स्वार्थों की डाल पर बैठे प्यार के पंछी

70 वर्षीय भंवरलाल शाह मूलरूप से राजस्थान के जिला पाली के गांव रावड़ी के रहने वाले थे. घर की आर्थिक स्थिति ठीक न होने के कारण सालों पहले उन्होंने रोजीरोटी की तलाश में पुणे शहर की राह पकड़ी थी. उस समय पुणे छोटा सा शहर हुआ करता था. उन्होंने पुणे की वारजे मालवाड़ी में एक किराए की दुकान ली. उन के पास जो जमापूंजी थी, उस से उन्होंने अपना कारोबार शुरू किया.

जैन धर्म के अनुयायी भंवरलाल ईमानदार, मधुर व्यवहार वाले नेकदिल इंसान थे. वह गरीबों की हरसंभव मदद किया करते थे. अगर किसी ग्राहक के पास पैसे नहीं होते तो वह उसे सामान भी उधार दे दिया करते थे. यही कारण था कि उस इलाके के सारे लोग उन की दुकान पर आते थे, जिस से उन्हें अच्छी आमदनी होने लगी.

जैसेजैसे उस इलाके की आबादी बढ़ती गई, वैसेवैसे उन की दुकान की आमदनी भी बढ़ती गई. इस के बाद वह बीवीबच्चों को भी राजस्थान से पुणे ले आए. इसी बीच उन्होंने किराए की दुकान छोड़ कर अपनी दुकान खरीद ली. उन के परिवार में पत्नी के अलावा उन के 3 बेटे मुकेश शाह, भरत शाह और विपुल शाह थे. तीनों बच्चे पढ़ रहे थे. छोटा बेटा विपुल परिवार में सब से छोटा था, इसलिए परिवार में सब से ज्यादा प्यार उसे ही मिलता था.

ज्यादा लाड़प्यार की वजह से वह जिद्दी स्वभाव का हो गया था, जिस से उस का पढ़ाई में मन नहीं लगता था. अकसर वह दोस्तों के साथ मटरगश्ती करता रहता था. वह अपने भाइयों की तरह कोई डिग्री वगैरह तो नहीं ले पाया लेकिन व्यवहारकुशल था. पिता ने विपुल को दुकान पर बैठाना शुरू कर दिया. भंवरलाल ने थोक में भी सामान बेचना शुरू कर दिया था, जिस से आमदनी और ज्यादा बढ़ गई.

भंवरलाल ने बेटों की पढ़ाई के बाद उन के व्यवसाय की भी व्यवस्था कर दी. अपने बड़े बेटे मुकेश के लिए उन्होंने धामरी में एक दुकान खुलवा दी तो भरत और विपुल के लिए वारजे मालवाड़ी स्थित चर्च के पीछे एक जनरल स्टोर खुलवा दिया. इस में वह किताबें और स्टेशनरी भी बेचने लगे.

भंवरलाल ने कारोबार बढ़ाया तो उन्होंने अपने गांव के कई लड़कों को बुला कर अपनी दुकान पर रख लिया था. थोड़े ही दिनों में उन की दुकान की पुणे के अन्य क्षेत्रों में भी शाखाएं हो गई थीं.

अपने तीनों बच्चों को अपने पैरों पर खड़े देख कर भंवरलाल बेफिक्र हो गए थे. बाद में उन्होंने उन की शादी कर दी तो 2-3 साल में उन के आंगन में नातीपोतों की किलकारियां भी गूंजने लगीं.

कुछ दिनों तक वह अपने नातीपोतों, बहू और बेटों के साथ रहे. जब उन्हें इस बात का विश्वास हो गया कि बेटे अब अपना कारोबार संभाल लेंगे, तब उन्होंने अपने धर्मगुरुओं से महावीर स्वामी का मंत्र ले लिया और सांसारिक मोहमाया को त्याग कर उन के साथ निकल गए.

अपने पिता के वहां मौजूद न रहने के बावजूद भाइयों ने कारोबार को बुलंदियों तक पहुंचाया. कारोबार अच्छा चल रहा था, परिवार सुखी था. किसी चीज की कोई कमी नहीं थी. उन्होंने रहने के लिए पुणे के सिंहगढ़ रोड स्थित गंगा भाग्योदय इमारत में फ्लैट ले लिए थे. सब कुछ ठीकठाक चल रहा था कि विपुल के जीवन में प्रेरणा कांबले नाम की एक ऐसी आंधी आई कि विपुल को जेल की सलाखों के पीछे जाना पड़ गया.

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विपुल की जिंदगी में आई प्रेरणा नाम की आंधी

32 वर्षीय विपुल 3 बच्चों का बाप बन चुका था. इस के बावजूद वह आशिकमिजाज था. मौका मिलने पर वह खूबसूरत लड़कियों को अपने जाल में फंसाने की कोशिश में लगा रहता था.

2015 में प्रेरणा कांबले और विपुल की मुलाकात उस समय हुई, जिस समय प्रेरणा कांबले अपने कोर्स की कुछ किताबें खरीदने के लिए विपुल की दुकान पर गई थी. शोख और चंचल स्वभाव की प्रेरणा को देखते ही विपुल के दिल में घंटियां बज उठीं. वह उसे अपलक देखता रह गया. उसे ऐसा लगा जैसे उस की दुकान पर कोई परी आई हो.

उस की नजरें देख कर एक बार को प्रेरणा भी शरमा गई थी. फिर उस ने अपनी किताबों की सूची विपुल की तरफ बढ़ाई. विपुल ने कुछ किताबें निकाल कर उस के सामने रख दीं और बाकी किताबें दुकान में उपलब्ध न होने की बात बता कर अगले दिन उपलब्ध कराने को कह दिया.

किताबों का उपलब्ध न होना सिर्फ एक बहाना था. उसे तो प्रेरणा कांबले को बारबार अपनी दुकान पर बुलाना था. उस का मानना था कि जितनी बार प्रेरणा उस की दुकान पर आएगी, उतनी बार उसे बात करने का मौका मिलेगा और बात आगे बढ़ेगी. वह प्रेरणा को पूरी तरह अपने दिलोदिमाग में बसा चुका था.

प्रेरणा कांबले एक धार्मिक प्रवृत्ति के परिवार से थी. परिवार की आर्थिक स्थिति कुछ खास नहीं थी. लेकिन परिवार खुशहाल था. यह परिवार दांगट पाटिल नगर की स्नेहा विहार सोसायटी में रहता था.

प्रेरणा कांबले उस परिवार की एकलौती संतान थी. परिवार की सारी जिम्मेदारी प्रेरणा कांबले की मां स्नेहा कांबले पर थी. प्रेरणा पढ़ाई में होशियार थी. छोटीमोटी नौकरी के साथ वह सौफ्टवेयर इंजीनियरिंग का कोर्स भी कर रही थी.

प्रेरणा महत्त्वाकांक्षी, आधुनिक और खुले विचारों वाली युवती थी. वह एक बार जिस से बात कर लेती थी, उस पर अपना प्रभाव जमा देती थी. तभी तो पहली बार मिलने पर विपुल भी उस का दीवाना हो गया था.

जहां एक तरफ विपुल के दिलोदिमाग पर प्रेरणा की छवि बस गई थी, वहीं दूसरी तरफ प्रेरणा भी विपुल के बातव्यवहार के असर को नजरअंदाज नहीं कर पाई थी. प्रेरणा जब भी विपुल शाह की दुकान पर जाती थी, वह प्रेरणा का मुसकरा कर स्वागत करता था. किताबों पर पर उसे भारी छूट देता था.

धीरेधीरे प्रेरणा कांबले का भी झुकाव विपुल की तरफ होने लगा था, जिस के बाद प्रेरणा किसी न किसी सामान के बहाने विपुल की दुकान पर जाने लगी. इसी समय मौका मिलने पर दोनों कुछ बातें कर लिया करते थे. धीरेधीरे दोनों के बीच खूब बातें होने लगीं.

उन्हें बात करने का मौका तो मिलता था लेकिन संकोच की वजह से विपुल उस से अपने मन की बात नहीं कह पाता था. इस की वजह यह थी कि विपुल का वैवाहिक जीवन उस के बीच आ रहा था. इस के अलावा दोनों की उम्र और जाति धर्म के बीच जमीनआसमान का फासला था.

लेकिन यह विचार कुछ दिन के लिए ही आए, क्योंकि प्यार उम्र, जाति और धर्म को नहीं देखता. इस तरह दोनों ही एकदूसरे को मन ही मन चाहने लगे.

शुरुआत प्यार की

मौका दिवाली के त्यौहार का था. विपुल हर दिवाली के त्यौहार पर अपने ग्राहकों को शुभकामनाओं के कार्ड के साथ कोई न कोई गिफ्ट देता था. इस बार विपुल ने प्रेरणा को एक महंगे गिफ्ट के साथ शुभकामनाओं का कार्ड भी दिया. कार्ड में लिखे मैसेज में विपुल ने प्रेरणा कांबले से अपने प्यार का इजहार किया था.

महंगा गिफ्ट पा कर प्रेरणा बहुत खुश हुई. चूंकि वह भी विपुल को चाहती थी, इसलिए उस ने भी कार्ड का जवाब कार्ड से ही दिया, जिस में उस ने अपने प्यार का इजहार कर दिया था.

इस के बाद उन की फोन पर बातचीत का सिलसिला शुरू हो गया. वह मिलनेजुलने के लिए बाहर जाने लगे. विपुल शाह के पास पैसों की कोई कमी नहीं थी. वह प्रेरणा के ऊपर दिल खोल कर पैसे खर्च करता था. उसे महंगे उपहार देता और महंगे होटलों में जा कर खाना खिलाता. प्रेरणा का वह हर तरह से खयाल रखने लगा था.

इसी दौरान वह पल भी आ गया, जब एक होटल में उन्होंने अपनी हसरतें पूरी कीं. विपुल ने उस से शादी करने का वादा भी कर लिया. प्रेरणा कांबले विपुल शाह की फरेबी बातों में आ गई. वह विपुल का हर कहा मानने लगी. दोनों काफी खुश थे.

प्रेरणा कांबले विपुल को ले कर अपने गृहस्थ जीवन के ख्वाब देखने लगी, लेकिन विपुल की सच्चाई सामने आने पर उस का यह भ्रम टूट गया. प्रेरणा कांबले को जब पता चला कि विपुल शादीशुदा है तो जैसे उस के पैरों तले से जमीन खिसक गई.

जो विपुल उस के तनमन से खेल रहा था, वह फरेबी निकला. विपुल की पत्नी को इस बात की जानकारी नहीं थी कि उस के पति का किसी और से चक्कर चल रहा है. पर यह बात आखिर कब तक छिपी रह सकती थी. एक न एक दिन तो सच्चाई सामने आनी ही थी.

प्रेरणा को अपनी भूल पर पछतावा होने लगा. उसे विपुल पर गुस्सा तो बहुत आ रहा था, लेकिन अब वह कर भी क्या सकती थी. काफी सोचनेविचारने के बाद विपुल शाह के प्रति उस के मन में जो इज्जत थी, अब वह नफरत में बदल गई. उस ने विपुल को सबक सिखाने का फैसला कर लिया.

उस ने तय कर लिया कि विपुल ने उस के साथ जो धोखा किया है, उस की वह पूरी कीमत वसूलेगी. वह विपुल से खुद के रहने के लिए एक फ्लैट खरीदने के लिए पैसों की मांग करने लगी. पुणे जैसे शहर में फ्लैटों की कीमत करोड़ों रुपयों में आंकी जाती है. विपुल इतनी बड़ी रकम उसे देना नहीं चाहता था, फिर भी उस ने प्रेरणा कांबले को कुछ लाख रुपए दे कर उस से दूरियां बनानी शुरू कर दीं.

उगने लगे नफरत के बीज

लेकिन प्रेरणा कांबले भी इतनी आसानी से उस का पीछा छोड़ने वालों में से नहीं थी.  विपुल शाह ने उसे प्यार और मोहब्बत के नाम पर छला था. शादी का वादा कर के उस के शरीर और जज्बात से खेला था. इसलिए प्रेरणा ने उस से कहा कि अगर वह उसे फ्लैट खरीदने के पैसे नहीं देगा तो वह अपने और उस के संबंधों की जानकारी उस की पत्नी और परिवार को दे देगी.

प्रेरणा कांबले की इस धमकी से विपुल डर गया और वक्तबेवक्त प्रेरणा की बातों को  मान कर उसे पैसे देता रहा. लेकिन प्रेरणा कांबले नाम की फांस उस के गले में फंस गई थी. अब वह उस दिन को कोसने लगा, जिस दिन प्रेरणा से उस की मुलाकात हुई थी. उसे अब अपनी भूल पर पछतावा हो रहा था.

उस का चैन और सुकून सब उड़ गया था. वह अकसर इस विचार में खोया रहता था कि उस के भविष्य का क्या होगा. प्रेरणा की धमकी और उस की ब्लैकमेलिंग के भूत से कब तक डरता रहेगा. वह प्रेरणा की मंशा जान चुका था कि अब वह उस से सिर्फ अपना प्रतिशोध ले रही है, जो कभी खत्म होने वाला नहीं है.

इन्हीं सब सोचविचारों में फंसे विपुल के मन में प्रेरणा कांबले के लिए एक खतरनाक योजना ने जन्म ले लिया, जिस से उसे प्रेरणा, उस की धमकी और ब्लैकमेलिंग से आजादी मिल जाए. विपुल ने उस का काम तमाम करने की ठान ली, जिस से न रहे बांस और न बजे बांसुरी. लेकिन यह काम इतना आसान नहीं था. इस के लिए उसे किसी विश्वसनीय व्यक्ति की जरूरत थी.

इस बारे में जब उस ने अपने चारों ओर नजरें दौड़ाईं तो उसे अपनी दुकान का नौकर लहु गोनते नजर आया. लहु गोनते उस का पुराना नौकर था. जरूरत पड़ने पर वह कार ड्राइव भी कर लेता था. कभीकभी कार ड्राइव करने के लिए विपुल उसे अपने साथ भी ले कर जाया करता था. हर काम में वह उस की मदद करने को तैयार रहता था. विपुल ने जब उस से बात की तो वह थोड़े से पैसों के लालच में साथ देने को तैयार हो गया.

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अपनी योजना के अनुसार 15 मार्च, 2018 को दोपहर 12 बजे के बाद विपुल ने लहु गोनते को अपनी एमएच12पी 2412 नंबर की कार को बाहर निकालने के लिए कहा. इस के बाद उस ने प्रेरणा को यह कह कर बुलाया कि वह पथरी की दवा लेने मुंबई जा रहा है. अगर वह आएगी तो बातचीत में सफर कट जाएगा और घूम कर भी आ जाएंगे. प्रेरणा उस के साथ जाने को तैयार हो गई. वैसे भी वह अकसर विपुल के साथ लंबी ड्राइव पर जाती थी.

बन गई मौत की भूमिका

अपनी मौत से अनभिज्ञ प्रेरणा कार में पिछली सीट पर विपुल के साथ बैठ कर मुंबई की ओर रवाना हो गई. कार विपुल का नौकर चला रहा था. लगभग एक घंटे बाद कार लोनावाला के करीब बाघराई मंदिर के पास रुक गई. वहां पर तीनों ने चाय पी. चाय पीने के बाद लहु वापस कार में आ कर बैठ गया. जबकि प्रेरणा और विपुल थोड़ा समय बिताने के लिए मंदिर के पीछे वाली एक चट्टान पर जा कर बैठ गए. कुछ मिनटों तक इधरउधर की बातें करने के बाद प्रेरणा कांबले अपने मतलब की बात पर आ गई.

‘‘विपुल, तुम मेरे फ्लैट के बारे में क्या कर रहे हो? मैं देख रही हूं कि तुम्हें मेरे फ्लैट में कोई दिलचस्पी नहीं है. कुछ दिनों से मेरे प्रति तुम्हारा व्यवहार भी ठीक नहीं है. तुम मुझ से दूरियां बना रहे हो. मेरा फोन भी रिसीव नहीं करते. आखिर तुम्हारे मन में चल क्या रहा है? तुम मुझे फ्लैट के लिए पैसे दोगे या नहीं? या फिर मुझे अपने संबंधों के बारे में तुम्हारे परिवार और तुम्हारी बीवी को बताना पड़ेगा?’’

विपुल प्रेरणा के इन जहरीले सवालों का जवाब उसी समय देना चाहता था, लेकिन वक्त अनुकूल नहीं था. वहां से आ कर दोनों कार में बैठ गए. प्रेरणा उस से नाराज हो गई थी, इसलिए वह कार की आगे की सीट पर बैठ गई. विपुल के लिए यह मौका अच्छा था. अपने साथ लाई रस्सी से उस ने प्रेरणा के गले को पूरी तरह कस दिया. थोड़ी देर तक हाथपैर मारने के बाद उस के प्राणपखेरू उड़ गए.

तब तक सूरज पूरी तरह से डूब चुका था. चारों ओर अंधेरा हो गया था. कार ग्रामीण पुलिस थाने पौड़ की सीमा में प्रवेश कर चुकी थी. लहु गोनते ने प्रेरणा कांबले की लाश को ठिकाने लगाने के लिए कार विसाधर पहाडि़यों के जंगलों में ले जा कर रोक दी.

इस के बाद दोनों ने शव को कार से बारह निकाल कर सहारा सिटी के पीछे की घनी झाडि़यों के बीच ले जा कर डाल दिया. लाश को कोई पहचान न सके, इसलिए उन्होंने वहां पड़े पत्थरों से मारमार कर उस के चेहरे को क्षतविक्षत कर दिया. फिर वे घर लौट आए.

लेकिन विपुल रात भर इस डर से नहीं सो पाया कि कहीं प्रेरणा के शव से पुलिस को कोई ऐसा सूत्र न मिल जाए, जिस की वजह से उसे जेल जाना पड़े. इस से बचने के लिए वह नौकर के साथ सुबह उठ कर घटनास्थल की ओर निकल गया. उस ने एक बोरी साथ ले ली थी.

मुंबई-पुणे रोड स्थित पावना झील के पास पैट्रोल पंप से इन लोगों ने 5 लीटर पैट्रोल खरीदा और मौकाएवारदात पर पहुंच कर प्रेरणा के शव को बोरी में लपेट कर उसे पैट्रोल से जला दिया. अपने अपराधों का सबूत मिटाने के बाद दोनों पुणे लौट आए. इस के बाद नौकर लहु गोनते अपने गांव चला गया. अब विपुल एकदम निश्चिंत हो गया था.

जुर्म बोलता है

24 घंटे बीत जाने के बाद जब प्रेरणा कांबले घर नहीं पहुंची तो घर वालों को उस की चिंता सताने लगी. बिना किसी को कुछ बताए वह कहां चली गई, यह उन की समझ में नहीं आ रहा था.

अपनी तरफ से काफी खोजबीन के बाद भी जब प्रेरणा का कहीं पता नहीं चला, तब निराश हो कर प्रेरणा कांबले की मां स्नेहा कांबले वारजे मालवाड़ी थाने पहुंची. स्नेहा ने थानाप्रभारी बाजीराव मोले से मिल कर उन्हें सारी बातें बता दीं और प्रेरणा कांबले की गुमशुदगी की शिकायत दर्ज करवा दी.

थानाप्रभारी बाजीराव मोले ने इस मामले को गंभीरता से लिया और स्नेहा कांबले से प्रेरणा की फोटो और हुलिया ले कर उन्हें घर भेज दिया. इस मामले की जांच उन्होंने सहायक इंसपेक्टर बालासाहेब शिंदे, एएसआई जगन्नाथ मोरे, हेडकांस्टेबल चंद्रकांत जाधव उर्फ मंगी और राजेंद्र खामकर को सौंप दी. यह बात 17 मार्च, 2018 की है.

अपने वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देशन में पुलिस टीम ने तेजी से प्रेरणा की गुमशुदगी की जांच शुरू कर दी. उन्होंने प्रेरणा कांबले की उम्र, हुलिया और फोटो के विवरण शहर और गांवों के पुलिस थानों में भेज दिए. जब प्रेरणा कांबले के मोबाइल डाटा और काल रिकौर्ड निकलवाए गए तो उन के हाथ शीघ्र ही विपुल शाह और उस के नौकर लहु गोनते की गरदन तक पहुंच गए. वे दोनों पुलिस गिरफ्त में आ गए.

इस बीच थाना पौड़ की पुलिस ने विसाधर पहाडि़यों के जंगल से प्रेरणा का जला हुआ शव बरामद कर के केस दर्ज कर लिया था. इस की सूचना थाना वारजे मालवाड़ी को भी दे दी गई थी.

चूंकि यह मामला लोनावला ग्रामीण पुलिस थाने पौड़ के अंतर्गत आता था, अत: वारजे मालवाड़ी पुलिस अधिकारियों ने विपुल शाह और गोनते को उन के हवाले कर दिया पौड़ पुलिस थाने के सीनियर इंसपेक्टर सुरेश निबांलकर और सहायक इंसपेक्टर उद्धव खांडे ने उन से विस्तार से पूछताछ की. पुलिस ने आरोपी विपुल और उस के नौकर के खिलाफ भादंवि की धारा 302, 120बी, 34 के तहत गिरफ्तार कर उन्हें न्यायालय में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया.

कथा लिखे जाने तक विपुल भंवरलाल शाह और लहु गोनते लोनावला जेल में बंद थे. इस मामले की जांच टीम को पुणे डेक्कन विभाग के एसीपी बाजीराव मोहिते ने प्रशस्तिपत्र दे कर सम्मानित किया.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

तुम्हीं हो फादर…मदर तुम्हीं हो…

जब से मेरे बचपन के दोस्त आम से खास हुए हैं, अपना सीना बिना फुलाए 40 से 60 हो गया है. अब तो न चाहते हुए भी उन से गाहेबगाहे काम पड़ता ही रहता है. कभी पानी नल में न आने पर कमेटी वालों को उन का फोन करवाने जाना पड़ता है, तो कभी बिजली न आने पर. इन सरकारी महकमे वालों को भी पता नहीं आजकल क्या हो गया है कि बिना किसी नेता के फोन के छींकते भी नहीं. इन की हरकतों को देख कर तो यों लगता है मानो ये जनता के नहीं, नेताओं के नौकर हों. जब देखो, जहां देखो, नेताओं के आगेपीछे दुम हिलाते रहते हैं. कभी ऐसे जनता के आगे भी दुम हिलाओ, तो मजा मिले. नल में 2 दिन से पानी न आने के चलते पानी वालों को दोस्त का फोन करवाने उन के घर गया, पर वे घर में कहीं न दिखे.

मैं ने परेशान होते हुए भाभी से पूछा, ‘‘नेताजी कहां हैं भाभीजी? घूमने गए हैं क्या? या अभी भी चुनाव के दिनों की भागदौड़ की थकान मिटाने के लिए लेटे हुए हैं? लगता है कि अब तो वे अगले चुनाव तक ही जागेंगे.’’ ‘‘जब से पार्टी से निकाले गए हैं, तब से इन की नींद हराम हो गई है. पूजा कर रहे हैं भीतर. कुछ दिनों से नई बीमारी पाल ली है. जब देखो पूजा… पूजा… पूजा… सौ बार कह चुकी हूं, बहुत हो गई यह पूजा, पर उठने का नाम ही

नहीं लेते. ‘‘सच कहूं भाई साहब, मैं ने ये इतने बेचारे कभी नहीं देखे, जितना आजकल देख रही हूं. चेहरे पर जीत की रत्तीभर लाली नहीं, जबान पर पहले सी कोई गाली नहीं. चाय 5-5 बार गरम करनी पड़ती है, पर इन को तो चाय पीने तक की फुरसत नहीं,’’ भाभी ने दुखड़ा रोया.

भाभी की यह हालत देख कर मुझे रोना आ गया. कैसा नेता है यह? जीत के महीनेभर बाद ही अपनी घरवाली को परेशान करने लग गया है.

सांसें रोके दबे पैर उन के भगवान रूम में गया, तो जो मैं ने देखा उसे देख कर मैं भी हैरान रह गया. सामने पार्टी प्रधान का बड़े से शीशे में मढ़ा हंसता हुआ फोटो बराबर खांसता हुआ और वे फोटो के आगे धूपदीप, फलफू्रट थाली में सजा साष्टांग अधखुली धोती में पड़े हुए. यह देख कर मैं चकराया. मुझ से रहा न गया, सो पूछ बैठा, ‘‘भाई साहब? यह क्या…?’’

‘‘पूजा हो रही है और क्या?’’ कह कर वे लेटेलेटे ही पार्टी प्रधान के फोटो के आगे नाक रगड़ने लगे, तो मैं डरा. बचीखुची नाक भी जाती रही तो… पर तभी कहीं से भविष्यवाणी हुई कि इन के नाक होना या न होना कोई माने नहीं रखता गधे. इन की नाक हो, तो भी ये वैसे ही, न हो तो भी ये वैसे ही.

‘‘पर… किस की पूजा?’’ ‘‘अपने इन भगवान की और किस की? इन के आगे इन दिनों हर अवतार फेल है. जो ठान लेते हैं, बस कर के ही दम लेते हैं.’’

देशभर की उदासी चेहरे पर मलने के बाद उन्होंने फोटो के आगे रखे प्रसाद में से एक केला मेरी ओर बढ़ाया, तो मैं ने केला उन से प्रसाद रूप में ले कर जेब में डालते हुए पूछा, ‘‘पर यह सब चुनाव क्षेत्र के लोगों ने देख लिया, तो उन में क्या मैसेज जाएगा भाई साहब? ‘‘उन्होंने आप को काम करने के लिए वोट दिया है, दिनरात इन की तसवीर के आगे लेटे रहने के लिए नहीं.’’

‘‘भाड़ में जाए काम. यहां तो पार्टी में बने रहने के लाले पड़े हैं. जो मैसेज जाना हो जाए. मुझे अपने को देखना है. ‘‘सोच रहा हूं, अपनी जबान सिलवा लूं. कहीं गलती से भी ऐसावैसा सच जैसा कहीं बक दिया तो… इस देश में तुम किसी जबान सिलने वाले को जानते हो क्या?’’

इतना कह कर उन्होंने हाथ में घंटी पकड़ी और घंटी की ‘टनटन’ के साथ सुर में गाना गाने लगे, मानो पार्टी प्रधान को अपना दुखड़ा सुना रहे हों, ‘तुम्हीं हो फादर, मदर तुम्हीं हो, तुम्हीं हो नियरर, डियरर तुम्हीं हो… जो खिल सकें न वे फूल हम हैं… तुम्हारे चरणों की धूल हम हैं. दया की दृष्टि सदा ही रखना… तुम्हीं हो बिस्तर, चादर तुम्हीं हो… तुम्हीं हो लोटा, गागर तुम्हीं हो…’

सिगरेट के हर कश में है मौत

वैसे तो सिगरेट से कैंसर होने का पता 4 दशक पहले चल गया था पर फिर भी आज भी सिगरेट्स इस कदर पी जा रही हैं कि हर साल 70 लाख लोग केवल धूएं के कारण मरते हैं. फ्रांस में 34% लोग सिगरेट पीते हैं और भारत में 14% सिगरेटबीड़ी के आदी हैं. भारत का आंकड़ा कम इसलिए है कि यहां पानमसाले और खैनी में मिला कर तंबाकू ज्यादा खाया जाने लगा है.

वर्ल्ड हैल्थ और्गेनाइजेशन का कहना है कि सीमा में भी तंबाकू सेवन उसी तरह की गलतफहमी है जैसी कि शराब के बारे में है. थोड़े से सेवन से कुछ नहीं होता, नितांत गलत है. सिगरेट बीमारियां तो पैदा करेगी चाहे एक पीओ या 20. हां, कम पीने वालों के पास पैसे हों तो वे इलाज करा लेते हैं.

वैसे भी कम पीने का दावा करने वाले जब तनाव में होते हैं तो धड़ाधड़ पीने लगते हैं. उन्हें फिर कोई रोक नहीं पाता. दुनिया भर में 28 हजार अरब रुपए सिगरेट से होने वाले रोगों के इलाजों पर खर्च करे जाते हैं और टोबैको कंपनियां और व्यावसायिक अस्पताल इस लत का जम कर लाभ उठाते हैं.

घर में सिगरेट न घुसे यह जिम्मेदारी औरतों की है. उन्हें प्रेम करते समय ही इस पर पाबंदी लगा देनी चाहिए. जो सिगरेट पीए वह भरोसे का नहीं क्योंकि न जाने कब वह धोखा दे जाए. फिर घर में सिगरेट पीएगा तो बाकियों यानी छोटे बच्चों तक को दुष्प्रभाव झेलना पड़ेगा.

भारत को छोडि़ए, इटली जैसे देश के शहरों के फुटपाथ वैसे तो साफसुथरे दिखेंगे पर सिगरेट के टुकड़े हर जगह मुंह चिढ़ाते नजर आ जाएंगे. सिगरेट वहां भी और भारत में भी औरतों की दुश्मन नंबर एक है.

वैसे कुछ देशों में औरतें भी बराबर की सी सिगरेट पीती हैं पर वे खुद को भी नष्ट करती हैं और बच्चों को भी. बच्चों को शुरू से ही लत पड़ जाती है और 7 से 10 साल तक के बच्चे छिपछिप कर स्मोकिंग शुरू कर देते हैं. सिगरेट ही मादक दवाओं के लिए रास्ता खोलती है. ज्यादा नशा पाने के लिए हेरोइन आदि लेना शुरू करा जाता है जो बाद में लाइलाज हो जाता है.

अपने ब्वौयफ्रेंड और बहन संग गोवा पहुंची प्रियंका चोपड़ा

बौलीवुड की देसी गर्ल प्रियंका चोपड़ा आजकल अपने कथित ब्वौयफ्रेंड निक जोनास को लेकर काफी सुर्खियों में हैं. पिछले कुछ दिनों से इन दोनों के अफेयर की खबरें सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बनी हुई हैं. खबरों की मानें तो प्रियंका, निक को अपनी मां से मिलवाने के लिए भारत लाई हैं. इसी बीच प्रियंका, निक और अपनी फैमिली के साथ एक हौलीडे के लिए गोवा रवाना हो गई हैं. देसी गर्ल के साथ गोवा में उनकी कजिन परिणीति चोपड़ा और भाई सिद्धार्थ भी मौजूद हैं. प्रियंका के इस ट्रिप की तस्वीरें सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रही हैं.

तस्वीरों में प्रियंका, निक और परिणीति चोपड़ा के साथ लंच एन्जौय करते नजर आ रही हैं. यही नहीं परिणीति चोपड़ा ने गोवा पहुंच कर बहन प्रियंका चोपड़ा के साथ एक डांस वीडियो भी बनाया है. जिसमें दोनों बहनें बौलीवुड का गाना ‘टिप-टिप बरसा पानी’ को गाते और डांस करते हुए दिख रही हैं. परिणीति चोपड़ा ने इस वीडियो को अपने इंस्टाग्राम पर शेयर किया है.

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मीडिया रिपोर्टस् कि माने सिंगर निक जोनास अपने और प्रियंका के रिलेशनशिप को लेकर बेहद सीरियस हैं. वह प्रियंका के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में रहना चाहते हैं. खबरों की माने पिछले कई दिनों से दोनों एक दूसरो डेट कर रहे हैं. सोशल मीडिया पर भी आए दिन इनकी तस्वीरें वायरल होती रहती हैं.

बता दें प्रियंका, निक और मधू चोपड़ा को हाल ही में ब्रांद्रा के फेमस रेस्टोरेंट में साथ नजर आए थे. जहां निक प्रियंका का हाथ पकड़े नजर आए. इस खास मुलाकात के बाद निक जोनस ने इंस्टाग्राम पर प्रियंका का वीडियो पोस्ट किया है जिसमें वह बेहद खुश नजर आ रही हैं. इस वीडियो को पोस्ट करते हुए निक ने दिल वाला इमोजी भी बनाया था. प्रियंका चोपड़ा निक से करीबन 10 साल बड़ी हैं और वह उनसे टीवी शो क्वांटिको के दौरान एक फ्रेंड के जरिए मिले थे.

Not a cheesy Chopra sister performance. Nope. @priyankachopra #DancingInTheRain

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बौलीवुड की देसी गर्ल ने हिन्दी फिल्म जगत में धमाल मचाने के बाद हौलीवुड में भी खूब झंडे गाड़े. एक बार फिर प्रियंका सलमान खान के साथ फिल्म ‘भारत’ में नजर आने वाली हैं.

जैन कमल : अखबारों को पठनीय और खूबसूरत बनाया

‘मैंने जैन कमल को वर्षों एक डिजाइनर, एक कलाविद और निसंदेह एक विचारक के रूप में काम करते देखा है. इतना परिपूर्ण काम दुर्लभ ही देखने को मिलता है, जैन कमल के बारे में ये खयालात विख्यात पत्रकार प्रीतिश नंदी के हैं.

वे  जनूनी हैं, जो धरती से खो चुकी एक लिपि को ‘कंप्यूटर के कीबोर्ड’ में लाने के लिए दशकों से सोए नहीं हैं. वे एक टाइपोग्राफर जिस के डिजाइन किए हुए समाचार पत्र और पत्रिकाएं हर सुबह 15 करोड़ हिंदुस्तानियों की 30 करोड़ आंखों के सामने से गुजरते हैं. वे मीडिया की तमाम कामयाब कहानियों के शिल्पी हैं, जिन कहानियों को पूरी उम्र सुना, सुनाया जा सकता है, वह भी बिना ऊबे हुए. वे जैन कमल हैं, जी हां, कमल जैन नहीं.

ये शख्स इंडिया टुडे हिंदी से लेकर दैनिक सन्मार्ग (कोलकाता) तक 60 से ज्यादा पत्रिकाओं व दैनिक अखबारों का चेहरा बदल चुके हैं यानी इन्हें डिजाइन कर चुके हैं. ये शख्स 10 साल तक फिल्म सैंसर बोर्ड ज्यूरी में रहे हैं. 19 साल की उम्र में इन्हें ललित कला अकादमी पुरस्कार मिल चुका है. इन्होंने पटना और बड़ोदरा कालेज औफ फाइन आर्ट्स से डिगरी हासिल की. देश ही नहीं, दुनिया में विख्यात ‘नैशनल इंस्टिट्यूट औफ डिजाइन,’ अहमदाबाद में पढ़ाने गए, मगर अच्छा नहीं लगा तो जौब छोड़ कर मुंबई आ गए और मीडिया के अनंत सौंदर्यबोध का आख्यान बन गए.

जैन कमल नाम का यह शख्स संपूर्णता में क्या बला है, एकदो बैठकों, मुलाकातों और संवादों में तो शायद समेटना ही मुश्किल है. कहीं से शुरू कर के कहीं पहुंच जाने वाले इस शख्स की मधुरवाणी कब घनगर्जन में तबदील हो जाएगी, आप इस का पहले से अंदाजा ही नहीं लगा सकते. कलाकार अपनी धुन, ध्वनि और चितवन तक में कलाकार होता है, यह बात जैन कमल के साथ रहते हुए हर पल आप को महसूस होती है.

पटना फाइन आर्ट्स कालेज के ही एक ग्रेजुएट और कला पर निरंतर तमाम अखबारों में लिखने वाले सुमन कुमार सिंह ने जब मुझे इस शख्स से मिलने का सुझाव दिया था, तब तक मुझे उन के बारे में कुछ नहीं पता था. वे एक कलाकार होंगे, मैं ने बस इतना ही सोचा था. फिर जब मिलने के लिए फोन पर बात हुई तो यह शख्स मुझे आकर्षक के बजाय उबाऊ ही लगा. मुझे लग रहा था कि बस 15-20 मिनट का एक इंटरव्यू ले लूंगा. गया भी इसी मनोस्थिति से था, लेकिन जब उन के भायंदर स्थित आवास पर पहुंचा और उन से बातचीत होने लगी तो अंदाजा लगा कि जिस से मिलने आया हूं, कोई कलाकार नहीं, बल्कि औघड़ है. एक शरीर में समाए न जाने कितने कलाकार. ऐसे में सारी योजना गड्डमड्ड होनी ही थी.

बहरहाल, न जाने कितने विषयों, संदर्भों और प्रसंगों पर बातचीत हुई. इसलिए कई दिनों तक इस मुलाकात की खुमारी रही. मगर अब समस्या यह थी कि इस वृहद् जटिल और बिखरी हुई अनंत विषप्रसंगों वाली बातचीत को प्रस्तुत किस फौर्मेट में किया जाए? क्योंकि सवालजवाब के फौर्मेट में तो यह समाने वाली नहीं थी. इस तरह की बातचीत को सुननेसुनाने के लिए जिस प्रासंगिक माहौल की जरूरत होती है, वह यहां नदारद था. इस बातचीत में घटनाओं की जिज्ञासा और खुलासे की बेचैनी का कोई तड़का भी नहीं था. जो कुछ था, वह था विशुद्ध नशा, विशुद्ध रोमांस और विशुद्ध कला, जिसे बेतरतीब क्रम के छोटेछोटे मनमौजी आख्यानों में ही शायद बांधा जा सकता था. मैं ने यहां बस उस बुनियादी बातचीत के एक टुकड़े को ही रखने की कोशिश की है जिस से पता चलता है कि इस शख्स ने देश के तमाम अखबारों को खूबसूरत बनाने के लिए आखिर क्या कलाकारी की.

जैसा कि मैं ने पहले ही कहा कि जैन कमल एक ऐसे मीडिया डिजाइनर हैं जिन के पास गाथा सुनाने की अनगिनत कहानियां हैं.

ड्रौपलैटर का सफर

हिंदुस्तान में ड्रौपलैटर की शुरुआत करने वाले शख्स यही हैं. देश में पहली बार ड्रौपलैटर कौंसेप्ट को जैन कमल ने 80 के दशक में डेबोनियर पत्रिका में इस्तेमाल किया था. हालांकि विकीपीडिया के मुताबिक, दुनिया में इस का चलन 20वीं सदी के पहले दशक यानी 1910 से ही हो रहा था, लेकिन हिंदुस्तान में जैन कमल ने ही इसे पठनीयता में चारचांद लगाने के लिए इस्तेमाल किया.

यह सब कैसे हुआ? आइए जैन कमल से ही जानते हैं, ‘‘मैं ने डेबोनियर पत्रिका में एक ऐक्सपैरिमैंट किया था. अब उस पर मैं एक किताब भी लिख रहा हूं जिस का नाम है, ‘ड्रौपलैटर.’ जी,  हां, 90 फीसदी संपादक नहीं जानते कि ड्रौपलैटर क्या है और हम उसे क्यों इस्तेमाल करते हैं?

‘‘ड्रौपलैटर का कौंसैप्ट कुछ यों है कि जब आप कोई धारावाहिक पढ़ते हैं यानी स्टोरी का एक हिस्सा आज पढ़ा और अगला हिस्सा अगले अंक में आना है. कहने का मतलब एक सीक्वैंस को मेंटेन करना है. ऐसे में बड़ा सवाल है कि पाठक की रुचि कैसे बनाए रखी जाए या 2 हजार से 4 हजार शब्दों की स्टोरी को एक सामान्य पाठक से कैसे पढ़वाया जाए.

‘‘इन सवालों को ले कर मैं ने डेबोनियर में सब से पहले बहराम कांट्रैक्टर और डौम मोरिस की स्टोरी में ड्रौपलैटर का इस्तेमाल किया. हिंदुस्तान में यह ड्रौपलैटर का पहला इस्तेमाल था और जैसा कि मैं ने बताया कि इस के पीछे मेरी सोच कंटैंट को अलग दिखाने भर की या खूबसूरती बढ़ाने भर की नहीं थी. इस के पीछे मूल सोच यह थी कि पाठक को कैसे उबाए बिना लंबीलंबी स्टोरी पढ़वाई जाएं.

‘‘उदाहरण के लिए जैसे डौम मोरिस की एक स्टोरी है. जिस में वे लिखते हैं कि रात में मैं पी कर गली के अंदर से जा रहा था. वहां ऐसा हुआ…वहां वैसा हुआ… और इस के बाद मैं नाली में गिर गया. यहां से कहानी टर्न लेती है, तो कहानी टर्न लेते हुए दिखनी चाहिए न? यहां मैं आगे की कहानी सुनाने के लिए ड्रौपलैटर का इस्तेमाल करता हूं, क्योंकि यहां से कहानी नई बात कहनी शुरू करती है जो पिछली बात से अलग है. यहीं ड्रौपलैटर अपनी ताकत दिखाता है.

‘‘अपने अलग दिखने की ताकत से ड्रौपलैटर पाठक का कौलर पकड़ कर, उस को स्टोरी पढ़ने के लिए मजबूर कर देगा. कुल मिला कर लिखे हुए को पढ़वाने की कला है डिजाइन और इसी डिजाइन का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा है ड्रौपलैटर.’’

चल निकला ड्रौपलैटर और मैं भी वे आगे कहते हैं, ‘‘ड्रौपलैटर सब को पसंद आया. भले ज्यादातर लोगों को इस के पीछे की सोच समझ नहीं आई लेकिन पसंद सब को आया. कुछ लोगों ने तो इसे महज फैशन समझा और उसी तरह खुद इस्तेमाल भी करने लगे जैसे ‘फेमिना.’ फेमिना में ड्रौपलैटर को ऐज ए फैशन रखा जाने लगा. लेकिन मेरे कौंसैप्ट को इस देश में एक आदमी ने सब से अच्छी तरह से समझा. वह था बहराम कौंट्रैक्टर, ‘आफ्टरनून’ अखबार का संपादक. वह रोज मुझ से बात करने के लिए अपनी गाड़ी भेजता. बोलता, कमल को बुलाओ. मैं ने उस समय उस के अखबार को डिजाइन करने के लिए 25 हजार रुपए चार्ज किए थे.

‘‘बहरहाल, मेरे कहने का मतलब यह है कि ड्रौपलैटर वह जादू था जिस ने 2 हजार से 4 हजार शब्दों की स्टोरी को पढ़ाने में ही मदद नहीं की, मेरी भी कीमत बढ़ा दी. लेकिन जिस ड्रौपलैटर ने अंगरेजी में आकर्षण और पठनीयता की इतनी कामयाब कहानी लिखी, वह सब हिंदी में इतना आसान नहीं था, क्यों? बताता हूं. ऐसा इसलिए था क्योंकि हिंदी में अंगरेजी जैसे सभी अक्षरों की लंबाई एकजैसी नहीं है. हिंदी में अगर मान लीजिए हम ने कोई ड्रौपलैटर अ अक्षर से शुरू किया है तो उस के आगे जैसे ही आप अंगूर शब्द लिखेंगे तो वहां पूरी लाइन या डिजाइन डिसबैलेंस हो जाएगी. इसलिए हिंदी में औपरेटर ड्रौपलैटर कौंसैंप्ट से कन्नी काटता. मैं ने उस के लिए एक तरीके की खोज की.’’

हाथ लगा लौक टु लीड सिस्टम

जैन कमल कहते हैं, ‘‘हम ने ‘लौक टु लीड सिस्टम’ का इस्तेमाल किया. यह तकनीक हालांकि कंप्यूटर में पहले से ही मौजूद थी लेकिन इस्तेमाल नहीं हो रही थी. इसे मैं ने ही देश में सब से पहले इस्तेमाल किया. लेकिन यह खूबसूरती यों ही नहीं आ गई. इस के पीछे और कहानियां भी हैं.

‘‘वास्तव में पहले क्या होता था कि पत्रकार स्टोरी लिख कर औपरेटरों के पास पटक कर घर चले जाते थे. मैं ने ‘इंडियन ऐक्सप्रैस’ के मालिक को ब्रीफ किया कि क्यों पत्रकारों को ही अपनी स्टोरी टाइप करनी चाहिए, न कि औपरेटरों को. मालिक को बात समझ आ गई. उस ने नोटिस बोर्ड में एक नोटिस लगा दिया कि अगर नौकरी करना है तो अपनी स्टोरी खुद फीड कर के जानी होगी. हालांकि, इस की वजह से आधे से ज्यादा लोग नौकरी छोड़ने के लिए मजबूर हो गए. इस कारण तमाम पत्रकार मुझे पीटने के लिए ढूंढ़ने लगे. वे मेरी पिटाई करना चाहते थे.

‘‘मैं यह सब पहले से ही जानता था, लेकिन मैं अपनी सोच में इतना बदमाश था कि यह सब करना ही था. मुझे मालूम था कि अपने कौंसैप्ट को मैं अगर पत्रकारों या एडिटर के साथ डिस्कस करूंगा तो कोई नहीं सुनेगा. लेकिन अगर वही बात उन से मालिक बोलेगा तो सब सुनेंगे, सब को सुनना ही पड़ेगा.

‘‘इस से अखबार को बहुत बेनिफिट हुआ. इस से अखबार बहुत साफसुथरे हो गए. इस से उन के चेहरे निकल आए. क्यों जब तक औपरेटर के जिम्मे टाइपिंग थी, तब तक होता यह था कि अगर स्टोरी छोटी पड़ गई तो उसे पेज बनाने वाले लोग लीडिंग बढ़ा कर ऐडजस्ट कर लेते थे. इसी तरह अगर बढ़ गई तो कुछ लाइनें काट देते थे. मैं ने फौर्मेट को लौक कर दिया. आप को कम करना हो या बढ़ाना हो, जबरदस्ती नहीं चल सकती. इस सब से अखबारों को पढ़ने में बहुत सहूलियत हुई. उन में सुंदरता दिखने लगी.’’

यह एक रिवोल्यूशन था, लेकिन यह यों ही नहीं हुआ. इस में कंट्रोलिंग औफ कंप्यूटर, नौलेज औफ कंप्यूटर ऐंड फीडिंग औफ कंप्यूटर को कंट्रोल किया जैन कमल के डिजाइन ने.

यह आइडिया नहीं एक किस्म का बाइबिल है? पूछने पर वे कहते हैं, ‘‘जी, हां, मैं पूरी जिम्मेदारी से कह रहा हूं कि अखबार की डिजाइनिंग का यह बाइबिल है. मैं ने  लोकसत्ता के लिए  रिसर्च गाइड बुक बनाई है. उसे अगर मैं आप को दे दूं तो आप किसी अखबार को खुद ही ठीक कर देंगे बिना मेरे. इस में अखबार को डिजाइन करने का पूरा का पूरा ब्लूप्रिंट है. मैं ने ऐसी एकदो नहीं, 60 से ज्यादा बाइबिलें लिखी हैं.

‘‘कहने का मतलब यह कि मैं ने जिस भी अखबार को डिजाइन किया है, उस के लिए उस की डिजाइन गाइड भी लिखी है. अब इस में एक बड़ी और बाधा आई. अंगरेजी में साढ़े 7 लाख फौंट हैं. देवनागरी में 450 फौंट हैं. हम ने इंजीनियर के साथ बैठ कर महज 20-25 फौंट चुन लिए और बाकी सब को कंप्यूटर से निकाल बाहर किया ताकि उन का बोझ घटे. इस से कंप्यूटर भी तेज चलने लगे और हमारी डिजाइन में गैरजरूरी हस्तक्षेप होने से भी बच गए. इस तरह अखबारों को सुंदर बनाने में, उन को पठनीय बनाने में बहुत लड़ाई लड़ी गई है.’’

आयकर इंसपेक्टर का खतरनाक खेल

12 अप्रैल की बात है. एक अधेड़ आदमी जयपुर के गांधीनगर पुलिस थाने पहुंचा. उस ने थाने के गेट पर खड़े संतरी से कहा, ‘‘भैया, मुझे रिपोर्ट दर्ज करानी है.’’

संतरी ने अधेड़ को अंदर ड्यूटी अफसर से मिलने को कहा. अंदर एक सबइंसपेक्टर ड्यूटी अफसर की कुरसी पर बैठा था. आसपास पुलिस के 2 जवान बैठे कुछ लिखापढ़ी कर रहे थे. ड्यूटी अफसर के सामने रखी कुर्सियों पर 2 लोग पहले से बैठे थे, जिन से ड्यूटी अफसर बात कर रहा था.

ड्यूटी अफसर को बातों में व्यस्त देख कर अधेड़ कुछ देर खड़ा रहा. फिर बेचैनी से इधरउधर देखने लगा. अधेड़ की बेचैनी देख कर सबइंसपेक्टर ने पूछा, ‘‘बताएं साहब, क्या बात है?’’

‘‘थानेदार साहब, मेरे बेटे की बहू नहीं मिल रही है. आप उसे ढूंढ देंगे तो भला होगा.’’ अधेड़ ने अपने आने का मकसद बता दिया.

‘‘आप की बहू कब से गायब है?’’ ड्यूटी औफिसर ने पूछा.

‘‘साहब, वह एक दिन पहले से गायब है.’’ अधेड़ ने अपने कंधे पर पड़े अंगौछे से माथे पर आया पसीना पोंछते हुए कहा.

‘‘आप की बहू आप के बेटे के पास ही रहती होगी, फिर वह गायब कैसे हो गई?’’ ड्यूटी अफसर ने अधेड़ के चेहरे पर नजरें गड़ा कर पूछा, ‘‘कहीं ऐसा तो नहीं कि वह अपनी मरजी से किसी के साथ चली गई हो?’’

‘‘नहीं थानेदार साहब, ऐसी कोई बात नहीं है.’’ अधेड़ ने ड्यूटी अफसर को आश्वस्त करते हुए कहा, ‘‘मेरा बेटा आयकर विभाग में इंसपेक्टर है. उस की पोस्टिंग गुजरात के वड़ोदरा में है. मेरी बहू यहीं जयपुर के बापूनगर में एक पीजी हौस्टल में रह कर टीचर भर्ती परीक्षा की तैयारी कर रही थी.’’

ड्यूटी अफसर ने अधेड़ को एक कागज देते हुए कहा, ‘‘आप अपनी लिखित रिपोर्ट दे दो, हम रिपोर्ट दर्ज कर के आप की बहू को जरूर तलाश करेंगे.’’

अधेड़ ने कागज ले कर थानाप्रभारी के नाम एक प्रार्थनापत्र लिखा. अधेड़ ने वह प्रार्थनापत्र ड्यूटी अफसर को देते हुए कहा, ‘‘साहब, मेरी यह रिपोर्ट दर्ज कर लो.’’

ड्यूटी अफसर ने उस प्रार्थनापत्र पर सरसरी नजर डाली.

प्रार्थनापत्र का लब्बोलुआब यह था कि रिपोर्ट दर्ज कराने आया वह अधेड़ अलवर जिले के कठूमर का रहने वाला बृजेंद्र सिंह था. उस का बेटा लोकेश चौधरी आयकर विभाग में निरीक्षक था.

लोकेश चौधरी गुजरात के वड़ोदरा शहर में तैनात होने के कारण वहीं रहता था. लोकेश की शादी कोई सवा साल पहले भरतपुर जिले के सिनसिनी गांव में रहने वाले रामकुमार सिनसिनवार की बेटी मुनेश से हुई थी.

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मुनेश शिक्षक भरती परीक्षा की तैयारी कर रही थी. इस के लिए वह जयपुर के बापूनगर में डी-126 कृष्णा मार्ग पर स्थित एक पीजी हौस्टल में रहती थी. मुनेश इसी हौस्टल से 11 अप्रैल को लापता हो गई थी.

गांधीनगर पुलिस थाने में 12 अप्रैल को बृजेंद्र सिंह की लिखित रिपोर्ट पर मुनेश की गुमशुदगी का मामला दर्ज कर लिया गया. रिपोर्ट में बृजेंद्र सिंह ने अपनी पुत्रवधू के गुम होने में किसी पर शक जाहिर नहीं किया था, इसलिए पुलिस ने सामान्य तरीके से जांचपड़ताल शुरू कर दी.

इस के दूसरे ही दिन लोकेश चौधरी जयपुर आ कर पुलिस अफसरों से मिला और अपनी पत्नी को तलाश करने की गुहार लगाई. पुलिस अधिकारियों ने लोकेश की परेशानी समझते हुए उस की पत्नी की हरसंभव तरीके से तलाश करने का आश्वासन दिया.

1-2 दिन बाद लोकेश जयपुर कमिश्नरेट के आला पुलिस अफसरों से मिला और उन से गांधीनगर थाना पुलिस की शिकायत करते हुए कहा कि पुलिस सही तरीके से उस की पत्नी की तलाश नहीं कर रही है.

लोकेश का कहना था कि मुनेश का अपहरण हुआ है. लोकेश बारबार पुलिस अफसरों से मिल कर अपनी पत्नी को तलाश करने का दबाव बनाने लगा.

इस पर पुलिस उपायुक्त (पूर्व) कुंवर राष्ट्रदीप ने मुनेश की तलाश के लिए अतिरिक्त पुलिस उपायुक्त (पूर्व) हनुमान प्रसाद मीणा और गांधीनगर के सहायक पुलिस आयुक्त राजपाल गोदारा के सुपरविजन में इंसपेक्टर सुरेंद्र सिंह, सबइंसपेक्टर कृष्ण कुमार, कांस्टेबल ओमप्रकाश और नरेंद्र कुमार की एक टीम गठित कर दी.

इस पुलिस टीम ने जांच के दौरान हौस्टल के आसपास के सीसीटीवी कैमरों की फुटेज देखीं. इस के अलावा मुनेश और उस के पति लोकेश चौधरी सहित अन्य संदिग्ध लोगों के मोबाइल नंबरों की कालडिटेल्स भी निकलवाई. पुलिस ने मुनेश व लोकेश के दोस्तों का भी पता लगाया. साथ ही दोनों की पुरानी हिस्ट्री भी पता कराई. व्यापक जांचपड़ताल में पुलिस अफसरों को मुनेश के गुम होने का मामला संदिग्ध नजर आया.

पुलिस इस मामले की तह तक जाने के लिए जांचपड़ताल में जुटी हुई थी कि इसी बीच 21 अप्रैल को मुनेश के पिता रामकुमार सिनसिनवार ने गांधीनगर थाने में एक लिखित रिपोर्ट दी. रिपोर्ट में लिखा था कि मेरी बेटी मुनेश 11 अप्रैल से गायब है. इस के बाद मेरा दामाद लोकेश जयपुर आया तो हम ने उस का मोबाइल चैक कराने के लिए कहा था. इस पर लोकेश ने अपना मोबाइल फोरमैट कर डेटा डिलीट कर दिया.

मुनेश के पिता ने रिपोर्ट में लिखा कि लोकेश व उस के घर वाले मेरी बेटी को दहेज के लिए प्रताडि़त करते रहते थे. उन्होंने इसी साल फरवरी में मुनेश की 10 लाख रुपए की एफडी तुड़वा कर पैसे निकलवा लिए थे.  रिपोर्ट में आगे लिखा था कि लोकेश और उस के घर वालों ने मिल कर मेरी बेटी मुनेश का षडयंत्रपूर्वक अपहरण कर के उस की हत्या कर दी है. इस पर गांधीनगर थाने में उसी दिन भादंसं की धारा 364, 498ए, 302, 304बी और 120बी के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया गया.

इस मामले की जांच मालवीयनगर के सहायक पुलिस आयुक्त (प्रशिक्षु) आईपीएस औफिसर कावेंद्र सिंह सागर को सौंपी गई. कावेंद्र सिंह सागर ने रिपोर्ट दर्ज होते ही लोकेश चौधरी की तलाश कराई. पता चला कि वह जयपुर में ही है. इस के बाद उसी दिन यानी 21 अप्रैल को लोकेश चौधरी को पुलिस ने थाने ला कर पूछताछ की. उस की पूर्व हिस्ट्री और मोबाइल काल विश्लेषण के आधार पर उस से कई सवाल किए गए.

पुलिस के सवालों के आगे लोकेश ज्यादा देर तक नहीं टिक सका, वह टूट गया. उस ने बताया कि अपने एक साथी के सहयोग से उस ने अपनी पत्नी मुनेश को जयपुर से गुजरात के वड़ोदरा बुलाया था. वड़ोदरा में मुनेश की हत्या कर के उस की लाश जमीन में गाड़ दी गई थी. लोकेश ने बताया कि उस ने मुनेश की हत्या की साजिश अपनी प्रेमिका से शादी करने के लिए रची थी. पुलिस ने उसी दिन लोकेश को गिरफ्तार कर लिया.

लोकेश की स्वीकारोक्ति से पुलिस अधिकारी दंग रह गए. पत्नी के गुम होने का नाटक रच कर जो आयकर निरीक्षक पुलिस पर ढिलाई बरतने का आरोप लगा रहा था, उस ने 10 दिन पहले ही पत्नी की हत्या कर दी थी.

यह खुलासा होने पर उसी दिन जयपुर से प्रशिक्षु आईपीसी औफिसर कावेंद्र सिंह सागर के नेतृत्व में पुलिस की एक टीम आरोपी आयकर निरीक्षक लोकेश चौधरी को साथ ले कर गुजरात के वड़ोदरा शहर के लिए रवाना हो गई. 22 अप्रैल को लोकेश की निशानदेही पर जयपुर पुलिस ने वड़ोदरा में हरणी एयरपोर्ट क्षेत्र स्थित तृषा डुप्लेक्स में बगीचे की जमीन खोद कर गाड़ा गया मुनेश का शव बरामद कर लिया. मुनेश का शव बगीचे में एक कोने में करीब 7 फीट गहरा गड्ढा खोद कर दफनाया गया था.

मुनेश का शव निकालने के लिए गड्ढा खुदवाना पड़ा, इस काम में पुलिस को मजदूरों के अलावा जेसीबी की मदद भी लेनी पड़ी. गड्ढा खोदने में ही 3 घंटे लग गए. मुनेश के शरीर पर बहुत कम कपड़े मिले.

लोकेश ने मुनेश का शव जमीन में गाड़ कर उस पर करीब 15 किलो नमक भी डाल दिया था ताकि शव जल्दी से गल जाए और बदबू भी न फैले. बाद में गड्ढे में मिट्टी भर दी गई. फिर उसे समतल कर पानी का छिड़काव कर दिया गया था ताकि मिट्टी जम जाए.

वड़ोदरा से मुनेश का शव बरामद कर पुलिस दल उसी रात जयपुर के लिए वापस चल दिया. 23 अप्रैल को जयपुर पहुंच कर पुलिस ने मुनेश के शव का सवाई मानसिंह अस्पताल में पोस्टमार्टम कराया. दोपहर बाद मुनेश का शव उस के पिता को सौंप दिया गया. मुनेश के घर वाले उस का शव भरतपुर जिले के अपने पैतृक गांव सिनसिनी ले गए.

सिनसिनी में जब मुनेश का शव पहुंचा तो पूरे गांव में शोक छा गया. सवा साल पहले जिस बेटी को गांव वालों ने दुलहन बना कर विदा किया था, अब कफन में लिपटी उस की लाश गांव पहुंची थी. हजारों लोगों की मौजूदगी में मुनेश का गांव में अंतिम संस्कार कर दिया गया. पुलिस ने मुनेश की हत्या के मामले में लोकेश चौधरी के दोस्त प्रवेंद्र शर्मा को 23 अप्रैल की रात गिरफ्तार कर लिया.

लोकेश ने प्रवेंद्र शर्मा को जयपुर भेज कर मुनेश को वड़ोदरा बुलवाया था और उसी की मदद से मुनेश की हत्या कर उस का शव जमीन में गाड़ दिया था. प्रवेंद्र आयकर निरीक्षक लोकेश का दोस्त और उसी के गांव का रहने वाला था.

पुलिस की ओर से लोकेश और प्रवेंद्र से की गई पूछताछ में मुनेश की हत्या की जो कहानी उभर कर सामने आई, वह सन 2015 में प्रदर्शित अजय देवगन की फिल्म ‘दृश्यम’ से मिलतीजुलती है. हालांकि लोकेश ने पुलिस को बताया कि उस ने फिल्म ‘दृश्यम’ देखी जरूर है, लेकिन मुनेश की हत्या इस फिल्म से प्रेरित हो कर नहीं की.

अलवर जिले के कठूमर के रहने वाले लोकेश की शादी 5 फरवरी, 2017 को भरतपुर जिले के सिनसिनी गांव के रहने वाले रामकुमार सिनसिनवार की बेटी मुनेश से हुई थी. शादी के बाद मुनेश अपने आयकर निरीक्षक पति लोकेश चौधरी से खूब खुश थी. उसे अपनी किस्मत पर रश्क होता था कि उसे प्यार करने वाला अफसर पति मिला है. शादी के बाद कुछ समय वह पति के साथ वड़ोदरा में रही, फिर ससुराल आ गई. बीच में जब भी मौका मिलता, लोकेश अपने गांव आ जाता या मुनेश वड़ोदरा चली जाती. इस तरह दोनों की जिंदगी हंसीखुशी से बीत रही थी.

मुनेश पढ़ीलिखी थी. उस की इच्छा थी कि वह भी सरकारी नौकरी करे. वह अध्यापिका बनना चाहती थी. एक दिन उस ने पति लोकेश से कहा कि राजस्थान में हजारों शिक्षकों की भरती होने वाली है. वह शिक्षक भरती परीक्षा देना चाहती है, जिस के लिए उसे जयपुर में रह कर तैयारी करनी पड़ेगी. जयपुर में रहने से उस पर घर के कामकाज का बोझ भी नहीं रहेगा और वह आराम से अपनी पढ़ाई पर ध्यान दे सकेगी.

मुनेश की इस इच्छा पर न तो लोकेश को कोई ऐतराज था और न ही उस के घर वालों को. लोकेश ने उस की बात पर सहमति जताते हुए कहा कि यह तो अच्छी बात है. आजकल वैसे भी महंगाई इतनी हो गई है कि पतिपत्नी मिल कर कमाएं, तभी अच्छे तरीके से जिंदगी गुजर सकती है.

लोकेश ने जयपुर के बापूनगर में डी-126 कृष्णा मार्ग पर स्थित एक पीजी हौस्टल में मुनेश के रहने की व्यवस्था कर दी. मुनेश इसी हौस्टल में रह कर अपनी पढ़ाई कर रही थी. दूसरी ओर लोकेश का पहले से एक युवती से प्रेमप्रसंग चल रहा था. हालांकि मुनेश में कोई बुराई नहीं थी. लोकेश को भी उस से कोई शिकायत नहीं थी.

मुनेश पढ़ीलिखी थी, शक्लसूरत से भी खूबसूरत थी. आधुनिक और फैशनेबल भी थी, लेकिन पता नहीं लोकेश को अपनी प्रेमिका में ऐसा क्या नजर आता था कि वह उसी के खयालों में खोया रहता था.

लोकेश अपनी प्रेमिका से शादी करना चाहता था, लेकिन न तो कानूनी दृष्टि से यह संभव था और न ही सामाजिक रूप से. सरकारी नौकरी करते हुए दूसरी शादी करने पर उस की नौकरी भी जा सकती थी. इसलिए वह मुनेश को ठिकाने लगाने की साजिश रचने लगा. साजिश रचने के साथ वह ‘दृश्यम’ फिल्म की तरह पुलिस के हर संभावित सवालों के जवाब भी तय करने लगा.

लोकेश को पता था कि मोबाइल फोन की लोकेशन के आधार पर पुलिस उस तक पहुंच जाएगी, इसलिए उस ने हर कदम बहुत सोचसमझ कर उठाया.

पति पर संदेह का सब से पहला कारण प्रेमप्रसंग और अवैध संबंध होते हैं, इसलिए उस ने अपनी प्रेम कहानी को छिपाने के लिए अपने मोबाइल से प्रेमिका से बात करना बंद कर दिया था.

उस ने अपने एक साथी कर्मचारी की आईडी हथिया कर उस के नाम से सिम खरीदी. इस सिम से वह केवल अपनी प्रेमिका से ही बात करता था. अन्य किसी से बात करने के लिए वह अपने दूसरे मोबाइल नंबरों का उपयोग करता था.

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लोकेश ने खुद को संदेह से दूर रखने के लिए मुनेश को एक महीने पहले ही जयपुर में स्कूटी दिलवाई. वह जानबूझ कर दिन में कई बार वड़ोदरा से जयपुर में पत्नी मुनेश को फोन करता था ताकि दोनों के बीच अच्छे संबंधों की बात साबित हो सके.

साजिश के तहत लोकेश के कहने पर उस के दोस्त प्रवेंद्र शर्मा ने वड़ोदरा में हरणी एयरपोर्ट क्षेत्र स्थित तृषा डुप्लेक्स में ग्राउंड फ्लोर पर किराए का मकान लिया. लोकेश व प्रवेंद्र ने 10 अप्रैल को इस मकान के बगीचे के एक कोने में मजदूरों से करीब 7 फुट गहरा गड्ढा खुदवाया.

इन्होंने मजदूरों से कहा कि वे यह गड्ढा खाद बनाने के लिए खुदवा रहे हैं. बगीचे में गड्ढा खुदाई का काम आसपड़ोस के लोगों को न दिखाई दे, इस के लिए उन्होंने ग्रीन नेट से बगीचे को कवर कर दिया था.

लोकेश इतना शातिर दिमाग था कि खुद की फोन लोकेशन वड़ोदरा में ही बनाए रखना चाहता था. गड्ढा खुद जाने के बाद उस ने अपने दोस्त प्रवेंद्र को उसी रात वड़ोदरा से जयपुर के लिए रवाना कर दिया. लोकेश ने प्रवेंद्र का मोबाइल खुद के पास रख लिया और उसे दूसरा नया मोबाइल दे कर जयपुर भेजा.

प्रवेंद्र दूसरे दिन यानी 11 अप्रैल को जैसे ही जयपुर पहुंचा, लोकेश ने अपनी पत्नी को फोन कर कहा कि मैं एक केस में फंस गया हूं, बड़ी परेशानी में हूं. मेरा दोस्त जयपुर आया हुआ है. तुम उस के साथ वड़ोदरा आ जाओ. मैं अपने दोस्त से कह देता हूं कि वह तुम्हें हौस्टल से ले लेगा.

मुनेश कुछ सोचतीविचारती, इस से पहले ही प्रवेंद्र बापूनगर स्थित पीजी हौस्टल पहुंच गया. प्रवेंद्र ने मुनेश से कहा, ‘‘भाभीजी, भैया ने वड़ोदरा बुलाया है और चलना भी अभी है.’’

मुनेश को किसी बात का कोई शकशुबहा तो था नहीं, इसलिए वह प्रवेंद्र के साथ चल दी. प्रवेंद्र ने हौस्टल से रवाना होते ही बहाने से मुनेश का मोबाइल ले लिया और उस की सिम निकाल ली.

मुनेश के मोबाइल की सिम निकालने से उस की आखिरी लोकेशन जयपुर में गांधीनगर, बापूनगर व लालकोठी इलाके में आती रही. इस के पीछे लोकेश की मंशा थी कि पुलिस का संदेह गुजरात और वड़ोदरा तक न पहुंचे.

12 अप्रैल की दोपहर मुनेश और प्रवेंद्र वड़ोदरा पहुंच गए. प्रवेंद्र मुनेश को सीधे अपने किराए के मकान पर ले गया. वहां लोकेश पहले से मौजूद था.

मुनेश जैसे ही उस मकान में पहुंच कर अपने पति लोकेश से मिलने के लिए आगे बढ़ी तो लोकेश ने उस का गला घोंट दिया. प्रवेंद्र ने उस का मुंह दबा लिया, इस से मुनेश की चीख भी किसी ने नहीं सुनी.

मुनेश की हत्या के बाद लोकेश और प्रवेंद्र ने मिल कर उस का शव मकान के बगीचे में पहले से खुदवाए हुए गड्ढे में डाल दिया. फिर शव पर नमक व मिट्टी डाल कर दोनों ने उस गड्ढे को भर दिया. बाद में पानी का छिड़काव भी कर दिया.

मुनेश की हत्या के बाद लोकेश ने अपने पिता बृजेंद्र सिंह को फोन कर के कहा कि मुनेश नहीं मिल रही है. पुलिस में इस की रिपोर्ट दर्ज करा दो. बेटे के कहने पर बृजेंद्र सिंह ने उसी दिन गांधीनगर थाने में मुनेश के गुम होने की रिपोर्ट दर्ज करा दी.

इस के अगले दिन लोकेश वड़ोदरा से जयपुर आ गया. उस ने पुलिस को मुनेश के अपहरण की आशंका जताई और कहा कि उस की मुनेश से मोबाइल पर आखिरी बार 11 अप्रैल को बात हुई थी. उस समय उस ने कहा था कि वह किसी दोस्त के पास जा रही है.

बाद में पुलिस ने जब मुनेश की तलाश में लोकेश और मुनेश के मोबाइल की काल डिटेल्स निकाली तो लोकेश की वड़ोदरा से जयपुर में मुनेश से 11 अप्रैल को बात होने की तो पुष्टि हुई. इस के बाद मुनेश के मोबाइल की टावर लोकेशन जयपुर में गांधीनगर, बापूनगर और लालकोठी के आसपास ही घूमती रही.

इसीलिए पुलिस लोकेश पर संदेह नहीं कर पा रही थी और लोकेश इस का फायदा उठा कर पुलिस पर दबाव बना रहा था ताकि पुलिस मुनेश के अपहरण की कहानी में उलझ कर रह जाए.

प्रवेंद्र शर्मा गुजरात के भावनगर में नौकरी करता था. लोकेश ने उसे आयकर विभाग में नौकरी दिलवाने का झांसा दे कर मुनेश की हत्या की साजिश में शामिल किया था.

लोकेश ने पुलिस से बचने के लिए करीब एक दर्जन प्लान बनाए थे. इसीलिए जयपुर पुलिस शुरू में मुनेश के अपहरण की कहानी में ही उलझ कर रह गई. पुलिस ने इस मामले को सुलझाने के लिए लोकेश और मुनेश के मोबाइल फोंस की साल भर की करीब 15 हजार कालडिटेल्स की जांच की.

लोकेश ने मुनेश की हत्या की साजिश रचने के साथ ही करीब 3 महीने पहले अपनी प्रेमिका से बातचीत के लिए दूसरे के नाम से सिम ले ली थी. उस ने प्रेमिका को भी सख्त हिदायत दे दी थी कि वह उस के पुराने नंबरों पर काल न करे. इस के पीछे लोकेश का मानना था कि पुलिस ज्यादा से ज्यादा 2-3 महीने की काल डिटेल्स देखेगी, इस में उस की प्रेमिका का नंबर नहीं आएगा.

प्लान के तहत लोकेश ने मुनेश को जयपुर में स्कूटी दिलवाई और शिक्षक भरती परीक्षा के लिए उस का पीजी हौस्टल में एडमिशन कराया ताकि ससुराल वालों की नजर में वह एक अच्छा दामाद बना रहे. इस के अलावा वह रोजाना मुनेश को कई बार फोन करता और मैसेज भेजता ताकि लोगों को लगे कि दोनों एकदूसरे को खूब प्यार करते हैं.

लोकेश खुद वड़ोदरा में रहा. दोस्त प्रवेंद्र के नाम पर उस ने वड़ोदरा में किराए का मकान लिया. फिर प्रवेंद्र को नया मोबाइल दे कर जयपुर भेजा. योजनानुसार प्रवेंद्र ने मुनेश के साथ जयपुर से वड़ोदरा के लिए रवाना होते ही उस के मोबाइल की सिम निकाल कर फेंक दी ताकि उस की लोकेशन जयपुर में आती रहे.

इतना ही नहीं, उस ने पिता से पुलिस में बहू के लापता होने की रिपोर्ट भी दर्ज करवाई. फिर दूसरे दिन ही जयपुर आ कर लोकेश ने मुनेश के अपहरण की कहानी गढ़ कर गांधीनगर थाना पुलिस की शिकायत की ताकि पुलिस अफसर शिकायत और अपहरण की कहानी में उलझे रहें.

लोकेश ने अपना मोबाइल हैंग होने का बहाना बना कर उसे फोरमैट करा दिया. इस से उस का संदिग्ध डाटा, मैसेज आदि डिलीट हो गए.

11 अप्रैल की रात हौस्टल में मुनेश की रूममेट आशा ने लोकेश को फोन कर के कहा कि मुनेश का टिफिन आया हुआ है लेकिन न तो मुनेश मिल रही है और न ही उस का नंबर लग रहा है. इस पर लोकेश ने रूममेट को सख्ती से कहा कि पीजी हौस्टल संचालक से मुनेश के बारे में पूछो, क्योंकि यह उस की जिम्मेदारी है.

मामले का खुलासा होने से पहले तक लोकेश अपने ससुराल वालों के साथ मिल कर मुनेश की तलाश में जुटा रहा ताकि उस पर किसी को कोई संदेह न हो.

लोकेश ने भले ही फिल्म दृश्यम से प्रेरित हो कर मुनेश की हत्या की साजिश नहीं रची हो, लेकिन उस ने 10 दिन तक पुलिस को गुमराह करने में कोई कसर नहीं छोड़ी.

यह विडंबना ही है कि केंद्र सरकार के अधिकारी लोकेश चौधरी ने प्रेमिका से शादी रचाने के लिए अपने हाथ पत्नी के खून से रंग लिए. भोलीभाली मुनेश शादी के सवा साल बाद भी अपने पति की शातिर चालों को नहीं समझ सकी. वह पति के विश्वास के भरोसे मारी गई. उस ने तो लोकेश के साथ सात जनम तक जीनेमरने की कसमें खाई थीं.

लोकेश और उस के दोस्त प्रवेंद्र ने जो कुछ किया, उस की सजा उन्हें कानून देगा. सवाल यह भी है कि लोकेश की प्रेमिका क्या कातिल प्रेमी का इंतजार करती रहेगी.

जब प्यार हुआ हाईजैक

20 जनवरी, 2018 की बात है. मध्य प्रदेश के सीहोर जिले के थाना आष्टा के थानाप्रभारी बी.डी. वीरा थाने में बैठे पुराने मामलों की फाइल देख रहे थे, तभी उन्हें इलाके के समरदा गांव के पास मिट्टी की खदान में किसी युवक की लाश पड़ी होने की खबर मिली.

मामला हत्या का था, इसलिए उन्होंने उसी समय घटना की जानकारी अपने एसडीओपी और एसपी को दे दी और खुद अपनी टीम के साथ मौके लिए रवाना हो गए. समरदा गांव के पास स्थित मिट्टी की वह खदान कुछ दिनों से बंद पड़ी थी.

थानाप्रभारी जब मौके पर पहुंचे तो वहां एक युवक की लाश मिली. उस युवक की उम्र यही कोई 20 साल थी. उस का सिर कुचला हुआ था. वहीं पर खून लगा पत्थर पड़ा था. लग रहा था कि शायद उसी पत्थर से उस की हत्या की गई थी. वहीं पर बीयर की खाली बोतलें भी पड़ी थीं.

मौके के हालात देख कर थानाप्रभारी यह भी समझ गए कि उस की हत्या किसी दोस्त ने ही की होगी. बहरहाल, पहली जरूरत लाश की पहचान की थी. पुलिस ने थोड़ा प्रयास किया तो लाश की पहचान भी हो गई. पता चला कि मृतक का नाम रितिक मेहता था और वह आष्टा में राठौर मंदिर के पास रहता था.

खबर मिलने पर रितिक के घर वाले भी घटनास्थल पर पहुंच गए. उन्होंने बताया कि रितिक 19 जनवरी की सुबह लगभग 10 बजे अपने दोस्त क्लिंटन उर्फ लखन मालवीय के साथ कालेज जाने को बोल कर निकला था, जिस के बाद वह घर वापस नहीं आया.

संदेह के दायरे में आया लखन

थानाप्रभारी को पहले ही मामले में यारीदोस्ती के बीच हुई हत्या का शक था. घर वालों से पूछताछ के बाद थानाप्रभारी ने घटनास्थल की काररवाई निपटाई और लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. साथ ही थाने में हत्या का केस भी दर्ज करवा दिया गया.

चूंकि रितिक लखन के साथ गया था, इसलिए थानाप्रभारी ने तत्काल एकटीम लखन के घर बरखेड़ा गांव भेज दी. लेकिन लखन घर पर नहीं मिला और न ही उस के बारे में कोई जानकारी मिली. इस से पुलिस का शक लखन पर और भी गहरा गया. लिहाजा पुलिस टीम संभावित जगहों पर लखन को तलाशने लगी.

थानाप्रभारी बी.डी. वीरा के निर्देश पर पुलिस की दूसरी टीम आष्टा से समरदा खदान के बीच रास्ते में लगे सीसीटीवी कैमरे के फुटेज जमा करने, लखन और मृतक के मोबाइल की काल डिटेल्स तथा उन की लोकेशन निकालने के काम में जुट गई.

इस छानबीन में पुलिस ने पाया कि लखन 19 जनवरी को रितिक को उस के घर के बाहर से अपनी मोटरसाइकिल पर बैठा कर शराब की दुकान पर गया था. शराब की दुकान पर लगे सीसीटीवी कैमरे में लखन बीयर खरीदते दिख गया. उस के मोबाइल की लोकेशन भी समरदा में उसी समय पर पाई गई, जिस समय रितिक का मोबाइल स्विच्ड औफ हुआ था.

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अब आष्टा थानाप्रभारी बी.डी. वीरा के सामने आरोपी की तसवीर साफ हो चुकी थी, इसलिए उन्होंने टीम के साथ अपने मुखबिरों को भी सक्रिय कर दिया. इस का नतीजा यह निकला कि 2 दिन बाद ही लखन मालवीय पुलिस के हाथ लग गया.

पकडे़ जाने पर पहले तो वह अपने आप को बेकसूर बताता रहा, लेकिन जब थानाप्रभारी ने उस से मनोवैज्ञानिक ढंग से पूछताछ की तो वह अपने ही बयानों में उलझने लगा. जिस के बाद उस ने स्वीकार कर लिया कि उस ने ही रितिक की हत्या की थी. उस ने मृतक का मोबाइल फोन और पर्स भी बरामद करा दिया.

अपने भाई की जिस मोटरसाइकिल पर वह रितिक को बैठा कर ले गया था, वह भी पुलिस ने बरामद कर ली. पूछताछ के बाद लखन ने अपने दोस्त की हत्या करने की जो कहानी बताई, वह प्यार को हाईजैक करने वाली कहानी थी—

साल भर पहले रितिक मेहता  और लखन मालवीय स्थानीय मौडल स्कूल में एक साथ पढ़ते थे. दोनों में गहरी दोस्ती थी. दोनों ही एकदूसरे के लिए कुछ भी करने को तैयार रहते थे. जब वे 10वीं कक्षा में थे, उस समय लखन का दिल साथ में पढ़ने वाली एक खूबसूरत लड़की बीना पर आ गया था. लखन ने यह बात अपने दोस्त रितिक को बताई. रितिक ने दोनों की प्रेमकहानी को आगे बढ़वाने में काफी मदद की.

लखन और बीना की प्रेम कहानी शुरू हो गई, जिस में रितिक उन दोनों की पूरी मदद करता था, इसलिए बीना की रितिक से भी अच्छी बनती थी. रितिक दोनों के एकांत में मिलने की व्यवस्था के साथसाथ उस दौरान उन की चौकीदारी भी करता था.

बताया जाता है कि कई बार तो स्कूल में खाली पड़े क्लासरूम में लखन और उस की प्रेमिका के मिलन कार्यक्रम के दौरान रितिक क्लास के बाहर खड़े हो कर पहरेदारी करता था. इसी बीच रितिक भी बीना को एकतरफा चाहने लगा था. पर उस ने अपनी चाहत कभी जाहिर नहीं होने दी. रितिक ने अपने जन्मदिन पर दोस्त लखन और उस की प्रेमिका बीना को भी बुलाया था. तब बीना ने रितिक से कहा, ‘‘रितिक, तुम हमारे लिए कितना करते हो, क्या स्कूल में कोई लड़की तुम्हारी दोस्त नहीं है?’’

‘‘नहीं, मैं ने किसी लड़की को अभी तक दोस्त नहीं बनाया.’’ रितिक बोला.

‘‘रितिक, इस स्कूल में जो भी लड़की तुम्हें पसंद हो, तुम मुझे बता दो. उस से मैं तुम्हारी दोस्ती करा दूंगी.’’ बीना ने विश्वास दिलाते हुए कहा.

एक लड़की 2 दीवाने

एकतरफा ही सही, रितिक को बीना पसंद थी. भला यह बात वह उसे कैसे बता सकता था. अगर वह अपने मन की बात उसे बता देता तो उस के दोस्त लखन का दिल टूट जाता. लिहाजा उस ने अपने दिल की बात उसे नहीं बताई.

बहरहाल, लखन और बीना की प्रेम कहानी और रितिक की उन से दोस्ती लगातार चलती रही. लेकिन किसी को यह पता नहीं था कि प्रेम कहानी वाली दोस्ती एक दिन 3 में से एक दोस्त की हत्या का कारण बनेगी. कहानी में मोड़ उस समय आया, जब 12वीं की परीक्षा में बीना और रितिक तो पास हो गए, लेकिन लखन फेल हो गया.

इस से त्रिकोण का एक कोण पीछे रह गया जबकि रितिक और बीना ने एक स्थानीय कालेज में एडमिशन ले लिया. अब रितिक और बीना की मुलाकातें कालेज में ही होने लगीं. जबकि लखन का रितिक से तो बराबर मिलनाजुलना बना रहा, पर बीना से वह नहीं मिल पाता था.

प्यार भले ही एकतरफा हो, उस की तड़प दीदार के लिए बेचैन करती है. यही लखन के साथ हुआ. वह बीना से मिलने के लिए उस के कालेज के चक्कर लगाने लगा. लेकिन यह रोजरोज संभव नहीं था. इधर लखन की गैरमौजूदगी में बीना और रितिक की दोस्ती कुछ ज्यादा ही गहराने लगी.

बीना के प्रति उस के दिल में जो प्यार दबा हुआ था, वह अंगड़ाइयां लेने लगा. पर बीना तो अब भी लखन को चाहती थी और उस के बारे में अकसर रितिक से बातें भी करती रहती थी.

जबकि रितिक चाहता था कि किसी तरह बीना के दिल में लखन के प्रति नफरत पैदा हो जाए. जब वह उस से बात करनी बंद कर देगी तो वह बीना पर अपना प्रभाव जमाना शुरू कर देगा. इस के लिए रितिक ने योजनाबद्ध तरीके से बीना से लखन की बुराइयां करनी शुरू कर दीं. वह कहता कि लखन शराब पीता है, दूसरी लड़कियों पर भी नजर रखता है.

ये सब बातें सुन कर बीना को लखन से नफरत हो गई. उस के दिमाग में लखन की जो छवि बनी हुई थी, वह बदल गई. वह सोचने लगी कि लखन भी आम लड़कों की तरह ही है. उस ने लखन से मिलना तो दूर, फोन पर बात करनी भी बंद कर दी. रितिक इस से बहुत खुश हुआ. उस ने इस नाराजगी का फायदा उठाते हुए बीना से नजदीकियां बढ़ा लीं. धीरेधीरे वह रितिक को इतना चाहने लगी कि उस ने लखन से एक तरह से किनारा कर लिया.

नफरत के बीजों की फसल

लखन हमेशा की तरह रितिक से मिलने के बहाने कालेज आ कर बीना से मिलने की कोशिश करता तो रितिक भी कोई न कोई बहाना बना देता. यानी रितिक ने लखन से भी मिलना बंद कर दिया. रितिक से नजदीकी बन जाने के बाद बीना ने उस से फोन पर भी बात करनी बंद कर दी थी.

लखन कोई दूध पीता बच्चा तो था नहीं, सो धीरेधीरे उस की समझ में आने लगा कि बीना और रितिक दोनों बदल गए हैं. इस से उसे शक हुआ कि कहीं ऐसा तो नहीं, उस की गैरमौजूदगी में दोनों के अवैध संबंध बन गए हों. कालेज में कई ऐसे लड़के पढ़ते थे, जो 12वीं कक्षा में लखन के साथ पढ़े थे. इसलिए लखन ने कुछ लड़कों से मिल कर सच्चाई का पता लगाया तो उसे जल्द ही यह बात पता चल गई कि रितिक ने उस के प्यार को हाईजैक कर लिया है.

लखन को इस बात की जरा भी उम्मीद नहीं थी कि बीना के साथसाथ रितिक भी उस के साथ इतना बड़ा धोखा करेगा. इस के लिए वह रितिक को ही कसूरवार मानने लगा. उस ने सोचा कि रितिक ने ही उस की प्रेमिका को बरगलाया होगा. इसलिए उस ने रितिक से ऐसा बदला लेने की सोची, जिस की रितिक और बीना ने कभी कल्पना भी नहीं की थी.

बन गई हत्या की योजना

आष्टा थानाप्रभारी बी.डी. वीरा के अनुसार, लखन गुस्से में था. उस ने रितिक की हत्या कर के उसे हमेशा के लिए अपने और बीना के बीच से हटाने की योजना बना ली. इस योजना के तहत 19 जनवरी, 2018 को रितिक को बीयर पिलाने का लालच दे कर वह उसे अपने साथ समरदा खदान पर ले गया. समरदा में लखन की बहन की शादी हुई थी, इसलिए वह उधर के सुनसान इलाकों के बारे में जानता था.

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लखन की चाल को रितिक समझ नहीं सका था, इसलिए वह उस के साथ आसानी से समरदा खदान की तरफ चला गया. खदान में बैठ कर दोनों ने बीयर पी, जिस के बाद नशा हो जाने पर लखन ने रितिक के साथ अपनी प्रेमिका बीना को ले कर विवाद करना शुरू कर दिया.

चूंकि रितिक को बीयर का नशा चढ़ गया था, इसलिए वह वहीं खदान में लेट गया. मौका देख कर लखन ने पास पड़े भारी पत्थर से कई वार कर के उस का सिर कुचल कर हत्या कर दी. इस के बाद वह उस का पर्स और मोबाइल ले कर वहां से भाग गया. बाद में उस ने सिमकार्ड तोड़ने के बाद रितिक का मोबाइल फोन पौलीथिन में रख कर अपने खेत में गाड़ दिया, जिसे बाद में पुलिस ने बरामद कर लिया.

लखन मालवीय से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर न्यायालय में पेश किया, जहां से उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया.

भाजपा के लिए सपा ने बनाई यह खास रणनीति

आगामी लोकसभा चुनाव की तैयारियों में जुटी समाजवादी पार्टी ने भाजपा के बूथ मैनेजमेंट को टक्कर देने का प्लान बनाया है. इसके लिए सपा ने मेरठ जिले के कुल 2701 बूथों पर प्रभारी के साथ ही प्रत्येक विधानसभा क्षेत्रों को 25 सेक्टरों में बांटकर सेक्टर प्रभारी भी नियुक्त किए जाएंगे. साथ ही मतदाता सूची में नए मतदाताओं को जोड़ने के लिए कार्यकर्ता क्या मेहनत कर रहे हैं, उसकी समीक्षा के लिए सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव के दो बड़े करीबी नेता मेरठ आ रहे हैं.

आपको बता दें कि भाजपा ने 23 से 25 जून तक नए मतदाताओं के वोट बढ़ाने के लिए अभियान चलाया हुआ है. इस अभियान के अंतर्गत भाजपा नेता व कार्यकर्ता हर बूथ पर कैंप लगाकर लोगों के वोट बनवा रहे हैं. इससे पहले भी भाजपा इस तरह से बूथ मैनेजमेंट कर चुनाव लाभ उठाती रही है. इससे सबक लेते हुए सपा ने भी इस बार भाजपा के नक्शे कदम पर चलने का फैसला किया है. सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के निर्देश पर प्रत्येक बूथ पर प्रभारी की नियुक्ति की जाएगी साथ ही प्रत्येक बूथ पर कमेटी भी गठित होगी.

इसके अलावा जिले के सातों विधानसभा क्षेत्रों को सेक्टरों में बांटा जाएगा. जिसमें एक विधानसभा क्षेत्र में 25 सेक्टर बनाये जाएंगे. प्रत्येक सेक्टर पर प्रभारी की नियुक्ति होगी. इस काम को हर हाल में 30 जून तक संपन्न करने का निर्देश दिया गया है. इन सबका कार्य लोकसभा चुनाव की मतदाता सूची में नए मतदाता जुड़वाना, फर्जी मतदाताओं के नाम हटवाना तथा दूसरी पार्टियों की गतिविधि पर नजर रखना है. इन सबके कार्य के लिए पार्टी के निर्देश पर 26 जून को एमएलसी उदयवीर सिंह समीक्षा करने आ रहे हैं. 29 जून को सपा युवजन सभा के प्रदेश अध्यक्ष ब्रजेश यादव समीक्षा करने आएंगे. ये दोनों नेता अखिलेश यादव के करीबी हैं. दोनों स्थानीय नेताओं को पार्टी की रणनीति समझाएंगे और स्थानीय राजनीतिक समीकरण की जानकारी लेंगे.

जुलाई से होंगे सम्मेलन

सपा जिलाध्यक्ष चौधरी राजपाल सिंह ने बताया कि बूथ कमेटियों और सेक्टरों के गठन के बाद बूथ प्रभारियों व सेक्टर प्रभारियों के सम्मेलन 15 जुलाई से शुरू होंगे. इस तिथि तक सभी प्रकोष्ठों की कार्यकारिणी गठित कर ली जाएंगी.साथ ही कार्यकर्ता घर-घर संपर्क करेंगे. मतदाता सूची में नए मतदाताओं के नाम जुड़वाने व संशोधन के लिए सपा के बूथ प्रभारियों को फार्म-छह, फार्म-सात व फार्म-आठ दिए जाएंगे. ये प्रभारी बूथ लेवल अधिकारियों से संपर्क करके अपने काम को अंजाम देंगे.

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