पुरातनपंथी सोच को मूक समर्थन

अगर गाय आप का खेत चरने लगे तो खेत को नष्ट करोगे या गाय को मार भगाओगे? बलात्कार के मामले में धर्मप्रचारकों का कहना है कि बलात्कारी तो गायों की तरह पूजनीय हैं, जिन्हें न पकड़ा जा सकता है और न ही मारा. उन्होंने चर लिया तो गलती किसान की है कि उस ने खेत बोया या बिना पहरेदारी के छोड़ दिया.

बलात्कारियों को सब से बड़ा बल धर्म के उन पैरोकारों से मिलता है, जो समयसमय पर कहते रहते हैं कि बलात्कारों के लिए औरतें जिम्मेदार हैं, क्योंकि वे भड़काऊ पोशाकें पहनती हैं.

आजकल बलात्कार होते हुए बहुत से भारतीय वीडियो सोशल मीडिया में घूम रहे हैं और उन में आमतौर पर जबरन जोरआजमाइश उन लड़कियों से होती दिखती है, जो गांवों की हैं, खेतों में से गुजर रही हैं और बदन पर पूरे कपड़े पहने हुए हैं. इसी तरह भगवा दुपट्टा पहने उन लड़कों के भी वीडियो सोशल मीडिया में खूब चल रहे हैं, जो नैतिकता थोपने के बहाने जोड़ों पर हमला कर रहे हैं. इन में भी लड़कियों की पोशाकें भड़काऊ नहीं हैं.

दोनों तरह के वीडियोज में एक समानता यह है कि कानून हाथ में लेने वाले एक तरह का सा व्यवहार कर रहे हैं. 2-4 लड़के मिल कर प्रेम करते जोड़े की कभी ऐंटीवैलेंटाइन डे के नाम पर तो कभी लव जिहाद के नाम पर पिटाई कर रहे हैं. ये वही हैं जो बलात्कार जैसे कांड करते हैं.

धर्म और संस्कृति की रक्षा के नाम पर एक अघोषित सेना खड़ी कर ली गई है, जो कहीं भी किसी को भी शिकार बना लेती है. वे सदियों से पेशेवर डकैती करतेकरते सैनिक बने लड़ाकों की तरह हैं. पहले के राजा डकैतों को अपनी सेना में शामिल कर उन्हें लूट और दुश्मन की औरतों को भोगने की इजाजत देते थे. अब अघोषित सेना तैयार हो रही है जो गौरक्षा, संस्कृति रक्षा व धर्म रक्षा के नाम पर उत्पात मचाती है और गुंडे तत्त्व इसी में शामिल हैं. इन्हें बोनस में मारपीट का हक मिलता है और बलात्कार करें तो पुलिस मामला दर्ज नहीं करती.

बलात्कार औरतों की प्रगति को रोकने का सब से बड़ा हथियार बना हुआ है. उन्हें घरों में बंद करना है, तो उन में बलात्कार का हौआ बैठा दो. उन्हें बता दो कि बलात्कार के दौरान शारीरिक कष्ट तो होगा ही, बाद में समाज दोषी भी उन्हें ही मानता रहेगा.

संस्कृति, धर्म, रीतिरिवाजों का रातदिन गुणगान करने वाले धर्म के रक्षक, जिन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वयं सब से ज्यादा मुखर हैं, क्यों नहीं बलात्कार की पीडि़ता को वह सामाजिक स्तर दिलाने को बोलते, जो पत्थर की मूर्तियों और सिर्फ भैंसों की तरह दूध देने वाली गायों को दिलाने के लिए रातदिन बोलते नहीं थकते? वे भी उसी पुरातनपंथी सोच को मूक समर्थन दे रहे हैं कि बलात्कार की दोषी तो लड़कियां ही हैं.

व्यापार विवाद का यह दौर अभी लंबा चलेगा

ऐसे वक्त में, जब चीन और अमेरिकी प्रतिनिधि वाशिंगटन में बनी सहमति के मुद्दों को अमली जामा देने की नई प्रक्रिया में जुटे हों, जरूरी है कि ऐसा कुछ न हो, जो इसे प्रभावित करने का काम करे. सच है कि बार-बार के व्यापारिक विवादों ने दोनों देशों के साथ वैश्विक बाजार पर भी असर डाला है. चीन ने व्यापारिक कड़ियों की मजबूती ही देखी, लेकिन अमेरिका बाज नहीं आ रहा.

चीन ने दोनों पक्षों के बीच आम सहमति की जमीन तलाशने की बेचैनी और उसके नतीजे देखे हैं. लेकिन अमेरिका अब तक दंडात्मक टैरिफ के इरादे से चिपका हुआ है. व्हाइट हाउस ने फिर चीनी आयात पर 25 फीसदी टैरिफ थोपने की बात कही है, जबकि साझा सहमति और अमेरिका के ट्रेड वार रोकने पर सहमत हो जाने के बाद ऐसी हरकतें वाशिंगटन को अविश्वसनीय बनाती हैं.

कभी-कभी लगता है कि व्यापार विवाद का यह दौर अभी लंबा चलेगा. व्यापार विवाद चीन के लिए गंभीर चुनौती रहे हैं. चिंता है कि वार्ता व अंतर्विरोध की लुकाछिपी कहीं नई मुश्किल न खड़ी कर दे. ऐसे में, चीन के लिए विकास की अपनी रफ्तार बनाए रखना जरूरी है. अमेरिका से विवाद निपटाने में दो सूत्री सिद्धांतों पर ध्यान देना होगा- एक तो यह कि अमेरिका आर्थिक विकास में चीन की साझेदारी चाहे तो हमें स्वागत करना चाहिए, लेकिन अमेरिका से निर्यात बढ़ना चीन की कमजोरी न माना जाए. साथ ही, चीनी हित प्रभावित करने वाले किसी अमेरिकी प्रयास को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए.

वाशिंगटन सहमति परस्पर सहयोग का बड़ा द्वार है, तो परस्पर हितों का ध्यान रखना भी जरूरी है. ठीक वैसे ही है, जैसे दोनों के सामने एक विशाल केक रखा है, पर किसी एक की भी नियत साफ न हो, तो केक का स्वाद बिगड़ते देर नहीं लगेगी. अमेरिका को पता होना चाहिए कि वह वास्तव में चाहता क्या है- ज्यादा टैरिफ या ज्यादा निर्यात, क्योंकि दोनों एक साथ तो चल नहीं सकते. व्यापार वार्ताओं का नतीजा अमेरिका के प्रति झुकाव के रूप में नहीं, पारस्परिक समान लाभ के रूप में आना चाहिए. उम्मीद है, रोस की यात्रा अमेरिका को एक नई यथार्थवादी अंतर्दृष्टि देगी.

चक्कर 4 का : कहां से आया है ये चार का चक्कर

सच पूछें, तो हमें आज तक नहीं पता चला कि यह ‘चार’ का चक्कर क्या है? जिधर जाओ चौक्का, बात ‘चार’ की. ‘चार’ से शुरू ‘चार’ पर खत्म.

दरअसल, हमारी अक्ल तो बहुत मोटी है या यों कहें कि हर वक्त घास चरने चली जाती है, इसलिए ‘चार’ दिन की जिंदगी का गहरा राज ‘चार’ दिन में कैसे समझें?

महंगाई ‘चारों’ खाने चित किए रहती है, इसलिए काजूबादामकिशमिश की बात तो छोडि़ए, आजकल तो आलूटमाटर खाने के भी लाले पड़े हैं. दालरोटी के लिए भी हमारी कलम को ‘चार’ गुना जद्दोजेहद करनी पड़ती है, ताकि शांति से जुगाड़ बैठता रहे, ‘चार’ पैसे कमाते रहें.

मुद्दे से न भटक कर दोबारा अपनी बात पर आते हैं. देश के हालात के फेर में पड़े, तो खो जाने का डर है.

हमारा लाख टके का सवाल ‘चार’ को ले कर है. आखिर क्या वजह है कि हर भारतीय ‘चार’ की ही बात करता है? हमें याद आता है कि अकसर हमारे पिताजी हमें समझाते हुए कहते थे, ‘बेटा, कभी कोई बुरा काम मत करना, वरना ‘चार’ लोग क्या कहेंगे.’

उस समय भी हम नादान थे, सो तुरंत निकल पड़ते थे कि आखिर वे ‘चार’ लोग कौन हैं, जो हर वक्त हम पर आंखें गड़ाए रहते हैं. न तो हम उस समय उन ‘चार’ की खोजखबर ले पाए और न ही आज तक उन के दर्शन मुमकिन हुए.

पिताजी कभी ऐसे भी डांटते थे, ‘चार’ किताबें क्या पढ़ लीं कि खुद को इतना बड़ा स्याना समझने लगे?’

हम हिसाब लगाते कि ‘चार’ किताबें तो दूसरीतीसरी जमात में ही पूरी हो गई थीं. अब तो तादाद 40 के पार पहुंच चुकी, फिर भी पिताजी ‘चार’ पर ही क्यों अटके रहते हैं?

‘चार’ पैसे कमाओगे तो पता चलेगा,’ यह बात कभी न कभी सब को सुननी पड़ी होगी. हमारे मन में तो स्कूलकालेज के दिनों से यह वाक्य समाया हुआ है. बात वहीं की वहीं, ढाक के तीन पात, ‘चार’ पैसे भला क्या हुआ?

कभी पिताजी ज्यादा गुस्सा हो जाते, तो कह बैठते, ‘आजकल ईमानदारी ‘चारचार’ आने में बिकती है…’

सच पूछें, तो हम उन के समझाने से समझे हों, ऐसा दावा आज भी नहीं कर सकते. वजह, कुछ काम की बात समझते, उस से पहले ही यह ‘चार’ का आंकड़ा सारा गुड़ गोबर कर देता.

‘चार’ लोगों में हमारी भी इज्जत है’ जैसा मन को भाने वाला वाक्य हमें थोड़ा संतोष तो देता है, पर गड़बड़ यह हो जाती है कि इज्जत केवल ‘चार’ लोगों में क्यों है, बाकी के लोगों में क्यों नहीं? और जिन ‘चार’ लोगों में है, वे मुए हैं कौन से? भरेपूरे महल्ले में केवल ‘चार’ लोग? जरूर कोई जादुईचमत्कारी लोग रहे होंगे.

हमारी दादी अकसर हमारी माताजी को झिड़कतीं, ‘‘चार’ लोग सुनेंगे, तो क्या सोचेंगे?’

गई भैंस पानी में. फिर से ‘चार’ लोग. ये कौन हैं, जो सिर्फ हमें ही नजर नहीं आते हैं? दुनिया के सब लोग उन से डरते हैं और हम उन के दर्शन तक नहीं कर पाते?

हमारी दादी का एक और पसंदीदा जुमला था, ‘‘चार’ दिनों की आई बहू के ऐसे नखरे…’ हम गिनती कर के हिसाब लगाते कि मां को ब्याह कर आए तो 20 साल हो गए हैं, फिर भी ‘चार’ दिन?

जरा बड़े हुए, तो ‘चार’ का चमत्कार और बड़ा होने लगा. हमारी बेरोजगारी, जो अकसर आवारागर्दी के रूप में दिखाई पड़ने लगी थी, हमारे पिताजी, फूफाजी, ताऊजी, चाचाजी को बड़ी खलती थी. सब एक सुर में नसीहतें बिखेरते, ‘‘चार’ दिन टिक कर बैठोगे, तो काम मिलेगा… समझे?’

लो कर लो बात. घर में बैठो तो आलसी, बाहर जाओ टिक कर बैठो.

अकसर हम ने अपनी माताजी को पिताजी से ऐसा भी कहते सुना, ‘वह आई और ‘चार’ बातें सुना कर चली गई.’

‘चार’ बातें? क्या मां ने डायरीपैन ले कर कुशल स्टैनो की तरह हमारी बूआजी की डांट को नोट किया था, जो गिनती में ‘चार’ ही ठहरी? कुछ समझ नहीं आया.

आज भी हमारी श्रीमतीजी हमें रोज उलाहना देती हैं, ‘एक मैं ही हूं, जो आप की ‘चार’ बातें सहन कर जाती हूं. कोई और होती, तो आप की अक्ल ठिकाने लगा देती?

हम सोचने लग जाते कि हमारी ‘चार’ बातें कौन सी हैं, जो श्रीमतीजी रोज सहन करती हैं? शादीशुदा जिंदगी का राज शायद ही कभी किसी को समझ आया हो, इसलिए हम क्या समझ पाए.

पत्नीजी के साथ कभी घूमने जाते हैं, तो हमारे मुंह से भी निकल जाता है, ‘‘‘चार’ कदम भी नहीं चला जाता क्या? बड़ी नाजुक हो, जो ‘चार’ मिनट में थक गईं?’

मतलब ‘चार’ की बीमारी में हम भी जकड़े हुए हैं.

देखिए, कैसा गजब है कि हम यह लेख लिख रहे हैं, तो टैलीविजन पर मधुर गीत दिखाईसुनाई पड़ रहा है, ‘‘चार’ बोतल वोदका, काम मेरा रोज का…’

लग गए न ‘चार’ चांद. अब आप ही बताइए कि हम ‘चार’ के चक्कर से कैसे पीछा छुड़ाएं?

संजू की तरह ही है मंजू की कहानी

राजकुमार हिरानी की फिल्म ‘संजू’ पिछले काफी वक्त से सुर्खियों में हैं. इस फिल्म में रणबीर कपूर लीड रोल निभा रहे हैं और फिल्म को लेकर दर्शकों के बीच अभी से ही काफी उत्साह है. फिल्म के 2 गानें भी रिलीज कर दिए गए हैं और इन्हें भी फैन्स का अच्छा रिस्पौन्स मिला है. संजय दत्त की जिंदगी को बखूबी बयां करती इस फिल्म को देखने का फैन्स बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं. संजू को मिल रही इस पौपुलेरिटी के बीच मंजू का भी एक वीडियो सोशल मीडिया पर काफी वायरल हो रहा है.

‘मंजू’ के इस वीडियो को 1 दिन पहले ही यूट्यूब पर अपलोड किया गया है और सोशल मीडिया पर यह वीडियो काफी तेजी से वायरल हो रहा है. इसकी कहानी संजू से मिलती जुलती है लेकिन मंजू एक कामवाली की कहानी है, जिसने अपनी मालकिनों का जीना मुश्किल किया हुआ है. हालांकि, इस वीडियो को देखने के बाद आप भी हंसी नहीं रोक पाएंगे और हंसते-हंसते लोट-पोट हो जाएंगे. बता दें, यह वीडियो संजू का स्पूफ है लेकिन इस वीडियो में कई सारे बदलाव किए गए हैं.

गौरतलब है कि, संजू का निर्देशन राजकुमार हिरानी ने किया है. फिल्म में रणबीर कूपर के अलावा दीया मिर्जा, सोनम कपूर, अनुष्का शर्मा, विक्की कौशल, करिश्मा तन्ना और मनीषा कोइराला जैसे  सितारे लीड रोल में है. फिल्म 29 जून को रिलीज होगी. फिल्म में संजय दत्त के करियर की शुरुआत से लेकर अब तक की कहानी को हूबहू दिखाया जाएगा और फिल्म में रणबीर भी हूबहू संजय दत्त ही लग रहे हैं. फैन्स फिल्म के रिलीज होने का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं.

सवालों के घेरे में रीलौंचिंग

रीलौंचिंग होती है, होने दें. प्रोडक्ट की रीलौंचिंग होती रहनी चाहिए. गाडि़यों की होती है. बिल्डर फ्लैटों की करते हैं. साहित्य, कला, संस्कृति इन से अलग नहीं हैं. संगीत के साथसाथ सभी कलाओं में भी रीलौंचिंग की परंपरा है. अरे भाई, नेताओं की या पार्टियों की रीलौंचिंग हो, तो हायतोबा मचाने की क्या जरूरत आ पड़ी. सरकारों का भी एक रूप बहुरुपियों का होता है. इधर भूमि अधिग्रहण विधेयक को ग्रहण लगा हुआ है, फिर भी वह नएनए विधेयक या अध्यादेश के रूप में लौंच होता रहता है. लोकतंत्र को चलाए रखने के लिए यह सब होता रहना जरूरी है.

लौंचिंग से फसलों पर पड़े ओलों की भरपाई नहीं हो सकती. बाउंस होते सरकारी चैकों से रकम नहीं आ जाएगी. किसानों की आत्महत्या के आंकड़े भी कम नहीं होंगे. लेकिन किसानों को कंगाल बना देने वाली अधिग्रहण बिल की साजिश देश के लोगों को जरूर समझ में आएगी. कारपोरेट घराना एक नए भारत का सपना संजोए हुए है. उस में किसानों को अभी से हाशिए पर डालने की कोशिश का नाम है भूमि अधिग्रहण अध्यादेश, ताकि किसानों की बेशकीमती जमीन पर अरबपति अपने सपनों के आशियाने को और मजबूती दे सकें.

लौंचिंग हो तो दमदार हो, जानदार हो. जैसे बराक ओबामा के साथ 10 लाख के सूट का दमखम दिखा. पूरे देश में तहलका मचा. सोशल मीडिया में सूट छा गया. उन दिनों देश के पास सूट के सिवा और था ही क्या? कोई कीमत आंकने लगा, कोई दर्जी की तलाश में निकल पड़ा.

भद्रजन सूट के होने पर सवालिया निशान दागने लगे. करोड़ोंअरबों के वारेन्यारे को छोड़ कर देश का मीडिया हाथ धो कर सूट के पीछे पड़ा रहा. कीमती सूट के साथ प्राइम मिनिस्टर की लौंचिंग होती है, तो इतने बवाल की क्या जरूरत? देश के स्वाभिमान के सामने 10 लाख की क्या औकात? वैसे भी इतिहास को दोबारा लिखा जा रहा है. नए इतिहास में एकाध अध्याय सूट व सूट माहिरों पर भी हो जाए, तो बिल्ली के भाग्य से. सूट बड़ा भाग्यशाली निकला. नीलामी में अपनी ऊंची बोली लगवा कर सुर्खियों में आ गया. इसे कहते हैं अपनाअपना भाग्य. आजकल कुछ नेता बिलकुल नई तरह से अपनी लौंचिंग कराने लगे हैं.

वे न्यूज चैनलों में आएदिन बहस के लिए आते हैं. बहस का जवाब देते हैं. सवालजवाब करते हैं. एकाएक इमोशनल हो जाते हैं. इतने इमोशनल कि फूटफूट कर रो पड़ते हैं, फफकने लगते हैं. चैनलों की टीआरपी बढ़ाते हैं. एक हद तक दर्शकों की हमदर्दी भी बटोर ले जाते हैं.

यह एक नए किस्म का पैतरा है. देखें, कितने दिन चलता है. जनता भी अब इतनी गंवार और जाहिल नहीं रही. ऊलजलूल टिप्पणी करना. जो मुंह में आए, बेलगाम बोलना. या फिर संवैधानिक भावनाओं के उलट आचरण करते हुए भी नेता व मंत्री अपनी लौचिंग कराने लगे हैं.

यह लौचिंग का सस्ता, सुंदर व टिकाऊ तरीका है. जब देशभर में आलोचना के स्वर उभरते हैं, निंदा होने लगती है, तो फिर ये अपने बयान से मुकर जाते हैं. माफी मांग लेते हैं. फटकार पड़ने पर रोनेधोने का नाटक भी कर लेते हैं. देश लौंचिंग के नए दौर से गुजर रहा है. अभी बहुतकुछ देखना है. देखते चलिए. मुसकराते हुए. महल्ले का लड़का पंच बनता है, तो उस की लौंचिंग जरूरी हो जाती है. ऐसे मौके पर पटाखों का शोरगुल और ढोलनगाड़ों की थाप आम बात है. वही लड़का सरपंच बन जाए, तो फिर रीलौंचिंग. पूरा कसबा मस्ती में. बोतलों की बहार. सब के अपनेअपने राम और रहीम.

एक नेता के मंत्री बनते ही कृष्णावतार हो जाता है. लौंचिंग पर लौंचिंग. मंत्री शहर का हुआ, तो समझो कि शहर की ऐसीतैसी. दर्जनों गेट. बैनरपोस्टर और फ्लैक्स. ये सब उसी जगह दिखते हैं, जहां इन को लगाने की मनाही है. मीलभर लंबे जुलूस और डीजे की कानफोड़ू आवाज के साथ ही मंत्री की लौंचिंग होती है. मंत्री भी कौन? वही घिसापिटा पुराना पापी, जिस की सारी बत्तीसी नकली. उम्र के असर में लहरा कर चलते हैं. यही लहरा कर चलना उन की खास अदा में शामिल है. कमर में दर्द का स्थायी भाव. सिर पर हिमाचली टोपी नया लुक देती है. थोड़ा झुकने लगे हैं, पीसा की मीनार की तरह. लेकिन रोब एक नंबर का. खानेकमाने में वही जोश. पूरे शहर के नामीगिरामियों को जुलूस में शामिल रखने की हैसियत रखते हैं.

सत्ता के गलियारे में भटकते ऐसे चरित्रों को जनता बखूबी पहचानने लगी है. अब यह शोरगुल और नकली जयजयकार उन्हें पीड़ा पहुंचाने लगी है. चारों तरफ असुरक्षा है, चुनौतियां हैं. वह जिंदा रहने की जद्दोजेहद से गुजर रही है. खयालों की एक पूरी दुनिया उस के साथ है. लेकिन भविष्य की तमाम उम्मीदें धुंधली नजर आती हैं, क्योंकि उस की जद्दोजेहद की आवाज सुनाई नहीं पड़ती. ऐसे माहौल में तरहतरह की लौंचिंग कई सवाल खड़े करती है.

विनोद राठौड़ की वापसी

अपने समय के मशहूर गायक व संगीतकार पंडित चतुर्भुज के बेटे विनोद राठौड़ ने बौलीवुड में बतौर पार्श्वगायक काफी बेहतरीन काम किया है. विनोद राठौड़ ने लता मंगेशकर, सुरेश वाड़ेकर, अलका याज्ञनिक, साधना सरगम, अनुराधा पौड़वाल, कविता कृष्णमूर्ति सहित कई दिग्गज गायकों के साथ तमाम गीत गाए हैं. उन्हें दो बार सर्वश्रेष्ठ गायक का फिल्मफेअर सहित कई पुरस्कार मिल चुके हैं. इतना ही नही विनोद राठौड़ उन गायकों में से रहे हैं, जिनके लिए भाषा की कभी कोई बंदिश नहीं रही. वह हिंदी के अलावा उड़िया, मराठी, तेगलू, गुजराती,अंग्रेजी, पंजाबी, सिंधी, तमिल, कन्नड़, राजस्थानी व भोजपुरी के साथ साथ फारसी भाषा में भी गीत गाकर शोहरत बटोर चुके हैं.

पर विनोद राठौड़ लंबे समय से गायब थे. अब विनोद राठौड़ एक बार फिर सक्रिय हुए हैं. विनोद राठौड़, निर्माता पी अभय कुमार की, डी. के. बरनवाल के निर्देशन में बन रही हत्या व रहस्य प्रधान फिल्म‘‘वह कौन थी’’से पुनः वापसी कर रहे हैं. हाल ही में विनोद राठौड़ ने फिल्म ‘‘वह कौन थी’’ के लिए संगीतकार संजय राज के निर्देशन में मुंबई स्थित कुमार सानू के स्टूडियो में एक गाने की रिकार्डिंग की.

विनोद राठौड़ कहते हैं- ‘‘मैं कहीं गायब नहीं हुआ था. मैं सदैव बेहतरीन रचनात्मक काम करने में यकीन करता हूं. मैंने कभी भी भेड़चाल का हिस्सा बनने व सस्ती लोकप्रियता हासिल करने के लिए काम नहीं किया. जब अच्छे गाने नहीं आ रहे थे, तो भी मैं संगीत की साधना में रत था. मेरे संगीत के शो लगातार हो रहे थे. अब एक अच्छा मौका मिला, तो मैंने ‘वह कौन थी’के लिए गाना गाया है.’’

धराशायी हो रहा क्योटो का सपना

उत्तर प्रदेश के वाराणसी शहर के बारे में कहा जाता है कि यह भगवान शिव की नगरी है. धार्मिक कहानियों में बताया जाता है कि वाराणसी यानी काशी भगवान शिव के त्रिशूल पर टिकी है. धार्मिक नगरी होने के कारण यहां लोग मोक्ष प्राप्त करने के लिए आते हैं.

यहां से पूरी दुनिया को आध्यात्मिक ऊर्जा मिलती है. यहीं पर संकटमोचक हनुमान का मंदिर है. 15 मई को जब चौकाघाटलहरतारा फ्लाईओवर का एक हिस्सा गिर जाने से 20 लोगों की मौत हुई तो कुछ भी पुण्यप्रताप, पूजापाठ काम नहीं आया. घरों से निकले लोगों को इस बात का अंदाजा नहीं था कि रास्ते में मौत उन का इंतजार कर रही है.

धर्म की राजनीति का लाभ लेने के लिए 2014 के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने अपने प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी नरेंद्र मोदी को वाराणसी लोकसभा सीट से चुनाव लड़ाया. चुनावप्रचार के दौरान नरेंद्र मोदी ने बारबार इस बात को अपने भाषणों में दोहराया कि वे यहां खुद नहीं आए हैं उन को मां गंगा ने बुलाया है. गंगा की सफाई से ले कर काशी को क्योटो जैसा आधुनिक शहर बनाने का वादा जनता से किया.

लोकसभा चुनाव में जीत के बाद नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बन गए पर काशी का क्योटो बनने का सपना पूरा नहीं हो सका. गंगा की सफाई को ले कर दिए गए तमाम तरह के दावे फेल हो गए. केंद्र और प्रदेश में भाजपा की सरकारें हैं. इस के बाद भी यहां विकास और भ्रष्टाचार का तानाबाना विफलता की कहानी कह रहा है.

कैसे हुआ हादसा

15 मई को शाम करीब 5 बजे का समय रहा होगा. चौकाघाट फ्लाईओवर को बनाने का काम चल रहा था. फ्लाईओवर के लहरतारा वाले छोर पर गार्डर को ऊपर रखे जाने का काम चल रहा था. 2 पिलरों के बीच करीब 28 मीटर लंबाई और 15 मीटर चौड़ाई में 5 गार्डर रखे जाने थे. दोनों पिलरों के बीच रखे जाने के बाद पांचों गार्डरों को एकदूसरे से जोड़ दिया जाना था. पिलर के शिखर पर गार्डर को तुरंत न रख कर पहले बेयरिंग पर रखा जाता है. इस के बाद धीरेधीरे बेयरिंग को हटा कर गार्डर को पिलर पर सैट कर दिया जाता है.

घटना के समय पिलर पर गार्डर यानी बीम को टिकाने के लिए बेयरिंग को हटाने का काम चल रहा था.

2 गार्डरों से बेयरिंग हटाई जा चुकी थीं. बाकी का काम चल रहा था. शाम को 5 बज कर 20 मिनट पर गार्डर का संतुलन बिगड़ गया. वह नीचे गिरने लगा. गार्डर लड़खड़ाते हुए कुछ सैकंड्स के लिए रुका, फिर नीचे सड़क पर गिर गया.

नीचे सड़क पर खड़े और चल रहे लोगों को इस का आभास नहीं हो सका. जिस से उस के नीचे तमाम गाडि़यां और लोग दब गए. बचाव काम के लिए सब से अधिक परेशानी क्रेन को यहां तक लाने और गार्डर को हटा कर नीचे दबे लोगों को निकालने की थी. गार्डर इतने भारी थे कि 3-3 क्रेन मिल कर एक गार्डर का केवल कुछ हिस्सा ही उठा कर लोगों को बचा पा रही थीं. 10 क्रेनों को इस काम में लगाया गया.

सरकारी अफसरों से ले कर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य रात 10 बजे से पहले वहां पहुंच गए और मदद के लिए मुआवजे का ऐलान शुरू हो गया. विपक्ष ने मुआवजा बढ़ाने की मांग शुरू कर दी. सरकार ने घटना के तुरंत बाद चीफ प्रोजैक्ट मैनेजर सहित कुछ लोगों को सस्पैंड कर दिया. मुख्यमंत्री ने 48 घंटे में घटना की रिपोर्ट मांगी. फौरीतौर पर यही हो सका.

सरकार की लापरवाही

भाजपा के समर्थक और नेता इसे अपनी सरकार की नाकामी नहीं मानते. उसे कभी कांग्रेस तो कभी समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी की विफलता करार दे देते हैं. गोरखपुर, कुशीनगर और वाराणसी में हुई दुर्घटनाओं ने केंद्र और प्रदेश सरकार की पोल खोल दी है. वाराणसी में फ्लाईओवर बनने के दौरान बीम गिरने से 20 लोगों के मरने और 30 से अधिक लोगों के घायल होने की दुखद घटना घटी.

वाराणसी में राष्ट्रीय राजमार्ग-2 पर चौकाघाटलहरतारा फ्लाईओवर का काम बेहद धीमी गति से चल रहा है. ढाई साल से अधिक का समय बीत जाने के बाद अभी तक महज 53 फीसदी काम ही हो सका है. इस काम को जून तक पूरा हो जाना था. काम समय पर पूरा न होने के कारण इस की समयावधि दिसंबर तक बढ़ा दी गई थी.

चौकाघाटलहरतारा फ्लाईओवर इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यह वाराणसी के कैंट स्टेशन के पास स्थित है. इस फ्लाईओवर को बनाने का काम उत्तर प्रदेश राज्य सेतु निगम कर रहा है, जो सरकार की संस्था है. इस संस्था की लापरवाही का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि रोडवेज से रेलवे स्टेशन के आगे तक रोड के किनारे लोहे के स्क्रैप रखे हैं. जिन से टकरा कर अकसर लोग घायल होते रहते हैं.

शिकायतों के बाद भी सेतु निगम ने कोई हल नहीं निकाला. कैंट रेलवे स्टेशन के सामने तो सालों से लोहे की सीट लगा कर रास्ता बंद कर दिया गया है. यहां आने वालों के लिए सड़क पार करना बेहद मुश्किल होता है.

करीब 6 माह पहले जब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ वाराणसी के दौरे पर आए थे तो उन्होंने फ्लाईओवर का निरीक्षण भी किया था. मुख्यमंत्री काम की धीमी प्रगति से नाराज थे. साथ ही, काम के प्रति लापरवाह अफसरों को उन्होंने चेतावनी भी दी थी कि काम को समय पर पूरा किया जाए. फ्लाईओवर का निर्माण कर रही संस्था के अफसरों पर इस चेतावनी का कोई प्रभाव नहीं पड़ा.

सचाई यह है कि यहां पर आधे से ज्यादा काम ठेकेदारों द्वारा कराया जा रहा है. रौ मैटरियल और लेबर का काम इस में प्रमुख है. ठेकेदार पैसा बचाने के चलते सही काम नहीं करते. कम मजदूरों से काम चलाने के कारण यह फ्लाईओवर समय पर तैयार नहीं हो सकता.

केवल मुख्यमंत्री ही नहीं, जिले के डीएम योगश्वर राम मिश्र भी 6 माह में कई बार फ्लाईओवर का निर्माण कार्य देखने गए थे. इस के बाद भी निर्माण मानकों और सुरक्षा मानकों पर ध्यान नहीं दिया गया. सड़क के दोनों तरफ किसी भी तरह की बैरीकेटिंग नहीं की गई, जिस से आनेजाने वालों को परेशानी होती थी. निर्माण काम कर रही संस्था अपनी मनमानी से काम कर रही थी.

इस फ्लाईओवर का निर्माण 2015 में शुरू हुआ, जिस के तहत 1,710 मीटर का निर्माण होना था. 30 माह में इस काम को पूरा किया जाना था. इस की लागत 77.41 करोड़ रुपए रखी गई थी. फ्लाईओवर को बनाने में 63 पिलर बनने हैं. जून तक काम पूरा होना था. अभी तक 45 पिलर ही तैयार हुए. ऐसे में काम के निर्माण की तारीख को दिसंबर तक बढ़ा दिया गया था.

उत्तर प्रदेश राज्य सेतु निगम को लखनऊ में मैट्रो का निर्माण कर रही संस्था से सीखना चाहिए था. प्रदेश की राजधानी लखनऊ में मैट्रो का निर्माण कार्य बेहद भीड़भाड़ वाले इलाकों में चल रहा है. यह कार्य बहुत ही सावधानी से ट्रैफिक को रोक कर किया जा रहा है. इस का 24 घंटे काम चलता है. यही नहीं, समय से काम चल रहा है. मैट्रो निर्माण का काम निजी संस्था मिल कर कर रही है. ऐसे में सेतु निगम और पीडब्लूडी जैसी संस्थाओं को मैट्रो निर्माण करने वाली निजी संस्था से सीखना चाहिए.

वाराणसी से पहले यहां से कुछ ही दूरी पर स्थित गोरखपुर और कुशीनगर में ऐसे ही लापरवाहीपूर्ण हादसे हो चुके हैं. गोरखपुर के अस्पताल में औक्सिजन की कमी से बच्चों की मौत हो गई तो कुशीनगर में स्कूली वैन रेलगाड़ी से टकरा गई.

गोरखपुर और वाराणसी में एक समानता और है कि एक उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का शहर है तो दूसरा देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संसदीय क्षेत्र है और कुशीनगर भगवान बुद्ध की नगरी है. ऐसे में इन जगहों पर हुए हादसे बताते हैं कि वीवीआईपी जिले भी किस हद तक भ्रष्टाचार व लापरवाही के शिकार हैं. हर घटना में निचले स्तर पर कार्यवाही की गई जबकि मंत्री स्तर पर किसी को जिम्मेदार नहीं माना गया.

भूल जाते हैं लोग

इन तीनों ही घटनाओं में मुख्य जिम्मेदार सरकारी महकमे हैं. कुशीनगर में रेलवे प्रशासन ने मानवरहित क्रौसिंग को सुधारा नहीं था. गोरखपुर में हादसा सरकारी अस्पताल में हुआ और अस्पताल की लापरवाही से बच्चे मरे. ऐसे में कहीं न कहीं जरूरत इस बात की थी कि मंत्री और सरकार के स्तर पर अपनी भूल को स्वीकार किया जाता. तभी सुधार की संभावना नजर आती.

मौजूदा सरकार हर मुद्दे पर राजनीतिक अंदाज में बयानबाजी कर दूसरे दलों और सरकारों की नजीर दे कर खुद बचाने की कोशिश करती है. प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव ने कहा कि मैं उम्मीद करता हूं कि सरकार केवल मुआवजा दे कर अपनी जिम्मेदारी से नहीं भागेगी, बल्कि ईमानदारी से जांच कर दोषियों को सजा भी देगी.

घातक है स्वास्थ्य सेवा का व्यापारीकरण

आप की सेहत पर कंपनियां अब मोटा नहीं बहुत मोटा पैसा बना रही हैं. देश में अपोलो, मैक्स और फोर्टिस जैसे मल्टी स्पैश्यलिटी अस्पतालों पर खरीदार 5,000 करोड़ से 10,000 करोड़ खर्चने को तैयार बैठे हैं और उन के मूल प्रमोटर अब बापदादाओं की मेहनत का बहुत मोटा मुनाफा कमा रहे हैं.

अब स्वास्थ्य सेवा स्वास्थ्य सेवा नहीं रह गई है, कमाऊ गाय बन गई है जिसे आधुनिक तकनीक व नित नए शोधों से भरपूर खिलायापिलाया जा रहा है.

इन स्वास्थ्य कंपनियों को पैसा उन आम लोगों की जेबों से आता है जो अपनी या अपने अजीजों की जान बचाने के लिए अपनी आखिरी कौड़ी तक कुरबान करने को तैयार हो जाते हैं. बढ़ते प्रदूषण और बदलते लाइफस्टाइल से नित नई बीमारियां पैदा हो रही हैं. इन की वजह से लोगों को पहले से कई गुना ज्यादा पैसा खर्चना पड़ रहा है और इसी की वजह से अस्पतालों की चेनें बन रही हैं, जिन्हें खुले बाजार में बेचा जा रहा है.

फोर्टिस अस्पतालों को खरीदने के लिए देशीविदेशी कंपनियां 2,500 करोड़ तक लगाने को तैयार हैं और 10-20 दिन में जब यह डील हो जाएगी तो इन अस्पतालों के कर्ताधर्ता एक बार फिर बदल जाएंगे.

स्वाभाविक है कि अब अस्पतालों के नए मालिकों को अपनी लगाई पूंजी का लाभ चाहिए होगा, मरीजों का हित नहीं.

स्वास्थ्य तो असल में सरकार यानी समाज के हाथों में रहना चाहिए ताकि हर मरीज को इलाज मिल सके और बीमारियों के कारण लोग न मरें. इन महंगे अस्पतालों ने तो लाखों की आखिरी आस भी छीन ली.

सरकारी अस्पतालों में धांधलियों, निकम्मेपन और लापरवाही के कारण लोगों का इन पर से विश्वास ही उठ गया है. निजी अस्पताल कंपनियां अच्छे डाक्टरों को मोटा वेतन व कमीशन दे कर आकर्षित कर लेती हैं और इसीलिए सरकारी अस्पतालों के योग्य डाक्टर भी उन की शरण में चले जाते हैं. सरकारी अस्पतालों में योग्य डाक्टर कम ही रह जाते हैं, जिन्हें या तो ऊपरी कमाई के अवसर मिल जाते हैं या सरकारी तंत्र जिन्हें मकानों, यात्राओं की सुविधा दे देते हैं.

फोर्टिस के बिकने का मामला इसलिए चिंता की बात है कि इस से सारे देश के अस्पतालों को फर्क पड़ेगा. जहां भी डाक्टर निजी छोटे अस्पताल सफलता से चला रहे हैं उन का अस्तित्व अब खतरे में है. बड़े अस्पताल उन्हें लपकने को दौड़ेंगे.

चिकित्सा का प्रबंध अब डाक्टरों के हाथों से निकल कर काले कोटधारी अकाउंटैंटों के हाथों में आ जाएगा जिन्हें सिर्फ पैसे से मतलब होगा.

सरकार लाख कोशिश कर ले कि इन अस्पतालों की कुछ आय गरीबों को इलाज के रूप में मिले पर यह संभव नहीं दिखता. सरकार ने अपने कर्मचारियों को ही अपने खर्च पर इन अस्पतालों में भेजना शुरू कर दिया है.

सरकार पर असल गरीबों का दबाव फिर कौन कराएगा? गरीबों को तो फिर से झाड़फूंक वालों के पास जाना पड़ेगा.

इतना पक्का है कि गायों और कुत्तों की चिकित्सा सुविधाओं की कमी नहीं रहेगी, गरीबों को नहीं मिलेगी.

फिल्मों में अंग प्रदर्शन आम बात है : शगुन दूबे

भोजपुरी सिनेमा में रोजाना नएनए कलाकार ऐक्टिंग में अपने हाथ आजमा रहे हैं. इसी कड़ी में एक और नई कलाकार शगुन दूबे का नाम भी जुड़ गया है. वे जल्दी ही भोजपुरी सिनेमा के रुपहले परदे पर अपनी अदाओं और नजाकत का जलवा बिखरने वाली हैं. उन की पहली भोजपुरी फिल्म ‘दीवाने’ की शूटिंग पूरी हो चुकी है, जो जल्दी ही सिनेमाघरों में दिखाई जाएगी.

पेश हैं, शगुन दूबे से की गई बातचीत के खास अंश:

आप कहां से हैं और आप के फिल्मी सफर की शुरुआत कैसे हुई?

मैं उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले से हूं. मेरा पालनपोषण और मेरी पढ़ाईलिखाई यहीं से ही हुई है. बचपन से ही मैं स्कूल और फिर कालेज में हर सांस्कृतिक कार्यक्रम में बढ़चढ़ कर हिस्सा लेती थी.

पापा के जिगरी दोस्त और फिल्मकार इम्तियाज खान ने कई फिल्में बनाई हैं. जब उन की भोजपुरी फिल्म ‘पंचायत’ बन रही थी, तब उन्होंने मुझे हीरोइन के रोल के लिए औफर दिया था, मगर उस समय मेरी पढ़ाई चल रही थी. मम्मी और पापा ने कहा था कि पहले पढ़ाई पूरी हो जाए, फिर देखा जाएगा.

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जब मेरी पढ़ाई पूरी हो गई, तो इम्तियाजजी ने दोबारा औफर दिया. मैं ने तुरंत हां कह दिया और बन गई फिल्म ‘दीवाने’ की हीरोइन.

इस फिल्म के पहले सीन की शूटिंग के समय आप के मन में क्या चल रहा था?

इस फिल्म की शूटिंग को ले कर मैं बहुत जोश में थी, पर कैमरे के सामने ऐक्शन बोलते ही पहली बार थोड़ा नर्वस थी. लेकिन जब पहला शौट ओके हो गया, तो सभी ने तालियां बजा कर मेरा हौसला बढ़ाया.

इस फिल्म में अपने किरदार के बारे में कुछ बताएं?

इस फिल्म में मेरा किरदार एक ऐसी लड़की का है, जो अपने प्रेमी से बेइंतिहा मुहब्बत करती है, मगर समय आने पर खुद ही अपने प्यार का बलिदान दे कर अपने प्रेमी की शादी किसी और लड़की से करा देती है.

यह किरदार मेरे दिल के बहुत करीब है. मुझे यह रोल निभा कर बहुत ही मजा आया. उम्मीद है कि हमारी रोमांटिक जोड़ी दर्शकों को खूब पसंद आएगी.

आप के आदर्श कौन हैं?

मैं मम्मीपापा को अपना आदर्श मानती हूं. मेरे भाई अभिषेक दूबे ने भी काफी सहयोग किया है. फिल्मकार इम्तियाज खान तो मेरे लिए गौडफादर जैसे हैं.

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ग्लैमर वर्ल्ड में हीरोइनों में हौट दिखने की एक होड़ सी लगी रहती है. इस बारे में आप क्या कहेंगी?

जहां तक हौट दिखने या अंग प्रदर्शन की बात है, तो फिल्म जगत में यह आम है. मैं फिल्मों में कहानी के मुताबिक जो सीन की डिमांड होगी, वह करूंगी, मगर मैं किसी इमेज में बंधना नहीं चाहती हूं. मैं हर तरह के किरदार निभाना चाहती हूं.

मैं एक बात और कहना चाहती हूं कि भोजपुरी फिल्मों को ले कर लोगों के मन में फूहड़ता का भरम कुछ ज्यादा ही घर कर गया है, जबकि बौलीवुड व हौलीवुड की फिल्मों में जिस तरह से फिल्म हीरोइनों को पेश किया जाता है, उस तरह भोजपुरी फिल्मों की हीरोइनों को नहीं पेश किया जाता है. पहले के बजाय अब भोजपुरी फिल्में भी करोड़ों रुपए के बजट में बनने लगी हैं.

अंतर्जातीय शादी व पिछड़ा तबका

आजकल अंतर्जातीय शादियां खूब हो रही हैं. इन में से कई मामलों में परिवार वालों द्वारा इंटरनैट से रिश्ते तय किए जाते हैं और कई मामले प्रेमविवाह के होते हैं.

90 फीसदी भारतीय परिवार तो अंतर्जातीय शादी के लिए तैयार नहीं होते हैं और तब तो और भी समस्या पैदा होती है, जब वर या वधू में से कोई एक पिछड़े तबके का हो.

ये पिछड़े तबके के बच्चे पढ़ेलिखे, अच्छे परिवार से हों, तो अगड़े तबके के मांबाप हां तो कह देते हैं, पर हंगामा शादी की विधि से शुरू होता है.

हिंदुओं की शादियों की रस्में पंडितों के मंत्रों, फेरों और पैसे मांगने से शुरू होती हैं और पैसे ऐंठने की रस्म से ही खत्म होती हैं. पिछड़ी जाति में जो हिंदू हैं, वहां रीतिरिवाजों की उतनी परेशानी नहीं है. रस्में मिलतीजुलती ही हैं.

सवाल वहां खड़ा होता है, जहां पिछड़े तबके ने बौद्ध धर्म स्वीकारा है, क्योंकि दोनों धर्मों की शादी प्रथा में काफी फर्क है. वहां न कोई पंडित होता है, न ही थोड़ीथोड़ी देर में वधू पक्ष से पैसे ऐंठे जाते हैं और न ही वहां आधी रात तक की जाने वाली लंबी व थका देने वाली रस्में होती हैं, बल्कि अग्नि को साक्षी नहीं माना जाता, वहां सारे समाज के सामने सब को साक्षी मान कर शादी होती है. छोटी सी रीति से शादी होती है, आडंबर और ढकोसलों से परे.

जब ऐसे जोड़ों में एक सामान्य जाति और दूसरा बौद्ध जाति से होता है, तो सामान्य तबका अपनी ही रीतियों से शादी कराने के लिए दूसरे पक्ष को मजबूर करता है.

इन में से कई परिवार अपनी ही रीति से शादी कराने के लिए अड़ जाते हैं या फिर अलगअलग मंडप में शादी कराने के लिए दूसरे पक्ष को मजबूर करते हैं.

शायद कहीं न कहीं उन्हें पिछड़े तबके से रिश्तेदारी जोड़ने में शर्म महसूस होती है और वे अपने समाज को यह बात बताना नहीं चाहते हैं. ऐसे भी परिवार होते हैं, जो दोनों रीतियों से शादी के लिए खुशीखुशी तैयार होते हैं.

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वर और वधू को चाहिए कि जब उन्होंने अपना जीवनसाथी अपनी पसंद से चुना है, तो उस की सचाई समाज के सामने लाने में कैसी शर्म? ऐसा न कर के आप यह साबित करते हैं कि हमें अपने दामाद या बहू से लेनादेना है, उन के परिवार या उन के समाज से नहीं. और यहीं आप सब से बड़ी गलती करते हैं. वजह, शादी 2 परिवारों का मिलन है, यह बात भूलनी नहीं चाहिए.

एक मराठा परिवार, जो अन्य पिछड़ा वर्ग से हैं, के बेटे को एक बौद्ध लड़की से प्रेमविवाह करना था. वर के मातापिता हिंदू रीति से शादी कराने पर अड़े हुए थे. उन का कहना था कि बौद्ध रीति से शादी हुई, तो उन के समाज को पता चल जाएगा कि बहू निचली जाति की है और समाज उन्हें जाति से बाहर कर देगा. उन्होंने आखिर तक बौद्ध रीति से शादी कराने की रजामंदी नहीं दी.

मजे की बात यह है कि उन की बेटी ने भी बौद्ध लड़के से शादी की थी. शादी को 5-6 साल हो गए हैं, सासससुर (दोनों पक्षों के) अपने दामादबहू से खुश हैं. पर लड़की वालों के रिश्तेदारों को वे दर्दनाक शूल तो चुभा गए, जिस का दर्द हमेशा उन के अंदर उन की इस गिरी हुई सोच की याद दिलाता रहेगा.

अगर वे तभी दोनों रीतियों से शादी करने के लिए मान जाते, तो रिश्तेदारों की इस टीस को खत्म कर देते और दोनों के बीच बराबरी के संबंध होते.

दूसरा उदाहरण एक और परिवार का है, जो बौद्ध है. लड़के की शादी एक मराठा लड़की से तय हुई. लड़के की मां को बौद्ध रीति से शादी करने में शर्म महसूस हुई और उन्होंने कट्टर हिंदू रीति से शादी कर के अपनेआप को बहुत बड़ा समझने का दंभ भरा.

इस के उलट एक और उदाहरण बताते हैं. एक ईसाई लड़के की शादी पिछड़े तबके की लड़की से तय हुई. लड़के के घर वालों ने चर्च में शादी नहीं कराई, क्योंकि ऐसा करने से लड़की को पहल ईसाई बनाना पड़ता.

उन्होंने लड़की के रीतिरिवाजों से शादी की और छोटा सा रिसैप्शन दे डाला. हमारे समाज में ऐसी खुली सोच वाले लोग भी हैं, पर उन की तादाद गिनती में है.

जिस पिछड़े तबके ने बौद्ध पद्धति को स्वीकारा है, वे तो सोच में हिंदुओं की सोच से कई गुना ऊपर हैं. शादी में वहां न कोई मुहूर्त होता है, न खोखली विधियां हैं, न समय की पाबंदी है और न आधी रात को नींद हराम करने वाली रस्में हैं. दानदहेज का तनाव भी नहीं है.

यहां लोग बेटियों के जन्म पर दुख नहीं मनाते, न ही बेटों के जन्म पर खुशी मनाते हैं. दोनों का जन्म मातापिता को एक सी खुशियां देता है. दोनों की एक सी परवरिश और पढ़ाईलिखाई होती है. दोनों की ही शादियों में बराबरबराबर सा खर्च होता है.

बेटियों के ससुराल वालों के साथ कोई लेनदेन नहीं होता है. दहेज मांगने वालों की समाज में कोई जगह नहीं होती. न ही बेटियों के जन्म से ही उस के ब्याह के लिए पैसे जोड़ने की प्रक्रिया शुरू होती है. न तो वे दहेज देते हैं, न दहेज लेते हैं.

न यहां कोई पंडित होता है, जो कन्या पक्ष से पैसों की मांग करता है. ऐसा पिछड़ा वर्ग, जो अब बौद्ध बन चुका है, से सवर्ण क्यों अपना संबंध बनाने से कतराते या शरमाते हैं?

असल में पिछड़ा कौन है? सारी कुरीतियों से अलगथलग निडर पिछड़ा वर्ग या कुरीतियों के दलदल में फंसा  उच्च वर्ग?

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