दासदेव : फिल्म की कमजोर कड़ी है पटकथा

रोमांटिक, पोलीटिकल व रोमांचक फिल्म ‘‘दास देव’’ लंबे इंतजार के बाद सिनेमाघरों तक पहुंच पाई है. पृष्ठभूमि बदली है, मगर कहानी के केंद्र में राजनीति और प्यार ही है. चाहत, पावर और लत की कहानी के साथ ही हमारे देश की राजनीति का स्तर किस हद तक गिरा हुआ है, इसका नमूना है फिल्म ‘‘दासदेव’’. क्योंकि फिल्म ‘‘दास देव’’ में प्रेम कहानी या हारे हुए प्रेमी की मासूमियत नहीं, बल्कि यह फिल्म गंदी राजनीति के साथ अपनी राजनीतिक विरासत को बढ़ाते रहने की महत्वाकांक्षा की काली दलदल मात्र है.

शरतचंद्र चट्टोपाध्याय की देवदास फिल्मकारों के लिए एक पसंदीदा विषय रहाहै. इस पर 1928 में बनी मूक फिल्म ‘देवदास’ से लेकर अब तक कई फिल्में बनचुकी हैं. इसका आधुनिक वर्जन अनुराग कश्यप की फिल्म ‘देवडी’ थी. और अब तक कहा जा रहा था कि सुधीर मिश्रा की फिल्म ‘‘दास देव’’ भी शरतचंद्र के उपन्यास ‘देवदास’ का आधुनीकरण है. मगर फिल्म की शुरूआत में ही फिल्मकार सुधीर मिश्रा ने स्वीकार किया है कि यह फिल्म शरतचंद्र के उपन्यास ‘देवदास’ के साथ साथ शेक्सपियर के हेलमेट और उनके नाना द्वारिका प्रसाद मिश्रा, जो कभी राजनीति में थे, द्वारा सुनाई गई कहानियों से प्रेरित है. ज्ञातब्य है कि मशहूर लेखक, पत्रकार, कवि द्वारिका प्रसाद मिश्रा 30 सिंतबर 1963 से 29 जुलाई 1967 तक मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री थे. पं. जवाहर लाल नेहरू से मतभेद के चलते द्वारिका प्रसाद मिश्रा को 13 वर्ष का राजनीतिक वनवास झेलना पड़ा था. सुधीर मिश्रा की फिल्म ‘‘दास देव’’.

फिल्म की कहानी 1997 में उत्तरप्रदेश के जहानाबाद से शुरू होतीहै, जब राजनेता विश्वंभर चैहाण(अनुराग कश्यप) एक राजनीतिक सभा को संबोधित करते हुए ऐलान करते हैं कि वह किसानों को उनकी जमीन का सही मुआवजा दिलवाकर रहेंगे और अपने छोटे भाई अवधेश(सौरभ शुक्ला) को अगला मुख्यमंत्री बनाने की बात करते हैं. उस वक्त उनका छह सात वर्ष का बेटा देव उनके साथ चलने की जिद करता है, पर वह कहते हैं कि वह अपने चाचा अवधेश व पारो के पिता के साथ रहे. वह जल्द वापस आ जांएगे. भाषण खत्मकर जैसे ही हेलीकोप्टर में बैठकर विश्वंभर चैहाण उड़ते हैं, वैसे ही आसमान में उनका हेलीकोप्टर जलकर स्वाहा हो जाता है. उसके बाद कहानी पूरे 21 वर्ष बाद दिल्ली से शुरू होती है, जहां एक पब में देव(राहुल भट्ट) व पारो(रिचा चड्ढा) दोनों हैं. दोनों एक दूसरे के बचपन के साथी होने के साथ ही एक दूसरे से प्यार करते हैं. देव को ड्रग्स की लत लग चुकी है. ड्रग्स व शराब के नशे में देव कुछ लोगों से मारामारी कर लेता है, तो गुस्से में पारो पब से बाहर आ जाती है, फिर गाड़ी में एक साथ जाते हुए रास्ते में देव, पारो को मनाने की कोशिश करता है. पर कुछ दूर आगे चलने पर सूनी सड़क पर चड्ढा की कार देव की कार को रोकती है.

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चड्ढा ने देव को करोड़ो रूपए कर्ज दे रखा है, जो कि उन्हें वापस चाहिए. इसलिए चड्ढा अपने साथ देव को लेकर जाती हैं. उधर उसी वक्त अवधेश को हृदयाघात होता है और वह अस्पताल पहुंच जाते हैं. इधर पारो, सहाय(दिलीप ताहिल) को फोन करके सारी बात बताती है, उस वक्त सहाय के सामने चांदनी (अदिति राव हैदरी) बैठी होती है. सहाय किसी तरह देव को छुड़ा लेते हैं. अवधेश, सहाय से कहते हैं कि वह देव को संभाले. देव की मां सुशीला को यकीन है कि अवधेश, देव के साथ गलत नही होने देंगे. धीरे धीरे पता चलता है कि चांदनी भी देव से प्यार करती है. पर वह सहाय की गुलाम सी बनी हुई है, क्यांकि सहाय बार बार उसे याद दिलाते रहते हैं कि सहाय की मौत के बाद सारी संपत्ति की मालकिन चांदनी होंगी. चांदनी बहुत ताकतवर है. देश के हर राजनेता से उसके अच्छे संबंध है.

सहाय के कहने पर चांदनी, देव को संभालती है और देव के साथ हम बिस्तर भी होती है. पारो के साथ साथ अवधेश भी चाहते हैं कि देव ड्रग्स व शराब से तौबा कर ले. अवधेश चाहते हैं कि देव उनकी राजनीतिक विरासत को संभाले. मगर यह बात उभरकर आती है कि विश्वंभर को पारो के पिता (अनिल जौर्ज) पर यकीन था और उन्होंने ही पारों के परिवार को रहने के अपनी कोठी के अंदर ही कमरे दिए थे. पर अवधेश पारो के पिता व पारो को पसंद नहीं करते. उन्हें देव व पारो का साथ भी पसंद नहीं है. पर फिलहाल वह अपनी राजनीतिक चालें चलने में मस्त है.

एकदिन गुस्से में पारो, देव से कह देती है कि वह दिल्ली छोड़कर जलाना जा रही है. पारो गांव पहुंचकर अपने पिता के साथ मिलकर किसानों के लिए काम करना शुरू करती है. उधर अपने चाचा अवधेश, सहाय, चांदनी व मां सुशीला के रचे चक्रव्यूह में फंसकर देव भी परिवार की राजनीतिक विरासत को संभालने व राज्य का अगला मुख्यमंत्री बनने के मकसद से जलाना पहुंचकर किसानों के बीच काम करना शुरू करते हैं. बहुत जल्द वह अति लोकप्रिय हो जाते है. मुख्यमंत्री भी देव की सराहना करते हैं.

फिर देव को चमकाने के लिए और पारो के परिवार को फंसाने के मकसद से चांदनी, सहाय व अवधेश मिलकर एक खेल रचते हैं, जिसमें अब तक किसानों के हिमायती माने जाने वाले पारो के पिता पर ही किसानों की जमीन हथियाने से लेकर किसानों की हत्या करने तक का आरोप लग जाता है. और खुद को बीमार बताकर अवधेश अस्पताल में भर्ती होकर वहीं से अपनी गंदी राजनीतिक चाले चलता है.

देव, पारो के पिता को छुडाने में असमथर्ता व्यक्त करते हुए कह देता है कि देव के पिता ने उसके पिता की तरह ऐसा काम कभी न करते. इससे पारो नाराज होकर देव से रिश्ता खत्म कर अपनी उम्र से काफी बड़ी उम्र व विपक्ष के नेता रामाश्रय शुक्ला (विपिन शर्मा) के साथ शादी कर चुनाव लड़ने की तैयारी शुरूकर देती है.

अब शुरू होता है राजनीति का अति गंदा खेल और धीरे धीरे अतीत के काले अध्याय खुलते हैं. पता चलता है कि देव की मां सुशीला व अवधेश के बीच अवैध रिश्ते हैं. अवधेश व रामाश्रय शुक्ला ने मिलकर ही देव के पिता विश्वंभर की हत्या की योजना बनाई थी, जिसमें उद्योगपति सहाय ने मदद की थी. पारो के पिता को जेल व जेल में उनकी हत्या के पीछे भी अवधेश ही है. अवधेश के ही इशारे पर पारो की हत्या की कोशिश की गई.

यह सारा सच पारो के साथ साथ देव को पता चलता है. तब देव अपने चाचा अवधेश के साथ ही रामाश्रय शुक्ला व अन्य दोषियों की हत्या कर देता है. पूरे एक वर्ष बाद देव व पारो नदी किनारे मिलते हैं.

विचारोत्तेजक फिल्म ‘‘हजारों ख्वाहिषें ऐसी’’ के अलावा जुनूनी रोमांचक प्रेम कहानी प्रधान फिल्म ‘ये साली जिंदगी’ के निर्देशक सुधीर मिश्रा इस कदर अपनी नई फिल्म ‘‘दास देव’’ में निराश करेंगे, यह उम्मीद तो किसी को नहीं थी.

फिल्म की कहानी चांदनी के नजरिए से कही जाना शुरू होती है. चांदनी कहानी की सूत्रधार के रूप में भी नजर आती है, मगर क्लायमैक्स पर पहुंचते पहुंचते निर्देशक सुधीर मिश्रा खुद इस बात को भूल गए. फिल्म में आगजनी व हिंसा अपनी चरम सीमा पर है. फिल्मकार राजनीति व प्रेम के बीच सामंजस्य बैठाने में बुरी तरह से विफल रहे हैं. फिल्म में रोमांस तो कहीं है ही नहीं, सिर्फ गंदी राजनीति हावी है. राजनीतिक स्वार्थ की पूर्ति के लिए हर रिश्ते का खून किया गया है.

फिल्म इंटरवल से पहले रोचक है, मगर तब उसकी गति धीमी है. इंटरवल के बाद कहानी गति पकड़ती है, पर जिस तरह से पूरा कथानक गड़बड़ होता है, उससे दर्शक कन्फ्यूज हो जाता है. उसकी समझ में ही नहीं आता कि आखिर किस किरदार का किसके साथ क्या रिश्ता है, कौन सा किरदार किसके साथ है और क्यों? वास्तव में ‘देवदास’ और शेक्सपियर के हेमलेट के ग्रे विश्वासघाती रंग का मिश्रण करते हुए फिल्मकार कहानी को फैलाते चले गए, पर वह भूल गए कि किसे प्रमुखता देनी है, कथा किसके नजरिए से शुरू हुई और फिर वह कहानी को समेट नही पाए. फिल्म की सबसे बड़ी कमजोर कड़ी इसकी पटकथा है. यानी कि फिल्मकार फिल्म के कथानक के साथ न्याय करने में पूर्णरूपेण विफल रहे हैं.

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फिल्म के कैमरामैन सचिन के कृष्ण बधाई के पात्र है. निर्देशक ने फिल्म की लोकेशन बहुत सही चुनी है. जहां तक अभिनय का सवाल है तो देव के किरदार में राहुल भट्ट फिट ही नहीं बैठते हैं, वह अपने अभिनय से भी निराश करते हैं. भावों की अभिव्यक्ति करने में असमर्थ रहते हैं. पारो के किरदार में रिचा चड्ढा ने जानदार अभिनय किया है. चांदनी के किरदार में अदिति राव हैदरी अपनी प्रतिभा का जलवा ठीक से नहीं दिखा पाईं, शायद फिल्म की पटकथा ने उन्हें ऐसा अवसर नहीं दिया. यूं तो वह कहानी की नायिका है, मगर जैसे ही कई उपकहानियां आती हैं, कई किरदार आते हैं, तो उनका किरदार हाशिए पर पहुंच जाता है.

यह लेखक व निर्देशक की कमजोरी का नतीजा है. भ्रष्ट व अति महत्वाकांक्षी राजनेता अवधेश के किरदार में सौरभ शुक्ला से बेहतर कोई हो ही नहीं सकता था. उन्होंने जबरदस्त परफार्मेंस दी है. उन्होंने एक बार फिर साबित कर दिखाया कि वह अति बेहतरीन अभिनेता हैं. पारो के पिता के किरदार में अनिल जौर्ज जमे हैं. दिलीप ताहिल, विपिन शर्मा, विनीत कुमार सिंह, अनिल जौर्ज भी अपने अभिनय से प्रभावित करते हैं.

दो घंटे बीस मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘दास देव’’ का निर्माण संजीव कुमार, गौरव शर्मा व मनोहर पी कानुनगो ने किया है. फिल्म के निर्देशक सुधीर मिश्रा, पटकथा लेखक सुधीर मिश्रा व जयदीप सरकार, संगीतकार संदेश शांडिल्य, विपिन पटवा, शमीर टंडन, अनुपम राग, सत्य माणिक अफसर, कैमरामैन सचिन के कृष्ण व कलाकार हैं- राहुल भट्ट, रिचा चड्ढा, अदिति राव हैदरी, सौरभ शुक्ला, विनीत कुमार सिंह, दिलीप ताहिल, विपिन शर्मा, दीपराज राणा,  अनिल जौर्ज, सोहेला कपूर, जयशंकर पांडे, योगेश मिश्रा, श्रुति शर्मा व अनुराग कश्यप.

लोगों को काफी पसंद आ रहा है खेसारी लाल यादव का नया गाना

इन दिनों इंटरनेट पर हिंदी गानों की तरह अब भोजपुरी गानों को भी काफी पसंद किया जा रहा है. इसी क्रम में भोजपुरी फिल्मों के मशहूर एक्टर खेसारीलाल यादव के एक गाने को यूट्यूब पर 18 दिन के अंदर 46 लाख से ज्यादा लोगों ने देखा है. इस गाने में खेसारीलाल का साथ भोजपुरी एक्ट्रेस चांदनी सिंह भी ठुमके लगाती हुई नजर आ रही हैं. ‘सलवार धरा गइल पेटी में’ गाने में खेसारीलाल चांदनी पर गुस्सा करते नजर आ रहे हैं, क्योंकि इस वीडियो वह हाफ पेंट में नजर आ रही हैं. पूरे गाने में खेसारीलाल संस्कार की बात करते नजर आ रहे हैं. इस गाने को इसी महीने 8 अप्रैल को यूट्यूब पर अपलोड किया गया था.

बता दें, बहुत ही जल्द खेसारीलाल 65 कास्‍ट वाली भोजपुरी की सबसे महंगी फिल्‍म ‘दबंग सरकार’ में नजर आने वाले हैं. ‘दबंग सरकार’ की शूटिंग लखनऊ के विभिन्‍न खूबसूरत लोकेशन पर पूरी हो चुकी है और अब यह पोस्‍ट प्रोडक्‍शन फेज में है. निर्देशक योगेश राज मिश्रा ने कहा, “यह फिल्‍म भोजपुरी इंडस्‍ट्री में काफी कुछ बदलने वाली है. फिल्‍म काफी अच्‍छी बनी है, जो लोगों को खूब इंटरटेन करेगी. फिल्‍म ‘दबंग सरकार’ लोगों के बीच भोजपुरी के लिए सकारात्‍मक सोच लाने की कोशिश है.”

मिश्रा ने सेट पर एक हादसे के बारे में जिक्र करते हुए खेसारीलाल के साथ अगली फिल्‍म करने की भी बात कही. उन्‍होंने बताया, “एक बार सेट पर खेसारीलाल घायल हो गए. इस दौरान उनके हाथों में गहरी चोट लगी. हमने तब शूट रोकना का फैसला किया, मगर उन्‍होंने कुछ दवाई लगाकर शूट को चालू रखने को कहा. यह उनकी जीवटता और प्रोफेसनलिज्‍म को दर्शाता है, जो अन्‍य कलाकारों के लिए एक मिसाल भी है. हालांकि बाद में उनका पैर काफी सूज गया था.”

वहीं, ‘दबंग सरकार’ के निर्माता दीपक कुमार और निर्देशक योगेश राज मिश्रा ने भोजपुरी सुपरस्‍टार खेसारीलाल यादव को परफेक्‍शनिस्‍ट बताया. उन्‍होंने कहा, “खेसारलाल यादव इंडस्‍ट्री के पावरफुल अभिनेता हैं. हमने उनकी मेहनत को ‘दबंग सरकार’ की शूटिंग के दौरान करीब से देखा, जिसके आधार पर हम कह सकते हैं कि वे आने वाले दिनों में काफी आगे जाने वाले हैं. उनमें काम के प्रति गजब का जुनून है, जो हमें हर शौट में देखने को मिला.”

दीपक कुमार ने कहा, “खेसारीलाल यादव काफी डाउन टू अर्थ हैं और आज भी उन्‍हें अपना पास्‍ट याद है, जो उन्‍हें स्‍टारडम के बाद भी सामान्‍य बनाता है. आज भी वे फुर्सत के पलों में पुराने दिनों की बातें करते हैं. साथ ही वे अपनी बेबाकी और हाजिर जवाबी से लोगों को हंसाते रहते हैं. वे काफी जौली मूड के इंसान हैं.”

अवेंजर्स इन्फीनिटी वार : एक्शन से भरपूर फिल्म

अच्छाई व बुराई की लड़ाई  के साथ ही पृथ्वी को बचाने की कवायद की कहानी है हौलीवुड फिल्मकार एंथोनी रोसो और जौय रोसो की रोमांचक एक्शन प्रधान साइंस फिक्शन फिल्म‘‘एवेंजर्स इन्फीनिटी वार’’. जो कि मार्वेल कामिक्स के सुपर हीरो अवेंजर्स पर आधारित है. एक पंक्ति की कहानी के साथ कई उप कहानियों के साथ साथ तकरीबन 76 किरदारों और एक नहीं कई जगहों से (न्यूयार्क, वकांडा, टाइटन, नोव्हेअर ) युक्त यह फिल्म दर्शकों को बांधकर रखती है.

फिल्म की कहानी का केंद्र असीम शक्तियां रखने वाली छह मणियां हैं. इनके नाम हैं-शक्ति मणि, अंतरिक्ष मणि, समय मणि, स्मृति मणि, वास्तविकता मणि, आत्मा मणि. इनमें से चार मणियां पृथ्वी ही नहीं पूरे ब्रम्हांड को खत्म करने पर उतारू थैनौस के पास हैं और वह अपनी शक्ति के बल पर अन्य दो मणियों को हासिल कर सर्वाधिक ताकतवर बनकर पृथ्वी सहित पूरे ब्रम्हांड को खत्म कर नए सिरे से अपने मनमाफिक नए ब्रम्हांड की रचना करना चाहता है. अपने मकसद में कामयाब होने के लिए थैनौस अपनी सौतली दत्तक पुत्री गमोरा (जौय सल्डाना) की हत्या करने से भी बाज नहीं आता है. जबकि दो मणियों को थैनौस के हाथ न लगने देने के साथ ही थैनौस को खत्म करने के लिए आयरन मैन, थोर, द हल्क व अन्य अवेंजर्स एक साथ आ जाते हैं. इतना ही नही पृथ्वी व ब्रम्हांड को बचाने के लिए ब्लैक विडो, स्पाइडरमैन व ब्लैक पैंथर भी इनके साथ आ जाते हैं. यह सभी  थैनौस के पास मौजूद चार मणि भी छीनना चाहते हैं.

फिल्म ‘‘अवेंजर्स इन्फीनिटी वार’’ की शुरुआत वहीं से होती है, जहां पर मार्वल्स की पिछली फिल्म ‘‘थोरः रगनारोक’’ खत्म हुई थी. इस फिल्म में स्पेस यान से उतरने वाले असगार्डियन भाईयों  थोर व लोकी को जहां छोड़ा था. उधर टाइटन ग्रह के निवासी थैनौस (जोश ब्रोलिन) ने सिर्फ अपने काफिले बल्कि अपने शिल्प को भी बर्बाद कर दिया है. वह लोगों पर अत्याचार करने के साथ ही उन्हे मौत के घाट उतार रहा है. अब थैनौस की योजना दो अन्य मणि को हासिल कर पूरे ब्रम्हांड को बर्बाद करने की है. थैनौस की योजना की जानकारी मिलते ही द हल्क वापस धरती पर आते हैं. फिर जबरदस्त एक्शन के अवेंजर्स व उनके साथी थैनौस को रोकने की मुहीम में जुट जाते हैं.

फिल्म की कहानी लार्जर देन लाइफ से भरपूर होते हुए भी काफी दिलचस्प है. अदभुत व अति तेज गति से भागती कहानी व जबरदस्त एक्शन दृश्यों से भरपूर यह एक ‘एपिक’ फिल्म है. पिछली अवेंजर फिल्मों के मुकाबले इस फिल्म में इंसानी भावनाओं को ज्यादा उकेरा गया है. इतना ही नहीं इस फिल्म में कहानी के साथ ही कुछ दार्शनिक बातें भी की गयी हैं. फिल्म में कई अनुत्तरित सवाल भी हैं. फिल्म का क्लायमेक्स आश्चर्यचकित कर जाता है. फिल्म की पटकथा जबरदस्त है. इस फिल्म को देखने का असली मजा तो बड़े परदे पर ही आएगा और वह भी थ्री डी में.

फिल्म की लोकेशन व संवाद जबरदस्त हैं. हिंदी में अनुवादित फिल्म के संवादो में तो कुछ हिंदी फिल्मों के नाम भी जोड़े गए हैं, जिससे भारतीय दर्शक इस फिल्म के साथ जुड़ सकें. भारत में यह फिल्म अंगेजी व हिंदी के अलावा तमिल, तेलगू, मलयालम में भी प्रदर्शित हो रही है.

जहां तक अभिनय का सवाल है, तो फिल्म के हर कलाकार /किरदार ने बुराई से जीत हासिल करने की जद्दोजेहाद के साथ ही मानवीय जीवन व संवेदना को भी बेहतर तरीके से उकेरा है. कलाकारों की भीड़ में कुछ कलाकार अपनी अभिनय प्रतिभा के बल पर अपना एक अलग वजूद बनाने में कामयाब होते हैं. मसलन – टोनी स्टार्क उफ आयरन मैन के किरदार में राबर्ट डाउनी ज्यूनियर, कैप्टन अमेरिका के किरदार में क्रिस इवान्स, ब्लैक विडो के किरदार में स्करलेट जोहान्सन, थोर के किरदार में क्रिस हैमस्वर्थ आदि. मगर थैनौस के किरदार में जोशब्रोलिन सर्वाधिक प्रभावित करते हैं. गमोरा जैसे अति भावुक व अति जटिल किरदार को जौय सलडाना ने काफी बेहतरीन तरीके से निभाया है.

दो घंटे 29 मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘अवेंजर्सःइन्फीनिटी वार’’ का निर्माण: ‘‘मार्वल्र्स स्टूडियो ने किया है. फिल्म के निर्देशक एंथेनी रोसो व जो रोसो, लेखक स्टीफन मैकफिली और क्रिस्टाफर मार्कस हैं. कहानी मार्वेल कामिक्स पर आधारित है. कलाकार हैं- राबर्ट डाउनी ज्यूनियर, क्रिस हैमस्वर्थ, मार्क रफ्लो, क्रिस इवांस, स्कार्लेट जोहान्सन, बेनेडिक्ट कम्बरबैच व अन्य.

रैंपवौक के बाद चुपके चुपके बात करते दिखें रणबीर और दीपिका

रणबीर कपूर और दीपिका पादुकोण का भले ही ब्रेकअप हो चुका हो लेकिन आज भी दोनों को एकसाथ देखना फैंस को भाता है. पिछले कुछ समय से दोनों सुर्खियों में बने हुए हैं. हाल ही में दोनों ने ‘मिजवान फैशन’ शो में रैंपवौक किया था. दोनों ने फैशन डिजाइनर मनीष मल्‍होत्रा के लिए रैंपवौक किया. दोनों शो स्टौपर थे और एक दूसरे का हाथ थाम चलते नजर आये. अब एक वीडियो वायरल हो रहा है जिसमें दोनों चुप-चुपके एकदूसरे से बात करते नजर आ रहे हैं.

रणबीर दीपिका का सोशल मीडिया पर एक वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है जिसमें शबाना आजमी पत्रकारों से रू-ब-रू हो रही हैं और उनके पीछे खड़े रणबीर और दीपिका चुपके-चुपके एकदूसरे से बात करते दिख रहे हैं.

वीडियो में रणबीर, दीपिका के कानों में कुछ कह रहे हैं और दीपिका हल्‍की सी स्‍माइल कर दूसरी तरफ देखने लगती हैं. रणबीर ने एक बातचीत में कहा, ‘ मैंने दीपिका के साथ फिल्‍में की है, टीवी में भी नजर आया हूं. लेकिन फैशन शो में पहली बार साथ हूं. यह मजेदार है.’

बातचीत में दीपिका ने रणबीर की तारीफ करते हुए कहा,’  मुझे लगता है वो जो भी पहनते हैं अच्‍छे लगते हैं. मुझे लगता है ये उनकी बौडी लैंग्‍वेज है, उनके लिए यह बहुत आसान है. मुझे लगता है वे जो भी पहनते हैं वे उसे आसानी से पेश कर पाते हैं.’

रणबीर और दीपिका का भले ही ब्रेकअप हो चुका है लेकिन दोनों अच्‍छे दोस्‍त की तरह पेश आते हैं. ब्रेकअप के बाद भी दोनों ने ‘तमाशा’ और ‘ये जवानी है दीवानी’ जैसी फिल्‍मों में साथ काम कर चुके हैं.

रणबीर इनदिनों अपनी आनेवाली फिल्‍म ‘संजू’ को लेकर बिजी हैं. राजकुमार हिरानी के निर्देशन में बनी इस फिल्‍म का टीजर रिलीज हो चुका है जिसे दर्शक बे‍हद पसंद कर रहे हैं. फिल्‍म संजय दत्‍त की बायोपिक फिल्‍म हैं.

VIDEO : फंकी लेपर्ड नेल आर्ट

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अब मलाइका ने बताए अपने बेडरूम सीक्रेट्स

बौलीवुड सितारे आजकल अपनी निजी जिंदगी को लेकर खुल कर बात करने में जरा भी नहीं हिचकिचाते. उनके लिए अपनी निजी जिंदगी के बारे में बात करना बेहद ही आम बात हो गई है. वह अपनी जिंदगी से जुड़ी पर्सनल बातों को यूं ही चैट शो या इंटरव्यूज के दौरान शेयर करना पसंद करते हैं.

बता दें कि सैलेब्स अपने बेडरूम के सीक्रेट को बेपर्दा करने में जरा भी नहीं शर्माते और ना ही हिचकिचाते हैं. आपको याद होगा कि हाल ही में विद्या बालन ने करण जौहर के शो पर अपने बेडरुम सीक्रेट्स बता कर किस तरह से सनसनी मचा दी थी. विद्या बालन के बाद मीरा राजपूत और शाहिद कपूर ने अपने बेडरूम सीक्रेट के राज खोले थे. अब इस कड़ी में एक और हसीना का नाम जुड़ गया है. वो हसीना कोई और नहीं बल्कि मलाइका अरोड़ा है.

जी हां मलाइका नें अपने बेडरूम सीक्रेट की कई ऐसी बातें बताई हैं जिसे सुनकर आप भी काफी हैरान हो जाएंगे. आपकी जानकारी के लिए बता दे कि मलाइका हाल ही में अपनी बहन अमृता अरोड़ा के साथ चैट शो BFFs With Vogue में नजर आई थीं. जब मलाइका से इस चैट शो के दौरान पूछा गया कि उनकी फेवरेट बेडरूम पोजिशन कौन सी है. तो उन्होंने बिना शर्माएं इस सवाल का जवाब देते हुए कहा- “ON TOP”. इतना ही नही उन्होंने इस चैट शो पर अपनी पर्सनल लाइफ को लेकर कई बड़े खुलासे भी किए थे.

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कैसा होगा 2050 का धार्मिक नक्शा

आज से 32 साल बाद यानी 2050 में विभिन्न धार्मिक समुदायों के हिसाब से कैसा होगा दुनिया का नक्शा, अमेरिका की जानीमानी सर्वेक्षण संस्था ‘पीयू’ द्वारा दुनिया के प्रमुख धर्मों की आबादी के ट्रैंड्स के बारे में कुछ समय पहले जारी की गई रिपोर्ट काफी चौंकाने वाली है. रिपोर्ट ने कई देशों की नींद उड़ा दी है. यदि ये ट्रैंड्स सही साबित हुए तो दुनिया के कई देशों का भूगोल बदल जाएगा. आज विश्व का हर देश इस बदलाव से अपने देश पर होने वाले असर के बारे में सोच रहा है. ऐसा स्वाभाविक भी है क्योंकि आज के लोकतांत्रिक युग में जनसंख्या धर्मों की ताकत नापने का प्रमुख पैमाना है. जनसंख्या के अनुपात  में धर्मों की राजनीतिक शक्ति बढ़ती या घटती है.

पीयू की रिपोर्ट में वर्ष 2010 को आधार मान कर वर्ष 2050 तक 8 प्रमुख धार्मिक समुदायों की जनसंख्या का आकलन और विश्लेषण किया गया है. विश्व तथा भारत के संदर्भ में इस के निष्कर्ष चौंकाने वाले हैं. इन 40 सालों में विश्व की जनसंख्या में 35 प्रतिशत की वृद्धि होगी, जिस में प्रमुख समुदायों में मुसलमानों की जनसंख्या सर्वाधिक यानी 73 प्रतिशत, ईसाई समाज की 35 प्रतिशत तथा हिंदुओं की जनसंख्या 34 प्रतिशत बढ़ेगी, इस हिसाब से आबादी के मामले में ईसाई पहले, मुसलमान दूसरे तथा हिंदू तीसरे नंबर पर होंगे.

भारत के हिंदुओं के लिए बुरी खबर यह है कि साल 2050 में भारत की कुल आबादी में हिंदुओं की हिस्सेदारी में 2.8 फीसदी तक कमी आने की संभावना है. वर्ष 2050 में देश की कुल आबादी 1.7 अरब होगी. इस में 76.7 फीसदी हिंदू होंगे, जबकि साल 2010 में यह आंकड़ा 79.5 फीसदी था. 2010 में देश में हिंदुओं की कुल आबादी 97.37 करोड़ थी, जबकि साल 2050 में संभावित तौर पर यह 129.79 करोड़ होगी, इस प्रकार इस दौरान कुल हिंदू आबादी में मात्र 32.42 करोड़ की वृद्धि होगी. एक भ्रम फैलाया जा रहा है कि 2050 तक हिंदू 50 फीसदी से कम होंगे.

जबकि साल 2050 में कुल आबादी में मुसलमानों की साझेदारी साल 2010 के 14.4 फीसदी से बढ़ कर 18.4 फीसदी हो जाएगी. इस दौरान उन की कुल आबादी 17.62 करोड़ से बढ़ कर संभावित तौर पर 31.06 करोड़ हो जाएगी. इस प्रकार इन 40 वर्षों के दौरान, उन की आबादी में 13.44 करोड़ की वृद्धि होगी. यह रपट बौद्ध धर्म के लिए भी चिंताजनक है कि उस की आबादी कम होगी या उतनी ही रहेगी.

society

भारत के संदर्भ में बताया गया है कि 2050 में  भारत में विश्व के सब से ज्यादा हिंदू और सब से ज्यादा मुसलमान होंगे. इस के बाद पाकिस्तान तथा इंडोनेशिया में. दूसरी तरफ ज्यादातर हिंदू भारत, नेपाल और मौरीशस में रहते हैं.

इस प्रोजैक्शन मौडल को 2050 से आगे ले जाने पर नतीजा निकलता है कि 2070 में दुनिया में मुसलिमों और ईसाइयों की जनसंख्या लगभग बराबर होगी यानी दोनों विश्व की आबादी के 32-32 प्रतिशत होंगे. इस के बाद दोनों धर्मों की आबादी  बढ़ेगी मगर वर्ष 2100 में मुसलिमों की आबादी 1 प्रतिशत ज्यादा

हो जाएगी. मुसलिम 35 प्रतिशत होंगे तो ईसाई 34 प्रतिशत. यह वृद्धि मुख्यरूप से अफ्रीका के कारण होगी जो उच्च प्रजनन दर वाला महाद्वीप है. इस के कारण दोनों धर्म विश्व जनसंख्या में अपना प्रतिशत बढ़ाएंगे.

बदलता धार्मिक चरित्र

धर्मों की आबादी में आने वाले इस बदलाव से कई देशों का धार्मिक चरित्र बदल जाएगा. वर्ष 2050 में आस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, बेनिन, फ्रांस, रिपब्लिक औफ मैसिडोनिया, बोस्नियाहर्जेगोविना, नीदरलैंड्स ईसाई बहुसंख्य नहीं रह जाएंगे. अमेरिका में भी ईसाइयों की संख्या में कमी आएगी. 2010 में वे आबादी के तीनचौथाई से ज्यादा थे. 2050 में दोतिहाई रह जाएंगे. वहां दूसरी सब से ज्यादा आबादी यहूदियों की नहीं, मुसलमानों की होगी.

ईसाइयों की संख्या भले ही अमेरिका और ब्रिटेन में घट रही हो मगर रूस, चीन और दक्षिण कोरिया में ईसाई धर्म तेजी से अपनी जड़ें जमा रहा है. वर्ष 1900 से दक्षिण कोरिया में 1 प्रतिशत लोग ही ईसाई थे लेकिन ईसाइयत वहां तेजी से बढ़ी और आज 30 प्रतिशत दक्षिण कोरियाई ईसाई हैं. रूस में कम्युनिज्म की समाप्ति के बाद ईसाइयत को अपनाने वालों की तादाद बढ़ी है. 1991 से 2008 के बीच रूसी वयस्कों में ईसाइयों की संख्या 31 प्रतिशत से बढ़ कर 72 प्रतिशत हो गई है. चीन के धर्मों के विशेषज्ञ परजू विश्वविद्यालय के समाजशास्त्री फेंगांग यांग के मुताबिक, 1950 से 2010 के बीच ईसाइयत 7 प्रतिशत की दर से बढ़ी.

इस समय इसलाम दुनिया में सब से तेजी से बढ़ने वाला धर्म है और इस की वजह यह है कि वैश्विक स्तर पर मुसलमानों की प्रजनन दर सब से  ज्यादा यानी 3.1 प्रति महिला है, जबकि 2.7 प्रतिशत प्रजनन दर से ईसाई दूसरे नंबर पर हैं और 2.4 की प्रजनन दर के साथ हिंदू तीसरे नंबर पर. दूसरा निर्धारक तत्त्व है हर धर्म का वर्तमान आयु विभाजन यानी उस धर्म के अनुयायी कितने युवा हैं और उन के सामने कितने प्रजनन के वर्ष बाकी हैं. 2050 में 27 प्रतिशत आबादी 15 वर्ष से कम उम्र की होगी. इन में मुसलिम 34 प्रतिशत, हिंदू 30 प्रतिशत और ईसाई 27 प्रतिशत हैं. यह युवा आबादी मुसलिम आबादी के तेजी से बढ़ने की सब से बड़ी वजह बनेगी.

इस सर्वेक्षण में जो मुद्दे सामने आए, उन के अनुसार साल 2050 में यानी 21वीं सदी के मध्यबिंदु पर विश्व में अलगअलग मतावलंबियों के आंकड़े इस प्रकार होंगे : आज विश्व में मुसलिम 160 करोड़ हैं, वे 120 करोड़ से बढ़ कर 280 करोड़ होंगे. यह बताना कठिन है कि 40 वर्षों में 40 प्रतिशत की यह वृद्धि व्यावहारिक है या अतिरंजित है. उन का ईसाइयों के लिए जो आंकड़ा है वह बताता है कि अगले 35 वर्षों में उन का 70 करोड़ से बढ़ कर 290 करोड़ होना संभव है.

इस में मजे की बात यह है कि इस दौरान यूरोप, अमेरिका आदि देशों में ईसाइयों की संख्या 30 करोड़ से कम होगी. इसलिए रिपोर्ट में जो 70 करोड़ की वृद्धि दिखाई गई है वह वास्तव में 100 करोड़ की है, लेकिन यूरोप के लोगों में ईसाई धर्म त्यागने की संभावना के कारण वास्तव में यह जोड़ केवल 70 करोड़ का होगा. इसी दौरान हिंदुओं की संख्या 105 करोड़ से 130 करोड़ हो जाएगी, लेकिन भारत में मुसलिम जनसंख्या का अनुपात काफी बढ़ा हुआ होगा.

अमेरिका में बढ़ती हिंदू आबादी

पीयू ने 10 वर्ष पूर्व निष्कर्ष निकाला था कि  अमेरिका और यूरोप में हिंदुओं का प्रभाव बढ़ेगा. 10 वर्ष पूर्व विश्व की ख्यातिप्राप्त साप्ताहिक ‘न्यूजवीक’ ने तो एक विशेषांक भी प्रकाशित किया था. उस में संपादिका लिशा मिलर ने तो उस समय यह संकेत दिया था कि पूरा अमेरिका धीरेधीरे भारतीय जीवनपद्धति को स्वीकारने की दिशा में बढ़ रहा है. लेकिन यह कहना थोड़ा मुश्किल है कि यह निष्कर्ष हिंदुओं को खुश करने के लिए था या अतिशयोक्ति के सहारे ईसाइयों को सचेत करने वाला था.

पीयू रिसर्च सैंटर की नई रपट ‘रिलीजियस लैंडस्केप स्टडी’ के मुताबिक अमेरिका की हिंदू आबादी बढ़ कर 22.3 लाख हो गई है और आबादी के लिहाज से हिंदू धर्म मानने वाले लोग यहां चौथे पायदान पर पहुंच गए हैं. साल 2007 से ले कर अब तक इस में 85.8 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई है. अमेरिकी जनसंख्या में हिंदुओं की आबादी साल 2007 में 0.4 फीसदी से बढ़ कर पिछले साल 0.7 फीसदी हो गई. अध्ययन कुल आबादी में हिंदुओं की प्रतिशतता को दर्शाता है, लेकिन संख्या नहीं बताता.

इस रिपोर्ट को देखने से एक बात तो साफ होती है कि अगले 30-35 वर्षों में विश्व में मुसलिम जनसंख्या तेजी से बढ़ेगी. इंडोनेशिया में आज 20 करोड़ 50 लाख और भारत में 17 करोड़ 70 लाख मुसलिम हैं. भारत में 35 वर्षों बाद मुसलमानों का आंकड़ा 20 करोड़ 50 लाख से अधिक होगा. वर्ष 2050 में विश्व में 31 प्रतिशत ईसाई होंगे और 30 प्रतिशत मुसलिम होंगे, लेकिन बाद के 20 वर्षों में दोनों में उसी अनुपात में वृद्धि हो कर विश्व में 31 प्रतिशत मुसलिम तथा 30 प्रतिशत ईसाई होने की संभावना उन्होंने व्यक्त की है.

इस रिपोर्ट में यूरोप स्थित मुसलिमों की संख्या को ले कर वृद्धि के काफी विवरण दिए गए हैं. उन के मत में 2010 में यूरोप में 5.9 प्रतिशत मुसलिम थे, जो 2050 में 10 प्रतिशत होंगे. इस से भी अधिक उन की ही एक गंभीर चेतावनी है, वह यह कि यूरोप में सभी अन्य धर्मावलंबी तथा सैकुलर आदि लोगों की तुलना में ईसाई 45 प्रतिशत यानी अल्पसंख्यक होंगे. ब्रिटेन में भी यही स्थिति होगी. यूरोप में मुसलिमों की जो वृद्धि होगी वह मुख्यतया फ्रांस, जरमनी और बेल्जियम में होगी.

रिपोर्ट में दिए हुए आंकड़े जनसंख्या की वृद्धि, प्रजनन संख्या से जुड़े अनुमान पर आधारित हैं. इस में फिलहाल विश्वभर में चल रहे धर्मांतरण अभियानों से बढ़ने वाली संभावित संख्या का अनुमान नहीं है, जबकि भारत, अफ्रीका का सहारा रेगिस्तान इलाका और लैटिन अमेरिका में धर्मांतरण जोरों पर है. कई जगह तो ईसाइयत और इसलाम के बीच धर्मांतरण की होड़ मची है. अब तो चीन में भी धर्मांतरण के चलते ईसाई मिशनरी और चीन की कम्युनिस्ट सरकार के बीच आमनेसामने की लड़ाई चल रही है.

रपट का यह मानना है कि धर्मांतरण भी किसी धार्मिक समुदाय की संख्या वृद्धि में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करता है. लेकिन धर्मांतरण काफी जटिल प्रक्रिया है. कुछ देशों में वयस्कों के लिए एक धर्म छोड़ कर दूसरा धर्म अपनाना सामान्य बात है लेकिन कई देशों में धर्म बदलना बहुत मुश्किल और कानूनी वजहों से पेचीदा है. कई देशों में तो इसे गैरकानूनी माना गया है. ज्यादातर मुसलिम देशों और हमारे पड़ोसी नेपाल में इसे गैरकानूनी माना जाता है. सर्वे कहता है बहुत से लोग, जिन का किसी धर्म से वास्ता नहीं था, ईसाई बन जाते हैं तो बहुत लोग जिन की परवरिश ईसाई के तौर पर हुई वे नास्तिक या अधर्मी बन जाते हैं. भारत के बारे में सर्वे कहता है कि धर्मांतरण के आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं.

रपट की प्रामाणिकता कितनी आव्रजन भी देशों के धार्मिक चरित्र को बदलने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है. आबादी बढ़ने के अन्य कारणों के साथ आव्रजन को भी जोड़ने के बाद यूरोप में मुसलिम आबादी 2010 के 5.9 प्रतिशत से बढ़ कर 2050 में 10.2 प्रतिशत हो जाएगी, जबकि आव्रजन को न जोड़ने पर यह आंकड़ा 8.4 प्रतिशत ही रह जाता है. अमेरिका में 2010 में हिंदू आबादी 0.7 प्रतिशत थी जो आव्रजन को जोड़ने पर 2050 में 1.3 प्रतिशत हो जाएगी पर आव्रजन को न जोड़ने पर लगभग 0.8 प्रतिशत रहेगी.

उपरोक्त आंकड़ों के आधार पर पीयू रिसर्च सैंटर की रपट चौंकाने वाली अवश्य है. वस्तुत: जनगणना एक बड़ी पेचीदा प्रक्रिया है जो किसी भी देश के सामाजिक तथा आर्थिक कारणों, भौगोलिक तथा प्रकृति विज्ञान का परिणाम होती है. मानव व्यवहार के बारे में ऐसे निष्कर्ष पूरी तरह से सही नहीं होते हैं तथा वक्त की कसौटी पर पूरी तरह से खरे नहीं उतरते. कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि यह  रपट पश्चिम समर्थक और ईसाई समर्थक नजरिए से लिखी गई है. वह विश्व में बढ़ रहे इसलामी वर्चस्व को उठाती है जबकि सारी दुनिया में चल रहे ईसाई धर्मांतरण पर चुप्पी साध लेती है.

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मां बनना औरत की मजबूरी नहीं

मातृत्व का एहसास औरत के लिए कुदरत से मिला सब से बड़ा वरदान है. औरत का सृजनकर्ता का रूप ही उसे पुरुषप्रधान समाज में महत्त्वपूर्ण स्थान देता है. मां वह गरिमामय शब्द है जो औरत को पूर्णता का एहसास दिलाता है व जिस की व्याख्या नहीं की जा सकती. यह एहसास ऐसा भावनात्मक व खूबसूरत है जो किसी भी स्त्री के लिए शब्दों में व्यक्त करना शायद असंभव है.

वह सृजनकर्ता है, इसीलिए अधिकतर बच्चे पिता से भी अधिक मां के करीब होते हैं. जब पहली बार उस के अपने ही शरीर का एक अंश गोद में आ कर अपने नन्हेनन्हे हाथों से उसे छूता है और जब वह उस फूल से कोमल, जादुई एहसास को अपने सीने से लगाती है, तब वह उस को पैदा करते समय हुए भयंकर दर्द की प्रक्रिया को भूल जाती है.

लेकिन भारतीय समाज में मातृत्व धारण न कर पाने के चलते महिला को बांझ, अपशकुनी आदि शब्दों से संबोधित कर उस का तिरस्कार किया जाता है, उस का शुभ कार्यों में सम्मिलित होना वर्जित माना जाता है. पितृसत्तात्मक इस समाज में यदि किसी महिला की पहचान है तो केवल उस की मातृत्व क्षमता के कारण. हालांकि कुदरत ने महिलाओं को मां बनने की नायाब क्षमता दी है, लेकिन इस का यह मतलब कतई नहीं है कि उस पर मातृत्व थोपा जाए जैसा कि अधिकांश महिलाओं के साथ होता है.

विवाह होते ही ‘दूधो नहाओ, पूतो फलो’ के आशीर्वाद से महिला पर मां बनने के लिए समाज व परिवार का दबाव पड़ने लगता है. विवाह के सालभर होतेहोते वह ‘कब खबर सुना रही है’ जैसे प्रश्नचिह्नों के घेरे में घिरने लगती है. इस संदर्भ में उस का व्यक्तिगत निर्णय न हो कर परिवार या समाज का निर्णय ही सर्वोपरि होता है, जैसे कि वह हाड़मांस की बनी न हो कर, बच्चे पैदा करने की मशीन है.

समाज का दबाव

महिला के शरीर पर समाज का अधिकार जमाना नई बात नहीं है. हमेशा से ही स्त्री की कोख का फैसला उस का पति और उस के घर वाले करते रहे हैं. लड़की कब मां बन सकती है और कब नहीं, लड़का होना चाहिए या लड़की, ये सभी निर्णय समाज स्त्री पर थोपता आया है. वह क्या चाहती है, यह कोई न तो जानना चाहता है और न ही मानना चाहता है, जबकि सबकुछ उस के हाथ में नहीं होता है, फिर भी ऐसा न होने पर उस को प्रताडि़त किया जाता है.

यह दबाव उसे शारीरिक रूप से मां तो बना देता है परंतु मानसिक रूप से वह इतनी जल्दी इन जिम्मेदारियों के लिए तैयार नहीं हो पाती है. यही कारण है कि कभीकभी उस का मातृत्व उस के भीतर छिपी प्रतिभा को मार देता है और उस का मन भीतर से उसे कचोटने लगता है.

कैरियर को तिलांजलि

परिवार को उत्तराधिकारी देने की कवायद में उस के अपने कैरियर को ले कर देखे गए सारे सपने कई वर्षों के लिए ममता की धुंध में खो जाते हैं. यह अनचाहा मातृत्व उस की शोखी, चंचलता सभी को खो कर उसे एक आजाद लड़की से एक गंभीर महिला बना देता है.

लेकिन अब बदलते समय के अनुसार, महिलाएं जागरूक हो ई हैं. आज कई ऐसे सवाल हैं जो घर की चारदीवारी में कैद हर उस औरत के जेहन में उठते हैं, जिस की आजादी व स्वर्णिम क्षमता पर मातृत्व का चोला पहन कर उसे बाहर की दुनिया से महरूम कर दिया गया है.

आखिर क्यों औरत की ख्वाहिशों को ममता के खूंटे से बांध कर बाहर की दुनिया से अनभिज्ञ रखा जाता है? जैसे कि अब उस का काम नौकरी या उन्मुक्त जिंदगी जीना नहीं, बल्कि अपने बच्चे की परवरिश में अपना अस्तित्व ही दांव पर लगा देना मात्र रह गया हो.

बच्चे को अपने रिश्ते का जामा पहना कर उस पर अपना अधिकार तो सभी जमाते हैं, लेकिन जो बच्चे के पालनपोषण से संबंधित कर्तव्य होते हैं, उन का निर्वाह करने के लिए तो पूरी तरह से मां से ही अपेक्षा की जाती है. क्या परिवार में अन्य कोई बच्चे का पालनपोषण नहीं कर सकता. यदि हां, तो फिर इस की जिम्मेदारी अकेली औरत ही क्यों ढोती है?

निर्णय की स्वतंत्रता

दबाव में लिया गया कोई भी निर्णय इंसान पर जिम्मेदारियां तो लाद देता है परंतु उन का वह बेमन से वहन करता है. जब हम सभी एक शिक्षित व सभ्य समाज का हिस्सा हैं तो क्यों न हर निर्णय को समझदारी से लें तथा जिम्मेदारियों के मामले में स्त्रीपुरुष का भेद मिटा कर मिल कर सभी कार्य करें. ऐसे वक्त में यदि उस का जीवनसाथी उसे हर निर्णय की आजादी दे व उस का साथ निभाए तो शायद वह मां बनने के अपने निर्णय को स्वतंत्रतापूर्वक ले पाएगी.

एक पक्ष यह भी

कानून ने भी औरत के मां बनने पर उस की अपनी एकमात्र स्वीकृति या अस्वीकृति को मान्यता प्रदान करने पर अपनी मुहर लगा दी है.

मातृत्व नारी का अभिन्न अंश है, लेकिन यही मातृत्व अगर उस के लिए अभिशाप बन जाए तो? वर्ष 2015 में गुजरात में एक 14 साल की बलात्कार पीडि़ता ने बलात्कार से उपजे अनचाहे गर्भ को समाप्त करने के लिए उच्च न्यायालय से अनुमति मांगी थी, लेकिन उसे अनुमति नहीं दी गई. एक और मामले में गुजरात की ही एक सामूहिक बलात्कार पीडि़ता के साथ भी ऐसा हुआ. बरेली, उत्तर प्रदेश की 16 वर्षीय बलात्कार पीडि़ता को भी ऐसा ही फैसला सुनाया गया. ऐसी और भी अन्य दुर्घटनाएं सुनने में आई हैं.

बलात्कार पीडि़ता के लिए यह समाज कितना असंवेदनशील है, यह जगजाहिर है. बलात्कारी के बजाय पीडि़ता को ही शर्म और तिरस्कार का सामना करना पड़ता है. ऐसे में अगर कानून भी उस की मदद न करे और बलात्कार से उपजे गर्भ को उस के ऊपर थोप दिया जाए तो उस की स्थिति की कल्पना कीजिए, वह कानून और समाज की चक्की के 2 पाटों के बीच पिस कर रह जाती है. लड़की के पास इस घृणित घटना से उबरने के सारे रास्ते खत्म हो जाते हैं और ऐसे बच्चे का भी कोई भविष्य नहीं रह जाता जिसे समाज और उस की मां स्वीकार नहीं करती.

पिछले साल तक आए इस तरह के कई फैसलों ने इस मान्यता को बढ़ावा दिया था कि किस तरह से महिला के शरीर से जुड़े फैसलों का अधिकार समाज और कानून ने अपने हाथ में ले रखा है. वह अपनी कोख का फैसला लेने को आजाद नहीं है. अनचाहा और थोपा हुआ मातृत्व ढोना उस की मजबूरी है.

लेकिन 1 अगस्त, 2016 को सुप्रीम कोर्ट ने बलात्कार की शिकार एक नाबालिग लड़की के गर्भ में पल रहे 24 हफ्ते के असामान्य भू्रण को गिराने की इजाजत दे दी. कोर्ट ने यह आदेश इस आधार पर दिया कि अगर भू्रण गर्भ में पलता रहा तो महिला को शारीरिक व मानसिक रूप से गंभीर खतरा हो सकता है.

सुप्रीम कोर्ट ने गर्भ का चिकित्सीय समापन अधिनियम 1971 के प्रावधान के आधार पर यह आदेश दिया है. कानून के इस प्रावधान के मुताबिक, 20 हफ्ते के बाद गर्भपात की अनुमति उसी स्थिति में दी जा सकती है जब गर्भवती महिला की जान को गंभीर खतरा हो. 21 सितंबर, 2017 को आए मुंबई उच्च न्यायालय के फैसले ने स्थिति को पलट दिया.

न्यायालय ने महिला के शरीर और कोख पर सिर्फ और सिर्फ महिला के अधिकार को सम्मान देते हुए यह फैसला दिया है कि यह समस्या सिर्फ अविवाहित स्त्री की नहीं है, विवाहित स्त्रियां भी कई बार जरूरी कारणों से गर्भ नहीं चाहतीं.

कोई भी महिला चाहे वह विवाहित हो या अविवाहित, अवांछित गर्भ को समाप्त करने के लिए स्वतंत्र है, चाहे वजह कोई भी हो. इस अधिकार को गरिमापूर्ण जीवन जीने के मूल अधिकार के साथ सम्मिलित किया गया है. महिलाओं के अधिकारों और स्थिति के प्रति बढ़ती जागरूकता व समानता इस फैसले में दिखाई देती है. अविवाहित और विवाहित महिलाओं को समानरूप से यह अधिकार सौंपते हुए उच्च न्यायालय ने लिंग समानता और महिला अधिकारों के पक्ष में एक मिसाल पेश की है.

सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला

28 अक्तूबर, 2017 को गर्भपात को ले कर सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ा फैसला सुनाया. सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के मुताबिक, अब किसी भी महिला को अबौर्शन यानी गर्भपात कराने के लिए अपने पति की सहमति लेनी जरूरी नहीं है. एक याचिका की सुनवाई करते हुए कोर्ट ने यह फैसला लिया है. कोर्ट ने कहा कि किसी भी बालिग महिला को बच्चे को जन्म देने या गर्भपात कराने का अधिकार है. गर्भपात कराने के लिए महिला को पति से सहमति लेनी जरूरी नहीं है. बता दें कि पत्नी से अलग हो चुके एक पति ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी. पति ने अपनी याचिका में पूर्व पत्नी के साथ उस के मातापिता, भाई और 2 डाक्टरों पर अवैध गर्भपात का आरोप लगाया था. पति ने बिना उस की सहमति के गर्भपात कराए जाने पर आपत्ति दर्ज की थी.

इस से पहले पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने भी याचिकाकर्ता की याचिका ठुकराते हुए कहा था कि गर्भपात का फैसला पूरी तरह महिला का हो सकता है. अब सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ और जस्टिस ए एम खानविलकर की बैंच ने यह फैसला सुनाया है. फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि गर्भपात का फैसला लेने वाली महिला वयस्क है, वह एक मां है, ऐसे में अगर वह बच्चे को जन्म नहीं देना चाहती है तो उसे गर्भपात कराने का पूरा अधिकार है. यह कानून के दायरे में आता है.

हम यह स्वीकार करते हैं कि आज कानून की सक्रियता ने महिलाओं को काफी हद तक उन की पहचान व अधिकार दिलाए हैं परंतु आज भी हमारे देश की 40 प्रतिशत महिलाएं अपने इन अधिकारों से महरूम हैं, जिस के कारण आज उन की हंसतीखेलती जिंदगी पर ग्रहण सा लग गया है.

बच्चे के जन्म का मां और बच्चे दोनों के जीवन पर बहुत गहरा और दूरगामी प्रभाव पड़ता है. इसलिए मातृत्व किसी भी महिला के लिए एक सुखद एहसास होना चाहिए, दुखद और थोपा हुआ नहीं.

हर सिक्के के दो पहलू

बच्चा पैदा करना पूरी तरह से महिलाओं के निर्णय पर निर्भर होने से परिवार में कई विसंगतियां पैदा होंगी.

बच्चे की जरूरत पूरे परिवार को होती है, और उसे पैदा एक औरत ही कर सकती है. ऐसे में उस के नकारात्मक रवैए से पूरा परिवार प्रभावित होगा.

मातृत्व का खूबसूरत एहसास मां बनने के बाद ही होता है. नकारात्मक निर्णय लेने से महिला इस एहसास से वंचित रह जाएगी.

सरोगेसी इस का विकल्प नहीं है, मजबूरी हो तो बात अलग है.

अपनी कोख से पैदा किए गए बच्चे से मां के जुड़ाव की तुलना, गोद लिए बच्चे या सरोगेसी द्वारा पैदा किए गए बच्चे से की ही नहीं जा सकती.

आज के दौर में महिलाएं मातृत्व से अधिक अपने कैरियर को महत्त्व देती हैं. उन की इस सोच पर कानून की मुहर लग जाने के बाद अब परिवार के विघटन का एक और मुद्दा बन जाएगा और तलाक की संख्या में बढ़ोतरी होनी अवश्यंभावी है.

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जनधन पर बैंकों की लूट

4 वर्ष पहले 15 अगस्त, 2014 को दिल्ली के लालकिले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी उद्घोषणा से लोगों को एकबारगी चौंका दिया था. सब के चहरे पर मुसकान थी, नारा था ‘मेरा खाता भाग्य विधाता.’ लोगों में आशा की किरण हिलोरें लेने लगी थी, 15  नहीं, तो 5 लाख रुपए तो मिल ही जाएंगे. जितने मुंह उतनी बातें होती थीं. केंद्र सरकार ने 28 अगस्त, 2014 को आधिकारिक तौर पर प्रधानमंत्री जनधन योजना के नाम से इस योजना का शुभारंभ कर दिया.

देखते ही देखते 5 सप्ताह के अंदर ही 5 करोड़ से अधिक खाते खोले जा चुके थे. इस बीच, खाते खोलने में जो अड़चनें आईं उन को दूर करने के लिए नियमों में ढिलाई दी गई, दस्तावेजों से समझौता किया गया. परिणामस्वरूप, अक्तूबर 2017 में वित्तीय सेवा विभाग के जारी आंकड़ों के अनुसार, 30.60 करोड़ लोगों ने इस योजना के तहत अपने खाते खुलवाए हैं और इन खातों में कुल 67,687.72 करोड़ रुपए जमा किए जा चुके हैं. वास्तव में गरीबों के लिए यह एक बहुत बड़ी उपलब्धि है, इस में दोराय नहीं. उन के नाम एक खाता तो हो गया वरना वे महीनों बैंकों के चक्कर लगाते रहते थे खाता खुलवाने के लिए, फिर भी कागजी कार्यवाही पूरी नहीं कर पाते थे और फिर थकहार कर घर बैठ जाते थे.

अब सही बात यह है कि खाता खुल गया तो बैंकों ने उन की गाढ़ी कमाई पर कैंची चलाना चालू कर दिया है. मैसेज, आहरण, बचत खाते में निर्धारित जमा से कम की राशि आदि और न जाने कितने नियमों का हवाला बैंक वाले आएदिन इन खाताधारकों को देते रहते हैं और उन के खातों में जमा रुपयों पर कैंची चलाते रहते हैं. बैंकों की मनमानी आज गरीब व्यक्ति साहूकारों व सूदखोरों से कहीं ज्यादा, अपने बैंकों से पीडि़त है. ब्याज तो कम है लेकिन बैंकों का मासिक चार्ज बहुत ज्यादा है. अब मजदूरगरीब जाए तो कहां जाए. सूदखोरों से मुक्ति के लिए तो वह न्यायालय का दरवाजा खटखटा लेता था किंतु बैंकों की मनमानी लूट ने उसे कहीं का नहीं छोड़ा. सरकार का शासकीय आदेश जीरो बैलेंस, निशुल्क रुपे कार्ड के नारे आदि धरे के धरे रह गए, जैसे भजनों से मिलने वाला सुख, शांति व समृद्धि. जनधन खाते के कुछ खातेदार ऐसे हैं जो 1,000-500 तो दूर, 100-200 रुपए भी जमा नहीं कर पा रहे हैं.

ऐसे में बैंक नितनए नियमों का हवाला देते हुए सैकड़ों का चूना खाताधारकों को हर महीने लगाएं, यह उचित नहीं है. एक ओर जहां सरकार कैशलैस भुगतान की योजना चला रही है, वहीं दूसरी तरफ विभिन्न प्राइवेट और सरकारी बैंकों ने खाताधारकों के खाते से 1 अप्रैल, 2017 से भारीभरकम कटौती करने लगे हैं.  बचत खाते में महानगरों में रहने वालों को 3 हजार, शहरी व कसबाई इलाकों में रहने को 2 हजार और ग्रामीण इलाकों में 1 हजार रुपए खाते में औसतन रखना जरूरी होगा. ऐसा न करने पर बैंक 50 से 100 रुपए तक सर्विस चार्ज की वसूली ग्राहक के खाते से करता है. यदि एटीएम कार्ड आप के बताए पते से वापस चला जाता है तो इस के एवज में कूरियर चार्ज के रूप में 100 रुपए व सर्विस टैक्स वसूल किया जाता है.

डैबिट कार्ड के सालाना चार्ज में भी बढ़ोतरी की गई है. क्लासिक डैबिट कार्ड पर 125 रुपए व सर्विस टैक्स खाते से कटते हैं. सिल्वर, ग्लोबल, युवा व गोल्ड डैबिट कार्ड पर 175 रुपए व सर्विस टैक्स खाते से कटते हैं. प्लैटिनम डैबिट कार्ड वालों के खाते से 250 रुपए व सर्विस टैक्स तो प्राइड व प्रीमियम बिजनैस डैबिट कार्ड वालों से 350 रुपए व सर्विस टैक्स वसूल किए जाते हैं.  अगर एटीएम कार्ड रिप्लेस करना है तो बैंक इस के एवज में खाते से 300 रुपए वसूल करता है. एटीएम पिन भूल जाते हैं और फिर डुप्लीकेट या रीजनरेट कराते हैं तो बैंक आप के खाते से 50 रुपए व सर्विस टैक्स वसूल करता है. इंटरनैशनल ट्रांजैक्शन खास कर बैलेंस इन्क्वायरी पर 25 रुपए व सर्विस टैक्स, कैश विथड्राअल ट्रांजैक्शन पर 100 रुपए मिनिमम कटौती किए जाने का नियम है. वह भी साढ़े 3 प्रतिशत सर्विस चार्ज के साथ. 5 बार ही टैक्सफ्री ट्रांजैक्शन की सुविधा मिलती है.

5 से ज्यादा ट्रांजैक्शन करने पर प्रति ट्रांजैक्शन ग्राहक को 10 से 15 रुपए देने होते हैं. गाढ़ी कमाई से कटौती न्यूनतम जमाराशि के नाम पर खाताधारक के खाते में निर्धारित राशि का होना अनिवार्य है. जिन के खाते में इस से कम राशि है और वे अपने खाते में बेगारी के चलते रुपए जमा नहीं कर पा रहे हैं तो वे अपनी गाढ़ी कमाई, जो आड़े वक्त के लिए बचा कर रखी थी, उस से भी हाथ धोने को मजबूर हैं. कमलेश कुमार, निवासी कसबा हरगांव, जिला सीतापुर, पेशे से राजगीर हैं. वे अपनी आपबीती सुनाते हुए भावुक हो जाते हैं, कहते हैं कि उन के खाते में 1,173 रुपए थे जो अब कटपिट कर मात्र 630 रुपए रह गए हैं, जिस में उन का प्रधानमंत्री बीमा योजना का चार्ज 312 रुपए भी शामिल है.

वे कहते हैं कि एक गरीब आदमी, जिस के सिर पर 5 जनों का बोझ हो और रोज की मजदूरी ही जीने का एकमात्र सहारा हो, वह बैंक में 2 हजार रुपए की न्यूनतम जमाराशि हमेशा कैसे रख सकता है. वे पारिवारिक खर्च के चलते बच्चे के स्कूल की मासिक फीस जमा नहीं कर पा रहे हैं, ऐसे में बैंक में पैसा कहां से जमा करें.  रहीस के खाते में 600 रुपए की जमाराशि पर 150 रुपए की कटौती की गई है. उन से बैंक में 2,000 रुपए की जमा के बारे में पूछने पर वे बताते हैं कि यदि घर में 4 लोगों का खाता हो और सारे खातों में मिला कर 8,000 रुपए जमा कर दिए जाएं तो वह रुपया गरीब आदमी के किस काम का जिस का वह ऐनवक्त पर इस्तेमाल न कर सके. राकेश कुमार लखीमपुरखीरी में अध्ययनरत एक छात्र हैं. उन की शहरी क्षेत्र के एक राष्ट्रीयकृत बैंक खाते में 2,120 रुपए की जमाराशि थी, लेकिन अब मात्र, 1,675 रुपए ही शेष हैं और वह भी बैंक की भेंट चढ़ता जा रहा है.

वे दुखी हैं, बेरोजगारी में खाते को कैसे मेंटेन करें.  विधवा गुड्डी देवी अपनी आपबीती सुनाते हुए कहती हैं कि वे अपने खाते में पैंशन के शेष 1,500 रुपए में से 1,000 रुपए लेने आई थीं दवा खरीदने के लिए, पर यहां पता चला कि खाते से 185 रुपए कट गए हैं. बैंककर्मी ने खाते में और रुपए डालने की बात कह कर उन्हें चलता कर दिया.  कांति सिंह लखनऊ में रह कर परीक्षा की तैयारी कर रही हैं, उन का स्टूडैंट खाता है. उन के खाते में 2,560 रुपए थे जो एकदिवसीय परीक्षाओं की फीस आदि के लिए रखे हुए थे. वे तब दंग रह गईं जब डैबिट कार्ड से फीस जमा कर रही थीं. पता चला खाते से 540 रुपए कम हो गए हैं. बैंक से पता करने पर मालूम हुआ कि खाते से 540 रुपए की राशि डैबिट कार्ड, एसएमएस चार्ज व मासिक खाता मेंटिनैंस आदि के काट लिए गए हैं.

किस काम का खाता आमजन खाते को चालू रखने के लिए रुपए जमा कर तो दें किंतु बैंककर्मी निर्धारित से कम की राशि होने पर चलता कर देते हैं. ऐसे में लोग अपने खाते को संचालित करने के स्थान पर अपना बैंक खाता बंद करवाना ही उचित समझते हैं. यह नमूना तो मात्र मेरे अपने आसपास के लोगों का है, देश में न जाने ऐसे कितने लाखोंकरोड़ों लोग होंगे जो बैंकों की इस अप्रत्याशित लूट का शिकार होते रहते हैं. ऐसे में प्रधानमंत्री का नारा ‘अपना खाता भाग्य विधाता’ एक मजाक बन कर रह गया है. बेचारा जनधन का मारा खाताधारक अब अपने घर की दालरोटी चलाने की जुगत करे या अपने खाते को मेंटेन करे. परिवार चलाने के लिए महंगाई की मार वह अलग से झेल रहा है. कामधंधा के नाम पर केंद्र सरकार ने कोई नया काम अभी तक नहीं किया.

4 वर्षों से सरकार अपने प्रचार में ही लगी हुई है. अब बेचारा खाताधारक अपने खाते को मेंटेन करने के लिए चोरीडकैती करे या फिर जेब काटे, वरना बैंक से अपनी जेब कटवाए. असुरक्षित खाताधारक गरीब मजदूर खाताधारक जहां बैंक में जमा कटौती से परेशान हैं वहीं बड़े खाताधारक असुरक्षा से परेशान हैं. देश के सभी सरकारी, अर्धसरकारी, शहरी, ग्रामीण बैंक खाते से आधार जोड़ने का अभियान चला रहे हैं. क्या यह पूरी तरह सुरक्षित है? इस का उत्तर न सरकार के पास है न बैंकों के पास, खुद आधार जारी करने वाली संस्था यूआईडीएआई ने भी इसे सुरक्षित नहीं माना है. यूआईडीएआई ने बताया है कि अब तक 210 बार आधार से जुड़े लोगों की गोपनीय जानकारी जन्मतिथि, पता आदि को लीक किया जा चुका है. इस बात का खुलासा नहीं किया गया कि ऐसा कबकब घटित हुआ है. साइबर हमले का भ्रम लोगों के बीच बना हुआ है. इस प्रकार की घटनाएं वहां तक घटित हो रही हैं जो राष्ट्र तकनीकी मामलों में भारत से कहीं ज्यादा विकसित हैं.

आएदिन बैंक साइबर हमले के शिकार हो जाते हैं और अपने साथसाथ लोगों को आर्थिक पंगु बना देते हैं. ऐसे में हम खुद को साइबर हमलों से कितना सुरक्षित पाएंगे जबकि साइबर अपराधी को आधार कार्डों का एक मजबूत मंच मिल जाएगा. राष्ट्रीय अपराध रिकौर्ड ब्यूरो के अनुसार, साइबर अपराध का मामला देश में सालदरसाल बढ़ता ही जा रहा है. 2014 में यह  आंकड़ा 3,622 था, जो 2015 में बढ़ कर 11,592 और 2016 में 12,317 के स्तर को पार कर गया है. आईटी विशेषज्ञ रामानुज पांडे कहते हैं कि साइबर अपराधों को रोकने के लिए बड़े स्तर पर कोई खास तकनीकी अभी तक ईजाद नहीं की गई है. इस के बचाव हेतु आमजन के मध्य में डिजिटल जागरूकता अभियान चलाया जाना चाहिए. तभी हम सब को साइबर अपराधियों से सुरक्षित रख सकते हैं. हैकरों का सब से पसंदीदा निशाना बैंक, इनवैस्टमैंट एजेंसियां और बीमा कंपनियां हैं. साइबर सिक्योरिटी फर्म सिमैनटेक के मुताबिक, 2015 में हैकरों ने 35 फीसदी हमले इन्हीं क्षेत्रों पर किए. हैकरों ने न्यूयौर्क फैडरल रिजर्व में सेंध लगा कर बंगलादेश के बैंकों से 8.1 करोड़ डौलर उड़ा दिए थे.

12 मई, 2017 को वैश्विक रैनसमवेयर हमला हुआ. हैकर्स ने अमेरिका की नैशनल सिक्योरिटी एजेंसी जैसी तकनीक का इस्तेमाल कर साइबर अटैक किया. रैनसम अंगरेजी शब्द है, जिस का अर्थ है, फिरौती.  इस साइबर हमले के बाद संक्रमित कंप्यूटरों ने काम करना बंद कर दिया. उन्हें फिर से खोलने के लिए बिटकौइन के रूप में 300 से 600 डौलर तक की फिरौती की मांग की गई. ब्रिटेन, अमेरिका, चीन, रूस, स्पेन, इटली, वियतनाम समेत लगभग 74 देशों में रैनसमवेयर साइबर हमले हुए थे. साइबर सुरक्षा शोधकर्ताओं के मुताबिक, बिटकौइन मांगने के 36 हजार मामलों का पता चला. परिणामतया, 2,30,000 से ज्यादा कंप्यूटर प्रभावित हो गए थे. बंगलादेश में 2015 के साइबर हमले ने बैंक तो बैंक, लोगों को भी दिवालिया बना दिया था.

फिर भी हम नहीं चेत रहे हैं और बिना किसी पुख्ता सुरक्षा के आधार कार्ड को बैंक से जोड़ रहे हैं. लोगों की खूनपसीने की कमाई को लूटने का एक खुला मंच तैयार कर रहे हैं.  भविष्य में अगर इस प्रकार की घटनाएं देश में कहीं घट जाती हैं तो उन का जिम्मेदार कौन होगा? यह देश के सामने बहुत बड़ा प्रश्न है. सरकार को इस तरफ गंभीरता से सोचना होगा. और जब पूरा विश्वास हो जाए कि अब हम सुरक्षित हैं तभी लोगों के बैंक खातों को आधार कार्ड से जोड़ने के कार्य को अमल में लाया जाना चाहिए.

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दोस्त बना जीजा, खतरनाक नतीजा

सुबह का उजाला अभी फैलना शुरू हुआ था कि ‘बचाओ बचाओ’ की मर्मभेदी चीख ने वहां मौजूद लोगों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया था. चीखने वाले पर तेजधार हथियार से एक युवक ने हमला किया था, जिस से गंभीर रूप से घायल हो कर वह चीखा था. चीखने के साथ ही वह सड़क पर गिर पड़ा था और गिरते ही बेहोश हो गया था.

उस युवक के गिरते ही उस पर हमला करने वाला युवक लंबे फल का खून सना चाकू हाथ में लिए भागा था. सुबह का समय होने की वजह से वहां बहुत कम लोग थे, लेकिन जो भी थे, वे उस का पीछा करने या पकड़ने की हिम्मत नहीं कर सके थे.

पर उन लोगों ने इतना जरूर किया कि हमलावर के भागने के बाद सड़क पर घायल पड़े युवक को पंचकूला के सैक्टर-6 स्थित जनरल अस्पताल पहुंचा दिया था. उसे देखते ही डाक्टरों ने मृत घोषित करने के साथ इस की सूचना पुलिस को दे दी थी.

सूचना मिलते ही थाना मौलीजागरां के एएसआई गुरमीत सिंह सुबह 7 बजे के करीब अस्पताल पहुंच गए थे. घटना की जानकारी ले कर उन्होंने थानाप्रभारी इंसपेक्टर बलदेव कुमार को सूचित किया तो सिपाही अमित कुमार के साथ वह भी अस्पताल पहुंच गए थे.

जरूरी काररवाई कर के बलदेव कुमार ने उन लोगों से बात की, जो मृतक को अस्पताल ले कर आए थे. वे 2 लोग थे, जिन में एक 19 साल का मोहम्मद चांद था और दूसरा था ड्राइवर अशोक कुमार. पूछताछ में चांद ने बताया था कि वह पंचकूला के सैक्टर-16 की इंदिरा कालोनी के मकान नंबर 1821 में रहता था और सैक्टर-17 की राजीव कालोनी स्थित शरीफ हलाल मीट शौप पर नौकरी करता था.

सुबह जल्दी जा कर चांद ही दुकान खोलता था. मृतक को ही नहीं, उस पर हमला करने वाले को भी वह अच्छी तरह से पहचानता था. वह सुबह 5 बजे दुकान पर पहुंचा तो मुर्गा सप्लाई करने वाली गाड़ी आ गई. गाड़ी के ड्राइवर अशोक कुमार ने मोहम्मद चांद को आवाज दे कर गाड़ी से मुर्गे उतारने को कहा.

मोहम्मद चांद गाड़ी के पीछे पहुंचा तो गाड़ी में बैठा ड्राइवर का सहायक इरफान उतर कर उस के पास आ गया. जैसे ही वह जाली वाला दरवाजा खोल कर मुर्गे निकालने के लिए आगे बढ़ा, शाहबाज हाथ में चाकू लिए वहां आया और इरफान के सिर पर उसी चाकू से वार कर दिया.

वार होते ही इरफान पीछे की ओर घूमा तो शाहबाज ने कहा, ‘तुम ने मेरी भोलीभाली बहन को अपनी मीठीमीठी बातों में फंसा कर मेरी मरजी के खिलाफ उस से शादी की है न? तो आज मैं तुझे उसी का सबक सिखा रहा हूं. आज मैं तुझे जिंदा नहीं छोड़ूंगा.’

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इस के बाद शाहबाज ने इरफान की छाती, आंख के नीचे और कमर तथा पेट पर लगातार कई वार किए. इरफान ‘बचाओ…बचाओ’ की गुहार लगाते हुए नीचे गिर गया. शाहबाज का गुस्सा और उस के हाथ में चाकू देख कर कोई भी उस के पास जाने की हिम्मत नहीं कर सका.

लेकिन जैसे ही शाहबाज चला गया, मोहम्मद चांद और अशोक कुमार ने किसी तरह इरफान को अस्पताल पहुंचाया, जहां डाक्टरों ने उसे देखते ही मरा हुआ बताया. ऐसा ही कुछ अशोक कुमार ने भी बताया था, लेकिन उस का कहना था कि वह आगे था. शोर सुन कर पीछे आया. तब तक शाहबाज अपना काम कर के जा चुका था.

इंसपेक्टर बलदेव कुमार ने हत्याकांड के चश्मदीद मोहम्मद चांद के बयान के आधार पर शाहबाज के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज करने की अनुशंसा कर के तहरीर थाना भेज दी, जहां एफआईआर नंबर 101 पर भादंवि की धारा 302 के तहत यह केस दर्ज कर लिया गया. यह घटना 4 जून, 2016 की है.

उसी दिन पुलिस की एक टीम शाहबाज की तलाश में जुट गई. उस के बारे में पता करने के लिए विश्वस्त मुखबिर भी सक्रिय कर दिए गए थे. मुखबिर की ही सूचना पर शाहबाज को उसी दिन रात में गांव मक्खनमाजरा से गिरफ्तार कर लिया गया.

अदालत से कस्टडी रिमांड ले कर सब से पहले शाहबाज से उस चाकू के बारे में पूछा गया, जिस से उस ने इरफान का कत्ल किया था. 6 जून को उस की निशानदेही पर वह चाकू मौलीजागरां की एक कब्रगाह से बरामद कर लिया गया. उस ने वहां चाकू को पत्थरों के नीचे दबा कर रखा था. लेकिन उस पर लगा खून उस ने साफ कर दिया था.

इस के बाद शाहबाज से इरफान की हत्या के बारे में पूछताछ की गई तो उस ने जो कहानी सुनाई, वह इस प्रकार थी—

मूलरूप से उत्तर प्रदेश के जिला बिजनौर के रहने वाले शाहबाज और इरफान एक ही गांव के रहने वाले थे, इसलिए वे एक साथ खेलकूद कर बड़े हुए थे. कुछ दिनों पहले कामधंधे की तलाश में दोनों चंडीगढ़ आ गए. इरफान जहां अपने बड़े भाई के साथ आया था, वहीं शाहबाज अपने पूरे परिवार के साथ आया था. उस के परिवार में अब्बूअम्मी के अलावा एक छोटी बहन साहिबा थी.

चंडीगढ़ में दोनों पंचकूला की सीमा पर बसे गांव मौलीजागरां में थोड़ी दूरी पर अलगअलग किराए के मकान ले कर रहने लगे थे. मौलीजागरां जहां चंडीगढ़ में पड़ता है, वहीं मुख्य सड़क के उस पार की दुकानें हरियाणा के जिला पंचकूला के सैक्टर-17 की राजीव कालोनी के अंतर्गत आती हैं. उन्हीं में से एक दुकान पर शाहबाज जहां मुर्गे काटने का काम करने लगा था, वहीं इरफान को मुर्गे सप्लाई करने वाली गाड़ी पर सहायक की नौकरी मिल गई थी.

अपने हिसाब से दोनों का काम ठीकठाक चल रहा था. शाहबाज के अब्बू को भी नौकरी मिल गई थी. इरफान और शाहबाज हमउम्र थे. दोनों इतने गहरे दोस्त थे कि उन में सगे भाइयों जैसा प्यार था. एक दिन भी दोनों एकदूसरे से मिले बिना नहीं रह पाते थे. एकदूसरे के यहां आनाजाना, खाना खा लेना या फिर कभीकभार सो जाना आम बात थी.

साहिबा भी दोनों के साथ बचपन से खेलतीकूदती आई थी. मगर अब वह जवान हो चुकी थी. घर वाले उस के निकाह के बारे में सोचने लगे थे. देखनेदिखाने की बात चली तो साहिबा ने हिम्मत कर के शरमाते हुए घर वालों से कहा कि वह इरफान से प्यार करती है और उसी से निकाह करना चाहती है.

साहिबा की इस बात से शाहबाज के घर में तूफान सा आ गया. घर का कोई भी आदमी इस रिश्ते के लिए तैयार नहीं था. शाहबाज ने साफ कहा, ‘‘इस से बड़ी जिल्लत मेरे लिए और क्या होगी कि लोग यह कह कर मेरा मजाक उड़ाएंगे कि अपनी बहन का निकाह करने के लिए ही मैं ने इरफान से दोस्ती की थी. क्या निकाह के लिए सिर्फ वही रह गया है? दुनिया में और कोई लड़का नहीं है? मैं यह निकाह किसी भी कीमत पर नहीं होने दूंगा.’’

शाहबाज ने साहिबा को तो लताड़ा ही, इरफान से भी झगड़ा किया. इरफान ने उसे समझाने की कोशिश करते हुए कहा कि जो भी होगा, घर वालों की रजामंदी से होगा. लेकिन शाहबाज ने साफ कह दिया कि वह साहिबा को भूल जाए और किसी अन्य लड़की से निकाह कर ले, वरना उस के लिए ठीक नहीं होगा.

शाहबाज की इस धमकी का नतीजा यह हुआ कि कुछ दिनों बाद इरफान साहिबा को भगा ले गया और एक धार्मिक स्थल पर दोनों ने निकाह कर लिया. वह वापस आया तो साहिबा को शरीकेहयात बना कर आया. शाहबाज को इस मामले में सारी गलती इरफान की नजर आ रही थी. उस ने अपने दिलोदिमाग में बैठा लिया कि इरफान ने साहिबा के भोलेपन का फायदा उठा कर उसे अपनी बातों में फंसा लिया है.

शाहबाज इरफान से पहले से ही नाराज था, जलती पर घी का काम किया उस ने साहिबा को भगा कर. उस के अब्बू ने इस से बहुत ज्यादा शर्मिंदगी महसूस की. इसी की वजह उन्होंने 2 दिनों बाद ही मौलीजागरां का अपना निवास छोड़ दिया था और वहां से 20 किलोमीटर दूर जा कर कस्बा डेराबस्सी में किराए का मकान ले कर रहने लगे थे. उन्होंने उधर जाना ही छोड़ दिया था. शाहबाज को नौकरी की वजह से उधर जाना पड़ता था.

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जिस मीट की दुकान पर शाहबाज काम करता था, इरफान रोजाना उधर मुर्गे की सप्लाई करने आता था. लेकिन निकाह के बाद वह उधर दिखाई नहीं दिया था. पता चला कि निकाह के दिन से ही उस ने छुट्टी ले रखी है.

4 जून, 2016 की बात है. साहिबा से इरफान को निकाह किए 5 दिन हो गए थे. सुबह के 5 बजे शाहबाज दुकान पर पहुंच कर मुर्गा काटने वाला चाकू तेज कर रहा था. तभी मुर्गेवाली गाड़ी आ कर उस की दुकान से थोड़ी दूरी पर सड़क के किनारे रुकी. इरफान उतर कर गाड़ी के पीछे की ओर आया.

शाहबाज ने उसे आते देखा तो उसे देख कर उस की आंखों में खून उतर आया. उस के पास सोचनेविचारने का वक्त नहीं था. वह मीट काटने वाला चाकू ले कर तेजी से भागता हुआ इरफान के पास पहुंचा और जरा सी देर में उसे मौत के घाट उतार कर भाग गया.

पहले तो उस ने कब्रिस्तान के पास एक जगह चाकू को साफ कर के पत्थरों के नीचे छिपा दिया. उस के बाद बचने के लिए इधरउधर छिपता रहा. लेकिन पुलिस ने उसे पकड़ लिया. उस ने कहा कि इरफान ने काम ही ऐसा किया था, जिस से उसे मारने का कोई अफसोस नहीं है. इरफान ने जो किया था, उस की उसे यही सजा मिलनी चाहिए थी.

पूछताछ के बाद पुलिस ने शाहबाज को फिर से अदालत में पेश किया, जहां से उसे न्यायिक हिरासत में बुड़ैल जेल भेज दिया गया.

बलदेव कुमार ने उस के खिलाफ आरोपपत्र तैयार कर समय से निचली अदालत में दाखिल कर दिया, जहां से सैशन कमिट हो कर 13 सितंबर, 2016 से मामले की सुनवाई चंडीगढ़ के अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश अतुल कसाना की अदालत में शुरू हुई.

6 अक्तूबर को अदालत ने शाहबाज के खिलाफ धारा 302 का चार्ज फ्रेम कर दिया. उस ने अदालत में खुद को बेकसूर बताते हुए दरख्वास्त की थी कि पुलिस ने एक झूठी कहानी गढ़ कर इस केस में उसे बिना मतलब फंसा दिया है. वह अपने उन बयानों से भी मुकर गया, जो उस ने कस्टडी रिमांड के दौरान पुलिस को दिए थे.

मामले की विधिवत सुनवाई शुरू होते ही अभियोजन पक्ष ने डा. अमनदीप सिंह, डा. गौरव, मोहम्मद चांद, इंतजाम अली, अशोक कुमार, इंसपेक्टर बलदेव कुमार, फोटोग्राफर फूला सिंह, हवलदार सतनाम सिंह, रमेशचंद, धर्मपाल एवं यशपाल के अलावा सीनियर कांस्टेबल कृष्णकुमार, एसआई गुरमीत सिंह, एसआई गुरनाम सिंह और डा. मनदीप सिंह के रूप में 15 गवाह अदालत में पेश किए.

इस के बाद अतिरिक्त पब्लिक प्रौसीक्यूटर ने अभियोजन पक्ष की गवाहियों के पूरी होने के बाद सीआरपीसी की धारा 293 के तहत फोरैंसिक साइंस लैबोरेटरी की रिपोर्ट के अलावा विसरा रिपोर्ट भी पेश की.

अभियोजन पक्ष की काररवाई पूरी होने के बाद 20 जनवरी, 2017 को कोड औफ क्रिमिनल प्रोसीजर की धारा 313 के तहत अभियुक्त शाहबाज का स्टेटमैंट रिकौर्ड किया गया. अभियुक्त ने उक्त सभी गवाहों को झूठ करार देते हुए यही कहा कि वह बेकसूर है. उसे झूठा फंसाया गया है.

बचाव पक्ष की ओर से साहिबा को पेश किया गया. कोड औफ क्रिमिनल प्रोसीजर की धारा 315 के अधीन दर्ज अपने बयान में साहिबा ने अदालत को बताया कि उस ने इरफान से प्रेम विवाह किया था, जिस का परिवार वालों ने पहले तो विरोध किया, लेकिन बाद में मान गए थे.

इरफान ने उसे बताया था कि उस की कुछ गलत लोगों से ऐसी दुश्मनी हो गई है कि वे मौका मिलने पर उस की जान ले सकते हैं. ऐसे में हो सकता है, इरफान को उन्हीं लोगों ने मारा हो, न कि शाहबाज ने.

बचाव पक्ष की ओर से अशोक कुमार को अविश्वसनीय करार देते हुए अदालत ने उसे मुकरा गवाह घोषित करने की गुहार लगाई गई, जो अदालत ने मान भी ली. यह भी दलील दी गई कि पुलिस द्वारा बरामद चाकू पर डाक्टर की रिपोर्ट के मुताबिक मानवीय खून नहीं लगा था.

31 जनवरी, 2017 को विद्वान जज अतुल कसाना ने इस मामले का फैसला सुनाते हुए खुली अदालत में कहा कि उन्होंने दोनों पक्षों को ध्यानपूर्वक सुनने के अलावा सभी साक्ष्यों को गौर से जांचापरखा है, जिन से यह केस शीशे की तरह साफ है. अशोक कुमार को भले मुकरा गवाह करार दिया गया है, लेकिन उस की गवाही को नकारा नहीं जा सकता.

वह भी एक तरह से इस केस का चश्मदीद गवाह था. भले ही उस की गवाही में बाद में कुछ विपरीत बातें सामने आईं, जिस वजह से उसे मुकरा गवाह घोषित किया गया. लेकिन उस की शुरू की गवाही अभियोजन पक्ष को पूरी तरह मजबूती देने में सहायक सिद्ध हुई है.

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चाकू पर मानवीय खून का अंश होने की बात रिपोर्ट में पहले ही आ चुकी है. हालांकि अभियुक्त ने उसे फेंकने से पहले साफ कर दिया था. साहिबा को बचाव पक्ष ने गवाह के रूप में पेश कर के केस की दिशा बदलने का प्रयास किया. लेकिन उस की प्रेम विवाह वाली बात मान लेने से ही प्रौसीक्यूशन की कहानी को बल मिल जाता है.

लिहाजा यह अदालत इस निष्कर्ष पर पहुंची है कि अभियोजन पक्ष आरोप सिद्ध करने में कामयाब रहा है और अभियुक्त शाहबाज खान मृतक मोहम्मद इरफान का कत्ल करने का दोषी पाया गया है. अभी वह जेल में है. सजा की बाबत सुनने के लिए उसे अगले दिन अदालत में पेश किया जाए.

अगले दिन शाहबाज को ला कर अदालत में पेश किया गया तो माननीय एडीजे अतुल कसाना ने उसे उम्रकैद के अलावा 10 हजार रुपए जुरमाने की सजा सुनाई.

– कथा अदालत के फैसले पर आधारित 

बेरोजगारी और मानसिकता

आंकड़ों के अनुसार देश में बेरोजगारी बढ़ रही है. सरकार के इस दावे के बावजूद कि भारत दुनिया की सब से तेज बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था है, बेरोजगारी के संकट में कोई कमी नहीं आने वाली. देश में छिपी बेरोजगारी तो बहुत ज्यादा है क्योंकि हमारे यहां 1 कमाए 5 खाएं की परंपरा आज भी चल रही है. बहुत से बेरोजगार आधाअधूरा काम कर के अपनेआप को कमाऊ मान लेते हैं.

बेरोजगारी बढ़ने की जिम्मेदार सरकार ही हो, जरूरी नहीं. किसी भी अर्थव्यवस्था में बेरोजगारी की जड़ उस की उत्पादकता में होती है. यदि जनसंख्या उत्पादक होगी तो थोड़े से लोग बहुतों के लायक खाना, मकान, कपड़ा जुटा सकते हैं और बाकी व्यर्थ के विलासिता वाले कामों में लग कर अपने को कामकाजी मान सकते हैं, लेकिन यदि उत्पादकता कम होगी तो ज्यादा लोग उसी जमीन या उन्हीं कारखानों में लगेंगे और वे केवल अपने लायक ही सामान पैदा कर सकेंगे या बना सकेंगे.

अमीर देशों में प्रतिव्यक्ति उत्पादकता कृषि, औद्योगिक व सेवा क्षेत्रों में बहुत ज्यादा है और वहां जनसंख्या की 2 से 5 प्रतिशत लोगों की बेरोजगारी भी सरकार के लिए चिंता का विषय होती है. इस के उलट हमारे यहां स्पष्ट व अस्पष्ट बेरोजगारी के आंकडे़ भयावह हैं और गांवों में कृषि पर आधारित बेरोजगारी भी बढ़ रही है. इस का अर्थ है कि देश में ह्यूमन कैपिटल का बेहद नुकसान हो रहा है. देश की अर्थव्यस्था में 10 प्रतिशत से कम योगदान देने वाली कृषि पर 50 प्रतिशत आबादी निर्भर है.

कठिनाई यह है कि देश में सोच है कि यहां रोजगार उसे माना जाता है जहां बिना काम किए पैसा मिले. यहां सरकारी नौकरी ही सर्वोत्तम मानी जाती है चाहे उस का अर्थव्यवस्था के लिए कुछ लाभ न हो. यहां लूट के माल में बंटवारा सर्वोत्तम काम माना जाता है और वही सफल रोजगार माना जाता है जो मुफ्त की खा सके. यह हमारी उस पौराणिक संस्कृति की देन है जिस में काम करने वाले लोग समाज के सब से निम्न हैं और लूटने वाले पंडेपुजारी सब से ऊंचे.

इस समस्या का हल आसान नहीं है क्योंकि मानसिकता बदलने में कई पीढि़यां लगती हैं. अंगरेज हमें बदल नहीं पाए और हमारे नेताओं का तो कहना ही क्या है? वे तो लूट के देवताओं के पुजारी हैं.

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