प्रधानमंत्री जी जरा बताइये कहां हैं अच्छे दिन

भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ सदस्यों यशवंत सिन्हा, अरुण सिन्हा और शत्रुघ्न सिन्हा के तीखे बयानों के बाद नरेंद्र मोदी ने अपने बचाव में, अपना पक्ष रखने के लिए जनता की अदालत में आंकड़ों का ढेर, कंपनी सैक्रेटरियों की एक सभा में पेश किया. भाषण लंबा था, बहुत से आंकड़े स्क्रीन पर थे, नए तरह के वादे थे पर वे सुलगती आग को ठंडा कर पाएंगे, इस में संदेह है.

किसी प्रधानमंत्री को यह हक नहीं कि 3 साल राज करने के बाद वह पिछले 70 सालों, 10 सालों या अपने से पहले के 2-3 सालों के आंकड़ों के सहारे अपने लिए गोरखपुरी औक्सीजन को ढूंढ़ने की कोशिश करे. मनमोहन सिंह की सरकार के खिलाफ जनता थी तभी तो नरेंद्र मोदी को भारी सफलता मिली. जनता को मोदी  से बहुत उम्मीदें हैं.

उन उम्मीदों को पूरा न करने की जगह यह कहना कि पिछली सरकार कौन सी अच्छी थी, बेबुनियाद है. आज जनता एक तरफ आर्थिक समस्याओं से जूझ रही है तो दूसरी तरफ देशभर में फैल रही दहशत, गुंडागर्दी, गालीगलौज और विरोधी को मार डाले जाने के वातावरण को झेल रही है. ये दोनों प्राकृतिक आपदाएं नहीं हैं, ये दोनों 2014 में बनी सरकार की नई देन हैं.

जनता ठगा महसूस कर रही है कि वह भ्रष्ट सरकार से मुक्त हुई या नहीं. उसे तो अपने ऊपर हर रोज हावी होती और उस के हाथ बांधती सरकार नजर आ रही है. कंपनी सैक्रेटरियों से नरेंद्र मोदी ने इस तरह का कुछ नहीं कहा जो आम जनता को राहत दे सके. हां, जिन कंपनियों में उन के श्रोता सैक्रेटरी हैं, कंपनी कानून की बाध्यता के कारण उन कंपनियों के आंकड़े अच्छे हैं क्योंकि यह दिख रहा है कि पैसा आम छोटे, बहुत छोटे और पटरी वाले व्यापारियों के हाथों से निकल कर मोटी धन्ना सेठ कंपनियों के हाथों में जा रहा है.

नोटबंदी बिलकुल फेल ही नहीं हुई, लोगों पर भूकंप साबित हुई है, इस में अब कोई संदेह नहीं रहा. 8 नवंबर को कहा गया था कि नोटों के पुराने काले, आतंकी, नकली नोटों के महल की जगह साफसुथरा, चमचमाता, सहज, सुलभ भवन मिलेगा जिस में केवल अमीर नहीं, हर गरीब को जगह मिलेगी. पता चला कि पुराना महल तो गिर गया पर अधबने, बिना खिड़कियों, दरवाजों वाले, ऊंचे सरकारी भवन में जनता को ला पटक दिया गया है.

यही गुड्स ऐंड सर्विसेज टैक्स के बारे में कहा गया कि 1 जुलाई, 2017 से टैक्स स्वतंत्रता मिलेगी. पर 1947 की स्वतंत्रता के बाद की जनता को बेहाली से गुजरना पड़ रहा है. जो दर्द लाखों ने 1947 में राजनीतिक स्वतंत्रता की खातिर सहा, वही अब जीएसटी लाखों को आर्थिक स्वतंत्रता के नाम पर कंप्यूटरों व रिटर्नों की जंजीरों के कारण दे रहा है. सरकारी आजादी, गुलामी का कब रूप ले लेगी, यह न भाजपा की भक्त जनता ने सोचा था न भाजपा के अतिभक्त व्यापारियों ने. दोनों बहुत खिन्न और रोष में हैं.

नरेंद्र मोदी का कहना कि बस कुछ दिन और, अच्छे दिन आने वाले हैं इतनी बार दोहराया जा चुका है कि इस पर सहज विश्वास नहीं हो रहा. मोदी कह रहे हैं कि वे जीएसटी में सुधार करेंगे पर तेजाब तो बोतल से निकल चुका है और बोतल टूट चुकी है. अब जितना मरजी पानी डाल लो, वह जनता को, व्यापार को, घरघर को झुलसाएगा तो सही. आंकड़ेबाजी पढ़ेलिखों के लिए है पर वे तो सहीगलत पहचानते हैं और प्रधानमंत्री के आंकड़ों की पोल खोलने में लगे हैं.

आम जनता को अपनी पक्की नौकरी, ज्यादा पैसे और सुरक्षा की चिंता है. नरेंद्र मोदी ने अपने भाषण में किसी ठोस कदम का वादा नहीं किया जिस से कंपनियों को नुकसान पहुंचे और जनता को लाभ पहुंचे. कंपनियां देश व अर्थव्यवस्था की दुश्मन नहीं हैं, उन के बिना जंगल मरुस्थल बन जाएंगे पर वे जंगल कुछ की मिलकियत नहीं रह सकते.

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जब तंबाकू आपकी लत बन जाए

25 साला रिंकू निचले तबके के एक मजदूर का बेटा था. जब वह 12 साल का था, तभी उस ने अपने पिता के साथ मजदूरी पर जाना शुरू कर दिया था. काम के दौरान जब उस ने साथी मजदूरों को थकान उतारने के लिए तंबाकू, गुटका, बीड़ीसिगरेट का सेवन करते देखा, तो उस की भी ऐसा करने की इच्छा होती थी. एक दिन रिंकू ने एक मजदूर से बीड़ी मांग कर पी, जो बाद में आदत बन गई. जब रिंकू 22 साल का हुआ, तो उस के मुंह में छाले की समस्या बनी रहने लगी. जब आम दवाओं से उसे कोई फायदा नहीं हुआ, तो उस ने पास के एक सरकारी अस्पताल में एक डाक्टर को अपनी समस्या बताई.

डाक्टर ने रिंकू के मुंह के छालों की जांचपड़ताल के बाद कैंसर की जांच कराने की सलाह दी. रिंकू ने जरूरी टैस्ट कराए, तो पता चला कि उसे मुंह का कैंसर हो चुका है.

चूंकि रिंकू एक गरीब मजदूर का बेटा था, इसलिए वह अपनी बीमारी का इलाज सही तरीके से नहीं करा पाया और 25 साल की उम्र में कैंसर की वजह से उस की मौत हो गई.

अनिल को बचपन में ही स्कूल में गलत दोस्तों की संगत पड़ गई और वह तंबाकू व गुटका का सेवन करने लगा और इसे अपनी लत बना लिया.

जब अनिल की 22 साल की उम्र में शादी हुई, तो उसे लगा कि वह एक नई जिंदगी की शुरुआत कर रहा है. इस बीच वह एक बच्चे का बाप भी बन गया.

कुछ समय तक तो सबकुछ ठीकठाक रहा, लेकिन एक दिन उसे लगा कि वह अपना मुंह पूरी तरह नहीं खोल पा रहा है. जब उस ने डाक्टर से जांच कराई, तो पता चला कि उसे मुंह का कैंसर हो चुका है, जो आखिरी स्टेज पर है.

अनिल के पिता सरकारी नौकरी करते थे. वे उस के इलाज के लिए देश के बड़ेबड़े अस्पतालों में दौड़े, लेकिन पिछले साल अनिल की कैंसर की वजह से मौत हो गई.

मुंह व फेफड़े का कैंसर होने की अहम वजह तंबाकू का ज्यादा सेवन करना है, क्योंकि तंबाकू में कैंसर बनाने वाले निकोटिन और नाइट्रोसोप्रोलिन जैसे खतरनाक तत्त्व पाए जाते हैं.

तंबाकू से बनी बीड़ी व सिगरेट में कार्बन मोनोऔक्साइड, थायोसाइनेट, हाइड्रोजन साइनाइड व निकोटिन जैसे खतरनाक तत्त्व पाए जाते हैं, जो न केवल कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी को जन्म देते हैं, बल्कि शरीर को भी कई खतरनाक बीमारियों की तरफ धकेलते हैं.

जो लोग तंबाकू या तंबाकू से बनी चीजों का सेवन नहीं करते हैं, वे भी तंबाकू का सेवन करने वाले लोगों खासकर बीड़ीसिगरेट पीने वालों की संगत में बैठ कर यह बीमारी मोल ले लेते हैं. इसे अंगरेजी भाषा में ‘पैसिव स्मोकिंग’ कहते हैं.

नुकसान ही नुकसान

तंबाकू के सेवन में न केवल लोगों की कमाई का ज्यादातर हिस्सा बरबाद होता है, बल्कि इस से उन की सेहत पर भी कई तरह के गलत असर देखने को मिलते हैं, जो बाद में कैंसर के साथसाथ फेफड़े, लिवर व सांस की नली से जुड़ी कई बीमारियों को जन्म देने की वजह बनते हैं.

तंबाकू या सिगरेट का इस्तेमाल करने से सांस में बदबू रहती है व दांत गंदे हो जाते हैं. इस में पाए जाने वाला निकोटिन शरीर की काम करने की ताकत को कम कर देता है और दिल से जुड़ी तमाम बीमारियों के साथसाथ ब्लड प्रैशर की समस्या से भी दोचार होना पड़ता है.

पहचानें कैंसर को

 डाक्टर वीके वर्मा का कहना है कि पूरी दुनिया में जितनी तादाद में मौतें होती हैं, उन में से 20 फीसदी मौतों की वजह सिर्फ कैंसर है. गाल, तालू, जीभ, होंठ व फेफड़े में कैंसर की एकमात्र वजह तंबाकू, पान, बीड़ीसिगरेट का सेवन है.

अगर कोई शख्स तंबाकू या उस से बनी चीजों का इस्तेमाल कर रहा है, तो उसे नियमित तौर पर अपने शरीर के कुछ अंगों पर खास ध्यान देना चाहिए.

अगर आप पान या तंबाकू का सेवन करते हैं, तो यह देखते रहें कि जिस जगह पर आप पान या तंबाकू ज्यादातर रखते हैं, वहां पर कोई बदलाव तो नहीं दिखाई पड़ रहा है. इन बदलावों में मुंह में छाले, घाव या जीभ पर किसी तरह का जमाव, तालू पर दाने, मुंह का कम खुलना, लार का ज्यादा बनना, बेस्वाद होना, मुंह का ज्यादा सूखना जैसे लक्षण दिखाई पड़ रहे हैं, तो तुरंत नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र पर जा कर अपनी जांच कराएं. बताए गए सभी लक्षण कैंसर की शुरुआती दशा में दिखाई पड़ते हैं.

बढ़ती तंबाकू की लत

 अकसर स्कूलकालेज जाने वाले किशोरों व नौजवानों को शौक में सिगरेट के धुएं के छल्ले उड़ाते देखा जा सकता है. यह आदत वे अपने से बड़ों से सीखते हैं.

सरकार व कोर्ट द्वारा सार्वजनिक जगहों पर धूम्रपान करने पर पूरी तरह से रोक लगाई गई है और अगर ऐसा करते हुए किसी को पाया जाता है, तो उस पर जुर्माना भी लगाए जाने का कानून है, लेकिन यह आदेश सिर्फ आदेश बन कर ही रह गया है. हम गुटका खा कर जहांतहां थूक कर साफसुथरी जगहों को भी गंदा कर बैठते हैं, जो कई तरह की संक्रामक बीमारियों की वजह बनता है.

पा सकते हैं छुटकारा

 एक सर्वे का आंकड़ा बताता है कि 73 फीसदी लोग तंबाकू खाना छोड़ना चाहते हैं, लेकिन इस का आदी होने की वजह से वे ऐसा नहीं कर पाते हैं.

अगर आप में खुद पर पक्का यकीन है, तो आप तंबाकू की बुरी लत से न केवल छुटकारा पा सकते हैं, बल्कि तंबाकू को छोड़ कर दूसरों के लिए भी रोल मौडल बन सकते हैं.

तंबाकू या उस से बनी चीजों का सेवन करने वाला शख्स अगर कुछ देर इन चीजों को न पाए, तो वह अजीब तरह की उलझन यानी तलब का शिकार हो जाता है, क्योंकि उस का शरीर निकोटिन का आदी बन चुका होता है. ऐसे में लोग तंबाकू के द्वारा निकोटिन की मात्रा को ले कर राहत महसूस करते हैं, लेकिन यही राहत आगे चल कर जानलेवा लत भी बन सकती है.

इन सुझावों को अपना कर भी तंबाकू की लत से छुटकारा पाया जा सकता है:

* तंबाकू की लत को छोड़ने के लिए अपने किसी खास के जन्मदिन, शादी की सालगिरह या किसी दूसरे खास दिन को चुनें और आदत छोड़ने के लिए इस दिन को अपने सभी जानने वालों को जरूर बताएं.

* कुछ समय के लिए ऐसी जगह पर जाने से बचें, जहां तंबाकू उपयोग करने वालों की तादाद ज्यादा हो, क्योंकि ये लोग आप को फिर से तंबाकू के सेवन के लिए उकसा सकते हैं.

* तंबाकू, सिगरेट, माचिस, लाइटर, गुटका, पीकदान जैसी चीजों को घर से बाहर फेंक दें.

* तंबाकू या उस से बनी चीजों के उपयोग के लिए जो पैसा आप द्वारा खर्च किया जा रहा था, उस पैसे को बचा कर अपने किसी खास के लिए उपहार खरीदें. इस से आप को अलग तरह की खुशी मिलेगी.

* तंबाकू की तलब होने के बाद मुंह का जायका सुधारने के लिए दिन में 2 से 3 बार ब्रश करें. माउथवाश से कुल्ला कर के भी तलब को कम कर सकते हैं.

* हमेशा ऐसे लोगों के साथ बैठें, जो तंबाकू या सिगरेट का सेवन नहीं करते हैं और उन से इस बात की चर्चा करते रहें कि वे किस तरह से इन बुरी आदतों से बचे रहे हैं.

* बीड़ीसिगरेट पीने की तलब महसूस होने पर आप अपनेआप को किसी काम में बिजी करना न भूलें. पेंटिंग, फोटोग्राफी, लेखन जैसे शौक पाल कर तंबाकू की लत से छुटकारा पा सकते हैं.

इस मुद्दे पर डाक्टर मलिक मोहम्मद अकमलुद्दीन का कहना है कि अकसर उन के पास ऐसे मरीज आते रहते हैं, जो किसी न किसी वजह से नशे का शिकार होते हैं और वे अपने नशे को छोड़ना चाहते हैं. लेकिन नशे के छोड़ने की वजह से उन को तमाम तरह की परेशानियों से जूझना पड़ता है, जिस में तंबाकू या सिगरेट छोड़ने के बाद लोगों में दिन में नींद आने की शिकायत बढ़ जाती है और रात को नींद कम आती है.

सिगरेट छोड़ने वाले को मीठा व तेल वाला भोजन करने की ज्यादा इच्छा होती है. इस के अलावा मुंह सूखने का एहसास होना, गले, मसूढ़ों व जीभ में दर्द होना, कब्ज, डायरिया या जी मिचलाने जैसी समस्या भी देखने को मिलती है. इस की वजह से वह मनोवैज्ञानिक रूप से मानसिक बीमारियों का शिकार हो जाता है.

ऐसी हालत में तंबाकू की लत के शिकार लोगों को एकदम से इसे छोड़ने की सलाह दी जाती है, क्योंकि धीरेधीरे छोड़ने वाले अकसर फिर से तंबाकू की लत का शिकार होते पाए गए हैं.

तंबाकू छोड़ने के बाद अकसर कोई शख्स हताशा का शिकार हो जाता है. इस हालत में उसे चाहिए कि वह समयसमय पर किसी अच्छे मनोचिकित्सक से सलाह लेना न भूले.

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नानू की जानू : इस फिल्म से दूरी ही भली

2014 में प्रदर्शित तमिल फिल्म ‘‘पिसासु’’ के हिंदी रीमेक वाली फिल्म ‘‘नानू की जानू’’ इस कदर घटिया है कि इसे देखना पैसा व समय बर्बाद करने के साथ ही सिरदर्द है. इस फिल्म से दूर रहने में ही हर तरह की भलाई है. फिल्म में एक दृश्य है, जहां नानू की मां (हिमानी शिवपुरी) एक फिल्म देख रही हैं. जब नानू पूछता है कि फिल्म कैसी है, तो नानू की मां कहती है-‘‘बहुत बकवास’’. तो लेखक ने अपनी फिल्म की सच्चाई खुद ही इस दृश्य में व्यक्त कर दी है.

फिल्म ‘‘नानू की जानू’’ की कहानी एक भूत की प्रेम कहानी है. आनंद उर्फ नानू (अभय देओल) दिल्ली शहर का गुंडा है. वह लोगों से उनका मकान किराए पर लेता है और फिर उसे हड़प लेता है. इसमें उसका दोस्त डब्बू (मनु रिषि) मदद करता है. एक दिन जब नानू अपनी कार से घर की तरफ वापस लौट रहा होता है, तभी उसकी मां का फोन आ जाता है, मां से मोबाइल फोन पर बात करते हुए वह गाड़ी को किनारे लगाने की कोशिश करता है, तो उसकी कार से स्कूटी की टक्कर हो जाती है और स्कूटी पर सवार लड़की सिद्धि उर्फ जानू (पत्रलेखा) की मौत हो जाती है. पर नानू को इस बात का अहसास ही नहीं है. मगर सिद्धि यानी कि जानू का भूत उसके पल्ले पड़ जाता है.

भूतनी जानू अब नानू के घर में ही रहने लगती है. और नानू के साथ कई बड़ी अजीब सी चीजें होने लगती है. नानू इनसे निजात पाने का असफल प्रयास करता है. नानू अपने दोस्त डब्बू के साथ पता लगाना शुरू करता है कि किस लड़की की मौत हुई है, जो कि भूतनी बनकर उसके साथ रह रही है. तो पता चलता है कि उस रात सड़क पर सिद्धि की मौत हुई थी. नानू,सिद्धि के पिता से मिलते हैं. सिद्धि के पिता ने सिद्धि का अंतिम संस्कार नहीं किया है. बल्कि उसके मृत शरीर को अपनी फैक्टरी में बर्फ के बीच सुरक्षित रखा है. क्योंकि वह मानते हैं कि वह जिंदा है.

अब नानू व उसका दोस्त यह पता लगाने की कोशिश करते हैं कि सिद्धि की हत्या किसने की. कहानी कई मूर्खतापूर्ण हास्य दृश्यों के साथ आगे बढ़ती है और फिर पता चलता है कि सिद्धि की स्कूटी की टक्कर नानू की ही कार से हुई थी. इस बीच सिद्धि के पिता नानू को बता चुके हैं कि वह तो उनकी बेटी का प्रेमी है. क्योंकि सिद्धि हमेशा कहा करती थी कि वह जिससे प्रेम करेगी, उसके घर रहने खुद ही चली जाएगी. अब नानू सिद्धि के पिता के साथ फैक्टरी पहुंचता है. तो अचानक बर्फ के टुकड़े हो जाते हैं और सिद्धि उर्फ जानू उठकर खड़ी हो जाती है. वह कहती है कि उसका समय नहीं आया था. यमराज के बंदे उसे गलती से उठा ले गए थे. इसलिए उन्होंने उसे वापस भेज दिया है और अब वह अपने प्रेमी नानू के घर में ही रहेगी. फिर अचानक एक घटना घटती है तो पता चलता है कि वह तो भूतनी ही है.

फिल्म ‘‘नानू की जानू’’ को देखते चंद मिनटों में ही दर्शक को अहसास होने लगता है कि हम बुरी तरह से ठगे गए हैं. बेसिर पैर की कहानी, ऊटपटांग पटकथा वाली यह फिल्म बेवजह के हंसी के दृश्यों से भरी गयी है. फिल्म में न हौरर है, न कौमेडी है और न ही कोई अन्य भावनाएं. फिल्म में कहीं कोई लौजिक नहीं है. मनोरंजन भी नहीं है.

दर्शक अपना सिर पीटते हुए कहता है-‘‘कहां फंसायो नाथ..’’ फिल्म के निर्देशक फराज हैदर ने तो शायद कसम खा रखी थी कि वह बद से बदतर फिल्म बनाकर दिखाएंगे. फिल्म के निर्देशक फराज हैदर तो बेहतरीन प्रतिभाओं का उपयोग ही नहीं कर पाए. फिल्म का गीत संगीत भी आकर्षित नहीं करता.

जहां तक अभिनय का सवाल है, तो अभय देओल बुरी तरह से निराश करते हैं. ‘सोचा ना था’, ‘देव डी’, ‘ओए लक्की लक्की ओए’, ‘शंघाई ’, ‘हैप्पी भाग जाएगी’ जैसी फिल्मों के अभिनेता अभय देओल पूरी तरह से चुक गए हैं. दो साल बाद वह अति घटिया व बेसिर पैर की कहानी, अति घटिया पटकथा वाली फिल्म ‘‘नानू की जानू’’ में अति घटिया अभिनय करते हुए नजर आए हैं. कई दृश्यों में वह अपने चचेरे भाई सनी देओल की नकल करते हुए नजर आते हैं.

पूरी फिल्म में पत्रलेखा महज पांच से छह मिनट के लिए नजर आती हैं. इंटरवल से पहले दो मिनट और इंटरवल के बाद चार मिनट के लिए. पत्रलेखा के सामने एक अति  घटिया फिल्म में छोटा सा किरदार निभाने की क्या मजबूरी थी, यह तो वही जानें. पर वह इस छोटे से किरदार में भी अपनी कोई छाप नहीं छोड़ती. ‘सिटी लाइट’ में अपने अभिनय से बौलीवुड में छा जाने वाली पत्रलेखा फिल्मों चयन में गलतियां कर अपने करियर पर खुद ही कुल्हाड़ी मार रही हैं.

दो घंटे की अवधि वाली एक्शन हौरर व कौमेडी फिल्म ‘‘नानू की जानू’’ के निर्माता साजिद कुरेशी, निर्देशक फराज हैदर, लेखक मनु रिषि चड्ढा, कैमरामैन  एस आर सतीष कुमार,संगीतकार मीत ब्रदर्स, साजिद वाजिद, जीत गांगुली तथा कलाकार हैं-अभय देओल, पत्रलेखा, राजेष शर्मा, मनु रिषि, ब्रजेंद्र काला, मनोज पाहवा, हिमानी शिवपुरी व अन्य

शूटिंग के दौरान अनीता हसनंदानी का दिखा बेहद हौट अवतार

एकता कपूर के अपकमिंग सीरियल ‘नागिन-3’ की चर्चा काफी समय से हो रही थी. सीरियल में करिश्मा तन्ना और अनीता हसनंदानी ‘नागिन’ का किरदार निभाने वाली हैं. इन दोनों लीड एक्ट्रेस का नागिन वाला हौट लुक तो पहले ही सामने आ चुका है. खुद एकता कपूर ने सोशल मीडिया पर ‘नागिन 3’ के दो पोस्टर रिलीज किए थे हालांकि एकता ने सीरियल के बाकि एक्टर्स का खुलासा नहीं किया है.

लेकिन अब अनीता हसनंदानी ने सीरियल के सेट पर अपनी कुछ तस्वीरें और वीडियो को सोशल मीडिया पर साझा किया है. जिन्हें देखने के बाद साफ है कि उन्होंने इस शो की शूटिंग शुरू कर दी है. तस्वीरों में साफ है कि नागिन के किरदार के साथ अनीता न्याय करने वाली हैं. फैंस उन्हें अब शो में देखने के लिए काफी बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं. जानकारी के मुताबिक अनीता इस सीरियल में निगेटिव किरदार में नजर आएंगी. फिलहाल अनीता इन दिनों स्टार प्लस के मशहूर सीरियल ‘ये है मोहब्बतें’ में भी शगुन का किरदार निभा रही हैं.

बता दें कि इससे पहले टेलीविजन पर दिखाए जाने वाले ‘नागिन’ सीरियल के दोनों सीरीज में मौनी राय और अदा खान लीड रोल में थीं. दोनों ही सीजन में दर्शकों ने इनके किरदार को काफी पसंद किया है. कहा जा रहा है इस बार आने वाले सीरियल ‘नागिन-3’ में पहले से ज्यादा स्पेशल इफेक्ट्स का इस्तेमाल किया जा रहा है. हालांकि यह सीरियल कब से शुरू होगा इस बात की जानकारी नहीं मिली है.

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लड़कियों से अभद्रता है ही गलत

औरतों को सम्मान देते हुए भी पुरुष क्याक्या बोल जाते हैं इस का नमूना 2012 में दिल्ली में रात निर्भया के बलात्कार, जो बीभत्स व क्रूर था और जिस से पूरा देश उबल पड़ा था, को बैंगलुरु में दिए जाने वाले एक सम्मान समारोह के समय मिला. उस समय कर्नाटक के पूर्व डाइरैक्टर जनरल पुलिस एचटी संगलिना ने कहा कि निर्भया कितनी सुंदर और आकर्षक रही होगी यह उस की मां को देख कर अंदाजा लगाया जा सकता है. निर्भया की मां अवार्ड लेने आई थीं.

संगलिना ने बाद में इसी बात की सफाई देते हुए यह भी कह डाला कि बदमाश तो खूबसूरत औरतों की ताक में रहते हैं और यदि उन के साथ कुछ गलत हो जाए तो उन्हें चुप रह कर सह लेना चाहिए ताकि पुलिस में शिकायत की जा सके. हालांकि निर्भया की मां ने उस फंक्शन के तुरंत बाद संगलिना के बयान पर रोष जता दिया था कि इस कांड की देश भर में हुई भर्त्सना के बाद कुछ नहीं बदला. फिर भी संगलिना का दिमाग इस प्रकार पुरुषवादी बना है कि वे सफाई देते हुए भी गुनाह कर गए.

असल में औरतों के प्रति समाज में पगपग पर एक जहर सा उगला जाता है. बेटियों पर घरों में जब छोटीछोटी बातों पर बंधन लगाए जाते हैं जो बेटों पर नहीं लगाए जाते, तो यह बात साफ कर दी जाती है कि बेटों में केवल लिंग के कारण कुछ विशेषता है. यह बात लड़कियों के मन में बैठ जाती है कि वे हीन हैं.

निर्भया जैसे कांड और उन पर आए उबाल से केवल लड़कियों को चेतावनी दी गई कि उन्हें घर से बाहर नहीं निकलना चाहिए. उन में लड़कों को शिक्षा देने की कोई बात नहीं थी कि उन्हें सामाजिक सीमाओं के दायरे में रहना चाहिए. बलात्कारों के विरोध में दुनिया भर में औरतें जो विद्रोह कर रही हैं, जो मी टू आंदोलन कर रही हैं उन में सजा की मांग की जा रही है, सामाजिक दृष्टिकोण बदलने की नहीं. पुरुषों से अपरोक्ष रूप से कहा जा रहा है कि औरतों के साथ चाहे जो मरजी करो पर पकड़े गए तो जेल जाओगे.

होना यह चाहिए कि लड़कियों के साथ अभद्र व्यवहार है ही गलत, पकड़े जाओ या न पकड़े जाओ, यह दुनिया नहीं सिखा रही. तभी औरतों पर सैक्सी चुटकुले बन रहे हैं, इंटरनैट का भरपूर दुरुपयोग पोर्न के लिए किया जा रहा है, जिस में औरतों को सैक्स डौल बना कर प्रस्तुत किया जा रहा है.

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बिल्डर्स पर नया फंदा ‘कंप्लीशन सर्टिफिकेट’

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के नगरनिगम की 6 फरवरी को संपन्न हुई अहम मीटिंग में 2 अपर आयुक्तों बी के चतुर्वेदी और मलिका निगम को हटाने के साथ उन के खिलाफ विभागीय जांच के आदेश दिए गए. मामला कंप्लीशन सर्टिफिकेट से संबंधित था. कंप्लीशन सर्टिफिकेट सारे राज्यों के सभी शहरों में अनिवार्य है और इस के अभाव में लाखों बनेबनाए मकान वैध रूप से खाली रहते हैं.

भोपाल नगरनिगम के इन अधिकारियों पर आरोप था कि उन्होंने कई बिल्डर्स को गलत तरीके से कंप्लीशन सर्टिफिकेट जारी कर लगभग 200 करोड़ रुपयों का घोटाला कर डाला. जाहिर है कंप्लीशन सर्टिफिकेट देने के एवज में मोटी घूस ली गई और जब मामला दबाए नहीं दबा तो नगरनिगम ने उस पर लीपापोती करने की गरज से कुछ अधिकारियों को सस्पैंड कर दिया जिस के बारे में हर कोई जानता है कि इस सजा के कोई खास माने नहीं होते.

दरअसल होता यह है कि जांच चलती रहती है और दोषी अधिकारी शान से नौकरी करते रहते हैं. दूसरी तरफ कंप्लीशन सर्टिफिकेट घोटाले में दोषी पाए गए बिल्डर्स पर 0.5 फीसदी की दर से पैनल्टी लगा दी गई जो करोड़ों में होती है.

इस मामले में पैनल्टी जमा करने के लिए एक महीने का वक्त दिया गया. उलट इस के नगरनिगम के दोषी अधिकारियों की बाबत जांच की कोई समयसीमा तय नहीं की गई कि यह फलां वक्त तक पूरी कर ली जाएगी.

भोपाल के मामले में तो उस वक्त हैरानी हुई जब 3 दोषी अधिकारियों को हफ्तेभर बाद ही बाइज्जत फिर से पदस्थ कर दिया गया. नियमकायदे और कानूनों के नाम पर जो खेल इस घूसकांड में हुआ उस की मिसाल शायद ही ढूंढ़ने से कहीं मिले.

नगरनिगम परिषद ने एक संकल्प पारित करते हुए अपर आयुक्त बी के चतुर्वेदी और मलिका निगम सहित सिटी इंजीनियर जी एस सलूजा को एकतरफा कार्यमुक्त करते हुए उन्हें उन के मूल विभाग में भेजने व उन के खिलाफ विभागीय जांच की बात कही थी लेकिन 13 फरवरी को शासन ने निगम परिषद का संकल्प खारिज करते हुए उन्हें वापस नगरनिगम में ही नियुक्त करने के आदेश दे दिए. अब यह विवाद कानून के मकड़जाल में उलझ कर रह गया है, जिस में दोषी अफसर शान से नौकरी कर रहे हैं यानी या तो उन्होंने भ्रष्टाचार किया ही नहीं और अगर किया भी है तो उन का कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता.

प्रतिनियुक्ति इन के लिए वरदान साबित हुई पर इस का फर्जी कंप्लीशन सर्टिफिकेट पर क्या फर्क पड़ा, यह न किसी ने सोचा और न ही किसी ने बताया.

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कंप्लीशन का औचित्य क्या

नवंबर 2017 में नगरनिगम, भोपाल में फर्जी कंप्लीशन सर्टिफिकेट का मामला चर्चा में था. कुछ कांग्रेसी पार्षदों ने आरोप लगाया था कि बिल्डिंग अनुभूति शाखा ने बिल्डरों से सांठगांठ कर उन्हें गलत तरीके से कंप्लीशन सर्टिफिकेट जारी कर दिए हैं.

ऐसा इसलिए किया गया था कि बिल्डर मई 2016 से लागू नए कानून रेरा यानी रियल स्टेट अथौरिटीज एक्ट में रजिस्ट्रेशन कराने से बच जाएं. इस घूसकांड के उजागर होने पर भोपाल के महापौर आलोक शर्मा ने एक जांच कमेटी बना दी जिस ने जांच की तो इस फर्जीवाड़े का कुछ हिस्सा सामने आ गया.

बहरहाल, जो भी सामने आया उस से एक बात तो स्पष्ट हो गई कि सरकार चाहे कितने भी नियमकानून बना ले, वे ग्राहकों के हितों के बजाय भ्रष्ट अफसरों के हित साधते हैं. चूंकि तमाम नियमों और कानूनों की चाबी इन्हीं अफसरों के पास रहती है, इसलिए घूस खाने के लिए उन्हें नया मौका मिल जाता है. कंप्लीशन सर्टिफिकेट उन में से एक है, जिस पर घूस लेने में कोई चूक नहीं की गई.

कंप्लीशन सर्टिफिकेट ग्राहक को आश्वस्त करता एक कागज है कि जिस फ्लैट, मकान या कालोनी में वह रहा है वह कानूनन पूरी तरह वैध है और वैसा ही है जैसा प्रोजैक्ट के वक्त बिल्डर ने बताया था. हिंदी में इस सर्टिफिकेट को अधिभोग एवं समापन प्रमाणपत्र कहा जाता है. जब कोई डैवलपर किसी प्रोजैक्ट को पूरा कर लेता है तो उसे स्थानीय निकाय से इस प्रमाणपत्र को हासिल करना पड़ता है. न लेने पर सजा और पैनल्टी के प्रावधान हैं. बोलचाल की भाषा में इसे कंप्लीशन सर्टिफिकेट कहा जाता है.

बदली अहमियत

भोपाल के एक सीनियर आर्किटैक्ट सुयश कुलश्रेष्ठ की मानें तो कंप्लीशन सर्टिफिकेट तो हमेशा से ही अनिवार्य रहा है पर अभी तक इस की कोई अहमियत नहीं थी, इसलिए लोग इसे लेते नहीं थे. रेरा लागू होने के बाद इस की अनिवार्यता से देशभर के बिल्डर परेशान हैं. सुयश बताते हैं कि रेरा में कोई नया प्रावधान नहीं है. हुआ इतना भर है कि बहुत से पुराने कानूनों को मिला कर एक नया कानून बना दिया गया है.

एक मकान या अपार्टमैंट कई कानूनी जटिलताओं व प्रक्रियाओं में उलझा रहता है. निर्माण से ले कर समापन तक तरहतरह की अनुमतियां डेवलपर को सरकार से लेनी पड़ती हैं. निर्माण का नक्शा पेश करने से ले कर निर्माण पूरा होने के बाद तक नियमकायदे व कानूनों के यज्ञ में सैकड़ों तरह की आहुतियां डालने के बाद भी मकान काननून आप का हुआ या नहीं, यह तय करने का हक पंडों की तरह अधिकारियों के हाथ में होता है.

कंप्लीशन सर्टिफिकेट इस बात का प्रमाण होता है कि भवन निर्माण का काम स्थानीय कानूनों व स्वीकृत नक्शे या योजना के अनुरूप हुआ है. इस में यदि रत्तीभर भी गड़बड़ी है तो आप एक अवैध भवन या मकान में रह रहे हैं. जहां तक बात बिल्डर्स की है, तो वे तब तक ग्राहक को कब्जा नहीं दे सकते जब तक उन्होंने यह कंप्लीशन सर्टिफिकेट स्थानीय निकाय से हासिल न कर लिया हो. अगर बिल्डर यह सर्टिफिकेट नहीं लेता है तो मान लिया जाता है कि उस ने निर्माण तयशुदा पैमानों व कानूनों के मुताबिक नहीं किया है.

देशभर में ऐसी इमारतों की भरमार है जिन के कंप्लीशन सर्टिफिकेट बिल्डर्स ने नहीं लिए हैं और लिए भी हैं तो भोपाल के घोटाले की तर्ज पर घूस  दे कर, जिस का खमियाजा खरीदारों को भी भुगतना पड़ता है. यह परेशानी कितनी बड़ी है, इस का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि देशभर में आएदिन अवैध कालोनियों को वैध बनाने की मुहिम चलती रहती है. अवैध निर्माण क्यों हुआ था और क्या यह बिना सरकारी विभागों की मिलीभगत के मुमकिन है, इस पर सरकारें मौन रहती हैं, लेकिन वे वैध करार देने के नाम पर और टैक्स यानी दक्षिणा लेने से नहीं चूकतीं. रेरा के राडार पर बिल्डर हैं. यह  सर्टिफिकेट तमाम मकानों के लिए भी जरूरी है, इस लिहाज से देश के 80 फीसदी मकान अवैध या गैरकानूनी हैं. अगर इस बाबत भी अनिवार्यता लाद दी गई तो देशभर में हड़कंप मच जाएगा.

बेतुके नियमकायदे

मकान बनाना कभी आसान काम नहीं रहा. 90के दशक तक लोग खुद की देखरेख में अपनी मरजी का मकान बनवाते थे. इस बाबत तब उन्हें स्थानीय निकाय से अनुमति भर लेनी पड़ती थी जो तब 100-500 रुपए की घूस दे कर मिल जाती थी. बिजली, पानी और सीवेज को ले कर तब खासे कानून  वजूद में नहीं थे. सारी सहूलियतें एक आवेदन व निर्धारित शुल्क अदा करने पर मिल जाती थीं. बड़ी दिक्कत तब मजदूरों और सामग्री की हुआ करती थी.

पर जब शहरीकरण का दौर शुरू हुआ तो रियल एस्टेट कारोबार चमक उठा. हर शहर में बिल्डर, कोलोनाइजर्स और डैवलपर कुकरमुत्तों की तरह उग आए.  ये लोग आज भी आम लोगों की कानूनी परेशानियां दूर करने में अहम रोल निभाते हैं. एक बिल्डर सरकारी कायदेकानूनों की जितनी जानकारी रखता है, उतनी शायद खुद सरकार के कर्मियों को भी नहीं होती.

इन जानकारियों और सहूलियतों की कीमत वह ग्राहकों से वसूलता है तो इस में हर्ज क्या. इस सवाल पर तय है कि सहमत होना मुश्किल है. वजह, बिल्डर्स की छवि कुछ ऐसी बिगाड़ी गई है कि वे हर किसी को लुटेरे नजर आते हैं. मकान और भवन निर्माण को ले कर हर साल नए नियमकानून बनते हैं. कहने को तो ये आम लोगों के भले व हित के लिए होते हैं लेकिन हकीकत में इन से घूस का दायरा बढ़ता है.

विभिन्न विभागों से अनापत्ति प्रमाणपत्र लेने से उसे कंप्लीशन सर्टिफिकेट तक के मुकाम तक पहुंचाने का सफर घूस से भरा हुआ है. भोपाल के एक नामी बिल्डर की मानें तो 60 लाख रुपए का एक फ्लैट तो 40 लाख रुपए में बन जाता है पर बचे 20 लाख रुपए में से हमें 12 लाख रुपए टैक्स और घूस के रूप में देने पड़ते हैं. लोग भी हमें पैसे इसी बाबत देते हैं कि कानूनी खानापूर्तियों की बाबत उन्हें दरदर और दफ्तरदफ्तर न भटकना पड़े.

इस बिल्डर के मुताबिक, निर्माण से संबंध रखते अधिकांश नियमकानून गैरजरूरी व बेमतलब के हैं. कंप्लीशन सर्टिफिकेट उन में से एक है. अगर कोई अपनी जमीन पर मकान या अपार्टमैंट बना रहा है तो उसे कंप्लीशन सर्टिफिकेट लेने के लिए बाध्य करना ज्यादती नहीं, तो क्या है.

बात सच भी है कि इतने फुट की गली छोड़ो, इतने फुट का रास्ता अनिवार्य है, इतनी जमीन पार्किंग और इतनी पर्यावरण के नाम पर खाली रखने व बिल्डिंग का इतना या उतना हिस्सा फलां के लिए आरक्षित रखने जैसी शर्तें लागत को बढ़ाती ही हैं जिसे आम ग्राहक को ही चुकाना पड़ता है. अधिकांश पैसा सरकारी खजाने या घूस में जाता है जबकि लोग समझते हैं कि बिल्डर लूट रहा है.

डैवलपर चंदन गुप्ता का कहना है, ‘‘जिसे लूट करार दे दिया गया है वह दरअसल फीस है. एक बिल्डर तो करोड़ों का दांव खेलता है, इस पर भी उस का टेटुआ सरकारी मुलाजिमों के पंजे में रहता है. अगर वह इतना सबकुछ करने के एवज में कुछ ज्यादा ले ले, तो बेकार की हायतोबा क्यों मचती है. कुछ बिल्डर ज्यादा मुनाफे में ठगी करते हैं, पर ऐसे लोग हर पेशे में हैं. दूसरे, लागत मूल्य में उतारचढ़ाव आता रहता है, इसलिए भी धोखाधड़ी होती है.’’

रही बात कंप्लीशन सर्टिफिकेट की, तो उस का औचित्य समझ से परे है, खासतौर से तब, जब उसे भी रिश्वत दे कर हासिल किया जा सकता है. इस की अनिवार्यता से घूसखोरी और बढ़ रही है और भोपाल की तरह देशभर के स्थानीय निकायों के अधिकारी व दूसरे ओहदेदार अपनी जेबें भर रहे हैं.

कंप्लीशन सर्टिफिकेट का स्थानीय निकाय द्वारा दिया जाना और भी बेतुकी बात है. इसे ग्राहक या खरीदार से लिया जाना चाहिए जो मेहनत की गाढ़ी कमाई दे कर मकान खरीदता है. अगर उसे एतराज नहीं तो स्थानीय निकायों को सरपंच बनाने की कोई तुक नहीं. बिल्डर्स के गले में डाले इस नए फंदे को ढीला करने को निकायों के घूसखोर मुलाजिम तैयार नहीं, जिन्हें आम लोगों के भलेबुरे से लेनादेना नहीं होता.

रेरा का फेर

मई 2016 से ग्राहकों के भले के लिए सरकार ने रेरा यानी रियल एस्टेट अथौरिटी एक्ट लागू किया है जिस का हर किसी ने स्वागत किया. रेरा का प्रमुख प्रावधान यह है कि अब हर प्रोजैक्ट का रजिस्ट्रेशन अनिवार्य है और बिल्डर को उन शर्तों को पूरा करना जरूरी है जिन वह वादा व दावा ग्राहक से करता है.

ग्राहक बिल्डर की ठगी से बचें, यह बेहद जरूरी है लेकिन इस बाबत जो शर्तें बिल्डर पर लादी जा रही हैं वे पूरी हो पाएंगी, इस में शक है. नए  प्रावधानों में से एक उल्लेखनीय यह है कि खरीदारों से जो पैसा बिल्डर लेगा, उस का 70 फीसदी निर्माण कार्य में लगाएगा, लेकिन बिल्डर इमारत की कीमत नहीं बढ़ा पाएगा भले ही बिल्डिंग मटेरियल के भाव बढ़ रहे हों. ऐसे में जाहिर है कि बिल्डर इमारत की गुणवत्ता गिराने को मजबूर होंगे. बिल्डर डिजायन में बदलाव तभी कर सकता है जब दोतिहाई खरीदार अपनी सहमति दें.

ऐसी कई बंदिशों की कोई खास अहमियत नहीं है. वजह, आमतौर पर खरीदार अब जागरूक है और ठोकबजा कर ही जायदाद खरीदता है.

रेरा को लागू हुए डेढ़ साल होने को हैं लेकिन इस का फायदा ग्राहकों को उतना नहीं मिल पा रहा है जितना कहा गया था. इस की इकलौती वजह कानून का उन बाबुओं के हाथों में होना है जो उसे अपनी मरजी से नचाते हैं.

नोएडा और ग्रेटर नोएडा के करीब डेढ़ लाख ग्राहक आज भी इंतजार कर रहे हैं कि उन्हें मालिकाना हक मिले लेकिन वह नहीं मिल रहा है. शिकायतें हो रही हैं पर उन पर कार्यवाही नहीं हो रही. ऐसे में साफ दिख रहा है कि यह कानून भी अव्यावहारिकताओं से भरा है. तयशुदा वक्त में मकान दे पाना पूंजी, बिल्डिंग मटेरियल और श्रमिक उपलब्धता पर निर्भर रहता है. ये सब बातें बिल्डर्स के हक में नहीं हैं, लिहाजा अब विवाद नएनए रूप में सामने आएंगे.

कंप्लीशन सर्टिफिकेट विवाद इसी रेरा की देन है. अप्रैल 2016 तक, जिन्होंने बिल्डिंग निर्माणकार्य पूरा कर लिया था, उन्हें इस सर्टिफिकेट की बाध्यता नहीं थी. लेकिन भोपाल की तरह देशभर में आधेअधूरे प्रोजैक्ट्स को कंप्लीशन सर्टिफिकेट जारी हुए ताकि बिल्डर रेरा में रजिस्ट्रेशन से बच सकें तो इस में गलती सर्टिफिकेट जारी करने वाले निकायों की भी है.

दिलचस्प बात यह भी है कि मध्य प्रदेश में तो ग्राम सचिवों तक ने ये प्रमाणपत्र बिल्डर्स को दे दिए थे जिस से यह साबित हुआ था कि सरकार को यह भी नहीं पता कि कंप्लीशन सर्टिफिकेट जारी करने का हक आखिर है किस को. अब मकान महंगे हो गए हैं. रेरा की शर्तों पर खरा उतरने के लिए बिल्डर दाम बढ़ाने को मजबूर हो चले हैं यानी इस नए कानून का भार भी खरीदारों को ढोना है. इस के बाद भी वे खुश और संतुष्ट हैं, तो यह खुशी कितने दिन टिक पाएगी, यह भी जल्द सामने आ जाना है.

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बिना तलाक के तलाकशुदा

उत्तर प्रदेश के जिला एटा की शबाना का अलग ही मामला है. उस के पति ने उसे तलाक नहीं दिया है, फिर भी इद्दत के दौरान भरणपोषण की रकम दे कर उस से छुटकारा पा लिया है. जबकि इद्दत 2 स्थितियों में होता है. एक औरत विधवा हो जाए, दूसरा उस का तलाक हो जाए. लेकिन शबाना के साथ इन दोनों स्थितियों में एक भी नहीं है.

एटा शहर के किदवईनगर में समरुद्दीन पत्नी रजिया, 2 बेटियों शबाना, शमा तथा 2 बेटों सरताज और नूर आलम के साथ रहते थे. उन का खातापीता परिवार था. बेटियों में शबाना शादी लायक हुई तो वह उस के लिए लड़का ढूंढने लगे.

एटा में ही उन के एक रिश्तेदार अलीदराज रहते थे. बाद में वह काम की तलाश में दिल्ली चले गए और वहां दक्षिणपूर्वी दिल्ली जिले के संगम विहार में रहने लगे. उन्होंने वहीं स्टील फरनीचर का अपना कारखाना लगा लिया, जो ठीकठाक चल पड़ा.

अलीदराज के परिवार में पत्नी के अलावा 2 बेटे और 1 बेटी थी. वह बेटी की शादी कर चुके थे. बड़े बेटे आसिफ की शादी के लिए उन्होंने समरुद्दीन के पास प्रस्ताव भेजा. क्योंकि शबाना उन्हें पसंद थी. आसिफ पिता के स्टील फरनीचर के धंधे में हाथ बंटा रहा था. लड़का ठीकठाक था, इसलिए समरुद्दीन ने हामी भर दी. इस के बाद आसिफ और शबाना का निकाह हो गया.

शादी के बाद शबाना दिल्ली आ गई. वह समझदार लड़की थी, इसलिए रजिया को पूरा विश्वास था कि बेटी अपने बातव्यवहार से ससुराल वालों का दिल जीत लेगी और खुशहाल जीवन जिएगी. हुआ भी ऐसा ही. शबाना के दांपत्य के शुरुआती दिन काफी खुशहाल थे. मांबाप ने शादी में 4-5 लाख रुपए खर्च किए थे.

आसिफ का भी काम ठीक चल रहा था. सासससुर, पति, देवर सभी उसे प्यार करते थे. इसलिए शबाना भविष्य को ले कर निश्ंिचत थी. शादी के साल भर बाद शबाना को एक बेटी पैदा हुई, जिस का नाम अलीशा रखा गया. अलीशा घर की पहली संतान थी, इसलिए उसे ले कर सभी खुश थे. सब कुछ बढि़या चल रहा था, लेकिन अचानक शबाना के सुख के दिन दुखों में बदल गए.

एक दिन आसिफ शराब पी कर घर आया तो शबाना को गुस्सा आ गया. उस ने कहा, ‘‘यह क्या कर के आए हो तुम? यह नया शौक कब से पाल लिया? पीने वाले मुझे बिलकुल भी पसंद नहीं हैं. तुम्हें तो पता ही है कि मेरे मायके में शराब की छोड़ो, कोई बीड़ीसिगरेट तक नहीं पीता.’’

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पत्नी की नसीहत सुन कर उसे अमल में लाने के बजाय आसिफ ने शबाना के गाल पर तमाचा जड़ते हुए कहा, ‘‘क्या मैं तेरे बाप के पैसों से पी कर आया हूं, जो तू मुझे समझा रही है? तू कौन होती है मुझे रोकने वाली?’’

शौहर के इस व्यवहार से शबाना हैरान रह गई. उस ने कहा, ‘‘भले तुम मेरे बाप के पैसों की नहीं पी रहे हो, पर शराब पीना अच्छा तो नहीं है.’’

‘‘तू ठीक कह रही है. तू ही कौन सी अच्छी है. मेरे दोस्त मुझ पर हंसते हैं, वे कहते हैं कि कहां मोटी के चक्कर में फंस गया.’’

कह कर आसिफ कमरे में चला गया. उस की इस बात पर शबाना हैरान थी. उस ने तो उसे पसंद कर के निकाह किया था. अब यह क्या कह रहा है? शबाना डर गई. उस ने मन को समझाया कि आसिफ ने नशे में यह बात कह दी होगी.

लेकिन सुबह भी आसिफ का व्यवहार जस का तस रहा तो शबाना सहम उठी. क्योंकि इस से उस का दांपत्य सुखी नहीं हो सकता था. शबाना ने शौहर को समझाने की कोशिश करते हुए कहा, ‘‘देखो, अब मैं जैसी भी हूं, तुम्हारी बीवी हूं. अब पूरा जीवन तुम्हें मेरे साथ ही बिताना होगा.’’

आसिफ ने उस की इस बात का कोई जवाब नहीं दिया. वह खापी कर फैक्ट्री चला गया.  शबाना को परेशान देख कर सास अफसरी ने पूछा, ‘‘क्या बात है बहू, तुम कुछ परेशान लग रही हो?’’

‘‘अम्मी आप ही बताइए कि अगर मैं मोटी हूं, तो इस में मेरा क्या दोष है?’’ शबाना ने कहा.

‘‘नहीं, इस में तुम्हारा दोष नहीं, हमारा दोष है.’’ अफसरी बेगम ने व्यंग्य किया.

उसी बीच सामूहिक विवाह समारोह में शबाना के देवर असद की शादी दिल्ली की कमरुन्निसा के साथ हो गई थी. कमरुन्निसा छरहरे बदन की काफी खूबसूरत लड़की थी. भाई की दुलहन देख कर आसिफ को लगा कि मांबाप ने उस के निकाह में कुछ ज्यादा ही जल्दी कर दी थी, वरना उस का निकाह भी किसी खूबसूरत लड़की के साथ हुआ होता.

यह बात मन में आते ही आसिफ को भाई से ईर्ष्या होने लगी. पर मन की बात बाहर नहीं आने दी. बेटी के पहले जन्मदिन पर आसिफ के कुछ दोस्त घर आए तो उन्होंने कहा, ‘‘भाई आसिफ, असद की बीवी तो बहुत सुंदर है.’’

दोस्तों की इस बात से आसिफ ने खुद को काफी अपमानित महसूस किया. उसे लगा कि शबाना से निकाह कर के उस ने बहुत बड़ी गलती की थी. उस दिन के बाद से आसिफ शबाना से उखड़ाउखड़ा रहने लगा. उसे शबाना में हजार कमियां नजर आने लगीं. बातबात में वह उस की पिटाई करने लगा. उस की इस पिटाई से शबाना का 2 बार गर्भपात हो गया.

शबाना परेशान थी कि इस तरह पिटते हुए जिंदगी कैसे बीतेगी? पति का व्यवहार काफी तकलीफ देने वाला था. परेशान हो कर उस ने पिता को फोन कर दिया कि दिल्ली आ कर वह उसे ले चलें. समरुद्दीन दिल्ली पहुंचे और शबाना को एटा ले गए. घर पहुंच कर शबाना ने मांबाप को पति द्वारा प्रताडि़त करने की सारी बात बता दी.

अब तक समरुद्दीन को कहीं से पता चल चुका था कि शादी से पहले आसिफ किसी शादीशुदा औरत को भगा ले गया था. पुलिस ने उसे चंडीगढ़ में गिरफ्तार किया था. लेकिन आसिफ के नाना इसलाम ने किसी तरह से उसे जेल जाने से बचा लिया था. उस के बाद आननफानन में शबाना से उस का निकाह करा दिया गया था. इस से समरुद्दीन को लगा कि उस के साथ धोखा हुआ है.

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आसिफ मोटी बीवी शबाना से छुटकारा पाने के बारे में सोचने लगा. कुछ दिनों बाद वह शबाना को ले आया. शबाना एक बार फिर गर्भवती हो गई. घर वाले बेटा होने की उम्मीद कर रहे थे. शबाना को लगा कि अगर बेटा न हुआ तो उस पर होने वाले अत्याचार बढ़ जाएंगे. समय पर शबाना को बेटा ही हुआ, लेकिन वह दिव्यांग था. उस का नाम आतिश रखा गया.

दिव्यांग बेटा पैदा होने की वजह से शबाना पर होने वाले अत्याचार बढ़ गए थे. सास ने कह दिया था कि दिव्यांग बच्चे पैदा करने वाली बहू के साथ उस के बेटे का कोई भविष्य नहीं है. अब वह अपने बेटे के लिए चांद सी बहू लाएगी.

‘‘तो फिर मेरा क्या होगा अम्मी?’’ शबाना ने पूछा तो अफसरी ने कहा, ‘‘तुझे तलाक दे देगा और क्या होगा. मेरा बेटा मर्द है, जवान है, 4-4 शादियां कर सकता है.’’

‘‘नहीं, यह गलत है.’’ शबाना ने कहा तो अफसरी ने आसिफ से कहा, ‘‘तोड़ दे इस के हाथपैर. अब यह हमें बताएगी कि क्या गलत है और क्या सही है.’’

आसिफ जानवरों की तरह शबाना पर टूट पड़ा. इस के बाद बातबात पर उस की पिटाई होने लगी. शबाना समझ नहीं पा रही थी कि वह अब क्या करे? दिव्यांग बेटा पैदा होने के बाद आसिफ बेलगाम हो गया था. अलीदराज और अफसरी अकसर फैक्ट्री में रहते थे. ऐसे में आसिफ बाजारू लड़कियों को घर ला कर शबाना के सामने ही कमरे में बंद हो जाता था. विरोध करने पर उस की पिटाई करता और उसे घर से निकाल देने की धमकी देता.

आसिफ शबाना को इतना परेशान कर देना चाहता था कि वह खुद ही घर छोड़ कर चली जाए. क्योंकि उस के लिए दूसरी बीवी की तलाश शुरू हो गई थी.

आसिफ अपने दोस्तों को घर बुला कर उन के साथ शराब पीता. उस के दोस्तों ने नशे में एक दो बार शबाना से छेड़छाड़ भी की. शबाना ने इस बात की शिकायत आसिफ से की तो उस ने कहा, ‘‘अगर तू मेरे दोस्तों के साथ सो जाएगी तो तेरा क्या बिगड़ जाएगा.’’

पति इतना गिर सकता है, शबाना ने सोचा भी नहीं था. शौहर की हरकतें बरदाश्त से बाहर होती जा रही थीं. शबाना समझ गई कि आसिफ उस से छुटकारा पाना चाहता है. वह बुरी तरह फंसी हुई थी. वह कुछ कर भी नहीं सकती थी. संयोग से उसी बीच वह गर्भवती हो गई. इस की जानकारी होते ही आसिफ ने कहा, ‘‘तुझे यह बच्चा गिरवाना होगा, वरना तू फिर से दिव्यांग बच्चे को जन्म देगी. हमें तो स्वस्थ बेटा चाहिए.’’

शबाना ने पति को बहुत समझाया, पर वह अपनी जिद पर अड़ा रहा. शबाना पिता को बुला कर उन के साथ मायके चली गई. वह ससुराल के बजाय मायके में ही बच्चे को जन्म देना चाहती थी. लेकिन अफसरी और आसिफ ने तय कर लिया था कि वह इस बच्चे को पैदा नहीं होने देंगे. उसी बीच आसिफ के लिए बरेली की एक लड़की तलाश कर ली गई थी. फरवरी, 2016 में आसिफ ससुराल पहुंचा और ससुर समरुद्दीन से कहा कि वह शबाना को ले जाना चाहता है.

लेकिन समरुद्दीन ने शबाना को विदा करने के बजाय कहा कि वह उन लोगों के खिलाफ अदालत में घरेलू हिंसा का मुकदमा दर्ज कराएंगे. ससुर के तेवर से आसिफ डर गया. उस ने माफी मांगते हुए कहा, ‘‘मुझ से जो गलती हुई, उसे माफ कर दें. अब मैं शबाना को कुछ नहीं कहूंगा.’’

आखिर समरुद्दीन ने कुछ लोगों को बुलाया तो उन के सामने आसिफ ने आश्वासन दिया कि अब वह शबाना को अच्छी तरह रखेगा. इस के बाद समरुद्दीन ने शबाना को विदा कर दिया.

शबाना ससुराल आ गई. ससुराल में 10-15 दिन तो ठीक से गुजरे, लेकिन उस के बाद उसे फिर से प्रताडि़त किया जाने लगा. शबाना के 3 माह के गर्भ को अफसरी गिराने में जुट गई. वह उसे तरहतरह की दवाएं खिलाने लगी. आसिफ भी उस के साथ मारपीट करने लगा.

परेशान हो कर शबाना ने पिता को फोन कर के सारी बात बता दी. समरुद्दीन दिल्ली पहुंचे और थाना संगम विहार में शिकायत दर्ज करा दी. शिकायत की एक प्रति उन्होंने राष्ट्रीय महिला आयोग को भी भेज दी. यह मामला साकेत स्थित महिला सेल में पहुंचा. वहां सुनवाई भी हुई, पर कोई फैसला नहीं हुआ.

अफसरी और आसिफ ने तय कर लिया था कि उन्हें शबाना से छुटकारा पाना है. अब उसे उस के पिता समरुद्दीन से भी मिलने नहीं दिया जाता था. चूंकि शबाना गर्भवती थी, इसलिए आसिफ उसे तलाक भी नहीं दे सकता था. क्योंकि इसलाम में गर्भवती महिला को तलाक नहीं दिया जा सकता. उन्होंने मौलवियों से मशविरा कर के एक योजना बनाई और उसी योजना के तहत समरुद्दीन से कहा कि वह 11 जून, 2016 को पंचायत में आ कर अपनी बात कहें.

11 जून, 2016 को अलीदराज की फैक्ट्री में पंचायत बैठी. समरुद्दीन भी उस पंचायत में पहुंचे. शबाना भी अपने बच्चों के साथ पंचायत में आई. पंचों के पूछने पर शबाना ने कहा कि वह आसिफ के साथ रहना चाहती है, पर वह उस के साथ मारपीट न करे. परंतु आसिफ ने कहा कि अब वह उसे तलाक देना चाहता है. इस पर पंचों ने कहा कि वह गर्भवती पत्नी को तलाक नहीं दे सकता.

शबाना और समरुद्दीन परेशान थे. आखिर एक सादे कागज पर दोनों से जबरदस्ती दस्तखत करा लिए गए. फिर उसी कागज पर अलगअलग रहने का समझौता तैयार किया गया. उस में जो लिखा गया, उस के अनुसार मनमुटाव की वजह से शबाना और आसिफ एक साथ नहीं रहना चाहते. अत: दहेज का 30 हजार रुपए का चैक शबाना को दिया जाता है. इस के अलावा 5 हजार रुपए इद्दत के दौरान का खर्च भी दिया जाता है.

समझौते में यह भी लिखा गया था कि दोनों बच्चे अलीशा और आतिश आसिफ के पास रहेंगे. पंचायत में आसिफ ने शबाना से कह दिया कि वह समझ ले कि उस का तलाक हो चुका है. उस के दोनों बच्चे उस के पास ही रहेंगे. शबाना कहती रही कि उस के बच्चे उसे दे दिए जाएं, लेकिन किसी ने उस की एक नहीं सुनी और बापबेटी को जबरन बाहर निकाल दिया गया.

शबाना पिता के साथ एटा आ गई. मां रजिया को जब पता चला कि बेटी को उस के पति ने छोड़ दिया है तो उस पर जैसे पहाड़ टूट पड़ा. गर्भवती बेटी की हालत भी खराब थी. आखिर रजिया ने अपने आंसू पोंछ कर बेटी को संभाला.

पंचायत ने आसिफ से कहा था कि वह गर्भवती पत्नी को तलाक नहीं दे सकता, लेकिन बच्चा पैदा होने के बाद वह फोन कर के 3 तलाक कह सकता है. यही योजना बना कर इद्दत के दौरान दिया जाने वाला भरणपोषण का खर्च आसिफ ने 5 हजार रुपए पहले ही दे दिए थे.

इस के बाद आसिफ ने समझ लिया कि उस का तलाक हो चुका है. बस कहना भर बाकी है. लेकिन शबाना और उस के मांबाप आसिफ और उस के घर वालों को सबक सिखाना चाहते थे.

इस संबंध में समरुद्दीन एडवोकेट मोहम्मद इरफान से मिले. समझौता देख कर उन्होंने कहा कि किसी भी दृष्टि से शबाना और आसिफ का तलाक नहीं हुआ है. इसलिए शबाना को अपने पति से बच्चे और भरणपोषण का खर्च पाने का पूरा हक है.

एडवोकेट मोहम्मद इरफान ने 24 नवंबर, 2016 को शबाना की तरफ से मुकदमा दायर करा दिया. शबाना ने 4 दिसंबर, 2016 को एक बेटे को जन्म दिया, जिस का नाम अहमद रखा गया. वह पूरी तरह से स्वस्थ है. जुलाई, 2017 में आसिफ ने बरेली की किसी लड़की से निकाह कर लिया. शादी की बात सुन कर शबाना काफी दुखी हुई. मांबाप के समझाने पर शबाना ने खुद को संभाला और अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ने के लिए कमर कस ली.

शबाना आसिफ से अपने बच्चों की वापसी का और भरणपोषण का मुकदमा लड़ रही है. उस का कहना है कि सौतेली मां उस के बच्चों को कभी खुश नहीं रख सकेगी. 9 अगस्त, 2017 को उस ने परिवार न्यायालय एटा में सैक्शन 10 के अंतर्गत गार्जियन ऐंड वार्ड्स एक्ट का केस दायर कर दिया है.

22 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने तीन तलाक को असंवैधानिक घोषित कर दिया है. शबाना खुश है कि अब आसिफ उसे कम से कम 3 तलाक तो नहीं दे सकता. वह अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ कर उस से अपने बच्चे और गुजाराभत्ता ले लेगी. वह एक चरित्रहीन शौहर के पास जाने के बजाय अकेली रह कर स्वाभिमान के साथ जीने का प्रण कर चुकी है.

शराब के लिए पैसे नहीं दिए तो दे दिया तलाक

बिहार के जिला बेगूसराय के थाना वीरपुर की पश्चिमी पंचायत क्षेत्र में मोहम्मद शकील अपनी पत्नी रूबेदा खातून के साथ रहता था. दोनों का विवाह 22 साल पहले हुआ था और घर में 6 बच्चे थे.

शकील शराब का लती था, मजबूरी में रूबेदा ही जैसेतैसे परिवार का भरणपोषण करती थी. बिहार में नीतीश सरकार ने शराब पर पाबंदी लगाई तो शराबियों को दिन में तारे नजर आने लगे.

लेकिन शराब ऐसी चीज है, जो पाबंदी के बावजूद भी बंद नहीं होती. लोग बेचनेखरीदने के नएनए रास्ते खोज लेते हैं. गुजरात की तरह बिहार का भी हाल है. मोहम्मद शकील ने भी शराब मिलने का अड्डा तो खोज लिया, पर उसे ज्यादा पैसों की जरूरत पड़ने लगी. एक दिन जब शकील ने रूबेदा से पैसे मांगे तो उस ने पैसे देने से इनकार कर दिया.

इस से शकील आपे से बाहर हो गया और गुस्से में रूबेदा को 3 बार तलाक बोल कर उस से रिश्ता खत्म करने का ऐलान कर दिया. घबरा कर रूबेदा ने पासपड़ोस के लोगों को हकीकत बताई. वे लोग जानते थे कि शकील आए दिन रूबेदा के साथ मारपीट करता है.

वे रूबेदा का साथ देने के वादे के साथ उसे थाना वीरपुर ले गए. जहां रूबेदा ने पूरी बात थानाप्रभारी बाबूलाल को बताई. थानाप्रभारी ने 15 अगस्त, 2017 को रूबेदा की ओर से शकील के खिलाफ उत्पीड़न की रिपोर्ट दर्ज कर के उसे गिरफ्तार कर लिया. लेकिन तलाक के मामले में वह भी कुछ नहीं कर सकते थे. बहरहाल, सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद रूबेदा और उस के 6 बच्चों का भविष्य अंधकारमय होने से बच गया.

आला हजरत के खानदान की बहू भी 3 तलाक के फेर में

कोई सोच भी नहीं सकता कि 3 तलाक के चक्कर में बरेली के आला हजरत खानदान की बहू रही निदा खान मौत के आगोाश में जाने से बामुश्किल बच पाई है. 5 मई, 2017 को निदा जब अपने वालिद के घर थी, तभी करीब दर्जन भर गुंडों ने घर में घुस कर तोड़फोड़ की. निदा को कमरे में बंद कर के ताला लगा दिया गया था, इसलिए वह बच गई. बाकी घर वालों के साथ गुंडों ने मारपीट की.

बदमाश जातेजाते धमकी दे कर गए कि निदा बच नहीं पाएगी. निदा को उस के पति ने 3 तलाक कह कर घर से निकाल दिया था. इस मामले को ले कर निदा अदालत गई. उस का केस तो दर्ज हो गया, लेकिन बदले में दुश्मनी भी मिली.

निदा के भाई मोइन खान का कहना है कि जब एक दिन वह और निदा अदालत से घर लौट रहे थे तो रास्ते में कुछ बाइक सवारों ने उन के साथ बदसलूकी की और केस वापस न लेने पर जान से मारने की धमकी दी. इस के बाद उन के घर पर गुंडे आए थे. निदा अपनी लड़ाई तो लड़ ही रही है, साथ ही अपने जैसी महिलाओं की मदद भी करती है. सर्वोच्च न्यायालय के फैसले से निदा खुश है. उसे न्याय मिल सकेगा या नहीं, यह तो वक्त ही बताएगा.

फर्ज : उस्मान ने मां बाप के साथ क्या किया

जयपुर के सिटी अस्पताल में उस्मान का इलाज चलते 15 दिनों से भी ज्यादा हो गए थे लेकिन उस की तबीयत में सुधार नहीं हो रहा था.

आईसीयू वार्ड के सामने परेशान सरफराज लगातार इधर से उधर चक्कर लगा रहे थे. बेचैनी में कभी डाक्टरों से अपने बेटे की जिंदगी की भीख मांगते तो कभी फर्श पर बैठ कर फूटफूट कर रोने लग जाते.

उधर, अस्पताल के एक कोने में खड़ी उस्मान की मां फरजाना भी बेटे की सलामती के लिए नर्सों की खुशामद कर रही थी. तभी आईसीयू वार्ड से डाक्टर बाहर निकले तो सरफराज उन के पीछेपीछे दौड़े और उन के पैर पकड़ कर गिड़गिड़ाते हुए कहने लगे, ‘‘डाक्टर साहब, मेरे उस्मान को बचा लो. कुछ भी करो. उस के इलाज में कमी नहीं होनी चाहिए.’’

डाक्टर ने उन्हें उठा कर तसल्ली देते हुए कहा, ‘‘देखिए अंकल, हम आप के बेटे को बचाने की पूरी कोशिश कर रहे हैं. उस की हालत अभी भी गंभीर बनी हुई है. औपरेशन और दवाओं को मिला कर कुल 5 लाख रुपए का खर्चा आएगा.’’

‘‘कैसे भी हो, आप मेरे बेटे को बचा लो, डाक्टर साहब. मैं 1-2 दिनों में पैसों का इंतजाम करता हूं,’’ सरफराज ने हाथ जोड़ कर कहा.

काफी भागदौड़ के बाद भी जब सरफराज से सिर्फ 2 लाख रुपयों का ही इंतजाम हो सका तो निराश हो कर उस ने बेटी नजमा को मदद के लिए दिल्ली फोन मिलाया. उधर से फोन पर दामाद अनवर की आवाज आई.

‘‘हैलो अब्बू, क्या हुआ, कैसे फोन किया?’’

‘‘बेटा अनवर, उस्मान की हालत ज्यादा ही खराब है. उस के औपरेशन और इलाज के लिए 5 लाख रुपयों की जरूरत थी. हम से 2 लाख रुपयों का ही इंतजाम हो सका. बेटा…’’ और सरफराज का गला भर आया.

इस के पहले कि उन की बात पूरी होती, उधर से अनवर ने कहा, ‘‘अब्बू, आप बिलकुल फिक्र न करें. मैं तो आ नहीं पाऊंगा, लेकिन नजमा कल सुबह पैसे ले कर आप के पास पहुंच जाएगी.’’

दूसरे दिन नजमा पैसे ले कर जयपुर पहुंच गई.

आखिरकार सफल औपरेशन के बाद डाक्टरों ने उस्मान कोे बचा लिया. धीरेधीरे 10 साल गुजर गए. इस बीच सरफराज ने गांव की कुछ जमीन बेच कर उस्मान को इंजीनियरिंग की पढ़ाई करवाई और मुंबई एअरपोर्ट पर उस की नौकरी लग गई. उस ने अपने साथ काम करने वाली लड़की रेणु से शादी भी कर ली और ससुराल में ही रहने लगा.

इस के बाद उस्मान का मांबाप से मिलने आना बंद हो गया. कई बार वे बीमार हुए. उसे खबर भी दी, फिर भी वह नहीं आया. ईद, बकरीद तक पर भी वह फोन पर भी मुबारकबाद नहीं देता.

एक दिन सुबह टैलीफोन की घंटी बजी. सरफराज ने फोन उठाया उधर से उस्मान बोल रहा था, ‘‘हैलो अब्बा, कैसे हैं आप सब लोग? अब्बा, मुझे एक परेशानी आ गई है. मुझे 10 लाख रुपयों की सख्त जरूरत है. मैं 1-2 दिनों में पैसे लेने आ जाता हूं.’’

‘‘बेटा, तेरे औपरेशन के वक्त नजमा से उधार लिए 3 लाख रुपए चुकाने ही मुश्किल हो रहा है. ऐसे में मुझ से 10 लाख रुपयों का इंतजाम नहीं हो सकेगा. मैं मजबूर हूं बेटा,’’ सरफराज ने कहा.

इस के आगे सरफराज कुछ बोलते, उस्मान गुस्से से भड़क उठा, ‘‘अब्बा, मुझे आप से यही उम्मीद थी. मुझे पता था कि आप यही कहोगे. आप ने जिंदगी में मेरे लिए किया ही क्या है?’’ और उस ने फोन काट दिया.

अपने बेटे की ऐसी बातें सुन कर सरफराज को गहरा सदमा लगा. वे गुमसुम रहने लगे. घर में पड़े बड़बड़ाते रहते.

एक दिन अचानक शाम को सीने में दर्द के बाद वे लड़खड़ा कर गिर पड़े तो बीवी फरजाना ने उन्हें पलंग पर लिटा दिया. कुछ देर बाद आए डाक्टर ने जांच की और कहा, ‘‘चाचाजी की तबीयत ज्यादा खराब है, उन्हें बड़े अस्पताल ले जाना पड़ेगा.’’

डाक्टर साहब की बात सुन कर घबराई फरजाना ने बेटे उस्मान को फोन कर बीमार बाप से मिलने आने की अपील करते हुए आखिरी वक्त होने की दुहाई भी दी.

जवाब में उधर से फोन पर उस्मान ने अम्मी से काफी भलाबुरा कहा. गुस्से में भरे उस्मान ने यह तक कह दिया, ‘‘आप लोगों से अब मेरा कोई रिश्ता नहीं है. आइंदा मुझे फोन भी मत करना.’’

यह सुन कर फरजाना पसीने से लथपथ हो गई. वो चकरा कर जमीन पर बैठ गई. कुछ देर बाद अपनेआप को संभाल कर उस ने नजमा को दिल्ली फोन किया, ‘‘हैलो नजमा, बेटी, तेरे अब्बा की तबीयत बहुत खराब है. तू अनवर से इजाजत ले कर कुछ दिनों के लिए यहां आ जा. तेरे अब्बा तुझे बारबार याद कर रहे हैं.’’

नजमा ने उधर से फौरन जवाब दिया, ‘‘अम्मी आप बिलकुल मत घबराना. मैं आज ही शाम तक अनवर के साथ आप के पास पहुंच जाऊंगी.’’

शाम होतेहोते नजमा और अनवर जब  घर पर पहुंचे तो खानदान के लोग सरफराज के पलंग के आसपास बैठे थे. नजमा भाग कर अब्बा से लिपट गई. दोनों बापबेटी बड़ी देर तक रोते रहे.

‘‘देखो अब्बा, मैं आ गई हूं. आप अब मेरे साथ दिल्ली चलोगे. वहां हम आप को बढि़या इलाज करवाएंगे. आप बहुत जल्दी ठीक हो जाओगे,’’ नजमा ने रोतेरोते कहा.

आंखें खोलने की कोशिश करते सरफराज बड़ी देर तक नजमा के सिर पर हाथ फेरते रहे. आंखों से टपकते आंसुओं को पोंछ कर बुझी आवाज में उन्होंने कहा, ‘‘नजमा बेटी, अब मैं कहीं नहीं जाऊंगा. अब तू जो आ गई है. मुझे सुकून से मौत आ जाएगी.’’

‘‘ऐसा मत बोलो, अब्बा. आप को कुछ नहीं होगा,’’ यह कह कर नजमा ने अब्बा का सिर अपनी गोद में रख लिया. अम्मी को बुला कर उस ने कह दिया, ‘‘अम्मी आप ने खूब खिदमत कर ली. अब मुझे अपना फर्ज अदा करने दो.’’

उस के बाद तो नजमा ने अब्बा सरफराज की खिदमत में दिनरात एक कर दिए. टाइम पर दवा, चाय, नाश्ता, खाना, नहलाना और घंटों तक पैर दबाते रहना, सारी रात पलंग पर बैठ कर जागना उस का रोजाना का काम हो गया.

कई बार सरफराज ने नजमा से ये सब करने से मना भी किया पर नजमा यही कहती, ‘‘अब्बा, आप ने हमारे लिए क्या नहीं किया. आप भी हमें अपने हाथों से खिलाते, नहलाते, स्कूल ले जाते, कंधों पर बैठा कर घुमाते थे. सबकुछ तो किया. अब मेरा फर्ज अदा करने का वक्त है. मुझे मत रोको, अब्बा.’’

बेटी की बात सुन कर सरफराज चुप हो गए. इधर, सरफराज की हालत दिनपरदिन गिरती चली गई. उन का खानापीना तक बंद हो गया.

एक दिन दोपहर के वक्त नजमा अब्बा का सिर गोद में ले कर चम्मच से पानी पिला रही थी. तभी घर के बाहर कार के रुकने की आवाज सुनाई दी.

कुछ देर बाद उस्मान एक वकील को साथ ले कर अंदर आया. उस के हाथ में टाइप किए हुए कुछ कागजात थे. अचानक बरसों बाद बिना इत्तला दिए उस को घर आया देख कर सभी खुश हो रहे थे.

दरवाजे से घुसते ही वह लपक कर सरफराज के नजदीक जा कर आवाज देने लगा, ‘‘अब्बा, उठो, आंखे खोलो, इन कागजात पर दस्तखत करना है. उठो, उठो,’’ यह कह कर उस ने हाथ पकड़ कर उन्हें पैन देना चाहा.

नजमा ने रोक कर पूछा, ‘‘भाईजान, ये कैसे कागजात हैं?’’

लेकिन वह किसी की बिना सुने अब्बा को आवाजें देता रहा. सरफराज ने आंखें खोलीं. उस्मान की तरफ एक नजर देखा. और अचानक उन के हाथ में दिए कागजात और पैन नीचे गिर पड़े. उन का हाथ बेदम हो कर लटक गया. यह देख नजमा चिल्लाई, ‘‘अब्बा, अब्बा, हमें अकेला छोड़ कर मत जाओ.’’ और घर में कुहराम ?मच गया. नजमा बोली, ‘‘भाईजान जो मकान आप अपने नाम कराना चाहते थे वह तो 10 साल पहले अब्बू ने आप के नाम कर दिया था. आप अब फिक्र न करो.’’

ये सब देख कर उस्मान ने फुरती से अब्बा के बिना दस्तखत रह गए कागजात उठाए और वकील के साथ बिना पीछे देखे बाहर निकल गया.

फरजाना, नजमा और अनवर भाग कर पीछेपीछे आए लेकिन तब तक कार रवाना हो गई.

तीनों दरवाजे में खड़े कार की पीछे उड़ी धूल के गुबार में चकाचौंधभरी शहरी मतलबपरस्त दुनिया की आंधी में फर्ज और रिश्तों की मजबूत दीवार को भरभरा कर गिरते हुए देखते रह गए.

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मैं 30 साल का हूं. बीवी गुजर चुकी है. साली से शादी करना चाहता हूं. क्या करूं.

सवाल
मैं 30 साल का हूं. मेरी 2 बेटियां हैं और बीवी गुजर चुकी है. मैं अपनी साली से शादी करना चाहता हूं. मैं क्या करूं?

जवाब

अगर आप की बीवी सामान्य तरीके से गुजरी है, तो आप की शादी में कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए, बशर्ते साली राजी हो. ऐसे में आप अपनी ससुराल वालों से खुल कर बात कर सकते हैं. अगर साली तैयार न हो, तो आप इश्तिहार की मदद से किसी और लड़की से शादी कर सकते हैं.

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फिल्म रिव्यू : बियौंड द क्लाउड्स

फिल्म की कहानी के केंद्र में तारा (मालविका मोहनन) और उसका छोटा भाई आमिर (ईशान खट्टर) है. फिल्म की कहानी शुरू होती है आमिर के अपने दोस्त अनिल के साथ ड्रग्स के पैकेट इधर से उधर पहुंचाने से. 2-3 बार ड्रग्स के पैकेट पहुंचाने के बाद आमिर एक बडे़ वेश्या गृह के मालिक और ड्रग्स के असली कारोबारी अशोक के पास पैसे लेने जाता है. अशोक 2-3 दिन में पैसे देने का वादा करता है. आमिर कह देता है कि पैसे नहीं मिलेंगें, तो काम नहीं होगा. इस बात से अशोक गुस्सा हो जाता है और वह अपने आदमी सनी के माध्यम से पुलिस के पास आमिर व उसके दोस्तों के ड्रग्स व्यापार की खबर पहुंचवा देता है.

पुलिस आमिर के अड्डे पर छापा मारती है. आमिर के कुछ साथी पकड़े जाते हैं. आमिर और अनिल भागने में सफल होते हैं. आमिर भाग कर धोबीघाट पहुंच कर कपड़ों में प्रेस कर रही अपनी बहन तारा के पास ड्रग्स का पैकेट छिपा देता है. पुलिस अभी भी उसके पीछे है. वह भाग रहा है. धोबी घाट पर एक इंसान अक्सी (गौतम घोष) उसे कपड़ों के ढेर में छिपा देता है. पुलिस खाली हाथ लौट जाती है.

दूसरे दिन तारा, आमिर को लेकर अपने घर जाती है. वह बताती है कि उसने यह घर एक इंसान से कर्ज लेकर खरीदा है. दोनों भाई बहन के बीच बहस होती है और तब दोनों की कहानी उजागर होती है. जब आमिर 13 साल का था, तब एक कार एक्सीडेंट में उसके माता पिता की मौत हो गयी थी. आमिर अपनी बहन के साथ रहता था. आमिर की नाराजगी है कि जब तारा का पति उसकी पिटाई करता था, तब बहन होते हुए भी उसको बचाती नहीं थी. इस पर तारा तर्क देती है कि उसका शराबी पति उसकी पिटाई करके चमड़ी उधेड़ देता था, ऐसे में वह उसे कैसे बचाती. बहरहाल, भाई बहन के आंसू बहते हैं. सारे गिले शिकवे मिट जाते हैं.

दूसरे दिन सुबह तारा धोबीघाट के लिए रवाना होती है. तो पता चलता है कि तारा के दो तीन पुरुषों से अवैध संबंध हैं. यह बात अक्सी को पसंद नहीं. अक्सी, तारा से कहता है कि वह सिर्फ उसकी है. और वह तारा के साथ जबरदस्ती करने की कोशिश करता है. तारा खुद को बचाने के लिए पत्थर से अक्सी का सिर फोड़ देती है. पुलिस आती है, अक्सी को अस्पताल पहुंचाती है. पुलिस तारा को अपने साथ ले जाती है, पुलिस तारा को अदालत में पेश करती है. अदालत तारा को जेल भेज देती है.

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जेल में जेलर (जवाद असकरी), तारा को बताता है कि जब तक अक्सी का बयान नहीं आ जाता, उसे यहीं जेल में रहना पड़ेगा. तारा यह बात आमिर को बताती है. आमिर गुस्से में अस्पताल जाता है. पता चलता है कि अक्सी का औपरेशन सफल रहा. कुछ दिनों में ठीक हो जाएगा. आमिर खुद को अक्सी का दोस्त बताकर अक्सी से मिलता है. और उसे धमकाता है कि यदि उसने पुलिस को बयान नहीं दिया कि उसने तारा के साथ बलात्कार किया, इसलिए तारा ने उसके सिर पर पत्थर मारा, तो वह उसकी दोनों आंखें निकालकर उसका जीना मुश्किल कर देगा. उसके बाद आमिर हर दिन अक्सी के पास जाने लगता है. यहां तक कि अक्सी के लिए दवाईयां अपने पैसे से खरीद कर देता है.

इधर जेल में हर दूसरे तीसरे दिन आमिर अपनी बहन तारा से मिलने जाता है. तारा का एक ही रोना है कि उसे जेल में नहीं रहना है. मगर वह नहीं चाहती कि आमिर ड्रग्स सहित किसी गलत धंधे से जुड़े. जेल में ही तारा की दोस्ती 3 साल के बच्चे छोटू से हो जाती है, जिसकी मां गंभीर रूप से बीमार है. एक दिन छोटू की मां की मौत हो जाती है. अब तारा को लगता है कि उसकी भी मौत जेल में ही होगी. धीरे धीरे तारा छोटू में अपनी खुशियां तलाशने लगती है.

इसी बीच दक्षिण भारत से अक्सी की मां (शारदा जुम्पा), पत्नी(हीबा शाह) व चार साल की बेटी आ जाती है, जिन्हें हिंदी नहीं आती. अक्सी की पत्नी को टूटी फूटी अंग्रेजी आती है. हालात ऐसे बनते हैं कि आमिर, अक्सी के परिवार को अपने घर में रहने की इजाजत दे देता है. फिर अक्सी की पत्नी की तस्वीर मोबाइल से खींच कर अशोक को दिखाकर पैसे ऐंठता है. वह अशोक के  हाथों  अक्सी की पत्नी को बेचकर जमानत पर बहन तारा को छुड़ाना चाहता है. पर ऐन वक्त पर उसका जमीर उसे इसकी इजाजत नहीं देता. इससे अशोक उस पर चिढ़ जाता है और गंभीर परिणाम भुगतने की चेतावनी देता है.

कई घटनाक्रम बड़ी तेजी से बदलते हैं. एक दिन तारा के आंसू देखकर गुस्से व परेशानी के साथ आमिर घर पहुंचता है. वहां अक्सी की बेटी का नाच उसका गुस्सा ऐसा बढ़ाता है कि वह गुस्से में अक्सी का सच और अक्सी की वजह से बहन तारा के जेल में होने की बात बता देता है. यह सुनकर अक्सी का परिवार आमिर के घर से रात में ही चला जाता है. सुबह आमिर उठता है तो घर की हालत देखकर उसे अहसास होता है कि उसने गुस्से में काफी कुछ गलत कर डाला. वह अस्पताल की तरफ भागता है.

इधर सुबह अक्सी की मां अदालत परिसर में अक्सी की तरफ से बयान टाइप करवाती है कि कैसे तारा निर्दोष है. मगर जब वह अस्पताल पहुंचती है, तो पता चलता है कि अक्सी की मौत हो गयी है. कुछ देर में आमिर भी पहुंच जाता है. अब तारा छोटू के साथ जेल में खुशियां तलाश रही हैं. तो वहीं आमिर, अक्सी के परिवार को अपने घर ले आता है.

लेखक निर्देशक माजिद मजीदी ने बड़ी खूबसूरती से सपनों के शहर मुंबई में भाई बहन की एक प्यारी कहानी सुनायी है, जिसमें विश्वास और परिस्थितियों के चलते जीवन के उतार चढ़ाव हैं. माजिद मजीदी ने इंसानी स्वभाव, इंसानी संवेदनाओं और भावनाओं को बहुत बारीकी से व बेहतरीन तरीके से सेल्यूलाइड के परदे पर उकेरा है. फिल्म में एक सीन है, जहां आमिर का दोस्त अनिल पिता की बीमारी और पैसे के लालचमें अशोक के हाथों बिक जाता है. वह आमिर को लेकर एक ऐसी सुनसान जगह पर पहुंचता हैं, जहां पानी और मिट्टी का कीचड़ है.

वहां अशोक के दो गुंडे अनिल को पैसा देते हैं. अनिल मुंह घुमाकर पैसे गिनना शुरू करता है. इधर अशोक के गुंडे कीचड़ में आमिर की पिटाई करने लगते हैं और वह उसे मार देना चाहते हैं. कुछ देर बाद अनिल का जमीर जागता है. वह उन दोनों गुंडों से कहता है कि अब आमिर को मत मारो. गुंडे कहां सुनने वाले. तब अनिल खुद उन गुंड़ों से लड़ने उसी कीचड़ में पहुंचता है. अनिल मारा जाता है और गुंडे आमिर को मरा हुआ समझ छोड़ देते हैं. यानी कि माजिद मजीदी ने इस दृश्य के माध्यम से मानव स्वभाव का बेहतरीन चित्रण किया है. उन्होंने यह कहने की कोशिश की है कि इंसान सिर्फ अच्छा या बुरा नहीं होता है. परिस्थितिवश वह गलत कदम उठा लेता है.

इतना ही नहीं माजिद मजीदी ने झोपड़पट्टी व गंदगी वाले इलाके में भी आर्थिक व सामाजिक रूप से रचे बसे दो अलग अलग वर्ग का भी चित्रण किया. माजिद मजीदी की जितनी तारीफ की जाए, उतना कम है.

सिर्फ फारसी भाषा के जानकार फिल्मकार माजिद मजीदी ने हिंदी में ‘बियौंड द क्लाउड्स’ जैसी फिल्म बनाकर भारतीय फिल्मकारों को चुनौती के साथ बहुत बड़ा सबक दिया है कि अपनी भारतीय सभ्यता संस्कृति व जीवन मूल्यों से दूर न भागे. मगर होली से चंद घंटे पहले तूफानी बारिश और छोटू की मां की मौत पर तारा का उलझन भरा अभिनय कुछ खटकता है.

जहां तक अभिनय का सवाल है, तो सही मायने में बौलीवुड को ईशान खट्टर और मालविका मोहनन के माध्यम से दो बेहतरीन कलाकार मिले हैं. ईशान ने साबित कर दिया है कि बिना संवाद के किसी भी दृश्य को वह अपने अभिनय व चेहरे के भाव से जीवंत बना सकते हैं. बहन को जेल से ना छुड़ा पाने की बेबसी हो, गलत घंधे में फंसे होने का गम हो, दुःख हो, इन सारे भावों को ईशन खट्टर ने आंसुओं और अपने चेहरे के भाव से जिस तरह से परदे पर उकेरा है, वह उन्हें कमाल का कलाकार बनाती है. पूरी फिल्म में एक भी दृश्य ऐसा नहीं है, जहां इस बात का अहसास हो कि ईशान खट्टर की यह पहली फिल्म है.

‘तारा’ के किरदार में मालविका मोहनन ने भी जानदार अभिनय किया है. तारा के किरदार के लिए कंगना रानौट व दीपिका पादुकोण सहित कई दिग्गज कलाकारों ने औडीशन दिये थे. पर माजिद मजीदी ने अंततः मालविका मोहनन को चुना था. मालविका मोहनन ने अपने जानदार व सशक्त अभिनय से साबित कर दिया कि माजिद मजीदी की पारखी नजर ने गलत चयन नहीं किया था.

तनिष्ठा चटर्जी, गौतम घोष व छोटे बच्चे ने भी बेहतरीन अभिनय किया है. फिल्म का संगीत पक्ष सबसे अधिक कमजोर है. फिल्म की कमजोर कड़ी संगीतकार ए आर रहमान हैं. फिल्म के कैमरामैन अनिल मेहता ने बहुत बेहतरीन काम किया है. जिसकी वजह से लोगों को मुंबई एक नए रंग में नजर आती है.

लगभग दो घंटे की अवधि वाली फिल्म ‘बियौंड द क्लाउड्स’ का निर्माण ‘जी स्टूडियो’ के साथ मिलकर किशोर अरोड़ा व शरीन केड़िया ने ‘नमः पिक्चर्स’ के बैनर तले किया है. फिल्म के लेखक निर्देशक माजिद मजीदी, संगीतकार  ए आर रहमान, कैमरामैन अनिल मेहता तथा कलाकार हैं – ईशान खट्टर, मालविका मोहनन, गौतम घोष, शारदा जुम्पा, हिबा शाह व अन्य.

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