धर्मजनित भीड़तंत्र का खतरा और हिंसा का सिलसिला

पश्चिम बंगाल के 24 परगना जिले के बशीरहाट कसबे में 12वीं में पढ़ने वाले एक किशोर द्वारा 22 जुलाई 2017 को फेसबुक पर मुसलमान युवकों पर आपत्तिजनक पोस्ट डालने से प्रदेश के कई शहर सुलग उठे. पोस्ट ज्योंही वायरल हुई, मुसलमान सड़कों पर उतर आए. भीड़ ने घरों पर हमला कर दिया. दुकानें लूटीं, कईर् वाहन फूंक दिए. भीड़ पोस्ट करने वाले किशोर को भीड़ के हवाले करने की मांग करने लगी. गोलियां चलने से कसबे में कार्तिक चंद घोष नामक व्यक्ति की मौत हो गई. इस घटना के बाद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को दोषी ठहरा कर विपक्षी दलों में आरोपप्रत्यारोप लगाने का खेल शुरू हो गया.

इस से पहले, फरीदाबाद-पलवल टे्रन में 15 वर्षीय जुनैद खान नामक किशोर को बीफ ले जाने के शक में भीड़ ने उस पर खूब छींटाकशी की, फिर चाकू घोंप कर उस की हत्या कर दी. कुछ समय पहले गायों को ले जा रहे अलवर के पहलू खान की गाय की तस्करी के नाम पर भीड़ ने जान ले ली थी. पिछले साल दादरी में गोमांस के संदेह में घर में घुस कर भीड़ द्वारा मारे गए मोहम्मद अखलाक की मौत का कहर उस के परिवार पर टूट पड़ा था.

भीड़तंत्र द्वारा नफरत के विस्फोट का यह अंतहीन सिलसिला थमता हुआ नहीं दिख रहा है. देशभर में इन दिनों यह भयावह दृश्य देखा जा रहा है. ऐसी घटनाओं ने देश के विचारकों को गहरी चिंता में डाल दिया है. जुनैद हत्याकांड के बाद हजारों लोगों ने सड़कों पर उतर कर ‘नौट इन माई नेम’ नारे के साथ दिल्ली के जंतरमंतर, मुंबई, कोलकाता, बैंगलुरु, हैदराबाद जैसे शहरों में विरोध प्रदर्शन किया.

देश की सरकार न सिर्फ बहरा कर देने वाली चुप्पी साधे हुए है, बल्कि अल्पसंख्यकों के खिलाफ हमले और भीड़ द्वारा हत्या करने को खुलेआम बढ़ावा देने में लगी हुई है. अल्पसंख्यक आयोग और मौजूदा केंद्र सरकार अल्पसंख्यक समुदाय को सम्मान दिलाने व उस की सुरक्षा का दिखावा तक करने में असफल रही है.

यह और ऐसे कई आरोप लगाते हुए प्रख्यात मानवाधिकार कार्यकर्ता 60 वर्षीया शबनम हाशमी ने अपना राष्ट्रीय अल्पसंख्यक अधिकार पुरस्कार सरकार को वापस लौटाया तो इस पर कोई खास होहल्ला तो दूर, औपचारिक चर्चा भी नहीं हुई.

मानवाधिकार के क्षेत्र में शबनम हाशमी को कार्य करते 2 दशकों से भी ज्यादा का वक्त गुजर चुका है. वे एक धीरगंभीर पर आकर्षक व्यक्तित्व वाली महिला हैं जो आमतौर पर खामोशी से अपना काम करना पसंद करती हैं.

पिछले दिनों देश के विभिन्न क्षेत्रों में खासतौर से गौरक्षा और बीफ खाने व उस की कथित तस्करी के नाम पर उन्मादी भीड़ ने जिस तरह मुसलमानों की चुनचुन कर हत्या की वह दीर्घकालिक चिंता की बात है. समाज पर राज एक वर्गविशेष की भीड़ का चल रहा है जिस पर सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रपति ने गंभीरता से जबकि प्रधानमंत्री ने औपचारिक रूप से चिंता जताई है.

देश धर्मजनित भीड़तंत्र की दहलीज पर न केवल खड़ा है बल्कि यह रोग काफी भीतर तक दाखिल भी हो गया है. इसे समझने के लिए कुछ हादसों पर गौर करना जरूरी है. अफसोस की बात यह भी है कि कट्टर और अदूरदर्शी लोग इन हादसों का समर्थन कर रहे हैं. जब से मौजूदा सरकार सत्ता में आई है, एक सर्वे बताता है कि पिछले 3 वर्षों में इस तरह की घटनाओं में 97 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है. हाल की कुछ बहुचर्चित घटनाएं तफसील से पढि़ए.

वल्लभगढ़, 22 जून, 2017

हरियाणा के वल्लभगढ़ से 4 किलोमीटर की दूरी पर एक गांव है खदावली. खदावली गांव में मुसलिमों की तादाद खासी है. इस गांव के एक बुजुर्ग निवासी हैं जलालुद्दीन, जिन का घर भरापूरा है. जलालुद्दीन का छोटा बेटा जुनैद मेवात के एक मदरसे फैज-ए-सोमानिया में पढ़ रहा था. जुनैद इस दफा ईद की छुट्टियां मनाने खदावली आया.

ईद की खरीदारी करने के लिए, हादसे के दिन, जुनैद अपने बडे़ भाई हाशिम के साथ दिल्ली गया था और खरीदारी के बाद रात की लोकल ट्रेन से घर वापस लौट रहा था. वल्लभगढ़ से दिल्ली तकरीबन 45 मिनट का रास्ता है. बहैसियत हाफिज, जुनैद की यह पहली ईद थी और वह दिल्ली की जामा मसजिद का इमाम बन जाने का ख्वाब संजोए था. यह ख्वाब, हद से ज्यादा, हर धार्मिक मुसलमान किशोर का होता है.

सदर स्टेशन से हाशिम और जुनैद लोकल ट्रेन में बैठे. उन के साथ 2 पड़ोसी दोस्त मोहसिन और मोईन भी थे. सदर में तो ट्रेन में कुछ जगह थी लेकिन जैसेजैसे यह वल्लभगढ़ की तरफ बढ़ने लगी तो मुसाफिरों की तादाद बढ़ने लगी. ये चारों चूंकि बैठ चुके थे, इसलिए जगह और बैठने की मारामारी को देखते हुए बतियाते जा रहे थे. भीड़ में एक बुजुर्ग को खड़ा देख जुनैद ने उन्हें बैठने के लिए अपनी सीट दे दी और खुद उन की जगह खड़ा हो गया.

ओखला स्टेशन से उस डब्बे में एकसाथ कई लोग चढ़े, जिस से धक्कामुक्की होने लगी. लोकल ट्रेनों में ऐसा होना आम बात है. लेकिन धक्कामुक्की इतनी बढ़ी कि एक धक्के से जुनैद गिर पड़ा. इस पर धक्का मारने वालों से हाशिम और जुनैद ने कहा कि वे धक्का न मारें.

बस, इतना कहना भर था कि ओखला से चढ़े एकसाथ 15-20 लोगों में से एक ने हाशिम की टोपी छीन कर नीचे फेंक दी और उसे फिल्मी स्टाइल में अपने पैरों तले कुचल दिया. यह भीड़ इतने से ही शांत नहीं हुई. भीड़ में से एक ने हाशिम की दाढ़ी पकड़ ली. हाशिम और जुनैद, अंजाना पर पहचाना कुछ भी कह लें, खतरा देख अब बचाव की मुद्रा में आ गए.

कायदे से तो बात यहीं खत्म हो जानी चाहिए थी कि भीड़ ने 2 मुसलमान युवकों की टोपी रौंदी और दाढ़ी नोची, पर भीड़ का इरादा कुछ और था. इन लोगों ने हाशिम और जुनैद की पिटाई करनी शुरू कर दी. मोईन और मोहसिन को भी खींच कर मारा जाने लगा. मौजूद मुसाफिरों की भीड़ इस मारकुटाई पर कुछ नहीं बोली. इन चारों को पीटने वाले 10-15 लोग चिल्लाते भी जा रहे थे कि ये मुसलमान हैं, गाय खाते हैं और देशद्रोही हैं. पिटाई के दौरान ही हाशिम ने अपने मोबाइल फोन से वल्लभगढ़ में रह रहे अपने बड़े भाई शाकिर को हादसे की खबर दे दी थी, जिस से वह उन्हें लेने के लिए स्टेशन पहुंच गया था.

वल्लभगढ़ पर ट्रेन रुकी तो भीड़ ने इन चारों को उतरने नहीं दिया. इस पर शाकिर ढूंढ़ता हुआ उन के डब्बे तक जा पहुंचा. उस के साथ उस के कुछ दोस्त भी थे. शाकिर और उस के दोस्तों ने देखा कि इन चारों को भीड़ ने पकड़ रखा है, और उन्हें उतरने नहीं दे रहे हैं. इस पर कहासुनी शुरू हुई तो भीड़ ने शाकिर और उस के साथियों की धुनाई शुरू कर दी.

वल्लभगढ़ से टे्रन खिसकी तो भीड़ में से किसी ने एक नुकीला चाकू निकाला और शाकिर पर वार कर दिया. शाकिर को खतरे में देख उस के दोनों छोटे भाई हाशिम और जुनैद आगे आए तो इन पर भी चाकू से हमला किया गया.

अगला स्टेशन असावटी था, महज 10 मिनट का रास्ता, लेकिन जुनैद पर चाकू के इतने हमले हुए थे कि वह मर गया.

चलती टे्रन में एक मुसलमान युवक की हत्या की बात जंगल की आग की तरह देशभर में फैली जिस पर तरहतरह की बातें हुईं. अस्पताल में भरती हाशिम आगंतुकों को रट्टू तोते की तरह यही कहानी सुना रहा था. जलालुद्दीन के घर ईद की खुशियों की जगह मातम ने ले ली और इस इलाके के मुसलमानों ने ईद की नमाज अपने बाजुओं में काली पट्टी बांध कर पढ़ी.

जुनैद को क्यों मारा, यह बात ट्रेन में ही चिल्लाचिल्ला कर हत्यारी भीड़ बता चुकी थी कि ये मुसलमान हैं, ये गाय खाते हैं और देशद्रोही हैं.

रामगढ़, झारखंड

29 जून, 2017

झारखंड के रामगढ़ जिले में मोहम्मद अलीमुद्दीन नाम के युवक को गौरक्षकों ने पीटपीट कर मार डाला. यह वह वक्त था जब गुजरात के साबरमती आश्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नसीहत या चेतावनी दे रहे थे कि गौरक्षा के नाम पर आदमियों की हत्या स्वीकार्य नहीं.

इस बात से रामगढ़ के गौरक्षकों ने जो सीखा वह बेहद घृणित, अमानवीय और वीभत्स है. हादसे के दिन अलीमुद्दीन वैन में मांस, कथित रूप से प्रतिबंधित मांस यानी बीफ, ले कर जा रहा था, जिस की भनक इस इलाके के गौरक्षकों को लग गई थी. उन्होंने रामगढ़ के बाजार टांड़ में अलीमुद्दीन को वैन सहित बलपूर्वक रोका और वैन की तलाशी ली.

वैन में 4 बोरियों में मांस देख गौरक्षक भड़क गए और उन्होंने तुरंत वैन को आग लगा दी. वैन में रखी बोरियों में मांस गाय का था या किसी और जानवर का था या फिर था ही नहीं, यह सचाई कभी पता नहीं चलने वाली.

यह बात भी यहीं खत्म हो जानी चाहिए थी पर यह शुरुआत थी. गौरक्षकों के आतंक को सैकड़ों लोगों ने देखा. अलीमुद्दीन को खींच कर बीच चौराहे पर लाया गया और गौरक्षकों ने उसे मौत की सजा सुना दी. यह किसी अदालत द्वारा दी गई सजा नहीं थी जिस में कथित मुजरिम को अपनी सफाई देने के लिए कोई वक्त मिलता. मौत की सजा के फैसले पर भीड़ ने तुरंत अमल भी किया और अलीमुद्दीन की जम कर पिटाई की और बाकायदा उस का वीडियो भी बनाया गया. मंशा तय है, ताकि सनद रहे…की थी.

हिंसक और उन्मादी भीड़ अलीमुद्दीन को पीटती रही. इसी बीच कहीं या किसी से खबर मिलने पर पुलिस भी आ गई और बमुश्किल भीड़ के चंगुल से उस ने अलीमुद्दीन को छुड़ाया. जल्द ही इस हादसे की खबर भी आग की तरह फैली कि झारखंड के रामगढ़ जिले में गौरक्षकों ने पीटपीट कर एक मुसलमान को मार डाला. उस पर आरोप यह लगाया कि वह गौमांस ले जा रहा था.

पुलिस अलीमुद्दीन को इलाज के लिए अस्पताल ले गई पर इलाज के दौरान ही उस की मौत हो गई. मौके पर बड़ी तादाद में उस इलाके के आसपास से आए मुसलमान इकट्ठा हो गए. इस वक्त तक अपना मिशन पूरा कर गौरक्षक छूमंतर हो चुके थे.

रिम्स, रांची में पोस्टमौर्टम के बाद अलीमुद्दीन की लाश पुलिस हिफाजत में उस के गांव मनुआ फूलसराय लाई गई. मनुआ फूलसराय के लोगों ने पुलिस वालों का विरोध किया और अलीमुद्दीन के घर वालों ने उस का शव लेने से इनकार कर दिया. सरकारी अधिकारियों ने विरोध झेलते हुए 3 बार मध्यस्थता की, तब कहीं जा कर अलीमुद्दीन की लाश उस के घर वालों ने ली. अब तक रामगढ़ जिले में अघोषित कर्फ्यू लग गया था और 33 संवेदनशील इलाकों में सुरक्षा बल तैनात कर दिए गए थे.

दूसरे दिन सुबह पुलिस ने 12 लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया. ये दर्जनभर तो गायब हो ही गए थे, इस इलाके के तमाम हिंदूवादी नेता भी अलीमुद्दीन की मौत के बाद फरार हो गए. हिंसा और रोमांच से भरपूर भीड़ द्वारा की गई इस हत्या में गुल तो कई खिले और अभी तक खिल रहे हैं पर एक बासी बात यह भी प्रचारित हुई कि अलीमुद्दीन पर अपहरण और चोरी के मामले दर्ज थे. इस का उस की हत्या से संबंध किसी को समझ नहीं आया.

भारी तनाव के बीच रामगढ़ और मनुआ फूलसराय के लोग बारबार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यह भाषण स्मार्टफोन पर सुन रहे थे जिस में उन्होंने कहा था, गौरक्षा के नाम पर हिंसा क्यों, मौजूदा हालात पर पीड़ा होती है. गाय की सेवा ही गाय की भक्ति होती है. गौरक्षा के नाम पर हिंसा ठीक नहीं. देश को अहिंसा के रास्ते पर चलना होगा, गौभक्ति के नाम पर लोगों की हत्या स्वीकार नहीं की जाएगी. अगर वह इंसान गलत है तो कानून अपना काम करेगा, किसी को भी कानून अपने हाथ में लेने की जरूरत नहीं है. हिंसा समस्या का समाधान नहीं है.

यह भाषण उल्लेखनीय इसलिए था कि रामगढ़ में गौभक्तों के गैंग ने न केवल कानून अपने हाथ में लिया था बल्कि गाय के नाम पर एक मुसलमान को पीटपीट कर मार डाला था. समस्या का समाधान जिस हिंसा के जरिए निकाला गया उस की प्रतिध्वनि सदियों तक गूंजती रहेगी. प्रधानमंत्री का भाषण ऐसे हर हादसे पर उल्लेखित होगा.

झारखंड, गिरिडीह जिले का बरवाबाद गांव, 29 जून

रांची से लगभग 270 किलोमीटर दूर गिरिडीह जिले के देवरी थाने के तहत आने वाले बरवाबाद गांव में 28 जून को हिंसक भीड़ ने मुहम्मद उस्मान अंसारी की हत्या करने की कोशिश की. उस का घर जला दिया और परिवार वालों को जला कर मारने का प्रयास किया. उस की गायों को लूट कर ले जाया गया.

500 घरों और 15 मुसलमानों के इस गांव में उस्मान के घर से सटा बदरी मंडल का घर है. उस्मान दूध का कारोबार करता था. उस के पास पहले 14 गाएं थीं पर अब नहीं हैं. इस कारोबार में उस का बेटा सलीम भी मदद करता था. उस्मान की एक जर्सी गाय कई दिनों से बीमार थी. इलाज के बावजूद गाय 25 जून को मर गई. उस्मान ने गांव के एक दलित को सूचना दी कि वह उस की मर चुकी गाय को फेंक आए. दलित गाय फेंकने के एवज में 2 हजार रुपए मांग रहा था पर उस्मान इतने पैसे देने को तैयार नहीं था. वह 700 सौ रुपए देना चाहता था. बात नहीं बनी तो उस्मान ने बेटे की मदद से खुद ही अपने घर के सामने मैदान के पार एक बड़े नाले में फेंक दी.

मैदान में मंगलवार के दिन बाजार लगता है. 27 जून को बाजार लगने की तैयारी हो रही थी. तभी कुछ युवकों ने 60 वर्षीय उस्मान को पकड़ लिया और कहने लगे कि तुम ने गाय को काट कर फेंक दिया. उस्मान कहता रहा कि गाय मेरी थी और बीमारी की वजह से मर गई थी. पर युवकों ने शोरशराबा शुरू कर दिया. भीड़ उस्मान को मारनेपीटने लगी. उस के घर में आग लगा दी गई और घर में बंधी हुई गायों को खोल दिया और लूट कर ले गए.. उस की पत्नी को भी पीटा गया. बेटे और बहू ने भाग कर, छिप कर जान बचाई.

उस्मान को मरा समझ कर भीड़ हटी, तब पुलिस आई. भीड़ ने पुलिस पर भी पथराव किया. बदले में पुलिस ने हवाई फायर किए, तब जा कर भीड़ तितरबितर हुई. उस्मान को इलाज के लिए गिरिडीह ले जाया गया. उस की हालत गंभीर थी.

अलवर, राजस्थान

1 अप्रैल, 2017

यों तो साल 2017 में ऐसे छोटेबड़े हादसों की तादाद दर्जनभर हैं जिन में गाय के नाम पर दलितों और मुसलमानों को हिंदूवादियों और गौभक्तों ने धुना. जिन मामलों में भीड़ द्वारा कोई मरा नहीं, वे दफन हो कर रह गए. पर जिन मामलों में किसी, खासतौर से मुसलमान, को दफन होना पड़ा उन्होंने जरूर तूल पकड़ा. इन में से एक राजस्थान के अलवर का है. इस में 51 वर्षीय पशुपालक पहलू खान की भीड़ ने मारमार कर हत्या कर दी थी.

हरियाणा के नूह जिले के गांव जयसिंहपुर के रहने वाले पहलू खान अपने 4 साथियों सहित जयपुर के मशहूर पशु मेले में गए थे. उन का मकसद था दुधारू मवेशी खरीदना जिस से उन की रोजीरोटी और घर चलते हैं.

पहलू और उन का काफिला मवेशी खरीद कर वापस लौट रहा था. गौरक्षकों ने उन्हें अलवर में रोक लिया. आरोप यह लगाया कि ये लोग गायों की तस्करी करते हैं. इस पर पहलू खान ने उन्हें खरीदे गए मवेशियों की रसीदें दिखाईं कि वे लोग मवेशियों को जायज तरीके से ले जा रहे हैं.

यहां भी बात यहीं खत्म हो जानी चाहिए थी पर गौरक्षकों की इस भीड़ का मकसद कुछ और था. पहलू खान सहित उन के 2 बेटों और साथी यूनुस खान को गौरक्षकों की भीड़ ने बेरहमी से धुना और इतना धुना कि पांचों बेहोश हो गए. पुलिस आई, भीड़ छंटी पर इन लोगों को पता नहीं चला. हां, यूनुस की बेहोशी जब मुकम्मल तौर पर टूटी तब उन्हें यह दुखद समाचार मिला कि पहलू दुनिया में नहीं रहे.

यूनुस को समझ नहीं आ रहा था कि किस जुर्म की सजा उन्हें मिली जबकि वे तो दुधारू गाय ला रहे थे. इस के सुबूत भी उन के पास थे.

हादसे में पहलू खान के जिंदा बच गए 22 वर्षीय बेटे इरशाद का कहना है कि गायों की रक्षा के नाम पर वे लोग लूटना चाहते थे. गौरक्षकों ने सब से पहले

हमें रोक कर जेबों की तलाशी ली और 75 हजार रुपए छीन लिए. भगवा कपड़े पहन कर आम लोगों को पीटना, फिर उन से पैसे व मवेशी छीन लेना इन गौरक्षकों का मुख्य उद्देश्य प्रतीत होता है.

हालत खराब होने से पहलू खान को इमरजैंसी वार्ड में रखा गया था. वहीं उन की मौत हो गई. इरशाद का कहना है कि वे तो दूध बेच कर अपना पेट पालते हैं और उस दिन भी गाय और भैंसें खरीदने गए थे. गौरक्षकों ने उन्हें गौ तस्कर कह कर मारा.

जयसिंहपुर मुसलिम बाहुल्य गांव है लेकिन पहलू खान की गौरक्षकों की भीड़ द्वारा पिटाई के बाद मौत हुई तो अब वहां कोई गाय नहीं पालना चाहता. कोई और अब पहलू खान की तरह भीड़ के हाथों मरना नहीं चाहता.

यहां भी ये कथित गौरक्षक हिंदूवादी संगठनों से जुड़े थे. उन्होंने साजिश के तहत पहलू खान और उन के साथियों को बेरहमी से मारा और औन द स्पौट अपना फैसला थोप दिया.

नोएडा, उत्तर प्रदेश

12 जुलाई, 2017

भीड़तंत्र का रोग अन्य क्षेत्रों में भी फैला है. उत्तर प्रदेश के नोएडा स्थित महागुन मौडर्न सोसायटी में घुस कर 500 से अधिक लोगों ने तोड़फोड़ की. पुलिस पर पत्थरबाजी की गई. हंगामे के कारण घंटों तक सोसायटी में दहशत का माहौल रहा. कहा गया कि घर में काम करने वाली एक महिला को फ्लैट में बंधक बना कर रखा गया. नौकरानी पर एक घर से 10 हजार रुपए चुराने का आरोप था. उस की चोरी सीसीटीवी फुटेज में पकड़ी गई थी. इस पर नौकरानी का पति भीड़ के साथ सोसायटी में पहुंचा और तोड़फोड़ शुरू कर दी.

इस भीड़ ने फैसला करना अपने हाथ में ले लिया. यह भीड़ पुलिस, कानून को नकारने लगी है. लोकतंत्र में भीड़ का यह कैसा फैसला है? भीड़ विरोध करे तो जायज कहा जा सकता है पर भीड़ तो फैसले करने लगी है. यह खतरनाक है. कुछ समय पहले व्यवस्था के खिलाफ दिल्ली के जंतरमंतर पर उमड़ा आक्रोश जायज था. वह शांतिपूर्वक विरोध था. इस तरह का विरोध लोकतंत्र के लिए जरूरी है पर भीड़ द्वारा हिंसा फैलाना लोकतंत्र के लिए घातक है.

भीड़तंत्र की दुनिया

लोकतंत्र के वोटतंत्र और भीड़तंत्र में फर्क है. वोटतंत्र का एक मकसद होता है. वोट सोचसमझ कर डाले जाते हैं. पर भीड़तंत्र का मकसद मात्र विध्वंस होता है. बाबरी मसजिद, चर्चों, सरकारी दफ्तरों, सार्वजनिक इमारतों में तोड़फोड़ के पीछे भीड़ का उन्माद होता है. यह भीड़ लोकतंत्र के हित में नहीं, नुकसान में

जुटी दिखती है. यह भीड़ अमेरिका के औक्युपाई वालस्ट्रीट, दिल्ली के जंतरमंतर का आंदोलन, फ्रांस की क्रांति, रूसी क्रांति, चीनी क्रांति, अरब वसंत वाली भीड़ नहीं है. यह विध्वंसक भीड़ है.

भीड़ उन्मादी होती है. उसे पुलिस या सेना रोक नहीं सकती. आएदिन पुलिस थानों पर हमला, पत्थरबाजों की भीड़ द्वारा सेना पर हमला रोके नहीं रुक रहा. मिस्र, लीबिया, सीरिया, ट्यूनीशिया, इन चारों देशों को राजनीतिक तौर पर अस्थिर कर दिया गया. इस का असर अभी तक कायम है. सेना के टैंकों के बावजूद भीड़ नियंत्रित नहीं हो पाई. तख्तापलट कर दिए गए

पर ये देश स्थिरता के लिए तरस रहे हैं. तेल जैसे समृद्ध संसाधनों के बावजूद इसलामिक भीड़ ने पश्चिम एशिया को विनाश के मुहाने पर ला खड़ा किया.

इसी भीड़तंत्र से दुनिया को विभाजन का दंश झेलना पड़ा है. भारत-पाक बंटवारा भीड़तंत्र का नतीजा था, जिस में साफ था 2 धर्म आमनेसामने खड़े थे. भीड़तंत्र द्वारा दोनों धर्मों के लोगों के बीच नफरत फैलाई जा रही थी. दोनों अपनेअपने धर्म के पक्ष और बचाव में नारेबाजी करते हुए तोड़फोड़ करने में जुटे थे. दोनों के बीच हिंसा चरम पर पहुंच गई थी और नतीजा धर्म के आधार पर ‘टू नैशन थ्योरी’ के अंजाम तक पहुंच गया.

भीड़तंत्र ‘धर्म खतरे में है’ जैसे नारे देता है. अब यह नाजियों की तरह ‘राष्ट्रवाद खतरे में है’ के नए रूप में सामने आ रहा है.

भीड़तंत्र ने राष्ट्रों को सामाजिक, आर्थिक तौर पर बड़ा नुकसान पहुंचाया है. कम्युनिज्म का खात्मा इसीलिए हुआ कि वह सर्वहारा के नाम पर उद्योगों को चौपट करने पर तुला हुआ था. भारत के कोलकाता में हजारों कारखाने भीड़तंत्र की उन्मादी मानसिकता के कारण बंद हो गए. आएदिन मजदूरों की हड़तालों ने, तोड़फोड़ ने आर्थिक संसाधनों को बंदी के कगार पर पहुंचा दिया.

भीड़तंत्र का तुरंत नुकसान नजर नहीं आता, पर दीर्घकालीन प्रभाव रहता है.

2 समाजों, वर्गों के बीच पैदा हुआ वैमनस्य कभी खत्म नहीं होता. समयसमय पर इन के बीच हिंसा, कटुता की वारदातें सामने आती रहती हैं. हिंदू, मुसलमान, ईसाई, यहूदी के बीच झगड़ा सैकड़ों सालों से चला आ रहा है.

भीड़ का फैसला

भीड़ जहां फैसला करने लगती है, वहां सरकार के होने न होने के कोई माने नहीं रह जाते. राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया पहलू खान की मौत पर उस के गांव नहीं गईं तो बात हैरानी की है. जिस तरह इस वारदात को अंजाम दिया गया वह साफसाफ बता रहा है कि अगर दूध आप की रोजीरोटी है और आप गाय खरीदतेबेचते हैं तो आप की जिंदगी आज सुरक्षित नहीं है बशर्ते आप मुसलमान या दलित हैं तो. पिछड़ों को अभी नहीं छेड़ा जा रहा क्योंकि कट्टरों के लठैत वही हैं.

साफ है कि समूचे देश में लोकतंत्र और संविधान की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं. गौरक्षक गिरोह, एंटी रोमियो स्क्वैड अब खुलेआम सड़कों पर उतर आए हैं और कानून अपने हाथों में ले रहे हैं. इन गिरोहों को सरकार का संरक्षण हासिल है. कट्टरपंथियों का मनोबल आसमान छू रहा है. देशभर में दलितों, अल्पसंख्यकों पर हमलों की बाढ़ सी आ गई है.

ये मामले इतने नए भी नहीं हैं. यही भीड़ कभी अयोध्या में बाबरी मसजिद गिरा देती है. गुजरात में कत्लेआम मचा देती है. गोधरा कांड बन जाता है. दिल्ली में सिखों पर टूट पड़ती है. गैंगरेप से ले कर औरतों को डायन कह कर मार डालने वाली यह भीड़ खुद फैसले करने पर उतारू दिख रही है.

दुख और आश्चर्य की बात यह है कि इस भीड़ को सत्ता का अभयदान मिल रहा है. छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार गौहत्या में शामिल लोगों को मृत्युदंड देने का ऐलान कर चुकी है. जो एक तरह से गौरक्षकों के लिए कवच है कि जिसे मृत्युदंड मिलना ही है, उसे भीड़ ने मार डाला तो क्या गुनाह है?

मुख्यमंत्री रमन सिंह मीडिया के सामने कह चुके हैं कि गौहत्या जैसे अपराधों में शामिल होने वालों को लटका दिया जाएगा. गुजरात में इसी अपराध के लिए आजीवन कारावास की सजा का प्रावधान है. हरियाणा सरकार गौहत्या के अपराधी को 10 साल के कारावास की सजा का प्रावधान कर चुकी है. महाराष्ट्र में 5 साल जेल की सजा है.

भीड़तंत्र का यह उभार और सरकार का इसे खुला समर्थन देना एक खतरनाक संकेत है जो आएदिन उग्र और अराजक होता जा रहा है. यह भीड़ जागरूक नागरिक नहीं, उन्मादी है. यह मानवीयता के मकसद से नहीं, मजहबी नफरत से उपजा उभार है जो किसी भी समाज के आपसी प्रेम, भाईचारे, शांति के खात्मे के लिए काफी है.

आज राष्ट्र, धर्म, रंग, जाति के नाम पर पनपती भीड़ का नागरिक विवेक खत्म हो चुका है. समाज को सच बताने वाला कोई नहीं है, न मीडिया, न नेता. झूठ को सच बता कर बेचा जा रहा है. युवा धर्म और संस्कृति के सड़ेगले विचारों की अर्थी ढो रहा है. युवाओं के पास तर्क नहीं हैं. उन में तर्कशक्ति का विकास करने वाले साधन न के बराबर हैं जबकि मध्यकालीन बर्बर मानसिकता में धकेलने वाले साधन काफी ज्यादा हैं.

यह भीड़तंत्र की धर्मजनित सोच लोकतंत्र को जल्दी ही तानाशाही में तबदील कर देगी. सवाल मनुष्यता और लोकतंत्र पर मंडराते खतरे को ले कर है. धर्मजनित भीड़तंत्र की ओर बढ़ रहा देश इस बात का संकेत है कि हम बर्बर युग की ओर बढ़ रहे हैं.

सोशल मीडिया की भूमिका

अफवाहें पहले भी फैलती थीं. खासकर धर्म पर आधरित अफवाहों के फैलने में देर नहीं लगती थी. बिना मोबाइल के दिल्ली में गणेश की मूर्ति के दूध पीने की अफवाह सैकड़ों किलोमीटर दूर तक घंटों में पहुंच गई. ऐसे उदाहरण कई हैं. धर्म पर आधारित अफवाहें पहले तेज गति की आंधियों की रफ्तार से चलती थीं.  सोशल मीडिया के जमाने में ये तूफान से भी तेज गति से फैलने लगी हैं. धर्म की अफवाहें धर्मभीरुओं को सक्रिय कर देती हैं जो कानून को अपने हाथ में लेने में नहीं घबराते. यही वजह है कि घटना एक  शहर में होती है तो उस की प्रतिक्रियाएं दूसरे शहरों में भी होती हैं. पहले अफवाहें फैलाने के माध्यम कम थे. उन में बहुत क्रिएशन नहीं होता था. साधारणतौर पर कभी पोस्टकार्ड तो कभी एक या दो रंग में छपे हुए पंफ्लेट ही प्रमुख साधन होते थे.

सोशल मीडिया के जमाने में अफवाहों को फैलाने के लिए तरहतरह के सजीव से दिखने वाले वीडियो का सहारा लिया जाता है. अपनी अफवाह की आड़ में मजबूत तर्क गढ़ लिए जाते हैं. कई बार वीडियो देश के बाहर के होते हैं. पर उन को ऐसे प्रस्तुत किया जाता है जैसे वे अपने देश के हों. इन को चंद घंटों में ही लाखों लोगों तक न केवल पहुंचा दिया जाता है बल्कि इन को ले कर धर्म के नाम पर भड़काने वाली एक बहस भी शुरू हो जाती है. यह बहस ही भीड़तंत्र के लिए हथियार का काम करती है. बेंगलुरु में पूर्वोत्तर राज्यों के रहने वाले युवाओं के खिलाफ ऐसे संदेश वायरल हुए कि उन युवाओं को दूसरे शहरों में भी मुश्किलों का सामना करना पड़ा.

दलित चिंतक रामचंद कटियार कहते हैं, ‘‘सोशल मीडिया का सब से बड़ा प्रभाव धर्म पर आधारित बातों के प्रचारप्रसार में देखने को मिलता है. धर्म की अफवाह फैलाने वाले पहले इस टैक्नोलौजी का विरोध करते थे. उन का कहना था कि यह पश्चिमी संस्कृति का हिस्सा है. जैसे ही यह टैक्नोलौजी लोगों को पसंद आई, धर्म का प्रचार करने वालों ने इस को स्वीकार कर लिया. यह केवल अफवाहों के फैलाने तक ही सीमित नहीं है. चंदा मांगने और उसे सीधे बैंक के अपने खाते में जमा करने तक में सोशल मीडिया की भूमिका प्रभावी हो गई है. इस तरह का प्रचार करने वालों की संख्या बढ़ रही है और इतनी अधिक होती जा रही है कि इस का विरोध करने वाले कमजोर पड़ते जा रहे हैं.’’

नफरत फैलाने का काम

धर्म को ले कर सोशल मीडिया के बडे़ ग्रुप में कुछ संदेश ऐसे होते हैं जो केवल आपस में धर्म को ले कर टकराव व नफरत फैलाने का काम करते हैं. ये हर बात में धर्म को बीच में लाते हैं और फिर इस के आधार पर दूरियां पैदा करते हैं. इस से धर्म के वैमनस्य की जमीन तैयार होती है. बड़े अचंभे की बात यह होती है कि अपना काम होते ही ऐसे संदेश मीडिया पटल से पूरी तरह से गायब हो जाते हैं. उदाहरण के लिए उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में एक संदेश बहुत तेजी से प्रचारित किया गया. उस में कहा गया था, ‘भाजपा ने किसी भी मुसलिम को टिकट नहीं दिया है. यह हिंदुत्व की सब से बड़ी जीत है. अब हिंदुओं की बारी है कि वे मुसलिम समर्थक पार्टियों को वोट न दें.’ चुनावभर यह मुद्दा बना रहा. प्रदेश में भारी जीत हासिल करने के बाद सरकार बनी तो भाजपा ने मुसलिम मंत्री भी बनाया. अब यह बात मुद्दा नहीं बनी कि भाजपा ने ऐसा क्यों किया.

सोशल मीडिया के जानकार कहते हैं, ‘‘ऐसी अफवाहें फैलाने वाले अपनी बात को कहते हैं, पूरी तरह से प्रचारित करते हैं और फिर आसानी से बाहर निकल जाते हैं. वे तर्क में फंसने की कोशिश नहीं करते. अगर तर्क में फंसते हैं तो दूसरे पर आरोप लगा कर निकल लेते हैं. ऐसे संदेश केवल दिलों में नफरत भरने का काम करते हैं. यह काम संगठित तौर पर चलाया जाता है.

‘‘मैसेज के ऐसे संदेश बनाए जाते हैं जो लोगों को पसंद आएं. उन के दिल को छू जाएं. संदेश के साथ फोटो और वीडियो को सुबूत के रूप में जोड़ा जाता है. कई बार ऐसे फोटो और वीडियो एडिट कर सामने रखे जाते हैं जिन से देखने वाले का खून खौल उठे. भारत और पाकिस्तान को ले कर एक वीडियो ऐसा जारी किया गया जिस में

2 सैनिकों के सिर चाकू से काटते दिखाया जाता है. इसे पाकिस्तान की करतूत बताई गई. असल में यह वीडियो भारत व पाकिस्तान के सैनिकों की जगह आतंकी संगठन आईएसआईएस का था जो इराक में शूट किया गया था.’’

विरोधियों पर निशाना

धर्मजनित भीड़तंत्र के खिलाफ काम करने वालों, ऐसी घटनाओं पर सचेत करने वालों को ये लोग अपने निशाने पर लेते हैं. उन को अपने प्रचारतंत्र से सब से बड़ा खलनायक समझाने का काम करते हैं. सोशल मीडिया के संदेशों को सब से प्रमुख मानने वाले लोग इन की बातों को सच मान लेते हैं. ये केवल धर्म से धर्म को ही नहीं लड़ाते, जाति से जाति के बीच भी टकराव का सब से बड़ा कारण बनते हैं.

सहारनपुर में दलित-ठाकुर हिंसा रही हो या रायबरेली में ब्राहमण-पिछड़ा हिंसा, सोशल मीडिया के भड़काऊ संदेश ही माध्यम रहे हैं. सहारनपुर में प्रशासन को ऐसे संदेशों को रोकने के लिए इंटरनैट को ही बंद करना पड़ा था. कश्मीर में ऐसे संदेश बड़े पैमाने पर हिंसा भड़काने का काम करते हैं. वहां भी बारबार इंटरनैट को बंद करना पड़ता है.

सोशल मीडिया पर आने वाले ये संदेश बहुत ही संगठित तरह से फैलाए जाते हैं. ऐसा करने वाले बहुत होशियार होते हैं. उन को पता होता है कि किस काम के लिए कैसे संदेश प्रभाव डाल सकेंगे. ये लोग केवल पैसे के लिए अपना काम करते हैं. कभी ये चुनावों में नेताओं के प्रचारप्रसार के लिए काम करते हैं तो कभी ये विरोधी नेता की छवि को खराब करने का काम करते हैं. एक बार ऐसे संदेशों का जखीरा तैयार कर सोशल मीडिया के हवाले कर के ये लोग बाहर हो जाते हैं.

जानकार बताते हैं कि ऐसे काम करने वाले देश के बाहर भी बैठे हो सकते हैं. ये काम केवल भारत में ही नहीं हो रहा, देश के बाहर भी ऐसे काम खूब हो रहे हैं. यही वजह है कि नेताओं में अब काम करने के बजाय इस तरह के दिखावे करने की आदत बढ़ती जा रही है.

धर्म के आगे नतमस्तक

धर्मजनित अफवाहें सब से ज्यादा फैलती हैं, इस का खास कारण भी है. धर्म का डर बहुत सारे भारतीयों के मन में बसा है. वे धर्म की अफवाह को अफवाह मानते हुए भी दिल से अस्वीकार नहीं करना चाहते. यह सोशल मीडिया के तंत्र का ही कमाल है कि जो धर्म के अंधविश्वास, रूढि़वादिता का विरोध करता है, उसे राष्ट्र का विरोधी मान लिया जाता है.

राष्ट्र और धर्म को आपस में जोड़ कर देखने की प्रवृत्ति ने तर्कशक्ति को प्रभावित किया है. जिस के कारण अब धर्म को गलत मानते हुए उस का विरोध करने का साहस लोगों में घटता जा रहा है. ऐसा लगता है कि धर्म की खामियों का विरोध करना आप के भारतीय होने के सुबूत को छीन लेगा.

धर्म के गलत बयानों का विरोध करने वालों के खिलाफ जनमानस को तैयार करने में सोशल मीडिया की बड़ी भूमिका होेती जा रही है. ऐसे लोगों के खिलाफ पहले धर्मजनित संदेश फैलाए जाते हैं. इस के बाद भीड़ इन पर हमला कर देती है. उस समय कानून भी इन का साथ नहीं दे पाता.

कानून पीडि़त का साथ नहीं देता और दोषी के खिलाफ कड़े कदम नहीं उठाता. ऐसे में धर्म पर आधारित प्रचार और भीड़तंत्र दोनों को ही बढ़ावा देने वाले लोग बच जाते हैं. सोशल मीडिया पर सक्रिय ऐसे लोगों में से बहुतायत फर्जी नाम से अपनी पहचान बनाते हैं और प्रचार को आगे बढ़ाते हैं.

धर्म के नाम पर जिस तरह से समाज अपनी खुली आंखों को भी बंद करता है वह भीड़तंत्र और उस के प्रचारतंत्र के हौसले को बढ़ाता है. गौरक्षा से ले कर, लव जिहाद तक ऐसे मामले खूब देखने में आए हैं. जब कानून और प्रशासन इन के खिलाफ ऐसे काम नहीं करता तो इन का हौसला बढ़ता है. ऐसे मामले भाजपा सरकार से पहले भी होते थे पर अब जब भाजपा सरकार धर्म का बचाव करती और उस की आलोचना करने वाले को दोषी मानती हैं तो ऐसे काम करने वाले लोगों को शह मिलती है. जब धर्म की आलोचना करने वाले को निशाना बनाया जाता है तो धर्म के नाम पर आंख बंद कर चुके लोगों को लगता है कि यह धर्म पर आधारित न्याय है. लोग यह भूल जाते हैं कि देश के बाहर इस तरह का न्याय ही आतंकवाद को बढ़ावा देता है.

आतंकवाद का पोषण करने वाले धर्म के नाम पर ही जिहाद फैलाते हैं. अपना धर्म न मानने वालों को कत्ल से ले कर उन्हें तमाम तरह ये उत्पीडि़त करने को अपना अधिकार समझ लेतेहैं. जब हम ऐसे लोगों को गलत मानते हैं तो फिर अपने देश में धर्मजनित भीड़तंत्र द्वारा की जाने वाली हत्याओं का समर्थन कैसे कर सकते हैं. हत्या ही नहीं, अफवाहों से भरे संदेशों को फैलाने वाले, उन का समर्थन करने वाले भी उसी तरह के दोषी होते हैं.

बदहाली : बच्चा जनने के दौरान जाती जान

रामपुर गांव के रहने वाले रामकुमार की पत्नी सीमा पेट से थी. रामकुमार गरीब परिवार का था. बहुत कोशिशों के बाद भी उस का बीपीएल कार्ड नहीं बना था. इस वजह से गरीबी रेखा से नीचे रहने वालों को मिलने वाले सरकारी फायदे भी  नहीं मिल रहे थे. दलित जाति का होने के चलते उस के पास जमीन का कोई पट्टा भी नहीं था. उस की पत्नी पेट से हुई, तो गांव की स्वास्थ्यकर्मी ‘आशा बहू’ ने प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में ले जा कर दवाएं दिलवा दी थीं.

सीमा कमजोर थी. यह उस का तीसरा बच्चा था. बच्चा जनने के दिन उसे बहुत दर्द हो रहा था. गांव में पहले वह स्वास्थ्य केंद्र गई. वहां डिलिवरी कराने की अच्छी सुविधा नहीं थी, तो डाक्टर ने उसे जिला अस्पताल, लखनऊ भेज दिया. रास्ते में ही उसे दर्द शुरू हो गया. कमजोर होने के चलते वह डिलिवरी नहीं कर पाई और उस की सांसें समय से पहले ही थम गईं.

दहिला गांव की रहने वाली सुभावती भी बच्चा जनने के दौरान गुजर गई. उसे जब दर्द उठा, तो सब से पहले गांव की कुछ औरतों ने घर में ही बच्चा पैदा कराने की कोशिश की. इस दौरान बच्चे का सिर अंग से बाहर आ गया, पर आगे का हिस्सा बाहर नहीं आ पाया. सुभावती को खून बहने लगा. उस का पति ब्रजेश और गांव के लोग अस्पताल ले जाने लगे, तभी रास्ते में उस की मौत हो गई.

ब्रजेश अतिपिछड़ी मल्लाह जाति का था. गांव से सड़क तक आने में 2 किलोमीटर का रास्ता तय करना पड़ता है. आसपास कोई डाक्टर या दूसरी स्वास्थ्य सेवाएं न होने के चलते ऐसी घटनाएं कई बार घट जाती हैं. गांव में रहने वाली गरीब औरतों के मामलों में सब से ज्यादा बच्चा जनने के दौरान मौत होती है. ये लोग गरीब और नासमझ दोनों होते हैं. ऐसे में इन को किसी तरह की सरकारी मदद भी नहीं मिल पाती है.

ऐसी घटनाएं केवल उत्तर प्रदेश में ही नहीं, देश के बाकी प्रदेशों में भी होती हैं. देश में बच्चा जनने के दौरान मरने वाली औरतों की तादाद काफी है.

मुसीबत में गांव वालियां  

एक तरफ सरकार ने संसद में ‘मातृत्व अवकाश’ यानी मैटरनिटी लीव के लिए बिल ला कर उसे 6 हफ्ते से बढ़ा कर 12 हफ्ते कर के ऐसा जताया है, जैसे औरतों के लिए बहुत बड़ा काम कर दिया हो, दूसरी ओर अभी भी देश में बच्चा जनने के दौरान हर घंटे 5 औरतों की जान जा रही है.

‘मातृत्व अवकाश’ का फायदा चंद औरतों तक ही पहुंच रहा है. जरूरत इस बात की है कि देश में बदहाल महिला स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर किया जाए, जिस से गांव में काम करने वाली मजदूर औरतें भी महफूज तरीके से बच्चा पैदा कर सकें. उन्हें अपनी जान से हाथ न धोना पड़े.

‘मातृत्व अवकाश’ का फायदा लेने वाली औरतें हर तरह से जागरूक और सक्षम हैं. वे अपना इलाज और देखभाल बेहतर तरीके से कर सकती हैं.

गांव की रहने वाली गरीब औरतें न तो सक्षम हैं और न ही जागरूक. ऐसे में ‘जननी सुरक्षा योजना’ के तहत केवल एक हजार रुपए की मदद दे कर महफूज तरीके से बच्चा पैदा करने की सोचना बेमानी बात है.

‘जननी सुरक्षा योजना’ भी दूसरी तमाम सरकारी योजनाओं की तरह लालफीताशाही और भ्रष्टाचार की शिकार है, जिस से इस का सही फायदा औरतों को नहीं मिल पा रहा है.

बहुत पुरानी कहावत के हिसाब से बच्चा जनने को औरत का दूसरा जन्म माना जाता है. यह बात काफी हद तक ठीक भी है. बहुत सारी मैडिकल सेवाओं के बाद भी बच्चा जनने के दौरान देश में हर घंटे 5 औरतों की जान चली जाती है.

देश में मृत्यु दर का आंकड़ा एक लाख बच्चा जनने के मामलों पर महज 174 का है. स्वास्थ्य सेवाओं में तरक्की के बाद भी यह हालत चिंताजनक है.

विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी डब्ल्यूएचओ ने साल 2016 की रिपोर्ट में खुलासा किया है कि भारत के गांवदेहात में हालात ज्यादा खराब हैं. बहुत सारी कोशिशों के बाद भी अभी अस्पतालों में सौ फीसदी प्रसव नहीं होते हैं. इस के लिए सब से ज्यादा जिम्मेदार लोगों का जागरूक न होना और स्वास्थ्य सेवाओं का बदहाल होना है.

पूरी दुनिया में बच्चा जनने के दौरान होने वाली कुल मौतों में से 17 फीसदी मौतें भारत में होती हैं.

भारत का हाल इंडोनेशिया जैसे देशों से भी खराब है. भारत में जहां बच्चा जनने के दौरान हर साल 174 औरतों की जान चली जाती है, वहीं इडोनेशिया में यह तादाद 126 की है.

भारत की खराब हालत के लिए गांवदेहात के इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं का बुरा हाल होना है.

देश की स्वास्थ्य सेवाओं के हालात पर नजर डालें, तो पता चलता है कि गांवदेहात के इलाकों में काम कर रहे सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पर बच्चा जनने की मूलभूत सुविधाएं तक नहीं हैं. ऐसे में कई बार सड़क और अस्पताल के बाहर ही बच्चा पैदा होने की घटनाएं भी पता चलती रहती हैं.

काम नहीं आ रही योजना

बच्चा जनने के दौरान होने वाली मौतों को रोकने और जच्चा बच्चा की सेहत का ध्यान रखने के लिए साल 2005 में ‘जननी सुरक्षा योजना’ शुरू की गई.

इस योजना में गरीबी रेखा से नीचे रहने वाली औरतों का खास ख्याल रखने की कोशिश शुरू हुई. इस योजना के तहत अस्पताल में बच्चा जनने वाली औरतों को एक हजार रुपया दिया जाने लगा. इस योजना में यह तय किया गया कि बच्चा अस्पताल में पैदा हो या ट्रेनिंग दाई द्वारा ही कराया जाए.

इस योजना के फायदे उन तक पहुंचाने के लिए महिला स्वास्थ्यकर्मी ‘आशा बहू’ को तैयार किया गया. ‘जननी सुरक्षा योजना’ का लाभ लेने के लिए बच्चा पैदा कराने वाली औरत को अस्पताल में अपना रजिस्ट्रेशन कराना पड़ता है. इस के बाद भी अस्पतालों में सौ फीसदी बच्चे पैदा नहीं हो रहे हैं. इस वजह से ही बच्चा जनने के दौरान होने वाली मौतों को रोका नहीं जा सका है.

आंकड़े बताते हैं कि 80 फीसदी अस्पतालों में तय मानक से दोगुना मरीज होते हैं. 62 फीसदी सरकारी अस्पतालों में महिला डाक्टर यानी गाइनिकोलौजिस्ट नहीं होती हैं.

30 फीसदी जिलों में एएनएम यानी आरर्जिलरी नर्स मिडवाइफ ही महिला मरीजों को देखती हैं, इन पर भी दोगुना मरीजों को देखने का भार होता है.

22 फीसदी स्वास्थ्य केंद्र ऐसे होते हैं, जहां पर एएनएम तक नहीं मिलतीं. देशभर के सरकारी अस्पतालों में 3429 महिला डाक्टर होनी चाहिए, पर केवल 1296 पदों पर ही महिला डाक्टर तैनात हैं.

बदहाल स्वास्थ्य केंद्र

जमीनी सचाई इन आंकड़ों से भी कहीं ज्यादा भयावह है. किसी भी स्वास्थ्य केंद्र पर बच्चा जनने की सुविधाएं ही नहीं हैं. सामान्य प्रसव तो किसी तरह से हो भी जाता है, पर हालत खराब होते ही देखभाल करने का सिस्टम नहीं है. इस के लिए मरीज को कम से कम जिला लैवल के अस्पताल जाना होता है. कई बार आनेजाने के दौरान ही मौत हो जाती है. जिला अस्पताल पहुंचने के पहले ही कई बार ऐसे हालात हो जाते हैं कि औरत की मौत हो जाती है.

तमाम स्वास्थ्य केंद्रों पर बिजली की रोशनी तक का सही इंतजाम नहीं है. बड़े शहरों के गांवदेहात इलाकों में बने स्वास्थ्य केंद्रों पर दिन के समय में भले ही डाक्टर मिल जाए, पर किसी भी तरह की इमर्जैंसी में डाक्टर उपलब्ध नहीं होते हैं, जिस के चलते भी मरीजों को मजबूरन झोलाछाप डाक्टरों के पास जाना पड़ता है.

प्राइवेट अस्पतालों में बच्चा पैदा कराने का खर्च इतना महंगा हो गया है कि आम आदमी वहां जाना नहीं चाहता. गरीब तबका तो वहां जाने की सोच भी नहीं सकता है.

कई स्वास्थ्य केंद्रों पर काम करने वाले वार्ड बौय या सफाई मुलाजिम ही कुछ पैसों के लालच में बच्चा पैदा कराने का जोखिम उठाते हैं. इस में कई बार औरत की जान चली जाती है.

बिना जानकार लोगों के बच्चा पैदा कराने का असर केवल औरत पर ही नहीं पड़ता, बल्कि होने वाले बच्चे की जान को भी जोखिम होता है. इस दौरान सही तरह से बच्चे को अगर पकड़ा न जाए, तो उस के सिर की नस दब जाती है. कई बार बच्चे के मुंह में ऐसा तरल पदार्थ पहुंच जाता है, जिस से बच्चे को बेहद नुकसान हो जाता है.

कई मामलों में औरत बच जाती है, तो बच्चे की मौत हो जाती है. महफूज तरीके से बच्चा पैदा न हो पाने के चलते ही देश में नवजात शिशुओं की मृत्यु दर भी दूसरे देशों के मुकाबले ज्यादा है.

बिगड़ जाते हैं रिश्ते

अस्पतालों पर मरीजों के बढ़ते बोझ का एक बुरा असर यह भी पड़ता है कि मरीज और डाक्टर के बीच संबंध तनाव भरे हो जाते हैं. कई बार मरीज के परिवार वाले अस्पताल में तोड़फोड़ तक करने लगते हैं. तोड़फोड़ की घटनाएं केवल प्राइवेट अस्पतालों में होती हैं, जहां इलाज के बाद जब मरीज की मौत हो जाती है और अस्पताल में इलाज का खर्च मांगा जाने लगता है, तो मरीज के परिवार वाले तोड़फोड़ करते हैं.

प्राइवेट अस्पतालों में बच्चा पैदा कराने का खर्च सामान्य हालत में 50 हजार से ऊपर का आने लगा है. अगर जच्चा बच्चा को कोई परेशानी हो जाए, तो यह खर्च एक लाख रुपए से ऊपर तक पहुंच जाता है. ऐसे में गरीब आदमी प्राइवेट अस्पताल की तरफ रुख करने की सोच भी नहीं सकता है.

सरकारी अस्पतालों में डाक्टरों की कमी और मरीजों की ज्यादा तादाद होने से डाक्टर के पास इतना भी समय नहीं होता है कि वह मरीज की सही तरह से काउंसलिंग कर सके. ऐसे में मरीज को पता ही नहीं चलता कि गर्भावस्था में उसे अपना किस तरह से ध्यान रखना चाहिए और खानपान किस तरह का करना है, जिस से बच्चा जनने में आसानी हो और उसे किसी अनहोनी का सामना न करना पड़े.

गर्भावस्था में होने वाली देखभाल जब सही तरह से नहीं होती, तो उस का बुरा असर बच्चा जनने के समय पड़ता है, जो खतरनाक हो जाता है.

शिशु जन्म के बाद 24 घंटे के अंदर होने वाले 5 सौ मिलीलिटर से एक हजार मिलीलिटर से ज्यादा खून बहने को पोस्टपार्टम हैमरेज यानी पीपीएच कहते हैं. यह बच्चा जनने के दौरान होने वाली मौतों की सब से बड़ी वजह होती है.

डाक्टर मानते हैं कि इस के अलावा भी कई परेशानियां ऐसी हो सकती हैं, जो जानलेवा हैं. जानकार डाक्टर के पास न जाने से ऐसी परेशानियां बढ़ जाती हैं, जिस से जच्चा और बच्चा दोनों को नुकसान हो जाता है. जिला अस्पताल के दूर होने से बच्चा जनने के लिए झोलाछाप डाक्टरों के पास जाना मजबूरी होती है. मरीज का वहां जाना जानलेवा हो जाता है.

पहले ज्यादातर गांवों में दाइयां होती थीं या अनुभवी औरतें होती थीं, जिन की मदद से घर में ही बच्चा पैदा हो जाता था. अब गांवों में ये लोग नहीं हैं, जिस से घरों में बच्चा पैदा कराना खतरनाक हो गया है.

इस सब के बावजूद सरकारी अस्पतालों में बच्चा पैदा कराना मां और बच्चे के लिए सुरक्षित माना जाता है, क्योंकि वहां के डाक्टर और नर्स अपने काम को बखूबी जानते हैं और उन की कोशिश रहती है कि जच्चाबच्चा दोनों को कोई नुकसान न पहुंचे.

प्रसव से अहम होता है गर्भपात

पेट से होने के बाद भी कई बार परेशानी होने से बच्चा गिर जाता है. आमतौर पर बच्चा गिर जाने के बाद मरीज को डाक्टर के पास नहीं ले जाया जाता. इस से गर्भ के कुछ टुकड़े बच्चेदानी में रह जाते हैं, जो माहवारी को गड़बड़ करते हैं और बच्चेदानी में इंफैक्शन की वजहें बनते हैं. इस का कई बार ऐसा असर पड़ता है कि औरत बच्चा पैदा करने के काबिल ही नहीं रह जाती. ऐसे में डाक्टर से मिलें और जरूरी जांच कराएं. इस से बच्चेदानी में होने वाली परेशानी से बचा जा सकता है.

बच्चेदानी में इंफैक्शन होने से अंडवाहिनियों पर असर पड़ता है. वह गर्भ के लिए सही अंडे नहीं बना पाती, जिस से भविष्य में बच्चा ठहरने की उम्मीदें कम हो जाती हैं. बांझपन से बचने के लिए जरूरी है कि प्रसव ही नहीं, गर्भपात भी अच्छे अस्पताल और जानकार डाक्टर की देखरेख में कराएं.

आमतौर पर लोग सोचते हैं कि जब बच्चा गिर गया, तो डाक्टर के पास जाने की क्या जरूरत है? इस सोच से बाहर निकल कर अच्छी सेहत के लिए सुरक्षित गर्भपात कराना भी बेहद जरूरी होता है.

भारी पड़ता मजदूरी करना

पेट में बच्चा होने के दौरान भारी बोझ उठाना, ज्यादा मेहनत का काम करना, ऊंचाई पर चढ़ना उतरना और लंबे समय तक खड़े रहना मुसीबत की वजह बन जाता है. अगर सही तरह से खानपान न किया जाए, तो हालात और भी ज्यादा खराब हो सकते हैं.

गांवदेहात के इलाकों में अभी भी ज्यादातर औरतें पेट से होने के दौरान कामकाज और मजदूरी करती रहती हैं, जिस से इस तरह की परेशानियां बढ़ जाती हैं. इस दौरान जब शरीर को सही भोजन नहीं मिलता, तो बच्चे के विकास पर भी बुरा असर पड़ता है. कई बार बच्चे का वजन कम हो जाता है, जिस से बच्चा पैदा होने के पहले ही पेट गिर जाता है या समय से पहले ही बच्चा हो जाता है. दोनों ही हालात मां और बच्चे के लिए खतरनाक होते हैं.

सही तरह से भोजन न करने से मां के शरीर में खून की कमी हो जाती है, जिसे एनीमिया कहते हैं. इस से बच्चा जनने के समय परेशानी आती है. बच्चा जनने के दौरान मां सही तरह से दबाव नहीं लगा पाती, जिस से कई बार बच्चा अंग के रास्ते में ही फंसा रह जाता है और उस की मौत हो जाती है.

जिन जगहों पर आपरेशन की सुविधाएं होती हैं, वहां ऐसे हालात से बचने के लिए आपरेशन मुमकिन हो जाता है. आपरेशन के लिए भी मां के शरीर में सही मात्रा में खून होना जरूरी होता है, नहीं तो उस की जान को खतरा हो जाता है.

सैक्स संबंधों में बरतें सावधानी

पेट से होने के दौरान सैक्स संबंध बनाना वैसे खतरनाक नहीं होता, पर इस में सावधानी बरतना जरूरी होता है. पेट से होने के शुरुआती 2 महीने और आखिर का एक महीना सैक्स के लिए पूरी तरह से वर्जित होता है.

औरत को कोई परेशानी न हो, तो सावधानी और सहजता के साथ सैक्स संबंध बनाने में परेशानी नहीं आती. उतावलेपन और जोर जबरदस्ती से बनाए गए सैक्स संबंध से नुकसान हो सकता है.

गांवदेहात के इलाकों में कई बार ऐसी घटनाएं दिखती हैं, जहां पर नशे में पति अपनी पत्नी के साथ सैक्स करता है. उस समय उसे इस बात का एहसास तक नहीं होता कि यह पत्नी और उस के होने वाले बच्चे के लिए घातक हो सकता है.

सैक्स के समय जब औरत को दर्द होता है, तो पति को अपनी मर्दानगी पर गुमान होने लगता है, जो जच्चाबच्चा दोनों पर भारी पड़ता है.

रेखा और जितेंद्र के साथ भी ऐसा ही हुआ. रेखा को 7वां महीना चल रहा था. जितेंद्र ने सैक्स करने की जिद पकड़ ली. रेखा ने उसे सावधानी से सैक्स करने की रजामंदी दी.

शुरुआत में कुछ देर तक तो जितेंद्र ने सब्र से काम लिया, पर आखिरी पलों में वह बहक गया. उस ने पूरे जोश से संबंध बनाना शुरू कर दिया. रेखा के दर्द से उसे और भी जोश आने लगा. उस के बाद रेखा को पेटदर्द शुरू हो गया. उस के अस्पताल पहुंचने से पहले ही ज्यादा खून बहने लगा. हालत खराब होने से शरीर में खून की कमी हो गई और पेट में पल रहे बच्चे की मौत हो गई.

दरअसल, पेट से होने के बाद 9 वें महीने का समय ऐसा होता है, जब सैक्स के लिए औरत पूरी तरह से तैयार नहीं होती. पति के  लिए यह 9वें महीने का समय बिना सैक्स के गुजारना मुश्किल हो जाता है. ऐसे में कई बार सैक्स के लिए मन करने लगता है, जो औरत के लिए खतरा बन जाता है.

गांवदेहात में डाक्टरी सलाह मुहैया नहीं होती, जिस से सैक्स संबध के दौरान सावधानी नहीं बरती जाती और खतरा हो जाता है. इस दौरान सैक्स संबंध बनाते समय कंडोम का इस्तेमाल जरूरी होता है. ऐसा न करने से सैक्स से जुड़ी बीमारियां होने का डर रहता है, जो औरत ही नहीं, बल्कि पेट में पल रहे बच्चे के लिए भी हानिकारक होता है.

टीके लगवाना है जरूरी

बच्चा पेट में आने की शुरुआत से ले कर पैदा होने के बाद तक कई तरह की बीमारियों से लड़ने के लिए टीके लगवाना बेहद जरूरी होता है. टीके लगवाने से न केवल मां की सेहत बेहतर होती है, बल्कि बच्चे को भी बीमारियों से लड़ने की ताकत मिलती है.

सरकारी अस्पतालों में टीके लगवाने का मुफ्त इंतजाम होता है. टीके लगवाने के साथसाथ कई तरह की जांच कराना भी जरूरी होता है. इस से शरीर में होने वाली परेशानियों का पता चल जाता है और उस बीमारी का इलाज हो जाता है.

कई बार लोग टीका लगवाने और जांच से बचते हैं, जो बाद में परेशानी का सबक बन जाते हैं. हर जिले के सरकारी अस्पताल में ये काम मुफ्त ही हो जाते हैं. जरूरत इस बात की है कि महफूज तरीके से बच्चा जनने की अहमियत को समझें और खुद पहल कर के सरकारी अस्पताल तक जाएं. सरकार ने सुविधाएं दे रखी हैं, जिन को अपना हक समझ कर इस्तेमाल करें.

पति के बर्थडे पर पत्नी ने दिया मौत का तोहफा

मूल रूप से चमौली, उत्तराखंड का रहने वाला यशपाल मध्य प्रदेश के पीथमपुर इलाके में बनी सिप्ला दवा कंपनी में काम करता था. यशपाल ने पूजा से पहले प्यार किया, फिर घर वालों के भारी विरोध के बाद उस ने पूजा से शादी की थी. यशपाल और पूजा एक ही कालेज में पढ़ते थे. इस दौरान दोनों में अच्छी दोस्ती थी. एक दिन पूजा अचानक गश खा कर गिर पड़ी. डाक्टरों ने जांच कर पूजा के दिल में दिक्कत बताई. डाक्टरों के मुताबिक, उस के एक वौल्व में छेद था. जो ठीक तो हो सकता था, पर इस के लिए लंबा समय और महंगी दवा की जरूरत थी. पूजा की बीमारी जान कर यशपाल बहुत दुखी हुआ. पूजा की बीमारी जानने के बावजूद यशपाल ने उस से शादी का प्रपोजल रखा, जिसे पूजा ने तुरंत मान लिया. इस के बाद उन दोनों की प्रेम कहानी की चर्चा पूरे कालेज में होने लगी.

साल 2011 में यशपाल की नौकरी सिप्ला दवा कंपनी, इंदौर में लग गई. नौकरी के बाद जब शादी की बात आई, तो यशपाल के घर वाले लड़की देखने लगे. यशपाल ने कहा कि वह अपनी गर्लफ्रैंड पूजा से ही शादी करेगा.

यशपाल ने घर वालों से पूजा के दिल की बीमारी की बात नहीं छिपाई. पूजा की बीमारी जान कर घर वालों ने यशपाल को काफी समझाने की कोशिश की, पर उस ने किसी की एक न सुनी.

आखिरकार यशपाल की जिद के आगे घर वालों को झुकना पड़ा. साल 2012 में यशपाल और पूजा की शादी बड़े धूमधाम से हो गई. शादी के बाद यशपाल पूजा को ले कर इंदौर आ गया. वह इंदौर के एबी रोड पर राऊ इलाके में ओमप्रकाश चौधरी के मकान में किराए पर रहने लगा.

इंदौर का राऊ इलाका धूल, धुआं और शोरशराबे वाला इलाका है. पूजा को दिल की बीमारी थी, इसलिए प्रदूषण की वजह से उसे सांस लेने में तकलीफ होने लगी. उसे दिखाने पर डाक्टर ने कहा कि पूजा को अगर सेहतमंद देखना चाहते हो, तो उसे किसी हिल स्टेशन पर ले जाओ.

यशपाल पहाड़ी इलाके का रहने वाला था. उस ने देहरादून में अपने मामा के घर के पास ही एक मकान किराए पर ले कर पूजा को वहां शिफ्ट कर दिया. पूजा देहरादून में अकेले रहने लगी. इधर इंदौर में यशपाल पूजा के इलाज के लिए पैसे जुटाने में लग गया. वह हर महीने पूजा से मिलने देहरादून आता था. डाक्टरी चैकअप के बाद उस की दवा वगैरह का इंतजाम कर के फिर इंदौर लौट आता. यह सिलसिला पिछले 3 सालों से चल रहा था.

यशपाल पूजा को खुश देखना चाहता था. पूजा ने भी यशपाल को प्यार देने में कोई कमी नहीं रखी. टाइमपास करने के लिए पूजा अपना समय इंटरनैट पर गुजारने लगी. उस ने फेसबुक पर अंजलि के नाम से अकाउंट खोल लिया.

बस, यहीं से उस का मन बहकने लगा. वह फेसबुक पर नएनए लड़कों से चैटिंग करने लगी. पूजा जिन लड़कों से चैटिंग करती थी, उन में कोटा, राजस्थान का रहने वाला करन सिंह सिद्धू भी था. धीरेधीरे उन की फेसबुक की दोस्ती प्यार में बदल गई. इस के बाद दोनों मोबाइल फोन पर घंटों बातें करने लगे. जब करन को यह पता चला कि पूजा देहरादून में अकेली रहती है, तो उस ने मिलने की इच्छा जाहिर की.

पूजा ने तुरंत करन सिंह को अपना पता दे दिया. पता मिलते ही वह देहरादून पहुंच गया. करन सिंह रात में पूजा के घर पर ही रुका. दोनों में उसी रात सैक्स संबंध बन गए. इस के बाद तो करन सिंह अकसर उस से मिलने कोटा से देहरादून पहुंचने लगा.

पूजा करन सिंह को दिलोजान से इतना चाहने लगी कि अब उसे यशपाल का प्यार फीका लगने लगा था. वह यशपाल को छोड़ कर करन सिंह के साथ घर बसाने की सोचने लगी.

करन सिंह भी पूजा के प्यार में पागल था. उसे पूजा के रूप में सोने के अंडे देने वाली मुरगी मिल गई थी. पूजा उसे प्यार और सैक्स के अलावा पैसा भी देती थी. उधर यशपाल पूजा की ठीक से देखभाल नहीं कर पा रहा था. इस का उसे मलाल था. इस के लिए उस ने इंदौर की दवा कंपनी सिप्ला को छोड़ने का फैसला लिया. यही फैसला उस के लिए जन्मदिन पर मौत का तोहफा साबित हुआ.

पूजा के पास वह रह सके और उस की देखभाल कर सके, इस के लिए यशपाल ने देहरादून की दवा कंपनी में नौकरी के लिए अर्जी दी.चूंकि यशपाल को सिप्ला जैसी अच्छी दवा कंपनी में काम करने का तजरबा था. सो, उसे देहरादून में एक दवा कंपनी में नौकरी मिल गई. उसे 1 जुलाई को कंपनी जौइन करनी थी.

यह खुशखबरी उस ने पूजा को सुनाई, तो वह खुश होने के बजाय दुखी हो गई.  जाहिर सी बात थी, यशपाल के देहरादून आने के बाद करन सिंह के साथ ऐयाशी कर पाना उस के लिए मुश्किल हो जाएगा. उस ने तुरंत करन सिंह को देहरादून बुलाया. पूजा ने उस से कहा कि अगर वह आगे भी उस से जिस्मानी संबंध बनाए रखना चाहता है, तो यशपाल के देहरादून पहुंचने से पहले ही उसे ठिकाने लगाना होगा.

पहले तो यह सुन कर करन सिंह चौंका, पर जब पूजा ने यशपाल को रास्ते से हटाने का प्लान बताया, तो उसे सुन कर करन सिंह राजी हो गया. 20 जून की सुबह इंदौर पुलिस ने यशपाल को अपने कमरे में मरा पाए जाने की बात बताई. यशपाल की मौत की खबर मिलते ही उस का भाई हरी सिंह, ताऊ आनंद सिंह, जीजा व दूसरे रिश्तेदार इंदौर पहुंच गए.

पूजा को भी यशपाल की मौत की सूचना मिल चुकी थी. वह भी इंदौर पहुंच गई. उस का रोतेरोते बुरा हाल था. पूजा की हालत देख कर यशपाल के घर वाले आंसू रोक न सके.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट आ जाने के बाद यशपाल की लाश उस के परिवार वालों को दे दी गई. लेकिन अंतिम संस्कार से लौटते ही पुलिस ने पूजा को यशपाल की हत्या के आरोप में हिरासत में ले लिया. यशपाल के घर वालों ने इस का विरोध किया. पूजा भी इस बात से इनकार करती रही.

शाम तक पुलिस टीम करन सिंह को राजस्थान के हनुमानगढ़ से गिरफ्तार कर उसे इंदौर ले कर पहुंची. करन सिंह को अपने सामने देख पूजा टूट गई.

पूजा ने बताया कि यशपाल से दूर रहने के बाद वह करन सिंह से प्यार करने लगी थी. वह यशपाल से अलग हो कर करन सिंह के साथ घर बसाना चाहती थी. जब यशपाल ने फोन पर उसे बताया कि वह देहरादून की कंपनी में 1 जुलाई से जौइन करने वाला है, तो वह चौंक गई. वह हर हाल में करन सिंह को पाना चाहती थी, इसलिए उस ने यशपाल से छुटकारा पाने का प्लान बना लिया.

20 जून को यशपाल का बर्थडे था. प्लान के मुताबिक, पूजा ने यशपाल से फोन पर कहा कि वह इस बार उस के बर्थडे पर एक खास तोहफा देना चाहती है. यह तोहफा उस का फेसबुक फ्रैंड करन सिंह 19 तारीख की रात को ले कर पहुंच जाएगा. यशपाल ने पूजा से बारबार पूछा, वह तोहफे में क्या दे रही है, यह बता दे. पूजा ने सस्पैंस है कह कर उसे चुप करा दिया.

यशपाल की पत्नी पूजा उसे पहली बार उस के बर्थडे पर तोहफा भेजने वाली थी. वह तोहफे में क्या देने वाली है, इसी सोच में वह कई दिनों तक खोया रहा. वह 19 जून की रात को बेसब्री से इंतजार करने लगा.

यशपाल ने करन सिंह के लिए अपने ही घर पर एक छोटी सी पार्टी रखी थी. 19 तारीख की रात को करीब 10 बजे करन सिंह यशपाल के घर पर पहुंचा. यशपाल ने उस का जोरदार स्वागत किया. दोनों बैठ कर देर रात तक शराब पीते रहे.

करन सिंह दिखावे के लिए शराब लेता रहा. उस ने यशपाल को जम कर शराब पिलाई. नशा होने की वजह से यशपाल बेहोश हो कर बिस्तर पर लुढ़क गया. मौका पा कर करन सिंह ने यशपाल के मुंह में रूई ठूंस दी, ताकि उस की आवाज न निकल सके. इस के बाद गला दबा कर उस की हत्या कर दी और बाहर से दरवाजे पर ताला लगा कर वहां से चला गया.

लेकिन करन सिंह और पूजा का एकसाथ रहने का प्लान धरा रह गया और वे पुलिस के हत्थे चढ़ गए.

ये है असली ‘शोले’, शौहर ही बन गया ‘गब्बर’

मनोज ने बांहों में जोर से कस कर अपनी बीवी फूलकुमारी को जकड़ लिया और भाभी सविता देवी ने उस के जिस्म पर गरम सलाखों से मारना शुरू कर दिया. बीचबीच में मनोज का बड़ा भाई सरोज उसे उकसाता रहा. फूलकुमारी रोतीचिल्लाती, तो उसे फिल्म ‘शोले’ की हीरोइन बसंती की तरह नाचने के लिए कहा जाता. जब वह नाचने से इनकार करती, तो गरम सलाखों से दागा जाता. दर्द से तड़पती फूलकुमारी नाचने की कोशिश करती, पर गश खा कर जमीन पर गिर पड़ती थी. चेहरे पर पानी डाल कर उसे होश में लाया जाता और उस के बाद फिर से उसे नाचने का फरमान सुना दिया जाता. फिल्म ‘शोले’ के खतरनाक विलेन गब्बर सिंह की हैवानियत को भी फूलकुमारी के पति और ससुराल वालों ने मात दे दी थी.

फूलकुमारी के बेटी को जन्म देने के साथ ही परेशानियों का सिलसिला शुरू हो गया था और उस की शादीशुदा और पारिवारिक जिंदगी लगातार खराब होती गई थी.

बेटी को जनने वाली फूलकुमारी पर उस के सास, ससुर, भैसुर, गोतनी और उस के पति का जोरजुल्म शुरू हो गया. फूलकुमारी और उस के मांबाप को परेशान करने के लिए मनोज ने यह रट लगानी शुरू कर दी कि उसे दहेज में मोटरसाइकिल नहीं मिली है. वह फूलकुमारी पर दबाव बनाने लगा कि वह अपने मांबाप से मोटरसाइकिल दिलाए, नहीं तो तलाक के लिए तैयार हो जाए.

मनोज की इस कारिस्तानी में गांव का ही रामानंद केवट भी बढ़चढ़ कर मदद करने लगा. रामानंद केवट पर औरतों को सताने के पहले से कई मुकदमे दर्ज हैं. उस ने अपने बड़ी बहू को इस कदर तंग किया था कि उस ने फांसी लगा कर अपनी जिंदगी ही खत्म कर ली थी. वह छोटी बहू को भी डराधमका कर रखता है और कहीं बाहर आनेजाने भी नहीं देता है.

फूलकुमारी देवी बताती है कि मनोज ने मायके वालों से फोन पर बात करने पर भी पाबंदी लगा दी. 4 जून, 2016 को उसे घर के एक कमरे में धकेल कर दरवाजा बंद कर दिया गया और सास मुन्नी देवी पहरेदार के रूप में बाहर डंडा ले कर बैठी रहती थीं.

24 मई, 2014 को बिहार की राजधानी पटना के दीघा थाने की बिंद टोली में काफी धूमधाम से मनोज और फूलकुमारी की शादी हुई थी. भोजपुर जिले के आरा शहर के रघु टोला में रहने वाले किसान रामदयाल केवट और मुन्नी देवी के बेटे मनोज के साथ फूलकुमारी आरा आ गई.

इस बीच मनोज के बड़े भाई धनोज की बीवी रिंकू ने 6 मार्च, 2015 को बेटी को जन्म दिया. घर में खुशियां मनाई गईं और जम कर पार्टी हुई. उस के बाद जनवरी, 2016 को धनोज और रिंकू मुंबई चले गए.

धनोज मुंबई में गरम मसाले का कारोबार करता है. उस के बाद मनोज और फूलकुमारी देवी के घर भी 27 अक्तूबर, 2015 को बेटी का जन्म हुआ. फूलकुमारी के बेटी होने के बाद पूरे घर में कुहराम मच गया.

जब फूलकुमारी के पिता रवींद्र महतो को अपनी बेटी की दर्दभरी कहानी का पता चला, तो वे बेटी की ससुराल आरा पहुंचे. उन्हें बेटी से नहीं मिलने दिया गया और बेइज्जत कर के घर से भगा दिया गया. उस के बाद रवींद्र महतो महिला थाने पहुंचे और इंचार्ज पूनम कुमारी से मिल कर पूरी घटना की जानकारी दी.

रवींद्र ने जब एफआईआर दर्ज करने की गुजारिश की, तो थाना इंचार्ज ने उन से कहा कि आप लोग पटना के दीघा थाना इलाके में रहते हैं, इसलिए आरा में एफआईआर दर्ज करने से आप लोगों को बारबार पटना से आरा आनेजाने में काफी पैसा और समय बरबाद होगा. आरा के सभी मामले पटना में ही रैफर कर दिए जाते हैं, इसलिए दीघा थाने जा कर एफआईआर दर्ज कराएं, तो अच्छा रहेगा.

थानाध्यक्ष पूनम कुमारी ने कहा कि दीघा थाने के थानाध्यक्ष के पास जा कर मामला दर्ज कराएं. पूनम कुमारी ने यह भी भरोसा दिलाया कि अगर दीघा थानाध्यक्ष मामला दर्ज नहीं करेंगे, तो उन से उन की बात करा देना.

महिला थाने से निराशा हाथ लगने के बाद रवींद्र महतो पटना के दीघा थाने गए. वहां पर पुलिस वालों को बेटी के साथ हुए अत्याचार की कहानी सुनाई और एफआईआर दर्ज करने की गुहार लगाई.

रवींद्र की बातों को सुनने के बाद पुलिस वालों ने साफतौर पर कहा कि यह मामला तो भोजपुर जिले के आरा शहर का है, इसलिए यहां तो किसी भी हालत में एफआईआर दर्ज नहीं होगी. आरा में जा कर ही मामला दर्ज कराएं.

इस के बाद फूलकुमारी के पिता रवींद्र महतो थाने में ही बैठ कर रोने लगे और बेटी को इंसाफ दिलाने की रट लगाने लगे. इस के बाद भी पुलिस वालों ने उन की मदद नहीं की.

पटना पुलिस हैडक्वार्टर के सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक, 9 जून, 2016 को दोपहर में महिला थाने की थानाध्यक्ष पूनम कुमारी ने रिपोर्ट में कहा था कि घायल के परिजन खुद ही इंजरी रिपोर्ट और एफआईआर दर्ज नहीं कराना चाह रहे थे. उन का कहना था कि पटना में एफआईआर दर्ज करेंगे.

इस से यह साफ हो जाता है कि महिला थानों में भी औरतों के मामले को ले कर किस कदर लापरवाही बरती जाती है.

युवाओं को लुभाता पुराने गीतों का नया वर्जन

साल की शुरुआत में ही डीजे शेजवुड ने सदाबहार गाने ‘परदे में रहने दो’ का रीमिक्स वर्जन पार्टी लवर यूथ के लिए लौंच कर दिया है और इसे जम कर डाउनलोड भी किया गया. इस के अलावा हनी सिंह भी हंसराज हंस के गानों को रीमिक्स कर अपना कमबैक कर चुके हैं. आमतौर पर नई पीढ़ी पुराने गीतों को पसंद नहीं करती. उन गीतों का स्लो म्यूजिक उन्हें पसंद नहीं आता. पर जब वही गीत नए अंदाज में, नए धमाकेदार म्यूजिक के साथ, नई आवाज में सुनते हैं तो युवकयुवतियां इन गीतों के साथसाथ गुनगुनाते नजर आते हैं. वैसे देखा जाए तो पुराने गीतों का कोई मुकाबला नहीं. वे गीत हमेशा से सदाबहार हैं और रहेंगे. पुराने गीतों के सुर व बोल ही अलग थे.

उन गीतों में भावों का समावेश होता था. ऐसा लगता है जैसे गीतकार ने अपनी सारी भावनाएं उस गीत के शब्दों को माला के मोती की तरह पिरो दिया है. उन गीतों में जो शब्द इस्तेमाल हुए हैं, ऐसा लगता है जैसे हर एक शब्द संगीत से भरपूर है. यह बात और है कि उस वक्त का म्यूजिक इतनी अच्छी क्वालिटी का नहीं था. कभीकभी तो वह म्यूजिक कर्कश लगने लगता है. वर्तमान में भारत में म्यूजिक में नएनए प्रयोग हो रहे हैं जिस से हमारा म्यूजिक दिनोंदिन निखरता जा रहा है. सब से पहले आरडी बर्मन ने शुरुआत की थी. उन्होंने अपने पिता एसडी बर्मन की छाया से बाहर निकल कर सलिल चौधरी, नौशाद, कल्याणजीआनंदजी और शंकरजयकिशन जैसे पुराने संगीतकारों के संगीत को नया सुरताल दिया. वहीं गुलजार ने शब्दों को अपने एक अलग ही स्वरूप में ढाल कर गीतों की पुरानी परंपरा को बदला.

भूले हुए गीत फिर होंठों पर कई पुराने गीत ऐसे हैं जिन्हें भुला दिया गया है, जैसे ‘तीसरी कसम’ फिल्म का गीत ‘चलत मुसाफिर मोह लिया रे…’ की तर्ज पर जब नए फ्यूजन में ‘बद्रीनाथ की दुल्हनिया’ का गीत बनाया गया तो नई पीढ़ी को बहुत पसंद आया. इस के अलावा ‘‘तम्मातम्मा…’ के नए सुरसंगीत की लयताल के साथ सभी एक बार फिर झूम उठे.

फिल्म ‘रईस’ में सनी लियोनी पर फिल्माया गया गाना ‘लैला मैं लैला…’ ने जीनत अमान की कातिल अदाओं की याद दिला दी. श्रद्धा कपूर और आदित्य राय कपूर पर फिल्माया गया ‘बांबे’ फिल्म का गाना ‘हम्माहम्मा…’ भी हिट लिस्ट में आ गया.

इसी तरह ‘ऐसे न मुझे तुम देखो…’, ‘पलपल दिल के पास…’ जैसे गीत, जो अपने जमाने के हिट गीतों में से हैं, नए संगीत का नया जामा पहन कर फिर हिट हो गए. ‘फोर्स 2’ में सोनाक्षी सिन्हा और जौन अब्राहम पर ‘मिस्टर इंडिया’ का गाना ‘काटे नहीं कटते…’ का रीमिक्स बना. ‘त्रिदेव’ फिल्म का गीत ‘ओएओए…’ भी हिट रीमिक्स की लिस्ट में रहा. इस में हर्ज ही क्या है

गीतकार पंछी जालौनवी कहते हैं कि अगर पुराने अच्छे गानों से युवा पीढ़ी को रूबरू कराया जा रहा है तो इस में बुरा क्या है? इसे लोकप्रिय पुराने गानों में नई संजीवनी भरने की कवायद के तौर पर देखना ज्यादा बेहतर होगा. अगर रीमिक्स के रूप में नई पीढ़ी को पुराने गीतों का नया वर्जन पसंद आ रहा है, तो रीमिक्स बनाने में हर्ज ही क्या है? ‘दीवार’ फिल्म का गीत ‘कह दूं तुम्हें या चुप रहूं…’ जैसे गीत को यदि नया रूप दे कर इमरान हाशमी और ईशा गुप्ता पर फिल्माया न गया होता तो शायद ही कभी नई पीढ़ी यह गाना सुन पाती, क्योंकि आज की पीढ़ी नया और नया चाहती है, चाहे पुराने को नया बनाया गया हो.

नुसरत फतेह अली खान का गाया गीत ‘मेरे रश्के कमर…’ आज नए वर्जन में कुछ ज्यादा ही सुरीला लगता है. जो लोग नुसरत अली और उन के गाए गीतों को भूल चुके थे, उन के दिल में भी एक बार फिर नुसरत की शानदार आवाज में गाए हुए गीतों का जादू जाग उठा. क्लासिक गीतों से रूबरू होते युवा

यश चोपड़ा की 1973 में रिलीज हुई फिल्म ‘दाग’ का गीत ‘नी मैं यार मनाना नी…’ पर एक म्यूजिक वीडियो बनाया गया है जिस में वाणी कपूर थिरकती नजर आती हैं. इस गाने का रीमिक्स वर्जन यशिता शर्मा की आवाज में है. वैसे लताजी अपने गीतों के साथ छेड़छाड़ पसंद नहीं करतीं और उन्होंने हमेशा से रीमिक्स का विरोध ही किया है पर यही गीत पुराने म्यूजिक के साथ यदि युवाओं को सुनाया जाए तो शायद उन्हें पसंद नहीं आएगा. पुराने क्लासिक गीतों का नया वर्जन बनाने से युवा पीढ़ी कम से कम क्लासिक गीतो से रूबरू तो हो रही है. पुराने कालजयी गीत जब नए अंदाज में, नई आवाज में, नए संगीत के साथ पेश किए जाते हैं तो ये गीत बरबस ही युवाओं को लुभाते हैं. और तो और पुरानी पीढ़ी को भी अपने जमाने के गीत फिर से याद आ जाते हैं और इन गीतों को सुन कर उन की भी पुरानी यादें ताजा हो जाती हैं. क्लासिक में नए रैप और नए संगीत का फ्यूजन युवाओं को बहुत पसंद आ रहा है.

कैसे आजकल की यूथ पार्टी का एंथम सौंग ‘सात समंदर पार…’ बना हुआ है. इस दौड़ में कब कौन सा गीत लाबिस्टर बन जाए, यह युवाओं को भी पता नहीं होता. इसलिए पुराने गीतों की रीमिक्स वर्जन का दौर चल निकला है. ये ट्रैंड सस्ता होने के साथ शौर्टकट पौपुलरिटी का टूल भी बन चुका है, जहां प्रचार के लिए जोर और पैसा नहीं लगाना पड़ता.

जिंदगी नशे की भेंट मत चढ़ाइए

नशे की लत वह भयंकर बीमारी है, जो न केवल उस शख्स को, बल्कि उस के पूरे परिवार को खोखला कर देती है. इस की भयावहता का अंदाजा उस परिवार को देख कर आसानी से लगाया जा सकता है, जिस का मुखिया ही नशे की गिरफ्त में हो.

नशेड़ी बेरोजगार हो जाता है और तरहतरह की बीमारियों का शिकार हो जाता है. उस के परिवार की हालत दरदर भटकते भिखारी जैसी हो जाती है और उस की समाज में इज्जत वगैरह सब खत्म हो जाती है. नशेड़ी 2 तरह के होते हैं. एक वे, जो नशा करने को बुरा नहीं मानते हैं. दूसरे वे, जो इसे बुरा मानते हैं, पर लत से मजबूर हैं. जो बुरा नहीं मानते हैं, उन को कुछ भी समझाओ, उन के पास जवाब पहले से हाजिर होते हैं. आओ उन के जवाब देखते हैं :

सवाल : अरे भैया, देखो तो नशे से तुम्हारा शरीर कैसा हो गया है? नशेड़ी : कैसा हो गया है. एक दिन तो सब का शरीर मिट्टी में मिलना ही है.

सवाल : पर उस दिन के आने से पहले ही क्यों मरना चाहते हो? नशेड़ी : आप को पता है क्या, मौत कब आएगी? मौत तो जब आनी है, तब आएगी.

सवाल : देखो कितना पैसा इस में लग जाता है. सही कहा न? नशेड़ी : मैं अपने पैसे की पीता हूं, आप से मांगने तो नहीं आता?

सवाल : तुम्हारी पत्नी, मांबाप, बच्चे सब दुखी होंगे? नशेड़ी : उन की चिंता मुझे करनी है. आप अपने काम से काम रखो.

इस दर्जे के नशेडि़यों से नशा नहीं छुड़ा सकते. नशा छुड़ाने के लिए इन्हें ‘नशा मुक्ति केंद्र’ में ले जाना ही उचित रहेगा. दूसरे नशेड़ी वे हैं, जो नशे को बुरा मानते हैं. वे इसे छोड़ना भी चाहते हैं, पर लत से मजबूर हैं. ऐसे नशेड़ी अगर कोशिश करें, तो नशा छोड़ सकते हैं. कुछ सुझाव पेश हैं:

बुरी संगत से दूर रहें नशा देखादेखी का शौक है. अगर ऐसे लोगों से दूर रहें जो नशा करते हैं, तो आप की इच्छा नहीं होगी या इच्छा होगी भी, तो आप दबा पाएंगे. ऐसे लोगों को आप को बताना भी नहीं चाहिए कि आप ने नशा करना छोड़ दिया है, वरना वे आप को जबरदस्ती उस जगह ले जाएंगे और तरहतरह से आप को फुसलाएंगे. फिर आप खुद को रोक नहीं पाएंगे, इसलिए ठीक यही है कि ऐसे लोगों की संगत से दूर रहें.

अपनी सेहत पर ध्यान दें कभी जिम में जाना शुरू करें, सुबह घूमने जाना शुरू करें. हर रोज आईने में देखें और अपनेआप से कहें कि अब चेहरा कितना सुंदर होता जा रहा है. अच्छे कपड़े पहनें और बनठन कर रहना शुरू करें.

परिवार के साथ रहें आमतौर पर नशे की तलब एक खास समय पर होती है. उस समय अपने परिवार के साथ बिताएं. परिवार को भी चाहिए कि उस समय नशे करने वाले सदस्य को जितना हो सके, बिजी रखें. प्यार भरा बरताव करें और किसी भी बात पर उन्हें गुस्सा न दिलाएं.

जेब में पैसे न रखें जहां तक हो सके, जेब में पैसे ही न रखें या बहुत ही कम रखें. जब जेब में पैसे ही नहीं होंगे, तो आप नशा खरीद नहीं पाएंगे और तलब का समय निकल जाएगा.

ऐसी जगह से बचें आनेजाने का रास्ता बदल लें, जहां आप नशा करते थे. कितनी भी तलब उठे, उस जगह न जाएं. इसी तरह से शादी या दूसरे कार्यक्रमों में जहां नशे की पार्टी चल रही हो, वहां न जाएं. आप खुद को शाबाशी दें कि आप में कितनी मजबूती है. इस से तलब धीरेधीरे कम हो जाएगी.

शुरू में ज्यादा तलब होगी, पर अगर आप मन को मजबूत रखेंगे और नशा नहीं करेंगे, तो जैसेजैसे दिन बीतते जाएंगे, आप की तलब कम होती जाएगी और धीरेधीरे खत्म हो जाएगी. शपथ ले लीजिए

आप शपथ भी ले सकते हैं कि चाहे कोई मुझ पर कितना भी दबाव डाले, मैं प्रतिज्ञा करता हूं कि अब किसी तरह का नशा नहीं करूंगा. इसे रोजाना 3 बार बोलिए. जब भी आप को नशे की तलब उठे, तो मन को मजबूत बनाए रखें.

कुलमिला कर आप को हर हाल में अपने मन की मजबूती बनाए रखनी है. न तो यह सोचें कि आज नशा कर लेते हैं, कल से नहीं लेंगे. बहादुर बनिए. गम का डट कर सामना कीजिए. इस बात पर भरोसा रखिए कि समय के साथसाथ सब ठीक हो जाता है. पहले भी आप की जिंदगी में कितने ही गम आए होंगे, पर आज वे बीती बात बन गए हैं. इसी तरह से ये भी आने वाले समय में बीती बात बन जाएंगे.

आप इस दुनिया में नशेड़ी बनने के लिए नहीं आए हैं. आप की जिंदगी बहुत कीमती है. यह दोबारा नहीं मिलेगी. इसे नशे की भेंट न चढ़ाइए.

मोबाइल : दुर्घटना से भली सावधानी

विशाल अपनी मोटरसाइकिल से फोरलेन हाईवे से गुजर रहा था. उस के मोबाइल की घंटी बजने पर वह फोन पर बात करने में लग गया. उस का पूरा ध्यान बात करने में था, कि अचानक एक चौराहे पर सामने से आ रहे ट्रक से उस की भिड़ंत हो गई. मोटरसाइकिल तो चकनाचूर हुई ही, मौके पर उस की मौत भी हो गई. टक्कर जबरदस्त थी, मोबाइल हाथ से छूट कर दूर जा गिरा था. रोहित अपनी कार से जा रहा था कि उस का मोबाइल बजा. यह देखने के लिए कि किस का है, उस ने अपना ध्यान सामने से हटाया. ध्यान हटते ही उस की कार डिवाइडर पर चढ़ती हुई दूसरी ओर चली गई. उधर से तेज गति से एक ट्रक आ रहा था जिस की चपेट में वह आ गई. रोहित के साथ उस की बीवी, बच्चे भी थे. चारों की दुर्घटनास्थल पर ही मौत हो गई.

अहमदाबाद से एक टूरिस्ट बस अपने गंतव्य के लिए निकली ही थी कि ड्राइवर का मोबाइल बज उठा. बात रात 11 बजे की है. मोबाइल पर वह सामने वाले से झगड़ रहा था. ऐसे में उस का ध्यान भटक गया और बस 40 फुट गहरी खाई में गिर गई. बस में सवार 40 लोगों में से केवल 3 ही बचे. जो बचे, उन्होंने पुलिस को सूचना दी. जरा सोचिए, जब बस का ड्राइवर मोबाइल पर किसी से बात करता है तो अपनेआप को कितने असुरक्षित मानते होंगे. कुछ जागरूक यात्री ड्राइवर को इस के लिए मना भी करते हैं, लेकिन वह मानता नहीं. नतीजा दुर्घटना के रूप में सामने आता है. एक ही लापरवाही या गलती का परिणाम सभी निर्दोष यात्रियों को भुगतना पड़ता है.

कई प्रकरणों में यह भी देखने को आया है कि मोबाइल पर बात करने में ड्राइवर इस कदर खो गए कि अपने आगे चल रहे ट्रक में पीछे से घुस गए. उन की गाड़ी ट्रक के पिछले हिस्से में इस बुरी तरह फंस गई कि वे काफी दूर तक घसीटते रहे. टूव्हीलर या फोरव्हीलर वाहन चलाते समय मोबाइल पर बात करना एक फैशन बन गया है. यह प्रवृत्ति युवक तथा युवतियों दोनों में है. इस वजह से आएदिन उन की दुर्घटनाओं के समाचार पढ़ने को मिलते हैं. यद्यपि वे जानते हैं कि वाहन चलाते समय मोबाइल का इस्तेमाल घातक व जानलेवा हो सकता है, फिर भी वे अपनी जान को आफत में डालते हैं.

सेवलाइफ फाउंडेशन ने टीएनएस इंडिया सर्वे किया था जिस में देश से ड्राइविंग की बाधाओं में मोबाइल को सब से खतरनाक पाया गया. सर्वे में 1,749 लोगों की राय जानी गई. 47 प्रतिशत लोग ड्राइविंग के दौरान रिसीव करते हैं कौल. 34 प्रतिशत लोग मानते हैं कि ड्राइविंग करते समय फोन पर बात करना खतरनाक है. 96 प्रतिशत लोग असुरक्षित मानते हैं, जब ड्राइवर फोन पर बात करता है. 60 प्रतिशत लोग कौल का जवाब देने से संबंधित फोन पर बात करते हैं ड्राइविंग के दौरान. 68 प्रतिशत लोग चाहते हैं कि ड्राइविंग के दौरान मोबाइल यूज करने पर सख्त कानून बनाया जाए. यद्यपि मोटर व्हीकल एक्ट के अंतर्गत वाहन चलाते समय मोबाइल का इस्तेमाल करना कानूनन अपराध है लेकिन, इस के लिए सजा के बजाय अर्थदंड दिया जाता है, इसलिए यह अधिक प्रभावी नहीं हुआ.

मोबाइल आप की सुविधा के लिए है. उस का इस्तेमाल सावधानी से करना चाहिए ताकि आप सुरक्षित रहें और आप की वजह से दूसरों की जान भी जोखिम में न पड़े.

कुशीनगर हादसा : प्रशासन ही नहीं सरकार भी दोषी

कुशीनगर में महात्मा गौतमबुद्ध को निर्वाण प्राप्त हुआ था. पर्यटन के लिहाज से कुशीनगर पूरी दुनिया में मशहूर है. महात्मा बुद्ध के तमाम अनुयायी पूरे विश्व से यहां आते हैं. यह बौद्ध परिपथ के नाम से मशहूर है. सारनाथ और लुंबनी यहां से करीब हैं. कुशीनगर की गोरखपुर से दूरी 50 किलोमीटर है. गोरखपुर गोरक्षा पीठ के महंत योगी आदित्यनाथ उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं. ऐसे में यहां की हर घटना असाधारण हो जाती है.

यही वजह है कि कुशीनगर में स्कूल वैन हादसे की खबर का पता चलते ही मुख्यमंत्री अपने अमरोहा दौरा से पहले कुशीनगर गए. उन्होंने जनता के आक्रोश को ‘नौटंकी’ कह कर पूरे मामले को विवादों में ला दिया. मुख्यमंत्री ने शिक्षा और परिवहन विभाग के निम्न कर्मचारियों के खिलाफ तो कड़े कदम उठाने की बात कही पर मंत्री व शीर्ष स्तर पर बैठे जिम्मेदार लोगों को सजा न दे कर एकपक्षीय न्याय किया.

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ संत हैं. हर काम की शुरुआतपूजापाठ से करते हैं. यह बात और है कि इस के बाद भी उन की मुसीबतें कम होती नहीं दिख रही हैं. पिछले साल मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के अपने ही जिले गोरखपुर के बीआरडी यानी बाबा राधव दास अस्पताल में औक्सीजन की कमी से कई बच्चों की मौत हो गई थी. सरकार ने इस का ठीकरा अस्पताल के डाक्टर कफील अहमद पर फोड़ कर खुद को किनारे कर लिया. हाईकोर्ट ने डाक्टर कफील को जमानत पर छोड़ दिया है.

औक्सीजन की कमी से बच्चों की मौत का जिम्मेदार कौन है, यह साबित करना कठिन काम है. आम आदमी हादसों को जल्द भूल जाता है. दूसरा हादसा होने पर फिर से तेजी आती है.

एक साल के अंदर ही गोरखपुर के पास कुशीनगर में स्कूली वैन रेलगाड़ी की चपेट में आ गई. इस में 13 बच्चों की मौत हो गई. 4 बच्चे गंभीर रूप से घायल हो गए. यह घटना 26 अप्रैल को घटी. औक्सीजनकांड की तरह एक बार फिर सरकार ने स्कूल के प्रबंधक करीम जहान खान के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर उसे जेल भेज दिया. इस के साथसाथ, शिक्षा विभाग और परिवहन विभाग के कुछ कर्मचारियों के खिलाफ कार्यवाही की. पूरे मामले में शिक्षा और परिवहन विभाग के कर्मचारियों के साथसाथ, इस विभाग के मंत्री भी जिम्मेदार हैं. ऐसे में मंत्रियों व उच्च अधिकारियों के खिलाफ कार्यवाही न कर सरकार ने एकपक्षीय काम किया है.

प्रदेश में बहुत सारे स्कूल बिना मान्यता के चल रहे हैं. यह बात सभी को पता है. शिक्षा विभाग के आलाअफसर और मंत्री खामोश क्यों हैं? मुख्यमंत्री को खुद भी अपनी गलती माननी चाहिए.

ऐसे में जब तक मंत्री स्तर तक सजा नहीं दी जाएगी तब तक सुधार शुरू नहीं होगा. शिक्षा विभाग के साथसाथ परिवहन विभाग के मंत्री की लापरवाही क्यों नहीं दिख रही? मुख्यमंत्री का क्षेत्र होने के कारण गोरखपुर और कुशीनगर की दुर्घटना अहम हो जाती है. यह उसी तरह खास है जैसे गोरखपुर लोकसभा के उपचुनाव में हार के बाद भाजपा स्तब्ध रह गई थी.

जिस तरह से मुख्यमंत्री का क्षेत्र एक के बाद एक वजह से चर्चा में है उस से उन की प्रशासनिक क्षमता पर भी सवाल उठ रहे हैं. मंत्रिमंडल में मुख्यमंत्री को पूरा सहयोग नहीं मिल रहा. वहां की खेमाबंदी राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय है.

एक साल के अंदर ये तीनों ही घटनाएं मुख्यमंत्री के सामने किसी चुनौती से कम नहीं हैं. उन की प्रशासनिक क्षमता पर सवालिया निशान लग रहा है. जिस तरह से मुख्यमंत्री अपना आपा खोते नजर आ रहे हैं उस से साफ है कि वे खुद अपनी कमजोरी को समझ रहे हैं.

कुशीनगर दुर्घटना के बाद जब जनता ने मुख्यमंत्री के खिलाफ नारेबाजी करते हुए अपने आक्रोश को जताया तब मुख्यमंत्री ने उसे ‘नौटंकी’ बता कर बंद करने को कहा. मुख्यमंत्री के इस व्यवहार की आलोचना केवल विपक्षी ही नहीं, खुद भाजपा में भी अंदरखाने हो रही है. मुख्यमंत्री का क्षेत्र काफी संवेनशील होता है. ऐसे में वहां का असर पूरे प्रदेश पर पड़ता है.

मासूमों की मौत

गुरुवार 26 अप्रैल की सुबह का समय था. उत्तर प्रदेश के कुशीनगर जिले के दुदही रेलवे स्टेशन से करीब डेढ़ किलोमीटर दूर बहरपुरवा रेलवे क्रौसिंग पर सुबह 6 बजकर 50 मिनट पर सीवानगोरखपुर पैसेंजर ट्रेन पास हुई. ठीक इसी समय डिवाइन पब्लिक स्कूल के बच्चे वैन से स्कूल जाने के लिए क्रौसिंग पार कर रहे थे. बहरपुरवा रेलवे क्रौसिंग पर कोई बैरियर नहीं लगा था. स्कूल वैन के ड्राइवर ने रेलगाड़ी को नहीं देखा और वैन रेलगाड़ी के सामने आ गई, जिस में 11 बच्चों की घटनास्थल पर ही मौत हो गई. जबकि 2 बच्चों की मौत अस्पताल जाते समय रास्ते में हुई. 8 बच्चों की क्षमता वाली वैन में 17 बच्चे सवार थे.

घटना के बाद सरकार का काम शुरू हो गया. मुआवजा, जांच, कुछ लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज हो गई. कुछ दिन लोग जेल में रहेंगे, फिर बाहर आएंगे. कब किस को क्या सजा मिलेगी, पता नहीं. कुछ दिन में सबकुछ सामान्य हो जाएगा. जिन घरों के चिराग बुझ गए उन का गम कभी दूर नहीं होगा.

दुर्घटना के लिए सब से अधिक जिम्मेदार वैन ड्राइवर था जो इयरफोन लगा कर वैन चला रहा था. उस ने रेलवेलाइन पर बिना ध्यान दिए वैन को क्रौस कराने की गलती की. केवल पूर्वोत्तर रेलवे की बात करें तो 5 सालों में 450 से अधिक दुर्घटनाएं मानवरहित रेलवे क्रौसिंग्स पर हो चुकी हैं, जिन में 325 से अधिक जानें जा चुकी हैं.

पूर्वोत्तर रेलवे में 625 मानवरहित रेलवे क्रौसिंग हैं. दुर्घटना होने के बाद बहुत सारी चर्चाएं होती हैं. इस के बाद किसी नए हादसे के इंतजार में फिर सबकुछ सामान्य हो जाता है. जिस देश में बुलेट ट्रेन की बात हो रही हो वहां आज भी ऐसे हादसे बताते हैं कि देश में बुलेट ट्रेन चलाने से पहले रेलवे के मूलभूत ढांचे में बदलाव की जरूरत है. मानवरहित क्रौसिंग एक बड़ी समस्या है.

लापरवाह शिक्षा विभाग

कुशीनगर दुर्घटना का दूसरा पक्ष शिक्षा विभाग है. यह बात केवल कुशीनगर के स्कूल में ही नहीं चल रही, पूरे प्रदेश में यही हाल है. कुशीनगर में दुर्घटना होने के बाद मामला खुल गया, पर इस के बाद भी शिक्षा विभाग अपने कामों में सुधार नहीं करेगा. ग्रामीण भी अब अपने बच्चों को बस से स्कूल पढ़ने के लिए भेजना चाहते हैं.

शिक्षा विभाग प्राइवेट स्कूलों को मान्यता देने के नाम पर बड़ीबड़ी वसूली करता है. इस का हिस्सा शिक्षा विभाग में छोटे कर्मचारी से ले कर मंत्री तक पहुंचता है. मान्यता देने के लिए सालोंसाल स्कूल प्रबंधन को दौड़ाया जाता है. डिवाइन पब्लिक स्कूल को भी मान्यता नहीं मिली थी. ऐसे में उस के यहां पढ़ रहे बच्चों को सेठ बंशीधर विद्यालय से टीसी देने की व्यवस्था होती थी.

स्कूल को सरकारी मान्यता नहीं मिली है, यह बात बहुत सारे पेरैंट्स को पता ही नहीं थी. कुशीनगर के दुदही ब्लौक के मिश्रौली गांव की प्रधान किरन देवी ने अपने 9 साल के इकलौते बेटे रवि और 2 बेटियों 7 साल की सुंदरी और 5 साल की रागिनी का दखिला डिवाइन स्कूल में करा दिया था. किरन देवी के पति अमरजीत पहले प्रधान थे. 750 रुपए प्रति बच्चा फीस दे कर वे अपने 3 बच्चे वैन से स्कूल भेज रहे थे.

जहीर बताते हैं कि उन का बेटा अरशद गांव के स्कूल में पढ़ने नहीं जाता था. उसे शौक था कि वह भी वैन वाले स्कूल में पढ़ने जाएगा. जब से उस का एडमिशन यहां हुआ था वह रोज स्कूल जा रहा था. उत्तर प्रदेश के हर कसबे और गांव में प्राइवेट स्कूल खुल गए हैं. ये स्कूल मान्यता के लिए शिक्षा विभाग के पास भटक रहे हैं पर शिक्षा विभाग इन को मान्यता नहीं दे रहा. शिक्षा विभाग की मिलीभगत से ही ये अपने यहां के बच्चों को किसी मान्यता वाले विद्यालय से प्रमाणपत्र दिला देते हैं. शिक्षा विभाग में रिश्वत की आड़ में यह खेल कई वर्षों से चल रहा है.

सबक सीखने को तैयार नहीं

प्रदेशभर में वाहन चलाते ऐसे तमाम लोग मिल जाएंगे जो कानों में इयरफोन लगा कर ड्राइव करते हैं. बिना हैलमेट के और सीटबैल्ट लगाए बगैर भी लोग खूब ड्राइव करते हैं. रौंग साइड गाडि़यां खूब चलती हैं. हर स्कूलवाहन पूरी तरह से दुरुस्त नहीं होता. जरूरत से ज्यादा सवारी वाहनों में ठूंसी जाती हैं. ट्रैफिक नियम तोड़ कर चलना शान समझा जाता है, जिस में सब से अधिक सत्तापक्ष के लोग होते है. जब जिस की सरकार होती है उस के लोग शान से नियम तोड़ कर चलते हैं. पुलिस और परिवहन विभाग की लापरवाही साफ दिखती है.

अभी तक वैन वाले स्कूल केवल शहरों में ही होते थे. अब गांवों में भी वैन वाले स्कूल होने लगे हैं. गांव, कसबों और छोटे शहरों में किसी भी तरह की ट्रैफिक व्यवस्था नहीं है. वहां स्कूल वाहनों को चैक करने का कोई ढांचा नहीं हैं. वैन चलाने वाले ज्यादातर चालक लाइसैंसधारी नहीं होते. लाइसैंस बनाने के नाम पर आरटीओ औफिस लूट करता है और जम कर रिश्वत ली जाती है.

कुशीनगर की घटना के बाद चेते परिवहन विभाग ने राजधानी लखनऊ में स्कूल वैन चालकों के लाइसैंस चैक किए. कई चालकों को बिना लाइसैंस पकड़ा गया. परिवहन विभाग के कर्मचारी कहते हैं कि हमारे पास पर्याप्त कर्मचारी नहीं हैं जो इस तरह की चैकिंग नियमितकर सकें.

नियम कहता है कि गाड़ी चलाते समय मोबाइल पर बात करना, नशे में वाहन चलाना, तेज रफ्तार वाहन चलाना, सीटिंग क्षमता से अधिक लोगों को बैठाना, रैड लाइट जंप करना कानून तोड़ना माना जाता है. इस की सजा के रूप में वाहन चलाने वाले ड्राइवर का लाइसैंस 5 माह के लिए रद्द करने का प्रावधान है.

आंकडे़ बताते हैं कि पकडे़ जाने के बाद भी ऐसी कड़ी कार्यवाही नहीं की जाती है.केवल स्कूली वाहनों की बात नहीं है, सड़क पर नियमों की लापरवाही के तमाम उदाहरण मिलते हैं. जब तक लापरवाही पर अंकुश नहीं लगाया जाएगा, तब तक सुधार नहीं होगा.

युवाओं का सपना घर हो अपना

दिल्ली के आसपास के कई बिल्डरों के, ग्राहकों का पैसा ले कर, बैठ जाने से युवाओं का अपने घर का सपना चकनाचूर हो गया है. जेपी, यूनीटैक आम्रपाली, सुपरटैक, वैब जैसी कई बिल्डर कंपनियों ने उन युवाओं को उकसाया जो 60-70 लाख रुपए लगा कर अपना मकान पाने को उत्सुक थे. युवाओं को लगा कि अपनी बचत, अच्छे वेतन व बैंक लोन के जरिए वे मकान खरीद सकेंगे और 3-4 साल में ऐसे फ्लैट के मालिक बन जाएंगे जहां पास में स्विमिंग पूल होगा, क्लब होगा, टैनिस कोर्ट होगा और थोड़ी दूरी पर ही मल्टीप्लैक्स वाला मौल होगा.

नोएडा, गुड़गांव में खासतौर पर कितने ही प्रोजैक्ट खटाई में पड़े हुए हैं, क्योंकि एक तो सरकारों ने बिल्डरों को समय पर अनुमति नहीं दी, दूसरे, बिल्डरों ने न केवल कानून तोड़ कर ज्यादा पैसा बनाया बल्कि उन्होंने ग्राहकों से वसूला पैसा मकान बनाने की जगह दूसरे प्रोजैक्ट्स में लगा दिया. अकेले जेपी ग्रुप की वजह से 20 हजार खरीदार अपनी जमापूंजी खो चुके हैं.

मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा हुआ है पर कोर्ट कछुए की चाल चल रही है जबकि कल के युवा अब प्रौढ़ होेने लगे हैं और उन का छोटा बैंकलोन, महाकर्ज बन गया है. बैंकों ने इन बिल्डरों को जो कर्ज दिया था वह अलग डूब रहा है और लगभग 30 हजार से 50 हजार करोड़ रुपए खंडहरों में बदल रहे हैं. यह है हमारे देश की हालत जहां गरीबों को तो छोडि़ए, थोड़े खातेपीतों को भी चूसने में कोई कसर नहीं छोड़ी जाती.

देश का हाल यह है कि आज कोई भी वर्ग संतुष्ट नहीं है. पिछले सालों में दिखाए गए अच्छे दिनों के सपने वैसे ही टूट रहे हैं जैसे इन हजारों युवाओं के अपने घरों के सपने टूट गए हैं.

‘फन्ने खां’ की रिलीज से पहले ऐश्वर्या को लगा बड़ा झटका

बौलीवुड की खूबसूरत अदाकाराओं में से एक ऐश्वर्या राय बच्चन की मोस्ट अवेटेड फिल्म ‘फन्ने खां’ की शूटिंग शुरू हो चुकी है. फिल्म में ऐश्वर्या के साथ अभिनेता राजकुमार राव नजर आने वाले हैं. इस फिल्म में ऐश्वर्या एक सिंगर की भूमिका अदा कर रही हैं. जहां एक तरफ इस फिल्म की काफी चर्चा हो रही है वहीं दूसरी तरफ फिल्म से जुड़ी एक और खबर आ रही है. दरअसल, मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक ऐश्वर्या से रिक्वेस्ट की गई है कि वो इस फिल्म के लिए अपनी फीस थोड़ी कम कर दें.

ऐश्वर्या राय बच्चन, राजकुमार राव और अनिल कपूर की इस फिल्म को पहले क्रि-अर्ज एंटरटेनमेंट की प्रेरणा अरोरा प्रोड्यूस कर रही थीं लेकिन कुछ कारणों के चलते अब इसे टी-सीरीज के भूषण कुमार बना रहे हैं. टी-सीरीज फिल्म की प्रोडक्शन कास्ट पर पुनर्विचार कर रही है, जिस कारण एक्टर्स की फीस में कटौती होने की उम्मीद है.

हालांकि फीस कम करने को लेकर ऐश्वर्या का कोई औफिशयल स्टेटमेंट नहीं आया है. इसके साथ ही ये भी अभी तक पता नहीं चल पाया है कि क्या ऐश्वर्या की तरह फिल्म के बाकी एक्टर्स अनिल कपूर और राजकुमार राव से भी प्रोड्यूसर्स ने फीस कम करने के लिए कहा है या नहीं.

आपकी जानकारी के लिए बता दें कि ऐश्वर्या और अनिल बड़े पर्दे पर लगभग दो दशक बाद साथ दिखेंगे. इससे पहले वह साल 2000 में ‘हमारा दिल आपके पास है’ और 1999 की हिट फिल्म ‘ताल’ में साथ नजर आ चुके हैं. ये डच फिल्म ‘एव्रीबडीज फेमस’ की रीमेक है. जिसका निर्माण राकेश ओम प्रकाश मेहरा कर रहे हैं. फिल्म अतुल मांजरेकर द्वारा निर्देशित होगी.

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