मोदी मैजिक पर ग्रहण

देश के 10 राज्यों में लोकसभा की  4 और विधानसभा की 10 सीटों के लिए हुए उपचुनावों के नतीजे केंद्र सरकार के कार्यों पर चुनाव पूर्व सर्वेक्षण सरीखे हैं. 14 उपचुनावों से साफ संकेत मिल गया है कि अब देश में मोदी मैजिक खत्म हो रहा है. रामायण की तर्ज पर भाजपा के ‘अश्वमेघ यज्ञ’ का घोड़ा कर्नाटक में विपक्ष ने रोक लिया. कर्नाटक विधानसभा चुनाव के बाद अन्य राज्यों में हुए उपचुनावों में भी भाजपा को मात खानी पड़ी. जीत की जंग में भाजपा का प्रदर्शन सब से खराब रहा. भाजपा के लिए सब से बड़ी शर्मनाक हार ‘राम के प्रदेश’ उत्तर प्रदेश में रही.

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में एकतरफा मैदान मारने वाली भाजपा का उपचुनावों में हार का सिलसिला जारी है. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य की लोकसभा सीटें क्रमश: गोरखपुर व फूलपुर हारने के बाद भाजपा पश्चिमी उत्तर प्रदेश की कैराना लोकसभा सीट और नूरपुर विधानसभा सीट भी हार गई. कैराना सीट का महत्त्व भी गोरखपुर और फूलपुर से कम नहीं है.

कैराना से हिंदुओं के पलायन का बनावटी मुद्दा बना कर भाजपा ने 2014 में लोकसभा सीट जीती थी. चुनावी जीत के बाद भाजपा कैराना से पलायन की बात को भूल गई, क्योंकि फिर साबित करना पड़ता कि कितने कहां क्यों गए. पश्चिमी उत्तर प्रदेश की नूरपुर विधानसभा सीट सहारनपुर जिले में आती है और हिंदुओं के पलायन का मुद्दा वहां भी मददगार रहा पर अब उपचुनाव में नूरपुर सीट भी भाजपा के हाथ से निकल गई.

अविजित नहीं शाह-मोदी

उपचुनावों में भाजपा की हार से साफ हो गया है कि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जोड़ी अविजित नहीं है. उस को हराया जा सकता है. राजनीतिक समीक्षक हनुमान सिंह ‘सुधाकर’ कहते हैं, ‘‘भाजपा की जीत का सफर विरोधी दलों के मनोबल को तोड़ चुका था. विपक्षी एक तरह से पस्त हो गए थे लेकिन कर्नाटक में भाजपा के प्रबंधन को तोड़ने के बाद विपक्षी एकता का मनोबल बढ़ गया है. अब उन को एहसास हो चुका है कि राजनीति के चाणक्य कहे जाने वाले अमित शाह का प्रबंधन भी फेल हो सकता है.

यह बात न केवल विपक्षी दल बल्कि भाजपा के कार्यकर्ता और नेता भी समझने लगे थे कि शाहमोदी की जोड़ी हर हाल में उन्हें जीत दिलाती रहेगी, लेकिन अब यह भ्रम टूट गया है. ऐसे में आने वाले दिनों में 3 राज्यों के विधानसभा चुनावों में भाजपा को कड़ी चुनौती का सामना करना पडे़गा. शाहमोदी की जोड़ी के सामने पस्त पडे़ भाजपा नेता भी अब विरोध में उठने वाले स्वरों को हवा देने का काम करेंगे.

भाजपा को प्रदेशदरप्रदेश मिल रही जीत से पार्टी की टौप लीडरशिप में हेकड़ी का भाव आ चुका था. अपनी किसी भी योजना को वह फेल मानने को तैयार नहीं थी. विपक्षी दलों से ले कर जनता या दूसरे जानकार लोगों की राय उस के लिए बेमानी हो चुकी थी. पार्टी अपनी आलोचना को विरोध मानने लगी थी. पार्टी में अंदर और बाहर दोनों तरफ तानाशाही का बोलबाला था. मीडिया के सवालों का उन का एजेंडा बता कर सरेआम जवाब देने से मना कर दिया जाता था. इस तरह की तानाशाही कांग्रेस में भी इमरजैंसी के दौर में दिखी थी. जो तानाशाही कांग्रेस में 28 साल सरकार चलाने के बाद आई थी वह भाजपा में मात्र 4 साल में ही दिखाई देने लगी है.

1975 से 1977 तक इमरजैंसी के दौर में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने विपक्ष को नेस्तनाबूत करने का संकल्प ले कर अपने फैसले लागू करने शुरू किए. कांग्रेसमुक्त भारत के अपने अभियान में यही काम भाजपा करने लगी. ऐसे में जनता के मन में स्वाभाविक तौर पर विरोधी दलों के प्रति एक सहानुभूति पैदा हो गई.

यही वह लहर थी जिस ने कांग्रेस के खिलाफ इमरजैंसी के बाद विरोधी दलों का साथ दिया था. भाजपा के खिलाफ बहुत सारे दलों का गठबंधन भले ही बहुत लंबा सफर तय न कर सके लेकिन भाजपा को कुरसी से उतारने में अवश्य सफल हो सकता है. शाहमोदी की जोड़ी की सफलता पर प्रश्नचिह्न लगने शुरू हो गए हैं.

कांग्रेस फिर मैदान में

राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा का मुकाबला क्षेत्रीय दल नहीं कर सकते हैं. क्षेत्रीय दलों के सहयोग से कांग्रेस भाजपा का मुकाबला करने के लिए मैदान में है. कर्नाटक चुनाव के बाद कांग्रेस और दूसरे दलों का यह तालमेल साफतौर पर दिखा. इस का असर भाजपा के रणनीतिकारों पर भी हुआ, मंच पर सोनिया गांधी और मायावती की गले मिलती फोटो देख कर भाजपाई खेमे के चेहरे का रंग फीका पड़ गया. यही नहीं, सोनिया व मायावती की इस जोड़ी को ले कर सोशल मीडिया पर भी गहमागहमी रही. कुछ मैसेज काफी कटाक्ष वाले थे.

भाजपा को यह मालूम है कि 2014 में उस की सफलता कम, कांग्रेस की असफलता ज्यादा थी. अब भाजपा और कांग्रेस का फर्क बहुत सारे मामलों में खत्म हो गया है. केवल धर्म की कट्टरता को छोड़ दें तो भाजपा और कांग्रेस में कोई भेद नहीं रह गया है. कई बार तो भाजपा कांग्रेस के पुराने कामों का उदाहरण दे कर अपना बचाव भी करने लगी है.

राज्यों में राज्यपाल की ताकत का प्रयोग करना हो, जोड़तोड़ कर के सरकार बनानी हो, जनता पर टैक्स लगाना हो, ये सब वैसे ही होने लगा है जैसे कांग्रेस के राज में होता था. अब कांग्रेस अपने को बदल कर भाजपा का मुकाबला करने के लिए मैदान में उतर चुकी है. बीमार होने के बावजूद कर्नाटक में सोनिया गांधी ने मंच पर खडे़ हो कर विपक्षी दलों को ताकत दी और भाजपा को चुनौती दे दी.

14 उपचुनावों के बाद अगली परीक्षा 3 राज्यों के विधानसभा चुनावों में है. मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में भाजपा लंबे समय से सत्ता में है. वहां हमेशा भाजपा और कांग्रेस का सीधा मुकाबला होता रहा है. तीनों ही प्रदेशों में कोई क्षेत्रीय दल मुकाबले में नहीं होता था. हाल के कुछ सालों में तीनों ही प्रदेशों में बहुजन समाज पार्टी की दखल बढ़ी है. यही वजह है कि अब कांग्रेस के लिए मायावती की दोस्ती अहम हो चुकी है.

धार्मिक एजेंडा फिस

दलित चिंतक रामचंद्र कटियार कहते हैं, ‘‘भाजपा को लोकसभा चुनाव जीतने के बाद यह लगने लगा था कि धार्मिक एजेंडा ही उस की जीत का एकमात्र फार्मूला है. उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव से पहले भले ही पार्टी योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने से बच रही थी पर जीत के बाद उस ने योगी को ही मुख्यमंत्री की कुरसी पर बैठा दिया. भाजपा के लिए उत्तर प्रदेश बेहद महत्त्वपूर्ण था. लोकसभा चुनाव में उसे 2014 की तरह अब 73 सीटें मिलनी बेहद मुश्किल हैं.

‘‘भाजपा धर्म को आगे कर के यह चुनाव जीतना चाहती है. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को भाजपा ने अपना ब्रैंड ऐंबैसेडर सा बना लिया. चुनावीप्रचार में भाजपा में योगी का कद मोदी और शाह के बाद माना जाने लगा. हर चुनाव में उन को स्टारप्रचारक बना कर पेश किया जाने लगा. गुजरात और हिमाचल में जीत के लिए योगी के प्रचार को सराहा गया था. कर्नाटक में भी योगी को चुनावीप्रचार में रखा गया.’’

भाजपा योगी को पूरे भारत में चुनावीप्रचार का हिस्सा बना चुकी है. परेशानी वाली बात यह है कि पूरे देश में ब्रैंड ऐंबैसेडर बने योगी उत्तर प्रदेश में ही चुनावी जीत नहीं दिला पा रहे हैं. योगी के मुख्यमंत्री बनने के बाद उत्तर प्रदेश के 3 लोकसभा उपचुनावों में पार्टी को हार का सामना करना पड़ा. इस में खुद मुख्यमंत्री योगी की गोरखपुर सीट शामिल है. इस के अलावा फूलपुर और कैराना में भी योगी ने प्रचार अभियान चलाया था. उत्तर प्रदेश में योगी धार्मिक एजेंडे पर ही काम कर रहे हैं. पर्यटन में केवल धार्मिक महत्त्व के शहरों का विकास हो रहा है. परिवहन की सुविधाओं में भी धार्मिक पहचान वाले शहरों को प्राथमिकता दी जा रही है. विकास के दूसरे कामों में भी धार्मिक शहरों को महत्त्व मिल रहा है. गौरक्षा के नाम पर शहर से गांव तक छुट्टा जानवरोंं का आतंक बढ़ता जा रहा है.

उत्तर प्रदेश और बाकी प्रदेशों में भाजपा को मिली हार से साफ हो गया है कि जनता को भाजपा का धार्मिक एजेंडा पसंद नहीं आ रहा है. धार्मिक एजेंडा फिस होने से भाजपा की हार तय हो गई है. कैराना और नूरपुर में जिन्ना विवाद काम नहीं आया. ऐसे में साफ है कि लोग अब जागरूक हो रहे हैं.

अंधसमर्थक व्यापारी स्तब्ध

भाजपा की हार से सब से अधिक स्तब्ध अंधसमर्थक व्यापारी हैं. नोटबंदी, ईवे बिल, महंगाई, बैंकों की परेशानी और जीएसटी से परेशानी के बाद भी ये समर्थक भाजपा की गलती मानने को तैयार नहीं थे. उन को लगता था कि भाजपा को ऐसे ही जनता का समर्थन मिलता रहेगा. असल में ये समर्थक बड़ी संख्या में ऊंची जातियों के थे. इस के साथ ही साथ, इस जमात में कुछ पिछड़ी जातियां और दलित भी शामिल हो चुके थे.

केंद्र और फिर उत्तर प्रदेश में सरकार बनाने के बाद भाजपा में दलितों की उपेक्षा होने लगी. उन पर जातीय अत्याचार शुरू हो गया. उत्तर प्रदेश के सहानपुर व महाराष्ट्र के भीमा कोरेगांव में हुई हिंसा ने भाजपा की पोल खोल दी. मध्य प्रदेश के मंदसौर में किसानों पर अत्याचार ने दलितों और पिछड़ों को यह बता दिया कि भाजपा अभी भी ऊंची जातियों की पार्टी है.

भाजपा के समर्थक यह चाहते थे कि दलितपिछडे़ पार्टी को वोट तो दें पर ये पार्टी में अपना हक न मांगें. भाजपा के अंधभक्त व्यापारी समर्थकों को अब लग रहा है कि आगे के चुनाव में भी दलित, पिछड़ा और मुसलिम गठजोड़ बना रहा तो भाजपा का सत्ता में कायम रहना मुश्किल हो जाएगा.

उत्तर प्रदेश में दलित, पिछड़े और मुसलिम गठजोड़ ने कैराना व नूरपुर के उपचुनाव में भाजपा को हराने में सब से बड़ी भूमिका निभाई. इस जीत ने पश्चिम उत्तर प्रदेश में हाशिये पर चले गए अजित सिंह के लोकदल में जानफूंकदी है.

नए गठबंधन की तलाश

एनडीए के सहयोगी दलों के साथ भाजपा का व्यवहार हेकड़ी वाला होता जा रहा है. उत्तर प्रदेश में भाजपा के सहयोगी ओमप्रकाश राजभर नाराज चल रहे हैं. अपना दल के बारे में भी अंदर खाने चर्चा है कि लोकसभा चुनाव वह भाजपा के साथ नहीं लड़ेगा. रामविलास पासवान, उदित राज और रामदास अठावले जैसे नेता पार्टी में दलित मुद्दों को ले कर मुखर हैं. भाजपा सांसद ज्योतिबा फूले आरक्षण और संविधान के मुददे पर भाजपा के साथ खड़ी नहीं हैं. ऐसे में भाजपा गठबंधन की कमजोर होती ताकत ने सहयोगी दलों को दूसरा रास्ता देखने पर मजबूर कर दिया है.

बिहार में जदयू और भाजपा की सरकार भले ही चल रही हो पर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार सहज भाव से काम नहीं कर रहे हैं. वे जौकीहाट सीट बुरी तरह हारने से पहले ही नोटबंदी पर कटाक्ष कर चुके थे कि लालू प्रसाद यादव के पुत्र तेजस्वी यादव को कहना पड़ा था कि अब नीतीश कुमार के पुराने गठबंधन में लौटने के दरवाजे बंद हो चुके हैं.

बिहार की जौकीहाट विधानसभा सीट लालू प्रसाद यादव के राष्ट्रीय जनता दल ने ही जीती है. यहां पर भाजपाजदयू गठबंधन का मुकाबला राजद से था. यहां भाजपा की हार से साफ लगता है कि केवल विपक्षी एकता के सामने ही नहीं, आमनेसामने के मुकाबले में भी भाजपा चुनाव हार जाएगी.

कांग्रेस के नेता सुरेंद्र सिंह राजपूतकहते हैं, ‘‘भाजपा की जुमलेबाजी अब जनता समझ चुकी है. उसे केवल हवाई जुमलों से नहीं संभाला जा सकता. कांग्रेस की राजनीति देश के विकास और समाज को एकजुट रखने की रही है, देश के लोग इस बात को समझ रहे हैं. 3 राज्यों के चुनावों के पहले ही 14 उपचुनावों में भाजपा की हार से साफ हो गया है कि अब भाजपा की जुमलेबाजी काम नहीं आएगी.’’

देश को केवल विरोध की राजनीति नहीं चाहिए. देश के लोग विश्वास की राजनीति को महत्त्व देते हैं. 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों से देश की जनता ने भाजपा, खासकर प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी नरेंद्र मोदी के शहद में डूबे बयानों के प्रभाव में वोट दे दिया. लोकसभा चुनावों के बाद केंद्र सरकार की नीतियां जनता के सुखदुख और विकास की नहीं रहीं. नोटबंदी, बैंकों की परेशानी, बेरोजगारी को केंद्र सरकार ने कभी गंभीरता से नहीं लिया. भाजपा के नेता और कार्यकर्ता जहां मोदी मैजिक के टूटने से स्तब्ध हैं वहीं विरोधी दलों में आत्मविश्वास भर चुका है.

घोटाले, दोष, दोषी

नीरव मोदी और मेहुल चौकसी के मामले में 12,000 से 20,000 करोड़ रुपए के घपले पर सरकारी पंजाब नैशनल बैंक ने सारा दोष एक सीनियर लैवल के अफसर पर डाल दिया है. उसे गिरफ्तार करा कर बैंक के डायरैक्टर व चेयरमैन बच निकले हैं. यही तो सरकारी अफसरों की खासीयत है कि वे आमतौर पर हर तरह के आरोपों से मुक्त रहते हैं. यही प्रशासकीय सेवक अपने को देश का आयरनफ्रेम कहते हैं. इस फ्रेम का हर गर्डर दूसरे पर निर्भर रहता है और दूसरे की सुरक्षा करता है. प्राइवेट बैंकों को यह सुविधा नहीं है और इसीलिए जैसे ही पता चला कि वीडियोकोन कंपनी को 40,000 करोड़ रुपए के कर्ज में जो 3,250 करोड़ रुपए आईसीआईसीआई बैंक ने दिए थे उस में बैंक की चेयरपर्सन चंदा कोचर का अहम रोल था. इन्हीं चंदा कोचर के पति दीपक कोचर की कंपनी न्यू पावर रिन्यूएबल्स को वीडियोकोन के चेयरमैन वेणुगोपाल धूर्त ने मोटा कर्ज दिया था.

केंद्रीय जांच ब्यूरो इस आरोप की जांच कर रहा है और चंदा कोचर से पूछताछ शुरू हो गई है. ऐसी पूछताछ नीरव मोदी को कर्ज देने वाले सरकारी बैंकों के चेयरमैनों से अभी शुरू नहीं हुई है, क्योंकि वे बैंक सरकारी जो हैं. सरकार जो करती है, वह ठीक ही होता है, यह धारणा आज तक जनता में बनी हुई है. लगातार प्रचार के बल पर सरकारी अफसर यह साबित करने में सफल हो गए हैं कि इस देश में भ्रष्टाचार, लूट, बेईमानी या तो नेता करते हैं या व्यापारी. उन्होंने अफसरशाही को इस से मुक्त कर रखा है. लगभग हर कानून में बारबार नियंत्रण सरकारी अफसरों व इंस्पैक्टरों को दिया जाता है, जबकि भ्रष्टाचार की असल जड़ों में खादपानी देने का काम इन्हीं अफसरों के बनाए नियमकानून करते हैं और इन्हें लागू करने वाले यही अफसर इस का लाभ उठाते हैं.

आईसीआईसीआई बैंक सरकारी नहीं है और इसीलिए उस के चेयरपर्सन पर जल्दी ही हाथ डाल दिया गया वरना चाहे चारा घोटाला हो, कोयला घोटाला हो या कौमनवैल्थ गेम्स घोटाला, दोषी मुख्यतया सरकारी अफसरों की जमात ही होती है जो अपने इशारे पर नेताओं व व्यापारियों को चलाती है. जरूरत इस बात की है कि कानून कड़े नहीं, सभी पक्षों पर बराबर लागू हों. दोषी केवल नेता और व्यापारी नहीं, उन के हाथ बांधने वाले या उन को खुला अवसर देने वाले नियमकानून भी हैं. दोषी वे सैकड़ों कानून हैं जो आम जनता को आराम से जीने नहीं देते. इन्हीं के कारण प्रतिस्पर्धा कम होती है और व्यापारी, नेता, अफसर मिल कर जनता को लूटते हैं. अफसर जानते हैं कि नेता कुछ समय के लिए आते हैं और उन्हें कानून की पेचीदगियों का कुछ पता नहीं होता. वे उन्हें बहका कर मामले उलझा देते हैं और खुद निकल जाते हैं.

क्या यही धर्म है?

धर्म अब एक संस्थागत व्यापार हो गया है. देश में बनने वाले मंदिरों की संख्या तेजी से बढ़ रही है. एक समय शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने शिरडी के साईंबाबा के मंदिर बनाए जाने पर आपत्ति जताई थी कि वे भगवान नहीं, बाबा हैं. इसलिए हिंदू धर्म के अनुसार एक मुसलिम बाबा का मंदिर बनाना सर्वथा गलत है. इस पर देशभर में बवाल खड़ा हो गया. साईंबाबा के समर्थकों ने उन्हें भलाबुरा भी कहा. पर वे डटे रहे. साईंबाबा फकीर थे और फकीर की तरह रहे पर अब उन के स्वर्णमय मंदिर बन रहे हैं.

एक और देवता इन दिनों हावी हैं, शनिदेव, जहां देखें वहां शनि मंदिरों का निर्माण हो रहा है. बड़ी भीड़ है. शनिग्रह से सभी भयग्रस्त हैं. मध्य प्रदेश के एक मुख्यमंत्री ने उन पर 111 घड़े सरसों का तेल चढ़ाया था, पर कुरसी छिन गई. इन मंदिरों पर चढ़ावे के अतिरिक्त जो तेल चढ़ता है,  वह आय का बड़ा साधन है. चढ़ाए गए तेल को साफ कर के फिर दुकानों पर बेच दिया जाता है और वही तेल फिर शनिदेव पर शीशियों में भर कर भक्तों को बेच दिया जाता है. यही नहीं, ठेले पर बिकने वाले कई चाटसमोसे उसी तेल से तले जाते हैं. यह रिसाइक्लिंग औयल भारत में ही संभव है.

मंदिरों का बोलबाला

धर्म लालच और भय 2 खंभों पर टिका होता है. शनि की दशा से सभी भयभीत हैं. मजे की बात यह है कि युगों से स्थापित देवता राम और कृष्ण के मंदिर अब सूने पड़े हैं. हां, पुराने भक्त वहां भी हैं, पर साईंबाबा और शनिदेव के मंदिर भक्तों से बहुत ही गुलजार हैं.

एक बात और, इन मंदिरों को बनाने के लिए भूमि या धन की आवश्यकता नहीं है. कोई संकल्प कर ले, मंदिर बनाना है. भूमि और धन स्वयं आ ही जाएगा. जानना चाहेंगे, कैसे…

तो जानिए, किसी भी सड़क व हाईवे के किनारे खाली जगह तलाश लीजिए, न हो तो नगरपालिका या निगम का कोई पार्क देख लीजिए या कोई चौराहा पकड़ लीजिए. भूमि की समस्या हल हो गई. इस काम के लिए किसी एसडीओ या नागरिक संस्था के अधिकारी से अनुमति लेने की भूल न करिए. बस, शुरू हो जाइए. एक छोटा सा चबूतरा बना कर रातोंरात मूर्ति स्थापित कर दें, फिर चंदा देने वाले स्वयं आ जाएंगे और विशाल मंदिर बन जाएगा. आप, बस, दानपेटी पर ताला अपना ही लगा कर रखिए. कुछ समय के लिए हर गुरुवारशनिवार को भंडारा शुरू कर दें और प्लेटगिलास सड़क पर फेंक कर चल दें. सुबह सफाई हो जाएगी. नगरपालिका पानी का टैंकर भी फ्री दे देगी. अब और क्या चाहिए, बेरोजगारी समाप्त हो जाएगी. नेतागीरी भी जम सकती है. बाबा की कृपा से संभावनाएं अनंत हैं. इस से ट्रैफिक की समस्या हो तो हो, या सुप्रीम कोर्ट कुछ भी कहता रहे, नजरअंदाज करिए.

क्या यह आजादी है

मुझे पोलैंड की एक महिला टूरिस्ट की बात बड़ी अच्छी लगी जो संयोगवश मैसूर में हुए शांति सम्मेलन में मुझे मिली थीं. उन्होंने कहा, ‘‘वाकई भारत में बड़ी फ्रीडम है, ऐसी कहीं और नहीं.’’

मैं बड़ा प्रसन्न हुआ. पूछा, ‘‘कैसे?’’ वे बोलीं, ‘‘यहां इतनी फ्रीडम है कि जहां मन चाहे वहां दुकान लगा लो, मंदिर बना लो या मजार, कोई बाधा नहीं है. यहां तक कि जहां इच्छा हो वहां खड़े हो जाओ, कोई बोलेगा नहीं. ऐसी फ्रीडम, मैं ने कहीं नहीं देखी.’’

जब मैं अपने शहर से नागपुर जाता था तो मार्ग के किनारे एक मढि़या बंजारी माई की पड़ती थी. सुनसान जंगल में वह मढि़या सूनीसूनी सी थी. अब वहां बड़ा मंदिर बन गया है. आगे बढ़तेबढ़ते हर जगह हाईवे के किनारे अनेक मजारें भी दिखने लगी हैं. इस घनघोर जंगल में इन्हें कौन और क्यों दफनाने आता है, सोचता हूं. लगता है, एक प्रतियोगिता चल रही है. हाईवे पर चलने वाले ट्रैफिक पर इस से क्या बाधा पड़ती है, कोई सोचता है? नवरात्रि पर रातभर देवी जागरण से छात्रों और बीमारों पर क्या बीतती है?

पर्व आने पर शहर में सड़क पर टेबल रख कर लंगर बांटने से राहगीरों को होने वाली असुविधा के बारे में कोई बोलता नहीं है. क्या धार्मिकता बढ़ रही है? तो फिर अपराधों की, बलात्कारों की संख्या में इतनी वृद्धि क्यों हो रही है? प्रतिमाह जगहजगह भागवत कथाएं हो रही हैं पर नैतिकता का स्तर गिरता ही जा रहा है. कुछ समझदार व्यक्ति सड़क के किनारे मंदिर बना लेते हैं, फिर उस की आड़ में अपनी दुकान लगा लेते हैं. अब अगर कोई शासकीय अधिकारी इन्हें हटाने को पहुंचता है तो बड़ी भीड़ इकट्ठा हो जाती है. शहरों में सड़कों के दोनों ओर दुकानें लगी हैं, चलना मुश्किल है. ट्रैफिक सिग्नल हैं नहीं, अगर हैं तो बंद पड़े हैं. सिग्नल पर नौजवान बीच से निकल जाते हैं. सर्वाधिक कठिनाई में हैं बच्चे, महिला और बुजुर्ग. वे जान हथेली पर रख कर सड़क पार करते हैं, रोज कितने ही शहीद हो जाते हैं.

धर्मस्थल मालामाल

मंदिरों में देश की एक वर्ष की जीडीपी से अधिक मूल्य का सिर्फ सोना ही पड़ा है. तहखानों में पड़ा सोना धीरेधीरे गायब हो जाता है. मंदिरों में सफाई का हाल देखिए, मंदिर के बाहर मालाएं, फूल, पौलिथीन बिखरे पड़े रहते हैं. क्या भारत का स्वच्छता अभियान यहां नहीं है. पर्व पर मंदिर परिसर में ऐसी भीड़ मचती है जैसे लूट हो रही हो.

तीर्थस्थान चाहे गया हो, इलाहाबाद या अन्य स्थल, वहां अव्यवस्था और अजीब खींचतान है. हमारे स्वनामधन्य हर बार होने वाले कुंभ मेले में बैठ कर श्रद्धालुओं की सुविधा की बात क्यों नहीं करते? क्या माथे पर बड़ेबड़े त्रिपुंड लगा कर रेशमी गद्दों पर बैठ कर प्रवचन देने से धर्म का उद्धार हो जाएगा. जिन छोटे, गरीब लोगों का धर्मांतरण यदाकदा कराया जा रहा है, उस में जातिप्रभा, ऊंचनीच आदि बातों पर चर्चा कर उसे रोकने के लिए गरीब, छोटे तबकों को मुख्यधारा में लाने की चर्चा आखिर यह धर्मसंसद क्यों नहीं करती?

चोर को खांसी, साधु को दासी बिगाड़ ही देती है. ऐसे साधु उक्त कारण से कारावास में पड़े हैं. धर्मस्थलों, महंतों, मजारों, झाड़फूंक के बहाने इलाज करने वालों को देख कर एक बार फिर दुष्यंत याद आ जाते हैं, ‘कैसेकैसे मंजर सामने आने लगे हैं…’

अमेरिका में एंकर बेबी का धंधा

दुनियाभर के देशों की उन गर्भवती महिलाओं के लिए एक अच्छी खबर है जो अपने होने वाले बच्चे को अमेरिकी नागरिक बनाने का सपना देख रही हैं. प्रजनन के अंतिम हफ्तों में प्रशांत महासागर के पश्चिमी छोर पर सैपनटापूसमूह (नौर्दर्न मैरीना आइलैंड्स) पर पर्यटन के नाम पर घूमनेफिरने आएं और अपने नवजात शिशु के साथसाथ उस के अमेरिकी नागरिक होने का सर्टिफिकेट भी लेते जाएं. यह आईलैंड अमेरिकी जमीन है.

यह स्थान इन दिनों चीनी लोगों के लिए बर्थ टूरिज्म का केंद्र बनता जा रहा है. चीनी महानगर शंघाई या गोंजेओ से मात्र 4-5 घंटे की फ्लाइट है और 45 दिन के लिए तो वीजा की भी दरकार नहीं है. यहां बड़े आकर्षक और मनोहारी समुद्रतट हैं, खरीदारी के लिए मौल, कैसिनो और अस्पताल हैं. स्थानीय चामोरो समुदाय के लोगों की अपनी मेलजोल वाली संस्कृति है. वर्ष 2009 में पहली बार अमेरिका की इमिग्रेशन नीति में जब बदलाव हुआ था तब नियमादोष के चलते साल के अंत तक मात्र 9 चीनी पर्यटक गर्भवती महिलाएं आई थीं, जिन की संख्या अब बढ़ कर 472 हो गई है. इस का भंडाफोड़ उस समय हुआ जब एक लास एंजिल्स से गई गायनीकोलौजिस्ट ने अवैध इमिग्रेशन और करों की चोरी में संशय होने की शिकायत पर एफबीआई से शिकायत कर दी थी. एफबीआई कुछ मामलों में जांच कर रही है, पर धंधा बदस्तूर जारी है.

एंकर बेबी के नाम से इस बहुचर्चित कारोबार में पड़ोसी देश कनाडा के बाद चीनी समुदाय ने लास एंजिल्स और इस के आसपास के छोटे नगरों में गहरी जड़ें जमा ली हैं. इस कारोबार में चीनी समुदाय के एक गिरोह ने एक वैबसाइट  भी तैयार की है, जिस के जरिए गर्भवती महिलाओं को प्रजनन के अंतिम सप्ताहों में बर्थ टूरिज्म के लिए कैलिफोर्निया लाया जाता है. हालांकि एंकर बेबी के लिए भारत से भी गर्भवती महिलाएं आती हैं पर उन की संख्या बहुत कम है.

पियु रिसर्च सैंटर के अनुसार, अमेरिका में जन्म लेने वाले 12 बच्चों में से 1 बच्चा एंकर बेबी होता है. इन में साल 2013 में कुल 36 हजार बच्चे एंकर बेबी थे, जो वैध रूप से बर्थ टूरिज्म के कारण हुए थे. लेकिन अमेरिका में ऐसे लाखों हिस्पैनिक पेरैंट्स हैं जो पंजीकृत नहीं हैं और उन के प्रतिवर्ष 3 लाख बच्चे पैदा होते हैं. इन का अमेरिकी नागरिक के रूप में पंजीकरण होता है. टैक्सास प्रशासन ने वर्ष 2015 में नवजात शिशुओं को सर्टिफिकेट देने में असमर्थता जताई थी, लेकिन यह फैसला अवैधानिक करार दिया गया. कनैडियन नागरिक अमेरिकी महिलाओं को सरोगेसी मदर के रूप में अपना रहे हैं. इस का खर्च बड़ा है.

इस धंधे में मोटी कमाई करने वाले चीनी बिचौलिए ट्रांसलेटर कहे जाते हैं. ये गर्भवती महिला से बतौर पैकेज 50 हजार से 80 हजार डौलर लेते हैं. इस पैकेज में एक महिला के चीन के किसी नगर से अमेरिका आनेजाने, अस्पताल में शिशु के जन्म आदि पर व्यय और समीप में किसी अपार्टमैंट में ठहरने के लिए आधी धनराशि पेशगी ले ली जाती है. यही ट्रांसलेटर नवजात शिशु के लिए पासपोर्ट की भी व्यवस्था करता है. अमूमन एक सामान्य अस्पताल में नौर्मल डिलीवरी के लिए 7,500 डौलर तथा सिजैरियन के लिए 10, 500 डौलर फीस चुकानी पड़ती है, जबकि दवाओं का व्यय अलग है.

पियू रिसर्च सैंटर की रिपोर्ट पर भरोसा करें, तो वर्ष 2013 में 2 लाख 75 हजार महिलाएं पर्यटक के रूप में अमेरिका आई थीं. इन में हजारों गर्भवती थीं. यूएस इमिग्रेशन ऐंड कस्टम एनफोर्समैंट ने लास एंजिल्स, अरवाईंन, सेंटा क्लारा आदि नगरों में 40 स्थानों पर छापे मारे थे. इन छापों के दौरान इस धंधे में लिप्त कौंट्रैक्टर के रूप में काम करने वाले ट्रांसलेटर अमेरिकी इमिग्रेशन नियमों और टैक्स में अनियमितता तथा वीजा अवधि के बिना अनुमति समयावधि से अधिक ठहरने आदि के आरोपी पाए गए थे. इन में कुछ पर केस भी चल रहे हैं.

यह आश्चर्य की बात है कि जो चीन अमेरिका सा लगने लगा है और लगातार तेजी से अपने नागरिकों की दशा सुधार रहा है, वहां भी लोग अमेरिकी नागरिकता पाने के लिए बेचैन रहते हैं.

ध्यान रहे, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने चुनाव अभियान के दौरान एंकर बेबी कारोबार में अनियमितता के सवाल पर संविधान के 14वें संशोधन में बदलाव किए जाने का आश्वासन दिया था. यही नहीं, ट्रंप ने चुनाव अभियान में मैक्सिको सीमा पर दीवार खड़ी करने का भी आश्वासन दिया था, लेकिन अभी तक दोनों पर कोई ठोस कार्यवाही नहीं हो सकी है.

संविधान के अनुसार, अमेरिकी जमीन पर जन्म लेने वाले बच्चे को अमेरिकी नागरिकता प्रदान की जाती है. इस के लिए जन्म प्रमाणपत्र दिया जाता है. यही बच्चा आगे चल कर 18 साल की उम्र के बाद अपने माता और पिता को वैधानिक तौर पर ग्रीनकार्ड के रूप में अमेरिका का स्थायी निवासी बना कर अमेरिका ले आता है.

चुनावी उत्सव : आखिर क्या था यह माजरा

‘वक्तेरुखसत तसल्लियां दे कर, और भी तुम ने बेकरार किया.’

यहां शायर उन नेताओं के मन का दर्द कह रहा है, जो चुनावों में पार्टी के प्रचार के लिए किसी दूसरे राज्य में गए थे. वहां मीडिया ने उन्हें रंगरलियां मनाते हुए ऐक्सपोज कर दिया. अब अपने राज्य में उन के खिलाफ विपक्ष वालों ने खूब प्रचार किया है कि इस तरह के रंगीनमिजाज विधायकों की सदस्यता खारिज की जाए. उन के सुप्रीमो ने अब उन्हें तसल्ली दी है कि यह गर्दगुबार जल्दी ही छंट जाएगा, क्योंकि होहल्ला करने वाले विपक्ष के नेताओं का मुंह हीरेजवाहिरात से भर दिया गया है.

ये नेता वहां खूब रंगरलियां मनाते रहे, खरीदारी भी कमाल की हुई. सारा इंतजाम बढि़या था. घूमाघूमी भी बहुत अच्छी रही. शराब भी विलायती थी और मुरगा भी ताजा व जायकेदार मिलता रहा. दोस्तों की रंगीन महफिलें भी खूब जमीं.

इन नेताओं के अपने राज्य की तरफ चलने से 2 दिन पहले अखबार वालों ने पता नहीं कैसे यह राज उजागर कर दिया कि कुछ विधायक चुनावी प्रचार के दौरान रंगरलियों में डूबे रहे.

शायर कहता है कि हे देशवासियो, चुनाव प्रचार तो अपनेआप में एक नैशनल फैस्टिवल है. चुनावी परचा भरने से कई दिन पहले ही भावी उम्मीदवार के घर हलवाई बैठा दिया जाता है. लजीज, लुभावने और तर व्यंजनों की मनभावन खुशबू चारों तरफ फैल जाती है. दूरदूर से बधाइयों व समर्थनप्रदर्शन का सिलसिला शुरू हो जाता है.

असली भांगड़ा तो उस दिन होता है, जब उम्मीदवार को पार्टी का टिकट मिल जाता है. साकी इतनी जोर से जाम छलकाता है कि हर तरफ मय ही मय बरसती है और सारी फिजां पर मदहोशी का नशा छा जाता है. गाजेबाजे के साथ हमारा होनहार उम्मीदवार पूरी तरह सजधज कर अपना नामांकन परचा भरने जाता है.

सजी हुई सैकड़ों कारें, आदमकद बैनर, कारोंबसों पर चस्पां पोस्टर और लोकलुभावन नारे हवा में उछलते हैं. पूरे शहर का ट्रैफिक गड़बड़ा जाता है. पुलिस वाले खुद आगे बढ़ कर बैरिकेड लगाते हैं, ताकि बड़े लोगों की कारों के काफिले रुकने न पाएं.

आम आदमी को आनेजाने में कोई परेशानी न हो, इस बात की किसे चिंता है. पुलिस वाले तो बस पार्टी उम्मीदवार के गुस्से से ही डरते हैं. कल को अगर वह जीत गया, तो वही उन का माईबाप होगा.

ताकत दिखाने का यह सिलसिला बदस्तूर चलता रहता है. परचा भरतेभरते आधा प्रचार तो यों ही हो जाता है.

चुनाव में विरोधी को मात देने के लिए एक और तरीका अपनाया जाता है. जगहजगह स्टेज शो कराए जाते हैं. फिल्मी सितारे, बड़े खिलाड़ी, गायक व कलाकार भीड़ जुटाने में एड़ीचोटी का जोर लगाते हैं. सब को वक्त पर पैसा जो मिल जाता है. कूल्हे मटकाती मौडलें स्टेज पर कैबरे दिखाती हैं. इस दौरान उम्मीदवार के घर के बाहर लंगर चलता रहता है.

आखिरी हफ्ते में तो यह चुनावी फैस्टिवल पूरे रंग में होता है. आसपास के राज्यों से दबदबे वाले नेता बुलाए जाते हैं. वोटरों के दुखते कानों में इतना चुनावी कचरा फेंका जाता है कि वे बेचारे भी सोचते हैं कि कब चुनाव का दिन आए और वे वोट फेंक कर शांति से सो सकें.

प्रशासन की नाक में भी दम रहता है. सरकारी मुलाजिमों की नींद हराम हो जाती है. उन की जान तब आफत में पड़ जाती है, जब वे रातदिन एक कर के वोटिंग मशीनों को संभालते हैं, चुनाव कराते हैं, पहरा देते हैं.

शायर सही कहता है, ‘… और भी तुम ने बेकरार किया,’ यानी सुप्रीमो ने चलतेचलते कहा था, ‘अगले 6 महीने बाद दूसरे राज्यों में भी चुनावी बिगुल बजने वाला है. तुम्हारी ऐसी धमाकेदार सेवा फिर की जाएगी. ये मीडिया वाले तो सिरफिरे हैं, जो चुनावी फर्ज व शानोशौकत को रंगरलियों जैसे घटिया नाम से पुकारते हैं. हम ने तुम्हारे राज्य के मुख्यमंत्री व प्रदेश अध्यक्ष को फोन कर दिया है. तुम आराम से जाओ, वहां तुम्हारा बाल बांका तक नहीं होगा.

‘हां, फिर तैयार रहना लल्ला. इस बार तुम्हें बंगाल के काले जादू व असम की ब्लैक ब्यूटी का स्वाद चखाएंगे.’

‘वक्तेरुखसत तसल्लियां दे कर…’ वाह, क्या रुतबा है चुनावी प्रचार से लौटने वाले जत्थे का. शायर की बेकरारी काबिलेगौर है. नेताओं को अपने सुप्रीमो पर पूरा भरोसा है कि ऐसे नायाब चुनावी फैस्टिवल कभी नहीं थमेंगे. इलैक्शन कमिश्नर लाख सयाना बने, मगर हमारे रहनुमा कोई न कोई चोर दरवाजा तलाश ही लेते हैं.

शायर कहता है कि धन्य हैं हमारे भविष्य निर्माता, जो चुनावों को एक रंगारंग फैस्टिवल की तरह मनाते हैं, लंगर चलाते हैं, कंबलसाडि़यां बांट कर गरीबगुरबों की लाज ढकते हैं, बाजेगाजे, ठुमके, दवादारू का कामयाब आयोजन करते हैं और देश की एकता की अनूठी मिसाल कायम करते हैं. आखिर में जीत उन्हीं की होती है, जो गरीब जनता की जितनी ज्यादा सेवा करते हैं. जनता एक बार फिर चुनावों का बेसब्री से इंतजार करने लगती है.

पथरी निकालने वाले बाबा की खुली कलई

हमारे देश में आस्था के नाम पर अंधविश्वास का खेल सदियों से चला आ रहा है. कहीं सयानेभोपो झाड़फूंक से लोगों का इलाज करते हैं. कहीं तांत्रिक अपने टोटकों से लोगों की समस्याएं दूर करने का दावा करते हैं, तो कहीं ढोंगी बाबा अपने चमत्कार दिखाते हैं. कहीं फकीर का चोला पहन कर लोगों का दुख दूर किया जाता है. कोई बाबा दरबार सजाता है तो कोई मंदिर की आड़ में इस तरह के काम करता है. कोई मजार पर बैठ कर झाड़ा लगाता है.

यह सिलसिला आज से नहीं बल्कि लंबे समय से चला आ रहा है. कोई तथाकथित भूत उतारने का दावा करता है तो कोई लड़का पैदा होने की दवा देता है. कोई कैंसर की बीमारी का इलाज करने की बात करता है तो कोई वशीकरण मंत्र के नाम पर मुकदमा जीतने और खोया प्यार दिलाने की गारंटी देता है.

कई जगह तो महिलाएं भी ऐसे कथित चमत्कार दिखाती हैं कि अंधविश्वास में डूबे लोग उन की जयजय कार करते हैं. कई जगह तो इलाज के नाम पर पीडि़त पर अत्याचार भी किए जाते हैं. पीडि़त को लोहे की जंजीरों से पीटा जाता है.

विज्ञान के इस युग में ये कथित बाबा और भोपाभोपी आमजन के विश्वास से खिलवाड़ कर रहे हैं. शिकायत होने पर पुलिस और संबंधित विभागों के अधिकारी कभीकभार इन के खिलाफ काररवाई करते हैं. लेकिन ये काररवाई इतनी हल्की होती है कि ढोंगी बाबाओं पर कोई असर नहीं पड़ता.

कुछ दिन के बाद ये लोग फिर अपनी दुकान जमा लेते हैं. अपने ही लोगों के माध्यम से ये भक्तों का ऐसा मायाजाल बुनते हैं कि दुखी, पीडि़त लोग इन की चौखट पर माथा टेकने पहुंच जाते हैं और फिर शुरू कर देते हैं आस्था के नाम पर लोगों को ठगना.

अंधविश्वास की इस कमाई से आजकल दूर देहात के गांव और पहाड़ों में रहने वाले ये कथित बाबा भी हाईटेक हो गए हैं. उन के पास नएनए मौडल के मोबाइल फोन और लैपटाप के अलावा अपने वाहन तक हैं. राजस्थान में ढोंगी बाबाओं की बाढ़ सी आ गई है.

कई तो चमत्कारिक तरीके से लोगों का इलाज करने का दावा करते हैं. यहां पर हम ऐसे ही एक कथित बाबा के बारे में बताने जा रहे हैं जो अपनी कथित शक्ति के बल पर किसी भी तरह की पथरी चुटकी में निकालने का दावा करता है.

राजस्थान के अलवर जिले में स्थित है विश्व प्रसिद्ध सरिस्का बाघ अभयारण्य. इसी अभयारण्य के मुख्यालय के पास भर्तृहरि का समाधि स्थल है. भर्तृहरि मध्य प्रदेश की रियासत उज्जैन के राजा थे. वह न्यायप्रिय और जनसेवक थे. बाद में वह भोगविलास में उलझ गए. जब उन्हें अपनी गलती का पश्चाताप हुआ तो वह राजपाट छोड़ कर जंगलों में चले गए. बाद में उन्होंने सरिस्का के रमणीक जंगलों में समाधि ले ली. फिर वहीं पर उन का विशाल मंदिर बन गया.

भर्तृहरि बाबा के समाधिस्थल के पास इंदौक गांव है. इस गांव में ढोलमजीरे की आवाज के साथ बंदर की तरह कूदने वाला एक बाबा कथित चमत्कार दिखाता है. नारायण मीणा नाम का यह बाबा किडनी और पित्त की थैली की पथरी मुंह से उगलने के नाम पर पिछले करीब 8 सालों से लोगों को बेवकूफ बना रहा है.

अलवर शहर से करीब 32 किलोमीटर दूर इस गांव के एक छोटे से मंदिर पर बाबा हर बुधवार और शनिवार को दरबार लगाता है. बाबा ने आस्था के नाम पर भक्तों का ऐसा मायाजाल बना रखा है कि उस के दरबार में राजस्थान, दिल्ली, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश आदि राज्यों  से लोग आते हैं.

इस कथित बाबा के गोरखधंधे में 8-10 लोग शामिल हैं. ये लोग मरीज की किडनी या पित्त की थैली की पथरी निकालने से पहले बाकायदा अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट ऐसे देखते हैं जैसे वह कोई डाक्टर हों. इस के कुछ देर बाद ही बाबा अपने मुंह से पथरी के नाम से पत्थर उगल देता है.

society

मजे की बात तो यह है कि अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट में जितनी पथरी बताई जाती हैं, बाबा उतने ही आकार की और उतने ही पत्थर अपने मुंह से उगल देता है.

निर्धारित दिन मरीज जब बाबा के दरबार में पहुंचते हैं तो सब से पहले बाबा के दरबार में अगरबत्ती और प्रसाद चढ़ाने के नाम पर उन से 120 रुपए लिए जाते हैं. यह प्रसाद बाबा के परिवारजन ही मंदिर के बाहर बेचते हैं. इस के बाद बाबा का बेटा प्रत्येक मरीज से नाम पूछता है और उन से 300-300 रुपए लेता है.

फिर सभी मरीजों की कतार लगवा ली जाती है. इस के बाद मजीरे बजते हैं. इन्हीं ढोलमजीरों की तेज आवाज के बीच बंदर की तरह उछलताकूदता हुआ नारायण मीणा नाम का बाबा मंदिर पर पहुंचता है. बाबा मंदिर में कई बार ऐसा दिखावा करता है जैसे कि उस के शरीर में किसी देवता का प्रवेश हो गया है. इस के बाद बाबा मंदिर के चबूतरे पर चुपचाप बैठ जाता है.

बाबा के पास बैठा उस का परिजन मरीज की अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट देख कर उस से पथरी की संख्या पूछता है. कोई मरीज अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट नहीं लाता तो उस से मुंहजबानी पूछा जाता है कि पथरी कहां और कितनी हैं. इस के बाद रिपोर्ट देखने वाला वह व्यक्ति बाबा को अंगुलियों से इशारा करता है.

इस बीच वही व्यक्ति बालों की बनी रस्सी मरीज के शरीर पर उस जगह घुमाताफिराता है. जहां पथरी बताई गई है. फिर बाबा को एक आदमी पानी पिलाता है. इस के बाद बाबा वहां बैठे अपने परिजन के हाथ में थमी हुई थाली में अपने मुंह से छोटेछोटे पत्थर उगल देता है. इन पत्थरों की संख्या उतनी ही होती है, जितनी मरीज ने अपने शरीर में पथरी बताई थीं.

आमतौर पर इन पत्थरों की संख्या एक या 2 होती है. इन पत्थरों को बाबा का परिजन कागज की एक पुडि़या में बांध कर मरीज को दे देता है और कहता है कि ये लो पथरी निकल गई है.

पर हाल ही में एक स्टिंग औपरेशन में इस बाबा की करतूत सामने आ गई है. इस स्टिंग औपरेशन में अलवर जिले के राजगढ़ के थाना राजाजी निवासी बबली सैनी का जिला अस्पताल में अल्ट्रासाउंड कराया गया.

अल्ट्रासाउंड में बबली सैनी की दाईं किडनी में 3 और बाईं किडनी में एक पथरी बताई गई. बबली की यह अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट देख कर मंदिर में कथित बाबा ने अपने मुंह से पत्थर के 3 टुकड़े उगल कर उसे थमा दिए. इस के बाद बबली सैनी का दोबारा अलवर के जिला अस्पताल में अल्ट्रासाउंड कराया तो उस की दोनों किडनियों में चारों पथरियां मौजूद मिलीं.

स्टिंग औपरेशन में इस कथित बाबा ने एक मीडियाकर्मी को भी अपने मुंह से एक पत्थर का टुकड़ा उगल कर दे दिया जबकि उस मीडियाकर्मी के कोई पथरी नहीं थी. बाबा की करतूत उजागर करने के लिए दरबार में पहुंचे मीडियाकर्मी से जब बाबा के परिजन ने अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट मांगी तो उस ने कहा कि रिपोर्ट घर पर रह गई है. लेकिन पेट में साढ़े 6 एमएम की पथरी है.

इस पर बाबा ने अपने मुंह से पथरी के नाम पर पत्थर का एक टुकड़ा उगल दिया. इन पत्थरों की जांच कराई गई तो ये नदियों में बजरी के साथ निकलने वाले कंकड़ पत्थर निकले. बाबा के इस कथित चमत्कार के पीछे का सच यह है कि उसी के परिवार के 8-10 लोग इस पूरे ढोंग को अंजाम देते हैं.

अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट देखने के बाद मरीज से पथरी की संख्या पूछ कर बाबा का परिजन इशारे से बाबा को पथरी की संख्या बताता है इसी के साथ दूसरा आदमी उस मरीज के शरीर पर पथरी वाली जगह पर बालों को बनी एक रस्सी घुमाताफिराता है. इसी दौरान बाबा कथित चमत्कार दिखाते हुए अपने मुंह से पथरी के नाम पर उतने ही कंकड़पत्थर उगल देता है.

बाबा दरबार में पहुंचने से पहले अपने मुंह में छोटेछोटे कंकड़पत्थर दबा कर लाता है. इसीलिए पथरी निकालने के ढोंग के दौरान वह किसी से बात तक नहीं करता. जब उस के मुंह में पत्थर खत्म हो जाते हैं. तब वह चादर ओढ़ कर एक तरफ बैठ जाता है. उस चादर की आड में वह फिर से अपने मुंह में पत्थर भर लेता है.

पथरी निकालने का दावा करने के बाद बाबा के परिजन उस मरीज को भभूत की एक पुडि़या देते हैं. साथ ही यह भी कह देते हैं कि भर्तृहरि धाम जा कर वहां से एक और भभूत की पुडि़या ले कर पानी में मिला कर पीनी है. इस के बाद भगवान शंकर का जल और दूध से अभिषेक कर के और बंदरों को चने खिलाने हैं.

मछली को गुंथा हुआ आटा और गाय को ढाई किलो दलिया खिलाना है. कन्या को भोजन करा कर दक्षिणा देनी है. फिर चीटिंयों को मीठा आटा डालना है.

बाबा का यह कथित चमत्कार सप्ताह में 2 दिन और महीने में 8 दिन चलता है. हर बार मोटे तौर पर 250 से 300 मरीज वहां पहुंचते हैं. इस तरह बाबा का परिवार लोगों को बेवकूफ बनाकर हर महीने करीब 4 लाख रुपए तक ठग रहा है.

चिकित्सा विशेषज्ञों का कहना है कि मानव शरीर में सामान्य तौर पर पथरी पित्त की थैली यानी गाल ब्लेडर और किडनी में बनती है. मैडिकल साइंस में पित्त की थैली की पथरी को आमतौर पर औपरेशन से निकाला जाता है. किडनी की पथरी एवं यूरिनरी सिस्टम, यूरेटर और ब्लेडर की पथरियों का इलाज उन के आकार और स्थान पर निर्भर करता है.

society

कानूनी रूप से औषधि और जादुई उपचार अधिनियम 1954 आपित्तजनक विज्ञापन तथा औषधि प्रसाधन अधिनियम 1940 के अंतर्गत जादूटोना, चमत्कार आदि से इलाज करना प्रतिबंधित है. ऐसे मामलों में चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग सीधे तौर पर काररवाई कर सकता है.

पहली बार पकड़े जाने पर 6 महीने तक और दूसरी बार पकडे़ जाने पर एक साल तक की सजा का प्रावधान है. इस अधिनियम में पथरी, अंधता, कैंसर, मिर्गी, डायबिटीज, बहरापन, मोतियाबिंद सहित 54 बीमारियों को शामिल किया गया है. इतना सब कुछ होने के बावजूद कथित चमत्कारी बाबा आस्था के नाम पर लोगों को ठग कर खूब फलफूल रहा है.

अपने ब्वौयफ्रेंड के साथ मुंबई पहुंची प्रियंका चोपड़ा

बौलीवुड एक्ट्रेस प्रियंका चोपड़ा और अमेरिकन सिंगर निक जोनस के रिश्ते की खबरें पिछले कुछ वक्त से चर्चा में है. कुछ दिन पहले निक और प्रियंका एक दूसरे को डेट करते हुए नजर आए थे जिसके बाद से ऐसी खबरें सामने आ रही हैं कि दोनों एक दूसरे के साथ रिलेशनशिप में हैं. वहीं, शुक्रवार को प्रियंका अमेरिकी गायक एवं गीतकार निक जोनास के साथ मुंबई पहुंची.

35 साल की प्रियंका चोपड़ा ने एयरपोर्ट पर मीडिया से बचने की कोशिश की. फोटोग्राफर दोनों की केवल हल्की सी झलक ही कैमरे में कैद कर सके. उन्हें बाद में कार से बाहर निकलते देखा गया. बता दें, पिछले साल दिसंबर में जोनास ने ‘जुमांजी : वेलकम टू द जंगल’ के प्रचार के दौरान भारत आने की इच्छा जाहिर की थी. आपको बता दें कि मिस वर्ल्ड रह चुकी एक्ट्रेस प्रियंका चोपड़ा पिछले कुछ वक्त यूएस में है और हौलीवुड इंडस्ट्री में काम कर रही हैं.

bollywood

प्रियंका और निक दोनों ही एक दूसरे की इंस्टाग्राम पोस्ट को लाइक कर रहे हैं और एक दूसरे की पोस्ट्स पर कमेंट भी कर रहे हैं. गौरतलब है कि हाल ही में अमेरिकी गायक निक जोनास और प्रियंका चोपड़ा को कैलिफोर्निया के वेस्ट हौलीवुड में एक साथ देखा गया था, जिससे दोनों की डेटिंग खबरों को बल मिला है. बता दें, प्रियंका ने पिछले कुछ वक्त में अपनी शादी की खबरों का तो खंडन किया था, लेकिन उन्होंने कभी भी अपने रिलेशनशिप के बारे में कभी खुलासा नहीं किया.

शादी के बाद भी इसी तरह प्यार करूंगा

Chammak Challo

VIDEO : रोज के खाने में स्वाद जगा देंगे ये 10 टिप्स

ऐसे ही वीडियो देखने के लिए यहां क्लिक कर SUBSCRIBE करें गृहशोभा का YouTube चैनल.

क्या बदल सकता है भारत का चुनावी समीकरण?

एक प्राइवेट कंपनी में एकाउंटेंट सचिन अरोड़ा की उस दिन छुट्टी थी, इसलिए उस ने सोचा क्यों न कुछ देर फेसबुक में ही समय गुजारा जाए. अभी उस ने फेसबुक खोला ही था कि सामने एक खूबसूरत तसवीर के साथ एक आकर्षक इबारत चमकी, ‘जानिए आप की शक्ल देशविदेश के किस महान एक्टर से मिलती है.’

सचिन को हमेशा यह खुशफहमी रही थी कि उस की शक्ल विनोद खन्ना से /मिलती है, इसलिए उस ने यह पढ़ते ही सोचा क्यों न आजमा कर देख लिया जाए कि उस का अनुमान सही भी है या नहीं. अत: उस ने तुरंत उस पौइंट पर क्लिक कर दिया, जहां से यह जानने के लिए कदम दर कदम आगे बढ़ना था.

पहली क्लिक के बाद ही बारीक अक्षरों में लिखी यह बात सामने आई कि अगर आप इस मनोरंजक क्विज में भाग लेते हैं तो इस ऐप को, जिस ने यह क्विज डेवलप की है, क्या मिलेगा? साथ ही जवाब में लिखा था, आप की सार्वजनिक प्रोफाइल, तसवीरें और आप के कमेंट.

सचिन ने सोचा ऐसी कौन सी खास चीजें हो सकती हैं. इसलिए वह नेक्स्ट के बाद नेक्स्ट बटन क्लिक करता गया. हालांकि उसे बाद में निराशा हुई, क्योंकि ऐप ने उसे हौलीवुड के एक्टर टौम हैंक जैसा बताया था, जिसे वह जानता तक नहीं था.

बहरहाल, इस पहेली में टाइम पास कर के सचिन यह सब भूल गया था, लेकिन कुछ महीनों बाद उसे तब आश्चर्य हुआ जब एक असहिष्णुता संबंधी औनलाइन वोटिंग में उस ने अपने आप को उन लोगों के विरुद्ध मोर्चाबंदी करते हुए पाया, जो सरकार की सांस्कृतिक गतिविधियों में हस्तक्षेप कर रहे थे.

सचिन को तो शायद यह पूरा मामला पता ही नहीं चलता, अगर उस के एक दोस्त ने व्यंग्य करते हुए यह न कहा होता कि आजकल कलाकारों का बहुत विरोध कर रहे हो. सचिन को इस से ही पता चला कि उस के नाम और तसवीरों का किसी ने दुरुपयोग किया है.

दरअसल, हाल के सालों में हम ने भले ही ध्यान न दिया हो, लेकिन फेसबुक में इस तरह के खेलों की बाढ़ आ गई है, जिस में कहा जाता है कि जानिए आप किस हीरो की तरह लग रहे हैं? पिछले जन्म में क्या थे? या आप उद्योगपति होते तो किस के जैसे होते? या फिर आप खिलाड़ी के रूप में किस खेल के लिए ज्यादा उपयुक्त हैं? ऐसी तमाम पहेलियों में भाग लेने के लिए आमंत्रित करने वाले कार्यक्रमों की इंटरनेट में बाढ़ आ गई है. इन में लोग रुचि से भाग भी लेते हैं.

सब से पहले इस तरह के सवाल आने शुरू हुए थे— आप 60 साल बाद कैसे दिखेंगे? आप की जोड़ी किस हीरोइन या हीरो के साथ जमती है? मनोवैज्ञानिक रूप से आकर्षित करने वाले टाइमपास खेलों की यह शृंखला लगातार बढ़ती गई तो ऐसा यूं ही नहीं हुआ, बल्कि इस के पीछे एक पूरी साजिश थी.

दरअसल, आम लोग भले ही न जानते हों लेकिन इन खेलों के जरिए पर्सनल डाटा चुराने का बहुत ही सोचासमझा खेल चल रहा था. इस डाटा चोरी की बात शायद इतनी डरावनी नहीं लगती, अगर पिछले दिनों इस बात का खुलासा न होता कि इसी तरह डाटा चुरा कर कुछ कंपनियों ने डोनाल्ड ट्रंप को अमेरिका का राष्ट्रपति बनवा दिया है.

जी हां, ये सब उन साइको प्रोफाइल विकसित करने वाली कंपनियों का खेल है, जिस को ले कर आज पूरी दुनिया में हंगामा है. वास्तव में ये कंपनियां आम लोगों को सोशल मीडिया में विशेषकर फेसबुक जैसे लोकमंच में मनोवैज्ञानिक रूप से फांसती हैं.

अपने सहज मानवीय आकर्षण वाले सवालों के जरिए ये कंपनियां लोगों को अपने जाल में फांस कर उन का प्रकट रूप में तो मनोरंजन करती हैं, लेकिन इस मनोरंजन के पीछे उन का असली मकसद इन लोगों की मेल आईडी, तसवीरें और तमाम पर्सनल जानकारियां हासिल करना होता है.

बाद में एकत्र की गई इन प्रोफाइल जानकारियों को ये कंपनियां कारपोरेट सेक्टर से ले कर विभिन्न मार्केटिंग एजेंसियों तक को बेच देती हैं. अब यह खुलासा इसलिए खौफनाक लगने लगा है, क्योंकि पता चला है कि ये अपना डाटा राजनीतिक पार्टियों को भी बेचती हैं और वे इस डाटा के जरिए मतदाताओं का ब्रेनवाश कर के मनपसंद नतीजे हासिल करने की कोशिश करती हैं.

2 बड़े अखबारों के स्टिंग से घबराई भाजपा, कांग्रेस 

गत 17 मार्च, 2018 को अमेरिका और ब्रिटेन के 2 अखबारों ने जब इस बात का खुलासा किया कि अमेरिकी चुनावों में मौजूदा राष्ट्रपति ट्रंप के पक्ष में इस तरह के खेल का किस तरह से इस्तेमाल किया गया तो पूरी दुनिया में हड़कंप मच गया. इस खुलासे के बाद भारत में भी हंगामा मचा हुआ है.

देश की दोनों मुख्य राजनीतिक पार्टियां भाजपा और कांग्रेस डर रही हैं कि कहीं अमेरिका की तरह यहां भी अगले साल होने वाले चुनाव में राजनीतिक फायदे के लिए इस तरह के तथ्यों का इस्तेमाल न किया जाए. इसीलिए दोनों पार्टियां एकदूसरे पर आरोप लगा रही हैं कि वे देश के आम मतदाताओं का निजी डाटा हासिल कर के उन का राजनीतिक ब्रेनवाश कर रही हैं. हालांकि चुनाव आयुक्त ए.के. रावत ने साफतौर पर इनकार करते हुए कहा है कि ऐसा कुछ नहीं हो रहा, न हो सकता है.

लेकिन अमेरिका में घटी घटना ने साबित कर दिया है कि जब अमेरिकी मतदाताओं का ब्रेनवाश हो सकता है तो हिंदुस्तानी मतदाताओं का क्यों नहीं?

कांग्रेस ने तो भाजपा पर आरोप भी लगा दिया है कि भाजपा ने 2014 का चुनाव फेसबुक के जरिए इसी तरह से मतदाताओं का ब्रेनवाश कर के जीता था. हालांकि इस के लिए डाटा चोरी का आरोप नहीं लगाया गया. बहरहाल, डर की यह पूरी कहानी कहां और कैसे सामने आई, इस पर हम आगे बात करेंगे. फिलहाल अमेरिका में डाटा लीक के दुरुपयोग के जरिए जो डर पूरी दुनिया के सामने आया है, वह यह है कि इस साल और अगले साल दुनिया के 2 दरजन देशों में होने जा रहे आम चुनावों में इंटरनेट कंपनियां हारजीत का फैसला कर सकती हैं.

कुल मिला कर यह डर वैसा ही है, जैसा 1970 के दशक में हुआ करता था. तब राजनीतिक पार्टियों को लगता था कि उन के धाकड़ विरोधी जीतने के लिए बूथ कैप्चरिंग कर लेंगे. यह भी एक किस्म से कैप्चरिंग की ही आशंका है.

फर्क बस यह होगा कि तब भौतिक रूप से लठैतों और हथियारों की बदौलत यह काम होता था और अब आशंका है कि सोशल मीडिया के मनोवैज्ञानिक कब्जे के जरिए यह खेल खेला जाएगा. बहरहाल, यह आशंका कहां से पैदा हुई और कैसे कदम दर कदम आगे बढ़ी, इस का सिलसिला कुछ यूं शुरू होता है.

वाट्सऐप के को-फाउंडर ब्रायन एक्टन ने फैलाई सनसनी

21 मार्च, 2018 को शाम 5 बज कर 18 मिनट पर किए गए अपने एक ट्वीट से मैसेजिंग ऐप वाट्सऐप के को-फाउंडर ब्रायन एक्टन ने तब हड़कंप मचा दिया, जब उन्होंने सभी से अपना फेसबुक एकाउंट डिलीट करने को कहा. एक्टन ने ट्वीट किया, ‘यह डिलीट फेसबुक का वक्त है.’

एक्टन का यह ट्वीट ऐसे समय में आया, जब पौलिटिकल डाटा एनालिस्ट कंपनी कैंब्रिज एनालिटिका पर अमेरिका के 5 करोड़ फेसबुक यूजर्स का डाटा चुरा कर, उस का गलत इस्तेमाल करने का आरोप लगा था.

अमेरिकी अखबार न्यूयार्क टाइम्स और ब्रिटेन के अखबार औब्जर्वर के एक संयुक्त स्टिंग से यह खुलासा हुआ है कि ब्रिटेन की कैंब्रिज एनालिटिका नामक कंपनी ने फेसबुक के 5 करोड़ यूजर्स के बारे में विस्तृत जानकारियां एकत्र कर के उन की अनुमति के बिना उन का दुरुपयोग किया.

यह सब 2016 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के समय हुआ और माना जाता है कि डोनाल्ड ट्रंप को राष्ट्रपति बनवाने के लिए किया गया. स्टिंग के मुताबिक कंपनी ने एक ऐप बनाया और उस के जरिए इन जानकारियों का कई किस्म से दुरुपयोग किया. मालूम हो कि इस कंपनी ने ऐप के जरिए वोटरों के व्यवहार की भविष्यवाणी की थी, जिस में डोनाल्ड ट्रंप को जीतता हुआ बताया गया था.

इस खुलासे के बाद से माना जा रहा है कि फेसबुक मुश्किल में है. चूंकि कैंब्रिज एनालिटिका ने यह डाटा फेसबुक से हासिल किया था, इस वजह से यह आशंका जताई जा रही है कि फेसबुक में किसी का भी डाटा सुरक्षित नहीं है.

इस आशंका का एक कारण यह भी है कि स्टिंग से यह भी पता चलता है कि कंपनी के पास 5 और देशों के फेसबुक यूजर्स का डाटा है, जिस में से एक देश भारत भी है. इस असुरक्षा के बाद अब बड़ा सवाल यह पैदा हो गया है कि क्या फेसबुक जिंदा भी रहेगा या बंद हो जाएगा?

लेकिन सवाल यह भी है कि अगर फेसबुक बंद हो गया तो इस प्लेटफार्म में मौजूद असंख्य अनंत डाटा का क्या होगा? लोगों के एकाउंट में मौजूद अपार जानकारियों, तसवीरों और वीडियोज का क्या होगा? क्या फेसबुक का हश्र भी सोशल मीडिया वेबसाइट माईस्पेस डौटकौम जैसा होगा?

गौरतलब है कि माईस्पेस डौटकौम पर भी साल 2011 में इसी तरह डाटा बेचने का आरोप लगा था. माना गया था कि उस ने भी अपने यूजर्स के डाटा को चोरीछिपे एक एजेंसी को बेच दिया था.

क्या होगा फेसबुक का और उस के यूजर्स के डाटा का

इस आरोप के बाद जिस माईस्पेस डौटकौम को साल 2005 में रूपर्ट मर्डोक ने 58 करोड़ डालर में खरीदा था, उसे साल 2011 में महज 3.5 करोड़ डालर में बेचना पड़ा. क्योंकि इस खुलासे के बाद साइट की विश्वसनीयता बिलकुल खत्म हो गई थी. नतीजतन उस की सदस्य संख्या नहीं बढ़ रही थी. यही कारण था कि रूपर्ट की कंपनी न्यूज कारपोरेशन को मजबूरी में अपनी इस कंपनी को औनलाइन विज्ञापन कंपनी स्पेसिफिक मीडिया को बेचना पड़ा था.

लेकिन माईस्पेस डौटकौम को तो फिर भी ग्राहक मिल गया था, मगर क्या फेसबुक को भी कोई ग्राहक मिल पाएगा? यह इसलिए भी संभव नहीं है, क्योंकि दोनों के आकार में जमीनआसमान का फर्क है.

जब माईस्पेस डौटकौम को बेचना पड़ा था, उस समय उस की सदस्य संख्या महज 3 करोड़ के आसपास थी, जबकि फेसबुक के सदस्यों की संख्या इस समय करीब 2.1 अरब है. इस में इस के सक्रिय उपभोक्ताओं की संख्या 1 अरब 40 करोड़ है. ये फेसबुक के वे सदस्य हैं, जो हर दिन फेसबुक का चक्कर काटते हैं.

यही वजह है कि दुनिया की कोई भी कारपोरेट कंपनी फिलहाल फेसबुक के अधिग्रहण की नहीं सोच पा रही. लेकिन स्टिंग औपरेशन से हुए खुलासे ने फेसबुक की नींव हिला कर रख दी है. इस खुलासे के  बाद फेसबुक के शेयरों में भारी गिरावट आई है.

इन पंक्तियों के लिखे जाने तक यह गिरावट 8 फीसदी से ज्यादा हो चुकी थी, जिस के कारण मार्क जकरबर्ग को 350 अरब रुपए से ज्यादा का नुकसान हो चुका है, जबकि कंपनी को अब तक इस से 600 फीसदी से ज्यादा का नुकसान हो चुका है. इस वजह से भी कारपोरेट दुनिया में फेसबुक के भविष्य को ले कर हड़कंप मचा हुआ है.

बहरहाल, फेसबुक के अस्तित्व की आशंकाओं और अनुमानों वाले सवालों के जवाब हम बाद में जानेंगे, पहले हम इस विषय पर बात करते हैं कि आखिर हम इस सब पर बात ही क्यों कर रहे हैं?

अमेरिका और ब्रिटेन के इन 2 अखबारों के इस साझा स्टिंग से आखिर हमारा क्या लेनादेना? लेनादेना है, जैसा कि पहले ही लिखा जा चुका है कि इस स्टिंग से पता चलता है कि कैंब्रिज एनालिटिका ने सिर्फ अमेरिका के फेसबुक यूजर्स का ही डाटा नहीं चुराया है, बल्कि उस ने ब्रिटेन, दक्षिण कोरिया और भारत सहित 5 देशों के फेसबुक यूजर्स के डाटा की चोरी की है.

हकीकत पर परदा डालने की कोशिश

हालांकि कैंब्रिज एनालिटिका ने इस का खंडन किया है, लेकिन इस स्टिंग के प्रकाश में आने के बाद भारत के कानून और सूचना मंत्री रविशंकर प्रसाद ने साफसाफ कहा है कि यदि फेसबुक डाटा का दुरुपयोग भारतीय चुनावों को प्रभावित करने की कोशिश में किया गया तो यह कतई सहन नहीं किया जाएगा. उन्होंने 17 मार्च, 2018 को इस खुलासे के बाद फेसबुक को कड़ी चेतावनी दी, जिस में यहां तक कहा कि अगर जरूरत पड़ी तो भारत सरकार फेसबुक के विरुद्ध कड़े से कड़ा कदम उठाएगी.

हालांकि कैंब्रिज एनालिटिका ने कहा है कि उस ने फेसबुक के भारतीय उपभोक्ताओं का कोई डाटा नहीं चुराया है और न ही उस का चुनाव को प्रभावित करने का कोई इरादा है. फेसबुक के मालिक जकरबर्ग ने तो इस संबंध में भारत से स्पष्ट तौर पर माफी भी मांगी है और फेसबुक में डाटा संबंधी सुरक्षा को और मजबूत करने की बात भी कही है.

फिर भी अगर इस सब से भारत के राजनीतिक गलियारों में एकदूसरे के विरुद्ध आरोपप्रत्यारोप का सिलसिला थम नहीं रहा तो इस के पीछे बड़ी वजह यही है कि सभी राजनीतिक पार्टियां डरी हुई हैं कि साल 2019 के लोकसभा चुनाव में मतदाताओं के मतों का अपहरण करने की कोशिश की जा सकती है.

इस आशंका की वजह से देश की दोनों बड़ी राजनीतिक पार्टियों— कांग्रेस और भाजपा का एकदूसरे पर यह आरोप लगाना है कि उस का कैंब्रिज एनालिटिका से संबंध है. भारतीय जनता पार्टी की तरफ से कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने सवाल उठाया है कि आखिर कांग्रेस का कैंब्रिज एनालिटिका से इस कदर प्रेम क्यों है?

भाजपा की तरफ से कांग्रेस पर यह भी आरोप लगाया गया है कि राहुल गांधी की सोशल मीडिया प्रोफाइल में कैंब्रिज एनालिटिका की क्या भूमिका है? क्या कांग्रेस अब चुनाव जीतने के लिए डाटा चोरी का इस्तेमाल करेगी, जैसा कि इस कंपनी ने अमेरिका में किया. चूंकि हाल ही में राहुल गांधी के ट्विटर पर फालोअर्स की संख्या काफी बढ़ी है तो भाजपा का आरोप यह भी है कि ये फरजी फालोअर्स हैं, जिन्हें ऐसे ही डाटा जगलरी के जरिए हासिल किया गया है.

कांग्रेस की सफाई और आरोप में दम है

इस पर कांग्रेस के प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने भाजपा की खबर ली है. उन्होंने भाजपा को इन आरोपों के बदले खूब खरीखोटी सुनाई है. सुरजेवाला के मुताबिक भाजपा फेक न्यूज की फैक्ट्री है, वही इस तरह की कंपनियों का सहारा लेती है.

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने या कांग्रेस के अध्यक्ष ने कभी भी इस कंपनी की किसी भी तरह की कोई मदद नहीं ली है. अगर स्वतंत्र रूप से कैंब्रिज एनालिटिका के दावों की बात करें तो उस का कहना है कि साल 2010 में बिहार विधानसभा चुनाव में उस ने काम किया था.

कैंब्रिज एनालिटिका की वेबसाइट में मौजूद विवरण में एक जगह यह दावा किया गया है कि हमारे प्रयासों से हमारे ग्राहक की बड़ी जीत हुई. हम ने जितना टारगेट किया, उस की 90 फीसदी सीटें हमारे क्लाइंट को मिलीं. अगर इतिहास में पीछे मुड़ कर जाने की कोशिश करें कि साल 2010 में बिहार विधानसभा में किस को जीत मिली थी तो निश्चित रूप से वह भाजपा और जेडीयू का गठबंधन था, जिसे भारी बहुमत मिला था.

जनता दल यूनाइटेड ने तब 141 सीटों पर चुनाव लड़ा था और 115 सीटें जीती थी जबकि भारतीय जनता पार्टी जिस ने सिर्फ 102 सीटों पर चुनाव लड़ा था, उस ने 91 सीटें जीती थीं. इस तरह देखा जाए तो तथ्यात्मक रूप से यह भारतीय जनता पार्टी है, जिस ने 2010 के विधानसभा चुनाव में 90 फीसदी सीटें जीती थीं. इस तरह कैंब्रिज एनालिटिका के दावे में वही फिट हो रही है.

यही नहीं, रणदीप सुरजेवाला का यह भी कहना है कि साल 2010 में कैंब्रिज एनालिटिका की इंडियन पार्टनर ओवलेनो बिजनैस नाम की कंपनी वास्तव में भाजपा की साथी पार्टी के सांसद के बेटे की थी और तब ओबीआई की सेवाओं का राजनाथ सिंह ने अपने लिए इस्तेमाल किया था.

रणदीप सुरजेवाला भाजपा पर आरोप लगाते हैं कि भाजपा फेक स्टेटमेंट, फेक कौन्फ्रैंस के साथसाथ फेक डाटा का सहारा लेने वाली पार्टी है. इसी क्रम में कांग्रेस आईटी सेल की प्रभारी दिव्या स्पंदना का कहना है कि कैंब्रिज एनालिटिका राइट विंग पार्टियों के साथ मिल कर काम करती है, लिबरल्स के साथ नहीं और सब को पता है कि राइट विंग कौन है.

कुल मिला कर अब यह डाटा लीक इतना डरावना क्यों है, इसे समझ लेते हैं. दरअसल, भारत में फेसबुक के करीब 20 करोड़ सक्रिय उपभोक्ता हैं, जिस में ज्यादातर की उम्र 18 से 35 साल के बीच है.

समाजशास्त्रियों और मनोविदों का मानना है कि ये लोग राजनीतिक दलों द्वारा फैलाई गई अफवाहों को सच मान लेते हैं और उसी के मुताबिक उन के बारे में अपनी राय बना लेते हैं.

कहने का मतलब यह है कि ये लोग तात्कालिक माहौल के प्रभाव में आ कर अपना मतदान करते हैं. ऐसे में आशंका है कि परदे के पीछे रहने वाली ये डाटा विश्लेषक कंपनियां चोरी से हासिल किए गए डाटा के जरिए आगामी चुनावों में अपनी सेवा लेने वाली राजनीतिक पार्टियों को कृत्रिम माहौल बना कर जिताने की कोशिश करेंगी, जैसा कि आरोप है कि 2 साल पहले अमेरिका में ट्रंप के लिए ऐसा माहौल बनाया गया.

क्या भारतीय वोटरों को भ्रमित कर के मतदान कराया जाएगा?

चूंकि भारत में 20 करोड़ से ज्यादा फेसबुक के सक्रिय उपभोक्ता हैं और उन में से 90 फीसदी 35 साल से कम उम्र के हैं. ये उपभोक्ता आमतौर पर हमेशा अपने जैसे तमाम दूसरे लोगों के साथ जुड़े रहते हैं और इस तरह एकदूसरे की बातों से प्रभावित होते हैं. इसलिए आशंका है कि ऐसी जानकारियों को व्यक्तिगत स्तर पर प्रसारित किया जाएगा, जिस से कि इन लोगों का दिमाग बदल जाए.

चूंकि लोगों का वास्तविक इंटरैक्शन बहुत कम हो गया है, जबकि आभासी मेलमिलाप बहुत बढ़ गया है, इसलिए यह माना जा रहा है कि उपभोक्ता एकदूसरे को प्रभावित करेंगे. लब्बोलुआब यह है कि साल 2019 में राजनीतिक पार्टियां मतदाताओं के बीच अपने लोकप्रिय समर्थन के बजाय आंकड़ों के जोड़तोड़ और भ्रामक माहौल से उपजी भावनात्मक स्थितियों के जरिए चुनाव जीतने की कोशिश करेंगी.

यह भी माना जा रहा है कि साल 2016 में अमेरिका में राष्ट्रपति ट्रंप ऐसे ही चुनाव जीते थे. यही वजह है कि कैंब्रिज एनालिटिका के डाटा चोरी संबंधी खबर के खुलासे से भारत में हड़कंप मच गया है.

इंटरनेट के जानकारों का मानना है कि यह आशंका पूरी तरह से हवाहवाई नहीं है. कैंब्रिज एनालिटिका या कोई भी कंपनी जिस के पास किसी समुदाय विशेष का बड़े पैमाने पर व्यक्तिगत डाटा हो, वह ऐसा माहौल रच सकती है, जिस के मनोविज्ञान में उलझ कर मतदाता वैसा ही निर्णय ले जैसा कि कोई शातिर कंपनी उन से निर्णय लिवाने की कोशिश करे.

स्टिंग औपरेशन के दौरान यह बात सामने आई है कि कैंब्रिज एनालिटिका लोगों के डाटा से उन की साइकोलौजिकल प्रोफाइलिंग करती है और उसी प्रोफाइलिंग के आधार पर किसी उम्मीदवार के समर्थन में या उस के विरोधी के खिलाफ सूचनाएं प्लांट की जाती हैं. कुल मिला कर नतीजा यह होता है कि मत देने वाले मतदाता का मन बदल जाता है और वह अपना वोट उसे दे देता है, जिसे वह इस तरह के प्रभाव में आने के पहले अपना वोट नहीं देना चाहता हो.

मतदाता का मन बदलने का षडयंत्र

यह पूरा किस्सा शायद महज एक अनुमान ही होता, अगर ब्रिटेन के चैनल-4 ने कैंब्रिज एनालिटिका कंपनी के बड़े अधिकारियों का स्टिंग औपरेशन प्रसारित न किया होता. इस प्रसारण के बाद ही पूरी दुनिया को पता चला कि यह कंपनी दुनिया के तमाम राजनीतिक दलों के लिए सोशल मीडिया में कैंपेन चलाती है और अपने क्लाइंट या ग्राहकों को जितवाने के लिए हर वह हथकंडा अपनाती है, जिस से कि मतदाता का मूड बदला जा सके.

फेसबुक और ट्विटर जैसी सोशल मीडिया पर जो लोग ज्यादा से ज्यादा समय बिताते हैं और अपने दिलदिमाग की तमाम बातों को यहां दर्ज करते हैं. ये कंपनियां इन्हीं बातों से इन के मनोविज्ञान का अध्ययन करती हैं. फिर उसी अध्ययन के आधार पर इन्हें भावनात्मक बाहुपाश में कैद करने के लिए चक्रव्यूह रचती हैं. देश की 2 सब से बड़ी राजनीतिक पार्टियां अगर इस डाटा लीक से डरी हुई हैं और एकदूसरे पर गंभीर से गंभीरतम आरोप लगा रही हैं तो इस के पीछे बहुत बड़ा कारण लोगों की साइकोलौजिक प्रोफाइलिंग करने वाली कैंब्रिज एनालिटिका जैसी कंपनियों के कामकाज का तौरतरीका भी है.

इस तरह की कंपनियां सोशल मीडिया प्लेटफार्म से डाटा चुरा कर मनोवैज्ञानिक कैंपेन विकसित करती हैं. यही नहीं, ये कंपनियां नेताओं के भाषण, राजनीतिक पार्टियों के घोषणापत्रों तक को अपने इन्हीं सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक विश्लेषणों के आधार पर तैयार करवाती हैं.

कहने का मतलब यह है कि अगर भाजपा यह घोषणा करे कि वह अगले साल, इस महीने, इस तारीख तक अयोध्या में मंदिर बनवा देगी तो हो सकता है यह भाजपा के नेताओं के बजाए मतदाताओं का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण करने वाली कंपनी का निष्कर्ष हो और जो किसी पार्टी के नेता विशेष के मुंह से जारी हुआ हो.

जकरबर्ग की सीनेट के सामने पेशी

फेसबुक के संस्थापक और सीईओ मार्क जकरबर्ग बहुत बड़ी हस्ती हैं. दुनिया भर में फेसबुक के अरबों यूजर्स हैं, जिन का सीधा लाभ जकरबर्ग की कंपनी को मिलता है. फेसबुक के माध्यम से हुई गलतियों के लिए जकरबर्ग सितंबर 2006 से नवंबर 2011 तक 5 बार माफी मांग चुके हैं.

इस बार तो उन्होंने अमेरिकी सीनेटर्स के सामने माफी मांगी और अपनी गलतियों को सुधारने का वादा भी किया. लेकिन अपने इस वादे पर वह कब तक कायम रहेंगे, कहा नहीं जा सकता.

जकरबर्ग पर सब से बड़ा आरोप यह है कि उन की कंपनी की वजह से 8.7 करोड़ फेसबुक यूजर्स का डाटा लीक हुआ, जिस का चुनाव के समय सीधा लाभ अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को मिला, वरना वह राष्ट्रपति नहीं बन पाते.

इस का सीधा मतलब यह है कि किसी भी देश में, चाहे वह भारत ही क्यों न हो, अमेरिका में बैठे चंद लोग चुनाव के समय फेसबुक यूजर्स का सहारा ले कर चुनाव परिणामों का रुख मोड़ सकते हैं.

यह जितनी गहन चिंता का विषय भारत में है, उतना ही अमेरिका में भी है. इसी के मद्देनजर 11-12 अप्रैल को अमेरिकी सीनेट ने मार्क जकरबर्ग को सीनेटर्स के सामने पेश होने को कहा. मंगलवार और बुधवार को जकरबर्ग सीनेट के सामने पेश हुए, जहां 44 सीनेटर्स को 5-5 मिनट का समय दे कर जकरबर्ग से सवाल पूछने को कहा गया. हालांकि यह मात्र औपचारिकता जैसा था, क्योंकि इतने समय में क्रौस क्वेश्चन नहीं किए जा सकते थे. जबकि यह जरूरी था.

10 घंटे चली इस काररवाई में सीनेटर डिक डर्बिन ने जकरबर्ग से पूछा कि पिछली रात आप किस होटल में ठहरे थे और किसे मैसेज किया था? जवाब में जकरबर्ग ने कहा कि यह निजी मामला है, जिसे मैं सार्वजनिक नहीं करना चाहूंगा. इस पर डर्बिन बोले, ‘डाटा लीक का मामला भी निजता से जुड़ा है.’

लंबी चली सवालजवाबों की इस फेहरिश्त के दौरान जकरबर्ग ने अपनी गलती सुधारने का वादा करते हुए कहा कि फेसबुक यह तय करेगा कि आने वाले साल में भारत, पाकिस्तान, हंगरी, ब्राजील और अमेरिका में होने वाले चुनावों में फेसबुक का दुरुपयोग न हो.

इस सुनवाई की वजह था ब्रिटिश फर्म कैंब्रिज एनालिटिका द्वारा फेसबुक के 8.7 करोड़ यूजर्स का डाटा लीक करने का मामला, जिस का इस्तेमाल अमेरिकी चुनाव में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के पक्ष में हुआ बताया जाता है.

जकरबर्ग ने हर गलती को स्वीकारते हुए माफी मांगी और कहा कि फेसबुक को मैं चलाता हूं, इस के माध्यम से जो भी गलती हुई या होगी, उस के लिए जिम्मेदार भी मैं ही रहूंगा.

जकरबर्ग ने अपनी कंपनी को ले कर कई दावे भी किए, लेकिन न्यूयार्क टाइम्स ने उन की हकीकत बताते हुए उन दावों को गलत बताया. मसलन जकरबर्ग ने कहा कि फेसबुक काल का डाटा स्टोर नहीं करता, जबकि हकीकत यह है कि फेसबुक एंड्रायड फोन के काल और एसएमएस तक के रिकौर्ड रखता है.

उधर सीएनएन का कहना है कि जकरबर्ग की पेशी महज एक दिखावा है. इस मौके पर जकरबर्ग ने यह भी कहा कि उन की कंपनी कैंब्रिज यूनिवर्सिटी के न्यूरो साइंटिस्ट अलेक्सांद्र और कैंब्रिज एनालिटिका पर मुकदमा करने की सोच रही है. लेकिन इस पर कुछ सीनेटर्स ने कहा कि उन्हें शंका है कि ऐसा होगा.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें