जरूरत के आधार पर तय हो राजनेताओं की सुरक्षा

वीआर्ईपी संस्कृति, वीआईपी प्रोटोकॉल और वीआईपी सुरक्षा जैसे तमाम विषयों की बेशक समीक्षा होनी चाहिए. इसमें कोई शक-शुब्हा नहीं कि प्रोटोकॉल और सुरक्षा जैसे मसलों को देखने वाले ताकतवर लोग मुल्क के संसाधनों का बेजा इस्तेमाल करते हैं, क्योंकि वे इसे रुतबे और हैसियत से जोड़कर देखते हैं. फिर भी, जरूरी सुरक्षा और गैर-जरूरी प्रोटोकॉल में फर्क है.

ज्यादा विकसित शासन-व्यवस्थाओं में सार्वजनिक पदों पर बैठे लोग विभिन्न सुविधाओं और विशेषाधिकारों का इस्तेमाल काफी सावधानी व पारदर्शिता के साथ करते हैं. लेकिन पाकिस्तान में भ्रष्ट नौकरशाही और रौब-रुआब का भूखा राजनीतिक नेतृत्व अक्सर व्यावहारिक समझ और वास्तविक सुरक्षा जरूरतों का अतिक्रमण कर डालता है.

प्रधान न्यायाधीश साकिब निसार की सदारत में सुप्रीम कोर्ट ने अप्रैल महीने में अपने एक अहम फैसले के जरिए मुल्क भर के उन तमाम लोगों को मिली सरकारी सुरक्षा को हटाने का आदेश दिया था, जिन्हें वाजिब प्रक्रिया को अपनाए बिना सुरक्षा दी गई है. मसले को आगे बढ़ाते हुए आला अदालत ने ऐसे लोगों को सरकारी वाहन तुरंत वापस करने को कहा और उसने यह भी साफ किया था कि आगामी चुनावी मुहिम के दौरान नेताओं को अपनी हिफाजत का इंतजाम खुद करना चाहिए. मगर इस फैसले के भयानक नतीजे निकल सकते हैं.

सुप्रीम कोर्ट ने महंगे सरकारी वाहनों के बेजा इस्तेमाल व सुरक्षाकर्मियों की गलत तैनाती का वाजिब संज्ञान लिया है. अगर ऐसा न हो रहा होता, तो अदालती आदेश की तामील में जुटे सरकारी महकमे इतनी जल्दी दर्जनों की तादाद में गाड़ियां न बरामद कर पाते. लेकिन चुनाव से पहले राजनेताओं की सरकारी सुरक्षा पर सामूहिक रोक का फैसला मुनासिब नहीं है.

पिछले दो आम चुनाव इस बात के गवाह हैं कि अनेक नेताओं व उम्मीदवारों की जान पर कितने खतरे आए थे. 2008 में बेनजीर भुट्टो के कत्ल का खामियाजा तो पाकिस्तान की सियासत अब भी भुगत रही है. इसलिए सामूहिक रोक की बजाय वास्तविक जरूरत के आधार पर यह तय होना चाहिए.

औषधीय नर्सरी : महिलाओं के लिए आय का जरिया

बदलते जमाने में औषधीय पौधों की मांग दुनियाभर में तेजी से बढ़ रही है. महिलाएं छोटी सी जगह पर औषधीय पौधों की खेती कर अपने पैरों पर खड़ी हो सकती हैं. वे औषधीय पौधों की नर्सरी लगा कर खासा मुनाफा कमा सकती है. इन पौधों की खासीयत यह है कि ये बंजर और अकसर जलजमाव वाले इलाकों में खूब पनपते हैं. स्टीविया, गुग्गुल, खस, बेल, तुलसी, गुडची, पचौली, एलोवेरा, सतावर, सिट्रोनेला, लेमनग्रास, सर्पगंधा, जेट्रोफा, मेंथा, कलिहारी, ब्राह्मी, बच, आंवला आदि औषधीय पौधों की खेती कर या नर्सरी लगा कर महिलाएं खुद का कारोबार शुरू कर सकती हैं. इन की खेती से प्रति हैक्टेयर 50 हजार से 2 लाख रुपए तक की आमदनी हो सकती है.

ग्रामीण और शहरी महिलाएं थोड़ी सी ट्रेनिंग ले कर आसानी से औषधीय पौधों की नर्सरी का कारोबार शुरू कर सकती हैं. इस से जहां वे अपने पैरों पर खड़ी हो सकती हैं वहीं वे परिवार की आमदनी भी बढ़ा सकती हैं. महिलाओं को नर्सरी लगाने के लिए प्रेरित करने वाली मोहम्मद कलाम तिब्बी बगीचा की संचालिका रजिया सुल्तान बताती हैं, ‘‘नर्सरी लगाने व चलाने में विशेष रकम व मेहनत की जरूरत नहीं होती है. जो महिलाएं नर्सरी लगाना चाहती हैं वे सब से पहले इस बारे में जानकारी हासिल करें. कृषि विभाग से लाइसैंस ले कर विधिवत ट्रेनिंग लेने के बाद काम शुरू करें. इस के लिए सरकार अनुदान भी देती है. इस का प्रपोजल बना कर आप अपने जिला कृषि पदाधिकारी के कार्यालय में जमा कर सकते हैं. जिन के पास कम जमीन है उन के लिए नर्सरी का कारोबार काफी फायदेमंद है.’’

रजिया कहती हैं, ‘‘एक मिर्च में 50 बीज होते हैं और उन बीजों से कम से कम 30 पौधे उगते हैं. बाजार में मिर्च के एक पौधे की कीमत 1 रुपया है. इस तरह एक मिर्च से कम से कम 30 रुपए की कमाई होती है, जिस में से 15 रुपए नैट प्रौफिट होता है. इसी से अनुमान लगाया जा सकता है कि नर्सरी लगाने का काम कितना फायदेमंद है.’’

देश के कई राज्यों समेत बिहार के मधुबनी, वैशाली, भागलपुर, सीवान शहरों में खस की काफी उम्दा खेती की जा सकती है. बंजर और बाढ़ग्रस्त इलाकों में भी खस की कामयाब खेती की जा सकती है. खस और पचौली इत्र बनाने के काम आते हैं और बाजार में खस की कीमत 25 से 30 हजार रुपए प्रति किलो है. शरबत और सुगंधित साबुन बनाने में भी इस का उपयोग होता है. इस के अलावा पटना, नालंदा और भोलपुर जिले की मिट्टी एलोवेरा की खेती के लिए काफी लाभकारी है. एलोवेरा के साथ आंवला की अंतरवर्ती खेती करने से कमाई को दोगुना किया जा सकता है.

एलोवेरा की खेती करने वाले असलम परवेज कहते हैं, ‘‘मैं बिहार के मसौढ़ी प्रखंड के कटका गांव में एलोवेरा की खेती 6 वर्षों से कर रहा हूं और हर साल खासा मुनाफा कमा रहा हूं.’’

हैरत की बात यह है कि लाखोंकरोड़ों रुपए खर्च कर औषधीय पौधों की खेती को बढ़ावा देने और किसानों को इन के प्रति जागरूक करने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं, पर इस की जानकारी ज्यादातर किसानों को नहीं है. महिलाएं और किसान औषधीय खेती के बारे में पूरी जानकारी जुटा कर इस की नर्सरी लगाएं या खेती करें तो वे अपनी मेहनत और पूंजी का कई गुना ज्यादा फायदा उठा सकते हैं.

बच, ब्राह्मी, कालामेघ, सतावर, सफेद मुसली, आंवला, गुड़मार, तुलसी, अश्वगंधा, दालचीनी आदि की खेती के लिए केंद्र सरकार 20 प्रतिशत और राज्य सरकार 70 प्रतिशत का अनुदान दे रही हैं. इस के अलावा बेग,

सर्पगंधा, कलिहारी, चित्रक की खेती के लिए सरकार 50 फीसदी और राज्य सरकार 40 फीसदी अनुदान देती हैं. गुग्गुल की खेती पर केंद्र सरकार 75 फीसदी और राज्य सरकार 15 फीसदी तक अनुदान देती हैं.

भगदड़ की वजह से शो बीच में छोड़ गईं सपना चौधरी

टीवी शो बिग बौस से अपनी पहचान बनाने वाली हरियाणवी डांसर सपना चौधरी इन दिनों काफी सुर्खियों में हैं. उन्हें लगातार बौलीवुड से औफर आ रहे हैं. इसी बीच सपना यूपी के बरेली में एक डांस शो के लिए पहुंची थी. लेकिन उनका ये शो हंगामे का शिकार हो गया. सपना चौधरी का प्रोग्राम शुरू होने के कुछ देर बाद ही वहां हंगामा शुरू हो गया. रात साढ़े दस बजे बेकाबू भीड़ मंच पर चढ़ गई. भीड़ और सपना के बाउंसरों में जमकर धक्का मुक्की हुई. इस दौरान हंगामा इतना ज्यादा बढ़ गया कि सपना किसी तरह खुद को बचाते हुए स्टेज से उतरीं और शो बीच में ही छोड़ गाड़ी में बैठ वहां से चली गईं.

ये हंगामा तब शुरू हुआ जब सपना के डांस के दौरान भीड़ स्टेज पर चढ़ गई और कभी सेल्फी, कभी ये तो कभी वो गाना बजाकर डांस की मांग की करने लगी. सपना के मंच से हटने के बाद लोग और ज्यादा हंगामे पर उतर आए. आयोजकों ने कार्यक्रम समाप्त करने की घोषणा की तो हंगामा खत्म करने के लिए पुलिस ने लाठियां चलानी शुरू कर दीं.

यहां पर सपना के साथ आई एक डांसर भीड़ में फंस गई जिसे मुश्किल से निकाला गया. रिपोर्ट के मुताबिक, सपना का डांस देखने को करीब दस हजार लोग जुट गए थे, लेकिन इतनी पब्लिक को संभालने के लिए पुलिस वहां नहीं थी. ऐसे में जब हंगामा शुरू हुआ तो भीड़ को संभालना बेहद मुश्किल हो गया.

भाजपा के दांव पर किरकिरी

कर्नाटक में बहुमत न पा कर भी सत्ता में आ जाने की प्रबल चाह भारतीय जनता पार्टी के लिए कोई शर्म या नैतिक मूल्य के घटने का मामला नहीं है. हिंदू पौराणिक सोच के अनुसार यह अपनेआप में सही है और हमारे पुराण इस तरह की घटनाओं से भरे पड़े हैं. इन्हीं पुराणों का गुणगान आज भी प्रवचनकर्ता बड़े गर्व से करते हैं.

भाजपा वैसे बड़ेबड़े सपने दिखा रही है पर वह देश को भ्रष्टाचारमुक्त और गरीबीमुक्त कर पाए या न कर पाए, कांग्रेसमुक्त बनाने में एड़ीचोटी का जोर लगा रही है. कर्नाटक में 130 से 150 सीटें हासिल करने की उम्मीद लगाए भाजपा 104 सीटों पर सिमट गई तो कितने ही चैनलों के एंकरों के मुंह जिस तरह लटके रह गए थे उस से साफ है कि भारतीय जनता पार्टी की सोच किस तरह हमारे देश के अमीर, समृद्ध और उच्चवर्ग में गहरे तक बैठी है कि उस की हजार गलतियों को अनदेखा किया जा रहा है.

कांग्रेस में कोई सुरखाब के पर नहीं लगे हैं लेकिन वह देश को जाति व धर्म के नाम पर भाजपा की तरह विभाजित नहीं कर रही. गैरभाजपा पार्टियों को जाति का सवाल भाजपा के हमले से बचाव में उठाना पड़ रहा है. देश के मतदाताओं में बहुमत पिछड़ी व निचली जातियों के मतदाताओं का ही है, इसलिए सभी पार्टियां उन पर डोरे डाल रही हैं. भारतीय जनता पार्टी सब से बड़ी व सक्षम पार्टी होते हुए भी पूरी तरह छा नहीं पा रही. उस की पिछड़ी व निचली जातियों को जोड़ने की कला अब कमजोर हो रही है, क्योंकि पिछड़ी व निचली जातियां अपने साथ हो रहे भेदभाव पर नाराजगी जताने लगी हैं.

कर्नाटक में कांग्रेस को जिन सीटों का नुकसान हुआ है वे असल में पिछले चुनावों में भारतीय जनता पार्टी के विभाजित वोटों के लाभ से मिली थीं.

55 घंटे के मुख्यमंत्री बने बी एस येदियुरप्पा ने तब अलग पार्टी बना कर भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ चुनाव लड़ा था. अब चूंकि भ्रष्टाचार के आरोपों में तब हटाए गए येदियुरप्पा अब फिर से शुद्धि पा कर भाजपाई हो गए हैं तो भाजपा ने कांग्रेस से सीटें छीन लीं. 2014 के चुनावों में जो सफलता भाजपा को मिली थी वह अब दोहराई नहीं गई पर भाजपा को आशा थी कि वह कांग्रेस व जनता दल (सैक्युलर) में विभीषणों को ढूंढ़ लेगी और सत्ता पर बनी रहेगी. लेकिन ऐसा हो नहीं सका.

104 सीटें पा कर जनता दल (सैक्युलर) व कांग्रेस के संयुक्त मोरचे की 116 सीटों के मुकाबले कम सीटें मिलने पर भी भाजपा ने गोवा व मणिपुर को दोहराया तो इसलिए कि यहां का उच्चवर्ग इसी बात का समर्थन करता है. सत्ता उस के पास हो जो जन्म से इस का अधिकारी हो. ऐरेगैरों को भला सत्ता कैसे दी जा सकती है.

अफसोस यह है कि कांग्रेस और जनता दल (सैक्युलर) का एक भी विधायक भाजपा के साथ जुड़ने को तैयार नहीं हुआ और येदियुरप्पा 55 घंटे मुख्यमंत्री बने रहने के बाद चलते बने. भाजपा चुप नहीं बैठेगी, यह पक्का है. पर उस की अलग पार्टी की छवि गोवा, मणिपुर के बाद अब ध्वस्त हो गई है. फिर भी, ‘जो राजा उसी का बजेगा बाजा,’ पुरानी मगर सही कहावत है.

‘हावड़ा पटना लव ऐक्सप्रैस’ वाया फेसबुक

‘तुम क्या काम करते हो? तुम्हारा घर कहां है?’ लड़की ने अपने फेसबुक फ्रैंड के चैट बौक्स में मैसेज डाला.

लड़के ने तुरंत जवाब दिया, ‘तुम मुझे बहुत अच्छी लगती हो. मेरा घर पटना में है. तुम कहां रहती हो?’

लड़की ने भी पलट कर जवाब दिया, ‘मैं कोलकाता में रहती हूं. तुम भी मुझे काफी अच्छे लगते हो.’

लड़के ने मैसेज टाइप किया, ‘कोलकाता में कहां रहती हो? मैं तुम से मिलना चाहता हूं. हमारा मिलन कैसे होगा? मैं तुम्हारे बगैर जिंदा नहीं रह सकता हूं.’

लड़की ने लिखा, ‘‘मैं हावड़ा में रहती हूं. मैं भी तुम्हारे बिना जिंदगी की सोच नहीं सकती हूं….’’

इस तरह की मुहब्बत से भरी चैटिंग का सिलसिला चलता रहा. इस के बाद उन दोनों ने एकदूसरे का मोबाइल फोन नंबर मांगा. दोनों के बीच बातचीत का सिलसिला भी चल पड़ा. उन दोनों की मुहब्बत इतनी परवान चढ़ी कि वे मिलने के लिए बेताब हो उठे. दोनों मिले भी. शादी भी कर ली. उस के बाद लड़की के साथ जो कुछ घटा, वह रूह कंपा देने वाला था.

दरअसल, पश्चिम बंगाल के हावड़ा जिले की रहने वाली 22 साल की लड़की सुलेखा को फेसबुक और ह्वाट्सऐप के जरीए बिहार के एक लड़के आसिफ से दोस्ती हुई. सोशल साइटों के जरीए शुरू हुई उन की प्रेमकहानी इस कदर परवान चढ़ने लगी कि लड़की अपने फेसबुकिया आशिक से मिलने पटना पहुंच गई.

मुहब्बत की आस में हावड़ा से पटना पहुंची सुलेखा को पटना में उस के प्रेमी से छलावा और ब्लैकमेलिंग के सिवा कुछ नहीं मिला. प्रेम में पागल उस लड़की ने अपने बदमाश प्रेमी को काफी समझाने की कोशिश की, पर बात नहीं बनी. प्रेमी की खातिर लड़की ने अपना धर्म भी बदलवा लिया, पर उस के बाद भी उस के हाथ कुछ नहीं आया. थकहार कर उस ने पुलिस और अदालत का दरवाजा खटखटाया.

सुलेखा ने 13 जून, 2016 की रात को पटना के महिला थाने में दुष्कर्म, धोखेबाजी और साइबर क्राइम का मामला दर्ज कराया. इस में उस ने पटना के फुलवारीशरीफ के हारुननगर के रहने वाले आसिफ के साथसाथ 5 लड़कों को आरोपी बनाया.

इस लड़की की शिकायत मिलने के बाद छापामारी कर पुलिस ने 2 लड़कों रिजवी और फैज को गिरफ्तार कर लिया. सुलेखा ने बताया कि अप्रैल, 2015 में उसे फुलवारीशरीफ के एक लड़के का फोन आया और उस के बाद ह्वाट्सऐप पर भी मैसेज आए. दोनों फेसबुक फ्रैंड थे. उस ने बताया कि उसे किसी काम से पटना आना था, तो उस ने अपने फेसबुक फ्रैंड को फोन किया. वह उस से मिलने मीठापुर महल्ले में आया. सुलेखा मीठापुर के ही ‘सौरभगौरव’ होटल में ठहरी हुई थी.

होटल में बातचीत और नाश्ते के दौरान आसिफ ने सुलेखा की कोल्ड ड्रिंक में नशीली चीज मिला दी. जब वह बेहोश हो गई, तो उस लड़के ने उस के साथ बलात्कार किया और उस का वीडियो भी बना लिया. इस के बाद वह सुलेखा को वीडियो दिखा कर उसे ब्लैकमेल करने लगा.

ब्लैकमेलिंग से परेशान सुलेखा 28 जनवरी, 2016 को पटना आई और लड़के से मिल कर मामले को खत्म करने की कोशिश की.

आसिफ ने उस से शादी करने का भरोसा दे कर अपने जाल में फिर फंसा लिया. उस ने उसे पटना कालेज के पास के एक गर्ल्स होस्टल में ठहराया. उस के बाद गांधी मैदान के आसपास के पार्क में उस का जबरन धर्म बदलवा कर निकाह कराया गया.

निकाह के बाद वे दोनों एनआईटी कालेज के पास नफीस कालोनी में रहने लगे. सुलेखा को लगा कि अब आसिफ सुधर गया है और उस की जिंदगी पटरी पर लौट आई है.

कुछ दिनों तक तो सबकुछ ठीकठाक चला, पर 15-16 दिनों के बाद ही आसिफ फिर अपने पुराने रंग में आ गया. निकाह के 25 दिनों के बाद अचानक आसिफ गायब हो गया. उस ने अपना मोबाइल फोन भी स्विच औफ कर दिया.

सुलेखा ने 5 दिनों तक अपने शौहर के आने का इंतजार किया, लेकिन जब वह कई दिनों तक नहीं लौटा, तो सुलेखा आसिफ के फुलवारीशरीफ वाले घर पर पहुंच गई.

पहले तो आसिफ के घर वालों ने उसे जलील किया और चले जाने को कहा. जब वह आसिफ से मिलने और उस के ही घर में रहने की जिद पर अड़ी रही, तो लड़के के भाई ने उसे अपने दोस्त के मकान में किराए पर रहने का इंतजाम करा दिया.

सुलेखा ने बताया कि उस के बाद उसे यह कह कर जलील किया जाता था कि उस ने सही तरीके से इसलाम नहीं अपनाया है. अच्छी तरह से सीखने के लिए उसे एक मदरसे में रख दिया गया. वहां भी उस के साथ बदसलूकी की गई. जब वह पेट से हुई, तो जबरन उस का बच्चा गिरा दिया गया.

14 जून, 2016 को अदालत में सुलेखा का बयान दर्ज कराया गया. आसिफ और उस के दोस्तों के खिलाफ किसी के धर्म को ठेस पहुंचाने के लिए धारा 295/ए, पेट गिराने के लिए धारा 313, मारपीट के लिए धारा 323, बंधक बनाने के लिए धारा 344, बलात्कार के लिए धारा 376, नशा कराने के लिए धारा 328, हत्या करने की धमकी देने के लिए धारा 387, धोखाधड़ी करने के लिए धारा 420, धोखे से शादी करने के लिए धारा 496 और धमकी देने के लिए धारा 506 के तहत केस दर्ज किया गया है.

तारतार यह फेसबुकिया प्यार

बिहार के भागलपुर शहर की रहने वाली सीमा (बदला हुआ नाम) बनारस के चेतगंज के इंटर कालेज में पढ़ती थी. पढ़ाई के दौरान ही फेसबुक के जरीए उस की दोस्ती रोहित नाम के लड़के से हुई. वह बनारस के धोरौया थाने के लोहरिया गांव का रहने वाला था.

फेसबुक के जरीए ही रोहित ने सीमा को बताया कि वह ‘मनमोहिनी’ नाम की फिल्म बना रहा है. उस ने सीमा को अपनी फिल्म में हीरोइन बनने का लालच दिया. इस के बाद उन दोनों के बीच चैटिंग शुरू हो गई.

जब वे दोनों चैटिंग के जरीए गहरे दोस्त बन गए, तो एक दिन सीमा रोहित से मिलने पहुंच गई. रोहित ने स्क्रीन टैस्ट के बहाने उस के जिस्म को खूब सहलाया और उस से लिपटने की कोशिश की.

सीमा को उस की हरकत पसंद नहीं आई और वह वहां से जाने लगी. रोहित ने उसे समझाया कि फिल्मों में काम करने के लिए बहुतकुछ करना पड़ता है और बहुतकुछ सहना भी पड़ता है. इस के बाद रोहित ने उस से कहा कि पटना में शूटिंग होनी है, इसलिए वह पटना में उस से मिले.

पटना पहुंचने से पहले सीमा ने रोहित से फोन पर बात की और ठहरने का ठिकाना पूछा. रोहित ने उसे एक होटल का पता बताया. पटना पहुंच कर सीमा उसी होटल में ठहरी.

सीमा को यह पता नहीं चला कि कब उसे गहरी नींद लग गई. कुछ देर बाद रोहित उस के कमरे में पहुंचा और उस के जिस्म से खेलने लगा. उस ने सीमा के साथ बलात्कार किया और उस की वीडियो फिल्म भी बना ली.

रोहित ने उसे धमकाया कि अगर वह किसी को कुछ बताएगी, तो उस की ब्लू फिल्म इंटरनैट पर डाल दी जाएगी. सीमा रोतेबिलखते बनारस लौट गई.

सीमा की तकलीफों का यहीं खात्मा नहीं हुआ. इस के बाद रोहित फोन कर के बताई हुई जगह पर आने के लिए उस पर दबाव बनाने लगा.

सीमा ने उस की बात नहीं मानी, तो उस ने उस के साथ बलात्कार के वीडियो को इंटरनैट पर डाल दिया. रोहित ने सीमा को इस बारे में बता भी दिया.

सीमा ने तुरंत चेतनगंज थाने में रोहित के खिलाफ एफआईआर दर्ज करा दी. पुलिस ने रोहित को वाराणसी कैंट स्टेशन से गिरफ्तार कर लिया. अब रोहित जेल की हवा खा रहा है और पुलिस उस के पुराने रिकौर्ड को खंगालने में लगी हुई है.

बचें सरकारी नौकरियों के फर्जी इश्तिहारों से

गांवदेहात की रहने वाली अनीता ने रोजगार संबंधी एक अखबार में 8वीं जमात पास लोगों के लिए आंगनबाड़ी सहायिकाओं की भरती का इश्तिहार देखा, जिस के लिए 3 सौ रुपए के आवेदन शुल्क की मांग की गई थी, जो शिक्षा विकास संस्थान, मेरठ में बैंक ड्राफ्ट के जरीए भेजनी थी. उस इश्तिहार में हर ग्राम पंचायत में आंगनबाड़ी सुपरवाइजर, आंगनबाड़ी वर्कर व आंगनबाड़ी सहायिकाओं के पदों के लिए अर्जी मांगी गई थी.

अनीता ने फार्म खरीद कर तय शुल्क के साथ शिक्षा विकास संस्थान, मेरठ को नौकरी के लिए अर्जी भेजी, लेकिन अर्जी भेजने के एक साल बाद भी जब उक्त पद के लिए कोई बुलावा नहीं आया, तो उन्होंने इश्तिहार में दिए गए फोन नंबर पर बात करने की कोशिश की. लेकिन सभी फोन नंबर स्विच औफ थे.

जब अनीता ने अपने आसपास के गांवों में पता किया, तो पता चला कि कई औरतों ने इस पद के लिए अर्जी दी थी, लेकिन आज तक उन सब से कोई संपर्क नहीं किया गया था.

इसी तरह चांद ऐजूकेशनल ऐंड कल्चरल सोसाइटी, लेखू नगर, नई दिल्ली द्वारा सर्वशिक्षा अभियान के तहत 20 हजार से ज्यादा अध्यापकों के पदों पर भरती निकाली गई, जिस की न्यूनतम योग्यता 12वीं जमात पास होना तय थी. इस के लिए इस संस्था द्वारा आवेदन शुल्क के रूप में 250 रुपए के पोस्टल और्डर की डिमांड की गई थी.

लाखों बेरोजगारों द्वारा उक्त पद के लिए अर्जी दाखिल की गई, लेकिन उक्त संस्था द्वारा मांगा गया आवेदन फर्जी निकला. कैरियर काउंसलिंग से जुड़े ‘दिशा सेवा संस्थान’ के डायरैक्टर अमित मोहन का कहना है कि सरकारी महकमों में नियुक्तियों का अधिकार सिर्फ सरकार के पास होता है और इस के लिए सरकार इश्तिहार निकाल कर नियुक्तियां करती है. महकमों में होने वाली नियुक्तियों में पदों के मुताबिक अलगअलग शैक्षिक योग्यता तय की जाती है.

किसी भी गैरसरकारी संस्था द्वारा अगर सर्वशिक्षा अभियान, आंगनबाड़ी, अग्निरक्षा विभागों सहित सरकारी महकमों में किसी तरह की नियुक्ति के लिए आवेदन मांगा जाता है, तो उस का मकसद महज ठगी करना होता है.

अनीता के मामले में कुछ इसी तरह की ठगी की गई, क्योंकि आंगनबाड़ी विभाग में भी सरकार से जुड़ा महिला एवं बाल विकास मंत्रालय करता है.

उत्तर प्रदेश में गांवों में आंगनबाड़ी व उस से जुड़े दूसरे पदों की नियुक्तियां की जा चुकी हैं. ऐसे में इस तरह के इश्तिहार भोलेभाले लोगों को नौकरी के नाम पर लूटना होता है. फर्जी संस्थाओं द्वारा निकाली गई वैकैंसी के आधार पर कुछ ही समय में करोड़ों रुपए इकट्ठा हो जाते हैं.

इस के बाद ये संस्थाएं अपना बोरियाबिस्तर समेट कर चंपत हो जाती हैं और 200-300 रुपए की मामूली रकम के लिए ठगी का शिकार हुआ शख्स इन के खिलाफ कोई शिकायत नहीं करता. इस के बाद इन संस्थाओं के लोग फिर से दूसरे शहरों में इस तरह की ठगी का जाल फैलाना शुरू कर देते हैं.

कम पढ़े ही बने शिकार

सरकारी नौकरियों के नाम पर फर्जी संस्थाओं द्वारा ठगी का मकसद सिर्फ कम पढ़ेलिखे लोगों को ठगने का होता है. कुछ इसी तरह का एक मामला बस्ती जिले के बनकटी ब्लौक के मरवटिया उर्फ जोगिया गांव के रहने वाले सुदामा प्रसाद के साथ हुआ.

सुदामा प्रसाद ने अखिल भारतीय मानव हित संस्थान नाम की एक संस्था में नौकरी के लिए आवेदन किया और उस संस्था ने सुदामा को यह यकीन दिलाया कि वह भारत सरकार द्वारा नामित की गई एक संस्था है. जिस के द्वारा सभी गांवों में सायंकालीन स्कूल चलाए जाने हैं.

गोरखपुर की इस संस्था ने सुदामा से शिक्षक पद पर नियुक्ति के लिए 50 हजार रुपए घूस के रूप में लिए और सुदामा की ही तरह जिले के तमाम गांवों के बेरोजगारों नौजवानों को नौकरी देने के नाम पर इस संस्था द्वारा पैसे की वसूली की गई.

सुदामा 10 हजार रुपए महीने की तनख्वाह पर नियुक्त हुआ, लेकिन उस को पढ़ाते हुए जब 2 महीने से ऊपर हो गए, तो उस ने उस संस्था से अपनी तनख्वाह की मांग की, पर इस के पहले कि सुदामा उस संस्था से तनख्वाह ले पाता, संस्था गोरखपुर से अपना बोरियाबिस्तर समेट चुकी थी.

इस संस्था से जुड़े लोगों से जब ठगे गए और भी लोगों ने उन के मोबाइल नंबरों पर बात करनी चाही, तो सभी नंबर बंद मिले.

वैबसाइटों पर न करें यकीन

सरकारी नौकरियों के लिए सिर्फ वैबसाइटों पर निकलने वाली वैकैंसी को आधार मान कर विश्वास नहीं करना चाहिए, क्योंकि आएदिन रेलवे भरती बोर्ड सहित तमाम महकमों की फर्जी वैबसाइट बना कर बेरोजगारों से नौकरी के नाम पर ठगी के मामले सामने आते रहते हैं, जिस में ठगी करने वाला अपनेआप को संबंधित महकमे का अधिकारी बता कर न केवल वैबसाइटों के जरीए फार्म भरवाता है, बल्कि नौकरी की पक्की गारंटी के नाम पर भारीभरकम रकम वसूल कर फर्जी नियुक्तिपत्र भी थमा देता है.

ऐसे में जब भी आप सरकार नौकरी के लिए आवेदन कर रहे हों, तो संबंधित विभाग व उस के द्वारा जारी किए गए इश्तिहारों की ठीक तरह से जांच करें, इस के बाद ही नौकरी के लिए आवेदन करें.

इन पर भी रखें नजर

अगर कोई संस्था आप को सरकारी महकमे में नियुक्ति कराने का दावा करती है, तो इस की शिकायत तुरंत अपने नजदीकी पुलिस स्टेशन पर जरूर करें, क्योंकि किसी भी तरह की नियुक्तियों का अधिकार फर्जी संस्थाओं को नहीं दिया जाता है.

कुछ महकमों द्वारा सेवा प्रदाता संस्थाओं के जरीए नियुक्यिं की जाती हैं, जिस में किसी तरह के आवेदन शुल्क की मांग नहीं की जाती और न ही नौकरी देने लिए किसी तरह की रकम की मांग की जाती है.

नौकरियों के आवेदनों के फार्म बेचने की दुकान चलाने वाले एक आदमी का कहना है कि फर्जी संस्थाओं द्वारा नियुक्तियों के लिए निकाले गए आवेदन फार्म अकसर उन की दुकान पर मुफ्त में भेज दिए जाते हैं, लेकिन वे ऐसे फार्मों को फाड़ देते हैं, क्योंकि उन्हें अच्छी तरह पता है कि सरकारी नौकरियों के लिए निकाले गए कौन से इश्तिहार सही हैं और कौन से फर्जी.

अगर आप कम पढ़ेलिखे हैं और सरकारी नौकरी पाने का ख्वाब देखते हैं, तो अपनी पढ़ाईलिखाई के मुताबिक पदों को चुनें. उस के लिए पूरी तैयारी के साथ इम्तिहान में शामिल हों, जिस से किसी भी तरह की ठगी से बच सकें. नहीं तो कोई छोटामोटा

कारोबार कर के अपने कैरियर को आगे बढ़ाएं. आजकल प्राइवेट नौकरियों में भी बहुत गुंजाइश है.

साड़ी पहन एक्सरसाइज करती दिखीं अदा शर्मा

बौलीवुड एक्ट्रेस अदा शर्मा सोशल मीडिया पर काफी एक्टिव रहती हैं और अक्सर ही अपने वीडियो और फोटोज सोशल मीडिया पर शेयर करती रहती हैं. इसी बीच उन्होंने एक बार फिर अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर एक वीडियो शेयर किया है. इस वीडियो में वह साड़ी पहन कर एक्सरसाइज करते हुए नजर आ रही हैं. बता दें, अदा ने यह वीडियो केंद्रीय मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौर द्वारा दिए गए फिटनेस चैलेंज को एक्सेप्ट करते हुए शेयर किया है.

वीडियो में अदा साड़ी में नजर आ रही हैं और वह किसी जिम में नही बल्कि किसी बिल्डिंग की छत पर एक्सरसाइज करते हुए दिखाई दे रही हैं. इतना ही नहीं वह एक्सरसाइज के लिए मुद्गर का इस्तेमाल कर रही हैं. अदा ने इस वीडियो को शेयर करते हुए लिखा, ‘क्योंकि यह फिट इंडिया चैलेंज है और इसलिए मैं पूरी तरह से ट्रेडिशनल अवतार में यह कर रही हूं. साथ ही उन्होंने ब्रैकेट में लिखा, कोई भी एक्ट्रेस उनके इस साड़ी लुक को कौपी न करें क्योंकि वह इसे पेटेंट करा रही हैं’.

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इसके अलावा उन्होंने लिखा, ‘खुद को फिट रखने के लिए किसी को भी बड़े जिम में जाने की जरूरत नहीं है. कुछ वक्त पहले मैं महाराष्ट्र के एक अखाड़े में गई थी और वहां के लोगों की फिटनेस को देख मैं काफी इंस्पायर हुई. वो लोग अपने ही वजन और कुछ सिंपल प्रोप्स के इस्तेमाल से खुद को फिट बनाते हैं. इसी में से एक है मुद्गर’. आपको बता दें कि भारत में मुद्गर का इस्तेमाल प्राचीन काल से किया जा रहा है.

गौरतलब है कि अदा ने फिल्म ‘1920’ से डेब्यू किया था और इस फिल्म के लिए उन्हें बेस्ट डेब्यू एक्टर फीमेक का फिल्मफेयर अवौर्ड भी मिला था. हालांकि, इसके बाद वह साउथ फिल्म इंडस्ट्री की ओर चली गई और उन्होंने कई साउथ फिल्मों में काम किया है.

यामी ने इस फिल्म के लिए दी अपने बालों की कुर्बानी

बौलीवुड अदाकारा यामी गौतम ने भले ही ज्यादा फिल्मों में काम न किया हो, पर उन्होंने आजतक जितनी भी फिल्में की हैं उन सब में हमेशा अपने रोल को अच्छी तरह से समझा है और अपना बनाया है. यामी गौतम ने फिल्म ‘विक्की डोनर’, ‘काबिल’ और ‘सरकार 3’ में अलग अलग किरदार को निभाया है. इसलिए वह अपनी आने वाली फिल्म ‘उरी’ में भी कुछ अगल तरह का किरदार निभा रही हैं.

फिल्म ‘उरी’ के लिए यामी ने फिजिकल फिटनेस के साथ-साथ अपने पूरे लुक को भी बदल दिया है. उन्होंने इंस्टाग्राम पर अपने नए लुक को पोस्ट किया है. एक्ट्रेस फिलहाल एक स्टाइलिश बौब लुक में हैं. पहली बार ऐसा हुआ है जब उन्होंने अपने लंबे बालों की कुर्बानी दी है और अपने रोल के लिए हेयर कट कराया है.

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तीन हेयर स्टाइलिस्ट और फिल्म के डायरेक्टर की टीम ने यह तय किया कि फिल्म में उनके बाल कैसे दिखेंगे और उसी के अनुसार वीकेंड में हेयर ट्रांसफार्मेशन किया गया है. इस लुक में एक्ट्रेस बेहद क्लासी दिख रही हैं. उनके नए हेयर कट को देखकर यूजर्स उन्हें अच्छे कमेंट दे रहे हैं.

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यामी ने बताया फिल्म के किरदार के इस खास लुक को लेकर वो काफी उत्साहित थी. जब आदित्य ने उनके साथ बात की तो वह अपने कैरेक्टर को अधिक रियल बनाने का मौका चूकना नहीं चाहती थी. मुझे अपना लुक काफी पसंद आया और आशा है कि दर्शक भी इसे पसंद करेंगे. फिल्म उरी 2016 में उरी में हुए हमलों पर आधारित है. आदित्य धर इस फिल्म के साथ डायरेक्शन की शुरुआत कर रहे हैं और फिल्म में यामी के अपोजिट विक्की कौशल होंगे.

हुनर पाने में लगाएं दमखम

शिक्षा संस्थानों व सरकारी नौकरियों में युवाओं की आरक्षण की चाहत हर पार्टी के लिए गले की हड्डी बन गई है. नौकरी के गिरते अवसरों से परेशान युवा एक बार फिर सरकारी नौकरियों के पीछे दौड़ रहे हैं पर वहां पहली बाधा पद के अनुकूल स्कूली या कालेजी शिक्षा की अनिवार्यता आड़े आ जाती है. दोनों जगहों पर पिछड़ी व निचली जातियों के युवा और ऊंची जातियों के युवा जिन में सदियों से सवर्ण माने गए पढ़ेलिखे व खातेपीते घरों के तो हैं ही, 1947 के बाद हुए भूमि सुधारों से जमीनमालिक बने तब के थोड़े कम पिछड़े घरों के युवा भी अब शामिल होने लगे हैं.

नतीजा यह है कि सरकारी शिक्षा संस्थानों या सरकारी नौकरियों में लाखों को निराशा होने लगी है. जिन्हें आरक्षण नहीं मिला वे रोना रोते रहते हैं कि आरक्षण न होता तो वे अपने से कमतर के मुकाबले स्कूलकालेज या सरकारी दफ्तर में जगह पा जाते. उन का गुस्सा कहीं मराठा, कहीं जाट, कहीं पाटीदार, कहीं केषलिंगा तो कहीं किसी और जाति के नाम से दिख रहा है.

सड़कों पर भगवा दुपट्टा लपेटे युवाओं के जो हुजूम दिखने लगे हैं उन में ज्यादातर इसी नाराज वर्ग से हैं. वे धर्म के पैरोकार बन कर आरक्षण को समाप्त करने की जुगत में पूजापाठी बनने का ढोंग रच रहे हैं. वे शासकों को खुश करना चाहते हैं कि  उन से ज्यादा बड़ा भक्त कोई नहीं है. वे, दाता, अब तो कालेज में सीट या सरकारी नौकरी का वर दे दो, की गुहार करते नजर आते हैं.

ये युवा भटके ही नहीं, मूर्ख भी हैं. इन्हें नहीं मालूम कि सपनों के चमकीले पहाड़ को तोड़ने का लालच दे कर इन से लोगों के सिर तुड़वाए जा रहे हैं. एक राजनीतिक माफिया तैयार किया जा रहा है जिस का हिस्सा बन कर ये युवा अपनी पूरी जिंदगी स्वाह कर देंगे. आज तो ये मातापिता के या धमकियों  से वसूले चंदे के पैसों से मोटरसाइकिलों पर नारे लगाते घूमते हैं और झंडे, लाउडस्पीकर, गाय, राष्ट्रभक्ति, राष्ट्रगान के नाम पर तोड़फोड़ करते हैं पर जैसे ही जरा बड़े होंगे तो इन के हाथों में न शिक्षा होगी, न नौकरी और न ही हुनर. बाइकों पर इन की जगह युवाओं की अगली खेप ले लेगी और बुढ़ाते नेता भी इन्हें दूध से मक्खी की तरह निकाल फेंकेंगे.

आरक्षण का लाभ ज्यादा जातियों को मिले तो भी सीटें तो उतनी ही रहेंगी. यदि दलितों, ओबीसीयों के हाथों से कुछ छीना गया तो वे भी उसी तरह का शोर मचाने लगेंगे जैसे आज पाटीदार, जाट व गुर्जर मचा रहे हैं. उन का हल्ला ज्यादा दमदार होगा और ज्यादा खतरनाक क्योंकि वे लोग सदियों का हिसाब करने के लिए तैयार बैठे हैं. धर्म की लुटिया पूरी तरह डूब सकती है और उन का आरक्षण आबादी के हिसाब से 50 से बढ़ कर 70-75 प्रतिशत तक पहुंच सकता है.

अच्छा यही है कि युवा अपना दमखम नए हुनर पाने में लगाएं. आज हुनरमंदों की हर क्षेत्र में जरूरत है. अगर चीन जैसा बनना है तो चीन जैसी उत्पादन क्षमता तैयार करनी होगी.

पुरुष रजोनिवृत्ति को इस तरह समझिए

पुरुषों के लिए रजोनिवृत्ति शब्द का प्रयोग कभी कभी उम्र बढ़ने के कारण टेस्टोस्टोरोन का स्तर कम होने या टेस्टोस्टोरोन की जैव उपलब्धता में कमी बताने के लिए किया जाता है. महिलाओं की रजोनिवृत्ति और पुरुषों में रजोनिवृत्ति 2 भिन्न स्थितियां हैं. हालांकि, महिलाओं में अंडोत्सर्ग (औव्यूलेशन) खत्म हो जाता है और हार्मोंस बनने भी कम हो जाते हैं और यह सब अपेक्षाकृत कम समय में होता है जबकि पुरुषों में हार्मोन बनना और टेस्टोस्टोरोन की जैव उपलब्धता कई वर्षों में कम होती है. जरूरी नहीं है कि इस के नतीजे स्पष्ट हों.

पुरुषों में रजोनिवृत्ति महिलाओं की अपेक्षा अचानक नहीं होती है. इसके संकेत और लक्षण धीरे धीरे और सूक्ष्मतौर पर सामने आते हैं. पुरुषों के हार्मोन टेस्टोस्टोरोन के स्तर में कमी किसी भी सूरत में उस तेजी से नहीं होती है जिस तेजी से महिलाओं में होती है. हैल्थकेयर विशेषज्ञ इसे एंड्रोपौज, टेस्टोस्टोरोन डैफिशिएंसी या देर से

शुरू हुआ हाइपोगोनाडिज्म कहते हैं. हाइपोगोनाडिज्म का मतलब है पुरुषों के हार्मोन में इतनी कमी जो किसी उम्रदराज व्यक्त्ति के लिए भी कम हो.

संकेत और लक्षण

-मूड बदलना और चिड़चिड़ापन.

-शरीर में चरबी का पुनर्वितरण.

-मांसपेशियों की कमी.

-शुष्क व पतली त्वचा.

-हाइपर हाइड्रोसिस यानी अत्यधिक पसीना निकलना.

-एकाग्रता की अवधि कम होना.

-उत्साह कम होना.

-सोने में असुविधा यानी अनिद्रा या थकान महसूस होना.

-यौन इच्छा कम हो जाना.

-यौन क्रिया ठीक से न होना.

उपरोक्त लक्षण भिन्न पुरुषों में अलग अलग हो सकते हैं और यह अवसाद से ले कर दैनिक जीवन व खुशी में हस्तक्षेप तक, कुछ भी हो सकता है. इसलिए, संबंधित कारण मालूम करना महत्त्वपूर्ण है और इसे दूर करने के लिए आवश्यक इलाज किया जाना चाहिए. कुछ लोगों की हड्डियां भी कमजोर हो जाती हैं. इसे औस्टियोपीनिया कहा जाता है.

कुछ मामलों में जब जीवनशैली या मनोवैज्ञानिक समस्या आदि जिम्मेदार नहीं लगते हैं, तो पुरुष रजोनिवृत्ति के लक्षण हाइपोगोनाडिज्म के कारण हो सकते हैं जब हार्मोन कम बनते हैं या बनते ही नहीं हैं. कभीकभी हाइपोगोनाडिज्म जन्म से ही मौजूद होता है. इस से यौनारंभ देर से आने और अंडग्रंथि छोटा होने जैसे लक्षण हो सकते हैं. कुछेक मामलों में हाइपोगोनाडिज्म का विकास जीवन में आगे चल कर भी हो सकता है खासकर उन पुरुषों मे जो मोटे हैं या जिन्हें टाइप 2 डायबिटीज है. इसे देर से हुआ हाइपोगोनाडिज्म कहा जा सकता है और ऐसे पुरुष में रजोनिवृत्ति के लक्षण सामने आ सकते हैं. हाइपोगोनाडिज्म देर से शुरू होने का पता आमतौर पर आप के लक्षणों और खून की जांच के नतीजों से पता चलता है. इस का उपयोग टेस्टोस्टोरोन का स्तर जानने के लिए किया जाता है.

पुरुष रजोनिवृत्ति के लक्षण का सब से आम किस्म का उपचार जीवनशैली से संबंधित स्वास्थ्यकर विकल्प चुनना है. उदाहरण के लिए, आप का चिकित्सक आप को सलाह दे सकता है :

-पौष्टिक आहार लें.

-नियमित व्यायाम करें.

-पर्याप्त नींद लें.

-तनाव मुक्त रहें.

जीवनशैली से संबंधित ये आदतें सभी पुरुषों के लिए फायदेमंद हो सकती हैं. इन आदतों को अपनाने के बाद पुरुष, रजोनिवृत्ति के लक्षणों को महसूस करने वाले पुरुष अपने संपूर्ण स्वास्थ्य में सकारात्मक परिवर्तन देख सकते हैं. अगर आप अवसाद में हैं तो आप के चिकित्सक ऐंटी डिप्रैसैंट्स थेरैपी और जीवनशैली में परिवर्तन की सलाह देंगे. हार्मोन रीप्लेसमैंट थेरैपी भी एक उपचार है. हालांकि इलाज के लिए मरीज के परिवार का कैंसर प्रोस्टेट का इतिहास और ब्लड पीएसए की रिपोर्ट चाहिए होती है अगर डाक्टर को लगता है कि हार्मोन रीप्लेसमैंट थेरैपी से फायदा होगा.

(लेखक इंद्रप्रस्थ अपोलो अस्पताल, दिल्ली में सीनियर कंसल्टैंट (यूरोलौजी) हैं.)

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