रामपाल सिंह और शिवराज सिंह का याराना

रामपाल सिंह मध्य प्रदेश के लोक निर्माण मंत्री हैं जिन की गिनती उन इनेगिने मंत्रियों में होती थी जिन के दामन पर कोई दाग नहीं लगा था, पर अब लग गया है. बात कहने को तो बहुत मामूली सी है कि उन के मंझले बेटे गिरजेश प्रताप सिंह ने अपने से थोड़ी सी कम जाति की एक युवती से चोरीछिपे आर्य समाज मंदिर में शादी कर ली, लेकिन मांबाप के सामने वह ढीला पड़ गया और दूसरी जगह सगाई कर ली.

पीडि़ता ने अग्निपरीक्षा देते खुदकुशी कर ली तो राज्यभर में खासा बबाल मच गया. इस मुश्किल घड़ी में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान उन के काम आए और दोस्ती निभाई.

होनहार पुलिस वाले समझ गए कि कानून व्यवस्था कैसे बनाए रखनी है और जांच किस पद्धति से करनी है, लिहाजा, सबकुछ मैनेज हो गया और जो डैमेज हुआ वह इस साल के विधानसभा चुनाव में दिखना तय है, क्योंकि पीडि़ता के समुदाय वाले भी कम ठसक वाले नहीं.

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इंटरनैट का सरकारी दुरुपयोग

फेसबुक द्वारा लाखोंकरोड़ों यूजर्स की निजी जानकारी को विज्ञापनदाताओं के लिए व कैंब्रिज एनालिटिका को चुनावों में दुरुपयोग करने के लिए उपलब्ध कराने पर अमेरिका की संसदीय कमेटी ने फेसबुक के मालिक मार्क जुकरबर्ग से जो जिरह की, उस से साफ हो गया कि आज के राजनीतिबाज, चाहे अमेरिका के हों या भारत के, बेहद सतही व अज्ञानी हैं. उन्हें वोटरों को भ्रमित करना ही आता है. मार्क जुकरबर्ग ने यह तो कई बार माना कि उन्होंने गलतियां की, पर 40-50 सांसद मिल कर मार्क जुकरबर्ग पर कोई आपराधिक मामला न बना सके.

एक के बाद एक सांसद ने उन से सवाल पूछे पर सभी सवाल ऐसे थे जैसे 5वीं कक्षा के छात्र आइंसटाइन की परीक्षा ले रहे हों. मार्क जुकरबर्ग बेहद आत्मविश्वास के साथ बिना लड़खड़ाए जवाब देते रहे और उलटे, यह साबित करते रहे कि सांसदों को खुद नहीं मालूम कि वे पूछना क्या चाहते हैं.

आज दुनिया के सभी देशों में सत्ता चुने हुए जनप्रतिनिधियों के हाथों से फिसल कर बड़ी टैक, फार्मास्युटिकल, औटो, पैट्रोकैमिकल, खुदरा बिक्री करने वाली कंपनियों के हाथों में जाती जा रही हैं. देशों की सरकारें अब मंत्रालयों से नहीं, इन कंपनियों के हैडक्वार्टरों से चलने लगी हैं. कैंब्रिज एनालिटिका ने यह तक साबित कर दिया है कि इन कंपनियों ने अमेरिका में ही नहीं, दुनिया के सभी बड़े लोकतंत्रों पर कब्जा सा कर लिया है और फेसबुक व व्हाट्सऐप ऐसे हथियार बन गए हैं जिन में शिकार खुद अपने हाथों अपने को जंजीरें पहनाते हैं ताकि वे खुद इन के इशारे पर चल सकें और इन के इशारों पर अपने मनचाहे जनप्रतिनिधियों को चलाएं.

सोशल मीडिया क्रांति जनता के हाथों में अधिकारों को देने की क्रांति नहीं है, बल्कि यह पलट क्रांति है जिस में जनता को गुलाम बनाया जा रहा है. जनता उसी तरह भ्रम में डाली जा रही है जैसे लेनिन ने रूस की जनता को डाला था और एडोल्फ हिटलर ने जरमनी की जनता को. परिणाम में आजादी और मुक्ति दिलाने के नाम पर उन्हें पीढि़यों तक गुलामी सहनी पड़ी.

धर्मगुरु बातों के छल्लों की जंजीरें बनाते हैं और कई हजार वर्षों से आज तक उन का कहर दुनिया की 90 प्रतिशत जनता सह रही है. आज दुनियाभर में हिंसा का मुख्य कारण धर्मजनित सोच, अलगाव, नियम, आदेश हैं. फेसबुक और व्हाट्सऐप के सहारे मार्क जुकरबर्ग जैसे नए चक्रवृत्ति सम्राट पैदा हो गए हैं जो अपनी निरीह जनता की पलपल की जानकारी रखते हैं.

नरेंद्र मोदी की सरकार एक तरफ धर्म का सहारा और दूसरी तरफ कंप्यूटरइंटरनैट का सहारा ले कर आधार कार्ड के जरिए सब की जानकारी रखने वाली एकतरफा हुकूमत करना चाह रही है जिस में आप के पलपल की जानकारी मार्क जुकरबर्ग जैसों को रहे और आप केवल ऐसे कुत्ते हों जो गले में पड़ी जंजीर को सुरक्षा का निशान मानता है.

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उजले लोगों का ये है काला धंधा

“हैलो, कैन आई टौक टू रवनीत मैम?’’ मोबाइल फोन पर किसी पुरुष की रौबदार आवाज उभरी. ‘‘यस, आफकोर्स.’’ दूसरी ओर से किसी युवती ने खनकती आवाज में पूछा.

‘‘मैम, मैं जयपुर से आया हूं, मेरा नाम करण है… करण शर्मा…’’ उसी रौबदार आवाज में पुरुष ने कहा, ‘‘दरअसल, मैं जयपुर में एक मीडिया हाउस में काम करता हूं. मेरे दोस्त ने रवनीत मैम का नंबर दिया था, इसीलिए फोन किया है.’’

‘‘यस, आई एम रवनीत स्पीकिंग.’’ उसी खनकती आवाज में युवती ने कहा.

‘‘मैम, मैं आप के कोचिंग सैंटर में अपने बेटे का एडमिशन कराना चाहता हूं, इसलिए आप से मिलना चाहता हूं.’’ करण ने फोन करने का मकसद बताया.

‘‘यस, आप कोटा आएं तो सीधे कोचिंग सैंटर आ जाएं, मुलाकात हो जाएगी.’’ युवती ने कहा.

‘‘मैम, मैं आज जयपुर से इसी काम के लिए कोटा आया हूं, आप कहें तो मैं आ जाऊं?’’ करण ने गुजारिश करने वाले अंदाज में कहा.

‘‘ठीक है, अभी एक बजा है, आप ऐसा कीजिए, 2 बजे तक आ जाइए. इतनी देर में मैं लंच कर लेती हूं.’’ रवनीत ने कहा.

‘‘ओके मैम.’’ करण ने कहा.

यह 4 जनवरी, 2017 की बात है. रवनीत कोटा के एक नामी कोचिंग इंस्टीट्यूट में पब्लिक रिलेशन (पीआर) का काम करती थी. इस इंस्टीट्यूट में आईआईटी-जेईई आदि परीक्षाओं की तैयारी कराई जाती थी.

इस कोचिंग इंस्टीट्यूट में काम करते उसे अभी कुछ ही महीने हुए थे, लेकिन अपनी खूबसूरती और अच्छी अंगरेजी में लच्छेदार बातें करने की वजह से वह इतने कम समय में ही कोचिंग संस्थान के कामकाज से अच्छी तरह वाकिफ ही नहीं हो गई थी, बल्कि पब्लिक रिलेशन की जिम्मेदारी संभालने की वजह से कोचिंग इंस्टीट्यूट में अपने बच्चों का एडमिशन दिलाने के लिए तमाम प्रभावशाली लोग उस की मदद ले रहे थे. क्योंकि कोचिंग इस्टीट्यूट की मोटी फीस में वह कुछ रियायत भी करवा देती थी.

करण जैसे मीडियापर्सन का फोन आना रवनीत के लिए रोजाना की तरह सामान्य बात थी. उस समय दोपहर का एक बज चुका था. उस के पेट में चूहे कूद रहे थे. वह घर से लंचबौक्स लाई थी.

लंचबौक्स खोल कर सुकून से लंच करने के साथ वह अपने मोबाइल फोन पर वाट्सएप पर आ रहे वीडियो, फोटो व मैसेज भी देख रही थी. इस बीच एकदो फोन आए तो रवनीत ने उन्हें इग्नोर क र दिया.

रवनीत लंच खत्म कर के बैठी ही थी कि उस के केबिन में एक हैंडसम आदमी दाखिल हुआ. उस के साथ एक युवती भी थी. अंदर आते ही उस आदमी ने कहा, ‘‘हैलो रवनीत मैम, माईसेल्फ करण.’’

‘‘ओ यस, करण फ्रौम जयपुर?’’ रवनीत ने सवाल किया. लेकिन जवाब मिलने से पहले ही बोली, ‘‘प्लीज सिट.’’

‘‘रवनीतजी, मैं आप के कोचिंग में अपने बेटे के एडमिशन के लिए आया हूं.’’ करण ने अपने आने का मकसद बताते हुए कहा, ‘‘वैसे मैं जयपुर के एक मीडिया हाउस में काम करता हूं. पीआर में आप जैसे स्मार्ट चेहरे कम ही होते हैं. आप का चेहरा देख कर मुझे याद आ रहा है कि मैं ने आप को जयपुर में कहीं देखा है.’’

करण की इस बात पर रवनीत एकदम से हड़बड़ा उठी. फिर खुद को संभाल कर बोली, ‘‘जयपुर में… हां, दरअसल मैं ने जयपुर में पढ़ाई की थी न. शायद तभी कभी देखा होगा.’’

रवनीत की हड़बड़ाहट देख कर करण समझ गया कि वह सही ठिकाने पर पहुंच गया है. जिस रवनीत की तलाश में वह 10 दिनों से भटक रहा था, वह यही रवनीत है. करण ने उस की आंखों में आंखें डाल कर कहा, ‘‘मेरा नाम करण शर्मा नहीं, मैं एसओजी का पुलिस इंसपेक्टर हूं. मेरे साथ यह महिला भी पुलिस इंसपेक्टर हैं. रवनीत, अब तुम्हारा भांडा फूट चुका है. तुम ने बहुत लोगों को अपनी सुंदरता के जाल में फांसा और उन्हें ब्लैकमेल कर के उन से करोड़ों रुपए वसूले. हम तुम्हें गिरफ्तार करने आए हैं.’’

इसंपेक्टर की बात सुन कर रवनीत के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं. वह चेहरा छिपा कर फूटफूट कर रोने लगी. थोड़ा रो लेने के बाद उस ने हिचकियां लेते हुए कहा, ‘‘सर, मैं ने अब वह सब छोड़ दिया है. उन बदमाशों ने मुझ से चीटिंग की थी. इसलिए मैं ने उन का साथ छोड़ दिया है. इन बातों को काफी समय हो गया है. अब मैं शांति की जिंदगी जी रही हूं. प्लीज, मुझे शांति से जीने दीजिए.’’

‘‘तुम्हें जो कुछ भी कहना है, पुलिस स्टेशन चल कर कहना.’’ कह कर दोनों पुलिस अधिकारी रवनीत को हिरासत में ले कर कोचिंग इस्टीट्यूट से बाहर ले आए और वहां खड़ी गाड़ी में बैठा कर अपनी टीम के साथ सीधे जयपुर के लिए चल पड़े.

कोटा से जयपुर तक के लंबे सफर में रवनीत गुमसुम बैठी रही. जयपुर पहुंचतेपहुंचते रात हो गई थी. इसलिए रवनीत से उस दिन पूछताछ नहीं की जा सकी. अगले दिन सुबह एसओजी के अधिकारियों ने रवनीत से पूछताछ शुरू की. अधिकारियों ने उस से कहा कि वह इस बात को ठीक से जान ले कि पुलिस को उस के पूरे गिरोह का पता चल चुका है. कुछ लोगों को गिरफ्तार भी किया जा चुका है. इसलिए वह खुद ही बता दे कि उस ने किनकिन लोगों को अपने हुस्न के जाल में फांस कर उन से कितनी रकम ऐंठी है? इस काम में उस के साथ कौनकौन लोग शामिल थे?

रवनीत की कहानी जानने से पहले आइए यह जान लेते हैं कि पुलिस को उस के बारे में कैसे पता चला?

12 मई, 2015 को जयपुर के विद्याधरनगर इलाके में सैंट्रल स्पाइन स्थित अलंकार प्लाजा के सामने दिनदहाड़े 34 साल के हिम्मत सिंह की गोली मार कर हत्या कर दी गई थी. हमलावर 2 थे और मोटरसाइकिल से आए थे. हिम्मत सिंह हरमाड़ा थाने का हिस्ट्रीशीटर था. वह प्रौपर्टी का कारोबार करता था और जयपुर के राजपुरा हरमाड़ा के लक्ष्मीनगर में परिवार के साथ रहता था. जबकि वह मूलरूप से सीकर के राजपुरा गांव का रहने वाला था. बैनाड़ रोड पर मां भगवती प्रौपर्टीज के नाम से उस ने अपना औफिस बना रखा था.

थाना पुलिस इस मामले में कुछ नहीं कर पाई तो इस मामले की जांच एसओजी को सौंप दी गई. हिम्मत सिंह की हत्या के आरोप में करीब डेढ़ साल बाद दिसंबर, 2016 के दूसरे सप्ताह में एसओजी ने 2 लोगों को गिरफ्तार किया. इन में एक जयपुर के तिलकनगर का रहने वाला आनंद शांडिल्य था और दूसरा उत्तर प्रदेश के बिजनौर का रहने वाला अनुराग चौधरी उर्फ रानू.

अनुराग चौधरी जयपुर के विद्युतनगर में रहता था. दोनों से पूछताछ में पता चला कि हिम्मत सिंह की हत्या राजस्थान के कुख्यात अपराधी आनंदपाल सिंह ने कराई थी. आनंदपाल अदालत से जेल जाते समय पुलिस पर गोलियां चला कर फरार हो गया था. वह अभी भी पुलिस गिरफ्त से बाहर है.

आनंद और अनुराग आनंदपाल के सहयोगी थे. हिम्मत सिंह की हत्या जयपुर में हरमाड़ा के पीछे माचड़ा में एक जमीन पर कब्जे को ले कर की गई थी. इस जमीन पर हिम्मत सिंह की नजर थी, जबकि आनंदपाल की नजर पहले से ही उस जमीन पर थी. आनंदपाल के इशारे पर ही उस के गिरोह के लोगों ने हिम्मत सिंह की गोली मार कर हत्या की थी.

पुलिस आनंद और अनुराग से आनंदपाल और उस के गिरोह के बारे में पूछताछ कर रही थी. इसी पूछताछ में पुलिस के सामने एक नया खुलासा हुआ. आनंद शांडिल्य ने पुलिस को बताया कि जयपुर में एक ऐसा भी गिरोह सक्रिय है, जो हाईप्रोफाइल लोगों के साथ ब्लैकमेलिंग करता है.

इस काले धंधे में सारे बड़े लोग शामिल हैं. बड़े लोगों से मतलब वे लोग हैं, जो समाज में प्रतिष्ठा की नजर से देखे जाते हैं. इस गिरोह में कुछ वकील, पुलिस वाले, प्रौपर्टी व्यवसाई और फरजी पत्रकार भी शामिल हैं.

यह गिरोह खूबसूरत लड़कियों की मदद से रईस लोगों को ब्लैकमेल करता है. इस गिरोह के लोग पहले तो रईस लोगों की पहचान करते हैं, उस के बाद उन्हें फंसाने के लिए उन की दोस्ती गिरोह की खूबसूरत लड़कियों से करा देते हैं. दोस्ती के लिए वे फार्महाउसों पर सेलिबे्रट पार्टियां आयोजित करते हैं. इन पार्टियों में पीनेपिलाने का दौर चलता है.

उसी बीच लड़कियां शिकार को अपने मोबाइल नंबर दे देती हैं और उन के नंबर ले लेती हैं. इस के बाद पहले बातचीत और उस के बाद मुलाकातों का दौर शुरू हो जाता है. कुछ ही मुलाकातों में लड़कियां अपने शिकार को अपनी सुंदरता के मोहपाश में इस कदर बांध लेती हैं कि वे उन के साथ हमबिस्तर होने के लिए बेचैन हो उठते हैं.

शिकार को तड़पा कर लड़कियां हमबिस्तर होने का प्रोग्राम बनाती हैं. इस के लिए वे कई बार जयपुर से बाहर भी चली जाती हैं. रईसों के साथ उन के हमबिस्तर होने के समय गिरोह के सदस्य लड़की की मदद से गुप्त कैमरे से वीडियो क्लिपिंग बना लेते हैं. अगर इस में वे सफल नहीं हो पाते तो लड़कियां हमबिस्तर होने के बाद अपने अंतर्वस्त्र सुरक्षित रख लेती हैं.

इस के बाद उस रईस को धमकाने का काम शुरू होता है. लड़की अपने रईस शिकार को पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराने की धमकी देती है. ज्यादातर मामलों में लड़कियां पुलिस में शिकायत कर भी देती हैं. इस के बाद फरजी पत्रकार और वकील का काम शुरू होता है. वे उस रईस को बदनामी का डर दिखा कर समझौता कराने की बात करते हैं. जरूरत पड़ने पर बीच में पुलिस वाले भी आ जाते हैं.

रईस अपनी इज्जत बचाने के लिए उन से सौदा करता है. रईस की हैसियत देख कर 10-12 लाख रुपए से ले कर एक करोड़ रुपए तक मांगे जाते हैं. गिरोह के लोग शिकार पर दबाव बनाए रखते हैं. आखिर रईस को सौदा करना पड़ता है. उस से पैसे लाने का काम अलग लोग करते हैं.

आनंद शांडिल्य ने पुलिस को बताया था कि यह गिरोह जयपुर सहित राजस्थान के बड़े शहरों के नामचीन प्रौपर्टी व्यवसायियों, बिल्डरों, मोटा पैसा कमाने वाले डाक्टरों, ज्वैलर्स, होटल रिसौर्ट संचालक और ठेकेदार आदि को अपना शिकार बनाता. इस काले धंधे में एक एनआरआई युवती भी शामिल है.

गिरोह के लोग लड़की को प्लौट या फ्लैट खरीदने के बहाने प्रौपर्टी व्यवसाई अथवा बिल्डर के पास भेज कर उसे फांस लेते हैं. इसी तरह होटल रिसौर्ट संचालक के पास नौकरी के बहाने भेजा जाता है तो डाक्टर के पास इलाज के बहाने. सौदा होने के बाद युवती और उस के गिरोह के सदस्य स्टांप पर लिख कर देते हैं कि दुष्कर्म नहीं हुआ है.

इस के पहले जयपुर में कभी इस तरह का कोई बड़ा मामला सामने नहीं आया था. इसलिए एसओजी के लिए हकीकत जानना अत्यंत महत्त्वपूर्ण था. अधिकारियों ने आपस में सलाहमशविरा कर के एसओजी के आईजी एम.एन. दिनेश के निर्देशन में हाईप्रोफाइल ब्लैकमेलिंग करने वाले गिरोह की खोजबीन शुरू कर दी.

उसी बीच इस गिरोह से पीडि़त जयपुर के वैशालीनगर निवासी डा. सुनीत सोनी ने एसओजी में शिकायत कराई कि उन का वैशालीनगर में हेयर ट्रांसप्लांट का क्लीनिक है. कुछ महीने पहले एक लड़की हेयर ट्रांसप्लांट कराने के लिए उन की क्लीनिक में आई. तभी उन का उस लड़की से संपर्क हुआ. लड़की ने जल्दी ही उन्हें प्रेमजाल में फांस लिया. इस के बाद दोनों पुष्कर गए और वहां एक रिसौर्ट में रुके. 2 दिनों बाद 2 लड़के मीडियाकर्मी बन कर आए और लड़की से दुष्कर्म का मुकदमा दर्ज कराने की धमकी दे कर उन से एक करोड़ रुपए मांगे.

डाक्टर ने रुपए देने से मना किया तो लड़की ने उन के खिलाफ पुष्कर में दुष्कर्म का मुकदमा दर्ज करा दिया. जांच के बाद पुलिस ने डा. सुनीत सोनी को गिरफ्तार कर के जेल भेज दिया. डाक्टर करीब ढाई महीने तक जेल में रहे. इस बीच डाक्टर से गिरोह के वकील सहित अलगअलग लोगों ने संपर्क किया.

गिरोह के सदस्यों ने अदालत में लड़की के बयान बदलवाने के लिए डाक्टर से डेढ़ करोड़ रुपए की मांग की. आखिर सौदा एक करोड़ रुपए में तय हो गया. पैसे लेने के बाद गिरोह के लोगों ने लड़की के बयान बदलवा दिए. उस समय डा. सुनीत सोनी ने जयपुर के थाना वैशालीनगर में इस मामले की रिपोर्ट भी दर्ज कराई थी. लेकिन उस समय थाना पुलिस ने कोई काररवाई नहीं की थी.

डा. सुनीत सोनी की शिकायत पर जांच करते हुए एसओजी ने 24 दिसंबर, 2016 को इस हाईप्रोफाइल ब्लैकमेलिंग करने वाले गिरोह का खुलासा किया. एसओजी ने गिरोह के 2 लोगों को गिरफ्तार कर लिया था. गिरफ्तार किए गए लोगों से पूछताछ की गई तो गिरोह में शामिल लड़कियों के बारे में पता चल गया. इन्हीं लोगों से गिरोह की एनआरआई लड़की रवनीत कौर उर्फ रूबी के बारे में पता चला था. इस के अलावा एक लड़की कल्पना उत्तराखंड की थी.

इस के बाद एसओजी इस पूरे गिरोह को गिरफ्तार करने में जुट गई. धीरेधीरे लोग पकड़े भी जाने लगे. एसओजी उत्तराखंड के ऊधमसिंहनगर से कल्पना को गिरफ्तार कर के जयपुर ले आई. पूछताछ में कल्पना ने बताया कि गिरोह ने उस की मदद से कई लोगों को अपने जाल में फांस कर मोटी रकम ऐंठी थी.

कल्पना से पूछताछ के बाद राजस्थान सशस्त्र पुलिस बल (आरएसी) के कांस्टेबल हरिकिशन को गिरफ्तार किया गया. उस ने गिरोह के लिए उत्तराखंड से अन्य कई लड़कियों को बुलाया था. कल्पना को भी वही लाया था.

गिरोह ने कल्पना को इस काम के लिए जो रकम देने का वादा किया था, वह रकम उसे नहीं मिली थी. इस के बाद उस ने गिरोह के सदस्य एक वकील को दुष्कर्म का केस दर्ज कराने की धमकी दी थी. इस से घबराए वकील ने कल्पना से सन 2015 में आमेर के एक मंदिर में शादी कर ली थी. वकील से शादी के बाद भी गिरोह कल्पना से हाईप्रोफाइल ब्लैकमेलिंग की वारदातों का काम लेता रहा.

कल्पना की गिरफ्तारी के बाद एसओजी का दल एनआरआई लड़की रवनीत कौर की तलाश में जुट गया. लेकिन समस्या यह थी कि अब तक रवनीत का गिरोह से पैसों के लेनदेन को ले कर विवाद हो गया था, जिस से वह गिरोह  से अलग हो गई थी. एसओजी को कहीं से जानकारी मिली कि रवनीत कोटा में है. जांच अधिकारियों को उस के फेसबुक एकाउंट का भी पता चल गया था.

इस के बाद एसओजी ने रवनीत के मोबाइल नंबर हासिल कर लिए. उस का नंबर मिल गया तो एसओजी की टीम कोटा पहुंच गई और एक पुलिस इंसपेक्टर ने रवनीत को जयपुर के मीडियाकर्मी करण के नाम से फोन किया. इस के बाद उसे किस तरह पकड़ा गया, आप शुरू में पढ़ चुके हैं. रवनीत कौर उर्फ रूबी से पूछताछ में उस की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार थी—

27 साल की रवनीत कौर उर्फ रूबी हांगकांग में पैदा हुई थी. उस के पिता पंजाब के फरीदकोट के रहने वाले थे. वह कारोबार के सिलसिले में हांगकांग गए थे. वहां उन का कामधाम जम गया तो वहीं उन्होंने भारतीय मूल की महिला से शादी कर ली.

रवनीत सन 2008 में ओवरसीज कार्ड पर अपनी दादी के पास जालंधर रहने आई. जालंधर से वह सन 2012 में जयपुर आ गई और एक यूनिवर्सिटी से उस ने 3 साल के बीबीए कोर्स में एडमिशन ले लिया. उसी यूनिवर्सिटी में एमबीए कर रहे कोटा निवासी रोहित से उस की दोस्ती हो गई. रवनीत कौर को बीबीए की पढ़ाई रास नहीं आई तो उस ने 2 साल बाद पढ़ाई छोड़ दी.

इस बीच रवनीत बीचबीच में अपने मातापिता के पास हांगकांग भी जाती रही. सन 2013 के अंत में उस के मातापिता ने कनाडा के एक एनआरआई बिजनैसमैन से उस की शादी तय कर दी. रवनीत भी उस से शादी करने को तैयार थी. इस का कारण यह था कि उस समय तक रवनीत की कोटा के रहने वाले रोहित से केवल दोस्ती थी.

दोस्ती इतनी आगे नहीं बढ़ी थी कि वह उस से शादी के बारे में सोचती. उस ने मातापिता से कहा कि शादी में वह जयपुर का लहंगा पहनेगी और वहीं से शादी के अन्य कपड़े और ज्वैलरी ले कर आएगी.

मातापिता ने उसे जयपुर से लहंगा और अन्य सामान लाने के लिए 8 लाख रुपए दे दिए. जयपुर आ कर रवनीत के 8 लाख रुपए खर्च हो गए मातापिता से शादी के सामान के लिए लाए पैसे खर्च हो गए तो रवनीत परेशान हो उठी. इस बीच उस की शादी भी टूट गई तो वह जयपुर में ही नौकरी की तलाश करने लगी. तभी वह इस गिरोह के संपर्क में आई. यह सन 2014 की बात है. गिरोह के इशारे पर रवनीत ने 6-7 लोगों को अपनी सुंदरता के जाल में फांस कर करोड़ों की वसूली की. सब से पहले उस ने एक बिल्डर को अपने हुस्न का जलवा दिखा कर उस से एक गोल्फ क्लब में मीटिंग तय की.

फ्लैट का सौदा करने दोनों में ही दोस्ती हो गई तो जल्दी ही दोनों में अनैतिक संबंध भी बन गए. बिल्डर के खिलाफ वकील ने इस्तगासा पेश करने की धमकी दी तो मीडियाकर्मी ने खबर चलाने की धमकी दी. गिरोह के इशारे पर रवनीत ने उस से एक करोड़ रुपए मांगे.

अंत में उस से 35 लाख रुपए वसूले गए. इस के बाद रवनीत को मोहरा बना कर गिरोह ने एक बिल्डर से 50 लाख, एक एक्सपोर्टर से 23 लाख, एक डाक्टर से एक करोड़ 5 लाख, प्रौपर्टी व्यवसाई से 80 लाख और रिसौर्ट मालिक के बेटे से 45 लाख रुपए वसूले.

ब्लैकमेलिंग से मोटी रकम मिली तो रवनीत ने हांगकांग जा कर अपने मातापिता को उन से लिए 8 लाख रुपए लौटा दिए. उस ने अपने घर वालों को बताया कि वह जयपुर में नौकरी करती है. उस ने उन से कोटा के अपने प्रेमी के बारे में भी बता दिया था.

उसी बीच रवनीत कौर उर्फ रूबी का गिरोह के लोगों से पैसों के बंटवारे को ले कर विवाद हो गया. इस की वजह यह थी कि गिरोह के सदस्य शिकार से तो मोटी रकम ऐंठते थे, लेकिन रवनीत को काफी कम पैसे देते थे. इसी बात को ले कर दिसंबर, 2015 के आखिर में रवनीत ने गिरोह छोड़ दिया.

इस के बाद रवनीत ने सन 2016 के शुरू में कोटा निवासी अपने प्रेमी रोहित से शादी कर ली. शादी के बाद वह कोटा चली गई, जहां वह महावीरनगर तृतीय में ससुराल वालों के साथ रहने लगी. बाद में उस ने कोटा की एक कोचिंग इस्टीट्यूट में नौकरी कर ली. उस इंस्टीट्यूट को छोड़ कर उस ने दूसरे कोचिंग इंस्टीट्यूट में करीब 4 महीने ही नौकरी की थी कि एसओजी ने उसे गिरफ्तार कर लिया था. रवनीत की गिरफ्तारी तक उस की ससुराल वालों को उस के कारनामों का पता नहीं था.

एसओजी ने उसे अदालत में पेश कर सुबूत जुटाने के लिए रिमांड पर लिया. उस की हैंडराइटिंग और हस्ताक्षरों के नमूने लिए, ताकि उस का शिकार बने लोगों को लिखित में दिए गए स्टांप पेपरों की लिखावट से मिलान किया जा सके.

स्टांप पर रवनीत कौर अपने हाथों से लिख कर हस्ताक्षर करती थी. स्टांप पर लिखे समझौतों और हस्ताक्षरों की मिलान के लिए अदालत में रवनीत कौर से लिखवा कर हस्ताक्षर कराए गए. इस के बाद इन्हें जांच के लिए विधिविज्ञान प्रयोगशाला भेजा गया.

इस गिरोह की दूसरी हसीना रीना शुक्ला और उस के सहयोगियों ने एक चार्टर्ड एकाउंटैंट से 70 लाख रुपए ऐंठे थे. हाईप्रोफाइल ब्लैकमेलिंग गिरोह का खुलासा होने पर एसओजी में इस संबंध में शिकायत दर्ज कराई है. इसी के बाद एसओजी ने रीना शुक्ला, शंभू सिंह और किशोरीलाल को गिरफ्तार किया था.

किशोरीलाल सीए का दोस्त था. शंभू सिंह जयपुर के मानसरोवर में प्रौपर्टी का कारोबार करता था, जबकि रीना शुक्ला गरीब बच्चों का एक एनजीओ चलाती थी. रीना ने एक मासिक अखबार का रजिस्ट्रेशन भी करा रखा था. आरोपियों ने इसी अखबार के प्रैस कार्ड भी बनवा रखे थे. इन लोगों से पूछताछ में पता चला कि शंभू सिंह के प्रौपर्टी के व्यवसाय को वही सीए संभालता था.

रीना सन 2008 से शंभू सिंह के संपर्क में थी. शंभू सिंह के मार्फत रीना की दोस्ती सीए से हुई. रीना की मौसी कोटा में रहती थी. उस के पड़ोस में अनीता रहती थी. रीना ने अनीता को नौकरी दिलाने के बहाने सन 2013 में जयपुर बुलाया और सीए के माध्यम से एक कंपनी में नौकरी दिलवा दी, साथ ही रहने के लिए जयपुर के प्रतापनगर में एक फ्लैट किराए पर दिलवा दिया.

नवंबर, 2013 में रीना के रिश्तेदार की शादी में शरीक होने के लिए शंभू सिंह और अनीता राजस्थान के प्रतापगढ़ शहर गए. वहीं पर सीए अनीता के बीच अनैतिक संबंध बन गए. इस के सबूत रीना और अनीता ने एकत्र कर लिए. उन्हीं सबूतों के आधार पर उन्होंने सीए को ब्लैकमेल करना शुरू कर दिया.

रीना ने सीए से अनीता को एक लाख रुपए दिलवा कर कोटा भेज दिया. इस के बाद भी रीना और शंभू सिंह ने सीए को ब्लैकमेल करना जारी रखा. उन्होंने 6 महीने में उस से 10 लाख रुपए वसूल लिए.

किशोरीलाल को पता था कि रीना और शंभू सिंह सीए को ब्लैकमेल कर रहे हैं. उसी बीच सीए ने मानसरोवर स्थित अपना एक प्लौट सवा करोड़ रुपए में बेचा. किशोरीलाल ने सीए के प्लौट बेचने की बात रीना और शंभू सिंह को बता दी. सीए के पास मोटी रकम देख कर शंभू सिंह और रीना को लालच आ गया. उन्होंने सीए को धमकी दी कि अनीता कोर्ट में दुष्कर्म का इस्तगासा दर्ज करवा रही है. अगर समझौता करना हो तो वह एक करोड़ रुपए मांग रही है. उस ने मीडिया में भी मामला उजागर करने की धमकी दी.

इन धमकियों से सीए परेशान हो गया. वह आत्महत्या करने की सोचने लगा. इस के बाद शंभू सिंह के साथ मिल कर किशोरीलाल ने 70 लाख रुपए में सौदा करवा दिया. सीए ने अपने दोस्त किशोरीलाल को यह मामला निपटाने के लिए 70 लाख रुपए दे दिए. किशोरीलाल शंभू सिंह और रीना के साथ अनीता को यह रकम देने कोटा गया.

वहां उस ने 20 लाख रुपए खुद रखे और 50 लाख रुपए शंभू सिंह और रीना को दे दिए. रीना और शंभू सिंह ने अनीता को होटल में बुला कर एक समझौता पत्र तैयार किया. इस के बाद रीना ने समझौता पत्र और रुपए के साथ अनीता की एक फोटो ले ली.

शंभू सिंह और रीना ने अनीता को बताया कि सीए ने कोटा में कोई प्रौपर्टी खरीदी है, ये रुपए उन्हीं के हैं. वे प्रौपर्टी खरीदने के लिए सीए के दोस्त के साथ कोटा आए हैं. अनीता को बातों में उलझा कर रीना और शंभू सिंह ने उसे मात्र 10 हजार रुपए दे कर घर भेज दिया, बाकी रुपए दोनों ने अपने पास रख ली और सीए को समझौता पत्र और फोटो दे कर बता दिया कि समझौता हो गया.

एसओजी ने रीना और शंभू सिंह से अनीता के बारे में पूछताछ की तो उन्होंने बताया कि अनीता की 6 महीने पहले कैंसर से मौत हो गई है. एसओजी अधिकारियों को आशंका है कि कहीं मामले का खुलासा होने के डर से अनीता की हत्या तो नहीं कर दी गई. इस बात की जांच शुरू हुई. इस जांच में शंभू सिंह के बैंक लौकर से 15 से ज्यादा सीडियां मिली हैं, जिन्हें पुलिस ने देखा तो उन में तमाम लोगों की आपत्तिजनक फिल्में थीं. इस से स्पष्ट हो गया कि इन लोगों ने अन्य लोगों से भी पैसे ऐंठे हैं.

जांच में रीना और शंभू सिंह के उस झूठ का परदाफाश हो गया कि अनीता मर चुकी है. एसओजी ने कोटा निवासी अनीता चौहान को गुजरात के अहमदाबाद शहर से जीवित बरामद कर लिया.

पूछताछ में अनीता ने बताया कि वह अपने पति के साथ पिछले 3-4 महीने से अहमदाबाद में रह रही थी. उसे शंभू सिंह और रीना शुक्ला द्वारा उस के नाम पर सीए से 70 लाख रुपए ऐंठने की जानकारी नहीं थी. पूछताछ के बाद पुलिस ने अनीता को छोड़ दिया था. वह इस मामले में गवाह बन गई है.

जयपुर में इस तरह की ब्लैकमेलिंग करने वाले नएनए गिरोह सामने आ रहे हैं. एक अन्य गिरोह में तो एक सरकारी वकील के साथ कई लड़कियां शामिल थीं. उन्होंने स्पा मसाज सैंटर के नाम पर रईसों से मोटी रकम ऐंठी. एसओजी ने इस गिरोह की 2 लड़कियों वंदना भट्ट और पूनम कंवर को 11 फरवरी को गिरफ्तार किया.

इन्होंने एक साल में 6 रईसों से 60 लाख रुपए वसूल करने की बात स्वीकार की है. ये लड़कियां रईसों को मसाज पार्लर में बुला कर फांसती थीं. अनैतिक संबंध बनने के बाद थाने में शिकायत दर्ज करा कर वकील और उस के साथी उस रईस को फोन कर धमकाते थे और समझौता कराने के नाम पर 10 से 15 लाख रुपए ऐंठ लेते थे.

सौदा होने के बाद ये लोग पीडि़त को स्टांप पर समझौता लिख कर देते थे. एसओजी की जांच में सामने आया है कि हाईप्रोफाइल ब्लैकमेलिंग गिरोह ने ढाई साल में करीब 45 लोेगों से 20 करोड़ रुपए वसूले हैं.

इन में गिरोह के सरगना एक वकील और कुख्यात अपराधी आनंदपाल के साथी आनंद शांडिल्य के हिस्से में 2-2 करोड़ रुपए आए हैं. रवनीत कौर के हिस्से में डेढ़ करोड़ रुपए आए थे. बाकी रकम अन्य सदस्यों में बांटी गई थी. गिरोह के सरगना वकील ने 8 वारदातों के बाद आनंद शांडिल्य को अलग कर दिया था. इस का कारण यह था कि आनंद शांडिल्य ब्लैकमेलिंग की राशि लाता था तो उस में से 15-20 लाख रुपए पहले  ही खुद रख लेता था. इस के बाद लाई गई रकम में भी हिस्सा लेता था. इस बात का पता गिरोह के दूसरे सदस्य वकील को चल गया था.

इस हाईप्रोफाइल ब्लैकमेलिंग गिरोह में 4 वकील, 2 फरजी पत्रकार एवं एनआरआई युवती सहित करीब 30 लोग शामिल थे. गिरोह के सरगना वकील को एसओजी ने 9 फरवरी को गोवा से गिरफ्तार किया था. वहां भी उस के साथ एक युवती थी. उस युवती के बारे में जांच की जा रही है.

एक वकील को जयपुर से एक दिन पहले ही एसओजी ने गिरफ्तार किया था. फरार आरोपियों की तलाश में एसओजी जुटी हुई है. जयपुर बार एसोसिएशन ने गिरोह में शामिल वकीलों की सदस्यता रद्द कर दी है. बार कौंसिल के चेयरमैन एम.एम. लोढा ने 12 फरवरी को कहा है कि दुष्कर्म के झूठे केस में फंसा कर रुपए ऐंठने वाले वकीलों की सदस्यता बार कौंसिल से भी समाप्त कर दी जाएगी.

– कथा पुलिस सूत्रों व अन्य रिपोर्ट्स पर आधारित

होप और हम : आकर्षित नहीं करती ये फिल्म

‘लोगों से प्यार करो, चीजों से नहीं’ सहित कई छोटे छोटे संदेश देने वाली फिल्म ‘‘होप और हम’’ जिंदगी के छोटे छोटे पलों के साथ ही आशा व उम्मीदों की बात करती है. इंसानी भावनाओं की सीधी सादी कहानी के साथ फिल्म में लघु प्रेम कहानी भी है.

फिल्म की कहानी मुंबई के एक मध्यमवर्गीय परिवार की है. जिसके मुखिया नागेश श्रीवास्तव (नसिरूद्दीन शाह) हैं. उनके दो बेटे नीरज (अमीर बशीर) व नितिन (नवीन कस्तूरिया) हैं. नितिन दुबई में नौकरी कर रहा है. नीरज की पत्नी अदिति (सोनाली कुलकर्णी) और उनकी बेटी तनु (वृति वघानी) व बेटा अनुराग (मास्टर कबीर साजिद) है. अनुराग को क्रिकेट काशौक है. नागेश श्रीवास्तव के पास एक जर्मन कंपनी की एक फोटो कापी मशीन है, जिसे वह मिस्टर सोनेकेन बुलाते रहते हैं. जिसका लेंस खराब हो गया है, इसलिए अब फोटो कापी सही नहीं निकलती, परिणामतः हर ग्राहक उन्हे दस बातें सुनाकर चला जाता है.bollywood movie review hope aur hum

अदिति चाहती हैं कि उनके ससुर जी अब उस मशीन को बेच दें,तो उस जगह पर तनु के लिए एक कमरा बन जाए. जबकि नागेश का फोटो कापी मशीन से दिल का लगाव है और वह अपने काम को एक कलात्मक काम मानते हैं. वह मशीन के लिए लेंस तलाश रहे हैं. इसके लिए उनकी पोती तनु कंपनियों को ईमेल भेज कर लेंस के बारे में पूछताछ करती रहती है, पर हर बार उसे एक ही जवाब मिलता है कि उस फोटोकापी मशीन का लेंस नही है. मगर नागेश को उम्मीद है कि फोटो कापी मशीन का लेंस जरुर मिलेगा.bollywood movie review hope aur hum

इसी बीच अनुराग की नानी (बीना बनर्जी) के बुलावे पर नीरज व अनुराग राजपीपला में उनकी पुरानी कोठी पर जाते हैं, जहां अनुराग के मामा, नानी की इच्छा के बगैर कोठी को होटल बनाने के लिए किसी को बेच रहे हैं. नानी की कोठी में अनुराग अपने नाना के कमरे में जाता है और उनकी किताबें पढ़ने के साथ ही संगीत सुनता रहता है. एक दिन वह क्रिकेट खेलने निकलता है और गेंद कोठी के एक कमरे में जाती है तो जब वह गेंद लेन जाता है,तो उसके साथ एक ऐसा हादसा होता है, जिससे वह अपराधबोध से ग्रसित हो जाता हे और फिर उसका व्यवहार ही बदल जाता है.

इधर अनुराग का चाचा दुबई से वापस आता है, वह हर किसी के लिए कुछ न कुछ उपहार लेकर आया है. वह अपने पिता नागेश के लिए नई फोटोकापी यानी मशीन लेकर आया है. एक दिन नाटकीय तरीके से पिता को नई मशीन पर काम करने के लिए राजी कर लेता है. जबकि इस बार नागेश ने जर्मन भाषा में तनु से एक कंपनी को लेंस के लिए ईमेल भिजवाया है. नागेश अपनी फोटोकापी मशीन को बेचकर उस जगह पर तनु के लिए कमरा बनवा देते हैं. नागेष अपना मोबाइल फोन टैक्सी में भूल गया है. पर उसे उम्मीद है कि उसका मोबाइल फोन मिल जाएगा.bollywood movie review hope aur hum

एक दिन एक लड़की उसका फोन उठाती है और मोबाइल फोन लेने के लिए काफीशौप बुलाती है, पर कई घंटे इंतजार के बाद जब नितिन वापस लौटने लगता है तो वही लड़की (नेहाचौहान) नाटकीय तरीके से उसे औटोरिक्शा में उसका मोबाइल फोन वापस देकर गायब हो जाती है. बाद में अनुराग की नानी, नितिन की शादी के लिए उसी लड़की की फोटो दिखाती है. इतना ही नही नागेश को जर्मन कंपनी से लेंस मिलने की खबर मिलती है. पर अब नागेश क्या करे, उन्होंने तो फोटोकौपी मशीन बेच दी. इससे अदिति को भी तकलीफ होती है. दुबारा अपनी नानी के घर जाने पर अनुराग के मन का अपराध बोध गलत साबित होता है. और वह फिर से क्रिकेट खेलने वाला पहले जैसा अनुराग बन जाता है. यानी कि फिल्म में हर किरदार की उम्मीदें पूरी होती हैं.

फिल्मकार सुदीप बंदोपाध्याय ने नसीहते देने व उम्मीदों के पूरे होने की बात करने वाली फिल्म का कथा कथन शैली बहुत बचकानी रखी है. यदि सुदीप बंदोपाध्याय ने एक खुशनुमा फिल्म बनाने का प्रयास किया होता, तो इंसानी बदलाव व विकास की एक बेहतर फिल्म बन सकती थी. मगर फिल्म देखते हुए अहसास होता है जैसे कि वह लोगों को धूल से सने फोटो अलबम में झांकने के लिए कह रहे हों. फिल्म जीवन की मीठी मगर व्यर्थताओं को पकड़ने की कोशिश है. फिल्म में नवीनता नहीं है. इस तरह की कोशिशें अतीत में ‘फाइंडिंग फैनी’ और‘ए डेथ इन द गंज’ फिल्मों में भी की जा चुकी हैं. इतना ही नहीं उम्मीदों व आशा की बात करते करते पटकथा लेखक द्वय सुदीप बंदोपध्याय व नेहा पवार तकदीर की बात कर फिल्म पर से अपनी पकड़ खो देते हैं. फिल्म का गीत संगीत फिल्म की संवेदनशीलता को खत्म करने काम काम करता है.

जहां तक अभिनय का सवाल है, तो नागेश के किरदार को नसिरूद्दीन शाह ने बाखूबी निभाया है. नसिरूद्दीन शाह के सामने बाल कलाकार कबीर साजिद ने बेहतरीन परफार्मेंस देकर इशारा कर दिया है कि वह आने वाले कल का बेहतरीन कलाकार है. सोनाली कुलकर्णी, अमीर बशीर व नवीन कस्तूरिया भी ठीक ठाक रहे.

एक घंटा 35 मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘होप और हम’’ का निर्माण समीरा बंदोपाध्याय ने किया है. सह निर्माता दिव्या गिरीश शेट्टी, लेखक सुदीप बंदोपाध्याय व नेहा पवार,निर्देशक सुदीप बंदोपाध्याय, संगीतकार रूपर्ट फेंमंडेस, कैमरामैन रवि के चंद्रन तथा कलाकार हैं- नसिरूद्दीन शाह, सोनाली कुलकर्णी, अमीर बशीर, नवीन कस्तूरिया, मास्टर कबीर साजिद, वृति वघानी व अन्य

राजी : हर हाल में देखी जाने वाली फिल्म

‘फिलहाल’, ‘जस्ट मैरिड’, ‘तलवार’ जैसी फिल्मों की निर्देशक मेघना गुलजार इस बार हर वतन परस्त इंसान के दिल की बात करने वाले तोहफे के तौर पर रोमांचक फिल्म ‘‘राजी’’लेकर आयी हैं. हरिंदर सिक्का की किताब ‘कालिंग सहमत’ पर आधारित फिल्म ‘‘राजी’’ एक भारतीय अंडरकवर की सच्ची कहानी है, जो कि हर इंसान के दिल में देशप्रेम जगाती है. इसी के साथ यह फिल्म इस तरफ भी इशारा करती है कि युद्ध अनावश्यक है, युद्ध सही या गलत नहीं पहचानता. युद्ध तो सिर्फ अंधेरे व क्रूरता का परिचायक है. फिल्मकार मेघना गुलजार ने फिल्म में सहमत के साहस का जश्न मनाने से परे कई सवाल भी उठाए हैं.

फिल्म ‘‘राजी’’ की कहानी 1971 के भारत पाक युद्ध की पृष्ठभूमि की है. कहानी शुरू होती है पाकिस्तान से, जो कि तत्कालीन बांग्लादेश की मुक्तिवाहिनी सेना का भारत द्वारा साथ दिए से नाराज होकर भारत को नेस्तानाबूद करने के मंसूबे के साथ युद्ध की तैयारी कर रहा है. पाकिस्तानी सेना के ब्रिगेडियर परवेज सय्यद (शिशिर शर्मा) के साथ कश्मीर निवासी भारतीय उद्योगपति हिदायत खान (रजित कपूर) की बहुत अच्छी दोस्ती है, पर ब्रिगेडियर परवेज सय्यद को इस बात की भनक नहीं है कि हिदायत खान वतन परस्त होने के साथ साथ हिंदुस्तान की ‘रा’ एजेंसी को जानकारी देने का काम भी करते हैं.

हिदायत खान के पिता भी स्वतंत्रता सेनानी और भारतीय सुरक्षा एजेंसी के लिए काम करते थे. हिदायत खान का पाकिस्तान आना जाना लगा रहता था. जब हिदायत खान को पाकिस्तानी ब्रिगेडियर परवेज सय्यद के मुंह से पाकिस्तानी सेना के मंसूबे का पता चलता है तो वह सच जानकर भारत को सुरक्षित रखने के लिए एक अहम फैसला लेते हैं. हिदायत खान अपनी बीमारी का वास्ता देकर दोस्ती को रिश्तेदारी में बदलने की बात कर दिल्ली विश्वविद्यालय में अध्ययनरत अपनी बेटी सहमत (आलिया भट्ट) का विवाह ब्रिगेडिर परवेज सय्यद के बेटे व पाकिस्तानी सेना के मेजर इकबाल (विकी कौशल) के संग करने की गुजारिश करते हैं, जिसे परवेज सय्यद सहर्ष स्वीकार कर लेते हैं.bollywood movie razi review

सहमत बहुत ही ज्यादा नाजुक व अति भावुक साधारण कश्मीरी लड़की है. उसे इस बात का तब तक अहसास नहीं होता, जब तक उसके पिता उसे वापस कश्मीर नहीं बुलाते हैं कि उसके पिता ने उसके भविष्य को लेकर पाकिस्तान में कितना बड़ा फैसला कर आए हैं. जब सहमत पहलगाम, कश्मीर अपने घर पहुंचती है, तो हिदायत खान सहमत की मां तेजी (सोनी राजदान) के सामने ही बताते हैं कि उन्होंने सहमत की शादी इकबाल संग कराने का फैसला किस मकसद से लिया है.

वतन के लिए परेशान अपने पिता हिदायत खान को देखकर सहमत बिना देर किए हामी भर देती है. उसके बाद वह पाकिस्तान जाकर अपने वतन भारत की कान व आंख बनने के लिए पूरी तैयारी करने में जुट जाती है. वह बेहतरीन भारतीय जासूस बनने के लिए ‘रा’ एजेंट खालिद मीर (जयदीप अहलावत) से प्रशिक्षण लेना शुरू करती है. प्रशिक्षण के दौरान उसे काफी तकलीफ होती है, पर इससे वह मजबूत होती जाती है.

पूर्णरूपेण प्रशिक्षित होने पर इकबाल से सहमत की शादी होती है और वह एक बेटी से बहू बनकर भारत की दहलीज पार कर पाकिस्तान पहुंचती है. दुश्मन देश में अपनी ससुराल व अपने पति के दिल में जगह बनाते हुए सहमत अपने वतन भारत के खिलाफ पाकिस्तानी सेना द्वारा रचे जा रहे षडयंत्र की जानकारी इकट्ठा कर भारत में ‘रा’ के पास पहुंचाना शुरू करती है. एक सैनिक परिवार की बहू के रूप में सैनिक परिवार  के अंदर रहकर यह सब करना उसके लिए बहुत कठिन होता है, पर उस पर अपने वतन के लिए कुछ भी कर गुजरने का ऐसा भूत सवार है कि वह हर संकट का मुकाबला करते हुए अपने मकसद में कामयाब होती है. उसे दो लोगों की हत्या करने के साथ ही कई ऐसे फैसले लेने पड़ते हैं, जिसकी उसने कल्पना भी नहीं की थी.bollywood movie razi review

इस कहानी के बीच में सहमत व इकबाल की बड़ी खूबसूरत छोटी सी प्रेम कहानी भी पनपती है. बहरहाल, सहमत द्वारा भेजी गयी अहम जानकारी की वजह से भारत, पाकिस्तान के खिलाफ जंग जीतने में कामयाब होता है. पर अंतिम वक्त में इकबाल को पता चल जाता है कि सहमत ने पाकिस्तानी सेना द्वारा रचे जा रहे षडयंत्र की जानकारी भारत भेज दी है. वह अपने वतन के लिए सहमत के खिलाफ अपने देश की जांच एजेंसी को खबर करता है. जबकि खालिद मीर अपने साथियों के साथ सहमत को पाकिस्तान से सुरक्षित निकालने के  लिए पहुंच जाता है. पर कई घटनाक्रम तेजी से बदलते हैं. जिसमें इकबाल मारे जाते हैं. पर सहमत को लेकर खालिद मीर व उसके साथी भारत पहुंच जाते हैं. अब सहमत खुद को जासूसी के काम से अलग कर लेती है. वह इकबाल के बेटे को जन्म नहीं देना चाहती. मगर वह एक मां और एक औरत भी है.

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मेघना गुलजार ने एक बार फिर साबित कर दिखाया कि उन्हें  कहानी व किरदारों पर अपने निर्देशकीय कौशल से पकड़ बनाए रखने में महारत हासिल है. अपनी पिछली फिल्मों के मुकाबले वह इस फिल्म से ज्यादा बेहतरीन निर्देशक के रूप में उभरती हैं. फिल्म बहुत तेज गति से भागती है और दर्शकों को अपनी सीट पर चिपके रहने के लिए मजबूर करती है. निर्देशक के तौर पर मेघना गुलजार ने फिल्म को फिल्माने के लिए लोकेशन भी बहुत सही चुनी है. मेघना गुलजार ने फिल्म मे जिस तरह से मानवीय भावनाओं व संवेदनाओं को उकेरा है, उसके लिए भी वह बधाई की पात्र हैं.

मेघना गुलजार ने अपनी फिल्म में देशप्रेम को जगाने के लिए कोई देशभक्ति वाला भाषण नहीं परोसा है. उन्होंने पाकिस्तान के खिलाफ जहर उगलने वाले उत्तेजक या विरोधात्मक भाषण से भी दूरी बनाए रखी है. लेकिन अति जटिल व्यक्तियों का समूह अपने ईद गिर्द की परिस्थितियों से निपटने का जिस तरह से प्रयास करता है, उसी से देशप्रेम अपने आप उभरकर आता है.

अमूमन किताब को सेल्यूलाइड के परदे पर लाते समय पटकथा लेखक पूरी कहानी व फिल्म का बंटाधार कर देता है. मगर ‘कालिंग सहमत’ को फिल्म ‘राजी’ के रूप में पेश करने के लिए पटकथा लेखकद्वय मेघना गुलजार व भवानी अय्यर की तारीफ की जानी चाहिए.

फिल्म ‘‘राजी’’ पूर्ण रूपेण आलिया भट्ट की फिल्म है. आलिया भट्ट के जानदार अभिनय की जितनी तारीफ की जाए, उतनी कम है. वह पूरी फिल्म को अपने कंधे पर लेकर चलती हैं. दर्शक उनकी खूबसूरती, उनकी मासूमियत व उनकी अभिनय प्रतिभा का कायल होकर रह जाता है. सहमत को परदे पर सही मायनों में आलिया भट्ट ने अपने अभिनय से जीवंत किया है. संगीत प्रेमी मेजर इकबाल के किरदार को विकी कौशल ने खूबसूरती से निभाया है. संतुलित व संजीदा सैनिक, अपनी पत्नी सहमत के वतन के खिलाफ उसके सामने होने वाली बातों से पत्नी के मन को लगने वाली ठेस का अहसास करने के दृश्य में विकी कौशल एक मंजे हुए कुशल अभिनेता के रूप में उभरते हैं. तो वहीं ‘रा’ एजेंट खालिद मीर के किरदार में जयदीप अहलावत भी अपने अभिनय से लोगो के दिलों में जगह बना ही लेते हैं. रजित कपूर, शिशिर शर्मा, आरिफ जकरिया, सोनी राजदान आदि ने भी अपनी तरफ से सौ प्रतिशत देने का प्रयास किया है.

जहां तक फिल्म के गीत संगीत का सवाल है, तो वह भी काफी बेहतर बन पड़े हैं. फिल्म के कथानक के साथ ‘दिलबरो’, ‘ऐ वतन’ व ‘राजी’ गाने काफी बेहतर लगे हैं. गीतकार गुलजार और संगीतकार की तिकड़ी शंकर एहसान लौय ने कमाल दिखा ही दिया.

दो घंटे बीस मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘राजी’’ का निर्माण विनीत जैन, करण जोहर, हीरू यश जोहर व अपूर्वा मेहता ने किया है. हरिंदर सिक्का की किताब ‘‘कालिंग सहमत’’ पर आधारित इस फिल्म की पटकथा लेखक भवानी अय्यर व मेघना गुलजार, निर्देशक मेघना गुलजार, गीतकार गुलजार, संगीतकार शंकर एहसान लौय, कैमरामैन जय आई पटेल तथा फिल्म को अभिनय से संवारने वाले कलाकार हैं-आलिया भट्ट, विक्की कौशल, रजित कपूर, शिशिर शर्मा, अमृता खानविलकर, जयदीप अहलावत, अश्वथ भट्ट, सोनी राजदान व अन्य.

दिल किसी का तोड़ते नहीं अपनों से मुंह मोड़ते नहीं

VIDEO : दीपिका पादुकोण तमाशा लुक

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अर्थव्यवस्था : खोखली उपलब्धियों का बखान

अब केंद्र सरकार अर्थव्यवस्था के मोरचे पर बचाव की मुद्रा में खड़ी दिखाई देने लगी है. नोटबंदी और फिर जीएसटी को भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए वरदान होने का दावा करने वाले नेता बगलें झांकते दिखे. चारों ओर से विरोध के स्वर उठने के बाद सरकार को यूटर्न लेने पर मजबूर होना पड़ा. आखिर 10 नवंबर को गुवाहाटी में हुई जीएसटी काउंसिल की बैठक में सब से बड़ा बदलाव करना पड़ा. 211 कैटेगरी की वस्तुओं पर टैक्स घटाने के साथसाथ दूसरी रियायतें भी देनी पड़ीं.

अब तक 228 कैटेगरी की वस्तुओं पर 28 प्रतिशत टैक्स था. इन में से 178 पर टैक्स 18 प्रतिशत था यानी अब केवल 50 वस्तुओं पर 29 प्रतिशत टैक्स लगेगा. इस के बावजूद अनेक कारोबारी अब भी संतुष्ट नहीं हैं.

मजे की बात है कि अब ये चीजें सस्ती होंगी, महंगी क्यों हुई थीं, किस ने कीं और अब सस्ती कौन करेगा? जीएसटी काउंसिल ने माना है कि छोटे और मझोले उद्योग क्षेत्र में मुश्किलें आ रही हैं, पर अब तक जिन लोगों को नुकसान हो चुका है, वे उबर पाएंगे, कोई गारंटी नहीं है. अब भी अनेक कारोबारों से जुड़े सामानों मसलन सीमेंट, वार्निश, पेंट पर पहले जैसा 28 प्रतिशत टैक्स रखा गया है.

जीएसटी काउंसिल की बैठक में यह भी तय हुआ कि जिन कारोबारियों पर टैक्स की देनदारी नहीं है उन्हें देरी से रिटर्न फाइल करने पर रोजाना सिर्फ 20 रुपए जुर्माना देना होगा. जिन पर देनदारी है उन्हें रोजाना 50 रुपए देना पड़ेगा. अभी यह सब पर 200 रुपए था. पर कोई लाभ नहीं क्योंकि इस से व्यापारियों पर जो मानसिक दबाव की स्थिति थी वह तो अब भी बरकरार रहेगी. 200 रुपए से घटा कर 50 या 20 रुपए करने से कोई फर्क नहीं पड़ेगा. ट्रेडर्स संगठनों का मानना है कि टैक्स रेट घटाने और कंपोजीशन की लिमिट 75 लाख रुपए से 1.5 करोड़ रुपए करने से 34 हजार करोड़ रुपए के राजस्व का नुकसान होगा.

रसातल में अर्थव्यवस्था

सरकार यह राजस्व कहां से जुटाएगी? उसे कहीं न कहीं से भरपाई करनी होगी. वह कारोबारियों और आम जनता से ही वसूल करेगी. इसलिए इस फैसले से फायदे की गुंजाइश कम ही है. कंपोजीशन मैन्युफैक्चरर के लिए टैक्स 2 प्रतिशत से घटा कर 1 प्रतिशत किया गया है. ट्रेडर्स के लिए 1 प्रतिशत टैक्स में बदलाव नहीं. टर्नओवर में कर टैक्सेबल और नौन टैक्सेबल दोनों वस्तुएं शामिल होंगी पर टैक्स सिर्फ टैक्सेबल गुड्स पर देना पड़़ेगा. बस यह बढ़ोतरी का फैसला गुजरात चुनावों के बाद होगा. नतीजा चाहे जो भी हो.

इस फैसले से पारदर्शिता, भ्रष्टाचार और बेईमानी पर असर नहीं होगा. रिटेल इंडस्ट्री में ग्रोथ बढ़ेगी, इस बात की गारंटी नहीं है.

सरकार ने जाली करैंसी और कालाधन रोकने का लक्ष्य घोषित किया था पर दोनों ही काम नहीं हुए. कालेधन का बड़ा हिस्सा कहीं न कहीं लगा होता है, सर्कुलेशन में होता है, इसलिए नोटबंदी से कालाधन खत्म नहीं हुआ. सरकार के पास कोई आंकड़ा नहीं है. उलटे, नए नोटों को छापने में 30 हजार करोड़ रुपए खर्च हुए थे. जनता के काम के लाखोंकरोड़ घंटे जो बरबाद हुए उन घंटों के नुकसान का तो अंदाजा ही नहीं लगाया जा सकता.

पिछले साल नवंबर में नोटबंदी और इस साल जुलाई में जीएसटी लागू होने के बाद सरकार ने बारबार चुनावी लहजे में कहा था कि अब अर्थव्यवस्था की दशा सुधरने लगेगी, पर दीवाली आतेआते व्यापारियों, किसानों, कर्मचारियों, मजदूरों और आम लोगों के सब्र का बांध टूटने लगा और जहांतहां उन का आक्रोश जाहिर होने लगा. गिरती अर्थव्यवस्था की तपिश लघु एवं मध्यम उद्योग समूह भी महसूस करने लगे थे. सोशल मीडिया पर तो प्रधानमंत्री के जुमलों की खूब बखिया उधेड़ी जाने लगी.

अर्थव्यवस्था रसातल में जाती दिखने लगी. तमाम सरकारी आंकड़ों और विदेशी सर्वे रिपोर्टों में भी सरकार के दावों की पोल खुलने लगी. वित्त वर्ष 2017 की पहली तिमाही में जीडीपी 3 साल के सब से निचले स्तर 5.7 फीसदी पर पहुंच गई. पिछली तिमाही में यह 6.2 प्रतिशत थी और उस से पहले 7.0 थी जबकि 2016-17 के वित्त वर्ष की पहली तिमाही में जीडीपी में वृद्धि 7.9 फीसदी के स्तर पर थी.

अगर 2007-08 के आंकड़ों के आधार पर अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर को आंका जाए तो यह दर 3.7 प्रतिशत के आसपास तक गिर गई है. पूर्व वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा यही बात कह रहे हैं तो उन्हें महाभारत के पात्र शल्य कह दिया गया. हालांकि शल्य को कौरवों के साथ भेजने की साजिश कृष्ण ने ही रची थी.

पिछले 2 महीनों को छोड़ दें तो देश का आयातनिर्यात पिछले 20 महीनों में लगातार गिरा है. इस वर्ष 15 लाख लोगों को रोजगार से हाथ धोना पड़ा है. निजी निवेश गिर रहा है. औद्योगिक उत्पादन घट रहा है. कृषि संकट में है. निर्माण और दूसरे सर्विस सैक्टर्स की रफ्तार कमजोर हुई है. आयातनिर्यात दिक्कतें झेल रहा है.

नोटबंदी व जीएसटी की मार

गिरती अर्थव्यवस्था के बड़े कारणों में नोटबंदी और जीएसटी प्रमुख हैं. पिछले साल नवंबर में नोटबंदी की घोषणा के बाद देश में 86 प्रतिशत नकदी को अवैध करार दे दिया गया था. जिस के बाद देश में हलचल मच गई. लाखों लोग बेरोजगार हो गए. लाखों व्यापार ठप हो गए. इस दौरान निम्नवर्ग के लोगों पर इस का बुरा असर पड़ा था.

इस के बावजूद जुलाई 2017 में जीएसटी लागू किया गया. इस के लिए काफी सारी कंपनियां तैयार नहीं थीं. बहुत सी कंपनियों ने तो अपने स्टौक को कम कीमत पर बेच दिया. नाराज व्यापारियों का कहना था कि पहले जब केंद्र से कहा गया कि ज्यादा जीएसटी से आम लोगों और छोटे कारोबारियों पर बोझ बढे़गा तो सरकार ने उन की बात नहीं सुनी. अब जब गुजरात के छोटे व्यापारी नाराज हो कर सड़कों पर उतरे तो सरकार टैक्स घटाने पर राजी हुई, क्योंकि वहां चुनाव जो होने जा रहा है.

जीएसटी लागू होने के बाद राज्यों का टैक्स कलैक्शन कम हुआ है. सिर्फ 5 राज्यों ने राजस्व नुकसान न होने की बात कही है. बाकी सभी ने मुआवजा मांगा. देशभर के व्यापारी जीएसटी की जटिलता का रोना रो रहे हैं.

विश्व बैंक की ईज औफ डूइंग बिजनैस की रैंकिंग में भारत भले ही 30 पायदान ऊपर आ गया पर व्यापार और अर्थव्यवस्था से जुड़े कई इंडैक्स में देश अभी काफी पीछे है. ह्यूमन डवलपमैंट में भारत 188 देशों में 131वें, इकोनौमिक फ्रीडम में 186 देशों में 143वें, ग्लोबल पीस इंडैक्स में 163 देशों में 137वें स्थान पर ही है.

पिछले साल ग्लोबल हंगर इंडैक्स में 119 देशों में 97वें नंबर पर रहने वाला भारत अब 3 पायदान नीचे खिसक कर 100वें स्थान पर पहुंच गया. वैश्विक स्तर पर महाशक्ति बनने की राह पर बताने वाले भारत के लिए यह रिपोर्ट चिंताजनक तसवीर पेश करने वाली है.

ग्लोबल हंगर इंडैक्स की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में भूख अब भी एक गंभीर समस्या है. ग्लोबल हंगर इंडैक्स भुखमरी को मापने का एक पैमाना है जो वैश्विक, राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर पर भुखमरी को प्रदर्शित करता है. अंतर्राष्ट्रीय खाद्य नीति अनुसंधान संस्थान द्वारा प्रतिवर्ष जारी किए जाने वाले इस इंडैक्स में उन देशों को शामिल नहीं किया जाता जो विकास के एक ऐसे स्तर पर पहुंच चुके हैं जहां भुखमरी नगण्य है. इन में पश्चिम यूरोप के अधिकांश देश, अमेरिका, कनाडा आदि शामिल हैं.

बैंकों पर असर

देश में बढ़ता एनपीए यानी डूबत बैंक कर्ज साढ़े 9 लाख करोड़ रुपए के रिकौर्ड स्तर पर पहुंच गया. यह दिसंबर 2014 में 2.61 लाख करोड़ रुपए था. विशेषज्ञों ने कहा कि यह आंकड़ा इतना बड़ा है कि इसे समझने के लिए इतना ही काफी है कि यह पैसा तेल संपदा के धनी कुवैत जैसे देशों सहित कम से कम 130 देशों के सकल घरेलू उत्पाद में शामिल पैसों से अधिक है. यह नरेंद्र मोदी सरकार की आर्थिक समस्याओं को न समझ पाने की भक्ति की पोल खोलती है.

डूबत बैंक कर्ज यानी एनपीए के इस दलदल में बिजली, दूरसंचार, रियल्टी और इस्पात जैसे भारी पूंजी वाले क्षेत्र भी गहरे तक धंसे हुए हैं. जब ऐसे क्षेत्र कर्ज के भारी बोझ से दबे होंगे तो फिर ये भारत के बुनियादी ढांचे में बढ़ोतरी में मदद कैसे कर सकते हैं. बुनियादी ढांचे में ही विस्तार से देश की प्रगति हो सकती है. पर देश का नेतृत्व तो गाय, योगा और ताजमहल में अपने को उलझा कर रख रहा है.

देश में औद्योगिक उत्पादन की बात करें तो सितंबर में अगस्त की तुलना में औद्योगिक उत्पादन कम रफ्तार से बढ़ा. सितंबर माह में औद्योगिक उत्पादन सूचकांक यानी आईआईपी 3.8 प्रतिशत दर्ज हुआ. अगस्त महीने में यह 4.3 प्रतिशत दर्ज हुआ था जबकि एक साल पहले सितंबर माह में इस में 5 प्रतिशत की ग्रोथ देखने को मिली थी.

गैडफ्लाई के एक विश्लेषण में बताया गया कि भारत को पिछले 4 वर्षों से निजी क्षेत्र के निवेश में सूखे जैसे हालात का सामना करना पड़ रहा है. गिरती अर्थव्यवस्था का असर लघु एवं मध्यम उद्योग समूह भी महसूस कर रहे हैं.

एनपीए लगातार बढ़ता रहा. इस बढ़ोतरी पर चिंता व्यक्त की जाती रही. छोटे व्यापारियों से लोन की वसूली में बैंक उन का खून पी लेते हैं पर बड़े लोन में बैंक अक्षम साबित होते हैं.

सरकार मानती है कि बैंकों का बढ़ता एनपीए यानी बड़े लोगों से पैसे वसूल करना बड़ी चुनौती है. वित्त मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2016-17 के अंत तक विलफुल डिफौल्टर यानी जानबूझ कर कर्ज न चुकाने वालों पर सार्वजनिक बैंकों का 92,376 करोड़ रुपए का बकाया था.

भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर उर्जित पटेल ने कहा था कि बैंकों का फंसा कर्ज 9.6 प्रतिशत तक तय सीमा से अधिक पहुंच जाने पर समस्या को सुलझाने के लिए सार्वजनिक बैंकों में नई पूंजी डालने की जरूरत है. बाद में बैंकों को यह पूंजी दी गई. यह एक तरह का बेलआउट था.

गिरती अर्थव्यवस्था पर भाजपा के ही नेता व पूर्व वित्तमंत्री यशवंत सिन्हा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और वित्तमंत्री जेटली पर निशाना साधा था. भाजपा से जुड़े अरुण शौरी और सुब्रह्मण्यम स्वामी भी कुछ ऐसा ही बोलते रहे हैं. यशवंत सिन्हा ने कहा था कि मौजूदा समय में न तो युवाओं को रोजगार मिल पा रहा है और न ही देश में तेज रफ्तार से विकास हो रहा है. निवेश लगातार गिर रहा है. इस की वजह से जीडीपी भी घटती जा रही है. जीएसटी की वजह से कारोबार और रोजगार पर विपरीत असर पड़ रहा है.

आर्थिक डिप्रैशन में देश

भाजपा सांसद सुब्रह्मण्यम स्वामी यह भी कह चुके हैं कि देश की अर्थव्यवस्था आने वाले समय में और गिर सकती है और देश आर्थिक डिप्रैशन में जा सकता है.

मई 2014 में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आए थे तब लोगों की राय बंटी हुई थी कि वह हिंदुत्ववादी मुखौटे में आर्थिक सुधारक हैं या आर्थिक सुधारक के मुखौटे में एक हिंदुत्ववादी? पिछले साढे़ 3 वर्षों में लोगों को पता चलने लगा कि मोदी सरकार ने बारबार धार्मिक भावनाओं को बढ़ावा दिया है. देश की सब से बड़ी आबादी वाले उत्तर प्रदेश में कट्टर हिंदू नेता योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनाया. गौरक्षा, दलितों और मुसलमानों पर हमले, मंदिर निर्माण जैसे मुद्दे छाए रहे. आर्थिक सुधारों की बातें तो केवल जुमला साबित हुई हैं, उन का एक भी अपना मौलिक आर्थिक प्रयास अब तक सफल नहीं हुआ है.

वास्तव में मोदी हिंदू कट्टरपंथियों और कौर्पोरेट के समर्थक साबित होंगे. उन की सरकार ने गोमांस निर्यात व्यापार को ले कर उग्रता दिखाई और मवेशियों की खरीदबिक्री का नया कानून बना दिया. मोदी के अधीन हिंदू राष्ट्रवादी धंधेबाजों का काम सरपट तेजी से चलने लगा है. ये लोग उन लोगों को डराने लगे जो सरकार के खिलाफ बोलते या लिखते हैं ताकि उन के व्यापार पर अंकुश न लगे.

नोटबंदी और जीएसटी का मोदी कोई नए विचार ले कर नहीं आए. नोटबंदी से भ्रष्टाचार, कालेधन का कुछ नहीं बिगड़ा. उलटे, उत्पादन और व्यापार का भारी नुकसान हुआ है. नारों के अलावा नरेंद्र मोदी के कोई भी आर्थिक कदम कारगर नहीं हैं.

जीएसटी से छोटे और मझोले व्यापारियों की कमर टूट गई. हर महीने इस का रिटर्न दाखिल करने की बाध्यता ने व्यापारियों को सांसत में डाल दिया. हालांकि बाद में सरकार ने डेढ़ करोड़ रुपए तक का व्यापार करने वालों को हर तिमाही पर रिटर्न दाखिल करने की छूट दे दी. अब कुछ और रियायतें भी दी गई हैं. यह एक तरह से पंडेपुजारियों के हवाले व्यापार करना है. फर्क इतना है कि पोथी की जगह पंडे कंप्यूटर ले कर बैठे हैं.

जीएसटी से छोटे उद्योगों को नुकसान कैसे हो रहा था? एक विशेषज्ञ बताते हैं कि मान लीजिए, किसी शहर के इंडस्ट्रियल एरिया में 7 चाय की दुकानें और 6 खाने के ढाबे चलते हैं. चाय की दुकान पर 1-1 लड़का और ढाबे पर 4-4 लोग काम करते हैं. कुल 31 लोगों को काम मिला हुआ है. मालिकों को मिला लिया जाए तो कुल 44 लोगों को रोजगार मिला हुआ है. जीएसटी लागू होने के बाद इन 11 इकाइयों की जगह 3 फास्टफूड आउटलेट खुल गए. हर आउटलेट पर 4-4 कर्मचारियों को रोजगार मिला. इलाके में चाय और खाने की आपूर्ति पर कोई असर नहीं पड़ा, पहले की तरह जारी रही पर रोजगार पर विपरीत असर पड़ा. पहले 44 कर्मी कमातेखाते थे. अब 12 कर्मी कमाएंगे खाएंगे. 29 लोग बेरोजगार हो गए.

इन 29 लोगों द्वारा बाजार से कपड़े, जूते, साइकिल आदि नहीं खरीदे जाएंगे. इस से संपूर्ण बाजार में मांग में गिरावट आएगी. इस तरह जीएसटी द्वारा छोटे उद्योगों पर हुए प्रहार का असर पूरी अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा. बड़े उद्योगों को बाजार चाहिए. यह बाजार छोटे उद्यमों द्वारा बनता है. छोटे उद्योगों की बलि चढ़ा कर बड़े उद्योग अछूते नहीं रहेंगे.

भारत में बस एक इंडस्ट्री फेल नहीं है और वह है भारतीय मजदूरों को विदेशों में नौकरी. अमेरिका जैसे देश के पाबंदी के नियमों के बावजूद देश के बेरोजगार बड़ी संख्या में बाहर जा रहे हैं. वे अपने परिवार को भी ले जाते हैं और फिर कुछ समय बाद वहीं बस जाते हैं.

दुखड़ा रोए तो किस के पास

दिल्ली की त्रिनगर मार्केट में किराने के सामान से ले कर कपड़ा और फुटवेयर तक घर में काम आने वाले हर सामान का व्यवसाय है. इन के साथसाथ ब्याहशादियों के लिए यह कपड़े का अच्छा मार्केट माना जाता है.

त्रिनगर में 10/7 की दुकान में एक युवा व्यापारी अनुज चौहान की परचून की दुकान है. वह कहता है, ‘‘नोटबंदी के बाद पैसों की तंगी आ गई. पहले दुकान में पूरा सामान भरा रहता था पर अब आधा माल भी नहीं है. माल के बिना बिक्री कहां से होगी. ग्राहक आते हैं, सामान पूछते हैं पर जो सामान वह चाहता है, दुकान में नहीं होता तो ग्राहक लौट जाता है. पहले ऐसा नहीं होता था. ग्राहक की मांग पर हर सामान उपलब्ध रहता था. अब बिना माल के खाली बैठे रहते हैं. दीवाली पर पैसे उधार ले कर माल डलवाया पर ज्यादा फायदा नहीं हुआ. नोटबंदी और जीएसटी से पहले कामधंधा ठीक था.’’

साड़ी, सूट के व्यापारी मनोज गुप्ता कहते हैं, ‘‘नोटबंदी और जीएसटी का असर उन के धंधे पर पड़ा है. बिक्री घट गई. नोटबंदी से उबरे तो जीएसटी का भय हम पर हावी है. जीएसटी अभी समझ ही नहीं आ रही है. जानकारों से जानने की कोशिश कर रहे हैं. अपना काम जानकार से करा रहे हैं.’’

चूडि़यों की दुकान चलाने वाले इस्माइल कादिर कहते हैं, ‘‘हमारा काम छोेटे नोटों के सहारे चलता है. नोटबंदी से नोटों की किल्लत हो गई तो काम एकदम चौपट हो गया. फिर धीरेधीरे 500 और 2 हजार रुपए के नए नोट आए तो भी बुरा हाल रहा. छुट्टे रुपए

की दिक्कत आई. अब हालात ठीक होने की गुंजाइश दिखती है पर नएनए नियमकायदों से कारोबार सुरक्षित नहीं दिखता.’’

बच्चों के रेडिमेड कपड़ों के व्यापारी महेश जैन कहते हैं, ‘‘हम व्यापारियों के लिए तो अनगिनत समस्याएं हैं. सरकार के नएनए कानूनों का सब से ज्यादा असर व्यापारी को झेलना पड़ता है. खुदरा कारोबार पर नोटबंदी का ज्यादा असर पड़ा. अब जीएसटी से निबट रहे हैं. इन फैसलों से धंधा कम हुआ है. जीएसटी से नफानुकसान का आकलन अभी किया नहीं. पर इसे ले कर मानसिक परेशानी ज्यादा बढ़ गई है.

इस मार्केट की दुकानों के दरवाजे आज भी शीशे के नहीं हैं. दुकानों के आगे गाडि़यां नहीं हैं. ये घरेलू सामान बेचते हैं. जब इन दुकानों की स्थिति ठीक नहीं है तो देश की कहां से होगी. देश में हर छोटे, मझोले दुकानदार की हालत तकरीबन ऐसी ही है. नरेंद्र मोदी इन्हें ही कालाबाजारी कहकह कर कोस रहे हैं. इन्हीं से टैक्स वसूल रहे हैं ताकि सरकार चले. पंडे उन्हीं के बल पर मंदिरों की अपनी दुकानें चलाते हैं और उन्हीं के पापों को पुण्यों में बदलते हैं.

व्यापारी फिर भी भाजपा को वोट देंगे, क्योंकि वह ही हिंदुओं की संरक्षक है, हिंदुत्व की बात करती है और व्यापारी समझते हैं कि उन का पैसा भगवान की गुल्लक से आता है, अपनी मेहनत से नहीं.

बिगड़ रहे हैं हालात

असल में यह दोष प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी या वित्तमंत्री अरुण जेटली का नहीं है, उस जनता का है जो चमत्कार में विश्वास करती है. नोटबंदी लागू हुई तो लोग दिनरात लाइनों में लगे रहे. इस उम्मीद से कि अब तो मोदी सारा कालाधन ला कर उन के खातों में डाल देंगे. जीएसटी से लगा कि अब टैक्स चोरी रुक जाएगी. चमत्कार होगा और जनता का भविष्य सुधर जाएगा लेकिन पिछले साढ़े 3 वर्षों में क्या कोई करिश्मा हुआ?  क्या लोगों की दशा सुधरी? लफ्फाजी खूब हो रही है पर हालात जस के तस ही नहीं है बल्कि ज्यादा बिगड़ रहे हैं.

अब नोटबंदी और जीएसटी की मार असहनीय हो गई तो लोग कराहने लगे. अगर गुजरात विधानसभा के चुनाव न आते और वहां लोगों की चीखपुकार सुनाई न पड़ती तो सरकार के कानों पर जूं तक न रेंगती. चारों ओर होहल्ले के बाद सरकार को जीएसटी की दरें कम करने पर मजबूर होना पड़ा सिर्फ चुनावों तक. चुनाव बाद सरकार फिर अपने रंग में रंग जाएगी.

नोटबंदी और जीएसटी एक नया ब्राह्मणवाद है. यह आर्थिक, सामाजिक विभाजन है. इस से गैरबराबरी पैदा हो रही है. छोटे, मझोले व्यापारी, जो निचले तबकों से आते हैं, बरबादी की कगार पर जा पहुंचे.

देशभर से ऐसे लाखों व्यापारियों की दुकानों पर ताले लग गए. दुकानदार सड़कों पर आ गए. सरकार द्वारा अब टैक्स घटाने के फैसले से भी उन के बीते दिन वापस नहीं आ सकते. एक तरफ सब से अधिक खरबपति हमारे देश में हैं जबकि दूसरी ओर भुखमरी से तबाह और कुपोषित आबादी और गरीब मर रहे हैं. यह कैसा विकास है और किस का विकास है?

देश अपनी जीडीपी की दर की रफ्तार या शेयर सूचकांक की उछाल से महान नहीं बनेगा. व्यापार में आसानी, छोटे, मझोले व्यापारी और उद्योग समूह पर ज्यादा ध्यान, उन के साथ समानता और उत्थान की नीतियों से उन की प्रगति तय होगी. सरकार है कि इस कुव्यवस्था के बावजूद अर्थव्यवस्था की खोखली उपलब्धियों का बखान किए जा रही है.

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क्या सच में हो गया सलमान और लूलिया का ब्रेकअप

सलमान खान और लूलिया वंतूर के रिलेशनशिप की चर्चा हमेशा होती रही है. कई बार दोनों की शादी की खबरें भी आई और कई बार उन्हें साथ में भी स्पौट किया गया. हालांकि दोनों में से किसी ने ना कभी रिलेशनशिप की बात स्वीकार की और ना ही कभी इससे इनकार किया.

पहले भी सलमान खान का अफेयर हमेशा चर्चा में रहता आया है. एक बार फिर ऐसा लग रहा है कि सलमान सिंगल होने की राह पर हैं. जी नहीं ऐसा हम नहीं बल्कि उनकी कथित गर्लफ्रेंड लूलिया वंतूर के पोस्ट से लग रहा है. दरअसल लूलिया वंतूर ने इंस्टाग्राम पर एक पोस्ट डाला है जिसे पढ़कर कुछ ऐसा ही लग रहा है.

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इसमें लूलिया वंतूर ने लिखा है ‘शायद मैंने जिंदगी में सबसे बड़ी गलती ये है कि प्यार मतलब सही शख्स की तलाश है. ऐसे इंसान की तलाश मत कीजिए जिसके साथ आप अपनी जिंदगी बिताना चाहते हैं. वो शख्स बनें जिसके साथ आप जिंदगी बिताना चाहते हैं.’ हालांकि सच्चाई क्या है ये तो समय बताएगा कि असल में दोनों ब्रेकअप की ओर हैं या नहीं.

हालांकि सोमवार को भी सलमान खान सोनम कपूर के रिसेप्शन में जैकलीन फर्नांडिस के साथ पहुंचे. लूलिया वंतूर उनके साथ नहीं थी. सलमान खान फंक्शन में मीडिया को इग्नोर कर कैटरीना कैफ से बातें करते नजर आए.

अगर फिल्मों की बात करें तो सलमान खान फिलहाल रेस 3 की शूटिंग खत्म करने में लगे हैं. पिछले दिनों रेस 3 की पूरी टीम कश्मीर में थी. सलमान खान की रेस 3 इस साल ईद पर रिलीज होगी. इसके बाद वो अली अब्बास जफर की फिल्म भारत की शूटिंग में व्यस्त हो जाएंगे.

हालांकि थोड़े समय बाद इस पोस्ट को इंस्टाग्रांम से हटा लिया गया था जिसके बाद से यह मामला सभी को कुछ सीरियस सा लगने लगा है.

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स्विमिंग पूल में दिखाया दिशा ने स्टंट

बौलीवुड अदाकरा दिशा पाटनी सोशल मीडिया पर हमेशा ऐक्टिव रहती हैं. वो अक्सर ही अपने हौट और बोल्ड फोटोज और वीडियो को शेयर कर सुर्खियों में रहती हैं. इस बार दिशा पाटनी ने सोशल मीडिया पर अपना एक और वीडियो शेयर किया है, जिसे देखकर ऐसा लगता हे कि वह शायद अब एक्शन में भी अपना हाथ आजमाना चाहती हैं.

ऐसा हम इसलिए कह रह हैं क्योंकि हाल ही में उन्होंने अपने इंस्टाग्राम पर एक वीडियो पोस्ट किया है. जिसमें वह डांस नहीं बल्कि स्टंट करती नजर आ रही हैं और वो भी पानी में. स्टंट भी कोई ऐसा वैसा नहीं बल्कि बेहद ही जानदार. जी हां दिशा ने स्विमिंग पूल में हैंड स्टैंड किया है.

आप देखेंगे कि किस तरह बड़े ही आराम से वह स्विमिंग पूल में फ्लिप करती हैं और हाथों के बल खड़ी हो जाती हैं. दिशा पाटनी के इस हैरतअंगेज कारनामे को देख जहां लोगों के पसीने छूट गए हैं, वहीं दिशा सभी से पूछ रही हैं कि उनकी तरह यह हैंडस्टैंड कौन कर सकता है?

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भले ही टाइगर और दिशा ने कभी भी अपने रिलेशनशिप पर खुलकर बात ना की हो, लेकिन दिशा के इस स्टंट को देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि किसकदर टाइगर श्रौफ के प्यार का खुमार दिशा चढ़ रहा है. अब देखना यह होगा कि दिशा के इस अंडरवॉटर हैंडस्टैंड पर टाइगर की क्या प्रतिक्रिया होगी.

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अलगाव ए मोबाइल : शिकंजे में हर शख्स

साक्षी और सिंधु ने साबित कर दिया कि घर के लिए सब्जी, बच्चों की पीटीएम से ले कर ओलिंपिक में मैडल लाने तक के लिए महिलाओं को ही आगे आना पड़ता है. इतनी बड़ी कामयाबी के साथ एक और छोटी खबर जो पिछले दिनों चर्चा में रही, वह थी ‘सिंधु का मोबाइल से अलगाव’  वह भी पूरे 3 महीने के लिए. आज शायद यह ओलिंपिक में मैडल जीतने से भी ज्यादा कठिन कार्य है. महान तपस्या है. जब मोबाइल यत्रतत्रसर्वत्र छाया है, तो इस के बिना रहने की कल्पना करने से भी डर लगता है. घर, बाहर, मैट्रो स्टेशन या एयरपोर्ट सब जगह मोबाइल पर जुटे लोग दिख जाएंगे. बीएमडब्लू वाला हो या रिकशे वाला हर कोई इस का दीवाना है. सुबह से ले कर रात और रात से ले कर सुबह, अनवरत मोबाइल देवो भव:.

अब आप ही बताइए उस सफलता या उपलब्धि के क्या माने हैं जिस की पलपल की खबर लोगों तक न पहुंचे. कैसा होगा वह करुणामय पल जब सिंधु ने भरे मन से मोबाइल का त्याग किया होगा? कितनी मुश्किल से मोबाइल अपने बैग या जेब से निकाल कर दिया होगा? क्या उस का हाथ नहीं कांपा होगा?

क्या उस के मन में एक बार भी नहीं आया होगा कि अब मैं सैल्फी कैसे लूंगी? मैं फेसबुक पर पोस्ट कैसे डालूंगी? ट्विटर पर ट्वीट कैसे करूंगी? कैसे इंस्टाग्राम पर धड़ाधड़ पिक्स डालूंगी. शायद इन में से अगर एक खयाल भी दिमाग में आ जाता तो बेचारी के तो आंसू निकल जाते और शायद वह कह भी देती, ‘भाड़ में जाए ओलिंपिक्स’ इस महान कार्य के लिए ‘भारत रत्न’ तो बहुत छोटी चीज है. उस से भी बड़ा कोईर् अवार्ड है तो  उसे मिलना चाहिए था, जैसे ‘संभाले जनून अवार्ड’ या फिर ‘काबिलेतारीफ अवार्ड.’

क्या फायदा ऐसी सफलता का जब तक उस की पलपल की खबर फेसबुक पर किसी ने न ली. आज कोई भी नौजवान  नाम से कम इस बात से ज्यादा जाना जाता है कि उस ने सोशल मीडिया पर कितनी पोस्ट डालीं.

सोचो जरा, कैसी खुशी रही होगी सिंधु के मुख पर जब वह रियो पहुंची होगी. क्याक्या सत्कार हुआ होगा उस का? पर सब बेकार, जब उन हसीन लमहों को किसी ने फेसबुक पर देखा ही नहीं, लाइक ही नहीं किया और न ही कोई कमैंट किया. आज के ज़माने में इसे बेइज्ज़ती कहते हैं, अगर कोई लाइक या कमैंट न करे, और जो पोस्ट न डाले वह बैकवर्ड.

वह ज़माने लद गए जब बच्चे मां के उठाने पर या घड़ी के अलार्म से उठते थे. अब उन की नींद व्हाट्सऐप या फेसबुक के मैसेज से खुलती है. चाहे मां कितनी भी आवाज लगा लें मजाल है कि बच्चे जरा हिल भी जाएं और वहीं अगर वह वाईफाई औन कर दें, तो देखो नज़ारा, एक मिनट में उठ जाएंगे और पूरी मुस्तैदी से फोन उठा कर मैसेज पढ़ना शुरू कर देंगे. अब आप यह न कहना कि हमारा बच्चा पढ़ता नहीं है.

देखो, कितने मनोयोग से पढ़ रहा है. फिर चाहे वह ग्रुप के मैसेज हों या पिछली रात वाली चैट.

सुबह बेशक अपने सामने खड़ी मम्मी को नमस्ते, गुडमौर्निंग न बोले पर मजाल है, अपने व्हाट्सऐप ग्रुप पर ‘गुडमौर्निंग फैं्रड्स’ लिखना भूल जाए. जैसे वे तो ताक लगाए बैठे हैं कि कब आप का बच्चा गुडमौर्निंग बोले और वे अपने दिन का शुभारंभ करें.

फेसबुक पर भी वे ऐसीऐसी पोस्ट डालेंगे कि फै्रंड्स पुरजोर कोशिश करेंगे कि उन की खबर दुनिया के कोनेकोने तक पहुंच जाए. इतना लाइक करेंगे कि हरेक कमैंट का जवाब देंगे. सैल्फी डालेंगे और लोगों को पकाएंगे. पिछली रात का एकएक मिनट का लेखाजोखा होगा. तिस पर उन का बस चले तो अपनी नींद में आने वाले सपने भी फेसबुक पर डाल दें, पर कमबख्त याद ही नहीं रहते बड़ा अफसोस है.

वह जमाना गया जब लोग समय देखने के लिए घड़ी देखते थे. अब तो वह बेचारी दीवार टंगेटंगे ही ‘टैं’ बोल जाती है, किसी को उस का ध्यान ही नहीं आता. अब लोग वक्तबेवक्त मोबाइल चैक करते हैं. हर आधे सैकंड में जैसे इतने समय में कोईर् भूकंप न आ गया हो, उन के फोन और उन्हें देखना क्या होता है कि कितने लाइक आए हैं, कितने कमैंट मिले हैं या फिर किस ने क्या पोस्ट डाली है. शायद उन्हें लगता है कि लोग टौर्च ले कर उन्हें ही ढूंढ़ रहे हैं. कितने फौलोअर हो गए, कितने लाइक, कमैंट जैसे इस में कोई विश्व रिकौर्ड बनाना है.

लोगों की गुडमौर्निंग, गुडईवनिंग, बर्थ के विशेज, हर त्योहार की शुभकामनाएं यहां तक कि विमंस डे, फादर्स डे आदि की अवधारणाएं भी सुबहसुबह व्हाट्सऐप बीप के साथ सब का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करती हैं.

जहां इतना जनून उबल रहा हो, ऐसे में सिंधु का अलगाव ए मोबाइल वाकई काबिलेतारीफ है. एक भारत रत्न तो इस उपलब्धि के लिए भी बनता है जी.

पहले बच्चे किताबें ले कर खुश होते थे और अब मोबाइल. उन्हें कह दो, ‘बेटा नोट्स बना लो,’ तो जवाब मिलेगा, ‘क्या जरूरत है मौम? व्हाट्सऐप ग्रुप पर कोई भी डाल देगा?’

नोट्स भी अब इंस्टैंट पिज्जा की तरह हो गए हैं. 15 मिनट के बाद फ्री, क्योंकि 15 मिनट में ही बच्चे उन नोट्स पर इतने कमैंट्स डाल कर बेइज्जती कर देते हैं कि बनाने वाला सोच में पड़ जाता है कि मैं ज्यादा समझदार हूं या फिर ये सब लोग, जो अपनी ऐक्सपर्ट राय दे रहे हैं. उसे अपने ही बनाए नोट्स की गुणवत्ता पर शक होने लगता है.

और तो और व्हाट्सऐप अब रैगिंग का नया तरीका बन गया है. पहले फै्रशर्स को अच्छेअच्छे सब्ज़बाग दिखा कर ग्रुप में जोड़ लेते हैं. टीचर्स भी कहते हैं, ‘सीनियर्स से बना कर रखो. काम आएगी यह दोस्ती आगे बढ़ने में.’

फिर वह इसी ग्रुप पर कालेज की छुट्टी का ऐलान कर के क्लास बंक करवा देते हैं.

पर अफसोस, सिंधु ने ये सब अविस्मरणीय पल खो दिए सिर्फ ओलिंपिक में मैडल की चाह में.

VIDEO : पीकौक फेदर नेल आर्ट

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