इस बंगाली गाने में कहर ढा रही हैं मोनालिसा

बिग बौस 10 कंटेस्टेंट और भोजपुरी स्टार मोनालिसा उर्फ अंतरा बिश्वास इस गर्मी में और भी ज्यादा हौट अवतार के साथ सोशल मीडिया पर छाईं हुई हैं. मोनालिसा का नया गाना झुमा बोदी(झुमा भाभी) सोशल मीडिया पर धमाल मचा रहा है. इस वीडियो में मोनालिसा सफेद रंग की साड़ी और बालों में गजरा लगाकर ट्रेन में सफर करती हुईं नजर आ रही हैं. मोनालिसा के आस-पास कई सारे लड़के दिख रहे हैं.

कोई उन्हें फूल गिफ्ट कर रहा है तो कोई पान. ट्रेन से उतरते ही वो बारिश में भीगती हुईं नजर आ रही हैं. इस वीडियो को यूट्यूब पर काफी पसंद किया जा रहा है. अब तक इस वीडियो को लाखों बार देखा जा चुका है. मोनालिसा का यह वीडियो बंगाली वेब सीरिज का हिस्सा है.

बंगाली वेब सीरिज डुपुर ठाकुरपो सीजन 2 में मोनालिसा बेहद ग्लैमरस अवतार नजर आ रही हैं. इससे पहले इस वेब सीरिज के गाने को अपने इंस्टाग्राम पर मोनालिसा ने खुद शेयर किया था. इस वीडियो में मोनालिसा सफेद शिफौन साड़ी नजर आ रही है और उनके डासिंग मूव्स को आप भी देखते रह जाएंगे. साड़ी के साथ उन्होंने चोटी और गजरा में और वो और भी बेहद खूबसूरत लग रही थीं.

मोनालिसा भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री की सबसे अधिक फीस चार्ज करने वाली एक्ट्रेस हैं. उन्होंने 2008 में भोले शंकर फिल्म से इंडस्ट्री में कदम रखा था और इसके बाद लगातार वो कई सुपरहिट फिल्मों का हिस्सा रही हैं. इस दौरान उनकी जोड़ी भी कई स्टार्स के साथ हिट रही जैसे रियल लाइफ पति विक्रांत के साथ इतिहास, गौरव झा के साथ जवानी जिंदाबाद,श्याम देहाती के साथ रानी दिलबर जानी, विक्रांत के साथ मिलन संयोग जैसी सुपरहिट फिल्में दे चुकी हैं.

इच्छामृत्यु का अधिकार देना खतरनाक

इच्छामृत्यु के बाबत आखिरकार सुप्रीम कोर्ट अब इस बात के लिए तैयार हो गया है कि आम लोगों को जीने के साथ मरने का भी मौलिक अधिकार है. यह एक किस्म से उस की अब तक की सोच का यूटर्न है. कुछ लोग इसे नागरिक आजादी की चरम निजता का सम्मान मान रहे हैं, तो कुछ लोगों की नजर में यह बेहद खौफनाक फैसला है.

सुप्रीम कोर्ट के जानेमाने वकील और स्त्रियों, बच्चों तथा तमाम वंचित तबकों के मानवाधिकारों की हमेशा वकालत करने वाले अरविंद जैन इच्छामृत्यु पर शुरू से ही लगातार अपनी सुचिंतित प्रतिक्रिया व्यक्त करते रहे हैं. पेश हैं सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक कहे जाने वाले फैसले के बाद उन से हुई विस्तृत बातचीत के महत्त्वपूर्ण अंश-

सुप्रीम कोर्ट ने इच्छामृत्यु का जो ऐतिहासिक फैसला दिया है, जिस में जीवन के साथ मृत्यु को भी गरिमापूर्ण बनाने की बात कही जा रही है, उस के बारे में क्या कहेंगे?

यह बेहद खतरनाक फैसला है. खासकर इस माने में हम देश को दिल्ली, मुंबई, हैदराबाद, पुणे और कोलकाता की नजर से ही नहीं देखें. बीमारियां और खासकर लाइलाज बीमारियां सिर्फ इन शहरों में ही नहीं होतीं, गांव में भी, कसबों में भी, ऐसे दूरदराज के इलाकों में भी जहां तमाम मैडिकल सुविधाएं हैं ही नहीं, वहां भी होती हैं, जिन से जूझने के बजाय हम उन के मुकाबले जीवन को ही खत्म कर देने का सरल विकल्प ढूंढ़ लाए हैं. यह पलायन है. यह इंसान की गरिमा और उस के जज्बे का अपमान है.

देश के बड़े हिस्से में तो लाइफ सपोर्टिंग सिस्टम भी नहीं है, वहां तो लोग इस फैसले की आड़ में मामूली सी बीमारियों को भी लाइलाज बता कर जीवन को निबटा देंगे. जरा, कोई सुप्रीम कोर्ट से पूछें जहां आज तक एक सुविधासंपन्न हौस्पिटल नहीं पहुंचा, उन जगहों, उन इलाकों में मृत्यु के फैसले को न्यायोचित ठहराने वाला मैडिकल बोर्ड कहां से आएगा? क्या इतने डाक्टर देश में हैं जो हर इच्छामृत्यु को जांचपरख सकें कि मरने वाले की इच्छा से ही या सही मानो में ऐसा जीवन खत्म हुआ है, जिस के बचने की कोई उम्मीद नहीं थी.

हैरानी की बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने देश के दूरदराज इलाकों में या कहना चाहिए महानगरों के बाहर के इलाकों में डिस्ट्रिक मजिस्ट्रेट को मौत को सही या गलत ठहराने का अधिकार दे दिया है. यह इंसान की गरिमा का कितना बड़ा अपमान है कि एक औफिसर किसी की मौत को जायज या नाजायज ठहराने वाला बन जाता है.

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इच्छामृत्यु के इस अधिकार से कहीं समाज में अराजकता की स्थिति तो नहीं पैदा हो जाएगी?

मेरा इस मामले में बिलकुल साफ कहना है कि इस वक्त राज्य के पास मैडिकल सुविधाएं डाक्टर, दवाई, खर्चे, पैसा है नहीं. सरकार आप को बचा नहीं सकती. आप के जीवन की रक्षा नहीं कर सकती. इसलिए कोई मरे, समाज मरे, देश मरे राज्य की बला से.

 लेकिन यह फैसला राज्य यानी सरकार नहीं कर रही, यह फैसला सुप्रीम कोर्ट की तरफ से आया है, जो कि एक स्वतंत्र न्यायिक संस्था है?

बेसिकली न्यायपालिका के मुखौटे में यह राज्यसत्ता का ही पौलिटिकल बिल है, मैं ऐसा मानता हूं. यहां राज्य नहीं चाहता या उस के पास संसाधन नहीं है या वह संसाधनों को राफेल खरीदने में खर्च करना चाहता है. मैडिकल ऐक्सपैंसेज या दूसरे वैलफेयर ऐक्सपैंसेज के लिए उस के पास कोई जगह नहीं है?

या कहें उस की इच्छा नहीं है अथवा उस की प्राथमिकता में नहीं है?

यस, उस की प्राथमिकता में ही नहीं है. वह कहता है हां, ठीक है यार, जब इस का कुछ होना ही नहीं है, बचना है नहीं, इस को मरना ही मरना है, तो इस को लाइफ सपोर्ट सिस्टम में लगा कर इतने डाक्टर, इतनी दवाएं क्यों बरबाद करें.

न्यायिक एथिक्स की दृष्टि से इच्छामृत्यु का यह निर्णय कितना खतरनाक है?

देखिए, मृत्युदंड के बारे में सुप्रीम कोर्ट की सोच है कि रेयरैस्ट औफ रेयर मामले में ही मृत्युदंड दिया जा सकता है, वह भी तब जबकि जिन्हें मृत्युदंड दिया जाना है, वे जघन्यतम अपराधी हैं. फिर भी, सुप्रीम कोर्ट मृत्युदंड देने से बचता है. अब निर्भया कांड के अपराधियों को ही लें, छोटी अदालत से, हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट से भी उन्हें मृत्युदंड हो चुका है. फिर भी अभी तक उन को फांसी नहीं हुई. कहने का मतलब वहां तो आप रिव्यू भी करेंगे, प्रीव्यू भी करेंगे और अगर सजा देने में 5-10 साल की देरी हो गई तो उसे आजीवन कैद में परिवर्तन भी करेंगे यानी पहले तो रेयरैस्ट औफ रेयर केस में फांसी देंगे, फिर इस फैसले को 5-10 साल एक्जिक्यूट नहीं करेंगे, फिर डिले होने के नाम पर फांसी को आजीवन कारावास में परिवर्तित कर देंगे.

छोटी बच्चियों से रेप के मामले में आज तक सिवा धनंजय चटर्जी और जुम्मन खां के किसी और को मौत की सजा नहीं हुई. दहेज हत्याओं के मामले में पहले फांसी हो सकती थी और छोटी अदालतों तथा हाईकोर्ट ने ऐसे कुछ फैसले भी दिए लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें आजीवन कैद में बदल दिया. एक भी फांसी दहेज हत्याओं के मामले में आज तक नहीं हुई. 1986 में तो इन्होंने कानून ही बदल दिया कि दहेज हत्याओं के मामले में मुकदमा 302 में नहीं, बल्कि धारा 304बी में चलेगा. जिस में अधिकतम सजा आजीवन कैद ही हो सकती है. इस तरह देश के सारे दहेज हत्यारों को सुप्रीम कोर्ट ने फांसी से बचा लिया. यहां तक कि आतंकवादियों की भी मौत की सजा को आजीवन कारावास में बदला गया है.

जब जिन लोगों ने अपराध किए हैं, वह भी बर्बर अपराध किए हैं, अगर उन लोगों को फांसी की सजा नहीं देना चाहते क्योंकि फांसी की सजा देने के बाद कोर्ट उसे पलट नहीं सकता, इसलिए बहुत सोचसमझ कर मृत्युदंड का निर्णय लिया जाता है. सिर्फ हिंदुस्तान में ही नहीं, दुनिया के तमाम बड़े देशों ने तो इसी बात को ध्यान में रख कर फांसी की सजा ही खत्म कर दी है. तो ऐसे में किसी को भी इच्छामृत्यु का अधिकार दे देना, यह तो बहुत खतरनाक है.

क्या ऐसे फैसलों के पीछे माहौल की भी कोई भूमिका होती है, आखिरकार सुप्रीम कोर्ट ने इस इच्छामृत्यु के फैसले को इतनी सहजता से कैसे दे दिया है?

बेसिकली आज यानी साल 2018 में समाज की 2 ही मानसिक स्थितियां हैं या तो मर जाऊं या किसी को मार दूं यानी किसी की हत्या कर दूं या आत्महत्या कर लूं. आदमी इतना परेशान है कि वह कुछ भी कर सकता है.

आप की बातों से तो लगता है कि यह एक बेहद निराश माहौल का निराशा से भरा बेहद घातक फैसला है?

यस.

यह तो समाज के लिए बहुत घातक है?

यस. चूंकि ये लोग आइवरी टावर में बैठे हुए हैं, समाज से इन का कोई सरोकार नहीं है, समाज से कोई कंसर्न नहीं है, समाज से कोई संवाद नहीं है, इसलिए ये समझते हैं, बस यही दुनिया है, यही समाज है और यही हकीकत है. यही जीरो ग्राउंड रियलिटी है. चलो ऐसा कर देते हैं, चलो वैसा कर देते हैं, चलो मरना है मर जाओ, यार. बस, वसीयत लिख देना. अरे, वसीयत नहीं लिखा, घरपरिवार के तो लोग हैं? वो नहीं हैं तो फ्रैंड्स की कंसैंट ले लो. बुलाओ इन 4 डाक्टरों को. भाई देखो, यह बचेगा या नहीं बचेगा? नहीं बच सकता तो हटाओ यह लाइफ सपोर्टिंग सिस्टम. खत्म करो. इतना पैसा नहीं है सरकार के पास, वह भी जिस का कोई फायदा न हो. इफरात में न डाक्टर हैं, न दवाईयां हैं और न पैसा है.

इस से तो बहुत खतरनाक निष्कर्ष निकल रहा है. कहां तो इसे गरिमापूर्ण मौत का नाम दिया जा रहा है, जबकि इस से तो लगता है कि यह जीवन की गरिमा खत्म करने वाला है?

वो तो हो ही रहा है. जो लोग सत्ता में बैठे हैं चाहे राजनीतिक सत्ता में हों, चाहे न्यायिक सत्ता में, उन के लिए सारी दुनिया अच्छी है. ये लोग आम जनता के दृष्टिकोण से समाज को देख ही नहीं सकते. ये तमाम बड़े अफसरों के बेटे, नेताओं के बेटे, राष्ट्रपति के बेटे, मुख्यमंत्रियों के बेटे, बड़े घरानों के बेटे, बड़े वकीलों के बेटे, बड़े भूतपूर्व जजों के बेटेबेटियां, यही सब पीढ़ी दर पीढ़ी शासक हैं. बाप भी सुप्रीम कोर्ट जज होता है, बाद में बेटा भी. ऐसे क्लास के सामने जीवन और मृत्यु के सवाल आ कर खड़े ही नहीं होते. इन के लिए मृत्यु की दूरदूर तक कल्पना ही नहीं होती. दुख क्या होता है, ये क्या जानें.

ओह, तो यह वर्ग इच्छामृत्यु के रोमांच का सुख लेना चाहता है?

हां.

इस समय जिस तरह का खतरनाक माहौल  है, भीड़, बिना किसी खौफ के, जिस की चाहे हत्या कर देती है, कहीं यह उसी रास्ते का अगला कदम तो नहीं है?

मैं ने कहा न, हमारी जीने की इच्छाएं खत्म की जा रही हैं. सच पूछो तो मुझे भी मरने में कोई दिक्कत नहीं है, सारा रोना जीने का है. जीने में दिक्कत है. मुझे मरने से डर नहीं लगता, जीने में डर लगता है. पूरे समाज का यही हाल है. तो पहले तो ऐसी स्थितियां पैदा कर दो कि लोग जीने से डरने लगें और फिर मरने का अधिकार दे दो. लोग सहजता से सोचने लगेंगे, चल यार, मर जाते हैं.

देश की 73 फीसदी संपत्ति पर देश के एक फीसदी लोगों का कब्जा है. लोगों के पास खाने को रोटी नहीं है, पीने को पानी नहीं है. हां, मौत का सुख है. यह यों ही नहीं है कि किसानों की आत्महत्याओं का सिलसिला बढ़ता जा रहा है लेकिन उन की मौतें आंकड़े बन कर रह गई हैं. महिलाओं की आत्महत्याओं का सिलसिला हाल के सालों में काफी ज्यादा बढ़ा है. ऐसा हो भी क्यों न, किसी को अगर किसी हौस्पिटल में एडमिट कराना हो तो बड़े से बड़े नेता की सिफारिश चाहिए. डाक्टर नहीं है, दवाएं नहीं हैं. पिछले 4 वर्षों में पूरे देश में एक हौस्पिटल नहीं बना, एक कालेज नहीं बना. यह सब क्या हो रहा है. ऐसे में राज्य सरकार हो, न्यायपालिका हो, या साधनसंपन्न वर्ग, ये तीनोंचारों वर्ग जो आम लोगों के कंधों पर बैठे हैं, वे समझते हैं कि आम लोगों को मरने दो न यार, हमें क्या लेना.

निर्वासन का दर्द झेलती औरतें

कर्मों की कार्यशाला में सदियों पक कर संस्कार तैयार होते हैं, जो धीरेधीरे संस्कृति बन जाते हैं. अगर ऐसा नहीं होता तो आज भी मिथिला की नारियां सीता के बताए मार्ग पर चलने को शायद प्रतिबद्ध न होतीं.

सीता ने रावण के आचरण का कड़ा विरोध किया था पर राम के अत्याचार का प्रतिवाद न कर सकीं. अगर उस वक्त सीता ने खुद पर राम द्वारा किए गए अत्याचार का विरोध किया होता तो शायद अच्छा होता. बगैर किसी अपराध के निर्वासन के दंड को चुपचाप स्वीकार कर सीता ने जानेअनजाने नारियों को जो संदेश दिया उस का परिपालन आज भी अनेक सीताएं कर रही हैं.

मिथिला समेत कई नगरों में आज भी ऐसी सीताओं की कमी नहीं है जो प्रतिदिन उपेक्षा, अपमान और अवमानना का विष पीती हुई निर्वासन की पीड़ा भोग रही हैं. ये सीताएं भी अपनों के अत्याचार का विरोध नहीं कर पातीं. खास बात यह है कि छोटीछोटी बातों पर छोड़ दी जाने वाली ऐसी निर्दोष स्त्रियों के प्रति परिवार और समाज की कोई सहानुभूति नहीं होती. झूठे आक्षेप, मारपीट और प्रताड़नाओं को चुपचाप सहते हुए हर हाल में ससुराल में बनी रहने वाली स्त्रियों को ही समाज में श्रेष्ठ मान्यता दी जाती है. अपनों की उपेक्षा और निर्वासन की पीड़ा झेल रही कुछ सीताओं की व्यथाकथा से आप भी रूबरू हों.

शक में ठुकराया

3 बहनों और 2 भाइयों में सब से बड़ी नीतू कुमारी 15 सालों से अपने मायके में रह कर छोड़े जाने का कष्ट झेल रही है. 16 साल की उम्र में पास के गांव में महेंद्र सिंह से उस की शादी हुई थी. शादी के बाद उस का पति उसे अपने साथ दिल्ली ले कर गया जहां वह काम करता था. 2 बच्चे भी हुए. घर पर नीतू पूरे दिन अकेली रहती थी. अकेलेपन से ऊब कर वह कभीकभार पड़ोस के मुसलिम परिवार के साथ घूमनेफिरने जाने लगी. महेंद्र को यह पसंद नहीं आया.

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तीसरी बार जब नीतू गर्भवती थी तो उस का पति बहाने से दोनों बच्चों के साथ उसे उस के मायके पहुंचा कर लौट गया. नीतू आज तक वापस लिवा ले जाने की प्रतीक्षा कर रही है. उस के पति को शक था कि यह तीसरा बच्चा उस का नहीं है. बच्चे के जन्म के एक साल बाद वह एक बार आया था और बेटे को देख कर एक ही दिन में चला गया. फिर कभी वापस नहीं आया. नीतू के बारबार फोन कर के वापस ले चलने की मिन्नतों का जवाब था कि इस तीसरे बच्चे की शक्ल पड़ोस के फिरोज से मिलती है.

लदनियां के सरकारी स्कूल के अध्यापक रमाकांत ठाकुर के 2 बच्चों में सोनी छोटी है. उस से बड़ा एक भाई है. देखने में बेहद खूबसूरत सोनी की शादी घर वालों ने उस के मैट्रिक पास करते ही कर दी थी. पति दिल्ली में नौकरी करता था. साधारण कदकाठी और गहरे रंग के आलोक कुमार पर पत्नी की बेदाग खूबसूरती का ऐसा असर हुआ कि वह दिल्ली से नौकरी छोड़ कर घर पर ही आ कर बैठ गया. एक बेटा होने के बाद मातृत्व की गरिमा से सोनी का रूप और निखर गया.

सोनी चाहती थी कि पति कोई कामधंधा करे पर आलोक चौबीसों घंटे घर में मंडराता, पत्नी के हर क्रियाकलाप पर पैनी नजर रखता. पति की बेकारी से तंग आ कर सोनी 1-2 घरों में बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने लगी जिस से कुछ पैसे आने लगे. पर आलोक उस से सारे पैसे ले कर शराब पी जाता. धीरेधीरे घर में क्लेश होने लगा. एक दिन आलोक ने मारपीट कर सोनी को घर से निकाल दिया. पड़ोस के घर में सोनी ने अपने बच्चे के साथ रात काटी. सुबह घर में घुसने की कोशिश की तो पड़ोसी के साथ अनैतिक संबंध का कलंक लगा कर दोबारा मारापीटा.

लाचार सोनी महल्ले के कुछ लोगों से किराए के पैसे मांग कर मायके वापस आ गई. आज दोचार घरों में ट्यूशन पढ़ा कर वह अपना व अपने बेटे का पेट पाल रही है. ध्यान देने वाली बात यह है कि उस के पिता के हिसाब से इस अलगाव के लिए उस की बेटी ही जिम्मेदार है, उसे वापस नहीं आना चाहिए था.

प्रताड़ना का दंश

एक मामला है भागलपुर की सीमा चौधरी के निर्वासन का. समृद्ध परिवार की रूप, गुण और संस्कारों से परिपूर्ण 4 बहनों में सब से बड़ी सीमा की शादी उच्च पद पर आसीन युवक संदीप सुमन से बहुत धूमधाम से की गई थी. पतिपत्नी की आयु में कई सालों का अंतर था. सुहागरात से ही पत्नी को प्रताडि़त करने का जो सिलसिला चला वह कभी अंत न ले सका. गालीगलौज से ले कर हर प्रकार की घरेलू हिंसा का सामना करती सीमा एक बेटे की मां बन गई.

रोजरोज अपमान सहने के बावजूद सीमा ने अपने मायके में यह सब नहीं बताया था. पर एक बार जब वह मायके आई हुई थी तो आदत से मजबूर संदीप ने वहां पर भी उस की पिटाई कर दी. उस दिन घर के लोग वस्तुस्थिति से परिचित हो सके. उन लोगों ने संदीप को समझाने की कोशिश की तो वह पूरे परिवार को बुराभला कहता पत्नी को वहीं छोड़ कर वापस आ गया.

सीमा की बहुत कम उम्र में शादी कर दी गई थी. सो, उस की पढ़ाई पूरी नहीं हो सकी थी. मायके में रह कर बच्चे को पालने के साथ उस ने अपनी पढ़ाई पूरी की. आज वह सरकारी विभाग में एक उच्च अधिकारी है, पर पति के खौफ से बाहर नहीं निकल पाई है. सालों से कोर्ट में तलाक का केस लटका पड़ा है जो उस के पति की तरफ से किया गया था.

कोर्ट में सुनवाई के दौरान जब भी उस का सामना अपने पति से होता है, सीमा हाइपरटैंशन समेत कई व्याधियों से पीडि़त हो जाती है और कई दिनों तक दवाई लेने के बाद ही उस की हालत संभलती है. संदीप चूंकि सरकारी सेवा में है, इसलिए दूसरी शादी तो नहीं कर सका पर उस के अनैतिक संबंधों की दुर्गंध समाज में पसरी हुई है.

इसी तरह झंझारपुर की सुनीता. जब वह 13 साल की थी तभी उस की शादी कर दी गई थी. ससुराल आने के 2 दिनों बाद ही उस का पति काम पर वापस चला गया. दोचार महीने में वह कभी दोचार दिनों के लिए आता और फिर वापस चला जाता. दरअसल, वह ससुराल से पूरा दहेज न मिलने के कारण असंतुष्ट व गुस्से में था. वह सुनीता पर मायके से दहेज मांगने के लिए दबाव बनाता था. मायके की आर्थिक हालत देख कर सुनीता कुछ नहीं कह पाती थी.

कुछ ही समय में सुनीता 3 बेटियों की मां बन गई. जब बच्चे थोड़े बड़े हुए तो सुनीता ने पति से उन की पढ़ाई का खर्च मांगा जिसे देने से उस ने साफ मना कर दिया. लाचार हो कर सुनीता ने आसपास के कई घरों में घरेलू काम कर के उन्हें पढ़ायालिखाया. धीरेधीरे सुनीता के पति ने घर आना ही छोड़ दिया. उस की खुद की मां का खर्च भी सुनीता ही उठाती रही.

एक अच्छा रिश्ता मिलने पर सुनीता ने बड़ी लड़की की शादी कर्ज ले कर कर दी, लेकिन 3 महीने में ही उस के पति ने उसे छोड़ दिया. आज सुनीता और उस की बेटी सुबह से रात तक कई घरों में काम करती हैं, तब जा कर पूरे घर का पेट भरता है.

भागलपुर की ही मोती की कहानी थोड़ी अलहदा है. दूधिया गौर वर्ण की मोती ने 8वीं क्लास में ही महल्ले के एक लड़के हर्ष के झांसे में आ कर घर से भाग कर मंदिर में शादी कर ली. गनीमत यह रही कि ससुराल वालों ने मोती को सहर्ष स्वीकार कर लिया.

8-9 साल बहुत अच्छे कटे पर उस के बाद हर्ष छोटीछोटी बात पर कलह करने लगा. दूसरे बच्चे के जन्म के बाद उस ने दूसरे शहर में बिजनैस जमा लिया और घर आना कम कर दिया. मोती बूढ़े सासससुर की सेवा करने के साथसाथ बच्चों को भी संभालती रही. इधर हर्ष ने वहां छिप कर दूसरी शादी कर ली. मोती ने चूंकि घर से भाग कर शादी की थी, इसलिए मायके का आसरा भी खत्म हो गया. सासससुर की सहानुभूति और प्यार तो बहू के साथ है पर बेटे पर उन का कोई वश नहीं. 7 साल हो गए, हर्ष ने पत्नी की खबर नहीं ली. सोनी से पूछने पर कि अगर उस का पति वापस आता है तो क्या वह उसे पहले की तरह स्वीकार कर पाएगी, उस का जवाब था, उस का घर है, उस के बच्चे हैं वह जब चाहे आ सकता है.

मजे की बात यह है कि ये स्त्रियां बरसों से निर्वासन का दर्द भोग रही हैं पर पति और परिवार की बदनामी न हो जाए, इसलिए इन्होंने अपने असली नाम और तसवीरें छापने की अनुमति नहीं दी.

बाघों की लगातार होती मौत का ये है सच

इसी मार्च महीने के तीसरे सप्ताह में लगे 2 बड़े झटकों ने वन्यजीव प्रेमियों को हिला कर रख दिया. दोनों झटके राजस्थान में केवल 24 घंटे के अंतराल पर लगे. विश्वप्रसिद्ध सरिस्का अभयारण्य में एक बाघ की फंदे में फंसने से मौत हो गई. इस के अगले ही दिन रणथंभौर अभयारण्य का एक बाघ पास के एक गांव में घुस गया. ग्रामीणों की सूचना पर पहुंचे वन विभाग के कर्मचारियों ने उसे बेहोश कर पकड़ने के लिए ट्रैंकुलाइज किया, लेकिन बाघ बेहोशी की दवा का असर नहीं झेल सका और उस की मौत हो गई.

सरिस्का में फरवरी के चौथे सप्ताह से बाघिन एसटी-5 लापता चल रही थी. इस बाघिन की तलाश में वन विभाग के कर्मचारी दिनरात ट्रैकिंग कर रहे थे. इसी दौरान 19 मार्च, 2018 की रात करीब 9 बजे सरिस्का अभयारण्य की सदर रेंज के इंदौक इलाके में कालामेढ़ा गांव के एक खेत में बाघ का शव पड़ा होने की सूचना मिली.

इस सूचना पर सरिस्का मुख्यालय के अफसर मौके पर पहुंचे और बाघ केशव के शव को कब्जे में ले लिया. उस की गरदन क्लच वायर द्वारा बनाए गए फंदे में फंसी हुई थी. वह 4 साल के जवान नर बाघ एसटी-11 का शव था. इस बाघ की मौत कुछ घंटों पहले ही हुई थी. जिस खेत में उस की लाश मिली थी, वह खेत भगवान सहाय प्रजापति का था. वन अधिकारियों ने खेत मालिक को हिरासत में ले लिया. भगवान सहाय ने वन अधिकारियों को बताया कि फसलों को नीलगायों और दूसरे जंगली जानवरों से बचाने के लिए उस ने खेत में ब्रेक वायर जैसा तार लगा रखा था. खेत की तरफ आने पर बाघ फंदे में उलझ गया होगा और फंदे से निकलने की जद्दोजहद में तार से उस का गला घुट गया होगा, जिस से उस की मौत हो गई.

जिस जगह बाघ एसटी-11 का शव मिला, वह इलाका बाघिन एसटी-3 के लापता होने वाली जगह से कुछ ही दूर है. कुछ दिनों पहले बाघिन एसटी-5 और बाघ एसटी-11 सरिस्का की अकबरपुर रेंज में साथसाथ देखे गए थे. इन के पगमार्क और लोकेशन साथ मिले थे.

उस के बाद से बाघिन एसटी-5 लापता हो गई थी, लेकिन बाघ एसटी-11 के रेडियो कौलर के सिगनल लगातार मिल रहे थे. बाघ एसटी-11 सरिस्का अभयारण्य का पहला शावक था. उस का जन्म रणथंभौर से लाई गई बाघिन एसटी-2 से करीब 4 साल पहले हुआ था.

बाघ का शव मिलने के दूसरे दिन 20 मार्च को जयपुर से वन विभाग के आला अफसर और देहरादून से भारतीय वन्यजीव संस्थान के वैज्ञानिक सरिस्का पहुंच गए. सरिस्का प्रशासन और देहरादून से आए वैज्ञानिकों ने कालामेढ़ा पहुंच कर बाघ की मौत से जुड़े साक्ष्य जुटाए. हिरासत में लिए गए खेत मालिक की निशानदेही पर तार का फंदा और बाघ के बाल आदि बरामद किए गए.

बाद में सरिस्का मुख्यालय पर बाघ के शव का पोस्टमार्टम कराया गया. इसी दिन अधिकारियों और वन्यजीव प्रेमियों की मौजूदगी में बाघ के शव को जला दिया गया. वन विभाग ने बाघ की मौत के मामले में खेत के मालिक भगवान सहाय प्रजापति को विधिवत गिरफ्तार कर लिया.

हैरानी की बात यह रही कि राज्य के मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक डा. जी.वी. रेड्डी ने पूरे मामले की जांच से पहले ही आरोपी किसान को बेकसूर बताते हुए कहा कि उस ने खेत में फसल बचाने के लिए फंदा लगाया था, जिस में फंस कर बाघ मारा गया. किसान ने खुद वन विभाग को बाघ के मरने की सूचना दी थी. फिर भी हम इस बात की जांच करेंगे कि क्या वह आदतन फंदा लगाता रहा है.

यह दुखद रहा कि जिस समय सरिस्का में बाघ एसटी-11 के अंतिम संस्कार की तैयारी चल रही थी, उसी समय सरिस्का से करीब 250 किलोमीटर दूर रणथंभौर अभयारण्य में 6 साल के नर बाघ टी-28 की मौत हो गई. वह करीब 13 साल का था.

मारा गया जंगल का राजा

करीब 6 साल तक इस बाघ का रणथंभौर अभयारण्य के जोन-3 में एकछत्र राज था. जंगल के इस राजा ने साढ़े 4 साल की उम्र में बूढ़े बाघ टी-2 को भिडंत में हरा कर इस इलाके पर कब्जा जमाया था. उस दौरान दूसरे जवान बाघों ने इस इलाके पर अपना कब्जा करने के लिए टी-28 को चुनौती दी थी लेकिन वह किसी बाघ से नहीं डरा. करीब डेढ़दो साल पहले जवान बाघ टी-57 ने उसे जोन-3 से खदेड़ दिया था. इस के कुछ दिन बाद बाघ टी-86 ने उसे जंगल से बाहर का ही रास्ता दिखा दिया था.

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करीब 13 साल से ज्यादा उम्र का होने के कारण बाघ टी-28 अभयारण्य में जवान बाघों का मुकाबला नहीं कर सका. वह इधरउधर भटकने लगा था. कभी जंगल तो कभी खेतों तो कभी नालों में रह कर वह अपनी जिंदगी के दिन काट रहा था. उम्र ज्यादा होने की वजह से अब उस के लिए जंगल में शिकार करना भी मुश्किल हो गया था.

उस दिन यानी 20 मार्च, 2018 को सुबह करीब 9 साढ़े 9 बजे बाघ टी-28 भोजन की तलाश में खंडार रेंज से निकल कर छाण गांव के पास खेतों में आ गया. बाघ को देख कर आसपास के ग्रामीणों की भीड़ वहां जमा हो गई. लोगों ने उसे घेरने के बाद वन विभाग को सूचना दे दी. इस बीच लगातार भागदौड़ कर रहे इस बाघ के हमले से जैतपुर गांव का अहसर और छाण गांव का लईक जख्मी हो गए. इलाज के लिए उन्हें अस्पताल भेज दिया गया.

लोगों की सूचना पर वन विभाग के अफसर और कर्मचारी छाण गांव में मौके पर पहुंच गए. वन अधिकारियों ने पहचान लिया कि खेत में घुसा हुआ बाघ टी-28 है. अफसरों ने ग्रामीणों को समझाया कि बाघ खुद ही जंगल में चला जाएगा, लेकिन ग्रामीण अधिकारियों पर उस बाघ को पकड़ने का दबाव डाल रहे थे. हालात ऐसे थे कि बाघ चारों ओर से घिरा हुआ था. ऐसे में वह आतंकित होने के साथ खुद के बचाव का रास्ता भी ढूंढ रहा था. इस स्थिति में आक्रामक हो कर वह ग्रामीणों पर हमला भी कर सकता था.

ग्रामीणों के दबाव में वन अफसरों ने बाघ को ट्रैंकुलाइज कर बेहोश करने के लिए सवाई माधोपुर से टीम बुलाई. दोपहर करीब 12 बजे मौके पर पहुंची टीम ने अपनी काररवाई शुरू की. दोपहर करीब पौने एक बजे टीम ने निशाना साध कर एक बार में ही बाघ को ट्रैंकुलाइज कर बेहोश कर दिया.

कुछ देर इंतजार करने के बाद वन अफसरों की टीम बाघ के पास पहुंची तो वह बेहोश मिला. वन विभाग की टीम ने बेहोश बाघ को पिंजरे में डाला. इस के बाद टीम वापस जाने लगी तो ग्रामीणों ने वन विभाग की गाड़ी रोक ली. ग्रामीणों ने बाघ के कारण खेत में हुए नुकसान की भरपाई करने के बाद ही बाघ को वहां से ले जाने देने की बात कही.

इस बात पर विवाद हो गया. वन कर्मचारियों ने पैसा देने में अपनी मजबूरी बताई तो गुस्से में ग्रामीणों ने वन विभाग की टीम पर पथराव शुरू कर दिया. इस बीच वन विभाग के अफसरों ने फोन कर के किसी से उधार पैसे मंगाए और 2 खेत मालिकों को उन की फसल के नुकसान की भरपाई के रूप में 30-30 हजार रुपए नकद दे दिए.

इस के बाद ग्रामीणों ने वन विभाग की टीम को जाने की इजाजत दी. वन कर्मचारियों ने गांव से निकलते समय पिंजरे में बंद बाघ टी-28 की जांच की तो पता चला कि उस की सांसें थम चुकी थीं. बाद में उसी दिन बाघ के शव का पोस्टमार्टम कराने के बाद उस का अंतिम संस्कार कर दिया गया.

बाघों की मौत पर सवाल

2 दिन में 2 बाघों की मौत से राजस्थान में बाघों की सुरक्षा पर सवाल खड़े हो गए. पूरा वन विभाग हिल गया. राज्य के वन एवं पर्यावरण मंत्री गजेंद्र सिंह खींवसर ने इन बाघों की मौत पर दुख जताते हुए कहा कि देश में बढ़ती आबादी और जंगलों में अतिक्रमण के कारण बाघों की मौत हो रही है. जंगलों से गांव स्थानांतरित नहीं हो पा रहे हैं.

सरिस्का में बाघ एसटी-11 से कुछ दिन पहले ही देश भर में टाइगर रिजर्व पर नजर रखने वाली बौडी नैशनल टाइगर कंजरवेशन अथौरिटी यानी एनटीसीए के चीफ डा. देवब्रत ने सरिस्का का दौरा करने के बाद राज्य सरकार को एक रिपोर्ट सौंपी थी. इस रिपोर्ट में कहा गया कि जब तक सरिस्का टाइगर रिजर्व में अतिक्रमण और अन्य गैरकानूनी गतिविधियां होती रहेंगी तथा पर्याप्त स्टाफ नहीं होगा, तब तक बाघ खतरे में रहेंगे.

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रणथंभौर के बाघ टी-28 की मौत के सिलसिले में 21 मार्च को सवाई माधोपुर जिले के खंडार पुलिस थाने में फलौदी रेंजर तुलसीराम ने एक रिपोर्ट दर्ज कराई. 21 लोगों के नामजद और लगभग 100 अन्य लोगों के खिलाफ दर्ज कराई रिपोर्ट में बाघ को टैं्रकुलाइज कर लाते समय सरकारी वाहन पर पथराव कर तोड़फोड़ करने और राजकीय कार्य में बाधा डालने का आरोप लगाया गया. उन्होंने रिपोर्ट में कहा कि यदि टैं्रकुलाइज किए बाघ को इतनी देर तक नहीं रोका जाता तो उस की जान बचाई जा सकती थी.

21 मार्च को ही सवाई माधोपुर में पथिक लोक सेवा समिति और कंज्यूमर रिलीफ सोसायटी के कार्यकर्ताओं ने कलेक्टरेट पर प्रदर्शन कर कलेक्टर को प्रधानमंत्री के नाम एक ज्ञापन दिया. उन्होंने बाघ की मौत की उच्चस्तरीय जांच कराने की मांग की. ज्ञापन में वन विभाग पर ट्रैंकुलाइज करने में लापरवाही का आरोप लगाते हुए कहा गया कि वन विभाग के पास बाघों को ट्रैंकुलाइज करने के लिए विशेषज्ञ नहीं हैं. ऐसे में अयोग्य वनकर्मियों से बाघों को ट्रैंकुलाइज कराया जा रहा है.

नैशनल टाइगर कंजरवेशन अथौरिटी यानी एनटीसीए ने घटना के 2 दिन बाद ही टी-28 की मौत के संबंध में राज्य के वन विभाग से रिपोर्ट मांग ली. इस में बाघ की उम्र, उस की मौत के कारण, पोस्टमार्टम रिपोर्ट आदि सभी तथ्यात्मक जानकारियां मांगी गईं.

दूसरी तरफ सरिस्का में बाघ एसटी-11 की मौत के सिलसिले में की गई जांच में संगठित गिरोह के शामिल होने की आशंका जताई जा रही है. इस में सरिस्का अभयारण्य  में पर्यटकों को घुमाने वाले जिप्सी चालकों के शामिल होने का भी संदेह है.

वन विभाग ने गिरफ्तार भगवान सहाय प्रजापति से पूछताछ के आधार पर लीलूंडा गांव में एक मकान से बंदूक, तलवार व सांभर आदि के सींग भी बरामद किए.

इस के अलावा अन्य जगहों से भी टोपीदार बंदूकें बरामद की गईं. इन आरोपियों के खिलाफ वन विभाग ने वन्यजीव अधिनियम की धाराओं के तहत काररवाई न कर के मालाखेड़ा पुलिस थाने में आर्म्स एक्ट के तहत मामला दर्ज कराया.

पुलिस ने आर्म्स एक्ट में इंदौक गांव के बिल्लूराम मीणा, हरिकिशन मीणा व त्रिलोक मीणा और लीलूंडा गांव के रतनलाल गुर्जर को गिरफ्तार किया. हालांकि इन की गिरफ्तारी भगवान सहाय प्रजापति से पूछताछ में मिली जानकारी के आधार पर की गई थी. वन विभाग अभी बाघ एसटी-11 की मौत के मामले की जांच कर रहा है.

फरवरी के चौथे सप्ताह से लापताबाघिन एसटी-5 के शिकार की भी आशंका जताई जा रही है. बाघिन का कोई सुराग नहीं मिलने पर एनटीसीए ने प्रोटोकोल के अनुसार सरिस्का प्रशासन को आदेश दिए हैं कि इस बाघिन के जीवित या मरने की पुष्टि की जाए.

दरअसल, बाघ कहीं भी सुरक्षित नहीं हैं. चाहे राजस्थान का रणथंभौर हो या सरिस्का अभयारण्य हो अथवा देश का कोई अन्य अभयारण्य. सभी अभयारण्यों की अपनी समस्या है.

असुरक्षित हैं शरणस्थली

राजस्थान में बाघों की शरणस्थली के रूप में मुख्यरूप से 2 अभयारण्य हैं, रणथंभौर और सरिस्का. इन दोनों बाघ परियोजनाओं को स्थापित हुए करीब 4 दशक बीत चुके हैं. सरिस्का सन 2000 तक कार्बेट नेशनल पार्क के बाद बाघों का सब से सुरक्षित अभयारण्य माना जाता था.

इस के बावजूद वन विभाग के अफसरों की लापरवाही से सक्रिय हुए शिकारियों ने सरिस्का अभयारण्य से बाघों का सफाया कर दिया. सन 2005 में सरिस्का के बाघ विहीन होने की बात सामने आई. तत्कालीन प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह के निर्देश पर इस मामले की सीबीआई ने भी जांच की थी.

जिला अलवर और जयपुर जिले के कुछ हिस्से तक करीब 1200 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले सरिस्का टाइगर रिजर्व को तत्कालीन मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक और बाद में राजस्थान के हैड औफ फोरेस्ट फोर्स बने आर.एन. मेहरोत्रा के प्रयासों से फिर बाघों से आबाद करने की कार्ययोजना बनाई गई.

मेहरोत्रा ने इस काम में वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट औफ इंडिया का सहयोग लिया. डब्ल्यूआईआई और मेहरोत्रा के प्रयासों से 28 जून, 2008 को भारत में बाघ का पहला ट्रांसलोकेशन किया गया.

इस में रणथंभौर अभयारण्य से बाघ को ट्रैंकुलाइज कर भारतीय वायुसेना के हेलीकौप्टर से सरिस्का अभयारण्य ला कर छोड़ा गया था. इस के बाद समयसमय पर रणथंभौर से 2 नर और 2 मादा बाघों को ला कर सरिस्का में छोड़ा गया.

इस तरह सरिस्का अभयारण्य में बाघों का पुनर्वास कर वंशवृद्धि की कवायद शुरू की गई. हालांकि भारतीय वन सेवा के वरिष्ठ अधिकारी रहे आर.एन. मेहरोत्रा के प्रयास फलीभूत होने लग गए थे, लेकिन सब से पहले लाए गए नर बाघ की नवंबर 2010 में पायजनिंग से मौत हो गई. अब बाघ एसटी-11 की संदिग्ध तरीके से मौत हो गई.

बाघिन एसटी-5 फरवरी के तीसरे सप्ताह से लापता चल रही थी. फिलहाल सरिस्का में 11 बाघबाघिन हैं. इन में भी 2 किशोर उम्र के शावक हैं. इन के अलावा 7 शावक हैं. सरिस्का अभयारण्य का क्षेत्रफल काफी लंबाचौड़ा होने से यहां बाघ के दर्शन बड़ी मुश्किल से हो पाते हैं.

राजकुमार के नाम से जाने जाने वाले सरिस्का के बाघ एसटी-11 की मौत के बाद बाघों की वंशवृद्धि पर असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है.

सरिस्का में फिलहाल बाघिनों के मुकाबले बाघों की संख्या कम है. नर बाघों में जवान बाघ 2 ही हैं. अब इन्हीं पर सरिस्का में बाघों की वंशवृद्धि की उम्मीद टिकी हुई है. सरिस्का में पिछले ढाई साल से नया शावक नजर नहीं आया है.

सरिस्का में बाघों का कुनबा लगातार बढ़ रहा है. बाघबाघिनों की नई खेप अब अपने लिए नए ठिकाने तलाश रही है. इस के लिए वे आसपास के जंगलों में चले जाते हैं.

दूसरी ओर रणथंभौर से निकल कर जवान होते बाघ अपनी विचरणस्थली करौली और दौसा जिले में भी बना रहे हैं. कुछ बाघबाघिन सवाई माधोपुर जिले की सीमाएं पार कर बूंदी और कोटा होते हुए जंगल के कारीडोर से हो कर पड़ोसी राज्य मध्य प्रदेश तक पहुंच गए हैं. रणथंभौर से 2-2 बाघबाघिनों को अब सरिस्का और नए बनाए गए मुकंदरा अभयारण्य में स्थानांतरित करने के प्रयास भी चल रहे हैं.

संरक्षण के प्रयासों के बावजूद खतरा ही खतरा

राज्य के हैड औफ फोरेस्ट फोर्स से सेवानिवृत्त अधिकारी आर.एन. मेहरोत्रा का कहना है कि रणथंभौर में बाघ की मौत मैनेजमेंट की काररवाई की वजह से हुई. रणथंभौर में 5 साल में सब से ज्यादा व्यवहारिक गतिविधियां बढ़ी हैं. वहां कानून व्यवस्था बिगाड़ने का काम हुआ है. वन कानूनों की खुली धज्जियां उड़ाई जा रही हैं.

दूसरी तरफ सरिस्का में विभागीय अधिकारी वन्यजीवों के संरक्षण में जुटे हैं, लेकिन किसान अपनी फसलों को वन्यजीवों से बचाने के लिए कानून के विपरीत फंदे लगा कर जानवरों को फांसने का काम कर रहे हैं. इसे कठोरता से रोकना जरूरी है. सरिस्का में भी अवैध कब्जे बढ़ाने की कोशिशें हो रही हैं, इन्हें सख्ती से नहीं रोका गया तो भविष्य में रणथंभौर जैसी स्थिति हो सकती है.

वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट औफ इंडिया के मुताबिक सन 2004 में हुई गणना में देश भर में 1411 बाघ थे. सरकार के प्रयासों से सन 2011 में बाघों की तादाद बढ़ कर 1706 हो गई. सन 2014 में फोटोग्राफिक डाटा बेस के आधार पर देश भर में 2226 बाघ गिने गए. यह संख्या दुनिया भर के बाघों की संख्या का करीब 70 फीसदी थी. दुनिया भर में बाघों की फिलहाल कुल संख्या लगभग 3890 है.

सन 2017 देश में बाघों के लिए संकट का साल रहा. इस दौरान देश भर में 115 बाघों की मौत हई. नैशनल टाइगर कंजरवेशन अथौरिटी की रिपोर्ट के मुताबिक पिछले साल देश में 98 बाघों के शव और 17 बाघों के अवशेष बरामद किए गए. इन में से 32 मादा और 28 नर बाघों की पहचान हो सकी.

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बाकी मृत बाघों की पहचान नहीं हो सकी. बाघों की मौत के मामले में मध्य प्रदेश का नाम पहले नंबर पर आता है. वहां 29 बाघों की मौत हुई.

इस के अलावा महाराष्ट्र में 21, कर्नाटक में 16, उत्तराखंड में 16 और असम में 16 बाघों की मौत दर्ज की गई. बाघों की मौत के पीछे करंट लगना, शिकार, जहर, आपसी संघर्ष, प्राकृतिक मौत, ट्रेन या सड़क हादसों को कारण बताया गया. पिछले 5 सालों में 414 बाघों की मौत के मामले सामने आए हैं. इन में सन 2013 में 63, सन 2014 में 66, सन 2015 में 70, सन 2016 में 100 और 2017 में 115 मामले शामिल हैं.

बाघों के संरक्षण के लिए सरकार ने सन 1973 में प्रोजेक्ट टाइगर शुरू किया था. तब से ले कर अब तक देश में 50 टाइगर रिजर्व बनाए गए हैं, जो देश के कुल भौगोलिक क्षेत्र का 2.12 प्रतिशत है. सन 2014 के बाद इस साल फिर देश भर में बाघों की गणना की जाएगी.

इस बार गणना में परंपरागत तरीकों के अलावा हाईटेक तरीके का भी इस्तेमाल किया जाएगा. इस के लिए वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट औफ इंडिया ने एक ऐप डेवलप किया है. इसे मौनिटरिंग सिस्टम फौर टाइगर इंटेंसिव प्रोटेक्शन ऐंड इकोलौजिकल स्टेटस या एम स्ट्राइप्स नाम दिया गया है.

बहरहाल, जंगलों में बढ़ते मानवीय दखल, कटाई, चराई, स्वच्छंद विचरण का दायरा घटने से बाघों पर संकट मंडरा रहा है. इन के अलावा सब से बड़ा संकट शिकारियों का है. बेशकीमती खाल और अवशेषों से यौन उत्तेजक दवाएं बनाने वालों की निगाहें हमेशा बाघों पर टिकी रहती हैं. इसी कारण बाघ बेमौत मारे जा रहे हैं.

रागिनी को मार कर प्रिंस को क्या मिला

खुशमिजाज रागिनी दुबे सुबह तैयार हो कर अपनी छोटी बहन सिया के साथ घर से पैदल ही स्कूल के लिए निकली थी. वह बलिया जिले के बांसडीह की रहने वाली थी. दोनों बहनें सलेमपुर के भारतीय संस्कार स्कूल में अलगअलग कक्षा में पढ़ती थीं. रागिनी 12वीं कक्षा में थी तो सिया 11वीं में.

उस दिन रागिनी महीनों बाद स्कूल जा रही थी. स्कूल जा कर उसे अपने बोर्ड परीक्षा फार्म के बारे में पता करना था कि परीक्षा फार्म कब भरा जाएगा. वह कुछ दिनों से स्कूल नहीं जा पाई थी, इसलिए परीक्षा फार्म के बारे में उसे सही जानकारी नहीं थी.

दोनों बहनें पड़ोस के गांव बजहां के काली मंदिर के रास्ते हो कर स्कूल जाती थीं. उस दिन भी वे बातें करते हुए जा रही थीं, जब दोनों काली मंदिर के पास पहुंची तभी अचानक उन के सामने 2 बाइकें आ कर रुक गईं. दोनों बाइकों पर 4 लड़के सवार थे. अचानक सामने बाइक देख रागिनी और सिया सकपका गईं, वे बाइक से टकरातेटकराते बचीं.

‘‘ये क्या बदतमीजी है, तुम ने हमारा रास्ता क्यों रोका?’’ रागिनी लड़कों पर गुर्राई.

‘‘एक बार नहीं, हजार बार रोकूंगा.’’ उन चारों में से एक लड़का बाइक से नीचे उतरते हुए बोला. उस का नाम प्रिंस उर्फ आदित्य तिवारी था. प्रिंस आगे बोला, ‘‘जाओ, तुम्हें जो करना हो कर लेना. तुम्हारी गीदड़भभकी से मैं डरने वाला नहीं, समझी.’’

‘‘देखो, मैं शराफत से कह रही हूं, हमारा रास्ता छोड़ो और स्कूल जाने दो.’’ रागिनी बोली.

‘‘अगर रास्ता नहीं छोड़ा तो तुम क्या करोगी?’’ प्रिंस ने अकड़ते हुए कहा.

‘‘दीदी, छोड़ो इन लड़कों को. मां ने क्या कहा था कि इन के मुंह मत लगना. इन के मुंह लगोगी तो कीचड़ के छींटे हम पर ही पड़ेंगे. चलो हम ही अपना रास्ता बदल देते हैं.’’ सिया ने रागिनी को समझाया.

‘‘नहीं सिया नहीं, हम बहुत सह चुके इन के जुल्म. अब और बरदाश्त नहीं करेंगे. इन दुष्टों ने हमारा जीना हराम कर रखा है. इन से जितना डरोगी, उतना ही ये हमारे सिर पर चढ़ कर तांडव करेंगे. इन्हें इन की औकात दिखानी ही पड़ेगी.’’

‘‘ओ झांसी की रानी,’’ प्रिंस गुर्राया,  ‘‘किसे औकात दिखाएगी तू, मुझे. तुझे पता भी है कि तू किस से पंगा ले रही है. प्रधान कृपाशंकर तिवारी का बेटा हूं, मिनट में छठी का दूध याद दिला दूंगा. तेरी औकात ही क्या है. मैं ने तुझे स्कूल जाने से मना किया था ना, पर तू नहीं मानी.’’

‘‘हां, तो.’’ रागिनी डरने के बजाए प्रिंस के सामने तन कर खड़ी हो गई. ‘‘तुम मुझे स्कूल जाने से रोकोगे, ऐसा करने वाले तुम होते कौन हो?’’

‘‘दीदी, क्यों बेकार की बहस किए जा रही हो,’’ सिया बोली, ‘‘चलो यहां से.’’

‘‘नहीं सिया, तुम चुप रहो.’’ रागिनी सिया पर चिल्लाई, ‘‘कहीं नहीं जाऊंगी यहां से. रोजरोज मर के जीने से तो अच्छा होगा कि एक ही दिन मर जाएं. कम से कम जिल्लत की जिंदगी तो नहीं जिएंगे. इन दुष्टों को इन के किए की सजा मिलनी ही चाहिए.’’ रागिनी सिया पर चिल्लाई.

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‘‘तूने किसे दुष्ट कहा?’’ प्रिंस गुस्से से बोला.

‘‘तुझे और किसे…’’ रागिनी भी आंखें दिखाते हुए बोली.

आतंक पहुंचा हत्या तक

इस तरह दोनों के बीच विवाद बढ़ता गया. विवाद बढ़ता देख कर प्रिंस के सभी दोस्त अपनी बाइक से नीचे उतर कर उस के पास जा खड़े हुए. सिया रागिनी को समझाने लगी कि लड़कों से पंगा मत लो, यहां से चलो. लेकिन उस ने बहन की एक नहीं सुनी. गुस्से से लाल हुए प्रिंस ने आव देखा न ताव उस ने रागिनी को जोरदार धक्का मारा.

रागिनी लड़खड़ाती हुई जमीन पर जा गिरी. अभी वह संभलने की कोशिश कर ही रही थी कि वह उस पर टूट पड़ा. पहले से कमर में खोंस कर रखे चाकू से उस ने रागिनी के गले पर ताबड़तोड़ वार करने शुरू कर दिए. कुछ देर तड़पने के बाद रागिनी की मौत हो गई. उस की हत्या कर वे चारों वहां से फरार हो गए.

घटना इतने अप्रत्याशित तरीके से घटी थी कि न तो रागिनी ही कुछ समझ पाई थी और न ही सिया. आंखों के सामने बहन की हत्या होते देख सिया के मुंह से दर्दनाक चीख निकल पड़ी. उस की चीख इतनी तेज थी कि गांव वाले अपनेअपने घरों से बाहर निकल आए और जहां से चीखने की आवाज आ रही थी, वहां पहुंच गए. उन्होंने मौके पर पहुंच कर देखा तो रागिनी खून से सनी जमीन पर पड़ी थी. वहीं उस की बहन उस के पास बैठी दहाड़ें मार कर रो रही थी.

दिनदहाड़े हुई दिन दहला देने वाली इस घटना से सभी सन्न रह गए. लोग आपस में चर्चा कर रहे थे कि समाज में कानून नाम की कोई चीज नहीं रह गई है. बदमाशों के हौसले इतने बुलंद हो गए हैं कि राह चलती बहूबेटियों का जीना तक मुश्किल हो गया है. इस बीच किसी ने फोन द्वारा घटना की सूचना बांसडीह रोड थानाप्रभारी बृजेश शुक्ल को दे दी थी.

गांव वाले रागिनी को पहचानते थे. वह पास के गांव बांसडीह के रहने वाले जितेंद्र दुबे की बेटी थी, इसलिए उन्होंने जितेंद्र दुबे को भी सूचना दे दी. बेटी की हत्या की सूचना मिलते ही घर में कोहराम मच गया, रोनापीटना शुरू हो गया. उन्हें जिस अनहोनी की चिंता सता रही थी आखिरकार वो हो गई.

जितेंद्र दुबे जिस हालत में थे, उसी हालत में घटनास्थल की तरफ दौडे़. वह बजहां गांव के काली मंदिर के पास पहुंचे तो वहां उन की बेटी की लाश पड़ी थी.

लाश के पास ही छोटी बेटी सिया दहाड़े मार कर रो रही थी. बेटी की रक्तरंजित लाश देख कर जितेंद्र भी फफकफफक कर रोने लगे. उन्हें 2-3 दिन पहले ही कुछ शरारती तत्व घर पर धमकी दे कर गए थे कि रागिनी स्कूल गई तो वह दिन उस की जिंदगी का आखिरी दिन होगा. आखिरकार वे अपने मंसूबों में कामयाब हो गए.

सूचना पा कर एसआई बृजेश शुक्ल फोर्स के साथ मौके पे पहुंच चुके थे. उन्होंने शव का मुआयना किया. मृतका के गले पर अनेक घाव थे. चूंकि पूरी वारदात मृतका की छोटी बहन सिया के सामने घटित हुई थी, इसलिए उस ने एसआई बृजेश शुक्ल को सारी बातें बता दीं. उस ने बताया कि बजहां गांव के रहने वाले ग्राम प्रधान कृपाशंकर तिवारी का बेटा प्रिंस उर्फ आदित्य तिवारी, प्रधान का ही भतीजा सोनू तिवारी, नीरज तिवारी और दीपू यादव ने दीदी की हत्या की है.

मौके की काररवाई निपटाने के बाद पुलिस ने लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी. पुलिस ने जितेंद्र दुबे की तहरीर पर ग्रामप्रधान कृपाशंकर तिवारी, उस के बेटे आदित्य उर्फ प्रिंस, सोनू तिवारी, नीरज तिवारी और दीपू यादव के खिलाफ हत्या और छेड़छाड़ की धाराओं में मुकदमा दर्ज कर लिया.

पुलिस ने मामले की जांच की तो पता चला कि ग्रामप्रधान कृपाशंकर का बेटा प्रिंस सालों से रागिनी को तंग किया करता था. वह रागिनी से एकतरफा प्यार करता था. कई बार वह रागिनी से अपने प्यार का इजहार कर चुका था लेकिन रागिनी न तो उस से प्यार करती थी और न ही उस ने उस के प्रेम पर अपनी स्वीकृति की मोहर ही लगाई थी.

पहले तो रागिनी उस की हरकतों को नजरअंदाज करती रही. लेकिन जब पानी सिर के ऊपर जाने लगा तो उस ने अपने घर वालों को प्रिंस की हरकतों के बारे में बता दिया.

बेटी की परेशान जान कर जितेंद्र को दुख भी हुआ और गुस्सा भी आया. बात बेटी के मानसम्मान से जुड़ी हुई थी, भला वह इसे कैसे सहन कर सकते थे. वह उसी समय शिकायत ले कर ग्राम प्रधान कृपाशंकर तिवारी के घर जा पहुंचे. संयोग से कृपाशंकर घर पर ही मिल गए. जितेंद्र ने उन के बेटे की हरकतों का पिटारा उन के सामने खोल दिया. लेकिन कृपाशंकर ने उन की शिकायत पर कोई ध्यान नहीं दिया. प्रधानी के घमंड में चूर कृपाशंकर तिवारी ने जितेंद्र को डांटडपट कर भगा दिया.

जितेंद्र दुबे ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि प्रधान से उस के बेटे की शिकायत करनी उन्हें भारी पड़ जाएगी. अगर उन्हें इस बात का खयाल होता तो वह शिकायत कभी नहीं करते.

बाप ने दी बेटे को शह

शिकायत का परिणाम उल्टा यह हुआ कि शाम के समय जब प्रिंस कहीं से घूम कर घर लौटा तो कृपाशंकर ने उस से पूछा, ‘‘बांसडीह के पंडित जितेंद्र तुम्हारी शिकायत ले कर यहां आए थे. वे कह रहे थे कि उन की बेटी को आतेजाते तंग करते हो, क्या बात है?’’

इस पर प्रिंस ने सफाई देते हुए कहा, ‘‘पापा, यह सब गलत है, झूठ है. मैं ने उस की बेटी के साथ कभी बदसलूकी नहीं की. मैं तो उस की बेटी को जानता तक नहीं, छेड़ने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता. मुझे बदनाम करने के लिए पंडितजी झूठ बोल रहे होंगे.’’

‘‘ठीक है, मैं जानता हूं बेटा. मुझे तुझ पर पूरा भरोसा है कि तू ऐसावैसा कोई काम नहीं करेगा. वैसे मैं ने पंडितजी को डांट कर भगा दिया है.’’

‘‘ठीक किया पापा,’’ प्रिंस के होंठों पर जहरीली मुसकान उभर आई.

प्रिंस ने उस समय तो पिता की आंखों में धूल झोंक कर खुद को बचा लिया. पुत्रमोह में अंधे कृपाशंकर को भी बेटे की करतूत दिखाई नहीं दी. नतीजा यह हुआ कि प्रिंस की आंखों में दुबे की बेटी रागिनी के लिए नफरत और गुस्से का लावा फूट पड़ा. उसे लगा कि पंडित की हिम्मत कैसे हुई कि उस के घर शिकायत करने आ गया. प्रिंस ने उन्हें सबक सिखाने की ठान ली. आखिर उस ने वही किया, जो उस ने मन में ठान लिया था.

दिनदहाड़े रागिनी की हत्या के बाद आसपास के इलाके में दहशत फैल गई थी. मामला बेहद गंभीर था, इसलिए एसपी सुजाता सिंह ने अपराधियों को गिरफ्तार करने के सख्त आदेश दिए. कप्तान का आदेश पाते ही एसआई बृजेश शुक्ल अपनी पुलिस टीम के साथ आरोपियों को तलाशने में जुट गए.

8 अगस्त, 2017 को पुलिस ने जिले से बाहर जाने वाले सभी रास्तों को सील कर दिया. पुलिस को इस का लाभ भी मिला. बलिया से हो कर गोरखपुर जाने वाली रोड पर 2 आरोपी प्रिंस उर्फ आदित्य तिवारी और दीपू यादव उस समय पुलिस के हत्थे चढ़ गए जब वह जिला छोड़ कर गोरखपुर जा रहे थे.

दोनों को गिरफ्तार कर के पुलिस उन्हें थाना बांसडीह रोड ले आई. दोनों आरोपियों से रागिनी दुबे की हत्या के बारे में गहनता से पूछताछ की गई. पहले तो प्रिंस ने पुलिस को अपने पिता की ताकत की धौंस दिखाई लेकिन कानून के सामने उस की अकड़ ढीली पड़ गई. आखिर दोनों ने पुलिस के सामने घुटने टेकने में ही भलाई समझी. उन्होंने अपना जुर्म कबूल कर लिया. बाकी के 3 आरोपी मौके से फरार हो गए थे.

दोनों आरोपियों से की गई पूछताछ और बयानों के आधार पर दिल दहला देने वाली जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार थी.

55 वर्षीय जितेंद्र दुबे मूलत: बलिया जिले के बांसडीह में 6 सदस्यों के परिवार के साथ रहते थे. उन के परिवार में पत्नी के अलावा 3 बेटियां और 1 बेटा अमन था. निजी व्यवसाय से वह अपने परिवार का भरण पोषण करते थे. उन का परिवार संस्कारी था.

बेटियों पर गर्व था दुबेजी को

उन की तीनों बेटियां गांव में मिसाल के तौर पर गिनी जाती थीं, क्योंकि तीनों ही अपने काम से काम रखती थीं. वे न तो अनर्गल किसी दूसरे के घर उठतीबैठती थीं और न ही फालतू की गप्पें लड़ाती थीं. वे पढ़ाई के साथ घर के काम में भी हाथ बंटाती थीं. दुबेजी बेटियों को बेटे से कम नहीं आंकते थे. तभी तो उन की पढ़ाई पर पानी की तरह पैसा बहाते थे. बेटियां भी पिता के विश्वास पर हमेशा खरा उतरने की कोशिश करती थीं.

तीनों बेटियों में नेहा बीए में पढ़ती थी, रागिनी 11वीं पास कर के 12वीं में गई थी जबकि सिया 11वीं में थी. स्वभाव में रागिनी नेहा और सिया दोनों से बिलकुल अलग थी. रागिनी पढ़ाईलिखाई से ले कर घर के कामकाज तक सब में अव्वल रहती थीं. वह शरमीली और भावुक किस्म की लड़की थी. जरा सी डांट पर उस की आंखों से आंसुओं की धारा बह निकलती थी.

बात 2015 के करीब की है. रागिनी और सिया दोनों सलेमपुर के भारतीय संस्कार स्कूल में अलगअलग कक्षा में पढ़ती थीं. उस समय रागिनी 10वीं में थी और सिया 9वीं में. दोनों बहनें घर से रोजाना बजहां गांव हो कर पैदल ही स्कूल के लिए जातीआती थीं. बजहां गांव के ग्राम प्रधान कृपाशंकर तिवारी का बेटा प्रिंस उर्फ आदित्य उन्हें स्कूल आतेजाते बड़े गौर से देखा करता था.

प्रिंस पहली ही नजर में रागिनी पर फिदा हो गया था. थी तो रागिनी साधारण शक्लसूरत की, मगर उस में गजब का आकर्षण था. रागिनी और सिया जब भी स्कूल जाया करती, वह उन के इंतजार में गांव के बाहर 2-3 दोस्तों के साथ खड़ा रहता था.

वह उन्हें तब तक निहारता रहता था जब तक रागिनी और सिया उस की आंखों से ओझल नहीं हो जाती थीं. जबकि दोनों बहनें उस की बातों को नजरअंदाज कर के बिना कोई प्रतिक्रिया किए स्कूल के लिए निकल जाती थीं.

ऐसा नहीं था कि दोनों बहनें उन के इरादों से अंजान थीं, वे उन के मकसद को भलीभांति जान गई थीं. रागिनी प्रिंस से जितनी दूर भागती थी, प्रिंस उतना ही उस की मोहब्बत में पागल हुआ जा रहा था.

17 वर्षीय आदित्य उर्फ प्रिंस उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के बजहां गांव का रहने वाला था. उस का पिता कृपाशंकर तिवारी गांव का प्रधान था. प्रधान तिवारी की इलाके में तूती बोलती थी. उस से टकराने की कोई हिमाकत नहीं करता था. जो उस से टकराने की जुर्रत करता भी था, वह उसे अपनी पौवर का अहसास करा देता था. उस की सत्ता के गलियारों में अच्छी पहुंच थी. ऊंची पहुंच ने प्रधान तिवारी को घमंडी बना दिया था.

ग्रामप्रधान कृपाशंकर तिवारी का बेटा प्रिंस भी उसी के नक्शेकदम पर चल रहा था. पिता की ही तरह प्रिंस भी अभिमानी स्वभाव का था. जिसे चाहे वह उस से उलझ जाता था और मारपीट पर आमादा हो जाता था. वह जब भी चलता था उस के साथ 5-7 लड़कों की टोली चलती थी.

उस की टोली में नीरज तिवारी, सोनू तिवारी और दीपू यादव खासमखास थे. ये तीनों प्रिंस के लिए किसी भी हद तक जाने को हमेशा तैयार रहते  थे. इसीलिए वह इन पर पानी की तरह पैसा बहाता था.

घातक बनी एकतरफा मोहब्बत

प्रिंस रागिनी से एकतरफा मोहब्बत करता था. उसे पाने के लिए वह किसी भी हद तक जाने के लिए तैयार था जबकि रागिनी उस से प्यार करना तो दूर उस से बात तक करना उचित नहीं समझती थी.

रागिनी के प्यार में प्रिंस इस कदर पागल था कि उस ने खुद को कमरे में कैद कर लिया था. न तो यारदोस्तों से पहले की तरह ज्यादा मिलता था और न ही उन से बातें करता था. प्रिंस की हालत देख कर उस के दोस्त नीरज और दीपू परेशान रहने लगे थे. यार की जिंदगी की सलामती के खातिर तीनों दोस्तों ने फैसला किया कि चाहे कुछ भी क्यों न हो जाए, वह उस का प्यार यार के कदमों में ला कर डालेंगे.

नीरज, सोनू और दीपू तीनों ने मिल कर एक दिन रागिनी और सिया को स्कूल जाते समय रास्ते में रोक लिया. तीनों के अचानक से रास्ता रोकने से दोनों बहनें बुरी तरह से डर गईं, ‘‘ये क्या बदतमीजी है? तुम ने हमारा रास्ता क्यों रोका? हटो हमें स्कूल जाने दो.’’ रागिनी हिम्मत जुटा कर बोली.

‘‘हम तुम्हारे रास्ते से भी हट जाएंगे और तुम्हें स्कूल भी जाने देंगे, बस तुम्हें हमारी कुछ बातें माननी होंगी.’’ नीरज बोला.

‘‘न तो मैं तुम्हारी कोई बात मानूंगी और न ही सुनूंगी. बस तुम हमारा रास्ता छोड़ दो. हमें स्कूल के लिए देर हो रही है.’’ रागिनी नाराजगी भरे लहजे में बोली.

‘‘देखो रागिनी, ये किसी की जिंदगी और मौत की सवाल है. मेरी बात सुन लो, फिर चली जाना.’’ नीरज ने कहा.

‘‘मैं ने कहा न, मैं तुम्हारी कोई बात नहीं सुनने वाली. क्या मुझे ऐसीवैसी लड़की समझ रखा है. जो राह चलते आवारा किस्म के लड़के के मुंह लगे.’’ रागिनी बोली.

‘‘देखो रागिनी, तुम्हारा गुस्सा अपनी जगह जायज है. मैं जानता हूं कि तुम ऐसीवैसी लड़की नहीं, खानदानी लड़की हो. लेकिन तुम ने मेरी बात नहीं सुनी तो मेरा भाई जो तुम से प्यार करता है, मर जाएगा. तुम उसे बचा लो.’’ नीरज रागिनी के सामेन गिड़गिड़ाया.

‘‘तुम्हारा भाई मरता है तो मेरी बला से. मैं उसे प्यार नहीं करती. एक बात कान खोल कर सुन लो कि आज के बाद इस तरह की वाहियात बात फिर मेरे सामने मत दोहराना, वरना इन का परिणाम बहुत बुरा होगा, समझे.’’ नीरज को खरीखोटी सुनाती हुई रागिनी और सिया चली गईं.

रागिनी की बातें नीरज के दिल को लग गई थी. उसे कतई उम्मीद नहीं थी कि रागिनी उसे ऐसा जवाब दे सकती है. रागिनी की बातों से उसे काफी गहरा आघात पहुंचा था. चूंकि मामला उस के भाई के प्यार से जुड़ा हुआ था इसलिए उस ने रागिनी के अपमान को अमृत समझ कर पी लिया था. उस समय तो नीरज और उस के दोस्तों ने उसे कोई जवाब नहीं दिया, लेकिन नीरज ये बात अपने तक सीमित नहीं रख सका.

उस ने घर जा कर यह बात प्रिंस से बता दी. भाई की बात सुन कर प्रिंस गुस्से से उबल पड़ा कि रागिनी की ऐसी मजाल जो उस ने उस के प्यार को ठुकरा दिया. अगर वो मेरे प्यार को ठुकरा सकती है तो मैं भी उसे जीने नहीं दूंगा. अगर वो मेरी नहीं हो सकती तो मैं किसी और की भी नहीं होने दूंगा.

society

प्रिंस के गुस्से को नीरज और उस के दोस्तों ने और हवा दे दी थी. रागिनी के प्यार में मर मिटने वाला जुनूनी आशिक प्रिंस ठुकराए जाने के बाद एकदम फिल्मी खलनायक बन गया था.

उस दिन के बाद से रागिनी जब भी कहीं आतीजाती दिखती थी, प्रिंस चारों दोस्तों के साथ मिल कर अश्लील शब्दों की फब्तियां कस कर उसे जलील करता, उसे छेड़ता रहता था. और तो और वह दोस्तों को ले कर उस के घर तक धमकाने के लिए पहुंच जाता था.

लिख दिया मौत का परवाना

प्रिंस के इस रवैये से उस के घर वाले परेशान हो गए थे. डर के मारे रागिनी ने घर से बाहर निकलना छोड़ दिया था. उस ने स्कूल जाना भी  बंद कर दिया था. प्रिंस का खौफ रागिनी के दिल में बैठ गया था. जब बात हद से आगे बढ़ गई तो रागिनी ने पिता जितेंद्र दुबे ने बांसडीह रोड थाने में प्रिंस और उस के दोस्तों के खिलाफ लिखित शिकायत की.

लेकिन प्रधान कृपाशंकर की राजनैतिक पहुंच की वजह से मामला वहीं रफादफा हो गया था. इस के बाद प्रिंस और भी उग्र हो गया. वह सोचता था कि जितेंद्र दुबे ने उस के खिलाफ थाने में शिकायत करने की जुर्रत कैसे की.

बात अप्रैल, 2017 की है. प्रिंस अपने तीनों दोस्तों नीरज, सोनू और दीपू यादव को ले कर जितेंद्र दुबे के घर गया और उन्हें धमकाया कि आज के बाद तुम्हारी बेटी रागिनी अगर स्कूल पढ़ने गई तो वो दिन उस की जिंदगी का आखिरी दिन होगा.

इस की धमकी के बाद रागिनी के घर वाले डर गए. उन्होंने उसे स्कूल भेजना बंद कर दिया. वह कई महीनों तक स्कूल नहीं गई.

इस वर्ष उस का इंटरमीडिएट था. स्कूल में परीक्षा फार्म भरे जा रहे थे. परीक्षा फार्म भरने के लिए वह 8 अगस्त, 2017 को छोटी बहन सिया के साथ स्कूल जा रही थी. पता नहीं कैसे प्रिंस को रागिनी के आने की खबर मिल गई और उस ने उस का गला रेत कर हत्या कर दी.

बहरहाल, पुलिस ने रागिनी हत्याकांड के नामजद 5 आरोपियों में से 2 आरोपियों प्रिंस और दीपू यादव को तो गिरफ्तार कर लिया. बाकी के 3 आरोपी प्रधान कृपाशंकर, नीरज तिवारी और सोनू फरार होने में कामयाब हो गए. आरोपियों को गिरफ्तार करने को ले कर मृतका की बड़ी बहन नेहा तिवारी सैकड़ों छात्रछात्राओं के साथ कलेक्ट्रेट परिसर पहुंची और धरने पर बैठ गई.

उन लोगों ने परिवार के सदस्यों को मिल रही धमकी के लिए पुलिस प्रशासन को जिम्मेदार ठहराया. कांग्रेस के नेता सागर सिंह राहुल ने भी लापरवाही बरतने के लिए पुलिस प्रशासन को कोसा. तब कहीं जा कर बाकी के आरोपियों प्रधान कृपाशंकर तिवारी, सोनू तिवारी और नीरज तिवारी ने कोर्ट में आत्मसमर्पण किया.

कथा लिखे जाने तक पांचों में से किसी भी आरोपी की जमानत नहीं हुई थी. होनहार बेटी की मौत से पिता जितेंद्र दुबे काफी दुखी हैं. उन्होंने शासनप्रशासन से गुहार लगाई है कि बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ का नारा देने वाली सरकारें यदि बेटियों की सुरक्षा नहीं कर सकतीं तो उन्हें पैदा होने से पहले ही कोख में मार देने की इजाजत दे दें, ताकि बेटियों को ऐसी जिल्लत और जलालत की मौत रोजरोज न मरना पड़े.        ?

  – कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

स्त्रीधन पति का नहीं तो सरकार का कैसे

सरकार को गहनों से लदीफंदी औरतों से बहुत चिढ़ है. वर्षों से आयकर विभाग की निगाहें औरतों के गहनों पर ही रही हैं और जब भी किसी अमीर के घर पर आयकर विभाग छापा मारता है, तो अफसरों की निगाहें औरतों के गहनों पर ही रहती हैं और उन्हें ही जब्त कर के मालखाने ले जाया जाता है. पतिदेव के तो कागज ही होते हैं जो जाते हैं. अब नीरव मोदी से जिन्होंने पिछले सालों में गहने खरीदे थे, उन से पूछताछ हो रही है भले, चैक दे कर भुगतान करा था या नक्द. यह सरासर ज्यादती है. पत्नी को इस से कोई सरोकार नहीं कि उसे जो गहने मिले वे पति के सफेद पैसे से खरीदे गए थे या काले पैसे से. उसे तो जेवरों से मतलब है. उस के जेवर सुरक्षित रहने चाहिए और हरगिज मालखाने की शोभा नहीं बढ़ानी चाहिए.

आजकल आयकर विभाग पहले के राजाओं के कारिंदों की तरह औरतों के गहने जब्त कर ले जाता है. यदि उन की रसीद भी दिखा दी जाए कि ये निहायत सफेद पैसे से खरीदे गए थे तो भी उन्हें यह कह कर ले जाते हैं कि ये वही गहने नहीं हैं जो ज्वैलर से मिली रसीद में लिखे हैं. अगर मां या सास ने पुश्तैनी जेवर दिए थे तो वे तो आयकर विभाग के अनुसार काले स्याह ही हैं. वह मांग करने लगेगा कि डिक्लेयर क्यों नहीं किए? अरे भई, डिक्लेयर तो कितनी ही शादियों में किए थे. अब मैली सरकारी फाइलों के लिए क्या जरूरी है कि संपत्ति कर की रिटर्न में दर्ज किए जाएं? जेवर वैसे भी संपत्ति नहीं हैं. ये तो सजावटी होते हैं, दिखाने के लिए. इन की महत्ता तो रोब डालने की होती है पर सत्यानाश हो सरकार का कि वह इन्हें पाप समझती है.

पति पर करोड़ों का आयकर का फाइन हो जाए पत्नियों को फर्क नहीं पड़ता पर 2 साधारण जड़ाऊ नैकलेस 7-8 माह के लिए आयकर विभाग के पास चले जाएं तो ऐसा लगता है जैसे पति और बच्चों से तलाक हो गया है. अब जब नीरव मोदी के जेवर खरीदे गए थे तो शान ही कुछ और थी. एक तो जेवर महंगे और दूसरा नीरव मोदी वाली मुहर, सोने में सुहागा. पर इस पर बुरा हो सरकार का, जिस की काली छाया पड़ रही है.

औरतों को चाहिए कि संविधान में संशोधन कराएं कि स्त्रीधन जैसे पति नहीं ले सकता वैसे ही सरकार भी जेवर न ले सके. जेवर तो दूसरों का दिल जलाने के लिए होते हैं, सफाई देने के लिए नहीं.

देश संकट में है : आखिर ऐसा क्या हो गया

हमारे देश की जनता को लालकिले से प्रधानमंत्रीजी का भाषण हूबहू सुनाते हुए लोक संपर्क महकमे ने दुखी मन से सूचित किया कि मंत्रीजी की लोकप्रिय बकरी कई दिनों से गायब है. देश संकट की घड़ी से गुजर रहा है.

यह सुन कर देश के सरकारी तंत्र समेत कुछ भावुक किस्म के खाली दिमागों में हायतोबा मच गई.

बंधुओ, ऐसा नहीं है कि मंत्रीजी की बकरी ढूंढ़ने के लिए प्रशासन ने कोई कोशिश न की हो.

प्रशासन ने मंत्रीजी की बकरी ढूंढ़ने के लिए पूरी ईमानदारी से कोशिश की थी. अब प्रशासन के हाथ कुछ खास नहीं लगा, तो उस बेचारे का क्या कुसूर.

प्रशासन को तनख्वाह मिलती ही अपने देश के नेताओं के जानमाल की हिफाजत करने की है. जनता की हिफाजत करने के लिए तो ऊपर वाला बैठा है.

अब जब प्रशासन का सारा अमला मंत्रीजी की बकरी ढूंढ़ने में नाकाम हो गया, तो प्रशासन को न चाहते हुए भी जनता की मदद लेनी पड़ी.

ऐसे में देश के नमक के साथ राशन की दुकान के सड़े आटे की चपाती खाने वाली जनता का भी फर्ज बनता था कि वह खानापीना छोड़ कर मंत्रीजी की बकरी ढूंढ़े.

जब तक प्रशासन को मंत्रीजी की बकरी नहीं मिल जाती, तब तक वह मंत्रीजी के दुख में शरीक होते हुए अपने महल्ले में दुख सभाएं कराए.

प्रशासन द्वारा इस बारे में पटवारी को जिला प्रशासन तक अपनी रिपोर्ट पहुंचानी होगी और जिला प्रशासन यह रिपोर्ट मंत्रीजी के मंत्रालय को सूचित करेगा.

पटवारी इस बात की तसदीक करेगा कि किसकिस महल्ले में मंत्रीजी के दुख से दुखी हो कर दुख सभाएं की जा रही हैं और फिर मंत्रालय का काम यह रहेगा कि वह तमाम दुख सभाओं की रिपोर्ट बना कर नेताजी को तब तक भेजेगा, जब तक मंत्रीजी की बकरी मिल नहीं जाती.

जिला लैवल पर प्रशासन की दुख सभाओं की रिपोर्ट को खंगालने के बाद ही आगे के लिए यह तय किया जाएगा कि अगले महीने सरकार द्वारा जनता को खिलाया जाने वाला राशन किस महल्ले को भेजा जाए और किस महल्ले में नहीं.

ऐसी जनता को राशन खिलाना अपने लिए हार के दरवाजे खोलने के समान है, जो राशन तो मंत्रीजी का खाए और गुणगान दूसरों के गाए.

मीडिया की मानें, तो सरकार ने मंत्रीजी की बकरी को ढूंढ़ने के लिए खुफिया महकमे की भी मदद ली है. ऐसा भी नहीं है कि मंत्रीजी का आदेश पा कर खुफिया महकमे ने उन की बकरी को ढूंढ़ने में कोई लापरवाही बरती हो.

हमारे खुफिया तंत्र का काम ही सरकार के हर काम को मुस्तैदी से करना है. सरकार के हर आदेश को कोई और माने या न माने, पर वह पूरी ईमानदारी से मानता आया है. अब इसे मंत्रीजी का सौभाग्य मानें या बकरी का कि इतना सब होने के बाद भी खुफिया महकमे के हाथ अब तक निराशा ही लगी है.

रही बात पुलिस वालों की, वे तो बेचारे अपने थाने के अंदर गुम हुए माल को ढूंढ़ने तक में नाकाम रहते हैं, तो उन की बकरी क्या खाक ढूंढ़ पाएंगे.

अब उन बेचारों का भी क्या कुसूर. उन्हें अपने आम के बागों की रखवाली करने से कोई बाहर आने दे तो बेचारे कुछ और नया सीखें, वरना बंदूक उलटी ही पकड़ेंगे, इसलिए इस बार यह काम मंत्रीजी ने उन्हें नहीं दिया.

अपने मंत्रीजी ऐसेवैसे तो हैं नहीं. वे जनता के लिए शहर में सरकारी अस्पताल खुलवाते हैं और अस्पताल जनता को समर्पित कर छींक तक आने पर अपना इलाज कराने चुपचाप विदेश चले जाते हैं.

अब तक की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक हैरत की बात तो यह है कि इतनी छानबीन करने के बावजूद भी बकरी नहीं मिली, तो नहीं मिली.

अब बकरी के न मिलने पर मीडिया में ऐसे भी कयास लगाए जा रहे हैं कि बकरी को विपक्ष ने अगवा कर लिया है, ताकि इस बकरी के दम पर कुरसी को ले कर मंत्रीजी से परदे के पीछे कोई सौदा किया जा सके.

उधर एक खबरिया चैनल तो ब्रेकिंग न्यूज में यहां तक दावा कर रहा है कि मंत्रीजी की बकरी को आतंकवादियों ने अगवा कर लिया है और वे चाहते हैं कि बकरी को छोड़ने के बदले मंत्रीजी जेलों में बंद उन के दोस्तों को छोड़ें.

कहा तो यह भी जा रहा है कि मंत्रीजी की बकरी को ढूंढ़ने का काम अमेरिका की खुफिया एजेंसी को दिया जा रहा है. कुलमिला कर मंत्रीजी की बकरी के गुम होने पर जितने मुंह उतनी बातें.

पार्टी के ही लोग अपना नाम न छापने की शर्त पर यह बात कहते फिर रहे हैं कि बकरी खुद ही नेताजी के दुहने से तंग आ कर भाग गई है. कुछ लोगों का तो यही कहना है कि बकरी का दूध सूख जाने पर मंत्रीजी ने खुद ही उसे कहीं छिपा दिया है.

अब तो दबे शब्दों में मंत्रीजी ने अपनी बकरी के गुम होने पर विपक्ष पर आरोप लगाने शुरू कर दिए हैं.

कुछ राजनीतिक माहिरों का तो यहां तक कहना है कि मंत्रीजी की बकरी के अपहरण के पीछे आईएसआई का हाथ भी हो सकता है.

दरअसल, बकरी हमारे दैनिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक जीवन का एक मूलभूत अंग रही है. यही वजह है कि संस्कृति मंत्रालय भी मंत्रीजी की बकरी को ढूंढ़ने में जनता से अपील कर रहा है.

बकरी की जगह अगर मंत्रीजी का कुछ और गुम होता, तो प्रशासन तो प्रशासन, मंत्रीजी तक उसे इतनी गंभीरता से नहीं लेते.

हे मेरे देश के वोटरो, बकरी न होती, तो हमारे साहित्य में यह कहावत न होती कि आखिर बकरे की मां कब तक खैर मनाएगी. अगर हमारी जिंदगी में बकरी न होती तो क्या कबीर कभी यह लिख पाते :

‘बकरी खाती घास है, ताकी काडि़ खाल,

जो बकरी को खात है, तिनको कौन हवाल.’

अगर बकरी न होती, तो चुनाव में हार के बाद बलि का कोई बकरा न बन पाता.

दोस्तो, अगर बकरी न होती, तो बकरा भी कहां से होता? तब उस की जगह बलि चढ़ने के लिए कौन तैयार हो पाता? गीदड़, सियार तो समाज से आने से पहले ही चालाक रहे हैं. राजनीति में आने के बाद तो क्या मजाल, जो उन का कोई बाल तक बांका कर सके.

यह एक राष्ट्रीय बहस का मुद्दा है, पर इस मुद्दे पर बहस इसलिए जरूरी नहीं मानी जाती, क्योंकि राजनीतिक दलों के पास हार की बेदी पर बलि चढ़ाने के लिए अपनेअपने बकरे मौजूद होते हैं.

बकरी का सब से बड़ा फायदा यह होता है कि इस के केवल 2 ही थन होते हैं. इसे नेताजी कहीं भी दुह सकते हैं. बकरी का दूध निकालने के लिए ज्यादा मशक्कत नहीं करनी पड़ती. बकरी को जनता से ज्यादा आसानी से दुहा जा सकता है. बस, इसीलिए मंत्रीजी लोकप्रिय बकरी के गुम होने पर बहुत दुखी हैं.

जनता की सुविधा के लिए बकरी का रंगरूप, नैननक्श, कदकाठी से ले कर मिमियाने तक की सारी जानकारी देश के तमाम चैनलों, प्रिंट मीडिया को सरकारी विज्ञापन के रूप में दे दी गई है.

जिस किसी को भी लोकप्रिय बकरी का पता चले, वह तुरंत अपने नजदीकी थाने में खबर करे. सही खबर देने वाले को गणतंत्र दिवस के मौके पर मंत्रीजी द्वारा सम्मानित किया जाएगा.

अमेरिकियों के पास सतर्क रहने के हैं तमाम कारण

आत्मविश्वास से लबरेज किम जोंग उन अपनी योजना के साथ सिंगापुर आया, थोड़ा दिया और ज्यादा लेकर लौटा. अपना कद बढ़ाया, अमेरिकी राष्ट्रपति से तारीफें बटोरीं, सैन्य अभ्यास खत्म करने का वादा लिया. सबसे बड़ी बात उसका वह बढ़ा हुआ आत्मविश्वास कि उत्तर कोरिया ने सब कुछ बखूबी किया. निश्चित रूप से यह सब युद्ध से तो बेहतर ही है. हालांकि भय की पूरी दीवार जब ट्रंप की खड़ी की हुई हो तो उन्हें तो श्रेय नहीं दिया जा सकता.

अमेरिकी राष्ट्रपति अपने अहंकार की तुष्टि के लिए किम पर मेहरबान दिखे. उन्हें नहीं पता कि उन्होंने अपने देश का कितना नुकसान कर लिया. संयुक्त वक्तव्य की भाषा भी पिछले वक्तव्यों की तुलना में लचर दिखी. इसमें भविष्य के प्रति आश्वस्त करने वाली कोई प्रतिज्ञा नहीं दिखी. हां, ट्रंप को बैठक से इतना खुश देखना आश्चर्य नहीं, हंसी का मामला है.

ट्रंप उत्तर कोरिया वालों को समझाते दिखे कि कैसे वे तोपखाने के अभ्यास वाले समुद्र तटों पर ‘दुनिया के सबसे अच्छे होटल’ बना सकते हैं. वे किम को उसके बढ़ते वायस ओवर के साथ किसी हॉलीवुड फिल्म के ट्रेलर की तरह पेश करते नजर आए. उसे अपने देश से प्यार करने वाला एक ‘ऐसा प्रतिभाशाली इंसान’ बताया, जो अच्छे-अच्छे काम करना चाहता है. भूल गए कि वे ऐसे तानाशाह की बात कर रहे हैं, जिसे संयुक्त राष्ट्र संघ आधुनिक विश्व में मानवाधिकार हनन का अपने तरह का अकेला पर्याय मानता है.

किम के बारे में वे बहुत मजबूती से कहते हैं कि ‘उन्हें मुझ पर और मुझे उन पर भरोसा है’. अब अमेरिकी राष्ट्रपति भले ही इतने नासमझ हों, उत्तर कोरियाई नेता तो कतई ऐसा नहीं हो सकता, यह सब जानते हैं. ईरान समझौते से इकतरफा मुकरने के बाद कहा जाने लगा है कि अमेरिका की बात पर भरोसा नहीं किया जा सकता. जी 7 व सिंगापुर बैठकों ने भी बताया है कि घटक हमेशा साथ नहीं रह सकते.

खैर, मंगलवार की बैठक ने स्पष्ट कर दिया है कि अमेरिकियों के पास सतर्क रहने के तमाम कारण हैं. वे खुद भी ट्रंप के वादों पर भरोसा नहीं कर सकते.

भोजपुरी सिनेमा की छटपटाहट, नकल की आंधी में असल गायब

कहने को भोजपुरी सिनेमा ने 50 साल से ज्यादा का सफर पूरा कर लिया है, लेकिन उस के खाते में 50 बेहतरीन फिल्में भी नहीं हैं. हर साल 50 से ज्यादा भोजपुरी फिल्में बन रही हैं, लेकिन हिंदी फिल्मों की अंधी नकल की वजह से वे न घर की रहीं और न घाट की.

भारत समेत मौरीशस, फिजी, सूरीनाम वगैरह देशों में तकरीबन 25 करोड़ लोग भोजपुरी बोलने समझने वाले हैं. देश में बिहार और उत्तर प्रदेश में भोजपुरी बोलने वाले सब से ज्यादा हैं. महाराष्ट्र, पंजाब, गुजरात वगैरह राज्य भी भोजपुरी सिनेमा के बड़े बाजार हैं, क्योंकि बिहार और उत्तर प्रदेश के हजारों लाखों लोग वहां के कल कारखानों में काम करते हैं.

भोजपुरी सिनेमा के हीरो राजीव मिश्रा कहते हैं कि परदेश में अपनी बोली की फिल्म देख कर लोग अपने गांव की मिट्टी की खुशबू के जैसा मजा लेते हैं. इसी वजह से दूसरे राज्यों में भी भोजपुरी फिल्में काफी चलती हैं. वहीं मिट्टी की खुशबू आज की भोजपुरी फिल्मों से पूरी तरह से गायब हो चुकी है और उस की जगह पूरी तरह से मुंबइया फिल्मों के स्टाइल ने ले ली है.

‘गंगा मइया तोहरे पियरी चढ़इबो’ पहली भोजपुरी फिल्म थी, जो 5 फरवरी, 1962 में रिलीज हुई थी. 5 लाख रुपए में बनी उस फिल्म ने 75 लाख रुपए की कमाई की थी.

विश्वनाथ शाहाबादी की बनाई इस फिल्म को मिली भारी कामयाबी के बाद तो भोजपुरी सिनेमा का रास्ता ही खुल गया और एक के बाद एक धड़ाधड़ भोजपुरी फिल्में बनने लगीं.

साल 1977 में भोजपुरी सिनेमा तब एक बार फिर उठ खड़ा हुआ, जब हिंदी सिनेमा के खलनायक रहे सुजीत कुमार और छोटेमोटे रोल करने वाली प्रेम नारायण भोजपुरी फिल्म ‘दंगल’ में हीरो हीरोइन बन कर आए.

‘दंगल’ भोजपुरी की पहली रंगीन फिल्म थी. ‘दंगल’ के गाने ‘गोरकी पतरकी रे मारे गुलेलवा जियरा हिलहिल जाए…’ ने तो धमाल ही मचा दिया. उस गाने को मोहम्मद रफी और आशा भोंसले ने आवाज दी थी. उस के बाद राकेश पांडे और पद्मा खन्ना की जोड़ी ‘बलम परदेसिया’ ले कर आई, जिस ने कामयाबी के झंडे गाड़े.

उस के बाद ‘धरती मैया’, ‘दूल्हा गंगा पार के’, ‘दगाबाज बलमा’, ‘संईयां मगन पहलवानी में’, ‘हमार दूल्हा’ जैसी बीसियों भोजपुरी फिल्में बनीं, पर कोई खास धमाल नहीं मचा सकीं. उस के बाद एक बार फिर भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री जैसे कोमा में चली गई.

भोजपुरी फिल्मों के जानकार बृजलाल कहते हैं कि हिंदी सिनेमा की कोरी नकल, फूहड़ डायलौग और गीतों ने भोजपुरी सिनेमा का बहुत कबाड़ा किया है. इस वजह से ज्यादातर लोग परिवार के साथ फिल्म देखने से कतराते हैं.

हीरो रविकिशन कहते हैं कि भोजपुरी सिनेमा के लोग अपनी सोच और बाजार के हिसाब से फिल्में बनाते हैं. एक बार जो चीज चल गई, उसे ही कामयाबी की गारंटी मान लेना फिल्मकारों की बहुत पुरानी बीमारी है. जो करोड़ों रुपए खर्च कर फिल्म बनाएगा, वह कमाई का खयाल तो रखेगा ही. जनता की पसंद के हिसाब से फिल्में बनती हैं. भोजपुरी फिल्मों की वजह से ही बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश के सैकड़ों सिनेमाघर बंद होने से बच गए.

भोजपुरी फिल्मों से जुड़े लोग अपनी पीठ कितनी भी ठोंक ले, पर यह सच है कि भोजपुरी सिनेमा को वह दर्जा नहीं मिल सका है, जो तमिल, तेलुगु, मलयाली, बंगला, कन्नड़, मराठी फिल्मों को हासिल हो चुका है.

भोजपुरी फिल्मों के नामी विलेन उदय श्रीवास्तव कहते हैं कि इस इंडस्ट्री में बाहरी लोगों के घुसने से भोजपुरी फिल्मों की पहचान खत्म हो गई है. ऐसे लोगों को भोजपुरी की माटी की खुशबू, उस की संस्कृति और पहचान से कोई लेनादेना नहीं होता है. वे यही समझते हैं कि केवल भोजपुरी बोली में फिल्म बना देने से वह भोजपुरी फिल्म हो जाती है.

आज की भोजपुरी फिल्मों में खूनखराबे की भरमार होने से औरतें ऐसी फिल्मों से कट चुकी हैं, जिस से फिल्में चल नहीं पाती हैं.

हिंदी फिल्मों के नाम अंगरेजी में क्यों: राकेश

भोजपुरी फिल्मों के हिंदी नाम रखने के चलन के बारे में सुपरस्टार राकेश मिश्रा कहते हैं कि इस में कोई खराबी नहीं है. दक्षिण की कई हिट फिल्में हिंदी में बन रही हैं और ढेरों मुंबइया फिल्मों के नाम अंगरेजी में रखे जाते हैं. फिल्म बनाने वाला और फाइनैंसर यही चाहता है कि किसी भी तरह से उस की फिल्म हिट हो और उन्हें मुनाफा मिल सके.

राकेश मिश्रा का दावा है कि भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री ने खूब तरक्की की है और आज भी उस की कामयाबी का सफर जारी है. कई फिल्मों के ओवर बजट होने की वजह से इंडस्ट्री को थोड़ा झटका लगा था, पर अब सबकुछ पटरी पर लौट आया है. वैसे, भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री नई तकनीक और पुरानी परंपरा के बीच छटपटा रही है और इस कसमसाहट के दौर के बाद कुछ बेहतर नतीजा ही सामने आएगा.

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