ऐसे नहीं मिलती खुशियां

आगरा के एतमादुद्दौला थाना क्षेत्र निवासी गुलजारीलाल प्रजापति अपना पुश्तैनी धंधा कर के परिवार का भरणपोषण कर खुशहाल जिंदगी बिता रहा था. उस के काम में उस की पत्नी सोमवती और 3 बेटे भी हाथ बंटाते थे. एक बेटी थी जो घर के रोजाना के काम में मां का हाथ बंटाती थी. गुलजारीलाल के बेटे जवान हो गए तो पुश्तैनी धंधा छोड़ कर वे दूसरा काम करने लगे थे. फिर गुलजारीलाल ने कांच का सामान बनाने की एक फैक्ट्री में नौकरी कर ली.

बच्चे जवान थे तो उन की शादी के लिए रिश्ते भी आने लगे. मंझले बेटे विनोद की शादी फिरोजाबाद जिले के गांव मोहम्मदाबाद निवासी महेश की भतीजी अनीता से कर दी.

दरअसल अनीता के पिता रमेश और मां की मृत्यु उस समय हो गई थी, जब अनीता छोटी थी. तब उस के ताऊ महेश ने ही उस की और उस के भाईबहन की परवरिश की थी.

विनोद एक सीधासादा युवक था तो वहीं अनीता तेजतर्रार थी. ससुराल में वह खुश नहीं थी. गुलजारीलाल का संयुक्त परिवार था. अनीता को वहां घुटन हो रही थी. कुछ दिनों तक तो वह खामोश रही, पर उस ने पति पर जोर डालना शुरू कर दिया कि वह इस संयुक्त परिवार में नहीं रह सकती. वह अलग रहना चाहती है.

पत्नी की बात से विनोद हैरान था और परेशान भी. अपने परिवार से अलग होने की बात उस ने कभी सोची नहीं थी. ससुराल में सभी लोग अनीता का ठीक से खयाल रखते थे तो वह समझ नहीं पा रहे थे कि आखिर ऐसी क्या बात है जो वह अलग रहने की जिद कर रही है. बहरहाल, उन्होंने उसे किसी तरह समझाबुझा दिया.

एक दिन अनीता मायके गई और कई दिन तक जब उस ने आने का नाम नहीं लिया तो उस के ससुर गुलजारीलाल ने अनीता के ताऊ महेश को फोन किया कि वह अनीता को ससुराल छोड़ जाएं.

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अगले दिन महेश अनीता को ले कर आ गया और उस ने गुलजारीलाल से कहा, ‘‘देखो समधीजी, अनीता अब आप की अमानत है. इस की देखभाल की जिम्मेदारी आप की ही है. मैं एक बात और बताना चाहता हूं कि यह जिद्दी स्वभाव की है. आप इस की किसी अनापशनाप जिद पर ध्यान न दें.’’

उस दिन तो किसी ने महेश की बात पर गौर नहीं किया, लेकिन दिनबदिन अनीता का बदलता व्यवहार ससुराल वालों को अखर रहा था.

फिर एक दिन अनीता घर में किसी को बिना बताए कहीं चली गई. सास सोमवती ने बड़ी बहू मीना से पूछा कि अनीता कहां है तो मीना ने कहा कि कहीं से फोन आया था और वह फोन पर बातें करतेकरते बाहर निकल गई.

सोमवती चिंतित हो गईं कि पता नहीं यह कहां चली गई. काफी देर बाद जब अनीता वापस लौटी तो सास ने उस से पूछताछ की. अनीता ने कोई सफाई देने के बजाय सास से तपाक से कहा, ‘‘मैं कोई कैदी तो हूं नहीं, जो एक जगह बंद हो कर रहूं. इंसान हूं, कहीं घूमने चली गई तो इस में हैरान होने वाली क्या बात है.’’

अनीता का यह व्यवहार ससुराल में किसी को भी अच्छा नहीं लगा. ससुराल में अब उस पर नजर रखी जाने लगी. एक दिन तो हद हो गई. अनीता के जेठ राकेश ने उसे एतमादुद्दौला चौराहे पर किसी आदमी के साथ देख लिया.

राकेश ने उस समय तो उस से कुछ नहीं कहा. जब वह घर आई तो उस से पूछताछ की तो उस ने सफाई दी कि वह अपने रिश्ते के भाई से मिलने गई थी. गुलजारीलाल ने उस से सख्ती से कहा कि जिस से भी मिलना हो, घर पर मिलो, अन्यथा नतीजा अच्छा नहीं होगा.

अनीता ने तड़प कर कहा, ‘‘अब और बुरा क्या होगा. मेरी जिंदगी तो वैसे भी बरबाद हो कर रह गई है.’’

सोमवती ने हैरानी से उसे देखा और पूछा, ‘‘क्या परेशानी है तुझे, जो इस तरह बोल रही है?’’

‘‘तुम नहीं समझोगी अम्मा,’’ कह कर वह अपने कमरे में चली गई.

इस के बाद अनीता ससुराल वालों के शक के घेरे में आ गई थी. गुलजारीलाल ने उस के ताऊ महेश को सारी बात बताई तो उस ने कहा, ‘‘समधीजी, मैं ने पहले ही आप को बता दिया था कि आप ही इसे अपने हिसाब से रखें. अब आप ही जानो.’’

धीरेधीरे वक्त बीत रहा था. अनीता का 2 बार गर्भपात हो चुका था. आखिर 4 साल बाद उस ने एक बेटे को जन्म दिया, जिस का नाम आयुष रखा गया. परिवार में बेटे के जन्म के बाद सभी लोग खुश हुए.

इस बीच घर वालों को यह बात पता चल चुकी थी कि शादी से पहले अनीता के गांव के ही किसी लड़के के साथ गलत संबंध थे. आयुष के जन्म के बाद तो अनीता बेखौफ हो गई और एक दिन अपने दुधमुंहे बच्चे को छोड़ कर घर से बिना बताए फिर गायब हो गई. बारबार बहू का घर से गायब होना बदनामी वाली बात थी, इसलिए घर के लोग चिंतित हो गए. अनीता के ताऊ ने साफ कह दिया कि उसे उस लड़की से कोई मतलब नहीं है.

काफी खोजबीन के बाद पता चला कि अनीता मोहम्मदाबाद के रहने वाले किशन नारायण के साथ टूंडला में किराए का कमरा ले कर रह रही है. ससुराल वाले हैरान रह गए कि बहू इतनी बेलगाम कैसे हो सकती है. आखिर ससुराल वाले उस के पास गए और उसे समझाबुझा कर वापस ले आए. घर पहुंचने पर पति विनोद ने अनीता की खूब पिटाई की, तो आखिर अनीता ने भी मुंह खोल दिया कि वह अपने प्रेमी के बिना नहीं रह सकती.

अब विनोद भी अपनी जिद पर था. उस ने अनीता को हिदायत दे दी कि उसे किशन को भूल जाना होगा वरना अंजाम बुरा होगा. इस के बाद घर के और लोग भी अनीता पर नजर रखने लगे. उस का घर से कहीं आनाजाना भी बंद कर दिया. इसी बीच वह एक बेटी पल्लवी की मां बन गई. 2 बच्चों की मां बनने के बाद भी वह प्रेमी को दिल से दूर नहीं कर पाई.

किशन भी शादीशुदा और 2 बच्चों का बाप था पर इश्क के नशे में उस ने अपनी पत्नी और बच्चों की भी परवाह नहीं की.

बंदिशें लगने पर आशिकों की दीवानगी भी बढ़ती गई. दोनों ही परेशान थे. इश्क के लिए वे किसी भी हद तक जाने के लिए तैयार थे.

फिर योजनानुसार किशन ने विनोद से दोस्ती कर ली. उस ने विनोद से यह भी कहा कि जो कुछ हुआ, वह उसे भूल जाए और अब वह वादा करता है कि आगे से अनीता से कोई संबंध नहीं रखेगा. विनोद ने किशन की बात पर विश्वास कर लिया.

अपना विश्वास बढ़ाने के लिए किशन विनोद को खाना खिलाने ढाबे पर ले जाता और दारू भी पिलाता. ससुराल वालों के प्रति अनीता का जो अडि़यल रवैया था, वह उस ने बदल दिया. वह सभी से प्यार से पेश आने लगी. इस से ससुराल वाले समझने लगे कि वह अब सुधर गई है. लेकिन वह यह नहीं समझ पाए कि अनीता और उस के प्रेमी किशन ने इस के पीछे क्या योजना बना रखी है.

विनोद जिस फैक्ट्री में काम करता था, उस में कांच के गिफ्ट आइटम बनते थे. एक दिन किशन ने उस से कहा कि उस की मार्बल फैक्ट्री में अच्छी जानपहचान है. वह वहां उस की नौकरी लगवा सकता है. वहां उसे अच्छी सैलरी के अलावा कई तरह की सुविधाएं भी मिलेंगी. विनोद ने किशन की बात मान कर तुरंत हां कर दी. तब किशन ने कहा कि वह किसी दिन उस के साथ चला चलेगा और यदि सब कुछ ठीक रहा तो मार्बल फैक्ट्री में उस की नौकरी लग जाएगी.

विनोद सीधासादा आदमी था और अपनी दुनिया में ही खुश था. जबकि किशन बिजली मिस्त्री था और बहुत तेजतर्रार था. कोई नहीं जानता था कि किशन के मन में क्या चल रहा है. लेकिन प्रेमिका को पाने के लिए वह भयानक षडयंत्र रच रहा था.

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अपने मकसद को पूरा करने के लिए एक दिन किशन ने अपने चचेरे भाई सुनील से बात की और कहा कि वह अपने प्यार को किसी भी कीमत पर पाना चाहता है. चाहे इस के लिए उसे किसी की जान ही क्यों न लेनी पड़े. इस काम में उसे उस की मदद की जरूरत है.

सुनील किशन का चचेरा भाई ही नहीं, लंगोटिया दोस्त भी था. वह टैंपो चलाता था. किशन की सहायता करने के लिए वह उस के गुनाह में शामिल होने को तैयार हो गया. इस के बाद किशन ने अनीता और सुनील के साथ एक षडयंत्र रचा.

27 दिसंबर, 2017 की शाम को विनोद के मोबाइल पर एक फोन आया. फोन करने वाले ने अपना नाम सुनील बताते हुए कहा, ‘‘मैं किशन का दोस्त बोल रहा हूं. किशन ने तुम्हारी नौकरी के लिए मुझ से बात की थी. अब हम और किशन रामबाग चौराहे पर खड़े तुम्हारा इंतजार कर रहे हैं. तुम यहीं पर आ जाओ, जिस से नौकरी के बारे में बात की जा सके.’’

नौकरी की बात सुनते ही विनोद खुश हो गया और घर में किसी को बिना कुछ बताए रामबाग चौराहे पर पहुंच गया. वहां पर किशन एक टैंपो में बैठा मिला. उस के साथ एक और लड़का था. विनोद उस लड़के को नहीं जानता था. किशन ने उस का परिचय अपने चचेरे भाई सुनील के रूप में दिया.

किशन ने विनोद को भी टैंपो में बैठा लिया. अनीता कुछ दिन पहले से अपने मायके में थी लेकिन थोड़ी देर में वह भी वहां आ गई. पत्नी को वहां देख कर विनोद हैरान रह गया. इस से पहले कि विनोद पत्नी से कुछ पूछता, किशन बोला, ‘‘दरअसल, अनीता तुम्हारे पास ही आने वाली थी. मैं ने सोचा कि तुम्हारे काम की बात करने के बाद यह यहीं से तुम्हारे साथ ही चली जाएगी.’’

वे सब कुछ देर तक इधरउधर की बातें करते रहे. तभी किशन ने विनोद से कहा कि फैक्ट्री मालिक ने मिलने के लिए आज शाम 8 बजे का समय दिया है. अभी तो 6 बज रहे हैं, चलो तब तक हम लोग खाना खा लेते हैं.

आने वाली आफत से बेखबर विनोद उस के साथ खाना खाने के लिए एक ढाबे पर चला गया. वहां सभी ने खाना खाया. खाना खाने के बाद किशन ने दारू मंगवाई और उस ने विनोद के गिलास में चुपके से नींद की 2 गोलियां डाल दीं.

दारू पीते ही विनोद को नशा चढ़ने ही लगा था. साथ ही उसे नींद सी आने लगी. तब तीनों उसे टैंपो में ले गए. फिर ढाबे से वे टैंपो को एक सुनसान जगह पर ले आए. वहीं पर अनीता और किशन ने विनोद को गला दबा कर मार डाला. उस की मौत के बाद उन्होंने राहत की सांस ली.

इधर रात को विनोद घर नहीं पहुंचा तो घर वाले चिंतित हो गए. फोन करने पर अनीता के ताऊ ने बताया कि अनीता तो कई दिन पहले ही यहां से अपनी ससुराल चली गई थी.

यह सुन कर परिजनों का माथा ठनका और देर रात में वे थाना एतमादुद्दौला पहुंचे, जहां उन्होंने विनोद की गुमशुदगी लिखाते हुए शक किशन और अनीता पर जताया. थानाप्रभारी ने उन्हें भरोसा दिया कि वह जल्दी ही विनोद का पता लगाने की कोशिश करेंगे.

विनोद के घर वालों ने रिश्तेदारियों में भी फोन किए पर विनोद का कुछ पता नहीं चला. 31 दिसंबर, 2017 को फिरोजाबाद जिले के थाना नारखी क्षेत्र के गांव बैदीपुर बिदरखा में पंचायत घर के बाहर एक युवक का सिर मिलने की सूचना गांव के चौकीदार ने दी तो थानाप्रभारी संजय सिंह तुरंत मौके पर पहुंच गए.

अब पुलिस युवक के शरीर के अन्य अंगों की तलाश में लग गई तो पुलिस को थोड़ी आगे एक पैर तथा कटी हुई हथेली मिल गई.

युवक के कटे हुए अंग मिलने की सूचना थानाप्रभारी ने प्रदेश के सभी थानों को वायरलैस द्वारा प्रसारित करा दी. थाना एतमादुद्दौला में गुलजारीलाल ने अपने मंझले बेटे विनोद की गुमशुदगी की सूचना दर्ज करा रखी थी, इसलिए किसी युवक का सिर और अन्य अंग नारखी थाना क्षेत्र में मिलने पर उन्हें शक हुआ कि कहीं ये अंग विनोद के ही तो नहीं हैं. उन्होंने गुलजारीलाल को थाने बुला लिया. इस के बाद वह उसे ले कर नारखी पहुंच गए. गुलजारीलाल ने जैसे ही वह कटा हुआ सिर देखा तो वह दहाड़ें मार कर रोने लगे. उन्होंने उस कटे हुए सिर की पहचान अपने बेटे विनोद के रूप में की.

सिर की शिनाख्त हो जाने के बाद नारखी पुलिस शव के बाकी हिस्सों की खोज में लग गई. तभी थानाप्रभारी संजय सिंह को सूचना मिली कि टूंडला पुलिस ने शमशान घाट से मोहम्मदाबाद जाने वाली सड़क पर इधरउधर बिखरे किसी इंसान के टुकड़े बरामद किए हैं.

थानाप्रभारी संजय सिंह वहां पहुंच गए. उन्होंने सोचा कि ये टुकड़े भी विनोद की ही लाश के होंगे, इसलिए जरूरी काररवाई कर के लाश के वे टुकड़े उन्होंने पोस्टमार्टम के लिए भेज दिए. इस वीभत्स कत्ल की खबर जब इलाके के लोगों को हुई तो वे सभी हैरान रह गए.

नारखी पुलिस को अब कातिलों की तलाश थी. विनोद के भाइयों ने उस की पत्नी अनीता और उस के प्रेमी किशन पर अपना शक जताया था. पुलिस उन दोनों के पीछे लग गई पर दोनों में से घर पर कोई भी नहीं मिला.

कोशिश के बाद पुलिस के लंबे हाथ आखिर नामजद आरोपियों तक पहुंच ही गए. नारखी के थानाप्रभारी संजय सिंह को मुखबिर ने 4 जनवरी, 2018 को सूचना दी कि प्रेमी युगल रजावली चौराहे पर मौजूद हैं. थानाप्रभारी तुरंत पुलिस बल के साथ वहां पहुंचे और दोनों को दबोच लिया.

पुलिस दोनों को थाने ले आई. सख्ती से पूछताछ करने पर अनीता ने स्वीकार कर लिया कि उस ने ही किशन व उस के दोस्त सुनील के साथ मिल कर अपने पति विनोद की हत्या कर उस की लाश के 30 टुकड़े किए थे. अनीता ने यह भी स्वीकारा कि उस की शादी से पहले से ही गांव के किशन से उस के अवैध संबंध थे. चूंकि किशन उस की जाति का नहीं था, इसलिए ताऊ ने किशन के साथ उस की शादी करने से मना कर दिया था पर वे दोनों हर कीमत पर शादी करना चाहते थे.

इसी दौरान ताऊ महेश ने अनीता की मरजी के खिलाफ उस की शादी विनोद से कर दी थी. अनीता बेमन से विनोद की दुलहन बन कर ससुराल पहुंच गई थी.

अनीता के ताऊ ने सोचा था कि शादी के बाद वह सुधर जाएगी. लेकिन विवाह के बाद प्रेमी की जुदाई ने अनीता को बागी बना दिया. वह रातदिन किशन के लिए तड़पती रहती.

उधर किशन ने भी घर वालों के दबाव में शादी तो कर ली थी लेकिन वह प्यार तो अनीता से ही करता था. समय निकाल कर दोनों मिलते रहते थे. आशिकी का जुनून धीरेधीरे खतरनाक मोड़ पर पहुंच रहा था. अनीता विनोद के साथ सात फेरों के बंधन में बंधी थी, अत: इस शादी को तोड़ना उस के लिए आसान नहीं था. 2 बच्चों की मां बनने के बाद भी उसे लगने लगा कि दिल पर बोझ ले कर वह जी नहीं सकती.

एक दिन उस ने किशन से कहा कि क्यों न विनोद नाम के इस कांटे को ही जिंदगी से निकाल दिया जाए. इश्क के अंधे प्रेमी को प्रेमिका की बात जंच गई. उस ने यह तक नहीं सोचा कि गुनाह करने के बाद अगर वह पकड़ा गया तो उस के परिवार का क्या होगा.

आखिर उस ने अपने चचेरे भाई सुनील को अपना राजदार बना लिया और षडयंत्र के तहत काम दिलाने के बहाने विनोद को भी विश्वास में ले लिया. फिर योजनाबद्ध तरीके से विनोद की हत्या कर दी.

उन लोगों ने विनोद की हत्या तो कर दी, पर उन के सामने यह समस्या आई कि लाश कहां ठिकाने लगाई जाए, जिस से वे बच सकें. वह टैंपो से लाश को मोहम्मदाबाद शमशान घाट ले गए. वहां जमीन पर पौलीथिन बिछा कर बांके से विनोद की लाश के 30 टुकड़े किए. फिर सभी टुकड़े पौलीथिन सहित टैंपो में रख लिए.

टैंपो ले कर वे मोहम्मदाबाद की तरफ बढ़ गए. रास्ते में चलते हुए वे एकएक टुकड़ा डालते गए. बांका भी उन्होंने एक जगह फेंक दिया और काम खत्म हो जाने के बाद सुनील अपनी राह चला गया और अनीता किशन के साथ टूंडला स्थित किराए के कमरे पर आ गई.

विनोद का कटा हुआ सिर उन्होंने एक खेत में डाला था पर जानवर उसे घसीट कर पंचायतघर के सामने ले आए, जिसे पुलिस ने 31 दिसंबर, 2017 को चौकीदार की सूचना पर बरामद कर लिया.

विनोद के शरीर के टुकड़े इकट्ठा करने के लिए पुलिस अनीता को अपने साथ ले गई. जब भी कोई टुकड़ा पुलिस को मिलता, अनीता दहाड़ें मार कर रोने का नाटक करने लगती थी.

जेल जाने और सजा पाने का डर उस की आंखों में साफ नजर आ रहा था. इश्क की दीवानगी का सुरूर उतर चुका था. अब वे एक बेरहम कातिल के रूप में समाज के सामने थे, जिसे अब समाज शायद कभी अपना नहीं सकेगा.

उस ने रोरो कर कहा कि उस से बहुत बड़ी गलती हो गई है. मांबाप की मौत के बाद वह अपने ताऊ के घर पली थी और अब उस के 2 मासूम बच्चे अपनी बदचलन कातिल मां के कारण अनाथ हो गए. उन का भविष्य क्या होगा, यह सोचसोच कर वह बहुत परेशान थी.

अभियुक्तों की निशानदेही पर पुलिस ने कत्ल में प्रयुक्त हुआ बांका भी बरामद कर लिया. हत्या में शामिल किशन का चचेरा भाई किशन पुलिस के हत्थे नहीं चढ़ सका.

कत्ल के बाद हर कातिल कानून से बचना चाहता है, इश्क में अंधी अनीता विनोद की पहचान मिटा कर अपनी अधूरी खुशियों को पूरा करना चाहती थी, पर ऐसा हो न सका.

रिश्ता नौकर और मालिक का

एक जमाना था जब मालिक और नौकर का रिश्ता वही होता था जो राजा और प्रजा का. तब जीवन बहुत सरल और सादगी वाला था. नौकरों की बेसिक जरूरत खाना, कपड़ा और मकान ही होते थे. वह इन्हीं जरूरतों की पूर्ति के लिए नौकरी करता था.

नौकर अपने मालिक की बहुत इज्जत करता था. वह जमाना ही ऐसा था जब सभी वर्गों के लोग अपने कार्यक्षेत्र से और आमदनी से संतुष्ट रहते थे, कोई किसी से बराबरी नहीं करना चाहता था.

धीरेधीरे समय बदला. नई टैक्नोलौजी के आगमन से भौतिक सुखों की वृद्घि हुई और ये सारे सुख पाने की घरघर में होड़ सी होने लगी. इस के साथ ही इन सुविधाओं की प्राप्ति के लिए नौकरों को मालिक से प्रतिस्पर्धा करने का जैसे अधिकार दे दिया गया है.

यहां तक महसूस किया गया है कि उन को अपने मालिक के ऐशोआराम से ईर्ष्या होने लगी. उन सुविधाओं को प्राप्त करने के लिए अधिक से अधिक पैसा पाने की लालसा उन की बढ़ती ही चली गई. उन को जो वेतन मिलता है, वह उन चीजों को पाने के लिए पर्याप्त नहीं होता है, इस के लिए वे गलत तरीके से पैसा प्राप्त करने से भी गुरेज नहीं करते हैं.

जब से एकल परिवार का चलन शुरू हुआ है और महिलाओं ने अधिक धन अर्जित करने की लालसा से घर से निकलना आरंभ किया है, मालिक, मालकिन और घरों में कार्य करने वाले नौकरनौकरानियों के बीच पैसे के लालच में अवैध संबंध बनने भी धड़ल्ले से सुनने में आ रहे हैं. इस के कारण उन के बीच गरिमामय रिश्ते तारतार हो रहे हैं और घर की सुखशांति भंग हो रही है.

घर में जवान महिला या पुरुष होेने पर लोग नौकर या नाकरानी रखने में डरने लगे हैं. यहां तक कि छोटे बच्चों की आया रखना भी सुरक्षित नहीं है. मालिक की अनुपस्थिति में अबोध बच्चों से भीख मंगवाने और उन को चुराने की घटनाएं भी खूब हो रही हैं. पैसा इस रिश्ते पर हावी होने लगा है और यह नित्य समाचारों से सिद्ध भी हो रहा है. भौतिक सुखों की आंधी ने मालिक के प्रति नौकर के सम्मानपूर्वक रिश्ते को अस्तित्वहीन ही कर दिया है.

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कुछ घटनाएं

16 अप्रैल, 2018, फरीदाबाद : गाडि़यों की खरीदबिक्री का काम करने वाले व्यवसायी सतविंदर सिंह के औफिस में चोरी व तोड़फोड़ का मामला सामने आया. शिकायत में सतविंदर ने अपने नौकर पर दुकान से मोटा कैश ले कर फरार होने की बात की. इस की तस्दीक सीसी टीवी फुटेज में हो गई. जिस में नौकर को गुल्लक तोड़ कर कैश निकालते व तोड़फोड़ करते देखा गया.

14 अगस्त, 2017, हरिद्वार :  ज्वालापुर कोतवाली क्षेत्र के कटहरा बाजार में ज्वालापुर निवासी अशोक कुमार की हार्डवेयर की दुकान है. दुकान के मालिक ने अहबाबनगर कालोनी में गोदाम बनाया है. दुकान व गोदाम में कर्मचारी काम करते हैं. बताया जाता है कि दुकान के मालिक ने नौकरों को माल चोरी का आरोप लगा कर निकाल दिया था. इसे ले कर नौकरों ने ज्वालापुर पुलिस से शिकायत की जिस में उन्होंने मालिक पर बकाया पैसे न देने का आरोप लगाया था. पुलिस की सूचना पर दुकान के मालिक अशोक कोतवाली पहुंचे जहां मौजूद नौकरों ने हंगामा किया. नौकरों व दुकान के मालिक ने एकदूसरे पर कई आरोप लगाए. बाद में पुलिस ने दोनों को शांत कराया.

22 जुलाई, 2017, रामनगर :  सैलरी के विवाद में नौकर ने मालिक को चाकू मार दिया. बताया गया है कि महल्ला कसेरा लाइन निवासी विशाल अग्रवाल की भारत गैस की एजेंसी है. उस के यहां ग्राम छोई निवासी नरेंद्र कड़ाकोटी गैस वितरित करने का काम करता था. आरोप है कि उसे नौकरी से निकाल दिया गया है. वेतन को ले कर उस का कुछ विवाद चल रहा था. सुबह वह एजेंसी कार्यालय में पहुंचा. वेतन को ले कर उन दोनों के बीच झगड़ा हो गया. इसी दौरान उस ने मालिक के कंधे और पेट पर चाकू से वार कर दिए. इस के बाद वह खुद ही कोतवाली पहुंच गया. मालिक को गंभीर अवस्था में हौस्पिटल ले जाया गया, लेकिन रास्ते में ही उस ने दम तोड़ दिया.

18 जुलाई, 2017, नोएडा :  राष्ट्रीय राजधानी से सटे नोएडा में एक उच्चवर्गीय सोसाइटी में घरेलू नौकर को ले कर उपजे मनमुटाव ने मालिक और मुसलिम घरेलू नौकरानी के बीच दंगे जैसे हालात पैदा कर दिए थे. ये घरेलू नौकरानियां अधिकतर झारखंड, पश्चिम बंगाल और असम जैसे राज्यों के पिछड़े इलाकों से आती हैं. गृह सहायिका के रूप में काम करने वाली इन महिलाओं के साथ गालीगलौज, मानसिक, शारीरिक एवं यौन शोषण सामान्य सी बात है.

2 नवंबर, 2013, नोएडा :  नौकरी से निकाले जाने पर एक अकाउंटैंट की ओर से मालिक से 3 लाख रुपए की रंगदारी मांगने का मामला सामने आया. मूलरूप से आगरा के फतेहाबाद निवासी माधव पाराशर सैक्टर-37 स्थित एक रैस्तरां में अकाउंटैंट था. रैस्तरां मालिक जयप्रकाश चौहान ने गलत व्यवहार के चलते माधव पाराशर को कुछ महीने पहले नौकरी से निकाल दिया था. आरोपी नौकरी छोड़ते वक्त जयप्रकाश चौहान की एक चैकबुक, सेल्स टैक्स और सर्विस बुक की रसीदें चुरा कर ले गया था. माधव ने 15 जुलाई से 29 अक्तूबर, 2013 तक पीडि़त के मोबाइल पर कौल कर 3 लाख रुपए की रंगदारी मांगी. उस के मना करने पर उस ने जयप्रकाश चौहान को जान से मारने की धमकी दी.

चूंकि आरोपी के पास रैस्तरां की रसीदें थीं, इसलिए उस ने रैस्तरां को बरबाद करने की धमकियां भी दी थीं. 3 लाख रुपए अपने खाते में डलवाने के लिए माधव ने केनरा बैंक का एक अकाउंट नंबर भी पीडि़त मालिक के मोबाइल पर मैसेज किया. धमकियों से डर कर जयप्रकाश चौहान ने एक बार अकाउंट में 10 हजार रुपए डाल दिए. पर कुछ दिनों बाद माधव फिर से रुपए मांगने लगा. परेशान हो कर पीडि़त ने 31 अक्तूबर को थाना सैक्टर-39 में माधव पाराशर के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई. इस संबंध में रैस्तरां मालिक की शिकायत पर थाना सैक्टर-39 पुलिस ने आरोपी को अरैस्ट कर लिया है.

24 जून, 2017, हरदोई :  उत्तर प्रदेश के हरदोई में पुलिस ने एक डीजे व्यवसायी की हत्या का खुलासा करते हुए, हत्या में शामिल पत्नी और नौकर को गिरफ्तार किया. पुलिस ने खुलासे में बताया कि नौकर और महिला के बीच अवैध संबंध थे, जिस कारण महिला ने नौकर के साथ मिल कर मालिक की हत्या कर दी.

सितंबर, 2017, पटना :  पूर्णिया का रहने वाला दिलीप चौधरी दुकान चलाता था और उस की दुकान पर रहने वाला नौकर घनश्याम उस के घर आयाजाया करता था. इसी दौरान उस की पत्नी और नौकर के बीच प्रेम हो गया. दोनों शारीरिक संबंध बनाने लगे. एसपी निशांत तिवारी ने बताया, नौकर और मालिक की पत्नी के बीच चल रहे इस अवैध संबंध के कारण मालिक ने नौकर को रंगेहाथ पकड़ा और उस की हत्या कर दी. गिरफ्तारी के बाद सख्ती से पूछे जाने पर आरोपी ने अपना गुनाह कुबूल कर लिया.

तृप्ति लाहिड़ी की किताब ‘मेड इन इंडिया’ देश में घरेलू नौकरों से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर संवेदनशील तरीके से सोचने को विवश करती है. लाहिड़ी अपनी इस पुस्तक में कहती हैं कि उदारीकरण के वर्तमान दशक में देश में घरेलू नौकरों की संख्या में 120 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई है. इस असंगठित क्षेत्र में कार्यक्षेत्र का दोतिहाई हिस्सा महिलाएं भरती हैं और उन में से अधिकतर झारखंड, पश्चिम बंगाल और असम जैसे राज्यों के पिछड़े इलाकों से आती हैं. इन में से अधिकतर अल्पायु में ही काम शुरू कर देती हैं और उन्हें सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम वेतन से भी कम वेतन दिया जाता है.

नौकरों के लिए न्याय

इन्हें नौकरी देने वाले लोगों में देश के धनाढ्य वर्ग से ले कर नवधनाढ्य होते हैं, जिन में से अधिकतर अभी भी मालिक और नौकर के बीच के पारंपरिक अंतर में विश्वास करते हैं. डिजिटल मीडिया ‘क्वार्ट्ज’ की एशिया ब्यूरो चीफ लाहिड़ी अपनी पुस्तक में वास्तविक जीवन की कहानियों के जरिए घरेलू नौकरों की दशादिशा को बड़ी ही प्रामाणिकता के साथ पेश करती हैं तथा ब्रोकरों व एजेंटों के कारोबार का विस्तार से ब्योरा पेश करती हैं. लाहिड़ी के अनुसार, भारत में घरेलू नौकरों के लिए न्याय हासिल कर पाना बेहद मुश्किल है.

पुस्तक में लाहिड़ी ने बतौर घरेलू नौकर अपने खुद के अनुभव को भी लिखा है. घरेलू नौकरों का क्षेत्र इतना तेज क्यों विकसित हुआ? पहले औरतें घर में रहती थीं, इसलिए अधिकतर घर के सभी कार्य वे स्वयं ही करती थीं, लेकिन अब ऐसा शहरी आबादी के अमीर होने और शहरों में महिलाओं के अधिक संख्या में काम करने के चलते हुआ. स्कूल जाने वाली लड़कियों की संख्या भी तेजी से बढ़ी. ऐसे में अगर वे उच्चशिक्षा लेना चाहती हैं और शिक्षा हासिल कर नौकरियों में जाती हैं, तो उन्हें घरेलू कामकाज के लिए मदद की जरूरत होती है.

उन का कहना है कि कई संगठनों ने घरेलू नौकरों के इस क्षेत्र को संगठित करने की कोशिशें की हैं, लेकिन इस क्षेत्र के संगठनीकरण की कोशिशें खास सफल नहीं हुईं. इस में 2 सब से बड़ी अड़चनें हैं. लोग अपने आसपास के लोगों द्वारा घरेलू नौकरों को दिए जाने वाले वेतन को ही सही मानते हैं. इसलिए उन्हें घरेलू नौकरों को अधिक वेतन देने के लिए राजी करना बेहद मुश्किल होता है. अगर वे इस के लिए राजी भी होते हैं तो उसी अनुपात में ढेरों काम लेना चाहते हैं.

इस के अलावा गरीबी से परेशान हो कर काम की तलाश में नएनए आए व्यक्तियों द्वारा कम वेतन पर काम करने पर राजी होने के चलते भी सांगठनिक तौर पर अधिक वेतन की मांग करना संभव नहीं हो पा रहा.

मालिक और नौकर के वर्तमान रिश्ते को सुधारने के लिए कानून के साथ लोगों की मानसिकता में बदलाव आना अत्यधिक आवश्यक है. पहले जमाने के विपरीत उन को अब बराबरी का दर्जा देना पड़ेगा. वे अपनी मेहनत के बदले वेतन पाते हैं, हम उन को पैसा दे कर उन पर कोई एहसान नहीं करते. उन को अपने से निम्नस्तर का सोचने का हमें कोई अधिकार नहीं है, तभी वे हमें आदर की दृष्टि से देखेंगे.

कुछ बदलाव जरूरी हैं

  • जितना उन को वेतन महीनेभर में मिलता है, उतना तो हम एक बार किसी रैस्तरां का बिल चुकाने में खर्च कर देते हैं. इसलिए जिस तरह हमारे वेतन की पुनरावृत्ति होती है, उसी प्रकार समय के अनुसार उन के वेतन में भी बढ़ोतरी होनी चाहिए. उन के लिए महीने में नियमित छुट्टी के साथ अन्य सुविधाओं के लिए भी वेतन सहित छुट्टी का प्रावधान अति आवश्यक है.
  • नौकर या नौकरानी रखने से पहले उस की पृष्ठभूमि की जानकारी होनी अति आवश्यक है.
  • घर में किशोर लड़का या लड़की हो तो किसी को भी कार्य करने के लिए रखने के बाद उस की गतिविधियों पर पूरा ध्यान रखना आवश्यक है.
  • अबोध बच्चों को आया के हवाले करना बहुत ही अनुचित है. महिलाओं को तभी नौकरी के लिए बाहर जाना चाहिए जब घर का ही कोई सदस्य उस की घर पर देखभाल करने के लिए हो. किसी बच्चे ने अपनी मां से पूछा कि क्या वह अपना कीमती सामान किसी बाहरी व्यक्ति की देखरेख में छोड़ सकती है. उस के मना करने पर उस बच्चे ने बहुत सही प्रश्न किया कि फिर वह अपने सब से कीमती चीज, अपनी बच्चे को किसी की निगरानी में कैसे छोड़ सकती है?

धार्मिक पर्यटन से बढ़ती पंडों की लूट

दिल्ली के रहने वाले प्रेम कुमार ने उत्तर प्रदेश में नैमिषारण्य का बहुत नाम सुना था. उत्तर प्रदेश सरकार के प्रचारप्रसार में भी नैमिषारण्य तीर्थ का बहुत जिक्र था. दिसंबर माह में प्रेम कुमार दिल्ली से 5 दिन की छुट्टी ले कर उत्तर प्रदेश घूमने गए तो अपने सफर की शुरुआत उन्होंने नैमिषारण्य से करना तय किया. कोहरे के कारण दिल्ली से लखनऊ पहुंचने में काफी समय लग गया.

लखनऊ में रात रुकने के बाद अगले दिन सुबह उन्होंने बस द्वारा नैमिषारण्य का सफर शुरू किया. लखनऊ के कैसरबाग बस स्टेशन से सुबह 7 बजे की बस मिल गई. 3 घंटे बाद बस ने नैमिषारण्य पहुंचा दिया. बस से उतरते ही दानदक्षिणा और भीख मांगने वालों ने उन्हें घेर लिया. प्रेम कुमार की पत्नी ने कहा कि दर्शन करने से पहले स्नान हो जाए. ऐसे में उन लोगों को धर्मशाला में एक कमरा लेना पड़ा. नैमिषारण्य में मंदिर के आसपास कोई अच्छा होटल या धर्मशाला उन लोगों को नहीं मिली. मजबूरी में एक साधारण धर्मशाला में कमरा लेना पड़ा.

कमरे में इंडियन स्टाइल का बाथरूम था. बड़ी मुश्किल से प्रेम कुमार और उन की पत्नी स्नान कर पाए. वहां से वे मंदिर पहुंचे तो प्रसाद खरीदने के लिए दुकानों में लोग उन को अपनी ओर खींचने लगे.

प्रेम कुमार की समझ में नहीं आ रहा था कि कहां और किस दुकान से प्रसाद खरीदें. लोगों से बचतेबचाते वे एक साफसुथरी दिखने वाली दुकान पर गए और प्रसाद के बारे में पूछा तो छत्र वाला प्रसाद कम से कम 51 रुपए का था. जब तक प्रेम कुमार 51 रुपए का प्रसाद देने को कहते तब तक दुकानदार ने 51-51 रुपए का प्रसाद प्रेम कुमार और उन की पत्नी को पकड़ा दिया.

प्रसाद ले कर आगे बढ़े तो वहां कुछ पंडों ने उन्हें घेर लिया. उन का प्रस्ताव था कि वे उन्हें पूरा नैमिषारण्य घुमा देंगे, हर मंदिर का माहात्म्य समझा देंगे, जो दक्षिणा देना चाहें दे देना. प्रेम कुमार जानते थे कि इन के चक्कर में पड़ कर ठगे जाएंगे. वे पंडों का चक्कर छोड़ कर खुद ही मंदिर दर्शन के लिए चल पड़े.

प्रेम कुमार को यह समझ नहीं आया कि प्रसाद में मिले छत्र को चढ़ाने के लिए 501 रुपए देने की क्या जरूरत? वे बोले कि छत्र नहीं चढ़ाना है. पतिपत्नी दोनों ऐसे ही प्रसाद चढ़ा कर चले आए. मंदिर से बाहर निकलते ही उन्हें एक बार फिर भीख मांगने वालों की लंबी लाइन से जूझना पड़ा. वहां से बचतेबचाते वे धर्मशाला पहुंचे और राहत की सांस ली.

प्रेम कुमार को यह नहीं लग रहा था कि कहीं घूमने आए और मन को शांति मिली हो. धर्मस्थलों में पंडेपुजारियों की लूट से वे व्यथित थे. जिस तरह का प्रचार नैमिषारण्य को ले कर सुना था वह पूरा होता नहीं दिखा.

सैरसपाटा नहीं चढ़ावा व स्नान

धार्मिक पर्यटन को पर्यटन का दर्जा देना ठीक नहीं है. असल में यहां पंडों की लूट होती है. लोगों के मन में किस्सेकहानियों के जरिए यह भर दिया जाता है कि धार्मिक पर्यटन से सुखशांति मिलती है. असल में यहां पंडों की दुकानें हैं जो हर तरह से पर्यटकों को लूटती हैं.

प्रसाद की दुकानों से ले कर धर्मशालाओं में ठहरने तक में ये पंडे तथाकथित भगवान के नाम पर पैसा लेते हैं. यहां के बाजारों व खानेपीने की दुकानों में इन लोगों का अधिकार होता है. पैसा लेने के बाद भी ये लोग इन जगहों के विकास के लिए कुछ नहीं करते हैं. कई बार इन जगहों पर बदइंतजामी का आलम यह होता है कि भगदड़ में सैकड़ों लोगों की जान चली जाती है.

ऐसी जगहों पर नदी, तालाब या कुंड में नहाने की परंपरा होती है. इस के बारे में बताया जाता है कि यहां नहाने से शरीर पवित्र हो जाता है, जबकि पानी इतना गंदा होता है कि यहां नहाने से त्वचा रोगों का खतरा बढ़ जाता है. मंदिर ही नहीं, दरगाहों में भी चढ़ावे के नाम पर लूट होती है.

51 रुपए से ले कर 501 रुपए तक के प्रसाद में एक ही तरह की चीजें होती हैं. बाहर हम 10 रुपए का पानी भी देखभाल कर खरीदते हैं, लेकिन प्रसाद के नाम पर हम यह देखते ही नहीं कि दुकानदाररूपी पंडे क्या दे रहे हैं और हम क्या चढ़ा रहे हैं. असल में इन जगहों पर पर्यटन नहीं होता, लोग धार्मिक डर की वजह से यहां आते हैं. पर्यटन का मतलब यह होता है कि हम जहां जा रहे हैं वहां के लोगों, संस्कृति, रहनसहन, पहनावा और खानपान को देखें व समझ सकें.

अंधभक्तिभरी सरकारी नीति

उत्तर प्रदेश में हर सरकार केवल ऐसे शहरों में सुविधाओं को बढ़ाती है जहां मंदिर होते हैं. वह ऐसा कर के धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने की बात करती है. योगी सरकार भी धार्मिक शहरों के विकास की बात कर रही है जहां पर्यटकों को पंडेपुजारियों और भीख मांगने वालों के अलावा कुछ नहीं मिलता है.

उत्तर प्रदेश में धार्मिक पर्यटन से जुड़े 3 सर्किट पहले से बने हैं. इन में बौद्ध, रामायण और कृष्ण हैं. इस के तहत कुशीनगर, अयोध्या और मथुरा का विकास हो रहा है. अब सरकार की धार्मिक पर्यटन से जुड़े कुछ और क्षेत्रों का विकास करने की योजना बनी है. इस में सूफी, फ्रीडम स्ट्रगल, कांवड़ और शक्तिपीठ प्रमुख हैं.

सरकार ने इस के लिए 500 करोड़ रुपए का बजट रखा है. सरकार पर केवल हिंदू धार्मिक स्थलों के विकास का आरोप न लगे, इसलिए फ्रीडम स्ट्रगल, सूफी और जैन सर्किट को जोड़ा गया है.

ब्रज सर्किट का नाम बदल कर कृष्ण सर्किट कर दिया गया है. इस से ब्रज का विकास होगा. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने ब्रज तीर्थ विकास परिषद का गठन किया है. अवध क्षेत्र के लिए भी यह मांग हो रही है. इस के अलावा धार्मिक महत्त्व वाले सरकारी शहरों में मथुरा, वाराणसी, वृंदावन, चुनार, विंध्याचल, देवा शरीफ, नैमिषारण्य, सारनाथ, कपिलवस्तु, श्रावस्ती, कौशांबी, महोबा, चित्रकूट, कांलिजर, झांसी, देवगढ़ और चरखारी शामिल हैं.

बड़े शहरों में आगरा, लखनऊ, वाराणसी को हैरिटेज जोन बनाया गया है. सरकार बरसाने की होली, अयोध्या के दीपोत्सव और इलाहाबाद के कुंभ को बढ़ावा देना चाहती है. उत्तर प्रदेश जनसंख्या के लिहाज से देश का सब से बड़ा राज्य है. यहां हर तरह का पर्यटन होता है. इस के बाद भी घरेलू पर्यटन के क्षेत्र में उत्तर प्रदेश दूसरे नंबर पर है. विदेशी पर्यटन को देखें तो उत्तर प्रदेश तीसरे नंबर पर है. उत्तर प्रदेश से पहले तमिलनाडु और महाराष्ट्र का नंबर आता है.

उत्तर प्रदेश मेें सब से अधिक विदेशी पर्यटक आगरा स्थित ताजमहल को देखने आते हैं. इस के बावजूद सरकार ताजमहल पर ध्यान नहीं दे रही है. उत्तर प्रदेश से जब उत्तराखंड अलग हुआ, उस के बाद से यहां पर्यटन के नाम पर केवल धार्मिक पर्यटन को ही बढ़ावा दिया गया, जबकि दक्षिण भारत ने अपने चहुंमुखी पर्यटन को बढ़ावा दिया. आज वहां देश का सब से अधिक पर्यटक जाता है.

दोहरा खर्च बड़ी परेशानी

  • आम शहरों में केवल आनेजाने व रहने पर खर्च करना होता है जबकि धार्मिक शहरों में इस के अलावा, पंडेपुजारियों को दानदक्षिणा देने पर भी खर्च करना पड़ता है.
  • धार्मिक शहर ऐसे बसे हैं कि वहां भीड़, जाम और गंदगी भरी होती है. ऐसे में पर्यटकों को गंदगी का सामना भी करना पड़ता है.
  • पंडेपुजारी धर्म का डर दिखा कर लूटने के रास्ते बनाते हैं. इस से लोगों को मजा कम, परेशानी ज्यादा होती है.
  • मंदिरों की भीड़ में शांति कम, परेशानी ज्यादा होती है, जेबकतरी से ले कर लूट तक की घटनाएं घटने लगी हैं.
  • धार्मिक शहरों की भीड़ में भगदड़ होने से अकसर कई तरह की दुर्घटनाएं घट जाती हैं.

जिन्ना का जिन्न

विभाजन के गड़े मुरदे मोहम्मद अली जिन्ना को, अलीगढ़ मुसलिम विश्वविद्यालय में लगे उन के चित्र को ले कर, उखाड़ा जा रहा है. एक व्यर्थ की बहस की शुरुआत की गई है कि 1947 में देश के विभाजन के लिए आखिर जिम्मेदार कौन था – मोहम्मद अली जिन्ना जो पाकिस्तान के कायदे आजम बने या कांग्रेस जिस ने उस के बाद दशकों तक राज किया?

विभाजन एक ऐसी बात थी जिस का 1947 से पहले चाहे अंदाजा था पर उसे इस बुरी तरह मारपीट की शक्ल मिलेगी, इस का अंदाजा नहीं था. भारत में नरसंहार के लिए मुसलमानों को दोषी ठहराया जाता है और पाकिस्तान में हिंदुओं को. कोई भी यह कहने को तैयार नहीं है कि असल में जिम्मेदार कौन था और कितना गुनाहगार था. आज इस बात को न उठाया जाए तो ही अच्छा है, क्योंकि इस में बहुत सी कड़वी सचाइयां ही सामने नहीं आएंगी, बल्कि 1947 के विभाजन के कारण जो आज भी सामने हैं, दिखने लगेंगे.

आज जिस तरह भीमराव अंबेडकर की मूर्तियों को तोड़ा जा रहा है और गांधी की मूर्तियों पर कालिख पोती जा रही है उस से साफ है कि देश का एक वर्ग उन्हीं मूर्तियों को चाहता है जिन के जरिए वह पैसा उगाहने में सफल हो. देश के कोनेकोने में देवीदेवताओं की मूर्तियों को लगाया जा रहा है, क्योंकि उन के माध्यम से वे ही लोग पैसा कमा रहे हैं जो जिन्ना के फोटोग्राफ या अंबेडकर की मूर्तियों से चिढ़ रहे हैं.

1947 की बात याद दिला कर कट्टरपंथी असल में यह बात दोहरा रहे हैं कि देश में पौराणिक राज चलेगा और जिसे पौराणिक अभयदान नहीं है उस की देश में जरूरत नहीं है. इन लोगों ने अपनी गिनती कुछ को बहलाफुसला कर बढ़ा ली है वरना ये धर्म के पैरोकार रहते हुए भी बेचारे ही थे. अब हिंदूमुसलिम राग आलाप कर असल में वे जाति के घाव कुरेद रहे हैं जो वर्षों से ढके हुए हैं.

मोहम्मद अली जिन्ना की फोटो का अलीगढ़ मुसलिम विश्वविद्यालय में कोई खास औचित्य नहीं है और वैसे ही किसी देवीदेवता, मदन मोहन मालवीय, दयानंद, दीनदयाल उपाध्याय, जवाहरलाल नेहरू, मोहनदास कर्मचंद गांधी के चित्रों का भी कोई महत्त्व नहीं है. ये सब इतिहास की किताबों में शोभा देते हैं, दीवारों और सड़कों पर नहीं.

जातिवादी मानसिकता के सामने विफलता

नेपाल में कैलाली की सांसद कालू देवी बिश्वकर्मा ने संसद में तमाम मशक्कत के बावजूद काठमांडू में मकान न मिलने की पीड़ा का बयान कर सबको चौंका दिया. संघीय समाजवादी फोरम की सांसद दो महीने से राजधानी में किराए का फ्लैट तलाश रही हैं, पर जातिवादी मानसिकता के सामने विफल हैं. दुर्भाग्यपूर्ण है कि पांच दशक पूर्व जाति आधारित भेदभाव अपराध घोषित होने के बावजूद दलित आज भी इसके शिकार हैं. निर्वाचित जन-प्रतिनिधि तक इससे नहीं बचे हैं.

2011 की जनगणना के अनुसार, नेपाल की कुल जनसंख्या का 13.13 प्रतिशत दलित हैं, हालांकि शोधार्थियों की नजर में यह आंकड़ा भी हकीकत से कम है. 1990 के राजनीतिक संक्रमण, विशेषकर 2006 के बाद देश ने पहचान व प्रतिनिधित्व से जुड़े कई राजनीतिक-सामाजिक बदलाव देखे, लेकिन बहुत कुछ अब भी नहीं बदला है. दलित अब भी राजनीति और समाज के हाशिए पर ही हैं.

मधेसियों व जनजातीय समूहों की तुलना में इनका प्रतिनिधित्व नगण्य रहा है. प्रतिनिधित्व सार्वजनिक बहसों में भले ही मुद्दा हो, पर रहनुमाई के अभाव में इनकी आवाज वहां भी मुखर नहीं हो सकी. दलित महिलाएं तो आज भी सबसे ज्यादा उपेक्षित-उत्पीड़ित हैं. हालांकि वर्तमान संविधान के अनुच्छेद 40 में इनकेसशक्तीकरण और प्रतिनिधित्व के लिए कई प्रावधान हैं, जिसने इस समाज को उम्मीद बंधाई है. आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के अनुसार अब हर वार्ड में कम से एक दलित महिला प्रतिनिधि का होना अनिवार्य है और संसद में भी 13.8 प्रतिशत सीट दलितों के लिए आरक्षित हैं.

यह सब है, कानून भी हैं, लेकिन मानसिकता नहीं बदली है. और सच है कि इसे बदले बिना महज सांविधानिक प्रावधानों से कुछ नहीं होगा. इसके लिए वैयक्तिक साझेदारी और समझदारी विकसित करनी होगी. निचली इकाइयों, स्कूल-कालेज और पाठ्यपुस्तकों के जरिए जागरूकता लानी होगी. संवैधानिक संस्थाओं से लेकर राजनीतिक-सामाजिक तानेबाना सक्रिय किए बिना सारे तो प्रयास ही नाकाम होंगे.

इस बिजनेसमैन को डेट कर रही हैं अंकिता लोखंडे

धारावाहिक पवित्र रिश्ता से फैमस हुईं अंकिता लोखंडे अब फिल्म ‘मणिकर्णिका’ में कंगना रनौत के साथ काम कर रही है. अंकिता लोखंडे का लुक पिछले दिनों सामने आया था. अपनी डेब्यू फिल्म में अंकिता झलकारी बाई का अहम रोल निभा रही हैं. फिलहाल अंकिता ने अपने हिस्से की शूटिंग पूरी कर ली है जिसके बाद वो अपनी क्वालिटी टाइम किसी खास के साथ स्पेंड कर रही हैं.

सूत्रों की मानें तो अंकिता लोखंडे मुंबई के एक बड़े बिजनेसमैन विक्की जैन को डेट कर रही हैं.  दोनों की नजदीकियां पिछले साल तब बढ़ी थी जब ये साथ में होली सेलिब्रेशन पार्टी में पहुंचे थे.

दरअसल, अंकिता और विकी जैन दोनों एक ही सोसाइटी में रहते हैं और अक्सर साथ में हैंगआउट करते भी देखे जाते हैं. बता दें, विक्की जैन स्पोर्ट्स रियलिटी एंटरटेनमेंट शो ‘बौक्स क्रिकेट लीग’ की मुंबई टीम के को-ओनर हैं.

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गौरतलब है कि इससे पहले पहले अंकिता का अफेयर एक्टर सुशांत सिंह राजपूत के साथ था. दोनों 6 साल तक लिव-इन में रहे थे. अंकिता और सुशांत को 2009 में जीटीवी के शो ‘पवित्र रिश्ता’ में लीड रोल मिला था. वहीं अंकिता के ब्वायफ्रेंड विक्की जैन भी इससे पहले एक्ट्रेस टिया वाजपेयी के साथ रिलेशनशिप में रह चुके हैं.

सफेद बाल मुरदाबाद : कैसे फंस गया मैं

जैसे ही उन के जनरल प्रोविडैंट फंड के कागज आए, वैसे ही वे दफ्तर की फाइलों की ओर से भी लापरवाह हो गए. ऐसी लापरवाही कि फाइलों से उन का जैसे कभी कोई रिश्ता ही न रहा हो. उन की मेज पर फाइलों का ढेर हर रोज उन के कद से ऊंचा होता जा रहा था, पर वे बेफिक्र. जो आएगा, वह उन के इकट्ठा किए गए गंद में सड़ता रहेगा.

वे सुबह ठुमकठुमक करते दोपहर के 12 बजे तक दफ्तर पहुंचते और जिस किसी को भी सीट पर तनिक गरदन उठाए देखते, उसी के पास गपें मारने हो लेते. किसी का उन के साथ गपें मारने का मन हो या न हो, इस से उन्हे कोई लेनादेना न होता.

जिन फाइलों की उलटापलटी की बदौलत उन्होंने बाबू होने के बाद भी शहर में 4-4 प्लौट खरीदे, बीसियों कंपनियों के हिस्से खरीदे, उन फाइलों से उन की बेरुखी देखने के काबिल थी.

जैसे ही 1 बजता, वे सब से पहले कैंटीन में आ जाते और इंतजार करते रहते कि कोई आए, तो वे उस को 4 बजे तक जैसेतैसे अपनी गपों में लगाए रखें.

आज उन के जाल में शायद मेरा फंसना लिखा था. दफ्तर आतेआते बिल्ली रास्ता काट गई थी, सो जान तो मैं पहले ही गया था कि आज दफ्तर में कुछ अनहोनी होगी, पर मेरे साथ इतना बुरा होगा, ऐसा मैं ने कभी नहीं सोचा था.

कैंटीन में फंसा मैं जब भी उन के पास से उठने की नाकाम कोशिश करता, तो वे कुछ खाने को मंगवा देते और सरकारी लालची कबूतर एक बार फिर पेट भरा होने के बाद भी दाने के लालच में उन के जाल में जा फंसता.

जब मेरा पेट हद से ज्यादा भर गया, तो और मेरे कान उन की बेहूदा बातें सुन कर पक गए, तो मैं ने कैंटीन के दरवाजे की ओर देखा कि कोई दफ्तर से चाय पीने आता, तो मैं उसे इन के हवाले कर इन से छुटकारा पाता.

पर जब दफ्तर से कोई आता न दिखा, तो सच कहूं कि पहली बार मुझे अपने हाल पर रोना आया और मैं ने उन को हद से ज्यादा झेलने के बाद उन से यों ही पूछ लिया, ‘‘मोहनजी, अब रिटायरमैंट के बाद आप का क्या करने का इरादा है? रिटायरमैंट के बाद आप को कोई याद आए या न आए, पर आप की सीट पर काम कराने आने वाले आप को बेहद याद आएंगे. बेचारों को आप ने इस तरह निचोड़ा है कि अगले कई जनमों तक अगर वे इसी देश में पैदा होंगे, तो किसी सरकारी दफ्तर में जाने से पहले सौ बार सोचेंगे.’’

‘‘करूंगा क्या? अब इश्कविश्क करने से तो रहा. घुटने तो घुटने, दिल तक को गठिया हो गया है. यह तो थोड़ाबहुत दफ्तर में…

अब बीवी की सेवा करूंगा, ताकि मरने से पहले उस के कर्ज से छुटकारा पा जाऊं. बेचारी ने किसी भी मन से सही, मेरी बहुत सेवा की है. कहीं ऐसा न हो कि अगले जनम में भी उसी से पाला पड़े,’’  कह कर उन्होंने ऐसा मुंह बनाया, मानो उन के मुंह में किसी ने नीम के पत्तों का गिलास भर रस उड़ेल दिया हो.

‘‘अगर बुरा न मानो, तो मैं आप को रिटायरमैंट के बाद एक बेहतर धंधे की सलाह दे सकता हूं,’’ मैं ने कहा.

‘‘यार प्रदीप, बहुत कर लिया दफ्तर में रहते हुए धंधा. यह 35 सालों तक मैं ने धंधे के सिवा और किया ही क्या है?’’

‘‘मेरी मानो, तो अपने महल्ले में मोबाइल रीचार्ज की दुकान खोल लेना. सारा दिन आराम से कट जाएगा और इस बहाने जाती जवानी भी रुक जाएगी.’’

‘‘हमारे महल्ले में पहले से ही 4-4 रिटायरी इस धंधे में जमे हैं. ऐसे में मुझे नहीं लगता कि…’’

‘‘तो ऐसा करो कि हेयर डाई की दुकान खोल लेना. वैसे भी मैं ने नोट किया है कि ज्योंज्यों हम जैसों की उम्र के बंदों के गाल अंदर को धंसते जा रहे हैं, वे सिर से ऐसे दिखते हैं मानो उन के सिर पर अभीअभी बाल आने शुरू हुए हैं. आज के सिर हैं कि उन्हें अपने पर एक भी सफेद बाल पसंद ही नहीं.

‘‘आज के जमाने का कोई सब से बड़ा दुश्मन है, तो वे हैं सफेद बाल. आज का आदमी उतना परेशान किसी से नहीं, जितना इन सफेद बालों से है. वह मौत का सामना खुशी से कर सकता है, पर सफेद बालों के आगे अपनेआप को बहुत कमजोर पाता है.

‘‘आदमी को उतनी परेशानी रोटी न मिलने पर भी नहीं होती, जितनी परेशानी आईने के आगे खड़े हुए अचानक सिर पर एक सफेद बाल दिखने पर होती है. सिर में एक सफेद बाल दिखते ही उसे लगता है, मानो उस पर मुसीबतों का एक पहाड़ नहीं टूटा, बल्कि कई टूट पड़े हैं,’’ किसी बाबा की तरह उपदेश देते हुए मेरा गला सूख गया था, सो पानी का घूंट ले कर मैं ने आगे कहना शुरू किया, ‘‘मोहनजी, इधर सफेद बाल सिर में दिखा और उधर डाई बनानेबेचने वालों की फसल कटनी शुरू. कई तो मैं ने ऐसे भी देखे हैं, जो सिर पर बाल न होने के बाद भी गंजे सिर पर ही कालिख मल लेते हैं.

‘‘ये अपने साहब देखे? सिर के तो सिर के, छाती तक के बाल काले कर के दफ्तर आने लगे हैं, ताकि अपनी शर्ट के बटन दिसंबर में भी खुले रख कर खुद को जवान होने के एहसास में डुबोए रहें. उन के दाढ़ीमूंछों के रंगे बालों को देख कर तो नौजवानों के ओरिजनल काले बालों तक को शर्म आ जाती है.

‘‘मैं जब आप की बेटी की शादी में गया था, तो अपनी दादी की उम्र की आप की महल्ले वालियों के रंगे बालों को देख कर दंग रह गया था. लगा था, आप का महल्ला तो जैसे जवानों का महल्ला हो. उन के बूढ़ी होने का पता तब चला था, जब वे कमर पर हाथ रख कर जैसेतैसे वरवधू को आशीर्वाद देने के लिए उठी थीं.

‘‘सच कहूं, आज के आदमी के पास रोटी के लिए पैसे हों या न हों, पर वह बाल डाई करने के लिए पैसे का जोड़तोड़ कर ही लेता है.

‘‘मेरा बस चले तो मैं टांगों तक के सफेद बाल रंग कर ही सांस लूं. आने वाले दिनों में देखना जो बिना डाई किए बालों के मरेंगे, उन्हें स्वर्ग के तो स्वर्ग के नरक तक के ताले नहीं खुलेंगे मिलेंगे. पता है पिछले हफ्ते अपने महल्ले में क्या हुआ था?’’

‘‘क्या हुआ था?’’ यह पूछते हुए मोहनजी का मुंह खुला का खुला रह गया.

‘‘महल्ले के सौ साल के एक बुजुर्ग गुजर गए.’’

‘‘तो क्या डाक्टरों के मरा बताने के बाद भी वे दोबारा जिंदा हो उठे?’’

‘‘नहीं, अब हम डाक्टरों पर विश्वास कम ही करते हैं… जब उन्हें देवभूत लेने आए, तो उन के सफेद बालों को देख कर उन्हें ले जाने से साफ मुकरते हुए बोले, ‘माफ करना, हम इन्हें नहीं ले जा सकते.’

‘‘गाड़ी अपनी कर दें क्या भैया? तुम ऊपर बिल अपना दे देना,’’ हम ने उन के आगे गिड़गिड़ाते हुए कहा. सभी को अपनेअपने घर जाने को देर जो हो रही थी. अब यहां लोगों के पास जिंदों के लिए वक्त नहीं, तो मरे हुए के साथ कौन रहे?

‘‘देवभूतों ने चाय पीतेपीते कहा. ‘ये नहीं चलेंगे. नरक में भी नहीं,’

‘‘क्यों नहीं चलेंगे? सौ साल का बंदा ऊपर ही तो चलता है.’’

‘‘यह सुन कर वे बोले, ‘तो ऐसा करो, अगर तुम इन से छुटकारा पाना चाहते हो, तो पहले इन के सफेद बाल डाई कराओ. साहब तक को सफेद बाल वालों से सख्त नफरत है.

‘‘‘जब हम कोई सफेद बाल वाली आत्मा ले जाते हैं, तो वे हमें न सुनने लायक गालियां यह कहते हुए देने लग जाते हैं कि मृत्युलोक से क्या गंद उठा लाए. कितनी बार कहा कि खूबसूरती भी कोई चीज होती है कि नहीं?’’’

इतना सुन कर मोहनजी ने मेरी पीठ थपथपाई और खुद ही मेरे पास से उठ कर मंदमंद मुसकराते हुए घर की ओर हो लिए.

बुल्गारिया में जंगली सुअर के शिकार मामले में बुरे फंसे सैफ अली खान

काले हिरण शिकार मामले में कुछ समय पहले जोधपुर कोर्ट द्वारा बरी‍ किए गए एक्‍टर सैफ अली खान का शिकार के एक अन्य मामले में पुलिस ने बयान दर्ज कराया है. दरअसल ये मामला यूरोपीय देश बुल्‍गारिया में जंगली सुअर (Wild Boar) के शिकार से जुड़ा हुआ है. इस मामले में बुल्‍गारिया की पुलिस ने सैफ के एजेंट को पकड़ा है. एक रिपोर्ट के मुताबिक बुल्‍गारिया की सरकार ने इस मामले में इंटरपोल (INTERPOL) से सैफ का बयान लेने का आग्रह किया था. उसके बाद सूत्रों के मुताबिक इंटरपोल के नोटिस पर पिछले दिनों मुंबई क्राइम ब्रांच ने सैफ अली खान का बयान दर्ज किया है.

इस रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से लिखा गया है कि सैफ अली खान का बयान गवाह के तौर पर दर्ज किया गया है. कहा जा रहा है कि इस महीने की शुरुआत में मुंबई क्राइम ब्रांच की बांद्रा यूनिट की एक टीम ने सैफ के घर जाकर बयान दर्ज किया. अभी यह स्‍पष्‍ट नहीं है कि क्‍या इस बयान को सीबीआई के पास अभी भेजा गया या नहीं? ऐसा इसलिए क्‍योंकि भारत में सीबीआई ही इंटरपोल की नोडल एजेंसी है.

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इस संबंध में एक सूत्र ने बताया कि बुल्‍गारिया की पुलिस ने एक ऐसे एजेंट को पकड़ा है जिसने एक्‍टर के लिए इस तरह के हंटिंग प्रोग्राम का आयोजन कराया था, लेकिन इसके लिए जरूरी लाइसेंस और परमिट कथित रूप से नहीं लिए गए थे. इस सूत्र के मुताबिक, ”एजेंट को इस शिकार प्रोग्राम के आयोजन के आरोप में पकड़ा गया है…क्‍योंकि उसने जरूरती परमिट और लाइसेंस नहीं लिए थे. इसी मामले में इंटरपोल ने एक्‍टर से ब्‍योरा मांगा है.”

बुल्‍गारिया में जंगली सुअर के शिकार को ‘बिग गेम’ हंटिंग श्रेणी में रखा जाता है. वहां के स्‍थानीय नियमों के मुताबिक यदि किसी विदेशी के पास अपने मूल देश का शिकार का लाइसेंस होता है तो ऐसे सैलानियों को बुल्‍गारिया लघु अवधि के वीजा के साथ एक महीने की मियाद का लाइसेंस जारी कर सकता है. यदि विदेशी नागरिक के पास शिकार का लाइसेंस नहीं होता तो उनको इसके लिए शिकार का थ्‍योरी और प्रैक्टिकल एक्‍जाम देना होता है. इसके साथ ही हथियार के लिए अनुमति लेनी होती है.

काला हिरण केस

इसी अप्रैल में जोधपुर कोर्ट ने 1998 के काला हिरण शिकार मामले में एक्‍टर सलमान खान को पांच साल की सजा सुनाई थी और अन्‍य आरोपियों सैफ अली खान, सोनाली बेंद्रे, नीलम और तब्‍बू को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया गया.

किरकिरा न हो जाए ग्रुप टूर का मजा

व्यक्तिगत ट्रिप की तुलना में पैकेज्ड टूर कई मामलों में काफी सुविधाजनक होता है. पैकेज्ड टूर में सबकुछ टूर औपरेटर द्वारा मैनेज कर देने और गाइड उपलब्ध करवा देने से आसानी होती है और व्यक्तिगत ट्रैवल की तुलना में यह सस्ता भी पड़ता है. लेकिन किसी टूर औपरेटर के जरिए पर्यटन पर जाने से पहले कुछ बातें जान लें तो आप यात्रा में होने वाले कड़वे अनुभवों, कुढ़न या तनाव से बच जाएंगे और टूर का मजा किरकिरा नहीं होगा.

भ्रामक धारणा-1 :  मैं ने ट्रैवल इंश्योरैंस ले लिया, मेरे सभी बैगेज की सुरक्षा की पूरी टैंशन खत्म.

असलियत :  किसी अच्छी ट्रैवल इंश्योरैंस पौलिसी में मैडिकल, ऐक्सिडैंट कवर के अलावा ट्रिप की रद्दगी, फ्लाइट की देरी और बैगेज लौस कवर रहता है, लेकिन सारा बैगेज नहीं. इस में एयरलाइन चैक्डइन बैगेज का ही लौस कवर होता है, एयरपोर्ट से बाहर का नहीं यानी होटल या टूर बस से बैगेज खो जाने पर आप को यह कवरेज नहीं मिलेगा. हां, आप टूर औपरेटर की मदद से स्थानीय पुलिस स्टेशन में एफआईआर दर्ज करा सकते हैं. एयरपोर्ट पर सामान खोने की सूचना भी संबंधित एयरलाइंस को तुरंत देनी होगी और इस का लिखित प्रमाण आप को रखना होगा. इस विषय में अपने इंश्योरैंस एजेंट से जानकारी लेनी लाभकारी साबित हो सकती है.

भ्रामक धारण-2 :  भ्रमण संबंधी जो शैड्यूल ब्रोशर में है, वही फाइनल है.

असलियत :  ज्यादातर टूर औपरेटर नियम और शर्तों के तहत लिख देते हैं कि उन के नियंत्रण से बाहर ट्रैफिक समस्या, मौसम की गड़बड़ी, स्थानीय त्योहार, स्पोर्ट्स, हड़ताल, होटल बंद होना, होटल में या फ्लाइट में ओवरबुकिंग होना, ट्रेन या विमान का मार्ग बदलना आदि व अन्य कारणों से तय कार्यक्रम में कोई भी तबदीली संभव है. इसलिए टूर औपरेटर द्वारा हमेशा टूर पैकेज, ट्रैवल प्लान, साइटसीइंग आदि में अचानक या शौर्ट नोटिस पर बदलाव संभव है. इसलिए पेमैंट देने और औफर डौक्यूमैंट पर दस्तखत करने से पहले सबकुछ अच्छी तरह पढ़ लें और छोटेमोटे बदलावों के लिए तैयार रहें.

भ्रामक धारणा-3 :  ट्रिप खत्म होने दो, तब इस की कम्प्लेन कर के सबक सिखाएंगे.

असलियत :  आप ने आनंदपूर्वक छुट्टी बिताने के लिए मुंहमांगी कीमत दी है, फिर सेवा में कमी की कोई शिकायत टूर खत्म होने के बाद क्यों करेंगे. बीत गई, सो बात गई. टूर खत्म होने पर शिकायत करने से भी क्या फायदा? आप टूर के किसी भी चरण में अगर दिक्कत महसूस करते हैं, तो उसी वक्त टूर कंपनी को शिकायत करें क्योंकि वे स्थानीय होटल वालों और स्थानीय वैंडर्स के भरोसे टूर आयोजित करते हैं. आप की पुख्ता शिकायत मिलने पर वे उसी वक्त उन्हें टाइट कर के आप को बेहतर सेवाएं दिलवाएंगे. हां, मौखिक शिकायत के साथसाथ लिखित शिकायत भी जरूर दें. अपनी शिकायत स्पष्ट, सटीक और सही शब्दों में लिखें, गोलमोल नहीं.

भ्रामक धारणा-4 :  10-15 मिनट इधरउधर तो चलता है, यार.

असलियत : हम भारतीय 10-15 मिनट की कोई कीमत नहीं समझते. टूर में भी हम यही मान कर चलते हैं कि बरात की बस की तरह यहां भी हमारे आए बिना बस नहीं चलेगी. लेकिन यकीन मानिए, आप को यहां काफी मुसीबतें झेलनी पड़ सकती हैं. किसी भी गु्रप टूर में समय की पाबंदी होती है और यहां देरी करने की कोई गुंजाइश नहीं. अगर आप एकदो मिनट से ज्यादा की देरी करते हैं और तय समय पर किसी पर्यटन स्थल, होटल या शौपिंग मौल से अपनी बस तक नहीं पहुंचते हैं, तो गाड़ी छूट जाएगी. फिर अनजानी जगह आप को काफी मुसीबतों का सामना करना पड़ सकता है.\

भ्रामक धारणा-5 :  मैं ने फीस दे दी, अब वीजा का पेपरवर्क करने का जिम्मा टूर औपरेटर का है

असलियत :  टूर औपरेटर वीजा आवेदन शुल्क के साथसाथ खुद की सर्विस फीस भी लेते हैं. वे आप के लिए आवेदन जरूर करते हैं, लेकिन इस पर उन का कोई बस नहीं चलता कि आप को वीजा समय पर मिल ही जाए. अगर आप का आवेदन रद्द हो जाता है, तो आप की फीस जब्त कर ली जाएगी. टूर औपरेटर से इस की वापसी की उम्मीद करना बेकार है.

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