धार्मिक मान्यताओं को न केवल पूरी तरह मानती है, बल्कि निर्वाह भी करती है. बाइक की वजह से वह भले ही जींस, जैकेट पहने, हाई हील के लौंग बूट पहने, लेकिन उस के चेहरे के अलावा उस के शरीर का कोई भी अंग बेपरदा नहीं होता. यहां तक कि वह हेलमेट भी हिजाब के ऊपर पहनती है.

रोशनी का मानना है कि अगर आप की सोच आधुनिक नहीं है तो पहनावे से कुछ नहीं होता. आधुनिकता सोच में होनी चाहिए, कपड़ों में नहीं. कुछ लोगों ने हिजाब के ऊपर हेलमेट लगाने को ले कर रोशनी का मजाक उड़ाया तो उस ने कहा कि बाइकिंग उस का जुनून है और हिजाब उस की आस्था और दोनों को ही कोई चैलेंज नहीं कर सकता.

कुछ लोगों ने रोशनी के पिता से बेटी के बाइक चलाने पर विरोध जताते हुए कहा कि रोशनी के लिए यह ठीक नहीं है, उस से कौन शादी करेगा. इस पर उस के पिता ने जवाब दिया कि जब तक वह कोई गलत काम नहीं करती, तब तक वे उसे उस का शौक पूरा करने से नहीं रोकेंगे.

रोशनी की एक खास बात यह भी है कि वह ट्रैफिक का कोई रूल नहीं तोड़ती, बल्कि दूसरों को भी ऐसा करने से रोकती हैं. उन का कहना है कि अगर आप के पास स्पोर्ट्स बाइक है तो यह जरूरी नहीं है कि उसे अनियंत्रित तरीके से ही चलाया जाए. रफ्तार हमेशा नियंत्रण में होनी चाहिए और ट्रैफिक रूल्स को फालो करना चाहिए.

रोशनी मिसबाह ने जब जामिया मिलिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी में दाखिला लिया था तभी आनेजाने के लिए पिता से कह कर बजाज एवेंजर 220 खरीदवा ली थी. लेकिन 5 महीने बाद ही उस ने अपनी वह बाइक बेच कर रौयल एनफील्ड खरीद ली, क्योंकि उसे इस की आवाज इंप्रेस करती थी. इस के लिए उस ने अपने फैमिली बिजनैस में भी सहयोग किया और कुछ पार्टटाइम जौब भी किए ताकि सारा बोझ परिवार पर न पड़े.

कुछ महीने रौयल एनफील्ड चलाने से भी जब रोशनी का मन भर गया तो उस ने अपनी इस बाइक को बेच कर होंडा सीबीआर 250 रिप्सोल स्पोर्ट्स बाइक खरीद ली. जामिया मिलिया में लड़कियों सहित अन्य स्टूडेंट भी रोशनी को अपने आदर्श के रूप में देखते हैं.

इतना ही नहीं बल्कि यूनिवर्सिटी के प्रोफैसरों की ओर से रोशनी को पार्किंग में खास स्लौट मुहैया कराया गया है, जो इंडो अरेबिक सेंटर के पास कैंपस में ही है. रोशनी मिसबाह के प्रोफेसर और सेंटर फोर वेस्ट एशियन स्टडीज के डायरेक्टर जावेद खान के अनुसार रोशनी मिसबाह एक गंभीर स्टूडेंट है और उस का पूरा फोकस अपनी पढ़ाई पर रहता है. वह अपने बाइक प्रेम के चलते भी अपनी जड़ों से जुड़ी है.

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मेरी शादी को 3 साल हो चुके हैं. पति रोजाना मुझ से संबंध बनाते हैं. क्या करूं.

सवाल
मेरी शादी को 3 साल हो चुके हैं. पति रोजाना मुझ से संबंध बनाते हैं. मना करने पर वे मारपीट कर के जबरन संबंध बनाते हैं. मैं क्या करूं?

जवाब

आप के पति कोई गुनाह नहीं कर रहे हैं, बस उन का तरीका गलत है. यही काम वे प्यार से भी कर सकते हैं. आप को भी अगर कोई तकलीफ होती है, तो उस बारे में पति को तसल्ली से बता सकती हैं. जब आप इतनी गहराई से जुड़ी हैं, तो बात करने में झिझकना नहीं चाहिए. वैसे, पति का हक है आप के साथ संबंध बनाना, लिहाजा मना न करें.

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