रेल पटरियों पर भटकता बचपन

रेलवे स्टेशनों व ट्रेनों के बीच मासूम बच्चों की जिंदगी कहीं खो सी गई है. खेतखलिहानों व शहरों से गुजरती हुई ट्रेन जब किसी रेलवे स्टेशन पर रुकती है, तो निगाहें उन बच्चों पर जरूर ठहरेंगी, जो रेलवे ट्रैक पर पानी की बोतलें जमा करते हैं या उन बच्चों की टोलियों पर नजरें जमेंगी, जिन के गंदेमैले कपड़े उन की बदहाली को बयां करते हैं. ये बच्चे हाथ में गुटकाखैनी का पाउच लिए ट्रेन की बोगियों में बेचते हैं. जहां इन्हें स्कूलों में होना चाहिए, लेकिन पेट की भूख के चलते यहां इन की जिंदगी के हिस्से में केवल ट्रेन की सीटी ही सुनाई देती है.

इन बच्चों की जिंदगी सुबह 5 बजे से शुरू होती है, स्कूल की घंटी नहीं, ट्रेन की सीटी सुन कर ये झुंड में निकल पड़ते हैं. ये ट्रेन की बोगियों में गुटकाखैनी बेच कर अपना और अपने घर वालों का जैसेतैसे पेट पालते हैं. रेलवे स्टेशन में मुश्किल हालात में रह रहे बच्चों के लिए काम करने वाली स्वयंसेवी संस्थाएं ‘साथी’ और ‘चाइल्ड लाइन’ ऐसे बच्चों को बसाने के लिए काम कर रही हैं, लेकिन सरकारी अनदेखी के चलते इन बच्चों के लिए कोई ठोस काम नहीं हो पा रहा है.

इलाहाबाद रेलवे स्टेशन में आप दर्जनों ऐसे बच्चों को देख सकते हैं, जो प्लेटफार्म पर भीख मांगते हैं और यहीं पर रहते हैं. इन बच्चों के मातापिता व घर का पता नहीं है. ये बच्चे ट्रेन व प्लेटफार्म पर ही अपनी जिंदगी बिताते हैं. गुजरबसर के लिए ऐसे बच्चे ट्रेनों में घूमघूम कर गुटका बेचते हैं. इलाहाबाद रेलवे स्टेशन के बाहर ये दुकानदारों से गुटका खरीदते हैं. बताया जाता है कि ये बच्चे 125 रुपए का गुटका 4 सौ रुपए तक में आासानी से बेच लेते हैं.

रेलवे स्टेशन व टे्रनों में गुटका, बीड़ी, सिगरेट जैसी चीजों को बेचने पर रोक है. वहां लाइसैंस वाला वैंडर ही रेलवे के नियमकानून के मुताबिक उचित दामों पर ही कोई चीज बेच सकता है. लेकिन असल खेल तो यहां से शुरू होता है. गैरकानूनी वैंडर धड़ल्ले से इलाहाबाद व उस के आसपास के रेलवे स्टेशनों पर सामान बेचते हुए नजर आते हैं. रेलवे प्रोटैक्शन फोर्स यानी आरपीएफ व राजकीय रेलवे पुलिस यानी जीआरपी की चैकिंग में गैरकानूनी वैंडर और गरीब बच्चों से गैरकानूनी काम कराने वाले माफिया बच निकलते हैं. 12 साल का राकेश इलाहाबाद रेलवे स्टेशन के पास एक झुग्गीझोंपड़ी बस्ती में रहता है. उस ने बताया कि उस के मांबाप नहीं हैं.

वह 70 साल की अपनी बूढ़ी नानी के साथ रहता था, क्योंकि पुलिस वालों ने कई बार उसे पकड़ा था. लेकिन सौ रुपए के नोट को उस ने बड़ी बखूबी से इस्तेमाल किया कि आप उस की समझदारी को सुन कर हैरान रह जाएंगे. जब वे पकड़े जाते हैं, तो सौपचास रुपए थमा देते हैं. मामला वहीं रफादफा हो जाता है. इलाहाबाद रेलवे स्टेशन व उस के आसपास रहने वाले बच्चों से बात करने पर पता चला है कि उन के पढ़ने का मन करता है, लेकिन परिवार की गरीबी के चलते उन्हें ट्रेनों में गुटका, पानी की बोतलें वगैरह बेचनी पड़ती हैं.

बसाने की हो ठोस नीति

ऐसे बच्चों को बसाने के मसले पर समाजसेविका नीलम श्रीवास्तव ने बताया कि जो बच्चे कई साल से रेलवे स्टेशन पर ही अपनी जिंदगी बिता रहे हैं, ऐसे बच्चों को सुधार पाना एक बड़ी चुनौती है. इन में से कई ऐसे बच्चे हैं, जो एक स्टेशन से दूसरे स्टेशन घूमते रहते हैं. ये नशा करने की लत का शिकार हो जाते हैं. बड़े होने पर ये अपराध की राह पकड़ लेते हैं, तब इन्हें सुधार पाना बहुत मुश्किल होता है. वैसे, घर से भाग कर आए बच्चों को सही रास्ते पर सलाह के जरीए ही लाया जा सकता है. नीलम श्रीवास्तव इन बच्चों की काउंसलिंग करती हैं. उन्होंने कई बच्चों को उन के घर भी पहुंचाया है. नीलम श्रीवास्तव आगे बताती हैं कि स्टेशन पर लंबे समय से रह रहे बच्चों को बसाने के लिए कई एनजीओ काम करने से कतराते हैं. उन का काम भी केवल कागजी होता है.

स्टेशन पर नहीं है भविष्य

12 साल का दीपक यादव इलाहाबाद रेलवे स्टेशन पर गुटका बेचता हुआ मिला. वह बांदा का रहने वाला है और घर से भाग कर ग्वालियर गया, जहां उस ने कुछ दिन होटल में काम किया, लेकिन होटल का मालिक उस से दिन में 16 घंटे काम कराता था. दीपक को अपनी गलती पर पछतावा हो रहा था. उस ने ठान लिया कि वह होटल की कैद से खुद को आजादी दिलाएगा. कई रात के बाद उसे एक मौका मिला. एक रात होटल का मेन गेट खुला पाया, बस इस गलती का फायदा उठाया व रात को वहां से निकल गया. आंखों में आंसू पोंछते हुए दीपक ने बताया कि वह इलाहाबाद आ गया और यहीं पास के दुकानदार से गुटका खरीद कर रेलवे स्टेशन पर बेचने लगा. दीपक की काउंसलिंग समाजसेविका नीलम श्रीवास्तव ने की और वह अपने घर जाने के लिए तैयार हो गया. एक संस्था की मदद से उस के घर का पता लगाया जा रहा है.

इलाहाबाद रेलवे स्टेशन पर मातापिता की नाराजगी के चलते रोजाना दर्जनों बच्चे घर से भाग कर आते हैं और कुछ दिन तक यहीं रहते हैं, तो कुछ किसी दूसरे स्टेशन का रुख कर लेते हैं. वहीं वाराणसी, कानपुर, इलाहाबाद, रायपुर वगैरह रेलवे स्टेशनों पर बच्चों के लिए काम करने वाली साथी संस्था मुश्किल हालत में रह रहे इन बच्चों की मदद करती है. ऐसे बच्चों को उन के घर तक पहुंचाने का काम करती है. 14 साल तक की उम्र के बच्चों के लिए अनिवार्य शिक्षा कानून के लागू होने के बाद भी बदहाली के आंसू में जी रहे स्टेशन पर ये बच्चे पढ़ने के अधिकार के लिए किस के सामने हाथ फैलाएं? गरीबी, बीमारी, नशाखोरी में जी रहे इन के मांबाप बच्चे पैदा तो कर देते हैं, लेकिन उन्हें तालीम क्या दो वक्त की रोटी भी नहीं दे पा रहे हैं. लाचार मांबाप पेट पालने के लिए इन बच्चों को रेलवे स्टेशन के हवाले कर देते हैं.

इलाहाबाद स्टेशन पर इन दिनों दर्जनों बच्चे रोज सुबह यहां से गुजरने वाली दर्जनों ट्रेनों से पानी की खाली बोतलें इकट्ठी करते हैं. इन बोतलों में दोबारा पानी भर कर इन बच्चों से ये बोतलें बिकवाई जाती हैं, जिस में अच्छीखासी आमदनी होती है. उन की गरीबी और पैसों के लालच के चलते रेलवे स्टेशन पर पानी की बोतलें गैरकानूनी तरीके से बेचने का धंधा जोरों पर है.

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इस गाने पर संभावना सेठ ने किया गजब का डांस

इन दिनों बौलीवुड गानों से ज्यादा भोजपुरी गाने यूट्यूब पर धूम मचा रहे हैं. इसी क्रम में भोजपुरी फिल्मों के मशहूर एक्टर निरहुआ दिनेशलाल यादव के फिल्म ‘सौगंध’ का एक गाना इंटरनेट पर हंगामा मचाया हुआ है. यह एक आइटम नंबर है,जिसके बोल हैं ‘ताजमहल बनवा द बलिया में’. इस गाने पर भोजपुरी अदाकारा संभावना सेठ जबरदस्त डांस करती हुई नजर आ रही हैं.

यह गाना इस कदर वायरल हो रहा है कि 5 दिनों के अंदर ही इस वीडियो को ,340,419 बार देखा जा चुका है. यूट्यूब रिलीज इस गाने को भोजपुरी सिंगर कल्पना ने गाया है. यह गाना सपना के गाने का कौपी बताया जा रहा है. ऐसा इसलिए क्योंकि इस गाने की धुन हरयाणवी डांसर सपना चौधरी के गाने ‘तेरी आंख्यां का यो काजल’ से मिलता-जूलता है. इतना ही नहीं इस गाने पर संभावना सेठ के डांस की तुलना भी सपना चौधरी के डांस से की जा रही है. कहा जा रहा है कि यह गाना सपना चौधरी को टक्कर देने के लिए बनाया गया है.

जब आप इस गाने को देखेंगे तो आपको यह गाना ‘तेरी आंख्यां का यो काजल’ का भोजपुरी वर्जन लगेगा. इस गाने में अपनी अदाओं की बिजलियां गिराने वालीं संभावना सेठ के लटके झटके देखकर आप भी थिरकने पर मजबूर हो जाएंगे. बता दें कि  भोजपुरी फिल्मों के मशहूर एक्टर निरहुआ दिनेशलवाल यादव की फिल्म ‘सौगंध’ का ट्रेलर भी हाल ही में रिलीज हुआ है. इस फिल्म की शूटिंग चार अलग-अलग चरणों में मुंबई, नेपाल और लंदन सहित कई देशों में हुई है. इस फिल्म में निरहुआ के साथ भोजुपरी अभिनेत्री आम्रपाली दुबे भी नजर आने वाली हैं. इस फिल्म के निर्देशक विशाल वर्मा है.

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इस फिल्म में डकैत बने दिखेंगे रणबीर कपूर, देखें वीडियो

बौलीवुड एक्टर रणबीर कपूर अपनी फिल्म ‘संजू’ को लेकर पिछले काफी वक्त से सुर्खियों में हैं. इस फिल्म के लिए रणबीर ने खुद को संजय दत्त के लुक में बदला था और उनके संजू के लुक को दर्शकों ने काफी पसंद भी किया था. जिसके बाद अब रणबीर कपूर आपको डकैत बने हुए नजर आएंगे. इस फिल्म में रणबीर कपूर आपको एक्शन करते हुए नजर आएंगे और रणबीर की इस फिल्म का नाम ‘शमशेर’ है. रणबीर की इस फिल्म का निर्माण यश राज फिल्म्स के बैनर तले किया जा रहा है.

बता दें, रणबीर लगभग 9 साल बाद एक बार फिर यश राज फिल्म्स के साथ काम करने वाले हैं. रणबीर ने आखिरी बार फिल्म ‘रौकेट सिंह: सेल्समैन औफ द ईयर’ में काम किया था. रणबीर की इस फिल्म का निर्देशन करण मल्होत्रा कने वाले हैं. एक खबर के मुताबिक रणबीर ने अपनी इस फिल्म को लेकर कहा, करण ने इस फिल्म के लिए मुझे मेरे कम्फर्ट जोन से बाहर निकाला है और अब मैं आगे आने वाली चुनौतियों को देख रहा हूं.

बता दें, करण इससे पहले यश राज फिल्म्स के बैनर तले ही फिल्म ‘अग्निपथ’ और ‘ब्रदर्स’ का निर्देशन कर चुके हैं. करण ने शमशेरा के बारे में बात करते हुए कहा, ‘शमशेरा’ ऐसी फिल्म है जिसका मैं काफी वक्त से इंतजार कर रहा था. हिंदी कमर्शियल सिनेमा को मैंने बचपन से देखा है और मैंने बचपन से जिस तरह के हीरो के बारे में सोचा है. इस फिल्म में वैसा ही हीरो नजर आने वाला है. ‘शमशेरा’ की कहानी मुझे हीरो को लेकर वो सब करने की इजाजत देती है जिसके बारे में मैंने सोचा था और यह मेरे लिए काफी उत्साहित करने वाला प्रोजेक्ट है’.

बता दें, इस फिल्म की शूटिंग इस साल के अंत में शुरू की जाएगी और फिल्म की शूटिंग को अलगे साल में खत्म किया जाएगा. फिलहाल रणबीर जल्द ही संजय दत्त की बायोपिक में नजर आने वाले हैं. हालांकि, वह फिलाहल अयान मुखर्जी की फिल्म ‘ब्रह्मास्त्र’ की शूटिंग में बिजी हैं. इस फिल्म में रणबीर सुपरहीरो की भूमिका में नजर आएंगे.

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हार्ट अटैक बनाम हार्ट फेल

दिल से जुड़ी बीमारी दुनियाभर में मौत की सब से आम वजहों में से एक है. हार्ट फेल होना या हार्ट अटैक की चर्चा करते हुए लोग अकसर भरम में पड़ जाते हैं. हार्ट अटैक का मतलब होता है दिल की मांसपेशियों का बेहद कमजोर होना, जबकि हार्ट फेल होने का मतलब है कमजोर दिल. हार्ट अटैक तब होता है, जब दिल की मांसपेशियों के एक हिस्से को आक्सिजन से खून की सप्लाई में रुकावट हो जाती है. खून की सप्लाई अगर तुरंत फिर से बहाल नहीं होती है, तो दिल की मांसपेशियों का एक हिस्सा मरने होने लगता है.

हार्ट फेल होना एक लंबी चलने वाली और धीरेधीरे बढ़ने वाली हालत है, जिस में दिल की मांसपेशियां दिल के जरीए खून और आक्सिजन की शरीर की जरूरत के मुताबिक सही मात्रा में खून को पंप नहीं कर पाती हैं. कम शब्दों में कहें, तो दिल अपना काम सही तरीके से पूरा नहीं कर पाता है.

वजह

हार्ट अटैक की सब से आम वजह खून का वह थक्का है, जो दिल की धमनियों में जमा हो जाता है. ये धमनियां दिल में खून और आक्सिजन की सप्लाई करने के लिए जिम्मेदार हैं. अगर ये धमनियां खून के थक्के या परत के चलते जाम हो जाएं, तो दिल को आक्सिजन नहीं मिल पाती है और वह काम करना बंद कर देता है.

हार्ट फेल होने की वजह हार्ट अटैक हो सकती है, पर ऐसा लंबे समय से चले आ रहे हाई ब्लडप्रैशर या हार्ट वौल्व बीमारी के चलते भी हो सकता है. अगर दिल धमनियों से खून को अहम अंगों तक असरदार ढंग से पंप नहीं कर पाएगा, तो ये अंग खराब हो जाएंगे. इस के अलावा फेफड़े में तरल इकट्ठा होने लगेगा. इस से सांस लेने में समस्या आएगी, जिस से टिशू टूटफूट जाते हैं.

लक्षण

* हार्ट अटैक का सब से आम लक्षण सीने में हलके से ले कर गंभीर दर्द है, जो तकरीबन 20 मिनट तक रहता है. दूसरे लक्षणों में खांसी आना, सांस फूलना और पसीना आना शामिल है.

* हार्ट फेल होने के संकेत और लक्षण धीरेधीरे या अचानक भी हो सकते हैं और इस में भूख न लगना, रात में बारबार पेशाब आना, पैरों या टखने में सूजन और सांस फूलना शामिल है. रूटीन ईसीजी और ईकोकार्डियोग्राफी ऐसे टैस्ट हैं, जिन से हार्ट फेल होने की गंभीरता का पता चल सकता है.

उपचार

* रुकी हुई यानी बाधित धमनियों के इलाज के लिए एंजियोप्लास्टी एक असरदार उपचार है. खास किस्म के नई तकनीक के दवा छोड़ने वाले स्टैंट अब मुहैया हैं, जो मुश्किल और संकरी धमनी के जरीए प्रभावी ढंग से आगे बढ़ा सकते हैं. इस के अलावा अमेरिका के एफडीए से स्वीकृत दवा छोड़ने वाले स्टैंट भी हैं, जो डायबिटीज के मरीजों के लिए बने हैं.

* आमतौर पर दिल की दवाएं हार्ट फेल होने के उपचार के लिए इस्तेमाल में लाई जाती हैं. ऐसे मरीज के डाक्टर उसे जिंदगी जीने के तरीके में बदलाव लाने की सिफारिश कर सकते हैं. जैसे बीड़ीसिगरेट छोड़ना, मरीज के सोडियम इनटैक (नमक कम खाना) को सीमित करना, वजन कम करना और मरीज के तनाव के लैवल को कम करना.

* कार्डियक रीसिंक्रोनाइजेशन थैरैपी हार्ट फेल होने के उपचार का एक असरदार रूप है. इस में इंप्लांट करने लायक एक उपकरण का उपयोग किया जाता है. यह उन मरीजों के लिए होता है, जिन्हें दिल के इलैक्ट्रिकल कंडक्शन की समस्या होती है.

रीसिंक्रोनाइजेशन थैरैपी से दिल से पूरे शरीर में खून का प्रवाह बढ़ सकता है. इस से पूरे शरीर में बीमारी के लक्षण कम होते हैं, अस्पताल में कम रहना पड़ता है और मौत के होने का खतरा भी कम रहता है.

दिल को रखें सेहतमंद

* अपने भोजन में ज्यादा से ज्यादा हरी सब्जियों और फलों को खाइए.

* अपने भोजन में संपूर्ण अनाज को खाइए, क्योंकि ये फाइबर और पोषक के अच्छे स्रोत हैं.

* वसा और कोलेस्ट्रौल सीमित कीजिए.

* कम फैट वाले प्रोटीन स्रोत चुनिए, जैसे दाल, सप्राउट, अंडे का सफेद वाला हिस्सा वगैरह.

* अपने भोजन में सोडियम (नमक) लेना कम कीजिए.

(लेखक साकेत सिटी अस्पताल, नई दिल्ली में कार्डियोलौजी विभाग के चेयरमैन हैं)

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बाइकर्स गैंग : सड़कों पर धूम मचा ले धूम

तेज रफ्तार में लहरिया कट चलती मोटरसाइकिल की पिछली सीट पर बैठना अपनेआप में दिलेरी का काम है. पटना के वीआईपी इलाके बेली रोड पर सुबह के समय बाइकर्स गैंग का राज चलता है. सुदेश राज की मोटरसाइकिल होंडा सीवीआर-250 की पिछली सीट पर बैठना मौत के कुएं में कूदने जैसा दिल दहलाने वाला लगता है. बाइक के रफ्तार पकड़ने के साथ ही समूचे शरीर में सिहरन सी दौड़ पड़ती है. सुदेश राज के कंधों को अपने दोनों हाथों से जोर से पकड़ कर बैठने के बाद भी हर पल गिरने का खौफ बना रहता है. पलक झपकते ही बाइक हवा से बातें करने लगती है.

तकरीबन एक किलोमीटर तक 120 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से बाइक चलाने के बाद सुदेश राज अचानक ही ब्रेक लगाता है और पूरी मोटरसाइकिल स्किड करती हुई उलटी दिशा में घूम जाती है. इस से सुदेश राज के चेहरे पर कामयाबी की मुसकराहट तैर जाती है और डर के मारे मेरे मुंह से चीख निकल जाती है. उस के बाद फिर बाइक रफ्तार पकड़ने लगती है और सुदेश राज मुझ से कहता है कि उस के कंधे को जोर से पकड़ लें. जब तक मैं कुछ समझ पाता, सुदेश राज ने बाइक का अगला पहिया हवा में उठा लिया. मेरी तो घिग्घी बंध गई. मैं चिल्लाया, ‘‘अरे, बाइक रोको. मुझे उतरने दो.’’ सुदेश राज को मेरी घबराहट देख कर और ज्यादा मजा आ रहा था. वह कहने लगा, ‘‘अंकल, अभी तो यह शुरुआत है. अभी तो आगेआगे देखिए होता है क्या.’’

इतना कह कर सुदेश राज ने बाइक की रफ्तार झटके में बढ़ा दी और उस का हैंडल छोड़ कर गाना गुनगुनाने लगा, ‘‘धूम मचा ले, धूम मचा ले, धूम…’’ रफ्तार के दीवाने सुदेश राज का खून उबाल मार रहा था और दूसरी ओर डर के मारे मेरा तो खून सूखा जा रहा था. कुछ देर बाद बाइक की स्पीड कम होते ही मैं तकरीबन कूद कर नीचे उतर गया और सुदेश राज हाथ हिलाता हुआ अपने बाकी बाइकर दोस्तों के साथ हवा हो गया. बेली रोड, पटना के वीमंस कालेज के पास से बाइकर्स गैंग की रेसिंग शुरू होने वाली थी. मैं ने एक बाइकर सुदेश राज से कहा कि मैं भी बाइक की पिछली सीट पर बैठ कर रफ्तार का मजा लेना चाहता हूं. मेरी बात को सुन कर सुदेश राज और उस के गैंग के बाकी दोस्तों ने जम कर ठहाका लगाया.

एक ने कहा, ‘‘क्यों अंकल, इस उम्र में हड्डियां तुड़वाने का इरादा है क्या?’’

तभी दूसरे ने मुझ पर फब्ती कसी, ‘‘हम लोगों की बाइक की स्पीड देख कर तो आप का हार्ट फेल हो जाएगा?’’ तीसरे ने सलाह दी, ‘‘पहले अपने घर वालों से लिखवा कर ले आओ कि कोई अनहोनी हुई, तो इस के लिए हम बाइकर्स जिम्मेदार नहीं होंगे.’’

सभी ने जोर का ठहाका लगाया और मोटरसाइकिल के ऐक्सिलेटर को तेज कर कानफाड़ू आवाजें निकालने लगे. मैं ने उन से कहा कि मुझे भी अपनी बाइक पर बिठा कर थोड़ी दूर तक ले चलो और अपनी बाइक की स्पीड थोड़ी कम ही रखना. इस के जवाब में एक बाइकर जांबाजी दिखाते हुए अकड़ के साथ बोला, ‘‘बाइक की स्पीड तो हमारी ही मरजी के हिसाब से होगी. बैठना है तो बैठो, वरना अपनी मौर्निंग वाक करो.’’ मेरी चिरौरी को सुन कर सुदेश राज ने अपने एक साथी से कहा कि अंकल को हैलमैट पहना दो. उस के बाद मैं सुदेश राज की बाइक की पिछली सीट पर बैठ गया. वीमंस कालेज से ले कर गोल्फ क्लब तक बाइक कुछ ही सैकंड में पहुंच गई और उतनी देर में ‘कलेजा मुंह को आना’ वाली कहावत सच में मुझ पर तबदील हो चुकी थी. इस में कोई शक नहीं है कि बाइकर्स रफ्तार, जांबाजी और कलाबाजी का बेजोड़ नमूना सड़कों पर दिखाते हैं, लेकिन वहीं दूसरी ओर बाइकर्स गैंग शहर के आम लोगों के लिए दहशत बने हुए हैं.

बाइकर्स गैंग में ज्यादातर 15 से 22 साल की उम्र के लड़के होते हैं. यमहा फेजर, यमहा एफजेड-1, होंडा सीवीआर, होंडा सीवी ट्रिगर, सुजुकी जिक्सर एसएफ, सुजुकी जीएस-150, बजाज पल्सर-350, कावासाकी निंजा, हीरो ऐक्स्ट्रीम स्पोर्ट्स, हीरो करिज्मा वगैरह मोटरसाइकिल बाइकर्स की पहली पसंद हैं. इन की कीमत 70 हजार से डेढ़ लाख रुपए के बीच है. रईस घरों के बाइकर्स भी तकरीबन 10 से 15 लाख रुपए की कीमत वाली सुजुकी बैंडिट, सुजुकी एम-1800 आरजेड, यमहा वाईजेडएफ-आर 11, कावासाकी जैसी बाइकों का जम कर इस्तेमाल करते हैं.

सड़कों पर बाइक ले कर निकले बाइकर्स गैंग के लोग खुद को रोड का राजा मानते हैं और कदमकदम पर कानून की धज्जियां उड़ाते नजर आते हैं. कई शहरों में बाइकर्स गैंग लड़कियों से छेड़खानी और चेन स्नैचिंग की वारदातों को अंजाम देते हैं. पिछले दिनों पटना के बेली रोड पर चिडि़याखाना के पास बाइकर्स गैंग ने 2 औरतों के गले से सोने की चेन झपट ली थी. पास खड़े पुलिस वाले भी तमाशा देखते रह गए. पटना के एक कारोबारी विनोद कुमार पांडे कहते हैं कि वे रोज दफ्तर बंद कर रात 8-9 बजे घर जाते हैं, तो रास्ते में बाइकर्स गैंग का बवाल देख कर मन में खौफ पैदा होता है. पता नहीं, कलाबाजी दिखाने के चक्कर में किसे धक्का मार दें? तेज रफ्तार से दौड़ती बाइक से टकरा कर किसी की जान न चली जाए? बाइकर्स गैंग वाले खुद तो अपनी जान जोखिम में डालते ही हैं, सड़क पर चलने वाले दूसरे राहगीरों की जान पर भी खतरा बना रहता है.

किसी एक बाइकर का बाइक पर से बैलैंस बिगड़ने पर वह खुद तो हादसे का शिकार होता ही है, साथ ही कई लोगों को भी अपने लपेटे में ले लेता है. पटना में भी बाइकर्स गैंग की शुरुआत हो चुकी है. दिल्ली, मुंबई, बैंगलुरु, अहमदाबाद, जयपुर वगैरह शहरों में बाइकर्स गैंग की भरमार है और वे रोज सड़कों पर कलाबाजियां दिखाते हैं. बाइकर्स की रफ्तार और स्टंट को देख कर जहां लोगों के मन में खौफ पैदा होता है, वहीं कई लोग उन के करतबों को दांतों तले उंगलियां दबा कर देखते हैं और मजे लेते हैं. पटना यूनिवर्सिटी के लैक्चरार पीके सिंह कहते हैं कि सड़कों पर बाइकर्स की कलाबाजियों को देखना रोमांचक होता है. सड़कों के किनारे खड़े हो कर कई लोग सर्कस जैसा मजा लेने के लिए बाइकर्स का इंतजार करते देखे जा सकते हैं.

गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश का रहने वाला सुमित यादव बाइकर्स गैंग का मैंबर है. वह पिछले ढाई साल से गाजियाबाद, नोएडा और दिल्ली की सड़कों पर अपनी पल्सर-350 बाइक पर स्टंट करता रहा है. सुमित यादव बताता है कि उस के गैंग में 32 लड़के हैं और वे रात ढलते ही तेज रफ्तार से सड़कों पर बाइक चलाते हैं और कलाबाजियां दिखाते हैं. वह दिलेरी दिखाते हुए कहता है कि बाइक से स्टंट करते हुए वह 3 बार हादसे का शिकार हुआ, लेकिन उस के बाद भी उस का हौसला कम नहीं हुआ है. एक बार तो बाइक से गिरने पर उस का बायां हाथ टूट गया था.

एक महीने बाद जब प्लास्टर खुला, तो वह फिर से अपनी बाइक ले कर सड़कों पर उतर आया. बाइकर्स गैंग पुलिस के लिए खासा सिरदर्द बने हुए हैं. पिछले साल जुलाई महीने में नई दिल्ली में बाइकर्स गैंग को काबू में करने के लिए पुलिस ने एक बाइकर की बाइक के पिछले टायर में गोली मारी, लेकिन गोली बाइक के पीछे बैठे करन पांडे नाम के एक लड़के को जा लगी. उस की मौके पर ही मौत हो गई. वहीं बाइक को चला रहा पुनीत शर्मा जख्मी हो गया. पुलिस ने जांच में पाया कि पुनीत नशे में धुत्त हो कर बाइक चला रहा था. कई मामलों में यह पाया गया है कि नशे की हालत में बाइकर्स सड़कों पर स्टंट करते हैं और कई हादसों को न्योता देते हैं.

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मोहब्बत की परिणति

रविवार 21 जनवरी, 2018 का अलसाया हुआ दिन था. बसंत ऋतु ने दस्तक दे दी थी, लेकिन सूरज की किरणों में फिर भी तेजी नहीं आई थी. सिहराती सर्द हवाओं के बीच आसमान दिन भर मटमैले बादलों से ही अटा रहा. लेकिन मौसम की बदमिजाजी से लोगों की आमदरफ्त में कोई तब्दीली नहीं आई थी.

कोटा स्टेशन की बाहरी हदों से शुरू होने वाले बाजार में रोजमर्रा की रौनक जस की तस कायम थी. अगर कोई फर्क था तो इतना कि लोगों के चेहरों पर कशमकश के भाव थे और शौपिंग की बजाय उन की उत्सुकता चोपड़ा फार्म जाने वाली गली नंबर-2 की तरफ थी, जिसे पूरी तरह पुलिसकर्मियों ने घेर रखा था.

तेज होती खुसुरफुसुर से ही पता चला कि किसी ने एक महिला और उस के बेटे की हत्या कर दी है. यह वारदात वहां रहने वाले चर्चित भाजपा नेता नीरज पाराशर के परिवार में हुई थी. बदमाशों ने घर में घुस कर नीरज पाराशर की पत्नी सोहनी और 12 साल के बेटे पीयूष को गोली मार दी थी.

बेटी तान्या वारदात का शिकार होने से बच गई थी. दरअसल, गोली लगने से पहले ही सोहनी ने उसे घर से बाहर फेंक दिया था. शोर मचा तो आसपास के रहने वाले लोग फौरन मौके पर पहुंच गए, लेकिन बदमाश तब तक भाग चुके थे.

खबर मिलने पर भीममंडी के थानाप्रभारी रामखिलाड़ी पुलिस बल के साथ वहां पहुंच गए थे. इस दोहरे हत्याकांड की खबर जब उन्होंने आला अधिकारियों को दी तो एएसपी समीर कुमार, डीएसपी शिवभगवान गोदारा, राजेश मेश्राम भी वहां आ गए. 10 मिनट बाद आईजी विशाल बंसल और एसपी अंशुमान भोमिया भी वहां पहुंच गए.

पुलिस अधिकारियों के सामने जो चुनौती मुंह बाए खड़ी थी, उस से निपटना आसान नहीं था. क्योंकि कुछ ही दिनों पहले स्टेशन क्षेत्र में एक और भाजपा नेता की दिनदहाड़े हत्या कर दी गई थी. इस के अलावा शहर में हत्या की और भी कई वारदातें अनसुलझी पड़ी थीं. इस सब को ले कर एसपी साहब के चेहरे पर तनाव साफ दिखाई दे रहा था.

केस बड़ा पेचीदा था. पुलिस इस बात पर भी हैरान थी कि इस चहलपहल वाले इलाके में नीरज पाराशर के मकान में बदमाश बेखौफ हो कर आए और मांबेटे को गोलियों से भून कर चले गए.

सोहनी की करपटी और उस के बेटे पीयूष के सीने में गोलियां लगी थीं. लग रहा था जैसे उन्हें गोली बहुत करीब से मारी गई थी. एक गोली कमरे की दीवार पर भी लगी थी, दीवार पर गोली टकराने का निशान बन गया था. पुलिस ने मौके से गोली का खोल भी बरामद कर लिया.

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सूचना मिलने पर पुलिस फोटोग्राफर, क्राइम इनवैस्टीगेशन टीम, डौग स्क्वायड और एफएसएल की टीमें भी वहां पहुंच गई थीं. सभी टीमें अपनेअपने ढंग से काम कर के लौट गईं. थानाप्रभारी रामखिलाड़ी मीणा ने शवों को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया और आगे की जांच में जुट गए.

उन्होंने नीरज पाराशर से बात की तो उस ने बताया कि घटना के वक्त वह सब्जी लेने के लिए बाजार गया हुआ था. सरेआम हुई इस वारदात ने पूरे इलाके में सनसनी फैला दी थी. गोली चलाने वाले कौन थे, किस तरफ भागे थे, किसी को कुछ पता नहीं था. पुलिस ने आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों के फुटेज भी खंगाले, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला.

पुलिस ने पड़ोसियों से बात की तो उन्होंने बताया कि हम ने गोलियां चलने की आवाज तो नहीं सुनी अलबत्ता मार दिया…मार दिया… की चीखपुकार जरूर सुनी थी. जिस के बाद वे लोग पाराशर के मकान की तरफ दौड़े. हालांकि कुछ लोगों ने पाराशर के मकान से एक आदमी को भागते देखा, लेकिन वह कौन था, कैसे आया और कहां गया, इस बाबत कुछ नहीं बता पाए.

पुलिस पूछताछ में रोताबिलखता नीरज ठीक से कुछ नहीं बता पा रहा था. टुकड़ों में जो कुछ वह कह रहा था, उस से पुलिस सिर्फ इतना समझ पाई कि उस की पत्नी सोहनी मुरैना की रहने वाली थी, जहां पड़ोस में रहने वाले चंद्रकांत पाठक उर्फ दिलीप से उस का अफेयर था. 2 महीने पहले सोहनी उस के साथ भाग गई थी, जिस की गुमशुदगी की सूचना उस ने थाना भीममंडी में दर्ज करा रखी थी.

पिछले दिनों उसे सोहनी के मुरैना में होने का पता चला तो वह मुरैना जा कर उसे ले आया. नीरज ने पुलिस को बताया कि वारदात करने वाला चंद्रकांत पाठक के अलावा कोई नहीं हो सकता. थानाप्रभारी ने यह सारी जानकारी एसपी अंशुमान भोमिया को दे दी.

इन सब बातों से अंशुमान भोमिया को लगा कि पूरे घटनाक्रम में सोहनी की कोई महत्त्वपूर्ण भूमिका रही होगी. इसलिए उन का पूरा ध्यान उस के अतीत और उस के प्रेमी चंद्रकांत पाठक पर अटक गया.

नीरज ने एसपी साहब से मुलाकात की. उस ने उन्हें एक नई जानकारी यह दी कि चंद्रकांत पाठक ने चेतन शर्मा के नाम से एक फरजी फेसबुक आईडी बना रखी थी. चंद्रकांत एक उच्चशिक्षित युवक था, साथ ही अच्छा शूटर भी. मध्य प्रदेश में उसे शार्पशूटर का अवार्ड मिल चुका था.

पुलिस ने नीरज से इस बारे में विस्तार से जानकारी मांगी कि सोहनी कब और कैसे गायब हुई थी? इस पर नीरज ने बताया, ‘‘नवंबर, 2017 में मैं अपनी पत्नी और बच्चों के साथ अपनी ससुराल मुरैना गया था. वहां से 20 नवंबर को हम कोटा लौट आए थे. 22 नवंबर को मैं गोवर्धन परिक्रमा के लिए वृंदावन चला गया था.

मेरी गैरमौजूदगी में चंद्रकांत पाठक आया और जबरन पत्नी को ले कर चला गया. उस समय दोनों बच्चे भी घर पर थे, जो सो रहे थे. बाद में जब बेटा पीयूष सो कर उठा और उस ने मां को नहीं देखा तो उस ने मुझे फोन किया. तब मैं ने पत्नी की गुमशुदगी की सूचना दर्ज कराई और अपने स्तर पर भी उस की तलाश करता रहा, लेकिन निराशा ही हाथ लगी.’’

उस ने आगे बताया, ‘‘सर, जनवरी, 2018 में अचानक मेरे पास पत्नी का फोन आया. उस ने किसी और के मोबाइल से फोन किया था. पत्नी ने मुझे बताया कि चंद्रकांत ने उसे कैद कर रखा है, आ कर उसे छुड़ा लें. यह जानने के बाद मैं मुरैना गया और पत्नी को साथ ले कर कोटा आ गया. चंद्रकांत पत्नी से कोई संपर्क न कर सके, इसलिए मैं ने पत्नी का फोन नंबर भी बदल दिया था. इस से खीझ कर एक दिन चंद्रकांत ने मुझे फोन पर ही धमकी दी कि सोहनी से बात करवा दो वरना पूरे परिवार को जान से मार देगा.’’

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नीरज से पूछताछ के समय एसपी अंशुमान भोमिया भी वहीं मौजूद थे. उन्होंने नीरज को तीखी नजरों से देखा, वह उन से आंखें नहीं मिला सका. नीरज के हावभाव और बातों से उन्हें उसी पर शक होने लगा था. लेकिन उन्होंने जानबूझ कर उसे ज्यादा कुरेदना उचित नहीं समझा. इसी बीच एक नई जानकारी ने पुलिस की तहकीकात का रुख मोड़ दिया.

पता चला कि चंद्रकांत पाठक शनिवार 20 जनवरी, 2018 की देर रात कोटा पहुंचा था और स्टेशन क्षेत्र के ही एक होटल में ठहरा था. पुलिस का मानना था कि निश्चित रूप से उस ने अगले रोज 21 जनवरी को दिन भर नीरज के घर के आसपास रेकी की होगी और जैसे ही उसे मौका मिला, वह वारदात को अंजाम दे कर भाग गया.

पुलिस ने नीरज और सोहनी की फेसबुक देखी तो इस प्रेम कहानी का काफी कुछ खुलासा हो गया. फेसबुक पर मोहब्बत और नफरत के जज्बात साथसाथ मौजूद थे. पत्नी के इस तरह छोड़ कर चले जाने से नीरज पाराशर इस हद तक परेशान था कि उस की यादें सहेजने के लिए पुराने फोटो शेयर करने के साथ मोहब्बत और हिकारत दोनों उगल रहा था.

15 दिसंबर, 2017 को नीरज ने अपनी फेसबुक पर लिखा, ‘आई हेट सोहनी पाराशर एंड माई लाइफ…’ 28 दिसंबर को सुर बदला तो उस के मन में सोहनी के लिए  तड़प पैदा हुई. उस ने लिखा, ‘आप कहां हो सोहनी, कम बैक प्लीज…’

31 दिसंबर को मोहब्बत ने जोर मारा तो नए साल की मुबारकबाद देते हुए लिखा, ‘विश यू ए हैप्पी न्यू ईयर सोहनी पाराशर’. 5 जनवरी को वैराग्य का भाव जागा तो कुछ अलग ही असलियत उजागर हुई, ‘सोहनी पैसे की दीवानी थी’. नीरज ने आगे लिखा, ‘इस दुनिया में कोई रिश्ता इंपोर्टेंट नहीं है, सब कुछ केवल पैसा है.’

पुलिस ने चंद्रकांत पाठक के फरजी नाम चेतन शर्मा की फेसबुक सर्च की तो चंद्रकांत और सोहनी की तूफानी मोहब्बत खुल कर सामने आ गई. 15 जनवरी को चंद्रकांत ने सोहनी के साथ करीब डेढ़ सौ फोटो शेयर किए थे, जो होटलों में मौजमस्ती और घूमनेफिरने की तस्दीक कर रहे थे.

17 जनवरी, 2018 को चंद्रकांत ने जो कुछ फेसबुक पर लिखा, उस ने उस के इरादों पर मुहर लगा दी. चंद्रकांत ने लिखा था, ‘इस दुनिया को अलविदा, मेरी जिंदगी यहीं तक थी. माफ कर देना, सभी का दिल दुखाया, बट गलत  मैं था. माफ कर देना… लव यू आल…सौरी.’

टूटे हुए दिल से निकले अल्फाज चंद्रकांत की उस मनोदशा की तसदीक कर रहे थे, जब कोई शख्स खुदकुशी का फैसला करता है जबकि सोहनी का कत्ल तो कुछ और ही कहानी की तरफ इशारा कर रहा था.

मामला काफी संदिग्ध था. नीरज अपनी बात पर अडिग था कि उस की पत्नी सोहनी की हत्या चंद्रकांत पाठक ने की है. लेकिन एसपी अंशुमान भोमिया के इस सवाल का उस के पास कोई जवाब नहीं था कि अगर तुम्हारी पत्नी से उस का अफेयर था तो आखिर ऐसा क्या हुआ कि वह उस की हत्या करने पर आमादा हुआ और मासूम बच्चे से चंद्रकांत की क्या दुश्मनी थी जो उस ने उसे भी गोली मार दी?

नीरज इस बाबत भी चुप्पी साधे रहा. एसपी अंशुमान भोमिया ने अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक समीर कुमार की अगुवाई में तेजतर्रार अफसरों डीएसपी शिवभगवान गोदारा, राजेश मेश्राम और भीमंडी नयापुरा और रेलवे कालोनी के थानाप्रभारियों को शामिल कर के एक पुलिस टीम बनाई और चंद्रकांत की तलाश में भेज दी. इस टीम ने उसे बिलासपुर, श्योपुर और देहरादून में तलाशा.

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पुलिस की यह कोशिश रंग लाई. चंद्रकांत को मध्य प्रदेश के श्योपुर से गिरफ्तार कर लिया गया. थाने ला कर जब उस से पूछताछ की गई तो पता चला कि वह उच्चशिक्षित था. उस ने मैथ्स, कैमिस्ट्री और कंप्यूटर साइंस में मास्टर डिग्री प्राप्त की थी. पीजीडीए किए चंद्रकांत पाठक के पास मास्टर औफ फाइन आर्ट्स की भी डिग्री थी.

इतना ही नहीं, वह सटीक निशानेबाज भी था. उसे बेस्ट शूटर का प्रोसीडेंट अवार्ड भी मिल चुका था. वह एनसीसी का सी सर्टिफिकेट होल्डर भी था.

एसपी भोमिया ने उस से पूछा कि इतना क्वालीफाइड हो कर भी उस ने इतनी संगीन वारदात को अंजाम कैसे दिया. इस बारे में उस ने जो कुछ बताया, उस से पूरी कहानी मोहब्बत पर आ कर सिमट गई.

चंद्रकांत पाठक उर्फ दिलीप उर्फ चेतन शर्मा मूलरूप से मुरैना के दत्तपुरा का रहने वाला था. सोहनी का परिवार उस के घर के ठीक सामने ही रहता था. दोनों का बचपन एक साथ खेलतेपढ़ते बतियाते बीता था. बचपन की यह दोस्ती कब प्यार में बदल गई, दोनों ही नहीं समझ सके. अलबत्ता दोनों मोहब्बत में इस कदर डूबे थे कि एकदूसरे के बिना रहने की कल्पना करना भी उन्हें गवारा नहीं था.

लेकिन पारिवारिक बंदिशों के कारण यह मोहब्बत जीवनसाथी की डोर में नहीं बंध पाई. कालांतर में सोहनी का विवाह कोटा के नीरज पाराशर से हो गया और चंद्रकांत ने भी परिवार की जिद के आगे सिर झुका कर कहीं दूसरी जगह शादी कर ली.

दोनों अलगअलग रिश्तों की डोर में बंध तो गए, लेकिन आशिकी खत्म नहीं हुई. चंद्रकांत के पिता का मुरैना में डीजे का काम था. वह पिता के काम में ही हाथ बंटाने लगा. बाद में चंद्रकांत के भी एक बेटा हो गया और सोहनी भी 2 बच्चों की मां बन गई.

इस के बावजूद सोहनी और चंद्रकांत के संबंध बने रहे. सोहनी अपने मायके मुरैना आती तो वह चंद्रकांत से जरूर मिलती. किसी तरह नीरज को इस बात की भनक लग गई. इस के बाद दोनों ने मिलने में ऐहतियात बरतनी शुरू कर दी. चंद्रकांत का कहना था, ‘कोई 2 महीने पहले मैं बिलासपुर में था. सोहनी वहीं आ गई थी. सोहनी अपनी ससुराल वालों को बिना बताए आई थी. इस के बाद चंद्रकांत ने सोहनी के साथ रहना शुरू कर दिया था.

‘इसी दौरान चंद्रकांत ने 20 लाख रुपए में अपनी दुकान बेची थी. वह रकम उस के पास मौजूद थी. इस बीच सोहनी उस की गैरहाजिरी में अपने पति के साथ कोटा चली गई. जाते समय वह मेरे 2 लाख रुपए और गहने अपने साथ ले गई थी. सोहनी ने मेरे साथ फरेब किया था.’

‘‘सोहनी के कत्ल की नौबत क्यों आई? अगर फरेब की कोई वजह थी तो उस मासूम बच्चे को क्यों मारा?’’ एसपी भोमिया ने पूछा.

‘‘नहीं सर, मेरा इरादा ऐसा नहीं था. मैं नीरज की गैरमौजूदगी में ही सोहना से मिलना चाहता था. ऐसा मैं ने किया भी.’’ एक पल रुकते हुए चंद्रकांत ने कहना शुरू किया, ‘‘मैं ने अपनी रकम और जेवरात सोहनी से मांगे तो वह उल्टे मुझ पर ही बरस पड़ी. मैं ने उसे डराने के लिए पिस्टल दिखाई, लेकिन अचानक बच्चा मेरे ऊपर झपट पड़ा और पिस्टल छीनने की कोशिश करने लगा. इस छीनाझपटी में ही ट्रिगर दब गया और बच्चे को गोली लग गई.

‘‘सोहनी को तो मुझे मजबूरी में मारना पड़ा. उसे नहीं मारता तो वह बेटे की हत्या की गवाह बन जाती. बेटे की मौत से सोहनी को अपनी बेटी की जान भी खतरे में नजर आई तो उस ने बच्ची को दरवाजे की तरफ फेंक दिया. सोहनी पर मैं ने 2 गोलियां चलाईं. अफरातफरी में निशाना चूक गया और एक गोली दीवार में धंस गई. एक गोली उस की कनपटी पर लगी थी. उस के बाद मैं बुरी तरह दहशत में आ गया था. इस के बाद मैं पहले दिल्ली चला गया फिर श्योपुर आ गया.’’

पुलिस ने उस से पूछताछ करने के बाद उसे भादंसं की धारा 302 के तहत गिरफ्तार कर न्यायालय में पेश किया, जहां से उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. 2 लाख की रकम और जेवरात अभी पुलिस बरामद नहीं कर पाई. कथा लिखे जाने तक चंद्रकांत जेल में बंद था.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

रेप, रेप, रेप…नहीं संभल रही भाजपा से सत्ता

उन्नाव कांड और कठुआ कांड पर समूचा देश सकते में है. जो गुस्सा निर्भया बलात्कार मामले में देखा गया, वैसा ही आक्रोश देशभर में उबल रहा है. घटनाओं के विरोध में महिला संगठन, छात्र संगठन और सामाजिक संगठन सड़कों पर कैंडल मार्च कर रहे हैं. जगहजगह धरना दे कर पीडि़ताओं को न्याय दिलाने की मांग की जा रही है. दोनों अमानवीय घटनाओं में सत्ता प्रतिष्ठान द्वारा अपराधियों के बचाव में खड़े हो कर न्याय की राह में आड़े आने का रवैया हैरान कर देने वाला था. अपराधियों के साथ भगवा सत्ता और हिंदू संगठनों के समर्थन का खतरनाक रूप सामने आया है.

शुरू में भाजपा सरकार की जिस तरह से जयजयकार हो रही थी, 4 वर्ष होतेहोते अब उस के प्रति लोगों में आक्रोश देखा जाने लगा है. सरकार कई मोरचों पर असफल रही है. क्या भाजपा से सत्ता संभल नहीं रही है? देश में अराजक तत्त्वों का बोलबाला बढ़ रहा है और सरकार उन के आगे असहाय बनी दिख रही है. तमाम मंत्रालय निकम्मे साबित हो रहे हैं.

कुकर्मियों का बचाव 

कठुआ की घटना को लें. जम्मूकश्मीर के कठुआ जिले के सरन गांव की 8 वर्षीया आमना (बदला हुआ नाम) का पहले अपहरण हुआ. उसे करीब एक सप्ताह तक एक मंदिर में बंधक बना कर रखा गया. उस का यौनशोषण किया गया और फिर बेरहमी से मार डाला गया. अबोध आमना अल्पसंख्यक गुर्जर बकरवाल समुदाय की लड़की थी. अपराध शाखा द्वारा दायर आरोपपत्र के अनुसार यह जघन्य कांड अल्पसंख्यक समुदाय को इलाके से हटाने के लिए रची गई सोचीसमझी साजिश थी.

मामले में 8 लोगों को गिरफ्तार किया गया है. अफसोस और शर्म की बात है कि मामला सामने आने के बाद हिंदू संगठनों ने तिरंगा ले कर भारत माता की जय बोलते हुए अपराधियों के समर्थन में सड़कों पर जुलूस निकाला. जुलूस में राज्य सरकार में शामिल भाजपा के 2 मंत्री भी शरीक थे जिन के खिलाफ हल्ला मचने पर पार्टी द्वारा उन से इस्तीफा देने को कहा गया.

इस बर्बर कांड को ले कर सोशल मीडिया पर जो गुस्सा निकल रहा है, उस में क्या हिंदू, क्या मुसलमान, क्या सिख यानी इंसाफ के लिए उमड़े आक्रोश के सामने तमाम धर्मों की दीवारें ढह गईं. हर धर्म, वर्ग, जाति के लोगों द्वारा आमना के साथ हुए बर्बर अत्याचार के लिए दोषियों को कड़ी से कड़ी सजा दिए जाने की मांग की जा रही है.

विधायक का खौफ

उन्नाव की घटना भी ऐसी ही है. उत्तर प्रदेश के उन्नाव में एक युवती के साथ बलात्कार के मामले में भाजपा विधायक कुलदीप सिंह सेंगर का नाम भी है. उन के अलावा 3 अन्य आरोपी हैं. मृतक की बेटी का आरोप है कि विधायक और उस के साथी लोगों ने उस के साथ गैंगरेप किया. दरअसल, ये लोग लड़की के परिवार से रंजिश रखते थे. उन को नीचा दिखाने व सबक सिखाने के लिए सालभर पहले रेप किया था.

अपने साथ हुए दुष्कर्म को ले कर लड़की मुकदमा लिखाने के लिए दरदर भटक रही थी. विधायक का नाम मुकदमे में लिखने को पुलिस तैयार नहीं हुई तो लड़की ने कोर्ट जा कर मुकदमा दर्ज कराया. जब कोर्ट के जरिए यह मुकदमा लिखा गया तो विधायक ने मुकदमा वापस लेने के लिए उस के पिता को पीटा और जेल भिजवा दिया, जहां उस की मौत हो गई. पूरे घटनाक्रम को देखें तो विधायक की धौंस पता चलती है.

पद का घमंड

लखनऊ से 56 किलोमीटर दूर उन्नाव जिले के माखी गांव की पीडि़ता (बदला हुआ नाम कविता) के पिता और दोनों चाचा 15 साल पहले कुलदीप सिंह सेंगर के करीबी हुआ करते थे. कविता की 3 बहनें और 1 भाई है. एक ही जाति के होने के कारण उन में आपसी तालमेल भी बेहतर था. वे एकदूसरे के सुखदुख में साझीदार होते थे. दोनों ही परिवार माखी गांव के सराय थोक इलाके के रहने वाले थे. कविता के ताऊ सब से दबंग थे. कुलदीप सिंह सेंगर ने कांग्रेस से अपनी राजनीति शुरू की. चुनावी सफर में कांग्रेस का सिक्का कमजोर था तो वे विधानसभा का पहला चुनाव बसपा यानी बहुजन समाज पार्टी के टिकट पर लड़े और 2002 में पहली बार उन्नाव की सदर विधानसभा सीट से विधायक बने.

कुलदीप के विधायक बनने के बाद कविता के परिवारजनों के साथ कुलदीप का व्यवहार बदलने लगा. जहां पूरा समाज कुलदीप को विधायकजी कहने लगा था, वहीं कविता के ताऊ कुलदीप को उन के नाम से बुलाते थे. कुलदीप अपनी छवि को बचाने के लिए इस परिवार से दूरी बनाने लगे. कविता के पिता और उन के दोनों भाइयों को यह लगा कि कुलदीप के भाव बढ़ गए हैं. वे किसी न किसी तरह से कुलदीप को नीचा दिखाने की कोशिश में लगे रहे. यह मनमुटाव बढ़ता गया. एक तरफ जहां कविता का परिवार कुलदीप का विरोध कर रहा था वहीं कुलदीप अपना राजनीतिक सफर बढ़ाते गए.

कविता के ताऊ के ऊपर करीब एक दर्जन मुकदमे माखी और दूसरे थानाक्षेत्रों में दर्ज थे. करीब 10 वर्षों पहले उन्नाव शहर में भीड़ ने ईंटपत्थरों से हमला कर के कविता के ताऊ को मार दिया. कविता के परिवार के लोगों ने इस घटना का जिम्मेदार विधायक कुलदीप को ही माना था. कविता के ताऊ की मौत के बाद उस के चाचा उन्नाव छोड़ कर दिल्ली चले गए. वहां उन्होंने अपना इलैक्ट्रिक वायर का बिजनैस शुरू किया. उन के ऊपर 10 मुकदमे दर्ज थे. कविता के पिता अकेले रह गए. उन के ऊपर भी 2 दर्जन मुकदमे दर्ज थे. नशा और मुकदमों का बोझ उन को बेहाल कर चुका था.

कुलदीप ने 2007 का विधानसभा चुनाव समाजवादी पार्टी के टिकट पर बांगरमऊ विधानसभा से जीता और 2012 में भगवंतनगर विधानसभा से चुनाव जीता. 2017 के विधानसभा चुनाव में कुलदीप ने भाजपा का साथ लिया और बांगरमऊ से विधायक बन गए. विधायक कुलदीप सिंह सेंगर के परिवार की कविता के परिवार से रंजिश बनी रही. उन्नाव जिले की पहचान दबंगों वाली है. यहां अपराधी प्रवृत्ति के लोगों की बहुतायत है. माखी गांव बाकी गांवों में से संपन्न माना जाता है. यहां कारोबार भी दूसरों की अपेक्षा अच्छा चलता है.

योगी राज के लिए फांस 

विधायक कुलदीप सिंह सेंगर के मामले को देखें तो पूरी बात साफ हो जाती है. सत्ता की हनक में अपना विरोध करने वाले के साथ विधायक कुलदीप सेंगर ने जो कुछ किया, वह अब योगी राज के गले में फांस बन गई है. उन्नाव से ले कर राजधानी लखनऊ तक केवल पुलिस ही नहीं, जेल और अस्पताल तक में जिस तरह से विधायक के विरोधी के साथ बरताव हुआ, वह किसी कबीले की घटना से कम नहीं है. पहले अपने विरोधी की पिटाई पानी डालडाल कर की जाती है. मरणासन्न अवस्था में उस के खिलाफ मुकदमा कायम करा कर पुलिस की मिलीभगत से जेल भेज दिया जाता है. घायल को ले कर पुलिस सरकारी अस्पताल जाती है जहां उस का इलाज करने के बजाय उसे जेल भेज दिया जाता है. घायल को जेल में सही इलाज नहीं मिलता जिस से वह तड़पतड़प कर मर जाता है.

विधायक की धौंस तो पूरे देश को सुनाई देने लगी. सरकार ने पहले बचाव किया. जब जनता से ले कर कोर्ट तक सरकार की नीयत पर सवाल उठने लगे तब दबाव में पूरा मामला सीबीआई को सौंपना पड़ा. सत्ता के आते ही योगी राज में भाजपाइयों की धौंस बढ़ गई है.

ऐसे सीन फिल्मों में देखने को मिल सकते हैं. पुलिस से ले कर जेल और अस्पताल तक के लोग विधायक की धौंस के आगे नतमस्तक बने रहे. जेल में जाने के दूसरे ही दिन घायल की मौत हो जाती है, मौत के बाद जागी सरकार के दबाव में पुलिस विभाग ने अपने कर्मचारियों को भले ही सस्पैंड कर दिया हो पर जिला जेल और अस्पताल के लोगों को कोई सजा नहीं दी गई है. अपना दामन बचाने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने पूरे मामले की जांच के लिए एसआईटी बना दी है.

बलात्कार का अनकहा सच

कविता के साथ हुए बलात्कार के मसले पर जो जानकारी सामने आई उस के अनुसार जून, 2017 में राखी (बदला हुआ नाम) नामक महिला कविता को ले कर विधायक कुलदीप के पास गई. विधायक ने उसे बंधक बना लिया उस के साथ बलात्कार किया गया. बलात्कार का आरोप विधायक के भाई और साथियों पर लगा. घटना के 8 दिनों के बाद कविता औरया जिले के पास मिली. कविता और उस  के पिता ने इस बात की शिकायत थाने में की. पुलिस ने 3 आरोपी युवकों को जेल भेज दिया. घटना में विधायक का नाम शामिल नहीं हुआ.

एकतरफा कार्यवाही

3 अप्रैल, 2018 को विधायक के छोटे भाई ने कविता के पिता के साथ मारपीट का मुकदमा वापस लिए जाने के लिए कहा. कविता और उस के परिवारजनों ने पुलिस में मुकदमा लिखाया. इस के साथ ही साथ विधायक के लोगों की तरफ से भी मुकदमा लिखाया गया. पुलिस ने क्रौस एफआईआर  दर्ज कीं और केवल कविता के पिता को जेल भेज दिया. कविता का आरोप है कि जेल में विधायक के लोगों ने उस के पिता की खूब पिटाई की.

8 अप्रैल को कविता अपने परिवारजनों के साथ राजधानी लखनऊ आई और सीधे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के कालीदास मार्ग स्थित आवास पर पहुंच गई. यहां उस ने आत्मदाह करने की कोशिश की. पुलिस ने उस को पकड़ लिया. गौतमपल्ली थाने में कविता को रखा गया.

वहां से पूरे मामले की जांच करने के लिए एसपी, उन्नाव से कहा गया. इस बीच जेल में ही कविता के पिता की मौत हो गई. पोस्टमौर्टम रिपोर्ट में पिटाई और घाव में सैप्टिक हो जाने से मौत होने की पुष्टि हुई. पोस्टमौर्टम रिपोर्ट में मृतक के शरीर पर चोट के 14 निशान पाए गए.

योगी की मजबूरी

कविता के पिता की जेल में मौत के बाद उत्तर प्रदेश की राजनीति गरमा गई. विपक्षी दलों में समाजवादी पार्टी से ले कर कांग्रेस तक ने सरकार पर आरोप लगाने शुरू कर दिए. खुद विधायक कुलदीप सिंह सेंगर मुख्यमंत्री से मिलने गए. लेकिन उन्होंने विधायक से मुलाकात नहीं की. विधायक को यह संदेश दिया गया कि वे जांच में सहयोग करें. सरकार की सख्ती के बाद कविता के पिता से मारपीट के आरोपी विधायक के भाई अतुल सिंह को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया. कविता ने इस के बाद भी अपनी लड़ाई जारी रखी है.

निकम्मी साबित होती सरकार

दोनों मामलों को ले कर पूरे देश में भाजपा की किरकिरी हो रही है. शुरू में भाजपा सरकार द्वारा विकास की जो योजनाएं पेश की गईं अब उन का जिक्र ही नहीं है. स्वच्छता अभियान फेल हो गया. राजधानी दिल्ली में चारों ओर बेशुमार गंदगी का आलम देखा जा सकता है. ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ नारे की धज्जियां उड़ रही हैं. विश्व के देशों की भ्रष्टाचार लिस्ट में भारत उसी जगह पर विराजमान है. बेरोजगारी का ग्राफ बढ़ता जा रहा है. हिंदुत्व उन्माद देश के युवाओं को निगल रहा है. उन में नशाखोरी बढ़ती जा रही है.

कृषि में कोई सुधार होता नहीं दिखता. किसानों की आय दोगुनी करने की बात की जा रही है पर कैसे होगी, ऐसी कौन सी जादू की छड़ी है, यह नहीं बताया जा रहा. उलटे, किसानों का गुस्सा और बढ़ रहा है. किसानों की आत्महत्याओं की दर घटने का नाम नहीं ले रही. युवा रोजगार के लिए सड़कों पर उतरे दिखाईर् पड़ रहे हैं. महिलाएं सुरक्षा के लिए आंदोलनरत हैं. विद्यार्थियों की परीक्षाओं के पेपर सुरक्षित नहीं हैं.

स्टार्टअप, स्टैंडअप इंडिया, न्यू इनोवेशन, प्रधानमंत्री स्वरोजगार योजना जैसी ललचाने वाली स्कीमों की अब चर्चा ही नहीं है.

इन सब के अलावा जिन चीजों का सब से अधिक विकास हुआ, वे हैं सामाजिक वैमनस्यता, जातीय व धार्मिक विभाजन और गहरा हुआ, घृणाहिंसा कभी गोरक्षा के नाम पर तो कभी वंदेमातरम के नाम पर. जातीय अस्मिता, धर्म, संस्कृति, लव जिहाद, आरक्षण विरोध, दलितों पर हिंसा जैसे मामलों को ले कर देश में नफरत का माहौल पैदा किया गया. ऐसे मामलों में सरकार कोई नियंत्रण नहीं कर पाई. उलटा, सरकार इन के समर्थन में खड़ी नजर आई.

अपराधियों को सत्ता का कवच

यह आश्चर्य की बात नहीं है कि कठुआ से उन्नाव तक अन्याय की घटनाएं हावी हैं और सत्ता प्रतिष्ठान का अहंकार न्याय की राह रोक रहा है. बलात्कार मामलों को ले कर भाजपा सरकार और उस के हिंदू संगठन अपराधियों के बचाव में आ खड़े हुए. असल में समूची हिंदुत्व संस्कृति ही स्त्रियों के यौनशोषण की समर्थक और उस की स्वतंत्रता की विरोधी रही है. यकीन न हो तो प्राचीन गं्रथ उठा कर देख लीजिए.

धर्म अमानवीय अपराधों पर कवच बना हुआ है. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने यों ही पूर्व गृहराज्य मंत्री स्वामी चिन्मयानंद को अपनी शिष्या के साथ बलात्कार का मामला वापस नहीं ले लिया. पीडि़त शिष्या राष्ट्रपति से आरोपी स्वामी के खिलाफ वारंट जारी करने की मांग करे तो करे, योगी सरकार तो धर्र्म की राह पर है. दोषी तो स्त्रियां हैं, उन्हें नरक का द्वार, पाप की गठरी, मर्द के लिए भोग्या करार दिया गया है. भाजपा इसी सोच की ही तो पोषक है.

मोदी और योगी के राज में गायों को बचाने के लिए मनुष्यों की जानें ले लेने और स्त्री की अस्मत व जान की तुच्छ कीमत मानने वाली संस्कृति की पैराकारी ही तो की जा रही है. असल में धर्मों में श्रम की नहीं, निकम्मेपन की पैरवी है. भाजपा सरकार वही कर रही है. रामराज्य का यूटोपिया प्रचारित किया जा रहा है

अक्षम मंत्रालय, अकर्मण्य मंत्री

सरकार के तमाम मंत्री निकम्मे साबित हो रहे हैं. वित्त मंत्री बीमार हैं. विदेश मंत्री लाचार हैं. बैंकों का अरबों रुपया ले कर फ्रौड कारोबारी देश से भागे जा रहे हैं. तिजोरी के रक्षक होने का दावा करने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक के बाद एक मामले सामने आने पर चुप्पी साधे हैं.

विदेश मंत्री का काम सिर्फ इतना दिखाई देता है कि वे विदेश में फंसे किसी भारतीय नागरिक को देश में बुलाने के साधन मुहैया करा दें. कानून मंत्री मजबूर दिखते हैं. उन के सामने पहली बार देश की सर्वोच्च न्याय संस्था में मतभेद उभर कर जगजाहिर हो रहे हैं. न्याय व्यवस्था पर से लोगों का भरोसा उठता जा रहा है. समूचा न्यायतंत्र भ्रष्टाचार में जकड़ चुका है. संवैधानिक न्याय व्यवस्था पर सरकार के नियंत्रण की मंशा उजागर हो रही है. न्यायाधीशों की नियुक्ति से ले कर फैसलों तक पर शक और सच उजागर हो रहे हैं.

सूचना प्रसारण मंत्री फेक न्यूज के नाम पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने का प्रस्ताव ला रही हैं. सरकार प्रैस नाम की संस्था को मजबूत करने के बजाय उसे सैंसर करना चाह रही है. पत्रकारिता के मूल्यों को रौंदा जा रहा है.

महिला रक्षा मंत्री की कोई कामयाबी अब तक कहीं प्रदर्शित नहीं हुई. गृहमंत्री से आंतरिक सुरक्षा नहीं संभल रही. वे केवल कड़ी कार्यवाही का आश्वासन देते सुनाई पड़ते हैं. फर्जी मुठभेड़ों के बल पर तमगे बांटे जा रहे हैं.

मानव संसाधन विकास मंत्रालय से शिक्षक, छात्र, अभिभावक सब परेशान हैं. पेपर लीक हो रहे हैं. स्कूलों, कालेजों, यूनिवर्सिटियों में अध्यापक नहीं हैं, अध्यापक हैं तो पढ़ाईर् नहीं है. निचले वर्गों के साथ भेदभाव है. शिक्षा संस्थानों को 5 हजार साल पुरानी हिंदू गुरुकुल, आश्रमों की शिक्षा पद्धति का अड्डा बनाया जा रहा है. कहा जाता है कि तमाम मंत्रालयों का काम प्रधानमंत्री कार्यालय देखता है. पर लगता नहीं कि पीएमओ समूचे देश को संभाल पा रहा है. पीएमओ ने सारे मंत्रियों को अकर्मण्य बना दिया है.

वोट की खातिर

धर्म के एजेंडे के अनुसार ऐसे काम होते दिख रहे हैं जो देश और समाज के हित में नहीं हैं. भाजपा सीधेसीधे पौराणिक व्यवस्था थोपना चाहती है. वोटों की खातिर भाजपा पिछड़ों और दलितों को अपनाना तो चाहती है पर इन्हें वर्णव्यवस्था के तहत पिछड़ा और दलित बनाए रख कर. सामाजिक स्तर पर उसे जातियों और उपजातियों के विभाजित हिंदू ही स्वीकार्य हैं. हिंदू एकता उस के लिए राजनीतिक मुद्दा है, सामाजिक मुद्दा नहीं, इसलिए पिछड़ों और दलितों में राजनीतिक एका तो करा दिया जाता है पर सामाजिक एकता नहीं हो पाती. (देखें अगला लेख : दलित आक्रोश)

विकास कहां

देश में विकास इसलिए नहीं हो पा रहा क्योंकि भाजपा की संघी सोच श्रम को नीचा मानती आई है और जो श्रम करने वाला वर्ग है यानी पिछड़े और दलित, वे खुद भी ब्राह्मण बनना चाह रहे हैं. क्या हम वैसी संस्कृति पर गर्व कर सकते हैं जो इंसान को बांटती हो, उन्हें एकदूसरे से छोटा करार देती हो, जैंडर भेदभाव रखती हो और विकास से दूर जा रही हो.

भाजपा के सत्ता संभालनेचलाने में नाकाम होने के पीछे उस की सदियों पुरानी सडि़यल और निकम्मेपन की सोच है. नई और मेहनत करने की सोच सिकुड़ती जा रही है जबकि जाहिलों का जमावड़ा बढ़ रहा है. निठल्ले साधुओं को मंत्री बनाया जा रहा है जो इस देश के लिए घातक ही तो है. ऐसे में विकास कहां से होगा, सामाजिक समरसता कहां से आएगी.

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भाजपाई रक्षाकवच

भारतीय जनता पार्टी की तारीफ करनी चाहिए कि जम्मू के कठुआ और उत्तर प्रदेश के उन्नाव में अपने समर्थकों को बलात्कार जैसे आरोप से बचाने के लिए वह जीजान से जुटी रही. जिसे 2 गायों के अपनेआप मर जाने पर दलितों और मुसलमानों पर कहर ढाने में देर नहीं लगती उस पार्टी की अपनों को बचाने की संस्कृति ही भारतीय जनता पार्टी को ‘उत्तम’ पार्टी बना रही है.

2002 में नरेंद्र मोदी की गुजरात संहार में भूमिका की आज तक पार्टी पूरी तन्मयता से रक्षा कर रही है. जैसे ही यह मामला उठाया जाता है, तुरंत पार्टी के सारे नेताओं को 1984 के दंगे याद आ जाते हैं और वे कहने लगते हैं कि कांग्रेस द्वारा किसी को 1984 के दंगों में सजा न देने का अर्थ है कि देश का कानून ऐसा है कि जो सत्ता में है वह गलत कर ही नहीं सकता, वह गुनाहगार हो ही नहीं सकता.

यही जम्मू के कठुआ और उत्तर प्रदेश के उन्नाव के मामलों में हुआ. अगर आम लोगों ने यह कांड किया होता तो प्राथमिकी लिखने से पहले अभियुक्त गिरफ्तार हो चुका होता पर चूंकि इस मामले में अपराधियों ने भाजपाई रक्षाकवच धारण कर रखा था, सो, पार्टी, सरकार, पुलिस, अदालत सब चुप रहे.

अपनी सत्ता के दौरान कांग्रेस अपनों को यदाकदा गिरफ्तार होने देती थी, और तभी उस में इतने निष्ठावान सदस्य कहां हैं जो मरने तक पार्टी के साथ रहें. भाजपा तो कहती है कि जो एक बार भाजपाधर्म ग्रहण कर ले वह सब पापों से ऊपर

हो गया और गरीबअमीर, चोरीडकैती, किडनी खरीद, बैंक लोन, अपनों को टैंडर देने जैसे छोटे अपराध वैसे ही शुद्ध हो जाते हैं जैसे राम का बालि को पेड़ की आड़ से तीर मारना या भीम का कृष्ण के कहने पर दुर्योधन की जांघ पर गदा वार करना था.

जनता के दबाव में सरकार ने यदि इन बलात्कारों के अपराधियों को गिरफ्तार भी किया है तो वे अपने ‘पुण्यों’ के बल पर जरूर ही किसी न किसी तरह मुक्ति पा जाएंगे, गवाह मुकर जाएंगे, जमानतें मिल जाएंगी, जज बारबार बदल दिए जाएंगे. हमारे पुराणों में ये सब तरकीबें बाकायदा दी गई हैं जो हमारी धार्मिक धरोहर हैं. ये आज भी विधिवत प्रवचनों में, धारावाहिकों में, फिल्मों में, धार्मिक पुस्तकों में दोहराई जाती हैं.

राजनीति करनी है तो भारतीय जनता पार्टी में करो. इसी में सुरक्षा मिलती है. कुसमय में यही किसी शिखंडी को आगे खड़ा कर बचाती है. कांग्रेस में क्या रखा है, वह तो दबाव में झुक जाती है और गुनहगारों को सजा हो जाने देती है. पार्टी सही चुनें जो खाए व खाने दे.

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जिस की बीवी काली…

बीवी काली हो या गोरी, यह एक बहस का मुद्दा न हो कर खोज की बात होनी चाहिए, ऐसा खयाल मेरे एक करीबी दोस्त का है. उस की पिछले दिनों नईनई शादी हुई थी. जब भी वह इस मुद्दे पर बात करता है, काली रंगत की जरूरत से ज्यादा वकालत करता है.

एक बार मैं ने कहा, ‘‘यार, तुम भी कमाल के आदमी हो. सारी दुनिया गोरे रंग पर फिदा है और तुम हो कि कालीकलूटी पर जान छिड़कते हो.’’

इस पर वह दोस्त बोला, ‘‘भाई मेरे, काले रंग के कितने फायदे हैं, क्या तुम्हें मालूम है? काली बीवी पाना या ढूंढ़ कर लाना हमारे परिवार में सदियों से चला आ रहा है.

‘‘जब मेरी शादी की बात चली थी, तो पिताजी ने मुझे लड़की देखने के लिए मना कर दिया था. वह जानते थे कि मैं काली को नकार दूंगा.

‘‘शादी से एक महीना पहले ही मुझे काली लड़की की खूबियां सुनाना शुरू कर दिया गया. इस का नतीजा यह हुआ कि मुझे गोरे रंग से नफरत होने लगी.’’

मैं सोचने लगा कि कहीं यह दोस्त पागल तो नहीं हो गया है. ऐसे खयालों वाले कहीं दोचार और मिल जाएं, तो खूबसूरती का सामान बनाने वालों का दिवाला ही निकल जाएगा.

मैं बोला, ‘‘देख यार, काली बीवी को ब्याह कर घर लाने के बावजूद तुम्हें कोई फायदा तो हुआ नहीं. कहीं ऐसा तो नहीं कि अपना ऐब छिपाने के लिए डींगें हांके जा रहे हो?’’

मेरी बात पर वह दोस्त अपना सीना फुला कर बोला, ‘‘देखो भाई, सब से बड़ा फायदा तो यह है कि रोजरोज के फेस पाउडर, क्रीम वगैरह का झंझट ही खत्म हो गया है. नहाने के लिए किसी खास किस्म के साबुन की जरूरत ही नहीं पड़ती. वह तो कपड़े धोने के साबुन से कपड़ों के साथसाथ खुद को भी धो डालती है. काली रंगत पर कोई भी साड़ी मैच नहीं करती, इसलिए हम जो भी साड़ी खरीद कर ला देते हैं, वह चुपचाप पहन लेती है.

‘‘पार्टी में जाने या सैरसपाटे का सवाल ही नहीं उठता. इन्हें साथ ले जाने के खयाल से ही रूह कांपने लगती है. शादी के समय मेरे ससुर ने काफीकुछ दिया था, क्योंकि इस कोयल से कोई शादी ही नहीं कर रहा था.

‘‘जब भी मैं अपनी ससुराल जाता हूं, तो मेरी इतनी खातिरदारी होती है कि मैं एक दिन की जगह एक महीने तक टिका रहता हूं. वापसी के समय मेरा खाली पर्स नोटों से भरा रहता है.’’

थोड़ी देर के लिए वह दोस्त चुप हो गया और देखने लगा कि मैं उस की बातों पर गौर कर रहा हूं या नहीं.

जब उसे यकीन हो गया कि मैं दिल लगा कर उस की बातें सुन रहा हूं, तो उस ने बातों का सिलसिला आगे बढ़ाते हुए कहा, ‘‘तू मेरा असली दोस्त है. तुझे एक गूढ़ बात बता रहा हूं.

‘‘तुम तो खैर शादी कर चुके हो, इसलिए यह बात तुम्हारे बेटे के काम आएगी.

‘‘जरा सोचो, अगर किसी हसीना के चेहरे पर काला तिल हो, तो वह खूबसूरत कहलाती है और यही तिल सफेद हो, तो वह कोढ़ या सफेद दाग कहलाता है.

‘‘देखा, काले रंग का कमाल. तुम ने भी अमिताभ बच्चन की वह फिल्म तो देखी होगी, जिस में वह गाता है…

‘‘जिस की बीवी काली, उस का भी बड़ा नाम है.

आंखों में लगा लो, सुरमे का क्या काम है.’’

फिर उस दोस्त ने मुझे अपने पास बुलाया. मेरे कान में फुसफुसा कर उस ने कहा, ‘‘काली बीवी का सब से बड़ा फायदा तो यही है कि कोई भी उस से छेड़छाड़ नहीं करता और न ही कोई उसे बहलाफुसला कर भगा ले जाने की जुर्रत करता है.’’

इस तरह उस दोस्त ने मुझे इतनी सारी खूबियां गिनाईं कि मैं दंग रह गया और सोचने लगा कि मैं क्यों गोरी रंगत के चक्कर में पड़ कर उस से शादी कर बैठा. अगर ये सज्जन मुझे शादी से पहले मिले होते, तो यकीनन मैं भी अपनी शादी के लिए कालीकलूटी लड़की ही पसंद करता…

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समांथा के किसिंग सीन पर मचा बवाल

साउथ इंडियन फिल्म इंडस्ट्री की जानी मानी अभिनेत्रा और सुपरस्टार नागार्जुन की बहू समांथा अक्किनेनी इन दिनों अपनी फिल्म मर्सल और रंगस्थलम की शानदार सफलता का जश्न मना रही हैं. फिल्म को मिली सफलता से उन्हें कई बौलीवुड फिल्मों के औफर भी मिलने लगे हैं. हाल ही में एक हिन्दी समाचार पत्र को दिए अपने इंटरव्यू में समांथा ने अपनी निजी जिंदगी से जुड़े कई राज पर से पर्दा उठाया है.

समांथा ने शादी के बाद फिल्म में किसिंग सीन पर भी बात की. उन्होंने कहा कि फिल्म रंगस्थलम में मैंने लिपलौक नहीं किया. वह बस गाल पर छोटी सी किस थी. मुझे पता है कि उस सीन के लिए लोग मेरी काफी आलोचना कर रहे हैं. मगर मैं पूछना चाहती हूं कि अगर एक शादीशुदा हीरो ऐसा कुछ करता तो क्या तब भी लोग ऐसे ही सवाल पूछते? मुझसे क्यों- सिर्फ इसलिए क्योंकि मैं एक महिला हूं?’

समांथा अक्किनेनी ने कहा कि उनका परिवार, खासकर ससुर नागार्जुन हमेशा उन्हें सपोर्ट करते हैं. एक एक्टर होने नाते वह भी यह बात समझते हैं कि किस करना सिर्फ मेरे काम का हिस्सा है. समांथा ने कहा कि ससुरालवालों की सपोर्ट की वजह से उन्हें शादी के बाद भी फिल्मों में काम करने में कोई परेशानी नहीं हो रही है.

समांथा ने कई बार बड़ी ही बेबाकी से बोल्ड स्टेटमेंट दिए हैं. समांथा से जब एक दिन संबंध को लेकर सवाल पूछा गया कि आप संबंध और खान में से किसे चुज करेंगी तो उन्होंने बड़ी बेबाकी से जवाब देते हुए कहा था कि वह एक दिन खाने के बगैर रह सकती हैं लेकिन संबंध बनाए बगैर नहीं.

बता दें कि पिछले साल 6 अक्टूबर को हुई नागा चैतन्य और समांथा की शादी सबसे महंगी शादियों में से एक थी. इस शादी में लगभग 10 करोड़ रुपए खर्च किए गए थे. गोवा में हिंदू रीति-रिवाज से शादी करने के बाद दो रिसेप्शन-चेन्नई और गोवा में हुए थे. शादी के बाद दोनों ने लगभग 40 दिन हनीमून मनाया था.

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