जब प्रेग्नेंसी के बावजूद करना पड़ा रेप सीन

स्टार बन जाना बहुत आसान है लेकिन सीन में ढलना और कहेनुसार सीन करना वाकई टेढ़ा काम है. कई बार शूट करने में सितारों को चोट लग जाती है और कई बार वो असहज हो जाते हैं लेकिन शूटिंग नहीं रुकती. ऐसा ही एक वाक्या अपने जमाने की टॉप की हीरोइन मौसमी के साथ घटा था. मौसमी चटर्जी उस वक्त टॉप की हीरोइनों में शुमार थीं और इसकी वजह थी हर किरदार को तल्लीनता के साथ निभाना. लेकिन अपने करियर में उन्हें एक ऐसा सीन करने को मिला जिसने उन्हें रुला ही दिया.

फिल्म थी ‘रोटी कपड़ा और मकान’. मनोज कुमार के लीड रोल वाली इस फिल्म में मौसमी के साथ एक रेप सीन शूट होना था. उस वक्त मौसमी चटर्जी प्रेग्नेंट थीं और तबियत भी ठीक नहीं रहती थी. इसलिए मौसमी इस बात को लेकर चिंता में थीं कि आखिर ये रेप सीन वो शूट कैसे करेंगी. चूंकि सीन फिल्म के लिए बहुत जरूरी था इसलिए मना भी नहीं कर सकतीं थी. इसलिए मौसमी चटर्जी ना चाहकर भी उस रेप सीन को करने के लिए तैयार हो गईं. लेकिन इस सीन की वजह से उनकी हालत खराब हो गई थी.

दिन भी आ गया और माहौल भी तैयार किया गया. इस सीन को आटे के एक गोदाम में शूट किया जाना था. सीन के मुताबिक विलेन को मौसमी चटर्जी का ब्लाउज उतारना था जबकि बाकी गुंडे उन्हें पकड़कर रखने वाले थे. इसी खींचा-तानी के दौरान मौसमी के पूरे शरीर पर खूब सारा आटा गिर गया. आटा ना सिर्फ उनके मुंह में भर गया बल्कि बालों में भी चिपक गया.

अब जैसे-तैसे सीन तो शूट हो गया और निर्देशक को भी खूब पसंद आया, लेकिन इसके बाद मौसमी घर जाकर खूब रोईं. आटा मुंह में जाने की वजह से उनकी तबियत बिगड़ गई और खूब उल्टियां हुईं. देर रात तक मौसमी चटर्जी की नौकरानी उनके बालों में चिपके आटे को ही निकालती रही. मौसमी चटर्जी की हालत इतनी बिगड़ गई थी कि फिल्म का जो गाना उन पर फिल्माया जाना था उसे जीनत अमान पर फिल्माया गया. हालांकि मौसमी चटर्जी की मानें तो उनके प्रेग्नेंट होने की वजह से उस गाने में जीनत को लिया गया.

छोटे पर्दे की यामी गौतम हैं बेहद ही हौट

बदलापुर, सनम रे और कबिल जैसी फिल्मों में अपनी दमदार एक्टिंग और खूबसूरती से लाखों दिलो पर राज करने वाली यामी गौतम को आज कौन नही जनता है. आज हर कोई उनकी खूबसूरती का दीवाना है.

आप यामी गौतम को तो जानती हैं पर क्या उनकी तरह दिखने वाली उनकी हमशक्ल और छोटे पर्दे की यामी गौतम को जानती हैं. जी हां, छोटे पर्दे की वही यामी जिसने अपनी अदाओं और हौट अंदाज से हर किसी को उनकी तारीफ करने पर मजबूर कर दिया है.

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चलिए आज हम आपको यामी गौतम की हमशक्ल विदिशा श्रीवास्तव के बारें में बताते हैं, जो इन दिनों अपने फोटोशूट के चलते सोशल मीडिया पर जमकर सुर्खिया बटोर रही हैं.

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दरअसल यहां हम बात कर रहे हैं स्टार प्लस के पौपुलर टीवी शो ‘ये हैं मोहब्बतें’ में रोशनी का किरदार निभा रहीं विदिशा श्रीवास्तव की. जो इन दिनों अपनी बोल्ड फोटोज की वजह से इंटरनेट पर ट्रेंड हो रही हैं.

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सोशल मीडिया पर ज्यादातर समय एक्टिव रहने वाली विदिशा आए दिन हौट तस्वीरें शेयर करती रहती है. विदिशा अपने इस फोटोशूट में इतनी खूबसूरत और हौट लग रहीं है कि कोई भी खुद को उनका दिवाना बनने से रोक नहीं पाएगा.

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यामी इन फोटोज में बेहद ही अलग अंदाज में नजर आ रही हैं, वो इसमें काफी हौट और बोल्ड लग रही हैं.

सीरियल ‘ये हैं मोहब्बतें’ से फैमस हुई विदिशा शो में तो बिल्कुल गांव की सीधी सादी और देसी अवतार में दिखती हैं, लेकिन असल जिन्दगी में वे काफी बोल्ड हैं. जिसका अंदाजा आप उनकी उन बोल्ड फोटोशूट से लगा सकती हैं, जो उन्होंने हाल ही में कराया है.

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विदिशा ने 2005 में तेलुगु फिल्म ‘अभिमानी’ से फिल्मों में डेब्यू किया था. साउथ इंडियन एक्ट्रेस विदिशा श्रीवास्तव ने सीरियल ये हैं मोहब्बतें से टीवी इंडस्ट्री में डेब्यू किया है.

विदिशा ने तेलुगू फिल्मों के अलावा कन्नड़ और मलयालम फिल्मों की लगभग 10 फिल्मों में काम किया है. विदिशा साउथ इंडियन फिल्म इंडस्ट्री का जाना-माना चेहरा हैं.

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राजनीति में कास्टिंग काउच

कास्टिंग काउच को ले कर केवल फिल्मों पर ही चर्चा होती है. लेकिन सचाई यह है कि कास्टिंग काउच केवल फिल्मों में ही नहीं बल्कि राजनीति और दूसरे क्षेत्रों में भी होता है. समयसमय पर हर क्षेत्र में काम करने वाले लोग इस पर अपनी राय देते हैं.

फिल्मों की तरह राजनीति भी अब कास्टिंग काउच से अछूती नहीं है. यहां लोग इस बात को स्वीकार नहीं करते हैं. गौसिप के रूप में तमाम नेताओं के महिलाओं से संबंधों की चर्चा होती रहती है. इन में राजनीति के अलावा फिल्मी महिलाएं भी शामिल होती हैं.

राजनीति में कास्टिंग काउच नहीं होता तो समयसमय पर नेताओं के संबंधों की कहानियां सामने नहीं आतीं. आंध्र प्रदेश में एन टी रामाराव और उत्तर प्रदेश में नारायण दत्त तिवारी के नाम चर्चित रहे हैं. दूसरे भी बहुत सारे ऐसे नेता हैं जिन के नाम समयसमय पर महिलाओं के साथ सामने आए हैं. यह बात और है कि ये बातें आसानी से दबा दी जाती हैं.

अभिनेत्री श्रीरेड्डी के बयान के बाद कांगे्रस नेता और पूर्व राज्यसभा सदस्य रेणुका चौधरी ने भी कहा कि कास्टिंग काउच केवल फिल्मों में ही नहीं है, यह सभी कार्यस्थलों की कड़वी सचाई है. यहां तक कि संसद भी इस से अछूती नहीं है. विदेशों में अभिनेत्रियों ने इस बात को स्वीकार कर ‘मी टू’ कहने में काफी समय लिया. अब समय आ गया है कि भारत में भी लोग सामने आ कर  ‘मी टू’ कहें.

चुप रहती हैं पीडि़ताएं

भारत में ‘मी टू’ अभियान के तहत कई औरतों ने बताया कि वे भी कभी न कभी इव टीजिंग का शिकार हुई हैं. कास्टिंग काउच को अभी लोगों ने स्वीकार नहीं किया है. फिल्मी दुनिया में भी वही अभिनेत्रियां सामने आई हैं जो कास्टिंग काउच की शिकार होने के बाद फिल्मों में काम नहीं पा सकी हैं.

दक्षिण भारत में एम जी रामचंद्रन और जयललिता का मामला ऐसे उदाहरणों में शामिल है. आंध्र प्रदेश में एन टी रामाराव और लक्ष्मी पार्वती का उदाहरण भी इन में से एक है. एन टी रामाराव और जयप्रदा पर भी ऐसे आरोप लगते रहे हैं.

उत्तर प्रदेश में कांग्रेसी नेता एन डी तिवारी के तमाम संबंध चर्चा में रहे हैं. एन डी तिवारी राज्यपाल के पद पर रहते हुए भी सैक्स स्कैंडल को ले कर चर्चा में आए. जिस के बाद उन का राजनीतिक कैरियर खत्म हो गया.

इमेज की चिंता

कई नेताओं के सैक्स स्कैंडल चर्चा में रहे हैं. अमरमणि त्रिपाठी मधुमिता हत्याकांड के चलते जेल में हैं. मधुमिता और अमरमणि का मसला ऐसा ही था. मधुमिता की हत्या का गुनाहगार अमरमणि को माना गया और उन को उम्रकैद की सजा दी गई. भाजपा के एक बड़े नेता का एक महिला के साथ संबंध चर्चा में रहा. राजनीति में ऐसे मामलों की फेहरिस्त लंबी है जिन में नेताओं के दूसरी महिलाओं से संबंध रहे. नेता महिलाओं को राजनीति में स्थापित करने का लोभ दिखा कर उन का शारीरिक शोषण करता है. भारत में राजनीति को दूध का धुला माना जाता है. किसी घटना के उजागर होने के बाद हर संभव प्रयास कर के उस को दबा दिया जाता है. इसलिए ऐसे मामले सामने नहीं आते हैं. चर्चा में रहने के बाद भी ऐसे मामले साबित नहीं हो पाते हैं.

नेताओं के साथ ही साथ कार्यस्थलों, औफिसों में भी ऐसे मामले चर्चा में नहीं आते. कार्यस्थलों में सब से अधिक मामले शिक्षा संस्थानों के आते रहे हैं. यहां पर महिलाओं को सुरक्षा देने के लिए अलग से कानून बनाने के अलावा एक सुनवाई सैल का भी गठन किया गया. इस के बाद भी इन कार्यस्थलों पर यौनशोषण की बातें सामने आती हैं.

इमेज की चिंता के कारण ठगी का शिकार होने के बाद भी औरतें ये बातें बाहर नहीं करतीं. ऐसे में इन्हें शिकार बनाने वाले भी बच निकलते हैं. पुलिस और कचहरी में ऐसे कई मामले आते हैं जिन में सालों से यौनशोषण के शिकार होने की बात कही जाती है.

इन घटनाओं के बाद रेणुका चौधरी जैसी महिला नेताओं के बयानों से पता चलता है कि कास्टिंग काउच केवल फिल्मों का मुद्दा नहीं है. राजनीति सहित समाज के दूसरे हिस्सों में भी यह खूब प्रचलित है. इस पर तभी विराम लग सकता है जब इस का शिकार होने वाली महिलाएं ‘मी टू’ जैसा अभियान चलाएं.

शिक्षा का भी वर्णभेद

भाजपा सरकारें बारबार यह जताने में लगी हैं कि देश में उन की और ऊंची जातियों की मेहरबानी से पिछड़े (शूद्र) व दलित (अछूत) जिंदा हैं और उन्हें थोड़ीबहुत जगह समाज में दी जा रही है. यह जताने का मतलब सिर्फ इतना समझाना है कि जो मिल रहा है उसे ऊपर वाले और ऊंचों की कृपा समझो वरना वैसी पिटाई होगी जैसी ऊना या राजकोट में हुई.

अभी मध्य प्रदेश के शिक्षा बोर्ड ने 10वीं व 12वीं क्लासों के नतीजे जारी करते हुए कहा कि सवर्ण ऊंचे जनरल कैटीगरी में कितने पास हुए, अन्य पिछड़ी जातियों के कितने और शैड्यूल कास्ट के कितने. यह सोच हर सरकारी विभाग में ठूंसठूंस कर भरी हुई है जबकि हर सरकारी विभाग में काफी पिछड़े व दलित आरक्षण की बदौलत पहुंच चुके हैं. वे इस कदर डरे रहते हैं कि ऐसे जातिवादी फैसले पर विभाग में रोकटोक नहीं कर सकते. बुरा हो लिबरल मीडिया का जिस ने इस बात को पकड़ लिया और हल्ला मचा दिया. इस पर बोर्ड के अफसर सफाई देते हैं कि इस से तो इन बच्चों को आगे पढ़ने में सहूलियत होगी. उन्हें दाखिले आसानी से मिलेंगे. उन की सोच पर दया आती है कि इन आंकड़ों को इकट्ठा कर के जारी कर के क्याकैसे मिलेगा, यह मालूम न होते हुए भी वे अपनी बात को सही साबित करने में लगे हैं.

असल में ऊंची ही नहीं नीची जातियों के मन में गहरा बैठा है कि यह भेदभाव तो खुद भगवान ने दिया है. बारबार पुराणों का उल्लेख करा जाता है कि आदि पुरुष के मुंह से ब्राह्मण, हाथों से क्षत्रिय, जांघों से वैश्य व पैरों से शूद्र पैदा हुए थे. जो दलित हैं तो वे शायद कहीं पैरों के नीचे की धूल से जन्मे थे क्योंकि उन का पौराणिक साहित्य में न के बराबर जिक्र है. नीची जातियां पीढ़ी दर पीढ़ी इस बात को मानती रही हैं और धर्मकर्म से अपना अगला जन्म सुधारने में लगी रहती हैं. अब वे पढ़नेलिखने लगी हैं पर आमतौर पर पिछड़ी रहती हैं. हालांकि अब बड़े शहरों में, जहां जातिवाद कुछ कम है, वहां के बच्चे बराबरी का दर्जा पाने लगे हैं. बोर्ड की यह जलील करने वाली हरकत एक आम बात है. पढ़नेपढ़ाने वाले इन वर्गों के लोगों को हिकारत से देखते हैं. भेदभाव रखते हैं. कहीं नौकरी मिल जाए तो भी चूंचूं करने से बाज नहीं आते. पीठ पीछे तो न जाने क्याक्या बोल जाते हैं और वे बातें कई दफा मुंह से निकल आती हैं. जाति का भूत अभी तो दमदार तरीके से सिर पर सवार है.

मकान बनाने से पहले

रोटी, कपड़ा और मकान इनसान की बुनियादी जरूरतें हैं. मेरे पास कपड़े थे और रोटियां भी, लेकिन मकान किराए का था. मेरे पिताजी का कहना था कि इस बुनियादी जरूरत को जल्दी से जल्दी पूरा कर लेना चाहिए, क्योंकि दूसरे के मकान में थूकने का भी डर होता है और अपने मकान में मनमानी करने की पूरी छूट होती है, इसलिए इस मनमानी को पूरा करने के लिए मेरे मन में उतावलापन मचा हुआ था.

लेकिन मकान का इंतजाम करना बड़ी टेढ़ी खीर होती है. मैं ने नौकरी करते हुए रिश्वतखोरी को बढ़ावा दिया, ताकि जैसेतैसे मैं अपना एक गरीबखाना बना सकूं.

मेरे हर दोस्त ने अपना यह शौक पलक झपकते ही पूरा कर लिया था. कई तो ऐसे थे, जिन के पास हर आवास योजना में एक मकान था. वे हमेशा मकान जैसी अचल जायदाद बनाने में लगे रहे और मैं हमेशा चंचला लक्ष्मी के पीछे पड़ा रहा.

एक दिन मेरे साथ अनहोनी हो गई. मैं ने एक हाउसिंग सोसाइटी में मकान लेने का फार्म भरा हुआ था. इत्तिफाक कहिए कि मुझे प्लौट अलौट हो गया.

यह सुनते ही मेरा शरीर रोमांचित हो उठा. पत्नी समेत बच्चे बल्लियां उछल पड़े. मदहोशी का एक ऐसा आलम था कि उसे मैं यहां बयान नहीं कर सकता.

मुझे रातदिन मकान के रंगीन सपने आने लगे. खाली जमीन पर सपनों में कोठी बनने लगी. उस को बनाने को ले कर घरेलू बैठकों का सिलसिला शुरू हो गया. नक्शे बनने लगे. सुझाव आने लगे.

पत्नी का कहना था कि अमुक कमरे में पंखा लगेगा, तो मेरा सुझाव था कि कूलर लगवाया जाएगा. बच्चे पढ़ने के बजाय चुपकेचुपके कोर्स की कौपियों में मकान के नक्शे बनाने लगे. बाहर लौनपेड़पौधे और ऊपर खुली बालकनी पर जोर दिया जाने लगा.

मैं इस सारी मुहिम में शामिल तो होता था, लेकिन हमेशा एक हताशा मुझे घेरे रहती थी कि मकान की नींव कैसे खुद पाएगी.

मेरे एक दोस्त हैं महेशजी. 2-3 महीने बाद एक दिन जब वे अचानक मिले, तो उन का हुलिया व चेहरे का भूगोल देख कर मेरे होश फाख्ता हो गए.

मैं ने पूछा, ‘‘क्यों, क्या मकान बनवा रहे हो?’’

वे खुश हो कर बोले, ‘‘आप को कैसे पता चला?’’

मैं ने कहा, ‘‘वह तो आप की शक्ल देख कर ही पता चल गया है. यह आप की बढ़ी हुई दाढ़ी, पिचके हुए गाल, धंसी हुई आंखें, बिना इस्तिरी किए कपड़े… कौन कह सकता है कि आप मकान नहीं बनवा रहे हैं?’’

वे बोले, ‘‘बस, पूछिए मत. भूल कर भी इस करमजले मकान का नाम मत लेना भाई. मुझे पता होता कि यह ऐसे गुल खिलाएगा, तो मैं नींव में सब से पहले खुद कूद जाता.’’

‘‘क्यों, ऐसा क्या हुआ?’’

‘‘हुआ यह कि जनाब, इस देश में जिन की पत्नियां कमाएं और जो बीड़ी पीता हो, उस का तो ऊपर वाला ही मालिक है. बस, मकान में जो कारीगर आते हैं, वे हर 15 मिनट के बाद बीड़ी पीते हैं. भला बताइए कि वे आप की जान नहीं लेंगे, तो और क्या करेंगे?’’

‘‘लेकिन, मैं क्या करूं?’’ मैं ने पूछा.

‘‘करना क्या है, इमली के पत्ते पर दंड पेलिए. मकान तो साक्षात काल है, जो मुंह खोले खड़ा है. जो जाता है, वही उस में समा जाता है,’’ महेशजी बोले.

मैं ने कहा, ‘‘जरा, सोचसमझ कर बोलिए. मकान के मामले में कुछ तो अच्छा बोलिए.’’

उन्होंने कहा, ‘‘तुम मेरे हालात देखने के बाद अगर रिस्क लेना चाहते हो, तो शौक से ले लो. मकान वही बना सकता है, जिस का दो नंबर का धंधा हो.’’

‘‘जब एक नंबर ही नहीं है, तो दो नंबर का सवाल ही कहां से आता है?’’

‘‘फिर तो हरि कीर्तन करो. मकान एक ऐसा लड्डू है, जिसे खाने वाला और नहीं खाने वाला दोनों पछताते हैं. मैं ने बनाया है, जान गले में आ गई. लोन के तमाम फौर्म भर कर पैसा उगाह लिया, लेकिन मकान अभी तक अधूरा है. मैं समझता हूं कि अगर मैं ने मकान पूरा बनाया, तो या तो मकान रहेगा या फिर मैं,’’ वे बोले.

यह सुन कर मेरे भी रोंगटे खड़े हो गए. मैं बस इतना ही कह पाया, ‘‘अगर ऐसी बात है, तो मैं मकान न बनाने की शपथ खाता हूं. जिस मकान को बनाने से आदमी को जिंदा ही स्वर्ग नसीब होता है, तो फिर मैं किराए के मकान में ही रह लूंगा.’’

वे हंसते हुए चले गए. उस दिन के बाद से मैं रोज नक्शे बनाता हूं, मकान के स्टाइल पर विचार करता हूं, लेकिन जमीन की बाउंड्रीवाल ही नहीं बन पाती, तो मकान क्या बनेगा.

कोचिंग सैंटर बना रहे हैं मोटा पैसा

देश में बढ़ती बेरोजगारी ने मातापिता को अपने बच्चों के कैरियर के प्रति सचेत कर दिया है. यही वजह है कि आज हर मातापिता अपने बच्चों को डाक्टर या इंजीनियर बनाना चाहते हैं.

अपनी जिंदगीभर की खूनपसीने की कमाई से वे अपने बच्चों को अच्छे कोचिंग सैंटरों में दाखिला दिला कर आईआईटी और मैडिकल की प्रवेश परीक्षा की तैयारी करा रहे हैं.

देश में इलाहाबाद, दिल्ली, कोटा जैसे शहरों के अलावा मध्य प्रदेश के भोपाल, जबलपुर, इंदौर, ग्वालियर और छत्तीसगढ़ के रायपुर, भिलाई जैसे बड़े शहरों में पीएससी, यूपीएससी, बैंक, रेलवे जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं के साथ ही साथ आईआईटी और मैडिकल की प्रवेश परीक्षा की कोचिंग देने वाले दर्जनों बड़े सैंटर हैं जो छात्रों व बेरोजगारों से मोटी फीस ले कर अपना कारोबार चमका रहे हैं.

इस के अलावा जिला और तहसील लैवल पर भी संविदा शिक्षक और पटवारी परीक्षा की तैयारी के लिए कुकुरमुत्ते की तरह कोचिंग सैंटर खुल गए हैं जो नौजवानों की जेब ढीली कर मोटा पैसा बनाने का काम कर रहे हैं.

बताया जाता है कि कैसे तथाकथित कोचिंग सैंटरों में उन लोगों द्वारा प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कराई जाती है जो खुद कभी किसी परीक्षा में पास नहीं हुए.

सरकारी नौकरी के साथसाथ मैडिकल और इंजीनियरिंग में अच्छी रैंक पाने को बेताब हजारों नौजवान मजबूरन इन कोचिंग सैंटरों में जा कर परीक्षा की तैयारी करने में जुटे हुए हैं.

सपने बिकते हैं कोटा में केंद्र में भारतीय जनता पार्टी सरकार के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज से 3 साल पहले शिक्षा नीति में बदलाव लाने की बात कही थी पर 3 साल से ज्यादा समय बीतने के बाद भी शिक्षा नीति में कोई बदलाव नहीं हुआ है.

देश के पढ़ेलिखे नौजवानों के लिए कैरियर गाइडैंस के लिए सरकारी कोशिशों का नतीजा सिफर ही रहा है. निजी क्षेत्रों ने इस का फायदा उठा कर कोचिंग के नाम पर बड़ेबड़े सैंटर खोल कर अपना धंधा जमा लिया है.

राजस्थान का कोटा शहर सपने बेचने वालों का शहर बन गया है. सौ से ज्यादा कोचिंग सैंटर यहां इंजीनियर और डाक्टर बनाने का सपना बेचते हैं.

कोटा में देशभर के तकरीबन एक लाख बच्चे पढ़ रहे हैं. इन कोचिंग सैंटरों में पढ़ाई के अलावा बच्चों के रहनेखाने तक का खर्च हर साल 2 लाख रुपए से ज्यादा होता है.

इन कोचिंग सैंटरों से कोटा के रियल ऐस्टेट कारोबार ने भी पंख लगा कर ऊंची उड़ान भरी है. पूरे कोटा में होस्टलों की तादाद भी 500 से कम नहीं है. इस के अलावा बड़ी तादाद में छात्र पेइंग गैस्ट बन कर भी रह रहे हैं.

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मैडिकल और आईआईटी की प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए कोटा में बने इन कोचिंग सैंटरों का जादू सिर चढ़ कर बोल रहा है. यही वजह है कि देशभर के मातापिता अपने बच्चों को 8वीं क्लास के बाद ही कोटा में कोचिंग के लिए भेजने लगे हैं.

दिल्ली भी कम नहीं

यूपीएससी, पीएससी की तैयारी के लिए इलाहाबाद, मेरठ के अलावा देश की राजधानी नई दिल्ली में भी कई सारे कोचिंग सैंटर हैं, जो होनहार नौजवानों को कलक्टर बनाने का सपना दिखाते हैं.

छोटेछोटे कमरों में चलने वाले इन कोचिंग सैंटरों में भी 2 लाख रुपए की मोटी फीस में 9 महीने के क्रैश कोर्स के जरीए आईएएस परीक्षा की तैयारी कराने का दावा किया जाता है.

दिल्ली में रह कर आईएएस की तैयारी कर रहे मध्य प्रदेश के एक छात्र सिद्धार्थ दुबे कहते हैं कि दिल्ली में 100 वर्गफुट का एक कमरा 8,000 से 10,000 रुपए तक मासिक किराए पर मिलता है. कोचिंग सैंटरों की फीस और महंगा किराया गरीब तबके के होनहार छात्रों के लिए टेढी खीर साबित होता है.

इन कोचिंग सैंटरों में पढ़ने वाले छात्र यह बात मानते हैं कि अकेले कोचिंग सैंटर के दम पर कोई नौजवान प्रतियोगी परीक्षा पास नहीं कर सकता जब तक कि वह खुद मेहनत न करे.

आज कोचिंग सैंटरों में जाना छात्रों की मजबूरी हो गई है, क्योंकि देशभर के कोनेकोने से आए और छात्रों के संपर्क में रहने से प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी के लिए मनमुताबिक माहौल मिल जाता है.

शासनप्रशासन और कारपोरेट की तिकड़ी मिल कर देश में लागू वर्तमान दोषपूर्ण शिक्षा प्रणाली को जानबूझ कर बदलना नहीं चाहती है. ऐसे में मजबूर हो कर छात्रों को कोचिंग सैंटरों के जाल में उलझना पड़ता है.

पैसे लेकर फर्जीवाड़ा

2 दिसंबर, 2017 को कर्मचारी चयन बोर्ड एसएससी की परीक्षा में मेरठ के डीएवी स्कूल में मोबाइल फोन के साथ पकड़े गए बागपत के रहने वाले सौरभ धामा ने पूछताछ में कई चौंकाने वाले राज खोले.

उस ने बताया कि मेरठ में एक कोचिंग के संचालक पंकज धामा ने उसे एसएससी की परीक्षा पास कराने के बदले मोटी रकम मांगी थी. सौरभ ने खुद और अपने भाई की नौकरी के लिए अपनी पुश्तैनी 7 बीघा जमीन भी गिरवी रख दी थी, जिस के बाद पंकज ने उसे पेपर के साथ आंसरशीट भी मुहैया करा दी थी.

नकल करते पकड़े गए अभ्यर्थी ने बताया कि मेरठ में कोचिंग सैंटर चलाने वाला पंकज धामा अब तक कई नौजवानों से मोटी रकम ले कर नौकरी लगा चुका है. इस परीक्षा में कई ऐसे अभ्यर्थी भी हैं जो पंकज के संपर्क में थे.

मेरठ की यह घटना बताती है कि कोचिंग सैंटर मोटी रकम ले कर देश की परीक्षा प्रणाली से खिलवाड़ कर के काबिल बेरोजगार नौजवानों का हक भी मारते हैं.

कोटा, दिल्ली, भोपाल और इंदौर के कोचिंग सैंटर तो आईआईटी और मैडिकल प्रवेश परीक्षा की कोचिंग लेने वाले छात्रों को 10वीं और 12वीं क्लास की परीक्षा में नियमित परीक्षार्थियों के रूप में शामिल कराने का काम भी करते हैं.

बताया जाता है कि ये कोचिंग सैंटर अपने यहां दर्ज बच्चों को उसी शहर के निजी स्कूलों से सांठगांठ कर उन को उन स्कूलों में दाखिला दिला देते हैं. निजी स्कूल इन छात्रों की हाजिरी लगाते रहते हैं जबकि ये छात्र उन स्कूलों में कभी पढ़ने जाते ही नहीं हैं.

कोचिंग और सरकार

वर्तमान समय में जब नौजवान तबका अपने कैरियर के लिए मोटी रकम खर्च कर कोचिंग सैंटरों में जाने को मजबूर है तो सरकार क्यों इस दिशा में कोशिश नहीं करती? हर स्कूल, कालेज में कैरियर गाइडैंस देने वाले शिक्षकों की नियुक्ति की जाए, क्योंकि उचित मार्गदर्शन की कमी में स्कूल में पढ़ रहे छात्र को हायर सैकेंडरी पास करने के बाद कौनकौन से अवसर उपलब्ध हैं, इस की जानकारी भी नहीं रहती है.

कालेज के उबाऊ सिलेबस से हट कर क्यों न उन्हें प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कराई जाए, जिस से ये नौजवान किसी कोचिंग सैंटर के मकड़जाल में न फंस कर अपने कैरियर को बना सकें? आखिर कब तक सरकारी तंत्र निजी संस्थानों के हाथों की कठपुतली बना रहेगा?

देश में विकासखंड लैवल पर शुरू हुए कौशल विकास केंद्रों में अच्छी तादाद में प्रशिक्षक और बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं और उन्हें मजबूत बनाने की कोशिश की जाए तो शायद बेरोजगारों का भविष्य संवर सके.

मुनाफे की हवस में मरते मजदूर

दिल्ली देश की राजधानी है जहां पर देश के नियमकानून बनाने वाले और उन को लागू कराने वाले रहते हैं. देश के दूसरे हिस्सों में यह समझा जाता है कि दिल्ली में कानून व्यवस्था के हालात बेहतर हैं. पर कुछ घटनाओं पर हम नजर डालें तो यह सब खयाली पुलाव ही लगता है.

दिल्ली में आएदिन होती लूट और बलात्कार की घटनाएं तो रोजमर्रा की बात बन चुकी हैं, मुनाफे की हवस के चलते मजदूरों की आग में जल कर मरने की घटनाएं भी तेजी से बढ़ती जा रही हैं.

इन दोनों घटनाओं में यह भी एक फर्क है कि जहां पर लूट (सड़क पर छीन लेना या घर में घुस कर डकैती करना) पूंजीवादी व्यवस्था द्वारा पैदा की गई समस्या है, वहीं बलात्कार पूंजीवादी व बाजारवादी संस्कृति की देन है. मजदूरों का फैक्टरी में आग में जल कर मर जाना पूंजीवादी मुनाफे की हवस का नतीजा है.

9 अप्रैल, 2018 को सुलतानपुरी के राज पार्क में 4 मजदूर जल कर मर गए. सुलतानपुरी का यह इलाका एक मिडिल क्लास रिहाइशी इलाका है जहां पर तकरीबन 500 घर हैं. इन में से 100 से भी ज्यादा घरों में जूतेचप्पल, सिलाई और दूसरे कामों की फैक्टरियां चलती

हैं. इन में से ज्यादातर फैक्टरियों में जूतेचप्पल का काम होता है जिन में पेस्टिंग से ले कर सिलाई तक का काम होता है.

यहां पर काम करने वाले मजदूरों से न्यूनतम मजदूरी के आधे में 10 से 12 घंटे काम कराया जाता है. यहां पर ज्यादातर मजदूर पीस रेट या 5-7 हजार रुपए प्रति महीने पर काम करते हैं. मजदूरों को लालच दिया जाता है कि उन्हें रहने की जगह दी जाएगी.

शहर में रहने की समस्या से जूझ रहे मजदूरों के लिए रहने की जगह मिलना बहुत बड़ी राहत जैसी होती है जिस के चलते वे कम पैसे में भी काम करने को राजी हो जाते हैं.

मालिकों के लिए यह सोने पे सुहागा जैसे हो जाता है. उन को 24 घंटे का मुफ्त में मजदूर मिल जाता है जो किसी भी समय फैक्टरी में लोडिंग, अनलोडिंग, चौकीदार का काम करता है. इस के बदले इन को छत पर एक कमरा मिल जाता है जिस में 8 से 10 लोग रहते हैं और बनातेखाते हैं.

मालिक घर जाते समय फैक्टरी में बाहर से ताला लगा देते हैं. इस की 2 वजहें हैं. एक तो यह कि नए मजदूर कहीं काम अच्छा नहीं लगने के चलते भाग न जाएं, दूसरा यह कि मजदूर रात में चोरी न कर लें.

10 अप्रैल को सुलतानपुरी के राज पार्क में बने ए-197 मकान, जहां पर एक दिन पहले आग लगी थी की गली में सन्नाटा था. ए-197 के बगल वाले घर के सामने प्लास्टिक की 3-4 कुरसियां रखी थीं और गली के एक मुहाने पर कुछ लोग आपस में बातचीत कर रहे थे.

ए-197 मकान को देख कर पूछने की जरूरत नहीं थी कि इसी फैक्टरी ने एक दिन पहले 4 जिंदगियों को निगल लिया था. यह मकान चारमंजिला था. नीचे वाली मंजिल पर एक 4 फुट का गेट था. इस के अलावा ऊपर 2 रोशनदान लगे थे जो आग लगने से काले हो चुके थे.

लोगों ने बताया कि यह फैक्टरी बृजेश गुप्ता की है जो ए-83 में रहते हैं. ए-197 में चप्पल बनाने का काम होता है जिस में तकरीबन 30-35 मजदूर काम किया करते थे.

इस इलाके में रविवार को छुट्टी का दिन होता है लेकिन बहुत सी कंपनियों में काम होता है.

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एक बड़े अखबार में छपी खबर के मुताबिक कारखाने में काम करने वाले मोहम्मद अली ने बताया कि यह फैक्टरी 15 सालों से चल रही थी और 8-9 अप्रैल की रात 2 बजे तक मजदूरों ने काम किया था. 9 तारीख की सुबह उत्तर प्रदेश के हरदोई जिले के अस्मदा गांव के मजदूर परिवारों के लिए बुरी खबर ले कर आई.

अस्मदा गांव के रहने वाले 18 साला मोहम्मद वारिस, 17 साला मोहम्मद अय्यूब, 20 साला मोहम्मद राजी व 17 साला मोहम्मद शान 10 तारीख की सुबह नहीं देख पाए और जल कर फैक्टरी के अंदर ही मर गए. कई लोग जान बचाने के लिए छत से कूदे जिस में उन को चोटें लगीं.

मोहम्मद वारिस और मोहम्मद अय्यूब दोनों सगे भाई थे जबकि मोहम्मद राजी व मोहम्मद शान चचेरे भाई थे.

सुलतानपुरी में आग लगने की यह कोई पहली घटना नहीं है. इस से पहले भी कई फैक्टरियों में आग लग चुकी है लेकिन कोई बड़ी दुर्घटना नहीं हो पाने के चलते खबर नहीं बन सकी.

आसपास के लोगों के मुताबिक, इस फैक्टरी में सुबह के 6.30 बजे आग लगी. दमकल महकमे और पुलिस को सूचना 6.35 पर मिल चुकी थी.

लोगों का कहना है कि महल्ले के काफी लोग इकट्ठा हो गए थे, लेकिन बिजली कटी नहीं थी इसलिए लोगों ने आगे बढ़ने की हिम्मत नहीं की.

दमकल की दर्जनों गाडि़यों ने मिल कर तकरीबन 2 घंटे में आग पर काबू पा लिया. आग की चपेट में आए लोगों को संजय गांधी अस्पताल पहुंचाया गया, जिस में से 4 लोगों को डाक्टरों ने मृत घोषित कर दिया.

जनवरी, 2018 में ही बवाना के सैक्टर 5 में आग लगने से 17 मजदूरों की जान चली गई थी. इस घटना में भी कहा जाता है कि काफी तादाद में मजदूरों की मौत हुई, लेकिन फैक्टरी में जो मजदूर रहते थे उन का पता नहीं चल पाया.

इस से पहले पीरागढ़ी, मंडोली, शादीपुर, शाहपुर जाट वगैरह जगहों पर दर्जनों मजदूरों की जानें जा चुकी हैं.

बवाना, सुलतानपुरी, नरेला के बाद नवादा की क्रौकरी फैक्टरी में लगी आग ने 3 मजदूरों को निगल लिया है और 4 मजदूर लापता हैं. मालिक बाहर से ताला लगा कर काम करा रहे थे और दिल्ली व केंद्र सरकार सो रही थी.

सुलतानपुरी जैसे रिहायशी इलाके में इस तरह की घटना होती है तो किसी भी तरह के मजदूर से मिल कर कुछ पता करना तकरीबन नामुमकिन बात होती है.

राज पार्क में जाने पर वही लोग मिलते हैं जो आसपास फैक्टरियों के मालिक हैं. ये मालिक हर आनेजाने वाले बाहरी शख्स पर निगाह रख रहे होते हैं और अपनी बात सुनाते हैं कि मालिक की किस्मत खराब थी, जो वे फंस गए.

मीडिया वाले गलत बयान छाप देते हैं जैसे लड़के तो काम ही नहीं करते थे, वे तो घूमने आए थे, बाहर से कोई ताला बंद नहीं रहता था वगैरह. जब तक कोई बाहरी शख्स उस इलाके में रहता है ये लोग नजर बनाए रखते हैं कि वह कहां जा रहा है, किस से बात कर रहा है.

पास में खड़े एक आदमी ने इस मुद्दे को अलग रूप देने के लिए कहा कि हिंदुस्तान एक नहीं हो रहा है लेकिन सऊदी अरब एक करना चाहता है. उस आदमी का इशारा हिंदूमुसलिम मुद्दा उठाने का था.

इस से हम जान सकते हैं कि इस तरह की सोच रखने वाले शख्स मोहम्मद वारिस, मोहम्मद अय्यूब, मोहम्मद राजी व मोहम्मद शान की मौत पर किस तरह सोचते होंगे?

गांधी नगर रेडीमेड कपड़ों का जानामाना बाजार है. इस बाजार में खबरें एक कोने से दूसरे कोने तक नहीं पहुंच पाती हैं. 22-23 अप्रैल, 2018 की रात में लगी आग और 2 लोगों की मौत का पता तो बहुत लोगों को नहीं था कि यहां  पर आग भी लगी है.

कुछ लोगों को मीडिया से पता भी चला तो उन को यह मालूम नहीं था कि आग किधर लगी है और कितना नुकसान हुआ है. काफी लोगों से पूछने के बाद एक नौजवान ने बताया कि गुरुद्वारे वाली गली की तरफ आग लगी है.

गुरुद्वारे वाली गली में जाने के बाद एक जूस विक्रेता ने एक गली की तरफ इशारा करते हुए बताया कि उस घर में आग लगी है.

मकान नंबर 2490 का तो माहौल देख कर लग ही नहीं रहा था कि इसी मकान में 2 दिन पहले 2 लोगों की जिंदगी खत्म हो चुकी है. उस घर को देखने पर आग लगने का पता जरूर चल रहा था. बाकी सबकुछ सामान्य सा लग रहा था.

इस मकान के बगल में एक औरत ने बताया कि यहां पर 2-4 घर छोड़ कर हर घर में फैक्टरी व गोदाम हैं. 2490 नंबर मकान भी एक संकरी गली में है, जिस में चारपहिया वाहन भी मुश्किल से जा सकता है. यह मकान चारमंजिला है, जिस की 3 मंजिलों में फैक्टरी चलती है. सब से ऊपर वाली मंजिल पर मकान मालिक खुद रहते हैं.

इन इलाकों में श्रम कानून का पालन नहीं हो रहा है. मजदूरों को 8-10 हजार रुपए प्रति महीने दे कर काम कराया जाता है.

साप्ताहिक छुट्टी के अलावा और कोई छुट्टी नहीं दी जाती है. यहां तक कि इतनी बड़ी घटना होने के बाद भी इस मकान को जांच के लिए सीलबंद करना उचित नहीं समझा गया. इस इलाके में चलने वाली हर फैक्टरी में रिहायश भी है, जो कभी भी दुर्घटना की एक बड़ी वजह बन सकती है.

किसी भी फैक्टरी में सुरक्षा मानकों का ध्यान नहीं रखा गया है. यहां तक कि इन मकानों के अंदर एक ही दरवाजा होता है और आग से बचाव के लिए कोई उपाय नहीं किया गया है.

दिल्ली में इतने बड़े पैमाने पर रिहायशी इलाकों में फैक्टरियां चल रही हैं जहां पर मालिक मनमाने तरीके से काम करते हैं और किसी तरह के श्रम कानून को लागू नहीं करते हैं.

दिल्ली सरकार, केंद्र सरकार, दिल्ली नगरनिगम, प्रशासन चुप बैठे हुए हैं. क्या इस तरह की घटना प्रशासन और सरकार की मिलीभगत के बिना हो सकती है? इस तरह की घटना होने के बाद केवल मुआवजा दे कर सरकार अपनी जिम्मेदारी को पूरा होना मान लेती है.

क्या मुआवजा देने से ही मोहम्मद वारिस, मोहम्मद अय्यूब, मोहम्मद राजी व मोहम्मद शान जैसे लाखों मजदूरों को इंसाफ मिल पाएगा? सरकारें कब तक ऐसी फैक्टरियों को चलते रहने देंगी, जो श्रम कानूनों को ताक पर रख कर चल रही हैं? कब तक मजदूरों की आवास की मांग को श्रम कानून में एक अधिकार

के रूप में जोड़ा जाएगा? क्या इसी तरह मजदूर मरते रहेंगे और मजदूर, कर्मचारी यूनियनें हाथ पर हाथ धरे बैठी रहेंगी?

रुद्राक्ष के हत्यारे को सजा-ए-मौत

26 फरवरी, 2018 की बात है. कोटा शहर की अदालत में उस दिन आम दिनों से कुछ ज्यादा ही भीड़ थी.  अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण प्रकरण न्यायालय के विशिष्ट न्यायाधीश गिरीश अग्रवाल की अदालत के बाहर सब से ज्यादा भीड़ मौजूद थी. भीड़ में शहर के आम लोगों के अलावा वकील भी शामिल थे.

अदालत में भीड़ जुटने का कारण यह था कि उस दिन कोटा के बहुचर्चित रुद्राक्ष अपहरण हत्याकांड का फैसला सुनाया जाना था. इसलिए रुद्राक्ष के मातापिता के अलावा उन के कई परिचित भी अदालत में आए हुए थे.

भीड़ में इस बात को ले कर खुसरफुसर हो रही थी कि अदालत क्या फैसला सुनाएगी. कोई कह रहा था कि आरोपियों को फांसी होगी तो कोई उम्रकैद होने का अनुमान लगा रहा था. दरअसल, इस मामले से कोटा की जनता का भावनात्मक जुड़ाव रहा था, इसलिए पूरे कोटा शहर की नजरें फैसले पर टिकी हुई थीं.

विशिष्ट न्यायाधीश गिरीश अग्रवाल समय पर अदालत पहुंच गए. जज साहब ने पहले अदालत के जरूरी काम निपटाए. फिर उन्होंने रुद्राक्ष हत्याकांड की फाइल पर नजर डाली और इस मामले के चारों आरोपियों को दोपहर 2 बजे अदालत में पेश होने का संदेश भिजवा दिया. अदालत के बाहर जमा लोगों को जब पता लगा कि जज साहब ने दोपहर 2 बजे आरोपियों को अदालत में पेश करने को कहा है तो वहां से धीरधीरे भीड़ कम होने लगी.

लंच के बाद अदालत के बाहर फिर से लोग जमा होने लगे. दोपहर 2 बजे पुलिस ने रुद्राक्ष हत्याकांड के आरोपी अंकुर पाडिया और उस के भाई अनूप पाडिया को कोर्टरूम में पेश किया. दोनों भाइयों को जेल से अदालत लाया गया था. तीसरा आरोपी महावीर शर्मा जमानत पर चल रहा था, वह भी कोर्टरूम में आ चुका था. इन तीनों आरोपियों को कटघरे में खड़ा किया गया.

इस बीच विशिष्ट न्यायाधीश गिरीश अग्रवाल अपने चैंबर से निकल कर कोर्टरूम में अपनी कुरसी पर बैठ गए. कुरसी पर बैठते ही उन्होंने एक नजर कोर्टरूम में मौजूद लोगों पर डाली, फिर अपने साथ लाई फाइल पर नजर दौड़ाने लगे.

इस केस का चौथा आरोपी करणजीत सिंह दिल्ली से नहीं आया था. उस के वकील सतविंदर सिंह ने जज साहब के सामने उस की हाजिरी माफी का प्रार्थनापत्र पेश करते हुए कहा कि करणजीत सिंह के दादा की मृत्यु होने के कारण वह अदालत में हाजिर नहीं हो सका. इस पर जज साहब कुछ नहीं बोले.

जज साहब ने सामने रखी फाइल खोल कर कुछ पन्ने पलटे और रुद्राक्ष की हत्या के चारों आरोपियों अंकुर पाडिया, अनूप पाडिया, महावीर शर्मा और चरणजीत सिंह को दोषी घोषित कर दिया. उन्होंने सजा के आधार बिंदु भी सुनाए.

तभी आरोपियों की पैरवी करते हुए उन के वकीलों ने कहा कि उन्हें कम से कम सजा दी जाए. विशिष्ट लोक अभियोजक कमलकांत शर्मा ने उन की बात का विरोध करते हुए कहा कि यह रेयरेस्ट औफ रेयर मामला है, इसलिए आरोपियों को कड़ी से कड़ी सजा दी जानी चाहिए. इन्हें कम से कम फांसी की सजा दी जाए. अपनी दलीलें पेश करते हुए लोक अभियोजक ने अदालत के सामने 3 रूलिंग भी पेश कीं.

वकीलों की दलीलें सुनने के बाद जज साहब ने शाम 5 बजे दोषियों को सजा सुनाने की बात कही. इस के बाद वह फिर से अपने चैंबर में चले गए.

रुद्राक्ष कौन था और उस का अपहरण व हत्या क्यों की गई, इस के लिए हमें करीब सवा 3 साल पीछे जाना होगा.

दरअसल रुद्राक्ष कोटा शहर की तलवंडी कालोनी के रहने वाले पुनीत हांडा का बेटा था. पुनीत हांडा एक बैंक में मैनेजर थे. 7 साल का रुद्राक्ष रोजाना की तरह 9 अक्तूबर, 2014 की शाम करीब 5-साढ़े 5 बजे अपने घर के पीछे हनुमान पार्क में खेलने गया था.

आमतौर पर वह करीब एक घंटे पार्क में खेल कर वापस घर लौट आता था, लेकिन उस दिन वह नहीं लौटा तो परिवार वालों ने उसे पार्क में जा कर ढूंढा. लेकिन वह वहां नहीं मिला.

उसी दिन शाम करीब साढ़े 7 बजे पुनीत हांडा के लैंडलाइन पर फोन आया. फोन करने वाले ने कहा कि तुम्हारा बेटा किडनैप हो गया है. पुनीत ने पहले तो इसे मजाक समझा, लेकिन फोन करने वाले ने गालीगलौज के साथ अपना नाम जफर मोहम्मद बताते हुए कहा कि बच्चे को कश्मीर भेज दिया है. अगर बच्चे को सहीसलामत वापस चाहते हो तो 2 करोड़ रुपए का इंतजाम कर लो.

पुनीत हांडा ने 2 करोड़ रुपए की रकम देने में असमर्थता जताई तो फोन करने वाले ने कहा, ‘‘तू बैंक मैनेजर है और तेरी बीवी टीचर. जितनी भी रकम हो सकती है, इकट्ठी कर ले. बाकी बात सुबह फोन कर के बताऊंगा और अगर पुलिस को बताने की होशियारी दिखाई तो बच्चे से हाथ धो बैठोगे.’’ कहते हुए उस आदमी ने फोन काट दिया.

फोन सुन कर पुनीत ने सिर थाम लिया. उन की समझ नहीं आ रहा था कि क्या करें. वह सोचने लगे कि उन की तो किसी से दुश्मनी भी नहीं है.

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बेटे के अपहरण होने की बात जब पुनीत की पत्नी श्रद्धा हांडा को पता चली तो वह रोने लगीं. पुनीत ने पत्नी को ढांढस बंधाते हुए कहा कि यह समय रोने का नहीं, बल्कि सोचने का है कि हमें अब क्या करना चाहिए. वह रोते हुए बोलीं, ‘‘मेरे जितने भी गहने हैं, सब बाजार में बेच दो पर मेरे रुद्राक्ष को ले आओ.’’

पुनीत ने पत्नी को हौसला रखने को कहा. बाद में उन्होंने फैसला किया कि पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करानी चाहिए. इस के बाद पुनीत ने अपने कुछ परिचितों को फोन कर के बुलाया. परिचितों के साथ उसी रात करीब पौने 9 बजे वह कोटा के जवाहरनगर पुलिस थाने पहुंच गए. थानाप्रभारी को उन्होंने सारी बातें बताईं. पुलिस ने उसी समय भादंवि की धारा 364ए के तहत रिपोर्ट दर्ज कर जानकारी अपने उच्चाधिकारियों को दे दी.

पुलिस ने मामले को गंभीरता से लिया. पूरे शहर में नाकेबंदी करा दी गई. पुलिस ने उस पार्क के आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों के फुटेज भी देखे, जिस में रुद्राक्ष खेलने गया था. फुटेज में सफेद रंग की निसान माइक्रा कार नजर आई, जिस का नंबर साफ नहीं दिख रहा था. पुलिस उस कार की तलाश में जुट गई. रुद्राक्ष और अपहर्त्ताओं की तलाश के लिए रात भर पुलिस का अभियान चलता रहा, लेकिन कोई सुराग नहीं लगा.

अगले दिन 10 अक्तूबर, 2014 को कोटा के तालेडा थाना इलाके के जाखमुंड स्थित नहर में एक बच्चे की लाश बरामद हुई. बाद में उस की शिनाख्त 7 वर्षीय रुद्राक्ष के रूप में हुई. जवाहरनगर थाना पुलिस ने बच्चे की लाश को जरूरी काररवाई के बाद पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया और केस में हत्या की धारा भी जोड़ दी.

थोड़ी सी देर में रुद्राक्ष की हत्या की खबर पूरे शहर में फैल गई. जिस के बाद लोग आक्रोश में आ गए. विरोध जताने के लिए लोगों ने बाजार बंद रखे. जगहजगह पुलिस के खिलाफ धरनाप्रदर्शन भी शुरू हो गए. कैंडल मार्च, मौन जुलूस निकाले गए. मानव शृंखला बना कर भी विरोध जताया गया. एक तरह से पूरा शहर इस आंदोलन से जुड़ गया था.

भारी जनाक्रोश को देखते हुए जयपुर से आए अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (क्राइम) अजीत सिंह कई दिनों तक कोटा में इसलिए डेरा डाले रहे कि कहीं स्थिति विस्फोटक न हो जाए.

पुलिस ने रुद्राक्ष के अपहर्त्ता और हत्यारोपियों की तलाश में कई टीमें गठित कीं. पुलिस ने रुद्राक्ष के साथ पार्क में खेल रहे बच्चों से भी पूछताछ की तो उन्होंने बताया कि कई दिन से एक अंकल पार्क में खेल रहे बच्चों को चौकलेट बांटने आते थे. उस दिन भी वह आए. उन के पास की चौकलेट खत्म हो गई थीं. रुद्राक्ष ही चौकलेट के लिए रह गया था. तब वह चौकलेट देने के लिए रुद्राक्ष को अपनी कार के पास ले गए.

पुलिस ने बच्चों के बताए हुलिए के आधार पर अपहर्त्ता के स्केच बनवा कर जारी कर दिए. सीसीटीवी फुटेज के आधार पर संदिग्ध कार के मालिक का भी पुलिस ने पता लगा लिया. इस के अलावा पुनीत हांडा के घर के लैंडलाइन टेलीफोन पर जिस फोन नंबर से फिरौती की काल आई थी, उस फोन नंबर की भी काल डिटेल्स निकलवाई गई.

5 दिन की लगातार जांचपड़ताल के बाद कोटा शहर के अनंतपुरा थाना इलाके के ओम एनक्लेव के रहने वाले अंकुर पाडिया का नाम सामने आया. पुलिस ने अंकुर पाडिया को तलाशा तो पता चला कि वह कोटा शहर में है ही नहीं. अंकुर के कोटा शहर में ही अलगअलग जगहों पर कई फ्लैट हैं.

पुलिस 14 अक्तूबर को ओम एनक्लेव में स्थित अंकुर के फ्लैट पर पहुंची. लोगों की मौजूदगी में फ्लैट का ताला तोड़ कर तलाशी ली तो वहां एक मोबाइल फोन, अंकुर का पासपोर्ट, वोटर आईडी कार्ड मिले.

फ्लैट के नीचे एक निसान माइक्रा कार भी खड़ी मिली. लोगों से पता चला कि वह कार अंकुर की ही है. कार में एक कंबल, कपड़े, चौकलेट, बिसकुट, कैंची, सेलोटेप, नायलौन की डोरी मिली.

अंकुर की बंसल क्लासेज के नजदीक ही स्टेशनरी की दुकान भी है. दुकान की तलाशी लेने पर वहां से एक लैपटाप, हार्डडिस्क, पेन ड्राइव, डोंगल, 2 मोबाइल फोन बरामद हुए. इस के अलावा उस के महालक्ष्मीपुरम स्थित फ्लैट से 3 लाख रुपए नकद, डायरी, मोबाइल फोन आदि जब्त किए. यह वही फोन था, जिस से फिरौती के लिए रुद्राक्ष के घर वालों को काल की गई थी.

जांच में पता चला कि रुद्राक्ष के घर फिरौती के लिए बीएसएनएल की सिम से काल की गई थी. उस की काल डिटेल्स से पुलिस को रिलायंस कंपनी का एक नंबर मिला. जांच आगे बढ़ी तो पता चला कि वह सिम दिल्ली से लिया गया था.

दिल्ली में करणजीत सिंह नाम के व्यक्ति ने एक साथ 8-10 सिम कार्ड बेचे थे. इन में से एक सिमकार्ड का प्रयोग कर के गुजरात से क्लोरोफार्म मंगाने के लिए ईमेल किया गया था. आईपी एड्रेस से अंकुर का नाम सामने आ गया था.

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पुलिस ने अंकुर का नंबर सर्विलांस पर लगा दिया. जांच में पता चला कि अनूप पाडिया का फरजी नाम संतोष सिंह है. अनूप की एक नए नंबर पर बारबार बात हो रही थी. उस नए नंबर का मूवमेंट कानपुर स्टेशन के आसपास आ रहा था. उस मोबाइल की आईडी उड़ीसा की थी. कानपुर में तलाश की गई तो पता चला कि अंकुर पाडिया उड़ीसा के किसी व्यक्ति की आईडी पर कानपुर के एक होटल में कमरा ले कर रह रहा है.

लंबी भागदौड़ के बाद पुलिस ने 27 अक्तूबर, 2014 को कानपुर से अंकुर पाडिया और लखनऊ से उस के भाई अनूप पाडिया को गिरफ्तार कर लिया. अनूप पाडिया रुद्राक्ष के अपहरण और हत्या मामले में अंकुर का सहयोगी था.

पूछताछ में पता चला कि अंकुर पाडिया को क्रिकेट मैचों का सट्टा लगाने का शौक था. इस शौक में कुछ समय पहले उस ने लाखों रुपए गंवा दिए थे, जिस से उस पर लाखों रुपए का कर्ज हो गया था, जिस की वजह से उसे कोटा में महालक्ष्मीपुरम का अपना फ्लैट गिरवी रखना पड़ा था.

बैंक का उस पर 39 लाख रुपए का कर्ज था. उस ने गोपाल से 65 लाख रुपए ले रखे थे. इस के अलावा निखिल शर्मा से भी 10 लाख रुपए ले रखे थे. कई अन्य लोगों से भी उस ने मोटी रकम ले रखी थी.

कर्ज से उबरने के लिए अंकुर ने रुद्राक्ष के अपहरण की योजना बनाई. उसे पता था कि रुद्राक्ष का पिता पुनीत हांडा बूंदी सेंट्रल कोऔपरेटिव बैंक में मैनेजर है और मां कौन्वेंट स्कूल में टीचर, इसलिए अंकुर को उम्मीद थी कि उन के बेटे रुद्राक्ष का अपहरण करने पर फिरौती के रूप में मोटी रकम मिल सकती है.

अंकुर ने रुद्राक्ष का अपहरण करने के लिए कई दिन तक पार्क के चक्कर लगाए. वहां खेलने वाले बच्चों को वह चौकलेट देता था. 9 अक्तूबर, 2014 को वह पार्क से रुद्राक्ष को चौकलेट के बहाने ले गया और उसे अपनी सफेद माइक्रा कार में बैठा कर क्लोरोफार्म सुंघा कर बेहोश कर दिया.

बेहोश रुद्राक्ष को ले कर वह कोटा शहर में घूमता रहा. वह कोटा के दशहरा मेले में भी गया. इस के अलावा उस ने उम्मेद क्लब के सिल्वर जुबली कार्यक्रम में भाग लिया. उसी रात अंकुर ने रुद्राक्ष की हत्या कर दी और उस का शव तड़के नहर में फेंक दिया. रुद्राक्ष की हत्या के बाद वह कोटा से भाग कर कई राज्यों में घूमता हुआ कानपुर पहुंचा.

बाद में 30 अक्तूबर को पुलिस ने दिल्ली के तिलकनगर थाना इलाके में कृष्णापुरी के रहने वाले करणजीत सिंह को गिरफ्तार कर लिया. करणजीत सिंह दिल्ली के गफ्फार मार्केट में मोबाइल का काम करता था.

उस ने पुलिस को बताया कि उसे एक जगह 10 सिम कार्ड लावारिस हालत में मिले थे. इन में से एक सिमकार्ड उस ने खुद रख लिया और बाकी 9 सिम 23 सितंबर, 2014 को एक आदमी को 1100 रुपए में बेच दिए. पुलिस ने अंकुर पाडिया के नौकर महावीर शर्मा को 7 नवंबर, 2014 को बूंदी जिले के केशोराय पाटन से गिरफ्तार कर लिया.

अंकुर पाडिया ने रुद्राक्ष के अपहरण की योजना पूरी तरह सोचसमझ कर बनाई थी. पुलिस को उस के लैपटाप की जांच के बाद पता चला कि उस ने सितंबर, 2014 में इंटरनेट के द्वारा क्लोरोफार्म मिलने के स्थानों की तलाश की. इस के अलावा एक अंगरेजी अखबार की वेबसाइट पर किडनैपिंग से संबंधित वेबपेज भी देखे.

अंकुर के लैपटाप की एफएसएल जांच रिपोर्ट से पता चला कि पहली सितंबर, 2014 से 14 अक्तूबर, 2014 के बीच उस ने अपराध के लिए इंटरनेट पर कई तरह की खोजबीन की थी. डेढ़ महीने में उस ने 188 तरह के कीवर्ड सर्च किए. इन में वेयर कैन बी गेट क्लोरोफार्म, वेयर कैन बी गेट मेकअप मटीरियल सरदारजी गेटअप, हाउ टू चेंज योर वाइस ओवर द फोन, रिच परसन इन कोटा प्रमुख थे.

अंकुर इतना शातिर था कि उस ने 16 अक्तूबर, 2014 की रात सुशांत राजगंधा नामक व्यक्ति का वोटर आईडी कार्ड चुरा लिया. सुशांत राजगंधा ट्रेन द्वारा बलसाड से राजगंधा जा रहा था. रुद्राक्ष की हत्या के बाद कोटा से फरार हो कर अंकुर भी उसी ट्रेन से कहीं जा रहा था.

इसी दौरान मौका पा कर अंकुर ने सुशांत राजगंधा का वोटर आईडी कार्ड व अन्य दस्तावेज चुरा लिए. सुशांत राजगंधा के वोटर आईडी कार्ड के आधार पर अंकुर कानपुर में होटल में रुका हुआ था. अंकुर के शातिराना दिमाग का अंदाज इस से भी पता चलता है कि जब कानपुर में उसे पकड़ा गया था तो उस के पास उस का लिखा 2 पन्नों का सुसाइड नोट भी था.

इस सुसाइड नोट पर उस के दस्तखत भी थे. इस से पुलिस ने अनुमान लगाया कि अंकुर इस सुसाइड नोट को प्रचारित कर दुनिया की नजर में मर जाता, लेकिन असल में वह नाम बदल कर अपने भाई अनूप पाडिया की तरह कहीं अन्यत्र रहने लग जाता.

पुलिस को यह भी पता चला कि अनूप पाडिया पर कोटा शहर व कई अन्य जगहों पर धोखाधड़ी के मामले दर्ज हैं. कई प्रकरण एनआई एक्ट के विचाराधीन हैं. वह सन 2009 में जयपुर जिले से पुलिस अभिरक्षा से फरार हो गया था. तब से वह फरार चल रहा था. बाद में उसे रुद्राक्ष के मामले में लखनऊ से गिरफ्तार किया गया, जहां वह संतोष सिंह के नाम से रह रहा था.

पुलिस की जांच में यह बात सामने आई कि दोनों भाई पैसों के लिए मिल कर अपराध कर रहे थे. रुद्राक्ष की हत्या के तुरंत बाद 12 अक्तूबर, 2014 को अंकुर सीधा अपने भाई अनूप उर्फ संतोष सिंह के पास गया था.

इस मामले में आमजनों की भावना को देखते हुए कोटा के वकीलों ने 2 आरोपियों अंकुर पाडिया और अनूप पाडिया की पैरवी नहीं की थी. इतना ही नहीं, बार असोसिएशन ने परिवादी पुनीत हांडा की तरफ से नि:शुल्क पैरवी के लिए एडवोकेट हरीश शर्मा को नियुक्त कर दिया था.

व्यापक जांचपड़ताल के बाद पुलिस ने अंकुर पाडिया के खिलाफ भादंसं की धारा 364ए, 302, 379, 419, 420, 120बी व सूचना प्रौद्योगिकी की धारा 65 व 66क, ख, ग, घ के तहत, अभियुक्त अनूप पाडिया उर्फ संतोष सिंह के खिलाफ भादंसं की धारा 364ए, 302, 419, 420, 212, 120बी और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 66ख, ग, घ के अंतर्गत आरोपपत्र पेश किया. अभियुक्त करणजीत सिंह के खिलाफ भादंसं की धारा 109, 364ए एवं 302 और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 66बी तथा अभियुक्त महावीर शर्मा के खिलाफ भादंसं की धारा 201 एवं 212 के तहत 23 जनवरी, 2015 को अदालत में आरोपपत्र पेश किया. पुलिस ने 1464 पेज और 10 सीडी में चालान पेश किया था.

कोर्ट में करीब 3 सालों तक इस बहुचर्चित मामले की काररवाई चलती रही, जिस में 110 गवाहों के बयान भी दर्ज किए गए. न्यायालय में पेश हुए साक्ष्यों के आधार पर ही न्यायाधीश गिरीश अग्रवाल ने आरोपियों को दोषी ठहराया.

सजा सुनाने के लिए जज साहब शाम 5 बजे कोर्ट में पहुंच गए. उस समय आरोपियों के अलावा मामले से जुड़े सभी वकील व रुद्राक्ष के मातापिता भी कोर्टरूम में मौजूद थे.

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जज साहब ने बिना कोई भूमिका बनाए सीधे फैसला सुनाते हुए कहा, ‘अभियुक्त अंकुर ने क्रूरतम, अमानवीय तथा हृदयविदारक जघन्य अपराध किया था. अभियुक्त की अपराध प्रवृत्ति को देखते हुए वह समाज की मुख्यधारा से जुड़ने के योग्य नहीं है. अभियुक्त अंकुर समाज के लिए खतरा है.’

उन्होंने आगे कहा, ‘ऐसे हालात में अभियुक्त अंकुर के साथ नरमी का रुख अपनाए जाने का कोई औचित्य नहीं हो सकता. 7 साल के बच्चे की बर्बरतापूर्वक हत्या के इस मामले को रेयरेस्ट औफ रेयर माना जाना न्यायोचित प्रतीत होता है. इसलिए अभियुक्त अंकुर पाडिया को मृत्युदंड से कम कुछ भी दिया जाना न्यायोचित नहीं है.’

इतना कह कर जज साहब ने एक सरसरी नजर कटघरे में खड़े अभियुक्त अंकुर पाडिया के चेहरे पर डाली.

कुछ क्षण रुक कर जज साहब ने कहा, ‘अभियुक्त अनूप ने नियोजित तरीके से षडयंत्रपूर्वक अपराध किया था. इस तरह के अपराधों में आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों के लिए नरमी का रुख अपनाया गया तो यह समाज के लिए घातक होगा. पिछले 5 सालों से वह नाम बदल कर और अपनी पहचान छिपा कर संतोष सिंह के नाम से रहता रहा और इसी नाम से आईडी, परिवार कार्ड बनवा लिए, जो उस की आपराधिक प्रवृत्ति को दर्शाता है. अभियुक्त अनूप का अपराध अतिगंभीर और हृदय विदारक है. उस के खिलाफ नरमी का रुख अपनाया जाना न्यायोचित नहीं होगा.’

जज साहब ने इतना कह कर कटघरे में खड़े अभियुक्त अनूप पाडिया और कोर्टरूम में मौजूद लोगों पर सरसरी नजर डाली. कुछ पलों की चुप्पी के बाद जज साहब ने आगे कहा, ‘अभियुक्त महावीर और करणजीत पर भी आरोपित अपराध गंभीर प्रकृति के हैं. महावीर ने फिरौती के लिए अपहरण व हत्या जैसे गंभीर अपराध में साक्ष्य नष्ट करने और आरोपी अंकुर को बचाने के लिए सहयोग किया. आरोपी चरणजीत ने फरजी सिम बेचने का अपराध किया. ये परिवीक्षा के प्रावधानों के लाभ पाने के अधिकारी नहीं हैं. उन्हें भी समुचित दंड से दंडित किया जाना न्यायोचित होगा.’

इस के बाद जज साहब ने टेबल पर रखे गिलास से पानी पिया. फिर उन्होंने दंडादेश सुनाते हुए कहा, ‘मुख्य आरोपी अंकुर पाडिया को दोषसिद्ध आरोप के अंतर्गत धारा 302 भादंसं में मृत्युदंड और 50 हजार रुपए के अर्थदंड से दंडित किया जाता है. इस के अलावा उसे 364ए में मृत्युदंड व 50 हजार रुपए के अर्थदंड से भी दंडित किया जाता है.’

अंकुर पाडिया को कई अन्य धाराओं में सजा व अर्थदंड सुनाने के बाद जज साहब ने अभियुक्त अनूप पाडिया को दोषी मानते हुए धारा 302 एवं 120बी और 364ए एवं 120बी भादंसं में आजीवन कारावास की सजा सुनाई. फिर अभियुक्त महावीर शर्मा को 4 साल और करणजीत सिंह को 2 साल की सजा सुनाई.

अदालत ने अंकुर पाडिया को फांसी की सजा के साथ कुल 3 लाख 60 हजार रुपए, अनूप पाडिया को उम्रकैद के साथ 3 लाख 20 हजार रुपए, महावीर शर्मा को 4 साल की कठोर कैद के साथ 25 हजार रुपए और करणजीत सिंह को 2 साल की कठोर कैद के साथ 1 लाख रुपए के अर्थदंड से दंडित किया.

सजा के अन्य बिंदुओं को सुनाने के बाद जज साहब ने फाइल को बंद करते हुए एक बार फिर कोर्टरूम में मौजूद लोगों पर नजर डाली और कुरसी से उठ कर अपने चैंबर में चले गए.

फैसला सुन कर कोर्टरूम में मौजूद रुद्राक्ष की मां श्रद्धा हांडा फफक पड़ीं. फांसी की सजा सुनाए जाने के बाद भी कटघरे में खड़े अंकुर पाडिया के चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी. उस के भाई अनूप पाडिया के चेहरे पर भी मलाल के कोई भाव नहीं थे.

रुद्राक्ष के पिता पुनीत हांडा ने कहा कि मेरी कैसी जीत और कैसी हार. मेरा बेटा तो वापस नहीं मिल सकता. 3 साल तक अदालत की चौखट पर आतेआते मैं खुद को अपराधी समझने लगा था. आरोपी पेशी पर आए या न आए, मैं तो हर बार पेशी पर पहुंचता था.

जेल से जब अंकुर व अनूप कोर्ट में आते तो लगता कि वे किसी ऐशगाह या फाइवस्टार होटल से निकल कर आ रहे हैं. ब्रांडेड जूते, जींस, टीशर्ट, चेहरे पर शिकन तक नहीं. ऐसे में मैं कई बार हैरान हो जाता कि जेल में आखिर चल क्या रहा है. मैं सिस्टम के आगे खुद को अपराधी और हत्यारों को फरियादी समझने लगा था.

अदालत का फैसला आने से करीब एक महीने पहले ही रुद्राक्ष के दादा मदनमोहन हांडा का स्वर्गवास हो गया था. पिता के ड्यूटी पर चले जाने और मां के स्कूल चले जाने के बाद रुद्राक्ष का सब से ज्यादा समय अपने दादाजी के साथ ही बीतता था.

रुद्राक्ष की मौत ने दादा मदनमोहन को भी तोड़ दिया था. जिस पार्क से रुद्राक्ष का अपहरण हुआ था, वहां दादाजी ने पोते की याद में 2 पौधे रोपे थे. वे इन्हीं पौधों को पालपोस कर रुद्राक्ष को याद करते थे.

रुद्राक्ष हत्याकांड में मुख्य आरोपी अंकुर पाडिया को गिरफ्तार कराने में तकनीकी जांच के जरिए सब से अहम भूमिका निभाने वाले हेडकांस्टेबल प्रताप सिंह को फैसला आने के दिन ही एएसआई के पद पर गैलेंटरी पदोन्नति दे दी गई. प्रताप सिंह की विशेष पदोन्नति की सिफारिश तत्कालीन पुलिस महानिदेशक ने की थी.

फैसला सुनाए जाने के बाद कोर्टरूम में मौजूद तीनों मुजरिमों को पुलिस कोटा जेल ले गई.

जेल में भी अनूप पाडिया अपनी फितरत दिखाने से नहीं चूका. उस ने जेल में ही कैदियों से वसूली शुरू कर दी. किसी ने इस की शिकायत भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो से कर दी तो ब्यूरो ने 10 अप्रैल, 2017 को प्रोडक्शन वारंट पर कोटा जेल से गिरफ्तार कर लिया.

इस मामले में कोटा जेल के जेलर बत्तीलाल मीणा और 2 दलालों को भी गिरफ्तार कर लिया. कोर्ट के आदेश पर अनूप पाडिया को अजमेर जेल भेज दिया गया था.

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