अपनी ही शादी में बेहोश हो गई थी ये एक्ट्रेस

बॉलीवुड का एक वो समय भी था, जब पर नीतू कपूर हिंदी सिनेमा पर राज किया करती थीं. उनकी फिल्में, उनकी एक्टिंग, उनकी खूबसूरती, उनकी अदाएं इन सभी ने, जाने किस-किस को दीवाना बनाया हुआ था. नीतू जितनी खूबसूरत अपने समय में थीं, आज उतनी ही खूबसूरती हैं. उनकी सादगी और सुंदरता में कोई कमी नहीं आई है.

यूं तो नीतू 59 साल की हो चुकी हैं, पर उनकी फैन फॉलोइंग इतनी तगड़ी है, जो किसी नौजवान सितारे से कम नहीं है. ये नीतू की अदाएं और खूबसूरती ही है जो ऋषि कपूर को उनका दीवाना बना गई. आज भी दोनों बॉलीवुड के सबसे हैप्पी मैरिड कपल में सबसे आगे आते हैं.

इस शादी ने तोड़े थे लाखों लड़कियों के दिल

ऋषि कपूर और नीतू की शादी, बॉलीवुड की सबसे शोकिंग शादी थी. उनकी और ऋषि कपूर की लव स्टोरी में बहुत कुछ दिलचस्प बातें भी थी. ऋषि कपूर के शादी करते ही जाने कितनी ही लड़कियों के दिल टूट गए थे.

सबसे पॉपुलर जोड़ी

उस दौर में नीतू कपूर और ऋषि कपूर की जोड़ी काफी पॉपुलर थी. इन दोनों ने कई फिल्मों में साथ काम किया था. नीतू जब महज 14 साल की थी, तभी से वे ऋषि को डेट करने लगी थी. इन दोनों की साथ में पहली फिल्म ‘जहरीला इंसान’ थी. लेकिन ये फिल्म ज्यादा हिट नहीं हुई थी.

ऐसा कहा जाता है कि अपने समय में शूटिंग करते समय, नीतू को ऋषि सेट पर काफी छेड़ा करते थे, जिसपर नीतू काफी चिढ़ जाया करती थीं. लेकिन बाद में धीरे धीरे दोनों के बीच नजदीकियां बढ़ने लगी.

पहले दोस्ती फिर प्यार

दोस्ती से प्यार में बदला ये रिश्ता फिल्म ‘खेल खेल में’ में से ही बदला. ‘खेल खेल में’ के रिलीज होने के बाद बॉलीवुड में इन दोनों के प्यार की चर्चाएं शुरू हो गई थीं. एक-दूसरे से करना चाहते थे शादी धीरे धीरे नीतू का कपूर परिवार में आना जाना काफी ज्यादा शुरू हो गया. सब जानते थे कि ये दोनों एक-दूसरे से शादी करना चाहते थे. राज कपूर ने कहा शादी करो सबको पता था कि नीतू ऋषि से शादी करने के लिए काफी सीरियस हैं. दोनों की बढ़ती नजदीकियों को देखकर राज कपूर ने ऋषि से साफ कह दिया था कि यदि वे नीतू से प्यार करते हैं तो उनसे शादी कर लें.

बेहोश हो गईं थीं नीतू

इन दोनों ने 1980 में एक दूसरे से शादी की. ऐसा कहा जाता है नीतू अपनी ही शादी के दिन बेहोश हो गई थीं, जिसका कराण था नीतू का भारी लहंगा, जिसे वो संभाल नहीं पा रही थीं.

ऋषि कपूर को क्यों आए थे चक्कर

खबरों की मानें तो कुछ ऋषि कपूर के साथ भी ऐसा ही हुआ था. शादी में इतनी भीड़ थी कि उन्हें भी चक्कर आ गए थे. इन दोंनो की शादी बॉलीवुड इंडस्ट्री की सबसे शानदार शादियों में से एक है जिसमें बॉलीवुड की तमाम बड़ी बड़ी हस्तियां शामिल थीं.

क्या आपने देखा खेसारीलाल यादव और याशिका कपूर का यह वीडियो

भोजपुरी फिल्म जगत के सुपरस्टार खेसारीलाल यादव की फिल्म डमरूइसी साल अप्रैल में रिलीज हुई थी. इस फिल्म ने पूरे देशभर में अच्छा कलेक्शन भी किया था. अब इस फिल्म का एक गाना तर तर पसीनाइंटरनेट पर वायरल हो रहा है. 9 दिन पहले यूट्यूब पर अपलोड किए गए इस वीडियो को अब तक 55 लाख से ज्यादा बार देखा जा चुका है. इस गाने में खेसारीलाल के साथ भोजपुरी एक्ट्रेस याशिका कपूर डांस करती हुई नजर आ रही हैं.

दबंग सरकार होगी खेसारीलाल यादव की अगली फिल्म

बता दें, एक अलग तरह के विषय पर बनी फिल्म डमरूने गुदगुदाने के साथ-साथ दर्शकों को खूब हंसाने में भी सफल साबित हुई थी. गौरतलब है कि इन दिनों खेसारी लाल यादव की कई भोजपुरी फिल्मे रिलीज होने के लिए तैयार है. खेसारीलाल की इन फिल्मों में सबसे ज्यादा चर्चा दबंग सरकार की हैं, क्योंकि इस फिल्म में खेसारी लाल यादव ने जबरदस्त बौडी बनाई है. बता दें, ‘दबंग सरकारको भोजपुरी सिनेमा की अब तक की सबसे महंगी फिल्म बताया जा रहा है.

दबंग सरकारके लिए बनाई बौडी

इस फिल्म के लिए खेसारीलाल यादव ने जमकर पसीना बहाया है और मस्कुलर बौडी बनाई है. आपको बता दें, ‘दबंग सरकारमें खेसारीलाल के साथ आकांक्षा अवस्थी और दीपिका त्रिपाठी लीड रोल में हैं. वहीं फिल्म के दो गानों में एक्ट्रेस काजल राघवानी स्पेशल अपीयरेंस देते हुए नजर आएंगी. हाल ही में काजल एक इंटरव्यू में कहा था, ‘मैंने अपना शत प्रतिशत उनको दिया. मुझे खुशी है कि वह एक लाजवाब फिल्‍म लेकर आ रहे हैं. उम्‍मीद करती हूं फिल्‍म दबंग सरकारसुपर डूपर हिट हो.

मालूम हो कि फिल्‍म दबंग सरकारका म्‍यूजिक और सेटेलाइट राइट यशी फिल्‍म्‍स ने खरीदा है. खेसारीलाल यादव की इस फिल्म का निर्देशन योगेश राज मिश्रा कर रहे हैं और फिल्म का निर्माण दीपक कुमार द्वारा किया जा रहा है. योगेश ने खेसारीलाल के बारे में बात करते हुए कहा, “खेसारीलाल यादव इंडस्‍ट्री के पावरफुल अभिनेता हैं. हमने उनकी मेहनत को दबंग सरकारकी शूटिंग के दौरान करीब से देखा, जिसके आधार पर हम कह सकते हैं कि वे आने वाले दिनों में काफी आगे जाने वाले हैं. उनमें काम के प्रति गजब का जुनून है, जो हमें हर शौट में देखने को मिला.”

समर्थन वापसी की व्याख्या

साढ़े तीन साल पहले भारतीय जनता पार्टी ने जम्मू-कश्मीर में राजनीति का जो एक अध्याय शुरू किया था, पिछले मंगलवार की दोपहर उसके समापन की घोषणा हो गई. तब सरकार चलाने के लिए पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी से गठजोड़ की जितनी तरह की राजनीतिक व्याख्याएं हुई थीं, उतनी ही तरह की व्याख्याएं शायद इस संबंध-विच्छेद की भी होंगी. बहुत से लोगों को अभी से इसमें उम्मीद नजर आनी शुरू हो गई है.

यह मानने वालों की तादाद काफी बड़ी है कि अब ऑपरेशन ऑल आउट की सारी बाधाएं खत्म हो चुकी हैं. अब सुरक्षा बलों को अपना काम करने की खुली छूट दी जाएगी और वे आतंकवाद को जड़ से उखाड़ने में पूरी तरह जुट जाएंगे. इस सोच के पीछे कहीं न कहीं यह धारणा भी है कि भाजपा और पीडीपी का गठजोड़ आतंकवादियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई में आड़े आ रहा है. लेकिन भाजपा के इस कदम की एक दूसरी व्याख्या भी है.

यह भी कहा जा रहा है कि जम्मू-कश्मीर में सरकार से समर्थन वापस लेकर पार्टी ने अगले आम चुनाव की राजनीति शुरू कर दी है. इस व्याख्या में कुछ नया नहीं है. आम चुनाव जब पास आने लगता है, तो किसी भी पार्टी के हर कदम की सबसे सुगम व्याख्या यही हो सकती है. ऐसी व्याख्याएं अक्सर गलत भी नहीं होतीं.

यह भी सच है कि पिछले कुछ समय से जम्मू-कश्मीर में जो हो रहा है, उसमें केंद्र सरकार और भाजपा, दोनों के लिए ही कोई बड़ा कदम उठाना और साथ ही कुछ करते हुए दिखना जरूरी हो गया था. प्रदेश सरकार से समर्थन वापस लेकर इसकी शुरुआत कर दी गई है. यह भी तय है कि अगला कदम राष्ट्रपति शासन होगा. मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने इस्तीफा देकर इसका रास्ता भी साफ कर दिया है. यह उम्मीद कम ही है कि वहां वैकल्पिक सरकार बनाने का कोई दावा सामने आए. ऐसे में, इस बदलाव का अर्थ होगा राज्य की बागडोर का केंद्र के हाथ में आ जाना.

केंद्र सरकार अब वहां अपने ढंग से आतंकवाद विरोधी अभियान चलाने को स्वतंत्र होगी. वैसे अभी भी यह अभियान केंद्रीय सुरक्षा बलों और सेना के जरिये ही चलाया जा रहा था. लेकिन इसमें केंद्र सरकार को एक सुविधा मिली हुई थी. वह सफलताओं को अपने खाते में दर्ज करा सकती थी और नाकामियों के आरोप राज्य के मत्थे मढ़ सकती थी. यह सुविधा अब खत्म हो जाएगी. महबूबा मुफ्ती के लिए भी अच्छा है कि वह केंद्र और भाजपा विरोध की राजनीति फिर जोर-शोर से शुरू कर सकेंगी. साझा सरकार का होना उन्हें अभी तक इससे रोक रहा था.

भाजपा ने जब पीडीपी को समर्थन दिया था, तब इसकी एक व्याख्या यह हुई थी कि पीडीपी और नेशनल कांफ्रेंस जैसी पार्टियां जम्मू-कश्मीर का राजनीतिक यथार्थ हैं और इस सच को स्वीकार करके ही वहां की राजनीति आगे बढ़ाई जा सकती है. भाजपा द्वारा पीडीपी को समर्थन देने को इस सच को स्वीकार करने के रूप में ही देखा गया था.

जाहिर है, पिछले साढ़े तीन साल में भाजपा को इस सच की सीमाएं भी नजर आ ही गई होंगी. फिलहाल केंद्र सरकार को बिना ज्यादा राजनीतिक सोच-विचार के कश्मीर घाटी में खुलकर आतंकवाद विरोधी अभियान चलाने का मौका मिल गया है. इससे काफी उम्मीदें भी हैं. लेकिन उसके आगे जब राज्य में फिर से राजनीतिक प्रक्रिया शुरू होगी, तो यह सच और इसकी सीमाएं फिर से सबके सामने खड़ी होंगी.

बकरा : डिंपल और कांता ने ऐसा क्या किया

सुनसान लंबा डग नदी में खूब तैरने के बाद डिंपल और कांता कपडे़ पहन कर जैसे ही शौर्टकट रास्ते से घर जाने लगीं, तो उन की नजर लोहारों के रास्ते चलते गुर, चेला और मौहता पर पड़ी. वे समझ गईं कि ये तीनों लोहारों की औरतों से आंख सेंकने के लिए ही इस रास्ते से आए थे. ‘‘कांता, ये गुर, चेला और मौहता जैसे लोग आज भी इनसान को इनसान से बांटे हुए हैं, ताकि इन का दबदबा बना रहे और इन की रोजीरोटी मुफ्त में चलती रहे. ये पाखंडी लोग औरतों को हमेशा इस्तेमाल की चीज बनाए रखना चाहते हैं.’’

‘‘सब से खास बात तो यह है कि ये लोग गरीबों और औरतों का शोषण करने के लिए देवीदेवता के गुस्से और कसमों के इतनी चालाकी से बहाने गढ़ते हैं कि लोगों में समाया देवीदेवता का डर उन के मरने तक भी कभी दूर नहीं होता,’’ डिंपल ने कहा.

‘‘हां डिंपल, तुम्हारा कहना एकदम सही है. ये राजनीति के मंजे खिलाड़ी आदमी को आदमी से बांटे ही रखना चाहते हैं. इन्होंने तो बड़ी होशियारी से रास्ते तक बांट दिए हैं, ताकि इन की चालाक सोच इन्हें मालामाल करती रहे,’’ कांता बोली. ‘‘बिलकुल सही कहा तुम ने कांता. इस पहाड़ी समाज को अंधेरे में रखने वाले इन भेडि़यों को सबक सिखाने के लिए हमें अपनी भूमिका अच्छे से निभानी होगी.

‘‘देवीदेवता के नाम पर ठगने वाले इन पाखंडियों की असलियत लोगों के सामने लाने के लिए हमें कुछ न कुछ करना ही होगा,’’ डिंपल ने गंभीर आवाज में कांता से कहा. ‘‘हां, यह बहुत जरूरी है डिंपल. मैं जीजान से तुम्हारे साथ हूं. जान दे कर भी दोस्ती निभाऊंगी,’’ कांता बोली.

इस के बाद उन दोनों ने एकदूसरे को प्यार से देखा और गले मिल गईं. ‘‘तुम मेरी सच्ची दोस्त हो कांता. देखो, आजादी के इतने साल बाद भी इस गांव के लोग अंधविश्वास में फंसे हुए हैं. इन्हें जगाने के लिए हम दोनों मिल कर काम करेंगी,’’ डिंपल ने अपनी बात रखी.

‘‘जरूर डिंपल, यही एकमात्र रास्ता है,’’ कांता ने कहा. डिंपल और कांता ने योजना बनाई और लटूरी देवता के मेले में मिलने की बात पक्की कर के तेजी से अपने घरों की ओर चल दीं.

डिंपल लोहारों की, तो कांता खशों की बेटी थी. कांता ने 23-24 साल की उम्र में ही घाटघाट का पानी पी रखा था. यह तो डिंपल की दोस्ती का असर था कि वह राह भटकने से बच गई थी. हमउम्र वे दोनों चानणा गांव की रहने वाली थीं. नैशनल हाईवे से मीलों दूर पहाड़जंगल, नदीनालों के उस पार कच्ची सड़क से पहुंचते थे. वह कच्ची सड़क लंबा डग नदी तक जाती थी. नदी तट से 2 मील ऊपर नकटे पहाड़ पर सीधी चढ़ाई के बाद चानणा गांव तक पहुंचते थे.

वहां ऊंचाई की ओर खशों और निचली ओर लोहारों की बस्ती थी. खशों को ऊंची जाति और लोहारों को निचली जाति का दर्जा मिला हुआ था. वहां चलने के लिए ऊंची और छोटी जाति के अलगअलग रास्ते थे. लोहारों को खशों के रास्ते चलने की इजाजत न थी. वे उन के घरआंगन तक को छू नहीं सकते थे, जबकि खशों को लोहारों के रास्ते चलने का पूरा हक था. वे उन के घरआंगन में बिना डरे कभी

भी आजा सकते थे. यहां तक कि उन के चूल्हों में बीड़ीसिगरेट तक भी सुलगा आते थे. पर गलती से भी कोई लोहार खशों के रास्ते या घरआंगन से छू गया, तो उस की शामत आ जाती थी. इस से गांव का देवता नाराज हो जाता था और उन्हें दंड में देवता को बकरे की बलि देनी पड़ती थी. मजाल है कि कोई इस प्रथा के खिलाफ एक शब्द भी कह सके.

लोहारों और खशों की बस्तियों के बीच तकरीबन 4-5 एकड़ का मैदान था, जहां बीच में लटूरी देवता का लकड़ी का मंदिर और गढ़ की तरह भंडारगृह था. देवता के गुर का नाम खालटू था. गुर में प्रवेश कर देवता अपनी इच्छा बताता था. लटूरी देवता गुर के जरीए ही शुभ और अशुभ, बारिश, सूखा, तूफान की बात कहता था. गांव और आसपास शादीब्याह, मेलाउत्सव, पर्वत्योहार सब देवता की इच्छा पर तय होते थे.

यहां तक कि फसल बोना, घास काटना भी देवता की इच्छा पर तय था. गुर खालटू को सभी पूजते थे. उसे खूब इज्जत मिलती थी. एक खास बात और थी कि देवता का बजंतरी दल भी था, जो देव रथ के आगेआगे चलता था. इन में ढोलनगाड़े, शहनाई तो लोहार बजाते थे, पर तुरही, करनाल वगैरह खश बजाते थे. देवता का रथ भी खश उठाते थे, लोहारों को तो छूने की इजाजत तक न थी.

लोहारों के रास्ते चलते गुर खालटू, चेला छांगू और मौहता भागू जैसे ही माधो लोहार के घर के पास पहुंचे, उस का मोटातगड़ा बकरा और जवान बेटी देख कर वे एकदम रुक गए. गुर खालटू के मुंह में आई लार को छांगू और भागू ने देख लिया था. चेला छांगू तो 3 साल से माधो की बेटी डिंपल पर नजर गड़ाए था, पर वह उस के हाथ न लगी थी.

तीनों की नजरें बारबार बकरे से फिसलती थीं और माधो की बेटी पर अटक जाती थीं. ‘‘ऐ माधो की लड़की, कहां है तेरा बापू?’’ गुर खालटू ने पूछा.

‘‘वे मेले में ढोल बजाने गए हैं,’’ तीनों को नमस्ते कर के डिंपल ने कहा. ‘‘आजकल कहां रहती हो? दिखाई नहीं देती हो?’’

डिंपल ने चेले छांगू की बात का कोई जवाब नहीं दिया, बल्कि बकरे से बतियाते हुए उसे घासपत्ते खिलाती रही, जैसे उस ने कुछ सुना ही न हो.

‘‘बकरा बेचना तो होगा न माधो को?’’ ‘‘नहीं मौहताजी, छोटे से बच्चे को दूध पिलापिला कर बच्चे की तरह पालपोस कर बड़ा किया है. इसे हम नहीं बेचेंगे,’’ नजरें झुकाए डिंपल ने कहा और बकरे को पत्ते दिखाती दूसरी ओर ले गई. उस ने तीनों को बैठने तक को न बोला. तीनों बेशर्मी से दांत निकालते हुए मेले की ओर चल दिए.

माधो लोहार को सभी लोग पसंद करते थे. एक तो उस के घराट का आटा सभी को भाता था, दूसरे नगाड़ा बजाने में माहिर उस जैसा पूरे इलाके में कोई दूसरा न था. डिंपल माधो की एकलौती औलाद थी. गांव में पढ़ने के बाद वह शहर में बीएससी फाइनल के इम्तिहान दे कर आई थी. वह खेलों में भी कई मैडल जीत चुकी थी.

गुर, चेला, कारदार चानणा गांव के साथ आसपास के अनेक गांव में अपना डंका जैसेतैसे बजाए हुए थे. देवता के खासमखास कहे जाने वाले वे देव यात्रा के नाम पर शराबमांस की धामें करवाते और औरतों का रातरात भर नाच करवाते थे. गांव में खश व लोहार पूरे लकीर के फकीर थे और देवता पर उन्हें अंधश्रद्धा थी. यह श्रद्धा बढ़ाने का क्रेडिट गुर व चेला जैसे लोगों को ही जाता था. लटूरी देवता का मेला भरने लगा

था. गुर खालटू के पहुंचते ही प्रधान रातकू और गांव वालों ने उन की खूब आवभगत की. गुर ने मंदिर से लटूरी देवता की पिंडी निकाली. पिंडी को स्नान करा कर धूपदीप व चावल से पूजाअर्चना कर के भेड़ू और मुरगे की बलि दिलाई गई. फिर देवता का रथ निकाल कर पूरे मेले में घुमाया गया.

इस के बाद गुर खालटू ने लोगों को मेले में गाने का आदेश दिया. ढोलनगाड़े, शहनाईरणसींगे बजने लगे और मर्दऔरत लाइनों में गोलगोल नाचने लगे. गुर के आदेश पर प्रधान रातकू खशों द्वारा धाम भी इस मैदान पर दी जानी थी. केवल लोहारों को मैदान से हट कर निचले खेत में खिलानेपिलाने का इंतजाम था. शाम ढलने तक नाच और बाजे बंद हो गए थे. शराब का दौर शुरू हो गया था, जिस में मर्दऔरत बराबर शामिल थे. जिसे जितनी पीनी थी पीए, कोई रोक नहीं थी.

नशे में झूमते लोगों में मांसभात की धाम कोईकोई ही खा पाया था. वहां से लोग झूमतेगाते आधी रात तक अपनेअपने घर पहुंचते थे.

नाचगानों और प्रधान रातकू की धाम के साथ हलके अंधेरे में लोगों से दूर एकांत में घटी एक घटना बड़ी ही दिलचस्प थी, जिस का 3 के सिवाय चौथे को पता न चला था. हुआ यों था कि डिंपल अपनी सहेली कांता के साथ मेले में घूमने आई थी. मेले की जगड़ से कुछ दूर एक पेड़ के नीचे खड़ी हो कर वे आपस में बातें करने लगी थीं.

चेला छांगू भी कहीं से टपक कर चोरीछिपे उन की बातें सुनने लगा था. डिंपल पर उस की बुरी नजर से कांता पूरी तरह परिचित थी और वह उसे देख भी चुकी थी. उस ने चेले को बड़ी मीठी आवाज में पुकारा, ‘‘चेलाजी, चुपकेचुपके क्या सुनते हो… पास आ कर सुनो न.’’

छांगू था पूरा चिकना घड़ा. वह ‘हेंहेंहें’ करता हुआ उन के पास आ कर खड़ा हो गया. ‘‘दोनों क्या बातें कर रही हो, जरा मैं भी सुनूं?’’ उस ने कहा.

‘‘चेलाजी, हमारी बातों से आप को क्या लेनादेना. आप मेले में जाइए और मौज मनाइए,’’ डिंपल ने सपाट लहजे में कहा. उसे चेले का वहां खड़े होना अच्छा नहीं लगा था. ‘‘हाय डिंपल, तुम्हारी इसी अदा पर तो मैं मरता हूं,’’ छांगू चेले की ‘हाय’ कहने के साथ ही शराब पीए होने की गंध से एक पल के लिए तो उन दोनों के नथुने फट से गए थे, फिर भी कांता ने बड़े प्यार से कहा, ‘‘चेला भाई, आप की उम्र कितनी हो गई होगी?’’

‘‘अजी कांता रानी, अभी तो मैं 40-45 साल का ही हूं. तू अपनी सहेली डिंपल को समझा दे कि एक बार वह मुझ से दोस्ती कर ले, तो फायदे में रहेगी. देवता का चेला हूं, मालामाल कर दूंगा.’’

‘‘क्या आप की बीवी और खसम करेगी?’’ ‘‘चुप कर कांता, ये लोहारियां हम खशकैनेतों के लिए ही हैं. जब चाहे इन्हें उठा लें… पर प्यार से मान जाए तो बात कुछ और है. तू इसे समझा दे, मैं देवता का चेला हूं. पूरे तंत्रमंत्र जानता हूं.’’

डिंपल के पूरे बदन में बिजली सी रेंग गई. उस के दिल में एक बार तो आया कि अभी जूते से मार दे, पर बखेड़ा होने से वह मुफ्त में परेशानी मोल नहीं लेना चाहती थी, तो उस ने सब्र का घूंट पी लिया. ‘‘पर तुम्हारी मोटी भैंस का क्या होगा? वह और खसम करेगी या किसी लोहार के साथ भाग जाएगी,’’ कांता ने ताना कसते हुए कहा, तो छांगू चेला भड़क गया.

‘‘चुप कर कांता, लोहारों की इतनी हिम्मत कि वे हमारी औरतों को छू भी सकें. पर तू इसे मना ले. इसे देखते ही मेरा पूरा तन पिघल जाता है. इस लोहारी में बात ही कुछ और है. पर याद रख कांता, मैं देवता का चेला हूं, जरा संभल कर बात करना… हां.’’ तभी डिंपल ने उस के चेहरे पर एक जोर का तमाचा जड़ दिया. दूसरा थप्पड़ कांता ने मारा. छांगू चेले का सारा नशा हिरन हो गया. उस की सारी गरमी पल में उतर गई. हैरानपरेशान सा गाल मलते हुए वह कभी डिंपल, तो कभी कांता को देखने लगा.

‘‘खबरदार, अगर डिंपल की तरफ नजर उठाई, तो काट के रख दूंगी. लोहारों की क्या इज्जत नहीं होती? लोहारों की औरतें औरतें नहीं होतीं? देवता के नाम पर तुम्हारे तमाशों को हम अच्छी तरह जानती हैं. चुपचाप रास्ता नाप ले, नहीं तो गरदन उड़ा दूंगी,’’ कमर से दरांती निकाल कर कांता ने कहा, तो छांगू चेला थरथर कांपने लगा. वह गाल मलता हुआ दुम दबा कर खिसक लिया. डिंपल और कांता खूब हंसी थीं. फिर काफी देर तक वे गांव के रिवाजों और प्रथाओं पर चर्चा करते रहने के बाद अपनेअपने घरों को लौटी थीं.

सुबह ही एक खबर जंगल की आग की तरह पूरे चानणा गांव में फैल गई कि माधो लोहार शराब के नशे में खशों के रास्ते चल कर उसे अपवित्र कर गया. उस की बेटी डिंपल ने लटूरी देवता के मंदिर को छू कर अनर्थ कर दिया. खश तो आग उगलने लग गए. वहीं माधो से खार खाए लोहार भी बापबेटी को बुराभला कहने लगे.

गुर खालटू ने कारदारों के जरीए पूरे गांव को मंदिर के मैदान में पहुंचने का आदेश भिजवा दिया. वह खुद छांगू, भागू और 3-4 कारदारों के साथ माधो के घर जा पहुंचा. आंगन में खड़े हो कर गुर खालटू ने रोब से पुकारा, ‘‘माधो, ओ माधो… बाहर निकल.’’

माधो की डरीसहमी पत्नी ने आंगन में चटाई बिछाई, लेकिन उस पर कोई न बैठा. इतने में माधो बाहर निकल आया और हाथ जोड़ कर खड़ा हो गया. डिंपल भी अपनी मां के पास खड़ी हो गई. उस ने किसी को भी नमस्ते नहीं किया. उसे देख कर छांगू चेले ने गरदन हिलाई कि अब देखता हूं तुझे.

‘‘माधो, तू ने रात खशों के रास्ते पर चल कर बहुत बड़ा गुनाह कर दिया है. तू जानता है कि तुझे ऐसा नहीं करना चाहिए था. तेरी बेटी ने भी मंदिर को छू कर अपवित्र कर दिया है. अब देवता नाराज हो उठेंगे,’’ गंभीर चेहरा किए गुर खालटू ने जहर उगला. ‘‘गुरजी, यह सब सही नहीं है. न मैं खशों के रास्ते चला हूं और न ही मेरी बेटी ने मंदिर को छुआ है.’’

‘‘हां, मैं तो मंदिर की तरफ गई भी नहीं,’’ डिंपल ने निडरता से कहा, तो गुर थोड़ा चौंका. दूसरे लोग भी हैरान हुए, क्योंकि गुर और कारदारों के सामने बिना इजाजत कोई औरत या लड़की एक शब्द भी नहीं बोल सकती थी. डिंपल देवता के नाम पर होने वाले पाखंड और कानून के खिलाफ हो रहे भेदभाव पर बहुतकुछ कहना चाहती थी, पर अपनी योजना के तहत वह चुप रही.

‘‘तू चुप कर डिंपल, मैं ने तुझे मंदिर को हाथ लगाते देखा है,’’ छांगू चेले ने जोर से कहा. ‘‘हांहां, बिना हवा के पेड़ नहीं हिलता. तुम बापबेटी ने बहुत बड़ा गुनाह किया है, अब तो पूरे गांव को तुम्हारी करनी भुगतनी पड़ेगी. बीमारी, आग, तूफान, बारिश वगैरह गांव को तबाह कर सकती है. तुम लोगों को पूरे गांव की जिम्मेदारी लेनी होगी,’’ मौहता भागू गुस्से से बोला.

‘‘तुम दोनों चुपचाप अपना गुनाह कबूल करो. हां, देवता महाराज को बलि दे कर और माफी मांग कर खुश कर लो,’’ एक मोटातगड़ा कारदार बोला. ‘‘जब हम ने गुनाह किया ही नहीं, तो बलि और माफी किस बात की?’’ डिंपल ने गुस्से में कहा, पर माधो की बोलती बंद थी.

‘‘माधो, इस से पहले कि देवता गुस्सा हो जाएं, तू अपने बकरे की बलि और धाम दे कर लटूरी देवता को खुश कर ले. इस से पूरा गांव प्रकोप से बच जाएगा. तुम्हारा परिवार भी देवता की नाराजगी से बच जाएगा. देख, तुझे देव गुर कह रहा है.’’ ‘‘हांहां, बकरे की बलि दे कर ही रास्ते और मंदिर की शुद्धि होगी. लटूरी देवता खुश हो जाएंगे और गांव पर कोई मुसीबत नहीं आएगी,’’ छांगू चेले ने आंगन में बंधे बकरे और डिंपल को देख कर मुंह में आई लार को गटकते हुए कहा. उसे डिंपल और कांता के थप्पड़ भूले नहीं थे.

‘‘हां, धाम न लेने के लिए मैं देवता को राजी कर दूंगा, पर बकरे की बलि तो तय है माधो,’’ गुर ने फिर कड़कती आवाज में कहा. डिंपल और उस की मां ने बकरा देने की बहुत मनाही की, पर गुर खालटू और देव कारकुनों के डराने पर माधो को मानना पड़ा. उस ने एक बार फिर सभी को बताया कि वह अपने रास्ते चल कर ही घर आया था और उस की बेटी ने मंदिर छुआ ही नहीं, पर उस की बात पर किसी ने ध्यान नहीं दिया.

मौहता भागू ने झट बकरा खोला और मंदिर की ओर ले चला. फिर सभी मंदिर की ओर शान से चल दिए. चलतेचलते गुर खालटू ने माधो को बेटी समेत लटूरी देवता के मैदान में पहुंचने का आदेश दिया. लटूरी देवता के मैदान में पूरे गांव वाले इकट्ठा हो गए. देवता के गुर खालटू ने धूपदान में रखी गूगल धूप को जला कर एक हाथ में चंबर लिए मंदिर की 3 बार बड़बड़ाते हुए परिक्रमा की. देवता की पिंडी बाहर निकाल कर पालकी में रख दी गई.

सब से पहले गुर ने पिंडी की पूजा की, फिर दूसरे खास लोगों को पूजा करने को कहा गया. चेला और मौहता व दूसरे कारदार जोरजोर से जयकारा लगाते थे. ढोलनगाड़ातुरही बजने लगे थे. गुर खालटू कनखियों से चारों ओर भी देख लेता था और गंभीर चेहरा बनाए खास दिखने की पूरी कोशिश करता था.

माधो डिंपल के साथ मंदिर से थोड़ी दूर अपराधी की तरह खड़ा था. कांता भी अपनी दादी के साथ एक पेड़ के नीचे खड़ी थी. माधो के बकरे को पिंडी के पास लाया गया था. उस की पीठ पर गुर ने पानी डाला, तो बकरे ने जोर से पीठ हिलाई. चारों ओर से लटूरी देवता की जयजयकार गूंज गई.

छांगू चेले ने सींगों से बकरे को पकड़ा था. एक मोटे गांव वाले ने दराट तेज कर पालकी के पास रखा था. उसे बकरा काटने के लिए गुर के आदेश का इंतजार था.

अचानक कांता जोरजोर से चीखने. गरदन हिलाते हुए उछलने भी लगी. उस के बाल बिखर गए. दुपट्टा गिर गया था. सभी लोग उस की ओर हैरानी से देखने लगे थे. कांता की दादी बड़े जोर से बोली, ‘‘लड़की में कोई देवी या फिर कोई देवता आ गया है. अरे, कोई पूछो तो सही कि कौन लड़की में प्रवेश कर गया है?’’

गुर, चेला और दूसरे कारदार बड़ी हैरानी और कुछ डरे से कांता की ओर देखने लग गए. गुर पूजापाठ भूल गया था. एक बूढ़े ने डरतेडरते पूछा, ‘‘आप कौन हैं जो इस लड़की में आ गए हैं? कहिए महाराज…’’

‘‘मैं काली हूं. कलकत्ते वाली. लटूरी देवता से बड़ी. सारे मेरी बात ध्यान से सुनो. आदमी के चलने से रास्ते कभी अपवित्र नहीं होते, न कोई देवता नाराज होता है. मैं काली हूं काली. आज में झूठों को दंड दूंगी. माधो और उस की बेटी पर झूठा इलजाम लगाया गया है. सुनो, लटूरी देवता कोई बलि नहीं ले सकता. अभी मेरी बहन महाकाली भी आने वाली है. आज सब के सामने सच और झूठ का फैसला होगा,’’ कांता उछलतीकूदती चीखतीचिल्लाती पिंडी के पास पहुंच गई. अचानक तभी डिंपल भी जोर से चीखने और हंसने लगी. उस के बाल खुल कर बिखर गए. अब तो गांव वाले और हैरानपरेशान हो गए. इस गांव के ही नहीं, बल्कि आसपास के बीसियों गांवों में कभी ऐसा नहीं हुआ था कि किसी औरत में देवी आई हो.

डिंपल की आवाज में फर्क आ गया था. एक बुढि़या ने डरतेडरते पूछा, ‘‘आप कौन हैं, जो इस सीधीसादी लड़की में प्रवेश कर गए हो? हे महाराज, आप देव हैं या देवी?’’

डिंपल भी चीखतीउछलती लटूरी देवता की पिंडी के पास पहुंच गई थी. वह जोर से बोली, ‘‘मैं महाकाली हूं. आज मैं पाखंडियों को सजा दूंगी. अब काली और महाकाली आ गई हैं, अब दुष्टों को दंड जरूर मिलेगा,’’ कह कर उस ने पिंडी के पास से दराट उठाया और बकरे का सींग पकड़े छांगू के हाथ पर दे मारा. छांगू चेले की उंगलियों की 2 पोरें कट कर नीचे गिर गईं. वह दर्द के मारे चिल्लाने और तड़पने लगा.

‘‘बकरे, जा अपने घर, तुझे कोई नहीं काट सकता. जा, घर जा,’’ डिंपल ने उछलतेकूदते कहा. बकरा भी माधो के घर की तरफ दौड़ गया. यह सब देख कर लोग जयकार करने लगे. अब तक तो सभी ने हाथ भी जोड़ लिए थे. बच्चे तो अपने मांओं से चिपक गए थे.

डिंपल ने दराट लहराया फिर चीखते और उछलते बोली, ‘‘बहन काली, गुर और उस के झूठे साथियों से पूछ सच क्या है, वरना इन्हें काट कर मैं इन का खून पीऊंगी.’’ ‘‘जो आज्ञा. खालटू गुर, जो पूछूंगी सच कहना. अगर झूठ कहा, तो खाल खींच लूंगी. आज सारे गांव के सामने सच बोल.’’

डिंपल ने एक जोर की लात खालटू को दे मारी. दूसरी लात कांता ने मारी, तो वह गिरतेगिरते बचा. गलत आदमी भीतर से डराडरा ही रहता है. डर के चलते ही खालटू ने सीधीसादी लड़कियों में काली और महाकाली का प्रवेश मान लिया था. छांगू की कटी उंगलियों से बहते खून ने उसे और ज्यादा डरा दिया था, जबकि वह खुद में तो झूठमूठ का देवता ला देता था. लातें खा कर मारे डर के वह उन के पैर पड़ गया और गिड़गिड़ाया ‘‘मुझे माफ कर दीजिए माता कालीमहाकाली, मुझे माफ कर दीजिए.’’

दर्द से तड़पते छांगू चेले ने अपनी उंगलियों पर रुमाल कस कर बांध लिया था. गुर को लंबा पड़ देख कर डर और दर्द के मारे वह भी रोते हुए उन के पैर पड़ गया, ‘‘मुझे भी माफी दे दो माता.’’ डिंपल ने गुर की पीठ पर कस कर लात मारी, ‘‘मैं महाकाली खप्पर वाली हूं. सच बता रे खालटू या तेरी गरदन काट कर तेरा सारा खून पी जाऊं,’’ डिंपल ने हाथ में पकड़ा दराट लहराया, तो वह डर के मारे कांप गया.

‘‘बताता हूं माता, सच बताता हूं. गांव वालो, माधो का बकरा खाने के लिए हम ने झूठमूठ की अफवाहें फैला कर माधो और डिंपल पर झूठा आरोप लगाया था. मुझ में कोई देवता नहीं आता है. मैं, चेला छांगू, मौहता भागू, कारदार सब से ठग कर माल ऐंठते थे. हम सारे दूसरों की औरतों पर बुरी नजर रखते थे. मुझे माफ कर दीजिए. आज के बाद मैं कभी बुरे काम नहीं करूंगा. मुझे माफ कर दीजिए.’’ डिंपल और कांता की 2-4 लातें और खाने से वह रो पड़ा.

अब तो कारदार भी उन दोनों के पैरों में लौटने लगे थे. ‘‘तू सच बता ओ छांगू चेले, नहीं तो तेरा सिर धड़ से अलग कर दिया जाएगा,’’ कांता ने जोर की ठोकर मारी तो वह नीचे गिर पड़ा, फिर उठ कर उस के पैर पकड़ लिए.

‘‘गांव के भाईबहनो, मैं तो चेला बन कर तुम सब को ठगता था. कई लड़कियों और औरतों को अंधविश्वास में डाल कर मैं ने उन से कुकर्म किया, उन से रुपएपैसे ऐंठे. मुझे माफ कर दीजिए माता महाकाली. आज के बाद मैं कभी बुरे काम नहीं करूंगा.’’ गुर, चेले, मौहता और कारदारों ने सब के सामने सच उगल दिया. डिंपल और कांता ने उछलतेचीखते उन्हें लातें मारमार कर वहां से भागने पर मजबूर कर दिया.

एक नौजवान ने पेड़ से एक टहनी तोड़ कर कारदार और मौहता भागू को पीट दिया. डिंपल और जोर से चीखी, ‘‘जाओ दुष्टो, भाग जाओ, अब कभी गांव मत आना.’’

वे सिर पर पैर रख कर भाग गए और 2 मील नीचे लंबा डग नदी के तट पर जीभ निकाले लंबे पड़ गए. उन की पूरे गांव के सामने पोल खुल गई थी. वे एकदूसरे से भी नजरें नहीं मिला पा रहे थे. कांता ने उछलतेचीखते जोर की किलकारी मारते हुए गुस्से से कहा, ‘‘गांव वालो, ध्यान से सुनो. खशलोहार के नाम पर रास्ते मत बांटो, वरना मैं अभी तुम सब को शाप दे दूंगी.’’

‘माफी काली माता, शांत हो जाइए. आप की जय हो. हम रास्ते नहीं बांटेंगे. माफीमाफी,’ सैकड़ों मर्दऔरत एक आवाज में बोल उठे. बच्चे तो पहले ही डर के मारे रोने लगे थे. काली और महाकाली के डर से अब खशखश न थे और लोहार लोहार न थे, लेकिन वे सारे गुर खालटू, चेले, मौहता व कारदारों से ठगे जाने पर दुखी थे.

‘माफी दे दो महाकाली माता. आप दोनों देवियां शांत हो जाइए. हमारे मन का मैल खत्म हो गया है. शांत हो जाइए माता,’ कई औरतें हाथ जोड़े एकसाथ बोलीं. ‘‘क्या माफ कर दें बहन काली?’’

‘‘हां बहन, इन्हें माफ कर दो. पर ये सारे भविष्य में झूठे और पाखंडी लोगों से सावधान रहें.’’ ‘हम सावधान रहेंगे.’ कई आवाजें एकसाथ गूंजी. कुछ देर उछलनीचीखने और दराट लहराने के बाद डिंपल ने कहा, ‘‘काली बहन, अब लौट चलें अपने धाम. हमारा काम खत्म.’’

‘‘हां दीदी, अब लौट चलें.’’ डिंपल और कांता कुछ देर उछलींचीखीं, फिर ‘धड़ाम’ से धरती पर गिर पड़ीं. काफी देर तक चारों ओर सन्नाटा छाया रहा. सब की जैसे बोलती बंद हो गई थी.

जब काफी देर डिंपल और कांता बिना हिलेडुले पड़ी रहीं, तो कांता की दादी ने मंदिर के पास से पानी भरा लोटा उठाया और उन के चेहरे पर पानी के छींटे मारे. वे दोनों धीरेधीरे आंखें मलती उठ बैठीं. वे हैरानी से चारों ओर देखने लगी थीं. फिर कांता ने बड़ी मासूमियत से अपनी दादी से पूछा, ‘‘दादी, मुझे क्या हुआ था?’’ ‘‘और मुझे दादी?’’ भोलेपन से डिंपल ने पूछा.

‘‘कुछ नहीं. आज सच और झूठ का पता चल गया है. लूट और पाखंड का पता लग गया है. जाओ भाइयो, सब अपनेअपने घर जाओ.’’ धीरेधीरे लोग अपने घरों को लौटने लगे. दादी कांता का हाथ पकड़ कर बच्ची की तरह उसे घर ले गईं. डिंपल को उस की मां और बापू घर ले आए.

शाम गहराने लगी थी और हवा खुशबू लिए सरसर बहने लगी थी. एक बार फिर डिंपल और कांता सुनसान मंदिर के पास बैठ कर ठहाके लगने लगी थीं. ‘‘बहन महाकाली.’’

‘‘बोलो बहन काली.’’ ‘‘आज कैसा रहा सब?’’

‘‘बहुत अच्छा. बस, अब कदम रुकेंगे नहीं. पहली कामयाबी की तुम्हें बधाई हो कांता.’’ ‘‘तुम्हें भी.’’

दोनों ने ताली मारी, फिर वे अपने गांव और आसपास के इलाकों को खुशहाल बनाने के लिए योजनाएं बनाने लगीं. आकाश में चांद आज कुछ ज्यादा ही चांदनी बिखेरने लगा था.

जय श्री अद्भुत चापलूस चालीसा यंत्र

भक्तो, हमारे देश में सरकारी नौकरी में आज इतने ज्यादा खतरे बढ़ गए हैं कि अपने को तीसमार खां कहने वाले भी कुरसी पर बैठने से पहले सौ बार भगवान का नाम लेते हैं. क्या पता कब जनता से कुछ लेते हुए क्राइम ब्रांच वालों के हत्थे चढ़ जाएं. क्या पता कब कैसे तबादला हो जाए. क्या पता कब सस्पैंड हो जाएं. सरकारी नौकरी में बुरे दिन आते देर नहीं लगती, इसीलिए हम ने सरकारी नौकरी में काम कर रहे अपने भाइयों और बहनों के लिए शास्त्रोक्त विधि से अपने ही देश में तैयार किया है जय श्री अद्भुत चापलूस चालीसा यंत्र, ताकि हमारा हर भाई मजे से कुरसी पर बैठे और अपनी दोनों टांगें मेज पर रख कर मौज कर सके. साहब तो साहब, भगवान तक उसे पूछने की हिम्मत न कर सके कि यार, दिन में ही यह क्या रात वाली लूटमार शुरू कर रखी है.

दोस्तो, दुनिया में साहब को पटाने का ऐसा कोई यंत्र नहीं है, जैसा यह चापलूस चालीसा यंत्र है. इस यंत्र का हर शब्द जाग्रत मंत्र है. इस यंत्र के आगे एक ऐसा लैंस लगा है, जिस में एक खास कोण से देखने पर संपूर्ण चापलूस चालीसा मंत्र के हर शब्द को साफसाफ पढ़ा जा सकता है. यह अद्भुत चापलूस चालीसा यंत्र शुद्ध चौबीस कैरेट गोल्ड प्लेटिड साहब मूरत पर लिखा गया है. यह यंत्र पसीने से खराब नहीं होता. इसे पहन कर मुलाजिम कुछ भी करे, उसे पसीना आता ही नहीं, बल्कि इस यंत्र को देख कर दूसरों को पसीने आने लगते हैं. इसे गले में जिसजिस ने डाला, आइए अब जानते हैं उन्हीं की जबानी इस अद्भुत चापलूस चालीसा यंत्र की रहस्यमयी कहानी :

मिस्टर राजेश : मैं ने जब से इस यंत्र को गले में डाला है, साहब मेरे वश में हो गए हैं. जब तक यह चमत्कारी यंत्र मेरे गले में नहीं था, तब तक साहब मेरी ओर देखते भी नहीं थे. साहब सामने आते थे, तो मेरे पसीने निकलने शुरू हो जाते थे. मैं उन के आगेपीछे दुम हिलाता हुआ थक जाता था, पर वे मुझ कुत्ते की ओर ध्यान तक न देते थे. सच कहूं, जब से मैं ने यह अद्भुत चापलूस चालीसा यंत्र गले में डाला है, तब से मैं साहब की बीवी से भी ज्यादा उन के नजदीक हो गया हूं. अब मैं नहीं, बल्कि वे मेरे आगेपीछे दुम हिलाते हैं. वे मुझे अपनी बीवी से भी ज्यादा प्यार करते हैं. जय श्री अद्भुत चापलूस चालीसा यंत्र.

मिस्टर देवेंद्र : जब मेरे एक दोस्त ने मुझे इस अद्भुत चापलूस चालीसा यंत्र के बारे में बताया, तो मुझे जैसे जीने की नई राह मिली. पहले तो मुझे यकीन ही नहीं हुआ था कि अपने देश में भी ऐसे आला दर्जे के चापलूस चालीसा यंत्र बन सकते हैं. सच कहूं, तो मेरे ऊपर रिश्वत लेते हुए हर समय सस्पैंड होने का खतरा मंडराता रहता था. अब पुरानी लत होने के चलते छोड़ी भी नहीं जा रही थी. दुविधा में था कि अब क्या करूं, क्या न करूं?

आखिरकार मेरी परेशानी को देख कर मेरे उस दोस्त ने मेरे गले में अपना श्री अद्भुत चापलूस चालीसा यंत्र डाला, तो पहनते ही मेरी रिश्वत के बारे में नैगेटिव सोच एकदम बदल गई. मुझे ऐसा लगा कि रिश्वत लेना भ्रष्टाचार नहीं, बल्कि यह तो मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है. देखते ही देखते मेरे मन से रिश्वत का डर जाता रहा और मैं ने यह अद्भुत चापलूस चालीसा यंत्र मंगवा कर अपने गले में डाल लिया. सच कहूं, जब से मैं ने इस अद्भुत चापलूस चालीसा यंत्र को गले में डाला है, तब से मेरे रिश्वत लेने के हौसले में सौ गुना इजाफा हुआ है.

अब मुझे महकमे के किसी मुलाजिम से कतई डर नहीं लगता. अब दफ्तर में लोग मुझे देवू नहीं, बल्कि रिश्वत का देवेंद्र कहने लगे हैं. जय श्री अद्भुत चापलूस चालीसा यंत्र. भाइयो, इस देश में इन की ही तरह लाखों ऐसे मुलाजिम हैं, जो इस यंत्र को गले में डाल कर नौकरी में मजे कर रहे हैं. हमाम में नंगे नहा रहे हैं. भूख न होने के बाद भी बस खाए जा रहे हैं. अगर आप भी चाहते हैं कि दफ्तर में कदम फूंकफूंक कर रखने से छुटकारा मिले, तो आज ही हमारे इस चापलूस चालीसा यंत्र को मंगवाइए. कीमत केवल 5 हजार रुपए. डाक खर्च 2 सौ रुपए अलग.

और हां, अगर आप अभी और्डर करते हैं, तो अद्भुत चापलूस चालीसा यंत्र के साथ 24 कैरेट गोल्ड प्लेटिड चेन फ्री.

बंधुओ, हम अपने चापलूस चालीसा यंत्र का किसी अखबार में कोई इश्तिहार नहीं देते. नकली अद्भुत चापलूस चालीसा यंत्र से सावधान रहें. आप की सुविधा के लिए हम ने नकली यंत्र से बचने के लिए डब्बे पर आप के ही शहर के लोकप्रिय भ्रष्ट की तसवीर बनाई है, जो आंखें बंद कर के भी बिलकुल साफ दिखती है. कमाल का है यह जय श्री अद्भुत चापलूस चालीसा यंत्र.

कानून जब गले का फंदा बन जाए

आयरलैंड ने जनमत संग्रह करा कर कैथोलिक कट्टर धार्मिक कानून, जिस के अनुसार गर्भपात कराना पाप है, बदल डाला है. दरअसल, 6 साल पहले सविता हलप्पनवार को अस्पताल में गर्भ के दौरान दाखिल होना पड़ा था और डाक्टरों की राय थी कि केवल गर्भपात के सहारे ही सविता की जान बचाई जा सकती है, पर कानून के कारण उन के हाथ बंधे थे. अदालत ने भी हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया और कर्नाटक निवासी सविता की धर्म की गला घोट नीति के कारण मौत हो गई.

गनीमत है कि उस के बाद वहां मुहिम शुरू हो गई कि कानून बदला जाए और अब जनमत करा कर जनता की राय ली गई. कैथोलिक कट्टरवादियों के विरोध के बावजूद आयरलैंड की जनता ने सविता को सच्ची श्रद्धांजलि दी.

सरकार, समाज और धर्म लोगों के निजी फैसलों में आज भी निरर्थक दखलंदाजी ज्यादा कर रहे हैं. गर्भपात वैसा ही निजी फैसला है जैसा सैक्स करना. विवाह के बाद या बिना विवाह सैक्स संबंध भी पहले धर्म की वजह से कानूनी दायरे में आते थे पर धीरेधीरे स्वतंत्रता के रक्षकों ने उन्हें व्यक्ति की अपनी इच्छा मान लिया है.

कोई रात के 4 बजे सोता है या 8 बजे इस पर किसी का नियंत्रण नहीं हो सकता. उस की जो जिम्मेदारियां दूसरों के प्रति हैं, वे अगर पूरी हो रही हैं तो इस पर न किसी को आपत्ति होती है न होनी चाहिए. कुछ आश्रमों व होस्टलों

में इस पर भी आपत्ति होती है, क्योंकि वे अनुशासन के नाम पर असल में व्यक्ति को विवेकशून्य बनाने की कोशिश करते हैं. नाइट आउट का सिद्धांत इसी पर है. यह कहना कि सोने का समय नियत करना जरूरी है ताकि आप स्वस्थ रहें गलत है, क्योंकि यह निर्णय व्यक्ति का अपना है.

गर्भपात का निर्णय भी इसी तरह गर्भवती व डाक्टर के बीच का है. इस में कितने सप्ताह बीत गए हैं जैसा कानून भी गलत है जो भारत में आज भी चल रहा है और विशेष अनुमति लेने के लिए सीधे सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे खटखटाने पड़ते हैं. इन के पीछे मूल भावना वही है जो आयरलैंड के चर्च ने सरकार के सहारे जनता पर थोप रखी थी कि व्यक्ति नहीं जानता कि उस के हित में क्या है.

यह गुलाम मनोवृत्ति बनाए रखना सरकारों के लिए लाभदायक होता है और वे तरहतरह के नियंत्रण थोपना चाहती हैं.

आयरलैंड की जनता ने जनमत संग्रह से एक बात से छुटकारा पाया है पर न जाने अमीर, शिक्षित, समृद्ध देश में और कितने नियंत्रण हैं, जिन्हें लोग आंख मूंद कर मानते चले जा रहे हैं. शायद यह शुरुआत हो कि आम व्यक्ति को अपनी सरकार से आजादी मिलना उतना ही जरूरी है जितना कि दूसरे, विदेशियों की सरकारों से.

 

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