शूटिंग के दौरान घायल हुईं प्रियंका चोपड़ा, घुटने में लगी गंभीर चोट

अपने हौलीवुड करियर में व्यस्त अदाकारा प्रियंका चोपड़ा इन दिनों ‘क्वांटिको’ के तीसरे सीजन की शूटिंग कर रही हैं. इस बीच उनके फैंस के लिए एक बुरी खबर आई है. जानकारी के मुताबिक क्वांटिको के सेट पर शूट के दौरान घायल होने से प्रियंका के घुटने में चोट आ गई है

इसकी जानकारी खुद उन्होंने ट्वीट कर अपने फैंस को दी है. प्रियंका ने बताया कि एक सीन की शूटिंग के दौरान उनके घुटने में चोट आ गई. उनके साथ सेट पर एक फिजियोलाजिस्ट हैं और अब तीन हफ्ते के लिए उनके पैरो में पट्टी चढ़ गई है.

इसके अलावा प्रियंका ने शूटिंग को लेकर कुछ मजेदार बातें भी बताईं. उन्होंने लिखा, ‘जब हम लोग इटली में थे तो पूरे क्रू मेम्बर्स में मैं अकेली अभिनेत्री थी इसलिए मुझे क्रू के साथ रात में बाहर जाना होता था. हमने काफी टस्कन वाइन पी. उन्होंने क्वांटिको के सीजन को पसंद करने के लिए अपने फैंस को शुक्रिया भी कहा.

प्रियंका का टीवी शो ‘क्वांटिको’ का पहला और दूसरा सीजन पहले ही हिट हो चुका है और अब तीसरा सीजन भी धमाल मचाने को तैयार है. 35 साल की प्रियंका ‘क्वांटिको’ में एफबीआई एजेंट एलेक्स पेरिश के किरदार में हैं. शूटिंग करीब पूरी होने को है.

इसके साथ ही प्रियंका ‘क्वांटिको’ के अलावा हौलीवुड फिल्म ‘अ किड लाइक जेक’ में भी दिखाई देंगी. हौलीवुड प्रोजेक्ट के अलावा प्रियंका अपकमिंग बौलीवुड फिल्म ‘भारत’ में नजर आएंगी. इस फिल्म में प्रियका के साथ सलमान खान भी होंगे. जल्द ही फिल्म की शूटिंग शुरू होगी. फिल्म में 10 साल बाद सलमान और प्रियंका एक साथ नजर आएंगे.

VIDEO : प्री वेडिंग फोटोशूट मेकअप

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वायरल हो रहा है “तू चीज बड़ी है मस्त” का भोजपुरी वर्जन

90 के दशक में अक्षय कुमार और रवीना टंडन स्‍टारर फिल्‍म मोहरा का गाना ‘तू चीज बड़ी है मस्‍त’ ने धमाल मचा दिया था. मगर अब इस गाने का भोजपुरी वर्जन ‘हम चीज बड़ी हईं मस्त’ भी आ गया है, जिसमें निशा दुबे और एक्‍शन किंग विशाल सिंह नजर आए हैं. चर्चित निर्देशक रामाकांत प्रसाद की फिल्‍म ‘गदर 2’ का गाना ‘हम चीज बड़ी हईं मस्त’ उसी गाने का भोजपुरी संस्‍करण है, जिसमें निशा का जादू सर चढ़कर बोल रहा है.

गाने में निशा काफी सेंशेसनल लुक में नजर आई हैं और डांस भी उनका बेहतरीन है. बता दें कि इन दिनों बौलीवुड में पुराने गाने को नए म्‍यूजिक के साथ फिल्‍मों में प्रजेंट करने का ट्रेंड चला है, जिसमें कई गाने नए अवतार में पसंद भी किए गए हैं. इसी क्रम में पिछले साल अब्‍बास मस्‍तान ने भी अपनी फिल्‍म ‘मशीन’ में मोहरा के गाने का यूज किया था, जिसमें मुस्‍तफा और कायरा आडवाणी नजर आईं थी.

लोगों ने उस गाने को खूब पसंद किया था. उसके बाद अब निशा दुबे को लेकर रामाकांत प्रसाद ने इस गाने का भोजपुरी वर्जन ‘हम चीज बड़ी हईं मस्त’ को अपनी फिल्‍म में शामिल किया है. इस गाने को भोजपुरिया दर्शकों ने सर आंखों पर बिठा लिया है और अब तक वीनस म्‍यूजिक के यू-ट्यूब चैनल पर इस गाने को 376,455 बार देखा जा चुका है.

इस गाने को लेकर निशा दुबे का कहना है, ‘पुराने गाने काफी अच्‍छे होते थे, जो आज भी हमारे जुबान पर होता है. और जहां तक बात रही रवीना टंडन की ‘तू चीज बड़ी है मस्‍त’ गाने की, तो ये मेरा औल टाइम फेवरेट गाना है. मैंने कभी सोचा नहीं कि भोजपुरी में कोई ऐसा कंसेप्‍ट लेकर आएगा, लेकिन मधुकर आंनद इसी के लिए जाने जाते हैं.’

निशा दुबे ने आगे कहा, “मधुकर आंनद ने इस गाने को अपनी सुपरहिट फिल्‍म ‘गदर 2’ में ‘हम चीज बड़ी हई मस्त’ के रूप में रखा, जिसे लोगों ने काफी सराहा. शुरू में मुझे जब इस बारे में बताया गया, तब मैं काफी एक्‍साइटेड थी. फिल्‍म रिलीज होने के बाद जिस तरह से लोगों ने ‘हम चीज बड़ी हई मस्त’ गाने को रिस्‍पांड किया है, उससे मैं काफी खुश हूं.”

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इस आइटम सौन्ग पर मोनालिसा ने लगाएं जमकर ठुमके

बिग बौस 10 की कंस्टेंट और भोजपुरी अदकारा मोनालिसा एक बार फिर से चर्चा में आ गई हैं. इस बार उनके सुर्खियों में आने की वजह उनका हौट और सेक्सी डांस मूव्स है. उन्होंने हाल ही में सनी लियोनी के फेमस आइटम नंबर ‘ट्र‍िपी ट्र‍िपी…’ पर हौट डांस परफार्मेंस दी है, जिसका वीडियो सोशल मीडिया पर काफी वायरल हो रहा है.

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बता दें कि मोनालिसा फिल्म भूमि के इस गाने पर पटना में आयोजित एक इवेंट में डांस करती नजर आ रही हैं. परफार्मेंस के दौरान उनके डांस मूव्स देखने वाले थे. उन्होंने इस दौरान गोल्डन कलर की ड्रेस पहन रखी थी.

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मोनालिसा पिछले दिनों एक तस्वीर के चलते ट्रोल हुई थीं. दरअसल, उन्होंने लाल कलर की गाउन में एक तस्वीर अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर पोस्ट की थी. लेकिन फोटो की वजह से उन्हें सोशल मीडिया यूजर्स ने ट्रोल करना शुरू कर दिया था.

मोनालिसा बंगाली वेब सीरीज ‘Dupur Thakurpo 2’ (दुपुर ठाकुरपो) में दिखाई देंगी. यह इस सीरीज का दूसरा सीजन है. उनकी यह फिल्म कौमेडी होगी. बता दें कि इससे पहले उन्होंने लाल गाउन में जो तस्वीर शेयर की थी वह उनकी अपकमिंग वेब सीरीज ‘Dupur Thakurpo 2’ का हिस्सा है.

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प्यार में हार गई हसीन मौडल

मौडलिंग और क्षेत्रीय फिल्मों की दुनिया में अनगिनत लड़कियां कदम रखती हैं. अपवाद को छोड़ दिया जाए तो किस्मत के सितारे उन्हीं के चमकते हैं, जो प्रतिभा के साथ मेहनत करती हैं. खूबसूरती के अपने मायने होते हैं. आकर्षक नैननक्श वाले चेहरों को लोग पसंद करते हैं. रिचा खूबसूरत थी तो उस के भी कद्रदानों की कोई कमी नहीं थी. सैकड़ों लोग उस के दीवाने थे. वह एक बेहद हसीन मौडल और अदाकारा थी. कई साल पहले उस के कदम सफलता की सीढि़यों पर पड़ने शुरू हुए तो उस की खुशियों को जैसे पंख लग गए थे. उस ने सालों से अपनी आंखों में बसे सपनों को साकार किया था. ऐसी कई मौडल थीं जो वक्त के साथ गुमनामी के अंधेरे में खो गई थीं, लेकिन रिचा का जादू लोगों के सिर पर चढ़ कर बोलता था. वह लगातार ऊंचाइयों को छू रही थी.

रिचा हिमाचल प्रदेश के सुंदर उपजाऊ पहाडि़यों वाले कांगड़ा जिले के प्रसिद्ध शहर धर्मशाला से लगे उपनगर नगरोटाबंगवां की रहने वाली थी. पहाड़ी वादियों में उस की फिल्में और म्यूजिक वीडियो एलबम धूम मचाती थीं. वह कई दरजन हिमाचली फिल्मों और एलबमों में काम कर चुकी थी. उस ने कुछ तमिल व पंजाबी फिल्मों में भी काम किया था.

इतना ही नहीं वह साउथ के चर्चित अभिनेता नागार्जुन के साथ भी फिल्म कर चुकी थी. रिचा मिस नगरोटा भी रह चुकी थी. इसके बाद वह मिस हिमाचल बनी. उस की गिनती हिमाचल की सब से खूबसूरत मौडलों में होती थी. लोग उस के इस कदर दीवाने थे कि वह जहां भी शूटिंग के लिए जाती थी, वहां लोगों की भीड़ लग जाती थी.

रिचा के पास नाम था, शोहरत थी और अच्छी जिंदगी जीने लायक दौलत भी थी. वह खुश रहने वाली लड़की थी और निजी जिंदगी में भी हंसतीमुसकराती रहती थी. कोई भी उसे देख कर नहीं कह सकता था कि रिचा परेशान होगी.

बाहरी दिखावे को छोड़ दिया जाए तो किसी के अंदर के खालीपन, अवसाद या उस के दिमाग में क्या चल रहा है, को जानना संभव नहीं होता. कई बार जो होता है वैसा दिखता नहीं है और जो दिखता है वह होता है. रिचा के साथ भी शायद ऐसा ही कुछ था. यह बात अलग थी कि लोग उस सब से बेखबर थे.

दिसंबर, 2016 में मौसम बेहद सर्द हो चला था. कभी बर्फबारी होती तो कभी बारिश. पर्यटकों के लिहाज से ऐसा मौसम जरूर लुभावना होता है, लेकिन इस से स्थानीय लोगों की दिनचर्या बिगड़ जाती है. रिचा को गायकी और अदाकारी के अभ्यास के लिए प्रतिदिन नगरोटा से धर्मशाला आना पड़ता था. ठंड में मुश्किल आई तो उस ने धर्मशाला के मोहल्ला गमरू में अपने लिए किराए पर कमरा ले लिया और वहां अकेले रहने लगी. इस से उस का आनेजाने का समय भी बचा और सर्दी से भी बचाव हो गया.

रिचा सुबह जल्दी उठ जाया करती थी और 9 बजे से 10 बजे के बीच स्टूडियो या प्रैक्टिस के लिए चली जाती थी, लेकिन 20 जनवरी, 2017 को ऐसा नहीं हुआ. उस दिन रिचा के कमरे का दरवाजा नहीं खुला तो घर में रहने वाले मकान मालिक के परिवार को उस की फिक्र हुई. पहले उन्होंने सोचा कि रिचा शायद देर से सोई होगी, जब थोड़ा और समय बीता तो वह सोचने पर मजबूर हो गए. उन से नहीं रहा गया तो उन्होंने रिचा के कमरे के दरवाजे पर दस्तक दी, लेकिन अंदर कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई.

जब कई बार दस्तक व आवाज देने पर भी रिचा ने कोई उत्तर नहीं दिया तो उन्होंने खिड़की के रास्ते अंदर देखने का प्रयास किया.  अंदर का नजारा देख कर उन के होश उड़ गए. रिचा पंखे के सहारे लटकी हुई थी. अविलंब इस की सूचना पुलिस को दी गई. सूचना पा कर धर्मशाला थानाप्रभारी कुलदीप राजा मौके पर आ पहुंचे.

पुलिस कमरे का दरवाजा तोड़ कर अंदर दाखिल हुई. पुलिस ने देखा रिचा ने ग्रे कलर की टी-शर्ट और छींटदार लोअर पहना हुआ था. उस का शव एक गर्म चादर के सहारे पंखे से लटका हुआ था. लटकने के बाद उस के घुटने लगभग जमीन पर टिक गए थे. कमरे में एक बेड के अलावा एक कंप्यूटर व जरूरत का अन्य सामान मौजूद था.

रिचा के परिजनों को भी सूचना दे दी गई. खबर मिलते ही उन के होश उड़ गए. वे लोग तुरंत धर्मशाला के लिए चल दिए. रिचा आत्महत्या जैसा घातक कदम उठा सकती है, ऐसा उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा था.

सोचने वाली बात यह थी कि चकाचौंध भरी जिंदगी के पीछे आखिर कौन सा अंधेरा था, जिस के लिए रिचा को आत्महत्या के लिए मजबूर होना पड़ा. आखिर उस की ऐसा कौन सी मजबूरी थी जिस की वजह से वह जिंदगी की जंग हार कर अपनी सांसों की डोर को खुद ही तोड़ने पर मजबूर हो गई थी. पुलिस ने रिचा के शव को नीचे उतारा.

मामला सीधे तौर पर आत्महत्या का था. बिस्तर पर ही रिचा का मोबाइल रखा था. एसपी संजीव गांधी को इस की सूचना मिली तो उन्होंने इस मामले में गहनता से जांच करने के निर्देश दिए. फोरैंसिक लैब की निदेशक मीनाक्षी महाजन के निर्देशन में फोरैंसिक एक्सपर्ट की टीम भी वहां आ गई.

पुलिस ने रिचा का मोबाइल अपने कब्जे में ले कर उस की जांच की तो पता चला कि उस ने एक नंबर पर रात 2 से 3 बजे के बीच कई बार काल की थी लेकिन संभवत: उस की बात नहीं हुई थी, क्योंकि काल के साथ ड्यूरेशन टाइम जीरो था.

इस से यह बात साफ हो गई कि वह देर रात तक किसी बात को ले कर परेशान थी. सुबह के समय उस के नंबर पर अलगअलग नंबर से कई मिस काल जरूर आई थीं. लेकिन तब तक वह दुनिया को अलविदा कह चुकी थी. इन में एक नंबर वह भी था जिस पर रिचा ने देर रात कई बार बात करने की कोशिश की थी.

पुलिस ने कमरे के सामान की बारीकी से जांच की तो घटनास्थल पर एक 3 पेज का सुसाइड नोट मिला. उस नोट से पता चला कि रिचा का संदीप नामक किसी युवक से प्रेमप्रसंग चल रहा था और वह उस की बेरुखी से बेहद आहत थी. रिचा ने 3 पेजों में कई बातों का जिक्र किया था. संदीप का मोबाइल नंबर भी सुसाइड नोट में लिखा था.

संदीप के नंबर से रिचा के मोबाइल पर सुबह भी काल की गई थी. निस्संदेह वह उस से बात करना चाहता था. इस के अलावा उस के कई एसएमएस भी थे, जिन्हें पढ़ कर पता चलता था कि दोनों के बीच अनबन थी.

चर्चित अदाकारा की आत्महत्या की खबर पूरे शहर में फैल चुकी थी. वहां लोगों का जमावड़ा लग गया. तब तक रिचा के घर वाले भी वहां आ गए थे. पुलिस ने उन से पूछताछ की तो उन्होंने बताया कि रिचा और संदीप एकदूसरे से प्यार करते थे और शादी करने वाले थे. यह बात परिवार में किसी से छिपी नहीं थी. लेकिन संदीप अकसर उस के साथ मारपीट करता था. उस की मौत का जिम्मेदार वही है. उन से संदीप के बारे में पता चला कि वह प्रशिक्षु कांस्टेबल है और ऊना में उस का प्रशिक्षण चल रहा है.

पुलिस ने मृतक के शव को पोस्टमार्टम के लिए डा. राजेंद्र प्रसाद मैडिकल कालेज एवं अस्पताल भिजवा दिया. साथ ही उस के घर वालों की तरफ से संदीप के खिलाफ भादंवि की धारा 303 व 34 के अंतर्गत मुकदमा दर्ज कर लिया. अगले दिन अखबारों में रिचा आत्महत्या प्रकरण सुर्खियों में आ गया.

पोस्टमार्टम के बाद उस का शव उस के घर वालों को सौंप दिया. पुलिस ने रिचा के मोबाइल की काल डिटेल्स हासिल की तो पता चला कि संदीप व उस के बीच अकसर बातें हुआ करती थीं. बातों का यह दौर कभी कम तो कभी ज्यादा चलता था. पुलिस ने रिचा की काल रिकौर्डिंग्स को भी सुना, जिस से दोनों के रिश्ते की कड़वाहट पुख्ता हो गई.

दर्ज मुकदमे, तथ्यों और बयानों के आधार पर एसपी संजीव गांधी ने रिचा के प्रेमी संदीप की गिरफ्तारी के निर्देश दे दिए. इस के लिए एक पुलिस टीम को ऊना भेजा गया. वह बनगढ़ स्थित प्रशिक्षण केंद्र में ही मौजूद था. पुलिस उसे गिरफ्तार कर के थाने ले आई.

पुलिस ने उस से गहराई से पूछताछ की, जिस के बाद पता चला कि संदीप के साथ दोस्ती से शुरू हुआ उस का सफर पहले प्यार में बदला और बाद में प्यार के इस रिश्ते में ऐसा बेरुखी भरा बदलाव आया कि वह उस की जिंदगी को भी लील गया.

मौडल रिचा

दरअसल 24 वर्षीय खूबसूरत रिचा मौडलिंग के क्षेत्र में जाना चाहती थी. उस की खूबसूरती की सभी तारीफ किया करते थे. जवानी की दहलीज पर कदम रखते ही पढ़ाई के साथसाथ उस ने इस के लिए प्रयास भी शुरू कर दिए थे. अपनी मेहनत के बल पर उस ने कम उम्र में ही एक्टिंग व मौडलिंग के क्षेत्र में खुद को स्थापित भी कर लिया. उस ने स्थानीय वह बाहरी कई म्यूजिक कंपनियों के साथ हिमाचली, गढ़वाली व पंजाबी वीडियो एलबम के साथ ही फिल्मों में भी काम किया.

रिचा व्यवहारकुशल भी थी और सुंदर भी. अभ्यास भी वह जम कर करती थी, जिस के बल पर उसे खूब काम मिला. वह ऐसी अदाकारा थी, जिस ने बिना किसी गौडफादर के अपनी प्रतिभा को साबित किया. वह काफी ऊंचाइयों पर पहुंच गई थी.

रिचा को हिंदी सीरियलों के औफर भी मिले, लेकिन वह हिमाचल प्रदेश में रह कर ही काम करना चहती थी. करीब एक साल पहले रिचा की मुलाकात एक प्रोग्राम के दौरान संदीप से हुई. पहली मुलाकात में ही दोनों ने एकदूसरे के दिलों पर अपनी छाप छोड़ी और मोबाइल नंबरों का आदानप्रदान भी कर लिया. दोनों के बीच अकसर बातें होने लगीं.

दोनों के बीच बातों के अलावा कुछ मुलाकातें भी हुईं. दिन, तारीख व साल के साथ उन की दोस्ती गहराती गई. उन की यह दोस्ती प्यार में कब बदल गई, इस का पता उन दोनों को पता ही नहीं चला. बातोंमुलाकातों के इसी दौर में दोनों के दिलों में चाहत ने जन्म ले लिया और यही चाहत एक प्यार का पौधा बन कर अंकुरित हो गई. रिचा के दिल में पहली बार किसी युवक ने अपनी जगह बनाई थी.

प्यार उस शै का नाम है जो बिना आहट किए दिल के दरवाजे खोल कर उस में चुपके से बस जाती है. इस का पता इंसान को तब चलता है, जब उस के दिल की धड़कनें खुदब खुद कुछ कहने लगती हैं. जब कोई प्यार का पाठ पढ़ता है तो दिल की धड़कनें उसी का नाम लेती हैं, जिस की सूरत उस में बसी होती है. दोनों अपने प्यार को कैद किए हुए थे. रिचा व संदीप प्यार का इजहार करने के लिए उचित अवसर की तलाश में रहने लगे. एक दिन संदीप ने अपने दिल की बात रिचा से कह दी.

रिचा को उस की बात पर कोई हैरानी नहीं हुई, क्योंकि वह जानती थी कि संदीप उसे चाहने लगा है. उस के सामने प्यार का इजहार करने के लिए उस के दिल की कलीकली खिल गई. वह मुस्करा दी. हालांकि उस की मुसकराहट में ही वह सच्चाई छिपी थी जो संदीप उस के मुंह से सुनना चाहता था. फिर भी उस ने पूछ लिया, ‘‘बताओ न, करती हो मुझ से प्यार?’’

‘‘बहुत ज्यादा, लेकिन ये बताओ कि कभी तुम मेरा साथ छोड़ तो नहीं दोगे?’’ रिचा ने आशंकित होते हुए कहा तो संदीप बोला, ‘‘ऐसा कभी हो सकता है क्या?’’ बात वहीं खत्म हो गई.

बीतते वक्त के साथ दोनों ने एक साथ जीनेमरने की कसमें खा लीं. समय अपनी गति से चलता रहा. रिचा दिल की सच्ची लड़की थी. वह संदीप को टूट कर चाहती थी. प्यार में दोनों ने हमेशा एक होने का फैसला कर लिया था. संदीप ने उसे यकीन दिलाया था कि वह अपनी बात से कभी पीछे नहीं हटेगा. देखतेदेखते कई महीने बीत गए.

रिचा ने संदीप से अपने प्रेमिल रिश्तों की बात अपने घर वालों को भी बता दी थी. उस ने घर वालों को विश्वास दिलाया था कि संदीप अच्छा लडका है और वह उस से जरूर शादी करेगा. रिचा अपने पैरों पर खड़ी थी. अच्छाबुरा भी समझती थी, इसलिए उस की खुशी के लिए किसी ने उस के रिश्ते पर कोई आपत्ति नहीं की. लेकिन प्यार में हर किसी को मुकाम मिल जाए, यह जरूरी नहीं. रिचा के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ. प्यार में कुछ बातों की हकीकत वक्त के साथ ही पता चलती है. इस मामले में भी ऐसा ही हुआ.

रिचा संदीप को उस का शादी का वादा याद दिलने लगी तो वह कटाकटा सा रहने लगा. उसे संदीप से ऐसी उम्मीद कतई नहीं थी. वह किसी न किसी बहाने से बात को टाल जाता था. इस से रिचा परेशान रहने लगी. इसी बीच उसे पता चला कि संदीप की दोस्ती किसी अन्य युवती के साथ भी है. रिचा को लगा कि वह उसे धोखा दे रहा है. एक दिन उस ने इस मुद्दे पर संदीप से बात की तो वह हत्थे से उखड़ गया और उस ने रिचा को ही कटघरे में खड़ा करने की कोशिश की. यह दिसंबर, 2016 की बात थी.

इस घटना के बाद दोनों के बीच अकसर झगड़ा होने लगा. हालांकि कुछ दिनों में धीरेधीरे दोनों सामान्य हो गए. 1 जनवरी, 2017 को नए साल का जश्न मनाने के लिए रिचा संदीप व अन्य दोस्तों के साथ हिमाचल के ही मैक्लोडगंज गई. कुछ दिन सब ठीक रहा, लेकिन उन के बीच फिर झगड़ा शुरू हो गया. हालात तब बिगड़े जब संदीप उस के साथ मारपीट व दुर्व्यवहार भी करने लगा. उस के बदले व्यवहार ने रिचा को तोड़ कर रख दिया.

रिचा चाहती तो किनारा कर सकती थी उसे कई चाहने वाले भी मिल सकते थे लेकिन वह संदीप को दिलोजान से प्यार करती थी. उस से दूर होने की कल्पना कर के ही वह निराश हो जाती थी. गलती संदीप की होने पर भी वह खुद हारने में यकीन रखती थी. खुद हार कर वह प्यार को जिताती थी. उस के बेपनाह प्यार का आलम यह था कि वह किसी भी सूरत में संदीप को खोना नहीं चाहती थी.

संदीप से उस की शादी जल्द हो इस के लिए उस ने बाहर शूटिंग पर जाने के कई प्रोग्राम छोड़ दिए थे. हालांकि यह सब उस के  कैरियर के लिए अच्छा नहीं था, लेकिन संदीप के लिए वह यह कुर्बानी देने को भी तैयार थी. दूसरी ओर संदीप पूरी तरह बेरुखी पर उतर आया था, जबकि वह चाहती थी कि वह उस से जल्द से जल्द शादी कर ले. रिचा तनाव के दौर से गुजर रही थी. अपनी परेशानियों का जिक्र वह अपनी सहेलियों से किया करती थी.

रिश्तों के मनमुटाव को दूर करने के लिए वह एक दिन संदीप के पास ऊना भी गई, लेकिन दोनों के बीच झगड़ा हो गया तो वह वापस आ गई.

11 जनवरी की रात मोबाइल फोन पर भी उस की संदीप से नोकझोंक हुई तो संदीप ने शादी करने से साफ इनकार कर दिया. उस ने रिचा के साथ दुर्व्यवहार भी किया. अचानक दिल पर लगी इस बड़ी चोट ने उसे तोड़ कर रख दिया. अवसाद के दौर में उस ने देर रात अपनी एक सहेली को कई बार फोन किया. लेकिन उस की बात नहीं हो सकी. कोई हालात को संभाल पाता, उस से पहले ही रिचा ने सुसाइड नोट पर कलम के जरिए अपना दर्द उकेरा. शुरुआती 2 पन्नों पर उस ने अपनी व संदीप की मौजूदा स्थिति के बारे में लिखा, जबकि अंतिम आधे पन्ने में आत्महत्या का कारण बताया.

रिचा ने अपनी मौत का जिम्मेदार संदीप को बताते हुए घातक कदम उठा लिया. उस की मौत उस के चाहने वालों को भी निराश कर गई.

पूछताछ के बाद पुलिस ने संदीप को माननीय न्यायालय के समक्ष पेश किया, जहां से उसे 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया. काश! रिचा की तरह संदीप  ने भी प्यार के रिश्ते को उतनी ही खूबसूरती से निभाया होता और वक्त पर रिचा को संभाल लिया होता तो निश्चित तौर पर आज वह प्रतिभाशाली खूबसूरत अदाकारा जिंदा होती. कथा लिखे जाने तक संदीप की जमानत नहीं हो सकी थी.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

सहयोगी : आर. गुलेरिया

फीमेल बॉडी बिल्डर : खूबसूरत और सेक्सी भी

कुल मिलाकर लड़कियों को उनकी फिगर और बॉडी से ही आंका जाता है और अगर लड़की की फिगर में कोई उन्नीस इक्कीस हुआ, तो उन्हें मर्दमार औरतों का तमगा दे दिया जाता है, कहा जाता है उन में औरतों वाली बात नहीं है, यही कारण है कि भारतीय समाज में अधिकांश महिलाओं को बॉडी बिल्डिंग और कसरत से दूर रखा जाता है और उन को इस क्षेत्र के नाकाबिल समझते हुए कहा जाता है  ‘ये तुम्हारे बस की बात नहीं’ और साथ ही यह भी माना जाता है कि अगर महिलाएं पुरुषों जैसी कसरत करेंगी तो उनके डोले शोले बन जाएंगे, उनके मसल्स दिखने लगेंगे और उन का लड़कियों वाला लुक खत्म हो जाएगा.

बॉडी बिल्डिंग और मातृत्व से जुड़े मिथक
महिलाएं बौडी बिल्डिंग करती हैं तो उस से उन के मां बनने के प्राकृतिक गुण पर प्रभाव पड़ता है? इस सवाल पर पुणे की फिगर ऐथलीट दीपिका चौधरी जिन्होंने अप्रैल, 2015 में अमेरिका में आयोजित इंटरनैशनल फिगर ऐथलीट प्रतियोगिता में न केवल भारत का प्रतिनिधित्व किया था, बल्कि उस प्रतियोगिता में जीत भी हासिल की थी, का कहना है, ‘‘यह बिलकुल गलत है. इस का ताजा उदाहरण हैं बैंगलुरु की बौडी बिल्डर सोनाली स्वामी जो 2 बच्चों की मां हैं और प्रसिद्ध बौडी बिल्डर भी. फिटनैस या बौडी बिल्डिंग का मातृत्व से कोई लेनादेना नहीं है.’’ अपनी सुंदरता और सिक्स पैक को मैंटेन रखते हुए दीपिका अपने परिवार की जिम्मेदारियां भी बखूबी निभा रही हैं. वे कहती हैं कि उन्हें अपने फिगर ऐथलीट बनने के निर्णय पर गर्व होता है.

फिगर एथलीट दीपिका चौधरी का मानना है कि जैसे प्रकृति के अनेक रंग हैं वैसे ही हर पुरुष में भी कुछ फैमिनिटी व हर महिला में कुछ मस्क्यूलैरिटी होती है. जो पुरुष फैशन व ब्यूटी इंडस्ट्री से जुड़े होते हैं उन में फैमिनिटी दिखाई देती है. मुझे समझ नहीं आता अगर कोई उस खास स्टाइल, उस बौडी टाइप में कंफर्टेबल है तो समाज को क्यों आपत्ति होती है? हमारे आसपास के लोगों में कोई गोरा, कोई सांवला,कोई लंबा, कोई छोटा, कोई मोटा तो कोई पतला होता है और लोग उन्हें उसी रूप में स्वीकारते हैं. वैसे भी हरेक की अपनी पसंद होती है. हरेक को अपनी पसंद के अनुसार जीने का अधिकार होना चाहिए.

साजिश धर्म व समाज की
भारतीय समाज की सोच है कि जो लड़कियां अथवा महिलाएं गेम्स खेलती हैं या फिर बौडी बिल्डिंग करती हैं उन की फिगर खराब हो जाती है, उन की खूबसूरती में कमी आ जाती है और उन की फैमिनिटी पर नकारात्मक असर पड़ता है, उनका नारीत्व, उनकी नाजुकता ख़त्म हो जाती है. दरअसल, यह समाज और धर्म की साजिश है कि उसने नारी को कमज़ोर और छुईमुई बनाए रखने के लिए यह साजिश रची है. धर्म ने नारी को हमेशा अपने सतीत्व को बचा कर रखने की ताकीद की है, उसे अपनी वर्जिनिटी संभाल कर रखने की हिदायत दी है और नारी इन्हीं हिदायतों और दिशा निर्देशों में फंसकर अपने सतीत्व को बचाने के चक्कर में वह बहुत सारे वे काम नहीं कर पाती जिन को करने की उसमें  क्षमता है. जब नारी समाज के इन बंधनों से मुक्त होकर अपने शरीर को भूल जायेगी तो वह उससे जुड़े डरों  से भी आज़ाद हो जायेगी.

कमजोर नहीं स्त्री
आज की महिलाओं पर अलग तरह की जिम्मेदारियां हैं. वे पुरुषों की तरह हर काम कर रही हैं, बस, मेट्रो की धक्कामुक्की का हिस्सा बन रही हैं, भागती दौड़ती घरबाहर की सभी जिम्मेदारियों को बखूबी निभा रही हैं. यह एक महिला ही है जो बच्चे को 9 महीने तक पेट में रखती है, प्रसव पीड़ा के दौरान 20 हड्डियों के एक साथ टूटने जितना दर्द सहती है. दुनिया रचने की ताकत सिर्फ एक महिला में ही होती है तो फिर वह कमजोर कैसे है? अगर बचपन से उन्हें खेल कूद और व्यायाम करने की आज़ादी दी जाए तो वह शारीरिक रूप से भी  पुरुषों को पछाड़ सकती हैं.

खूबसूरत सेक्सी फीमेल बॉडी बिल्डर
लेकिन कुछ महिलाएं समाज की इस परंपरागत सोच को  गलत साबित कर रही हैं और बॉडी बिल्डिंग में पुरुषों के आधिपत्य वाले क्षेत्र में अपनी जगह बना रही हैं और महिलाओं और बॉडी बिल्डिंग को लेकर स्टीरियोटाइप इमेज को तोड़ रही हैं. रूस की जूलिया विंस उन हौट और सेक्सी बॉडी बिल्डरों  में से हैं जिनके आगे दुनिया झुकने को तैयार रहती है. जहां ताकत में ये किसी भी दूसरे बॉडीबिल्डर को मात दे सकती हैं, वहीं खूबसूरती में भी इनके जैसा कोई दूसरा शायद ही हो. जूलिया की तुलना हॉलीवुड मूवी के कैरेक्टर हल्क से की जाती है. जूलिया को लोग मसल्स वाली बॉर्बी डॉल कहते हैं.15 साल की उम्र से जिम जाने वाली मासूम सी दिखने वाली जूलिया लड़की कोई आम लड़की नहीं बल्कि एक पॉवरलिफ्टर है और अच्छे-खासे पहलवान को भी चित कर सकती है.

‘आयरन वूमेन’ यासमीन मनक
खुद को हमेशा फिट रखने वाली यासमीन मनक पिछले 17 सालों से वेटलिफ्टिंग कर रही हैं साथ ही वे  भारत की  एक खूबसूरत महिला  होने के साथ-साथ एक बॉडी बिल्डर भी हैं. मनक ने हाल ही में बॉडी बिल्डिंग एंड फिटनेस फेडरशन (IBBFF) द्वारा आयोजित मिस इंडिया 2016 का खिताब अपने नाम किया है. अपनी  मेहनत की बदौलत वे  दो गोल्ड मेडल भी जीत चुकी हैं. मनक का गुडगांव में अपना एक जिम है, जहां वे वो हर महीने करीब 300 लड़के-लड़कियों को ट्रेन करती हैं.

वीजे बानी जे
‘बिग बॉस 10’ की सेलेब्रिटी कंटेस्टेंरट वीजे बानी जे को तो आप जानते ही होंगे. बानी जे का असली नाम गुरबानी जज है. वह रियलिटी शो ‘रोडीज’ का हिस्सा रह चुकी है, उनके शरीर पर बहुत सारे टैटू हैं. साथ ही वर्कआउट के प्रति दीवानी बानी के सिक्स पैक ऐब्स भी हैं. बानी मॉडल, एंकर और एमटीवी की जानी-मानी वीजे हैं. बानी अपने सिक्स पैक ऐब्स से महिलाओं की मस्कुलर बॉडी की आलोचना करने वालों  को  करारा जवाब दे रही हैं .भारत में महिलाओं के लिए स्लिम ट्रिम होना अच्छा माना जाता है लेकिन अगर वह ज्यादा पतला, ज्यादा मोटा या फिर मस्कुलर हो तो लोग ताने मारने लगते हैं. उन्हें मोटा, फैटी ,एक्स्ट्रा लार्ज जैसे नामों से बुलाते हैं. फिटनेस  बानी का जुनून है और उनका ये जुनून उनकी पर्सनैलिटी में झलकता है. इंडस्ट्री में ऐसी मॉडल और एक्ट्रेस कम ही देखने को मिलती हैं जो बानी के फिटनेस लेवल को छूती हैं.

जवां दिखने का कारगर तरीका स्ट्रेंथ ट्रेनिंग
स्ट्रेंथ ट्रेनिंग से शरीर और मन मजबूत बनता है. बॉडी का पोश्चर ठीक होता है, ब्लड फ्लो सही रहता है और साथ भावनात्मक स्थितियों का सामना करने की क्षमता भी बढ़ती है. वेट ट्रेनिंग के जरिए आप ना सिर्फ अपने वजन को कंट्रोल कर सकते हैं, बल्कि आपके मसल्स भी बढ़ती उम्र के बावजूद टोन्ड रहेंगे. अच्छी फिगर पाने के लिए महिलाओं के लिए सही वेट ट्रेनिंग बेहद जरूरी है. वे लोग जो यह मानते हैं कि महिलाओं को पुरुषों से अलग तरीके से वेट ट्रेनिंग करनी चाहिए क्योंकि पुरुषों की तरह  वेट ट्रेनिंग करने से उन के महिला होने के गुण कम हो जाएंगे. यह सोच बिलकुल गलत है  क्योंकि अगर कोई महिला ठीक वैसी ही कसरत या वेट ट्रेनिंग करे जैसे कोई पुरुष कर रहा है तो भी उसके मसल्स या शरीर  पुरुष जैसा  नहीं बनेगा क्योंकि इतनी एक्सरसाइज के बाद भी महिलाओं में टेस्टोसटेरोन का लेवल बहुत नहीं बढ़ पाता जबकि पुरुषों का बढ़ जाता है.

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मैट्रो के साथ बहुमंजिली सड़कें भी हैं जरूरी

शहरों की बढ़ती भीड़ को नियंत्रित करने के लिए मैट्रो रेल सेवाओं का बड़ा जाल बिछाया जा रहा है. यह  ठीक है पर ट्रैफिक की समस्या को यह न तो निजात देगा न हरेक वर्ग के लिए, हर समय के लिए उपयुक्त है. अपना वाहन सदियों से मानव का सही सहारा रहा है और अपना घोड़ा, गधा या रथ अथवा घोड़ागाड़ी सदियों से सफल संपन्न लोगों की ताकत रहे हैं.

इस तरह के लोग अगर मैट्रो, बस, टैक्सी न लें तो इस के लिए उन्हें दोष देना गलत है. उन्हें उन की चाही सुविधा दें चाहे, उस की कीमत लें.

मैट्रो के साथसाथ बहुमंजिली सड़कें बनाना भी अब जरूरी हो गया है. जैसेजैसे शहर ऊंचे हो रहे हैं यानी 20-30-50 मंजिले मकान बन रहे हैं, वैसे ही बहुमंजिली सड़कें 4-5-6 मंजिली बननी चाहिए. बहुत जगह बन रही हैं और 2-3 लैवल अब आम होने लगे हैं. अब सरकारों को 4-5 मंजिली लंबी सड़कों के बनाने पर विचार करना होगा.

जैसी बहुमंजिली पार्किंग बन रही हैं और ये शहरों के लिए विलासिता नहीं, आवश्यकता हो गई हैं, वैसी ही बहुमंजिली सड़कें भी बनानी होंगी.

ज्यादा गाडि़यां ज्यादा प्रदूषण जरूर फैला सकती हैं पर यदि ट्रैफिक के लिए रुकना न पड़े तो कम धुआं बरबाद कर के भी लंबी यात्रा की जा सकती है. ये सड़कें टोल सड़कें यानी जब इस्तेमाल करो तब पैसा दो के आधार पर भी बनाई जा सकती हैं और कर लगा कर पैसा वसूल करने के आधार पर भी.

मैट्रो पर भरोसा ठीक है पर कारें आज के आधुनिक समाज के लिए आवश्यक हैं. उन से बचा नहीं जा सकता.

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औपरेशन सी रिवर ऐसे हुआ कामयाब

गणतंत्र दिवस पर दिल्ली पुलिस की व्यस्तता बढ़ जाना स्वाभाविक होता है, कारण इस अवसर पर दिल्ली आने वाले वीआईपी विदेशी मेहमानों, वीवीआईपी और वीआईपी की सुरक्षा की जिम्मेदारी तो दिल्ली पुलिस को संभालनी ही होती है, साथ ही आतंकवादी गतिविधियों का खतरा अलग से बना रहता है.

इस बार तो इस मौके पर आसियान सम्मेलन भी था. बहरहाल, कहने का अभिप्राय यह है कि 26 जनवरी को होने वाले गणतंत्र दिवस के आयोजन की वजह से दिल्ली पुलिस स्थानीय नागरिकों की तरफ ज्यादा ध्यान नहीं दे पाती. ऐसे में कई बार ऐसी वारदातें हो जाती हैं, जो पीडि़तों के लिए तो दुखदायी होती ही हैं, पुलिस के लिए भी परेशानियां खड़ी कर देती हैं.

ऐसी ही एक वारदात गणतंत्र दिवस से एक दिन पहले यानी बीती 25 जनवरी को पूर्वी दिल्ली के जीटीबी इनक्लेव में घटी. समय था सुबह के साढ़े 7 बजे का. विवेकानंद स्कूल की बस छोटे बच्चों को ले कर स्कूल जा रही थी. इसी बस में कृष्णा मार्ग, न्यू मौडर्न कालोनी, शाहदरा निवासी करोड़पति व्यवसाई सन्नी गुप्ता का 5 वर्षीय बेटा और 7 साल की बेटी भी थे, जो शिवम डेंटल क्लीनिक के सामने से बस में बैठे थे.

विवेकानंद स्कूल की यह बस बच्चों को लेते हुए जब इहबास इलाके में एक बच्चे को लेने के लिए रुकी थी, तभी मोटरसाइकिल पर 2 युवक आए और बाइक खड़ी कर के हेलमेट पहने बस में चढ़ने लगे.

बस के गेट के पास खड़ी मेड ने उन्हें रोकने की कोशिश की तो उन में से एक युवक ने गाली देते हुए उसे साइड कर दिया. ड्राइवर नरेश थापा ने उन्हें टोका तो एक युवक ने उस के पैर में गोली मार दी. यह देख सारे बच्चे घबरा गए. तभी एक युवक ने आवाज दी, ‘‘विहान.’’

विहान पीछे की सीट पर अपनी बहन के साथ बैठा था, अपना नाम सुन कर वह खड़ा हो गया. युवक ने उसे गोद में उठा लिया और बस से उतरने लगा. बच्चे रोने लगे तो उस ने धमकी दी, ‘‘कोई भी रोया तो गोली मार दूंगा.’’ उस समय बस में 22 बच्चे थे.

अगले ही कुछ पलों में दोनों युवक विहान को ले कर मोटरसाइकिल से भाग निकले. जहां वारदात हुई, वह जगह सुनसान थी. जब तक लोग वहां पहुंचे, तब तक दोनों युवक आनंद विहार की ओर निकल गए. लोगों ने घायल ड्राइवर को जीटीबी अस्पताल पहुंचाया. फोन कर के स्कूल से दूसरी बस मंगवाई गई. साथ ही पुलिस को भी सूचना दे दी गई. विहान की बहन से नंबर ले कर उस के घर भी फोन किया गया.

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विहान के मातापिता और अन्य घर वाले तत्काल घटनास्थल पर पहुंच गए. उन का बुरा हाल था. थाना जीटीबी इनक्लेव से पुलिस भी आ गई थी. पुलिस ने विहान के अपहरण की सूचना दर्ज कर के तफ्तीश शुरू कर दी. पुलिस 3 दिनों तक हर तरह से कोशिश करती रही, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला.

स्थानीय पुलिस की जांच के साथ जिला पुलिस का स्पैशल स्टाफ भी अपहर्त्ताओं की खोज में लगा था. पुलिस ने जिले के 125 मुखबिरों को अपराधियों की गतिविधियों का पता लगाने की जिम्मेदारी अलग से सौंप रखी थी.

तेजतर्रार पुलिस अधिकारियों को दी जिम्मेदारी

जब थाना पुलिस और स्पैशल स्टाफ कुछ नहीं कर सका तो 28 जनवरी को विहान के अपहरण का मामला क्राइम ब्रांच को सौंप दिया गया. जौइंट पुलिस कमिश्नर आलोक कुमार ने अपने अधीनस्थ क्राइम ब्रांच के डीसीपी डा. जी. रामगोपाल नाइक को एक पुलिस टीम गठित कर के जल्द से जल्द मामले को सुलझाने को कहा.

डा. नाइक अपहरण मामलों के एक्सपर्ट हैं. वह विशाखापट्टनम के एक मशहूर व्यापारी के बेटे को सकुशल रिहा कराने के बाद चर्चा में आए थे. उन्होंने करीब 500 पुलिसकर्मियों की टीम को लीड करते हुए बच्चे को सकुशल बरामद किया था, इसलिए संयुक्त आयुक्त आलोक कुमार ने विहान के केस की जिम्मेदारी इन्हें सौंपी.

डीसीपी डा. जी. रामगोपाल नाइक ने क्राइम ब्रांच के एसीपी ईश्वर सिंह और इंसपेक्टर विनय त्यागी के साथ मीटिंग कर के रणनीति तैयार की कि बच्चे को सहीसलामत कैसे बरामद किया जाए. ईश्वर सिंह और विनय त्यागी दोनों ही बड़ेबड़े मामलों को सुलझाने में माहिर रहे हैं.

ईश्वर सिंह ने सन 2000 में क्रिकेट मैच फिक्सिंग के मामले को उजागर किया था, जिस में दक्षिण अफ्रीका क्रिकेट टीम के कैप्टन हैंसी क्रोनिए सहित दरजनों लोग शामिल थे. इस के अलावा इन्होंने किडनैपिंग के भी दरजनों मामले सुलझाए थे.

जबकि इंसपेक्टर विनय त्यागी एनकाउंटर स्पैशलिस्ट रहे राजबीर सिंह की टीम का हिस्सा तो थे ही, उन्होंने 1999 में हुए मशहूर कार्टूनिस्ट इरफान हुसैन के मर्डर की गुत्थी सुलझा कर हत्यारों को भी गिरफ्तार किया था. इस के साथ ही विनय त्यागी ने ‘इंडियाज मोस्ट वांटेड’ सीरियल के निर्माता और एंकर सुहेब इलियासी को भी पत्नी के कत्ल के मामले में गिरफ्तार किया था.

बच्चे का पता लगाने और उसे सहीसलामत बचाने की जिम्मेदारी मिलते ही ईश्वर सिंह और विनय त्यागी ने करीब 50 लोगों की टीम गठित की, जिस में सबइंसपेक्टर अर्जुन, दिनेश, हवा सिंह, सुशील, एएसआई राजकुमार, मोहम्मद सलीम, हवलदार शशिकांत और श्यामलाल को शामिल किया गया. इस औपरेशन को नाम दिया गया ‘सी रिवर’.

60 लाख की मांगी फिरौती

28 जनवरी को क्राइम ब्रांच को केस सौंपा गया और उसी दिन अपहृत विहान के पिता सन्नी गुप्ता के फोन पर फोन कर के लड़की की आवाज में 60 लाख रुपए की फिरौती मांगी गई. इतना ही नहीं, अपहर्त्ताओं ने वाट्सऐप काल कर के बच्चे से बात भी कराई. इस वाट्सऐप काल में एक अपहर्त्ता का चेहरा भी नजर आया, पर उसे पहचाना नहीं जा सका.

अपहर्त्ताओं ने फिरौती की रकम देने के लिए विहान के घर वालों से 4 फरवरी को दिल्ली से कड़कड़डूमा क्षेत्र स्थित क्रौस रिवर मौल आने को कहा था. साथ ही उन्होंने यह भी चेतावनी दी थी कि पुलिस के चक्कर में न पड़ें वरना बच्चे को नुकसान हो सकता है. पीडि़त परिवार चाहता था कि किसी भी तरह उन का बच्चा सुरक्षित मिल जाए. वह फिरौती की रकम देने को तैयार थे.

परिजनों ने यह बात पुलिस को बता दी थी, इस पर पुलिस अधिकारियों ने अपहर्त्ताओं को घेरने की पूरी योजना बना ली. चूंकि अपहर्त्ताओं ने पैसे ले कर क्रौस रिवर मौल बुलाया था, इसलिए पुलिस ने इस औपरेशन का नाम रखा ‘सी रिवर’. पुलिस टीम इस मौल के आसपास तैनात हो गई. विहान के पिता को एक बैग में नोट के आकार की कागज की गड्डियां भर कर भेजा गया पर अपहर्त्ता वहां नहीं पहुंचे. शायद उन्हें वहां पुलिस के मौजूद होने का शक हो गया था.

अपहरण के मामले बड़े ही संवेदनशील होते हैं. ऐसे मामलों में पुलिस की पहली प्राथमिकता अपहृत व्यक्ति को सहीसलामत बरामद करने की होती है. इस के बाद अपहर्त्ताओं को गिरफ्तार करने की सोची जाती है. अपहर्त्ताओं के फिरौती की रकम न लेने आने के बाद पुलिस पता लगाने की कोशिश करने लगी कि बच्चे का अपहर्त्ता कौन हो सकता है.

इस से पहले थाना पुलिस की 6 टीमें पीडि़त परिवार, बस चालक, मेड, पड़ोसियों और बस में मौजूद बच्चों से पूछताछ कर चुकी थीं. थाना पुलिस ने 3 संदिग्ध लोगों की तलाश में नोएडा में भी छापेमारी की थी, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला. इस के बाद ही यह मामला क्राइम ब्रांच को सौंपा गया था. इस की एक वजह यह भी थी कि क्राइम ब्रांच के पास पर्याप्त तकनीकी संसाधन होते हैं.

क्राइम ब्रांच भी यह बात मान कर चल रही थी कि बच्चे के अपहरण में किसी नजदीकी का हाथ हो सकता है, क्योंकि विहान के पिता ने हाल ही में किसी प्रौपर्टी का सौदा किया था, जिस की रकम उन के घर में मौजूद थी. यह बात उन के किसी करीबी को ही पता हो सकती थी, इसलिए पुलिस किसी नजदीकी पर शक कर रही थी.

क्राइम ब्रांच ने शुरू की अपने तरीके से जांच

पुलिस ने परिवार के सभी सदस्यों सहित वर्तमान नौकरों, पूर्व नौकरों व ऐसे लोगों का ब्यौरा बनाया, जिन्हें बच्चे के व्यापारी पिता सन्नी गुप्ता की उच्च आर्थिक स्थिति की जानकारी थी. पुलिस ने ऐसे 200 लोगों की एक लिस्ट बनाई, जिन से पूछताछ की जा सके. इस के अलावा ऐसे मामलों में शामिल रहे बदमाशों का ब्यौरा भी डोजियर सेल से निकलवाया गया. उन में से जो बदमाश जेल से बाहर थे, उन में से ज्यादातर को हिरासत में ले कर पूछताछ की गई, पर कोई नतीजा नहीं निकला.

विहान को ले कर घर के सभी लोग चिंतित थे. उस की मां शिखा का तो रोरो कर बुरा हाल था. रोतेरोते उन की आंखें सूज गई थीं. चूंकि विहान के पिता एक व्यापारी थे, इसलिए व्यापारी वर्ग भी इस बात को ले कर आक्रोश में था. बच्चे की शीघ्र बरामदगी के लिए व्यापारियों ने विरोध प्रदर्शन भी किया.

अपहर्त्ताओं ने पीडि़त परिवार को 2 वीडियो और 6 फोटो भेजे थे, जिन्हें देख कर पूरा परिवार डर गया था. जो वीडियो भेजे थे, उन में विहान ‘पापा, आई लव यू’ बोल रहा था. वह कह रहा था, ‘डैडी, आप मुझे लेने आ जाओ. मुझे आप की बहुत याद आ रही है.’ परिवार वाले उन वीडियो को बारबार देखते थे. विहान की चिंता में घर वालों की नींद उड़ी हुई थी.

पुलिस ने शाहदरा, इहबास, मंडोली रोड के करीब 2500 सीसीटीवी कैमरों की सूची बनाई, जिन में से 250 सीसीटीवी कैमरों की फुटेज खंगाली भी गई. आखिर में साहिबाबाद बौर्डर पर लगे एक सीसीटीवी कैमरे की फुटेज में बदमाश मोटरसाइकिल पर बच्चे को ले जाते दिखाई दिए. इस फुटेज से एक बदमाश की पहचान भी हुई.

दूसरी ओर डीसीपी जौय टिर्की और एसीपी संदीप लांबा की टेक्निकल टीम ने सर्विलांस, मोबाइल ट्रैकर से 35 टावरों के करीब 3 लाख नंबरों की जांच की.

3 लाख नंबरों में मिला अपहर्त्ता का नंबर

पुलिस टीम 3 लाख नंबरों की जांच करती रही. डंप डाटा में उसे 4 लोकेशन पर एक फोन नंबर कौमन मिला. उस फोन नंबर को सर्विलांस पर लगा दिया गया. जांच में पता चला कि वह फोन नंबर नितिन शर्मा का है. पुलिस ने उस नंबर पर आने वाली काल्स को रिकौर्ड करना शुरू कर दिया. इस से यह जानकारी मिली कि फोनधारक कोड में बात करता है. इस से उस पर पुलिस का शक और बढ़ गया.

फोन सर्विलांस पर लगाने के बाद इस बात की पुष्टि तो हो गई थी कि फोनधारक का नाम नितिन शर्मा है, पर वह रहता कहां है, यह पता नहीं लग सका. क्योंकि जिस आईडी से उस ने फोन का सिमकार्ड लिया था, वह फरजी पाई गई. इतनी बड़ी दिल्ली में उस का पता लगाना आसान नहीं था.

इंसपेक्टर विनय त्यागी ने सबइंसपेक्टर अर्जुन सिंह, हवा सिंह, दिनेश, सुशील, एएसआई राजकुमार, मोहम्मद सलीम, हैडकांस्टेबल श्यामलाल व शशिकांत को जिम्मेदारी दी कि वह मुखबिरों से मिलने वाली जानकारी की पड़ताल करें.

पुलिस ने पूरी दिल्ली में मुखबिरों का जाल बिछा रखा था. सभी मुखबिरों को एक अपहर्त्ता का वह फोटो दे दिया गया, जिस में उस ने पीडि़त परिवार से व्हाट्सऐप पर बात की थी. वह फोटो साफ नहीं था. मुखबिरों के अलावा उस फोटो की एकएक कौफी पूर्वी दिल्ली और उत्तरपूर्वी दिल्ली के सभी बीट अफसरों को भी दे दी गई ताकि वे अपनेअपने क्षेत्र के लोगों को फोटो दिखा कर जानकारी हासिल कर सकें.

जांच टीम में जितने भी पुलिसकर्मी थे, सभी रातदिन एक किए हुए थे. इन में से कुछ पुलिसकर्मियों के परिवार में शादी थी, इस के लिए उन्होंने छुट्टी भी ले रखी थी, पर केस की  संवेदनशीलता को देखते हुए वे छुट्टी पर नहीं गए. सभी की पहली प्राथमिकता केस को हल करने की थी. जौइंट सीपी आलोक कुमार जांच में जुटी सभी टीमों से संपर्क बनाए हुए थे. हर अपडेट वह पुलिस आयुक्त अमूल्य पटनायक को दे रहे थे.

उधर पीडि़त परिवार के पास अपहर्त्ताओं की तरफ से फिरौती की और कोई काल नहीं आई. मामला मीडिया में ज्यादा हाईलाइट हो चुका था, इसलिए अपहर्त्ता शायद चौकस हो गए थे. ऐसे में पुलिस को इस बात की आशंका थी कि कहीं अपहर्त्ता बच्चे को नुकसान न पहुंचा दें.

इसी दौरान एक मुखबिर ने उस धुंधले फोटो को पहचान लिया. उस ने बताया कि वह नितिन शर्मा है जो गोकुलपुरी में रहता है. यह जानकारी पुलिस के लिए महत्त्वपूर्ण थी. मुखबिर द्वारा नितिन के घर का पता भी मिल गया था. लेकिन पुलिस अधिकारियों ने अपहृत विहान की सुरक्षा को देखते हुए नितिन के घर दबिश देना जरूरी नहीं समझा.

उधर सर्विलांस टीम नितिन के फोन पर होने वाली बातचीत पर नजर रखे हुए थी. तभी सर्विलांस टीम को पता चला कि नितिन सोमवार की रात को दिल्ली में होने वाले एक शादी समारोह में आ रहा है. मुखबिर द्वारा पुलिस को उस की स्विफ्ट कार का नंबर भी मिल गया था. पुलिस टीम ने मोबाइल लोकेशन के आधार पर उस का पीछा करना शुरू कर दिया. 5 फरवरी, 2018 की रात करीब साढ़े 11 बजे नितिन की कार सीमापुरी में कम्युनिटी ब्लौक के पास रुकी तो क्राइम ब्रांच की टीम ने उसे हिरासत में ले लिया.

हिरासत में लेते ही पुलिस ने सब से पहले उस से विहान के बारे में पूछा. नितिन ने बताया कि विहान सुरक्षित है. उसे बी-505 इबोनी अपार्टमेंट, शालीमार सिटी, साहिबाबाद में रखा गया है. जौइंट सीपी आलोक कुमार ने उसी समय डीसीपी जी. रामगोपाल नाइक के नेतृत्व में 16 सदस्यीय एक टीम नितिन के साथ शालीमार सिटी भेज दी. रात एक बजे टीम 5वीं मंजिल स्थित उस फ्लैट पर पहुंच गई.

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बदमाशों ने कर दिया पुलिस को घायल

उस फ्लैट में अंदर की तरफ लकड़ी का दरवाजा था और बाहर लोहे की जाली वाला. पुलिस के सामने नितिन ने कोड में 3 बार दरवाजा खटखटाया. एक बदमाश ने जैसे ही लकड़ी वाला दरवाजा खोला तो अपने साथी नितिन को हथियारबंद पुलिस के बीच देख वह घबरा गया. तभी इंसपेक्टर विनय त्यागी ने कहा, ‘‘बच्चा पुलिस के हवाले कर दो, इसी में तुम्हारी भलाई है.’’

इंसपेक्टर विनय त्यागी दरवाजे के एकदम सामने थे. उन के बराबर में कमांडो कुलदीप था. उन के पीछे 6 अन्य पुलिसकर्मी एके 47 के साथ पोजीशन लिए खड़े थे. इंसपेक्टर त्यागी के ललकारने पर बदमाश ने फ्लैट के अंदर से कहा, ‘‘आप लोग यहां से चले जाओ वरना बच्चे की जान को खतरा हो सकता है.’’

इसी बीच लकड़ी का दरवाजा खोल कर बदमाश ने पुलिस पर फायरिंग कर दी. उस की एक गोली इंसपेक्टर विनय त्यागी और एक गोली कमांडो कुलदीप को लगी.

जवाब में पुलिस ने भी फायरिंग की. गोली लगने से एक बदमाश वहीं गिर गया, जबकि दूसरा लंगड़ाते हुए अंदर की तरफ भागा. उस के पैर में गोली लगी थी. बदमाशों की ओर से 5 राउंड फायरिंग की गई थी. गोली चलने से बाहर के लोहे वाले दरवाजे पर लगी जाली ढीली पड़ गई थी. फ्लैट के अंदर कोई हलचल न देख कर पुलिस ने ढीली पड़ चुकी लोहे की जाली को खींच कर मोड़ दिया और फिर अंदर हाथ डाल कर दरवाजे की सिटकनी खोल दी.

पोजीशन लेते हुए पुलिस फ्लैट में दाखिल हो गई. एक बदमाश फर्श पर पड़ा था, उस के सीने पर गोली लगी थी. उस की मौत हो चुकी थी. दूसरे बदमाश को भी पुलिस ने हिरासत में ले लिया. वह किचन में जा कर छिप गया था.

बच्चा छिपा बैठा था बैड के पीछे

जिस घायल बदमाश को हिरासत में लिया था, उस ने अपना नाम पंकज बताया और जिस बदमाश की मौत हुई थी, उस का नाम रवि था. पंकज को हिरासत में लेते ही डीसीपी डा. जी. रामगोपाल नाइक बच्चे को फ्लैट में ढूंढने लगे. वह बैड के पास छिपा मिला. बच्चा सहमा हुआ बैठा था.

डीसीपी ने विहान से कहा, ‘‘बेटा, मैं आप का चाचा हूं और पुलिस में हूं. आप को डैडी के पास ले जाने के लिए आया हूं.’’

यह कहते ही डीसीपी नाइक ने डरेसहमे विहान को गोद में उठा लिया, बच्चा उन से लिपट गया. विहान को सहीसलामत पा कर सभी ने राहत की सांस ली.

डीसीपी डा. नाइक ने अपहृत हुए विहान को सहीसलामत बरामद करने की सूचना संयुक्त आयुक्त आलोक कुमार को देते हुए कहा कि सर औपरेशन ‘सी रिवर’ सक्सेसफुल. यह खबर मिलते ही आलोक कुमार खुश होते हुए बोले, ‘‘वैल डन.’’

पुलिस को अपहरण का यह केस खोलने में भले ही 12 दिन लग गए लेकिन इस में सब से बड़ी सफलता यह रही कि विहान को पुलिस ने सहीसलामत बरामद कर लिया और अपहर्त्ता भी पकड़े गए.

5 वर्षीय विहान को बरामद करने के बाद पुलिस डाक्टरी जांच के लिए उसे जीटीबी अस्पताल ले गई. डाक्टरों ने विहान के कई तरह के टेस्ट किए. उधर डीसीपी ने रात 1 बज कर 5 मिनट पर विहान के दादा अशोक गुप्ता को फोन किया, ‘‘मैं डीसीपी राम नाइक बोल रहा हूं. बच्चा मिल गया है.’’

यह सूचना पाते ही अशोक गुप्ता चहक उठे. उन्होंने तुरंत अपने बेटे सन्नी और बहू शिखा को बताया तो उन के चेहरे खिल गए. मारे खुशी के शिखा की आंखों में आंसू भर आए. इस के बाद शिखा ने उसी समय यह जानकारी अपने मायके वालों को दे दी. घर के सभी लोग जीटीबी अस्पताल पहुंच गए. शिखा ने बेटे को देखते ही उसे उठा कर सीने से चिपका लिया.

विहान भी मां की गोद में आ कर खूब रोया. रोते हुए वह बोला, ‘‘अंकल और आंटी बहुत गंदे थे. अंकल शराब पीते थे. एक दिन उन्होंने मुझे थप्पड़ भी मारा था.’’

औपरेशन सी रिवर में एक अपहर्त्ता रवि मारा गया था, जबकि नितिन शर्मा और पंकज गिरफ्तार किए जा चुके थे. पंकज घायल हो गया था. पुलिस ने उसे जीटीबी अस्पताल में भरती करा दिया था. 7 फरवरी, 2018 को उसे अस्पताल से छुट्टी मिल गई. पुलिस ने दोनों बदमाशों से विहान अपहरण के बारे में पूछताछ की तो चौंकाने वाली जानकारी मिली. पता चला कि इन बदमाशों ने उस के अपहरण की साजिश 6 महीने पहले रची थी.

मास्टरमाइंड निकला नितिन शर्मा

इस पूरे मामले का मास्टरमाइंड 28 वर्षीय नितिन कुमार शर्मा था, जो उत्तरपूर्वी दिल्ली के गोकुलपुरी का रहने वाला था. संस्थागत रूप से उस ने 10वीं तक पढ़ाई की थी. इस के बाद वह ओपन स्कूल से 12वीं की पढ़ाई कर रहा था. उसे बनठन कर रहने का शौक था. घर वाले कब तक उस के शौक पूरा करते, लिहाजा वह यारदोस्तों से पैसे ले कर अपने खर्चे पूरे करने लगा.

नितिन के पिता ममराज पिछले 30 सालों से ढाबा चला रहे थे. जब नितिन पर कर्ज बढ़ने लगा तो वह अपने पिता के ढाबे पर बैठने लगा. कई साल पहले ममराज परिवार से अलग हो गए तो नितिन अपने भाई नवीन के साथ ढाबा चलाने लगा. नवीन अपनी मां के साथ यमुना विहार में रहता था, जबकि नितिन पत्नी के साथ गोकुलपुरी में.

ढाबे का काम जम गया तो अच्छी आमदनी होने लगी. नितिन धीरेधीरे लोगों का कर्ज चुकाने लगा. करीब एक साल से उस के ढाबे पर गोकुलपुरी का रहने वाला पंकज भी काम करने लगा था. 21 साल का पंकज दिन में उस के ढाबे पर काम करता और कभी शादीपार्टी वगैरह में उसे वेटर का काम मिल जाता तो रात में वह वेटर का काम भी कर लेता था.

वेटर का काम उसे गोकुलपुरी के ही रहने वाले रवि के पिता के सहयोग से मिलता था. उस के पिता वेटर सप्लाई का काम करते थे. इस तरह रवि से भी उस की दोस्ती हो गई थी. पंकज नितिन का अच्छा दोस्त था. बाद में उस की रवि से भी दोस्ती हो गई थी. ढाबे से नितिन को अच्छी कमाई हो ही रही थी. उस कमाई को नितिन अपने दोस्तों के साथ पार्टी में खर्च कर देता था. इस के अलावा नितिन की कई गर्लफ्रैंड थीं, उन पर भी वह खूब खर्च करता था.

अंधाधुंध खर्च करने की वजह से नितिन पर कर्ज और बढ़ने लगा. बाद में उस के पास लोग तगादे के लिए आने लगे. उन से बचने के लिए वह पूरे समय ढाबे पर भी नहीं बैठ पाता था, जिस से उस की आमदनी दिनोंदिन कम होती गई. एक दिन नितिन ने अपने दोस्तों पंकज और रवि के साथ बात की कि आमदनी कैसे बढ़ाई जाए. दोनों दोस्तों ने अलगअलग सुझाव दिए, जो नितिन को पसंद नहीं आए.

सोचसमझ कर किया विहान को टारगेट

नितिन कोई ऐसा काम करना चाह रहा था, जिस से एक ही झटके में उसे इतनी कमाई हो जाए जिस से कर्ज चुकाने के बाद बचे पैसों से वह कोई ढंग का बिजनैस शुरू कर सके. इस पर पंकज ने किसी अमीर घर के बच्चे का अपहरण करने का सुझाव दिया. पंकज का यह सुझाव नितिन की समझ में आ गया. इस के बाद वे ऐसी आसामी के बारे में सोचने लगे, जिस के बच्चे का अपहरण कर के फिरौती में 50-60 लाख रुपए लिए जा सकें.

नितिन अपने ढाबे का सामान अशोक गुप्ता की दुकान से लाता था, जो न्यू मौडर्न शाहदरा की गली नंबर-3 में रहते थे. वह अशोक गुप्ता के पूरे परिवार को अच्छी तरह जानता था. गुप्ता परिवार आर्थिक रूप से संपन्न था. उन के पोतेपोती दोनों स्कूल जाते थे.

दोनों बच्चे विवेकानंद स्कूल में पढ़ते थे. स्कूल की बस दोनों बच्चों को लेने आती थी. तीनों ने अशोक के 4 साल के पोते विहान का अपहरण करने का इरादा बना लिया. इस से पहले कि वे योजना को अंजाम देते, दिसंबर, 2017 में पंकज गाड़ी चोरी के एक मामले में जेल चला गया.

करीब 10 दिन बाद पंकज जमानत पर जेल से बाहर आया, तब तक नितिन ने सारी प्लानिंग कर ली थी कि कहां से बच्चे को उठाना है और अपहरण के बाद उसे कहां रखना है.

नितिन ने करीब 6 महीने पहले शालीमार सिटी के इबोनी अपार्टमेंट में एक फ्लैट साढ़े 10 हजार रुपए महीने के किराए पर ले लिया था. उसी फ्लैट पर वह दोस्तों के साथ अय्याशी करता था. यह फ्लैट पटपड़गंज स्थित तरंग अपार्टमेंट में रहने वाली सुशीला का था. नितिन ने फ्लैट मालकिन को बताया था कि उस का गांधीनगर में रेडीमेड गारमेंट का कारोबार है.

इलाके की अच्छी तरह रैकी करने के बाद 25 जनवरी, 2018 को रवि और पंकज वारदात को अंजाम देने के लिए निकले. नियत समय पर विहान स्कूल बस में अपनी 7 साल की बहन के पास बैठ गया. उस समय स्कूल बस शिवम डेंटल क्लीनिक के पास खड़ी थी. रवि और पंकज मोटरसाइकिल द्वारा बस के पास पहुंच गए, लेकिन वहां भीड़भाड होने की वजह से उन्होंने वारदात को अंजाम नहीं दिया.

स्कूल बस को अगले पिकअप पौइंट से और बच्चे लेने थे. जैसे ही बस उस स्टाप पर पहुंची तो विहान का अपहरण करने के लिए उन्होंने बस के पास अपनी बाइक रोक दी. लेकिन इस से पहले कि वे कुछ कर पाते, बस वहां से निकल गई. बस के अगले स्टाप पर बच्चे को किडनैप करने के लिए जैसे ही वे आगे बढ़े, उसी समय राह चलते कुछ लोग बीच में आ गए. तब तक स्कूल बस आगे निकल गई.

इस के बाद स्कूल बस दिलशाद गार्डन सी ब्लौक फ्लैटों के पीछे के गेट के सामने रुकी. इस के सामने इहबास अस्पताल का गेट नंबर-1 है. रवि और पंकज बाइक से पीछा करते हुए वहां पहुंच गए. दहशत फैलाने के लिए उन्होंने बस के ड्राइवर नरेश थापा के पैर में गोली मारी. इस के बाद उन्होंने बस के गेट पर खड़ी आया को धक्का दे दिया. तभी उन्होंने गेट से ही विहान को आवाज लगाई तो विहान अपनी सीट से खड़ा हो गया. रवि और पंकज ने विहान को उठा कर अपनी बाइक पर बैठा लिया.

मोटरसाइकिल पर विहान को बीच में बैठा कर वे आनंदविहार होते हुए शालीमार सिटी, साहिबाबाद स्थित उसी फ्लैट पर ले गए जो नितिन ने 6 महीने पहले किराए पर लिया था. नितिन उन का फ्लैट पर ही इंतजार कर रहा था.

वहां ले जा कर उन्होंने विहान को इतना डराधमका दिया, जिस से वह सहमा हुआ रहे. उन का इरादा बच्चे को कोई नुकसान पहुंचाना नहीं था. वह तो किसी तरह उस के घर वालों से फिरौती वसूलना चाहते थे.

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चोरी के फोन से मांगी थी फिरौती

तीनों बदमाशों का वैसे तो पुराना आपराधिक रिकौर्ड नहीं है, लेकिन वे थे बहुत शातिर. मोबाइल लोकेशन से वह पुलिस के हत्थे न चढ़ें, इसलिए उन्होंने वहां से 10 किलोमीटर दूर जा कर फिरौती की काल की थी. जिन मोबाइल फोनों से वे बातें करते थे, वह चोरी के थे. पंकज लड़की की आवाज निकालने में माहिर था, इसलिए विहान के घर वालों से वही बात करता था.

जिस फ्लैट में बच्चे को रखा गया था, वहां रात को केवल एक बदमाश बच्चे के साथ सोता था और 2 रात भर जागते हुए चौकस रहते थे. उन्होंने योजना तो फूलप्रूफ बनाई थी लेकिन मामला क्राइम ब्रांच के हाथ में पहुंचते ही उन के अरमानों पर पानी फिर गया. इस चक्कर में उन के साथी रवि को तो अपनी जान से हाथ धोना पड़ा.

पुलिस ने अपहर्त्ता पंकज और नितिन कुमार शर्मा से विस्तार से पूछताछ के बाद उन की निशानदेही पर 7.65 एमएम की 2 पिस्टल और मैगजीन बरामद कर लीं. दोनों को भादंवि की धारा 363, 307 और 25/27 आर्म्स एक्ट के तहत गिरफ्तार कर के कड़कड़डूमा न्यायालय में पेश किया गया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया.

बच्चे की हत्या कर 37 दिनों तक घर में रखे रहा लाश

विहान अपहरण मामले की तरह जनवरी, 2018 के पहले हफ्ते में उत्तरपश्चिमी दिल्ली के स्वरूपनगर इलाके से एक और बच्चे का फिरौती के लिए अपहरण कर लिया गया था, लेकिन इस मामले में अपहर्त्ता ने सब से पहले बच्चे की हत्या कर के लाश एक सूटकेस में भर ली. उस सूटकेस को वह 37 दिनों तक अपने कमरे में रखे रहा. बदबू न आए, इस के लिए वह कमरे में परफ्यूम छिड़कता रहता था. बच्चे की लाश बरामद होने के बाद जब सच्चाई सामने आई तो सभी हैरान रह गए.

उत्तरपश्चिमी दिल्ली के थाना स्वरूपनगर क्षेत्र के नत्थूपुरा में करण सिंह की परचून की दुकान थी. उन की दुकान अच्छी चलती थी, जिस से उन्हें ठीक आमदनी हो जाती थी. करण सिंह अपना पूरा ध्यान अपने परिवार और बिजनैस पर ही लगाते थे. परिवार में पत्नी के अलावा एक बेटा आशीष उर्फ आशू और एक बेटी थी. अपनी मेहनत की बदौलत उन्होंने अपनी एक दुकान से परचून की 3 दुकानें कर ली थीं. उन का परिवार हर तरह से खुशहाल था.

लेकिन 7 जनवरी, 2018 को उन के परिवार में जो हुआ, उसे करण सिंह पूरी जिंदगी नहीं भुला सकेंगे. दरअसल हुआ यह कि 7 जनवरी रविवार को 7 वर्षीय आशीष अपनी बुआ के बेटे के साथ घर के बाहर खेल रहा था. खेलकूद कर वह शाम 4 बजे घर लौट आया. घर पहुंच कर उस ने अपनी बड़ी बहन से कहा, ‘‘गुंजन दीदी, साढ़े 5 बज गए क्या?’’

‘‘क्यों, क्या कहीं जाना है?’’ गुंजन ने पूछा.

‘‘हां, मुझे अवधेश चाचा के पास जाना है. वह मुझे साइकिल दिलाएंगे.’’ आशू बोला.

आशू की इच्छा थी कि उस के पास एक इतनी छोटी साइकिल हो, जिसे वह आसानी से चला सके. मोहल्ले के बच्चे स्कूल से लौटने के बाद गली में जब साइकिल चलाते थे तो उस का मन भी साइकिल चलाने को करता था. इस बारे में उस ने अपनी मम्मी और पापा से कई बार कहा था लेकिन वह कोई न कोई बहाना बना कर टाल जाते थे.

ऐसा नहीं था कि करण सिंह की स्थिति  साइकिल दिलाने की नहीं थी, लेकिन वह यह सोच कर उसे साइकिल नहीं दिला रहे थे कि कहीं उन के लाडले को चोट न लग जाए.

लेकिन 7 जनवरी को जब उन के पड़ोसी और दूर के रिश्ते में आशीष के चाचा लगने वाले अवधेश ने जब उसे साइकिल दिलाने की बात कही तो आशू के मन में लालच आ गया.

बहन से कुछ देर बात करने के बाद आशू अपने घर से निकल गया. इस के बाद वह घर वापस नहीं लौटा. घर वालों ने आशू को इधरउधर ढूंढा, लेकिन उस का कोई पता नहीं चल सका. मोहल्ले के लोग भी उन के साथ बच्चे को ढूंढने में मदद करने लगे. जब वह नहीं मिला, तो करण सिंह अपने रिश्तेदार अवधेश के साथ थाना स्वरूपनगर पहुंच गए और आशू के गायब होने की बात थानाप्रभारी को बता दी.

थानाप्रभारी ने कोई लापरवाही न बरतते हुए उसी समय अज्ञात लोगों के खिलाफ अपहरण का केस दर्ज कर लिया और बच्चे के ढूंढने की काररवाई शुरू कर दी. बच्चे के गायब होने के 2 दिन बाद भी करण सिंह के पास फिरौती की कोई काल नहीं आई तो पुलिस को यही लगा कि किसी ने दुश्मनी में बच्चे का अपहरण किया है.

गली में लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज देखने पर पुलिस को पता लगा कि आशू अवधेश के घर के पास देखा गया था. उस के बाद उस की फुटेज नहीं दिखाई दी. तब पुलिस ने उस गली के 50 से ज्यादा घरों में तलाशी अभियान चलाया.

इतना ही नहीं, पुलिस ने छत पर रखी पानी की सभी टंकियां भी चैक कीं, पर बच्चे का कहीं पता नहीं चला.

इसी बीच पड़ोसियों को अवधेश के घर से अजीब सी दुर्गंध आती महसूस हुई. इस बारे में उस से पूछा गया तो वह बोला कि बदबू तो मुझे भी आती है. लगता है घर में कोई चूहा मर गया है. अगले दिन वह एक मरा हुआ चूहा घर के अंदर से निकाल कर ले आया. वही चूहा उस ने पड़ोसियों को दिखाते हुए कहा कि बदबू इसी से आ रही थी.

एक दिन करण की बेटी गुंजन ने घर वालों को बताया कि आशू साइकिल लेने के लिए अवधेश चाचा के यहां जाने की बात कह रहा था. सीसीटीवी फुटेज में भी आशू अवधेश के घर तक ही जाता दिखा था.

इन सब बातों से घर वालों को अवधेश पर शक होने लगा. अपना शक उन्होंने पुलिस से जाहिर किया तो पुलिस ने अवधेश से पूछताछ तक नहीं की. पुलिस का कहना यह था कि बिना किसी सबूत के उस के खिलाफ काररवाई नहीं कर सकते.

इस पर करण सिंह ने न्यायालय की शरण ली. कोर्ट के आदेश पर पुलिस सक्रिय हुई और बच्चा गुम होने के 38वें दिन अवधेश के घर की तलाशी ली. वहां एक सूटकेस से तेज बदबू आ रही थी.

जब उस सूटकेस को खुलवाया गया तो उस में आशू की लाश निकली जो पौलीथिन में लपेट कर रखी थी. पुलिस ने तुरंत अवधेश को हिरासत में ले लिया और सूचना डीसीपी असलम खान को दे दी. कुछ ही देर में डीसीपी और क्राइम इनवैस्टीगेशन टीम वहां पहुंच गई.

लोगों को जब पता चला कि करण सिंह के रिश्तेदार ने ही बच्चे की हत्या कर लाश अपने घर में छिपा रखी थी तो सैकड़ों लोग वहां एकत्र हो गए. सभी के मन में अवधेश के प्रति आक्रोश था. भीड़ के मूड को देखते हुए डीसीपी ने जिले के अन्य थानों की पुलिस भी वहां बुला ली ताकि स्थिति नियंत्रण में रहे.

पुलिस ने आननफानन में जरूरी कारवाई कर के बच्चे की सड़ी लाश को पोस्टमार्टम के लिए बाबू जगजीवनराम अस्पताल भेज दिया और अवधेश को पूछताछ के लिए थाने ले गई. पूछताछ में अवधेश ने आशू के अपहरण और हत्या करने की जो कहानी बताई, इस प्रकार थी—

अवधेश शाक्य मूलरूप से उत्तर प्रदेश के मैनपुरी जिले के कुरावली का रहने वाला था. उस के परिवार में मातापिता के अलावा 3 बहनें हैं.

वह सन 2010 में दिल्ली आया था. यहां रह कर वह सिविल सर्विस एग्जाम की तैयारी कर रहा था. 2 बार वह यह परीक्षा पास भी कर चुका था पर मुख्य परीक्षा में फेल हो गया था. इसी वजह से वह डिप्रेशन की हालत में चला गया.

बेरोजगार होने से उस पर लोगों का कर्ज भी चढ़ गया. कर्ज के साथसाथ उसे अपनी बहनों की शादी की चिंता भी खाए जा रही थी. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि वह ऐसा क्या करे, जिस से उस की आर्थिक हालत सुधरे.

तब उस के दिमाग में आया कि क्यों न वह अपने ही दूर के रिश्तेदार करण सिंह के बेटे का अपहरण कर ले. वह करण सिंह की हैसियत से वाकिफ था. उसे उम्मीद थी कि फिरौती में 18-20 लाख रुपए आसानी से मिल जाएंगे.

इस के बाद वह आशू के अपहरण की योजना बनाने लगा. इसी बीच उसे पता चला कि आशू अपने पिता से साइकिल की मांग कर रहा था लेकिन उन्होंने उसे साइकिल नहीं दिलवाई.

7 जनवरी को अवधेश ने आशू से कहा, ‘‘आशू, तुम्हें साइकिल चाहिए?’’

‘‘हां चाचा.’’ आशू खुश हो कर बोला.

‘‘ऐसा करो आज शाम साढ़े 5 बजे के बाद तुम मेरे कमरे पर आ जाना, मैं साइकिल खरीदवा दूंगा.’’ अवधेश ने लालच दिया.

‘‘ठीक है चाचा, मैं आ जाऊंगा.’’ कह कर आशू अपने घर चला गया था और उस ने यह बात अपनी बहन को बता दी थी.

साढ़े 5 बजे से पहले ही वह अवधेश के यहां चला गया. अवधेश आशू को अपने कमरे में ले गया और योजनानुसार गला घोंट कर उस की हत्या कर दी. इस के बाद उस ने आशू की लाश पौलीथिन में लपेट कर सूटकेस में बंद कर दी.

सूटकेस उस ने अपने कमरे में ही रख दिया. उस का इरादा लाश को कहीं बाहर ले जा कर ठिकाने लगाने का था. बाद में वह बच्चे के घर वालों से फिरौती मांगना चाहता था. आशू के घर वालों से अवधेश के पारिवारिक संबंध थे. वह उस के घर वालों के साथ आशू को ढूंढने का नाटक भी करता रहा. उसी ने घर वालों के साथ थाने जा कर रिपोर्ट लिखवाई. दूसरी तरफ उसे घर में रखी लाश को ठिकाने लगाने का मौका नहीं मिल पा रहा था क्योंकि इलाके में पुलिस गश्त कर रही थी.

15-20 दिन बाद जब लाश से बदबू आनी शुरू हो गई तो उस ने कमरे में परफ्यूम छिड़का. ऐसा वह रोजाना करता. पर बदबू बढ़ती जा रही थी. अवधेश परेशान था. कोई शक न करे, इसलिए उस ने एक चूहा मार कर घर के एक कोने में डाल दिया. उस पर भी उस ने परफ्यूम छिड़क दिया था.

एक दिन पड़ोसियों ने बदबू के बारे में उस से पूछा तो उस ने कह दिया कि घर में चूहा मर गया होगा. फिर वही मरा हुआ चूहा उस ने पड़ोसियों को दिखा दिया. उसे वह बाहर फेंक आया. लाश ठिकाने लगाने का मौका न मिलने से वह परेशान था. इस तरह बच्चे की लाश उस के यहां 37 दिन तक रखी रही.

पुलिस ने अवधेश से पूछताछ करने के बाद उसे रोहिणी न्यायालय में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया.

पीएनबी घोटाला : मिलीभगत की असली कहानी

किसी हिंदी फिल्म की शुरुआत के लिए भी शायद यह अति नाटकीय सीन लगे और निर्देशक आंख में इतने धूलझोंकू सीन को फिल्माने से मना कर दे, जैसी हकीकत पंजाब नैशनल बैंक की मुंबई स्थित ब्रेडी हाउस ब्रांच घोटाले से सामने आई है. जैसा कि बैंक के एमडी सुनील मेहता बताते हैं, ‘यह सब 2011 से ही चल रहा था और 3 जनवरी 2018 को 11,360 करोड़ रुपए के घोटाले के रूप में सामने आया.’

अब सामने कैसे आया, जरा यह भी देख लीजिए. कई महीने पहले नीरव मोदी के कुछ अधिकारी पंजाब नैशनल बैंक की ब्रैंडी हाउस शाखा पहुंचे. उन्होंने बैंक के मैनेजर से कहा कि उन्हें हांगकांग से कुछ सामान मंगाना है. सामान मंगाने के लिए उन्होंने बैंक से एलओयू यानी लेटर औफ अंडरटेकिंग जारी करने को कहा. उन्होंने ये लेटर औफ अंडरटेकिंग हांगकांग में मौजूद इलाहाबाद बैंक और एक्सिस बैंक के नाम पर जारी करने की गुजारिश की.

भारत में लेटर औफ अंटरटेकिंग का मतलब यह होता है कि किसी अंतरराष्ट्रीय बैंक या किसी भारतीय बैंक की अंतरराष्ट्रीय शाखा कारोबारी का अपना बैंक का साखपत्र जारी करता है, जिस का मतलब यह होता है कि आप इन साहब को इन की बताई हुई पार्टी को इतनी रकम का भुगतान कर दें. ये यह रकम 90 दिनों या अधिकतम 180 दिनों में लौटा देंगे. अगर ऐसा नहीं होता तो इस की भरपाई हम (यानी एलओयू या साखपत्र जारी करने वाला वाला बैंक) कर देंगे. यह शौर्ट टर्म लोन होता है.

इस लेटर के आधार पर कोई भी कंपनी दुनिया के किसी भी हिस्से में राशि को निकाल सकती है. इन एलओयू का इस्तेमाल ज्यादातर आयात करने वाली कंपनियां, विदेशों में भुगतान के लिए करती हैं. लेटर औफ अंडरटेकिंग किसी भी कंपनी को लेटर औफ कंफर्ट के आधार पर दिया जाता है. लेटर औफ कंफर्ट का मतलब होता है कि उसे कंपनी के स्थानीय बैंक की ओर से जारी किया गया है,यह उस कारोबार के लिए होता है, जो हो रहा होता है. यहां पीएनबी से यह गारंटी देने को कहा गया कि वह हांगकांग स्थित उन बैंकों को दे दे जिन का नाम ऊपर लिखा गया है.

पीएनबी ने हांगकांग में मौजूद इलाहाबाद बैंक को 5 और एक्सिस बैंक को 3 लेटर औफ अंडरटेकिंग जारी कर दिए. हांगकांग से करीब 280 करोड़ रुपए का सामान इंपोर्ट किया गया. कुछ महीने गुजर गए यानी वह पीरियड निकल गया, जितने दिनों बाद एलओयू के आधार पर भुगतान होना था.

अब 18 जनवरी को नीरव मोदी के कुछ अधिकारियों के साथ जिन बैंकों को एलओयू जारी किया गया था, उन के कुछ लोग बैंक पहुंचते हैं. वे अपने इंपोर्ट दस्तावेज दिखाते हुए कहते हैं कि पैसों का भुगतान कर दिया जाए. लेकिन अब वह बैंक मैनेजर नहीं है, जो इन के जारी करने के समय था. अत: वह कहता है कि जितना भी पैसा विदेश में भेजना है, उतना नकद जमा करना पड़ेगा.

कंपनियों के अधिकारियों ने फिर लेटर औफ अंडरटेकिंग दिखाया और उस के आधार पर पेमेंट करने को कहा. बैंक ने जब इन एलओयू की जांच शुरू की तो उन के होश उड़ गए. क्योंकि बैंक के रिकौर्ड में तो इन 8 लेटर औफ अंडरटेकिंग का कहीं जिक्र ही नहीं था. मतलब बैंक ने बिना कोई गारंटी लिए, बिना कुछ गिरवी रखे लेटर औफ अंडरटेकिंग जारी कर दिए थे. संक्षेप में यही पीएनबी घोटाला है, जिसे हीरा व्यापारी नीरव मोदी और उस के मामा मेहुल चौकसी ने अंजाम दिया है.

हकीकत पता चली तो मालूम हुआ घोटाला अरबों का है

बहरहाल, इस हकीकत के उजागर होने के बाद पीएनबी को तात्कालिक रूप से 280 करोड़ और जब पूरे मामले को खंगाला गया तो पता चला कि 11,360 करोड़ रुपए की चपत लग चुकी थी. इस के पता चलते ही पीएनबी के एमडी के मुताबिक, तुरंत संबंधित जांच एजेंसियों को इस की जानकारी दी गई. मगर सवाल यह है कि जब एलओयू मुंहजुबानी वायदे पर नहीं जारी किए जाते, बल्कि इस के पीछे कोई मजबूत गारंटी होती है तो फिर नीरव मोदी के मामले में ऐसा कैसे हुआ? आखिर कौन है ये नीरव मोदी?

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नीरव मोदी हीरे की ज्वैलरी का बहुत बड़ा कारोबारी है, जोकि इस खुलासे के पहले ही समझा जाता है कि 1 जनवरी 2018 को 4 बड़े बड़े सूटकेसों के साथ हिंदुस्तान छोड़ चुका है, जिस के बारे में भारत सरकार के अधिकारियों का कहना है कि उन्हें नहीं पता कि वह गया कहां या कहां है?

यह अलग बात है कि वह बैंक को लेटर भी लिख रहा है और धमकी भी दे रहा है. बहरहाल, ग्लैमर की दुनिया में भी इस 48 वर्षीय शख्स की खूब धाक थी. उस के नाम यानी ‘नीरव मोदी’ के नाम से हीरों का बड़ा ब्रांड है. कहा जाता है कि मेहमानों को लुभाने के लिए वह पेड़ों को भी हीरों से जड़ देता है. मौडल्स नीरव मोदी के करोड़ों के गहने पहन कर इतराती हैं. फिल्म एक्ट्रेस प्रियंका चोपड़ा से ले कर सिद्धार्थ मल्होत्रा तक नीरव मोदी के लिए विज्ञापन कर चुके हैं.

48 साल के नीरव की तीन कंपनियां हैं, जिन में एक हीरों का कारोबार करने वाली ‘फायरस्टार डायमंड’और दूसरी खुद उसी के नाम की ‘नीरव मोदी’. इन्हीं 2 कंपनियों के जरिए ये घोटाला हुआ, जिस की तह में है महत्त्वाकांक्षा.

नीरव अपने ब्रांड, नीरव मोदी को दुनिया का सब से बड़ा लग्जरी ब्रांड बनाना चाहता था. वह दुनिया की डायमंड कैपिटल कहे जाने वाले बेल्जियम के एंटवर्प शहर के मशहूर डायमंड ब्रोकर परिवार से ताल्लुक रखता है. एक वक्त ऐसा था कि वह खुद ज्वैलरी डिजाइन नहीं करना चाहता था, लेकिन पहली ज्वैलरी डिजाइन करने के बाद उस ने कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा.

नीरव मोदी भारत की उस एकमात्र भारतीय ज्वैलरी ब्रांड का मालिक है, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चित है. उस के डिजाइन किए गए गहने हौलीवुड की हस्तियों से ले कर देशी धनकुबेरों की पत्नियों तक की शोभा बढ़ाते रहे हैं. उस के द्वारा डिजाइन किया गया गोलकोंडा नेकलेस 2010 में नीलामी के जरिए 16.29 करोड़ में बिका था. जबकि 2014 में उस के द्वारा डिजायन किया एक हीरा 50 करोड़ रुपए में नीलाम हुआ था.

अपनी ज्वैलरी ब्रांड के दम पर ही वह फोर्ब्स की भारतीय धनकुबेरों की 2017 की सूची में 84वें नंबर पर मौजूद था. उस की माली हैसियत लगभग 12 हजार करोड़ रुपए की है, जबकि माना जा रहा है कि उस की निजी कंपनी 149 अरब रुपए के आसपास की है. दिल्ली में नीरव मोदी का शोरूम डिफेंस कालोनी में है.

इस धनकुबेर ने जो घोटाला किया, उस के संबंध में पंजाब नैशनल बैंक से जो हकीकत बाहर आई है, वह यह है कि बैंक ने एलओयू जारी नहीं किए, बल्कि बैंक के 2 कर्मचारियों ने चोरी से फरजी एलओयू बना कर दिए. इन कर्मचारियों के पास स्विफ्ट सिस्टम का कंट्रोल था, जो 200 देशों की बैंकिंग गतिविधियों के लिए आधिकारिक तकनीक है.

बैंकों की दुनिया का यह एक अति सीक्रेट अंतरराष्ट्रीय कम्युनिकेशन सिस्टम है. यह दुनिया के सभी बैंकों को आपस में जोड़ता है. इस स्विफ्ट सिस्टम से जो संदेश जाते हैं, वो उत्कृष्ट तकनीक का इस्तेमाल करते हुए कोड में भेजे जाते हैं. एलओयू भेजना, खोलना, उस में बदलाव करने का काम इसी सिस्टम के जरिए किया जाता है. इसी कारण से जब इस सिस्टम के जरिए किसी बैंक को संदेश मिलता है तो उस बैंक को पता होता है कि ये आधिकारिक और सही संदेश है.

लेकिन नीरव को भेजे गए दस्तावेजों में असल में बैंक का कोई दस्तावेज था ही नहीं यानी इस के साथ बैंक ने उस व्यापारी को कोई लिमिट नहीं दी थी, ब्रांच मैनेजर ने स्विफ्ट सिस्टम से इसे भेजने वाले को कोई कागज हस्ताक्षर कर के नहीं दिया कि इसे आगे भेजा जाए. उन्होंने चुपचाप एलओयू भेज दिया. जबकि इस माध्यम से आए किसी संदेश पर कभी कोई बैंक शक नहीं करता. लेकिन बात यह है कि किसी सिस्टम को संभालने वाला आखिर कोई न कोई व्यक्ति ही तो होता है.

सब कुछ हुआ बैंककर्मियों की मदद से

माना जा रहा है कि पीएनबी में इस काम को करने वाले 2 लोग थे, एक क्लर्क जो इस में डेटा डालता था और दूसरा अधिकारी जो इस जानकारी की आधिकारिक पुष्टि करता था. दोनों मिल कर नीरव के लिए काम करते थे. यही नहीं अब पता चला है कि ये दोनों कई सालों तक इसी डेस्क पर काम कर रहे थे, जोकि नहीं होना चाहिए था. इस पद पर काम करने वालों की अदलाबदली होती रहनी चाहिए.

एक और बात है कि स्विफ्ट सिस्टम कोर बैंकिंग से नहीं जुड़ा था. क्योंकि कोर बैंकिंग में पहले एलओयू बनाया जाता है और फिर वह स्विफ्ट के मैसेज से चला जाता है. इस कारण कोर बैंकिंग में एक कौन्ट्रा एंट्री बन जाती है कि अमुक दिन बैंक ने अमुक राशि का कर्ज देने की मंजूरी दी है तो अगले दिन जब बैंक का मैनेजर अपनी फाइलें यानी बैलेंसशीट देखता तो उसे पता चल जाता है कि बैंक ने बीते दिन कितने कर्जे की मंज़ूरी दी है.  लेकिन इस मामले में स्विफ्ट कोर बैंकिंग से जुड़ा हुआ नहीं था.

इन दोनों ने फरजी मैसेज को स्विफ्ट से भेजा, मैसेज भी गायब कर दिया और इस की कोर बैंकिंग में एंट्री नहीं की तो कुछ पता भी नहीं चला.  बैंक का पूरा सिस्टम कैसे बाईपास हो गया, अगर कोई चोर कोई निशान या सबूत ना छोड़े तो उसे पकड़ना बहुत मुश्किल होता है. खासकर तब जब कोई संदेह भी नहीं कर रहा है.

कोई संदेह करे तो इस मामले में जांच की जा सकती है, लेकिन ऐसा कुछ हुआ ही नहीं. वो एक बैंक से पैसे लेते रहे और दूसरे को चुकाते रहे. आज 50 मिलियन के एलओयू खोले, जब तक अगले साल इसे चुकाने की बारी आई तो उन्होंने तब तक 100 मिलियन के और करा लिए. अब उन्होंने पहले लिए गए 50 मिलियन चुका दिए और अगला कर्ज़ किसी और बैंक से ले लिया गया.  इस प्रकार से ये लेनदेन महीनों तक चलता रहा.

सवाल है कि इस पूरे खेल का माटरमाइंड कौन है? जैसेजैसे जांच आगे बढ़ रही है पता चल रहा है कि इस घोटाले का सूत्रधार नीरव मोदी नहीं बल्कि कोई और ही था. यह नीरव की अमेरिकन पत्नी एमी थी, जिस ने इस बड़े घोटाले की साजिश रची. यही नहीं, घोटाले का मास्टरमाइंड होने के साथ साथ नीरव के अमेरिका भागने के साजिश के पीछे भी एमी का ही दिमाग बताया जा रहा है.

माना जा रहा है कि यह बैंकिंग घोटाला हनीट्रैप के जरिए अंजाम दिया गया है. कुछ मौडल्स के जरिए बैंक के उच्च अधिकारियों को घोटाले में शामिल किया गया था. इन मौडल्स को हनीट्रैप के लिए कोऔर्डिनेट करने का काम एमी मोदी का था, जो नीरव मोदी और बौलीवुड के बीच एक कड़ी का काम कर रही थी.

वास्तव में पीएनबी की ब्रेडी फोर्ड ब्रांच के जिस पूर्व डिप्टी मैनेजर गोकुलनाथ शेट्टी को 17 फरवरी, 2018 को गिरफ्तार किया गया, 2013 में उस का ट्रांसफर इस ब्रांच से किया जाना था, जिसे रुकवा दिया गया. इस के बाद  2015 में 5 साल पूरे होने पर भी उस का ट्रांसफर ब्रांच से नहीं किया गया. सीबीआई अब ये पता लगाने की कोशिश कर रही है कि किस के इशारे पर शेट्टी का ट्रांसफर रोका गया.

वास्तव में गोकुलनाथ शेट्टी के ट्रांसफर को रुकवाने में भी मौडल्स और हनीट्रैप का इस्तेमाल हुआ. गोकुलनाथ शेट्टी ने एक बड़ा खुलासा किया है. उस के मुताबिक यह पूरा मामला पीएनबी के बड़े अधिकारियों की जानकारी में था. सीबीआई की तरफ से डायमंड किंग नीरव मोदी और गीतांजलि जेम्स के प्रमोटर मेहुल चौकसी के खिलाफ शिकायत के बाद एफआईआर दर्ज की गई है.

नीरव मोदी और मेहुल चौकसी इस घोटाले के मुख्य आरोपी हैं और उन्हें देखते ही पकड़ने के लिए लुकआउट नोटिस भी जारी किया जा चुका है. विदेश मंत्रालय ने नीरव मोदी और मेहुल चौकसी का पासपोर्ट निलंबित कर दिया है और इन के विदेशों के आउटलेट्स पर भी कारोबार न करने का आदेश दिया जा चुका है. रिजर्व बैंक ने स्पष्ट कर दिया है कि इस घोटाले में फंसी राशि का बोझ पीएनबी को खुद उठाना पड़ेगा.

सीबीआई जांच तो कर सकती है, पर पैसा नहीं ला सकती

यह मामला जनवरी में पकड़ा गया और 29 जनवरी, 2018 को इस की जांच सीबीआई से करवाने का अनुरोध किया गया. दूसरे सभी बैंकों ने सारी जिम्मेदारी पीएनबी पर ही डाली है कि उस की तरफ से जारी लेटर औफ अंडरटेकिंग (एलओयू) को सही मानते हुए नियमों के मुताबिक, संबंधित उद्योगपतियों की कंपनियों को फंड उपलब्ध कराए जा रहे थे. ऐसे में घाटा पूरी तरह से पीएनबी को उठाना पड़ेगा.

आरबीआई के सूत्रों का कहना है कि पीएनबी पर सख्ती दिखा कर देश के सभी बैंकों के सामने एक उदाहरण पेश करने की जरूरत है.

अगर यह मान भी लिया जाए कि दूसरे बैंक इस में शामिल थे, तब भी इस की शुरुआत पीएनबी की उस शाखा से हो रही थी, जहां से नीरव मोदी व अन्य रत्न व आभूषण कारोबारियों को नियमों की अनदेखी कर के हीरेमोती आयात करने के लिए लेटर औफ अंडरटेकिंग (एलओयू) जारी किए जा रहे थे. इसलिए यह घाटा पीएनबी को ही उठाना चाहिए. घोटाले की राशि 11,360 करोड़ रुपए की है, जो पीएनबी के पूरे बाजार पूंजीकरण का तकरीबन एक तिहाई है.

नीरव ने राजस्थान में बिखेरी हीरों की चमक

देश के सब से बड़े बैंकिंग घोटाले को अंजाम देने वाले नीरव मोदी का राजस्थान से गहरा नाता रहा है. नीरव मोदी की कंपनी गीतांजलि जेम्स की जयपुर में 3 फैक्ट्रियां हैं. इन में 2 फैक्ट्रियां जयपुर के सीतापुरा औद्योगिक क्षेत्र में और एक सीतापुरा सेज में है. इन में आभूषण बनाने का काम होता है.

इस कंपनी के प्रमोटर मेहुल चौकसी हैं. इन फैक्ट्रियों पर 15 फरवरी को ईडी ने छापे मारे. इस के अगले दिन जयपुर में 2 अन्य ठिकानों पर ईडी ने छापे मारे. इन पांचों जगहों से 10 करोड़ 44 लाख करोड़ रुपए के हीरे, रंगीन रत्न, जवाहरात और आभूषण जब्त किए गए. साथ ही महत्त्वपूर्ण दस्तावेज भी जब्त किए गए. कंपनी का एक बैंक खाता फ्रीज किया गया. इस खाते में एक करोड़ से ज्यादा की रकम जमा थी.

इस बैंकिंग घोटाले में भरतपुर की लक्ष्मण मंदिर शाखा के मुख्य प्रबंधन आर.के. जैन और सर्किल कार्यालय में कार्यरत अधिकारी पी.सी. सोनी को भी निलंबित कर दिया गया है. ये दोनों अधिकारी मुंबई की ब्रेडी हाउस शाखा में कार्यरत रहे थे. बैंक प्रबंधन उन सभी अधिकारियों पर काररवाई कर रहा है, जो 2011 से अब तक मुंबई की ब्रेडी हाउस शाखा में कार्यरत रहे हैं.

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बैंक प्रबंधन को शक है कि इन में कोई अधिकारी भले ही घोटाले में शामिल न हो, लेकिन जांच को प्रभावित कर सकता है. आर.के. जैन ब्रेडी हाउस शाखा में सन 2012 से 2015 तक सेकंड इंचार्ज के रूप में कार्यरत रहे थे. वे भरतपुर की रणजीत नगर कालोनी के रहने वाले हैं. पी.सी. मीणा अप्रैल, 2011 से नवंबर 2011 तक मुंबई की इसी शाखा में कार्यरत थे. वहां वे कौन्ट्रैक्टर औडिटर के पद पर कार्यरत थे. ये दोनों अधिकारी स्केल 4 के थे.

हीरे के कारोबार में पूरी दुनिया में अपनी पहचान बनाने वाला नीरव मोदी भव्य पार्टियों व रईसों के साथ रहने का शौकीन है. उस ने करीब 2 साल पहले जोधपुर में अपने हीरों की चमक से लोगों को चकाचौंध कर दिया था. नीरव मोदी ने अपने ब्रांड के 5 साल पूरे होने पर मारवाड़ के ताज के रूप में मशहूर जोधपुर के उम्मेद भवन में देशविदेश की नामी हस्तियों के साथ 2 दिन के जश्न का आयोजन किया था.

इस आयोजन में फैशन डिजाइनर राघवेंद्र, कविता राठौड़, मनीष मल्होत्रा, योहानन, मिशेल पूनावाला, इशिता, राज, दीप्ति सालगांवकर, चिराग, तनाज जोशी, लीजा हेडन, निखिल व इलिना मेशवानी सहित देशविदेश की नामी मौडल्स ने भाग लिया था. इस जश्न में जोधपुर के पूर्व महाराजा गज सिंह भी खासतौर से शरीक हुए थे. नीरव मोदी ने इस मौके पर अपने ब्रांड के तहत तैयार किए गए हीरों के आभूषणों की प्रदर्शनी भी लगाई थी. इस प्रदर्शनी के दौरान देशविदेश की टौप मौडल्स ने नीरव के हीरे के आभूषण पहन कर कैटवाक किया था.

काश ! तभी चेत जाते

वैसे देश के बैंकिंग क्षेत्र को हिला देने वाले पीएनबी घोटाले की शुरुआत 2013 में इलाहाबाद बैंक की निदेशक मंडल की बैठक में ही हो गई थी. नई दिल्ली में हुई उस बैठक में गीतांजलि ज्वैलर्स के मालिक मेहुल चौकसी को 550 करोड़ रुपए देने को मंजूरी दी गई थी. मेहुल चौकसी रिश्ते में घोटालेबाज नीरव मोदी के मामा हैं.

बाद में मामाभांजे ने मिल कर बैकों को हजारों करोड़ का चूना लगाया. चौकसी को बैंक की हांगकांग शाखा से भुगतान किया गया था. इलाहाबाद बैंक पीएनबी सहित देश के 4 अन्य सरकारी बैंकों को लीड करता है. आभूषण कारोबारी नीरव मोदी और गीतांजलि, नक्षत्र और गिन्नी ज्वैलरी चेन चलाने वाले मेहुल चौकसी मूलत: गुजरात के हैं. दोनों मुंबई में रहते हैं.

नई दिल्ली के होटल रेडिसन में 14 सितंबर, 2013 को इलाहाबाद बैंक के निदेशक मंडल की बैठक हुई. इस में भारत सरकार की ओर से नियुक्त निदेशक दिनेश दुबे ने चौकसी को 550 करोड़ लोन देने का विरोध किया.

16 सितंबर को इस बैठक की जानकारी दुबे ने भारतीय रिजर्व बैंक के तत्कालीन डिप्टी गवर्नर के.सी. चक्रवर्ती को दी. इस के बाद बैंक अधिकारियों को तलब भी किया गया, लेकिन इस के बावजूद मेहुल चौकसी को बैंक की हांगकांग शाखा से भुगतान कर दिया गया.

सवाल है अब पीएनबी एक झटके में इस राशि को किस तरह से उठाएगा. पीएनबी को इस राशि को इसी तिमाही में अपनी बैलेंसशीट में दिखाना होगा. इस बारे में पीएनबी, वित्त मंत्रालय और आरबीआई के बीच विचारविमर्श शुरू हो चुका है.

सूत्रों के मुताबिक एक सीधा उपाय यह है कि फिलहाल सरकार की तरफ से पीएनबी को दी जाने वाली पूंजीकरण की राशि बढ़ा दी जाए. दूसरा रास्ता यह है कि केंद्रीय बैंक की तरफ से पीएनबी के लिए विशेष उपाय किए जाएं.

क्योंकि छापों से जो 5100 और इस के बाद 650 करोड़ पकडे़ जाने के दावे किए गए वे सब झूठे हैं. मुश्किल से 1000 करोड़ ही बरामद होंगे.

रोटोमैक कंपनी के मालिक विक्रम कोठारी भी आए सीबीआई के शिकंजे में

डायमंड कारोबारी नीरव मोदी और मेहुल चौकसी के बाद कानपुर की रोटोमैक कंपनी के मालिक विक्रम कोठारी भी अचानक सुर्खियों में आ गए. आरोप है कि उन्होंने कई बैंकों को अरबों रुपए का चूना लगाया था.

रोटोमैक एक जानीमानी कंपनी है. इस कंपनी के मालिक विक्रम कोठारी ने इलाहाबाद बैंक, यूनियन बैंक, बैंक औफ इंडिया सहित कई सरकारी बैंकों से करीब 2919 करोड़ रुपए का लोन लिया था. यह लोन लेने के बाद उन्होंने न तो इस का ब्याज चुकाया और न ही मूलधन. बल्कि वह खुद भी सामने आने से बचते रहे. पिछले कुछ दिनों से इस बात की भी खबरें आनी शुरू हो गई थीं कि विक्रम कोठारी देश छोड़ कर जा चुके हैं.

सूद और मूलधन न मिलने पर पिछले साल बैंक औफ बड़ौदा ने विक्रम कोठारी को विलफुल डिफाल्टर घोषित कर दिया था. जब विक्रम कोठारी को इस बात की जानकारी हुई तो वह इलाहाबाद हाईकोर्ट चले गए. हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस डी.बी. भोसले और जस्टिस यशवंत वर्मा की खंडपीठ ने उन की याचिका मंजूर कर ली.

इस याचिका पर सुनवाई करते हुए उन्होंने बैंक को आदेश दिया कि विक्रम कोठारी की कंपनी को विलफुल डिफाल्टर लिस्ट से बाहर किया जाए. बैंक को माननीय हाईकोर्ट का आदेश मानने के लिए बाध्य होना पड़ा.

विक्रम कोठारी के खिलाफ बैंक द्वारा सीबीआई में शिकायत दर्ज कराई जा चुकी थी. सीबीआई को कोठारी की तलाश थी. 18 फरवरी को विक्रम कोठारी कानपुर में एक वैवाहिक समारोह में शामिल होने के लिए आए थे. सीबीआई को पता चला तो उस ने 19 फरवरी की रात 1 बजे उन के घर पर छापा मार कर उन्हें गिरफ्तार कर लिया.

2500 करोड़ का विलफुल डिफाल्टर चढ़ा सीबीआई के हत्थे

बैंकों से हजारों करोड़ रुपए का कर्ज लो और विदेश भाग जाओ. इस तरह की प्रवृत्ति वाले उद्योगपतियों की संख्या भारत में बढ़ती जा रही है. ऐसे उद्योगपति यह काम एक सोचीसमझी साजिश के तहत करते हैं. उन के फरार हो जाने के बाद बैंक और सरकार लकीर पीटती रह जाती हैं.

जिस तरह विजय माल्या बैंकों के 5600 करोड़ रुपए ले कर फरार हो गया, उसी तरह भारत के ही एक और उद्योगपति कैलाश अग्रवाल भी बैंकों से करीब ढाई हजार करोड़ रुपए का कर्ज ले कर फरार हो गए थे. देश के सब से बड़े विलफुल डिफाल्टर्स में से एक कैलाश अग्रवाल को सीबीआई ने 5 अगस्त, 2017 को गिरफ्तार किया था.

वरुण इंडस्ट्रीज के प्रमोटर्स कैलाश अग्रवाल और उन के पार्टनर किरण मेहता ने चेन्नै स्थित इंडियन बैंक से 330 करोड़ रुपए का कर्ज लिया था. इस के अलावा उन्होंने एक सोचीसमझी साजिश के तहत अन्य बैंकों से भी 1593 करोड़ रुपए कर्ज लिए. सन 2007 से 2012 के बीच इन्होंने कई बैंकों से वरुण इंडस्ट्रीज और इस की सहयोगी कंपनी वरुण जूल्स के नाम पर 10 सरकारी बैंकों से करीब 1242 करोड़ रुपए का कर्ज लिया.

कैलाश अग्रवाल और किरण मेहता ने सरकारी बैंकों के अलावा प्राइवेट बैंक्स, फाइनेंस कंपनियों से भी लोन लिया. शेयर्स के बदले बाजार से भी इन्होंने काफी पैसा उठा लिया. लोन की राशि उन्होंने नहीं चुकाई, जिस से सन 2013 में ये डिफाल्टर हो गए. बैंकों ने इन के पास कई नोटिस भेजे, पर ये दोनों यहां होते, तब तो मिलते. दोनों कभी के विदेश जा चुके थे. मार्च 2013 में इंडियन बैंक एंप्लाइज एसोसिएशन द्वारा तैयार की गई विलफुल डिफाल्टर्स की सूची में इन दोनों उद्योगपतियों का नाम भी शामिल था. इंडियन बैंक की शिकायत पर सीबीआई ने वरुण इंडस्ट्रीज के प्रमोटर कैलाश अग्रवाल और किरण मेहता के खिलाफ आपराधिक साजिश, धोखाधड़ी और फरजीवाड़े का केस दर्ज कर लिया.

सीबीआई ने जांच की तो पता चला कि ये दोनों सब से बड़े विलफुल डिफाल्टर्स में से हैं. सब से बड़े विलफुल डिफाल्टर सूरत के डायमंड कारोबारी हैं, जिन पर 7 हजार करोड़ रुपए का कर्ज है. दूसरे नंबर पर लंदन भागे विजय माल्या का नाम आता है, जिन पर 5600 करोड़ रुपए का कर्ज है. कैलाश अग्रवाल भी अपने साथी किरण मेहता के साथ दुबई भाग गए थे. तब से सीबीआई इन के पीछे लगी थी. 5 अगस्त, 2017 को कैलाश अग्रवाल जब दुबई से भारत लौटे, तो सीबीआई ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया.

सरकार बैंकों को दे चुकी है ढाई लाख करोड़ से ज्यादा

कारपोरेट फ्रौड और बैड लोन की वजह से बैंकों की हालत दिनोंदिन खराब होती जा रही है. पब्लिक सेक्टर बैंकों को एनपीए से उबारने के लिए सरकार प्रयासरत है. सरकार पिछले 11 सालों में बैंकों को ढाई लाख करोड़ से ज्यादा दे चुकी है, इस के बावजूद बैंक एनपीए से उबर नहीं पा रहे हैं.

बजट बनाते समय वित्त मंत्रियों के सामने 2 बड़ी समस्याएं होती हैं. पहली खर्च की जरूरत पूरी करना जिस से सामाजिक क्षेत्र की योजनाओं को सुधारा जा सके और दूसरी  राजकोषीय घाटे को कम करना. क्योंकि टैक्स का कलेक्शन काफी नहीं होता. इन के अलावा हाल के सालों में वित्त मंत्रालय के सामने एक और नई चुनौती उभर कर सामने आई है और वह चुनौती है सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को संभालने की.

पिछले 11 सालों में देश के 3 वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी, पी. चिदंबरम और अरुण जेटली पब्लिक सेक्टर बैंकों को एनपीए से उबारने के लिए 2.6 लाख करोड़ रुपए दे चुके हैं. यह राशि सरकार द्वारा इस साल ग्रामीण विकास के लिए आवंटित की गई राशि के दोगुने से ज्यादा है.

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एसबीआई सहित अन्य सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक एनपीए के कारण पिछले 2 वित्त वर्ष से घाटे में हैं. बताया जाता है कि इस वित्त वर्ष में भी बैंकों के हालात सुधरते नहीं दिख रहे. भारतीय स्टेट बैंक ने पिछले 18 सालों में पहली बार तिमाही घाटा दर्ज किया.

यही हाल बैंक औफ बड़ौदा का है. सरकारी बैंकों का मानना है कि मुद्रा समेत कई सरकारी योजनाओं के लिए कर्ज देना पड़ रहा है, इस से भी स्थिति बिगड़ी है. जबकि आम लोगों का मानना है कि जब करोड़ों रुपए कर्ज के बकाएदार बैंकों को कर्ज नहीं लौटाएंगे तो बैंकों की स्थिति दयनीय तो होगी ही.

हिना खान को मिली MMS लीक करने की धमकी

बिग बौस 11 भले ही खत्म हो गया हो, लेकिन शिल्पा शिंदे और हिना खान की कैटफाइट अभी भी जारी है. जब से शिल्पा ने ट्विटर पर एक MMS वीडियो शेयर किया है, तब से दोनों आमने-सामने हैं. अब दोनों अभिनेत्रियों की इस लड़ाई में उनके फैंस भी कूद पड़े हैं. ताजा अपडेट ये है कि शिल्पा के फैन ने हिना खान का MMS सोशल मीडिया पर लीक करने की धमकी दी है. मालूम हो कि शिल्पा शिंदे ने अपने एमएमएस पर पिछले साल उड़ी खबरों पर सफाई देने के लिए हाल ही में अपने ट्विटर अकाउंट पर एक पोर्न वीडियो अपलोड किया था. जिसके बाद हिना खान ने एक सेलिब्रिटी होने के नाते शिल्पा की इस हरकत को गलत ठहराया. इसके बाद शिल्पा के फैंस ने हिना को बुरी तरह से ट्रोल करना शुरू कर दिया.

अब यह बात इतनी ज्यादा बढ़ गई है कि शिल्पा के एक फैन ने हिना के किसी फेक एमएमएस को आनलाइन लीक करने की धमकी दे डाली. उसने हिना को निशाना बनाते हुए सोशल मीडिया पर लिखा, हिना जैसे लोगों के फैंस नहीं क्लाइंट होते हैं. जैसे ही ये ट्वीट वायरल हुआ हिना के बौयफ्रेंड रौकी जायसवाल का गुस्सा फुट पड़ा. उन्होंने इस कमेंट को गलत ठहराते शिल्पा के प्रशंसक को आड़े हाथ लिया और एक ट्विट किया गंदगी को छुपाने के लिए वे हर जगह गंदगी फैला रहे हैं. बकवास तर्क और तुलनाएं हो रही हैं. लेकिन मैं बता दूं कि ऐसी ओछी हरकतों से हमें कोई फर्क नहीं पड़ता. तुम अपने आइडल को पसंद करो. जिसे अभी भी कोई समझ नहीं है और जिसका इस मुद्दे पर कोई सेंसिबल स्पष्टीकरण नहीं है.

इसके बाद रौकी ने दूसरे ट्वीट में लिखा- आपके आइडल और उनके मीडिया हैंडलर्स नफरत और दुर्व्यहार को प्रमोट कर रहे हैं. जैसे कि अभी तक बिग बौस-11 चल रहा हो. आपके गुनाह को छिपाने के लिए अब कोई पर्दा नहीं है. अब ये शुरू ना करें कि कौन प्रमोशन चाहता है और कैसे.

रौकी नें इसके बाद एक और ट्वीट यानी कि तीसरा ट्वीट करते हुए लिखा- चलो अब आपस में हमारी बुराई करो और खुश रहो. जैसा कि तुम कर सकते हो. बेहतर जिंदगी जियो. डियर ट्रोल्स, हम असल में आप पर और आपके घटिया कमेंट्स पर हंसते हैं. हालांकि जब फीमेल फैन ने हिना का MMS वायरल करने की बात कही थी, तब शिल्पा के भाई आशुतोष ने फैन से इन सब चीजों से दूर रहने को कहा था.

बंगलादेश के बोल

जिस बंगलादेश को भारत ने 1971 में बनवाया था और उस की साढ़े 7 करोड़ जनता को पाकिस्तान के जुल्मों के कहर से मुक्ति दिलाई थी वही अब भारत को आंख दिखा रहा है. मई 2014 में अपने राजसिंहासन पर चढ़ते समय सफलतापूर्वक सातों पड़ोसी देशों के अध्यक्षों को बुला कर भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जो आशा बंधाई थी, वह बंगाल की खाड़ी और अरब सागर में डूब सी गई है.

बंगलादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना वाजेद ने साफसाफ कह दिया है कि भारत को बंगलादेशचीन संबंधों के बारे में चिंता करने की जरूरत नहीं है.  बंगलादेश का हक है कि वह अपने विकास के लिए कहीं से भी और किसी से भी सहायता ले सकता है. पाकिस्तान, मालदीव, श्रीलंका, नेपाल और यहां तक कि भूटान भी हमारी विदेश नीति को झटका दे चुके हैं जबकि भारत का साउथ ब्लौक केवल हार पहनाने और झूला झुलाने का काम कर सका था, दोस्त बनाने का नहीं.

भारत जैसे देश के लिए पड़ोसियों से बना कर रखना हमेशा ही कठिन रहा है. नेहरू के जमाने से भारत के पड़ोसी भारत से खार खाए हुए हैं क्योंकि हमारे विदेश मंत्रालय की नाक हमेशा टेढ़ी रही है. जेब में पैसा न होने के बावजूद हम विशाल भूमि, नदियों और निकम्मी व गरीब जनसंख्या के बल पर रोब झाड़ने की कोशिश करते रहे हैं, पर इसी विदेश मंत्रालय के राजनयिक जब गोरों के आगे सहायता के लिए चिरौरियां करते दिखते थे तो उस की कलई खुल जाती थी.

एक देश की विदेश नीति तब सफल होती है जब लेनदेन बराबरी के स्तर पर किए जाएं. देश के प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री सदा छोटे देशों पर अपना रोब, बिना कुछ दिए, गांठते रहते थे जो उन देशों को खलता था. चीन ने हाल के सालों में भरपूर कमाया है और उस की मेहनती जनता ने दूसरे कई देशों की जनता के मुकाबले कई गुना काम कर के सिद्ध कर दिया कि धर्म, जाति, रीतिरिवाजों और संकीर्णता से ज्यादा उत्पादन नहीं होता और किसी को कुछ देने लायक बचता भी नहीं.

बंगलादेश की इस बंदर घुड़की को चेतावनी समझना चाहिए. देश के प्रधानमंत्री या सत्तारूढ़ पार्टी के बिछाए जाल के बावजूद हम सब को कड़ी मेहनत करनी चाहिए ताकि अगर हम चीन, अमेरिका, ब्रिटेन पर रोब न गांठ सकें तो कम से कम पाकिस्तान, बंगलादेश को तो जता सकें कि भारत से अलग हो कर उन्होंने भयंकर भूल की है. फिलहाल तो उन्हें लगता है कि 1947 में वे अलग न होते तो भारत धर्मयुद्ध की आग में जल रहा होता और जनता भूखी मर रही होती.

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