आंसू छलक आए

‘‘देखो विनोद, अगर तुम कल्पना से शादी करना चाहते हो, तो पहले तुम्हें अपने पिता से रजामंदी लेनी पड़गी…’’ प्रेमशंकर ने समझाते हुए कहा, ‘‘शादी में उन की रजामंदी होना बहुत जरूरी है.’’

‘‘मगर अंकल, वे इस की इजाजत नहीं देंगे,’’ विनोद ने इनकार करते हुए कहा.

‘‘क्यों नहीं देंगे इजाजत?’’ प्रेमशंकर ने सवाल पूछा, ‘‘क्या तुम उन्हें समझाओगे नहीं?’’

‘‘मैं अपने पिता की आदतों को अच्छी तरह से जानता हूं. वे कभी नहीं समझेंगे और हमारी इस शादी के लिए इजाजत भी नहीं देंगे…’’ एक बार फिर इनकार करते हुए विनोद बोला, ‘‘आप उन्हें समझा दें, तो अच्छा रहेगा.’’

‘‘मेरे समझाने से क्या वे मान जाएंगे?’’ प्रेमशंकर ने पूछा.

‘‘हां अंकल, वे मान जाएंगे,’’ यह कह कर विनोद ने गेंद उन के पाले में फेंक दी.

विनोद प्रेमशंकर के मकान में किराएदार था. उसे अभी बैंक में लगे 2 साल हुए थे. इन 2 सालों में विनोद ने किराए के मामले में उन्हें कभी दिक्कत नहीं पहुंचाई थी. एक तरह से उन के घरेलू संबंध हो गए थे.

विनोद के बैंक में ही कल्पना काम करती थी. उसे भी बैंक में लगे तकरीबन 2 साल हुए थे. उम्र में वे दोनों बराबर के थे. दोनों कुंआरे थे. दोनों में कब प्यार पनपा, पता ही नहीं चला.

वे एकदूसरे के कमरे में घंटों बैठे रहते थे. दोनों ही तकरीबन 2 हजार किलोमीटर दूर से इस शहर में नौकरी करने आए थे.

कभीकभी कल्पना की मां जरूर उस के पास रहने आ जाती थीं. तब कल्पना मां से कोई बहाना कर के विनोद के कमरे में आती थी. प्रेमशंकर यह सब जानते थे.

जब कल्पना घंटों विनोद के कमरे में बैठी रहती, तब प्रेमशंकर को लगा कि उन दोनों में प्यार की खिचड़ी पक रही है.

एक दिन मौका देख कर उन्होंने विनोद से खुल कर बात की. नतीजा यही निकला कि विनोद के पिता इस शादी के लिए कभी राजी नहीं होंगे, क्योंकि वह ऊंची जाति का था, जबकि कल्पना निचली जाति की थी.

प्रेमशंकर बोले, ‘‘ठीक है विनोद, अगर तुम कल्पना से शादी करना चाहते हो, तो तुम्हें अपने मातापिता को भरोसे में लेना होगा.’’

मगर विनोद इनकार करते हुए बोला, ‘‘अंकल, वे इस शादी के लिए कभी इजाजत नहीं देंगे.’’

तब प्रेमशंकर ने कहा था, ‘‘आखिर वे भी तो इनसान हैं, कोई जानवर नहीं. तुम उन्हें बुलाओ. अगर वे नहीं आएंगे, तो मैं चलूंगा तुम्हारे साथ उन को समझाने…’’

इस तरह प्रेमशंकर बिचौलिया बनने को राजी हो गए.

विनोद के बुलाने पर पिता अरुण आ गए. साथ में उन की पत्नी मनोरमा भी थीं. प्रेमशंकर ने उन्हें अपने घर में इज्जत से बिठाया.

अरुण बोले, ‘‘बताइए प्रेमशंकर साहब, हमें किसलिए बुलाया है?’’

‘‘अरुण साहब, आप को खास वजह से ही यहां बुलाया है.’’

‘‘खास वजह… मैं समझा नहीं…’’ अरुण बोले, ‘‘जो कुछ कहना है, साफसाफ कहें.’’

‘‘ठीक है, पर इस के लिए आप को दिल थोड़ा मजबूत करना होगा.’’

‘‘मजबूत से मतलब?’’ अरुण ने हैरान हो कर पूछा.

‘‘मतलब यह कि आप ने विनोद की शादी के बारे में क्या सोचा है?’’

‘‘उस के लिए मैं ने एक लड़की देख ली है प्रेमशंकरजी. अब विनोद की हां चाहिए और उस की हां के लिए मैं यहां आया हूं,’’ यह कह कर अरुण ने प्रेमशंकर को अजीब सी निगाह से देखा.

‘‘अगर मैं कहूं कि विनोद ने अपने लिए लड़की देख ली है, तो…’’

‘‘क्या कहा, विनोद ने अपने लिए लड़की देख ली है?’’

‘‘जी हां अरुण साहब, अब आप का क्या विचार है?’’

‘‘कौन है वह लड़की?’’ अरुण ने पूछा.

‘‘उस के साथ बैंक में ही काम करती है. उस का नाम कल्पना है. आप इस पर क्या कहना चाहते हैं?’’

‘‘मतलब, विनोद कल्पना से शादी करना चाहता है?’’

‘‘हां,’’ इतना कह कर प्रेमशंकर ने अरुण के दिल में हलचल पैदा कर दी.

‘‘वह किस जाति की है? क्या समाज है उस का?’’ अरुण जरा गुस्से से बोले.

‘‘वह निचली जाति की है,’’ प्रेमशंकर ने बिना किसी लागलपेट के कहा.

‘‘क्या कहा, वह एक दलित घर से है? मैं यह शादी कभी नहीं होने दूंगा…’’ अरुण ने गुस्से में साफ मना कर दिया, फिर आगे बोले, ‘‘अरे प्रेमशंकरजी, शादीब्याह अपनी ही बिरादरी में होते हैं.’’

‘‘हांहां, होते हैं अरुणजी, मगर आप जिस जमाने की बात कर रहे हैं, वह जमाना गुजर गया. यह 21वीं सदी है.’’

‘‘हां, मैं भी जानता हूं. मुझे समझाने की कोशिश न करें.’’

‘‘जब आप इतना जानते हैं, तब इस शादी के लिए मना क्यों कर रहे हैं?’’

‘‘मैं अपने बेटे की गैरबिरादरी में शादी करा कर बिरादरी पर दाग नहीं लगाना चाहता. मैं यह शादी हरगिज नहीं होने दूंगा.’’

प्रेमशंकर मुसकराते हुए बोले, ‘‘तो आप विनोद की शादी अपनी ही बिरादरी में करना चाहते हैं?’’

‘‘हां, क्या आप को शक है?’’

‘‘आप विनोद से तो पूछ लीजिए.’’

‘‘पूछना क्या है? वह मेरा बेटा है. मेरा कहना वह टाल नहीं सकता.’’

‘‘अपने बेटे पर इतना भरोसा है, तो पूछ लीजिए उस से कि वह आप की पसंद की लड़की से शादी करेगा या अपनी पसंद की लड़की से,’’ कह कर प्रेमशंकर ने भीतर की तरफ इशारा कर के कहा, ‘‘विनोद, यहां आ जाओ.’’

भीतर बैठे विनोद और कल्पना इसी इंतजार में थे. वे दोनों बाहर आ गए. अरुण कल्पना को देखते रह गए.

प्रेमशंकर बोले, ‘‘पूछ लो अपने बेटे से… यह वह कल्पना है, जिस से यह शादी करना चाहता है.’’

‘‘क्यों विनोद, यह मैं क्या सुन रहा हूं?’’ विनोद के पापा अरुण बोले.

‘‘जो कुछ सुन रहे हैं, सच सुन रहे हैं पापा,’’ विनोद ने कहा.

‘‘तुम इस कल्पना से शादी नहीं कर सकते,’’ अरुण ने कहा.

‘‘पापा, मैं शादी करूंगा, तो इस से ही,’’ विनोद बोला.

‘‘मैं तुम्हारी शादी इस लड़की से हरगिज नहीं होने दूंगा.’’

‘‘मैं शादी करूंगा, तो सिर्फ कल्पना से ही.’’

‘‘ऐसा क्या है, जो तुम इस की रट लगाए हुए हो?’’

‘‘कल्पना मेरा प्यार है.’’

‘‘प्यार… 2-4 मुलाकातों को तुम प्यार समझ बैठे हो?’’ चिल्ला कर अरुण बोले, ‘‘कान खोल कर सुन लो विनोद, तुम्हारी शादी वहीं होगी, जहां हम चाहेंगे.’’

‘‘पापा सच कर रहे हैं विनोद…’’ मां मनोरमा बीच में ही बात काटते हुए बोलीं, ‘‘यह लड़की हमारी जातबिरादरी की भी नहीं है. इस से शादी कर के हम समाज में अपनी नाक नहीं कटा सकते हैं, इसलिए इस के साथ शादी करने का इरादा छोड़ दे.’’

‘‘मां, मेरे इरादों को कोई बदल नहीं सकता है. शादी करूंगा तो कल्पना से ही, किसी दूसरी लड़की से नहीं.’’

अपना फैसला सुना कर विनोद कल्पना को ले कर घर से बाहर चला गया.

पलभर के सन्नाटे के बाद प्रेमशंकर बोले, ‘‘अब क्या सोचा है अरुण साहब? अब भी आप इस शादी से इनकार करते हैं?’’

‘‘यह सब आप लोगों की रची हुई साजिश है. आप ने ही मेरे बेटे को बरगलाया है, इसलिए आप उस का ही पक्ष ले रहे हैं,’’ कह कर अरुण ने अपनी बात पूरी की.

‘‘अरुण साहब सोचो, विनोद कोई दूध पीता बच्चा नहीं है…’’ प्रेमशंकर समझाते हुए बोले, ‘‘आप उसे डराधमका कर अपने वश में कर लेंगे, यह भी मुमकिन नहीं है. वह नौकरी करता है, अपने पैरों पर खड़ा है. वह अपना भलाबुरा समझता है.

‘‘वह मेरे यहां किराएदार बन कर जरूर रह रहा है, मगर मैं उस को पूरी तरह समझ चुका हूं कि वह समझदार है. वैसे, वह आप की भावनाओं को भी समझता है. मगर वह शादी करेगा, तो कल्पना से ही. इस के पहले मैं भी यह सब बातें उसे समझा चुका हूं, इसलिए आप उसे समझदार समझें.’’

‘‘क्या खाक समझदार है भाई साहब…’’ मनोरमा झल्ला कर बोलीं, ‘‘वह उस लड़की को अपने साथ ले गया है. कहीं वह गलत कदम न उठा ले. सुनो जी, उस की शादी वहीं करो, जहां हम चाहते हैं.’’

‘‘भाभीजी, विनोद ऐसावैसा लड़का नहीं है, जो गलत कदम उठा ले…’’ प्रेमशंकर समझाते हुए बोले, ‘‘अरुण साहब, अगर आप उस पर दबाव डाल कर शादी कर भी देंगे, तब वह बहू के साथ वैसा बरताव नहीं करेगा, जो आप चाहेंगे. दिनरात उन में कलह मचेगी और आपस में मनमुटाव होगा.

‘‘अगर आप उन की मरजी से शादी नहीं करोगे, तब वे कोर्ट में ही शादी कर सकते हैं, क्योंकि कोर्ट उन्हीं का पक्ष लेगा. इसलिए आप सोचिए मत. मेरा कहना मानिए, इन की शादी आप आगे रह कर करें और पिता की जिम्मेदारी से छुटकारा पा जाएं.’’

‘‘मगर इस शादी से समाज में हमारी कितनी किरकिरी होगी, यह आप ने सोचा है?’’ एक बार फिर अरुण अपनी बात रखते हुए बोले.

‘‘समाज तो दोनों हाथों में लड्डू रखता है. थोड़े दिनों तक समाज ताना दे कर चुप हो जाएगा. इस बात पर जितना विचार कर के गहराई में उतरेंगे, उतनी ही तकलीफ उठाएंगे.

‘‘आप अपनी हठ छोड़ दें. इस के बावजूद भी आप अपनी जिद पर अड़े हो, तो विनोद की शादी अपनी देखी लड़की से कर दो. मैं इस मामले में आप से कुछ नहीं बोलूंगा,’’ प्रेमशंकर के ये शब्द सुन कर अरुण के सारे गरम तेवर ठंडे पड़ गए.

वे थोड़ी देर बाद बोले, ‘‘ठीक है प्रेमशंकरजी, मैं अपनी हठ छोड़ता हूं. विनोद कल्पना से शादी करना चाहता है, तो इस के लिए मैं तैयार हूं.’’

‘‘ओह, शुक्रिया अरुण साहब,’’ कह कर प्रेमशंकर की आंखों में खुशी के आंसू छलछला आए.

मेरे पति ने मेरे साथ अप्राकृतिक संबंध बनाए : बौबी डार्लिंग

बौबी डार्लिंग (पाखी शर्मा) ने पिछले साल अपने पति रामणिक शर्मा पर उनके साथ घरेलू हिंसा करने और दहेज मांगने का अरोप लगाया था. बौबी ने ठान लिया था कि वह अपने पति को जेल की सलाखों के पीछे भेजकर ही दम लेंगी और ऐसा ही हुआ. अपने पति की हरकतों का दुनिया के सामने खुलासा करने के बाद आखिरकार अब बौबी ने अपने पति को जेल भेज कर ही राहत की सांस ली है.

‘स्‍पौटबौय’ से बात करते हुए बौबी ने इस बात की पुष्टि करते हुए कहा, ‘दिल्‍ली पुलिस ने उसे 11 मई को गिरफ्तार किया था. इसके बाद उसने दिल्‍ली कोर्ट में अपनी अर्जी लगाई थी, लेकिन वह कोर्ट ने रिजेक्‍ट कर दी. शुक्र है कि मुझे इंसाफ मिल पाया है.’ बता दें कि बैंकौक में सेक्‍सचेंज सर्जरी करा कर बौबी डार्लिंग, पाखी शर्मा बन गई थीं.

इसके बार बिग बौस की कंटेस्‍टंट रह चुकी बौबी ने 2016 में भोपाल के रोड़ कौन्‍ट्रेक्‍टर रमणिक शर्मा से शादी की थी. लेकिन शादी के लगभग डेढ़ साल बाद ही बौबी ने अपने पति और उसके माता-पिता के खिलाफ सितंबर, 2017 में पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी.

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बौबी के अनुसार, ‘रमणिक सोसाइटी के सिक्योरिटी गार्ड को पैसे देते थे, ताकि वह मेरे बारे में उन्हें जानकारी दे सके. वह मेरे आने-जाने और बात करने पर नजर रखता था. मैंने आपसी सहमति से तलाक का सुझाव उन्हें दिया था, लेकिन उससे पहले उन्हें मेरी प्रौपर्टी वापस करनी होगी, क्योंकि मेरी वसीयत उसके पास ही है. मैं इसे बेचकर मुंबई शिफ्ट होना चाहती हूं.’ बता दें, रमणिक, बौबी डार्लिंग से 15 साल छोटे बताए जाते हैं.

बौबी डार्लिंग ने अपने पति पर लगाया अप्राकृतिक तरीके से संबंध बनाने का आरोप

वहीं दूसरी तरफ बौबी के पति रमणिक का दावा है कि बौबी यह सब सिर्फ पब्लिसिटी और पैसे के लिए कर रही है. इसके साथ ही रमणिक ने बौबी पर अपने ड्रग्‍स की लत और बच्‍चे पैदा कर सकने की बात से जुड़े झूठ बोले थे. हालांकि बाद की मीडिया रिपोर्ट्स में सामने आया था कि रमणिक, बौबी पर नजर रखता था और वह लगातार उसपर मुंबई वाले घर को बेच भोपाल में एक बंगला खरीदने का दबाव बना रहा था. बता दें कि बौबी डार्लिंग, ‘हंसी तो फंसी’ (2012), ‘क्‍या कूल हैं हम’ और ‘पेज 3’ जैसी फिल्‍मों में नजर आ चुकी हैं.

सरकारी दावों और वादों में फंसा कोढ़

बिहार के आरा रेलवे स्टेशन के पास ही एक छोटा सा इलाका बसा हुआ है अनाइठ. यह इलाका पटनामुगलसराय रेलवे लाइन के किनारे पर स्थित है और वहीं है कोढ़ के मरीजों की छोटी सी बस्ती ‘गांधी कुष्ठ आश्रम’.

कहने को तो यह कोढ़ के मरीजों के लिए आश्रम है, पर हर ओर अंधेरा, बेबसी, गंदगी और बदबू का आलम है. आश्रम के अंदर जाने की बात तो दूर उस के आसपास तकरीबन 25-30 मीटर पहले ही नथुने बदबूदार हवा से भभक उठते हैं. बजबजाती गंदगी के बीच कोढ़ से पीडि़त 68 परिवार रहते हैं, जिन की आबादी 152 है.

आश्रम के पास खड़े होने से यही महसूस होता है कि वहां तक सरकारी योजनाओं और दावोंवादों का रत्तीभर भी हिस्सा नहीं पहुंच सका है. बस्ती में गरीब कोढ़ के मरीजों को राहत और मदद देने की तमाम सरकारी योजनाओं और गैरसरकारी संस्थाओं की लूटखसोट की बानगी यहां साफ देखी जा सकती है. ऊपर से पोंगापंथ की वजह से भी मरीजों की हालत बद से बदतर होती जा रही है.

देश में कोढ़ के मरीजों की तकरीबन 850 कालोनियां हैं, जहां वे समाज के भेदभाव को झेलते हुए अपनी जिंदगी काट रहे हैं. सरकारी सुविधाओं और इलाज के नाम पर वहां कुछ नहीं पहुंच पाता है, जिस से मरीज तिलतिल कर मरने के लिए मजबूर हैं.

सेहत, पढ़ाईलिखाई, रोजगार वगैरह का कोई पुख्ता इंतजाम नहीं होने की वजह से कोढ़ के मरीज भीख मांग कर गुजारा करते हैं और धीरेधीरे उन के बच्चे भी भिखारी बन रहे हैं.

कोढ़ के मरीजों के बारे में समाज में गलत बातें फैलाने की वजह से भी वे अलग रहने को मजबूर हैं. न तो उन को बेहतर इलाज और आम जिंदगी देने के उपाय किए जाते हैं और न ही समाज में उन के प्रति कोई जागरूकता फैलाने के लिए कदम उठाए जाते हैं.

कोढ़ को ले कर समाज में फैले कई तरह के अंधविश्वासों और अफवाहों की वजह से भी कोढ़ के मरीजों की हालत ऐसी है. इस के बारे में आम लोग यही कहते हैं कि गलत काम करने की वजह से यह बीमारी होती है.

बहुत से तो यह भी कहते हैं कि यह बीमारी पिछले जन्म के पापों का नतीजा है. इसे ले कर समाज में पोंगापंथियों ने जम कर भरम फैला रखा है. बाबाओं ने यह प्रचार कर रखा है कि गलत काम करने, गलत संबंध बनाने, खून गंदा होने या सूखी मछली खाने से कोढ़ होता है, जबकि ऐसा कुछ नहीं है.

इस सिलसिले में डाक्टर दिवाकर तेजस्वी कहते हैं कि जिस किसी को कोढ़ हो जाता है, उस मरीज को ज्यादा देखभाल की जरूरत होती है, लेकिन ऐसा हो नहीं पाता है. परिवार और समाज उस से नफरत करने लगता है और उसे ठुकरा कर दरदर भटकने के लिए छोड़ देता है.

यह बीमारी एक से दूसरे इनसान में पुरानी माइक्रो बैक्टिरियल लेप्री से फैलती है. यह आमतौर पर चमड़ी पर असर डालती है और उंगलियां समेत कई अंग धीरेधीरे गलने लगते हैं. इस बीमारी का सही तरीके से इलाज किया जाए, तो यह पूरी तरह ठीक हो जाती है. साल 1991 में आई एमडीटी दवा के सेवन से यह बीमारी ठीक हो जाती है.

भारत में तकरीबन 15 लाख से ज्यादा कोढ़ के मरीज हैं. इन में से 24 फीसदी बिहार में हैं. बिहार में ही ऐसे लोगों की 40 बस्तियां हैं. यहां प्रति 10 हजार की आबादी पर 1.12 लोग कोढ़ के मरीज हैं. बिहार के अलावा झारखंड, पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़ और ओडिशा में सब से ज्यादा कोढ़ के मरीज हैं.

बिहार अनुसूचित एवं पिछड़ी जाति संघर्ष मोरचा के संयोजक किशोरी दास कहते हैं कि गरीब और पिछड़ों के दर्द को सुनने और उसे दूर करने वाला कोई नहीं है. उन के नाम पर पटना से ले कर दिल्ली तक सत्ता की रोटियां सेंकी जाती रही हैं, पर उन के हालात में बदलाव नहीं हो सका है.

कोढ़ को जड़ से मिटाने के लिए साल 1955 में राष्ट्रीय कुष्ठ नियंत्रण कार्यक्रम की शुरुआत की गई. उस के बाद साल 1983 में राष्ट्रीय कुष्ठ उन्मूलन कार्यक्रम शुरू किया गया और उसी साल मल्टी ड्रग थैरैपी की शुरुआत हुई.

साल 2005 में नैशनल लैवल पर इस बीमारी को जड़ से मिटाने का काम शुरू किया गया. साल 2012 में देश के 16 राज्यों और संघीय क्षेत्रों में विशेष कार्य योजना चालू की गई थी.

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भारत में कोढ़ के मरीजों की तादाद में इजाफा होने से यह साबित हो गया है कि देश में इस पर काबू पाने के तमाम उपाय नाकाम रहे हैं. अगर इसी कछुआ गति से इसे मिटाने की कवायद चलती रही, तो भारत से यह बीमारी खत्म करने में अभी भी 40 साल लगेंगे.

सरकार ने साल 2005 में दावा किया था कि देश से कोढ़ को पूरी तरह से खत्म कर दिया गया है. इस के बावजूद कोढ़ के मरीजों की तादाद में इजाफा होता जा रहा है, जिस से सरकार के दावों की पोल खुल गई है.

राष्ट्रीय कुष्ठ उन्मूलन कार्यक्रम ही कहता है कि कोढ़ के एक लाख, 27 हजार, 595 मामले हर साल भारत में होते हैं. अकेले दिल्ली में पिछले साल कुल 23 सौ नए मामले सामने आए हैं.

गांधी कुष्ठ आश्रम में रहने वाले बालेश्वर साव को उस के घर वालों ने घर से निकाल दिया. उसे कोढ़ हो गया था. गरीब होने की वजह से उस का समय पर इलाज नहीं हो सका. उस के जिस्म के कई हिस्सों में गहरे जख्म हो गए हैं, हाथपैरों की कई उंगलियां गल चुकी हैं. पिछले 20 सालों से वह सरकारी मदद के इंतजार में है, पर आज तक केवल भरोसे के अलावा उसे और कुछ नहीं मिल सका.

एनजीओ वाले कभीकभार बालेश्वर साव को खाने को कुछ अनाज और पहनने को कुछ कपड़े दे जाते हैं. इस से गुजारा नहीं चल पाता है. वह लकड़ी की गाड़ी पर बैठ कर दिनभर घूमता है. ‘माताबहन करिए दान, बाबू भइया करिए दान’ की गुहार लगालगा कर वह भीख मांगता है, तो दिनभर में 100-150 रुपए जमा हो जाते हैं.

पटना की सड़कों पर भीख मांगने वाले कोढ़ी शिवलाल यादव के झोंपड़े के अंदर घुसने पर हर ओर अंधेरा ही अंधेरा नजर आता है. अंधेरे के बीच कुछ चमकती आंखों को देख कर एहसास होता है कि झोंपड़े में कुछ और लोग भी रह रहे हैं.

शिवलाल यादव बताता है कि उस के साथ 3 और कोढ़ी रहते हैं. वे भी दिनभर भीख मांगते हैं. कभीकभार जब तबीयत ज्यादा खराब हो जाती है, तो सौ रुपए कर्ज लेने पर 10 रुपए रोज के हिसाब से सूद चुकाना पड़ता है.

वह आगे कहता है, ‘‘सुनते हैं कि कोढ़ के मरीजों और गरीब लाचारों के लिए सरकार ने बहुत सी योजनाएं बनाई हैं, पर आज तक उस के पास एक पैसा भी नहीं पहुंच सका है. सारा पैसा तो अफसरों और बाबुओं के पेट में चला जाता है.’’

शिवलाल यादव बड़ी ही मासूमियत से अफसरशाही के मुंह पर करारा तमाचा जड़ देता है और सरकारी योजनाओं की पोलपट्टी भी खोल देता है.

झोंपड़ी में रहने वाले को बिजली का कनैक्शन लेने के लिए सरकारी बिजली महकमे के बजाय प्राइवेट जैनरेटर चलाने का धंधा करने वाले दबंगों की चिरौरी करनी पड़ती है. जैनरेटर के जरीए झोंपडि़यों में एक बल्ब का कनैक्शन देने पर हर महीने सौ रुपए वसूले जाते हैं. कनैक्शन लेने वालों की मरजी न भी हो, तब भी जबरन कनैक्शन दे दिया जाता है.

बालेश्वर, मुन्ना, सुदन, लाल बिहारी और प्रभु ने जैनरेटर का कनैक्शन लेने से इनकार कर दिया था, तो उन सब पर बिजली चोरी करने का आरोप लगा कर मुकदमे में फंसा दिया गया. पिछले 9 साल से वे लोग बिजली चोरी के आरोप में थाने और कोर्ट के चक्कर लगा रहे हैं.

पटना के पास खगौल इलाके की रेलवे क्रौसिंग के पास बसी कोढ़ के मरीजों की बस्ती प्रेम नगर में रहने वाली कोढ़ से पीडि़त ललिता बेगम बताती हैं कि लालू प्रसाद यादव और राबड़ी देवी के राज में उन जैसे मरीजों के रहने के लिए थोड़ी सी जमीन मुहैया कराने के लिए अर्जी दी थी. उस के बाद नीतीश कुमार की सरकार बनने के बाद भी पिछले 8-9 साल में तकरीबन 50 बार से ज्यादा अर्जी दी जा चुकी है. मुखिया, बीडीओ, एसडीओ, डीएम, विधायक से ले कर मंत्री और मुख्यमंत्री को अर्जी दी गई, पर अभी तक कुछ भी नहीं हो सका है. हर कोई जमीन देने का भरोसा दे कर चलता कर देता है.

गंदी झोंपड़ी में रहने से और भी कई तरह की बीमारियां हो गई हैं. किसी को टीबी हो गई है, तो किसी की आंत में अल्सर हो गया है. किसी का लिवर खराब हो चुका है, तो किसी की आंखों की रोशनी ही चली गई है.

कालोनी में हर झोंपड़ी के चारों ओर पूरे साल गंदा पानी भरा रहता है. बांस के टुकड़े, पौलीथिन, जूट के बोरे और फटेपुराने कपड़ों को जोड़ कर बनाई गई झोंपडि़यों की दीवारें हर समय गीली रहती हैं. भिनभिनाती मक्खियों के झुंड, बजबजाते कीचड़ में अपनी थूथन घुसेड़े सूअरों की फौज, बिलों से झांकते मोटेमोटे चूहे आश्रम को नरक बनाने में कोई कोरकसर नहीं छोड़ते हैं.

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एक मरीज प्रभु मुसहर कहता है कि आधी से ज्यादा जिंदगी तो इसी गंदगी में कट गई, बाकी जिंदगी भी कट जाएगी. समाज ने हम लोगों को ठुकरा दिया है. ऐसे में किस से मदद की उम्मीद करें?

समाजसेवी आलोक कुमार बताते हैं कि बिहार सरकार की नजर इस कुष्ठ आश्रम पर नहीं पड़ सकी है, पर जरमनी की लिबेल और लेप्रा की कोशिश से कुष्ठ रोगियों को थोड़ी ही सही, पर मदद मिल रही है.

अच्छी बात यह है कि अनपढ़ मरीजों को पढ़ाने के लिए एक टीचर का इंतजाम किया गया है और सिलाई मशीनें दी गई हैं, जिस से काम सीख कर कोढ़ी भीख मांगने के बजाय दो वक्त की रोटी खाकमा सकें.

भारत में इस समय दुनिया का सब से बड़ा कुष्ठ उन्मूलन कार्यक्रम चल रहा है. इस कार्यक्रम के तहत तकरीबन एक लाख, 20 हजार मरीजों के नए मामले दर्ज हुए हैं. गरीबी इस बीमारी के पनपने की सब से बड़ी वजह है.

इंडियन मैडिकल एसोसिएशन के अध्यक्ष रह चुके डाक्टर अजय कुमार कहते हैं कि आज मल्टी ड्रग थैरैपी के जरीए इस बीमारी का आसान इलाज मुमकिन है. पर समाज और परिवार द्वारा ठुकराए जाने की वजह से मरीज का इलाज नहीं हो पाता है और वे तिलतिल कर मरने के लिए मजबूर हो जाते हैं.

अगर कोढ़ का शुरुआती दौर में ही पता लग जाए और सही इलाज चालू कर दिया जाए, तो उस के असर को काफी हद तक कम किया जा सकता है और  अंगों को गलने से बचाया जा सकता है.

सरकार, समाज और परिवार के साथसाथ कानून भी कोढ़ के मरीजों के साथ भेदभाव करता रहा है. राजस्थान, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश और ओडिशा में स्थानीय चुनावों में ऐसे मरीजों के हिस्सा लेने पर मनाही है.

साल 1939 में ही कोढ़ के मरीजों को ड्राइविंग लाइसैंस देने और साल 1990 से उन के रेलगाडि़यों में सफर करने पर रोक लगा दी गई है.

भारत में 16 ऐसे कानून हैं, जो कोढ़ के मरीजों के साथ भेदभाव करता है और उन्हें समाज की मुख्यधारा से दूर करता है. उस के बाद करेले पर नीम की तरह अंधविश्वास, कलंक वगैरह से इस बीमारी को जोड़ दिया गया है.

कोढ़ पर काबू पाने के लिए बना टीका

भारत ने कोढ़ के इलाज के लिए दुनिया का पहला टीका ईजाद करने में कामयाबी हासिल की है. बिहार और गुजरात के 5 जिलों में इसे ट्रायल के तौर पर शुरू किया गया है.

डाक्टर विमल कारक कहते हैं कि भारत पहला देश है, जहां कोढ़ के लिए टीका लगाने के लिए कार्यक्रम शुरू किया जा रहा है. इस के टैस्ट में पाया गया है कि कोढ़ के मरीजों के करीब रहने वालों को यह टीका दिया जाए, तो 3 साल के अंदर ही कोढ़ के मामलों में 60 फीसदी तक की कमी आ सकती है. इतना ही नहीं, अगर कोढ़ की वजह से किसी की चमड़ी जख्मी हुई हो, तो यह टीका उस के ठीक होने की रफ्तार को बढ़ा देगा.

इस टीके को नैशनल इंस्टीट्यूट औफ इम्यूनोलौजी के फाउंडर डायरैक्टर जीपी तलवार ने ईजाद किया है. ड्रग कंट्रोलर जनरल औफ इंडिया और अमेरिका के एफडीए ने भी इसे मंजूरी दे दी है.

केंद्र सरकार ने देशभर के सब से ज्यादा कोढ़ के असर वाले 50 जिलों में घरघर जा कर मरीजों की पहचान करने और टीका लगाने का काम शुरू किया है. अब तक तकरीबन साढ़े 7 करोड़ लोगों की जांच की जा चुकी है और तकरीबन 6 हजार लोगों को कोढ़ होने का पता चला है.

खूबसूरत ‘लेडी बौय’

हमारे समाज में कुछ मर्द औरतों जैसे दिखते हैं. यहां तक कि वे अपनी खूबसूरती से बहुत सी औरतों को भी मात देते हैं. उन्हें अकसर ट्रांसजैंडर, लेडी बौय या टीगर्ल के नाम से पुकारा जाता है. ‘लेडी बौय’ ऐसे लड़के होते हैं, जो सैक्स बदलवा कर अपने बदन को एक खूबसूरत लड़की के रूप में ढलवा लेते हैं. इस की वजह यह है कि ऐसे लड़के जो लड़की बनना चाहते हैं, उन्हें हमारे समाज में अधूरा समझा जाता है. उन्हें नामर्द कह कर दुत्कारा जाता है. किसी भी ‘लेडी बौय’ की खूबसूरती, कामुकता और चंचलता के पीछे भी आधुनिक चिकित्सा का कमाल है. हार्मोन चिकित्सा उन में सैक्स बदलाव ही नहीं लाती, बल्कि भावनात्मक बदलाव भी लाती है. यही वजह है कि कई ‘लेडी बौय’ औरतों की तुलना में ज्यादा कमसिन होते हैं. कभीकभी तो ये आम औरतों को भी मात देते दिखते हैं.

कुछ ‘लेडी बौय’ तो मौडलिंग की दुनिया में बतौर नाम कमा रहे हैं. इन में कनाडा के ‘लेडी बौय’ जेना तालकोवा व फिलिपींस के गीना रोसेरा खास हैं. जब कोई जवान लड़का खुद को एक लड़की के रूप में महसूस करने लगता है, तो क्या होता है? यह एक गंभीर सवाल है और यही एहसास उसे ‘लेडी बौय’ बनने पर मजबूर कर देता है, क्योंकि उस का चालचलन व बरताव उस के मूल सैक्स से मेल नहीं खाता. असल में यह गलती कुदरत से होती है और भुगतनी पड़ती है एक बेकुसूर इनसान को. इस कुदरती गलती से छुटकारा पाने के लिए अकसर ट्रांसजैंडर अपने सैक्स को बदलवाना चाहते हैं और यही जरूरत उन्हें ‘लेडी बौय’ बना देती है.

मशहूर सुपरमौडल 30 साला जीना रुकेरो ने साल 2014 में पहली बार अपनी असली पहचान उजागर की थी कि वे एक ट्रांसजैंडर यानी ‘लेडी बौय’ हैं. उन्होंने पूरी दुनिया के सामने अपना राज उजागर करते हुए कहा था कि जन्म के समय वे एक लड़का थीं. कई सामाजिक वजह और अपने काम के चलते वे अपनी असली पहचान उजागर नहीं कर पाई थीं. वे अपना सैक्स बदलवा कर इस मुकाम पर पहुंची हैं. जीना रुकेरो को 15 साल की उम्र में उन के एक जानने वाले की मदद से एक ब्यूटी कौंटैस्ट में हिस्सा लेने के लिए राजी किया गया था. तब से उन की जिंदगी ही बदल गई. 19 साल की उम्र में उन्होंने थाईलैंड में अपना सैक्स बदलवाया था. इस के बाद उन्हें अमेरिका के सैन फ्रांसिस्को में रहने की इजाजत मिल गई. उन्होंने अपने सर्टिफिकेट में अपना नाम जीना रुकेरो के रूप में दर्ज करा लिया. उस के बाद उन्होंने मौडलिंग को अपना कैरियर चुना.

आज जीना रुकेरो जैंडर प्राउड और्गेनाइजेशन की वकील होने के साथसाथ ट्रांसजैंडरों के लिए काम करती हैं. 17 जून, 2015 को डैमोक्रैटिक राष्ट्रीय समिति की ओर से अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने उन के काम को ले कर सम्मानित भी किया था.

ऐसे बदले सैक्स

भारत के अलगअलग अस्पतालों में सैक्स बदलवाने के तकरीबन सौ मामले आते हैं. उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के संजय गांधी पोस्टग्रेजुएट इंस्टीट्यूट व किंग जौर्ज मैडिकल कालेज में हर साल सैक्स बदलवाने के तकरीबन आधा दर्जन केस आते हैं. ऐसे मामलों में औरत से मां बनने की चाह रखने वालों की तादाद बहुत कम होती है. ज्यादातर केस मर्द से औरत बनने वालों के होते हैं. एक डाक्टर के मुताबिक, औरत से मर्द बनने की प्रक्रिया आसान होती है, जबकि मर्द से औरत बनने की प्रक्रिया बहुत ही मुश्किल होती है. इस की वजह यह भी है कि हर मर्द में कुछ फीमेल हार्मोन पाए जाते हैं. मर्द से औरत बनाने का आपरेशन का पहला चरण आरकिएक्टौमी कहलाता है. इस में मर्द के अंग को हटाया जाता है. इस के बाद इलैक्ट्रालाइसिस से चेहरे व शरीर के दूसरे अंगों के बाल हटाए जाते हैं.

आपरेशन के आखिरी चरण को वैजाइना प्लास्टी कहते हैं. इस में मर्द के अंग की जगह औरत का अंग लगाया जाता है. इस आपरेशन में औसतन 6 घंटे का समय लगता है और कम से कम 6 दिन तक मरीज को अस्पताल में रहना पड़ता है. इस के बाद औरत बन चुके मर्द को घर पर ही रह कर 2-3 महीने तक बैड रैस्ट करने की सलाह दी जाती है. इसी दौरान हार्मोनल ट्रीटमैंट भी चालू रहता है. औरत के हार्मोन के असर से मर्द का बदन खूबसूरत बनना और जिस्मानी बदलाव होना शुरू हो जाता है. अब चर्चा करते हैं औरत से मर्द बनने की प्रक्रिया के बारे में. इस प्रक्रिया का पहला चरण मास्टेक्टौमी कहलाता है, जिस में औरत की छाती हटाई जाती है. दूसरा चरण हिस्ट्रेक्टौमी कहलाता है, जिस में औरत के अंग व दूसरे उपांगों को हटाया जाता है. तीसरा व आखिरी चरण फलोप्लास्टी कहलाता है. इस में मर्द के अंग व अंडकोशों को लगाया जाता है. माहिर डाक्टरों के मुताबिक, आपरेशन से ही सबकुछ नहीं बदल जाता. सैक्स बदलवाने वाले या वाली को अपने बरताव में भी बदलाव लाना पड़ता है. कुछ मामलों में तो जिंदगीभर दवाएं खानी पड़ती हैं. भारत में सैक्स बदलवाने वालों की तादाद बहुत कम है. इस के उलट थाईलैंड जैसे देशों में बहुत ज्यादा है, जहां सैक्स का कारोबार जोरों पर है. मलयेशिया, थाईलैंड, सिंगापुर में तो हर महीने 10 से 20 तक सैक्स बदलवाने के आपरेशन होते हैं.

काजल का असली रंग

वासना की आग ऐसी भड़की कि पतिपत्नी के उस रिश्ते को भी भूल गई, जिस के लिए 12 साल पहले उस ने सात जन्मों का बंधन निभाने का वादा किया था. उस ने प्रेमी संग मिल कर पति की हत्या कर डाली. प्रेमी ने योजना तो ऐसी बनाई थी कि पति की हत्या में मायके वाले ही फंस जाएं और वह प्रेमिका संग मौज मनाता रहे. लेकिन उन के मंसूबों पर तब पानी फिर गया, जब उन की काल डिटेल्स में 13 सौ बार बातचीत करने का पता चला.

35 वर्षीय दिलीप कुमार पाठक बिहार के बेगूसराय जिले के थाना तेघरा के गांव रानीटोल में अपनी ससुराल आया था. उस की पत्नी काजल उर्फ कंचन एकलौते बेटे अंश को ले कर सालों से मायके में रह रही थी. अंश मामा के घर रह कर ही पढ़ता था. काजल भी वहीं रहते हुए एक नर्सरी स्कूल में पढ़ाती थी.

वैसे भी दिलीप की माली हालत ठीक नहीं थी. वह प्रौपर्टी डीलिंग का काम करता था. प्रौपर्टी डीलिंग के इस धंधे में उस ने अपनी सारी जमापूंजी लगा दी थी. इस धंधे में उसे इतना घाटा हुआ था कि वह पैसेपैसे के लिए मोहताज हो गया था. अपनी स्थिति सुधारने के लिए ही उस ने पत्नी और बेटे को ससुराल भेजा था.

उस ने सोचा था कि जब तक हाथ खाली है, तब तक पत्नी और बच्चे को मायके में रहने दे. पैसों का थोड़ा इंतजाम हो जाने के बाद उन्हें वापस बुला लेगा. इसीलिए उस ने काजल और बेटे अंश को रहने के लिए ससुराल भेज दिया था.

उस दिन 25 नवंबर, 2017 की तारीख थी. शाम साढ़े 6 बजे के करीब दिलीप घर से अकेला ही बेटे की कौपी खरीदने चौर बाजार के लिए निकला. उस ने पत्नी से कहा कि कौपी खरीद कर थोड़ी देर में लौट आएगा. उसे घर से निकले काफी देर हो चुकी थी. देखतेदेखते रात के 10 बज गए, लेकिन दिलीप लौट कर घर नहीं आया. इस से काजल और अंश दोनों परेशान हो गए. दोनों की समझ में नहीं आ रहा था कि वे क्या करें. इतनी रात गए उसे कहां ढूंढें.

परेशान काजल को जब कुछ नहीं सूझा तो उस ने देवर विनीत के पास ससुराल फोन कर के पूछा कि दिलीप वहां तो नहीं गए हैं? शाम 5 बजे के करीब बाजार जाने के लिए कह कर घर से पैदल ही निकले थे, लेकिन अभी तक लौट कर नहीं आए. मेरा तो सोचसोच कर दिल बैठा जा रहा है.

भाभी के मुंह से भाई के बारे में ऐसी बात सुन कर विनीत भी परेशान हो गया कि आखिर बिना कुछ बताए भाई कहां चला गया. फिर उस ने बड़े भाई दिलीप के फोन पर काल की तो उस का फोन स्विच्ड औफ था. उस ने कई बार उस से बात करने की कोशिश की लेकिन हर बार फोन बंद मिला. आखिर उस ने यह बात घर वालों को भी बता दी.

दिलीप के घर वाले जिला समस्तीपुर में रहते थे. वहां से बेगूसराय थोड़ी दूरी पर था. विनीत ने सोचा अब तो सुबह ही कुछ हो सकता है. उस ने रात तो जैसेतैसे काट ली. सुबह होते ही वह भाई का पता लगाने रानीटोल पहुंच गया.

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वहां पहुंच कर उसे पता चला कि रानीटोल से सटी बूढ़ी गंडक नदी के किनारे हृष्टपुष्ट गोरे रंग और औसत कदकाठी के एक युवक की लाश पाई गई है. लाश का जो हुलिया बताया जा रहा था, वह काफी कुछ उस के भाई दिलीप से मेल खा रहा था. यह सुन कर विनीत थोड़ा विचलित हो गया कि कहीं लाश भाई की तो नहीं है. हो सकता है, उस के साथ कोई घटना घट गई हो.

जितनी भी जल्दी हो सकता था, वह मौके पर पहुंच गया. वहां काफी भीड़ जमा थी. भीड़ को चीरता हुआ वह लाश तक पहुंच गया. लाश दाईं करवट पड़ी थी. हत्यारों ने उस की गरदन पर किसी तेज धारदार हथियार से पीछे से वार किया था. पास ही पूजा की सामग्री पड़ी थी और लाश के ऊपर अधखुली पीली मखमली चादर पड़ी थी.

ऐसा लग रहा था, जैसे मृतक जब पूजा कर रहा था, तभी हत्यारे ने मौका देख कर उस पर पीछे से वार कर दिया हो. विनीत लाश देख कर पहचान गया कि लाश उस के भाई की है. वह भाई की लाश से लिपट कर बिलखबिलख कर रोने लगा.

गांव वाले भी लाश को देखते ही पहचान गए थे कि काजल के पति दिलीप की लाश है. जैसे ही काजल को पति की हत्या की सूचना मिली तो वह गश खा कर गिर गई. घर में रोनापीटना शुरू हो गया. घर वाले वहां पहुंच गए, जहां दामाद का शव पड़ा था.

जहां से दिलीप का शव बरामद हुआ था, वह इलाका समस्तीपुर जिले के थाना मुफस्सिल में पड़ता था. थाना मुफस्सिल को घटना की सूचना मिल चुकी थी. थानाप्रभारी पवन सिंह पुलिस टीम के साथ मौके पर पहुंच गए थे. पवन सिंह ने इस बात की सूचना पुलिस अधीक्षक दीपक रंजन और डीएसपी मोहम्मद तनवीर अहमद को दे दी थी.

वरिष्ठ पुलिस अधिकारी भी वहां पहुंच गए. घटनास्थल और लाश का निरीक्षण करने के बाद थानाप्रभारी पवन सिंह ने मृतक के भाई से पूछताछ की तो उस ने बताया कि दिलीप के पास उस का एक सेलफोन था, जो गायब है.

घटनास्थल पर पूजा की सामग्री के अलावा दूसरी कोई चीज नहीं मिली थी. पुलिस ने पूजा सामग्री और चादर अपने कब्जे में ले ली. कागजी काररवाई करने के बाद लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी गई. फिर पुलिस थाने लौट आई.

विनीत ने अपने भाई दिलीप की हत्या की तहरीर थाने में दे दी, जिस के आधार पर पुलिस ने भादंवि की धारा 302, 34 के तहत अज्ञात हत्यारों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर के जांच शुरू कर दी.

दिलीप पाठक हत्याकांड का खुलासा करने के लिए एसपी दीपक रंजन ने डीएसपी तनवीर अहमद के नेतृत्व में एक टीम गठित कर दी. डीएसपी तनवीर अहमद ने घटनास्थल का दौरा कर के स्थिति को समझने की कोशिश की. परिस्थितियां बता रही थीं कि हत्या के इस मामले में मृतक का कोई अपना ही शामिल था. वह कौन था, इस का पता लगाना जरूरी था.

पुलिस ने मृतक के भाई विनीत पाठक से दिलीप की किसी से दुश्मनी के बारे में पूछा तो उस ने बताया कि उस की किसी से कोई दुश्मनी नहीं थी. काजल ने भी यही कहा. इसी दौरान एक मुखबिर ने चौंकाने वाली जानकारी दी. उस ने बताया कि दिलीप और उस की पत्नी काजल के बीच काफी मनमुटाव चल रहा था.

प्रारंभिक जांच के दौरान तनवीर अहमद को काजल की हरकतें खटकी भी थीं, लेकिन उस के खिलाफ कोई ठोस सबूत नहीं थे, इसलिए उन्होंने उस से सीधे बात करना ठीक नहीं समझा था.

डीएसपी मोहम्मद तनवीर अहमद ने दिलीप और काजल के मोबाइल की काल डिटेल्स निकलवाई. काजल के फोन की डिटेल्स देख कर उन के होश उड़ गए. उस के फोन पर डेढ़ महीने में एक ही नंबर से 13 सौ फोन आए थे. कई काल तो ऐसी थीं, जिन में उसी नंबर से 2 से 3 घंटे तक बातचीत की गई थी.

यह नंबर पुलिस के शक के दायरे में आ गया. पुलिस ने उस नंबर की काल डिटेल्स निकलवाई तो वह नंबर लक्ष्मण कुमार पासवान, निवासी रातगांव करारी, थाना-तेघरा, जिला बेगूसराय का निकला. पुलिस ने बिना समय गंवाए उसी दिन लक्ष्मण के घर पर दबिश दी और उसे पूछताछ के लिए थाने ले आई.

पूछताछ में लक्ष्मण टूट गया. उस ने अपना अपराध स्वीकार करते हुए बताया कि उस ने काजल के कहने पर उस के पति दिलीप की हत्या की थी. काजल उस की प्रेमिका थी. यह सुन कर सभी अधिकारी स्तब्ध रह गए. क्योंकि देखने में भोलीभाली लगने वाली औरत नागिन से भी जहरीली निकली, जिस ने इश्क के नशे में अपने पति को ही डंस लिया.

काजल के उजले चेहरे से नकाब उतर चुका था. डीएसपी अहमद ने एसपी दिलीप रंजन को पूरी बात बता दी. एसपी साहब ने महिला पुलिस को रानीटोल भेज कर काजल को थाने बुलवाया. थाने में लक्ष्मण को बैठा देख काजल के चेहरे का रंग उड़ गया.

काजल को यह समझते देर नहीं लगी कि उस के गुनाहों की पोल खुल चुकी है. ऐसे में भलाई सच बताने में ही है. काजल ने भी अपना जुर्म कबूल कर लिया कि उसी के कहने पर लक्ष्मण ने दिलीप की हत्या की थी. काजल ने हत्या की पूरी कहानी कुछ ऐसे बयां की—

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35 वर्षीय दिलीप कुमार पाठक मूलत: बिहार के समस्तीपुर जिले के थाना भगवानपुर के गांव बुढ़ीवन तैयर का रहने वाला था. पिता अनिल पाठक की 4 संतानों में वह सब से बड़ा था. हंसमुख स्वभाव का दिलीप मेहनतकश था. उस ने प्रौपर्टी डीलिंग का काम शुरू किया था, उस का यह धंधा सही चल निकला था.

दिलीप अपने पैरों पर खड़ा हो चुका था और ईमानदारी से पैसा कमा रहा था. पिता ने 12 साल पहले उस की शादी बेगूसराय के तेघरा, रानीटोल की रहने वाली काजल के साथ कर दी थी. शादी के कई साल बाद उस के घर में एक बेटा पैदा हुआ, जिस का नाम अंश रखा गया.

समय के साथ प्रौपर्टी के धंधे में दिलीप को काफी नुकसान हुआ. इस के बाद उस का धंधा धीरेधीरे और भी मंदा होता गया. स्थिति यह आई कि प्रौपर्टी के बिजनैस में उस ने जितनी पूंजी लगाई थी, सब डूब गई. यह करीब 3 साल पहले की बात है.

पति की माली हालत खराब देख काजल बेटे को ले कर अपने मायके रानीटोल चली गई और वहीं मांबाप के साथ रहने लगी. पत्नी का यह रवैया दिलीप को काफी खला, क्योंकि मुसीबत के वक्त साथ देने के बजाय वह उसे अकेला छोड़ कर चली गई. वह मन मसोस कर रह गया और सब कुछ वक्त पर छोड़ दिया.

उधर काजल ने बेटे को वहीं के एक कौन्वेंट स्कूल में पढ़ाना शुरू कर दिया. दिलीप बीचबीच में पत्नी और बेटे से मिलने ससुराल जाता रहता था. ससुराल में 1-2 दिन रह कर वह अपने घर लौट आता था.

अंश जिस कौन्वेंट स्कूल में पढ़ता था, वहां की किताबें भाषा में काफी मुश्किल होती थीं. कभीकभी अंगरेजी के कुछ शब्दों के अर्थ काजल को भी पता नहीं होते थे, जबकि वह अच्छीभली पढ़ीलिखी थी. बेटे की पढ़ाई में कोई परेशानी न आए, इसलिए उस ने अंश के लिए घर पर ही एक ट्यूटर लगा दिया. यह पिछले साल जुलाईअगस्त की बात है.

ट्यूटर का नाम लक्ष्मण कुमार पासवान था. रातगांव करारी का रहने वाला 21 वर्षीय लक्ष्मण कुमार एकदम साधारण शक्लसूरत और सांवले रंग का युवक था. लक्ष्मण की वाकपटुता से काजल काफी प्रभावित थी. अंश को भी वह खूब मन लगा कर पढ़ाता था. थोड़े ही दिनों में लक्ष्मण उस परिवार का हिस्सा बन गया. बेटे को पढ़ाते समय काजल लक्ष्मण के पास ही बैठी रहती थी.

लक्ष्मण जवान था. ऊपर से कुंवारा भी. जब काजल उस कमरे में आ कर बैठती थी, जिस में वह अंश को पढ़ाता था तो लक्ष्मण उसे कनखियों से निहारता रहता था. काजल भी लक्ष्मण के पास बैठने के लिए बेकरार रहती थी.

एक दिन लक्ष्मण अंश को ट्यूशन पढ़ाने उस के घर पहुंचा. उस समय शाम का वक्त था. उस रोज काजल काफी परेशान थी. उस ने अपने दुखों का पिटारा उस के सामने खोल कर रख दिया. लक्ष्मण काजल की दुखभरी व्यथा सुन कर भावनाओं में बह गया.

काजल ने उस से कहा कि वह उस के लिए कोई छोटीमोटी नौकरी ढूंढने में मदद करे. लक्ष्मण मना नहीं कर सका. बाद में लक्ष्मण ने अपने एक परिचित के माध्यम से एक नर्सरी स्कूल में उसे अध्यापिका की नौकरी दिलवा दी.

काजल लक्ष्मण के अहसानों की कायल थी. धीरेधीरे वह उस की ओर झुकती गई. लक्ष्मण भी उस की ओर आकर्षित होता गया. धीरेधीरे दोनों में प्यार हो गया. प्यार भी ऐसा कि एकदूसरे को देखे बिना रह न सके. यह बात भी जुलाई अगस्त 2016 की है. 2 महीने के प्यार के बाद लक्ष्मण और काजल ने चुपके से मंदिर में विवाह कर लिया. काजल ने इस की भनक किसी को नहीं लगने दी, पति तक को नहीं.

9 वर्ष का अंश भले ही छोटा था, लेकिन उस में इतनी अक्ल थी कि वह अच्छे और बुरे में फर्क महसूस कर सके. उस ने अपनी मम्मी और ट्यूटर के बीच के रिश्तों को महसूस कर लिया था. उसे लगता था कि कहीं कुछ गलत हो रहा है, जो घरपरिवार के लिए अच्छा नहीं है. अंश ने यह बात अपने पापा दिलीप को बता दी. बेटे की बात सुन कर उस के तनबदन में आग लग गई.

बहरहाल, सूचना मिलने के अगले दिन दिलीप ससुराल रानीटोल पहुंच गया. उस दिन ट्यूटर लक्ष्मण को ले कर पतिपत्नी के बीच काफी झगड़ा हुआ. काजल पति को समझाने के लिए झूठ पर झूठ बोले जा रही थी. उस ने सफाई देते हुए कहा कि उस के और लक्ष्मण के बीच कोई संबंध नहीं है.

लक्ष्मण को उस ने बेटे को ट्यूशन पढ़ाने के लिए रखा है. ट्यूटर आता है और बच्चे को ट्यूशन पढ़ा कर चला जाता है. उस रोज काजल अपने त्रियाचरित्र के दम पर पति को काबू करने में कामयाब हो गई थी. जैसेतैसे मामला शांत तो हो गया, लेकिन दिलीप पत्नी पर नजर रखने लगा.

पति को उस पर शक हो गया है, काजल ने यह बात लक्ष्मण को फोन कर के बता दी थी. उस ने लक्ष्मण को यह कहते हुए सावधान कर दिया था कि पति जब तक घर पर रहे, तब तक वह बच्चे को ट्यूशन पढ़ाने भी न आए. लक्ष्मण उस की बात मान गया और वैसा ही किया, जैसा उस ने करने को कहा था.

काजल लक्ष्मण से मिलने के लिए बेचैन रहती थी. पति के रहते उन के मिलन में बाधा पड़ रही थी. काजल से लक्ष्मण की जुदाई बरदाश्त नहीं हो रही थी. उस ने पति को रास्ते से हटाने के लिए लक्ष्मण पर दबाव बनाया कि वह उस की हत्या कर दे. उस के बाद रास्ते में रुकावट पैदा करने वाला कोई नहीं रहेगा. काजल को पाने के लिए लक्ष्मण उस की बात मानने के लिए तैयार हो गया.

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लक्ष्मण जानता था कि दिलीप की माली हालत अच्छी नहीं है, इसलिए कुछ ऐसा चक्कर चलाया जाए, जिस से वह उस के काबू में आ जाए. इस के लिए उस ने काजल को धोखे में रखते हुए एक और खेल खेलने की सोची.

उस ने सोचा कि दिलीप की हत्या का ऐसा तानाबाना बुना जाए, जिस से पूरा शक काजल और काजल के मायके वालों पर ही जाए. कभी मामले का खुलासा हो भी तो वह शक के दायरे से बचा रहे.

दिलीप ने लक्ष्मण को कभी नहीं देखा था, इसलिए वह उसे जानतापहचानता नहीं था. लक्ष्मण और काजल ने इसी बात का फायदा उठाते हुए योजना बनाई कि दिलीप को भरोसा दिलाया जाए कि एक ऐसी पूजा है, जिसे ध्यानमग्न हो कर करने पर पूजा की जगह पर ही 25 हजार रुपए मिल जाते हैं.

योजना बनाने के बाद काजल ने पति को इस पूजा के लिए मना लिया. दिलीप इसलिए तैयार हुआ था क्योंकि उस की आर्थिक स्थिति एकदम जर्जर हो चुकी थी. वह पैसेपैसे के लिए मोहताज था. उस ने सोचा कि संभव है ऐसा करने पर उसे आर्थिक लाभ मिल जाए.

बहरहाल, सब कुछ योजना के मुताबिक चल रहा था. काजल ने 25 नवंबर, 2017 को दिन में एक तेज धार वाला गंडासा दिलीप की मोटरसाइकिल की डिक्की में छिपा कर रख दिया. उस ने यह बात फोन कर के लक्ष्मण को बता दी. अब केवल योजना को अमलीजामा पहनाना बाकी था. लक्ष्मण ने काजल को भरोसा दिलाया कि आज काम तमाम हो जाएगा.

25 नवंबर की शाम साढ़े 6 बजे के करीब दिलीप बेटे के लिए कौपी खरीदने के लिए घर से अकेला निकला. घर से निकल कर जब वह चौर बाजार पहुंचा तो पीछे से लक्ष्मण पंडित बन कर उस की मोटरसाइकिल के पास पहुंच गया.

दरअसल, दिलीप के घर से निकलते ही काजल ने लक्ष्मण को फोन कर के बता दिया था कि शिकार घर से निकल चुका है. चौर में उस से मुलाकात हो जाएगी. आगे क्या करना है, यह उसे पता था ही.

चौर बाजार में उस की मुलाकात दिलीप से हुई तो उस ने काजल का परिचय देते हुए उसे पूजा वाली बात बताई. दिलीप समझ गया कि यह वही पंडित है, जिस से पूजा करानी है.

लक्ष्मण उसे बाइक पर बैठा कर चौर (तेघरा) से समस्तीपुर ले आया, जहां उस ने पूजा की सामग्री खरीदी. सामग्री खरीदने के बाद वह दिलीप को ले कर मोटरसाइकिल से रानीटोल स्थित माधोपुर बूढ़ी गंडक नदी के किनारे पहुंच गया. यह इलाका जिला समस्तीपुर में आता था.

योजना के अनुसार, लक्ष्मण ने पहले दिलीप से पूजा करवाई. पूजा की प्रारंभिक विधि समाप्त होने के बाद उस ने पैसे पाने के लिए दिलीप से 15 मिनट तक आंखें बंद कर ध्यानमग्न होने को कहा. साथ यह भी कहा कि आंखें बंद करने के बाद ही पैसे मिलेंगे.

दिलीप ध्यानमग्न हो गया. तभी लक्ष्मण बाइक की डिक्की में रखा धारदार गंडासा ले आया. उस ने पीछे से दिलीप की गरदन पर जोरदार वार किया. गरदन कटने से दिलीप की मौके पर ही मौत हो गई.

दिलीप की हत्या करने के बाद लक्ष्मण वहां से बाइक से वापस बेगूसराय लौट गया. बेगूसराय जाते वक्त लक्ष्मण ने दिलीप का मोबाइल फोन गरुआरा चौर की झाडि़यों में फेंक दिया. वहां से आगे जा कर उस ने गंडासा दलसिंहसराय के पास एनएच-28 के किनारे एक झाड़ी में फेंक दिया, ताकि पुलिस उस तक कभी न पहुंच सके.

इत्मीनान होने के बाद वह मोटरसाइकिल ले कर प्रेमिका काजल के घर रानीटोल पहुंचा. काजल उस के आने का बड़ी बेसब्री से इंतजार कर रही थी. लक्ष्मण को देखते ही उस का चेहरा खुशी से खिल उठा. घर में सभी सो गए थे. उस ने दबे पांव मोटरसाइकिल बरामदे में चढ़ा दी. उस वक्त रात के करीब 10 बज रहे थे.

मोटरसाइकिल खड़ी करवाने के बाद काजल ऊपर खाली पड़े कमरे में गई तो पीछेपीछे लक्ष्मण भी हो लिया. वहां दोनों एकदूसरे की बांहों में समा गए. बाद में लक्ष्मण अपने घर चला गया.

दोनों के रास्ते का रोड़ा साफ हो चुका था. दोनों यह सोच कर खुश थे कि पुलिस उन तक कभी नहीं पहुंच पाएगी. लेकिन कानून के लंबे हाथों ने उन के मंसूबों पर पानी फेर दिया और दोनों वहां पहुंच गए, जहां उन का असली ठिकाना था यानी जेल की सलाखों के पीछे. अंश अपने दादा अनिल के साथ अपने पैतृक गांव बूढ़ीवन आ गया और दादादादी के साथ रह रहा है.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

जिगोलो बनने के चक्कर में हो गया अपहरण

सोहेल हाशमी रोजाना की तरह 8 अक्तूबर, 2016 को भी अपने घर आए अखबार को पढ़ रहा था. अखबार पढ़ते पढ़ते उस की नजर एक पेज पर छपे विज्ञापन पर पड़ी. उस विज्ञापन को पढ़ कर सोहेल चौंका. लिखा था मेल एस्कौर्ट बन कर रोजाना 25 हजार रुपए कमाएं. सोहेल जानता था कि जिस तरह कालगर्ल्स होती हैं, उसी तरह का काम मेल एस्कौर्ट का होता है. विज्ञापन में जो आमदनी दी गई थी, वह उसे आकर्षित कर रही थी.

28 वर्षीय सोहेल ने उस विज्ञापन को कई बार पढ़ा. उस समय वह आर्थिक परेशानी से जूझ रहा था. अपने परिवार के साथ वह दिल्ली के शाहदरा की बिहारी कालोनी स्थित जिस 2 कमरों के मकान में रहता था, उस का किराया भी वह कई महीनों से नहीं दे पाया था. उस के दिमाग में आया कि अगर वह मेल एस्कौर्ट का काम शुरू कर दे तो उसे अलग अलग महिलाओं के साथ मौजमस्ती करने को तो मिलेगा ही, साथ ही मोटी कमाई भी होगी, इसलिए वह मानसिक रूप से यह काम करने के लिए तैयार हो गया.

विज्ञापन में जो फोन नंबर दिया गया था, सोहेल ने उस नंबर पर फोन किया. उस नंबर पर घंटी तो गई, पर किसी ने फोन नहीं उठाया. उस ने यह कोशिश कई बार की, पर किसी ने भी उस की काल रिसीव नहीं की तो वह निराश हो गया. बड़ी उम्मीद के साथ सोहेल ने फोन किया था. फोन रिसीव न होने से वह मन ही मन विज्ञापन देने वाले को कोसने लगा.

अगले दिन सोहेल घर के किसी काम में व्यस्त था, तभी उस के मोबाइल की घंटी बजी. स्क्रीन पर आए नंबर को देख कर उस की आंखों में चमक आ गई. वह नंबर वही था, जिस पर उस ने एक दिन पहले फोन किया था. सोहेल ने झट से काल रिसीव कर के बात की. फोन करने वाले ने उसे मेल एस्कौर्ट अर्थात जिगोलो का मतलब समझाया तो सोहेल ने कह दिया कि वह यह काम करने को तैयार हैं.

इस के बाद फोन करने वाले ने कहा, ‘‘एक अंतरराष्ट्रीय प्रोजैक्ट के सिलसिले में विदेशी आए हैं. आप को उन के साथ जाना है. लेकिन इस से पहले इंटरव्यू देना होगा. अगर आप इंटरव्यू में पास हो गए तो समझो ऐश और कैश दोनों मिलेंगे.’’

सोहेल सिर्फ यह देख रहा था कि जिगोलो बनने से क्या क्या फायदे हैं, इसलिए वह खुश हो कर बोला, ‘‘मैं इंटरव्यू के लिए तैयार हूं, मुझे कहां आना होगा?’’

‘‘आप कल उत्तर प्रदेश के कस्बा गजरौला पहुंच जाओ. वहां पहुंच कर फोन कर देना. हमारा आदमी औफिस तक ले आएगा.’’ फोन करने वाले ने कहा.

‘‘ठीक है, मैं कल गजरौला पहुंच जाऊंगा.’’ सोहेल ने खुश हो कर कहा.

अगले दिन सोहेल इंटरव्यू देने के लिए तैयार हुआ और शाहदरा से बस द्वारा आनंद विहार पहुंच गया. वहां से उस ने गजरौला जाने वाली बस पकड़ी और ढाई घंटे में गजरौला पहुंच गया. उस ने उस नंबर पर फोन कर के अपने गजरौला पहुंचने की खबर दे दी.

कुछ देर बाद सोहेल के पास 2 मोटरसाइकिल सवार पहुंचे. उन्होंने उस का बड़ी गर्मजोशी से स्वागत किया. साथ ही खुद को एक ऐसी कंपनी का कर्मचारी बताया, जिस में विदेशी काम करते थे. दोनों युवक सोहेल को मोटरसाइकिल पर बिठा कर सूरज ढलने तक इधरउधर गांव में घुमाते रहे, अंधेरा होने पर वे उसे जंगल में ले गए.

सोहेल ने जंगल में जाने के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा कि उन का औफिस एक खेत में इसलिए बनाया गया है, ताकि आसपास के गांवों के बारे में महत्त्वपूर्ण जानकारियां मिल सकें. कुछ देर में वे उसे खेत में बने एक ट्यूबवैल के कमरे पर ले कर पहुंचे. लेकिन वहां औफिस जैसा कुछ नहीं था.

इस से पहले कि सोहेल उन दोनों से कुछ पूछता, उन्होंने उसे कमरे में धकेल कर उस की पिटाई शुरू कर दी. उन्होंने उस की कनपटी पर पिस्तौल रख कर धमकी दी कि अगर उस ने भागने की कोशिश की तो उसे गोरी मार दी जाएगी.

सोहेल समझ गया कि वह गलत लोगों के बीच फंस गया है. उन के चंगुल से निकलना उसे मुश्किल लग रहा था. थोड़ी देर में 3 युवक और आ गए. उन के हाथों में तलवारें थीं. उन्हें देख कर सोहेल डर से कांपते हुए जान की भीख मांगने लगा. तभी एक युवक ने उस के गले पर तलवार रख कर उस का मोबाइल फोन छीन लिया.

इस के बाद वे उस की मां का नंबर पूछ कर चले गए. जो 2 युवक कमरे में बचे थे, वे सोहेल को रात भर तरहतरह से प्रताडि़त करते रहे. अगले दिन उन लोगों ने सोहेल की मां को फोन कर के 12 लाख रुपए की फिरौती मांगी. घर वालों को जब पता चला कि सोहेल का अपरहण हो चुका है तो वे घबरा गए. 12 लाख रुपए की फिरौती देना उन के वश की बात नहीं थी, इसलिए उन्होंने थाना शाहदरा की पुलिस को इस की सूचना दे दी. पुलिस ने वह फोन नंबर नोट कर लिया, जिस से फिरौती के लिए फोन आया था. पुलिस ने सोहेल के घर वालों से कह दिया कि वे अपहर्त्ताओं से संपर्क बनाए रखें.

थानाप्रभारी ने यह सूचना ईस्ट दिल्ली के डीसीपी ऋषिपाल को दी तो उन्होंने एक पुलिस टीम बना कर शीघ्रता से जरूरी काररवाई करने के निर्देश दिए. एसआई विजय बालियान के नेतृत्व में गठित टीम मोबाइल फोन की लोकेशन के आधार पर गजरौला पहुंच गई. अंतत: टेक्निकल सर्विलांस की मदद से दिल्ली पुलिस की टीम ने खेतों के बीच बने ट्यूबवैल के एक कमरे से सोहेल को अपहर्त्ताओं के चंगुल से सकुशल बरामद कर लिया. दोनों अपहर्त्ता भी पकड़े गए. उन की निशानदेही पर पुलिस ने उन के 3 अन्य साथियों को भी गिरफ्तार कर लिया.

जिगोलो बनने के चक्कर में सोहेल को क्या क्या यातनाएं झेलनी पड़ीं, उन्हें याद कर के वह सिहर उठता है. उस ने तौबा कर ली है कि पैसे कमाने के लिए वह इस तरह का कोई हथकंडा नहीं अपनाएगा.

तरकीब : झुमरी की जवानी हासिल कर पाया रतन

रतन सिंह की निगाहें पिछले कई दिनों से झुमरी पर लगी हुई थीं. वह जब भी उसे देखता, उस के मुंह से एक आह निकल जाती. झुमरी की खिलती जवानी ने उस के तनमन में एक हलचल सी मचा दी थी और वह उसे हासिल करने को बेताब हो उठा था.

वैसे भी रतन सिंह के लिए ऐसा करना कोई बड़ी बात न थी. वह गांव के दबंग गगन सिंह का एकलौता और बिगड़ैल बेटा था. कई जरूरतमंद लड़कियों को अपनी हवस का शिकार उस ने बनाया था. झुमरी तो वैसे भी निचली जाति की थी.

झुमरी 20वां वसंत पार कर चुकी एक खूबसूरत लड़की थी. गरीबी में पलीबढ़ी होने के बावजूद जवानी ने उस के रूप को यों निखारा था कि देखने वालों की निगाहें बरबस ही उस पर टिक जाती थीं. गोरा रंग, भरापूरा बदन, बड़ीबड़ी कजरारी आंखें और हिरनी सी मदमस्त चाल.

इस सब के बावजूद झुमरी में एक कमी थी. वह बोल नहीं सकती थी, पर उसे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता था. वह अपनेआप में मस्त रहने वाली लड़की थी.

झुमरी घर के कामों में अपनी मां की मदद करती और खेत के काम में अपने बापू की. उस के बापू तिलक के पास जमीन का एक छोटा सा टुकड़ा था, जिस के सहारे वह अपने परिवार को पालता था. वैसे भी उस का परिवार छोटा था. परिवार में पतिपत्नी और 2 बच्चे, झुमरी और शंकर थे. अपनी खेती से समय मिलने पर तिलक दूसरों के खेतों में भी मजदूरी का काम कर लिया करता था.

गरीबी में भी तिलक का परिवार खुश था. परंतु कभीकभी पतिपत्नी यह सोच कर चिंतित हो उठते थे कि उन की गूंगी बेटी को कौन अपनाएगा?

झुमरी इन सब बातों से बेखबर मजे में अपनी जिंदगी जी रही थी. वह दिमागी रूप से तेज थी और गांव के स्कूल से 10 वीं जमात तक पढ़ाई कर चुकी थी. उसे खेतखलिहान, बागबगीचों से प्यार था.

गांव के दक्षिणी छोर की अमराई में झुमरी अकसर शाम को आ बैठती और पेड़ों के झुरमुट में बैठे पक्षियों की आवाज सुना करती. कोयल की आवाज सुन कर उस का भी जी चाहता कि वह उस के सुर में सुर मिलाए, पर वह बोल नहीं सकती थी.

झुमरी की इस कमी को रतन सिंह ने अपनी ताकत समझा. उस ने पहले तो झुमरी को तरहतरह के लालच दे कर अपने प्रेमजाल में फांसना चाहा और जब इस में कामयाब न हुआ, तो जबरदस्ती उसे हासिल करने का मन बना लिया.

रात घिर आई थी. चारों तरफ अंधेरा हो चुका था. आज झुमरी को खेत से लौटने में देर हो गई थी. पिछले कई दिनों से उस की ताक में लगे रतन सिंह की नजर जब उस पर पड़ी, तो उस की आंखों में एक तेज चमक जाग उठी.

मौका अच्छा जान कर रतन सिंह उस के पीछे लग गया. एक तो अंधेरा, ऊपर से घर लौटने की जल्दी. झुमरी को इस बात का एहसास ही नहीं हुआ कि कोई उस के पीछे लगा हुआ है. वह चौंकी तब, जब अमराई में घुसते ही रतन सिंह उस का रास्ता रोक कर खड़ा हो गया.

‘‘मैं ने तुम्हारा प्यार पाने की बहुत कोशिश की…’’ रतन सिंह कामुक निगाहों से झुमरी के उभारों को घूरता हुआ बोला, ‘‘तुम्हें तरहतरह से रिझाया. तुम से प्रेम निवेदन किया, पर तू न मानी. आज अच्छा मौका है. आज मैं छक कर तेरी जवानी का रसपान करूंगा.’’

रतन सिंह का खतरनाक इरादा देख झुमरी के सारे तनबदन में डर की सिहरन दौड़ गई. उस ने रतन सिंह से बच कर निकल जाना चाहा, पर रतन सिंह ने उसे ऐसा नहीं करने दिया. उस ने झपट कर झुमरी को अपनी बांहों में भर लिया.

झुमरी ने चिल्लाना चाहा, पर उस के होंठों से शब्द न फूटे. झुमरी को रतन सिंह की आंखों में वासना की भूख नजर आई. रतन सिंह झुमरी को खींचता हुआ अमराई के बीचोंबीच ले आया और जबरदस्ती जमीन पर लिटा दिया. इस के पहले कि झुमरी उठे, वह उस पर सवार हो गया.

झुमरी उस के चंगुल से छूटने के लिए छटपटाने लगी. दूसरी ओर वासना में अंधा रतन सिंह उस के कपड़े नोचने लगा. उस ने अपने बदन का पूरा भार झुमरी के नाजुक बदन पर डाल दिया, फिर किसी भूखे भेडि़ए की तरह उसे रौंदने लगा.

झुमरी रो रही थी, तड़प रही थी, आंखों ही आंखों में फरियाद कर रही थी, लेकिन रतन सिंह ने उस की एक न सुनी और उसे तभी छोड़ा, जब अपनी वासना की आग बुझा ली.

ऐसा होते ही रतन सिंह उस के ऊपर से उठ गया. उस ने एक उचटती नजर झुमरी पर डाली. जब उस की निगाहें झुमरी की निगाहों से टकराईं, तो उस को एक झटका सा लगा.

झुमरी की आंखों में गुस्से की चिनगारियां फूट रही थीं, पर अभीअभी उस ने झुमरी के जवान जिस्म से लिपट कर जवानी का जो जाम चखा था, इसलिए उस ने झुमरी के गुस्से और नफरत की कोई परवाह नहीं की और उठ कर एक ओर चल पड़ा.

इस घटना ने झुमरी को झकझोर कर रख दिया था. वह 2 दिन तक अपने कमरे में पड़ी रही थी. झुमरी के मांबाप ने जब उस से इस की वजह पूछी, तो उस ने तबीयत खराब होने का बहाना बना दिया था.

कई बार झुमरी के दिमाग में यह बात आई थी कि वह इस के बारे में उन्हें बतला दे, पर यह सोच कर वह चुप रह गई थी कि उन से कहने से कोई फायदा नहीं. वे चाह कर भी रतन सिंह का कुछ बिगाड़ नहीं पाएंगे, उलटा रतन सिंह उन की जिंदगी को नरक बना देगा.

इस मामले में जो करना था, उसे ही करना था. रतन सिंह ने उस की इज्जत लूट ली थी और उसे इस के किए की सजा मिलनी ही चाहिए थी. पर कैसे? झुमरी ने इस बात को गहराई से सोचा, फिर उस के दिमाग में एक तरकीब आ गई.

रात आधी बीत चुकी थी. सारा गांव सो चुका था, पर झुमरी जाग रही थी. वह इस समय अमराई से थोड़ी दूर बांसवारी यानी बांसों के झुरमुट में खड़ी हाथों में कुदाल लिए एक गड्ढा खोद रही थी.

तकरीबन 2 घंटे तक वह गड्ढा खोदती रही, फिर हाथ में कटार लिए बांस के पेड़ों के पास पहुंची. उस ने कटार की मदद से बांस की पतलीपतली अनेक डालियां काटीं, फिर उन्हें गड्ढे के करीब ले आई.

डालियों को चिकना कर उन्हें बीच से चीर कर उन की कमाची बनाईं, फिर उन की चटाई बुनने लगी. अपनी इच्छानुसार चटाई बुनने में उसे तकरीबन 3 घंटे लग गए.

चटाई तैयार कर झुमरी ने उसे गड्ढे के मुंह पर रखा. चटाई ने तकरीबन एक मीटर दायरे के गड्ढे के मुंह को पूरी तरह ढक लिया. यह चटाई किसी आदमी का भार हरगिज सहन नहीं कर सकती थी.

सुबह होने में अभी चंद घंटे बचे थे. हालांकि बांसों के इस झुरमुट की ओर गांव वाले कम ही आते थे और दिन में यह सुनसान ही रहता था, फिर भी झुमरी कोई खतरा मोल लेना नहीं चाहती थी. उस ने जमीन पर बिखरे बांस के सूखे पत्तों को इकट्ठा कर उन का ढेर लगा दिया.

इस काम से निबट कर झुमरी ने बांस की चटाई से गड्ढे का मुंह ढका, पर उस पर पत्तों को इस तरह डाल दिया, ताकि चटाई पूरी तरह ढक जाए और किसी को वहां गड्ढा होने का एहसास न हो. गड्ढे से निकली मिट्टी को उस ने अपने साथ लाई टोकरी में भर कर गड्ढे से थोड़ी दूर डाल दिया.

काम खत्म कर झुमरी ने एक निगाह अपने अब तक के काम पर डाली, फिर अपने साथ लाए बड़े से थैले में अपना सारा सामान भरा और थैला कंधे पर लाद कर घर की ओर चल पड़ी.

7 दिनों तक झुमरी का यह काम चलता रहा. इतने दिन में उस ने 7 फुट गहरा गड्ढा तैयार कर लिया था. गड्ढे में उतरने और चढ़ने के लिए वह अपने साथ घर से लाई सीढ़ी का इस्तेमाल करती थी. काम पूरा कर उस ने पत्ते डाले, फिर अपने अगले काम को अंजाम देने के बारे में सोचती.

रतन सिंह ने झुमरी की इज्जत लूट तो ली थी, परंतु अब वह इस बात से डरा हुआ था कि कहीं झुमरी इस बात का जिक्र अपने मांबाप से न कर दे और कोई हंगामा न खड़ा हो जाए. परंतु जब 10 दिन से ज्यादा हो गए और कुछ नहीं हुआ, तो उस ने राहत की सांस ली. अब उसे रात की तनहाई में वो पल याद आते, जब उस ने झुमरी के जवान जिस्म से अपनी वासना की आग बुझाई थी. जब भी ऐसा होता, उस का बदन कामना की आग में झुलसने लगता था.

इस बीच रतन सिंह ने 1-2 बार झुमरी को अपने खेत की ओर जाते या आते देखा था, परंतु उस के सामने जाने की उस की हिम्मत न हुई थी. पर उस दिन अचानक रतन सिंह का सामना झुमरी से हो गया. वह विचारों में खोया अमराई की ओर जा रहा था कि झुमरी उस के सामने आ खड़ी हुई. उसे यों अपने सामने देख एकबारगी तो रतन सिंह बौखला गया था और झुमरी को देखने लगा था.

झुमरी कुछ देर तक खामोशी से उसे देखती रही, फिर उस के होंठों पर एक दिलकश मुसकान उभर उठी. उसे इस तरह मुसकराते देख रतन सिंह ने राहत की सांस ली और एकटक झुमरी के खूबसूरत चेहरे और भरेभरे बदन को देखने लगा.

इस के बावजूद जब झुमरी मुसकराती रही, तो रतन सिंह बोला, ‘‘झुमरी, उस दिन जो हुआ, उस का तुम ने बुरा तो नहीं माना?’’

झुमरी ने न में सिर हिलाया.

‘‘सच…’’ कहते हुए रतन सिंह ने उस की हथेली कस कर थाम ली, ‘‘इस का मतलब यह है कि तू फिर वह सब करना चाहती है?’’ बदले में झुमरी खुल कर मुसकराई, फिर हौले से अपना हाथ छुड़ा कर एक ओर भाग गई.

उस की इस हरकत पर रतन सिंह के तनमन में एक हलचल मच गई और उस की आंखों के सामने वो पल उभर आए, जब उस ने झुमरी की खिलती जवानी का रसपान किया था. झुमरी को फिर से पाने की लालसा में रतन सिंह उस के इर्दगिर्द मंडराने लगा. झुमरी भी अपनी मनमोहक  अदाओं से उस की कामनाओं को हवा दे रही थी.

झुमरी ने एक दिन इशारोंइशारों में रतन सिंह से यह वादा कर लिया कि वह पूरे चांद की आधी रात को उस से अमराई में मिलेगी. आकाश में पूर्णिमा का चांद हंस रहा था. उस की चांदनी चारों ओर बिखरी हुई थी. ऐसे में रतन सिंह बड़ी बेकरारी से एक पेड़ के तने पर बैठा झुमरी का इंतजार कर रहा था.

झुमरी ने आधी रात को यहीं पर उस से मिलने का वादा किया था, परंतु वह अब तक नहीं आई थी. जैसेजैसे समय बीत रहा था, वैसेवैसे रतन सिंह की बेकरारी बढ़ रही थी. अचानक रतन सिंह को अपने पीछे किसी के खड़े होने की आहट मिली. उस ने पलट कर देखा, तो उस का दिल धक से रह गया. वह झटके से उठ खड़ा हुआ. उस के सामने झुमरी खड़ी थी. उस ने भड़कीले कपड़े पहन रखे थे, जिस से उस की जवानी फटी पड़ रही थी.

जब झुमरी ने रतन सिंह को आंखें फाड़े अपनी ओर देखा पाया, तो उत्तेजक ढंग से अपने होंठों पर जीभ फेरी. उस की इस अदा ने रतन सिंह को और भी बेताब कर दिया.

रतन सिंह ने झटपट झुमरी को अपनी बांहों में समेट लेना चाहा, लेकिन झुमरी छिटक कर दूर हो गई. ‘‘झुमरी, मेरे पास आओ. मेरे तनबदन में आग लगी है, इसे अपने प्यार की बरसात से शांत कर दो,’’ रतन सिंह बेचैन होते हुए बोला.

झुमरी ने इशारे से रतन सिंह को खुद को पकड़ लेने की चुनौती दी. रतन सिंह उस की ओर दौड़ा, तो झुमरी ने भी दौड़ लगा दी. अगले पल हालत यह थी कि झुमरी किसी मस्त हिरनी की तरह भाग रही थी और रतन सिंह उसे पकड़ने के लिए उस के पीछे दौड़ रहा था.

झुमरी अमराई से निकली, फिर बांस के झुरमुट की ओर भागी. वह उस गड्ढे की ओर भाग रही थी, जिसे उस ने कई दिनों की कड़ी मेहनत से तैयार किया था. वह जैसे ही गड्ढे के नजदीक आई, एक लंबी छलांग भरी और गड्ढे की ओर पहुंच गई.

झुमरी के हुस्न में पागल, गड्ढे से अनजान रतन सिंह अचानक गड्ढे में गिर गया. उस के मुंह से घुटीघुटी सी चीख निकली. कुछ देर तक तो रतन सिंह कुछ समझ ही नहीं पाया कि क्या हो गया है. वह बौखलाया हुआ गड्ढे में गिरा इधरउधर झांक रहा था, पर जैसे ही उस के होशोहवास दुरुस्त हुए, वह जोरजोर से झुमरी को मदद के लिए पुकारने लगा. परंतु उधर से कोई मदद नहीं आई.

झुमरी की ओर से निराश रतन सिंह खुद ही गड्ढे से बाहर निकलने की कोशिश करने लगा. उस ने अपने दोनों हाथ ऊपर उठा कर गड्ढे के किनारे को पकड़ना चाहा, परंतु वह उस की पहुंच से दूर था.

रतन सिंह ने उछल कर बाहर निकलने की 2-4 बार नाकाम कोशिश की. आखिरकार वह गड्ढे का छोर पकड़ने में कामयाब हो गया. उस ने अपने बदन को सिकोड़ कर अपना सिर ऊपर उठाया. उस का सिर थोड़ा ऊपर आया, तभी उस की नजर झुमरी पर पड़ी. उस के हाथों में कुदाल थी और उस की आंखों से नफरत की चिनगारियां फूट रही थीं.

इस के पहले कि रतन सिंह कुछ समझता, झुमरी ने कुदाल का भरपूर वार उस के सिर पर किया. रतन सिंह की दिल दहलाने वाली चीख से वह सुनसान इलाका दहल उठा. उस का सिर फट गया था और खून की धारा फूट पड़ी थी. गड्ढे का किनारा रतन सिंह के हाथ से छूट गया और वह गिर पड़ा था.

गड्ढे में गिरते ही रतन सिंह ने अपना सिर थाम लिया. उस की आंखों के आगे अंधेरा छाने लगा था और उस पर बेहोशी छाने लगी थी. उस के दिमाग में एक विचार बिजली की तरह कौंधा कि यह झुमरी का फैलाया हुआ जाल था, जिस में फंसा कर वह उसे मार डालना चाहती है.

तभी रतन सिंह के सिर पर ढेर सारी मिट्टी आ गिरी. उस ने अपनी बंद होती आंखें उठा कर ऊपर की ओर देखा, तो झुमरी टोकरी लिए वहां खड़ी थी. अगले ही पल वह बेहोशी के अंधेरों में गुम होता चला गया.

झुमरी ने मिट्टी से पूरा गड्ढा भर दिया, फिर उस पर पत्तियां डाल कर उठ खड़ी हुई. उस ने सिर उठा कर ऊपर देखा. आकाश में पूर्णिमा का चांद हंस रहा था. थोड़ी देर बाद झुमरी कंधे पर थैला लादे अपने घर को लौट रही थी.

सनी लियोन ने एक बार फिर सोशल मीडिया पर बिखेरा हौटनेस का जलवा

अक्सर अपने हौट फोटोज को लेकर चर्चा में रहने वाली सनी लियोन काफी समय से इस तरह की खबरों से दूरी बना रखी थी. लेकिन एक बार फिर उन्होंने अपना बोल्ड फोटोशूट करवाकर इंटरनेट पर तहलका मचा दिया है.

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सनी ने हाल ही में अपने इंस्टाग्राम पर कुछ ब्लैक एंड वाइट फोटोज शेयर की है. इन फोटोज में सनी एक कुर्सी पर बैठी बेहद ही हौट अंदाज में पोज देती दिख रही हैं. उनका यह हौट अंदाज वाला फोटो सोशल मीडिया पर काफी तेजी से वायरल हो रही है. फैंस सनी की इन फोटोज को जमकर लाइक और शेयर कर रहे हैं. इसके अलावा अब तक उनकी फोटो पर ढेरों कमेंट्स भी आ चुके हैं.

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फोटोज को देखकर यही कहा जा सकता है कि जब बात हौटनेस की आती है तो सनी इसमें काफी माहिर हैं.

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बात करें फिल्मों की तो सनी जल्द ही अपनी बायोपिक फिल्म ‘करणजीत कौर: द अनटोल्ड स्टोरी आफ सनी लियोन’ में नजर आएंगी. इस फिल्म में सनी के पति डेनियल वेबर की भूमिका एक साउथ अफ्रीकन एक्टर निभाने जा रहे हैं. साथ ही सनी के बचपन की भूमिका एक्ट्रेस रायसा सुजानी निभाती हुईं नजर आएंगी. इसी के साथ सनी तमिल फिल्म ‘वीरमादेवी’ से तमिल फिल्म इंडस्ट्री में डेब्यू भी करने जा रही हैं. गौरतलब है कि सनी तीन बच्चों की मां है, जिनमें एक बेटी और दो बेटे शामिल हैं.

संतों के बहाने आदिवासियों को साधने की कोशिश

मध्य प्रदेश में आदिवासियों की तादाद सवा करोड़ से भी ज्यादा है और इन में से अधिकांश राज्य की लाइफलाइन कही जाने वाली नर्मदा नदी के किनारे रहते हैं. कहनेसुनने को तो ये आदिवासी बड़े सरल व सहज हैं पर इन का एक बड़ा ऐब खुद को हिंदू न मानने की जिद है.

पिछले साल फरवरी में आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत आदिवासी बाहुल्य जिले बैतूल गए थे, तो वहां के आदिवासियों ने साफतौर पर सार्वजनिक एतराज यह जताया था कि वे हिंदू किसी भी कीमत पर नहीं हैं, लेकिन संघ से जुड़े लोग आएदिन उन्हें हिंदू बनाने व साबित करने पर उतारू रहते हैं, इसे बरदाश्त नहीं किया जाएगा.

तब आदिवासी संगठनों की अगुआई कर रहे एक आदिवासी शिक्षक कगू सिंह उइके ने इस प्रतिनिधि को बताया था कि आदिवासी हिंदुओं की तरह पाखंडी नहीं हैं और न ही मूर्तिपूजा में भरोसा करते हैं. ऐसे कई उदाहरण इस आदिवासी नेता ने गिनाए थे, जो यह साबित करते हैं कि वाकई आदिवासी हिंदू नहीं हैं, यहां तक की शादी के फेरे भी इस समुदाय में उलटे लिए जाते हैं. इन में शव को दफनाया जाता है, जबकि हिंदू धर्म में शव को जलाए जाने की परंपरा है.

तमाम शिक्षित और जागरूक आदिवासियों को डर यह है कि आरएसएस और भाजपा उन्हें हिंदू करार दे कर उन की मौलिकता खत्म करने की साजिश रच रहे हैं, जिस से आदिवासियों की पहचान खत्म करने में सहूलियत रहे और धर्म व राजनीति में उन का इस्तेमाल किया जा सके. उधर, संघ का दुखड़ा यह है कि ईसाई संगठन आदिवासियों को लालच व सहूलियत दे कर उन्हें अपने धर्म में शामिल कर रहे हैं, जो हिंदुत्व के लिए बड़ा खतरा है.

ये तीनों ही बातें सच हैं और इस बाबत कोई रत्तीभर भी झूठ नहीं बोल रहा है. ईसाई मिशनरियां आजादी के पहले से इन जंगलों में घुस कर जानवरों की सी जिंदगी जी रहे आदिवासियों के लिए स्वास्थ्य व शिक्षा मुहैया कराती रही हैं. अब यह हिंदुओं की कमजोरी या खुदगरजी रही कि वे कभी आदिवासियों के नजदीक नहीं गए, उलटे उन्हें शूद्र व जंगली कह कर दुत्कारते ही रहे. आदिवासी खुद को ईसाई धर्म में ज्यादा सहज और फिट महसूस करते हैं तो इस की कई वजहें भी हैं, एक लंबा ऐतिहासिक व धार्मिक विवाद इन वजहों की वजह है. यह विवाद द्रविड़ों और आर्यों का संघर्ष है, जो अब नएनए तरीकों से सामने आता रहता है. आदिवासी खुद को देश का मूल निवासी और बाकियों को बाहरी मानते हैं.

ये करेंगे कमाल

इस पूरे फसाद में आरएसएस ने कभी या अभी भी हथियार नहीं डाले हैं, इस की ताजी मिसाल हाल ही में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान द्वारा 5 संतों को राज्यमंत्री का दर्जा देना है. चुनावी साल के लिहाज से विवादित और चर्चित ये गैरजरूरी नियुक्तियां निश्चित ही एक जोखिमभरा फैसला है, जो हर किसी को चौंका रहा है और हर कोई अपने स्तर पर कयास भी लगा रहा है.

साधुसंतों को राज्यमंत्री का दर्जा दिए जाने की एक बड़ी वजह यह मानी जा रही है कि इन पांचों ने शिवराज सिंह की चर्चित व विवादित नर्मदा यात्रा से जुड़े घोटाले उजागर करने की धौंस दी थी, इसलिए उन का मुंह बंद करने के लिए शिवराज सिंह के पास यही इकलौता रास्ता बचा था. बात एक हद तक सही भी है कि बीती 28 मार्च को इंदौर के गोम्मटगिरि में संत समुदाय की एक अहम मीटिंग में इस आशय का फैसला ले कर उसे सार्वजनिक भी किया गया था. इन संतों ने ऐलान किया था कि 1 अप्रैल से 15 मई तक वे नर्मदा घोटाला यात्रा निकालेंगे. यह धौंस पूर्वनियोजित इस लिहाज से लग रही है कि भारीभरकम खर्च के अलावा कोई घोटाला हुआ होता तो वह विपक्ष और मीडिया से छिपा नहीं रह पाता.

जिन 5 संतों को राज्यमंत्री का दर्जा दिया गया है उन में सब से बड़ा नाम चौकलेटी चेहरे वाले युवा संत भय्यू महाराज का है, जिन के दरबार में देशभर के दिग्गज नेता आ कर माथा टेकते हैं. दूसरे 4 हैं-कंप्यूटर बाबा, नर्मदानंद, हरिहरानंद और महंत योगेंद्र. इन पांचों में कई बातें समान हैं. मसलन, इन सभी ने कम उम्र में ही खासी दौलत व शोहरत हासिल कर ली है. इन पांचों का सीधा कनैक्शन भगवान से है और अहम बात यह कि इन पांचों का नर्मदा नदी के घाटों और निकटवर्ती इलाकों पर अच्छा दबदबा है, यानी इन का बड़ा भक्तवर्ग यहीं है.

नर्मदा नदी की परिक्रमा अगर कोई करे, तो वह राज्य की 230 विधानसभा सीटों में से 100 की नब्ज टटोल कर बता सकता है कि सियासी बहाव किस पार्टी की तरफ है. अपनी नर्मदा यात्रा के दौरान ही शिवराज सिंह को यह एहसास हो गया था कि उन की इस धार्मिक तामझाम वाली यात्रा में आदिवासियों ने कोई दिलचस्पी नहीं ली है, इस के बाद भी वे संतुष्ट थे कि कुछ आदिवासी तो उन की तरफ झुकेंगे ही.

शिवराज सिंह और आरएसएस का मकसद आदिवासी ही थे और हैं, जो इस बार धार्मिक कारणों के चलते भाजपा से बिदकने लगे हैं. जब बैतूल में मोहन भागवत का विरोध हुआ था, तभी समझने वाले समझ गए थे कि इस दफा आदिवासी इलाकों में भगवा दाल नहीं गलने वाली. लिहाजा, संघ ने भी इन इलाकों से अपनी गतिविधियां समेट ली थीं. राज्य सरकार ने नर्मदा किनारे के इलाकों में पौधारोपण और जलसंरक्षण जैसे उबाऊ मसलों पर जागृति लाने के लिए एक विशेष समिति गठित कर इन पांचों को उस का सदस्य बनाते हुए राज्यमंत्री का दर्जा भी दे डाला, तो किसी को इस की वजह शिवराज सिंह की डोलती नैया लगी, तो किसी को इस फैसले के पीछे उन की सियासी लड़खड़ाहट नजर आई.

संयोग से यह फैसला उस वक्त लिया गया जब सुप्रीम कोर्ट के एससी एसटीएक्ट में बदलाव या ढील के खिलाफ दलितों ने सड़कों पर आ कर विरोध जताया था और देशव्यापी हिंसा में कोई डेढ़ दर्जन लोग मारे गए थे. सर्वाधिक हिंसा और मौतें भी मध्य प्रदेश में ही हुई थीं. दलितों ने अदालत से ज्यादा नरेंद्र मोदी की सरकार को दोषी करार दिया था. ऐसे में पूरी भाजपा थर्रा उठी थी और डैमेज कंट्रोल में जुट गई थी. इस हिंसक प्रदर्शन से एक अहम बात यह भी उजागर हुई थी कि दलितों का भाजपा से मोहभंग हो चुका है.

इन बातों से चिंतित और हैरानपरेशान शिवराज सिंह को सहारा अगर आदिवासी वोटों में दिख रहा है तो उन्होंने उन्हें अपने पाले में खींचने के लिए इन पांडवों को जिम्मेदारी सौंप एक तीर से चार निशाने साधने की कोशिश ही की है.

भाजपा की धर्म की राजनीति से अब आम लोग चिढ़ने लगे हैं, फिर पहले से ही चिढ़े बैठे आदिवासियों को ये संत रिझा पाएंगे, ऐसा लग नहीं रहा. भाजपा के राज में साधुसंतों की मौज ज्यादा रहती है और उन्हें दानदक्षिणा भी ज्यादा मिलती है. अब तो संत मंत्री बन गए हैं, लिहाजा, उन का रुतबाऔर बढ़ा है. अब वे किसी घोटाले की बात नहीं कर रहे और न ही सरकार से मिलने वाली 7,500 रुपए की पगार की उन्हें दरकार है, जो उन का शायद एक मिनट का भी खर्च पूरा न कर पाए.

इन संतों को चाहिए थे अफसरों के झुके सिर और आगेपीछे हिफाजत में लगी पुलिस और यह सब इन्हें मिल रहा है तो वे आदिवासियों को हिंदू होने के फायदे भी समझाएंगे और यह भी बताएंगे कि हनुमान, शबरी, केवट, सुग्रीव और अंगद आदिवासी होते हुए भी रामभक्त थे और कैसे राम ने उन का उद्धार किया था. अब नर्मदा किनारे रोपे गए 6 करोड़ पेड़ गिनने के बजाय नर्मदा के घाटों पर पूजापाठ, यज्ञहवन और आरती व  प्रवचन होंगे, क्योंकि इन संतों का तो पेशा ही यही है. लपेटे में अगर आया तो वह गरीब आदिवासी होगा, जो हिंदू धर्म के कर्मकांडों और पाखंडों का न तो आदी है, न ही पहले कभी इस से सहमत हुआ था.

ऐसे खुली संतों की पोल

अपने भक्तों को लोभ, मोह, व्यभिचार और ईर्ष्या से दूर रहने के उपदेश पिलाते रहने वाले संतसाधु खुद कैसे इन दुर्गुणों की गिरफ्त में रहते हैं, यह 5 संतों को राज्यमंत्री का दर्जा दिए जाने के बाद तुरंत साबित हो गया. 5 अप्रैल को भोपाल में प्रदेशभर के साधुसंत इकट्ठा हुए और जम कर नए संत मंत्रियों को लताड़ते नजर आए.

साधुसंतों की सर्वोगा संस्था अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद ने संतों को मंत्री का दर्जा दिए जाने पर विरोध जताते तरहतरह की बातें कहीं. मसलन, साधुसंतों का दर्जा तो मंत्री से कहीं ऊपर होता है, उन्हें सरकारी प्रलोभनों में नहीं आना चाहिए, इस से समाज में साधुसंतों का सम्मान घटेगा.

दरअसल, विरोध प्रदर्शन कर रहे ये साधु खुद इस चिढ़ और ईर्ष्या का शिकार थे कि उन्हें क्यों मंत्री नहीं बनाया गया. उधर, मंत्री बने बाबा लोग भी ऊटपटांग हरकतें करते अपनी खुशी जताते रहे. कंप्यूटर बाबा सरकारी रैस्ट हाउस की छत पर धूनी रमा कर लोगों का ध्यान खींचने में लगे रहे तो एक और संत नर्मदानंद ने दावा कर डाला कि उन के यज्ञ के चलते ही भाजपा सत्ता में आ पाई थी और इस बार भी वे यज्ञ करेंगे.

दोफाड़ हो गए बाबाओं ने तो खूब धमाल किया, लेकिन मुख्यंत्री शिवराज सिंह इस बेहूदे फैसले को ले कर दिक्कतों से घिरते नजर आ रहे हैं. एक नागरिक रामबहादर वर्मा द्वारा दायर याचिका पर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने उन से इस बाबत सफाई मांगी तो 12 अप्रैल को आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने भी उन्हें नागपुर तलब कर खूब लताड़ लगाई कि साधुसंतों को सड़कों पर क्यों आना पड़ा.

शिवराज सिंह चौहान वाकई बधाई के पात्र हैं जिन्होंने साधुसंतों की पोल खोलने में अंजाने में ही सही, सटीक भूमिका निभाई. हालांकि मंत्री दर्जा न मिलने से खफा साधुसंत खुलेआम उन का और भाजपा का विरोध करने लगे हैं और कांग्रेस भी इन व्यथित व बेचैन संतों की महत्त्वाकांक्षाओं को खूब हवा दे रही है.

अच्छा तो यह होता कि सभी साधुसंतों को राज्यमंत्री का दर्जा दे दिया जाता. इस से सर्वधर्म समभाव का राग अलापने वाले साधुसंतों में आपस में फूट नहीं पड़ती. सरकारी खजाने पर जरूर बोझ पड़ता, जिसे आम भक्तों से वसूला जाना हर्ज की बात नहीं जो वैसे ही साधुसंतों को चढ़ावा देदे कर उन्हें करोड़पति बना चुके हैं. जल्दबाजी में शिवराज सिंह को यह ध्यान नहीं रहा कि एकाध दलित संत को भी यह दर्जा दे देते तो शायद नाराज दलितवर्ग उन की तरफ झुकता.

देखना दिलचस्प होगा कि 5 संतों के आशीर्वाद पर सौपचास संतों का श्राप भारी पड़ता है या नहीं.

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