लालू और भाजपा में पक रही सियासी खिचड़ी?

बिहार के सियासी हलकों में यह खुसुरफुसुर तेज होने लगी है कि सीबीआई के फंदे से छुटकारा पाने और नीतीश कुमार को दगाबाजी का सबक सिखाने के लिए लालू प्रसाद यादव भारतीय जनता पार्टी से हाथ मिलाने के मूड में हैं.

इस कयास को कुछ ताकत इस बात से भी मिल रही है कि नीतीश कुमार भी भाजपा से अलग कोई गठबंधन बनाने की कोशिशों में लग गए हैं.

पिछले दिनों राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के 2 घटक दलों के मुखिया रामविलास पासवान और उपेंद्र कुशवाहा से मुलाकात कर उन्होंने इन अटकलों को बल दे दिया है. साथ ही, नीतीश कुमार ने प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष रहे अशोक चौधरी को उन के दलबल के साथ अपनी पार्टी में शामिल कर लिया है. वे इस कोशिश में लगे हैं कि अगर लालू और भाजपा के मिलने की अटकलें सच साबित हो जाएंगी तो वे किसी भी तरह से अपनी सरकार और साख बचाने में कामयाब हो जाएंगे.

अगर भाजपा और राजद की सीटों और वोट फीसदी पर गौर करें तो पिछले विधानसभा चुनावों में भाजपा को 53 सीटों के साथ 24.4 फीसदी वोट मिले थे वहीं राजद को 80 सीटें और 18.4 फीसदी वोट मिले थे. 80 सीटों के साथ राजद के सिर पर सब से बड़ी पार्टी होने का सेहरा बंधा था. इस हिसाब से भाजपा और राजद के मिलन से 133 सीटें हो जाती हैं.

243 सीटों वाली बिहार विधानसभा में बहुमत पाने के लिए 123 सीटों की दरकार होती है. ऐसे में किसी और छोटेमोटे दल को शामिल किए बगैर आराम से सरकार चल सकती है.

जनता दल (यूनाइटेड) को 16.8 फीसदी वोट मिले थे और उस के खाते में 71 सीटें आई थीं. कांग्रेस के हाथ में 27 सीटें हैं और उसे 6.7 फीसदी वोट मिले थे. रामविलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी को 2 सीटें और 4.8 फीसदी वोट मिले थे, जबकि उपेंद्र कुशवाहा के रालोसपा को 2 सीटों के साथ 2.6 फीसदी वोट हासिल हुए थे.

इस आंकड़े के हिसाब से कांग्रेस, लोजपा और रालोसपा के साथ सरकार बनाना नीतीश कुमार के लिए खासा मुश्किल काम है.

ऊपरी तौर पर तो लालू प्रसाद यादव और भाजपा का मिलन नामुमकिन सा दिख रहा है, पर नेताओं के मिलनेबिछुड़ने का पिछला रिकौर्ड बताता है कि राजनीति में कुछ भी नामुमकिन नहीं होता है और न ही कोई दोस्ती या दुश्मनी हमेशा के लिए होती है. हालात और फायदे के लिहाज से रिश्ते बनतेबिगड़ते रहे हैं.

लालू प्रसाद यादव और भाजपा के मिलने की अटकलों को सिरे से खारिज करने वालों को यह याद रखना चाहिए कि साल 1990 में जब लालू प्रसाद यादव पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री बने थे तब उन्होंने भाजपा की मदद से ही सरकार बनाई थी.

अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव को ले कर बिहार में राजग और बाकी दलों में उठापटक का दौर चालू हो गया है. हर नेता अगले आम चुनाव में कामयाबी पाने के लिए गुणाभाग करने में लग गया है. इस से साफ है कि जैसेजैसे चुनाव नजदीक आएंगे वैसेवैसे बिहार में गठबंधनों की नई कोशिशें परवान चढ़ेंगी और उन का कोई नया और हैरान करने वाला चेहरा देखने को मिल सकेगा.

लालू प्रसाद यादव की पार्टी राजद की अगुआई में बने महागठबंधन को पहले नीतीश कुमार ने और उस के बाद कांग्रेस के एक गुट ने जोर का झटका दिया है. वहीं राजग के एक घटक दल हिंदुस्तानी अवाम मोरचा के सुप्रीमो जीतनराम मांझी ने राजग को बायबाय कर दिया. रालोसपा के मुखिया और केंद्रीय मंत्री उपेंद्र कुशवाहा ने एम्स में लालू प्रसाद यादव से मुलाकात कर राजग में तूफान ला दिया है.

उपेंद्र कुशवाहा ने इस मुलाकात को शिष्टाचार मुलाकात बताया है. पर इतिहास गवाह है कि सियासत में शिष्टाचार मुलाकात के कई अर्थ और अनर्थ होते हैं.

गौरतलब है कि तकरीबन 3 महीने पहले उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी ने पटना के गांधी मैदान में ‘शिक्षा बचाओ रैली’ का आयोजन किया था, जिस में राजद के कई नेताओं ने शामिल हो कर सियासी उलटफेर होने के संकेत दे दिए थे.

नरेंद्र मोदी की घटती लोकप्रियता के बीच राजग में ऊहापोह की खिचड़ी पकने लगी है. लोजपा सुप्रीमो रामविलास पासवान भी बदलते मौसम के हिसाब से करवट बदलने के मूड में हैं और राजग को घुड़की देने लगे हैं. कांग्रेस का एक नाराज खेमा पहले के पार्टी मुखिया रह चुके अशोक चौधरी की अगुआई में नीतीश कुमार का दामन थाम चुका है तो हिंदुस्तानी अवाम मोरचा के प्रदेश अध्यक्ष नरेंद्र सिंह ने एक बार फिर नीतीश कुमार की पार्टी का झंडा थाम लिया है.

इस उठापटक के बीच नीतीश कुमार को राजद का एक दिलचस्प न्योता मिला है. महागठबंधन को लात मार कर भाजपा की गोद में जा बैठने के बाद नीतीश कुमार को पलटूराम करार देने वाले राजद नेताओं ने नीतीश कुमार को फिर से महागठबंधन में आने का खुला न्योता दे डाला है.

राजद के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रघुवंश प्रसाद सिंह ने नीतीश कुमार को मक्खनमलाई लगाते हुए उन्हें धर्मनिरपेक्ष दलों का बड़ा चेहरा करार दे डाला है.

रघुवंश प्रसाद सिंह ने नीतीश कुमार को महागठबंधन में शामिल होने की गुहार लगाई है. उन्होंने साफतौर पर कहा कि राजनीति में कुछ भी नामुमकिन नहीं है. जब सभी गैरभाजपा दल एकजुट हो रहे हैं तो पुरानी बातों को भूल कर नीतीश कुमार को भी महागठबंधन में लौट आना चाहिए.

लोकसभा चुनाव 2019 को ले कर जद (यू) ने बिहार की सभी 40 सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी करने का ऐलान कर अपने दोस्त भाजपा को चुनौती देने के साथ मुश्किलें खड़ी कर दी हैं.

पिछले दिनों पार्टी की राज्य कार्यकारिणी की बैठक में जद (यू) के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीश कुमार ने पार्टी संगठन को धारदार बनाने और बूथ लैवल तक उसे मजबूत करने पर जोर दिया. इस के साथ ही अगले 2 महीने के अंदर बूथ लैवल पर एजेंट बनाने का भी फरमान जारी किया.

फिलहाल राज्य में जद (यू) के 1 करोड़, 54 लाख सदस्य हैं. इस के साथ ही नीतीश कुमार ने बाल विवाह, दहेज प्रथा जैसी सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ मुहिम चलाने के लिए भी नेताओं और कार्यकर्ताओं को निर्देश दिया है.

जद (यू) खुद को पार्टी विद डिफरैंस के तौर पर स्थापित करने में लग गई है. पिछले 13 सालों में नीतीश कुमार की अगुआई में हुए कामकाज को पार्टी जनता के बीच ले जाने की जुगत में है. वहीं पार्टी को ग्रासरूट लैवल तक मजबूत बनाने की कोशिशें शुरू हो चुकी हैं. पार्टी अपने वोटरों को यह समझाने में लगी है कि दूसरे दलों से गठबंधन करने के बाद भी उस के सिद्धांतों में कोई बदलाव नहीं आया है.

पिछले दिनों पार्टी की राज्य कार्यकारिणी की बैठक में खुद को दूसरे दलों से अलग साबित करने की रणनीति पर मंथन हुआ. पार्टी की नीतियों और सोच को जनता तक पहुंचाने के लिए डेढ़ लाख कार्यकर्ताओं को ट्रेंड किया जाएगा. पहले चरण में 15 हजार मास्टर ट्रेनर तैयार किए जाएंगे जो अपने जिलों, ब्लौकों और पंचायतों में टे्रनिंग देंगे. ट्रेनिंग पूरी होने के बाद सभी 534 ब्लौकों में जद (यू) कार्यकर्ताओं का सम्मेलन होगा.

जद (यू) के प्रदेश अध्यक्ष वशिष्ठ नारायण सिंह ने बताया कि जद (यू) पार्टी सकारात्मक राजनीति में यकीन करती है और उन की पार्टी के लिए राजनीति केवल सत्ता पाने का औजार भर नहीं है.

इस बीच भाजपा नेता और उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने दावा किया है कि साल 2019 का लोकसभा चुनाव भाजपा और जद (यू) साथ मिल कर लड़ेंगे और नरेंद्र मोदी फिर प्रधानमंत्री बनेंगे. गौरतलब है कि फिलहाल बिहार की 40 लोकसभा सीटों में से 32 सीटों पर राजग का कब्जा?है.

सुशील कुमार मोदी के इस दावे के बीच हकीकत यह है कि गठबंधन में अभी से ही खींचतान शुरू हो गई है. भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने जहां अपनी पार्टी के नेताओं को फार्मूला दिया है कि पार्टी कार्यकर्ताओं की बूथ लैवल तक पैठ बनाई जाए, वहीं नीतीश कुमार ने अपने नेताओं और वर्करों को कह दिया है कि राज्य की सभी 40 लोकसभा सीटों पर पार्टी का जनाधार बढ़ाने के लिए वे पूरी ताकत झोंक दें.

भाजपा की गोद में बैठ कर भी नीतीश कुमार अपने धुर विरोधी नरेंद्र मोदी को परेशान करने का कोई मौका नहीं छोड़ते हैं. मोदी के गढ़ गुजरात में अपनी ताकत आजमाने और पैठ बनाने की नीयत से नीतीश कुमार ने पिछले गुजरात विधानसभा चुनाव में अपनी पार्टी जद (यू) के 38 उम्मीदवारों को मैदान में उतारा था, लेकिन किसी की जीत तो दूर सभी उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई थी.

दक्षिणी गुजरात के आदिवासी इलाकों पर नीतीश कुमार की नजर थी और उन्हें यकीन था कि वहां से उन की पार्टी को ज्यादा वोट मिल सकते हैं, पर ऐसा नहीं हो सका.

जद (यू) के अंदर भी पिछले एक साल से काफी घमासान मचा हुआ है. पिछले साल 26 जुलाई को जब नीतीश कुमार ने लालू प्रसाद यादव से नाता तोड़ कर भाजपा के साथ मिल कर सरकार बनाई थी तो उन की ही पार्टी के अध्यक्ष रह चुके शरद यादव और राज्यसभा सांसद अली अनवर ने उन के फैसले का विरोध किया था. इस वजह से पिछले अगस्त को जद (यू) ने शरद यादव को राज्यसभा में पार्टी के नेता पद से हटा दिया था. उस के बाद उन्हें उद्योग मामले की संसदीय समिति के अध्यक्ष पद से भी हटा दिया गया था. तब शरद यादव ने बगावती तेवरों को तेज करते हुए जद (यू) के चुनाव चिह्न ‘तीर’ पर अपना दावा ठोंका था, जिसे चुनाव आयोग ने ठुकरा दिया था. 17 नवंबर, 2017 को आयोग ने नीतीश कुमार को जद (यू) का राष्ट्रीय अध्यक्ष मानते हुए उन्हें पार्टी का चुनाव चिह्न ‘तीर’ रखने का निर्देश सुनाया था.

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कोई सिनेमा छोटा नहीं : पायल रोहतगी

हिंदी फिल्मों की जानीमानी हीरोइन और ‘बिग बौस’ व ‘नच बलिए’ में प्रतियोगी रह चुकी पायल रोहतगी की शोख व बोल्ड अदाएं अब पूरे 2 साल बाद रमेश नैयर की भोजपुरी फिल्म ‘हल्फा मचा के गईल’ में भी देखने को मिलेंगी.

पायल रोहतगी इस भोजपुरी फिल्म में एक स्पैशल डांस में नजर आएंगी. इस गाने की शूटिंग मुंबई से 50 किलोमीटर दूर नायगांव के आरडीएल स्टूडियो में लगाए गए भव्य सैट पर की गई जिस में पायल रोहतगी के साथ फिल्म के हीरो राघव नैयर ने भी हिस्सा लिया.

इस गाने में पायल रोहतगी का बिंदास रूप दिखेगा. उन्होंने कहा, ‘‘फिल्म के निर्माता रमेश नैयर ने जब मुझे इस फिल्म का औफर दिया तो मैं इनकार न कर सकी.

‘‘फिल्म ‘हल्फा मचा के गईल’ भोजपुरी जरूर है, मगर मेरे डांस नंबर के बोल हिंदी में हैं. गाने के बोल बहुत अच्छे हैं. मैं ने तो इसे पूरी तरह से हिंदी आइटम सौंग मान कर किया है. यह एक क्लब के अंदर हो रहा डांस है जहां फिल्म के हीरो राघव नैयर एंजौय करने के लिए आते हैं.

‘‘जब मैं किसी फिल्म से जुड़ती हूं तो इस बात पर ध्यान देती हूं कि वह फिल्म अच्छी है या नहीं, क्योंकि सिनेमा का अच्छा होना जरूरी है. मेरी नजर में कोई सिनेमा छोटा नहीं होता.’’

पायल रोहतगी पिछले 4 सालों से किसी फिल्म में काम करते हुए नजर नहीं आईं. इस की क्या वजह रही? इस सवाल पर उन्होंने कहा, ‘‘मैं काफी काम कर रही हूं. अब हम ‘संग्राम सिंह फाउंडेशन’ के लिए भी काफी समय देते हैं.

‘‘इस के अलावा मैं फिल्म और टैलीविजन में ऐक्टिंग कर रही हूं. एक नारी प्रधान गुजराती फिल्म में मैं लीड किरदार निभा रही हूं. इस फिल्म में लोगों को पहली बार मेरी ऐक्टिंग में कई तरह के रंग देखने को मिलेंगे.’’

‘संग्राम सिंह फाउंडेशन’ के बारे में पायल रोहतगी ने कहा, ‘‘हमारे देश में क्रिकेट व हौकी के अलावा दूसरे खेलों से लोगों को ज्यादा पैसे नहीं मिल पाते हैं. बाकी खेलों से जुड़े खिलाड़ी मेहनत करते हैं, पर उन्हें मनचाहे पैसे नहीं मिल पाते हैं. नतीजतन, उन्हें कई तरह की पैसे संबंधी मुसीबतों से जूझना पड़ता है. ऐसे खिलाड़ी बड़ी मुश्किल से अपनी रोजीरोटी कमा पाते हैं. हम चाहते हैं कि कुश्ती भी क्रिकेट के आईपीएल की तरह एक मशहूर खेल बन जाए.

‘‘अब तो सलमान खान और आमिर खान जैसे बड़े कलाकारों ने कुश्ती जैसे खेल पर फिल्में भी कर ली हैं. इस से लोगों के बीच एक जागरूकता पैदा हुई है.

‘‘इस फाउंडेशन के तहत हम ने कुछ बच्चों को एडौप्ट भी किया है. संग्राम सिंह बच्चों से बहुत प्यार करते हैं. हम दोनों चाहते हैं कि उभरते हुए उन बच्चों के लिए कुछ किया जाए जो कुश्ती में दिलचस्पी रखते हैं.

‘‘इस फाउंडेशन ने सब से पहले केडी जाधव मैमोरियल टूर्नामैंट कराया था. यह पिछले साल की बात है, जहां हम ने उभरते हुए पहलवानों के मैच कराए थे. जो पैसा जमा हुआ था, वह उन में बांटा गया था.’’

क्रिकेट के अलावा दूसरे खेलों की बदहाली के लिए भारतीय सोच पर बात करते हुए पायल रोहतगी ने कहा, ‘‘यह हमारे देश की बदकिस्मती है वरना कुश्ती भारत देश का सब से पुराना खेल है.

‘‘अफसोस की बात है कि जब दूसरे देशों के खिलाडि़यों ने कुश्ती में नाम कमाया तब हम ने उस पर ध्यान दिया.

‘‘हमारे यहां सब से बड़ी समस्या यह है कि हम लोग सबकुछ बाहर से आयात करना चाहते हैं. हम अपने घर की चीजों की अनदेखी करते हैं. पर जब वह चीज विदेशों में मशहूर हो जाती है, तो हम उसे अपना लेते हैं. यह हमारी भारतीय सोच की कमी है.’’

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उन्नाव कांड : सामने आई औरतों की बदहाली

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से 56 किलोमीटर दूर उन्नाव जिले के माखी गांव की कविता (बदला हुआ नाम) के पिता और दोनों चाचा 15 साल पहले कुलदीप सेंगर के करीबी हुआ करते थे. एक ही जाति के होने के चलते उन में आपसी तालमेल भी बेहतर था. वे एकदूसरे के सुखदुख में साझीदार थे.

कुलदीप सेंगर ने कांग्रेस से अपनी राजनीति शुरू की. चुनावी सफर में कांग्रेस कमजोर लगी तो वे विधानसभा का पहला चुनाव बहुजन समाज पार्टी के टिकट पर लड़े और साल 2002 में पहली बार उन्नाव की सदर विधानसभा सीट से विधायक बने.

विधायक बनने के बाद जहां पूरा समाज कुलदीप सेंगर को ‘विधायकजी’ कहने लगा था, वहीं कविता के ताऊ उन्हें उन के नाम से बुलाते थे. लिहाजा, कुलदीप सेंगर ने अपनी इमेज को बचाने के लिए इस परिवार से दूरी बनानी शुरू कर दी.

कविता के पिता और उन के दोनों भाइयों को लगा कि कुलदीप सेंगर के भाव बढ़ गए हैं, इसलिए वे किसी न किसी तरह से उन को नीचा दिखाने की कोशिश में लगे रहे. यह मनमुटाव बढ़ता गया.

कविता के ताऊ पर गांव माखी और दूसरे थाना क्षेत्रों में तकरीबन एक दर्जन मुकदमे दर्ज थे. शायद इसी रंजिश में तकरीबन 10 साल पहले उन्नाव शहर में भीड़ ने ईंटपत्थरों से हमला कर के कविता के ताऊ को मार दिया था. कविता के परिवार के लोगों ने इस घटना का जिम्मेदार विधायक कुलदीप सेंगर को ही माना था.

कविता के ताऊ की मौत के बाद उस के चाचा उन्नाव छोड़ कर दिल्ली चले गए. वहां उन्होंने अपना इलैक्ट्रिक वायर का कारोबार शुरू किया. उन के ऊपर भी तकरीबन 10 मुकदमे दर्ज थे.

कविता के पिता अकेले रह गए. उन के ऊपर भी 2 दर्जन मुकदमे दर्ज थे. नशा और मुकदमों का बोझ उन को बेहाल कर चुका था.

कुलदीप सेंगर ने साल 2007 का विधानसभा चुनाव समाजवादी पार्टी के टिकट पर बांगरमऊ विधानसभा से जीता था और साल 2012 में भगवंत नगर विधानसभा से उन्होंने चुनाव जीता था. साल 2017 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने भाजपा का साथ लिया और बांगरमऊ से विधायक बन गए.

इस बीच विधायक कुलदीप सेंगर के परिवार और कविता के परिवार की रंजिश बनी रही.

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कविता से बलात्कार

कविता के साथ हुए बलात्कार के मसले पर जो जानकारी सामने आई उस के मुताबिक जून, 2017 में राखी (बदला हुआ नाम) नामक एक औरत कविता को ले कर विधायक कुलदीप सेंगर के पास गई थी. वहां विधायक ने उसे बंधक बना लिया और उस के साथ बलात्कार किया गया. बलात्कार का आरोप विधायक के भाई और साथियों पर लगा. वारदात के 8 दिन बाद कविता औरैया जिले के पास मिली.

कविता और उस के पिता ने इस बात की शिकायत थाने में की तब पुलिस ने 3 आरोपी नौजवानों को जेल भेज दिया. घटना में विधायक का नाम नहीं था.

कविता और उस का परिवार विधायक के नाम को भी मुकदमे में शामिल कराना चाहता था. एक साल तक कविता और उस का परिवार विधायक के खिलाफ गैंगरेप का मुकदमा लिखाने के लिए उत्तर प्रदेश के गृह विभाग से ले कर उन्नाव के एसपी तक भटकता रहा, इस के बाद भी विधायक के खिलाफ एफआईआर दर्ज नहीं हुई.

विधायक के खिलाफ मुकदमा न लिखे जाने के चलते कविता और उस के परिवार के लोगों ने सीआरपीसी की धारा 156 (3) के तहत कोर्ट से मुकदमा लिखे जाने की अपील की.

कविता की इतनी कोशिश करना उस पर भारी पड़ गया. विधायक के लोगों ने उस पर मुकदमा वापस लेने का दबाव बनाना शुरू किया.

हिरासत में मौत

3 अप्रैल, 2018 को विधायक के छोटे भाई ने कविता के पिता के साथ मारपीट की और मुकदमा वापस लिए जाने के लिए कहा. कविता और उस के परिवार वालों ने पुलिस में मुकदमा लिखाया. इस के साथ ही विधायक के लोगों की तरफ से भी मुकदमा लिखाया गया.

पुलिस ने क्रौस एफआईआर लिखी पर केवल कविता के पिता को ही जेल भेज दिया. कविता का आरोप है कि जेल में विधायक के लोगों ने उस के पिता की खूब पिटाई की.

8 अप्रैल, 2018 को कविता अपने परिवार वालों के साथ राजधानी लखनऊ आई और सीधे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के आवास कालीदास मार्ग पहुंच गई. वहां उस ने आत्मदाह करने की कोशिश की. पुलिस ने उसे पकड़ लिया.

इस पूरे मामले की जांच के लिए एसपी उन्नाव को कहा गया. इस बीच जेल में ही कविता के पिता की मौत हो गई. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में पिटाई और घाव में सैप्टिक हो जाने से मौत होना बताई गई.

किसी लड़की के लिए इस से दर्दनाक क्या हो सकता है कि जिस समय वह इंसाफ की मांग ले कर मुख्यमंत्री से मिली, उसी समय उस का पिता मौत के मुंह में चला जाए.

सरकार की तेजी के बाद कविता के पिता पर एकतरफा कार्यवाही करते हुए जेल भेजने के दोषी माखी थाने के एसओ अशोक सिंह भदौरिया समेत 6 पुलिस वालों को सस्पैंड कर दिया गया. मामले की जांच क्राइम ब्रांच को सौंप दी गई.

उन्नाव की एसपी पुष्पांजलि ने बताया कि 3 अप्रैल को कविता के पिता के साथ की गई मारपीट में शामिल सभी 4 आरोपियों को जेल भेज दिया गया.

मौत के बाद जागी सरकार

कविता के पिता की जेल में मौत के बाद उत्तर प्रदेश की राजनीति गरमा गई. विपक्षी दलों में समाजवादी पार्टी से ले कर कांग्रेस तक ने सरकार पर आरोप लगाने शुरू कर दिए. खुद विधायक कुलदीप सेंगर मुख्यमंत्री से मिलने आए, पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने विधायक से मुलाकात नहीं की.

विधायक कुलदीप सेंगर को यह संदेश दिया गया कि वे जांच में सहयोग करें. सरकार की सख्ती के बाद कविता के पिता से मारपीट के आरोपी विधायक के भाई अतुल सिंह को और बाद में विधायक को भी पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया.

सरकारी अफसर पूरे मामले में विधायक की भूमिका की भी जांच कर रहे हैं. पूरे मामले में सच जो भी हो, पर सरकार की किरकिरी हो चुकी है. भाजपा के लिए डैमेज कंट्रोल करना मुश्किल काम है.

बहरहाल, औरतों की बदहाली का इस से बड़ा क्या उदाहरण होगा कि अपने खिलाफ हुए अपराध में इंसाफ पाने के लिए उन को आत्मदाह करने तक की नौबत आती है.

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देश में बढ़ी धार्मिक हिंसा

बिहार में इस बार जो हिंदूमुसलिम दंगे हो रहे हैं वे उन इलाकों में भी हो रहे हैं जहां कभी नहीं हुए. यह भारतीय जनता पार्टी के कट्टरपंथी पंडावादियों की चाल है कि मुसलमानों के नाम पर कुछ दबंग हिंदुओं को उकसा कर उन्हें दलितों और अतिपिछड़ों को काबू में करने के लिए इस्तेमाल करा जा सके.

बिहार, पश्चिम बंगाल, ओडिशा के मुसलमानों में बहुत ही कम ऐसे हैं जिन के पुरखे 800 से 1000 साल पहले सिंध नदी की दूसरी तरफ से आए हों. यहां के मुसलमान ज्यादातर अछूत और शूद्र यानी पिछड़े हैं जिन्हें सदियों से पंडावादी राजाओं और गांवों के मुखियाओं ने गुलामों की तरह रखा था. जब मुसलमानों ने इन इलाकों पर राज करना शुरू किया तो ये मुसलिम बन कर अत्याचार से छूटे.

बंगलादेश इसी की देन है. अब जो करोड़ों मुसलमान इस इलाके में बचे हैं वे शूद्रों यानी पिछड़ों व अछूतों यानी दलितों के साथ के हैं, दोनों में आपसी गठजोड़ है. भारतीय जनता पार्टी उसे तोड़ना चाहती है. लालू प्रसाद यादव ने इन्हें जोड़ा था. इस से पहले गांधी और कांग्रेस ने इन्हें एक तरह से पटा कर रखा था.

नीतीश कुमार यह सब जानते हैं पर कांग्रेस और लालू प्रसाद यादव से उन की नहीं बनी इसलिए ज्यादातर भारतीय जनता पार्टी की गोद में बैठे रहे. अब तक उन की सुनी जाती थी पर अब पौराणिक राज दोबारा थोपने की जल्दबाजी में भगवाई चौधरी मुसलमानों पर हमले कर के उन्हें और दलितों को जता रहे हैं कि मान जाओ वरना तुम्हें तुम्हारे ही लोगों से पिटवा दिया जाएगा.

सदियों से दलितों और दलितों से बने मुसलमानों पर उन्हीं के कुछ लोगों को लाठी, बल्लम दे कर और डरा कर या रिश्वत दे कर लड़ने को तैयार करा जाता था. काफी तो धर्म की एकदो छूट पा कर धन्य हो जाते थे कि अपनों या अपनों से कुछ नीचों को पीटपाट कर वे पिछले जन्मों के पाप धो सकेंगे. हरेक को पट्टी पढ़ा दी जाती है कि रावण पिछले जन्मों का पापी था और उसे मार कर राम को देवता का पद मिला था. आज वे धर्म की रक्षा करेंगे तो उन का जीवन और अगला जन्म सुधर जाएगा.

उन का जन्म सुधरे या नहीं नीतीश कुमार का यह जन्म पापपुण्य, अगड़ेपिछड़ेदलित, हिंदूमुसलमान की चक्करबाजी में नष्ट हो रहा है, यह दिख रहा है. पिछले कई सालों में वे बेचारे से हो गए हैं. कभी भाजपा की गोद उन्हें चुभती है तो कभी लालू प्रसाद यादव की. बातें तो वे बड़ीबड़ी बनाते हैं पर बिहार का कुछ कराधरा नहीं. लालू को जेल में जरूर भिजवा दिया और वे शायद ज्यादा जिंदा भी न रह पाएं पर इस के अलावा वे बिहार में कुछ ज्यादा कर रहे हों, ऐसा नहीं लगता.

इतिहास और पुराणों से कुछ नहीं सीख पा रहे हैं नीतीश इसीलिए नालंदा में हिंदूमुसलिम दंगों की झड़ी लग गई है. एक राज्य या देश का निर्माण गृहयुद्ध के माहौल में नहीं होता. अब राज्य में उत्पादन की जगह खूनखराबा पैदा हो रहा है. जय हिंदू जय राम के नारे लग रहे हैं. जय भारत जय बिहार गया भाड़ में.

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ऐनकाउंटर के नाम पर हत्याएं…

उत्तर प्रदेश में योगी सरकार बनने के बाद 20 मार्च, 2017 से फरवरी, 2018 तक तकरीबन 11 महीने में कई ऐनकाउंटर हो चुके हैं जिन में 43 तथाकथित अपराधी मारे गए हैं और तकरीबन डेढ़ हजार घायल हुए हैं.

कानून व्यवस्था को ठीक करने के नाम पर होने वाले इन ऐनकाउंटरों पर अब सवाल उठने लगे हैं. ऐसे ऐनकाउंटरों के तौरतरीके, पुलिस की कहानी, ऐनकाउंटर पीडि़तों के जख्मों वगैरह की जांचपड़ताल करने पर ऐसे सवालों का उठना लाजिमी भी है. सब से बड़ा सवाल तो यह है कि मुठभेड़ की जाती?है या हो जाती है?

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के बयानों को देखें तो इस नतीजे पर पहुंचना मुश्किल नहीं है कि मुठभेड़ की जाती है और ऐसा तथाकथित अपराधियों की निशानदेही कर के होता है.

उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले में मुठभेड़ में छन्नू सोनकर, रामजी पासी, जयहिंद यादव और मुकेश राजभर मारे गए थे. उन के परिवार वालों और गांव वालों से मिलने के बाद जो तथ्य सामने आए हैं वे चिंता बढ़ाने वाले हैं.

छन्नू सोनकर को अमरूद के बाग से पुलिस वाले ले गए और जब वह देर रात तक घर नहीं आया तो उस के परिवार वालों ने उस के मोबाइल पर फोन किया. पता चला कि वह जहानागंज थाने में है.

पिता झब्बू सोनकर और उस की बहनों ने बताया कि अगली सुबह 2 पुलिस वाले उन के घर पहुंचे और बताया कि छन्नू का जिला अस्पताल में इलाज चल रहा है. वहां पहुंचने के बाद परिवार वालों को मुठभेड़ में उस के मारे जाने के बारे में पता चला.

मुकेश राजभर की मां ने बताया कि उस का बेटा कानपुर में मजदूरी करता था. 15 दिन पहले पुलिस वाले उस के घर गए थे, गालीगलौज और मारपीट की थी और मुकेश का कानपुर का पता मांगा था.

मां का आरोप है कि पुलिस वाले उस से रिश्वत में बड़ी रकम मांग रहे थे. उस ने बताया कि 26 जनवरी को 9 बजे पुलिस ने मुकेश को कानपुर से उठाया था.

दिन में 12 बजे सिपाही रामजन्म ने फोन कर के मुकेश की मां से पूछा था कि उस के पास कितने खेत हैं तो उस ने उस से कहा था कि मुकेश को ले गए हो तो उसे मारनापीटना मत, लेकिन पुलिस ने उस को ऐनकाउंटर में मार डाला.

मुकेश को सीने में एक गोली मारी गई थी. पुलिस ने उस पर बंदी रक्षक को गोली मारने का अरोप लगाया है.

जयहिंद यादव के पिता शिवपूजन यादव ने बताया कि जयहिंद उन को साथ ले कर दवा लाने जा रहा था. सादे कपड़ों में कुछ लोगों ने उसे उठा कर एक गाड़ी में बैठा लिया और चले गए. उस के बाद सूचना मिली कि उस की मुठभेड़ में मौत हो गई. उसे 21 गोलियां लगी थीं.

क्षेत्र पंचायत सदस्य रहे रामजी पासी के पिता दिनेश सरोज का कहना था कि पुलिस ने पहले उस पर फर्जी मुकदमे लगाए और फिर फर्जी मुठभेड़ कराने में उस की हत्या कर दी.

उन का कहना था कि रामजी ने 600 वोटों से क्षेत्र पंचायत चुनाव जीता था. इस के चलते कुछ सवर्ण लोग उस से जलते थे और मुठभेड़ में उन लोगों का भी हाथ है.

बाराबंकी में पुलिस ऐनकाउंटर में घायल रईस अहमद के परिवार वालों से भी मुलाकात की गई. रईस अहमद की पत्नी ने बताया कि 30 दिसंबर को अंधेरा होते ही मुखबिर आबिद के साथ सादा कपड़ों में गाड़ी में आए पुलिस वाले उसे गांव से ही उठा कर ले गए.

जिला पंचायत का चुनाव लड़ चुके रईस अहमद की पत्नी ने आगे बताया कि उस के पति की गांव के कुछ लोगों से प्रधानी के चुनाव को ले कर रंजिश थी. उस को इस से पहले नहर काटने के आरोप में फंसाया गया था.

पुलिस ने मारे गए सभी तथाकथित अपराधियों पर कई अपराधों से जुड़े होने का आरोप लगाया है और उन्हें इनामी भी बताया है. इस के अलावा इन मुठभेड़ों के बाद पुलिस की कहानी में कई चीजें ऐसी हैं जो सभी मामलों में एकजैसी हैं.

जैसे सभी मुलजिम मोटरसाइकिल से जा रहे थे और उन में से हरेक के साथ उस का एक साथी भी था. पुलिस ने जब उन्हें रोकने की कोशिश की तो मोटरसाइकिल सवारों ने उन पर गोलियां चलाना शुरू कर दिया.

पुलिस ने जवाबी फायर किया तो मुलजिमों को गोली लगी जिस में वे घायल हो गए लेकिन उन के साथी फरार होने में कामयाब रहे. मुठभेड़ के बाद मौके से मोटरसाइकिल के अलावा हर वारदात में एक हथियार भी बरामद हुआ.

सवाल है कि मोटरसाइकिल सवार से मुठभेड़ में किसी को 21 गोलियां कैसे लग सकती हैं? 21 गोलियां लगने के बाद पुलिस का यह कहना कि अस्पताल ले जाते समय मौत हुई, ऐसा स्वाभाविक नहीं लगता.

मुकेश राजभर के सीने में जिस जगह पर गोली लगी और जिस से उस की मौत भी हो गई उस जगह पर गोली लगने के बाद कुछ मिनटों तक ही जिंदा रहने की उम्मीद रह जाती है, ऐसे में पुलिस जिला अस्पताल में इलाज के दौरान उस की मौत की बात कह कर शक ही पैदा कर रही है.

उठ रहे सारे सवालों के मद्देनजर उत्तर प्रदेश राज्य मानवाधिकार आयोग ने आजमगढ़ के मुकेश राजभर, जयहिंद यादव, रामजी पासी और इटावा के अमन यादव की फर्जी मुठभेड़ पर जांच बैठा दी गई है. उत्तर प्रदेश की विधानसभा में भी विपक्षी दलों ने फर्जी मुठभेड़ के नाम पर की जा रही हत्याओं का सवाल उठाया.

दरअसल, मुठभेड़ों की यह मुहिम कानून व्यवस्था का मामला कम और ऐनकाउंटर पौलिटिक्स का मसला ज्यादा लगता है.

भाजपा सरकार अपराधियों के प्रति कठोर होने के दिखावे के नाम पर राजनीतिक हिसाबकिताब चुकता कर रही है. ऐनकाउंटर में मारे जाने वालों में मुसलिमों, दलितों और पिछड़ों की तादाद सब से ज्यादा है. नामी सवर्ण अपराधी या भाजपा की शरण में चले जाने वाले लोग तो निश्चिंत हो कर घूम रहे हैं.

मुठभेड़ों के बढ़ते हुए आंकड़े ही यह बताने के लिए काफी हैं कि सबकुछ ठीक नहीं है. 20 मार्च, 2017 से शुरू इस मुहिम के पहले 6 महीने में कुल 420 ऐनकाउंटर हुए थे जिन में 15 लोग मारे गए थे जबकि यह आंकड़ा 3 फरवरी, 2018 तक क्रमश: 1142 और 38 था.

योगी सरकार की दिलचस्पी किसी से छिपी हुई नहीं है और यह मामला कानून व्यवस्था को ले कर कम राजनीतिक ज्यादा है.

 

गेंद से छेड़खानी, भारी पड़ी नादानी

क्रिकेट की छोटी सी गेंद ने मैदान पर बड़ेबड़े कारनामे किए हैं. यह बहुत से क्रिकेटरों को फर्श से अर्श तक ले गई है तो कुछ को इस ने धूल भी चटाई है. अगर किसी खिलाड़ी ने इस से छेड़छाड़ करने की कोशिश की है, तो इस ने वे तेवर दिखाए हैं कि उस का क्रिकेट कैरियर ही रिवर्स की ओर स्विंग कर गया.

ऐसा ही कुछ हाल में भी हुआ. दक्षिण अफ्रीका के केपटाउन में आस्ट्रेलिया और दक्षिण अफ्रीका के बीच तीसरा टैस्ट मैच चल रहा था. मैच का तीसरा दिन था और तारीख थी 24 मार्च, 2018. आस्ट्रेलिया के सलामी बल्लेबाज कैमरून बैनक्राफ्ट टैलीविजन के कैमरे में कुछ ऐसा करते हुए कैद हो गए कि बाद में उन्हें उस हरकत का जवाब देना भारी पड़ गया.

दरअसल, कवर पर फील्डिंग करते समय कैमरून बैनक्राफ्ट के हाथ में पीली सी कोई चीज देखी गई थी, जिसे बाद में उन्होंने अपनी पैंट के भीतर शायद अंडरवियर में छिपा दिया था.

बाद में पता चला कि कैमरून बैनक्राफ्ट ने खेल के दौरान पीले रंग का टेप हाथ में लगा रखा था. वे बीचबीच में सब से नजरें बचा कर उसे पिच पर रगड़ते थे, जिस से मिट्टी के कण उस पर चिपक जाते थे और वह टेप किसी रेगमाल की तरह काम करता था.

बाद में उस टेप को गेंद पर रगड़ दिया जाता था जिस से गेंद का कुछ हिस्सा खुरदरा हो जाता था. जब गेंद जमीन पर टप्पा खाती थी तो वह रिवर्स स्विंग करने लगती थी जिस से बल्लेबाज को परेशानी महसूस होती थी.

लेकिन अफसोस, टेप को पैंट में छिपाने की कैमरून बैनक्राफ्ट की यह हरकत कैमरे में कैद हो गई.

असली हंगामा तो तब मचा जब इस टीम के कप्तान और दिग्गज बल्लेबाज स्टीव स्मिथ ने खुलासा करते हुए कहा, ‘‘मैं मानता हूं कि बैनक्राफ्ट ने गेंद से छेड़खानी की है… यह हमारी खेल योजना का हिस्सा था. टीम लीडरशीप को इस की जानकारी थी…’’

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इस करतूत में शामिल तीसरे शख्स का नाम था डेविड वार्नर. आस्ट्रेलिया क्रिकेट टीम के ताबड़तोड़ बल्लेबाज. दरअसल, बाद में स्टीव स्मिथ ने माना कि यह अकेले कैमरून बैनक्राफ्ट का आइडिया नहीं था. कप्तान के तौर पर उन से भी गलती हुई, लेकिन इस में डेविड वार्नर का भी अहम रोल था.

जीत पाने के लिए क्रिकेटरों का इस हद तक गिर जाना आस्ट्रेलियाई मीडिया को भी रास नहीं आया.

एक बड़े अखबार ने उन्हें कुछ यों कोसा, ‘हमें अब पता चला है कि हम ने ऐसे क्रिकेटरों की टीम भेजी जिन की जेब पैसे, टेप और पिच की गंदगी से भरी थी और जो खेल के नियम और शिष्टाचार को ताक पर रख कर धोखाधड़ी करने पर आमादा थे. सीनियर खिलाडि़यों ने इस करतूत की योजना बनाई जिस से खेल की बदनामी हुई और देश को भी शर्मसार किया.’

बात सही थी, क्योंकि आस्ट्रेलियाई क्रिकेट टीम हमेशा से ऐसी टीम रही है जिसे हराना किसी भी विरोधी टीम के लिए सपना होता है. डौन ब्रैडमैन से शेन वार्न तक आस्ट्रेलिया ने ऐसे न जाने कितने महान खिलाड़ी क्रिकेट जगत को दिए हैं.

जो टीम जीतना जानती है, हारे हुए मैच को विरोधी टीम के जबड़े से खींच कर जीत में बदलने का माद्दा रखती है. अगर वह किसी मैच को अपने हक में करने के लिए गेंद से छेड़खानी करने जैसी ओछी हरकत करती है तो इस बात पर हैरत होती है.

क्रिकेट आस्टे्रलिया को यह बात कतई रास नहीं आई. उस ने स्टीव स्मिथ, डेविड वार्नर और कैमरून बैनक्राफ्ट को सख्त सजा सुनाई. उस ने स्टीव स्मिथ और डेविड वार्नर पर 1-1 साल का तो कैमरून बैनक्राफ्ट पर 9 महीने का क्रिकेट खेलने पर बैन लगा दिया.

इन तीनों खिलाडि़यों को सजा तो मिली ही, अब पैसे का भी नुकसान होगा. सब से बड़ी सजा यह कि इन पर उम्रभर के लिए ऐसा दाग लग गया है, जो बड़ी मुश्किल से मिट पाएगा.

इस बात को ये तीनों खिलाड़ी बखूबी समझ रहे हैं, तभी तो इन की आंखों में आंसू हैं, जबान पर माफी है और चेहरे पर देश को शर्मसार कर देने की शर्मिंदगी.

आस्ट्रेलियाई क्रिकेट की मौजूदा हालत पर वहीं के एक पुराने क्रिकेटर माइकल हसी ने एक सटीक बात कही है, ‘‘अगले कुछ दिन, हफ्ते और महीने आस्टे्रलियाई क्रिकेट के लिए मुश्किल भरे होंगे. यह टीम के लिए एक मौका है कि खोए हुए मूल्यों और संस्कृति को फिर से आत्मसात करे. हम सकारात्मक सोच और खेल भावना के साथ खेलें.

‘‘अगर आप राहुल द्रविड़ का नाम लेते हैं तो पहली बात आप के जेहन में क्या आती है? अगर आप कहेंगे कि उन की 28 सैंचुरी हैं तो मुझे हैरानी होगी, लेकिन मुझे तब कोई हैरानी नहीं होगी जब आप कहेंगे ‘दि वाल’. उन्होंने सिद्धांतों और मूल्यों के साथ कभी समझौता नहीं किया.’’

यह मामला उन खिलाडि़यों के लिए भी एक सबक है जो खेलने का मतलब अपनी जीत समझते हैं और जब कोई खिलाड़ी केवल जीतने के लिए खेलता है, तो वह गेंद से छेड़खानी करने के साथसाथ खेल के नियमों पर भी मक्कारी का रेगमाल रगड़ कर उसे भी खुरदरा बनाने में भी पीछे नहीं रहता है.

पहले भी हुई है गेंद से छेड़खानी

द्य साल 1994 की बात है. इंगलैंड और दक्षिण अफ्रीका के बीच लौर्ड्स के मैदान पर टैस्ट मैच चल रहा था. इंगलैंड के तब के कप्तान माइक आथर्टन ने अपनी जेब से कुछ निकाल कर गेंद पर रगड़ा था. उन की यह हरकत कैमरे में कैद हो गई?थी. तब उन पर 2 हजार पाउंड का जुर्माना लगाया गया था.

द्य सचिन तेंदुलकर पर भी गेंद से छेड़छाड़ करने का आरोप लगा था. हुआ यों था कि साल 2001 में दक्षिण अफ्रीका और भारत के बीच पोर्ट एलिजाबेथ में मैच चल रहा था. तब उस मैच के रैफरी माइक डैनिस ने सचिन तेंदुलकर पर गेंद से छेड़छाड़ करने का आरोप लगाते हुए मैच फीस का 75 फीसदी जुर्माना और एक मैच का बैन लगा दिया था.

बाद में इंटरनैशनल क्रिकेट काउंसिल ने पाया था कि सचिन तेंदुलकर गेंद की सीम से घास हटा रहे थे. लिहाजा, उन्हें इस आरोप से बरी कर दिया गया.

द्य साल 2006 में इंगलैंड के ओवल में पाकिस्तान और इंगलैंड के बीच मैच चल रहा था, जिस में पाकिस्तान पर गेंद से छेड़खानी करने का आरोप लगाया गया था. तब पाकिस्तान के तब के कप्तान इंजमाम उल हक ने टी ब्रेक के बाद अपनी टीम मैदान पर उतारने से मना कर दिया था. लिहाजा, इंगलैंड को जीता माना गया. लेकिन बाद में इंटरनैशनल क्रिकेट काउंसिल की जांच में पाकिस्तान बेकुसूर साबित पाया गया और उस मैच को ड्रा करार दिया गया.

द्य साल 2013 में दुबई में पाकिस्तान और दक्षिण अफ्रीका के बीच टैस्ट मैच खेला जा रहा था. तब दक्षिण अफ्रीका के फाफ डु प्लेसिस को पैंट की जिप से गेंद को रगड़ कर उस की सीम को खराब करते हुए कैमरे में पकड़ा गया था. उन पर मैच फीस का 50 फीसदी काटने का जुर्माना लगाया गया था और पाकिस्तान के खाते में 5 रन जोड़े गए थे.

गेंद से छेड़छाड़ है बड़ा अपराध

इंटरनैशनल क्रिकेट काउंसिल के नियमों के मुताबिक गेंद से छेड़छाड़ लैवल 2 का अपराध?है जिस में कुसूरवार पाए गए खिलाड़ी पर सौ फीसदी मैच फीस का जुर्माना लग सकता है. इस के अलावा 4 नकारात्मक अंक भी उस खिलाड़ी के हिस्से में आ सकते हैं जो एक टैस्ट मैच के बैन के लिए काफी हैं.

इंटरनैशनल क्रिकेट काउंसिल के अधिनियम 42 के सबसैक्शन 3 में गेंद से छेड़छाड़ को ले कर बताया गया है. इस में लिखा है कि मैच के दौरान खिलाड़ी गेंद में चमक लाने के लिए या गेंद ओस या दूसरी किसी वजह से गीली हो गई है तो उसे पोंछने के लिए अंपायर की देखरेख में तौलिए का इस्तेमाल कर सकता है.

लेकिन कोई खिलाड़ी गेंद की चमक बरकरार रखने के लिए किसी कृत्रिम चीज जैसे वैसलीन वगैरह का इस्तेमाल करता है या गेंद को मैदान पर मिट्टी से रगड़ता है या फिर किसी नुकीली चीज से गेंद को नुकसान पहुंचाता है तो इसे नियमों का उल्लंघन माना जाएगा.

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पोंगापंथ : बच्चों को अंधविश्वासी मत बनाएं

हमारे यहां स्कूल में पढ़ने वाले छात्रों को किताबों में पढ़ने के लिए जो मिलता है उस का उलटा उन्हें अपने परिवार वालों, धर्मग्रंथों और धार्मिक गुरुओं से मिलता है. इसी का नतीजा होता है कि एक पढ़ालिखा इनसान भी बेवकूफ जैसा बरताव करता है.

राकेश 7वीं जमात का छात्र था. उस के गांव में यज्ञ हो रहा था. यज्ञ में आए धर्मगुरु अपने प्रवचन में बता रहे थे कि गंगा शिवजी की जटाओं से निकलती हैं और भगीरथ उन्हें स्वर्ग से धरती पर लाए थे.

प्रवचन खत्म होते ही राकेश ने पूछा, ‘‘महात्माजी, मैं ने तो किताब में पढ़ा है कि गंगा हिमालय के गंगोत्री ग्लेशियर से निकलती है?’’

इस पर महात्माजी ने कहा, ‘‘अभी तुम बच्चे हो. धर्म की बातें नहीं समझ पाओगे.’’

वहां बैठे दूसरे लोगों ने भी उसे बोला कि जब तुम बड़े हो जाओगे तो तुम्हें अपनेआप इन सब बातों की जानकारी हो जाएगी.

दूसरे दिन राकेश ने अपनी क्लास में टीचर से पूछा, ‘‘सर, आप जो पढ़ाते हैं उस का उलटा महात्माजी बताते हैं.’’

टीचर ने भी कहा कि जब तुम बड़े हो जाओगे तब समझोगे.

आज राकेश बड़ा हो गया है, फिर भी इन बातों को समझने में उसे मुश्किल हो रही है कि किसे सच माने और किसे झूठ.

प्रीति इंटर की छात्रा थी. एक दिन उस की मां ने उस से कहा, ‘‘तुम नहा कर रोजाना सूर्य भगवान को जल चढ़ाया करो. इस से तुम्हें हर चीज में कामयाबी मिलेगी.’’

इस पर प्रीति बोली, ‘‘मां, आप को पता नहीं है कि सूर्य भगवान नहीं हैं. सूर्य सौर्य मंडल का एक तारा है जो धरती से कई गुना बड़ा है.’’

प्रीति की मां बोलीं, ‘‘क्या वे सभी लोग बेवकूफ हैं जो सूर्य देवता को जल चढ़ाते हैं?’’

कविता समझ नहीं पाई कि किताब की बातें माने या अपनी मां की.

एक बार जब भूकंप आया तो मंजू के दादा ने बताया, ‘‘धरती शेषनाग के फन पर टिकी हुई है और शेषनाग जब करवट बदलता है, तो वह हिलने लगती है.’’

मंजू ने अपने दादा को जवाब दिया, ‘‘दादाजी, मेरी किताब में लिखा हुआ है कि धरती अपनी धुरी पर 23 डिगरी पर झुकी हुई है. जब 2 टैक्टौनिक प्लेट्स आपस में टकराती हैं तो भूकंप आता है.’’

इसी तरह परिक्रमा करते हुए जब धरती सूर्य और चंद्रमा के बीच आ जाती है तो चंद्रग्रहण होता है, जबकि धर्मशास्त्र बताते हैं कि जब राहु चंद्रमा को खा जाता है तो चंद्रग्रहण लगता है. इस तरह के सैकड़ों उदाहरण हमारे समाज में देखने को मिलते हैं, जो नई पीढ़ी को परेशानी में डाल देते हैं.

दें सही जानकारी

बच्चों को अंधविश्वासी नहीं बल्कि विज्ञान के आधार पर उन की बुद्धि का विकास करें. जब तर्क के आधार पर अंधविश्वासी लोग खरा नहीं उतरते तो वे आस्था की दुहाई देने लगते हैं. सांप की मूर्ति की पूजा करते हैं और जब ऐसे कहीं सांप देखते हैं तो उसे मारने लगते हैं. गणेश की सवारी चूहे की मूर्ति की पूजा करते हैं और घर में चूहेदानी और जहर दे कर उसे मार देते हैं. इन अंधभक्तों की यह कौन सी आस्था है, समझ के बाहर है.

कार्ल मार्क्स ने सही कहा था कि धर्म एक अफीम है. जिन देशों को यह बात समझ आ गई, वहां हालात बदल गए. जो देश गरीब थे, अचानक विकसित हो गए. हमें समझ नहीं आया, तो हम गरीब थे और आज भी गरीब ही हैं.

हम समझ नहीं पाए कि जिसे हम अमृत समझ रहे हैं वह एक धीमा जहर है, जो पूरे समाज और देश को धीरेधीरे खत्म कर रहा है. इसी धर्म रूपी अफीम ने हमे अंधा कर दिया है, जिस वजह से आज विज्ञान की रोशनी पूरी दुनिया में फैलने के बावजूद हम अज्ञान के अंधकार में डूबे हुए हैं और नई पीढ़ी को भी अंधविश्वासी बना रहे हैं.

धर्म के नशे में हम लोगों ने अपना स्वाभिमान खो दिया है. इनसानियत को भूल कर हम पशुत्व को अपना चुके हैं. देशसमाज के लिए हम सामूहिक रूप से इकट्ठा होने के बजाय धर्मों, मजारों, डेरों पर भीड़ के रूप में जमा होते हैं.

जहां सामूहिकता होती है, वहीं बदलाव होता है. जहां भीड़ होती है वहां भेड़चाल होती है. लोगों की भीड़, अलगअलग समाजों की भीड़, जातियों की भीड़, उपजातियों की भीड़, नेताओं की भीड़, पार्टियों की भीड़, गोत्र के नाम पर भीड़, भाषा के नाम पर भीड़, क्षेत्र के नाम पर भीड़, महात्माओं की भीड़, साधुओं की भीड़, मुल्लाओं की भीड़…

इस भीड़ को बनाए रखने में ही कइयों का फायदा होता है, इसलिए समाज को धर्म और जाति के नाम पर भीड़ में बदलने वाले लालची लोग समाज को इसी रूप में बनाए रखना चाहते हैं, क्योंकि भीड़ को बेवकूफ बनाया जा सकता है, समूह को नहीं. वरना ये राम रहीम, आसाराम, रामपाल जैसे हमारे सामने बारबार नजर नहीं आते.

धर्म को नहीं मानने वाला सुखी नीदरलैंड्स दुनिया का सब से ज्यादा नास्तिक देश है. वहां अपराध की दर इतनी कम है कि जेलखाने तक बंद करने पड़े हैं. 100 फीसदी पढ़ेलिखे लोग, रहनसहन का बहुत ज्यादा ऊंचा लैवल. और एक हमारा देश है, जहां रोजाना लोग भगवा, लाल, पीले, नीले, हरे, काले झंडे ले कर घूमते हैं फिर भी भयंकर गरीबी, बढ़ती बेरोजगारी, हत्या, बलात्कार, भेदभाव, जातीय हिंसा, रिश्वतखोरी, भ्रष्टाचार, गरीबों का शोषण आम बात है.

‘अर्जक संघ’ के राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष शिवनंदन प्रभाकर कहते हैं कि इस देश में पढ़ेलिखे डाक्टर, इंजीनियर, यहां तक कि वैज्ञानिक भी अंधविश्वासी और धर्म के जाल में उलझे हुए हैं. जब ये लोग इस खोल से बाहर नहीं निकल पा रहे हैं तो समाज के दूसरे आम लोग इन का उदाहरण देने लगते हैं.

‘शोषित समाज दल’ के राष्ट्रीय अध्यक्ष रघुनिराम शास्त्री का कहना है कि हम किसी भी बात को तर्क की कसौटी पर देखें. अगर सही लगता है तो उसे मानें. अगर नहीं लगता तो उसे न मानें. किसी चीज को इसलिए नहीं मानें कि हमारे पूर्वज मानते आए हैं.

वैसे, हमारे पूर्वज तो जंगल में नंगे घूमते थे, तो फिर आप सूटबूट क्यों पहनते हैं?

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सोफिया हयात ने पति को घर से बाहर निकाला

‘‘बिग बौस’’ प्रतियोगी रह चुकी तथा बौलीवुड की कुछ फिल्मों में अभिनय कर चुकी सोफिया हयात हमेशा किसी न किसी वजह से चर्चा में बनी रहती हैं. कभी वह मोह माया और अभिनय वगैरह छोड़कर क्रिश्चियन ‘नन’ बन जाती हैं. तो कभी भगवान गणेश आदि की पूजा करने की बात करती हैं. तो कभी ‘नन’ होने के बावजूद अभिनय करते हुए जमकर अंगप्रदर्शन करती हैं और उसे जायज भी ठहराती हैं. मगर लगभग एक वर्ष पहले सोफिया हयात ने ‘नन’ का चोला उतारकर गृहस्थ जिंदगी बिताने के लिए अपने रोमानियन प्रेमी वलाद स्तानेस्क्यू से शादी कर ली थी. लेकिन अब सोफिया हयात ने अपने पति वलाद स्तानेस्क्यू को अपने इंग्लैंड के घर से बाहर का रास्ता दिखाते हुए उससे सारे रिश्ते खत्म करने का ऐलान कर दिया है. इतना ही नहीं वह गर्भवती थीं, पर गर्भपात हो जाने से वह अपना बच्चा भी खो चुकी हैं.

24 अप्रैल 2017 को जब सोफिया हयात ने अपने रोमानियन प्रेमी वलाद स्तानेस्क्यू से इंग्लैंड के नार्थ केनसिंगटन में शादी की थी, तब बताया गया था कि वलाद स्तानेस्क्यू मशहूर इंटीरियर डिजायनर हैं. मगर एक वर्ष के अंदर ही सोफिया हयात को पता चल गया कि उनका पति इंटीरियर डिजायनर नहीं, बल्कि कर्ज में डूबा हुआ इंसान है. उसने सोफिया से झूठ बोलकर शादी की और झूठ बोलते हुए ठगता रहा. एक वर्ष के अंदर सोफिया की बहुत बड़ी धन राशि वह हजम कर गया.

सोफिया हयात ने पति को घर से बाहर निकालने के बाद इंस्टाग्राम पर पति को संबोधित करते  हुए उनकी सारी सच्चाई लिखी है. इंस्टाग्राम के अनुसार सोफिया ने पति के सारे खर्च खुद ही उठाए और वह उनसे झूठ बोलता रहा.

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महंगाई की मार, चुप मोदी सरकार

केंद्र में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बने हुए तकरीबन साढ़े 3 साल बीत चुके हैं. देश की जनता अच्छे दिन का इंतजार करतेकरते थक चुकी है, पर अच्छे दिनों ने तो आने का नाम ही नहीं लिया.

एक तरफ महंगाई व बेरोजगारी से बेहाल जनता ने अपने बुरे दिन वापस करने की ही मांग छेड़ दी है, वहीं दूसरी तरफ सत्ताधारी नेता अपनी लच्छेदार बातों के सपने दिखाते हुए साल 2019 में होने वाले लोकसभा चुनावों की तैयारियों में जुट चुके हैं.

साल 2014 में लोकसभा चुनाव के दौरान भाजपा ने देश की जनता को एक लोकप्रिय नारा दिया था. संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के खिलाफ यह नारा था, ‘बहुत हुई महंगाई की मार, अब की बार मोदी सरकार’.

सवाल यह है कि साढ़े 3 साल का सत्ता सुख भोगने के बाद भी सरकार आखिर अब तक महंगाई पर अंकुश क्यों नहीं लगा सकी है?

हद तो यह है कि इंटरनैशनल बाजार में कच्चे तेल की कीमतें घटने के बावजूद भारत में पैट्रोल व डीजल सस्ता नहीं किया गया. रेलवे स्टेशन पर बिकने वाली प्लेटफार्म टिकट 2 रुपए से बढ़ा कर 10 रुपए कर दी गई थी, जबकि त्योहारों के नाम पर प्लेटफार्म पर होने वाली भीड़ को कम करने जैसी बात कहते हुए 31 अक्तूबर, 2017 को प्लेटफार्म टिकट की कीमत 20 रुपए कर दी गई.

सब्जियों व खानेपीने के दूसरे सामान सस्ते होने के बजाय और ज्यादा महंगे होने की अहम वजह डीजल व पैट्रोल की कीमतों में बढ़ोतरी ही है.

यही सत्तारूढ़ भाजपा साल 2014 से पहले टमाटर, प्याज, पैट्रोल, रसोई गैस वगैरह की कीमतों में होने वाली बढ़ोतरी के खिलाफ सड़कों पर उतर आया करती थी, जैसे जनता का इस से बड़ा कोई हमदर्द ही न हो.

आज मंत्री, सांसद व विधायक बने बैठे अनेक भाजपा नेताओं ने तो उस समय आधे नंगे हो कर धरनेप्रदर्शन किए थे. अपने गले में सब्जियों की मालाएं पहन कर वे चौराहों पर ढोल पीटते नजर आते थे, पर अब तो यही नेता महंगाई बढ़ने के पक्ष में और अपनी प्रशासनिक नाकामी को छिपाने के लिए ऐसीऐसी बातें बना रहे हैं, जिन की कल्पना भी नहीं की जा सकती.

मिसाल के तौर पर, केंद्रीय पैट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान से मीडिया द्वारा जब भारत में पैट्रोल की बढ़ती कीमतों पर सवाल किया गया, तो उन्होंने दुनिया के ऐसे देशों से भारत की तुलना की, जहां पैट्रोल की कीमत भारत से ज्यादा है.

बहुमत के नशे में चूर यह सरकार अब महंगाई के बारे में तो बात ही नहीं करना चाहती है और न ही बंटे हुए व पस्त पड़े विपक्ष में इतना दमखम दिखाई दे रहा है कि वह सत्तारूढ़ दल के सामने महंगाई के बारे में पुरजोर तरीके से कोई सवाल उठा सके या अपना विरोध दर्ज कर सके.

केंद्रीय पर्यटन राज्यमंत्री अलफोस कननथनम ने बढ़ती हुई तेल की कीमतों पर अफसोस जाहिर करने के बजाय इस बढ़ोतरी का पक्ष ले कर यह साबित कर दिया कि भाजपा नेताओं द्वारा संप्रग के राज में महंगाई के खिलाफ आवाज जनता की हमदर्दी में नहीं, बल्कि संप्रग सरकार को बदनाम करने के मकसद से उठाई थी.

उन्होंने यह भी कहा, ‘‘पैट्रोल कौन खरीदता है? वह जिस के पास कार या बाइक है? निश्चित रूप से वह भूख से नहीं मर रहा है. वह शख्स जो यह खर्च कर सकता है, उसे करना चाहिए.’’

मंत्री महोदय ने यह भी फरमाया, ‘‘हम टैक्स लगा रहे हैं, ताकि गरीबों की जिंदगी भी सम्मानजनक हो. जो पैसा हम आज टैक्स के रूप में जमा कर रहे हैं, उसे हमारे द्वारा चुराया नहीं जा रहा है. इस के लिए बहुत बड़ी रकम की जरूरत है, इसलिए हम उन लोगों से टैक्स ले रहे हैं, जो इसे भर सकते हैं.’’

मंत्री महोदय की यह भाषा साल 2014 के पहले की नरेंद्र मोदी की भाषा से बिलकुल ही उलट है. आज मोटरसाइकिल या स्कूटर एक साधारण यहां तक कि गरीब आदमी तक अपनी सुविधा के लिए रखने पर मजबूर है. कई लोगों का रोजगार इन्हीं दोपहिया वाहनों से जुड़ा हुआ है.

निश्चित रूप से ऐसे मेहनतकश लोग भूख मिटाने के लिए ही अपनी बाइक या पैट्रोल से चलने वाले दूसरे जुगाड़ू किस्म के तिपहिया वाहनों में तेल डलवाते हैं.

वे भूख से इसलिए नहीं मर रहे, क्योंकि उन्हें मेहनत कर के पैसा कमाना आता है. पर उस खूनपसीने की कमाई से अगर एक गरीब व साधारण शख्स टैक्स देने लगे और दूसरी तरफ देश की संसद में सब्सिडी वाला सस्ता भोजन मिलता रहे, देश के नेताओं को तरहतरह की ऐशोआराम व सुखसुविधाएं मिलती रहें, उन को व उन के परिवार के लोगों को गैरजरूरी सिक्योरिटी व माली फायदा दिया जाता रहे, तो क्या यह तबका मंत्रीजी की बातों के मुताबिक भूखे मरने वाला तबका है?

भूख से तो इस समय देश का किसान आएदिन मर रहा है. पिछले 3 सालों में पूरे भारत में किसानों द्वारा रिकौर्ड खुदकुशी की गई हैं. सरकार इन किसानों से हमदर्दी जताना तो दूर उलटे इन के साथ किए गए अपने वादे भी नहीं निभा पा रही है.

उत्तर प्रदेश में भाजपा ने अपने संकल्पपत्र में किसानों के कर्ज माफ करने का ऐलान किया था. यहां नारा लगाया गया था, ‘हर कदम किसानों के साथ’, पर सत्ता में आने के बाद योगी आदित्यनाथ की सरकार ने आम किसानों के बजाय लघु व सीमांत किसानों तक अपने वादों को समेटते हुए डेढ़ लाख रुपए की कर्ज माफी का ऐलान किया.

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मथुरा में कर्ज माफी संबंधी प्रमाणपत्र जारी किया. हैरानी की बात यह है कि इन प्रमाणपत्रों में कई किसानों को यह सूचित किया गया कि उन का एक रुपया कर्ज माफ हुआ है, तो किसी का 2 रुपए, किसी का 9 पैसे, किसी का 84 पैसे.

उत्तर प्रदेश के नजीबाबाद इलाके में भी 9 पैसे से ले कर 84 पैसे, 2 रुपए, 3 रुपए, 6 रुपए, 16 रुपए, 21 रुपए व इसी तरह 377 रुपए तक के कर्ज माफ किए गए. जरा सोचिए, जिस किसान को डेढ़ लाख रुपए की कर्ज माफी की उम्मीद हो, उस के केवल 10 पैसे या 10 रुपए माफ किए जाएं, तो उस के दिल पर आखिर क्या गुजरेगी?

पर, इन बातों से लगता है कि सरकार का इस बात से कोई लेनादेना नहीं है, उस का असली ध्यान तो साल 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव में लगा हुआ है. उस की प्राथमिकताएं बुलट ट्रेन का ट्रेलर दिखा कर गुजरात में चुनाव जीतने की है. उस की प्राथमिकताएं ओडिशा और पश्चिम बंगाल में सत्ता पर कब्जा जमाना है. पर ऐसा कर के मोदी सरकार विपक्ष द्वारा उठाए जाने वाले इस नारे से खुद को निश्चित रूप से बचा नहीं सकेगी, जब विपक्ष पूछेगा कि ‘महंगाई की मार है, चुप क्यों मोदी सरकार है?’

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