स्कूल में बच्चों के ऊपर भाषा थोपना गलत

उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार नर्सरी से सभी सरकारी स्कूलों में अंगरेजी पढ़ाएगी तो केरल की वामपंथी सरकार निजी व सरकारी सभी स्कूलों में  10वीं तक मलयालम अनिवार्य कर रही है. अपनीअपनी खप्ती सोच पर जो नियम लागू किए जा रहे हैं उन का मातापिता या बच्चों पर क्या प्रभाव पड़ेगा, यह दोनों सरकारें जानने की भी इच्छुक नहीं हैं. अंगरेजी काम की भाषा है पर यह तो पक्का कर लें कि आखिर कितने लोग सही अंगरेजी पढ़, बोल और लिख पाते हैं? देश के प्राइवेट स्कूलों से निकले ज्यादातर बच्चे भी अंगरेजी में फिसड्डी रहते हैं, क्योंकि उन्हें अंगरेजी का ज्ञान कम ही होता है और रोजमर्रा की भाषा में चूंकि हिंदी व्याकरण का इस्तेमाल होता है, अंगरेजी के शब्दों या छोटे वाक्यों से काम चलाया जाता है.

अंगरेजी पढ़ कर देश का विकास हो जाएगा यह ऐसी ही मूर्खता है जैसे कहना कि संस्कृत पढ़ने से संस्कार सुधर जाएंगे. अमेरिका के अश्वेत, ब्लैक, लैटिनो अंगरेजी पढ़ते और बोलते हैं पर उन का आर्थिक स्तर बहुत कम है. वे अमेरिका की प्रगति का लाभ भी सिर्फ अंगरेजी जान कर न उठा पाए. अंगरेजी का ज्ञान होना विश्व के कितने ही और देशों में काफी फैला है पर विकास वहां न के बराबर है, क्योंकि उन के लिए अंगरेजी ऐसी ही है जैसे उत्तर भारतीयों के लिए हिंदी.

अंगरेजी के अल्फाबेट आना और छोटे वाक्यों का समझ आ जाना गलत नहीं है और अंगरेजी पढ़ाना इस दृष्टि से गलत नहीं है क्योंकि कंप्यूटर की भाषा अंगरेजी ही है और अब इसे कोई हटा नहीं सकता, पर अंगरेजी लिखनेपढ़ने या ज्ञान प्राप्त करने का सहारा नहीं बन सकती.

अगर सरकारें भाषा थोपेंगी तो यह गलत होगा. भाषा के मामले में सरकार को उदार होना चाहिए. हां, भाषा वर्ण या वर्ग व्यवस्था का जरिया न बने, कम से कम सरकार को यह खयाल रखना चाहिए. आज सरकार अधिकांश आदेश अंगरेजी या संस्कृतनिष्ठ हिंदी में जारी करती है जो ज्यादातर के पल्ले नहीं पड़ते. सरकार अंगरेजी विज्ञापनों पर ज्यादा महत्त्व देती है. हिंदी को जो स्थान मिला है वह उत्तर प्रदेश में न तो अंगरेजी पढ़ाने से कम होगा और न ही केरल में मलयालम पढ़ाने से मलयालम का स्थान और ऊंचा हो जाएगा. भाषा विचार और भाव प्रकट करने के लिए होती है और किसी भी एक या 2 भाषाओं पर महारत अच्छी है पर यह फैसला सरकारें न करें.

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‘धर्म’ और ‘सहानुभूति’ के सहारे भाजपा

गोरखपुर और फूलपुर में लोकसभा के उपचुनाव में हार के बाद भाजपा कैराना और नूरपुर को हल्के में नहीं लेना चाहती. दूसरी तरफ विपक्ष ने भाजपा की घेराबंदी करने का फैसला लिया है. अगर नूरपुर और कैराना में भाजपा को मात मिलती है तो 2019 के लोकसभा चुनाव में विपक्ष के एकजुट होने का रास्ता साफ हो जायेगा.

भाजपा को घेरने के लिये सपा-बसपा के साथ लोकदल खुल कर मैदान में है. कांग्रेस ने अभी अपने पत्ते नहीं खोले है पर विपक्षी एकता की हिमायती वह भी है. ऐसे में कैराना और नूरपुर को जीतना भाजपा के लिये सरल नहीं होगा. विपक्ष की घेराबंदी को तोड़ने के लिये भाजपा ने ‘धर्म’ और ‘सहानुभूति’ का सहारा लेने का फैसला किया है.

कैराना लोकसभा सीट भाजपा के सांसद हुकुम सिंह की मृत्यु के कारण रिक्त हुई है. भाजपा यहां से हुकुम सिह की बेटी मृगांका सिंह को टिकट दे रही है. नूरपुर विधानसभा की सीट विधायक लोकेन्द्र सिंह की सड़क दुर्घटना में मृत्यु के कारण खाली हुई है. लोकेन्द्र सिंह की मृत्यु सड़क दुर्घटना में हुई थी. उस समय वह नूरपूर से लखनऊ इंवेस्टर मीट में हिस्सा लेने जा रहे थे. लोकेन्द्र सिंह 2012 और 2017 में विधायक का चुनाव जीते थे. भाजपा अब वहां से लोकेन्द्र की पत्नी अवनी को चुनाव लड़ाने जा रही है.

असल में विपक्षी एकता से भाजपा के तोते उड़े हुये हैं. उसे फूलपुर और गोरखपुर की हार दिखाई दे रही है. ऐसे में भाजपा ने ‘सहानुभूति’ के साथ ही साथ ‘धर्म’ का सहारा लेने के लिये अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में जिन्ना की तस्वीर को लेकर विवाद को भड़का दिया. पश्चिम उत्तर प्रदेश में धर्म के नाम पर वोट पड़ते रहे हैं. भाजपा विपक्षी एकता की काट के लिये धर्म का सहारा लेने की योजना में है.

कैराना से समाजवादी पार्टी की तबस्सुम लोकदल के टिकट पर चुनाव लड़ेगी. नूरपुर से सपा नईमूल हसन चुनाव लड़ेंगे. सपा के नेता अखिलेश यादव और लोकदल के नेता जयंत चैधरी ने आपसी तालमेल से चुनाव लड़ने का फैसला किया है. बसपा यहां सपा और लोकदल के साथ है. कैराना में 2014 में जब हुकुम सिंह चुनाव जीते थे तो मोदी की लहर चल रही थी. उस समय भाजपा के हुकुम सिंह को 50 फीसदी वोट मिले थे. सपा को 29 फीसदी, बसपा को 14 फीसदी और लोकदल को 3 फीसदी वोट मिले थे. हुकुम सिंह का भाजपा के अलावा दूसरे वोट बैंक पर भी प्रभाव था. इसके बाद मोदी लहर का असर था.

हुकुम सिंह की बेटी मृगांका सिंह का क्षेत्र में कोई बहुत प्रभाव नहीं है. 2014 जैसी मोदी लहर भी नहीं है. ऐसे में कैराना जीतना भाजपा के लिये सरल नहीं होगा. भाजपा के लिये सबसे कड़ी चुनौती विपक्षी एकता भी है. ऐसे में केवल सहानुभूति लहर के बल पर चुनाव जीतना सरल नहीं है. कैराना जैसी हालत नूरपुर में भी है. वहां से 2 बार विधायक रहे लोकेन्द्र सिंह की पत्नी अवनी के लिये चुनाव जीतना सरल नहीं होगा. ‘मोदी-योगी’ की चमक गायब है. अवनी सिंह नेता नहीं हैं, ऐसे में केवल सहानुभूति लहर से जीत नहीं हासिल होने वाली.

विकास की बात करने वाली भाजपा अब अलीगढ़ के जिन्ना मुद्दे को उठा कर पश्चिम उत्तर प्रदेश का चुनाव जीतना चाहती है. 31 मई को कैराना और नूरपुर का चुनाव परिणाम आयेगा. इस बीच कर्नाटक विधानसभा चुनाव के परिणाम सामने होंगे. ऐसे में अगर कर्नाटक में भाजपा को जीत मिलती है तो उसका असर उत्तर प्रदेश के कैराना और नूरपुर उपचुनाव पर पड़ सकता है. अगर भाजपा कैराना और नूरपुर हारती है तो उत्तर प्रदेश में उसकी उखडती जड़ों पर मोहर लग जायेगी. 2019 में उसे आधी सीटे जीतना भी मुश्किल हो जायेगा.

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926 करोड़ की डकैती, जो हो नहीं पाई

पुलिस कांस्टेबल सीताराम की जयपुर की सी स्कीम के रमेश मार्ग स्थित एक्सिस बैंक की चेस्ट ब्रांच में ड्यूटी थी. 5 फरवरी की रात करीब 2 बजे वह बैंक की चेस्ट ब्रांच पर पहुंच गया. सीताराम जब पहुंचा तो बैंक का निजी सुरक्षा गार्ड प्रमोद मेनगेट पर तैनात था. सीताराम को आया देख कर प्रमोद ने उसे नमस्कार किया. सीताराम ने भी उस के अभिवादन का जवाब देते हुए पूछा, ‘‘प्रमोदजी, बैंक के अंदर आज ड्यूटी पर कौनकौन हैं?’’

कड़ाके की ठंड में रात में बैंक के बाहर ड्यूटी दे रहे प्रमोद ने जवाब में कहा, ‘‘साहब, रतिराम और मानसिंह ड्यूटी पर हैं.’’

‘‘ठीक है प्रमोदजी, उन दोनों से मेरी अच्छी पटरी बैठती है.’’ सीताराम ने अपनी टोपी सिर पर लगाते हुए कहा, ‘‘दोनों से बात करते हुए पता ही नहीं लगता कि कब रात गुजर गई.’’

कह कर कांस्टेबल सीताराम बैंक के अंदर जाने लगा, तभी जैसे उसे कुछ याद आया. उस ने पलट कर प्रमोद से कहा, ‘‘भैयाजी, ठंड ज्यादा पड़ रही है. रात का समय है. संभल कर होशियारी से ड्यूटी करना.’’

सीताराम की इस बात पर प्रमोद ने हंसते हुए कहा, ‘‘भाईसाहब, आप देखते ही हो कि मैं अपनी ड्यूटी पर किस तरह मुस्तैद रहता हूं.’’

प्रमोद की बात सुन सीताराम हंसते हुए अंदर बैंक में चला गया.

सीताराम ने बैंक के अंदर पहुंच कर देखा तो उस के साथी पुलिसकर्मी रतिराम और मानसिंह रेस्टहाउस में थे. सीताराम ने अपनी बंदूक संभाली और ड्यूटी पर खड़ा हो गया.

सीताराम को बैंक के अंदर आए हुए करीब आधा घंटा ही हुआ होगा कि उस ने बैंक के बाहर मेनगेट से किसी के कूद कर आने और कुछ टूटने जैसी आवाज सुनी. सीताराम चौंकन्ना हो गया. वह बैंक के अंदर बनी खिड़की से मुंह बाहर निकाल कर चिल्लाया, ‘‘कौन है?’’

सीताराम के चिल्लाने पर जवाब में कोई आवाज नहीं आई तो उस ने बाहर झांक कर देखा. उसे 4-5 लोग नजर आए. रात करीब ढाई बजे बैंक के अंदर लोगों को देख कर सीताराम एक बार तो घबरा गया, लेकिन तुरंत ही उस ने खुद को संभाला और हिम्मत से काम लेते हुए बंदूक ले कर थोड़ा बाहर तक आया.

बाहर देखा तो उसे 10 से भी ज्यादा लोग नजर आए. उन के हाथों में हथियार थे. किसी ने रूमाल से तो किसी ने मंकी कैप से और किसी ने मफलर से चेहरे ढंक रखे थे. इन में से 4-5 लोग बैंक का मेनगेट फांद कर अंदर आ गए थे. इन्होंने बैंक की बिल्डिंग का चैनल गेट भी खोल लिया था.

इतने सारे हथियारबंद लोगों को देख कर सीताराम समझ गया कि उन लोगों के इरादे ठीक नहीं हैं. वे बदमाश हैं और बैंक लूटने आए हैं. सीताराम ने इधरउधर देखा कि बैंक का गार्ड प्रमोद कहीं नजर आ जाए, लेकिन उसे वह कहीं नजर नहीं आया. सीताराम को लगा कि इन बदमाशों को नहीं रोका गया तो ये लोग बैंक लूट ले जाएंगे और हो सकता है किसी को मार भी डालें.

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सीताराम का समय पर लिया गया निर्णय सही साबित हुआ

सीताराम ने एक पल सोचा कि अंदर रेस्टहाउस से अपने साथी पुलिसकर्मियों रतिराम व मानसिंह को बुलाने जाए या नहीं. इतना समय नहीं था. अगर वह साथी पुलिसकर्मियों को बुलाने जाता तो हो सकता था तब तक बदमाश बैंक के अंदर चेस्टरूम तक पहुंच जाते. सीताराम ने तुरंत फैसला लिया. उस ने बदमाशों को ललकारा और अपनी बंदूक से हवाई फायर कर दिया.

फायर होते ही बदमाश हड़बड़ा गए और तेजी से मेनगेट फांद कर वापस भागने लगे. उन के साथी जो बैंक के बाहर खड़े थे, वे भी फटाफट वहां खड़ी गाड़ी में बैठ गए. इस के बाद सभी बदमाश गाड़ी से भाग गए.

बदमाशों के भागने पर सीताराम बैंक की बिल्डिंग से बाहर निकला तो देखा बाहर ड्यूटी पर तैनात बैंक के गार्ड प्रमोद के हाथपैर बंधे हुए थे. सीताराम ने उस के हाथपैर खोले. प्रमोद  बेहद घबराया हुआ था. वह सीताराम से लिपट कर बोला, ‘‘भाईसाहब, आज तो आप ने हमारी जान बचा ली वरना वे बदमाश हमें मार सकते थे.’’

सीताराम ने उसे ढांढस बंधाते हुए कहा कि चिंता मत करो, जो बदमाश आए थे, वे भाग गए हैं. तब तक हवाई फायर की आवाज सुन कर बैंक के रेस्टहाउस से पुलिसकर्मी रतिराम व मानसिंह भी वहां आ गए.

यह सारा घटनाक्रम मुश्किल से 3 मिनट में हो गया था. कांस्टेबल सीताराम ने सब से पहले फोन कर के पुलिस कंट्रोल रूम को सूचना दी. सूचना देने के 5-7 मिनट में ही पुलिस गश्ती दल बैंक के बाहर पहुंच गया.

पुलिस के गश्ती दल ने बैंक के निजी सुरक्षा गार्ड प्रमोद कुमार से पूछताछ की. करौली के रहने वाले प्रमोद ने बताया कि एक्सिस बैंक प्रशासन ने उसे बाहरी हिस्से में सुरक्षा की जिम्मेदारी दे रखी है.

प्रमोद ने पुलिस को बताया कि रात करीब ढाई बजे वह बैंक के बाहरी हिस्से में राउंड ले रहा था. जब वह पीछे की ओर चैकिंग करने गया था, तभी बैंक के आगे वाले हिस्से के गेट से किसी के कूदने की आवाज आई. इस पर वह मेनगेट की तरफ आया तो देखा कि 2 युवकों ने मुंह पर नकाब पहना हुआ था और उन के हाथों में पिस्तौलें थीं.

मैं उन्हें रोक ही रहा था कि 3 और युवक मेनगेट से बैंक के अंदर आ गए. उन लोगों ने पिस्तौल कनपटी पर लगा कर मुझे पकड़ कर नीचे गिरा दिया. मुझ से चाबी छीन ली, उसी चाबी से एक युवक ने चेस्ट ब्रांच के गेट से पहले वाले चैनल गेट का ताला खोल लिया. एक युवक ने मेरा मुंह बंद कर दिया और 2 युवक मेरे ऊपर बैठ गए. बाकी बचे एक युवक ने मेरे हाथ बांध दिए.

वे मेरे पैर बांध रहे थे, तभी बैंक के अंदर से सीताराम के चिल्लाने की आवाज आई. इस पर बदमाश घबरा गए. इस के कुछ सैकेंड बाद ही गोली चलने की आवाज सुनाई दी. गोली चलने की आवाज सुन कर सभी बदमाश बैंक के गेट को फांद कर बाहर भाग गए. प्रमोद ने बताया कि जो बदमाश बैंक के अंदर घुसे थे, उन्होंने आपस में कोई बात नहीं की थी. फायरिंग की आवाज सुन कर सिर्फ इतना कहा कि भागो यहां से. इस के बाद सीताराम ने आ कर मुझे संभाला और पुलिस को सूचना दी.

926 करोड़ रुपए थे लुटेरों के निशाने पर

रात को ही एक्सिस बैंक के अफसरों को मौके पर बुलाया गया. राजधानी जयपुर में बैंक लूटने के प्रयास की सूचना मिलने पर जयपुर पुलिस कमिश्नरेट के आला अफसर रात को ही मौके पर पहुंच गए. बैंक के अफसरों ने बताया कि राजस्थान में एक्सिस बैंक की सभी शाखाओं में इसी चेस्ट ब्रांच से पैसा जाता है.

पूरे राज्य से जमा हो कर पैसा भी इसी चेस्ट ब्रांच में आता है. बैंक अफसरों से पुलिस अधिकारियों को पता चला कि इस चेस्ट ब्रांच में वारदात के समय 926 करोड़ रुपए रखे हुए थे. इतनी बड़ी रकम की बात सुन कर पुलिस अफसर हैरान रह गए.

अगर पुलिस कांस्टेबल सीताराम हिम्मत दिखा कर गोली नहीं चलाता तो शायद बदमाश बैंक लूटने में कामयाब हो जाते. अगर यह बैंक लुट जाती तो यह भारत की अब तक की सब से बड़ी बैंक डकैती होती. सीताराम के गोली चलाने से यह बैंक डकैती होने से बच गई थी.

कांस्टेबल सीताराम की ओर से बदमाशों को ललकारने के लिए चलाई गई गोली बैंक के सामने बाईं ओर एक मकान की खिड़की में जा कर लगी. गोली लगने से खिड़की का कांच टूटा तो मकान मालिक और उन के परिवार की नींद खुल गई. उन्होंने बाहर आ कर पता किया तो बैंक में डकैती के प्रयास का पता चला. तब तक पुलिस भी मौके पर पहुंच गई थी.

पुलिस ने रात को जयपुर से बाहर निकलने वाले सभी रास्तों पर कड़ी नाकेबंदी करवा दी. 6 फरवरी को कांस्टेबल सीताराम की रिपोर्ट के आधार पर जयपुर के अशोक नगर थाने में मुकदमा दर्ज कर लिया गया.

6 फरवरी को सुबह से पुलिस और एक्सिस बैंक के आला अफसरों का मौके पर जमावड़ा लगा रहा. जयपुर के पुलिस कमिश्नर संजय अग्रवाल ने भी मौके पर पहुंच कर बैंक के सुरक्षा इंतजामों के बारे में जानकारी ली. पुलिस को जांचपड़ताल के दौरान 4 बड़े खाली कट्टे (बोरी) मिले. ये कट्टे बदमाश अपने साथ लाए थे, लेकिन गोली की आवाज सुन कर भागते समय छोड़ गए.

बदमाशों का पता लगाने के लिए पुलिस ने बैंक के अंदरबाहर और आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज देखी तो पता चला कि बदमाश 7 सीटर इनोवा गाड़ी से आए थे. इस गाड़ी से 11 बदमाश बाहर निकले और 2 बदमाश अंदर ही बैठे रहे. बाहर निकले सभी बदमाशों के चेहरे ढंके हुए थे. इन में से 4-5 बदमाशों के हाथ में पिस्तौल और बाकी के हाथों में डंडे और सरिए थे. इस इनोवा का नंबर तो साफ दिखाई नहीं दे रहा था, लेकिन राजस्थान के नागौर जिले की नंबर सीरीज जरूर नजर आ रही थी.

पुलिस की जांच में पता चला कि बैंक की इस चेस्ट ब्रांच में लिमिट से करीब 3 सौ करोड़ रुपए ज्यादा रखे हुए थे. नियमानुसार बैंक को यह राशि रिजर्व बैंक में जमा करानी चाहिए थी. यह बात सामने आने पर करेंसी चेस्ट में सुरक्षा मापदंडों को ले कर चूक और लिमिट से ज्यादा कैश रखने के मामले में रिजर्व बैंक के महाप्रबंधक करेंसी पी.के. जैन ने एक्सिस बैंक से रिपोर्ट मांगी.

बहरहाल, एक्सिस बैंक में देश की सब से बड़ी डकैती टल गई थी. कांस्टेबल सीताराम की सूझबूझ से बदमाशों को भागना पड़ा. सीताराम जयपुर का हीरो बन गया था. सीताराम की सतर्कता और बहादुरी से 926 करोड़ रुपए की बैंक डकैती टल जाने पर जयपुर पुलिस कमिश्नर संजय अग्रवाल ने राजस्थान के पुलिस महानिदेशक ओ.पी. गल्होत्रा से बात की और कांस्टेबल सीताराम को पुरस्कृत करने की सिफारिश की.

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पुलिस के लिए आसान नहीं था लुटेरों का सुराग ढूंढना

डकैती तो टल गई थी, लेकिन जयपुर पुलिस के लिए बैंक में घुसने वाले बदमाशों का पता लगाना सब से पहली चुनौती थी. इस के लिए पुलिस कमिश्नर संजय अग्रवाल ने अपने मातहत अधिकारियों की मीटिंग कर के वारदात के लिए आए बदमाशों का पता लगाने को कहा.

विचारविमर्श में यह बात सामने आई कि 7 सीटर इनोवा में 13 लोगों का बैठना आसान नहीं है. इस का मतलब बदमाशों के पास कोई दूसरा वाहन भी रहा होगा, लेकिन सीसीटीवी फुटेज में दूसरा वाहन नजर नहीं आ रहा था. इनोवा गाड़ी भी चोरी की होने या उस पर फरजी नंबर प्लेट होने की आशंका थी. इस बात पर भी विचार किया गया कि बैंक में वारदात करने से पहले बदमाशों ने रैकी जरूर की होगी. अगर उन्होंने रैकी की थी तो उन्हें इस बात का पता रहा होगा कि बैंक की इस चेस्ट ब्रांच में 3-4 पुलिसकर्मी हमेशा मौजूद रहते हैं.

एक सवाल यह भी उठा कि बदमाशों की संख्या करीब 13 थी और उन में 4-5 के पास पिस्तौल भी थी तो वे केवल एक गोली चलने से घबरा क्यों गए? बैंक में डकैती डालने की हिम्मत करने वाले बदमाश डर कर भागने के बजाय मरनेमारने पर उतारू हो जाते हैं. इस से संदेह हुआ कि बदमाश कहीं नौसिखिया तो नहीं थे. इस के अलावा बदमाशों को इस बात का अंदाजा नहीं था कि बैंक में 926 करोड़ रुपए होंगे.

पुलिस ने वारदात की जानकारी मिलने के तुरंत बाद जयपुर से बाहर निकलने वाले रास्तों पर नाकेबंदी कर दी थी. फिर भी बदमाशों का कोई सुराग नहीं मिला था. इस से यह बात भी उठी कि बदमाश जयपुर शहर के ही रहने वाले तो नहीं हैं.

पचासों तरह के सवालों का हल खोजने के लिए पुलिस कमिश्नर ने 4 आईपीएस अधिकारियों के सुपरविजन में एक दर्जन टीमें गठित कीं. इन टीमों में सौ से ज्यादा पुलिसकर्मियों को शामिल किया गया. अलगअलग टीमों को अलग जिम्मेदारियां सौंपी गईं.

पुलिस टीमों ने मुख्य रूप से बैंक कर्मचारियों और वहां तैनात गार्डों से पूछताछ, बैंक से रुपए लाने ले जाने वाली 3 निजी सिक्योरिटी एजेंसियों के मौजूदा और पुराने कर्मचारियों से पूछताछ, जयपुर से निकलने वाले रास्तों पर स्थित टोल नाकों पर सीसीटीवी फुटेज, जयपुर के आसपास हाइवे और कस्बों में स्थित होटल, ढाबों पर हुलिए के आधार पर बदमाशों की जानकारी हासिल करने, इस तरह की वारदात करने वाले गिरोहों की जानकारी जुटाने आदि बिंदुओं पर अपनी जांचपड़ताल शुरू की.

दूसरी ओर, पुलिस कमिश्नर ने रिजर्व बैंक में जयपुर के सभी पब्लिक सैक्टर और निजी सैक्टर के बैंक अधिकारियों, रिजर्व बैंक के अधिकारियों और गोल्ड लोन देने वाली कंपनियों के प्रतिनिधियों के साथ बैठक की. इस मीटिंग में पुलिस कमिश्नर ने कहा कि सभी बैंक सुरक्षा व्यवस्था के बारे में रिजर्व बैंक की गाइडलाइन का पूरी तरह पालन करें.

इस के अलावा उन्होंने सुरक्षा के खास प्रबंधों के साथसाथ अलार्म और हौटलाइन की आवश्यक व्यवस्था करने को भी कहा. कैश लाने ले जाने से पहले मौकड्रिल करने की भी बात की. उन्होंने राय दी कि बैंक के सीसीटीवी कैमरे अपग्रेड किए जाएं, जिन में कम से कम 90 दिन का बैकअप होना चाहिए. अलार्म सिस्टम भी जरूर लगाए जाएं.

हताशा में आशा की किरण नजर आई पुलिस को

वारदात के दूसरे दिन पुलिस के अधिकारी और जवान सभी बिंदुओं पर विचार कर जांचपड़ताल करते रहे, लेकिन यह भी पता नहीं चल सका कि बदमाश किस रास्ते से वापस गए. दूसरे और तीसरे दिन भी पुलिस को बदमाशों के बारे में कोई महत्त्वपूर्ण सुराग हाथ नहीं लगा. इस बीच जयपुर से पुलिस की टीमें नागौर, पाली, अजमेर, भीलवाड़ा, सीकर व झुंझुनूं आदि जिलों में गईं और संदिग्ध बदमाशों की तलाश की.

9 फरवरी को जयपुर पुलिस को इस मामले में उम्मीद की कुछ किरणें नजर आईं. कई जगह फुटेज में नजर आया कि बदमाशों की इनोवा गाड़ी के पीछे वाली बाईं ओर की लाइट टूटी हुई थी. इसी वजह से गाड़ी चलने पर यह लाइट नहीं जलती थी. इसी आधार पर पुलिस जयपुर से अजमेर की ओर टोल नाकों पर ऐसी इनोवा कार की तलाश में जुटी रही.

इसी दिशा में पुलिस आगे बढ़ी तो पता चला कि दूदू के पास एक बार के बाहर इनोवा कार रुकी थी. वहां लगे सीसीटीवी कैमरों में कुछ लोगों की तसवीर आ गई थी. इन लोगों ने कानों में सोने की मुर्की पहन रखी थीं. चेहरे भी ढंके हुए नहीं थे. इस से यह अंदाजा लगाया गया कि बदमाश जोधपुर-पाली की तरफ के हो सकते हैं. दूदू में होटल पर रुकने के बाद यह गाड़ी ब्यावर की ओर चली गई थी.

इसी बीच जांचपड़ताल में पता चला कि एक्सिस बैंक में बदमाश जो कट्टे छोड़ गए थे, वे पाली जिले की रायपुर तहसील के बर गांव में एक दुकान से खरीदे गए थे. इन कट्टों पर बर गांव की परचून की दुकान का नाम लिखा था. पुलिस उस दुकानदार तक पहुंची. हालांकि दुकानदार से बदमाशों के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली, लेकिन इस से यह अंदाजा जरूर लग गया कि बदमाशों का पाली जिले से कोई न कोई संबंध जरूर था.

पुलिस को बदमाशों की इनोवा कार की लोकेशन ब्यावर तक मिल गई थी. इस बीच महाराष्ट्र के नंबरों का पता चलने पर एक पुलिस टीम महाराष्ट्र भेजी गई. ब्यावर से पुलिस टीम सीसीटीवी फुटेज के आधार पर इनोवा कार का पीछा करते हुए जोधपुर तक पहुंच गई.

10 फरवरी को पाली जिले की पुलिस को कुछ जानकारियां मिलीं. इस के अगले  दिन 11 फरवरी को जोधपुर पुलिस कमिश्नरेट के महामंदिर थानाप्रभारी सीताराम को सूचना मिली कि जोधपुर के कुछ बदमाश कहीं बाहर कोई बड़ी वारदात कर के आए हैं.

आखिर पकड़ में आ ही गए लुटेरे

इस पर जोधपुर पुलिस की एक टीम बदमाशों की तलाश में जुटी और शाम तक 6 बदमाशों प्रकाश जटिया, पवन जटिया, धर्मेंद्र जटिया, जयप्रकाश जटिया, दिनेश लुहार और प्रमोद बिश्नोई को पकड़ लिया. ये छहों लोग जोधपुर के रहने वाले थे. जोधपुर पुलिस कमिश्नर अशोक कुमार राठौड़ ने इस की सूचना जयपुर पुलिस कमिश्नर संजय अग्रवाल को दी. इस पर जयपुर से एक टीम रवाना हो कर रात को ही जोधपुर पहुंच गई.

पकड़े गए 6 बदमाशों से बाकी लुटेरों का भी पता चल गया. जयपुर व जोधपुर पुलिस उन की तलाश में जुट गई. 12 फरवरी को पुलिस ने 2 और बदमाशों को पकड़ लिया. इन में अनूप बिश्नोई को जोधपुर के बनाड इलाके से पकड़ा गया, जबकि झुंझुनूं के बदमाश विकास चौधरी को जैसलमेर से गिरफ्तार किया गया. विकास चौधरी आजकल जैसलमेर के शिकारगढ़ इलाके में रह रहा था.

लादेन था गिरोह का सरगना

इन बदमाशों से की गई पूछताछ में सामने आया कि लूट की योजना जोधपुर के ओसियां  के सिरमंडी निवासी हनुमान बिश्नोई उर्फ लादेन ने बनाई थी. लादेन ही इस गिरोह का सरगना है. लादेन ने जयपुर में एक्सिस बैंक की चेस्ट ब्रांच की रैकी कर रखी थी. तिजोरी के ताले तोड़ने के लिए उस ने प्रमोद बिश्नोई के सहयोग से जोधपुर की जटिया कालोनी के रहने वाले प्रकाश, पवन, धर्मेंद्र व जयप्रकाश को तैयार किया था.

तिजोरी तोड़ने के लिए ये बदमाश जोधपुर से ही औजार ले कर चले थे. हनुमान उर्फ लादेन इस योजना में प्रकाश बिश्नोई से बराबर का हिस्सा मांग कर पार्टनर बना था. बाकी बदमाशों को 20 हजार से 10 लाख रुपए तक का लालच दिया गया था. लादेन और प्रकाश ने अपने भाड़े के साथियों को यह नहीं बताया था कि जयपुर में बैंक लूटने जाना है. उन्हें बताया गया था कि जयपुर में हवाला की रकम लूटनी है.

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5 फरवरी को लादेन के नेतृत्व में 15 बदमाश जोधपुर से 2 गाडि़यों में सवार हो कर जयपुर के लिए चले. उन्होंने रास्ते में जयपुर-अजमेर के बीच दूदू के पास एक गाड़ी छोड़ दी. इनोवा गाड़ी से सभी बदमाश उसी रात जयपुर पहुंचे और एक्सिस बैंक की चेस्ट ब्रांच पर धावा बोल दिया. बैंक में तैनात पुलिस कांस्टेबल के गोली चलाने से सभी बदमाश डर कर भाग निकले थे.

प्रकाश बिश्नोई जनवरी 2014 में राइकाबाग में रोडवेज बस स्टैंड पर रात्रि गश्त कर रहे पुलिस के एक एएसआई राजेश मीणा की हत्या का भी अभियुक्त था. पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर जेल भेज दिया था. घटना के समय वह जमानत पर छूटा हुआ था.

पुलिस को लादेन के अन्य साथियों के नामपता चल गए हैं. कथा लिखे जाने तक जयपुर व जोधपुर पुलिस उस की तलाश में जुटी थी. गिरफ्तार किए गए आठों बदमाशों को पुलिस जोधपुर से जयपुर ले आई. बदमाशों से उन के साथियों और आपराधिक वारदातों के बारे में पूछताछ की गई.

सीताराम को किया गया सम्मानित

एक्सिस बैंक में लूट के प्रयास के दौरान उपयोग किए गए हथियारों के बारे में भी पता लगाया गया. गिरफ्तार व फरार बदमाशों का आपराधिक रिकौर्ड भी खंगाला गया. यह भी पता लगाया गया कि इस वारदात में बैंक के किसी नएपुराने कर्मचारी का सहयोग तो नहीं था.

देश की सब से बड़ी बैंक लूट की वारदात को विफल करने का हीरो कांस्टेबल सीताराम ही रहा. हालांकि जयपुर पुलिस ने वैज्ञानिक तरीकों से जांचपड़ताल के जरिए बदमाशों को पकड़ कर अपनी साख जरूर बचा ली.

यह भी दिलचस्प रहा कि 11 फरवरी को जोधपुर में जब 6 बदमाश पकड़े जा रहे थे, उसी समय जयपुर में राजस्थान के पुलिस महानिदेशक ओ.पी. गल्होत्रा ने कांस्टेबल सीताराम को हैडकांस्टेबल के पद पर विशेष पदोन्नति दी. जयपुर पुलिस कमिश्नरेट में आयोजित समारोह में पुलिस महानिदेशक ने कहा कि ड्यूटी के दौरान उत्कृष्ट कार्य कर के सीताराम ने राजस्थान पुलिस की शान बढ़ाई है.

राजस्थान के सीकर जिले के पूनियाणा गांव के रहने वाले सीताराम के मातापिता पढ़लिख नहीं सके थे. वे मेहनतमजदूरी करते थे. पिता टोडाराम व मां प्रेम ने अपने एकलौते बेटे सीताराम को अपना पेट काट कर पढ़ाया लिखाया. सीताराम ने सीनियर सेकैंडरी तक की पढ़ाई सीकर में दांतारामगढ़ से की. 12वीं में वह क्लास टौपर रहा. कालेज की पढ़ाई रेनवाल से की. मातापिता की ख्वाहिश थी कि सीताराम शिक्षक बन जाए. सीताराम ने बीएड करने के साथ शिक्षक बनने की तैयारी शुरू भी की थी, लेकिन तभी उस का कांस्टेबल भर्ती में चयन हो गया.

उस ने साल 2015 में नौकरी जौइन की. प्रोबेशन पीरियड पूरा होने के बाद उसे बैंक की चेस्ट ब्रांच में सुरक्षा के लिए तैनात कर दिया गया था. डेढ़ साल पहले ही उस की शादी हुई थी. सीताराम के मातापिता और गांव के लोगों ही नहीं, आज राजस्थान पुलिस के कांस्टेबल से ले कर पुलिस महानिदेशक तक सभी को उस पर गर्व है.

मैं हर कीमत पर फिल्म ‘राजी’ में काम करना चाहती थी : आलिया

आलिया भट्ट इन दिनों अपनी आने वाली फिल्म ‘राजी’ के प्रमोशन में व्यस्त है. मेघना गुलजार निर्देशित फिल्म ‘राजी’ हरिंदर सिक्का के उपन्यास ‘कौलिंग सहमत‘ पर आधारित है. आलिया भट्ट का कहना है कि वह हर कीमत पर फिल्म राजी में काम करना चाहती थी.

आलिया भट्ट का कहना है कि दर्शक उन्हें इस फिल्म में बिल्कुल अलग अवतार में देखेंगे. उन्होंने कहा कि पहली बार मैं एक पीरियड फिल्म कर रही हूं और यह सच्ची कहानी पर आधारित भी है. इसलिए मैं बहुत उत्साहित हूं और उम्मीद करती हूं कि दर्शक इसे पसंद करेंगे.

उन्होंने कहा है कि वह कभी नहीं चाहती थी कि फिल्म राजी में उनके अलावा किसी और को लीड रोल के लिए कास्ट किया जाए क्योंकि वो इस फिल्म को हर कीमत कर करना चाहती थीं.

आलिया ने कहा कि जब मेघना गुलजार ने उन्हें फिल्म राजी के बारे में बताया था तब उन्हें कहानी इतनी पसंद आई थी कि वह नहीं चाहती थी कि यह फिल्म उनके अलावा कोई और करे ,जिसके चलते वह उनकी मैनेजर से लगातार इस बारे में पूछती रहती थी कि क्या मेघना की मूवी राजी के लिए उन्होंने किसी और को तो साइन नहीं कर लिया है.

अभी उस फिल्म का क्या स्टेटस है, जिस पर उनकी मैनेजर उन्हें बार-बार इस बात का आश्वासन देती थी कि मेघना अभी भी फिल्म को लिख रही हैं. उल्लेखनीय है कि मूवी राजी में आलिया भट्ट ने एक जासूस की भूमिका निभाई है.

इस फिल्म में वह एक पाकिस्तानी अफसर के साथ विवाह करने के बाद पड़ोसी मुल्क चली जाती हैं और वहां से भारत के लिए जासूसी करती हैं, जिसके चलते पाकिस्तान के कई सारे राज सामने आते हैं. यह फिल्म 11 मई को प्रदर्शित होगी.

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एक और अलगाववाद

कांजीवरम नटराजन अन्नादुरई के मुख्यमंत्रित्वकाल में तमिलनाडु से पृथक तमिलनाडु बनाने की आवाज तो पिछले 4-5 दशकों में खो गई लेकिन अब कर्नाटक में कांग्रेसी मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने अलग द्राविड़नाडु की मांग कर के देश के विभाजन की बात कर दी है. जब यूरोप के कई देशों, पश्चिम एशिया के देशों, श्रीलंका, दक्षिण अमेरिका के कुछ देशों में ऐसी मांगें उठ रही हों तो इस मांग को हलके में नहीं लेना चाहिए.

मूलतया एक देश की सफलता के पीछे एक बड़े भूभाग में एक अर्थव्यवस्था, एक मुद्रा, एकजैसे कानून, एक जगह से दूसरी जगह जाने की स्वतंत्रता, अलगअलग तरह के लोगों को एक झंडे के नीचे रहना शामिल होता है. लेकिन जब केंद्र सरकार एक तरह के लोगों के लिए काम करने लगे और कुछ इलाकों को लगने लगे कि उन के साथ लगातार भेदभाव हो रहा है, तो अलगाव की आवाज स्वाभाविक तौर पर उठ खड़ी होती है.

ऐसा हम आंध्र प्रदेश के विभाजन में देख चुके हैं जो एक तरह से सीमित था हालांकि वहां भी बीज देश से अलग हो जाने के थे. यह तो तत्कालीन केंद्र सरकार की चतुराई थी कि उस ने सिर्फ राज्यविभाजन से काम चला लिया.

तमिल तो पहले से ही अलग होना चाहते थे. उन का सपना तो भारत के तमिलनाडु और श्रीलंका के जाफना के इलाके को मिला कर नया देश बनाने की है. अब मलयाली, कन्नडि़गा और आंध्री भी ऐसी ही मांग को दोहराने की कोशिश में लगे हैं. कटट्रपंथी जिसे आर्यावर्त्त कहते हैं उस में इस इलाके को हमेशा नीचा सा समझा गया है जहां से केवल गुलाम या दास लाए जाते थे.

भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस अभी इस मांग को गंभीरता से नहीं ले रहीं पर जिस तरह से देश में छटपटाहट का वातावरण बन रहा है और ऊंचनीच की भावना को सरकारी संरक्षण मिल रहा है, यह मांग हिंसक हो सकती है. यह नहीं भूलना चाहिए कि जब खालिस्तान की मांग ने तूल पकड़ा था तो केंद्र सरकार के हौसले पस्त हो गए थे. यह तो कांग्रेस व भाजपा की दूरदर्शिता थी कि राजीव गांधी ने हरचरण सिंह लोंगोवाल से समझौता कर लिया जबकि अटल बिहारी वाजपेयी ने प्रकाश सिंह बादल से और संकट को सदा के लिए समाप्त कर डाला.

दक्षिण में यह समस्या उग्र हो सकती है क्योंकि भाजपा कट्टर हिंदू मठों के सहारे जीत का सपना देख रही है. वह जातियों की राजनीति के तहत वर्णव्यवस्था के आधार पर एकदूसरे को लड़वाने में लगी है. कैंब्रिज एनालिटिका ने स्पष्ट किया है कि देश की पार्टियां उस से फेसबुक पर जमा डेटा के आधार पर जाति का विश्लेषण मांगती हैं क्योंकि जाति के नाम पर वोट मांगना आसान होता है. यही अलगाव बाद में अलग देश की मांग बन जाता है जो यूरोप के यूगोस्लाविया में दिखा और इराक में कुर्दों के साथ दिख रहा है.

चुनाव जीतने के लिए जाति का उपयोग पैट्रोल व माचिस से खेलने के बराबर है. इस बारे में कठिनाई यह है कि गलीगली में मौजूद धर्म के दुकानदारों को देश की नहीं, अपनी दुकानदारी की चिंता रहती है. उन्होंने पहले सदियों तक देश को गुलाम बनवाए रखा, 1947 में टुकड़े करवाए और अब पूरे समाज में ऊंचनीच की खाइयां गहरी पर गहरी करते जा रहे हैं. उन पर न मोहन भागवत का नियंत्रण है न नरेंद्र मोदी का.

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रेल पटरियों पर भटकता बचपन

रेलवे स्टेशनों व ट्रेनों के बीच मासूम बच्चों की जिंदगी कहीं खो सी गई है. खेतखलिहानों व शहरों से गुजरती हुई ट्रेन जब किसी रेलवे स्टेशन पर रुकती है, तो निगाहें उन बच्चों पर जरूर ठहरेंगी, जो रेलवे ट्रैक पर पानी की बोतलें जमा करते हैं या उन बच्चों की टोलियों पर नजरें जमेंगी, जिन के गंदेमैले कपड़े उन की बदहाली को बयां करते हैं. ये बच्चे हाथ में गुटकाखैनी का पाउच लिए ट्रेन की बोगियों में बेचते हैं. जहां इन्हें स्कूलों में होना चाहिए, लेकिन पेट की भूख के चलते यहां इन की जिंदगी के हिस्से में केवल ट्रेन की सीटी ही सुनाई देती है.

इन बच्चों की जिंदगी सुबह 5 बजे से शुरू होती है, स्कूल की घंटी नहीं, ट्रेन की सीटी सुन कर ये झुंड में निकल पड़ते हैं. ये ट्रेन की बोगियों में गुटकाखैनी बेच कर अपना और अपने घर वालों का जैसेतैसे पेट पालते हैं. रेलवे स्टेशन में मुश्किल हालात में रह रहे बच्चों के लिए काम करने वाली स्वयंसेवी संस्थाएं ‘साथी’ और ‘चाइल्ड लाइन’ ऐसे बच्चों को बसाने के लिए काम कर रही हैं, लेकिन सरकारी अनदेखी के चलते इन बच्चों के लिए कोई ठोस काम नहीं हो पा रहा है.

इलाहाबाद रेलवे स्टेशन में आप दर्जनों ऐसे बच्चों को देख सकते हैं, जो प्लेटफार्म पर भीख मांगते हैं और यहीं पर रहते हैं. इन बच्चों के मातापिता व घर का पता नहीं है. ये बच्चे ट्रेन व प्लेटफार्म पर ही अपनी जिंदगी बिताते हैं. गुजरबसर के लिए ऐसे बच्चे ट्रेनों में घूमघूम कर गुटका बेचते हैं. इलाहाबाद रेलवे स्टेशन के बाहर ये दुकानदारों से गुटका खरीदते हैं. बताया जाता है कि ये बच्चे 125 रुपए का गुटका 4 सौ रुपए तक में आासानी से बेच लेते हैं.

रेलवे स्टेशन व टे्रनों में गुटका, बीड़ी, सिगरेट जैसी चीजों को बेचने पर रोक है. वहां लाइसैंस वाला वैंडर ही रेलवे के नियमकानून के मुताबिक उचित दामों पर ही कोई चीज बेच सकता है. लेकिन असल खेल तो यहां से शुरू होता है. गैरकानूनी वैंडर धड़ल्ले से इलाहाबाद व उस के आसपास के रेलवे स्टेशनों पर सामान बेचते हुए नजर आते हैं. रेलवे प्रोटैक्शन फोर्स यानी आरपीएफ व राजकीय रेलवे पुलिस यानी जीआरपी की चैकिंग में गैरकानूनी वैंडर और गरीब बच्चों से गैरकानूनी काम कराने वाले माफिया बच निकलते हैं. 12 साल का राकेश इलाहाबाद रेलवे स्टेशन के पास एक झुग्गीझोंपड़ी बस्ती में रहता है. उस ने बताया कि उस के मांबाप नहीं हैं.

वह 70 साल की अपनी बूढ़ी नानी के साथ रहता था, क्योंकि पुलिस वालों ने कई बार उसे पकड़ा था. लेकिन सौ रुपए के नोट को उस ने बड़ी बखूबी से इस्तेमाल किया कि आप उस की समझदारी को सुन कर हैरान रह जाएंगे. जब वे पकड़े जाते हैं, तो सौपचास रुपए थमा देते हैं. मामला वहीं रफादफा हो जाता है. इलाहाबाद रेलवे स्टेशन व उस के आसपास रहने वाले बच्चों से बात करने पर पता चला है कि उन के पढ़ने का मन करता है, लेकिन परिवार की गरीबी के चलते उन्हें ट्रेनों में गुटका, पानी की बोतलें वगैरह बेचनी पड़ती हैं.

बसाने की हो ठोस नीति

ऐसे बच्चों को बसाने के मसले पर समाजसेविका नीलम श्रीवास्तव ने बताया कि जो बच्चे कई साल से रेलवे स्टेशन पर ही अपनी जिंदगी बिता रहे हैं, ऐसे बच्चों को सुधार पाना एक बड़ी चुनौती है. इन में से कई ऐसे बच्चे हैं, जो एक स्टेशन से दूसरे स्टेशन घूमते रहते हैं. ये नशा करने की लत का शिकार हो जाते हैं. बड़े होने पर ये अपराध की राह पकड़ लेते हैं, तब इन्हें सुधार पाना बहुत मुश्किल होता है. वैसे, घर से भाग कर आए बच्चों को सही रास्ते पर सलाह के जरीए ही लाया जा सकता है. नीलम श्रीवास्तव इन बच्चों की काउंसलिंग करती हैं. उन्होंने कई बच्चों को उन के घर भी पहुंचाया है. नीलम श्रीवास्तव आगे बताती हैं कि स्टेशन पर लंबे समय से रह रहे बच्चों को बसाने के लिए कई एनजीओ काम करने से कतराते हैं. उन का काम भी केवल कागजी होता है.

स्टेशन पर नहीं है भविष्य

12 साल का दीपक यादव इलाहाबाद रेलवे स्टेशन पर गुटका बेचता हुआ मिला. वह बांदा का रहने वाला है और घर से भाग कर ग्वालियर गया, जहां उस ने कुछ दिन होटल में काम किया, लेकिन होटल का मालिक उस से दिन में 16 घंटे काम कराता था. दीपक को अपनी गलती पर पछतावा हो रहा था. उस ने ठान लिया कि वह होटल की कैद से खुद को आजादी दिलाएगा. कई रात के बाद उसे एक मौका मिला. एक रात होटल का मेन गेट खुला पाया, बस इस गलती का फायदा उठाया व रात को वहां से निकल गया. आंखों में आंसू पोंछते हुए दीपक ने बताया कि वह इलाहाबाद आ गया और यहीं पास के दुकानदार से गुटका खरीद कर रेलवे स्टेशन पर बेचने लगा. दीपक की काउंसलिंग समाजसेविका नीलम श्रीवास्तव ने की और वह अपने घर जाने के लिए तैयार हो गया. एक संस्था की मदद से उस के घर का पता लगाया जा रहा है.

इलाहाबाद रेलवे स्टेशन पर मातापिता की नाराजगी के चलते रोजाना दर्जनों बच्चे घर से भाग कर आते हैं और कुछ दिन तक यहीं रहते हैं, तो कुछ किसी दूसरे स्टेशन का रुख कर लेते हैं. वहीं वाराणसी, कानपुर, इलाहाबाद, रायपुर वगैरह रेलवे स्टेशनों पर बच्चों के लिए काम करने वाली साथी संस्था मुश्किल हालत में रह रहे इन बच्चों की मदद करती है. ऐसे बच्चों को उन के घर तक पहुंचाने का काम करती है. 14 साल तक की उम्र के बच्चों के लिए अनिवार्य शिक्षा कानून के लागू होने के बाद भी बदहाली के आंसू में जी रहे स्टेशन पर ये बच्चे पढ़ने के अधिकार के लिए किस के सामने हाथ फैलाएं? गरीबी, बीमारी, नशाखोरी में जी रहे इन के मांबाप बच्चे पैदा तो कर देते हैं, लेकिन उन्हें तालीम क्या दो वक्त की रोटी भी नहीं दे पा रहे हैं. लाचार मांबाप पेट पालने के लिए इन बच्चों को रेलवे स्टेशन के हवाले कर देते हैं.

इलाहाबाद स्टेशन पर इन दिनों दर्जनों बच्चे रोज सुबह यहां से गुजरने वाली दर्जनों ट्रेनों से पानी की खाली बोतलें इकट्ठी करते हैं. इन बोतलों में दोबारा पानी भर कर इन बच्चों से ये बोतलें बिकवाई जाती हैं, जिस में अच्छीखासी आमदनी होती है. उन की गरीबी और पैसों के लालच के चलते रेलवे स्टेशन पर पानी की बोतलें गैरकानूनी तरीके से बेचने का धंधा जोरों पर है.

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इस गाने पर संभावना सेठ ने किया गजब का डांस

इन दिनों बौलीवुड गानों से ज्यादा भोजपुरी गाने यूट्यूब पर धूम मचा रहे हैं. इसी क्रम में भोजपुरी फिल्मों के मशहूर एक्टर निरहुआ दिनेशलाल यादव के फिल्म ‘सौगंध’ का एक गाना इंटरनेट पर हंगामा मचाया हुआ है. यह एक आइटम नंबर है,जिसके बोल हैं ‘ताजमहल बनवा द बलिया में’. इस गाने पर भोजपुरी अदाकारा संभावना सेठ जबरदस्त डांस करती हुई नजर आ रही हैं.

यह गाना इस कदर वायरल हो रहा है कि 5 दिनों के अंदर ही इस वीडियो को ,340,419 बार देखा जा चुका है. यूट्यूब रिलीज इस गाने को भोजपुरी सिंगर कल्पना ने गाया है. यह गाना सपना के गाने का कौपी बताया जा रहा है. ऐसा इसलिए क्योंकि इस गाने की धुन हरयाणवी डांसर सपना चौधरी के गाने ‘तेरी आंख्यां का यो काजल’ से मिलता-जूलता है. इतना ही नहीं इस गाने पर संभावना सेठ के डांस की तुलना भी सपना चौधरी के डांस से की जा रही है. कहा जा रहा है कि यह गाना सपना चौधरी को टक्कर देने के लिए बनाया गया है.

जब आप इस गाने को देखेंगे तो आपको यह गाना ‘तेरी आंख्यां का यो काजल’ का भोजपुरी वर्जन लगेगा. इस गाने में अपनी अदाओं की बिजलियां गिराने वालीं संभावना सेठ के लटके झटके देखकर आप भी थिरकने पर मजबूर हो जाएंगे. बता दें कि  भोजपुरी फिल्मों के मशहूर एक्टर निरहुआ दिनेशलवाल यादव की फिल्म ‘सौगंध’ का ट्रेलर भी हाल ही में रिलीज हुआ है. इस फिल्म की शूटिंग चार अलग-अलग चरणों में मुंबई, नेपाल और लंदन सहित कई देशों में हुई है. इस फिल्म में निरहुआ के साथ भोजुपरी अभिनेत्री आम्रपाली दुबे भी नजर आने वाली हैं. इस फिल्म के निर्देशक विशाल वर्मा है.

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इस फिल्म में डकैत बने दिखेंगे रणबीर कपूर, देखें वीडियो

बौलीवुड एक्टर रणबीर कपूर अपनी फिल्म ‘संजू’ को लेकर पिछले काफी वक्त से सुर्खियों में हैं. इस फिल्म के लिए रणबीर ने खुद को संजय दत्त के लुक में बदला था और उनके संजू के लुक को दर्शकों ने काफी पसंद भी किया था. जिसके बाद अब रणबीर कपूर आपको डकैत बने हुए नजर आएंगे. इस फिल्म में रणबीर कपूर आपको एक्शन करते हुए नजर आएंगे और रणबीर की इस फिल्म का नाम ‘शमशेर’ है. रणबीर की इस फिल्म का निर्माण यश राज फिल्म्स के बैनर तले किया जा रहा है.

बता दें, रणबीर लगभग 9 साल बाद एक बार फिर यश राज फिल्म्स के साथ काम करने वाले हैं. रणबीर ने आखिरी बार फिल्म ‘रौकेट सिंह: सेल्समैन औफ द ईयर’ में काम किया था. रणबीर की इस फिल्म का निर्देशन करण मल्होत्रा कने वाले हैं. एक खबर के मुताबिक रणबीर ने अपनी इस फिल्म को लेकर कहा, करण ने इस फिल्म के लिए मुझे मेरे कम्फर्ट जोन से बाहर निकाला है और अब मैं आगे आने वाली चुनौतियों को देख रहा हूं.

बता दें, करण इससे पहले यश राज फिल्म्स के बैनर तले ही फिल्म ‘अग्निपथ’ और ‘ब्रदर्स’ का निर्देशन कर चुके हैं. करण ने शमशेरा के बारे में बात करते हुए कहा, ‘शमशेरा’ ऐसी फिल्म है जिसका मैं काफी वक्त से इंतजार कर रहा था. हिंदी कमर्शियल सिनेमा को मैंने बचपन से देखा है और मैंने बचपन से जिस तरह के हीरो के बारे में सोचा है. इस फिल्म में वैसा ही हीरो नजर आने वाला है. ‘शमशेरा’ की कहानी मुझे हीरो को लेकर वो सब करने की इजाजत देती है जिसके बारे में मैंने सोचा था और यह मेरे लिए काफी उत्साहित करने वाला प्रोजेक्ट है’.

बता दें, इस फिल्म की शूटिंग इस साल के अंत में शुरू की जाएगी और फिल्म की शूटिंग को अलगे साल में खत्म किया जाएगा. फिलहाल रणबीर जल्द ही संजय दत्त की बायोपिक में नजर आने वाले हैं. हालांकि, वह फिलाहल अयान मुखर्जी की फिल्म ‘ब्रह्मास्त्र’ की शूटिंग में बिजी हैं. इस फिल्म में रणबीर सुपरहीरो की भूमिका में नजर आएंगे.

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हार्ट अटैक बनाम हार्ट फेल

दिल से जुड़ी बीमारी दुनियाभर में मौत की सब से आम वजहों में से एक है. हार्ट फेल होना या हार्ट अटैक की चर्चा करते हुए लोग अकसर भरम में पड़ जाते हैं. हार्ट अटैक का मतलब होता है दिल की मांसपेशियों का बेहद कमजोर होना, जबकि हार्ट फेल होने का मतलब है कमजोर दिल. हार्ट अटैक तब होता है, जब दिल की मांसपेशियों के एक हिस्से को आक्सिजन से खून की सप्लाई में रुकावट हो जाती है. खून की सप्लाई अगर तुरंत फिर से बहाल नहीं होती है, तो दिल की मांसपेशियों का एक हिस्सा मरने होने लगता है.

हार्ट फेल होना एक लंबी चलने वाली और धीरेधीरे बढ़ने वाली हालत है, जिस में दिल की मांसपेशियां दिल के जरीए खून और आक्सिजन की शरीर की जरूरत के मुताबिक सही मात्रा में खून को पंप नहीं कर पाती हैं. कम शब्दों में कहें, तो दिल अपना काम सही तरीके से पूरा नहीं कर पाता है.

वजह

हार्ट अटैक की सब से आम वजह खून का वह थक्का है, जो दिल की धमनियों में जमा हो जाता है. ये धमनियां दिल में खून और आक्सिजन की सप्लाई करने के लिए जिम्मेदार हैं. अगर ये धमनियां खून के थक्के या परत के चलते जाम हो जाएं, तो दिल को आक्सिजन नहीं मिल पाती है और वह काम करना बंद कर देता है.

हार्ट फेल होने की वजह हार्ट अटैक हो सकती है, पर ऐसा लंबे समय से चले आ रहे हाई ब्लडप्रैशर या हार्ट वौल्व बीमारी के चलते भी हो सकता है. अगर दिल धमनियों से खून को अहम अंगों तक असरदार ढंग से पंप नहीं कर पाएगा, तो ये अंग खराब हो जाएंगे. इस के अलावा फेफड़े में तरल इकट्ठा होने लगेगा. इस से सांस लेने में समस्या आएगी, जिस से टिशू टूटफूट जाते हैं.

लक्षण

* हार्ट अटैक का सब से आम लक्षण सीने में हलके से ले कर गंभीर दर्द है, जो तकरीबन 20 मिनट तक रहता है. दूसरे लक्षणों में खांसी आना, सांस फूलना और पसीना आना शामिल है.

* हार्ट फेल होने के संकेत और लक्षण धीरेधीरे या अचानक भी हो सकते हैं और इस में भूख न लगना, रात में बारबार पेशाब आना, पैरों या टखने में सूजन और सांस फूलना शामिल है. रूटीन ईसीजी और ईकोकार्डियोग्राफी ऐसे टैस्ट हैं, जिन से हार्ट फेल होने की गंभीरता का पता चल सकता है.

उपचार

* रुकी हुई यानी बाधित धमनियों के इलाज के लिए एंजियोप्लास्टी एक असरदार उपचार है. खास किस्म के नई तकनीक के दवा छोड़ने वाले स्टैंट अब मुहैया हैं, जो मुश्किल और संकरी धमनी के जरीए प्रभावी ढंग से आगे बढ़ा सकते हैं. इस के अलावा अमेरिका के एफडीए से स्वीकृत दवा छोड़ने वाले स्टैंट भी हैं, जो डायबिटीज के मरीजों के लिए बने हैं.

* आमतौर पर दिल की दवाएं हार्ट फेल होने के उपचार के लिए इस्तेमाल में लाई जाती हैं. ऐसे मरीज के डाक्टर उसे जिंदगी जीने के तरीके में बदलाव लाने की सिफारिश कर सकते हैं. जैसे बीड़ीसिगरेट छोड़ना, मरीज के सोडियम इनटैक (नमक कम खाना) को सीमित करना, वजन कम करना और मरीज के तनाव के लैवल को कम करना.

* कार्डियक रीसिंक्रोनाइजेशन थैरैपी हार्ट फेल होने के उपचार का एक असरदार रूप है. इस में इंप्लांट करने लायक एक उपकरण का उपयोग किया जाता है. यह उन मरीजों के लिए होता है, जिन्हें दिल के इलैक्ट्रिकल कंडक्शन की समस्या होती है.

रीसिंक्रोनाइजेशन थैरैपी से दिल से पूरे शरीर में खून का प्रवाह बढ़ सकता है. इस से पूरे शरीर में बीमारी के लक्षण कम होते हैं, अस्पताल में कम रहना पड़ता है और मौत के होने का खतरा भी कम रहता है.

दिल को रखें सेहतमंद

* अपने भोजन में ज्यादा से ज्यादा हरी सब्जियों और फलों को खाइए.

* अपने भोजन में संपूर्ण अनाज को खाइए, क्योंकि ये फाइबर और पोषक के अच्छे स्रोत हैं.

* वसा और कोलेस्ट्रौल सीमित कीजिए.

* कम फैट वाले प्रोटीन स्रोत चुनिए, जैसे दाल, सप्राउट, अंडे का सफेद वाला हिस्सा वगैरह.

* अपने भोजन में सोडियम (नमक) लेना कम कीजिए.

(लेखक साकेत सिटी अस्पताल, नई दिल्ली में कार्डियोलौजी विभाग के चेयरमैन हैं)

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बाइकर्स गैंग : सड़कों पर धूम मचा ले धूम

तेज रफ्तार में लहरिया कट चलती मोटरसाइकिल की पिछली सीट पर बैठना अपनेआप में दिलेरी का काम है. पटना के वीआईपी इलाके बेली रोड पर सुबह के समय बाइकर्स गैंग का राज चलता है. सुदेश राज की मोटरसाइकिल होंडा सीवीआर-250 की पिछली सीट पर बैठना मौत के कुएं में कूदने जैसा दिल दहलाने वाला लगता है. बाइक के रफ्तार पकड़ने के साथ ही समूचे शरीर में सिहरन सी दौड़ पड़ती है. सुदेश राज के कंधों को अपने दोनों हाथों से जोर से पकड़ कर बैठने के बाद भी हर पल गिरने का खौफ बना रहता है. पलक झपकते ही बाइक हवा से बातें करने लगती है.

तकरीबन एक किलोमीटर तक 120 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से बाइक चलाने के बाद सुदेश राज अचानक ही ब्रेक लगाता है और पूरी मोटरसाइकिल स्किड करती हुई उलटी दिशा में घूम जाती है. इस से सुदेश राज के चेहरे पर कामयाबी की मुसकराहट तैर जाती है और डर के मारे मेरे मुंह से चीख निकल जाती है. उस के बाद फिर बाइक रफ्तार पकड़ने लगती है और सुदेश राज मुझ से कहता है कि उस के कंधे को जोर से पकड़ लें. जब तक मैं कुछ समझ पाता, सुदेश राज ने बाइक का अगला पहिया हवा में उठा लिया. मेरी तो घिग्घी बंध गई. मैं चिल्लाया, ‘‘अरे, बाइक रोको. मुझे उतरने दो.’’ सुदेश राज को मेरी घबराहट देख कर और ज्यादा मजा आ रहा था. वह कहने लगा, ‘‘अंकल, अभी तो यह शुरुआत है. अभी तो आगेआगे देखिए होता है क्या.’’

इतना कह कर सुदेश राज ने बाइक की रफ्तार झटके में बढ़ा दी और उस का हैंडल छोड़ कर गाना गुनगुनाने लगा, ‘‘धूम मचा ले, धूम मचा ले, धूम…’’ रफ्तार के दीवाने सुदेश राज का खून उबाल मार रहा था और दूसरी ओर डर के मारे मेरा तो खून सूखा जा रहा था. कुछ देर बाद बाइक की स्पीड कम होते ही मैं तकरीबन कूद कर नीचे उतर गया और सुदेश राज हाथ हिलाता हुआ अपने बाकी बाइकर दोस्तों के साथ हवा हो गया. बेली रोड, पटना के वीमंस कालेज के पास से बाइकर्स गैंग की रेसिंग शुरू होने वाली थी. मैं ने एक बाइकर सुदेश राज से कहा कि मैं भी बाइक की पिछली सीट पर बैठ कर रफ्तार का मजा लेना चाहता हूं. मेरी बात को सुन कर सुदेश राज और उस के गैंग के बाकी दोस्तों ने जम कर ठहाका लगाया.

एक ने कहा, ‘‘क्यों अंकल, इस उम्र में हड्डियां तुड़वाने का इरादा है क्या?’’

तभी दूसरे ने मुझ पर फब्ती कसी, ‘‘हम लोगों की बाइक की स्पीड देख कर तो आप का हार्ट फेल हो जाएगा?’’ तीसरे ने सलाह दी, ‘‘पहले अपने घर वालों से लिखवा कर ले आओ कि कोई अनहोनी हुई, तो इस के लिए हम बाइकर्स जिम्मेदार नहीं होंगे.’’

सभी ने जोर का ठहाका लगाया और मोटरसाइकिल के ऐक्सिलेटर को तेज कर कानफाड़ू आवाजें निकालने लगे. मैं ने उन से कहा कि मुझे भी अपनी बाइक पर बिठा कर थोड़ी दूर तक ले चलो और अपनी बाइक की स्पीड थोड़ी कम ही रखना. इस के जवाब में एक बाइकर जांबाजी दिखाते हुए अकड़ के साथ बोला, ‘‘बाइक की स्पीड तो हमारी ही मरजी के हिसाब से होगी. बैठना है तो बैठो, वरना अपनी मौर्निंग वाक करो.’’ मेरी चिरौरी को सुन कर सुदेश राज ने अपने एक साथी से कहा कि अंकल को हैलमैट पहना दो. उस के बाद मैं सुदेश राज की बाइक की पिछली सीट पर बैठ गया. वीमंस कालेज से ले कर गोल्फ क्लब तक बाइक कुछ ही सैकंड में पहुंच गई और उतनी देर में ‘कलेजा मुंह को आना’ वाली कहावत सच में मुझ पर तबदील हो चुकी थी. इस में कोई शक नहीं है कि बाइकर्स रफ्तार, जांबाजी और कलाबाजी का बेजोड़ नमूना सड़कों पर दिखाते हैं, लेकिन वहीं दूसरी ओर बाइकर्स गैंग शहर के आम लोगों के लिए दहशत बने हुए हैं.

बाइकर्स गैंग में ज्यादातर 15 से 22 साल की उम्र के लड़के होते हैं. यमहा फेजर, यमहा एफजेड-1, होंडा सीवीआर, होंडा सीवी ट्रिगर, सुजुकी जिक्सर एसएफ, सुजुकी जीएस-150, बजाज पल्सर-350, कावासाकी निंजा, हीरो ऐक्स्ट्रीम स्पोर्ट्स, हीरो करिज्मा वगैरह मोटरसाइकिल बाइकर्स की पहली पसंद हैं. इन की कीमत 70 हजार से डेढ़ लाख रुपए के बीच है. रईस घरों के बाइकर्स भी तकरीबन 10 से 15 लाख रुपए की कीमत वाली सुजुकी बैंडिट, सुजुकी एम-1800 आरजेड, यमहा वाईजेडएफ-आर 11, कावासाकी जैसी बाइकों का जम कर इस्तेमाल करते हैं.

सड़कों पर बाइक ले कर निकले बाइकर्स गैंग के लोग खुद को रोड का राजा मानते हैं और कदमकदम पर कानून की धज्जियां उड़ाते नजर आते हैं. कई शहरों में बाइकर्स गैंग लड़कियों से छेड़खानी और चेन स्नैचिंग की वारदातों को अंजाम देते हैं. पिछले दिनों पटना के बेली रोड पर चिडि़याखाना के पास बाइकर्स गैंग ने 2 औरतों के गले से सोने की चेन झपट ली थी. पास खड़े पुलिस वाले भी तमाशा देखते रह गए. पटना के एक कारोबारी विनोद कुमार पांडे कहते हैं कि वे रोज दफ्तर बंद कर रात 8-9 बजे घर जाते हैं, तो रास्ते में बाइकर्स गैंग का बवाल देख कर मन में खौफ पैदा होता है. पता नहीं, कलाबाजी दिखाने के चक्कर में किसे धक्का मार दें? तेज रफ्तार से दौड़ती बाइक से टकरा कर किसी की जान न चली जाए? बाइकर्स गैंग वाले खुद तो अपनी जान जोखिम में डालते ही हैं, सड़क पर चलने वाले दूसरे राहगीरों की जान पर भी खतरा बना रहता है.

किसी एक बाइकर का बाइक पर से बैलैंस बिगड़ने पर वह खुद तो हादसे का शिकार होता ही है, साथ ही कई लोगों को भी अपने लपेटे में ले लेता है. पटना में भी बाइकर्स गैंग की शुरुआत हो चुकी है. दिल्ली, मुंबई, बैंगलुरु, अहमदाबाद, जयपुर वगैरह शहरों में बाइकर्स गैंग की भरमार है और वे रोज सड़कों पर कलाबाजियां दिखाते हैं. बाइकर्स की रफ्तार और स्टंट को देख कर जहां लोगों के मन में खौफ पैदा होता है, वहीं कई लोग उन के करतबों को दांतों तले उंगलियां दबा कर देखते हैं और मजे लेते हैं. पटना यूनिवर्सिटी के लैक्चरार पीके सिंह कहते हैं कि सड़कों पर बाइकर्स की कलाबाजियों को देखना रोमांचक होता है. सड़कों के किनारे खड़े हो कर कई लोग सर्कस जैसा मजा लेने के लिए बाइकर्स का इंतजार करते देखे जा सकते हैं.

गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश का रहने वाला सुमित यादव बाइकर्स गैंग का मैंबर है. वह पिछले ढाई साल से गाजियाबाद, नोएडा और दिल्ली की सड़कों पर अपनी पल्सर-350 बाइक पर स्टंट करता रहा है. सुमित यादव बताता है कि उस के गैंग में 32 लड़के हैं और वे रात ढलते ही तेज रफ्तार से सड़कों पर बाइक चलाते हैं और कलाबाजियां दिखाते हैं. वह दिलेरी दिखाते हुए कहता है कि बाइक से स्टंट करते हुए वह 3 बार हादसे का शिकार हुआ, लेकिन उस के बाद भी उस का हौसला कम नहीं हुआ है. एक बार तो बाइक से गिरने पर उस का बायां हाथ टूट गया था.

एक महीने बाद जब प्लास्टर खुला, तो वह फिर से अपनी बाइक ले कर सड़कों पर उतर आया. बाइकर्स गैंग पुलिस के लिए खासा सिरदर्द बने हुए हैं. पिछले साल जुलाई महीने में नई दिल्ली में बाइकर्स गैंग को काबू में करने के लिए पुलिस ने एक बाइकर की बाइक के पिछले टायर में गोली मारी, लेकिन गोली बाइक के पीछे बैठे करन पांडे नाम के एक लड़के को जा लगी. उस की मौके पर ही मौत हो गई. वहीं बाइक को चला रहा पुनीत शर्मा जख्मी हो गया. पुलिस ने जांच में पाया कि पुनीत नशे में धुत्त हो कर बाइक चला रहा था. कई मामलों में यह पाया गया है कि नशे की हालत में बाइकर्स सड़कों पर स्टंट करते हैं और कई हादसों को न्योता देते हैं.

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