उज्बेकिस्तान में हुई ‘49वीं एशियन बौडी बिल्डिंग ऐंड फिजिक चैंपियनशिप’ में भारत की 27 साला श्वेता राठौड़ ने सिल्वर मैडल जीत कर पूरी दुनिया को चौंका दिया. भारत संचार निगम लिमिटेड में अफसर अनिल कुमार की बेटी श्वेता राठौड़ जयपुर की रहने वाली हैं. उन्होंने इंजीनियरिंग की डिगरी हासिल करने के बाद दिल्ली में कई बड़ी कारपोरेट कंपनियों में नौकरी की, पर मुंबई पहुंचने के बाद उन्होंने अपनी इवैंट मैनेजमैंट कंपनी शुरू की. साल 2014 में मुंबई में हुई ‘वर्ल्ड बौडी बिल्डिंग ऐंड फिजिक चैंपियनशिप’ ने श्वेता राठौड़ की जिंदगी बदल दी. आज वे बहुत बड़ी फिजिक सेलेब्रिटी बन चुकी हैं. इस के अलावा श्वेता राठौड़ ‘गौड्स ब्यूटीफुल चाइल्ड आर्गेनाइजेशन’ नामक एनजीओ के जरीए गरीब बच्चों, सिंगल मदर्स व आग से बुरी तरह जली औरतों को नई व बेहतर जिंदगी देने के काम को भी अंजाम दे रही हैं.
पेश हैं, श्वेता राठौड़ के साथ हुई लंबी बातचीत के खास अंश:
इंजीनियरिंग की डिगरी हासिल करने और कारपोरेट जगत में काम करने के बाद सब छोड़ कर फिटनैस जगत से जुड़ने का खयाल आप को कैसे आया
सबकुछ इतना अचानक नहीं हुआ. मैं स्कूल के दिनों से ही अपनी फिटनैस पर ध्यान देती रही हूं. जब मैं 10वीं जमात में पढ़ रही थी, तब से मैं ने जिम जाना शुरू कर रखा है. जिम करने के दौरान ही वेट लिफ्टिंग के प्रति मेरी दिलचस्पी बढ़ी. मैं ने हमेशा एडवांस वर्कआउट ही किया है, पर यह सब 2 साल पहले तक मैं खुद को फिट रखने के लिए करती थी.
‘फिजिक चैंपियन’ बनने का इरादा आप के मन में कैसे आया
साल 2014 में मुंबई के गोरे गांव इलाके में ‘इंडियन बौडी बिल्डिंग एसोसिएशन’ की तरफ से ‘फिजिक ऐंड बौडी बिल्डिंग वर्ल्ड चैंपियनशिप’ कराई गई थी. भारत में पहली बार यह आयोजन हो रहा था. मेरे मन में यह खयाल आ रहा था कि ‘फिजिक एथलीट’ बन कर मैं भी पूरे भारत की औरतों को इस के प्रति जागरूक करूं.
क्या ‘बौडी बिल्डिंग’ और ‘फिजिक एथलीट’ एक ही बात है
नहीं. बिलकुल नहीं. ‘बौडी बिल्डिंग’ और ‘फिजिक एथलीट’ दोनों में जमीनआसमान का अंतर है, पर दोनों प्रतियोगिताएं एकसाथ होती हैं. ‘बौडी बिल्डिंग’ में अपनी मसल्स को जरूरत से ज्यादा उभारना पड़ता है, जबकि ‘फिजिक एथलीट’ फिटनैस के क्षेत्र से जुड़ी हुई है. इस में डेढ़ से 2 मिनट की परफौर्मैंस देनी होती है, जो किसी गाने या डांस पर होती है. इतने कम समय में ही किक, स्लिप, वन हैंड पुशअप समेत जितने भी वर्कआउट होते हैं, करने पड़ते हैं. ‘फिजिक चैंपियनशिप’ में लड़की को फिट दिखना होता है, उस के मसल्स भी दिखने होते हैं, पर उस का औरत वाला रूप नजर आना चाहिए. यानी एक औरत के रूप में उसे खूबसूरत के साथसाथ फिट भी दिखना है. उस का स्टैमिना भी जबरदस्त होना चाहिए, तभी वह विजेता बन सकती है.
‘फिजिक एथलीट’ के रूप में किसी भी प्रतियोगिता में हिस्सा लेने के लिए कितना खर्च आता है
हमारा बहुत खर्चा होता है. हमें एक खास तरह के खानपान के नियम का पालन करना होता है. हमें जिम की लंबीचौड़ी फीस देनी होती है. ट्रेनर को अच्छे पैसे देने पड़ते हैं. एक इंटरनैशनल चैंपियनशिप के लिए खुद को तैयार करने में तकरीबन 9 से 10 लाख रुपए खर्च होते हैं.
यह इतना खर्चीला क्षेत्र है, तो फिर आप इस से क्यों जुड़ीं
मैं फिटनैस के क्षेत्र में लड़कियों को आने के लिए प्रेरित करना चाहती हूं. मैं उन्हें बताना चाहती हूं कि इंजीनियरिंग में डिगरी लेने व कारपोरेट जगत में अच्छी नौकरी करने के बावजूद मैं फिटनैस फिजिक के क्षेत्र से जुड़ी और भारत का नाम विदेशों में रोशन कर रही हूं.
‘फिजिक एथलीट’ से जुड़ने के लिए सरकार मदद क्यों नहीं करती है
जहां तक सरकार का सवाल है, तो सरकार जागरूक नहीं है. शायद इस की वजह यह रही है कि सरकार के सामने भी फिजिक फिटनैस के रूप में कोई चेहरा अभी तक नहीं आया है. जब मैं ने इस क्षेत्र में काम करना शुरू किया, तब मुझे सहारा देने वाला कोई नहीं था. लेकिन इस क्षेत्र से जुड़ने वाली लड़कियों की मदद करने के लिए हम ने ‘फिटनैस फौर एवर प्राइवेट लिमिटेड’ नामक एक अकादमी शुरू की. हमारी कंपनी उन्हें सही सलाह देने के साथसाथ कोचिंग भी देगी.
आम लड़की को फिट रहने के लिए क्या करना चाहिए
भारतीय औरतों में आयरन व कैल्शियम की कमी होती है, इसलिए इन्हें प्रोटीन वाला भोजन ज्यादा करना चाहिए. उन्हें दाल के साथसाथ हरी सब्जियां लेनी चाहिए. दूध के बने पदार्थ खाने चाहिए. दही बहुत जरूरी है. दही से शरीर के अंदर मैटाबोलिज्म बढ़ता है. पिज्जा, बर्गर जैसे जंक फूड का सेवन कतई नहीं करना चाहिए, बल्कि ब्राउन राइस खाना चाहिए. रोटी खानी है, तो सिर्फ गेहूं की न खाएं, बल्कि गेहूं के साथसाथ चना मिली रोटी खाएं या दूसरे कई अनाजों को मिला कर खाएं. इस के अलावा स्विमिंग या चहलकदमी या फिर साइकिल चलाना भी हर दिन करना चाहिए. जो लोग यह सब नहीं करते हैं, उन के अंदर चिड़चिड़ापन रहता है.
आप अपने एनजीओ ‘गौड्स ब्यूटीफुल चाइल्ड आर्गेनाइजेशन’ के जरीए क्या कर रही हैं
मेरा सारा ध्यान गरीब बच्चों पर है. एनजीओ शुरू करने से पहले मैं ने एक सर्वे किया था कि लोग अपराधी कैसे बनते हैं 90 फीसदी अपराधी बहुत गरीब परिवार से आने वाले लोग होते हैं. मैं ने एक बात को अनुभव किया कि तमाम एनजीओ गरीब बच्चों को मुफ्त में खाना खिला देते हैं या उन्हें स्कूल में पढ़ने भेज देते हैं. पर मैं अपने एनजीओ के जरीए गरीब बच्चों की पर्सनैलिटी को निखारने का काम कर रही हूं. इतना ही नहीं, हमारी संस्था सिंगल मदर्स की भी मदद कर रही है. मैं ने 10 ऐसी जरूरतमंद औरतों का इलाज करा कर उन्हें उन के पैरों पर खड़ा कराया, जो किसी हादसे में बुरी तरह से जल गई थीं.
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गांव वालों के उस समूह में चर्चा का मुद्दा ऐसा था, जो पंडेपुजारियों के धंधे पर सीधे चोट करने वाला था. वे लोग तय कर रहे थे कि मृत्युभोज की सामाजिक बुराई को खत्म किया जाए. इस से लोगों पर दोहरी मार पड़ती है. वे पंडों का तो पेट भरते ही हैं, उन्हें आडंबरों का शिकार भी होना पड़ता है. प्रियजनों को खोने वालों के लिए ऐसी प्रथा मृत्युभोज न हो कर ‘मृत्युदंड’ बन जाती है.
घंटों हुई चर्चा के बाद आखिर में यह तय किया गया कि इस बुराई के खिलाफ सामाजिक आंदोलन छेड़ा जाएगा. गांव में न तो कोई किसी पंडे के कहने पर मृत्युभोज देगा और न ही कोई उस में शामिल होगा. उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ जिले के विकासखंड धनीपुर इलाके में ऐसी बुराई के खिलाफ खड़ा हो रहा आंदोलन मौत के बाद परिजनों को तरहतरह के धार्मिक कर्मकांडों और डर दिखा कर जेबें भरने वाले पंडेपुजारियों को भले ही नागवार गुजरे, लेकिन सोचविचार के बाद 24 जनवरी को गांव वालों ने जो सामूहिक फैसला किया, उस की तारीफ भी हो रही है.
3 दर्जन से ज्यादा गांवों में इस प्रथा को लोग खुद ही खत्म कर देना चाहते हैं. वे शपथ ले रहे हैं कि न तेरहवीं में खाएंगे और न किसी को खिलाएंगे. दरअसल, किसी की मौत होने के बाद कर्मकांडी पंडेपुजारियों के कहने पर सामाजिक व धार्मिक परंपरा के नाम पर अनापशनाप पैसे खर्च होते हैं. दूसरे शब्दों में कहें, तो अंतिम संस्कार से ले कर तेरहवीं तक कमाई करने का कोई रास्ता नहीं छोड़ा जाता है. दुख की बात तो यह है कि लोगों को मुंह भरने के लिए ऐसी प्रथाओं को निभाना पड़ता है. कोढ़ में खाज तब और बढ़ जाती है, जब बीमारी से किसी की मौत हो. इलाज कराने के खर्चों से ही परिवार खोखला हो चुका होता है. इस के बाद कर्मकांडियों का पेट भी भरना पड़ता है. गरीब आदमी सामाजिक व धार्मिक परंपरा निभाने के चक्कर में और भी गरीब हो जाता है.
हजामत कर के पेट पालने वाले दीपक का सामना कुछ ऐसे ही हालात से हुआ. उस के परिवार में एक साल में एक के बाद एक 3 मौतें हुईं. मां बीमार थीं. इलाज के दौरान डाक्टरों ने भी अपनी कमाई करने का पूरा फर्ज निभाया. हालात ऐेसे हुए कि मकान भी बेचना पड़ा. किसी तरह इलाज तो कराया, लेकिन बचा नहीं सके. उस के एक भाई की मौत एक हादसे में हो गई, जबकि दूसरे ने जिंदगी से दुखी हो कर खुदकुशी करने जैसा कदम उठा लिया था. दीपक बताता है कि 3 मौतों के बाद में होने वाली प्रथाओं के खर्चों में वह इतना टूट गया कि किसी तरह अब जिंदगी को संभाले हुए है. परिवार के सदस्य दिनरात मेहनत कर के किसी तरह कर्ज चुका रहे हैं. ऐसे मौके पर खर्च के मामले में जब पैसे की जरूरत होती है, तो नातेरिश्तेदार भी हाथ खींच लेते हैं.
किसी की मौत के बाद जब उसे गंगा घाट पर अंतिम संस्कार के लिए ले जाया जाता है, तो पंडों को जिमाने के साथ समूह में साथ जाने वाले लोगों को वहीं खाना खिलाया जाता है. इस के लिए होटल, ढाबे बने होते हैं, जो आमतौर पर पूरीकचौड़ी, 2 सब्जी बनाते हैं. एक थाली की कीमत 40 से 60 रुपए तक होती है. तैयार पूरीसब्जियों के रेट भी तय होते हैं. हजारों रुपए का खर्च तो वहां खाना खिलाने में हो चुका होता है. इस के बाद किसी अपने की मौत का दर्द झेल रहे परिवार द्वारा तेरहवीं की रस्म अदा की जाती है, उन्हें दक्षिणा और दान किया जाता है. कर्मकांडों को मरने वाले के परिवार वालों से दान के नाम पर फोल्डिंग, खाट, बिस्तर, तकिया, पहनने के कपड़े, जूताचप्पल, 5, 11 या 21 बरतन का सैट, नहाने की बालटी समेत गेहूंचावल वगैरह दान में चाहिए होता है. अगर कोई शराब का शौकीन रहा हो, तो उसे अच्छे किस्म की बोतल दान करने की सलाह दी जाती है. इस सामाजिक बुराई को खत्म करने की सलाह कोई नहीं देता.
इस के बाद सभी गांव, पड़ोस, महल्ले के लोगों, जानपहचान वालों व रिश्तेदारों को जिमाया जाता है. देहात व पिछड़े इलाकों में ऐसे मौकों पर तो मेहमानों को शराब पिलाने कीपरंपरा भी देखी गई है. मौत के बाद धार्मिक परंपराओं पर होने वाले खर्चों का दौर यहीं नहीं थमता. साल में पड़ने वाले कुछ मौकों पर भी दान की परंपरा है. साधारण परिवारों की माली हालत ऐसी होती है कि वह बेचारे कर्ज ही चुका रहे होते हैं. न वे मौत भूलते हैं, न उस की कर्जदार करने वाली परंपराएं. कर्मकांड करने वाले पंडितों को इन बातों से कोई मतलब नहीं होता है. पिछड़े इलाकों में तो गरीबों को साहूकारोंसूदखोरों से कर्ज ले कर यह सब करना पड़ता है. सामाजिक तौर पर भी उसे यह परंपरा निभाने के लिए मजबूर किया जाता है. यह माना जाता है कि अगर कोई तेरहवीं कर के लोगों को भोज नहीं कराएगा, तो समाज क्या कहेगा. पापपुण्य का कुचक्र चलाया जाता है.
यह गरीबों के यहां ही होता हो, ऐसा नहीं है. समाज का कोई तबका इस से अछूता नहीं है, बल्कि तेरहवीं को भी अब बड़े आयोजनों के रूप में किया जाता है, जैसे कोई उत्सव हो. जिस की तेरहवीं में ज्यादा पकवान बनते हैं, ज्यादा लोग जुटते हैं, उसे ऊंचे दर्जे का आदमी समझा जाता है. कुप्रथा के खिलाफ आवाज उठाने वाले क्षत्रिय महासभा से जुड़े योगेंद्र पाल सिंह कहते हैं, ‘‘ऐसा आयोजन लोगों के लिए मृत्युदंड बन जाता है. इस कुप्रथा को लोगों को खत्म करना चाहिए. बहुत से लोग ऐसी सामाजिक बुराई को खत्म करने के लिए सामाजिक आंदोलन में शामिल हो रहे हैं.’’
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आखिर महाराष्ट्र हाईकोर्ट और मीडिया के सक्रिय होते ही 18 महीने बाद महाराष्ट्र के नवी मुंबई, कलंबोली पुलिस थाने के अफसरों ने 7 दिसंबर, 2017 की शाम को करीब 8 बजे अपने विभाग के शातिर और ऊंची पहुंच वाले अफसर अभय कुरुंदकर को उस के मीरा रोड स्थित घर से गिरफ्तार कर लिया.
अभय कुरुंदकर जिला ठाणे, पालघर के नवघर पुलिस थाने में बतौर इंचार्ज तैनात था. उस पर अपने ही विभाग की एक महिला अधिकारी अश्विनी बेंद्रे के अपहरण और हत्या जैसे गंभीर आरोप थे. अश्विनी बेंद्रे नवी मुंबई कोमोठे स्थित ह्यूमन राइट्स कमीशन औफिस में असिस्टेंट पुलिस इंसपेक्टर के रूप में तैनात थी.
25 वर्षीय अश्विनी राजू बेंद्रे मूलरूप से कोल्हापुर, तालुका आंधले, गांव हातकणगे की रहने वाली थी. वह 2007 के बैच की पुलिस अधिकारी थी. उस के पिता 1988 में आर्मी से रिटायर होने के बाद काश्तकारी में व्यस्त हो गए थे. परिवार में उन की पत्नी के अलावा 2 बेटियां और एक बेटा था. शिक्षा के साथ अश्विनी बेंद्रे हर काम में अपने छोटे भाई आनंद बेंद्रे और छोटी बहन से होशियार थी. चूंकि पिता आर्मी से थे, इसलिए वह बेटी की रुचि को देखते हुए उसे आर्मी या पुलिस सेवा में भेजना चाहते थे.
10वीं तक की शिक्षा अपने गांव के स्कूल से पूरी करने के बाद अश्विनी आगे की पढ़ाई के लिए अपने मामा के घर कोल्हापुर आ गई थी. उस के मामा कोल्हापुर में पुलिस अधिकारी थे. बीकौम करने के बाद वह एमपीएससी की तैयारी में जुट गई थी, लेकिन परीक्षा में शामिल होने से पहले ही उस के मातापिता ने राजकुमार उर्फ राजू गोरे से उस की शादी तय कर दी. 2005 में अश्विनी बेंद्रे विदा हो कर अपनी ससुराल चली गई.
सीधे और सरल स्वभाव का राजू गोरे अश्विनी बेंद्रे जैसी सुंदर पत्नी को पा कर बहुत खुश था. उसे जब यह मालूम हुआ कि अश्विनी बेंद्रे के मातापिता की इच्छा और अश्विनी की इच्छा पुलिस सेवा जाने की थी तो राजू गोरे ने पत्नी की इस इच्छा को पूरा करने के लिए हरसंभव सहयोग करने को कहा. पति के सहयोग से अश्विनी बेंद्रे ने एमपीएससी की परीक्षा में भाग लिया. यह परीक्षा उस ने अच्छे अंकों से पास की. इसी दौरान वह एक बेटी की मां भी बन गई.
नासिक में 6 माह की ट्रेनिंग पूरी करने के बाद अश्विनी बेंद्रे की पहली नियुक्ति पुणे में सबइंसपेक्टर के पद पर हुई थी. उस के बाद उसे सांगली के पुलिस मुख्यालय में तैनात कर दिया गया था. सांगली मुख्यालय में अश्विनी बेंद्रे को अभी कुछ महीने ही हुए थे कि उस का ट्रांसफर सांगली की लोकल क्राइम ब्रांच में कर दिया गया, जहां उस की मुलाकात पीआई अभय कुरुंदकर से हुई. अभय कुरुंदकर एक शातिरदिमाग अफसर था.
भले ही अफसर हो, अकेली औरत कई बार शातिर लोगों के जाल में फंस जाती है
अश्विनी बेंद्रे उस वक्त अपनी भावनाओं को दबाए पति से दूर अकेले ही जिंदगी का सफर तय कर रही थी. वैसे तो अश्विनी बेंद्रे एक सशक्त महिला थी. लेकिन पीआई अभय कुरुंदकर के फेंके गए जाल में वह बड़ी आसानी से फंस गई.
पीआई अभय कुरुंदकर मूलरूप से कोल्हापुर जिले के कराड़ गांव का रहने वाला था. उस का बचपन गरीबी और संघर्षों में बीता था. उस के बचपन में ही पिता का निधन हो गया था. परिवार में मां के अलावा 2 भाई और एक बहन थी. पिता के निधन के बाद जब परिवार वालों ने गांव से निकाल दिया तो मां अपने तीनों बच्चों को ले कर आजरा गांव में अपनी बहन के यहां रहने लगी थी. मेहनतमजदूरी कर के उन्होंने अपने तीनों बच्चों की परवरिश की.
दोनों भाई पढ़ाईलिखाई में जितने होशियार थे, उतने ही मेहनती भी थे. वे पूरा मन लगा कर पढ़ाई करते थे और बाकी समय में मां का हाथ बंटाते थे. उन के गांव के सारे दोस्त शराब, जुआ और राहजनी जैसे अपराधों में लिप्त रहते थे लेकिन ये दोनों भाई इन चीजों से दूर रहते थे. आखिरकार दोनों की मेहनत और पढ़ाई रंग लाई और दोनों भाइयों को पुलिस विभाग में नौकरी मिल गई.
पुलिस में नौकरी लग जाने के बाद अभय कुरुंदकर जब अपने पुश्तैनी घर और गांव गया तो पता चला कि उस के चचेरे भाइयों ने उस की पुश्तैनी जमीन पर कब्जा कर लिया है. इतना ही नहीं, उन्होंने उस के पिता की सारी संपत्ति भी अपने नाम करवा ली थी.
यह जान कर अभय कुरुंदकर काफी आहत हुआ, लेकिन उस ने अपने मन ही मन तय कर लिया था कि खूब पैसा कमा कर वह अपना घर अपने पुश्तैनी गांव में ही बनवाएगा. और उस ने ऐसा ही किया भी. उस ने पुलिस विभाग में अपना कद बढ़ाना शुरू किया. इस काम में उसे कामयाबी भी मिली. शीघ्र ही उस की पैठ कुछ बड़े अधिकारियों और राजनीतिज्ञों तक हो गई थी
तत्कालीन मंत्री एकनाथ खड़से के भांजे ज्ञानेश्वर पाटिल उर्फ राजेश पाटिल से अभय कुरुंदकर की गहरी दोस्ती हो गई थी. कानून और राजनीति के बीच दोस्ती होने के कारण अभय कुरुंदकर ने गैरकानूनी काम करने शुरू कर दिए. वह दोनों हाथों से पैसे कमाने लगा. वह अपनी पहुंच का फायदा उठा कर अपना ट्रांसफर उन थानों में कराता रहा, जहां अच्छी कमाई होती थी.
अभय कुरुंदकर ने थोड़े ही दिनों में इतना पैसा कमा लिया कि उस ने अपने गांव में 6 बिस्वा जमीन खरीद कर एक आलीशान घर बनवाया. उस मकान में उस का परिवार रहने लगा. इस के अलावा उस ने आजरा के आंबोली गांव में 7 एकड़ जमीन ले कर अपना फार्महाउस बनवाया. इस बीच उस का प्रमोशन और ट्रांसफर होते रहे.
29 मई, 2006 को उस का प्रमोशन कर के उसे कुछ दिनों के लिए कमिश्नर औफिस के नियंत्रण कक्ष भेज दिया गया. लेकिन अपनी पहुंच के कारण उस ने एक महीने के अंदर ही अपना ट्रांसफर कुपवाड़ा में करवा लिया. यहां पर वह लगभग ढाई साल रहा. यहीं से प्रमोशन पा कर वह मिर्ज के ट्रैफिक विभाग में चला गया.
2 जून, 2010 में अभय कुरुंदकर की बदली स्थानीय आर्थिक अपराध शाखा में पीआई के पद पर कर दी गई. यहीं पर अभय कुरुंदकर की मुलाकात एपीआई अश्विनी बेंद्रे से हुई और वह उस का पहली ही नजर में उस का दीवाना हो गया. कुछ ही दिनों में उसे अश्विनी बेंद्रे की कमजोरी पता लग गई.
वह उन दिनों जिस वियोग की ज्वाला में जल रही थी, उस पर अभय कुरुंदकर ने धीरेधीरे मरहम लगाना शुरू किया. उस का मरहम काम कर गया. दोनों को जब मालूम हुआ कि वह एक ही जिले के रहने वाले हैं तो नजदीकियां और बढ़ गईं. धीरेधीरे उन के बीच गहरी दोस्ती हो गई थी.
भ्रष्ट अफसर की सोच हमेशा गलत ही चलती है
उन दिनों अश्विनी बेंद्रे सांगली से रोजाना अपनी ड्यूटी के लिए अपडाउन किया करती थी, जिस के कारण उन्हें काफी परेशानी होती थी. अभय कुरुंदकर ने सहानुभूति दिखाते हुए क्राइम ब्रांच औफिस के करीब ही यशवंतनगर में अपनी पहचान के एक राजनैतिक कार्यकर्ता की मदद से अश्विनी बेंद्रे को एक मकान किराए पर दिलवा दिया और खुद भी पास के विश्राम बाग में रहने लगा. कुरुंदकर को सरकारी गाड़ी मिली हुई थी, लेकिन वह सरकारी गाड़ी का उपयोग न कर के अपनी खुद की कार से औफिस आताजाता था. वह अश्विनी को भी अपने साथ कार में बिठा कर औफिस ले आता था.
अपने से 14 साल छोटी अश्विनी बेंद्रे को 55 वर्षीय पीआई अभय कुरुंदकर ने बड़ी ही चतुराई से अपने प्रेमजाल में उलझा लिया था. शादी का वादा कर वह उस की भावनाओं से खेलने लगा. जबकि वह स्वयं एक शादीशुदा और 2 बेटोंबेटियों का पिता था. उधर अश्विनी बेंद्रे एक बच्ची की मां होते हुए भी परकटे परिंदे की तरह पीआई अभय कुरुंदकर की बांहों में गिर गई.
धीरेधीरे वह अपने पति राजू गोरे से विमुख होने लगी. कह सकते हैं कि वह अभय कुरुंदकर के साथ जिंदगी के नए ख्वाब देखने लगी थी. इस बात की जानकारी जब राजू गोरे को हुई तो उस के पैरों तले से जमीन खिसक गई. पहले तो राजू गोरे को इस बात का यकीन ही नहीं हुआ, क्योंकि वह अपनी पत्नी को काफी समझदार और सुलझी हुई मानता था, लेकिन जब सच्चाई सामने आई तो राजू गोरे और परिवार वालों के होश उड़ गए थे.
पहले तो राजू गोरे और अश्विनी बेंद्रे के परिवार वालों ने अश्विनी को काफी समझाया, लेकिन वह पीआई अभय कुरुंदकर के प्यार में डूबी हुई थी. इसलिए उस पर ससुराल वालों की बातों का कोई प्रभाव नहीं पड़ा. वह अभय कुरुंदकर से लवमैरिज करने के लिए तैयार थीं. बेटी पर मां के भटकने का कोई प्रभाव न पड़े, इसलिए राजू गोरे उस के पास से अपनी बेटी को ले गया. बेटी के जाने के बाद अश्विनी पूरी तरह आजाद हो गई.
वह अपने प्रेमी अभय कुरुंदकर के साथ ही रहने लगी. उस के साथ वह खुश थी लेकिन उस की यह खुशी अधिक दिनों तक कायम नहीं रही. उसे शीघ्र ही इस बात का पता चल गया कि वह चालाक और मक्कार किस्म का व्यक्ति है. उस का प्यार और शादी का वादा केवल एक छलावा था. शादी के नाम से वह चिढ़ जाता था. कभीकभी तो वह अश्विनी बेंद्रे से मारपीट तक कर बैठता था. अश्विनी के विरोध करने पर वह उसे और उस के पति को गायब करवा देने की धमकियां देता था.
अभय कुरुंदकर टौर्चर करता था अश्विनी बेंद्रे को
सन 2013 में अश्विनी बेंद्रे को अभय कुरुंदकर के टौर्चर से थोड़ी राहत तब मिली, जब अश्विनी का ट्रांसफर रत्नागिरि हो गया. अभय कुरुंदकर भी ठाणे जिले के पालघर स्थित नवघर पुलिस थाने में चला गया. इस के बावजूद अभय कुरुंदकर ने अश्विनी का पीछा नहीं छोड़ा. उसे जब भी मौका मिलता, वह उस के पास पहुंच जाता था और उसे परेशान करने में कोई कसर नहीं छोड़ता था.
अपने रसूख के दम पर वह अश्विनी और उस के परिवार के साथ कुछ भी कर सकता था. उस के डर से अश्विनी ने उस के खिलाफ सारे सबूत इकट्ठे करने शुरू कर दिए. अपने घर सीसीटीवी कैमरा भी लगवा लिया, जिस का सारा रिकौर्ड वह अपने लैपटाप में रखने लगी थी.
पालघर के नवधर पुलिस थाने में डेढ़ साल तक रहने के बाद अभय कुरुंदकर ने अपनी बदली क्राइम ब्रांच में करा ली थी. अब वह फिर से अश्विनी बेंद्रे के करीब आ गया था. अश्विनी उस के व्यवहार से तंग थी. वह उस से दूर रहने की कोशिश करने लगी. प्रमोशन होने के बाद वह भी एपीआई बन चुकी थी.
सन 2016 में अश्विनी बेंद्रे ने अपना ट्रांसफर ठाणे के नवी मुंबई कलंबोली स्थित कामोठे के ह्यूमन राइट्स कमीशन में करा लिया था. वह अपने परिवार वालों के बीच लौट आई थी. यह बात पीआई अभय कुरुंदकर को हजम नहीं हुई. वह अश्विनी से चिढ़ गया. इस का नतीजा यह हुआ कि एक दिन अचानक अश्विनी गायब हो गई.
18 अप्रैल, 2016 को अश्विनी बेंद्रे ने अपने परिवार वालों के साथ बाहर खाना खाने का प्रोग्राम बनाया. परिवार वाले उस का इंतजार करते रहे लेकिन वह नहीं आई. इस बीच उस का फोन भी बंद हो गया. लेकिन परिवार वालों ने इसे गंभीरता से नहीं लिया. उन का मानना था कि वह किसी इमरजेंसी काम में फंस गई होगी. लेकिन 15 दिनों के बाद घर वालों के पास ह्यूमन राइट्स कमीशन के औफिस से फोन आया. उन्होंने बताया कि अश्विनी बेंद्रे अपनी ड्यूटी पर नहीं आ रही है.
औफिस से अश्विनी के गायब होने की जानकारी मिलते ही पूरे परिवार में हड़कंप मच गया. अश्विनी बेंद्रे के पिता ने तुरंत नवी मुंबई कलंबोली पुलिस थाने में फोन कर के अश्विनी बेंद्रे की गुमशुदगी की सूचना दे दी.
उन्होंने कहा कि उन की पत्नी अस्पताल में भरती है और वह खुद थाने आने की स्थिति में नहीं हैं, इसलिए उन की बेटी की गुमशुदगी दर्ज कर के जरूरी काररवाई की जाए. यह जानकारी उन्होंने अपने बेटे आनंद बेंद्रे को भी दे दी. आनंद तुरंत अपनी गुमशुदा बहन की तलाश में जुट गया.
आनंद को उस की बहन अभय कुरुंदकर की ज्यादती के बारे में बताती रहती थी, इसलिए उस ने सीधेसीधे पीआई अभय कुरुंदकर पर बहन का अपहरण कर के उस की हत्या करने की आशंका जाहिर की. वह उस के खिलाफ सबूत भी इकट्ठा करने लगा. उस ने लैपटाप में रिकौर्डिंग और अन्य सबूत पुलिस को मुहैया करा दिए. चूंकि अभय कुरुंदकर पीआई था, इसलिए उस ने अपने प्रभाव से डेढ़ साल तक मामले को लटकवाए रखा.
ऊंची राजनीतिक पहुंच की वजह से अभय कुरुंदकर अपने वरिष्ठ अधिकारियों के आदेशों को भी नहीं मानता था. वह अपने मन की करता था. 2010 से 2013 के बीच पीआई अभय कुरुंदकर आर्थिक अपराध शाखा में रहा था, तब उस ने कई मामलों की गोपनीय जानकारी लीक कर दी थी. इस बात की जानकारी जब तत्कालीन डीसीपी दिलीप सावंत को हुई तो उन्होंने 9 मई, 2013 को अभय के खिलाफ कोल्हापुर के स्पैशल डीजीपी और डीजीपी को जांच के लिए एक रिपोर्ट भेजी. लेकिन उस का कोई असर नहीं हुआ था.
पीआई अभय कुरुंदकर की जांच होने के बजाय उस का ट्रांसफर सांगली के तांसगांव थाने में कर दिया गया. लेकिन वह वहां नहीं गया बल्कि तत्कालीन गृहमंत्री आर.आर. पाटील से मिल कर अपना ट्रांसफर रद्द करवा लिया. डीसीपी दिलीप सावंत के बारबार यह रिपोर्ट देने के बावजूद पीआई अभय कुरुंदकर द्वारा विभाग की महत्त्वपूर्ण जानकारी बाहर जाती रही. उस के खिलाफ कोई काररवाई नहीं हुई.
मामला एक सीनियर पुलिस अफसर का था, अत: कलंबोली के थानाप्रभारी पोकरे ने इसे गंभीरता से लिया. उन्होंने उस की जांच शुरू कर दी. उन्होंने काफी हद तक इस मामले को हल भी कर लिया था, लेकिन वरिष्ठ अधिकारियों के सहयोग के बिना मामला आगे नहीं बढ़ सका. 3 महीने का समय निकल जाने के बाद जब केस की जांच आगे नहीं बढ़ी तो अश्विनी बेंद्रे के घर वाले परेशान हो गए.
16 सितंबर, 2016 को आनंद बेंद्रे ने बहनोई राजू गोरे के साथ नवी मुंबई के कमिश्नर हेमंत नगराले से मुलाकात की. जरूरी काररवाई करने का आश्वासन देने के बजाय कमिश्नर हेमंत नगराले ने उन्हें यह कह कर डराया कि उन की जान को खतरा है, वे संभल कर रहें.
पुलिस कमिश्नर से उन्हें इस तरह की उम्मीद नहीं थी. उन की बातों से साफ जाहिर हो रहा था कि इस मामले को ले कर पुलिस गंभीर नहीं है. उन के इस रवैए से निराश हो कर अश्विनी बेंद्रे के घर वालों ने 8 अक्तूबर, 2016 को अदालत का दरवाजा खटखटाया.
अदालत का आदेश भी नहीं माना पुलिस ने
28 अक्तूबर, 2016 को अदालत ने पुलिस को आदेश दिया कि मामला काफी संगीन है, इस की जांच डीसीपी रैंक के अधिकारी से करवाई जाए. अदालत की पहल पर मामला डीसीपी पोखरे को सौंप दिया गया. डीसीपी पोखरे ने एसीपी राजकुमार चाफेकर के साथ मामले की जांच तो की, लेकिन उस पर कोई काररवाई नहीं हुई और देखतेदेखते 2 महीने गुजर गए. मामला ज्यों का त्यों रहा.
पहली जनवरी, 2017 को अदालत ने पुलिस प्रशासन को फटकार लगाते हुए मामले की जांच के लिए एसीपी प्रकाश निलेवाड़ की देखरेख में एक स्पैशल टीम गठित करने को कहा और पूछा कि मामले से संबंधित औडियो वीडियो का रिकौर्ड होने के बाद भी काररवाई क्यों नहीं की गई.
अदालत के आदेश पर एसीपी प्रकाश निलेवाड़ ने मामले को गंभीरता से लिया और जांच की जिम्मेदारी पीआई संगीता अलफांसो को सौंप दी. पीआई संगीता अलफांसो ने अपना काम पूरी ईमानदारी से किया. उन्होंने एक महीने की जांच के बाद 31 जनवरी, 2017 को अश्विनी बेंद्रे के अपहरण का मामला दर्ज कर लिया.
इस के पहले कि पीआई संगीता अलफांसो अश्विनी बेंद्रे के अपहर्त्ताओं पर कोई काररवाई करतीं, पीआई अभय कुरुंदकर को अपनी गिरफ्तारी का अहसास हो गया और फरवरी, 2017 में वह अदालत चला गया, जिस की वजह से मामले में रुकावट आ गई. जब तक अदालत का कोई आदेश आता, तब तक पीआई संगीता अलफांसो का ट्रांसफर हो गया. उन के जाने के बाद इस मामले की जांच 9 महीने के लिए फिर अटक गई. अभय कुरुंदकर ने अदालत में यह अरजी लगाई कि उस के ऊपर लगाए गए सारे आरोप झूठे और बेबुनियाद हैं. उसे साजिश के तहत फंसाया जा रहा है.
पीआई संगीता अलफांसो के ट्रांसफर के बाद एक बार फिर अश्विनी बेंद्रे के परिवार वालों का धैर्य टूट गया. 9 महीने के इंतजार के बाद इस बार उन्होंने मीडिया से संपर्क किया. पहले तो 15 दिनों तक मीडिया में कोई हलचल नहीं हुई.
मीडिया ने बदला केस का रुख
16 जनवरी, 2017 को इलैक्ट्रौनिक मीडिया ने अश्विनी बेंद्रे के साथ पीआई अभय कुरुंदकर द्वारा मारपीट का एक वीडियो वायरल कर पूरे देश में सनसनी फैला दी. दूसरे दिन प्रिंट मीडिया ने भी इसे सुर्खियों में छापा. इस के बाद तो यह मामला हाईप्रोफाइल हो गया और प्रशासन में हड़कंप मच गया.
सवालों के जवाबों में नवी मुंबई पुलिस कमिश्नर हेमंत नगराले को झूठ बोलना पड़ा. उन्होंने एक प्रैस नोट जारी कर मामले को झूठा और बेबुनियाद बता दिया. पुलिस कमिश्नर के इस बयान पर अदालत नाराज हो गई, जिस के चलते एसीपी प्रकाश निलेवाड़ ने पीआई संगीता अलफांसो द्वारा तैयार की गई जांच रिपोर्ट के आधार पर पीआई अभय कुरुंदकर को औन ड्यूटी और उस के साथ ज्ञानेश्वर पाटिल को 8 दिसंबर, 2017 को हिरासत में ले लिया.
पीआई संगीता अलफांसो ने अपनी रिपोर्ट में ज्ञानेश्वर पाटिल उर्फ राजेश पाटिल उर्फ राजू पाटिल को पीआई अभय कुरुंदकर का सहयोगी बताया था. राजू पाटिल अभय कुरुंदकर के हर अच्छेबुरे काम में उस के साथ रहता था. ज्ञानेश्वर पाटिल तत्कालीन मंत्री एकनाथ खड़से का भांजा था. वह जिला जलगांव, तालुका भुसावल के गांव तलवेल का रहने वाला था. एक बिजनैसमैन के अलावा वह वहां के भाजपा युवामोर्चा का नेता था.
हकीकत आ ही गई सामने
जिस दिन अश्विनी बेंद्रे गायब हुई थी, उस दिन अश्विनी और राजू पाटिल के मोबाइल फोन की लोकेशन साथसाथ मीरा रोड की थी. अभय कुरुंदकर का मकान भी मीरा रोड पर ही था. इस से मामला स्पष्ट था कि घटना मीरा रोड पर अभय के मकान में घटी थी और सबूत भायंदर खाड़ी में ले जा कर नष्ट किया गया था.
पीआई संगीता अलफांसो ने जब थाने में उस से पूछताछ की तो उस ने अपना गुनाह तो स्वीकार नहीं किया, लेकिन उस का बयान भी विश्वसनीय नहीं था. उस ने बताया कि जिस दिन अश्विनी गायब हुई थी, उस दिन वह मुंबई के अंधेरी स्थित एक होटल में अपने दोस्तों के साथ बैठ कर शराब पी रहा था.
इस के बाद वह खाना खाने के लिए बाहर निकला था. लेकिन कोई अच्छा होटल न मिलने के कारण वह अपने दोस्त पीआई अभय कुरुंदकर के घर चला गया था. अभय कुरुंदकर के विषय में पीआई संगीता अलफांसो को जो बात मालूम पड़ी थी, वह सीधे पीआई के खिलाफ जा कर अश्विनी बेंद्रे की हत्या की तरफ इशारा कर रही थी.
भायंदर खाड़ी के मछलीमारों ने पीआई संगीता अलफांसो को बताया था कि पीआई अभय कुरुंदकर लगभग एकडेढ़ साल पहले अकसर सुबहसुबह इधर आते थे. उन से वह किसी महिला के शव के बारे में पूछताछ किया करते थे. उन का कहना था कि वह एक महिला की गुमशुदगी की जांच कर रहे हैं. यदि उस महिला की उन्हें डेडबौडी मिले तो पहले उन से संपर्क करें.
एक बात और यह पता चली कि अश्विनी बेंद्रे के गायब होने के दूसरे दिन ही अभय कुरुंदकर ने अपने मकान की पुताई करवाई थी. अपनी फोक्सवैगन कार को भी उन्होंने अपने मकान से हटवा दिया था. अदालत के आदेश पर जब पीआई संगीता अलफांसो ने अभय कुरुंदकर के मकान की जांच की तो उन्हें दीवारों पर काले रंग के कुछ धब्बे नजर आए, जो पुताई के बाद भी पूरी तरह से दबे नहीं थे. उन्हें खुरचवा कर डीएनए टेस्ट के लिए सांताकु्रज की लैब में भेज दिया गया. उस की रिपोर्ट आने के बाद ही पता लगेगा कि वे खून के छींटे किस के हैं.
पीआई अभय कुरुंदकर की गिरफ्तारी के बाद जांच अधिकारी ने अश्विनी बेंद्रे के मामले से जुड़ी संदिग्ध लाल रंग की फोक्सवैगन कार नंबर एमएच10ए एन5500 भी खोज निकाली. यह कार सांगली घामड़ी रोड के जिम्नेश्वर कालोनी में रहने वाले रमेश चारुदत्त जोशी के नाम रजिस्टर थी. पुलिस टीम को अश्विनी बेंद्रे द्वारा लिखा गया एक नोट भी मिला, जिस में लिखा था, ‘मेरे हाथपैर तोड़ने और मुझे मार कर तुम्हारी मनोकामना पूरी हो जाएगी.’
ऐसे कई सबूत थे, जो अभय कुरुंदकर को अश्विनी बेंद्रे के मामले में दोषी ठहरा रहे थे. लेकिन इस के बाद भी अभय कुरुंदकर अपना अपराध स्वीकार नहीं कर रहा था. उस का कहना था कि वह इस मामले में निर्दोष है. जांच टीम ने परिस्थितिजन्य सबूतों के आधार पर उस के और ज्ञानेश्वर पाटिल उर्फ राजू पाटिल के खिलाफ भादंवि की धारा 323, 364, 497, 506(2), 34 के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया. धारा 302 डीएनए रिपोर्ट आने के बाद जोड़ दी जाएगी.
लेकिन इस के पहले पीआई अभय कुरुंदकर और ज्ञानेश्वर पाटिल उर्फ राजू पाटिल का इकबालिया बयान जरूरी है. इस के लिए पुलिस टीम ने अदालत से उन के नारको टेस्ट की इजाजत मांगी है, जिस पर उन के वकीलों ने ऐतराज किया है. बहरहाल, मामला अदालत में विचाराधीन है. दोनों आरोपी कथा लिखने तक सलाखों के पीछे थे.
पीआई अभय कुरुंदकर की गिरफ्तारी से एपीआई अश्विनी बेंद्रे के घर वालों को इंसाफ की आशा जागी है लेकिन मामला इतना लंबा खिंचा, इस बात का जिम्मेदार उन्होंने नवी मुंबई पुलिस कमिश्नर हेमंत नगराले को ठहराया है. उन्होंने प्रैस वार्ता कर के उन पर गंभीर आरोप लगाते हुए उन्हें भी सहअभियुक्त बनाने की मांग की है.
उन का कहना है कि पीआई अभय कुरुंदकर ने अपने पद का दुरुपयोग किया और तफ्तीश में सहयोग नहीं किया. इतना ही नहीं, उन्होंने जांच अधिकारी का ट्रांसफर कर अभियुक्त को बचाने की कोशिश की. यह एक ऐसा प्रश्न है जिस का जवाब उन्हें आने वाले समय में देना पड़ सकता है.
– कथा जनचर्चा और समाचार पर आधारित है
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हरियाणा के जिला सोनीपत के खरखौदा स्थित दिल्ली चौक पर अकसर गहमागहमी रहती है, लेकिन 27 दिसंबर को वहां कुछ अलग ही माहौल था. 40 से ज्यादा युवा और अधेड़ सजेधजे वहां इधरउधर टहल रहे थे. इन में किसी के हाथों पर मेंहदी लगी थी तो किसी के सिर पर सेहरा था. इन में से कुछ ऐसे लड़के भी थे, जिन्होंने ब्यूटीपार्लर जा कर फेशियल भी करवाया था, ताकि उन का चेहरा खूबसूरत लगे.
ज्यादातर क्लीनशेव्ड थे, वे चाहे अधेड़ थे या युवा. सभी के चेहरे खुशी से दमक रहे थे. उन के हावभाव और हरकतें देख कर यही लगता था कि इन्हें किसी का बेसब्री से इंतजार है. इन के साथ उन के एक या दो रिश्तेदार भी थे. सभी लोग दिल्ली की ओर से आने वाले वाहनों को टकटकी लगाए देख रहे थे.
दरअसल, ये सभी दूल्हे थे, जिन की शादी होनी थी. इन दूल्हों और उन के घर वालों से कहा गया था कि सुबह 9 बजे तक दिल्ली से एक बस आएगी, जिस में बैठ कर दूल्हों और उन के एकएक रिश्तेदार को दिल्ली स्थित तीसहजारी अदालत के पास पहुंचना है. वहीं बगल में स्थित अनाथ आश्रम में इन सब की एक साथ शादी कराई जाएगी.
ये सभी दूल्हे और उन के रिश्तेदार खरखौदा के दिल्ली चौक पर खड़े हो कर दिल्ली से आने वाली बस का इंतजार कर रहे थे. बस के आने का समय 9 बजे बताया गया था, इसलिए ये सभी दूल्हे 9 बजे से पहले ही वहां आ गए थे. क्योंकि उन्हें डर था कि अगर बस चली गई तो वे रह जाएंगे.
वहां आए ये सभी दूल्हे सोनीपत, जींद, रोहतक, झज्जर आदि जिलों के रहने वाले थे. बस को 9 बजे तक आ जाना था, लेकिन 10 बज गए. दिल्ली से बस नहीं आई. इस बीच दूल्हों के घरों से कभी भाई तो कभी मां तो कभी दोस्त का फोन कर के पूछता कि वे दिल्ली के लिए चल पडे़ या खरखौदा में ही खड़े हैं.
दूल्हे क्या जवाब देते. कुछ देर तो कहते रहे कि अभी बस नहीं आई है, थोड़ी देर में आ जाएगी. जैसे ही वे यहां से निकलेंगे, बता देंगे. लेकिन जब बस का इंतजार करतेकरते 11 बज गए और बस का कोई अतापता नहीं था. तो दूल्हों और उन के साथ आए रिश्तेदारों को बेचैनी होने लगी. घर वालों के फोन बारबार आ ही रहे थे, जिस से वे झुंझलाने लगे.
उन दूल्हों में से कुछ के रिश्तेदारों ने सुशीला को फोन किया. लेकिन उस का मोबाइल फोन बंद था. इस के बाद तो सब ने सुशीला को फोन करने शुरू कर दिए, लेकिन उस से बात नहीं हो सकी. ये सभी सुशीला को इसलिए फोन कर रहे थे, क्योंकि शादी कराने की जिम्मेदारी उसी ने ले रखी थी.
शादी की बातचीत करने के लिए उस के साथ मोनू भी आया था. कुछ लोगों के पास मोनू का भी फोन नंबर था. उसे भी फोन किया गया. उस का भी फोन बंद था, इसलिए उस से भी बात नहीं हो सकी. मोनू थाना कलां का रहने वाला था.
शादी कराने के लिए सुशीला ने उन दूल्हों के घर वालों से अच्छेखासे पैसे लिए थे. किसी से 45 हजार रुपए तो किसी से 60 हजार रुपए तो किसी से 90 हजार रुपए. सुशीला ने ही सब से दिल्ली से बस आने और वहां जा कर अनाथालय में सभी की सामूहिक शादी कराने की बात कही थी. उसी के कहने पर ये सभी लोग खरखौदा में इकट्ठे हुए थे.
लेकिन अब सुशीला से बात नहीं हो पा रही थी. मोनू का भी कुछ अतापता नहीं था. सुशीला और मोनू के मोबाइल फोन बंद बता रहे थे. इन के पास सुशीला और मोनू के अलावा किसी अन्य का मोबाइल नंबर नहीं था. इसी तरह दोपहर के 12 बज गए. वहां एकत्र दूल्हे और उन के रिश्तेदार तरहतरह की चर्चाएं करने के साथ धोखा खाने यानी शादी के नाम पर ठगे जाने की आशंका जाहिर करने लगे.
सभी दूल्हे पहुंच गए सुशीला के घर
इंतजार करतेकरते थक चुके लोगों ने कहा कि सुशीला खरखौदा में ही तो रहती है, चलो उस के घर चलते हैं. उसी से पूछते हैं कि अभी तक बस क्यों नहीं आई? सभी सुशीला के घर पहुंचे तो वह घर पर ही मिल गई. मोनू भी सुशीला के ही घर पर था.
सभी ने सुशीला और मोनू से बस न आने के बारे में पूछा तो सुशीला ने कहा, ‘‘देखो मैं पता करती हूं. शादी कराने की बात दिल्ली में रहने वाली मेरी भाभी अनीता ने कही थी. उन्हीं के कहने पर मैं ने दिल्ली से बस आने की बात बताई थी.’’
इस के बाद सुशीला ने सब के सामने अनीता को फोन किया. पता चला कि उस का भी फोन बंद है. कई बार कोशिश करने के बाद भी जब अनीता से भी बात नहीं हो सकी तो दूल्हों और उन के रिश्तेदारों को गुस्सा आ गया. उन्हें यकीन हो गया कि शादी के नाम पर वे ठगे गए हैं.
कुछ लोग सुशीला से अपने पैसे वापस मांगने लगे. उन का कहना था कि उन्होंने कर्ज ले कर उसे पैसे दिए हैं. अब वह शादी नहीं करा रही है तो उन के पैसे वापस करे. कुछ दूल्हों का कहना था कि अब वे बिना दुलहन के कौन सा मुंह ले कर अपने घर जाएंगे. कुछ दूल्हे ऐसे भी थे, जिन के घर वालों ने बेटे की शादी की खुशी में बहूभोज के लिए मैरिज होम तक बुक करा लिया था. डीजे वगैरह का भी इंतजाम किया था.
कुछ दूल्हे ऐसे भी थे, जिन के घर वालों ने शादी की सारी रस्में करा का उन्हें यहां तक पहुंचाया था. जो खातेपीते घर के दूल्हे थे, उन्होंने अपने रिश्तेदारों से बताया था कि लड़की के घर वाले गरीब हैं. इसलिए शादी करने के बाद बहू के साथ घर आएंगे तो उन सब की खातिरदारी घर पर करेंगे.
पैसे मांगने पर सुशीला ने कहा कि पैसे तो वह अनीता को दे चुकी है. इसलिए पैसे नहीं दे सकती. 2-3 घंटे तक सुशीला के घर पर हंगामा होता रहा. जब लोगों को ना तो पैसे वापस मिले और ना ही शादी होने की कोई सूरत नजर आई तो वे सुशीला और मोनू को पकड़ कर थाना खरखौदा ले गए. शादी के नाम पर हुई ठगी को एक दूल्हे का पिता बरदाश्त नहीं कर सका और वह थाने में ही बेहोश हो कर गिर पड़ा. लोगों ने उसे संभाला.
दूल्हों और उन के रिश्तेदारों ने पुलिस को सारी बात बताई. कुछ ने लिखित शिकायत कर दी. थाना खरखौदा पुलिस ने अनीता, सुशीला और मोनू के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया. थानाप्रभारी वजीर सिंह ने इस मामले की जांच एसआई नरेश कुमार को सौंपी. पुलिस ने सुशीला और मोनू को हिरासत में ले कर पूछताछ की. बाद में दोनों को गिरफ्तार कर लिया गया.
गेम की मास्टरमाइंड निकली अनीता
28 दिसंबर को पुलिस ने खरखौदा के वार्ड नंबर 2 निवासी सुशीला और गांव थाना कलां निवासी मोनू को मजिस्ट्रैट के सामने पेश कर पूछताछ के लिए 2 दिनों के रिमांड पर लिया. पुलिस द्वारा की गई पूछताछ में सुशीला और मोनू ने बताया कि उन्हें पता नहीं था कि शादी के नाम पर अनीता लोगों को ठग रही है.
अनीता ने उन्हें इस काम के लिए एक से 2 हजार रुपए ही दिए थे. बाकी रुपए उस ने खुद ही रख लिए थे. सुशीला के बताए अनुसार, अनीता दिल्ली के नरेला के लामपुर बौर्डर की रहने वाली थी. दिल्ली के अलावा झज्जर और अन्य जगहों पर भी उस के ठिकाने बताए.
थाना खरखौदा पुलिस ने अनीता की तलाश में दिल्ली और जहांजहां उस के मिलने की संभावना थी, छापे मारे, लेकिन वह नहीं मिली. इस के बाद पुलिस ने 3 टीमें बना कर उस की तलाश शुरू की.
सुशीला और मोनू से पूछताछ के आधार पर पुलिस ने कई अन्य लोगों से पूछताछ की, लेकिन अनीता के बारे में कुछ पता नहीं चला. रिमांड अवधि समाप्त होने पर पुलिस ने सुशीला और मोनू को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया.
पुलिस की लगातार छापेमारी से घबरा कर अनीता ने 7 जनवरी, 2018 को सोनीपत की अदालत में आत्मसमर्पण किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. पुलिस ने पूछताछ के लिए अदालत से उस का रिमांड मांगा तो उसे 5 दिनों की रिमांड पर सौंप दिया गया. 5 दिनों के बाद एक बार फिर 3 दिनों के रिमांड पर लिया गया.
अनीता से पूछताछ में पता चला कि कुंवारों से शादी के नाम पर ठगे गए पैसों का उपयोग अनीता के बेटे रोहित ने भी किया था. पुलिस ने 9 जनवरी को दिल्ली से रोहित को भी गिरफ्तार कर लिया. रोहित को 3 दिनों के रिमांड पर लिया गया. पुलिस द्वारा की गई पूछताछ और शादी के नाम पर ठगे गए लोगों से मिली जानकारी के आधार पर जो कहानी सामने आई है, वह इस प्रकार थी—
कुंवारों को ठगने की बनाई योजना
दिल्ली के नरेला के गांव लामपुर की रहने वाली अनीता के पति की मौत हो चुकी थी. उस के 2 बच्चे हैं, जिन की शादियां हो चुकी हैं. अनीता की हरियाणा में कई रिश्तेदारियां हैं. उसे पता था कि लड़कियों की कमी की वजह से हरियाणा के तमाम लड़कों की शादियां नहीं हो पाती हैं. शादी की उम्मीद में तमाम लड़के अधेड़ हो चुके हैं. इस तरह के लोग किसी भी तरह शादी करना चाहते हैं. इस के लिए वे पैसा दे कर दुलहन खरीदने को भी तैयार रहते हैं.
अनीता ने इसी बात का फायदा उठाया. उस ने शादी कराने के नाम पर कुंवारों को ठगने की योजना बनाई. इस काम में उस ने अपनी जानकार खरखौदा की रहने वाली सुशीला की मदद ली. हालांकि उस ने सुशीला को अपनी पूरी योजना नहीं बताई थी. उसे केवल आसपास के गांवों में कुंवारों के बारे में पता करने और उन की शादी कराने की बात करने की जिम्मेदारी सौंपी थी.
इस के बाद अपने परिचित मोनू को मदद के लिए ले लिया. दोनों ने आसपास के गांवों और रिश्तेदारों में ऐसे लड़कों के बारे में पता किया, जिन की शादी नहीं हुई थी. सुशीला ने ऐसे लड़कों की शादी कराने की बात चलाई. हर गांव में एकदो परिवार ऐसे मिल गए, जिन के यहां लड़कों की शादी नहीं हुई थी. वे चाहते थे कि उन के लड़के की शादी हो जाए और घर में बहू आ जाए. इस के लिए वे पैसे भी खर्च करने को तैयार थे.
एक शादी के लिए 45 से 90 हजार रुपए
सुशीला के कहने पर तमाम लोग शादी के लिए तैयार हो गए. एकदूसरे के माध्यम से शादी करने वालों की संख्या बढ़ती गई. सुशीला ने यह बात अनीता को बताई. वह खरखौदा आ गई और सुशीला के साथ कुछ ऐसे लोगों के यहां गई भी, जो शादी के इच्छुक थे. उस ने कहा कि जिन लड़कियों से उन की शादी कराएंगी, वे लड़कियां अनाथ हैं और दिल्ली के अनाथालय में रहती हैं. इस के लिए उन्हें अनाथालय को चंदा देना होगा.
चंदे की राशि कम से कम 45 हजार होगी. उम्र के हिसाब से चंदे की यह रकम बढ़ती जाएगी. जब कई लोग शादी के लिए तैयार हो जाएंगे तो वह एकसाथ सब की शादियां करा देगी.
शादी कब और कहां होगी, यह वह बाद में बता देगी. उस ने यह भी कहा कि शादी से कुछ दिनों पहले दिल्ली के तीस हजारी कोर्ट के पास स्थित आश्रम में पहले लड़कियां दिखाई जाएंगी, उन में वे जिस लड़की को पसंद करेंगे, उसी से उन की शादी कराई जाएगी. जिन के लड़कों की शादी नहीं हुई थी, उन्हें यह सौदा बुरा नहीं लगा.
वे चंदा देने के लिए तैयार हो गए. इस के बाद अनीता तो चली गई, सुशीला और मोनू शादी कराने वाले लड़कों के घर वालों से चंदा वसूल करने लगे.
कुछ जगह चंदा लेने के लिए सुशीला और मोनू के साथ अनीता भी गई थी. इन में कुछ लोग ऐसे भी थे, जो किसी तरह गुजरबसर कर रहे थे. ऐसे लोगों ने बेटे की शादी के लिए कर्जा ले कर सुशीला को पैसे दिए.
रोहतक के राजबीर और मोहन के गांव बोहर में सुशीला की रिश्तेदारी थी. सुशीला ने उन के गांव जा कर ऐसे लोगों के बारे में पता किया, जो शादी करना चाहते थे. गांव में रिश्तेदारी होने की वजह से सुशीला पर विश्वास कर के मोहन ने 45 हजार तो राजबीर ने 50 हजार रुपए उसे दे दिए. इसी तरह खरखौदा के संदीप ने शादी के लिए सुशीला को 45 हजार रुपए दिए थे. उस के पास पैसे नहीं थे तो घर वालों ने उधार ले कर उसे 45 हजार रुपए दिए थे.
खरखौदा के ही सुरेश, अंशरूप, पवन, राजेंद्र, मुनेश, जौनी, राकेश और साबू, सोनीपत के अमित, रोहतक के गांव हुमायूंपुर के संतोष और लक्ष्मी, निलौठी के असीक और रामवीर, मोहाना के राजू, बोहर के सत्यनारायण, कृष्ण, मोहन, राजवीर और कुलदीप, रोहतक के गांव निडाना के रमेश, अनिल, धनाना के शिवकुमार, जींद के अमरजीत, संजीव, झज्जर के बहराना गांव के जगवीर सहित कई लोगों ने शादी के लिए सुशीला को पैसे दिए.
ठगी के शिकार सब से ज्यादा खरखौदा के ही हुए हैं. इन की संख्या 25 से भी ज्यादा है. खरखौदा का रहने वाला सुरेश कुमार खेती करता था. उस का दूध का भी धंधा था. घर में बुजुर्ग विधवा मां थी.
आखिर बूढी मां पर वह कब तक बोझ बना रहता. सुशीला ने उस की मां से कहा कि वह सुरेश की शादी अनाथाश्रम की लड़की से करा देगी. इस के लिए 45 हजार रुपए दान देने पड़ेंगे. घर में 10 हजार रुपए ही थे. बाकी के 35 हजार रुपए उस ने ब्याज पर ले कर दिए.
खरखौदा का संदीप सब्जीमंडी में सब्जी बेचता था. बूढ़ी मां की इच्छा थी कि संदीप की शादी हो जाए. कई लोगों ने सुशीला को अनाथाश्रम की लड़की से शादी कराने के लिए पैसे दिए थे, इसलिए संदीप की मां भी उस के झांसे में आ गई. कुछ पैसे घर में थे और कुछ पैसे उधार ले कर सुशीला को दे दिए थे.
इसी तरह खरखौदा के वार्ड नंबर 3 निवासी स्कूटर रिपेयरिंग का काम करने वाले जौनी की दादी ने उस की दुलहन के लिए दान के रूप में पैसे दिए थे. दादी ने सोचा था कि पोते की बहू आ जाएगी तो दो जून की रोटी मिलने लगेगी.
सुशीला और अनीता ने सभी से 27 दिसंबर को शादी कराने के लिए कहा था. कुछ लोगों से यह भी कहा था कि शादी से 10-11 दिन पहले उन्हें दिल्ली में लड़कियां दिखा दी जाएंगी. उन में से शादी के लिए लड़की पसंद कर लेना.
कुंवारों को टालती रही अनीता
लड़की दिखाने के लिए मोहाना गांव के रोहताश ने 16 दिसंबर को अनीता को फोन किया तो उस ने कहा कि अनाथाश्रम की लड़कियों की शादी में मदद करने के लिए कुछ विदेशी आने वाले थे, लेकिन बर्फबारी होने की वजह से वे नहीं आए. इसलिए अब लड़की दिखाने का प्रोग्राम कैंसिल हो गया है. अब 27 दिसंबर को सीधे सामूहिक विवाह ही होगा.
जिन लोगों ने अनीता और सुशीला को लड़की दिखाने के लिए फोन किया था, सभी से यही कह दिया गया. लड़कों ने सोचा कि लड़की नहीं दिखाई जा रही, कोई बात नहीं शादी तो हो जाएगी.
इस के बाद सभी को फोन कर के बता दिया गया कि 27 दिसंबर को दिल्ली में शादी होगी. इस के लिए दिल्ली से खरखौदा बस आएगी. उस बस से सभी लोग दिल्ली पहुंच जाना, जहां तीसहजारी कोर्ट के पास स्थित एक अनाथाश्रम में सभी की शादी होगी. 27 दिसंबर को जो हुआ, वह बताया ही जा चुका है.
यह सारी योजना अनीता की थी. सुशीला और मोनू एजेंट के रूप में काम कर रहे थे. शादी के नाम पर चंदे के रूप में वसूली गई रकम अनीता लेती थी. उस में से कुछ पैसे सुशीला और मोनू को मिलते थे.
पुलिस ने हिसाब लगाया तो इन लोगों ने शादी के नाम पर 40 से ज्यादा लड़कों से 25 से 30 लाख रुपए वसूले थे. पुलिस यह भी पता कर रही है कि इन लोगों के साथ और लोग तो नहीं थे. थानाप्रभारी वजीर सिंह ने ठगे गए युवकों को आश्वासन दिया है कि उन लोगों से पैसे वसूल कर उन के पैसे वापस कराने की कोशिश की जाएगी.
दरअसल, सोनीपत के खरखौदा में लड़कों के हिसाब से लड़कियां बहुत कम हैं. इसी वजह से यहां सभी लड़कों की शादियां नहीं हो रही हैं.
मजे की बात यह है कि चुनाव के दौरान जींद जिले में कुंवारा संगठन बना था. उन्होंने शादी की उम्र पार करने वाले लड़कों की शादियां कराने की मांग उठाई थी. तब एक नेता ने बिहार से लड़कियां ला कर उन की शादी करवाने का आश्वासन दिया था.
दुलहन के नाम पर अनोखी ठगी
उत्तराखंड के बनबसा में एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट (एएचटीयू) की प्रभारी एसआई मंजू पांडेय को एक दिन एक व्यक्ति ने खास सूचना दी. उस ने बताया कि ऊधमसिंह नगर के खटीमा इलाके में कुछ लोग विवाह की चाह रखने वाले युवकों की शादी कराने के लिए लड़कियां उपलब्ध कराते हैं.
इस के एवज में वह उन से मोटी रकम वसूलते हैं. बाद में लड़कियां मौका मिलने के बाद वहां से लौट जाती हैं या फिर ठग गिरोह द्वारा अन्यत्र भेज दी जाती हैं.
एसआई मंजू पांडे ने यह जानकारी सीओ (टनकपुर) आर.एस. रौतेला को दी. सीओ आर.एस. रौतेला ने मंजू पांडेय के नेतृत्व में एक टीम बनाई, जिस में हैडकांस्टेबल लक्ष्मणचंद, रवि जोशी, कांस्टेबल गणेश सिंह के अलावा स्थानीय लोग और एनजीओ के लोग शामिल थे.
साथ ही उन्होंने योजना बना कर उन्हें अपने हस्ताक्षरयुक्त कुछ नोट व चैक दे दिए. इस के बाद एसआई मंजू पांडेय ने ठग गिरोह से किसी लड़के की शादी कराने के बारे में बात की.
निश्चित तारीख को चकरपुर मंदिर परिसर में शादी कराने की तैयारियों का नाटक करते हुए सीओ के हस्ताक्षर वाले चैक और नोट ठग गैंग के सदस्य को दे दिए. कुछ देर बाद खटीमा की ओर से 2 महिलाएं एक बाइक से वहां पहुंचीं. फिर एक महिला बस में सवार हो कर आई.
वह टनकपुर से आई थी. उन के पहुंचते ही विवाह की तैयारियां शुरू हो गईं. उसी दौरान एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट की दूसरी टीम वहां पहुंच गई. टीम ने पुरुष और तीनों महिलाओं को हिरासत में ले कर उन के पास से हस्ताक्षरयुक्त चैक और नोट अपने कब्जे में ले लिए.
पूछताछ में पता चला कि गिरोह में कलक्टर फार्म खटीमा की रहने वाली रजवंत कौर अपने बेटे सतनाम के साथ ठगी का यह धंधा कर रही थी. अन्य 2 महिलाओं में थाना नानकमता के गांव दहला निवासी गुरमीत कौर और टनकपुर की विष्णुपुरी कालोनी निवासी आरती कपूर थी. इन सभी के खिलाफ भादंवि की धारा 420, 120बी, 34 के तहत मुकदमा दर्ज कर कोर्ट में पेश किया, जहां से इन चारों को जेल भेज दिया गया.
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पूरी कालोनी शोर के चलते परेशान हो गई थी. कालोनी में एक सरकारी जमीन का टुकड़ा था. शर्माजी को उस पर कब्जा करना था. उन के मकान से लगालगाया वह टुकड़ा था. उन्होंने थोड़ी सी ईंटें और सीमेंट डलवा कर मंदिर बनवा लिया. आनेजाने वालों को दिक्कत हो रही थी. लेकिन किसी के बाप की हिम्मत जो भगवान के मंदिर के खिलाफ बोल दे. शर्माजी ने उसी मंदिर से लग कर एक दुकान खोल ली जहां मोटा पेट लिए वे सेठजी बन कर बैठ गए थे. लेकिन अभी उन का मन भरा नहीं था. उन्होंने विचार किया- भगवानजी तो स्वर्ग में रहते हैं, सो उन भगवानजी का ट्रांसफर एकमंजिला बना कर ऊपर कर दें और नीचे पूरा एक हौल निकल आएगा जिस में काफी जगह निकलेगी. उस का गोदाम के तौर पर उपयोग हो जाएगा.
जयपुर से एक पत्थर लाया गया. फिर एकमंजिला ऊंचा मंदिर निर्माण कर के नीचे वाले हिस्से पर शर्माजी ने दुकान और गोदाम निकाल लिया. 5-6 महीने बाद आधी दुकान किराए पर दे कर वे चांदी काटने लगे. लेकिन शर्माजी पूजापाठ करें या दुकानदारी-वे कुछ निर्णय नहीं कर पा रहे थे. इधर कालोनी वाले ईर्ष्या कर रहे थे, शिकायतें भी हो रही थीं. अभी दुकानों की लागत निकली नहीं थी और यदि यह अवैध कब्जा हट गया तो लाखों का नुकसान हो जाएगा. उन्होंने तरकीब भिड़ाई और आननफानन अपने गांव से एक अनाथ प्रौढ़ को बाबा बनवा कर बुलवा लिया. उस बाबा का प्रचारप्रसार कालोनी में हो जाए, इसलिए उन्होंने ध्वनि विस्तारक यंत्र लगा कर धार्मिक दोहों का वाचन रखवा दिया था. रातदिन चलने वाले इस पाठ का शोर इतना अधिक होता था कि कालोनी में सोने वाले जाग जाए और जागने वाले कालोनी छोड़ कर भाग जाए. लेकिन किसी की हिम्मत नहीं थी कि कोई भगवानजी के खिलाफ आवाज उठाए. शानदार तरीके से शर्माजी ने दुकानदारी जमा ली थी जिस के परिणामस्वरूप मंदिर का चढ़ावा, दुकान का किराया, किराने का फायदा मिला कर शर्माजी धन कूट रहे थे. कालोनी या उस में रहवासी जाए भाड़ में, उन्हें उस से कोई मतलब नहीं था.
इस बीच, शर्माजी ने अपने पुजारी महाराज के चमत्कारों का प्रचार कर दिया था. हवा से भभूत निकालना, पानी में दीपक जलाना, जबान पर कपूर को जलाना…एकदो नहीं पूरे आधा दर्जन से अधिक चमत्कारों को बतलाने के परिणामस्वरूप मंदिर में भीड़ बढ़ गई. चढ़ावा भी बढ़ गया. दुकान की बिक्री भी बढ़ गई. शर्माजी बहुत खुश थे. एक पसेरी उन का वजन और बढ़ गया था. जब दुकान चल निकली तो चमत्कारों को बढ़ाना तथा भक्तिरस में डूबा बताना भी कर्तव्य हो गया. शर्माजी का मंदिर ही उस जगह का नाम हो गया था और भीड़ बढ़ती जा रही थी. लोग अंधश्रद्घा में डूबे रहे. कोई प्रश्न खड़ा ही नहीं करे, इस के लिए शर्माजी ने भजनमंडल, पाठों का आयोजन पूरे डीजे साउंड के साथ शुरू कर दिया ताकि पूरी कालोनी में आवाज जाए. मैं ने सोचा कि अब कालोनी का मकान बेच कर चला जाऊं. सो, मैं ग्राहक खोजने लगा. जिस भी ग्राहक को मेरे घर बेचने का कारण पता चलता, वह मुझे अधर्मी कह कर मकान खरीदने से मना कर देता. मैं बहुत परेशान था.
तब ही हमारी एकमात्र सासूजी अचानक आ गईं. सुबहसुबह का समय था. इतना शोर था कि पक्षी भी कोलाहल करना भूल कर पेड़ छोड़ कर उड़ गए थे. सासूजी ने घर में प्रवेश किया और हमारी एकमात्र धर्मपत्नी का चेहरा देखा तो दंग हो गईं. दरअसल, वह पूरे एक महीने से शोर के चलते सो नहीं पाई थी. मेरे सिर के रहेसहे बाल भी उड़ गए थे और सिर खेल का मैदान हो गया था. सासूजी बहुत दुखी हुईं. यात्रा की थकान के चलते आराम करना चाहा, लेकिन दरवाजेखिड़की बंद कर लेने के बाद भी वे शोर से मुक्ति नहीं पा सकीं और सो नहीं पाईं. दोपहर वे कुछ नाराज हो कर खाने की टेबल पर आईं और बेटी से कह उठीं, मैं लौट कर जा रही हूं. हमारी पत्नीजी ने दुखी हो कर कहा, ‘मम्मीजी, आप के बुद्धि के चर्चे विदेशों में हैं और आप अगर ऐसी स्थिति में हमें छोड़ कर चली जाएंगी तो आखिर हमारा क्या होगा? उपाय करो, मम्मीजी. हम ने भी हाथ जोड़ लिए, प्लीज सासूजी, कुछ विचार तो करो, आखिर हमारे परिवार का ही नहीं, पूरी कालोनी वालों का सवाल है.’
‘ठीक है,’ कुछ सोचती हुईं सासूजी ने कहा.
हम तो खुशी से गुब्बारे की तरह फूल गए. जानते थे कि प्रत्येक स्थिति में सासूजी ही सब को कंट्रोल कर लेंगी. शाम को भगवे कपड़े पहन कर सासूजी अपनी पूर्व परिचित कालोनी की सहेलियों के साथ मंदिर में दर्शन करने गईं. प्रसाद चढ़ाया, चंदा दिया और हाथ जोड़ कर प्रसाद लिया और अपनी सहेलियों के साथ लौट आईं. अगली सुबह हम सो कर भी नहीं उठे थे कि सासूजी सहेलियों के साथ मंदिर चली गईं जहां भयानक ध्वनिप्रदूषण हो रहा था. उन्होंने तत्काल प्रौढ़ महाराज के हाथों में 500 रुपए का नोट रखा.
महाराज तो दंग रह गया कि आखिर इतना चंदा उसे ही क्यों दिया गया. उस ने खुश हो कर प्रश्न किया, ‘‘मैडमजी, बताइए यह 500 रुपए का चंदा मुझे क्यों दिया जा रहा है?’’ सासूजी की सहेली ने कमान संभाली और कहा, ‘‘पंडितजी, ये 500 रुपए तो कम हैं, इन की इच्छा तो 5,000 रुपए देने की थी.’’
‘‘आखिर क्यों भाई? ऐसी क्या बात हो गई थी?’’ ‘‘बात ही कुछ ऐसी थी. इन के पेट में पूरे 3 वर्षों से दर्द था, कल आप का प्रसाद ले गईं…सहेली अपना वाक्य पूरा भी नहीं कर पाई कि पंडित ने कहा, ‘‘ओह, वो खा कर ये ठीक हो गईं?’’
‘‘नहीं जी.’’ ‘‘फिर क्या बात हो गई?’’
‘‘पंडितजी, उस प्रसाद में आप की दाढ़ी का एक बाल था. मैडमजी ने सोचा प्रसाद में बाल आया है, निश्चितरूप से इस का कोई महत्त्व तो होगा. बस, उन्होंने उस बाल को अपने पेट में बांध दिया और देखतेदेखते पेट का दर्द गायब हो गया.’’ ‘‘धन्य हो पंडितजी,’’ सब सहेलियों ने समवेत स्वर में कहा.
‘‘ऐसे बाल मैं विशेष लोगों को ही देता हूं, जिस को सौ प्रतिशत लाभ देना होता है,’’ पंडित ने आत्मप्रशंसा से भर कर कहा. ‘‘हम धन्य हो गए,’’ कह कर सब सहेलियों ने चरणस्पर्श किए और चली आईं.
बस फिर क्या था-एक ने दूसरे से, दूसरे ने तीसरी से पूरी बात पूरी कालोनी में 1 घंटे में फैला दी गई. लगभग 9 बजे तक वहां एक हजार लोगों की भीड़ जमा हो गई जो पंडितजी से सौ प्रतिशत लाभ लेना चाहते थे. मरता क्या न करता. पंडितजी ने एकएक व्यक्ति से दाढ़ी का बाल नुचवाया, सिर टकला हो गया तो जो श्रद्धालु (ग्राहक) थे उन्होंने सिर के बाल नोचने शुरू कर दिए और देखतेदेखते बिना भौंह, बिना पलकों के, टकले, दाढ़ीविहीन पंडित भूत जैसे लगने लगे. पीड़ा से बिलबिला रहे थे. अभी भीड़ और बढ़ गई थी जो उन की टांगों व बगलों तक के केशलोचन करने के लिए आमादा थी. शर्माजी 11 बजे तक बिजनैस करते रहे. भारी ग्राहकी से वे खुश थे. लेकिन जब ज्ञात हुआ कि गांव से लाया पंडित पीछे के दरवाजे से भागने की कोशिश कर रहा है तो वे उस की छाती पर आ कर डट गए. सैकड़ों लोग उन के सिर पर बाल उगने की प्रतीक्षा में नंबर लगा कर बैठ गए थे. पंडितजी शौचक्रिया के नाम से जो बाहर गए तो फिर दोबारा लौट कर नहीं आए. 2 दिनों में ही शर्माजी का मंदिर श्मशान की तरह सुनसान हो गया था.
जब कोई नहीं रहा तो ग्राहकों ने आना बंद कर दिया. ग्राहक नहीं तो ध्वनि विस्तारक यंत्र बंद हो गया. जब शोर बंद हो गया तो भीड़ लापता हो गई. चढ़ावा खत्म हो गया. मंदिर के देवता एक दिन चोर के हाथों चोरी हो गए. देखतेदेखते शर्माजी की दुकानदारी पूरी तरह से खत्म हो गई. शर्माजी आजकल हाथठेले पर सब्जी बेच रहे हैं और हमारी सासूजी उन से सब्जी खरीद कर मनपसंद खाना पकवा कर खा रही हैं. है न हमारी सासूजी बुद्धिमान? हम तो यही कामना करते हैं कि सब को ऐसी सास मिले.
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फेसबुक,व्हाट्सऐप के बिना जिंदगी भी, क्या जिंदगी होगी. इन 2 ऐप्स ने युवाओं की जिंदगी बदल डाली है. अब दोस्तों के साथ गपें कौफीहाउसों में कम, डिजिटली ज्यादा होती हैं और होंठों की जगह कीबोर्डों पर उंगलियां ऐसे थिरकती हैं मानोे भरतनाट्यम कर रही हों. लेकिन फेसबुक और व्हाट्सऐप पर कुछ भी सीक्रेट नहीं, यह पक्का हो गया है. टैक्स्ट लिखा या पोस्ट किया हुआ चुन सकते हैं. फेसबुक, व्हाट्सऐप आदि चलाने वाली कंपनियां आप को, आप की पसंद को, आप के आर्थिक स्तर को, आप की छुट्टियों को बेच सकती हैं ताकि जानकारी के आधार पर आप की मार्केटिंग की जा सके.
‘आई एम औफ टु शिमला’ टाइप करते ही आप को शिमला के होटलों के विज्ञापन दिखने लग जाएं, तो कोई बड़ी बात नहीं. गूगल में शिमला होटल सर्च करते ही आप पर होटलों की बमवर्षा होने लगती है और आप की स्क्रीन ऐसे विज्ञापनों से भरने लगती है. जो युक्ति ऐप है, उस में तो पूरी स्क्रीन थोड़ी देर बाद ही इन विज्ञापनों से भर सकती है.
विज्ञापन तो बात दूसरी, आप के पास अब पार्टी, धर्म, विचारक विशेष के विज्ञापन भी आ सकते हैं. आप को दूसरे धर्म के खिलाफ उकसाने वाले मैसेज अनजान सोर्सों से मिल सकते हैं. आप को उकसाने की कोशिश की जा सकती है. आप की जाति, आप का धर्म, आप का देश खतरे में है, ऐसा कहकह कर आप को भ्रमित किया जा सकता है. अगर तर्क और सत्य कहने वालों को पैसा न मिल रहा हो तो वे कैसे महंगा डाटा खरीद कर आप को बहकाई जा रही सामग्री परोसते. इन में आप को एकतरफा जानकारी मिलेगी.
अमेरिका में हाउस औफ रिप्रजैंटेटिव और सीनेट की संयुक्त जांच कमेटी के सामने फेसबुक के मालिक मार्क जुकरबर्ग ने बहुत ही गलतियां मानीं पर हर बात पर उन की डिफैंस भी थी कि हर यूजर को महीन शब्दों में हर बात बता दी जाती है. वे बारबार कहते रहे कि लोग अपनी प्राइवेसी को प्रोटैक्ट कर सकते हैं पर सांसदों ने यह नहीं पूछा कि कंपनी प्रोटैक्शन की दीवार भेद सकती है या नहीं? अगर दीवार बनाई ही जुकरबर्ग ने है तो क्या उसे नहीं मालूम कि प्राइवेसी चूज करने के बावजूद आप के मैसेज हरेक शातिर के लिए खुले हैं. हैकर वे सब तकनीक जानते हैं जो फेसबुक के निर्माता बनाते हैं.
डिजिटल वर्ल्ड में कुछ भी छिपा नहीं है. अपनी प्रेमिका के साथ बिना कपड़ों के मोबाइल से शूट की गई फिल्म की रिकौर्डिंग सैकड़ों को उपलब्ध है, चाहे आप ने किसी को भेजा न हो. ‘मुक्ता, आई लव यू’ का संदेश मुक्ता तक पहुंचने से पहले सैकड़ों को पता चल जाएगा और यह भी कि उस समय आप कहां बैठे हैं, कौन से मोबाइल से मैसेज कर रहे हैं.
भारत सरकार यों ही आधार से मोबाइल को लिंक नहीं करा रही. वह आप को, हरेक नागरिक को ब्लैकमेल करने का हथियार ढूंढ़ रही है. जब सौफ्टवेयर तैयार होने लगेंगे तो सरकारों को कैंब्रिज एनालिटिका की जरूरत भी नहीं होगी. वे स्वदेशी हैकरों के जरिए हर नागरिक का कच्चा चिट्ठा रखेंगी, फेसबुक, ट्विटर या व्हाट्सऐप ही नहीं, ‘मेक माय ट्रिप’, ‘बुक माय शो’, ‘अमेजन’, ‘फ्लिपकार्ट’ सब आप के बारे में जानकारी जमा कर रहे हैं. आप आज की दुनिया में नंगे हैं. कपड़े, बस वर्चुअल हैं. आप का महत्त्व सिर्फ कुछ डिजिट्स का है. आप सरकार के मोहरे हैं और वही रहें. बिग ब्रदर आप को देख रहा है, यह न भूलें. आम आदमियों का व्यवहार धर्मसम्मत ही हो, यह अधर्मी तकनीक के सहारे तय किया जाएगा.
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उत्तर प्रदेश के उपचुनाव में भाजपा की किरकिरी कर देने वाले अखिलेश यादव ने एक तरफ साबित किया है कि पिताजी आउटडेटेड हो गए थे, वे चापलूसों से छुटकारा पाने में खुद को असमर्थ पा रहे थे. दूसरी ओर यही बात बिहार की अररिया सीट से साबित की तेजस्वी यादव ने कि जेल में अपनी वृद्धावस्था काट रहे पिता लालू यादव की बादशाहत संभालने के लिए वे पूरी तरह फिट हैं. उत्तर प्रदेश में बूआभतीजे की जोड़ी ने भगवा रथ थामा तो बिहार में भतीजे ने चाचा नीतीश के कान कुतर डाले.
मुलायम और लालू इस बात पर गर्व भी कर सकते हैं कि बेटे नालायक नहीं निकले और भाजपा के पौराणिक मानस पुत्रों से बेहतर हैं जिन्होंने पूर्वजों को अज्ञातवास काटने के लिए ढकेल दिया था. पांडवों की याद कर लें कि युद्ध जीतने के बाद उन्हें कहांकहां भटकना पड़ा.
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बौलीवुड अभिनेत्री कंगना रनौत अपने अभिनय के बल पर बौलीवुड की सबसे सफल अभिनेत्रियों में अपना नाम दर्ज करा चुकी हैं. वह फिल्म के लिए सबसे ज्यादा फीस लेने वाली अभिनेत्रियों में भी शामिल हैं. वह अपने बेबाक बयानों और कौन्ट्रोवर्सीज के चलते आए दिन चर्चा में रहती हैं. मौलूम हो कि ‘मणिकर्णिका- द क्वीन औफ झांसी’ के बाद अब वह राजकुमार राव के साथ ‘मेंटल है क्या’ में नजर आएंगी, जिसकी शूटिंग जल्द ही शुरू होने वाली है.
बता दें ‘मेंटल है क्या’ के जरिए एक बार फिर से राजकुमार राव और कंगना रनौत की जोड़ी बड़े पर साथ में देखने को मिलेगी. गौरतलब है कि इससे पहले फिल्म ‘क्वीन’ में यह जोड़ी साथ नजर आ चुकी है. ‘मेंटल है क्या’ फिल्म की शूटिंग 13 मई से शुरू होगी. जिसकी जानकारी फिल्म की निर्माता एकता कपूर ने दी है. एकता कपूर ने बताया, ‘फिल्म को लेकर हम काफी उत्साहित हैं. यह फिल्म न ही कोई हास्यप्रद और न ही थ्रिलर फिल्म है. इसीलिए हम इसकी शैली तलाश रहे हैं. हमने इसके लिए फिल्म का पोस्टर भी जारी किया है.
बता दे कि कंगना की फिल्म ‘मणिकर्णिका- द क्वीन औफ झांसी’ की शूटिंग लगभग खत्म ही हो चुकी है. फिल्म में सोनू सूद भी एक मुख्य भूमिका में होंगे. मणिकर्णिका की कहानी ‘विजेंद्र प्रसाद’ द्वारा लिखी गई है और इसका निर्देशन साउथ के डायरेक्टर कृष ने किया है.
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साल 2016 में राजस्थान में उदयपुर के महाराणा भूपाल के सरकारी अस्पताल में पेट से हुई एक बीमार औरत 12 घंटे तक वार्ड की खींचतान में फंसी रही. डाक्टरों की लापरवाही की वजह से समय पर इलाज नहीं हो पाने के चलते आखिरकार उस ने दम तोड़ दिया. जानकारी के मुताबिक, उदयपुर के कोटडा इलाके के पिलका गांव की 35 साला मोहिनी गरासिया 8-9 महीने के पेट से थी. पेट में दर्द उठने पर उसे गांव के ही सामुदायिक अस्पताल में दिखाया गया, जहां इलाज नहीं होने पर जांच के बाद उसे उदयपुर के सब से बड़े सरकारी अस्पताल के जनाना वार्ड में भरती कराया गया. लेकिन डाक्टरों ने मामूली बुखार बताते हुए उसे मामूली बीमारी वाले वार्ड में रैफर कर दिया. मामूली बीमारी वाले वार्ड के डाक्टरों ने भी उस का इलाज किए बिना ही डिलीवरी का केस बताते हुए वापस जनाना वार्ड में भेज दिया, लेकिन वहां भी मामूली जांच के बाद उसे फिर से जनरल वार्ड में भेज दिया गया.
बारबार इधर से उधर वार्ड के चक्कर लगाने के दौरान मोहिनी की तबीयत ज्यादा खराब हो गई और उस ने वार्ड के बीच बरामदे में ही दम तोड़ दिया. बाद में जब पूरे मामल की जांच की गई, तो मोहिनी के मरने की वजह उस के पेट में पल रहे बच्चे की 12 घंटे पहले हुई मौत से उस के भी बदन में जहर फैलने को बताया गया. बूंदी जिले की नैनवां तहसील के गांव हीरापुरा की रहने वाली मंजू के साथ जो हुआ, उस तरह का दर्द हर दिन राजस्थान के गंवई इलाकों की सैकड़ों औरतों को झेलना पड़ता है. दरअसल, हर राज्य सरकार ने गंवई और कसबाई इलाकों के सरकारी अस्पतालों में जरूरतमंद पेट से हुई औरतों को खून चढ़ाने के लिए ब्लड स्टोरेज यूनिट तो बना दी है और बदोबस्त दुरुस्त रखने के लिए आपरेशन थिएटर भी बना दिए हैं, लेकिन इन को सही तरह से चलाने के मामले में सेहत महकमा फेल नजर आ रहा है.
कुछ चुनिंदा जगहों को छोड़ कर तमाम अस्पतालों की ब्लड स्टोरेज यूनिटें बंद पड़ी हैं, लाखों रुपए के औजार व सामान धूल खा रहे हैं. इन सब खामियों के चलते गंवई इलाके की पेट से हुई औरतों की जान पर आफत बनी हुई है. कुछ महीने पहले हीरापुरा गांव की मंजू को बच्चा जनने की हालत में नैनवां के सरकारी अस्पताल में भरती कराया गया था. बदन में खून की कमी के चलते डाक्टरों ने मंजू का आपरेशन करने से पहले 3 यूनिट खून की जरूरत बताई. डाक्टरों ने मंजू के परिवार वालों से खून का बंदोबस्त करने के लिए आधा घंटे का समय दिया. उन्होंने जब अस्पताल में बनी ब्लड स्टोरेज यूनिट से ही खून देने की मांग डाक्टरों से की, तो डाक्टरों ने ब्लड यूनिट के खराब होने की बात बताई.
ऐसे हालात में शहर का अस्पताल दूर होने के चलते खून का बंदोबस्त वक्त पर नहीं हो पाया. इस दौरान मंजू की तबीयत बिगड़ती देखी, तो डाक्टरों ने बिना खून चढ़ाए ही आननफानन उस का आपरेशन कर दिया. लेकिन इस आपरेशन के महज एक घंटे बाद ही मंजू की मौत हो गई
ऐसे होते हैं डाक्टर
तय है कि जब किसी औरत को बच्चा जनने का दर्द उठता है, तो उस के पैर सीधे अस्पताल की ओर ही उठते हैं और वहां डाक्टरों के हाथों में ही सबकुछ होता है. भारत में ज्यादातर 2 तरह के अस्पताल हैं, एक सरकारी व दूसरे गैरसरकारी. सरकारी अस्पतालों में कदम रखते ही दिल में चुभन करने वाली बातों का सामना करना होता है. जैसे ‘सीधे खड़ी रह’, ‘लाइन में लग जा’, ‘नाटक मत कर’ वगैरह.
फिर बारी आती है चैकअप की. मुंह पर कपड़ा बांधे जो औरत आती है, वह डाक्टर है भी या नहीं, यह पता करना बहुत मुश्किल होता है. वह चैकअप के दौरान जिन शब्दों का इस्तेमाल करती है, कानों में गरम सीसे की तरह पिघलते हैं और बच्चा जनने का ख्वाब खौफनाक बन जाता है. फिर नंबर आता है बच्चा जनने का. यहां भी डाक्टर अपनी ही सहूलियत का ध्यान रखते हैं. बात सिजेरियन की ही नहीं, बल्कि सामान्य डिलीवरी केस में भी कोशिश यही होती है कि बच्चा दिन में ही पैदा हो, ताकि रात को उन की नींद में कोई खलल न पड़े. वैसे, बच्चा पैदा करना एक आसान बात है. बच्चे के पैदा करने में खास रोल उस की मां का होता है. उस की अंदरूनी ताकत ही उसे बच्चा जनने को उकसाती है. डाक्टर, नर्स, दाई वगैरह का काम तो इस ताकत को बढ़ावा देना होता है.
जयपुर में एक जनाना अस्पताल की हैड विमला शर्मा की मानें, तो अगर बच्चा जनने के दौरान किसी औरत के साथ कठोर बरताव होता है, तो वह खुल कर दर्द सहन नहीं कर पाती और ज्यादातर केस इसी वजह से बिगड़ते हैं. फिर भी आम लोगों का डाक्टरों पर यकीन पूरी तरह से कायम है, लेकिन डाक्टरों के पास इतना समय नहीं होता कि वे औरत में बच्चा जनने के कुदरती दर्द का इंतजार कर सकें. वे अपनी सहूलियत के मुताबिक दर्द देने वाली दवाओं का इस्तेमाल करने की कोशिश में लग जाते हैं.
लापरवाही डाक्टरों की
लक्ष्मी एक पढ़ीलिखी औरत है. पहला बच्चा होने के समय घर वाले उसे गांव के अस्पताल ले आए. दर्द के झटके तो शुरू हो गए थे, पर पूरी तरह दर्द शुरू नहीं हुआ था. जिस यूनिट में वह भरती हुई थी, उस यूनिट की हैड को कुछ दिनों के लिए छुट्टी पर जाना था, इसलिए उसे दवाओं से दर्द उठाने के इंजैक्शन दिए गए. जो दर्द नौर्मल तरीके से उठना था, उसे जबरदस्ती तकलीफदेह बनाया गया. एक और दूसरे मामले में डाक्टर द्वारा दी गई बच्चा जनने की तारीख के बाद भी नमिता को दर्द शुरू नहीं हुआ, तो उसे दर्द देने वाली दवा का इंजैक्शन लगाया गया. इस से दर्द तो शुरू हो गया, पर यह दर्द शुरू होतेहोते रात हो गई. क्योंकि डाक्टर का अपना बच्चा छोटा था, इसलिए उस का घर पर जाना जरूरी था. नतीजतन, नमिता की ड्रिप बंद कर दी गई. मामला सिजेरियन आपरेशन तक पहुंच गया.
अगर बच्चा जनने के मामले में डाक्टर से ले कर पूरे स्टाफ तक का रवैया मरीज के प्रति सही नहीं होता है, तो डाक्टर की इतनी जरूरत क्यों? फिर एक सवाल यह भी उठता है कि क्या हमारी पुरानी व्यवस्था ही सही थी?
दिमागी तौर पर रहें तैयार
डाक्टर विमला शर्मा कहती हैं, ‘‘बच्चे को जनने वाली मां अपने मन से बच्चा जनने का डर बाहर निकाले. एक जान को अपने भीतर पालने वाली औरत में बहुत ताकत होती है. जरूरत है, तो बस उसे पहचानने की. बच्चे को नौर्मल तरीके से पैदा करने में मां को ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ती. बस, उसे खुद को दिमागी तौर पर तैयार करना होता है.’’
शादी के बाद रमेश पहली बार अपनी दुलहन को फिल्म दिखाने गांव से तकरीबन 30 किलोमीटर दूर शहर ले जा रहा था. सवारी के लिए उस के पास मोटरसाइकिल थी. लोक रिवाजों के चलते घर के सामने से वह पत्नी को मोटरसाइकिल पर बैठा नहीं सकता था. पत्नी गांव से बाहर तक पैदल आई, फिर रमेश ने सड़क पर उसे मोटरसाइकिल पर बैठाया और फर्राटा भरते हुए शहर की ओर चल पड़ा. फिल्म देखने और शहर घूमने के बाद वे दोनों रात में अपने गांव वापस आ गए. केवल पत्नी को फिल्म दिखाने की ही बात नहीं है, किसी बीमार को अस्पताल ले जाना हो या घर और खेत के लिए जरूरी सामान लाना हो, तो मोटरसाइकिल सब से उपयागी सवारी हो गई है. हाल ही के कुछ सालों में मोटरसाइकिल गांव में रोजगार का आसान साधन बन कर उभरी है.
मोटरसाइकिल पर सवारी करने के साथसाथ जरूरत का सामान भी ले जाया जाता है. गांव के लोगों की ज्यादातर नातेरिश्तेदारी 50 से 60 किलोमीटर के बीच ही होती है. मोटरसाइकिल की सवारी से यह दूरी तय करना काफी आसान हो गया. शहर से 30 किलोमीटर दूर रह कर दूध की डेरी चलाने वाले नरेश यादव ने शुरुआत में मोटरसाइकिल पर दूध के डब्बे लाद कर शहर पहुंचाना शुरू किया था. वह अपनी मोटरसाइकिल पर दूध के 4 डब्बे ले कर शहर जाता था.
सब्जी का कारोबार करने वाले श्याम प्रसाद कहते हैं, ‘‘अब कम सब्जी पैदा होने पर भी मोटरसाइकिल से शहर की सब्जी मंडी में सब्जी को पहुंचाया जा सकता है. पहले इस के लिए ज्यादा सब्जी के तैयार होने का इंतजार करना पड़ता था या फिर बिचौलिए को ही बेच दिया जाता था.’’
दरअसल, हाल के कुछ सालों में गांवों को बड़े पैमाने पर सड़कों से जोड़ने का काम किया गया है. जहां पक्की सड़कें नहीं हैं, वहां भी खड़ंजा या ऐसा पक्का रास्ता जरूर बन गया है, जिस पर मोटरसाइकिल से आनाजाना आसान हो गया है. ज्यादातर गांव पक्की सड़कों से जुड़ चुके हैं.
पहले गांवों में पुराने टाइप की ज्यादा तेल की खपत वाली बुलेट, यजदी और राजदूत मोटरसाइकिलें चलती थीं, जिन को चलाना महंगा होता था, लेकिन अब 100 सीसी इंजन वाली कम पैट्रोल से चलने वाली मोटरसाइकिल आने से इन का इस्तेमाल करना किफायती होता है.
दिनोंदिन बदले दोपहिया
मोटरसाइकिल से पहले साइकिल गांव में आनेजाने का अहम साधन होती थी. पहले देश में साइकिलें बनाई नहीं जाती थीं. विदेशों से बन कर साइकिलें यहां आती थीं. साल 1944 में मुंजाल ब्रदर्स ने साइकिल के पार्ट बनाने की कंपनी खोली थी. साल 1951 में एटलस कंपनी ने भारत में साइकिलें बनानी शुरू की थीं. तब से ले कर अब तक तमाम तरह के बदलावों के बाद साइकिल मोटरसाइकिल हो गई है.
साधारण साइकिल से ले कर स्पोर्ट्स की साइकिल तक बहुत सारे प्रयोग किए गए. साल 1956 में मुंजाल ब्रदर्स से हीरो ग्रुप बनाया. साल 1975 तक हीरो कंपनी ने रोजाना 75 सौ साइकिल बनाने का रिकौर्ड बना लिया था. इस के बाद हीरो देश की सब से बड़ी साइकिल बनाने वाली कंपनी के रूप में उभरी थी.
इस समय तक देशभर में मोटरसाइकिल भी आ चुकी थी. साल 1955 में भारत सरकार ने पहली बार सेना और पुलिस के लिए ब्रिटेन से रौयल एनफील्ड मोटरसाइकिल को मंगवाया था. इन को चेन्नई में असैंबल किया जाता था. इन में बुलेट, जावा, यजदी और राजदूत प्रमुख थीं.
पुराने जमाने की ये मोटरसाइकिलें नए जमाने में नौजवानों को अपनी ओर खींच नहीं पा रही थीं. साल 1972 में लैंब्रैटा स्कूटर बाजार में आया. इस के बाद वैस्पा, बजाज सुपर और बजाज चेतक स्कूटर बाजार में आए. स्कूटरों को गांव में बाजार नहीं मिल सका.
साल 1984 में हीरो कंपनी ने जापानी होंडा कंपनी के साथ हाथ मिलाया और हीरो होंडा मोटरसाइकिल बाजार में उतारी. 100 सीसी इंजन वाली यह मोटरसाइकिलें एक लिटर पैट्रोल में 70 किलोमीटर की दूरी तय करती थी. उस समय तक भारत में चलने वाली मोटरसाइकिलें एक लिटर पैट्रोल में 35 किलोमीटर से ज्यादा नहीं जाती थीं. टीवीएस की विक्की भी इस दौर में आई, जिस को पैडल से स्टार्ट किया जाता था. इस की शुरुआती कीमत 35 सौ रुपए थी.
दमदार मोटरसाइकिल की मांग
हीरो होंडा ने मोटरसाइकिल को बहुत लोकप्रिय कर दिया. 100 सीसी की हीरो होंडा मोटरसाइकिल ज्यादा वजन उठाने में दमदार नहीं थी. इस को समझते हुए साल 1994 में हीरो होंडा ने स्प्लैंडर बनाई. इस के बाद दमदार मोटरसाइकिल को बाजार में उतारने की होड़ लग गई.
साल 2000 के बाद तो 100 सीसी पावर वाले इंजन की जगह पर 150 सीसी इंजन वाली मोटरसाइकिल को ज्यादा पसंद किया जाने लगा.
साल 2001 में बजाज पल्सर ने दमदार मोटरसाइकिल में अपना अलग बाजार बना लिया था. कुछ नौजवानों को 250 सीसी पावर वाली यमहा फेजर भी खूब पसंद की जाने लगी.
बजाज कंपनी ने 125 सीसी पावर वाली डिस्कवर को भी गांव के बाजार को ध्यान में रख कर तैयार किया. हीरो होंडा के बाद सब से कामयाब मोटरसाइकिल में डिस्कवर गिनी जाती है.
नए जमाने की मोटरसाइकिल सेल्फ स्टार्ट इंजन वाली आने लगी हैं. इस के बावजूद लोग किक स्टार्ट वाली मोटरसाइकिल को पसंद करते हैं.
वाहन बाजार पर लिखने वाले रजनीश राज कहते हैं, ‘‘पूरी दुनिया में तमाम तरह की मोटरसाइकिलों का कारोबार बढ़ रहा है. गांव के यातायात में मोटरसाइकिल तेजी से अपना दबदबा बढ़ाती जा रही है.
‘‘पिछले कुछ समय से यह भी देखा गया है कि केवल लड़के ही नहीं, लड़कियां भी मोटरसाइकिल का जम कर इस्तेमाल करने लगी हैं. स्कूटर के मुकाबले मोटरसाइकिल से सफर करना आसान होता है. थकान कम लगती है और खराब रास्तों पर भी यह स्कूटर से बेहतर चलती है.’’
जरूरत व शौक का बाजार
शौक के लिए मोटरसाइकिल रखने वाले लोग दमदार मोटरसाइकिल को पसंद करते हैं. जौन अब्राहम और दूसरे फिल्मी कलाकारों की तरह नौजवान मोटरसाइकिल का शौक रखते हैं.
लखनऊ शहर में ही बुलेट मोटरसाइकिल के 6 से ज्यादा शोरूम हैं. इस के बाद भी बुलेट खरीदने के लिए 4 से 6 महीने तक का इंतजार करना पड़ता है. रौयल एनफील्ड की एक लाख, 25 हजार से ले कर एक लाख, 75 हजार रुपए के बीच कीमत की मोटरसाइकिलें बाजार में मुहैया हैं.
दिल्ली के बाजार में स्पोर्टी और भारीभरकम मोटरसाइकिल देखने को मिलती हैं. दिल्ली के आसपास गुड़गांव, नोएडा के गांवों तक में अपने रईसी शौक के चलते लोगों ने लग्जरी मोटरसाइकिल भी खरीदी हैं.
पहाड़ों पर दमदार मोटरसाइकिल को ज्यादा पसंद किया जाता है. मोटरसाइकिल का बीमा और सर्विस दोनों ही जब से मोटरसाइकिल बेचने वाली एजेंसी से ही होने लगी है, तब से लोगों को आरटीओ दफ्तर के चक्कर नहीं लगाने पड़ते, जिस से इन की खरीदारी बढ़ी है
कारों से महंगी मोटरसाइकिलें
हरियाणा, पंजाब, राजस्थान और उत्तर प्रदेश के कुछ गांवों में महंगी मोटरसाइकिलें भी दिखने लगी हैं. थंडरबर्ड एलटी जैसी मोटरसाइकिल होंडा सिटी, फौक्सवैगन वैंटो, हुंडई वरना और स्कौडा रैपिड जैसी फुलसाइज सिडान कारों से महंगी है. 1699 सीसी की क्षमता वाली थंडरबर्ड 15 लाख, 75 हजार की कीमत वाली है. महंगी मोटरसाइकिल में कावासाकी, हार्ले डेविडसन और डुकाटी मौजूद हैं. अब इटली की बेनेली कंपनी ने 3 लाख से 11 लाख के बीच की कीमत वाली 5 मोटरसाइकिलों के मौडल लौंच किए हैं.
महंगी मोटरसाइकिल बनाने वाली कंपनियों की नजरें भी देश के गांवदेहात के बाजार पर हैं. जिस तरह से गांवों में फार्म हाउस कल्चर बढ़ रहा है, उस से इस तरह की महंगी मोटरसाइकिलों का चलन भी बढ़ने लगा है. महंगी कारों के बाद अब गांवों में महंगी मोटरसाइकिलें भी दिखने लगी हैं. जिन गांवों में पहले 100 सीसी इंजन वाली 35 से 40 हजार कीमत वाली मोटरसाइकिलें खरीदी जाती थीं, वहीं अब 150 से 250 सीसी इंजन वाली महंगी मोटरसाइकिलें खरीदी जाने लगी हैं.
बदलती लाइफ स्टाइल का असर
भोजपुरी फिल्मों की हीरोइन पूनम दुबे कहती हैं, ‘‘फिल्मों में भी लड़केलड़कियों को मोटरसाइकिल का इस्तेमाल करते दिखाया जाता है, जिस से नौजवानों में इस के प्रति रुझान बढ़ रहा है. अब छोटे शहरों और गांवों में भी सब से ज्यादा मोटरसाइकिलों का इस्तेमाल हो रहा है.’’
नौजवानों में बढ़ा है क्रेज
वाहन बाजार पर लिखने वाले रजनीश राज कहते हैं, ‘‘तकरीबन 70 फीसदी नौजवान मोटरसाइकिल का इस्तेमाल करते हैं. कम तेल के खपत वाली मोटरसाइकिल आने के बाद गांवों में लोगों का इस पर सवारी करना आसान हो गया. अब गांव के पास से सड़कें और हाईवे निकलने लगे हैं, जहां पर पैट्रोल की सुविधा मिलने लगी है. अब तो जगहजगह पैट्रोल पंप खुल गए हैं.’’