जौन अब्राहम अपनी महत्वाकांक्षी फिल्म ‘‘परमाणु’’ को लेकर प्रेरणा अरोड़ा के साथ अदालती चक्कर में फंस गए हैं. दोनों के बीच विवाद के चलते मसला अदालत में विचाराधीन है. सोमवार, 16 अप्रैल को मुंबई उच्च न्यायालय के जज एस जे कांठावाला ने कहा कि फिल्म ‘‘परमाणु’’ के केस की सुनवाई के वक्त जौन अब्राहम को भी अदालत में मौजूद रहना चाहिए. उसके बाद मंगलवार, 17 अप्रैल को जौन अब्राहम भी अदालत पहुंचे.
अदालत में प्रेरणा अरोड़ा के वकील ने कहा कि प्रेरणा अरोड़ा की कंपनी जौन अब्राहम की कंपनी को बकाया पांच करोड़ रूपए देगी. मगर जौन अब्राहम को फिल्म के प्रचार पर दस करोड़ रूपए खर्च करने होंगे. काफी बहस के बाद अदालत ने दोनों पक्षों से कहा कि वह दोनों आपस में बैठकर इस मसले को सुलझा लें.
अब जौन अब्राहम और प्रेरणा अरोड़ा के बीच बातचीत होगी और दोनों ने आपस में कोई समझौता कर लिया, तो वह उस समझौते की जानकारी अदालत में देंगे, उसके बाद ही अदालत फिल्म ‘परमाणु’ के प्रचार पर लगायी गयी रोक हटा सकती है. यानी कि यह तय हो गया है कि ‘‘परमाण’’ 4 मई को नहीं आ पाएगी. बौलीवुड का एक तबका मान रहा कि अब ‘‘परमाणु’’ 25 मई को ही सिनेमाघर पहुंच पाएगी.
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‘‘टू स्टेट्स’’ फेम निर्देशक अभिषेक वर्मन अपनी नई फिल्म ‘‘कलंक’’ की शूटिंग आज, 18 अप्रैल से शुरू कर रहे हैं. 1940 की पृष्ठभूमि पर आधारित कहानी वाली फिल्म ‘‘कलंक’’ एक एपिक फिल्म है. इस फिल्म की कल्पना करण जौहर और उनके पिता यश जौहर ने 15 वर्ष पहले की थी. करण जौहर ने आज ही इस फिल्म को अगले वर्ष 19 अप्रैल 2019 में प्रदर्शित करने की भी घोषणा कर दी है.
फिल्म ‘‘कलंक’’ में माधुरी दीक्षित, संजय दत्त, सोनाक्षी सिन्हा, आलिया भट्ट, वरूण धवन व आदित्य राय कपूर अभिनय कर रहे हैं. जबकि करण जौहर इस फिल्म का निर्माण अपनी कंपनी ‘‘धर्मा प्रोडक्शन’’ और साजिद नाड़ियादवाला व फौक्स स्टार स्टूडियो के साथ मिलकर कर रहे हैं.
खुद करण जौहर कहते हैं- फिल्म ‘कलंक’ मेरे लिए एक भावनात्मक यात्रा है. इस फिल्म का बीज 15 वर्ष पहले पड़ा था. जिसे मेरे पिता बनाना चाहते थे. अब उसी फिल्म के निर्देशन का भार अभिषेक वर्मन उठा रहे हैं. कहानी शिबानी बठीजा ने लिखी है.’
जबकि साजिद नाड़ियादवाला कहते है- ‘18 अप्रैल 2014 को फिल्म ‘टू स्टेट्स’ प्रदर्शित हुई थी, और अब 18 अप्रैल 2018 को ‘कलंक’ की यात्रा शुरू हो रही है. यह फिल्म सारी सीमाओं को तोड़गी. यह सही मायनो में ऐतिहासिक फिल्म है. करण जौहर व फौक्स स्टार स्टूडियो के साथ इस फिल्म का निर्माण करते हुए काफी उत्साहित हूं.’’
‘‘फौक्स स्टार स्टूडियो’’ के विजय सिंह कहते हैं- ‘‘धर्मा प्रोडक्शन और नाड़ियादवाला ग्रैंडसंस के साथ हमारी रचनात्मक भागीदारी हमेशा सफल रही है. हमें गर्व है कि हम ‘कलंक’ जैसी फिल्म के साथ जुड़े हैं.
‘‘कलंक’’ ऐसी फिल्म है, जिसमें 1997 में प्रदर्शित फिल्म ‘महानता’ के 21 वर्ष बाद संजय दत्त और माधुरी दीक्षित एक साथ काम कर रहे हैं. बौलीवुड से जुड़ा एक तबका मानता है कि ‘कलंक’ वही फिल्म है, जिसे करण जौहर ‘‘शिद्दत’’ के नाम से बनाना चाहते थे, पर शुरू ही नही हो पाई थी.
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हम ने घर के दरवाजे पर खड़े तीनों पुलिस वालों की ओर एक नजर बारीबारी से देखा.
‘‘यों उल्लू की तरह आंखें न घुमा… हमारे साथ थाने चल,’’ नुकीली मूंछों वाले एक कांस्टेबल ने कहा.
‘‘थाने में…’’ हम ने हैरानी से पूछा.
‘‘थाने नहीं तो क्या
हम तुझे होटल ले कर चलेंगे,’’ बड़ी दबंग आवाज में सबइंस्पैक्टर गुर्राया.
‘‘मगर, मेरा कुसूर क्या है?’’ हम ने सवाल किया.
‘‘बताऊं तेरा कुसूर…’’ सबइंस्पैक्टर फिर से गुर्राया.
हमारा कुसूर केवल इतना था कि महेशजी की बात मान कर ‘किराए के लिए खाली’ का बोर्ड लिखवाने के साथसाथ अपने नए मकान के कोने वाली दीवार पर पेंटर से ‘यहां पेशाब करना मना है’ भी लिखवा दिया था. फिर तो मुसीबतों का सिलसिला शुरू हो गया था.
दूसरे दिन जब हम किसी किराएदार की राह ताकने को अपने मकान पर पहुंचे तो देखा कि कोने वाली दीवार के पास की धरती बगैर बारिश के गीली थी. जगहजगह लंबीलंबी धारें बनी हुई थीं.
हम अभी दीवार पर लिखी मनाही वाली चेतावनी पढ़ ही रहे थे कि एक महाशय जल्दी से आए और हम से थोड़ा हट कर पीठ फेर कर बैठ गए.
‘‘अरेअरे रुको… यह क्या कर रहे हो?’’ हम चिल्लाए.
उन्होंने खुद रुकने के बजाय हमें हाथ से रुकने का इशारा किया और कुछ देर बाद काम निबटा कर मुसकराते हुए हमारे सामने खड़े हो गए.
‘‘आप ने पढ़ा नहीं, यह क्या लिखा है?’’ हम ने दीवार की ओर उंगली उठा कर इशारा किया.
‘‘भाई साहब, आप के इस नोटिस बोर्ड को पढ़ कर ही मुझे एहसास हुआ कि मैं ने काफी देर से यह ‘नेक’ काम नहीं किया. इस नोटिस को पढ़ने के बाद मुझे अपनेआप पर काबू रखना मुश्किल हो गया,’’ उन्होंने दांत निकालते हुए बेशर्मी से कहा.
उस दिन हम ने देखा कि न जाने कहांकहां से लोग आआ कर हमारे घर की दीवार की सिंचाई करते रहे. कुछ तो इतने बेशर्म निकले कि रिकशा रुकवा कर हमारी दीवार तर कर गए.
शाम को हम ने महेशजी से इस बारे में बात की, तो वह पेंटर से मिलने फौरन ही चले गए. दूसरे दिन हमारी दीवार पर लिखा था, ‘यहां कुत्ते पेशाब करते हैं’. फिर तो दीवार के सामने कई पालतू और आवारा कुत्ते लाइन में लगे अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे.
थोड़े ही फासले पर कुछ साहब टाइप लोग अपने हाथों में कुत्तों की जंजीरें लटकाए गपशप कर रहे थे. हमें देखते ही एक साहब हमारे करीब आए और बोले, ‘‘जैंटलमैन, आप ने हम लोगों की बहुत बड़ी समस्या हल कर दी है.’’
‘‘जी… क्या…’’ हम ने कुछ न समझते हुए कहा.
‘‘महल्ले वालों को पार्क में कुत्तों को घुमाने पर बहुत एतराज था, मगर आप ने सब का मुंह बंद कर दिया.’’
हमारा दिल चाहा कि उन के हाथ से कुत्ते का पट्टा छीन कर उन के गले में डाल कर उन को दीवार के पास ले जाएं और कहें कि अपने कुत्ते के साथसाथ आप भी अपना शौक पूरा कर लें. मगर कुत्तों और उन के मालिकों की तादाद देख कर मन मसोस कर रह जाना पड़ा. शाम को हम ने फिर महेशजी के घर का दरवाजा खटखटाया. वे उसी समय अपना स्कूटर निकाल कर पेंटर की दुकान की ओर उड़ चले.
अगले दिन जब हम ने दीवार पर नजर डाली, तो वहां लिखा था, ‘गधे के पूत, यहां मत मूत’.हम महेशजी की अक्ल पर गर्व कर उठे और इस मुसीबत से छुटकारा पा कर दिल ही दिल में खुश होने लगे.
हम पूरी तरह खुश भी न होने पाए थे कि एक हट्टेकट्टे पहलवान टाइप साहब गुस्से से आंखें लाल किए मुंह से झाग छोड़ते हुए आए और हमारी कमीज का कौलर खींच कर बोले, ‘‘तुम ने मुझे गाली क्यों दी?’’
‘‘पहलवानजी, मैं ने तो आप को कभी देखा तक नहीं. आप को गलतफहमी हुई है,’’ कहते हुए हम ने कौलर छुड़ाने के लिए जोर मारा, तो कौलर चर्र से फट गया.
वे साहब हमें कौलर से पकड़ कर खींचते हुए दीवार के पास ले आए और दहाड़े, ‘‘तुम ने मुझे गाली बक कर नहीं, लिख कर दी है,’’ और दीवार पर लिखे नोटिस की ओर इशारा किया.
हम ने एक नजर नोटिस बोर्ड पर और दूसरी दीवार के पास ताजाताजा बनी बलखाती लकीर की ओर डाली. उस के बाद उन की ओर देखा और कहा, ‘‘तो आप यहां बैठे ही क्यों थे? पढ़ेलिखे हो कर जाहिलों जैसी हरकत क्यों की?’’
‘‘पढ़ने की फुरसत किसे थी और जब पढ़ा तो देर हो चुकी थी.’’
‘‘आगे से पहले ही पढ़ लिया करना,’’ हम ने कहा.
‘‘आगे से पढ़ने की नौबत ही नहीं आएगी,’’ उन्होंने कहा. फिर पास पड़ा हुआ ईंट का टुकड़ा उठा कर दीवार पर लिखे नोटिस को रगड़रगड़ कर बिगाड़ने के बाद वे चले गए. हम ‘अरेअरे’ कहते रह गए.
शाम को महेशजी हमारा हाल और अपने ‘नोटिस’ का कमाल जानने के लिए आए और दीवार पर नजर डालते ही सब समझ गए.
उन्होंने हमें स्कूटर के पीछे बिठाया और पेंटर की दुकान की तरफ चल दिए.
अगले दिन दीवार पर नया नोटिस था, जिस में ‘इस जगह पर…’ के साथ कानूनी कार्यवाही करने की धमकी भी लिखी थी. ‘‘अब यहां सब ठीक रहेगा,’’ कह कर महेशजी ने हमारा कंधा थपथपाया.
उसी समय स्कूटर पर सवार कोई अपटूडेट नौजवान आया और स्कूटर को स्टैंड पर लगा कर हमारी और महेशजी की ओर पीठ फेर कर दीवार के पास जा कर चालू हो गया.
हम ने महेशजी का कंधा हिला कर उन्हें उस स्कूटर वाले की ‘हरकत’ दिखाई. वह हमारा हाथ थाम कर उस के स्कूटर के पास जा कर खड़े हो गए.
वह नौजवान मुसकराता हुआ हमारे पास आ कर खड़ा हो गया.
‘‘क्यों भाई, तुम ने वह चेतावनी नहीं पढ़ी?’’ हम ने सख्ती से पूछा.
‘‘तुम्हें मालूम है कि तुम्हारे खिलाफ कानूनी कार्यवाही हो सकती है. तुम्हें पुलिस के हवाले किया जा सकता है…’’ महेशजी गुर्राए, ‘‘तुम गिरफ्तार किए जा सकते हो.’’
‘‘भाई साहब, मैं खुद पुलिस में हूं,’’ कह कर वह मुसकराया, ‘‘मैं आप से यह जानना चाहता हूं कि अगर आप किसी ऐसे मुलजिम को हमारे पास ले कर आते हैं, तो हम लोग उस के खिलाफ कौन सी धारा लगाएं?’’
महेशजी हमारी तरफ और हम महेशजी की तरफ ताकने लगे.वह पुलिस वाला अपने स्कूटर को ‘किक’ मार कर सवार हो गया और हाथ हिलाते हुए चल दिया.
‘‘घबराओ नहीं, इस बार ऐसा नोटिस लिखवाऊंगा कि कोई भी आप की दीवार के पास बैठने की जुर्रत नहीं करेगा,’’ कह कर महेशजी ने अपना स्कूटर स्टार्ट किया.
अगले दिन दीवार पर नया नोटिस था, ‘यहां पर छिपे हुए मूवी कैमरे से आप की फिल्म उतारी जा रही है’. इस नोटिस ने सचमुच कमाल का काम किया. हम ने कई लोगों को दीवार के पास आते, वहां बैठते और फिर नोटिस पर नजर पड़ते ही एकदम से उठ कर भागते हुए देखा. हम लोगों की बदहवासियों पर मुसकराते हुए महेशजी की अक्ल की दाद देने लगे.
‘‘ऐ भाई… क्या सोच रहा है? दरवाजे को ताला लगा और हमारे साथ थाने चल,’’ एक कांस्टेबल ने हमें पुरानी यादों से झकझोरा.
‘‘मगर, मेरा कुसूर क्या है?’’
‘‘कुसूर पूछता है?’’ सबइंस्पैक्टर ने हमारी ओर देखते हुए कहा, फिर अपने साथ खड़े कांस्टेबल की ओर मुंह फेरा, ‘‘मांगेराम, इस का कुसूर बता तो.’’
‘‘तेरा कुसूर यह है…’’ मांगेराम ने कहा, ‘‘कि तू ब्लू फिल्में बनाता है.’’
‘‘ब… ब्लू फिल्में. यह क्या कह रहे हैं आप?’’ हम ने हैरानी से कहा.
‘‘हम नहीं कहते…’’ दूसरे कांस्टेबल ने गरदन हिलाई.
‘‘तो फिर किसी ने आप को सरासर गलत सूचना दी है,’’ हम ने समझाया.
‘‘अरे, गलती किसी और को पढ़ाना. अपने घर की दीवार पर इतना बड़ा इश्तिहार लगवा रखा है और कहता है कि हमें गलत सूचना मिली है. तू थाने चल, तेरी गलती हम सुधारेंगे,’’ कह कर सबइंस्पैक्टर ने हमें धकेल दिया.
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टैक्नोलौजी बूम के इस दौर में ग्लोबल विलेज में तबदील होती दुनिया में शादियां भी तेजी से ग्लोबल होती जा रही हैं. अब अंतर्धार्मिक, अंतर्जातीय, अंतर्सांस्कृतिक, अंतर्राष्ट्रीय हर तरह की जोडि़यां बन रही हैं. भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने 5 फरवरी, 2018 को एक मामले के फैसले में साफ कह दिया है कि 2 वयस्कों की शादी में किसी तीसरे का दखल गैरकानूनी है. हालांकि विश्व के अन्य देशों में ऐसे कानून पहले से ही लागू हैं.
यों तो अमेरिका में भारतीय वर्षों से बस रहे हैं पर 1990 के बाद आए टैक्नोलौजी बूम के बाद अमेरिका में काफी संख्या में भारतीय आने लगे हैं. पुराने बसे भारतीयों की पहली पसंद की बहू तो भारतीय लड़की ही होती थी. पर 1990 के बाद अमेरिका आने वालों में से कुछ ने यहीं शादी की है. इन्हें अपनी शादी से संबंधित कुछ समस्याओं का सामना भी करना पड़ता है. विशेषकर जब वे दूसरे धर्म या समुदाय में शादी करना चाहते हैं.
मातापिता की मानसिकता
अमेरिका में बसे भारतीय मूल के मातापिता, जिन की शादियां दशकों पहले हो चुकी थीं, उन में अंतर्जातीय लवमैरिज विरले ही होती थीं. दूसरे धर्म में शादी तो दूर की बात है. उनकी अरेंज्ड मैरिज होती थीं और ज्यादातर सफल ही होती थीं. इन में से लाखों ने सिल्वर जुबली, गोल्डन जुबली और कुछ ने डायमंड जुबली भी मनाई होंगी. उनकी मानसिकता अभी भी वही है कि जब हम अरेंज्ड मैरिज निभा सकते हैं तो हमारे बच्चे क्यों नहीं.
उन्हें डर है कि समाज क्या कहेगा या यह परिवार पर एक कलंक सा है. उन्हें लगता है कि अगर कोई बेटा या बेटी लवमैरिज करती है तो बाकी और परिवार के छोटे बच्चों की शादी में मुश्किल होगी, वे अपने बच्चों से काफी उम्मीद लगाए रहते हैं. उन्हें यह भी डर रहता है कि इस तरह की शादी से उनकी आशाएं धूमिल हो जाएंगी.
उनकी समझ में नहीं आ रहा है या वे समझना ही नहीं चाहते कि जमाना काफी बदल गया है. पहले वे पत्नी पर जिस तरह का दबाव रखते थे, आजकल की पढ़ी लिखी, कमाऊ बहू उसे बरदाश्त नहीं करेगी. यहां तक कि खुद उनके बच्चे भी अब ज्यादा स्वतंत्र होना चाहते हैं और अपनी खुशी से ही जीवनसाथी चुनना चाहते हैं.
अगर मातापिता नहीं मानते तो वे बगावत पर उतर आते हैं. चूंकि वे वयस्क हैं, इसलिए वे उनकी इच्छा के विरुद्ध लवमैरिज कर लेते हैं और कानून इसे मान्यता देता है. इस से मातापिता और बच्चों सभी को मानसिक क्लेश होता है, इस में दो मत नहीं हैं.
ज्यादातर मामलों में मातापिता भी आगे चल कर इन्हें स्वीकार कर लेते हैं. बच्चों की खुशी के लिए मातापिता शुरू से ही समझदारी दिखाएं तो रिश्तों में खटास की नौबत ही नहीं आएगी.
भावनात्मक लगाव में कमी
आधुनिकता और औद्दोगिकीकरण के युग में अभिभावक बच्चों को अपना ज्यादा समय नहीं दे पाते हैं. इसलिए बच्चों के साथ भावनात्मक रूप से उनके जुड़े होने में कमी आती है और बच्चे बड़े होकर अपने साथी में यह आत्मीयता ढूंढ़ते हैं और अमेरिका की तो बात ही कुछ और है.
जो युवा विदेश खासकर अमेरिका में बस गए हैं वे यहां के मुक्त और स्वच्छंद समाज में रहने के आदी हो गए हैं. इन के बच्चे तो बचपन से एलिमैंट्री स्कूल से लेकर कालेज की पढ़ाई और नौकरी तक अमेरिकी कल्चर में करते हैं. इन्हें अपनी पसंद में जाति, धर्म या नस्ल का कोई बंधन स्वीकार नहीं होता है.
देखा गया है कि अमेरिका में लगभग 28 से 30 प्रतिशत एशियन गैरएशियन से शादी करते हैं जिन में काफी भारतीय भी होते हैं.
मिक्स्ड मैरिज
अमेरिकी इंडियंस शिक्षा और कमाई दोनों मामलों में औसत अमेरिकी या किसी भी औसत एशियन (चीनी, जापानी, वियतनामी आबादी) से काफी ऊपर हैं. इसीलिए अगर इन्हें दूसरे धर्मों की लड़कियां पसंद करें तो कोई आश्चर्य की बात नहीं है.
अमेरिका में भारतीय मिक्स्ड मैरिज हो रही हैं. इन जोडि़यों को सामाजिक, धार्मिक, भावनात्मक और दार्शनिक वातावरण में सामंजस्य बिठाना होता है. शुरू में एडजस्ट करने की समस्या होती है और फिर उनके होने वाले बच्चे किस धर्म से जुड़ेंगे, इस की समस्या आती है.
एक ऐसा उदाहरण देखने को मिला जिसमें एक हिंदू लड़की मुसलिम लड़के से प्यार करती थी. दोनों काफी दिनों तक एक दूसरे से मिलते जुलते रहे थे और दोनों में प्यार भी था. पर जब शादी की बात आई तो लड़की पर लड़के के माता पिता द्वारा कई शर्तें थोपी गई थीं कि उसे मुसलिम धर्म अपनाना होगा. होने वाले बच्चों के मुसलिम नाम होंगे और उसे बुरका पहनना होगा, नौकरी छोड़ कर लड़के के साथ विदेश जाना होगा. बेचारी लड़की पर क्या गुजरी होगी, आप समझ सकते हैं. वह पूरी तरह टूट गई थी और काफी दिनों तक उसे डिप्रैशन में रहना पड़ा था. अंतर्धार्मिक प्रेम और शादी करने से पहले एक बार युवावर्ग को भी ठीक से सोचना चाहिए.
एक दूसरे मामले में एक हिंदू लड़के ने एक अफ्रीकी अमेरिकी से शादी की थी. लड़के के माता पिता को शुरू में काफी आपत्ति थी कि उनकी अगली पीढ़ी भी अमेरिका में ब्लैक अमेरिकी कहलाएगी और समाज उसे निम्न स्तर का मानेगा.
एक ऐसा भी उदाहरण है जहां एक दक्षिण भारतीय कट्टर हिंदू लड़के ने अपने मातापिता की अनुमति से ईसाई धर्म की अमेरिकी लड़की से शादी की. जब लोगों ने पूछा कि ऐसा क्यों किया तो लड़के के मातापिता ने कहा, ‘‘हमारे बच्चे का जन्म ही अमेरिका में हुआ था. शुरू से वह इसी संस्कृति में पला, तो हम उस से पुराने रीतिरिवाज की उम्मीद नहीं रखते हैं.
इतना ही नहीं, वे अपनी बहू से बहुत खुश हैं. उनके दोनों पोतों में एक का नाम हिंदू और एक का क्रिश्चियन है. परिवार में दोनों धर्मों के त्योहार मनाए जाते हैं.
अमेरिका में एक तरफ कुछ आप्रवासी भारतीय हिंदू भारतीय पत्नी को बेहतर चौइस मानते हैं. उनका कहना है कि भारतीय नारी कितनी भी पढ़ीलिखी और कमाऊ क्यों न हो,
वह पति के प्रति वफादार होती है और नौकरी करते हुए भी पारिवारिक जिम्मेदारियां बखूबी निभाती है. वहीं दूसरी तरफ, अमेरिका में जन्मी और पलीबढ़ी भारतीय मूल की लड़कियां अमेरिकी बौयफ्रैंड को बेहतर मानती हैं. उनका मानना है कि ज्यादातर भारतीय अभी भी पुरानी सोच वाले हैं जो पत्नी और बहू को दासी समझते हैं.
एक और अमेरिकी भारतीय हिंदू लड़की, जिसका पति अमेरिकी क्रिश्चियन है, भी अपने पति से बहुत खुश है. उस ने हिंदू और क्रिश्चियन दोनों रीतियों से शादी है. उस के बच्चों के हिंदू नाम हैं. उस का पति भारतीय संस्कृति और हिंदू धर्म का बहुत आदर करता है. वह भी अमेरिकन सोसाइटी की उतनी ही इज्जत करती है.
नई पीढ़ी के कुछ भारतीय बच्चों से जब पूछा कि आप के मातापिता को जब गैरभारतीय बौयफ्रैंड या गर्लफ्रैंड पसंद नहीं हैं तो आप क्यों नहीं कोई भारतीय साथी चुनते हो तो उनका निर्भीक उत्तर था, ‘‘उन्होंने अपनी खुशी और कैरियर के लिए देश क्यों छोड़ दिया था. भारतीय संस्कृति की इतनी चिंता थी, तो हमें भी वहीं पैदा किया होता. अब जब हमारी खुशी का मौका आया तब वे दखल दे रहे हैं. आप उन्हें समझाएं, हमें नहीं.’’
समानता की सोच
अमेरिका में रहने वाली मैरी कोल्स बताती है कि उस का हैंडसम, ब्राइट और दिलफेंक भाई स्टीव एक बंगाली युवती शेफाली से शादी कर रहा है जो कालेज में उस की जूनियर थी.
दोनों की एक फोटो दिखाते हुए मैरी ने बताया कि कैसे पुराना परिचय दोस्ती में बदला, फिर डेटिंग शुरू हुई और सालभर के भीतर ही मंगनी के बाद दोनों ने शादी करने का फैसला कर लिया.
मैरी ने बताया, स्टूडैंट वीजा के बाद 2 वर्षों के वर्क वीजा पर नौकरी करते हुए अमेरिकी नागरिक से शादी करके ओ ग्रीनकार्ड मिल जाएगा तो वापस भारत नहीं लौटना पड़ेगा. उच्चशिक्षा के लिए अमेरिका आने वाले बहुत से युवा ऐसा करने के बाद कालांतर में अमेरिकी नागरिक बन जाते हैं.
शेफाली के निर्णय के पीछे उस के जो भी निजी कारण रहे हों, अमेरिका में भारतीय मूल के अधिकांश परिवारों की बेटियां भी अमेरिकी वर चुनती हैं अपवाद की बात अलग. लेकिन पुरुषप्रधान आम भारतीय परिवारों की गृहिणी को ही गृहस्थी का अधिक बोझ उठाते देख कर शिक्षित और प्रोफैशनल रूप से महत्त्वाकांक्षी बेटी को अमेरिकी या अमेरिकी मानसिकता वाले युवक में वांछित जीवनसाथी दिखता है. ऐसा जीवनसाथी जो घर के हर छोटेबड़े काम में स्वेच्छा से बराबर का साझेदार होगा.
स्थायित्व की संभावना
विदेशों में बसने वाले भारतीय युवाओं को लगता है कि विदेशी पत्नी होने से वहां के समाज में उन्हें और उनकी संतान को प्रतिष्ठा मिलेगी.
फूड साइंटिस्ट डा. त्रिवेणी शुक्ला और उनकी पत्नी गिरिजा अमेरिका में अपने दशकों पुराने प्रवास के दौरान पूर्वी और पश्चिमी संस्कारों में सुंदर सामंजस्य स्थापित करते रहे.
अन्य भारतीय परिवारों की तरह शुक्ला दंपती की अपने बच्चों से भी यही उम्मीद थी. उनकी दोनों बेटियों और पुत्र ने अमेरिकी जीवनसाथी चुने तो मित्रों और स्वजनों में भारी आलोचना स्वाभाविक थी.
कोलंबिया यूनिवर्सिटी से एमबीए करने के बाद बड़ी बेटी रेखा ने सोच रखा था कि वह अपनी शैक्षिक और प्रोफैशनल महत्त्वाकांक्षा को विवाह जैसे अहम निर्णय पर हावी नहीं होने देगी. आज 2 दशकों बाद शुक्ला परिवार के शुभचिंतक इस विवाह को आदर्श मानते हैं.
पौलिसी राइटर रेणु शुक्ला और फाइनैंस डायरैक्टर एरिक जरेट््स्की अमेरिकी मुख्यधारा की 2 उच्छवल तरंगें मिल कर सशक्त प्रवाह बनीं.
उत्तर प्रदेशीय ब्राह्मण परिवार में जन्मी और पलीबढ़ी सुकन्या के संस्कार परंपराबद्ध से अधिक बौद्धिक हैं. वर्षों पहले हिंदू परिवार में जन्मे एक नवयुवक से परिचय भी हुआ था किंतु वैचारिक परिपक्वता के स्थान पर केवल धर्म और संस्कारों की समानता मेलजोल बढ़ाने का कारण न बन सकी.
पीस कोर के लिए वौलंटियर करने के दौरान एरिक जरेट्स्टकी की भी दोस्ती एक भारतीय युवती से हुई थी लेकिन वैचारिक अनुकूलता का अभाव था. यहूदी परिवार के पुत्र एरिक और ब्राह्मण पुत्री रेणु में समान बौद्धिक स्तर प्रथम आकर्षण का कारण बना और दोस्ती प्यार में बदली, प्यार विवाह में. यहूदी धर्मगुरु और ब्राह्मण पिता ने मिल कर विवाह संपन्न करवाया. दोनों के परिवार व बच्चे एकदूसरे के कल्चर को लेकर सम्मान का भाव रखते हैं.
कुछ ऐसी ही कहानी राजन शुक्ला और विक्टोरिया की है. राजन शुक्ला ने बताया कि विक्टोरिया से अधिक उन्हें उस के पिता ने प्रभावित किया था. राजन के सदैव सकारात्मक दृष्टिकोण और जिंदादिली ने विक्टोरिया का दिल जीत लिया था. विवाह के निर्णय से पहले दोनों के ही मन में असंख्य सवाल थे जिन्हें दोनों ने ताक पर रख दिया.
त्रिवेणी शुक्ला हंस कर कहती हैं कि विवाह बेटेबेटियों का ही नहीं, शुक्ला विक्टर और जरेट्स्की परिवारों का भी हुआ है. जब भी सब जुटते हैं, यूनाइटेड नैशंस बन जाता है.
आंचलिक विस्कौन्सिन के प्रबुद्ध मध्यवर्गीय परिवार में जन्मी जेसिका एक नामी बुकस्टोर में पार्टटाइम काम कर रही थी. भारत के स्वाधीनता संग्राम के प्रणेता परिवार के पुस्तकप्रेमी प्रपौत्र विष्णु की पोस्ंिटग निकटवर्ती उपनगर में थी और वह नियम से बुक्स्टोर में आता था. जेसिका से उस का परिचय हुआ और परवान चढ़ी. परिचयसूत्र में बंधने के बाद नौकरी के सिलसिले में दोनों जापान, फिनलैंड और फिर अमेरिका में कुछ वर्ष रहे.
जेसिका को आभास हुआ कि सास के हृदय में अपनी जगह बनाने के लिए उसे पहल करनी पड़ेगी. उस की सास महिला अधिकारों की प्रबल समर्थक रहीं और भारतीय प्रशासनिक सेवा से रिटायर हुईं. जेसिका ने हर वर्ष अकेले भारत जा कर कुछ समय ससुराल में बिताने का निश्चय किया.
जेसिका के दूसरे बेटे का जन्म विष्णु की भारत में पोस्टिंग के दौरान हुआ जहां वे मातापिता के निकट घर लेकर रहे. छोटे पौत्र के जन्म के बाद सास ने हफ्तेभर नवप्रसूता को अपने पास रख कर देखभाल की. जेसिका को गर्व है कि उनकी सास अपने साथ एक अलग तरह का संबंध जोड़ने के लिए पूरा श्रेय उसे देती हैं. विष्णु की तरह बहुत कम पति मां और पत्नी के बीच बंटने की दुविधा से मुक्त रह पाते हैं विशेषकर तब, जब विवाह अंतर्जातीय ही नहीं, अंतर्सांस्कृतिक भी हो.
दादी में अल्जाइमर्स के लक्षण दिखने लगे तो पतिपत्नी से साहस जुटा कर बड़े बेटे को पिछले साल क्रिसमस की छुट्टियों में दादी के पास रहने के लिए अकेले भारत भेजा, इस विचार से कि बालक पीढ़ी बुजुर्गों की सुखद स्मृतियां भरसक संजो सके.
क्याक्या समस्याएं
वैसे तो अपने देश में अरेंज्ड मैरिज में शुरू में एडजस्टमैंट में कुछ दिक्कतें आती हैं, पर मिक्स्ड मैरिज में कुछ ज्यादा एडजस्टमैंट की आवश्यकता है. मातापिता को डर रहता है कि अब परिवार का संस्कार, रीतिरिवाज खतरे में पड़ जाएंगे. हर परिवार की एक अलग परंपरा, लाइफस्टाइल, संस्कार होते हैं जिन का सम्मान दोनों को करना है.
मिक्स्ड मैरिज के बाद अकसर दोस्त, परिवार और समाज से दूरी या बहिष्कार का भय रहता है. कभीकभी एकदूसरे के त्योहारों व बच्चों की परवरिश को लेकर झगड़े होने लगते हैं जो तलाक तक पहुंच जाते हैं और इनका खमियाजा मासूम बच्चों को भुगतना पड़ता है. इसके लिए एक पक्ष अगर आक्रामक है तो दूसरे पक्ष को संयम बरतना चाहिए और यथासंभव रिश्तों को टूटने से बचाना चाहिए.
मातापिता को ऐसी मिक्स्ड मैरिज को सहर्ष स्वीकार करना सीखना होगा. विश्व ग्लोबल विलेज बन रहा है तो इसके वासियों की मानसिकता भी वैश्विक होनी चाहिए. वैचारिक परिपक्वता और पारिवारिक मूल्य ही दीर्घ व सुखी दांपत्य के स्रोत हैं.
कितने निभते हैं अंतर्राष्ट्रीय विवाह
पिंरसटन के रहने वाले जौर्ज दंपती ने 30 वर्षों से वहां रहने वाले परमविंदर भाटिया की बेटी शिवांगी से अपने बेटे सैम की शादी बड़ी धूमधाम से की. एमबीए शिवांगी ने अपनी सहूलियत से ऊपर उठकर उनसे निभाना चाहा पर वे हमेशा उसके खानपान व क्रिकेट प्रेम की आलोचना बड़ी कटुता से करते हुए उसकी निजता पर प्रहार करते रहे. आखिर शिवांगी ने अलग होने का फैसला ले लिया. ऐसी भी शादी क्या, जहां उस के कल्चर का मजाक उड़ाया जाए.
न्यू जर्सी के फ्रैंकलिन स्ट्रीट में रहने वाले केरलवासी गिरीश दंपती के बड़े बेटे ने अमेरिकी लड़की से शादी तो करली पर कटु आलोचनाओं से बचने के लिए वह घर से थोड़ी दूर पर ही दूसरे फ्लैट में रहने लगा. लेकिन छोटा बेटा जिसने एफ्रो अमेरिकी लड़की से शादी की थी, उन्हीं लोगों के साथ रह रहा था. एक दिन मिसेज गिरीश की अपने बहूबेटे के साथ बहुत कहासुनी हुई. बहू ने पुलिस को खबर कर दी. दोनों मांबेटे को पुलिस पकड़ कर ले गई. रातभर लौकअप में रखा. बात इतनी सी थी कि बेटेबहू ने अपने कुछ दोस्तों को बुला कर घर में पार्टी रखी थी. होहल्ला को वे बरदाश्त नहीं कर पाए और तूतूमैंमैं कर बैठे.
प्रताड़ना का पेंच
40 वर्षों से एडीसन में रहते पटेल दंपती की बेटी डा. प्रिया ने जौन से प्रेमविवाह किया था. दोनों न्यू जर्सी के प्रख्यात अस्पताल रौबर्ट वुड में साथसाथ काम करते थे. जौन का व्यवहार दूसरी महिला कर्मचारियों के साथ बड़ा ही उन्मुक्त था. जब भी प्रिया जौन को महिलाओं से दोस्ती की सीमाएं बताती, वह नाराज होकर भारतीय संस्कृति, परंपराओं, रहनसहन, खानपान का मखौल उड़ाने पर उतर आता था. मानसिक रूप से प्रताडि़त करने के बाद जब जौन शारीरिक हिंसा पर उतर आया तो प्रिया अपनी सोच पर प्रहार नहीं झेल पाई और उस से अलग हो गई. उनका 3 साल का बेटा शेरील प्रिया के पास रहता है क्योंकि वहां, भारत के विपरीत, बच्चों की गार्जियन मां ही होती है.
जमशेदपुर, झारखंड की रहने वाली वीणा पाठक की अमेरिकन बहू एलिस को 3 बच्चे, 2 लड़के और 1 लड़की एकसाथ हुए तो वह उखड़ गई. हैरिसन स्ट्रीट में रहते भारतीय परिवारों से वे जब भी, जहां भी मिलती, यह कहने से नहीं चूकती, ‘‘पता नहीं ये अमेरिकन लड़कियां खाती क्या हैं कि राक्षस की तरह 3-4 बच्चे एकसाथ पैदा कर लेती हैं. अंडा, मछली, गाय, भेड़, बकरी, सूअर सब के कलेजे खाती हैं. मुझे तो यहां पानी पीने से भी वितृष्णा होती है. पता नहीं, मेरे बेटे को यह कैसे भा गई. मैं तो जाने के दिन गिन रही हूं.’’
अमेरिका में रहने वालों के लिए यह कोई नई बात नहीं है. वहां फैशन के कपड़ों की तरह अपनी सहूलियत के अनुसार जीवनसाथी बदले जाते हैं. अलग होने की कानूनी प्रक्रिया भारत की तरह जटिल व उबाऊ नहीं है.
अगर अमेरिकन अंगरेजी में ताना मारते हैं तो भारतीय भी मुंह से हिंदी अंगरेजी दोनों में उस से बढ़कर आग उगलने से नहीं चूकते हैं. इन की सोच के तरकश में घृणा से बुझे शब्दों के ऐसे तीर होते हैं कि मन छलनी हो जाता है. चूंकि उस देश में कानून दूसरे देशवासियों के लिए भी समान है, सो, उसका लाभ भारतीय भी कम नहीं उठाते.
सुखी वैवाहिक जीवन
इसके विपरीत कितने ही अमेरिकन परिवारों की भारतीय बहुओं के साथ अच्छी निभ रही है. पेनसिल्वेनिया के डा. शिशिर प्रसाद की बेटी मेघा थौमसन परिवार की बहू है. प्रजनन संबंधी जटिलताओं के कारण जब वह मां नहीं बन सकी तो उसने भारत आ कर पुणे के एक अनाथालय से जुड़वां बच्चियों को गोद लिया. कानूनी कार्यवाही के लिए उसे न जाने कितनी बार भारत आना पड़ा. पति अलबर्ट, जो वहां साइंटिस्ट हैं, का पूरा साथ था कि यहां की जटिल कानूनी प्रक्रियाओं का सामना करके यहां से बच्चियों को वह अमेरिका ले जा सकी. आज दोनों बच्चियां 18 साल की हो गई हैं और मां से ज्यादा अपने डैडी से घुलीमिली हुई हैं. इसी को नियति कहते हैं.
मिलबर्न स्ट्रीट में रहने वाले फिजिक्स के साइंटिस्ट डा. सतीश प्रसाद, जो मेघा के चाचा हैं, ने अपनी तीनों बेटियों की शादियां अमेरिकन परिवारों में की हैं. तीनों लड़कियों का वैवाहिक जीवन बहुत ही सुखी है. 2 वर्षों पहले सभी भारत आए थे. वहां पतिपत्नी दोनों नौकरी करते हैं और अपनी सुविधानुसार ही रहते हैं, लेकिन अवसरों पर वे एकदूसरे के फैमिली मैंबर से प्रेमपूर्वक अवश्य मिलते हैं.
सालों से न्यूयौर्क में रहते डा. सुधांशु की बेटी रिया ने पीटर से प्रेमविवाह किया और आज उनके 2 बच्चे हैं. हर साल क्रिसमस में पीटर का पूरा परिवार नए साल के आगमन तक न्यूयौर्क में ही अपनी बहू के यहां रह कर वहां के सैलिब्रेशंस का आनंद उठाते हैं. डाक्टर के बेटेबहू निसंतान हैं. वे रिया के दोनों बच्चों को बहुत प्यार करते हैं.
होबोकन में रहते डा. रीता प्रसाद और डा. सुधीर प्रसाद की बहू और दामाद दोनों अमेरिकन हैं. उन से मिल कर कहीं से भी ऐसा नहीं लगता कि 2 विपरीत सभ्यताओं और संस्कृतियों का मिलन है. सभी पेशे से डाक्टर हैं और मिलजुल कर रहते हैं. अमेरिकन और इंडियन परिवारों, जहां ऐसे रिश्ते बने हैं, से मिलने पर यही निष्कर्ष निकला कि ऐसे रिश्तों को निभाने में अमेरिकियों से ज्यादा इंडियन असहनशील हैं. अमेरिकियों को भारतीय सभ्यता संस्कृति से जुड़े सारे रिवाज बहुत भाते हैं. वे हर त्योहार, पहनावे, खानपान का लुत्फ उठाते हुए उत्सुकता के साथ खुशी से मनाते हैं
देसी बनाम विदेशी शादियां
जहां एक ओर भारतीय युवतियां विदेशी युवाओं से शादी कर खुश नजर आती हैं वहीं भारतीय युवाओं की शादियां विदेशी युवतियों के साथ असफल नजर आईं. अपना नाम और पता गुप्त रखने की शर्त पर गुरुग्राम के भरत (बदला हुआ नाम और स्थान) ने लिथुआनियन लड़की से विदेश में बस जाने की चाह में अपने मातापिता की मरजी से उनकी उपस्थिति में शादी की, लेकिन एक साल के भीतर ही उसका तलाक हो गया जबकि उस की एक नन्ही बच्ची भी है.
दिल्ली के पश्चिमपुरी के विजय (बदला हुआ नाम और स्थान) की भी ऐसी ही कहानी है. इन्होंने भी लिथुआनियन लड़की से विदेश में बस जाने की चाह में 10 साल पहले शादी की थी. इन के 7 और 9 साल के 2 बेटे हैं, लेकिन अब वे तलाक लेना चाहते हैं.
इन दोनों भारतीयों की शादी असफल होने के कारण एकजैसे ही हैं. इन्होंने बताया कि विदेशी लड़कियां शादी के बाद न तो परिवार के लोगों को अपनाना चाहती हैं और न ही भारत आना चाहती हैं. इसके अतिरिक्त अपना पैसा, अपना खर्च, अपना काम जैसा विभाजन कर घर चलाने और उनकी जीवन जीने की स्वछंद शैली से आएदिन घर में कलह का माहौल बनता है, जिस से आखिरकार तलाक की नौबत आ जाती है.
श्रुति के पिता कमलजीत सिंह चौहान से बातचीत
आप की बेटी श्रुति चौहान कहां रहती है, उस की शिक्षा कहां से हुई थी?
हमारी बेटी इटली में रहती है. उस ने दिल्ली के गार्गी कालेज से बीए औनर्स वर्ष 2003 में किया था.
वह विदेश कैसे गई थी?
उस ने वर्ष 2003 में मिस इंडिया कौन्टैस्ट में भाग लिया था और वह कौन्टैस्ट के अंतिम चरण के 5वें नंबर पर चुनी गई थी. इन्हीं दिनों उसे फ्रांस दूतावास ने कल्चरर्स ऐक्सचेंज के तहत फ्रांस आने का निमंत्रण दिया और वह फ्रांस चली गई. उस का झुकाव शुरू से मौडलिंग की ओर था. उसे इटली की एक कंपनी से वहां मौडलिंग का औफर मिला और वह वहां से इटली चली गई. इटली में उस ने मैनेजमैंट औफ लग्जरी गुड्स में पोस्टग्रेजुएट की शिक्षा प्राप्त की.
श्रुति की शादी किससे और कहां हुई, क्या यह शादी परिवार की सहमति से हुई है?
श्रुति की शादी इटली के मिस्टर जिवोनी कोसोलीटो से हुई है. इटली के मिलान शहर में उन दोनों की दोस्ती हुई. पहले हम उस के साथ कल्चरल डिफरैंस के चलते शादी के खिलाफ थे.
आप लोग हिंदू हैं, क्या धर्म से संबंधित कोई परेशानी श्रुति को शादी के बाद झेलनी पड़ी?
श्रुति की शादी एक रोमन कैथोलिक ईसाई परिवार में हुई है, लेकिन न तो कभी लड़के ने और न ही कभी उस के परिवार वालों ने उसे धर्म परिवर्तन के लिए दबाव डाला. श्रुति तो दोनों धर्मों के त्योहार अपनी ससुराल वालों के साथ मनाती है. उस का एक बेटा भी है और वह इस विदेशी परिवार के बीच बेहद खुश है. मैं और मेरी पत्नी उस के पास कभी 6 महीने, कभी सालभर रह कर आते हैं.
मोयना की मां लीना से बातचीत
आप की बेटी कहां रहती है, वह विदेश कैसे गई थी?
मेरी बेटी आजकल लंदन में है. वह उच्चशिक्षा के लिए ब्रिटेन गई थी. उस ने पहले एडनबरा से एमए (इंग्लिश) किया, फिर लंदन स्कूल औफ इकोनौमिक्स से मीडिया ऐंड कम्युनिकेशंस की शिक्षा प्राप्त की.
मोयना की शादी किस से और कहां हुई, क्या यह शादी परिवार की सहमति से हुई है?
मोयना की शादी ईसाई परिवार के ब्रिटिशमूल के नागरिक से हुई है. शादी से पहले लंदन में एक ही कंपनी में कार्य करने के दौरान इन की दोस्ती हुई थी. फिर दोनों परिवारों की सहमति से इन की शादी हुई है.
आप लोग हिंदू हैं, क्या धर्म से संबंधित कोई परेशानी मोयना को शादी के बाद झेलनी पड़ी?
मोयना को कभी भी किसी ने धर्म बदलने के लिए दबाव नहीं डाला और न ही उस ने अपना धर्म बदला है. परिवार के सभी सदस्य छुट्टियों के दौरान आपस में मिलतेजुलते हैं. हम भी लंदन उनके परिवार से मिलने अकसर जाते हैं और उनके परिवार के लोग भी भारत हमारे पास आते रहते हैं. मोयना इस परिवार में शादी कर बेहद खुश है.
आप्रवासी भारतीय शादियों में धर्म का धंधा
आप्रवासी भारतीयों के विवाह में धर्म ने पीछा नहीं छोड़ा है. विदेशों में बसे भारतीय परिवार बड़ी संख्या में दूसरे समाजों में शादी रचा रहे हैं. भारतीय हिंदू युवकयुवतियां विदेशी ईसाई, यहूदी, मुसलिम धर्म में विवाह तो कर लेते हैं पर दोनों अपनेअपने धर्म, आस्था को छोड़ नहीं पाते. आप्रवासी शादियों में अलगअलग सामाजिक, धार्मिक वातावरण के बावजूद धर्म की मौजूदगी देखी जा सकती है. ये परिवार धार्मिक अंधविश्वासों को नहीं छोड़ पाते.
भारतीय ही नहीं, हर देश की विवाह संस्था में धर्म एक जरूरी हिस्सा है. अकेले अमेरिका में लगभग 20 लाख प्रवासी भारतीय हिंदू आश्रमों, मंदिरों, गुरुद्वारों की जीवनशैली अपनाए हुए हैं. प्रवासी भारतीय दूसरे धर्म, संस्कृति में विवाह तो कर लेते हैं पर उनकी विचारधारा, विश्वास, रीतिरिवाज, सामाजिक पद्धति के भेद दृढ़ता के साथ अपनी जगह मौजूद रहते हैं. वे इन्हें छोड़ नहीं पाते.
विदेशों में इस तरह के अंतर्धार्मिक विवाह अकसर चर्चों या धर्मस्थलों में संपन्न होते हैं और इन शादियों में पादरी, मुल्लामौलवी, पंडित की उपस्थिति जरूर रहती है. अमेरिका, यूरोप में अधिकांश विवाहों में पादरी, भारतीय पंडे, मौलवी विवाह के लिए विधिवत रूप से नियुक्त होते हैं. कुछ अन्य कानूनी अधिकारी भी होते हैं पर धर्म के इन बिचौलियों के कहने से ही विवाह की रस्में निभाई जाती हैं.
विवाह 2 व्यक्तियों के कानूनी रूप से एकसाथ रहने केलिए सामाजिक मान्यता है पर धार्मिक रीतिरिवाज से किए गए विवाह को अधिक सामाजिक मान्यता प्राप्त होती है, कानूनी विवाहों को इतनी नहीं होती. प्राचीन यूनान, रोम, भारत आदि सभी सभ्य देशों में विवाह को धार्मिक कर्तव्य बताया गया है. विवाह का धार्मिक महत्त्व प्रचारित करने से ही अधिकांश समाजों में विवाह विधि धार्मिक संस्कार मानी जाती रही है.
इस तरह से आप्रवासी धर्म का धंधा चला रहे हैं. भारत से गए कुछ लोगों ने लिखा भी है कि भारत से आने वाले परिवार कुछ सामान, जरूरी चीजों के साथ रामायण, गीता साथ लाए थे यानी विदेशों में बसे भारतीय धर्म की पूरी गठरी ले गए थे और अपनी अलग धार्मिक पहचान बनाने में जुटे रहे.
हालांकि अमेरिका, यूरोप और अन्य देशों में विवाह के लिए कानून बहुत उदार हैं और मैरिज अफसर के पास जा कर सीधे शादी कर सकते हैं, लेकिन फिर भी विवाह करने वाले दंपती और उनके परिवार धर्म की शरण में जाना अनिवार्य समझते हैं. रोमन कैथोलिक चर्च अब तक विवाह को धार्मिक बंधन समझता है.
यहूदियों की धर्मसंहिता के अनुसार, विवाह से बचने वाला व्यक्ति उनके धर्मग्रंथ के आदेशों का उल्लंघन करने के कारण हत्यारे जैसा अपराधी माना जाता है. रोमनों का भी यह विश्वास था कि परलोक में मृत पूर्वजों का सुखी रहना इस बात पर निर्भर करता है कि उनका विवाह संस्कार धार्मिक विधि से हो तथा उनकी आत्मा की शांति के लिए उन्हें अपने वंशजों की प्रार्थनाएं, भोज और भेंटें यथासमय मिलती रहें. इस तरह मिश्रित विवाहों में धर्म का धंधा खूब कामयाब है.
धर्म का भेद बुनियादी है और इसी से समस्याएं पैदा होती हैं. जोडि़यां अलगअलग धार्मिक, सामाजिक वातावरण से आती हैं. यूथ अपनी अलग संस्कृति में रगेपगे होते हैं. विवाह के लिए वे धर्म के रिवाजों का दामन थामे रखते हैं.
शिक्षा, सूचना, प्रौद्योगिकी, विज्ञान व उद्योग के क्षेत्र में बड़ी प्रगति के बावजूद प्रवासी समाज अभी भी दकियानूस बना हुआ है. दकियानूसी आप्रवासियों के बल पर विदेश में धर्म का धंधा चलता रहता है.
विक्टोरिया फ्रैंक और राजन शुक्ला के विवाह ने 2 भिन्न परिवारों, संस्कृतियों को मिला कर नई मौलिकता दिखाई.
दुनियाभर के प्रवासियों में भारतीय नंबर वन
करीब 3 करोड़ से भी अधिक प्रवासी भारतीय दुनिया के कोनेकोने में सफलतापूर्वक व्यवसाय व नौकरी कर अपने परिवार के साथ रह रहे हैं. अपनी मेहनत, अनुशासन, कानून अनुसरणता और शांत स्वभाव के चलते विदेशों में रह रहे भारतीयों को अन्य आप्रवासी समुदायों के लिए रोल मौडल की तरह पेश किया जाता है.
यह संख्या अन्य देशों के प्रवासियों के मुकाबले सब से ज्यादा है. सबसे अधिक संख्या में पंजाबी, गुजराती, बिहारी, तमिल, तेलुगू समुदायों और उत्तर प्रदेश के लोगों ने विदेशों में पलायन किया है.
आज भारतीय लोग मुख्यरूप से यूके, यूएसए, कनाडा, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड आदि देशो में जा कर बसना पसंद कर रहे हैं. यूएसए, यूके, आस्ट्रेलिया, दक्षिण अफ्रीका, यूएई, कतर, सिंगापुर, फिजी, चीन, जापान, दक्षिण कोरिया, केन्या, मौरीशस, सेशल्स, मलयेशिया में फैले भारतीय प्रवासी अन्य प्रवासियों से आंकड़ों के लिहाज से सबसे ऊपर हैं. सिर्फ बड़े देशों में ही नहीं, बल्कि कुक आइलैंड, किरिबाली, समोआ, पोलिनेसिया व माइक्रोनेसिप जैसे अपेक्षाकृत कम चर्चित देशों में भी भारतीय प्रवासियों की तादाद खासी है.
दुनिया के करीब 208 देश ऐसे हैं जहां भारतीय आबादी है. विदेश मंत्रालय, विश्व बैंक और संयुक्त राष्ट्र की एक संस्था की रिपोर्ट के मुताबिक, 3 करोड़ 8 लाख 40 हजार भारतीय 208 देशों के या तो स्थायी निवासी हैं या वहां रह रहे हैं. यह संख्या भारत में कई बड़े राज्यों की कुल आबादी से भी अधिक है. दिलचस्प बात तो यह है कि भारत समेत 45 देश ही ऐसे हैं जिन की कुल जनसंख्या विदेशों में बसे भारतीयों से ज्यादा है.
आकर्षक रोजगार और बेहतर भविष्य की संभावनाएं जहां ज्यादा दिखती हैं, भारतीय वहां बस जाते हैं. शायद इसीलिए सर्वाधिक यानी 86 लाख 40 हजार भारतीय पश्चिम एशियाई देशों और 60 लाख 30 हजार लोग दक्षिणपूर्व एशिया में हैं. दक्षिण एशिया के देशों में भी भारतीयों की संख्या 23 लाख 20 हजार है. दक्षिण एशिया के देशों में रहने वाले ज्यादातर भारतीय लेबर क्लास के हैं, जबकि उत्तरी अमेरिका में टैक्निकल लोगों की खासी मांग है और इस मांग को पूरा करने में 54 लाख 80 हजार भारतीय हिस्सेदारी निभा रहे हैं.
यूरोपीय देशों की बात करें तो रिपोर्ट बताती है कि उत्तरी यूरोप के देशों में करीब 19 लाख 10 हजार भारतीय हैं तो पश्चिमी यूरोप में उनकी संख्या 5 लाख 40 हजार और दक्षिण यूरोप में 3 लाख 40 हजार है. पूर्वी यूरोप के देशों तक में 50 हजार भारतीय प्रवास कर रहे हैं, जबकि अफ्रीकी देशों में भी भारतीयों की संख्या 31 लाख से ज्यादा है. लैटिन अमेरिका व कैरेबियाई देशों में 12 लाख 10 हजार भारतीय हैं.
अपना देश छोड़ कर दूसरे देशों में रहने वालों में सब से ज्यादा भारतीय हैं. इसके बाद मेक्सिको, रूस, चीन, बंगलादेश, पाकिस्तान, फिलीपींस, अफगानिस्तान, यूके्रन तथा ब्रिटेन शीर्ष 10 में हैं.
एक और दिलचस्प रिपोर्ट आई है जिस के मुताबिक दुनिया के देशों में इंडियन सिर्फ आबादी में ही सब से आगे नहीं हैं बल्कि प्रवास के दौरान अपने देश में पैसा भेजने में भी अव्वल हैं. विश्व बैंक के आंकड़े बताते हैं कि प्रवासी भारतीयों ने वर्ष 2017 में करीब 72 अरब डौलर भारत भेजे. 64 अरब डौलर के साथ चीन के प्रवासी दूसरे स्थान और फिलीपींस (30 अरब डौलर) के साथ तीसरे?स्थान पर हैं.
यह अलग बात है कि आज भी प्रवासी भारतीयों के साथ नस्लभेद की घटनाएं सुनने को मिलती रहती हैं. आस्ट्रेलिया में जहां भारतीय स्टूडैंट्स को पीटा जाता है वहीं अमेरिका में रैड डौट रेसिस्ट गु्रप का काला इतिहास है.
और तो और, अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी भारतीय आईटी पेशेवरों की राह में एच-1 वीजा की आड़ में मुश्किलें पैदा कर रहे हैं. रंग और नस्लभेद की तमाम रुकावटों को पार करते हुए भारतीय आज दुनियाभर में अगर सीना तान कर जीवनयापन कर रहे हैं, तो वह उनकी अपनी मेहनत है.
शकुंतला सिन्हा के साथ इंदिरा मितल, सुरेश चौहान, जगदीश पंवार, राजेश कुमार और रेणु श्रीवास्तव.
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मानसिक रूप से विकलांग मीना ऐसी बच्ची है जो अपने घर में आने वाले हर परिचित, अपरिचित व्यक्ति से लिपटचिपट जाती है. वह उस शख्स से तब तक लिपटी रहती है जब तक वह आगंतुक वहां रहता है. दरअसल, इस तरह से मीना अपनी भावनाएं व्यक्त करते हुए हर आने वाले से कहती है कि मुझे प्यार कीजिए, मुझे प्यार से सहलाइए.
मीना जैसे न जाने कितने बच्चे समाज व परिवार की उपेक्षा के शिकार होते हैं. यही वजह है कि ये प्यार के लिए बेहद तरसते हैं. वे प्यार की चाह में हर किसी को हसरतभरी निगाह से ताकते हैं, उन से लिपटते हैं, उन्हें छूते हैं. इस एहसास से कि शायद उन्हें भी बदले में भरपूर स्नेह और अपनापन मिले.
छत्तीसगढ़ के रायपुर की एक जगह बाल जीवन ज्योति बालगृह ऐसे बच्चों की शरणस्थली है. मीना यहीं रहती है. मीना जैसे करीब 23 बच्चों की मानसिक विकलांगता को यहां कम करने का प्रयास किया जा रहा है.
ऐसे बच्चों को पिछले 9 वर्षों से प्रशिक्षित कर रही सीता साहू कहती हैं कि ये बच्चे कठोर भाषा नहीं, सिर्फ और सिर्फ प्यार की भाषा समझते हैं. प्रेम से ही इन्हें काबू कर कुछ सिखाया व पढ़ाया जा सकता है.
कठिनाइयां कम नहीं
बाल जीवन ज्योति संस्था की सुप्रिटैंडैंट संगीता जग्गी कहती हैं, ‘‘ऐसे बच्चों, खासतौर से लड़कियों, की परवरिश में कई तरह की कठिनाइयां आती हैं. लड़कियों को पीरियड के समय कुछ समझ नहीं आता. उन के कपड़े खराब हो जाते हैं. इन की सारी चीजों को केयरटेकर को समझना पड़ता है और उन्हें संभालना पड़ता है. लड़कियों की सुरक्षा पर हमें खास ध्यान रखना पड़ता है.’’
ऐसे बच्चों को संभालना, उन्हें दैनिक क्रियाकलाप सिखाना आसान नहीं है. इस के लिए विशेष ट्रेनिंग की जरूरत होती है. ये बच्चे सुखदुख को महसूस करते हैं, लेकिन गुस्सा ज्यादा करते हैं. ये अपने कपड़े फाड़ डालते हैं, एकदूसरे से मारपीट करते हैं और रोकटोक करने पर गुर्राते हैं. कुल मिला कर इन्हें सहीगलत की पहचान नहीं होती.
छत्तीसगढ़ परिषद के मुख्य कार्यपालन अधिकारी भवानी शंकर तिवारी कहते हैं, ‘‘ऐसे बच्चे रोज एक ही चेहरा देखते हैं. जब नए चेहरे उन के सामने आते हैं, तो उन्हें बेहद खुशी मिलती है.
‘‘लोग अपनी जिम्मेदारी समझते हुए ऐसे बच्चों के साथ समय बिताएं, यह जरूरी है. ऐसे बच्चे अपने दैनिक क्रियाकलाप ठीक से कर लें, यही इन की शिक्षा है.’’
ऐसे बच्चे कठिनाइयों और तकलीफों में जीवन जीने वाले बच्चे होते हैं. गरीब परिवारों में ऐसे बच्चों की आजीविका चलाना कठिन होता है. छत्तीसगढ़ शासन ऐसे बच्चों के विकास के लिए प्रयास कर रहा है, लेकिन यह पर्याप्त नहीं है. इस के लिए समाज को भी आगे आना होगा
सुशील भी इन बच्चों में एक है. इस के साथ मुश्किल यह है कि यह 2 लोगों को हंस कर बातें करते नहीं देख सकता. जहां 2 लोगों को ऐसा करते देखता है, उसे गुस्सा आता है और वह उन्हें मारने को दौड़ पड़ता है.
अभिभावकों की स्थिति
रायपुर के श्यामलाल और शारदा ऐसे दंपती हैं जिन की पहली संतान रीना मानसिक विकलांगता की शिकार है. दोढाई वर्षों बाद जब ये इस सच्चाई से रूबरू हुए तो उन्हें काफी तकलीफ हुई.
शारदा ने हिम्मत नहीं हारी. वह उन संस्थानों में गई जहां ऐसे बच्चों का शिक्षण प्रशिक्षण होता है. रायपुर के आकांक्षा स्कूल से इन्हें बहुत संबल मिला. खुद भी इन्होंने घर में ही दैनिक क्रियाकलाप सिखाने का प्रयास जारी रखा. शारदा बताती है, ‘‘रीता को सही तरीके से आटा गूंधना सिखाने में उन्हें एक वर्ष का समय लगा.’’ शारदा के अनुसार, ‘‘ऐसे बच्चों को सिखाने के लिए, उन्हें किसी मुकाम तक पहुंचाने के लिए बहुत हिम्मत और धैर्य की जरूरत होती है.’’
महक और मोहन भाईबहन हैं. मानसिक विकलांगता के चलते इन के मांबाप को कई परेशानियों से गुजरना पड़ा. ये बच्चे एक जगह बैठ कर खाना नहीं खाते, किसी अन्य बच्चे के साथ खेलनाकूदना पसंद नहीं करते. कोई इन्हें पागल कहता है तो कोई बंदर. यह सब देखसुन कर मातापिता को बड़ी तकलीफ होती है. ऐसी स्थिति में मातापिता इन बच्चों को संस्था में रखना ठीक समझते हैं. यहां इन की बेहतर देखभाल होती है.
क्यों होता है ऐसा
ऐसे बच्चों पर रिसर्च कर चुकीं डा. सिम्मी श्रीवास्तव बताती हैं कि भारत में 2 प्रतिशत ऐसे बच्चे हैं. ऐेसे बच्चों के पैदा होने के पीछे कई वजहें होती हैं, जैसे गर्भ को क्षति पहुंचना, कुपोषण, शराब का सेवन, बिना डाक्टर की सलाह के दवा लेना, डिप्रैशन, कम उम्र में शादी होना आदि.
बाल रोग विशेषज्ञ मानते हैं, ‘‘ऐसे बच्चों की पैदाइश के पीछे कई कारण होते हैं. जैनेटिक दोष, जींस में खराबी, रेडिएशन की इंजुरी आदि के चलते भी बच्चे ऐसे पैदा होते हैं.
पहला बच्चा अगर मानसिक रूप से विकलांग है तो दूसरा बच्चा ऐसा न हो, इस के लिए सावधानी बरतनी चाहिए. डाक्टर के अनुसार, ‘‘दूसरे बच्चे के पैदा होने से पहले डाक्टर्स के संपर्क में रहना चाहिए. गर्भवती मां के पेट से पानी निकाल कर जांचा जाता है. जींस में खराबी पाए जाने पर उसे दवा द्वारा ठीक किया जा सकता है ताकि दूसरा बच्चा मंदबुद्धि पैदा न हो.’’
भावुक व शौकीन भी
मीना बेहद शौकीन बच्ची है. वह बोलती नहीं है, इशारे से बताती है. खाने की शौकीन मीना खाना बनाने वाली दीदियों से अपनी पसंद की सब्जी की खासतौर पर फरमाइश करती है.
अजय और रोहित बेहद भावुक हैं. इन की समझ इतनी विकसित नहीं है, फिर भी ये अपने मम्मीपापा को याद करते हैं. अजय तो इस वजह से अनमना सा रहता है, लेकिन रोहित कान पर फोन रखने का एहसास कर के मम्मीमम्मी कहता है.
हुनरमंद होते हैं ऐसे बच्चे
रौशन खेलकूद में अच्छा है. जब तेज दौड़ता है या क्रिकेट के खेल में विकेट लेता है, तो न सिर्फ उसे तालियां मिलती हैं, बल्कि प्रोत्साहन के रूप में उपहार भी मिलते हैं.
सकीना ‘मैय्या यशोदा…’ गाने पर जब थिरकती है तो उस की लचक देखते ही बनती है. इन बच्चों को देख कर लगता ही नहीं कि ये सामान्य बच्चों से कमतर हैं.
बाल जीवन ज्योति संस्था में रहने वाले इन बच्चों का हुनर देख कर आंखों पर विश्वास नहीं होता. खूबसूरत डिजाइनर दीये, राखी, लिफाफे और पेंटिंग्स बना कर न सिर्फ ये अपनी प्रतिभा को साबित करते हैं, बल्कि कद्रदानों से मिले पैसों से इन की जरूरतें भी पूरी होती हैं.
आत्मनिर्भरता की ओर कदम
असामान्य बच्चों की 3 श्रेणियां होती हैं- माइल्ड, माइनर और सीवियर. इस में माइल्ड कैटेगरी के बच्चों का आईक्यू सब से बेहतर होता है. ऐसे प्रतिभाशाली बच्चे कुछ हद तक आत्मनिर्भर होते हैं.
रीता समानी गर्ल्स शौप में कार्य करती है. जब यह कार्य के एवज में थोड़ाबहुत धनार्जन करती है तो इस के मम्मीपापा श्यामलाल और शारदा खुशी से फूल उठते हैं. रीता हालांकि संपन्न परिवार से है, फिर भी जितना कमाती है उसे जमा करती है और वक्त आने पर अपने छोटे भाईबहनों को उपहार दे कर खुशी से फूली नहीं समाती.
रीता समानी को देख कर मानसिक रूप से विकलांग बच्चों के मातापिता को हौसला मिलता है. यदि वे भी हिम्मत और धैर्य के साथ अपने बच्चों को प्रशिक्षित करें तो वे भी न सिर्फ सामान्य जीवन जी सकते हैं, बल्कि किसी मुकाम तक पहुंच सकते हैं.
समाज व सरकार का दायित्व
ऐसे बच्चों के संपूर्ण विकास के लिए छत्तीसगढ़ सरकार काफी सतर्क और जागरूक दिखाई पड़ती है. राज्य सरकार ने 1995 में निशक्त जन अधिनियम पारित किया, जिस का क्रियान्वयन 1996 में हुआ. जिला अधिकारी गांवगांव जा कर ऐसे बच्चे चिह्नित करते हैं, फिर उन्हें निशक्त जन का प्रमाणपत्र दिया जाता है. उस प्रमाणपत्र के आधार पर ये शासन द्वारा दी जा रही सुविधाओं का लाभ उठा सकते हैं.
हर नागरिक की समाज के प्रति जवाबदेही होती है. अभाव और गरीबी में जीने वाले उपेक्षित बच्चों की आवश्यकतानुसार उन की जरूरतें पूरी करना हम सब का उत्तरदायित्व है. प्यार से महरूम बच्चों को गंदे, पागल या असभ्य कह कर झिड़किए मत, बल्कि उन्हें प्यार से सहला दीजिए.
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रेलवे की सुरक्षा और क्षमता बढ़ाने के लिए बजट में इस बार 1.48 लाख करोड़ रुपए खर्च करने का प्रस्ताव रखा गया है. इस पैसे का इस्तेमाल सुरक्षा, इन्फ्रास्ट्रक्चर व रेलवे को हाइटैक बनाने में किया जाएगा. लेकिन, बजट के बाद संसद की लोकलेखा समिति की सदन में पेश की गई रिपोर्ट पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं.
मल्लिकार्जुन खड़गे की अध्यक्षता वाली लोकलेखा समिति ने रेलवे की कार्यप्रणाली की कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि 150 खतरनाक चिह्नित पुलों, पटरियों तथा ट्रेनों की गति पर प्रतिबंध लगाने के बावजूद रेलवे बोर्ड को 31 पुलों को मंजूरी देने में 213 महीने यानी 17 साल से अधिक का समय लग गया.
घटिया गुणवत्ता
लोकलेखा समिति ने रेलवे बोर्ड पर अपनी टिप्पणी में कहा है कि ब्रिटिश शासनकाल में बनाए गए कुछ पुल अच्छी स्थिति में हैं पर आजादी के बाद बनाए व मरम्मत किए गए पुल घटिया गुणवत्ता वाले हैं. रेल पटरियों का भी ऐसा ही हाल है. यह सब रेल अधिकारियों व ठेकेदारों की मिलीभगत से हुआ है. रिपोर्ट में कुशल कर्मचारियों की कमी पर भी सवाल उठाए गए हैं.
ऐसे में महज रेल बजट बढ़ा देने से क्या यात्रियों की सुरक्षा व्यवस्था पर भरोसा किया जा सकता है? रेल दुर्घटनाओं का ग्राफ लगातार बढ़ रहा है.
अव्यवस्था की मार
रेलयात्रा में लगातार जानमाल का खतरा बना हुआ है. रेल व्यवस्था राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी और निकम्मे अधिकारियों, कर्मचारियों के चलते भारी अव्यवस्था के दौर से गुजर रही है लेकिन फिर भी बुलेट ट्रेन चलाए जाने का शोर है. यात्रियों की जान की सुरक्षा को ले कर कोई गंभीर नहीं है. सरकार और उस के मुलाजिम दोनों ‘मनसा वाचा कर्मणा’ चोर हैं. यही कारण है कि पिछले कुछ महीनों से होने वाले रेल हादसों की अहम वजह स्टाफ का नकारापन रहा है, मगर सरकार द्वारा इन नकारे स्टाफ पर कोई कार्यवाही नहीं की गई है.
सरकार संसद के भीतर तो यह स्वीकार करती है कि रेल दुर्घटनाओं में रेलकर्मी दोषी हैं, मगर उन को गिरफ्तार करवाने, कठोर सजा दिलवाने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाती. लगता है कि सरकार मरने वाले यात्रियों को पिछले जन्म का फल मान कर पौराणिक सोच को पोषित करना चाहती है, बस.
लापरवाही की हद
सरकारी आंकड़े खुद चीख रहे हैं कि रेल हादसों के लिए स्टाफ की लापरवाही जिम्मेदार है, फिर भी सरकार है कि उन दोषी रेल अधिकारियों, कर्मचारियों पर कोई आपराधिक कार्यवाही करने से बचती है. मात्र अनुशासनात्मक कार्यवाही कर अगली बार फिर मौत पर मातम मनाती है और आखिर में मौत के मुलाजिमों को मुक्त कर देती है. यही कारण है कि अब तक स्टाफ की कमी से हुई दुर्घटनाओं में कार्यवाही का कोई बड़ा उदाहरण स्थापित नहीं हो सका कि जिस से स्टाफ सहमा हो और रेल दुर्घटनाएं रुकी हों.
होते होते बचा हादसा
25 सितंबर, 2017 (एक ही ट्रैक पर आई 3 ट्रेनें) : इलाहाबाद के निकट एक ही ट्रैक पर आई दूरंतो ऐक्सप्रैस सहित 3 ट्रेनें एकसाथ टकराने से बालबाल बच गईं.
29 सितंबर, 2017 को बिना गार्ड के रवाना हुई ट्रेन : उत्तर प्रदेश के उन्नाव में गंगा घाट रेलवेस्टेशन से मालगाड़ी को बिना गार्ड के ही रायबरेली के लिए रवाना कर दिया गया.
हादसों की वजह सिर्फ स्टाफ
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार में 3 वर्षों तक रेलमंत्री रहे सुरेश प्रभु के कार्यकाल में छोटे बड़े कुल 300 रेल हादसे हुए, जिनमें से सिर्फ साल 2017 में जनवरी से अगस्त तक 31 हुए. तब के रेलमंत्री सुरेश प्रभु ने दुर्घटनाओं के बाबत नैतिक आधार पर इस्तीफा देने की पेशकश की, जिस के बाद तत्कालीन ऊर्जा मंत्री पीयूष गोयल को यह मंत्रालय मिला. मगर हादसे हैं कि अब भी थमने का नाम नहीं ले रहे.
19 जुलाई, 2017 को संसद में सुरेश प्रभु ने रेलवे स्टाफ की लापरवाही की वजह से हुई दुर्घटनाओं के बाबत बताया था कि साल 2015-2016 में हुए कुल 107 हादसों में 55 और साल 2016-2017 में 85 हादसों में से 56 हादसे सिर्फ स्टाफ की लापरवाही से हुए. इसी तरह नीति आयोग की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2012 से साल 2016-2017 तक प्रत्येक 10 रेल दुर्घटनाओं में से 6 स्टाफ की चूक की वजह से हुई हैं. नीति आयोग की ही एक अन्य रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2017 में 31 मार्च तक 104 विभिन्न दुर्घटनाओं में 66 दुर्घटनाएं स्टाफ की लापरवाही से हुई हैं.
गुनाहगारों को सजा नहीं
रेलवे की बड़ी दुर्घटनाओं में जांच के लिए संसद ने एक कानून बना कर रेलवे संरक्षा आयोग बनाया है. निष्पक्ष जांच के लिए इस आयोग को केंद्रीय नागरिक उड्यन मंत्रालय के अधीन रखा गया है. इस आयोग का मुखिया संरक्षा आयुक्त होता है, जो रेलवे के अलग अलग जोन का काम देखने वाले 5 आयुक्तों के साथ काम करता है. संरक्षा आयोग के पास इतना काम होता है कि लंबे अरसे तक जांच ही चलती रहती है. दूसरा, इस आयोग का इतिहास है कि इस के आयुक्त ज्यादातर रेलवे के ही लोग होते हैं, इस से भी जांच का कार्य काफी हद तक प्रभावित होता है.
यही कारण है कि बड़ी से बड़ी दुर्घटनाओं में दोषियों पर आज तक कोई ठोस कार्यवाही नहीं की जा सकी है, जिस से स्टाफ की लापरवाही से दुर्घटनाएं होती रहती हैं. फलस्वरूप, रेलयात्रियों की जान जाने पर दोषी सजा नहीं, मजा काटता है.
पानी में जनता की गाढ़ी कमाई
रेलवे के दोषी अधिकारियों, कर्मचारियों पर कोई कठोर कार्यवाही न करने के कारण दुर्घटनाओं के साथ साथ इन से होने वाला आर्थिक नुकसान भी बढ़ता चला जा रहा है, जो जनता की गाढ़ी कमाई है.
संसद में हुई बहस के दौरान जो आंकड़े बताए गए हैं (आशंका है कि सरकारी स्वभाव के अनुसार बहुतकुछ छिपा भी लिया गया हो), उन के अनुसार, रेल दुर्घटनाओं के कारण साल 2014-2015 में 70.07 करोड़ रुपए का आर्थिक नुकसान हुआ है.
सुरक्षा के बजाय दूध, दवाई और वाईफाई का झांसा : मोदी सरकार अच्छे दिन के जुमले से सत्ता में तो आ गई मगर रेलयात्रा के दौरान होने वाले मौतरूपी मर्ज को जड़ से न दूर कर, ट्वीट करने पर दूध और दवाई मुहैया कराने की वाहवाही लूटने में लग गई. इस के साथ ही बुलेट ट्रेन चलाने का दावा, ट्रेन में वाईफाई उपलब्ध करवाने का दावा और अब तो ट्रेन में ही शौपिंग कराने का दावा करने में लगी है. जबकि यात्री सुरक्षित अपने गंतव्य तक पहुंच पाएगा, यह सुनिश्चित नहीं है.
नियम है, नकेल नहीं
रेलवे के एक रिटायर्ड जनरल मैनेजर ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि भारतीय रेलवे की नियम पुस्तिका के अनुसार, ट्रैक के रखरखाव हेतु प्रतिदिन 3-4 घंटे निर्धारित हैं, मगर ऐसा हो नहीं पाता. ज्यादातर नियम स्टाफ की लापरवाही की भेंट चढ़ जाते हैं. कभी कभी ट्रैक के खाली न होने या फिर ट्रेन के विलंब से चलने की वजह से भी ऐसा होता है. वे बताते हैं कि भारतीय रेल की प्रक्रिया बहुत अच्छी तरह से सुपरिभाषित, लिखित और वितरित की जाती है, यदि उसका सही से पालन हो जाए तो शायद ही कोई दुर्घटना हो.
सुरक्षा सुस्त, किराया चुस्त
हाल के दिनों में रेलवे ने टिकट में फ्लैक्सी रेट जैसे नए नए शिगूफे छोड़ कर जम कर आमदनी बढ़ाई है. अकसर रेलयात्री यह कहते हुए मिल जाते हैं कि प्रथम श्रेणी की यात्रा का खर्च उतनी ही दूरी के विमान यात्रा के खर्च के लगभग बराबर है.
ऐसे में प्रश्न यह उठता है कि जब मुसाफिर का मुख्य मकसद एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचना है तो क्या रेलवे उस स्थान तक सुरक्षित पहुंचाने की गारंटी भी गंभीरता से लेता है. जवाब है, नहीं. तथ्य यह है कि 1 रुपए में मात्र 7 पैसा ही रख रखाव के लिए लगाया जाता है, बाकी दूसरे कामों में इस्तेमाल हो जाता है. हालांकि, साल 2014-2015 के मुकाबले सुरक्षा पर खर्च होने वाली रकम को साल 2017-2018 में 42,430 करोड़ रुपए से बढ़ा कर 65,241 करोड़ रुपए कर दिया गया है.
लाइफलाइन नहीं, किलरलाइन
रेलवे देश की लाइफलाइन कहलाती है, मगर इस के राजनीतिकरण ने इसे लगभग ‘किलरलाइन’ में तबदील कर दिया है. देखने में आता है कि गठबंधन सरकारों में यह मंत्रालय किसी मजबूत दल की झोली में ही रहा और ज्यादातर काम राष्ट्रीय स्तर पर न हो कर, क्षेत्रीय स्तर पर ही किए गए. पूर्व में अलग से पेश होने वाले रेलवे बजट में पश्चिम बंगाल, बिहार, रायबरेली, अमेठी जैसे क्षेत्रों को खास सौगातें मिलती रही हैं.
ऐसे में हाल ही में हुई रेल दुर्घटनाओं के ऊपर अगर लालू प्रसाद यादव यह तंज कसते हैं कि खूंटा बदलने से नहीं, संतुलित आहार देने व खुराक बदलने से भैंस ज्यादा दूध देगी तो इसे महज एक राजनीतिक बयान नहीं समझा जाना चाहिए, बल्कि इस को समग्र परिप्रेक्ष्य में देखना चाहिए. वास्तव में किसी मंत्री का मंत्रालय बदल देने से रेलवे का भला नहीं हो पाएगा. बेहतर होगा कि रेलवे में भ्रष्टाचार, गैरजिम्मेदाराना कार्यसंस्कृति समाप्त हो और रेलवे स्टाफ व मंत्रालय जनता के प्रति जवाबदेह बनें.
अब तक के जितने भी रेल मंत्री बने हैं, सभी ने रेल सुरक्षा पर बड़ी बड़ी बातें की हैं. फिलहाल वर्तमान रेल मंत्री पीयूष गोयल ने रेल की बदहाल स्थिति पर कोई सुधारात्मक कदम उठाया है, ऐसा तो लगता नहीं.
हाल में हुए प्रमुख रेल हादसे
हाल में स्टाफ के नकारेपन से कई दुर्घटनाएं हुईं. हद तो तब हो गई जब एक ही दिन में 4-4 रेल हादसे हुए और मोदी सरकार ने उन पर कोई कार्यवाही नहीं की.
24 नवंबर, 2017 : उत्तर प्रदेश के मानिकपुर में वास्कोडिगामापटना सुपरफास्ट ट्रेन की 12 बोगियां बेपटरी हो गईं, जिस से पितापुत्र समेत 3 यात्रियों की मौत हो गई और 9 यात्री घायल हो गए.
29 सितंबर, 2017 : मुंबई के एलफिंस्टन रोड उपनगरीय रेलवे स्टेशन के फुटओवर ब्रिज पर मची भगदड़ से 22 लोगों की मौत हो गई और 32 लोग घायल हो गए.
6 सितंबर, 2017 (एक ही दिन में 4 हादसे) : नए रेलमंत्री पीयूष गोयल की ताजपोशी के एक ही दिन बाद 4 रेल हादसे देश के अलगअलग हिस्सों में हुए. पहली घटना उत्तर प्रदेश के सोनभद्र में घटी जिस में शक्तिपुंज ऐक्सप्रैस के 7 डब्बे बेपटरी हो गए. दूसरी, नई दिल्ली के मिंटो ब्रिज स्टेशन के निकट रांचीदिल्ली राजधानी ऐक्सप्रैस का इंजन और पावरकार उतर गया. तीसरी, महाराष्ट्र में खंडाला के निकट मालगाड़ी पटरी से उतर गई. चौथी, फरुखाबाद और फतेहगढ़ के पास दिल्लीकानपुर कालिंदी ऐक्सप्रैस क्षतिग्रस्त होने से बच गई.
17 अगस्त, 2017 : उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर के निकट खतौली में पुरीउत्कल ऐक्सप्रैस के हादसे में 23 लोगों की जानें गईं, जबकि 150 से ज्यादा लोग घायल हुए.
22 अगस्त, 2017 : उत्तर प्रदेश के औरैया में कैफियत ऐक्सप्रैस के डंपर से टकराने के कारण 9 कोच पटरी से उतर गए, दर्जनों यात्री घायल हो गए.
21 मई, 2017 : उत्तर प्रदेश के उन्नाव स्टेशन के पास लोकमान्य तिलक सुपरफास्ट ट्रेन के 8 कोच पटरी से उतर गए, जिस में 30 यात्री गंभीर रूप से घायल हो गए.
15 अप्रैल, 2017 : मेरठलखनऊ राजधानी ऐक्सप्रैस के 8 कोच रामपुर के पास पटरी से उतर गए. इस में लगभग 1 दर्जन यात्री घायल हुए.
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उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से महज 58 किलोमीटर की दूरी पर उन्नाव शहर है. यहां के वारासगवर इलाके के सथनी गांव में 22 फरवरी को 19 साल की मोनी नामक लड़की को जिंदा जला दिया गया.
मोनी साइकिल से एक दिन अपने गांव से बाजार की तरफ जा रही थी. इतने में कुछ लड़के साइकिल से आए और उसे खेतों में खींच ले गए, फिर उस पर पैट्रोल छिड़क कर आग लगा दी. जान बचाने के लिए लड़की सड़क की ओर भागी पर उस की मदद करने वाला कोई न था. बदमाश लड़की को जलता छोड़ कर भाग गए. लड़की जल कर मर गई.
पुलिस ने 2 दिनों बाद विकास नामक एक लड़के को पकड़ कर जेल भेज दिया. विकास पर आरोप है कि उस की मोनी से दोस्ती थी. दोस्ती में दरार पड़ी तो उस ने यह कांड कर दिया. किसी लड़की को आज के सभ्य समाज में जिंदा जलाने की घटना क्रूर राजाओं और तानाशाहों की याद दिलाती है.
केंद्र और प्रदेश में सरकारें चला रही भारतीय जनता पार्टी के लिए उन्नाव महत्त्वपूर्ण जिला है. भाजपा के साक्षी महाराज यहां से सांसद है. उन के क्षेत्र में दलित लड़की की बर्बर हत्या से पता चलता है कि दबंगों का मनोबल कितना बढ़ा हुआ है.
प्रदेश सरकार में महत्त्वपूर्ण पद संभाल रहे विधानसभा अध्यक्ष हृदय नारायण दीक्षित का कार्यक्षेत्र भी उन्नाव ही है. एक ओर केंद्र से ले कर प्रदेश तक दोनों सरकारें ‘बेटी बचाव बेटी पढ़ाओ’ की बात कर रही हैं, तो वहीं दूसरी ओर इन्हीं सरकारों के दौर में लड़कियां जलाई जा रही हैं.
उन्नाव की घटना से कुछ ही दिनों पहले उत्तर प्रदेश की शिक्षानगरी कहे जाने वाले इलाहाबाद शहर में एक दलित युवक को एक रैस्टोरैंट में पीटपीट कर मार डाला गया. मारपीट की छोटी सी वजह थी. दोनों घटनाओं में सरेआम लोगों ने अकेले को मारा. उन्नाव की मोनी को पैट्रोल छिड़क कर जलाया गया तो इलाहाबाद के युवक को नाली के किनारे पीटपीट कर मार डाला गया. युवक के मरने के बाद भी उस को पीटा जाता रहा.
एनकाउंटर को सही ठहराते हुए उन्नाव और इलाहाबाद की घटनाएं पूरी तरह से बर्बरता से भरी हैं. यह तब है जब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ कहते हैं, ‘‘बदमाशों को उन की ही भाषा में जवाब दिया जाए.’’ पुलिस ने कुछ एनकाउंटर्स कर सनसनी फैलाने की कोशिश की पर दबंगों पर असर पड़ता तो ऐसी घटनाएं न घटतीं.
हिंदुत्व के नाम पर दबंगई
योगीराज में ये हिंदुत्व की रक्षा के नाम पर चोला बदल चुके हिंदू रक्षा के नाम पर दबंग और गुंडे सक्रिय हो गए हैं. ये भगवा गमछाधारी बन गए हैं. अब इन को किसी पार्टी के झंडे तक की जरूरत नहीं रह गई है. ऐसे दबंग नेताओं के लिए भीड़ जुटाने में भी आगे हो जाते हैं. जहां अच्छे काम में 5 लोग एकसाथ नहीं खड़े होते वहां ये लोग हत्या जैसे जघन्य अपराध करने पर भी बहुत सारे लोगों को तैयार कर लेते हैं.
उन्नाव और इलाहाबाद दोनों शहरों की ही घटनाओं में दबंगों का साथ देने वाले दूसरे लोग भी थे. कासगंज में हुए दंगे में भी ऐसे ही दबंग शामिल थे.
इन को कानून की परवा नहीं होती. कासगंज में धारा 144 लागू होने के बाद भी तिरंगा यात्रा निकालने की अनुमति लेने की जरूरत नहीं समझी गई.
प्रदेश में अगर कानून का राज होता तो लोगों में जरूर कानून का डर होता और एक के बाद एक बर्बर घटनाएं नहीं घटतीं. गौरक्षा और धर्म के नाम पर कानून तोड़ने वाले जब बचने लगे तो दूसरे दबंगों का भी मनोबल बढ़ने लगा. ये अब उद्दंड हो गए हैं. हर गांव गली में जाति की खाई लगातार गहरी होती जा रही है.
ऐसे में जब लोगों को यह लगता है कि सामने वाला उस से नीची जाति का है तो वह और भी ज्यादा हिंसक हो कर उस को पीटने लगता है. दलितों के साथ हो रही घटनाओं के पीछे पाखंडी सोच का बड़ा हाथ है. इस को रोज बढ़ावा दिया जा रहा है.
धर्म की आड़ में प्रवचनों द्वारा लोगों को लगातार यह बताया जा रहा है कि समाज में अलगअलग खेमे भगवान की देन हैं. यह पिछले जन्मों में किए गए पापों का फल है. दबंगई करनेवाले जानते हैं कि उन पर उंगली नहीं उठाई जाएगी क्योंकि यह समाज का दस्तूर है.
दलितों को आज भी धार्मिक कहानियों में यही समझाया जाता है कि सवर्णों व उच्च जाति की सेवा करो, तभी कल्याण होगा. यही सोच एक दलित लड़की को जिंदा जलाने को प्रेरित करती है. आज तक जिन बाबाओं के आश्रमों का परदाफाश हुआ वहां सब से अधिक दलित लड़कियां ही पाई गईं. इस से भी समाज में ऊंचनीच के अंतर को समझा जा सकता है.
खामोश हैं दलित संगठन
दलितों के संगठन इन घटनाओं पर चुप्पी साधे हुए हैं. बहुजन समाज पार्टी की चुप्पी सब से बड़ी है. इस तरह की घटनाओं पर भाजपा के नेता कौशल किशोर दोनों ही जगहों पर गए और वहां पीडि़त परिवारों की मदद का पूरा भरोसा दिलाया. दलितों के मुखर न होने की प्रमुख वजह यह है कि भाजपा ने हिंदुत्व के नाम पर इन को अपने साथ कर लिया था.
देश और प्रदेश के तमाम बडे़ दलित नेता भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़े और अब वे भाजपा के साथ हैं. ऐसे में वे चुप हैं. दलित संख्या में अधिक हैं. ऐसे में नेता उन को साथ रख कर वोट लेने तक उन के साथ रहते हैं. बाद में वे उन की मूल समस्याओं पर चुप हो जाते हैं. दलित अपने से ऊंची जातियों से मेलजोल नहीं रख पाते हैं. ऊंची जातियों वालों का मानना है कि दलितों को वैसे ही रहना चाहिए जैसे वे सदियों से रहते आए हैं.
आज जिस तरह दबंगों के हौसले बुलंद हैं उस से सरकार की छवि खराब हो रही है. इलाहाबाद और उन्नाव की दोनों ही घटनाओं में पुलिस ने पहले मुकदमा दर्ज नहीं किया. इलाहाबाद और उन्नाव की घटनाओं के वीडियो और फोटो जब सोशल मीडिया पर वायरल हुए तब पुलिस हरकत में आई.
थाना स्तर पर आज भी दलित पीडि़त के पक्ष में कोई कार्यवाही नहीं होती है. सरकार यह कह कर अपना पल्ला झाड़ती रहती है कि वह प्रेमप्रसंग है, वह पारिवारिक विवाद है वगैरहवगैरह. असल में तो यह वर्णवाद है, वह भी सदियों पुराना.
सरकार के संरक्षण से बढ़ रही दबंगई
–आर एस दारापुरी (पूर्व आईपीएस, सदस्य – उत्तर प्रदेश स्वराज समिति)
उत्तर प्रदेश में दलितों के प्रति बढ़ रही हिंसक घटनाओं पर जहां बहुत सारे दलित नेता और दल चुप्पी साधे हैं वहीं अवकाशप्राप्त आईपीएस अधिकारी और उत्तर प्रदेश स्वराज समिति के सदस्य आर एस दारापुरी पूरी तरह से मुखर हैं. वे कहते हैं, ‘‘दलितों पर हिंसक घटनाओं की शुरुआत मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के शपथ लेते ही शुरू हो गई थी. जब सहारनपुर के शब्बीरपुर गांव में कहा गया, ‘अगर यूपी में रहना है तो योगीयोगी कहना है’. इस नारे में ही बाद में वंदेमातरम भी जोड़ दिया गया. यही नहीं, वहां बाबासाहेब को ले कर भी आपत्तिजनक टिप्पणियां की गईं. इस से हिंदुत्व के नाम पर काम करने वालों का हौसला बढ़ गया.
‘‘सरकार के इस कदम से खुली गुंडई, हिंसा और दबंगई को संरक्षण मिलने लगा. कई तरह की वाहनियां और सेनाएं अपनाअपना विरोध प्रदर्शन करने लगीं. इस से समाज का माहौल खराब हुआ. समाज में कानून का भय खत्म हो गया. समाज में एक हिंसक वातावरण बन गया है जो पूरे समाज के लिए घातक है.’’
दलित आंदोलन की चुप्पी पर दारापुरी ने कहा, ‘‘बसपा के समय से दलित आंदोलन कमजोर हो गया था. बाबासाहेब हमेशा कहते थे कि हिंदूराष्ट्र समाज के लिए घातक होगा. यहां पर शंबूक और बाली की तरह लोगों के वध होंगे. सीता की तरह महिलाओं के साथ अन्याय होगा. वे हमेशा देश में हिंदूराष्ट्र की स्थापना का विरोध करते रहे.
‘‘कांशीराम आंदोलन की जगह उस तरह काम करते थे जिस में दलित कमजोर बन कर उन के पीछेपीछे चलता रहे. जिस वजह से आज भी दलित मुखर हो कर अपनी बात नहीं कह पा रहा है. आज वह फिर से बसपा का साथ छोड़ ऊंची जातियों की अगुआई करने वालों के पीछे खड़ा हो गया है. इस के साथ ही भाजपा ने दलित नेताओं को अपने पक्ष में कर लिया, इसलिए दलित चुप हैं. उन को समझ में ही नहीं आ रहा है कि वे क्या करें?’’
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वर्ष 2014 में लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान देश की जनता बड़े मुग्धभाव से नरेंद्र मोदी की तरफ देखती थी. वे कांग्रेसी नेताओं से बेहतर, लच्छेदार भाषण देते थे, उम्मीदें बंधाते थे और सब्जबाग दिखाने के तो वे विशेषज्ञ हैं. तब लगता था कि कोई जादूगर पाशा या जादूगर सरकार मंच पर है जो अपनी छड़ी घुमाएगा और देखते ही देखते देश की तकदीर बदल जाएगी. खेत लहलहाने लगेंगे, उत्पादन चारगुना बढ़ जाएगा, बैंक खातों में नोट बरसने लगेंगे, आतंकी सहम कर भाग जाएंगे और इस से भी ज्यादा अहम बात यह, कि हर हाथ के लिए काम होगा. यानी कोई बेरोजगार नहीं रहेगा.
उस दौरान नरेंद्र मोदी बड़े फख्र से खुद को जब चाय वाला कहते थे तो जनता उन पर बलिहारी जाती थी कि देखो, इतने नीचे से वे इतने ऊंचे तक आ गए यानी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बन गए. नतीजतन, देशवासियों ने उन के हाथों में देश सौंप कर बेफिक्र होते अच्छे दिनों का इंतजार करने लगे.
उन के प्रधानमंत्रित्वकाल के 4 वर्ष बीत जाने के बाद भी अच्छे दिन नहीं आए तो अब लोगों को शक हो रहा है कि यह कैसा जादू है जिस के चलते सबकुछ उलटापुलटा हो रहा है, किसान पहले से ज्यादा खुदकुशी करने लगे हैं. जो नोट बड़े जतन से अपने खर्चों में से कटौती कर बचा कर रखे थे वे तक नोटबंदी के चलते छू हो गए थे. जीएसटी के कारण कारोबारी बेकार होते जा रहे हैं. आतंकी देश के सैनिकों की खुलेआम हत्याएं करने लगे हैं जिस से शहीदों की तादाद बढ़ रही है, यह तो हमारी सेना की देशभक्ति और पे्रम है कि वह विद्रोह तो दूर की बात है, कोई एतराज भी दर्ज नहीं कराती. फसलों की पैदावार तो कहीं बढ़ी नहीं और नौजवान थोक में बेरोजगार हो कर हताशा का शिकार हो चले हैं.
2 आरजू में और 2 साल इंतजार में कटे, लेकिन इस दौरान बुरा यह हुआ कि जनता का ब्लडप्रैशर कभी लो और कभी हाई होने लगा कि अब आगे क्या होगा. होने के नाम पर कुछ नहीं होना, यह तो सभी को समझ आ गया पर न होने के नाम पर अब क्या होगा, यह सोचसोच कर लोग हैरानपरेशान हैं.
नरेंद्र मोदी ने जनता की नब्ज टटोली तो वे चिंता में पड़ गए जो नए बजट को देख गश खाने लगी थी. ऐसे में एक दिन उन का ध्यान पकौड़ों की तरफ गया तो वे अपने सुनहरे अतीत में खो गए जिसे सिगमंड फ्रायड जैसे मनोविज्ञानी अतीत और बचपन में जीना कहते रहे हैं.
हर कोई जानता है कि यह पकौड़ा एक परंपरागत भारतीय व्यंजन है जो बेसन व तेल के मिश्रण से तैयार किया जाता है. छोटे साइज का पकौड़ा, पकौड़ी कहलाता है. इसे आलू, प्याज, पनीर सहित गिलकी व पालक तक से बनाया जाता है. भारतीय इसे बड़े चाव से खाते हैं.
होली के दिनों में भांग के पकौड़े खाने का रिवाज है, जिन के सेवन से लोग 2014 के सम्मोहित दौर में पहुंच जाते हैं. भांग का पकौड़ा बड़ा असरकारी होता है. फागुन के मदमस्त माहौल में तो इस का असर हजारगुना तक बढ़ जाता है.
पकौड़े की एक खूबी यह है कि इसे एक बार खाओ तो मन नहीं भरता. लिहाजा, लोग ठूंसठूंस कर पकौड़े खाते हैं और दूसरे दिन स्वच्छ भारत अभियान पर पलीता लगाते नजर आते हैं. आयुर्वेदिक चूर्णों की बिक्री में पकौड़ों के सेवन का बड़ा योगदान है.
देश के बेरोजगार होते नौजवानों की चिंता का हल प्रधानमंत्रीजी को यों ही पकौड़े में नहीं दिख गया कि उन्होंने युवाओं को पकौड़ा बेचने का मशवरा दे डाला. पकौड़ा बेचने की सलाह पर व्यापक और देशव्यापक प्रतिक्रियाएं हुईं और इतनी हुईं कि अगर पकौड़े में चेतना होती तो वह घबरा कर खुदकुशी कर लेता. देश की सारी समस्याएं पकौड़े में सिमट कर रह गईं. जनता ने अभी राफेल डील के बाबत मुंह खोला ही था कि उस में पकौड़े ठूंस दिए गए.
जो राजनीति कल तक चायमय थी, वह पकौड़ामय हो गई. पकौड़े पर शोध होने लगे लेकिन इधर युवाओं को यह मशवरा नागवार गुजरा कि हम डिगरी ले कर पकौड़ा बेचने जैसा क्षुद्र उद्यम क्यों करें, यह तो शर्म की बात है. इस पर भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने बिदकते युवाओं को समझाया कि पकौड़े बेचना कोई शर्म की बात नहीं. वे नहीं बता पाए कि यह फख्र की बात कैसे है. चूंकि पार्टी के मुखिया ने कहा था, इसलिए इसे बाद में तरहतरह से जगहजगह कई भाजपाई दरबारियों ने दोहराया कि पकौड़ा बेचना शर्म या हर्ज की बात नहीं.
हम ऐसा कुछ नहीं कर पा रहे हैं जिस से नौकरियां और रोजगार के मौके पैदा हों, यह बात शीर्ष नेताद्वय ने बड़े फागुनी अंदाज से कही थी कि अगर नौकरीरोजगार नहीं मिल रहे तो पकौड़े बेचो. यह इन की गलती नहीं थी, बल्कि मौसम की थी, होली के महीनाभर पहले से ही मानवदिल हंसीमजाक के लिए मचलने जो लगता है.
राजनीति का एक अलिखित सिद्धांत है कि जब सत्तापक्ष हाथ पर हाथ धरे बैठा रहता है तब विपक्ष सुस्त पड़ जाता है. इधर मोदी और शाह ने पकौड़ा उछाला, तो विपक्ष ने उसे लपक कर पकड़ लिया. तरहतरह की दिलचस्प बयानबाजियां हुईं. जगहजगह सार्वजनिक रूप से पकौड़े तल कर विरोध जताया गया. पकौड़ामय हो चले देश को एक काम मिल गया. सोशल मीडिया के सूरमा पोर्न साइट्स और धर्म को भूलभाल कर पकौड़े को ले कर पोस्ट डालने लगे. पकौड़े ने इतनी प्रसिद्धि अपने उद्भव के बाद कभी हासिल नहीं की थी जितनी साल 2018 के फरवरी महीने में की.
इन महावीरों ने साल 2018-19 के बजट को पकौड़ा बजट घोषित कर दिया. बुद्धिजीवी और विद्वान भी पकौड़ाचिंतन में व्यस्त हो गए. कइयों ने तो पकौड़े पर सब्सिडी की मांग कर डाली और कुछ लोग पकौड़े को भी आधार से लिंक करने की बात करने लगे. एक पोस्ट में तो पकौडे़ बनाने का राष्ट्रीय व्यावसायिक चित्रण यह बताते किया गया कि पकौड़ा बेचने का आइडिया मोदी ने दिया, इस के लिए गैस रिलायंस वाला अंबानी देगा, फौर्च्यून का तेल अडानी देगा और रामदेव पंतजलि का बेसन मुहैया कराएगा.
कुछ अर्थशास्त्रियों ने भी अपना ज्ञान बघारा कि जब सभी लोग पकौड़े बेचने लगेंगे तो उन्हें खरीदेगा कौन और क्या पकौड़े के स्टौल (हकीकत में ठेला या खोमचा) लगाने के लिए सरकार कर्ज देगी. पकौड़ा व्यवसाय को ले कर लोग आशान्वित भी हैं कि मुमकिन है ज्यादा पकौड़े बेचने वाले को सरकार पद्मश्री दे.
धर्म के जानकारों ने धर्मग्रंथ छान मारे पर किसी वेदपुराण, संहिता या उपनिषद में पकौडे़ का जिक्र नहीं मिला. फिर भी, उन्होंने मान लिया कि पकौड़ा सनातनी व्यंजन है. इधर, पूछा यह भी जा रहा है कि पकौड़े न खाने वालों को कहीं राष्ट्रद्रोही तो करार नहीं दिया जाएगा और क्या भगवा रंग के पकौड़े बनाने, खाने व बेचने वालों को देशभक्त का खिताब दिया जाएगा?
कुछ अदूरदर्शी लोगों की राय यह है कि जल्द ही बाबा रामदेव पंतजलि बेसनी पकौड़ा लौंच कर सकते हैं क्योंकि वे मैदा के घोर दुश्मन हैं. नई पीढ़ी पिज्जा, चाउमीन और नूडल्स खा कर अपनी सेहत खराब कर रही है, उस से बचने का एकमात्र तरीका पकौड़ा है जो आखिरकार एक आयुर्वेदिक पकवान है. इस का इकलौता आधार यह है कि इसे पीढि़यों से देश खा रहा है और अफ्रीका या यूरोप ने अभी पकौड़े पर अपनी दावेदारी नहीं जताई है.
हैरानी नहीं होनी चाहिए अगर जल्द ही कोई प्रदेश पकौड़े की बढ़ती लोकप्रियता देख अपनी दावेदारी इस पर ठोक दे. रसगुल्ला ओडिशा की डिश है या पश्चिम बंगाल की, यह तय करने में अदालतों को पसीने आ गए थे.
हरहर पकौड़ा, घरघर पकौड़ा के लगते नारों के बीच अच्छी बात यह है कि पकौड़ा एक धर्मनिरपेक्ष और जातिवाद से मुक्त व्यंजन है. पकौड़े का वंशवाद से भी कोई संबंध नहीं है. मायावती जैसी नेत्री यह आरोप नहीं लगा सकतीं कि चूंकि पकौड़ा मनुवाद का प्रतीक है, इसलिए इसे प्रोत्साहन दिया जा रहा है. वामपंथी भी पकौड़े पर खामोश रहने को विवश हैं, क्योंकि इस का सामंतवाद, जमींदारी या शोषण से कोई संबंध अभी तक सामने नहीं आया है. पकौड़ा दिल्ली के छोलेकुलचे और भठूरों के खिलाफ भी कोई साजिश नहीं है.
पकौड़े की राजनीति के अपने अलग नजरिए हैं. लोग जिस दिलचस्पी से पकौड़ापकौड़ा खेल रहे हैं, मुमकिन है इसे प्रसाद के रूप में देवीदेवताओं को चढ़ाया जाने लगे. कुछ शिक्षाविदों की राय है कि पकौड़ा निर्माण और विपणन को स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल किया जाना चाहिए, जिस से देश का भविष्य स्वावलंबी बने. देश के बच्चे अब डाक्टर, इंजीनियर या साइंटिस्ट बनने के सपने नहीं देखते, बल्कि वे पकौड़ाबाज बनने की ख्वाहिश पालने लगे हैं. ऐसे में देश का भविष्य वाकई उज्ज्वल है, यही कहा जाएगा.
नरेंद्र मोदी वाकई अतिमानव हैं जो देश का मनोरंजन करने के लिए नईनई तरकीब पेश करते रहते हैं. उन के सामने कर्नाटक, त्रिपुरा, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान विधानसभा के चुनावों की चुनौती है. उन्हें देश को विश्वगुरु भी बनाना है. उन के चिंतन में बाधा डाल रहे लोग पकौड़ाचिंतन में व्यस्त हो गए हैं, यह किसी उपलब्धि से कम बात नहीं.
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धर्म की खातिर किस तरह झूठ बोला जा सकता है इस का एक चौंकाने वाला उदाहरण पेश किया विज्ञान एवं तकनीकी मंत्री डा. हर्षवर्धन ने. ये जनाब महान वैज्ञानिक व भौतिकी विद्वान स्टीफन हाकिंग को श्रद्धांजलि देते समय कहने लगे कि इन वैज्ञानिक ने भी माना था कि वेदों का ज्ञान उन के और अल्बर्ट आइंस्टीइन के ज्ञान से कहीं अधिक है.
जब मंत्री से पूछा गया कि इस का संदर्भ क्या है तो उन्होंने बड़ी ही ढिठाई से उत्तर दिया कि ढूंढ़ लो खुद. ऐसा ही हमारे पंडेपुजारी रोज करते हैं. अब औरतों के टीका लगाने को ही ले लीजिए. यह धार्मिक रिवाज बेसिरपैर का है पर इस की वैज्ञानिकता सिद्ध करने के लिए कह डाला गया है कि जहां यह टीका लगता है वहां नसों का केंद्र है. इस से ऊर्जा नष्ट नहीं होती है. उस से खून का दौरा मुंह की पेशियों तक चालू रहता है. यह किस तरह के शोध से पता चला, यह बताने की जरूरत तो है ही नहीं.
नदियों के ऊपर से गुजरते हुए सैकड़ों लोग बसों, गाडि़यों और खिड़कियां खुली हों तो ट्रेनों से पानी में पैसे फेंकते हैं. वैज्ञानिकता सिद्ध करने के लिए मनगढ़ंत कह दिया गया है कि इस से कौपर को पानी में डाला जाता है ताकि पानी के विभिन्न गुणों का संतुलन बना रहे.
मंदिर जाने के लिए भी वैज्ञानिकता की खोज कर ली गई, जो शायद नासा के वैज्ञानिकों को भी शर्मसार कर दे. कह डाला गया है कि जहां मंदिर में मूर्ति स्थापित होती है, वहां गोपुरम होता है जो पृथ्वी की चुंबकीय शक्ति को एकत्रित कर लेता है और मूर्ति के माध्यम से मंदिर में जाने वालों को ऊर्जा देता है.
इस प्रकार के बहुत से झूठ रोज गढ़े जाते हैं ताकि इस वैज्ञानिक युग में भी धार्मिक पागलपन को बनाए रखा जा सके. ये मंत्री ही ऐसे नहीं हैं, जो इस तरह की मूर्खतापूर्ण बातें कहते हैं, हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक कह चुके हैं कि गणेश तो प्लास्टिक व ट्रांसप्लांट सर्जरी का कमाल है, जो हमारे पुराणों में पहले से ही मौजूद है.
यह जानने के लिए कोई तैयार नहीं कि इस सब ज्ञानविज्ञान को हम पहले से ही जानते हैं तो आज दुनिया के सब से पीछे वाले देशों में क्यों हैं? हमारी अर्थव्यवस्था बड़ी है पर अपनी अधिक भूमि और अधिक जनसंख्या के कारण वरना करोड़ों लोग यहां आज भी जानवरों की तरह रहने को मजबूर हैं.
असल में इस प्रकार का धार्मिक दुष्प्रचार औरतों पर भारी पड़ता है, जो इन अंधविश्वासों को मान कर शारीरिक, मानसिक गुलामी झेलने को मजबूर कर दी जाती हैं. कभी उन्हें भूखा रहना पड़ता है, कभी नंगे पांव चलना पड़ता है, कभी रात भर गला फाड़ कर चिल्लाना पड़ता है, तो कभी घंटों बैठ कर ध्यान लगाने या प्रवचन सुनने के नाम पर समय बरबाद करना पड़ता है. उन्हें डा. हर्षवर्धन जैसे लोगों के बेसिरपैर के बोल सुनने पड़ते हैं.
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सुरवीन चावला अपने बोल्ड अंदाज के कारण अक्सर सुर्खियों में रहती हैं. ‘हेट स्टोरी-2’ अभिनेत्री शादीशुदा होने का खुलासा कर सबको चौंका चुकी हैं. हाल ही में दिए इंटरव्यू में सुरवीन ने पहली बार अपनी मैरिड लाइफ पर खुलकर बात की. सुरवीन का कहना है कि शादी के बाद कुछ नहीं बदला है, बल्कि उनकी जिदंगी और बेहतर हो गई है. सुरवीन का कहना है कि वह अपने को-एक्टर को किस कर सकती हैं, कैमरे के सामने न्यूड हो सकती हैं, मेरे पति कुछ नहीं कहेंगे.
एक्ट्रेस सुरवीन चावला ने जनवरी में इस बात से पर्दा हटाया था कि साल 2015 में ही इटली में अपने लौन्ग टाइम बौयफ्रेंड अक्षय ठक्कर के साथ शादी कर चुकी हैं. हाल ही में दिए इंटरव्यू में सुरवीन ने मैरिड लाइफ के बारे में बात करते हुए कहा, ”शादी के बाद उनकी जिंदगी में कोई परिवर्तन नहीं आया है, बल्कि उनकी लाइफ और बेहतर हो गई है.
मुझे नहीं पता कि शादी की खबर से लोग इतने हैरान क्यों हुए?” सुरवीन ने आगे कहा, ”अब वो दिन चले गए हैं जब अभिनेत्रियां अपने प्रोफेशनल लाइफ के लक्ष्य को पूरा कर ही शादी करती थीं. बहुत सारी अभिनेत्रियों ने शादी के बाद अच्छा मुकाम हासिल किया है.”
सुरवीन ने कहा, मैं करियर में अच्छा कर रही थी, मैं एक महत्वाकांक्षी लड़की हूं, इसका मतलब यह नहीं है कि मेरा शादी करने का कोई प्लान नहीं है. जब किसी लड़के के साथ मैं सहज महसूस करती हूं तो मैं शादी के लिए इंतजार क्यों करुं? मेरे काम के प्रति मेरे पति काफी सपोर्टिंव हैं.
शादी की बात अगर है तो मैं कहूंगी कि सही समय पर शादी कर लेनी चाहिए. सुरवीन ने आगे कहा, वह अपने पति के साथ खुश हैं. मैं अपने को-एक्टर को किस कर सकती हूं और कैमरे के सामने न्यूड हो सकती हूं, वह सब कुछ कर सकती हूं जो स्क्रिप्ट की डिमांड होगी, मेरे पति कुछ भी नहीं कहेंगे.
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