पलायन और प्रदूषण के बीच है गहरा संबंध

युवा कसबों और गांवों से बुरी तरह शहरों और मैट्रोज में आ रहे हैं जहां शिक्षा के अवसर और कमाई के रास्ते तो हैं ही, खुलापन भी है जो उन के गांवकसबे में बिलकुल नहीं है. धर्म, जाति, भाषा के बंधनों से दूर युवा शहरों में आ जाते हैं पर ज्यादातर को सस्ते इलाकों में रहना पड़ता है, क्योंकि शहर बेहद महंगे और औसत युवा के लिए गांवकसबे की कमाई या बचत के बाहर के होते हैं.

युवाओं और मजदूरों की भरमार के कारण इन शहरों पर बेहद दबाव बढ़ रहा है और शहर दिनबदिन बदबूदार व प्रदूषित होते जा रहे हैं. गांवों की साफ हवा के आदी युवा शहर की जहरीली हवा में बीमार हो जाते हैं और दवाइयों पर निर्भर हो जाते हैं.

एक तरह से दुष्चक्र चल रहा है. चूंकि शहरों में मजदूर सस्ते मिल जाते हैं और मालिकों को कारखाने और सर्विस सैंटर बनाने में आसानी होती है तो वे शहरों में ही नौकरियों के अवसर दे रहे हैं और चूंकि अवसर शहरों के ही हैं, युवाओं को शहर आ कर भविष्य का दांव अपनाना पड़ता है और फिर शहर गंदे होते जाते हैं. हर शहर में गंदे इलाके बड़ी तेजी से बढ़ रहे हैं.

शहरों में प्रदूषण आज इस कारण बढ़ रहा है कि सड़कों, सीवरों, सफाई का इंतजाम बढ़ती आबादी के अनुसार करना कठिन होता जा रहा है. शहरों में कुछ लोग अमीर हो जाते हैं, सरकार को ज्यादा आबादी के शहरों से आय अधिक होने लगती है लेकिन नगर निकायों की आमदनी का स्रोत न के बराबर बढ़ता है जिस का असर शहर की गंदगी से सीधा जुड़ा है.

हर शहर के खाली इलाकों, आसपास के खेतों, जंगलों और यहां तक कि नदीनालों पर भी रहने के कच्चेपक्के मकान बन गए हैं. जहां 1,000 लोग रहने चाहिए वहां 5,000 रहने लगे हैं तो प्रदूषण होगा ही. रोनेधोने से काम नहीं चलेगा क्योंकि न सरकार शहरों में किसी को आने से रोक सकती है न मांग के अनुसार सुविधाओं को तुरंत जुटा सकती है.

यह प्रदूषण तो अब जिंदगी का हिस्सा बन गया है और हमारी संस्थाएं चाहे जो मरजी हो कर लें, कुछ नहीं कर सकतीं. अब गांवों को सुधारने की तो बात करता भी कोई नहीं है क्योंकि वहां जो लोग बचे हैं वे निम्न जातियों के हैं और यह देश उन बहुमत वाली नीची जातियों के बारे में सोचने को तैयार तक नहीं. सो, शहरी प्रदूषण के लिए तैयार रहें, हरदम, फिट या अनफिट.

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हमारी अर्थव्यवस्था एक भ्रम

हार्वर्ड शोधकर्ताओं का अनुमान है कि भारत आने वाले दशक के लिए सब से तेजी से बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था होगी.

विश्व बैंक और आईएमएफ द्वारा एकत्र आंकड़ों के आधार पर अमेरिका के कृषि आर्थिक अनुसंधान सेवा विभाग ने अनुमान लगाया है कि भारत 2030 तक तीसरी सब से बड़ी अर्थव्यवस्था बनने के लिए तैयार है, जो 4 विकसित देशों, जापान, ब्रिटेन और फ्रांस को पार कर जाएगी.

32 देशों के लिए प्राइस वाटरहाउस कूपर ने दीर्घकालिक वृद्धि की भविष्यवाणी की है कि 2050 तक भारतीय अर्थव्यवस्था दुनिया की सब से मजबूत अर्थव्यवस्था होगी.

सरकारें अर्थव्यवस्था के भ्रमित करते आंकड़ों से अपनी पीठ थपथपाने के बजाय देश की बड़ी आबादी की तंगहाल जीवनदशा को सुधारने के क्रम में कुछ कदम उठाए तो ही देश में गरीबी दूर हो सकती है.

कृषि क्षेत्र की दयनीय स्थिति भी भारत में गरीबी का अहम कारण है.

उपरोक्त सुर्खियां भारत की अर्थव्यवस्था के बहुत अधिक सुदृढ़ होने व तेजी से आगे बढ़ने का भ्रम पैदा करती हैं, जबकि अनेक अर्थशास्त्री भारतीय अर्थव्यवस्था के तेजी से नीचे जाने व विकास की गति मंद होने की आलोचना कर रहे हैं. नोटबंदी व जीएसटी उस की बड़ी वजह मानी जा रही हैं.

अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, भारतीय अर्थव्यवस्था अपने सकल घरेलू उत्पाद 2.44 ट्रिलियन डौलर के साथ विश्व में 7वें नंबर पर थी जोकि विश्व की सकल घरेलू उत्पाद में 3.08 फीसदी का अंशदान कर रही है. विश्व की 10 सब से बड़ी अर्थव्यवस्थाएं, उन की जनसंख्या, वहां की प्रतिव्यक्ति आय व उन के क्षेत्रफल तालिका-1 में दर्ज हैं :

तालिका से स्पष्ट है कि यद्यपि भारत अर्थव्यवस्था के आकार में विश्व में 7वें स्थान पर है किंतु यह कोई गर्व करने वाली स्थिति नहीं है. अर्थव्यवस्था का यह स्थान मुख्यरूप से भारत की विशाल जनसंख्या के कारण है. भारत का कुल क्षेत्रफल यूएसए का लगभग 1/3 है जबकि उस की जनसंख्या वहां से 3 गुना अधिक है. भारत 144वें स्थान पर है,

बाकी ढोल पीटना है

वास्तविक प्रतिव्यक्ति आय के मामले में भारत का विश्व में 144वां स्थान है जबकि क्रय शक्ति समता के आधार पर भारत का विश्व में 126वां स्थान है. एक अमेरिकी के मुकाबले एक भारतीय की प्रतिव्यक्ति आय मात्र 3.11 फीसदी है. यहां तक कि चीन के मुकाबले भी यह मात्र 21.58 फीसदी है. यह फर्क स्पष्ट रूप से दिखाता है कि भारत की वास्तविक स्थिति क्या है. बहुत से पिछड़े कहे जाने वाले देश हम से बेहतर स्थिति में हैं.

अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुसार, प्रतिव्यक्ति प्रतिदिन 1.90 डौलर से कम आय के व्यक्ति अत्यधिक गरीब माने जाते हैं. वर्ष 2011 में भारत में 21.2 फीसदी व्यक्ति इस श्रेणी में आते थे. भारतीय रिजर्व बैंक के डाटा के अनुसार भी वर्ष 2011-12 में भारत की कुल जनसंख्या का 21.92 फीसदी भाग, लगभग 26.98 करोड़ व्यक्ति गरीबीरेखा के नीचे थे.

उक्त विवेचना से स्पष्ट है कि हालांकि भारत की अर्थव्यवस्था विश्व में 9वें स्थान पर है किंतु वह अभी भी विश्व के गरीबतम देशों में से एक है.

क्या हैं कारण

यदि हम भारत की गरीबी के कारणों की विवेचना करें तो ये कारण स्पष्ट रूप से सामने आते हैं :

वर्ष 2013 के आंकड़ों के अनुसार, भारत में सैक्टरवार रोजगार की स्थिति थी: कृषि : 49.7 फीसदी, उद्योग : 21.5 फीसदी और सेवा क्षेत्र : 28.7 फीसदी.

इन आंकड़ों की तुलना यूएसए और चीन से करें तो स्थिति भयावह व शर्मनाक नजर आती है. यूएसए में वर्ष 2014 में कुल कार्यरत जनसंख्या का मात्र 1.4 फीसदी सीधे कृषि क्षेत्र से जुड़ा था जबकि 12.7 फीसदी रोजगार उद्योग क्षेत्र में. 80.1 फीसदी रोजगार सेवा क्षेत्र में व 5.7 फीसदी स्वरोजगार क्षेत्र में था. यहां पर एक उल्लेखनीय बात है कि यूएसए में वर्ष 1870 में कम से कम 50 फीसदी जनसंख्या कृषि से रोजगार पा रही थी.

चीन में भी वर्ष 2016 में कुल कार्यरत जनसंख्या का 27.7 फीसदी सीधे कृषि क्षेत्र से जुड़ा था जबकि 28.8 फीसदी उद्योग क्षेत्र से तथा 43.5 फीसदी सेवा क्षेत्र में कार्यरत था. सो, यह स्पष्ट है कि जिस अर्थव्यवस्था में रोजगार के लिए कृषि पर निर्भरता जितनी अधिक है, उस की प्रतिव्यक्ति आय उतनी ही कम है.

कृषि की दयनीय स्थिति

भारत में गरीबी का एक बहुत बड़ा कारण उस के कृषि क्षेत्र की दयनीय स्थिति है. जहां एक ओर भारत की कुल कार्यरत जनसंख्या का 49.7 फीसदी भाग कृषि क्षेत्र से जुड़ा है वहीं कृषि क्षेत्र का कुल आय में योगदान मात्र 17.4 फीसदी है. भारतीय कृषकों का 62.8 फीसदी भाग सीमांत कृषकों का है जिन का औसत कृषि भूमि स्वामित्व मात्र 0.24 हैक्टेअर का है. इस का भी मात्र 51 फीसदी भाग ही सिंचित है. लघु कृषकों का भाग 17.8 फीसदी है जिन का औसत कृषि भूमि स्वामित्व 1.42 हैक्टेअर है और इस का मात्र 39 फीसदी भाग ही सिंचित है.

भारतीय कृषक परिवारों के प्रतिमाह आय व व्यय के आंकड़े क्या हैं, इस को तालिका-2 में दर्ज किया जा रहा है.

तालिका-2 से स्पष्ट है कि कुल कृषक परिवारों का 80 फीसदी से अधिक भाग अपने प्रतिमाह व्यय से बहुत कम कमा पाता है. परिणामस्वरूप उसे इस कमी को पूरा करने के लिए ऋण लेना पड़ता है. आय की कमी के कारण कृषक एक ऐसे कुचक्र में फंस जाता है जिस से बाहर आना उस के लिए तब तक संभव नहीं है जब तक कि उस को किसी अन्य माध्यम से नियमितरूप से अतिरिक्त आय प्राप्त नहीं हो जाती है.

संपत्ति का असमान वितरण

समग्र प्रतिव्यक्ति आय कम होने के साथसाथ भारत में आर्थिक विषमता बहुत अधिक है. आर्थिक विषमता के मामले में भारत विश्व में रूस के बाद दूसरे स्थान पर है. भारत के 1 प्रतिशत सर्वाधिक धनी व्यक्ति कुल संपत्ति का 58.4 फीसदी भाग रखते हैं. सरकारें हमेशा इन्हीं 58.4 फीसदी धनवानों की सुनती हैं.

देश की कुल संपत्ति में निम्नतम 30 फीसदी लोगों के पास कुल संपत्ति का मात्र 1.4 फीसदी भाग ही है. देश के निम्नतम 70 फीसदी लोगों के पास कुल संपत्ति का मात्र 10.9 फीसदी भाग ही है. यह अंतर लगातार बढ़ता ही जा रहा है. परिणामस्वरूप, देश की आर्थिक प्रगति का लाभ नीचे के लोगों तक नहीं पहुंच पा रहा है.

निर्यात में कम हिस्सेदारी

विश्व की सब से बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के अंतर्राष्ट्रीय व्यापार की तुलना करें तो हम पाते हैं कि यहां भी भारत की स्थिति संतोषजनक नहीं है. द वर्ड फैक्टबुक के अनुसार, वर्ष 2016 के अनुमानित आयात व निर्यात की स्थिति क्या थी, यह तालिका-3 में दर्ज है :

उक्त तालिका से स्पष्ट है कि खुद को विश्व की 7वीं सब से बड़ी अर्थव्यवस्था बता कर अपनी पीठ थपथपाने से भारत की स्थिति नहीं बदलेगी. यदि भारत को अपनी स्थिति बेहतर करनी है तो उसे अपनी मूलभूत कमजोरियों को दूर करने के लिए गंभीर प्रयास करने होंगे.

कृषि पर निर्भर जनसंख्या को रोजगार के दूसरे स्रोत उपलब्ध कराने होंगे, उन की कृषि पर से निर्भरता कम करनी होगी, विश्व के निर्यात में अपनी हिस्सेदारी बढ़ानी होगी और सब से महत्त्वपूर्ण संपत्ति के वितरण की असमानता को कम करना होगा. तभी हम अपनी अर्थव्यवस्था को हकीकत में गर्व करने लायक बना सकेंगे.

इस सब के लिए देश की सामाजिक स्थिति जिम्मेदार है जिस में धर्म का सब से ज्यादा रोल है जिस ने देश की जनता को अकर्मण्य बना रखा है.

बस एक सही फैसले से बदलेगी आपकी जिंदगी

जीवन में तरक्की के लिए जरूरी है कि आप सही फैसले लें. आप के हर फैसले का आप के कैरियर पर असर पड़ता है. कोईर् भी फैसला लेने से पहले विषय की पूरी जानकारी होनी जरूरी है. यदि कोई गड़बड़ी हो जाए तो बचाव करना भी जरूरी है. कभीकभी बिना सोचसमझे जल्दबाजी में लिए गए कुछ फैसले आप की प्रोफैशनल लाइफ को बरबाद कर सकते हैं. इसलिए सोचसमझ कर सही फैसले लें ताकि बाद में पछताना न पड़े.

सिर्फ पैशन फौलो करना

यदि आप का पैशन गिटार बजाना या फिजिकल एडवैंचर है, तो आप किसी बैंड को जौइन कर कैरियर बना सकते हैं, इस से पैसा कमाने की क्षमता को फौलो करने पर आप को अच्छा लगेगा, पर हो सकता है बाद में परेशानी हो इसलिए पता लगाएं कि आप का पैशन स्थायी है या नहीं और उस से कितना पैसा कमा सकते हैं.

लोग अपनी जरूरतें पूरी करने के एवज में आप को पैसा दे सकते हैं पर जरूरी नहीं कि वे हमेशा ही आप को अच्छा पैसा दें. इसलिए सोचसमझ कर सही फैसला लें.

सेल्स में कैरियर से बचना

क्या आप सेल्सपर्सन बनने से कतराते हैं? यह एक खतरनाक फैसला हो सकता है. इस बात का खयाल रखें कि प्रोफैशनल लाइफ में आप को हमेशा कुछ न कुछ सेल करना पड़ता है. अगर आप की सेल्स में थोड़ी भी दिलचस्पी है तो यह लाइन आप की जिंदगी बदल सकती है.

सैलरी के लिए जौब

 कैरियर के किसी भी मोड़ पर यदि आप को सब से ज्यादा सैलरी का औफर मिले तो उस औफर को स्वीकार करने से पहले एक बार जरूर सोचें. अपने स्किल सैट के लिए डिमांड सप्लाई डायनैमिक्स पर विचार करना चाहिए.

अगर कोई कंपनी लौंगटर्म के लिए शानदार रिवार्ड औफर कर रही है, तो वह आप को शौर्टटर्म के लिए कम सुविधाएं देगी. जहां पर लौंगटर्म कैरियर ग्रोथ और रिटर्न्स गायब होते हैं, वहां ऐंप्लौयर आप को लुभाने के लिए बड़े औफर देता है.

फ्रैंड्स को न भूलें

 हर बार जब आप जौब बदलते हैं तो पुराने वर्कप्लेस पर कई दोस्त छोड़ जाते हैं. नए रोल में आप इन दोस्तों के साथ रिश्ते नहीं निभा पाते. इस से आप ऐक्सटर्नल प्रोफैशनल सपोर्ट सिस्टम को खो देते हैं और भविष्य में बेहतर नौकरी के अवसरों से भी वंचित रह जाते हैं. अच्छी नौकरी के लिए कभी विज्ञापन नहीं निकलते. ऐसी नौकरियां हमेशा किसी न किसी के रैफरैंस से भरी जाती हैं. इसलिए आप को पुराने संबंधों को हमेशा जीवित रखना चाहिए.

लाइफ पार्टनर की सुनें

प्रोफैशनल सपनों को पूरा करने के चक्कर में कई बार इंसान लाइफ पार्टनर की बातों को नजरअंदाज करता है. इस से परिवार में तनाव पैदा होता है और व्यक्ति काम पर पूरी तरह से फोकस नहीं कर पाता. भले ही आप काम में कितने भी व्यस्त रहते हों, लेकिन लाइफ पार्टनर को भी समय दें.

कैरियर बदलना ठीक नहीं

क्या आप पायलट हैं और फ्लाइंग से बोर हो चुके हैं? जब आप कैरियर बदलते हैं, तो अस्थायी रूप से ऐक्साइटिंग जौब मिलती है. आप नए कैरियर में सब से निचले पायदान पर होते हैं, क्योंकि पुराना अनुभव काम नहीं आता. वहां आप की उम्र के लोग आप से ऊपर काम करते हैं. कैरियर बदलने से अच्छा तो यह होगा कि आप वर्तमान कैरियर में ही कुछ नया करते रहें ताकि बोरियत न आए और जोश बना रहे.

जल्द सैटल हो जाना

 जिंदगी के शुरुआती दिनों में किसी शहर में सैटल हो जाने के कारण आप अन्य शहरों में जौब करने से कतराते हैं. यदि आप किसी शहर में बहुत जल्दी घर खरीद लेते हैं, तो इस बात की संभावना रहती है कि उस शहर को छोड़ कर कहीं और जाएंगे और कैरियर की नई राह तलाशेंगे.

जो भी मिला, उसे स्वीकार करना

अपनी काबिलीयत के अनुरूप अच्छे अवसर का इंतजार करें. आप को जो भी पहला अवसर मिलता है, उसे आप बेहतर समझते हैं. ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि आप ने अन्य अवसर देखे ही नहीं होते हैं. इसलिए पहले अवसर को तुरंत स्वीकार कर लेना हर बार सही नहीं होता. पहले औफर को स्वीकार करने से पहले विचार कर लें.

चापलूसी को महत्त्व देना

यदि आप आगे बढ़ने के लिए मेहनत के बजाय चापलूसी को चुनते हैं तो इस से आप कभी भी स्थायी कामयाबी हासिल नहीं कर सकते. आप को फैसला लेना होगा कि जीवन में मेहनत को अहमियत देंगे और चापलूसी छोड़ देंगे. आप को मालूम होना चाहिए कि वही व्यक्ति सफल होता, जो ईमानदारी से मेहनत करता है.

नया सीखते रहें

 शिक्षा एक सतत प्रक्रिया है. आप को हमेशा कुछ न कुछ सीखना चाहिए. हो सकता है कि आप ने ग्रैजुएशन या पोस्टग्रैजुएशन किया हो. इस पढ़ाई से शुरुआती स्तर पर तो जौब मिल जाती है, पर आप को अपनी शिक्षा कभी बंद नहीं करनी चाहिए. आप जितना ज्यादा सीखते हैं, उतनी ही तेजी से तरक्की पाते हैं. जौब के दौरान भी आप को नित नई चीजें सीखने की कोशिश करते रहना चाहिए.

अपना पैशन न भूलें

 अपने पैशन को फौलो न करना एक खतरनाक फैसला हो सकता है. समर्पित व्यक्ति आलसी व टैलेंटेड व्यक्ति की तुलना में तेजी से सफल होता है. अगर आप काम को पसंद करते हैं, तो कड़ी मेहनत कर सकते हैं.

मैं हूं बौस

लीडर के तौर पर लंबे समय तक अपनी भूमिका निभाने पर आप को लगता है कि कोई भी आप की आलोचना नहीं कर सकता और आप नियमों से परे हैं, लेकिन हकीकत अलग होती है. आप पर ज्यादा जिम्मेदारी होती है और गलती होने पर सब से पहले आप को ही सजा दी जाती है.

मैं लोगों को दिखता ही नहीं

आप जितना बेहतर परफौर्म करेंगे, लोगों की निगाह आप पर उतनी ही ज्यादा रहेगी. लोग आप के शब्दों, कार्यों और रवैए पर नजर रखेंगे. लोग आप के बारे में बातचीत भी शुरू कर देंगे. ऐसे में आप का एक गलत कदम या झूठ लोगों को बरदाश्त नहीं होगा और वे आप पर हावी हो जाएंगे.

मिल कर चलें

 यह बहुत आसान है कि आप अपनी सारी कामयाबी के लिए खुद को जिम्मेदार मानें. कई बार इस से आप घमंड भी करने लगते हैं. आप को बेहतर नतीजों के लिए लोगों, माहौल और समय को भी अहमियत देनी चाहिए. सब के साथ मिल कर चलने पर ही स्थायी सफलता मिल सकती है.

मेरी कोई जिम्मेदारी नहीं

कई लोग यह भी मानते हैं कि हालात उन के कंट्रोल में नहीं हैं. इस से वे खुद को कमजोर साबित करते हैं. आगे आ कर जिम्मेदारी लेना सीखें और हालात को वश में करने की कोशिश करें. यदि आप अपने जीवन में कैरियर के प्रति गैरजिम्मेदार रहेंगे तो कैरियर में बड़ी असफलता ही मिलेगी.

अंधविश्वास की पोषक सप्तवार कथाएं

हर हिंदू भक्त से बारबार कहा जाता है कि कम से कम समय में कम से कम परिश्रम कर के अधिक से अधिक लाभ, अधिक से अधिक सुख अर्जित कर लेना संभव है. भक्त वह बात मान लेता है. मानव मन की इसी दुर्बलता का लाभ उठाते हुए भविष्यवक्ता, साधुसंत टीवी चैनलों पर ज्यादा से ज्यादा समय खरीद कर स्वकल्याण कर रहे हैं. लोगों को इधरउधर की बातों में उलझा कर धन अर्जित कर रहे हैं.

चैनलों के माध्यम से लोगों पर अध्यात्म का जादू चलाने वालों का कहना है कि जो छोटेछोटे उपाय हम बताते हैं उन को श्रद्धा व विश्वास के साथ करने से अपने वर्तमान को बदला जा सकता है, भविष्य की धुंधली तसवीर को पूर्णतया स्पष्टरूप से देखा जा सकता है.

वे कहते हैं कि पूर्वजों ने जो मार्ग दिखाया है उसी मार्ग पर चलने के लिए वे आप को प्रेरित करते हैं ताकि आप का दुखी जीवन, सुख में बदल सके. लाभ अथवा सुखप्राप्ति के लिए किसी दिन विशेष की प्रतीक्षा करने की आवश्यकता नहीं. इस के लिए आप विधिपूर्वक पूजापाठ में व्यस्त हो जाएं. जैसे जैसे आप साधनापथ पर गहनता से प्रवेश करते चले जाएंगे वैसेवैसे सुख आप के नजदीक आता जाएगा.

सुखप्राप्ति के उद्देश्य से रविवार को ‘सूर्यदेव’, सोमवार को ‘शंकर-पार्वती’, मंगलवार को ‘हनुमान,’ बुधवार को ‘बुधदेव’, बृहस्पतिवार को ‘बृहस्पतिदेव’, शुक्रवार को ‘संतोषी मां’ एवं शनिवार को ‘शनिदेव’ से जोड़ दिया गया है. जो भी रविवार व्रत कर के रविवार व्रतकथा, सोमवार व्रत कर के सोमवार व्रतकथा, मंगलवार व्रत कर के मंगलवार व्रतकथा, बुधवार व्रत कर के बुधवार व्रतकथा, बृहस्पतिवार व्रत कर के बृहस्पतिवार व्रतकथा, शुक्रवार व्रत कर के शुक्रवार व्रतकथा और शनिवार व्रत कर के शनिवार व्रतकथा कहता या कथावाचकों से सुनता है, उसे स्वेच्छानुसार भिन्नभिन्न फलों की प्राप्ति होती है. यह उपदेश रातदिन टैलीविजन पर प्रवचनों में घरों में दिया जाता है. देने वाले भगवानों के बिचौलिए, दुकानदार और एजेंट हैं. इसी पर धर्म टिका है. आस्था बेवकूफी का दूसरा नाम है.

प्रलोभन का जाल

यदि कोई स्त्री या पुरुष रविवार व्रत कर के विधिपूर्वक रविवार व्रतकथा कहता अथवा कथावाचकों से सुनता है, वह धनवान हो जाता है, उस के सारे दुख दूर हो जाते हैं. अगर बांझ स्त्री यह सब करती है तो उसे पुत्र प्राप्त होता है. इस व्रत और कथा को करने से ब्राहमण विद्या, क्षत्रिय राज्य, वैश्य बुद्धि और शूद्र सुख पाता है. रोगी रोग से मुक्त हो जाता है.

इसी प्रकार, सोमवार व्रत कर के सोमवार व्रतकथा सुनने वाला यदि 16 सोमवार व्रत करता हुआ विधिपूर्वक सोमवार व्रतकथा कहता अथवा कथावाचकों से सुनता है तो वह व्यक्ति इस लोक में सुख पाता है.

इसी प्रकार, 21 सप्ताह तक प्रति मंगलवार व्रत कर के जो भी स्त्री या पुरुष मंगल व्रतकथा कहता अथवा सुनता है, वह खूब धन प्राप्त करता हुआ यश को प्राप्त होता है.

इसी तरह कोई भी स्त्री अथवा पुरुष 7 बुधवार व्रत करता हुआ बुधवार व्रतकथा कहता अथवा कथावाचकों से सुनता है, उसे सद्बुद्धि प्राप्त होती है.

बृहस्पति व्रत और कथा को विशेष रूप से स्त्रियों के लिए लाभकारी घोषित किया गया है. इस व्रत को करने और कथा को कहनेसुनने से घर में धन और विद्या आती है, सुंदर पति की प्राप्ति होती है.

शुक्रवार व्रत कर के शुक्रवार व्रतकथा कहने अथवा सुनने के परिणामस्वरूप निर्धनता और दरिद्रता का नाश होता है, लक्ष्मी की प्राप्ति होती है, मन की चिंताएं दूर होती हैं.

इसी प्रकार, जो स्त्री अथवा पुरुष शनिवार व्रत कर के शनिवार व्रतकथा कहता अथवा कथावाचकों से सुनता है, उस के सब दुख दूर हो जाते हैं.

मोक्ष की गारंटी

कथाओं को कहने या सुनने के परिणामस्वरूप हमें जो फल प्राप्त होते हैं उन सब का हमारे जीवन से प्रत्यक्ष संबंध है. वैसे, हम हिंदू मर कर भी मोक्ष की, स्वर्ग की गारंटी चाहते हैं.

इन व्रतों को करने और व्रतकथाओं को कहने या कथावाचकों से सुनने का सब से बड़ा लाभ यह है कि मरने के बाद भी सुख मिलता है, मोक्ष मिलने की गांटी मिल जाती है व व्रती स्वर्ग का अधिकारी हो जाता है. लेकिन जब हम धार्मिक संस्कारों से मुक्त हो कर इन व्रतकथाओं की जांच करते हैं तो ये कथाएं अंधविश्वास की पोषक सिद्ध होती हैं.

वर्चस्व ब्राहमणों का

हमेशा से हमारे यहां साहित्य लेखन, अध्ययनअध्यापन का कार्य और समाज में शिक्षा की समुचित व्यवस्था का एकाधिकार ब्राह्मणों पर था. ब्राह्मणों को सृष्टि रचयिता ब्रह्मा के मुख से उत्पन्न और मनुष्यों में मूर्द्धन्य माना जाता था. ब्राह्मणों ने समस्त समाज पर अपना वर्चस्व बनाए रखने के उद्देश्य से मानवमंगल की उपेक्षा करने के साथ निजी हितों को सर्वोपरि सिंहासन पर आसीन करते हुए प्रलोभन व भय दिखा कर अपनी वर्तमान व भावी पीढि़यों की सुखसुविधा को ध्यान में रखा है और वे हिंदू समाज के सभी वर्गों को ‘सप्तवार व्रतकथाओं’ में बड़ी दूरदर्शिता से समेटने में सफल रहे हैं.

वर्णव्यवस्था का तानाबाना

ब्राह्मण कथावाचक और दानदक्षिणा ले कर पुण्य बरसाने वाले, सभी पापों से मुक्त करवा के परलोक में सुखसुविधा संपन्न अग्रिम आरक्षण का सुव्यवस्थापक तथा मोक्ष स्वर्गादि का मार्ग प्रशस्त करने वाले ईश्वर के प्रतिनिधि बन गए.

हर जाति के लोग बंधे रहें, इसलिए ‘शनिवार व्रतकथा’ का नायक राजा विक्रमादित्य शासन करने वाला व प्रजा का रक्षक होने से ‘क्षत्रियवर्ण’ का प्रतिनिधि है. ‘वीरवार व्रतकथा’ का नायक व्यापार में लगा ‘वैश्यवर्ण’ का प्रतिनिधि है. ‘शुक्रवार व्रतकथा’ का नायक बुढि़या का निकम्मा पुत्र सेठ के पास नौकरी करने के कारण और अन्य कहानियों -रविवार व्रतकथा की नायक बुढि़या, सोमवार व्रतकथा का धूर्त व नशेबाज पुजारी व ‘मंगलवार व्रतकथा’ की नायिका अंधविश्वासी बुढि़या -इन कहानियों में वर्णित गरीब व सेवा करने वाले पात्र ‘शूद्रवर्ण’ यानी आज के पिछड़े या बैकवर्ड के प्रतिनिधि हैं.

वर्गव्यवस्था

परिवर्तनशील परिवेश में वर्णव्यवस्था का स्थान वर्गव्यवस्था ने लिया और इस दृष्टि से इन कथाओं पर विचार किया जाए तो सेवा करने वाले ‘शोषितवर्ग’ के प्रतिनिधि हैं, जबकि शनिवार व्रतकथा का नायक राजा विक्रमादित्य ‘शोषक वर्ग’ का प्रतिनिधि है. वीरवार व्रतकथा का नायक व्यापारी-‘मध्यम वर्ग’ का प्रतिनिधि है.

पौष्टिक व संतुलित आहार और शिक्षा की कमी के कारण इस वर्ग में समुचित मानसिक विकास नहीं हो पाता. इस वर्ग में तर्कवितर्क की संभावना बहुत कम होती है. कथा बताती है कि श्रमिक वर्ग का प्रतिनिधि स्वप्न में कहे गए ‘संतोषी माता’ के कथानुसार सबकुछ करता है तो उसे अन्य दिनों की अपेक्षा अधिक आमदनी होती है. एक ही दिन में उस का सारा माल बिक जाता है. अभी तक लेनदेन का कोई हिसाब नहीं था, परंतु माता की बात मानते ही देने वाले रुपया लाए, लेने वाले हिसाब लेने लगे, खरीदार नकद दाम में सौदा करने लगे. शाम तक धन का ढेर लग गया.

इसी प्रकार एक स्त्री जिसे उस के पति ने बहुत समय से न तो पत्र भेजा था और न ही धन, अन्य औरतों को ‘संतोषी माता’ का व्रत व कथा करतेसुनते देख और उन से इस व्रत व कथा के लाभ सुन कर स्वयं भी ‘माता’ के चरणों में लोटते हुए विनती करने लगती है तो उसे दूसरे ही शुक्रवार पति द्वारा भेजा हुआ पत्र प्राप्त हो जाता है और तीसरे ही शुक्रवार उसे पति द्वारा भेजा हुआ धन मिल जाता है.

मां संतोषी के अवतार ऐसी कपोल कल्पित कहानियों का ही प्रभाव है कि आज देश के विभिन्न भागों में व टैलीविजन के विभिन्न चैनलों पर जनमानस की मानसिक दुर्बलता का लाभ उठाती हुई बहुत सी औरतें स्वयं को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से ‘संतोषी माता’ से जोड़ कर जनसाधारण को भ्रमित कर अपनी दुकानदारी चला रही हैं. वे देवीदेवताओं, स्वप्नों, भूतप्रेतों, धागेतावीजों, हस्तरेखा, कुंडली आदि देख कर भविष्य का विवरण बताने वालों और उपाय रूप में दानदक्षिणा ले कर भावी अशुभ घटनाओं व विविध बाधाओं को दूर कर सुनहरे स्वप्न दिखाने वाले पंडेपुरोहितों व पुजारियों आदि और अन्य लोकों में एडवांस बुकिंग की सुव्यवस्था करवाने वाले तथाकथित ईश्वर प्रतिनिधियों में आस्था बनाए रखने को बढ़ावा दे रही हैं.

उल्लेखनीय बात यह है, ये तथाकथित माताएं धर्म के नाम पर लंबीलंबी कथाएं राम और कृष्ण आदि की सुनाती हैं, पर आड़ में, पूजा अपनी करवाती हैं. जनसाधारण को भौतिकवादी संस्कृति से दूर रहने की प्रेरणा देती हैं, परंतु, स्वयं भौतिकता, अत्याधुनिक सांसारिक सुखसुविधा का भरपूर उपयोग करती हैं.

ये तथाकथित देवियां काम, क्रोध, लोभ, मोह व अहंकार आदि का त्याग करते हुए प्रभुचरणों में स्वयं को समर्पित करने की बातें कहती हैं, परंतु, ये स्वयं हर तरह के विकारों से घिरी हैं?

प्रतिस्पर्धात्मक दौड़ व विषम परिस्थितियों से घबरा कर शांति की खोज में बहुत से लोग इन के चरणों में शांति ढूंढ़ रहे हैं परंतु जो संन्यासी खुद अपने आश्रम के द्वार को अपने पड़ोसी संन्यासी के आश्रम के द्वार से ज्यादा ऊंचा बनवाने में लगा हुआ है, अपने सेवकों को अपनी रसोई में लगवा रहा है, उन से अपने चित्र-चित्रयुक्त मालाएं, किताबें और सीडी व कैसटों आदि की बिक्री करवा रहा है, प्रवचन सुनने वाले भक्तों से अपना प्रचार करवा रहा है, अपने प्रवचनों का मूल्य मांग रहा है तो लोभी की परिभाषा क्या होगी?

होनी बड़ी बलवान

हम हिंदू यह मान कर चलते हैं कि जो कुछ भाग्य में लिखा होगा वही मिलेगा. भाग्य के लेख को तो विधाता भी नहीं बदल सकता. होनी बड़ी बलवान है, जो होना है वह हो कर ही रहेगा. यदि भाग्य में लिखा हुआ मिलना ही है और उस में किसी प्रकार का परिवर्तन संभव नहीं, तो फिर दानपुण्य, पूजापाठ और वंदना आदि में समय व्यर्थ नष्ट करने का क्या लाभ? यदि शनि की दशा में दुख उठाना अपने भाग्य में लिखा हुआ है तो दुख झेलना ही होगा. ऐसे में, शनिवार व्रत कर के शनिदेव की कथा सुनने और चींटियों को आटा डालने का क्या औचित्य है?

पलभर के लिए यह स्वीकार भी कर लेते हैं कि शनिदेव की कथा जो सुनेगा उसे किसी प्रकार का दुख न होगा. परंतु  ‘शनिवार व्रतकथा’ के अंतर्गत जो कथा मिलती है वह तो मात्र वर्णन है कि सूर्य, चंद्रमा आदि नव ग्रहों में इस बात को ले कर झगड़ा होने लगा कि उन सब में बड़ा कौन है? जब देवता झगड़ा करते हैं तो आमजन का झगड़ा व विवाद कैसे दूर होगा?

अन्य वारों की जो व्रतकथाएं हैं वे ऐतिहासिक कथाएं न हो कर मात्र उन लोगों की कथाएं हैं जिन्होंने इन व्रतकथाओं को किया. इन कथाओं को सुन लेने मात्र से कैसे किसी फल की प्राप्ति हो सकती है? कथा क्या है, यह ही पता नहीं चलता.

धर्म की आड़ में सप्तवार व्रतकथाओं को सुन लेने अथवा पढ़ लेने से कोई धनवान नहीं हो सकता. बांझ स्त्री पुत्र नहीं प्राप्त कर सकती है? धर्म की आड़ में व्यभिचार अवश्य पनप सकता है. इस वैज्ञानिक युग में भी हम बच्चों की प्राप्ति हेतु काल्पनिक कथाकहानियों का दामन पकड़ कर बैठे हुए हैं. एक तरफ कैशलैस भारत की कल्पना की जा रही है तो दूसरी तरफ उसी सरकार द्वारा इन अंधविश्वासों को प्रोत्साहन दिया जा रहा है.

प्रलोभन व भय का सहारा

मध्यवर्ग अर्थात व्यापारी वर्ग व्यापार में उतारचढ़ाव के चलते सरकारी नियमों से निरंतर संघर्ष करते रहने के कारण आस्तिक हो गया है. ऐसी कथाकहानियों को वह संदेह की दृष्टि से नहीं देख रहा और न ही किंतु/परंतु कर के परख रहा है. ऐसी कथाकहानियों में उस की आस्था इन कथावाचकों को खूब पैसा दिलवा रही है.

उन कथाओं के रचयिता इस बात से भलीभांति परिचित थे कि साधारण नौकरी आदि करने वाले के पास धन हो ही नहीं सकता पर व्यापारी के पास हर धन होता है. इस वर्ग से दानदक्षिणा पाने के लिए प्रलोभन और भय दोनों का सहारा लिया ‘बृहस्पति व्रतकथा’ ने.

बृहस्पति व्रतकथा में बृहस्पति देव की उपेक्षा करते ही व्यापारी की पत्नी की मृत्यु हो जाती है. संपूर्ण धन नष्ट हो गया. व्यापारी का माल से भरा हुआ जहाज समुद्र में डूब गया. बड़ी मुश्किल से लकड़ी के तख्तों पर बैठ कर उस ने अपनी जान बचाई.

जब जब भी व्यापारी ने कथा न करने की भूल की, बृहस्पति देव का कहर उस पर टूटा, जेल की हवा खानी पड़ी. परंतु जैसे ही वह व्यापारी बृहस्पति देव की कथा कहता है, बृहस्पति देव उस से इतना प्रसन्न हो जाते हैं कि रात्रि में स्वप्न में दर्शन दे कर राजा को उस के निर्दोष होने की बात कह कर उसे जेल से मुक्त करवा देते हैं. जेल में डालने के अपने अपराध के लिए राजा उस से क्षमा भी मांगता है और उसे अपना आधा राज्य भी दे देता है तथा उस की लड़की का उच्च कुल में विवाह संपन्न करवा कर दहेजरूप में अनमोल हीरेजवाहरात भी देता है. वाह, क्याक्या है?

ऐसी कथाओं का ही प्रभाव है कि औरतें अपनी संतान, पति व गृहस्थ धर्म की उपेक्षा कर के साधुसंतों की सेवा करना पुण्य समझती हैं और पुण्यलाभ के लोभ में पड़ कर अपने बेटेबेटियों तक की बलि चढ़ा देने में संकोच व लज्जा का भाव अनुभव नहीं करतीं और इस सब में कई बार उन्हें यौनशोषण का शिकार भी बनना पड़ जाता है, यौनउत्पीड़न की मानसिक वेदना झेलनी पड़ती है.

इन व्रतकथाओं के अनुसार, जो कोई स्त्री/पुरुष कथाएं करता है, उस के सब दुख दूर हो जाते हैं, सब मनोरथ पूरे होते हैं. परंतु यदि आप कभी कथा करना भूल गए तो सबकुछ जाता रहेगा. कथा न करने की भूल का दंड तो भोगना ही होगा.

हिंदू परिवारों में सभी बच्चों को बाल्यकाल से यही समझाया जाता है कि भगवान सर्वगुण संपन्न, सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान हैं. हमारे धर्मोपदेशक, धर्माचार्य धर्मग्रंथों व धर्मशास्त्रों के श्लोकों के हवाले देदे कर बड़ेबड़े मंचों से, दूरदर्शन के विभिन्न चैनलों व स्वप्रकाशित सामग्री के माध्यमों से भगवान की सर्वज्ञता को सिद्ध करने के चक्कर में निरंतर एड़ीचोटी का जोर लगा रहे हैं. वे उसे ‘अंतर्यामी’ इत्यादि कई विशेषज्ञों से अलंकृत करते हैं. ऐसे में, भगवान स्वयं क्यों नहीं दोषी को गलत काम करने से रोक लेते और यदि करने देते हैं तो दोषी भगवान हुए, आदमी नहीं. असल में भगवान की कल्पना ही निरर्थक है और लूटने की साजिश है.

अकर्मण्यता को बढ़ावा

वास्तव में ये कथाएं जनसाधारण में अंधविश्वास को बढ़ाती हैं, कर्मक्षेत्र में कूदने की अपेक्षा पलायनवादी व अकर्मण्य हो कर जीने की प्रेरणा देती हैं.

ये कथाएं लिखी गईं, यह एक गलती थी. सदियों तक इन्हें दोहराया गया, स्वीकार किया गया. यह दूसरी गलती थी. तीसरी गलती है आज भी इन से चिपके रहना.

विश्व प्रतिपल नएनए मार्गों पर अग्रसर हो रहा है परंतु हम कंप्यूटर का बटन दबाने के साथसाथ मंदिर की घंटी भी बजा रहे हैं, विज्ञान की परीक्षा देने के साथ भारत के आधुनिक अथवा प्राचीन देवीदेवताओं अथवा संतों के चरणों में गिर कर गिड़गिड़ा रहे हैं. हमारे चंद्रयान भेजने वाले वैज्ञानिक भयंकर मूर्तिपूजक भी हैं और मूर्ति में बसे भगवान में भरोसा करते हैं. यह कैसा उदाहरण है तार्किक व वैज्ञानिक सोच का.

इस प्रकार के जीवनदर्शन से भारत में निराशावाद पनपा. हम मुट्ठीभर विदेशी आक्रमणकारियों का डट कर सामना करने की अपेक्षा कस कर माला को पकड़ लेने और शिवलिंगों से लिपट जाने में अपनी भलाई समझते रहे. आक्रमणकारी अधपके लोग साम्राज्य स्थापित करने में सफल हो गए और हम ‘नमोभगवते वासुदेवाय’, ‘नम: शिवाय’ इत्यादि मंत्रों का जाप करते हुए वर्तमान से संघर्ष करने की अपेक्षा कथित स्वर्ग में अग्रिम आरक्षण हेतु अज्ञात सत्ता की साधना व खोज में पलायनवादी बने रह गए.

पैसों की भूखी एक प्रेमिका का हैरतअंगेज खेल

आज एक की बांहों में, तो कल दूसरे की बांहों में. इस तरह के कई प्रेमी देखने को मिल जाएंगे, पर कई लड़कों से इश्क लड़ा कर उन के पैसों पर ऐश करने का शौक रखने वाली लड़कियां कम ही मिलती हैं. विदिशा, मध्य प्रदेश की स्वीटी (बदला हुआ नाम) उन में से एक थी. उसे बौयफ्रैंड बनाने का शौक था. वह आएदिन नएनए बौयफ्रैंड बनाती थी. जिस की जेब उसे तंग लगने लगती, वह उस को अपनी जिंदगी से दूर कर देती थी. हाल ही में स्वीटी ने गोपाल रैकवार को अपने हुस्न के जाल में फंसाया. कुछ समय तक उस के पैसों पर खूब ऐश की. जब उस ने महसूस किया कि गोपाल की जेब तंग हो रही है, तो उस ने एक बकरा काट कर बेचने वाले मोटे आसामी अकरम को हुस्न का चारा दिखा कर अपना आशिक बना लिया और उसे हलाल करने लगी.

इस बात का पता गोपाल को चला. वह स्वीटी को अकरम से दूर रखने की कोशिश करने लगा. स्वीटी कम होशियार नहीं थी. उस ने दोनों हाथों में लड्डू हासिल करने के लिए अपने प्रेमियों के सामने दिल्ली सरकार के ईवनऔड वाले फार्मूले की तरह तारीख को आपस में बांट लेने का औफर रखा.

गोपाल को स्वीटी का औफर पसंद नहीं आया, तो उस की लाश शहर के बाहर एक कुएं में मिली. मध्य प्रदेश के विदिशा जिले के लोहांगीपुरा की रहने वाली 19 साला स्वीटी दिखने में काफी खूबसूरत थी. उस के पिता की मौत कई साल पहले हो गई थी. उस की विधवा मां बच्चों की सही तरीके से देखभाल नहीं कर पा रही थी. वह मंडी में मजदूरी कर के अपने तीनों बच्चों का पेट पाल रही थी.

कहते हैं कि गरीब की बेटी जल्दी ही जवान हो जाती है. ऐसा ही स्वीटी के साथ भी हुआ. अपनी ख्वाहिशों को पूरा करने के लिए उस ने अपने हुस्न को ही चारा बना लिया. उस ने खातेपीते घरों के लड़कों को पटाना शुरू किया. स्वीटी के हुस्न को पाने के लालच में कई लड़के बहुतकुछ लुटाने को तैयार थे. वह उन्हें हुस्न का स्वाद चखाती, इस के बदले में उन से मोटी रकम लेती. उस रकम से वह ऐश करती.

स्वीटी को मोटरसाइकिल चलाने का शौक था.  विदिशा और बीना की भीड़ भरी सड़कों पर तेज स्पीड में मोटरसाइकिल चला कर वह लोगों के आकर्षण का केंद्र बन चुकी थी.

गोपाल खातेपीते घर से था. वह स्वीटी की खूबसूरती के जाल में फंस कर उस से प्यार करने लगा. वह उस पर मनमाना खर्च भी करने लगा. जब भी वे दोनों मोटरसाइकिल पर शहर में घूमने निकलते, तो स्वीटी गोपाल को पीछे बिठा कर मोटरसाइकिल खुद चलाती थी. उस वक्त गोपाल स्वीटी की कमर को कस कर पकड़ लेता था.

पूरे शहर में दोनों के प्यार की चर्चा हो रही थी. यह बात गोपाल के घर वालों तक भी पहुंच गई. उन्हें स्वीटी का स्वभाव बिलकुल भी पसंद नहीं था. वे स्वीटी को चालू किस्म की लड़की मानते थे. गोपाल के परिवार वालों ने समझाते हुए उसे स्वीटी से दूर रहने की हिदायत दी, पर गोपाल पर स्वीटी के प्यार का नशा बुरी तरह से चढ़ा हुआ था.

इधर स्वीटी ने महसूस किया कि गोपाल का हाथ कुछ तंग होता जा रहा है. ऐसे में वह दूसरे प्रेमी की तलाश में लग गई. एक दिन स्वीटी की मुलाकात 28 साला अकरम से हुई. वह मांस बेचने का धंधा करता था. उस की कमाई अच्छी थी. स्वीटी ने उसे अपने हुस्न के जाल में फंसा लिया. वह उस पर दिल खोल कर खर्च करने लगा.

स्वीटी इस बात का ध्यान रखती थी कि उस की और अकरम की दोस्ती की खबर गोपाल को न लगे. इस के लिए वह गोपाल से भी मिलती रही. गोपाल से स्वीटी और अकरम की दोस्ती की खबर ज्यादा दिनों तक छिपी नहीं रह सकी. उस ने स्वीटी पर अपना हक जताते हुए उसे अकरम से दूर रहने की हिदायत दी.

स्वीटी ने गोपाल से कहा, ‘‘तुम मेरे मामले में दखलअंदाजी मत करो. मैं किस से मिलूंगी या नहीं मिलूंगी, यह मेरा पर्सनल मामला है. तुम अगर चाहते हो कि मेरा प्यार तुम्हें भी बराबर मिलता रहे, तो मेरे पास एक फार्मूला है. तुम दिल्ली सरकार के ईवनऔड फार्मूले की तरह तारीख तय कर लो. मैं उस दिन तुम्हारे पास रहूंगी और अगले दिन अकरम के साथ.’’

गोपाल को उस की बात पसंद नहीं आई. वह स्वीटी को हमेशा अपनी बांहों में रखना चाहता था. उस ने स्वीटी के फार्मूले को मानने से इनकार कर दिया. इधर गोपाल स्वीटी को रोकने में लगा था कि वह अकरम से न मिले. साथ ही, अकरम को भी वह बारबार मोबाइल कर के स्वीटी से दूर रहने की हिदायत देता रहा था.

अकरम ने स्वीटी को फोन कर के कहा, ‘‘अपने आशिक गोपाल को संभाल ले, वरना मैं उसे ऊपर पहुंचा दूंगा.’’

स्वीटी को गोपाल अब सिरदर्द लगने लगा था, क्योंकि वह काफी टोकाटाकी करने लगा था.

स्वीटी ने अकरम से कहा, ‘‘रोजरोज के झगड़े से अच्छा है कि गोपाल को निबटा ही दें.’’

अपनी प्रेमिका का आदेश मिलते ही अकरम ने 28 मार्च, 2016 की रात को गोपाल को अपनी दुकान पर बुलाया. अपने नौकर सुरेश पाल के साथ मिल कर उस ने गोपाल को जम कर शराब पिलाने के बाद उस की हत्या कर दी.

अकरम ने यह सूचना स्वीटी को दे दी. गोपाल की हत्या की खबर सुन कर स्वीटी काफी खुश हुई. वह अकरम की दुकान पर पहुंच गई. वहां तीनों ने जम कर शराब पी और जश्न मनाया.

बाद में पुलिस ने हत्या के आरोप में अकरम, उस के नौकर सुरेश पाल व स्वीटी को गिरफ्तार कर लिया. इस केस की जांच कर रहे अधिकारी राजेश तिवारी का कहना है, ‘‘जवानी के जोश में नौजवानों को किसी बात का होश ही नहीं रहता है. लड़के खेलीखाई लड़की से मेलजोल बढ़ाते वक्त उस पर भरोसा न रखें, क्योंकि ऐसी लड़की अपने फायदे के लिए कुछ भी कर सकती है.’’

मर्दों को अपने जाल में फंसाती लड़कियां

‘‘एक दिन रात के 10 बजे एक डाक्टर जब अपना क्लिनिक बंद कर के घर लौट रहे थे, तो रास्ते में उन्होंने देखा कि एक लड़की के साथ कुछ लफंगे जबरदस्ती कर रहे थे. वह लड़की ‘बचाओबचाओ’ चिल्ला रही थी. डाक्टर ने उस लड़की की मदद करने के मकसद से अपनी कार रोकी. कार के रुकते ही लफंगे भाग खड़े हुए.

डाक्टर ने उस लड़की की हिम्मत बंधाते हुए कहा, ‘‘कहां जाना है आप को? चलो, मैं छोड़ देता हूं.’’

वह लड़की तैयार हो गई. पर कुछ देर बाद ही उस लड़की ने शोर मचाना शुरू कर दिया. डाक्टर सकते में आ गए.

लड़की ने कहा, ‘‘आप मुझे 5 हजार रुपए दें, वरना मैं अपने कपड़े फाड़ लूंगी और आप पर इलजाम लगा दूंगी कि आप मुझे लिफ्ट देने के नाम पर मेरे साथ जबरदस्ती कर रहे थे.’’

डाक्टर ने 5 हजार रुपए दे कर उस लड़की से अपना पीछा छुड़ाया.

*  ‘‘भाई साहब, जरा रुकिए…’’ अंधेरी रात में मोटरसाइकिल पर जा रहे एक नौजवान को जब किसी लड़की ने पुकारा, तो उस ने जोर से ब्रेक लगा कर अपनी मोटरसाइकिल रोक दी और पूछा, ‘‘कहिए?’’

उस लड़की ने रोते हुए कहा, ‘‘मेरा भाई बहुत बीमार है. मुझे जल्दी घर पहुंचना है. मेरी मदद कीजिए. आप मुझे घर तक छोड़ देंगे, तो भगवान आप का भला करेगा.’’

यह सुन कर वह नौजवान पसीज गया और अपनी मोटरसाइकिल पर उसे लिफ्ट दे दी.

वह नौजवान जब रास्ते पर आगे बढ़ा, तो सुनसान इलाका आते ही एक मोटरसाइकिल पर सवार 2 लड़के पीछे से आए और आगे आ कर उन का रास्ता रोक लिया.

उन दोनों लड़कों ने उस नौजवान की कनपटी पर पिस्तौल लगा कर कहा, ‘‘किधर ऐश करने जा रहा है?’’

वह लड़की मोटरसाइकिल से उतर कर कुछ दूरी पर चुपचाप खड़ी रही… उस के साथी लुटेरों ने पिस्तौल अड़ा कर उस नौजवान की जेब से सारे रुपएपैसे व सोने की चेन व अंगूठी झपट ली और उस की मोटरसाइकिल की हवा निकाल दी.

उस गैंग में शामिल वह लड़की अपने साथियों की मोटरसाइकिल पर बैठ कर भाग गई.

* उस दिन घनघोर बादल छाए हुए थे और मूसलाधार बारिश हो रही थी. एक जौहरी अपनी दुकान बंद कर घर लौट रहे थे. रास्ते में उन्हें किसी का ऐक्सिडैंट होता दिखाई दिया. उन्होंने अपनी कार रोकी तो देखा कि एक लड़की बेहोश पड़ी थी.

वे जौहरी कार से उतरे और उस लड़की को अपनी कार में डाल कर अस्पताल ले जाने लगे.

थोड़ी दूर जाने के बाद ही वह लड़की ऐसे उठ बैठी, जैसे कुछ हुआ ही न हो. वह तो बेहोशी का नाटक कर रही थी.

उस लड़की ने जौहरी से कहा, ‘‘तुम्हारे पास जोकुछ रुपयापैसा, जेवर है, चुपचाप मेरे हवाले कर दो, वरना मैं शोर मचा दूंगी कि तुम ने मेरे साथ जबरदस्ती की है. फिर सारी जिंदगी जेल की चक्की पीसते रहना.’’

* एक लड़की ने एक पैसे वाले लड़के को फांस लिया. वैसे, उसे मालूम था कि उस लड़के की सगाई हो चुकी है और कुछ महीने बाद उस की शादी होने वाली है. लड़का भी उस लड़की के झांसे में आ गया.

लड़की ने लड़के को जिस्मानी संबंध बनाने के लिए उकसाया और मोबाइल फोन में उन पलों को कैद कर लिया. इस के बाद उस ने लड़के पर दबाव बनाया कि वह उसे 5 लाख रुपए दे, वरना वह यह वीडियो क्लिप उस की मंगेतर के पास भेज देगी. लड़के को मजबूर हो कर उसे पैसे देने पड़े.

आमतौर पर औरतों व लड़कियों को छलकपट से दूर ममतामयी माना जाता है, लेकिन इस की आड़ में कुछ शातिर औरतें व लड़कियां स्वांग रच कर मर्दों को अपने जाल में फांसती हैं.

किसी भी लड़की या औरत के माथे पर लिखा नहीं होता कि वह कैसी है. मर्द भावुक हो कर मदद का हाथ बढ़ाते हैं, बदले में मिलता है धोखा, इसलिए किसी भी अनजान लड़की या औरत को लिफ्ट देने या उस पर हद से ज्यादा यकीन करने से बचें. साथ ही, आप उस से चौकस रहें, वरना आप हवालात में होंगे और वह आप का तमाशा बनते देख मुसकरा रही होगी.

पत्नी की मौत के बाद टूट से गये थे शशि कपूर

शशि कपूर बौलीवुड इंडस्ट्री का ऐसा चेहरा जिन्हे भुला नामुमकिन है, अगर इनकी निजी जीवन की बात की जाए तो इनके जिंदगी में भी एक मोहब्बत थी वो थी शशि कपूर की पत्नी केंडल.

साल 1958 में शशि कपूर ने केंडल जेनर से शादी कर ली थी. बाल कलाकार के तौर पर डेब्यू करने के ठीक एक दशक बाद. शादी के बाद उनकी पत्नी का नाम केंडल जेनिफर से केंडल कपूर हो गया था. दोनों के बीच बहुत प्यार था. शशि पहले ऐसे सेलिब्रिटी थे जिनका जीवनसाथी विदेशी था.

दोनों का साथ लंबा नहीं रहा और साल 1984 में केंडल की कैंसर की वजह से मौत हो गई. इसने शशि को अंदर से तोड़ दिया था.

एक लेख में शशि की पारिवारिक दोस्त रिंकी रौय भट्टाचार्य ने बताया जेनिफर ने कई तरह से शशि की जिंदगी पर प्रभाव डाला था. जिसका सबूत उनका अनुशासन और परिवार के लिए समय देने का सेंस था. उन्होंने ही शशि को समझाया था कि रविवार परिवार का समय होता है. जिसकी वजह से शशि रविवार को कोई शूटिंग नहीं किया करते थे.

जेनिफर के बिना शशि की जिंदगी संकटमय हो गई थी. उनके निधन के बाद शशि बुरी तरह से टूट गए थे. शशि की बेहतरीन फिजिक के पीछे भी जेनिफर का हाथ था. उन्हें पत्नी की तरफ से नाश्ते में केवल एक कप कौफी और दो बिना मक्शन वाले टोस्ट खाने की इजाजत थी.

उनका यह रुटीन कई सालों तक बरकरार रहा. हालांकि बहुत कम फिल्मों में शशि के साथ जेनिफर नजर आई थीं. साल 1978 में रिलीज हुई फिल्म जुनून के लिए जेनिफर को बेस्ट सपोर्टिंग एक्ट्रेस का फिल्मफेयर अवौर्ड मिला था. इस फिल्म को प्रोड्यूस करने के साथ ही शशि ने लीड एक्टर का रोल भी निभाया था.

जब जेनिफर की मौत हुई उस समय शशि केवल 46 साल के थे. शशि ने अपनी पत्नी को याद करते हुए कहा था कि अगर उनकी मौत पहले हो गई होती तो उनके बिना जेनिफर इतने वक्त तक जी नहीं पाती, जितना वक्त उन्होंने अपनी पत्नी के बिना अकेले बिताया है. शशि का कहना था कि उनकी पत्नी उनके मुकाबले ना केवल एक बेहतर ऐक्टर बल्कि एक बेहतर इंसान भी थीं.

परी हूं मैं : तरुण ने दिखाई मुझे मेरी औकात

जिस रोज वह पहली बार राजीव के साथ बंगले पर आया था, शाम को धुंधलका हो चुका था. मैं लौन में डले झूले पर अनमनी सी अकेली बैठी थी. राजीव ने परिचय कराया, ‘‘ये तरुण, मेरा नया स्टूडैंट. भोपाल में परी बाजार का जो अपना पुराना घर था न, उसी के पड़ोस में रमेश अंकल रहते थे, उन्हीं का बेटा है.’’ सहजता से देखा मैं ने उसे. अकसर ही तो आते रहते हैं इन के निर्देशन में शोध करने वाले छात्र. अगर आंखें नीलीकंजी होतीं तो यह हूबहू अभिनेता प्राण जैसा दिखता. वह मुझे घूर रहा था, मैं हड़बड़ा गई.

‘‘परी बाजार में काफी अरसे से नहीं हुआ है हम लोगों का जाना. भोपाल का वह इलाका पुराने भोपाल की याद दिलाता है,’’ मैं बोली.

‘‘हां, पुराने घर…पुराने मेहराब टूटेफूटे रह गए हैं, परियां तो सब उड़ चुकी हैं वहां से’’, कह कर तरुण ने ठहाका लगाया. तब तक राजीव अंदर जा चुके थे.

‘‘उन्हीं में से एक परी मेरे सामने खड़ी है,’’ लगभग फुसफुसाया वह…और मेरे होश उड़ गए. शाम गहराते ही आकाश में पूनम का गोल चांद टंग चुका था, मुझे

लगा वह भी तरुण के ठहाके के साथ खिलखिला पड़ा है. पेड़पौधे लहलहा उठे. उस की बात सुन कर धड़क गया था मेरा दिल, बहुत तेजी से, शायद पहली बार.

उस पूरी रात जागती रही मैं. पहली बार मिलते ही ऐसी बात कोई कैसे कह सकता है? पिद्दा सा लड़का और आशिकों वाले जुमले, हिम्मत तो देखो. मुझे गुस्सा ज्यादा आ रहा था या खुशी हो रही थी, क्या पता. मगर सुबह का उजाला होते मैं ने आंखों से देखा.

उस की नजरों में मैं एक परी हूं. यह एक बात उस ने कई बार कही और एक ही बात अगर बारबार दोहराई जाए तो वह सच लगने लगती है. मुझे भी तरुण की बात सच लगने लगी.

और वाकई, मैं खुद को परी समझने लगी थी. इस एक शब्द ने मेरी दुनिया बदल कर रख दी. इस एक शब्द के जादू ने मुझे अपने सौंदर्य का आभास करा दिया और इसी एक शब्द ने मुझे पति व प्रेमी का फर्क समझा दिया.

2 किशोरियों की मां हूं अब तो. शादी हो कर आई थी तब 23 की भी नहीं थी, तब भी इन्होंने इतनी शिद्दत से मेरे  रंगरूप की तारीफ नहीं की थी. परी की उपमा से नवाजना तो बहुत दूर की बात. इन्हें मेरा रूप ही नजर नहीं आया तो मेरे शृंगार, आभूषण या साडि़यों की प्रशंसा का तो प्रश्न ही नहीं था.

तरुण से मैं 1-2 वर्ष नहीं, पूरे 13 वर्ष बड़ी हूं लेकिन उस की यानी तरुण की तो बात ही अलहदा है. एक रोज कहने लगा, ‘मुझे तो फूल क्या, कांटों में भी आप की सूरत नजर आती है. कांटों से भी तीखी हैं आप की आंखें, एक चुभन ही काफी है जान लेने के लिए. पता नहीं, सर, किस धातु के बने हैं जो दिनरात किताबों में आंखें गड़ाए रहते हैं.’

‘बोरिंग डायलौग मत मारो, तरुण,’ कह कर मैं ने उस के कमैंट को भूलना चाहा पर उस के बाद नहाते ही सब से पहले मैं आंखों में गहरा काजल लगाने लगी, अब तक सब से पहले सिंदूर भरती थी मांग में.

तरुण के आने से जानेअनजाने ही शुरुआत हो गई थी मेरे तुलनात्मक अध्ययन की. इन की किसी भी बात पर कार्य, व्यवहार, पहनावे पर मैं स्वयं से ही प्रश्नोत्तर कर बैठती. तरुण होता तो ऐसे करता, तरुण यों कहता, पहनता, बोलता, हंसताहंसाता.

बात शायद बोलनेबतियाने या हंसतेहंसाने तक ही सीमित रहती अगर राजीव को अपने शोधपत्रों के पठनपाठन हेतु अमेरिका न जाना पड़ता. इन का विदेश दौरा अचानक तय नहीं हुआ था. पिछले सालडेढ़साल से इस सैमिनार की चर्चा थी यूनिवर्सिटी में और तरुण को भी पीएचडी के लिए आए इतना ही वक्त हो चला है.

हालांकि इन के निर्देशन में अब तक दसियों स्टूडैंट्स रिसर्च कंपलीट कर चुके हैं मगर वे सभी यूनिवर्सिटी से घर के ड्राइंगरूम और स्टडीहौल तक ही सीमित रहे किंतु तरुण के गाइड होने के साथसाथ ये उस के बड़े भाई समान भी थे क्योंकि तरुण इन के गृहनगर भोपाल का होने के संग ही रमेश अंकल का बेटा जो ठहरा. इस संयोग ने गुरुशिष्य को भाई के नाते की डोर से भी बांध दिया था.

औपचारिक तौर पर तरुण अब भी भाभीजी ही कहता है. शुरूशुरू में तो उस ने तीजत्योहार पर राजीव के और मेरे पैर भी छुए. देख कर राजीव की खुशी छलक पड़ती थी. अपने घरगांव का आदमी परदेस में मिल जाए, तो एक सहारा सा हो जाता है. मानो एकल परिवार भरापूरा परिवार हो जाता है. तरुण भी घर के एक सदस्य सा हो गया था, बड़ी जल्दी उस ने मेरी रसोई तक एंट्री पा ली थी. मेरी बेटियों का तो प्यारा चाचू बन गया था. नन्हीमुन्नी बेटियों के लिए उन के डैडी के पास वक्त ही कहां रहा कभी.

यों तो तरुण कालेज कैंपस के ही होस्टल में टिका है पर वहां सिर्फ सामान ही पड़ा है. सारा दिन तो लेबोरेट्री, यूनिवर्सिटी या फिर हमारे घर पर बीतता है. रात को सोने जाता है तो मुंह देखने लायक होता है.

3 सप्ताहों का दौरा समाप्त कर तमाम प्रशंसापत्र, प्रशस्तिपत्र के साथ ही नियुक्ति अनुबंध के साथ राजीव लौटे थे. हमेशा की तरह यह निर्णय भी उन्होंने अकेले ही ले लिया था. मुझ से पूछने की जरूरत ही नहीं समझी कि ‘तुम 3 वर्ष अकेली रह लोगी?’

मैं ने ही उन की टाई की नौट संवारते पूछा था, ‘‘3 साल…? कैसे संभालूंगी सब? और रिद्धि व सिद्धि…ये रह लेंगी आप के बगैर?’’

‘‘तरुण रहेगा न, वह सब मैनेज कर लेगा. उसे अपना कैरियर बनाना है. गाइड हूं उस का, जो कहूंगा वह जरूर करेगा. समझदार है वह. मेरे लौटते ही उसे डिगरी भी तो लेनी है.’’

मैं पल्लू थामे खड़ी रह गई. पक्के सौदागर की तरह राजीव मुसकराए और मेरा गाल थपथपाते यूनिवर्सिटी चले गए, मगर लगा ऐसा जैसे आज ही चले गए. घर एकदम सुनसान, बगीचा सुनसान, सड़कें तक सुनसान सी लगीं. वैसे तो ये घर में कोई शोर नहीं करते मगर घर के आदमी से ही तो घर में बस्ती होती है.

इन के जाने की कार्यवाही में डेढ़ माह लग गए. किंतु तरुण से इन्होंने अपने सामने ही होस्टलरूम खाली करवा कर हमारा गैस्टरूम उस के हवाले कर दिया. अब तरुण गैर कहां रह गया था? तरुण के व्यवहार, सेवाभाव से निश्ंिचत हो कर राजीव रवाना हो गए.

वैसे वे चाहते थे घर से अम्माजी को भी बुला लिया जाए मगर सास से मेरी कभी बनी ही नहीं, इसलिए विकल्प के तौर पर तरुण को चुन लिया था. फिर घर में सौ औरतें हों मगर एक आदमी की उपस्थिति की बात ही अलग होती है. तरुण ने भी सद्गृहस्थ की तरह घर की सारी जिम्मेदारी उठा ली थी. हंसीमजाक हम दोनों के बीच जारी था लेकिन फिर भी हमारे मध्य एक लक्ष्मणरेखा तो खिंची ही रही.

इतिहास गवाह है ऐसी लक्ष्मणरेखाएं कभी भी सामान्य दशा में जानबूझ कर नहीं लांघी गईं बल्कि परिस्थिति विशेष कुछ यों विवश कर देती हैं कि व्यक्ति का स्वविवेक व संयम शेष बचता ही नहीं है.

परिस्थितियां ही कुछ बनती गईं कि उस आग ने मेरा, मुझ में कुछ छोड़ा ही नहीं. सब भस्म हो गया, आज तक मैं ढूंढ़ रही हूं अपनेआप को.

आग…सचमुच की आग से ही जली थी. शिफौन की लहरिया साड़ी पहनने के बावजूद भी किचन में पसीने से तरबतर व्यस्त थी कि दहलीज पर तरुण आ खड़ा हुआ और जाने कब टेबलफैन का रुख मेरी ओर कर रैगुलेटर फुल पर कर दिया. हवा के झोंके से पल्ला उड़ा और गैस को टच कर गया.

बस, एक चिनगारी से भक् से आग भड़क गई. सोच कर ही डर लगता है. भभक उठी आग. हम दोनों एकसाथ चीखे थे. तरुण ने मेरी साड़ी खींची. मुझ पर मोटे तौलिए लपेटे हालांकि इस प्रयास में उस के भी हाथ, चेहरा और बाल जल गए थे.

मुझे अस्पताल में भरती करना पड़ा और तरुण के हाथों पर भी पट्टियां बंध चुकी थीं तो रिद्धि व सिद्धि को किस के आसरे छोड़ते. अम्माजी को बुलाना ही पड़ा. आते ही अम्माजी अस्पताल पहुंचीं.

‘देख, तेरी वजह से तरुण भी जल गया. कहते हैं न, आग किसी को नहीं छोड़ती. बचाने वाला भी जलता जरूर है.’ जाने क्यों अम्मा का आना व बड़बड़ाना मुझे अच्छा नहीं लगा. आंखें मूंद ली मैं ने. अस्पताल में तरुण नर्स के बजाय खुद मेरी देखभाल करता. मैं रोती तो छाती से चिपका लेता. वह मुझे होंठों से चुप करा देता. बिलकुल ताजा एहसास.

अस्पताल से डिस्चार्ज हो कर घर आई तो घर का कोनाकोना एकदम नया सा लगा. फूलपत्तियां सब निखर गईं जैसे. जख्म भी ठीक हो गए पर दाग छोड़ गए, दोनों के अंगों पर, जलने के निशान.

तरुण और मैं, दोनों ही तो जले थे एक ही आग में. राजीव को भी दुर्घटना की खबर दी गई थी. उन्होंने तरुण को मेरी आग बुझाने के लिए धन्यवाद के साथ अम्मा को बुला लेने के लिए शाबाशी भी दी.

तरुण को महीनों बीत चले थे भोपाल गए हुए. लेकिन वहां उस की शादी की बात पक्की की जा चुकी थी. सुनते ही मैं आंसू बहाने लगी, ‘‘मेरा क्या होगा?’’

‘परी का जादू कभी खत्म नहीं होता.’ तरुण ने पूरी तरह मुझे अपने वश में कर लिया था, मगर पिता के फैसले का विरोध करने की न उस में हिम्मत थी न कूवत. स्कौलरशिप से क्या होना जाना था, हर माह उसे घर से पैसे मांगने ही पड़ते थे.

तो इस शादी से इनकार कैसे करता? लड़की सरकारी स्कूल में टीचर है और साथ में एमफिल कर रही है तो शायद शादी भी जल्दी नहीं होगी और न ही ट्रांसफर. तरुण ने मुझे आश्वस्त कर दिया.

मैं न सिर्फ आश्वस्त हो गई बल्कि तरुण के संग उस की सगाई में भी शामिल होने चली आई. सामान्य सी टीचरछाप सांवली सी लड़की, शक्ल व कदकाठी हूबहू मीनाकुमारी जैसी.

एक उम्र की बात छोड़ दी जाए तो वह मेरे सामने कहीं नहीं टिक रही थी. संभवतया इसलिए भी कि पूरे प्रोग्राम में मैं घर की बड़ी बहू की तरह हर काम दौड़दौड़ कर करती रही. बड़ों से परदा भी किया. छोटों को दुलराया भी. तरुण ने भी भाभीभाभी कर के पूरे वक्त साथ रखा लेकिन रिंग सेरेमनी के वक्त स्टेज पर लड़की के रिश्तेदारों से परिचय कराया तो भाभी के रिश्ते से नहीं बल्कि, ‘ये मेरे बौस, मेरे गाइड राजीव सर की वाइफ हैं.’

कांटे से चुभे उस के शब्द, ‘सर की वाइफ’, यानी उस की कोई नहीं, कोई रिश्ता नहीं. तरुण को वापस तो मेरे ही साथ मेरे ही घर आना था. ट्रेन छूटते ही शिकायतों की पोटली खोल ली मैं ने. मैं तैश में थी, हालांकि तरुण गाड़ी चलते ही मेरा पुराना तरुण हो गया था. मेरा मुझ पर ही जोर न चल पाया, न उस पर.

मौसम बदल रहे थे. अपनी ही चाल में, शांत भाव से. मगर तीसरे वर्ष के मौसमों में कुछ ज्यादा ही सन्नाटा महसूस हो रहा था, भयावह चुप्पियां. आंखों में, दिलों में और घर में भी.

तूफान तो आएंगे ही, एक नहीं, कईकई तूफान. वक्त को पंख लग चुके थे और हमारी स्थिति पंखकटे प्राणियों की तरह होती लग रही थी. मुझे लग रहा था समय को किस विध बांध लूं?

तरुण की शादी की तारीख आ गई. सुनते ही मैं तरुण को झंझोड़ने लगी, ‘‘मेरा क्या होगा?’’

‘परी का जादू कभी खत्म नहीं होगा,’ इस बार तरुण ने मुझे भविष्य की तसल्ली दी. मैं पूरा दिन पगलाई सी घर में घूमती रही मगर अम्माजी के मुख पर राहत स्पष्ट नजर आ रही थी. बातों ही बातों में बोलीं भी, ‘अच्छा है, रमेश भाईसाहब ने सही पग उठाया. छुट्टा सांड इधरउधर मुंह मारे, फसाद ही खत्म…खूंटे से बांध दो.’

मुझे टोका भी, कि ‘कौन घर की शादी है जो तुम भी चलीं लदफंद के उस के संग. व्यवहार भेज दो, साड़ीगहना भेज दो और अपना घरद्वार देखो. बेटियों की छमाही परीक्षा है, उस पर बर्फ जमा देने वाली ठंड पड़ रही है.’

अम्माजी को कैसे समझाती कि अब तो तरुण ही मेरी दुलाईरजाई है, मेरा अलाव है. बेटियों को बहला आई, ‘चाची ले कर आऊंगी.’

बड़े भारी मन से भोपाल स्टेशन पर उतरी मैं. भोपाल के जिस तालाब को देख मैं पुलक उठती थी, आज मुंह फेर लिया, मानो मोतीताल के सारे मोती मेरी आंखों से बूंदें बन झरने लगे हों.

तरुण ने बांहों में समेट मुझे पुचकारा. आटो के साइड वाले शीशे पर नजर पड़ी, ड्राइवर हमें घूर रहा था. मैं ने आंसू पोंछ बाहर देखना शुरू कर दिया. झीलों का शहर, हरियाली का शहर, टेकरीटीलों पर बने आलीशन बंगलों का शहर और मेरे तरुण का शहर.

आटो का इंतजार ही कर रहे थे सब. अभी तो शादी को हफ्ताभर है और इतने सारे मेहमान? तरुण ने बताया, मेहमान नहीं, रिश्तेदार एवं बहनें हैं. सब सपरिवार पधारे हैं, आखिर इकलौते भाई की शादी है. सुन कर मैं ने मुंह बनाया और बहनों ने मुझे देख कर मुंह बनाया.

रात होते ही बिस्तरों की खींचतान. गरमी होती तो लंबीचौड़ी छत थी ही. सब अपनीअपनी जुगाड़ में थे. मुझे अपना कमरा, अपना पलंग याद आ रहा था. तरुण ने ही हल ढूंढ़ा, ‘भाभी जमीन पर नहीं सो पाएंगी. मेरे कमरे के पलंग पर भाभी की व्यवस्था कर दो, मेरा बिस्तरा दीवान पर लगा दो.’

मुझे समझते देर नहीं लगी कि तरुण की बहनों की कोई इज्जत नहीं है और मां ठहरी गऊ, तो घर की बागडोर मैं ने संभाल ली. घर के बड़ेबूढ़ों और दामादों को इतना ज्यादा मानसम्मान दिया, उन की हर जरूरतसुविधा का ऐसा ध्यान रखा कि सब मेरे गुण गाने लगे. मैं फिरकनी सी घूम रही थी. हर बात में दुलहन, बड़ी बहू या भाभीजी की राय ली जाती और वह मैं थी.

सब को खाना खिलाने के बाद ही मैं खाना खाने बैठती. तरुण भी किसी न किसी बहाने से पुरुषों की पंगत से बच निकलता. स्त्रियां सभी भरपेट खा कर छत पर धूप सेंकनेलोटने पहुंच जातीं. तरुण की नानी, जो सीढि़यां नहीं चढ़ पाती थीं, भी नीम की सींक से दांत खोदते पिछवाड़े धूप में जा बैठतीं. तब मैं और तरुण चौके में अंगारभरे चूल्हे के पास अपने पाटले बिछाते और थाली परोसते.

आदत जो पड़ गई है एक ही थाली में खाने की, नहीं छोड़ पाए. जितने अंगार चूल्हे में भरे पड़े थे उस से ज्यादा मेरे सीने में धधक रहे थे. आंसू से बुझें तो कैसे? तरुण मनाते हुए अपने हाथ से मुझे कौर खिला रहे थे कि उस की भांजी अचानक आ गई चौके में गुड़ लेने…लिए बगैर ही भागी ताली बजाते हुए, ‘तरुण मामा को तो देखो, बड़ी मामीजी को अपने हाथ से रोटी खिला रहे हैं. मामीजी जैसे बच्ची हों. बच्ची हैं क्या?’

तरुण फुरती से दौड़ा उस के पीछे, तब तक तो खबर फैल चुकी थी. मैं कुछ देर तो चौके में बैठी रह गई. जब छत पर पहुंची तो औरतों की नजरों में स्पष्ट हिकारत भाव देखा और तो और, उस रोज से नानी की नजरें बदली सी लगीं. मैं सावधान हो गई.

ज्योंज्यों शादी की तिथि नजदीक आ रही थी, मेरा जी धकधक कर रहा था. तरुण का सहज उत्साहित होना मुझे अखर रहा था. इसीलिए तरुण को मेहंदी लगाती बहनों के पास जा बैठी. मगर तरुण अपने में ही मगन बहन से बात कर रहा था, ‘पुष्पा, पंजे और चेहरे के जले दागों पर भी हलके से हाथ फेर दे मेहंदी का, छिप जाएंगे.’

सुन कर मैं रोक न पाई खुद को, ‘‘तरुण, ये दाग न छिपेंगे, न इन पर कोई दूसरा रंग चढ़ेगा. आग के दाग हैं ये.’’

सन्नाटा छा गया हौल में. मुझे राजीव आज बेहद याद आए. कैसी निरापदता होती है उन के साथ, तरुण को देखो…तो वह दूर बड़ी दूर नजर आता है और राजीव, हर पल उस के संग. आज मैं सचमुच उन्हें याद करने लगी.

आखिरकार बरात प्रस्थान का दिन आ गया, मेरे लिए कयामत की घड़ी थी. जैसे ही तरुण के सेहरा बंधा, वह अपने नातेरिश्तेदारों से घिर गया. उसे छूना तो दूर, उस के करीब तक मैं नहीं पहुंच पाई. मुझे अपनी औकात समझ में आने लगी.

असल औकात अन्य औरतों ने बरात के वापस आते ही समझा दी. उन बहन-बुआ के एकएक शब्द में व्यंग्य छिपा था-‘‘भाभीजी, आज से आप को हम लोगों के साथ हौल में ही सोना पड़ेगा. तरुण के कमरे का सारा पुराना सामान हटा कर विराज के साथ आया नया पलंग सजाना होगा, ताजे फूलों से.’’

छुरियां सी चलीं दिल पर. लेकिन दिखावे के लिए बड़ी हिम्मत दिखाई मैं ने भी. बराबरी से हंसीठिठोली करते हुए तरुण और विराज का कमरा सजवाया. लेकिन आधीरात के बाद जब कमरे का दरवाजा खट से बंद हुआ. मेरी जान निकल गई, लगा, मेरा पूरा शरीर कान बन गया है. कैसे देखती रहूं मैं अपनी सब से कीमती चीज की चोरी होते हुए. चीख पड़ी, ‘चोर, चोर,चोर.’

गुल हुई सारी बत्तियां जल पड़ीं. रंग में भंग डालने का मेरा उपक्रम पूर्ण हुआ. शादी वाला घर, दानदहेज के संग घर की हर औरत आभूषणों से लदी हुई. ऐसे मालदार घरों में ही तो चोरलुटेरे घात लगाए बैठे रहते हैं.

नींद से उठे, डरे बच्चों के रोने का शोर, आदमियों का टौर्च ले कर भागदौड़ का कोलाहल…ऐसे में तरुण के कमरे का दरवाजा खुलना ही था. उस के पीछेपीछे सजीसजाई विराज भी चली आई हौल में. चैन की सांस ली मैं ने. बाकी सभी भयभीत थे लुट जाने के भय से. सब की आंखों से नींद गायब थी. इस बीच, मसजिद से सुबह की आजान की आवाज आते ही मैं मन ही मन बुदबुदाई, ‘हो गई सुहागरात.’

लेकिन कब तक? वह तो सावित्री थी जिस ने सूर्य को अस्त नहीं होने दिया था. सुबह से ही मेहमानों की विदाई शुरू हो गई थी. छुट्टियां किस के पास थीं? मुझे भी लौटना था तरुण के साथ. मगर मेरे गले में बड़े प्यार से विराज को भी टांग दिया गया.

जाने किस घड़ी में बेटियों से कहा था कि चाची ले कर आऊंगी. विराज को देख कर मुझे अपना सिर पीट लेने का मन होता. मगर उस ने रिद्धि व सिद्धि का तो जाते ही मन जीत लिया.

10 दिनों बाद विराज का भाई उसे लेने आ गया और मैं फिर तरुण की परी बन गई. गिनगिन कर बदले लिए मैं ने तरुण से. अब मुझे उस से सबकुछ वैसा ही चाहिए था जैसे वह विराज के लिए करता था…प्यार, व्यवहार, संभाल, परवा सब.

चूक यहीं हुई कि मैं अपनी तुलना विराज से करते हुए सोच ही नहीं पाई कि तरुण भी मेरी तुलना विराज से कर रहा होगा.

वक्त भाग रहा था. मैं मुठ्ठी में पकड़ नहीं पा रही थी. ऐसा लगा जैसे हर कोई मेरे ही खिलाफ षड्यंत्र रच रहा है. तरुण ने भी बताया ही नहीं कि विराज ट्रांसफर के लिए ऐप्लीकेशन दे चुकी है. इधर राजीव का एग्रीमैंट पूरा हो चुका था. उन्होंने आते ही तरुण को व्यस्त तो कर ही दिया, साथ ही शहर की पौश कालोनी में फ्लैट का इंतजाम कर दिया यह कहते हुए, ‘‘शादीशुदा है अब, यहां बहू के साथ जमेगा नहीं.’’

मैं चुप रह गई मगर तरुण ने अब भी मुंह मारना छोड़ा नहीं था. तरुण मेरी मुट्ठी में है, यह एहसास विराज को कराने का कोई मौका मैं छोड़ती नहीं थी. जब भी विराज से मिलना होता, वह मुझे पहले से ज्यादा भद्दी, मोटी और सांवली नजर आती. संतुष्ट हो कर मैं घर लौट कर अपने बनावशृंगार पर और ज्यादा ध्यान देती.

फिर मैं ने नोट किया, तरुण का रुख उस के बजाय मेरे प्रति ज्यादा नरम और प्यारभरा होता, फिर भी विराज सहजभाव से नौकरी, ट्यूशन के साथसाथ तरुण की सुविधा का पूरा खयाल रखती. न तरुण से कोई शिकायत, न मांगी कोई सुविधा या भेंट.

‘परी थोड़ी है जो छू लो तो पिघल जाए,’ तरुण ने भावों में बह कर एक बार कहा था तो मैं सचमुच अपने को परी ही समझ बैठी थी. तब तक तरुण की थीसिस पूरी हो चुकी थी मगर अभी डिसकशन बाकी था.

और फिर वह दिन आ ही गया. तरुण को डौक्टरेट की डिगरी के ही साथ आटोनौमस कालेज में असिस्टैंट प्रोफैसर पद पर नियुक्ति भी मिल गई. धीरेधीरे उस का मेरे पास आना कम हो रहा था, फिर भी मैं कभी अकेली, कभी बेटियों के साथ उस के घर जा ही धमकती. विराज अकसर शाम को भी सूती साड़ी में बगैर मेकअप के मिडिल स्कूल के बच्चों को पढ़ाती मिलती.

ऐसे में हमारी आवभगत तरुण को ही करनी पड़ती. वह एकएक चीज का वर्णन चाव से करता…विराज ने गैलरी में ही बोनसाई पौधों के संग गुलाब के गमले सजाए हैं, साथ ही गमले में हरीमिर्च, हरा धनिया भी उगाया है. विराज…विराज… विराज…विराज…विराज ने मेरा ये स्वेटर क्रोशिए से बनाया है. विराज ने घर को घर बना दिया है. विराज के हाथ की मखाने की खीर, विराज के गाए गीत… विराज के हाथ, पैर, चेहरा, आंखे…

मैं गौर से देखने लगती तरुण को, मगर वह सकपकाने की जगह ढिठाई से मुसकराता रहता और मैं अपमान की ज्वाला में जल उठती. मेरे मन में बदले की आग सुलगने लगी.

मैं विराज से अकेले में मिलने का प्रयास करती और अकसर बड़े सहजसरल भाव से तरुण का जिक्र ही करती. तरुण ने मेरा कितना ध्यान रखा, तरुण ने यह कहा वह किया, तरुण की पसंदनापसंद. तरुण की आदतों और मजाकों का वर्णन करने के साथसाथ कभीकभी कोई ऐसा जिक्र भी कर देती थी कि विराज का मुंह रोने जैसा हो जाता और मैं भोलेपन से कहती, ‘देवर है वह मेरा, हिंदी की मास्टरनी हो तुम, देवर का मतलब नहीं समझतीं?’

विराज सब समझ कर भी पूर्ण समर्पण भाव से तरुण और अपनी शादी को संभाल रही थी. मेरे सीने पर सांप लोट गया जब मालूम पड़ा कि विराज उम्मीद से है, और सब से चुभने वाली बात यह कि यह खबर मुझे राजीव ने दी.

‘‘आप को कैसे मालूम?’’ मैं भड़क गई.

‘‘तरुण ने बताया.’’

‘‘मुझे नहीं बता सकता था? मैं इतनी दुश्मन हो गई?’’

विराज, राजीव से सगे जेठ का रिश्ता निभाती है. राजीव की मौजूदगी में कभी अपने सिर से पल्लू नीचे नहीं गिरने देती है, जोर से बोलना हंसना तो दूर, चलती ही इतने कायदे से है…धीमेधीमे, मुझे नहीं लगता कि राजीव से इस बारे में उस की कभी कोई बात भी हुई होगी.

लेकिन आज राजीव ने जिस ढंग से विराज के बारे में बात की , स्पष्टतया उन के अंदाज में विराज के लिए स्नेह के साथसाथ सम्मान भी था.

चर्चा की केंद्रबिंदु अब विराज थी. तरुण ने विराज को डिलीवरी के लिए घर भेजने के बजाय अपनी मां एवं नानी को ही बुला लिया था. वे लोग विराज को हथेलियों पर रख रही थीं. मेरी हालत सचमुच विचित्र हो गई थी. राजीव अब भी किताबों में ही आंखें गड़ाए रहते हैं.

और विराज ने बेटे को जन्म दिया. तरुण पिता बन गया. विराज मां बन गई पर मैं बड़ी मां नहीं बन पाई. तरुण की मां ने बच्चे को मेरी गोद में देते हुए एकएक शब्द पर जोर दिया था, ‘लल्ला, ये आ गईं तुम्हारी ताईजी, आशीष देने.’

बच्चे के नामकरण की रस्म में भी मुझे जाना पड़ा. तरुण की बहनें, बूआओं सहित काफी मेहमानों को निमंत्रित किया गया. कार्यक्रम काफी बड़े पैमाने पर आयोजित किया गया था. इस पीढ़ी का पहला बेटा जो पैदा हुआ है. राजीव अपने पुराने नातेरिश्ते से बंधे फंक्शन में बराबरी से दिलचस्पी ले रहे थे. तरुण विराज और बच्चे के साथ बैठ चुका तो औरतों में नाम रखने की होड़ मच गई. बहनें अपने चुने नाम रखवाने पर अड़ी थीं तो बूआएं अपने नामों पर.

बड़ा खुशनुमा माहौल था. तभी मेरी निगाहें विराज से मिलीं. उन आंखों में जीत की ताब थी. सह न सकी मैं. बोल पड़ी, ‘‘नाम रखने का पहला हक उसी का होता है जिस का बच्चा हो. देखो, लल्ला की शक्ल हूबहू राजीव से मिल रही है. वे ही रखेंगे नाम.’’

सन्नाटा छा गया. औरतों की उंगलियां होंठों पर आ गईं. विराज की प्रतिक्रिया जान न सकी मैं. वह तो सलमासितारे जड़ी सिंदूरी साड़ी का लंबा घूंघट लिए गोद में शिशु संभाले सिर झुकाए बैठी थी.

मैं ने चारोें ओर दृष्टि दौड़ाई, शायद राजीव यूनिवर्सिटी के लिए निकल चुके थे. मेरा वार खाली गया. तरुण ने तुरंत बड़ी सादगी से मेरी बात को नकार दिया, ‘‘भाभी, आप इस फैक्ट से वाकिफ नहीं हैं शायद. बच्चे की शक्ल तय करने में मां के विचार, सोच का 90 प्रतिशत हाथ होता है और मैं जानता हूं कि विराज जब से शादी हो कर आई, सिर्फ आप के ही सान्निध्य में रही है, 24 घंटे आप ही तो रहीं उस के दिलोदिमाग में.

इस लिहाज से बच्चे की शक्ल तो आप से मिलनी चाहिए थी. परिवार के अलावा किसी और पर या राजीव सर पर शक्लसूरत जाने का तो सवाल ही नहीं उठता. यह तो आप भी जानती हैं कि विराज ने आज तक किसी दूसरे की ओर देखा तक नहीं है. वह ठहरी एक सीधीसादी घरेलू औरत.’’

औरत…लगा तरुण ने मेरे पंख ही काट दिए और मैं धड़ाम से जमीन पर गिर गई हूं. मुझे बातबात पर परी का दरजा देने वाले ने मुझे अपनी औकात दिखा दी. मुझे अपने कंधों में पहली बार भयंकर दर्द महसूस होने लगा, जिन्हें तरुण ने सीढ़ी बनाया था, उन कंधों पर आज न तरुण की बांहें थीं और न ही पंख.

रेस 3 : इस फिल्म से दूरी ही भली

2008 में अब्बास मस्तान के  निर्देशन में पहली बार सफल एक्शन फिल्म ‘रेस’ बनी थी. उसके बाद ‘रेस 2’ आयी. अब ‘रेस 3’आयी है, जिसमें अभिनय करने के साथ ही बतौर निर्माता सलमान भी जुडे़ हैं. मगर ‘‘रेस 3’’, ‘रेस’ सीरीज की सर्वाधिक कमजोर फिल्म है.

फिल्म ‘‘रेस 3’’ की कहानी के केंद्र में हैं मशहूर हथियार विक्रेता शमशेर सिंह (अनिल कपूर). फिल्म शुरू होने पर एक सीन से यह बात उभरकर आती है कि शमशेर सिंह इतने तेज तर्रार व चलाक हैं कि उन्हे कोई मात नहीं दे सकता. वह तो इंटरपोल के अफसर खन्ना (स्व.नरेंद्र झा) से भी सीधे बात करते रहते हैं.

बहरहाल, कहानी आगे बढ़ती है तो इंटेलीजेंस ब्यूरो को खबर मिलती है कि भारत में इलाहाबाद के पास हंडिया जिले के निवासी अवैध शस्त्र के कारोबार में पकडे़ जाने से बचने के लिए थाईलैंड के अलसाफिया में आकर बस गए हैं. शमशेर सिंह का एक सौतेला बेटा सिकंदर सिंह (सलमान खान) के अलावा बेटा सूरज सिंह ( साकिब सलीम) और बेटी संजना सिंह (डेजी शाह) है. सिकंदरसिंह के लिए काम करने वाला शूटर है यश(बौबी देओल).

जबकि राणा (फ्रीडा दारूवाला), शमशेर सिंह का सबसे बड़ा दुश्मन है. इंटेलीजेंस ब्यूरो की तरफ से जेसिका (जैकलीन फर्नांडिज) को शमशेर सिंह के परिवार के बारे में सच जानने व सबूत इकट्ठा करने की जिम्मेदारी दी गयी है. इधर जब सूरज व संजना 25 वर्ष के होते हैं, तो इन्हे पता चलता है कि इनकी मां ने वसीयत में जायदाद का पचास प्रतिशत सिकंदर को दिया है. बाकी के पचास प्रतिशत में से पचीस पचीस प्रतिशत के हकदार सूरज व संजना हैं. इससे सूरज व संजना नाराज होते हैं और सिकंदर को नेस्तानाबूद करने के लिए सूरज व संजना मिलकर जेसिका की मदद लेते हैं.

पता चलता है कि ऐसा करने के पीछे यश की ही सलाह थी क्योंकि यश और संजना एक दूसरे से प्यार करते हैं, इसकी भनक सूरज, सिकंदर व शमशेर सिंह को भी नहीं है. मगर सिंकदर सिंह, जेसिका को अपने प्रेम जाल में फांस लेता है. इधर यह पता चलता है कि यश और राणा के बीच भी कुछ संबंध हैं. सिकंदर हर हकीकत को जानते हुए कहता है कि वह अपने परिवार को टूटने व व्यापार में बंटवारा नहीं होने देगा. भाई के बीच आपसी दुश्मनी के बीच ही भारतीय नेताओं की अश्लील सीडी का मसला आता है, जिसे भुनाकर शमशेर सिंह सम्मानजक तरीके से भारत वापस जाना चाहता है. और साथ में वह सिकंदर, सूरज व संजना को भी रास्ते से हटा देना चाहता है.

क्लायमेक्स में पता चलता है कि सिकंदर, सूरज व संजना सगे भाई बहन हैं. इनके पिता का खून शमशेर सिंह ने ही किया था और यश, शमशेर का असली बेटा है. तथा शमशेर ने राणा के साथ दोस्ती बना रखी है. अंत में जेसिका, शमशेर सिंह व यश को हंडिया जेल पहुंचा देती है. पर शमशेर का वादा है कि रेस अभी खत्म नहीं हुई है.

अति धीमी गति वाली फिल्म ‘‘रेस 3’’ की सबसे बड़ी कमजोर कड़ी इसके लेखक हैं. फिल्म की कहानी व पटकथा का ताना बाना इतना गड़बड़ है कि फिल्म का हीरो या विलेन सहित किसी भी किरदार को सही ढंग से चित्रित नहीं कर पाए. दर्शक दिमाग लेकर फिल्म देखने जाए, तो पगला जाए. कहानी कब व कैसे हथियारों के व्यापार से ड्रग्स व वेश्यावृत्ति में लिप्त भारतीय नेताओं तक पहुंच जाती है, यह समझ में ही नहीं आता. पूरे विश्व को शस्त्र बेचने वाला व्यापारी, जिसके खिलाफ इंटेलीजेंस ब्यूरो की टीम जांच कर रही है, वह खुले आम मोबाइल पर इंटरपोल के बड़े अफसर से बात करता है, बड़ा अजीब सा लगता है.

लेखक की कमजोरी के चलते पारिवारिक अंतर कलह भी मजाक ही लगती है. कहानी हिचकोले लेते हुए आगे बढ़ती है, तमामएक्शन दृश्यों के साथ कहानी में इतने मोड़ आते हैं कि दर्शक का दिमाग चकरा जाता है और वह सोचने लगता है कि फिल्म में हो क्या रहा है? पूरी फिल्म दर्शकों को बांधकर रखने की बजाय उन्हे निराश ही करती है.

फिल्म के बचकाने संवाद भी फिल्म को घटिया बनाने में अपना योगदान देते हैं. फिल्म में कहीं कोई इमोशन या संवेदना उभरती ही नहीं है. सबसे बड़ा अफसोस तो यह है कि फिल्म को भारत के छोटे शहर से जोड़ने के मकसद से लेखक के साथ साथ कलाकारों ने भी इलाहाबाद की हिंदी भाषा के कुछ संवाद बोलते हुए पूरी भाषा का बेड़ा गर्क करके रख दिया है.

सलमान खान व टिप्स के रमेश तौरानी ने फिल्म ‘‘रेस 3’’ से अधिकाधिक धन कमाने के लिए इसका ‘‘थी डी’’ वर्जन भी बनाया है,पर इन्हे इस बात का अहसास ही नहीं है कि ‘‘थ्री डी’’ के लिए किस तरह की कहानी व दृश्य चाहिएं. ‘थ्री डी’ वर्जन की गुणवत्ता बहुत घटिया है. ‘थ्री डी’ में ‘‘रेस 3’’ देखते वक्त दर्शक दोहराता रहता है-कहां फंसायो नाथ..’’

फिल्म को बेहतरीन लोकशन पर फिल्माया गया है. कुछ एक्शन सीन जरूर अच्छे बन पड़े हैं. मगर डेजी शाह व जैकलीन फर्नांडिजके बीच का एक्शन सीन काफी बचकाना सा लगता है. जहां तक अभिनय का सवाल है तो किसी भी कलाकार ने ऐसा अभिनय नहीं किया है, जिसकी तारीफ की जाए. इसके लिए कुछ हद तक फिल्म के पटकथा लेखक भी जिम्मेदार हैं.

यहां तक कि अनिल कपूर जैसे कलाकार को तो इस फिल्म में जाया किया गया है. बौबी देओल अपनी वापसी वाली फिल्म में अपनी शर्ट उतारकर भी ऐसा कोई प्रभाव नहीं छोड़ते, जिससे उम्मीद की जाए कि वह बेहतर अभिनय कर सकते हैं. ‘रेस 3’देखकर दर्शक अच्छी तरह से समझ जाता है कि बौबी देओल का अभिनय करियर क्यों चौपट हुआ.

फिल्म में लंबे लंबे गीत भी दर्शकों को बोर ही करते हैं. कई असफल फिल्मों के निर्देशक रेमो डिसूजा ने एक बार फिर साबित कर दिखाया कि उनसे गुणवत्ता वाले काम की उम्मीद करना मूर्खता है.

फिल्म ‘‘रेस 3’’ में ऐसा कुछ नहीं है, जिसकी वजह से दर्शक इसे देखना चाहेगा.  ऐसे में फिल्म ‘‘रेस 3’’ को सलमान खान का जादुई करिश्मा डूबने से बचा पाएगा, इसमें भी शक है. क्योंकि सिनेमाघर से निकलते हुए हमने सलमान खान के प्रशंसकों को भी खुश नहीं पाया.

दो घंटे चालीस मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘रेस 3’ का निर्माण रमेश एस तौरानी और सलमा खान ने किया है. फिल्म के निर्देशक रेमो डिसूजा, लेखक सिराज अहमद, संगीतकार सलीम सुलेमान, विशाल मिश्रा, विक्की हार्दिक, शिवाय व्यास, गुरिंदर सेहगल, कैमरामैन अयंका बोस तथा फिल्म को अभिनय से संवारने वाले कलाकार हैं-अनिल कपूर, सलमान खान, जैकलीन फर्नांडिज, बौबी देओल, डेजी शाह, साकिब सलीम, फ्रीडा दारूवाला व अन्य.

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