परमाणु समझौते से अलग हुआ अमेरिका

अपने यूरोपीय मित्रों की मान-मनौव्वल पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की जिद भारी पड़ी और अमेरिका ने ईरान के साथ परमाणु समझौते से अपने को अलग कर लिया. यह सब तब हुआ, जब किसी को भी परमाणु अप्रसार के प्रति ईरान की प्रतिबद्धता पर कोई संदेह नहीं था. इजरायल और सऊदी अरब को छोड़कर ट्रंप के इस कदम की सभी देशों ने आलोचना की है.

दरअसल ट्रंप को समझ पाना आसान नहीं है, फिर भी कुछ तो समझ में आता है कि आखिर ऐसे सफल सौदे से उन्हें खुद को अलग करना क्यों ठीक लगा? दरअसल ट्रंप खुद को ऐसे युद्धपोतों से घिरा पाते हैं, जिनमें से अधिकतर इजरायल के करीब हैं और जो ईरान के साथ खुले टकराव से कम पर कुछ सुनना ही नहीं चाहते.

दूसरे, शायद यह कि अपने पूर्ववर्ती बराक ओबामा का हर बड़ा फैसला वह खत्म कर देना चाहते हैं. जो भी हो, समझौते को इस तरह तोड़ने ने शेष विश्व के साथ अमेरिका की प्रबिद्धताओं पर सवाल तो उठा ही दिए हैं. इसने आलोचकों को सवाल उठाने का मौका दो दिया है कि अगर अमेरिका एक बहुपक्षीय समझौते का सम्मान नहीं कर सकता, तो उसके बाकी वादों पर कैसे भरोसा किया जाए? वैसे भी मध्य-पूर्व एक जटिल इलाका है, जहां विभिन्न युद्धों में अलग-अलग खिलाड़ी अलग-अलग भूमिकाओं में हैं.

ऐसे में, ईरान की कुछ क्षेत्रीय गतिविधियों की आड़ लेकर समझौता तोड़ना दो अलग-अलग मुद्दों का घालमेल करने से ज्यादा कुछ नहीं है. इस पूरे प्रकरण में संसद में अमेरिकी झंडा जलाने की घटना छोड़ दें, तो ईरान ने अब तक सधी हुई प्रतिक्रिया ही दी है. राष्ट्रपति हसन रूहानी व यूरोपीय संघ के देशों ने भी समझौते के प्रति प्रतिबद्धता जताई है.

हालांकि एक बड़ा सवाल है कि यदि अमेरिका ने किसी राज्य को ईरान के साथ व्यापार की अनुमति दे रखी है, तो बदले हालात में ऐसा कोई समझौता कैसे टिकेगा? अभी तक इसका जवाब नहीं मिला है. पर इतना तो साफ है कि वाशिंगटन ने अपने तेवर यूं ही बनाए रखे, तो शक नहीं कि तेहरान भी वैसा ही जवाबी रुख अख्तियार कर ले, जो क्षेत्रीय शांति के लिए अच्छा नहीं हो.

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सेक्स में बिग 0 यानि चरमसुख पर चुप्पी क्यों

तनु के विवाह को 6 महीने हो गए थे. वह मायके आई हुई थी. विवाह के बाद अनुभव पूछते हुए उस की हमउम्र भाभी रेखा उस के साथ छेड़छाड़ करने लगी.

तब तनु ने बुझे स्वर में कहा, ‘‘मुझे तो कुछ अच्छा नहीं लगता. सब बोरिंग ही लगता है.’’

सुन कर रेखा हैरान हुई. फिर विस्तार से खुल कर बात करने पर रेखा को महसूस हुआ कि तनु ने अब तक चरमसुख का आनंद लिया ही नहीं है. सैक्स उसे एक रूटीन की तरह लग रहा है कि बस, पति का साथ देना, चाहे अच्छा लगे या बुरा.

रेखा अपनी एक रिश्तेदार डाक्टर मीनाक्षी से बात कर तनु को उन के पास ले गई. दोनों को अकेले छोड़ वहां से हट गई. डाक्टर ने बातोंबातों में उसे और्गेज्म के बारे में समझाया तो तनु झिझकती हुई सब बातें सुनतीसमझती रही. अगली बार मायके आने पर जब उस का खिला, चमकता चेहरा देख रेखा ने फिर आंखों ही आंखों में शरारती सवाल पूछा तो तनु शरमा कर हंस दी. तब रेखा को तसल्ली हो गई कि अब उस की ननद शारीरिक और मानसिक रूप से वैवाहिक जीवन का पूरापूरा आनंद ले रही है.

सैक्स की हमारे जीवन में महत्त्वपूर्ण भूमिका है. विशेष रूप से महिलाएं स्वयं को बहलाती हैं कि मजबूत रिश्ते के लिए अच्छा सैक्स जरूरी नहीं है. उन के लिए यह पार्टनर से जुड़े रहने के लिए ही है.

25 वर्षीय कविता का कहना है, ‘‘मेरा पार्टनर आसानी से उत्तेजित हो जाता था, जबकि मेरा मूड बनने में काफी समय लगता था. मैं उसी के लिए सैक्स करती थी. हर बार मुझे खाली और अधूरा लगता था.’’

फोरप्ले के महत्त्व के बारे में बताते हुए कंसल्टैंट मनोवैज्ञानिक हेल्थेनबेर इंडिया से अदिति आचार्य का कहना है, ‘‘जहां 90% पुरुष शारीरिक संबंध में चरमसुख का अनुभव करते हैं वहीं 30% महिलाओं ने अपने जीवन में चरमसुख का अनुभव कभी किया ही नहीं है. एक महिला को मानसिक रूप से इस खेल में शामिल होने में समय लगता है. 15 से 40 मिनट लगते हैं.’’

फुट स्पा, बौडी मसाज से यौवन, सौंदर्य वृद्धि होती है पर यह सब करवाना रोज तो

संभव नहीं हो सकता न? ‘द और्गेज्म आंसर गाइड’ में मनोवैज्ञानिक कैरल रिंकलेव एलिसन के द्वारा किए गए अध्ययन में एलिसन ने 23 से 90 साल उम्र की 2,632 महिलाओं का इंटरव्यू लिया था, जिस में पता चला था कि इन में से 39% ने ही स्वयं को रिलैक्स करने के लिए इस का आनंद उठाया है. विशेषज्ञ इस का श्रेय औक्सिटोसिन हारमोन को देते हैं. मनोवैज्ञानिक और सैक्सोलौजिस्ट डा. श्याम मिथिया बताते हैं, ‘‘जब एक महिला उत्तेजित होती है, तो औक्सीटोसिन नामक फीलगुड हारमोन हाइपोथेलेमस में नर्व्स सैल्स से खून में प्रवाहित होता है. औक्सीटोसिन न सिर्फ तनाव कम करता है, बल्कि जोश और आराम की भावना भी उत्पन्न करता है. यह रिश्ते को मजबूत करता है.’’

बिग 0 (चरमसुख) से शरीर को लाभ ही लाभ है. इस से यौनांगों में बेहतर रक्तप्रवाह होता है, शरीर को प्राकृतिक डिटौक्सीफिकेशन होता है, संतानोत्पत्ति की क्षमता बढ़ती है, याद्दाश्त सुधरती है, रोगप्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है, स्वस्थ ऐस्ट्रोजन हारमोन का स्तर बढ़ता है. यह औस्टियोपोरोसिस, हृदयरोग और स्तन कैंसर से भी सुरक्षा करता है.

37 वर्षीय अध्यापिका कविता गोयल कहती हैं, ‘‘चाहे दिन कितना भी खराब बीते, मैं और मेरे पति लगभग प्रतिदिन अच्छे सैक्स का आनंद उठा कर ही सोते हैं. यह एक ऐस्प्रिन खाने से तो अच्छा ही है और जब आप हर सुबह चेहरे की प्राकृतिक चमक के साथ उठें तो मेकअप की भी क्या जरूरत है.’’

चरमसुख के दौरान उत्पन्न होने वाले ऐंडोर्फिंस हारमोन सिरदर्द, मासिक उथलपुथल, आर्थ्राइटिस के लिए दर्दनिवारक का काम करते हैं.

आप ने कभी सफल, आनंददायक सैक्स के बाद अपने चेहरे की चमक देखी है? उस का श्रेय डीएनईए को जाता है. यह हारमोन त्वचा की चमक बढ़ाता है, नष्ट हुए टिशूज की मरम्मत करता है और त्वचा को जवान बनाए रखता है. यह हड्डियों और मांसपेशियों को मजबूत बनाता है. काफी अध्ययनों से यह सिद्ध हुआ है कि जो लोग हफ्ते में कम से कम 3 बार शारीरिक संबंध बनाते हैं वे अपनी उम्र से 10 साल छोटे लगते हैं. सैक्स कोच आनंदिति सेन कहती हैं, ‘‘अरोमाथेरैपी वाली कैंडल्स के बारे में सोचो, लाइट्स हलकी करो, आंखें बंद कर के कल्पना के घोड़ों को दौड़ने दें.’’

फिल्मों में महिलाओं को सैक्सुअल आनंद में ही लीन दिखाया जाता है, जबकि वास्तविकता में 20% महिलाएं ही चरमसुख को पाती हैं. तो क्या अच्छी सैक्स लाइफ न होने से आप का रिश्ता प्रभावित होता है? इस संबंध में फिटनैस ट्रेनर शिवानी जोशी का कहना है, ‘‘बिलकुल. पार्टनर का ध्यान रखना भी बहुत जरूरी है. उसे साफसाफ बताना बहुत जरूरी है कि आप को क्या अच्छा लगता है क्या नहीं.’’

तो सारी चिंताएं, संदेह छोड़ कर पार्टनर के साथ सैक्स का आनंद लें. इसे बोझ नहीं, तनमन के लिए एक औषधि की तरह समझें. इस का अनुभव कर प्राकृतिक रूप से स्वस्थ और सुखी रहें. पुरानी मानसिकता से बाहर निकलें, पार्टनर को अपनी पसंदनापसंद, इच्छाअनिच्छा बताएं और खुल कर जीएं.

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अखिल सचदेवा का नया एकल गीत ‘‘गल सुन’’ टीसीरीज से

‘घर से निकलते ही’, ‘ओ हमसफर’ और ‘रात कमाल है’ जैसे एकल गानों की सफलता से प्रेरित होकर टीसीरीज कंपनी अब गायक अखिल सचदेवा का एकल गीत ‘गल सुन’ लेकर आ रही है. अखिल सचेदवा द्वारा स्वरबद्ध इस गीत के गीतकार मनोज मुंताशिर हैं. वीडियो निर्देशक चरित देसाई ने इसका वीडियो अखिल सचदेवा और स्नेहा नमनंदी पर चानिया के सुरम्यद्वीप पर फिल्माया है.

चर्चित गीत ‘हमसफर’ के बाद अपना एकल गीत ‘गल सुन’ ला रहे अखिल सचदेवा कहते हैं- ‘‘मेरे लिए यह अद्भुत और बहुत ही अलग तरह का अनुभव रहा. इस गीत के वीडियो के फिल्मांकन के दौरान मैं अपना हाथ तुड़वा बैठा था. पर निर्देशक ने मेरा हौसला बढ़ाया और मैने दुर्घटना घटित होने के बाद भी शूटिंग की. मैंने सकारात्मक उर्जा के साथ शूटिंग की. सेट पर हम सभी दिल से गीत को आत्मसात कर चुके थे. इसे चानिया नामक सुरम्यद्वीप पर फिल्माया गया है, अब तक यहां पर न के बराबर ही शूटिंग हुई है.’’

अखिल कहते हैं- ‘‘असलियत में हमने इस गीत की धुन ‘हमसफर’ को बाजार में लाने से चार माह पहले ही बना ली थी. लगभग साढ़े तीन वर्ष पहले ही हमने इन गीतों को बनाया था. निजी स्तर पर ‘हमसफर’ की बनिस्बत ‘गल सुन’ गीत मेरे दिल के ज्यादा करीब है. मैं इसकी सफलता को लेकर आश्वस्त हूं. वीडियो में गीत के साथ एक रोचक कहानी भी है. यह कोई आम म्यूजिक वीडियो नहीं है.’’

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श्रीनगर में सीरियल ‘‘इश्क सुभान अल्लाह’’

मशहूर निर्माता धीरज कुमार इन दिनों कश्मीर और कश्मीर के निवासियों की तारीफ करते हुए नहीं थक रहे हैं. वास्तव में जीटीवी पर सोमवार से शुक्रवार रात दस बजे प्रसारित हो रहे अपने सीरियल ‘‘इश्क सुभान अल्लाह’’ की शूटिंग कश्मीर में लगातार 15 दिन करने के बाद धीरज कुमर वापस लौटे हैं.

इस सीरियल की शूटिंग के लिए सीरियल के मुख्य कलाकार अदनान खान व ईशा सिंह कश्मीर गए थे.

सीरियल की कहानी के अनुसार दोनों निकाह करने के बाद हनीमून मनाने के लिए कश्मीर जाते हैं. इस सीरियल को श्रीनगर व पहलगाम की अति खूबसूरत लोकेशनों पर 15 दिन फिल्माया गया.

सीरियल ‘‘इश्क सुभान अल्लाह’’ के निर्माता धीरज कुमार कहते हैं-‘‘कश्मीर को लेकर जिस तरह की बातें की जा रही हैं,वह अर्थहीन हैं. हमें तो कश्मीर में शूटिंग करने में कोई तकलीफ नहीं हुई. वहां के लोगों ने हमारी काफी मदद की.’’

 

लापरवाही : संकट में सरहदी पहरेदार

पाकिस्तान से सटी भारत की पश्चिमी सरहद पर पहरे के लिए हम सीमा सुरक्षा बल यानी बीएसएफ और ‘रेगिस्तान के जहाज’ ऊंट पर निर्भर हैं, लेकिन हमारी बीएसएफ को कमजोर करने के लिए पिछले कुछ सालों से ऊंटों को खत्म करने की साजिश चल रही है.

इस सदी की शुरुआत में देश में 10 लाख ऊंट थे, जो अब साढ़े 3 लाख ही बचे हैं. यही वजह है कि कई इंटरनैशनल एजेंसियां तो औपचारिक रूप से भारतीय ऊंट को लुप्त होती प्रजाति घोषित कर चुकी हैं.

यह बात भी गौर करने लायक है कि क्या इस मामले में बड़े पैमाने पर विदेशी ताकत का हाथ है, जो हमारे देश में अपने लोगों के जरीए बहुत ही सोचीसमझी चाल के तहत हमारे देश के रक्षा तंत्र को कमजोर करने में लगी हैं, ताकि वे आसानी से देश में घुस सकें?

बीएसएफ केवल लड़ाई ही नहीं लड़ती, बल्कि उसे घुसपैठियों से भी निबटना होता है. सरहद पर हथियारों और नशीली चीजों की तस्करी होना तो आम बात है.

गुजरात और राजस्थान से लगती पाकिस्तान की सरहद तकरीबन 1,040 किलोमीटर लंबी है. जहां तक राजस्थान का सवाल है, तो यहां मीलों तक 30-30 फुट की ऊंचाई के टीले हैं. गरमियों में तापमान 50 डिगरी सैल्सियस तक पहुंच जाता है.

ज्यादातर इलाका रेतीला है और छोटीछोटी कंटीली झाडि़यों से भरा है. इस पर पानी मुहैया होना भी मुश्किल है, जो संकरे कुओं में ही मिलता है. इस इलाके में केवल ऊंटों के दम पर ही सरहद की निगरानी कर पाना मुमकिन है.

ऊंट दिनभर में कम से कम 4 से 5 किलोमीटर तक चल लेता है. ऊंट की ज्यादा ऊंचाई के चलते इस पर बैठा सवार दूर तक देख सकता है. रेतीली जमीन पर भी यह आसानी से दौड़ सकता है.

सब से बड़ी बात यह है कि ऊंट को दिशा की जबरदस्त जानकारी होती है और इसीलिए इसे रात के समय चौकसी के लिए सब से बेहतर समझा जाता है.

देश की हिफाजत करने वाली बीएसएफ के लिए ऊंट बहुत ही अहम पशु है. इस का इस्तेमाल केवल सवारी या चौकसी करने के लिए ही नहीं होता, बल्कि इस का इस्तेमाल सरहद पर बनी चौकियों तक जवानों को खाना पहुंचाने के लिए भी होता है.

इस के अलावा यह बहुत से सामान जैसे चिट्ठियां, दवाएं, सिलैंडर वगैरह पहुंचाने के काम आता है.

ऊंट उन रेतीले इलाकों में भी पहुंच सकता है, जहां दूसरे वाहन नहीं पहुंच पाते. ऊंट की इन्हीं खासीयतों के चलते राजस्थान के रेतीले इलाकों और गुजरात की दलदली जमीन पर बीएसएफ इसे इस्तेमाल करती है.

बीएसएफ की जरूरत

कच्छ और सिंध के निकट 7 सौ किलोमीटर की सरहद में आपराधिक हरकतें बहुत ज्यादा होती हैं. बीएसएफ इस से निबटने के लिए कैमल सफारी का आयोजन भी करती है. इस में वह स्थानीय लोगों को सरहद के पास तक ले कर जाती है और सरहद पर होने वाले अपराधों के बारे में बताती है. इस से बीएसएफ को गांव वालों की ओर से काफी मदद भी मिलती है.

तस्करों और घुसपैठियों को कई बार हमारे जवानों ने ऊंटों पर बैठ कर ही पकड़ा है. गुजरात में साल 2001 में जब भूकंप आया, तो ऊंटों पर सवार जवान ही सब से पहले पहुंच पाए थे, पर अब ऊंटों को ले कर बीएसएफ और गृह मंत्रालय के लिए चेतावनी की घंटी बज चुकी है.

ऊंटों के प्रजनन का काम न तो कोई सरकारी एजेंसी और न ही बीएसएफ देखती है. बीएसएफ तो गांव वालों से या फिर मेलों से 5 से 10 साल की उम्र के ऊंटों को खरीदती है. खरीदने के बाद इन ऊंटों को 21 दिन तक अलग रखा जाता है और इन्हें होने वाली बीमारियां खासकर सुर्रा बीमारी के टीके लगाए जाते हैं.

इस के बाद इन को जोधपुर के सब्सिडरी ट्रेनिंग सैंटर में ट्रेनिंग दी जाती है. बीएसएफ एक ऊंट को 16 सालों तक इस्तेमाल में लेती है, फिर उस की नीलामी कर देती है.

ऊंटों की तस्करी

राजस्थान सरकार ने ऊंटों को राज्य से बाहर ले जाने पर पाबंदी लगा रखी है. इस के बावजूद हर रोज कम से कम 2 सौ ऊंटों की तस्करी राजस्थान से हो रही है. यह सारी तस्करी बागपत, उत्तर प्रदेश के एक गिरोह द्वारा की जा रही है, जिस में राजस्थान और हरियाणा के बहुत से पुलिस वालों की मदद ली जाती है.

सवाल उठता है कि ये ‘गरीब किसान’ सैकड़ों ऊंटों को खरीदने के लिए पैसा कहां से लाते हैं? एकएक ऊंट की कीमत लाखों रुपए में होती है और जैसेजैसे इन की तादाद कम हो रही है, इन की कीमत में इजाफा ही हो रहा है. कौन इन्हें पैसा दे रहा है?

सैकड़ों ऊंट बंगलादेश जा रहे हैं. तमाम ऊंट बागपत, मेरठ और हैदराबाद में मारे जा रहे हैं. दर्जनों ऊंट दिल्ली से सटे मेवात इलाके में लाए जाते हैं और मारे जाते हैं.

जरा सोचिए कि क्या यह केवल ऊंटों के मांस के लिए हो रहा है? इन्हें दिल्ली या आसपास के इलाकों में क्यों लाया जा रहा है? क्या कुछ लोगों ने पिछले 10 सालों में अचानक ऊंट के मांस का स्वाद चख लिया है?

ऊंट का मांस सूखा, कड़ा, तेज गंध वाला होता है. इसे खा पाना और पचाना बहुत ही मुश्किल होता है. ऊंट के मीट को पकाने में ही बहुत अधिक समय लगता है. खाने के लिहाज से कोई अच्छी पसंद नहीं कहा जा सकता, तो फिर कहां और क्यों जा रहे हैं ऊंट?

बीएसएफ अगर अपने बेड़े में आधे ऊंट ही शामिल कर पाई, तब अगले 5 सालों में क्या हालात होंगे? ऊंटों के हिमायती एक संगठन ने पिछले 3 सालों में 15 सौ से ज्यादा ऊंट पकड़े हैं, जो तस्करी के लिए ले जाए जा रहे थे.

बड़ा सवाल यही है कि ऐसे हालात में ऊंटों को बचाने के लिए राजस्थान और हरियाणा की सरकारें क्या उपाय कर रही हैं?

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रामपाल सिंह और शिवराज सिंह का याराना

रामपाल सिंह मध्य प्रदेश के लोक निर्माण मंत्री हैं जिन की गिनती उन इनेगिने मंत्रियों में होती थी जिन के दामन पर कोई दाग नहीं लगा था, पर अब लग गया है. बात कहने को तो बहुत मामूली सी है कि उन के मंझले बेटे गिरजेश प्रताप सिंह ने अपने से थोड़ी सी कम जाति की एक युवती से चोरीछिपे आर्य समाज मंदिर में शादी कर ली, लेकिन मांबाप के सामने वह ढीला पड़ गया और दूसरी जगह सगाई कर ली.

पीडि़ता ने अग्निपरीक्षा देते खुदकुशी कर ली तो राज्यभर में खासा बबाल मच गया. इस मुश्किल घड़ी में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान उन के काम आए और दोस्ती निभाई.

होनहार पुलिस वाले समझ गए कि कानून व्यवस्था कैसे बनाए रखनी है और जांच किस पद्धति से करनी है, लिहाजा, सबकुछ मैनेज हो गया और जो डैमेज हुआ वह इस साल के विधानसभा चुनाव में दिखना तय है, क्योंकि पीडि़ता के समुदाय वाले भी कम ठसक वाले नहीं.

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इंटरनैट का सरकारी दुरुपयोग

फेसबुक द्वारा लाखोंकरोड़ों यूजर्स की निजी जानकारी को विज्ञापनदाताओं के लिए व कैंब्रिज एनालिटिका को चुनावों में दुरुपयोग करने के लिए उपलब्ध कराने पर अमेरिका की संसदीय कमेटी ने फेसबुक के मालिक मार्क जुकरबर्ग से जो जिरह की, उस से साफ हो गया कि आज के राजनीतिबाज, चाहे अमेरिका के हों या भारत के, बेहद सतही व अज्ञानी हैं. उन्हें वोटरों को भ्रमित करना ही आता है. मार्क जुकरबर्ग ने यह तो कई बार माना कि उन्होंने गलतियां की, पर 40-50 सांसद मिल कर मार्क जुकरबर्ग पर कोई आपराधिक मामला न बना सके.

एक के बाद एक सांसद ने उन से सवाल पूछे पर सभी सवाल ऐसे थे जैसे 5वीं कक्षा के छात्र आइंसटाइन की परीक्षा ले रहे हों. मार्क जुकरबर्ग बेहद आत्मविश्वास के साथ बिना लड़खड़ाए जवाब देते रहे और उलटे, यह साबित करते रहे कि सांसदों को खुद नहीं मालूम कि वे पूछना क्या चाहते हैं.

आज दुनिया के सभी देशों में सत्ता चुने हुए जनप्रतिनिधियों के हाथों से फिसल कर बड़ी टैक, फार्मास्युटिकल, औटो, पैट्रोकैमिकल, खुदरा बिक्री करने वाली कंपनियों के हाथों में जाती जा रही हैं. देशों की सरकारें अब मंत्रालयों से नहीं, इन कंपनियों के हैडक्वार्टरों से चलने लगी हैं. कैंब्रिज एनालिटिका ने यह तक साबित कर दिया है कि इन कंपनियों ने अमेरिका में ही नहीं, दुनिया के सभी बड़े लोकतंत्रों पर कब्जा सा कर लिया है और फेसबुक व व्हाट्सऐप ऐसे हथियार बन गए हैं जिन में शिकार खुद अपने हाथों अपने को जंजीरें पहनाते हैं ताकि वे खुद इन के इशारे पर चल सकें और इन के इशारों पर अपने मनचाहे जनप्रतिनिधियों को चलाएं.

सोशल मीडिया क्रांति जनता के हाथों में अधिकारों को देने की क्रांति नहीं है, बल्कि यह पलट क्रांति है जिस में जनता को गुलाम बनाया जा रहा है. जनता उसी तरह भ्रम में डाली जा रही है जैसे लेनिन ने रूस की जनता को डाला था और एडोल्फ हिटलर ने जरमनी की जनता को. परिणाम में आजादी और मुक्ति दिलाने के नाम पर उन्हें पीढि़यों तक गुलामी सहनी पड़ी.

धर्मगुरु बातों के छल्लों की जंजीरें बनाते हैं और कई हजार वर्षों से आज तक उन का कहर दुनिया की 90 प्रतिशत जनता सह रही है. आज दुनियाभर में हिंसा का मुख्य कारण धर्मजनित सोच, अलगाव, नियम, आदेश हैं. फेसबुक और व्हाट्सऐप के सहारे मार्क जुकरबर्ग जैसे नए चक्रवृत्ति सम्राट पैदा हो गए हैं जो अपनी निरीह जनता की पलपल की जानकारी रखते हैं.

नरेंद्र मोदी की सरकार एक तरफ धर्म का सहारा और दूसरी तरफ कंप्यूटरइंटरनैट का सहारा ले कर आधार कार्ड के जरिए सब की जानकारी रखने वाली एकतरफा हुकूमत करना चाह रही है जिस में आप के पलपल की जानकारी मार्क जुकरबर्ग जैसों को रहे और आप केवल ऐसे कुत्ते हों जो गले में पड़ी जंजीर को सुरक्षा का निशान मानता है.

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उजले लोगों का ये है काला धंधा

“हैलो, कैन आई टौक टू रवनीत मैम?’’ मोबाइल फोन पर किसी पुरुष की रौबदार आवाज उभरी. ‘‘यस, आफकोर्स.’’ दूसरी ओर से किसी युवती ने खनकती आवाज में पूछा.

‘‘मैम, मैं जयपुर से आया हूं, मेरा नाम करण है… करण शर्मा…’’ उसी रौबदार आवाज में पुरुष ने कहा, ‘‘दरअसल, मैं जयपुर में एक मीडिया हाउस में काम करता हूं. मेरे दोस्त ने रवनीत मैम का नंबर दिया था, इसीलिए फोन किया है.’’

‘‘यस, आई एम रवनीत स्पीकिंग.’’ उसी खनकती आवाज में युवती ने कहा.

‘‘मैम, मैं आप के कोचिंग सैंटर में अपने बेटे का एडमिशन कराना चाहता हूं, इसलिए आप से मिलना चाहता हूं.’’ करण ने फोन करने का मकसद बताया.

‘‘यस, आप कोटा आएं तो सीधे कोचिंग सैंटर आ जाएं, मुलाकात हो जाएगी.’’ युवती ने कहा.

‘‘मैम, मैं आज जयपुर से इसी काम के लिए कोटा आया हूं, आप कहें तो मैं आ जाऊं?’’ करण ने गुजारिश करने वाले अंदाज में कहा.

‘‘ठीक है, अभी एक बजा है, आप ऐसा कीजिए, 2 बजे तक आ जाइए. इतनी देर में मैं लंच कर लेती हूं.’’ रवनीत ने कहा.

‘‘ओके मैम.’’ करण ने कहा.

यह 4 जनवरी, 2017 की बात है. रवनीत कोटा के एक नामी कोचिंग इंस्टीट्यूट में पब्लिक रिलेशन (पीआर) का काम करती थी. इस इंस्टीट्यूट में आईआईटी-जेईई आदि परीक्षाओं की तैयारी कराई जाती थी.

इस कोचिंग इंस्टीट्यूट में काम करते उसे अभी कुछ ही महीने हुए थे, लेकिन अपनी खूबसूरती और अच्छी अंगरेजी में लच्छेदार बातें करने की वजह से वह इतने कम समय में ही कोचिंग संस्थान के कामकाज से अच्छी तरह वाकिफ ही नहीं हो गई थी, बल्कि पब्लिक रिलेशन की जिम्मेदारी संभालने की वजह से कोचिंग इंस्टीट्यूट में अपने बच्चों का एडमिशन दिलाने के लिए तमाम प्रभावशाली लोग उस की मदद ले रहे थे. क्योंकि कोचिंग इस्टीट्यूट की मोटी फीस में वह कुछ रियायत भी करवा देती थी.

करण जैसे मीडियापर्सन का फोन आना रवनीत के लिए रोजाना की तरह सामान्य बात थी. उस समय दोपहर का एक बज चुका था. उस के पेट में चूहे कूद रहे थे. वह घर से लंचबौक्स लाई थी.

लंचबौक्स खोल कर सुकून से लंच करने के साथ वह अपने मोबाइल फोन पर वाट्सएप पर आ रहे वीडियो, फोटो व मैसेज भी देख रही थी. इस बीच एकदो फोन आए तो रवनीत ने उन्हें इग्नोर क र दिया.

रवनीत लंच खत्म कर के बैठी ही थी कि उस के केबिन में एक हैंडसम आदमी दाखिल हुआ. उस के साथ एक युवती भी थी. अंदर आते ही उस आदमी ने कहा, ‘‘हैलो रवनीत मैम, माईसेल्फ करण.’’

‘‘ओ यस, करण फ्रौम जयपुर?’’ रवनीत ने सवाल किया. लेकिन जवाब मिलने से पहले ही बोली, ‘‘प्लीज सिट.’’

‘‘रवनीतजी, मैं आप के कोचिंग में अपने बेटे के एडमिशन के लिए आया हूं.’’ करण ने अपने आने का मकसद बताते हुए कहा, ‘‘वैसे मैं जयपुर के एक मीडिया हाउस में काम करता हूं. पीआर में आप जैसे स्मार्ट चेहरे कम ही होते हैं. आप का चेहरा देख कर मुझे याद आ रहा है कि मैं ने आप को जयपुर में कहीं देखा है.’’

करण की इस बात पर रवनीत एकदम से हड़बड़ा उठी. फिर खुद को संभाल कर बोली, ‘‘जयपुर में… हां, दरअसल मैं ने जयपुर में पढ़ाई की थी न. शायद तभी कभी देखा होगा.’’

रवनीत की हड़बड़ाहट देख कर करण समझ गया कि वह सही ठिकाने पर पहुंच गया है. जिस रवनीत की तलाश में वह 10 दिनों से भटक रहा था, वह यही रवनीत है. करण ने उस की आंखों में आंखें डाल कर कहा, ‘‘मेरा नाम करण शर्मा नहीं, मैं एसओजी का पुलिस इंसपेक्टर हूं. मेरे साथ यह महिला भी पुलिस इंसपेक्टर हैं. रवनीत, अब तुम्हारा भांडा फूट चुका है. तुम ने बहुत लोगों को अपनी सुंदरता के जाल में फांसा और उन्हें ब्लैकमेल कर के उन से करोड़ों रुपए वसूले. हम तुम्हें गिरफ्तार करने आए हैं.’’

इसंपेक्टर की बात सुन कर रवनीत के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं. वह चेहरा छिपा कर फूटफूट कर रोने लगी. थोड़ा रो लेने के बाद उस ने हिचकियां लेते हुए कहा, ‘‘सर, मैं ने अब वह सब छोड़ दिया है. उन बदमाशों ने मुझ से चीटिंग की थी. इसलिए मैं ने उन का साथ छोड़ दिया है. इन बातों को काफी समय हो गया है. अब मैं शांति की जिंदगी जी रही हूं. प्लीज, मुझे शांति से जीने दीजिए.’’

‘‘तुम्हें जो कुछ भी कहना है, पुलिस स्टेशन चल कर कहना.’’ कह कर दोनों पुलिस अधिकारी रवनीत को हिरासत में ले कर कोचिंग इस्टीट्यूट से बाहर ले आए और वहां खड़ी गाड़ी में बैठा कर अपनी टीम के साथ सीधे जयपुर के लिए चल पड़े.

कोटा से जयपुर तक के लंबे सफर में रवनीत गुमसुम बैठी रही. जयपुर पहुंचतेपहुंचते रात हो गई थी. इसलिए रवनीत से उस दिन पूछताछ नहीं की जा सकी. अगले दिन सुबह एसओजी के अधिकारियों ने रवनीत से पूछताछ शुरू की. अधिकारियों ने उस से कहा कि वह इस बात को ठीक से जान ले कि पुलिस को उस के पूरे गिरोह का पता चल चुका है. कुछ लोगों को गिरफ्तार भी किया जा चुका है. इसलिए वह खुद ही बता दे कि उस ने किनकिन लोगों को अपने हुस्न के जाल में फांस कर उन से कितनी रकम ऐंठी है? इस काम में उस के साथ कौनकौन लोग शामिल थे?

रवनीत की कहानी जानने से पहले आइए यह जान लेते हैं कि पुलिस को उस के बारे में कैसे पता चला?

12 मई, 2015 को जयपुर के विद्याधरनगर इलाके में सैंट्रल स्पाइन स्थित अलंकार प्लाजा के सामने दिनदहाड़े 34 साल के हिम्मत सिंह की गोली मार कर हत्या कर दी गई थी. हमलावर 2 थे और मोटरसाइकिल से आए थे. हिम्मत सिंह हरमाड़ा थाने का हिस्ट्रीशीटर था. वह प्रौपर्टी का कारोबार करता था और जयपुर के राजपुरा हरमाड़ा के लक्ष्मीनगर में परिवार के साथ रहता था. जबकि वह मूलरूप से सीकर के राजपुरा गांव का रहने वाला था. बैनाड़ रोड पर मां भगवती प्रौपर्टीज के नाम से उस ने अपना औफिस बना रखा था.

थाना पुलिस इस मामले में कुछ नहीं कर पाई तो इस मामले की जांच एसओजी को सौंप दी गई. हिम्मत सिंह की हत्या के आरोप में करीब डेढ़ साल बाद दिसंबर, 2016 के दूसरे सप्ताह में एसओजी ने 2 लोगों को गिरफ्तार किया. इन में एक जयपुर के तिलकनगर का रहने वाला आनंद शांडिल्य था और दूसरा उत्तर प्रदेश के बिजनौर का रहने वाला अनुराग चौधरी उर्फ रानू.

अनुराग चौधरी जयपुर के विद्युतनगर में रहता था. दोनों से पूछताछ में पता चला कि हिम्मत सिंह की हत्या राजस्थान के कुख्यात अपराधी आनंदपाल सिंह ने कराई थी. आनंदपाल अदालत से जेल जाते समय पुलिस पर गोलियां चला कर फरार हो गया था. वह अभी भी पुलिस गिरफ्त से बाहर है.

आनंद और अनुराग आनंदपाल के सहयोगी थे. हिम्मत सिंह की हत्या जयपुर में हरमाड़ा के पीछे माचड़ा में एक जमीन पर कब्जे को ले कर की गई थी. इस जमीन पर हिम्मत सिंह की नजर थी, जबकि आनंदपाल की नजर पहले से ही उस जमीन पर थी. आनंदपाल के इशारे पर ही उस के गिरोह के लोगों ने हिम्मत सिंह की गोली मार कर हत्या की थी.

पुलिस आनंद और अनुराग से आनंदपाल और उस के गिरोह के बारे में पूछताछ कर रही थी. इसी पूछताछ में पुलिस के सामने एक नया खुलासा हुआ. आनंद शांडिल्य ने पुलिस को बताया कि जयपुर में एक ऐसा भी गिरोह सक्रिय है, जो हाईप्रोफाइल लोगों के साथ ब्लैकमेलिंग करता है.

इस काले धंधे में सारे बड़े लोग शामिल हैं. बड़े लोगों से मतलब वे लोग हैं, जो समाज में प्रतिष्ठा की नजर से देखे जाते हैं. इस गिरोह में कुछ वकील, पुलिस वाले, प्रौपर्टी व्यवसाई और फरजी पत्रकार भी शामिल हैं.

यह गिरोह खूबसूरत लड़कियों की मदद से रईस लोगों को ब्लैकमेल करता है. इस गिरोह के लोग पहले तो रईस लोगों की पहचान करते हैं, उस के बाद उन्हें फंसाने के लिए उन की दोस्ती गिरोह की खूबसूरत लड़कियों से करा देते हैं. दोस्ती के लिए वे फार्महाउसों पर सेलिबे्रट पार्टियां आयोजित करते हैं. इन पार्टियों में पीनेपिलाने का दौर चलता है.

उसी बीच लड़कियां शिकार को अपने मोबाइल नंबर दे देती हैं और उन के नंबर ले लेती हैं. इस के बाद पहले बातचीत और उस के बाद मुलाकातों का दौर शुरू हो जाता है. कुछ ही मुलाकातों में लड़कियां अपने शिकार को अपनी सुंदरता के मोहपाश में इस कदर बांध लेती हैं कि वे उन के साथ हमबिस्तर होने के लिए बेचैन हो उठते हैं.

शिकार को तड़पा कर लड़कियां हमबिस्तर होने का प्रोग्राम बनाती हैं. इस के लिए वे कई बार जयपुर से बाहर भी चली जाती हैं. रईसों के साथ उन के हमबिस्तर होने के समय गिरोह के सदस्य लड़की की मदद से गुप्त कैमरे से वीडियो क्लिपिंग बना लेते हैं. अगर इस में वे सफल नहीं हो पाते तो लड़कियां हमबिस्तर होने के बाद अपने अंतर्वस्त्र सुरक्षित रख लेती हैं.

इस के बाद उस रईस को धमकाने का काम शुरू होता है. लड़की अपने रईस शिकार को पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराने की धमकी देती है. ज्यादातर मामलों में लड़कियां पुलिस में शिकायत कर भी देती हैं. इस के बाद फरजी पत्रकार और वकील का काम शुरू होता है. वे उस रईस को बदनामी का डर दिखा कर समझौता कराने की बात करते हैं. जरूरत पड़ने पर बीच में पुलिस वाले भी आ जाते हैं.

रईस अपनी इज्जत बचाने के लिए उन से सौदा करता है. रईस की हैसियत देख कर 10-12 लाख रुपए से ले कर एक करोड़ रुपए तक मांगे जाते हैं. गिरोह के लोग शिकार पर दबाव बनाए रखते हैं. आखिर रईस को सौदा करना पड़ता है. उस से पैसे लाने का काम अलग लोग करते हैं.

आनंद शांडिल्य ने पुलिस को बताया था कि यह गिरोह जयपुर सहित राजस्थान के बड़े शहरों के नामचीन प्रौपर्टी व्यवसायियों, बिल्डरों, मोटा पैसा कमाने वाले डाक्टरों, ज्वैलर्स, होटल रिसौर्ट संचालक और ठेकेदार आदि को अपना शिकार बनाता. इस काले धंधे में एक एनआरआई युवती भी शामिल है.

गिरोह के लोग लड़की को प्लौट या फ्लैट खरीदने के बहाने प्रौपर्टी व्यवसाई अथवा बिल्डर के पास भेज कर उसे फांस लेते हैं. इसी तरह होटल रिसौर्ट संचालक के पास नौकरी के बहाने भेजा जाता है तो डाक्टर के पास इलाज के बहाने. सौदा होने के बाद युवती और उस के गिरोह के सदस्य स्टांप पर लिख कर देते हैं कि दुष्कर्म नहीं हुआ है.

इस के पहले जयपुर में कभी इस तरह का कोई बड़ा मामला सामने नहीं आया था. इसलिए एसओजी के लिए हकीकत जानना अत्यंत महत्त्वपूर्ण था. अधिकारियों ने आपस में सलाहमशविरा कर के एसओजी के आईजी एम.एन. दिनेश के निर्देशन में हाईप्रोफाइल ब्लैकमेलिंग करने वाले गिरोह की खोजबीन शुरू कर दी.

उसी बीच इस गिरोह से पीडि़त जयपुर के वैशालीनगर निवासी डा. सुनीत सोनी ने एसओजी में शिकायत कराई कि उन का वैशालीनगर में हेयर ट्रांसप्लांट का क्लीनिक है. कुछ महीने पहले एक लड़की हेयर ट्रांसप्लांट कराने के लिए उन की क्लीनिक में आई. तभी उन का उस लड़की से संपर्क हुआ. लड़की ने जल्दी ही उन्हें प्रेमजाल में फांस लिया. इस के बाद दोनों पुष्कर गए और वहां एक रिसौर्ट में रुके. 2 दिनों बाद 2 लड़के मीडियाकर्मी बन कर आए और लड़की से दुष्कर्म का मुकदमा दर्ज कराने की धमकी दे कर उन से एक करोड़ रुपए मांगे.

डाक्टर ने रुपए देने से मना किया तो लड़की ने उन के खिलाफ पुष्कर में दुष्कर्म का मुकदमा दर्ज करा दिया. जांच के बाद पुलिस ने डा. सुनीत सोनी को गिरफ्तार कर के जेल भेज दिया. डाक्टर करीब ढाई महीने तक जेल में रहे. इस बीच डाक्टर से गिरोह के वकील सहित अलगअलग लोगों ने संपर्क किया.

गिरोह के सदस्यों ने अदालत में लड़की के बयान बदलवाने के लिए डाक्टर से डेढ़ करोड़ रुपए की मांग की. आखिर सौदा एक करोड़ रुपए में तय हो गया. पैसे लेने के बाद गिरोह के लोगों ने लड़की के बयान बदलवा दिए. उस समय डा. सुनीत सोनी ने जयपुर के थाना वैशालीनगर में इस मामले की रिपोर्ट भी दर्ज कराई थी. लेकिन उस समय थाना पुलिस ने कोई काररवाई नहीं की थी.

डा. सुनीत सोनी की शिकायत पर जांच करते हुए एसओजी ने 24 दिसंबर, 2016 को इस हाईप्रोफाइल ब्लैकमेलिंग करने वाले गिरोह का खुलासा किया. एसओजी ने गिरोह के 2 लोगों को गिरफ्तार कर लिया था. गिरफ्तार किए गए लोगों से पूछताछ की गई तो गिरोह में शामिल लड़कियों के बारे में पता चल गया. इन्हीं लोगों से गिरोह की एनआरआई लड़की रवनीत कौर उर्फ रूबी के बारे में पता चला था. इस के अलावा एक लड़की कल्पना उत्तराखंड की थी.

इस के बाद एसओजी इस पूरे गिरोह को गिरफ्तार करने में जुट गई. धीरेधीरे लोग पकड़े भी जाने लगे. एसओजी उत्तराखंड के ऊधमसिंहनगर से कल्पना को गिरफ्तार कर के जयपुर ले आई. पूछताछ में कल्पना ने बताया कि गिरोह ने उस की मदद से कई लोगों को अपने जाल में फांस कर मोटी रकम ऐंठी थी.

कल्पना से पूछताछ के बाद राजस्थान सशस्त्र पुलिस बल (आरएसी) के कांस्टेबल हरिकिशन को गिरफ्तार किया गया. उस ने गिरोह के लिए उत्तराखंड से अन्य कई लड़कियों को बुलाया था. कल्पना को भी वही लाया था.

गिरोह ने कल्पना को इस काम के लिए जो रकम देने का वादा किया था, वह रकम उसे नहीं मिली थी. इस के बाद उस ने गिरोह के सदस्य एक वकील को दुष्कर्म का केस दर्ज कराने की धमकी दी थी. इस से घबराए वकील ने कल्पना से सन 2015 में आमेर के एक मंदिर में शादी कर ली थी. वकील से शादी के बाद भी गिरोह कल्पना से हाईप्रोफाइल ब्लैकमेलिंग की वारदातों का काम लेता रहा.

कल्पना की गिरफ्तारी के बाद एसओजी का दल एनआरआई लड़की रवनीत कौर की तलाश में जुट गया. लेकिन समस्या यह थी कि अब तक रवनीत का गिरोह से पैसों के लेनदेन को ले कर विवाद हो गया था, जिस से वह गिरोह  से अलग हो गई थी. एसओजी को कहीं से जानकारी मिली कि रवनीत कोटा में है. जांच अधिकारियों को उस के फेसबुक एकाउंट का भी पता चल गया था.

इस के बाद एसओजी ने रवनीत के मोबाइल नंबर हासिल कर लिए. उस का नंबर मिल गया तो एसओजी की टीम कोटा पहुंच गई और एक पुलिस इंसपेक्टर ने रवनीत को जयपुर के मीडियाकर्मी करण के नाम से फोन किया. इस के बाद उसे किस तरह पकड़ा गया, आप शुरू में पढ़ चुके हैं. रवनीत कौर उर्फ रूबी से पूछताछ में उस की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार थी—

27 साल की रवनीत कौर उर्फ रूबी हांगकांग में पैदा हुई थी. उस के पिता पंजाब के फरीदकोट के रहने वाले थे. वह कारोबार के सिलसिले में हांगकांग गए थे. वहां उन का कामधाम जम गया तो वहीं उन्होंने भारतीय मूल की महिला से शादी कर ली.

रवनीत सन 2008 में ओवरसीज कार्ड पर अपनी दादी के पास जालंधर रहने आई. जालंधर से वह सन 2012 में जयपुर आ गई और एक यूनिवर्सिटी से उस ने 3 साल के बीबीए कोर्स में एडमिशन ले लिया. उसी यूनिवर्सिटी में एमबीए कर रहे कोटा निवासी रोहित से उस की दोस्ती हो गई. रवनीत कौर को बीबीए की पढ़ाई रास नहीं आई तो उस ने 2 साल बाद पढ़ाई छोड़ दी.

इस बीच रवनीत बीचबीच में अपने मातापिता के पास हांगकांग भी जाती रही. सन 2013 के अंत में उस के मातापिता ने कनाडा के एक एनआरआई बिजनैसमैन से उस की शादी तय कर दी. रवनीत भी उस से शादी करने को तैयार थी. इस का कारण यह था कि उस समय तक रवनीत की कोटा के रहने वाले रोहित से केवल दोस्ती थी.

दोस्ती इतनी आगे नहीं बढ़ी थी कि वह उस से शादी के बारे में सोचती. उस ने मातापिता से कहा कि शादी में वह जयपुर का लहंगा पहनेगी और वहीं से शादी के अन्य कपड़े और ज्वैलरी ले कर आएगी.

मातापिता ने उसे जयपुर से लहंगा और अन्य सामान लाने के लिए 8 लाख रुपए दे दिए. जयपुर आ कर रवनीत के 8 लाख रुपए खर्च हो गए मातापिता से शादी के सामान के लिए लाए पैसे खर्च हो गए तो रवनीत परेशान हो उठी. इस बीच उस की शादी भी टूट गई तो वह जयपुर में ही नौकरी की तलाश करने लगी. तभी वह इस गिरोह के संपर्क में आई. यह सन 2014 की बात है. गिरोह के इशारे पर रवनीत ने 6-7 लोगों को अपनी सुंदरता के जाल में फांस कर करोड़ों की वसूली की. सब से पहले उस ने एक बिल्डर को अपने हुस्न का जलवा दिखा कर उस से एक गोल्फ क्लब में मीटिंग तय की.

फ्लैट का सौदा करने दोनों में ही दोस्ती हो गई तो जल्दी ही दोनों में अनैतिक संबंध भी बन गए. बिल्डर के खिलाफ वकील ने इस्तगासा पेश करने की धमकी दी तो मीडियाकर्मी ने खबर चलाने की धमकी दी. गिरोह के इशारे पर रवनीत ने उस से एक करोड़ रुपए मांगे.

अंत में उस से 35 लाख रुपए वसूले गए. इस के बाद रवनीत को मोहरा बना कर गिरोह ने एक बिल्डर से 50 लाख, एक एक्सपोर्टर से 23 लाख, एक डाक्टर से एक करोड़ 5 लाख, प्रौपर्टी व्यवसाई से 80 लाख और रिसौर्ट मालिक के बेटे से 45 लाख रुपए वसूले.

ब्लैकमेलिंग से मोटी रकम मिली तो रवनीत ने हांगकांग जा कर अपने मातापिता को उन से लिए 8 लाख रुपए लौटा दिए. उस ने अपने घर वालों को बताया कि वह जयपुर में नौकरी करती है. उस ने उन से कोटा के अपने प्रेमी के बारे में भी बता दिया था.

उसी बीच रवनीत कौर उर्फ रूबी का गिरोह के लोगों से पैसों के बंटवारे को ले कर विवाद हो गया. इस की वजह यह थी कि गिरोह के सदस्य शिकार से तो मोटी रकम ऐंठते थे, लेकिन रवनीत को काफी कम पैसे देते थे. इसी बात को ले कर दिसंबर, 2015 के आखिर में रवनीत ने गिरोह छोड़ दिया.

इस के बाद रवनीत ने सन 2016 के शुरू में कोटा निवासी अपने प्रेमी रोहित से शादी कर ली. शादी के बाद वह कोटा चली गई, जहां वह महावीरनगर तृतीय में ससुराल वालों के साथ रहने लगी. बाद में उस ने कोटा की एक कोचिंग इस्टीट्यूट में नौकरी कर ली. उस इंस्टीट्यूट को छोड़ कर उस ने दूसरे कोचिंग इंस्टीट्यूट में करीब 4 महीने ही नौकरी की थी कि एसओजी ने उसे गिरफ्तार कर लिया था. रवनीत की गिरफ्तारी तक उस की ससुराल वालों को उस के कारनामों का पता नहीं था.

एसओजी ने उसे अदालत में पेश कर सुबूत जुटाने के लिए रिमांड पर लिया. उस की हैंडराइटिंग और हस्ताक्षरों के नमूने लिए, ताकि उस का शिकार बने लोगों को लिखित में दिए गए स्टांप पेपरों की लिखावट से मिलान किया जा सके.

स्टांप पर रवनीत कौर अपने हाथों से लिख कर हस्ताक्षर करती थी. स्टांप पर लिखे समझौतों और हस्ताक्षरों की मिलान के लिए अदालत में रवनीत कौर से लिखवा कर हस्ताक्षर कराए गए. इस के बाद इन्हें जांच के लिए विधिविज्ञान प्रयोगशाला भेजा गया.

इस गिरोह की दूसरी हसीना रीना शुक्ला और उस के सहयोगियों ने एक चार्टर्ड एकाउंटैंट से 70 लाख रुपए ऐंठे थे. हाईप्रोफाइल ब्लैकमेलिंग गिरोह का खुलासा होने पर एसओजी में इस संबंध में शिकायत दर्ज कराई है. इसी के बाद एसओजी ने रीना शुक्ला, शंभू सिंह और किशोरीलाल को गिरफ्तार किया था.

किशोरीलाल सीए का दोस्त था. शंभू सिंह जयपुर के मानसरोवर में प्रौपर्टी का कारोबार करता था, जबकि रीना शुक्ला गरीब बच्चों का एक एनजीओ चलाती थी. रीना ने एक मासिक अखबार का रजिस्ट्रेशन भी करा रखा था. आरोपियों ने इसी अखबार के प्रैस कार्ड भी बनवा रखे थे. इन लोगों से पूछताछ में पता चला कि शंभू सिंह के प्रौपर्टी के व्यवसाय को वही सीए संभालता था.

रीना सन 2008 से शंभू सिंह के संपर्क में थी. शंभू सिंह के मार्फत रीना की दोस्ती सीए से हुई. रीना की मौसी कोटा में रहती थी. उस के पड़ोस में अनीता रहती थी. रीना ने अनीता को नौकरी दिलाने के बहाने सन 2013 में जयपुर बुलाया और सीए के माध्यम से एक कंपनी में नौकरी दिलवा दी, साथ ही रहने के लिए जयपुर के प्रतापनगर में एक फ्लैट किराए पर दिलवा दिया.

नवंबर, 2013 में रीना के रिश्तेदार की शादी में शरीक होने के लिए शंभू सिंह और अनीता राजस्थान के प्रतापगढ़ शहर गए. वहीं पर सीए अनीता के बीच अनैतिक संबंध बन गए. इस के सबूत रीना और अनीता ने एकत्र कर लिए. उन्हीं सबूतों के आधार पर उन्होंने सीए को ब्लैकमेल करना शुरू कर दिया.

रीना ने सीए से अनीता को एक लाख रुपए दिलवा कर कोटा भेज दिया. इस के बाद भी रीना और शंभू सिंह ने सीए को ब्लैकमेल करना जारी रखा. उन्होंने 6 महीने में उस से 10 लाख रुपए वसूल लिए.

किशोरीलाल को पता था कि रीना और शंभू सिंह सीए को ब्लैकमेल कर रहे हैं. उसी बीच सीए ने मानसरोवर स्थित अपना एक प्लौट सवा करोड़ रुपए में बेचा. किशोरीलाल ने सीए के प्लौट बेचने की बात रीना और शंभू सिंह को बता दी. सीए के पास मोटी रकम देख कर शंभू सिंह और रीना को लालच आ गया. उन्होंने सीए को धमकी दी कि अनीता कोर्ट में दुष्कर्म का इस्तगासा दर्ज करवा रही है. अगर समझौता करना हो तो वह एक करोड़ रुपए मांग रही है. उस ने मीडिया में भी मामला उजागर करने की धमकी दी.

इन धमकियों से सीए परेशान हो गया. वह आत्महत्या करने की सोचने लगा. इस के बाद शंभू सिंह के साथ मिल कर किशोरीलाल ने 70 लाख रुपए में सौदा करवा दिया. सीए ने अपने दोस्त किशोरीलाल को यह मामला निपटाने के लिए 70 लाख रुपए दे दिए. किशोरीलाल शंभू सिंह और रीना के साथ अनीता को यह रकम देने कोटा गया.

वहां उस ने 20 लाख रुपए खुद रखे और 50 लाख रुपए शंभू सिंह और रीना को दे दिए. रीना और शंभू सिंह ने अनीता को होटल में बुला कर एक समझौता पत्र तैयार किया. इस के बाद रीना ने समझौता पत्र और रुपए के साथ अनीता की एक फोटो ले ली.

शंभू सिंह और रीना ने अनीता को बताया कि सीए ने कोटा में कोई प्रौपर्टी खरीदी है, ये रुपए उन्हीं के हैं. वे प्रौपर्टी खरीदने के लिए सीए के दोस्त के साथ कोटा आए हैं. अनीता को बातों में उलझा कर रीना और शंभू सिंह ने उसे मात्र 10 हजार रुपए दे कर घर भेज दिया, बाकी रुपए दोनों ने अपने पास रख ली और सीए को समझौता पत्र और फोटो दे कर बता दिया कि समझौता हो गया.

एसओजी ने रीना और शंभू सिंह से अनीता के बारे में पूछताछ की तो उन्होंने बताया कि अनीता की 6 महीने पहले कैंसर से मौत हो गई है. एसओजी अधिकारियों को आशंका है कि कहीं मामले का खुलासा होने के डर से अनीता की हत्या तो नहीं कर दी गई. इस बात की जांच शुरू हुई. इस जांच में शंभू सिंह के बैंक लौकर से 15 से ज्यादा सीडियां मिली हैं, जिन्हें पुलिस ने देखा तो उन में तमाम लोगों की आपत्तिजनक फिल्में थीं. इस से स्पष्ट हो गया कि इन लोगों ने अन्य लोगों से भी पैसे ऐंठे हैं.

जांच में रीना और शंभू सिंह के उस झूठ का परदाफाश हो गया कि अनीता मर चुकी है. एसओजी ने कोटा निवासी अनीता चौहान को गुजरात के अहमदाबाद शहर से जीवित बरामद कर लिया.

पूछताछ में अनीता ने बताया कि वह अपने पति के साथ पिछले 3-4 महीने से अहमदाबाद में रह रही थी. उसे शंभू सिंह और रीना शुक्ला द्वारा उस के नाम पर सीए से 70 लाख रुपए ऐंठने की जानकारी नहीं थी. पूछताछ के बाद पुलिस ने अनीता को छोड़ दिया था. वह इस मामले में गवाह बन गई है.

जयपुर में इस तरह की ब्लैकमेलिंग करने वाले नएनए गिरोह सामने आ रहे हैं. एक अन्य गिरोह में तो एक सरकारी वकील के साथ कई लड़कियां शामिल थीं. उन्होंने स्पा मसाज सैंटर के नाम पर रईसों से मोटी रकम ऐंठी. एसओजी ने इस गिरोह की 2 लड़कियों वंदना भट्ट और पूनम कंवर को 11 फरवरी को गिरफ्तार किया.

इन्होंने एक साल में 6 रईसों से 60 लाख रुपए वसूल करने की बात स्वीकार की है. ये लड़कियां रईसों को मसाज पार्लर में बुला कर फांसती थीं. अनैतिक संबंध बनने के बाद थाने में शिकायत दर्ज करा कर वकील और उस के साथी उस रईस को फोन कर धमकाते थे और समझौता कराने के नाम पर 10 से 15 लाख रुपए ऐंठ लेते थे.

सौदा होने के बाद ये लोग पीडि़त को स्टांप पर समझौता लिख कर देते थे. एसओजी की जांच में सामने आया है कि हाईप्रोफाइल ब्लैकमेलिंग गिरोह ने ढाई साल में करीब 45 लोेगों से 20 करोड़ रुपए वसूले हैं.

इन में गिरोह के सरगना एक वकील और कुख्यात अपराधी आनंदपाल के साथी आनंद शांडिल्य के हिस्से में 2-2 करोड़ रुपए आए हैं. रवनीत कौर के हिस्से में डेढ़ करोड़ रुपए आए थे. बाकी रकम अन्य सदस्यों में बांटी गई थी. गिरोह के सरगना वकील ने 8 वारदातों के बाद आनंद शांडिल्य को अलग कर दिया था. इस का कारण यह था कि आनंद शांडिल्य ब्लैकमेलिंग की राशि लाता था तो उस में से 15-20 लाख रुपए पहले  ही खुद रख लेता था. इस के बाद लाई गई रकम में भी हिस्सा लेता था. इस बात का पता गिरोह के दूसरे सदस्य वकील को चल गया था.

इस हाईप्रोफाइल ब्लैकमेलिंग गिरोह में 4 वकील, 2 फरजी पत्रकार एवं एनआरआई युवती सहित करीब 30 लोग शामिल थे. गिरोह के सरगना वकील को एसओजी ने 9 फरवरी को गोवा से गिरफ्तार किया था. वहां भी उस के साथ एक युवती थी. उस युवती के बारे में जांच की जा रही है.

एक वकील को जयपुर से एक दिन पहले ही एसओजी ने गिरफ्तार किया था. फरार आरोपियों की तलाश में एसओजी जुटी हुई है. जयपुर बार एसोसिएशन ने गिरोह में शामिल वकीलों की सदस्यता रद्द कर दी है. बार कौंसिल के चेयरमैन एम.एम. लोढा ने 12 फरवरी को कहा है कि दुष्कर्म के झूठे केस में फंसा कर रुपए ऐंठने वाले वकीलों की सदस्यता बार कौंसिल से भी समाप्त कर दी जाएगी.

– कथा पुलिस सूत्रों व अन्य रिपोर्ट्स पर आधारित

होप और हम : आकर्षित नहीं करती ये फिल्म

‘लोगों से प्यार करो, चीजों से नहीं’ सहित कई छोटे छोटे संदेश देने वाली फिल्म ‘‘होप और हम’’ जिंदगी के छोटे छोटे पलों के साथ ही आशा व उम्मीदों की बात करती है. इंसानी भावनाओं की सीधी सादी कहानी के साथ फिल्म में लघु प्रेम कहानी भी है.

फिल्म की कहानी मुंबई के एक मध्यमवर्गीय परिवार की है. जिसके मुखिया नागेश श्रीवास्तव (नसिरूद्दीन शाह) हैं. उनके दो बेटे नीरज (अमीर बशीर) व नितिन (नवीन कस्तूरिया) हैं. नितिन दुबई में नौकरी कर रहा है. नीरज की पत्नी अदिति (सोनाली कुलकर्णी) और उनकी बेटी तनु (वृति वघानी) व बेटा अनुराग (मास्टर कबीर साजिद) है. अनुराग को क्रिकेट काशौक है. नागेश श्रीवास्तव के पास एक जर्मन कंपनी की एक फोटो कापी मशीन है, जिसे वह मिस्टर सोनेकेन बुलाते रहते हैं. जिसका लेंस खराब हो गया है, इसलिए अब फोटो कापी सही नहीं निकलती, परिणामतः हर ग्राहक उन्हे दस बातें सुनाकर चला जाता है.bollywood movie review hope aur hum

अदिति चाहती हैं कि उनके ससुर जी अब उस मशीन को बेच दें,तो उस जगह पर तनु के लिए एक कमरा बन जाए. जबकि नागेश का फोटो कापी मशीन से दिल का लगाव है और वह अपने काम को एक कलात्मक काम मानते हैं. वह मशीन के लिए लेंस तलाश रहे हैं. इसके लिए उनकी पोती तनु कंपनियों को ईमेल भेज कर लेंस के बारे में पूछताछ करती रहती है, पर हर बार उसे एक ही जवाब मिलता है कि उस फोटोकापी मशीन का लेंस नही है. मगर नागेश को उम्मीद है कि फोटो कापी मशीन का लेंस जरुर मिलेगा.bollywood movie review hope aur hum

इसी बीच अनुराग की नानी (बीना बनर्जी) के बुलावे पर नीरज व अनुराग राजपीपला में उनकी पुरानी कोठी पर जाते हैं, जहां अनुराग के मामा, नानी की इच्छा के बगैर कोठी को होटल बनाने के लिए किसी को बेच रहे हैं. नानी की कोठी में अनुराग अपने नाना के कमरे में जाता है और उनकी किताबें पढ़ने के साथ ही संगीत सुनता रहता है. एक दिन वह क्रिकेट खेलने निकलता है और गेंद कोठी के एक कमरे में जाती है तो जब वह गेंद लेन जाता है,तो उसके साथ एक ऐसा हादसा होता है, जिससे वह अपराधबोध से ग्रसित हो जाता हे और फिर उसका व्यवहार ही बदल जाता है.

इधर अनुराग का चाचा दुबई से वापस आता है, वह हर किसी के लिए कुछ न कुछ उपहार लेकर आया है. वह अपने पिता नागेश के लिए नई फोटोकापी यानी मशीन लेकर आया है. एक दिन नाटकीय तरीके से पिता को नई मशीन पर काम करने के लिए राजी कर लेता है. जबकि इस बार नागेश ने जर्मन भाषा में तनु से एक कंपनी को लेंस के लिए ईमेल भिजवाया है. नागेश अपनी फोटोकापी मशीन को बेचकर उस जगह पर तनु के लिए कमरा बनवा देते हैं. नागेष अपना मोबाइल फोन टैक्सी में भूल गया है. पर उसे उम्मीद है कि उसका मोबाइल फोन मिल जाएगा.bollywood movie review hope aur hum

एक दिन एक लड़की उसका फोन उठाती है और मोबाइल फोन लेने के लिए काफीशौप बुलाती है, पर कई घंटे इंतजार के बाद जब नितिन वापस लौटने लगता है तो वही लड़की (नेहाचौहान) नाटकीय तरीके से उसे औटोरिक्शा में उसका मोबाइल फोन वापस देकर गायब हो जाती है. बाद में अनुराग की नानी, नितिन की शादी के लिए उसी लड़की की फोटो दिखाती है. इतना ही नही नागेश को जर्मन कंपनी से लेंस मिलने की खबर मिलती है. पर अब नागेश क्या करे, उन्होंने तो फोटोकौपी मशीन बेच दी. इससे अदिति को भी तकलीफ होती है. दुबारा अपनी नानी के घर जाने पर अनुराग के मन का अपराध बोध गलत साबित होता है. और वह फिर से क्रिकेट खेलने वाला पहले जैसा अनुराग बन जाता है. यानी कि फिल्म में हर किरदार की उम्मीदें पूरी होती हैं.

फिल्मकार सुदीप बंदोपाध्याय ने नसीहते देने व उम्मीदों के पूरे होने की बात करने वाली फिल्म का कथा कथन शैली बहुत बचकानी रखी है. यदि सुदीप बंदोपाध्याय ने एक खुशनुमा फिल्म बनाने का प्रयास किया होता, तो इंसानी बदलाव व विकास की एक बेहतर फिल्म बन सकती थी. मगर फिल्म देखते हुए अहसास होता है जैसे कि वह लोगों को धूल से सने फोटो अलबम में झांकने के लिए कह रहे हों. फिल्म जीवन की मीठी मगर व्यर्थताओं को पकड़ने की कोशिश है. फिल्म में नवीनता नहीं है. इस तरह की कोशिशें अतीत में ‘फाइंडिंग फैनी’ और‘ए डेथ इन द गंज’ फिल्मों में भी की जा चुकी हैं. इतना ही नहीं उम्मीदों व आशा की बात करते करते पटकथा लेखक द्वय सुदीप बंदोपध्याय व नेहा पवार तकदीर की बात कर फिल्म पर से अपनी पकड़ खो देते हैं. फिल्म का गीत संगीत फिल्म की संवेदनशीलता को खत्म करने काम काम करता है.

जहां तक अभिनय का सवाल है, तो नागेश के किरदार को नसिरूद्दीन शाह ने बाखूबी निभाया है. नसिरूद्दीन शाह के सामने बाल कलाकार कबीर साजिद ने बेहतरीन परफार्मेंस देकर इशारा कर दिया है कि वह आने वाले कल का बेहतरीन कलाकार है. सोनाली कुलकर्णी, अमीर बशीर व नवीन कस्तूरिया भी ठीक ठाक रहे.

एक घंटा 35 मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘होप और हम’’ का निर्माण समीरा बंदोपाध्याय ने किया है. सह निर्माता दिव्या गिरीश शेट्टी, लेखक सुदीप बंदोपाध्याय व नेहा पवार,निर्देशक सुदीप बंदोपाध्याय, संगीतकार रूपर्ट फेंमंडेस, कैमरामैन रवि के चंद्रन तथा कलाकार हैं- नसिरूद्दीन शाह, सोनाली कुलकर्णी, अमीर बशीर, नवीन कस्तूरिया, मास्टर कबीर साजिद, वृति वघानी व अन्य

राजी : हर हाल में देखी जाने वाली फिल्म

‘फिलहाल’, ‘जस्ट मैरिड’, ‘तलवार’ जैसी फिल्मों की निर्देशक मेघना गुलजार इस बार हर वतन परस्त इंसान के दिल की बात करने वाले तोहफे के तौर पर रोमांचक फिल्म ‘‘राजी’’लेकर आयी हैं. हरिंदर सिक्का की किताब ‘कालिंग सहमत’ पर आधारित फिल्म ‘‘राजी’’ एक भारतीय अंडरकवर की सच्ची कहानी है, जो कि हर इंसान के दिल में देशप्रेम जगाती है. इसी के साथ यह फिल्म इस तरफ भी इशारा करती है कि युद्ध अनावश्यक है, युद्ध सही या गलत नहीं पहचानता. युद्ध तो सिर्फ अंधेरे व क्रूरता का परिचायक है. फिल्मकार मेघना गुलजार ने फिल्म में सहमत के साहस का जश्न मनाने से परे कई सवाल भी उठाए हैं.

फिल्म ‘‘राजी’’ की कहानी 1971 के भारत पाक युद्ध की पृष्ठभूमि की है. कहानी शुरू होती है पाकिस्तान से, जो कि तत्कालीन बांग्लादेश की मुक्तिवाहिनी सेना का भारत द्वारा साथ दिए से नाराज होकर भारत को नेस्तानाबूद करने के मंसूबे के साथ युद्ध की तैयारी कर रहा है. पाकिस्तानी सेना के ब्रिगेडियर परवेज सय्यद (शिशिर शर्मा) के साथ कश्मीर निवासी भारतीय उद्योगपति हिदायत खान (रजित कपूर) की बहुत अच्छी दोस्ती है, पर ब्रिगेडियर परवेज सय्यद को इस बात की भनक नहीं है कि हिदायत खान वतन परस्त होने के साथ साथ हिंदुस्तान की ‘रा’ एजेंसी को जानकारी देने का काम भी करते हैं.

हिदायत खान के पिता भी स्वतंत्रता सेनानी और भारतीय सुरक्षा एजेंसी के लिए काम करते थे. हिदायत खान का पाकिस्तान आना जाना लगा रहता था. जब हिदायत खान को पाकिस्तानी ब्रिगेडियर परवेज सय्यद के मुंह से पाकिस्तानी सेना के मंसूबे का पता चलता है तो वह सच जानकर भारत को सुरक्षित रखने के लिए एक अहम फैसला लेते हैं. हिदायत खान अपनी बीमारी का वास्ता देकर दोस्ती को रिश्तेदारी में बदलने की बात कर दिल्ली विश्वविद्यालय में अध्ययनरत अपनी बेटी सहमत (आलिया भट्ट) का विवाह ब्रिगेडिर परवेज सय्यद के बेटे व पाकिस्तानी सेना के मेजर इकबाल (विकी कौशल) के संग करने की गुजारिश करते हैं, जिसे परवेज सय्यद सहर्ष स्वीकार कर लेते हैं.bollywood movie razi review

सहमत बहुत ही ज्यादा नाजुक व अति भावुक साधारण कश्मीरी लड़की है. उसे इस बात का तब तक अहसास नहीं होता, जब तक उसके पिता उसे वापस कश्मीर नहीं बुलाते हैं कि उसके पिता ने उसके भविष्य को लेकर पाकिस्तान में कितना बड़ा फैसला कर आए हैं. जब सहमत पहलगाम, कश्मीर अपने घर पहुंचती है, तो हिदायत खान सहमत की मां तेजी (सोनी राजदान) के सामने ही बताते हैं कि उन्होंने सहमत की शादी इकबाल संग कराने का फैसला किस मकसद से लिया है.

वतन के लिए परेशान अपने पिता हिदायत खान को देखकर सहमत बिना देर किए हामी भर देती है. उसके बाद वह पाकिस्तान जाकर अपने वतन भारत की कान व आंख बनने के लिए पूरी तैयारी करने में जुट जाती है. वह बेहतरीन भारतीय जासूस बनने के लिए ‘रा’ एजेंट खालिद मीर (जयदीप अहलावत) से प्रशिक्षण लेना शुरू करती है. प्रशिक्षण के दौरान उसे काफी तकलीफ होती है, पर इससे वह मजबूत होती जाती है.

पूर्णरूपेण प्रशिक्षित होने पर इकबाल से सहमत की शादी होती है और वह एक बेटी से बहू बनकर भारत की दहलीज पार कर पाकिस्तान पहुंचती है. दुश्मन देश में अपनी ससुराल व अपने पति के दिल में जगह बनाते हुए सहमत अपने वतन भारत के खिलाफ पाकिस्तानी सेना द्वारा रचे जा रहे षडयंत्र की जानकारी इकट्ठा कर भारत में ‘रा’ के पास पहुंचाना शुरू करती है. एक सैनिक परिवार की बहू के रूप में सैनिक परिवार  के अंदर रहकर यह सब करना उसके लिए बहुत कठिन होता है, पर उस पर अपने वतन के लिए कुछ भी कर गुजरने का ऐसा भूत सवार है कि वह हर संकट का मुकाबला करते हुए अपने मकसद में कामयाब होती है. उसे दो लोगों की हत्या करने के साथ ही कई ऐसे फैसले लेने पड़ते हैं, जिसकी उसने कल्पना भी नहीं की थी.bollywood movie razi review

इस कहानी के बीच में सहमत व इकबाल की बड़ी खूबसूरत छोटी सी प्रेम कहानी भी पनपती है. बहरहाल, सहमत द्वारा भेजी गयी अहम जानकारी की वजह से भारत, पाकिस्तान के खिलाफ जंग जीतने में कामयाब होता है. पर अंतिम वक्त में इकबाल को पता चल जाता है कि सहमत ने पाकिस्तानी सेना द्वारा रचे जा रहे षडयंत्र की जानकारी भारत भेज दी है. वह अपने वतन के लिए सहमत के खिलाफ अपने देश की जांच एजेंसी को खबर करता है. जबकि खालिद मीर अपने साथियों के साथ सहमत को पाकिस्तान से सुरक्षित निकालने के  लिए पहुंच जाता है. पर कई घटनाक्रम तेजी से बदलते हैं. जिसमें इकबाल मारे जाते हैं. पर सहमत को लेकर खालिद मीर व उसके साथी भारत पहुंच जाते हैं. अब सहमत खुद को जासूसी के काम से अलग कर लेती है. वह इकबाल के बेटे को जन्म नहीं देना चाहती. मगर वह एक मां और एक औरत भी है.

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मेघना गुलजार ने एक बार फिर साबित कर दिखाया कि उन्हें  कहानी व किरदारों पर अपने निर्देशकीय कौशल से पकड़ बनाए रखने में महारत हासिल है. अपनी पिछली फिल्मों के मुकाबले वह इस फिल्म से ज्यादा बेहतरीन निर्देशक के रूप में उभरती हैं. फिल्म बहुत तेज गति से भागती है और दर्शकों को अपनी सीट पर चिपके रहने के लिए मजबूर करती है. निर्देशक के तौर पर मेघना गुलजार ने फिल्म को फिल्माने के लिए लोकेशन भी बहुत सही चुनी है. मेघना गुलजार ने फिल्म मे जिस तरह से मानवीय भावनाओं व संवेदनाओं को उकेरा है, उसके लिए भी वह बधाई की पात्र हैं.

मेघना गुलजार ने अपनी फिल्म में देशप्रेम को जगाने के लिए कोई देशभक्ति वाला भाषण नहीं परोसा है. उन्होंने पाकिस्तान के खिलाफ जहर उगलने वाले उत्तेजक या विरोधात्मक भाषण से भी दूरी बनाए रखी है. लेकिन अति जटिल व्यक्तियों का समूह अपने ईद गिर्द की परिस्थितियों से निपटने का जिस तरह से प्रयास करता है, उसी से देशप्रेम अपने आप उभरकर आता है.

अमूमन किताब को सेल्यूलाइड के परदे पर लाते समय पटकथा लेखक पूरी कहानी व फिल्म का बंटाधार कर देता है. मगर ‘कालिंग सहमत’ को फिल्म ‘राजी’ के रूप में पेश करने के लिए पटकथा लेखकद्वय मेघना गुलजार व भवानी अय्यर की तारीफ की जानी चाहिए.

फिल्म ‘‘राजी’’ पूर्ण रूपेण आलिया भट्ट की फिल्म है. आलिया भट्ट के जानदार अभिनय की जितनी तारीफ की जाए, उतनी कम है. वह पूरी फिल्म को अपने कंधे पर लेकर चलती हैं. दर्शक उनकी खूबसूरती, उनकी मासूमियत व उनकी अभिनय प्रतिभा का कायल होकर रह जाता है. सहमत को परदे पर सही मायनों में आलिया भट्ट ने अपने अभिनय से जीवंत किया है. संगीत प्रेमी मेजर इकबाल के किरदार को विकी कौशल ने खूबसूरती से निभाया है. संतुलित व संजीदा सैनिक, अपनी पत्नी सहमत के वतन के खिलाफ उसके सामने होने वाली बातों से पत्नी के मन को लगने वाली ठेस का अहसास करने के दृश्य में विकी कौशल एक मंजे हुए कुशल अभिनेता के रूप में उभरते हैं. तो वहीं ‘रा’ एजेंट खालिद मीर के किरदार में जयदीप अहलावत भी अपने अभिनय से लोगो के दिलों में जगह बना ही लेते हैं. रजित कपूर, शिशिर शर्मा, आरिफ जकरिया, सोनी राजदान आदि ने भी अपनी तरफ से सौ प्रतिशत देने का प्रयास किया है.

जहां तक फिल्म के गीत संगीत का सवाल है, तो वह भी काफी बेहतर बन पड़े हैं. फिल्म के कथानक के साथ ‘दिलबरो’, ‘ऐ वतन’ व ‘राजी’ गाने काफी बेहतर लगे हैं. गीतकार गुलजार और संगीतकार की तिकड़ी शंकर एहसान लौय ने कमाल दिखा ही दिया.

दो घंटे बीस मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘राजी’’ का निर्माण विनीत जैन, करण जोहर, हीरू यश जोहर व अपूर्वा मेहता ने किया है. हरिंदर सिक्का की किताब ‘‘कालिंग सहमत’’ पर आधारित इस फिल्म की पटकथा लेखक भवानी अय्यर व मेघना गुलजार, निर्देशक मेघना गुलजार, गीतकार गुलजार, संगीतकार शंकर एहसान लौय, कैमरामैन जय आई पटेल तथा फिल्म को अभिनय से संवारने वाले कलाकार हैं-आलिया भट्ट, विक्की कौशल, रजित कपूर, शिशिर शर्मा, अमृता खानविलकर, जयदीप अहलावत, अश्वथ भट्ट, सोनी राजदान व अन्य.

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