शादी से पहले मंगेतर के साथ सोना मना है क्योंकि..

शादी एक ऐसा समय है जब लड़का-लड़की एक साथ एक बंधन में बंधकर पूरा जीवन साथ में बिताने का वादा करते हैं. शादी को पुरूष आमतौर पर शारीरिक तौर पर अधिक देखते हैं. शादी का मतलब अधिकतर पुरूषों के लिए सेक्स संबध बनाना ही होता है लेकिन वे ये बात भूल जाते हैं कि शारीरिक संबंध से अधिक महत्वपूर्ण आत्मिक संबंध होता है.

यदि महिला और पुरूष आत्मिक रूप से एक-दूसरे से संतुष्ट‍ है तो फिर शारीरिक संबंधों में भी कोई दिक्कत नहीं होती. शादी से पहले यानी सगाई के बाद लड़के और लड़की को एकसाथ खूब समय बिताने को मिलता है लेकिन इसका ये अर्थ नहीं कि वे शादी से पहले फिजीकल रिलेशन बना ले या फिर प्री मैरिटल सेक्सू करें. शादी से पहले संयम बरतना जरूरी है. आइए जानें शादी और संयम के बारे में कुछ और दिलचस्प बातों को.

सगाई और शादी के बीच में संयम के बारे में कुछ और दिलचस्प बातें 

– सगाई के बाद लड़के और लड़की को आपस में एक-दूसरे से मिलना चाहिए और एक-दूसरे को जानना चाहिए, लेकिन इसके साथ ही उन्हें संयम बरतना भी जरूरी है.

– यदि शादी से पहले फिजीकल रिलेशन बनाने के लिए लड़का-लड़की में से कोई भी पहल करता है तो दूसरे को मना करना चाहिए नहीं तो इससे इंप्रेशन अच्छा नहीं पड़ता.

– दोनों को समझना चाहिए कि प्री मैरिटल सेक्स से पहले उन्हें आपस में एक-दूसरे को जानने-सूझने का मौका मिला है जिससे वे पहले एक-दूसरे की पसंद-नापसंद इत्यादि के बारे में जान पाएं.

– ये जरूरी है कि मिलने वाले समय को लड़के व लड़की को समझदारी से बिताना चाहिए न कि फिजूल की चीजों में खर्च करना चाहिए.

– शादी से पहले संयम बरतने से न सिर्फ दोनों के रिश्तों में मजबूती आती है बल्कि दोनों का एक-दूसरे पर विश्वास भी बना रहता है. इसके साथ ही संबंधों में अंतरंगता का महत्व भी बरकरार रहता है.

– प्रीमैरिटल सेक्स में हालांकि कोई बुराई नहीं लेकिन दोनों के रिश्ते पर शादी के बाद मनमुटाव का ये कारण बन सकता है.

– रिश्तों में खुलापन जरूरी है. चाहे तो शादी से पहले आप चीजों को डिस्कस कर सकते हैं. एक-दूसरे के साथ समय व्यतीत कर सकते हैं. एक-दूसरे के साथ घूम-फिर सकते हैं लेकिन इसके लिए जरूरी नहीं कि फिजीकल रिलेशन ही बनाया जाए.

– शादी से पहले फिजीकल रिलेशन से रिश्तों में अवसाद पैदा होने की संभावना बनी रहती है क्योंकि इसके बाद हर समय मन में एक डर और बैचेनी रहने लगती है. इसीलिए इन सबसे बचना जरूरी है.

– सेक्ससुअल रिलेशंस आपके रिश्ते में करीबी ला भी सकते हैं और दूरी बढ़ा भी सकते हैं इसीलिए कोई भी कदम उठाने से पहले सोच-समझ कर विचार करना आवश्यक है.

शादी से पहले संयम बरतने में कोई नुकसान नहीं है बल्कि रिश्तों की मजबूती के लिए यह अच्छा है.

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स्वरा भास्कर ने कास्टिंग काउच पर बताई आपबीती

कास्टिंग काउच, बौलीवुड का एक ऐसा काला सच है, जिस पर अक्‍सर बड़े सितारे बोलने से बचते हैं. यूं तो ऐसी घटनाएं अक्‍सर सामने आती हैं लेकिन अक्‍सर एक्‍टर्स कास्टिंग काउच सुनने की बात तो करते हैं लेकिन इससे जुड़ी किसी बात का खुलासा नहीं करते. लेकिन बौलीवुड एक्‍ट्रेस स्‍वरा भास्‍कर ने हाल ही में बौलीवुड में कास्टिंग काउच  होने की बात पर बेबाकी से अपनी बात रखी है. स्‍वरा ने बताया कि कैसे एक प्रोड्यूसर के असिस्‍टेंट ने उन्‍हें Kiss करने की कोशिश की और कैसे वह मुंबई जाते समय इस बात के लिए तैयार थीं कि कास्टिंग काउच होगा तो वह उसका कैसे सामना करेंगी.

हाल ही में स्‍वरा ने एक अखबार के कार्यक्रम में हिस्‍सा लिया और वहां कास्टिंग काउच के सवाल पर अपनी बात रखी. स्‍वरा भास्‍कर ने कास्टिंग काउच पर बोलते हुए कहा, ‘मैं जब मुंबई गई थी तो मैं इसके लिए पूरी तरह तैयार थी कि कोई आएगा और मुझसे ऐसे फेवर की बात करेगा तो मैं उसे क्‍या-क्‍या सुनाउंगी. मैंने तो फेमेनिज्‍म पर हिंदी और इंग्लिश में अलग-अलग स्‍पीच भी तैयार कर रखी थी. लेकिन एक-डेढ़ साल तक मुझसे किसी ने ऐसा कुछ कहा ही नहीं. फिर मुझे लगा कि लोग सीधा नहीं बोलते बल्कि कुछ हिंट्स देते हैं, जो मैं समझ ही नहीं पा रही थी.’

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स्‍वरा ने आगे बताया, ‘एक दिन मैं एक दफ्तर में थी और एक प्रोड्यूसर ने मुझसे कहा कि आपमें बहुत कुछ है, आप क्‍या-क्‍या कर सकती हैं रोल के लिए. तो मैं उसे बताने लगी कि सर मैं सोशलौजी की स्‍टूडेंट हूं, सर मुझे बंगाली आती है, मैं पंजाबी भी बोल सकती हूं. इस बीच वह बार-बार पूछता रहा कि आप और क्‍या कर सकती हैं रोल के लिए. आखिर में मुझे समझ में आया और मैंने कहा कि अगर आप पूछ रहे हैं कि क्‍या मैं इस रोल के लिए सैक्‍स कर सकती हूं या नहीं तो वो मैं नहीं कर सकती.’

अपने साथ हुई एक घटना बताते हुए स्‍वरा ने कहा, ‘एक बार मैं एक व्‍यक्ति के पास गई जो खुद को एक बड़े प्रोड्यूसर का असिस्‍टेंट बताता था. उसने कहा कि वह मुझे रोल दे सकता है, तभी मैं अपनी नानी को मैसेज कर रही थी कि इतनी देर में उसने मेरे कान पर आकर Kiss करने की कोशिश की और बोला ‘आई लव यू बेबी..’ मैं हटी तो उसके मुंह में मेरे बाल आ गए. अगर आप ऐसी घटनाओं को कास्टिंग काउच में गिनते हैं तो ये मेरे साथ हुआ है.’

स्‍वरा भास्‍कर हाल ही में फिल्‍म ‘वीरे दे वेडिंग’ में नजर आई थीं. इस फिल्‍म में उनके साथ सोनम कपूर, करीना कपूर और शिखा तल्‍सानिया नजर आई थीं.

अपने हुस्न से सोशल मीडिया पर कयामत ढा रही है यह बौलीवुड सिंगर

फिल्म टाइगर जिन्दा है ने इस साल बौक्स औफिस पर अब तक सबसे ज्यादा कलेक्शन का रिकार्ड अपने नाम किया है. ना केवल फिल्म और इसके एक्शन सीन की तारीफ हुई बल्कि फिल्म के गाने भी लोगों द्वारा खूब पसंद किये गए. इस फिल्म का एक गाना ‘स्वैग से करेंगे सबका स्वागत’ बेहद मशहूर हुआ जिसे सिंगर नेहा भसीन ने गाया था.

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नेहा भसीन का ये गाना इंटरनेट पर खूब वायरल हुआ और इसमें सलमान से ज्यादा तारीफ नेहा की हुई. ना केवल अपने गानों को लेकर बल्कि अपने ग्लैमरस अंदाज को लेकर भी नेहा इन दिनों खूब सुर्खियां बटोर रही हैं.

आज के दौर में सिंगर सिर्फ परदे के पीछे नहीं रह गए हैं बल्कि आपने कई म्यूजिक वीडियो देखे होंगे जिसमे सिंगर अपनी अदाओं का जादू बिखेरते नजर आते हैं. नेहा भसीन भी बौलीवुड की उन सिंगर्स में शामिल है जो फैशन, स्टाइल, और बोल्डनेस में किसी से पीछे नहीं हैं. 

बता दें कि लोग जितना नेहा भसीन की आवाज को पसंद करते हैं उतना ही इनकी हौट अदाओं को भी पसंद कर रहे है. हाल ही में नेहा ने सोशल मीडिया पर अपनी कुछ तस्वीरें भी शेयर की हैं जो खूब वायरल हो रही है.

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नेहा के शुरूआती करियर की बात करें तो उन्हें कालेज के दिनों से ही नेहा को म्यूजिक से खास लगाव था. नेहा भसीन ने ‘Coke pop star’ कौम्पिटिशन जीतकर अपने सफर की शुरुआत की. बौलीवुड में इन्हें बड़ा ब्रेक मिला फिल्म ‘फैशन’ से, जिसमे उन्होंने ‘कुछ खास है’ गाना गाया था. नेहा भसीन ये गाना चार्ट्स पर जबरदस्त हिट हुआ और नेहा भसीन की कामयाबी का सिलसिला चल निकला. आपको बता दें बौलीवुड में ब्रेक से पहले नेहा भसीन एक लड़कियों के बैंड का भी हिस्सा रही हैं.

‘ना 15 लाख आए, ना ही काला धन’

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने स्विस बैंक के ताजा आंकड़ों को लेकर केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार पर निशाना साधा है. शुक्रवार को राहुल ने ट्वीट किया कि मोदी सरकार जब से आई है सिर्फ कह रही है कि कालाधन लाएंगे, जबकि अब जब 2018 में वहां जमापूंजी बढ़ी है तो वो कह रहे हैं कि ये सब व्हाइट मनी है.

राहुल ने एक वीडियो ट्ववीट करते हुए तीन आंकड़े जारी किए. उन्होंने लिखा कि 2014 में उन्होंने (सरकार) कहा कि मैं स्विस बैंक में जमा सारा काला धन लाऊंगा और सभी भारतीयों के खाते में 15 लाख जमा कराउंगा. इसके बाद 2016 में कहा कि नोटबंदी देश में मौजूद काले धन को खत्म कर देगी. वहीं अब 2018 में वो कह रहे हैं कि स्विस बैंक में जो भारतीयों का पैसा बढ़ा है वह सब व्हाइट मनी है, स्विस बैंक में कोई काला धन नहीं है.

पार्टी ने जारी किया था पुराना वीडियो

आपको बता दें कि इससे पहले भी कांग्रेस पार्टी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर इस मुद्दे पर मोदी सरकार को घेरा था. कांग्रेस ने शुक्रवार को एक वीडियो जारी करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को निशाने पर लिया. ये वीडियो नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने से पहले का है, जिसमें वो कह रहे हैं कि किस तरह डॉलर के मुकाबले रुपया गिर रहा है और ये सब केंद्र की भ्रष्ट सरकार की वजह से हो रहा है.

कांग्रेस नेता आरपीएन सिंह ने कहा कि जब नरेंद्र मोदी विपक्ष में थे, तब वह तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का मजाक उड़ाते थे, क्या हमें भी अब ऐसा ही करना चाहिए. उन्होंने कहा कि प्रचार के दौरान इन्होंने 15 लाख रुपए देने का वादा किया था, लेकिन सत्ता में आए तो ये जुमला बन गया.

गौरतलब है कि स्विस बैंक ने जो ताजा आंकड़े जारी किए हैं उसमें दिख रहा है कि पिछले एक साल में भारतीयों की जमा पूंजी में करीब 50% की बढ़ोतरी हुई है. पिछले तीन साल से ये आंकड़े लगातार घट रहे थे, लेकिन अचानक 2017 में इतनी लंबी छलांग मोदी सरकार के लिए चिंता बढ़ा सकती है. विपक्ष के अलावा कई साथियों ने भी इसको लेकर सरकार को घेरा है.

कबाड़ का प्रयोग कर मैंने बनाई बौडी : संजय दत्त

एक्‍टर संजय दत्त इन दिनों काफी चर्चा में हैं. हालांकि उनकी कोई फिल्‍म तो नहीं आ रही लेकिन फिर भी इन दिनों सबसे ज्‍यादा बाद संजय दत्त की ही हो रही है. दरअसल संजय दत्त की जिंदगी की कहानी को पर्दे पर उतारती फिल्‍म ‘संजू’ रिलीज हो चुकी है. इस फिल्‍म में संजय दत्त का किरदार रणबीर कपूर निभाने वाले हैं.

यूं तो इस फिल्‍म में संजय दत्त की जिंदगी के कई पहलू दिखाए जाएंगे, लेकिन इस फिल्‍म से पहले ही संजय ने अपनी जिंदगी के एक अहम हिस्‍से पर बात की है. संजय दत्त का कहना है कि जेल में बिताए समय ने उनका अंहकार तोड़ दिया और उन्हें एक बेहतर इंसान बनाया.

संजय दत्त ने एक हिंदी न्यूज एजेंसी को दिए एक बयान में कहा, “मेरे कैद के दिन किसी रोलर कोस्टर की सवारी से कम नहीं रहे. अगर सकारात्मक पक्ष को देखें तो इसने मुझे बहुत कुछ सिखाया और मुझे एक बेहतर व्यक्ति बनाया.” उन्होंने कहा, “अपने परिवार और अपने चाहने वालों से अलग रहना एक चुनौती था.

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उन दिनों के दौरान मैंने अपने शरीर को अच्छे आकार में रखना सीखा. मैंने वजन और डंबल की जगह कचरे के डिब्बों और मिट्टी के घड़ों का प्रयोग किया. हम हर छह महीने में जेल के अंदर सांस्कृतिक समारोह किया करते थे, जहां मैंने उम्रकैद की सजा काट रहे लोगों को संवाद बोलना, गाना और नाचना सिखाया.”

संजय ने कहा, “उस मुश्किल दौर में वे लोग मेरा परिवार बन गए थे और जब मैं हार मान लेता था तो वे मुझे प्रोत्साहित करते थे.” उन्होंने कहा, “जेल में बिताए समय में मैंने बहुत कुछ सीखा. उसने मेरा अंहकार तोड़ दिया.” जेल से छूटने के दिनों को याद करते हुए संजय ने कहा, “अंतिम फैसले के बाद जिस दिन से मैं जेल से छूटा, वह दिन मेरी जिंदगी का सबसे अच्छा दिन था.

मैं अपने पिता (सुनील दत्त) को याद कर रहा था. मेरी इच्छा थी कि वह मुझे आजाद हुआ देखें. वह सबसे खुश इंसान होते. हमें हमारे परिवार को कभी भूलना नहीं चाहिए वे हमेशा हमारी ताकत होते हैं.”

राहुल का सियासी जुमला

किसानों का कर्जा माफ करने की मांग अब जोर पकड़ रही है. मंदसौर में हुई सभा में राहुल गांधी ने वादा किया है कि 2018 के मध्य प्रदेश चुनावों के बाद यदि उन की सरकार बनती है तो वे कर्जा माफ कर देंगे. 2014 से पहले नरेंद्र मोदी भी कुछ इसी तरह के इशारे करते थे और उन के गुरगे कहते थे कि जो 50 लाख करोड़ का काला धन नरेंद्र मोदी निकालेंगे या बाहर से लाएंगे उस से कर्जा, जो सिर्फ 12 लाख करोड़ का है, चुकता हो जाएगा. 2014 से अब तक जो कर्जे माफ हुए हैं, वे मजाक बन कर रह गए हैं. उत्तर प्रदेश में किसी के 20 पैसे तो किसी के 12 रुपए माफ हुए. दूसरे राज्यों में भी भाजपा ने वादे किए पर कुछ बड़ा नहीं हुआ. बैंक या सरकार असल में अगर कर्जे माफ कर दें तो उन के हिसाबों में बैंक और सरकार दोनों दिवालिए हो जाएंगे. देशविदेश से कर्ज मिलना बंद हो जाएगा. बैंकों और सरकार की आर्थिक साख डूब जाएगी.

राहुल गांधी ये कर्जे माफ कर सकेंगे इस पर भी शक है क्योंकि कहीं से तो यह पैसा लाना पड़ेगा और जिस तरह से बाजार और कारखाने चल रहे हैं, कहीं अच्छा होता नजर नहीं आ रहा है. जो अच्छा है वह सिर्फ सरकारी इश्तिहारों में है या नेताओं के भाषणों में है. सरकार अब किसानों से निबटने के लिए पुलिस और बंदूकों का सहारा ले रही है. भाजपा अपने पाखंडी पुजारी एजेंटों को लगा रही?है कि गांवगांव में यज्ञहवन कराओ कि फसल अच्छी हो, धनधान्य भरे. सरकार के बस का तो कुछ नहीं है.

हां, इस दौरान सरकार पूरी तरह से नीरव मोदी, मेहुल चौकसी, अडानी, अंबानी, जयपुरियाओं को लाखों करोड़ हड़पने की छूट दे रही है. चूंकि ये लोग बड़ेबड़े मंदिर भी बनवा रहे हैं, इन के पाप तो अपनेआप धुल रहे हैं. किसान बेचारे तो बस कांवड़ उठा कर पानी भर कर ला सकते हैं और उन्हें इस काम में मौसम आते ही लाभ दिया जाएगा पर तब तक तो कुछ करना ही होगा. इसलिए किसानों को दूसरी तरह के वादे किए जा रहे हैं जो अच्छे दिनों के वादों की तरह हैं. असल में किसानों को खुद कर्ज ले कर खेती करना बंद करना होगा. अपनी बचत में महागुण हैं. यही मंत्र है अच्छी फसल का. नेताओं के चक्कर में फंस कर किसान कर्जा तो ले लेते हैं पर जब बैंक पुलिसथाना ले कर आ जाते हैं तो वे नेताओं के पैरों में जा बिछते हैं. उन्हें कुछ दिन की मुहलत मिल जाती है पर यह ज्यादा दिन नहीं चलती.

किसानों का कर्जा माफ होगा, यह भूल जाइए. किसानों को तो अंगरेजों ने भी अकाल के दिनों में नहीं छोड़ा था और पूरा लगान वसूल किया था. यह आज भी होगा. अगर सरकार और बैंक वसूली नहीं कर पाएंगे तो वे अपने कर्जे दूसरों को बेच देंगे जो आधेपौने में खरीद कर किसानों पर लाठियोंबंदूकों से आ धमकेंगे. सरकार को मंदिरों से प्रेम है, उसे गाय की रक्षा करनी है, वंदेमातरम का गान जरूरी है पर किसानों के खेतों, उन की आह और परेशानियों से कोई मतलब नहीं है.

नीट : असमानता और भेदभाव की साजिश

एक राष्ट्र, एक परीक्षा’ जैसी दार्शनिक विचारधारा को ध्यान में रखते हुए नैशनल एलिजिबिलिटी कम ऐंट्रैंस टैस्ट यानी नीट लागू किया गया. यह एक ऐसा बाहुबली एग्जाम है जिस का आयोजन देश के उन सभी मैडिकल और डैंटल कालेजों में ऐडमिशन के लिए 2017 से अनिवार्य कर दिया गया जो मैडिकल और डैंटल काउंसिल औफ इंडिया द्वारा संचालित हैं. इस परीक्षा का उद्देश्य राज्यस्तरीय और प्राइवेट कालेजों द्वारा आयोजित की जाने वाली परीक्षाओं से विद्यार्थियों को मुक्त करना और ऐडमिशन प्रोसैस में समानता लाना है, लेकिन आज के हालात देखें, तो नीट ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वालों, गरीब, पिछड़ी जातियों और स्टेट बोर्ड के छात्रों के पक्ष में नहीं है.

शुरू से ही नीट स्टूडैंट्स और उन के पेरैंट्स के लिए सिरदर्द बना हुआ है. केरल में कई स्टूडैंट्स को परीक्षा केंद्रों पर शर्मिंदगी का सामना करना पड़ा था. कन्नूर जिले में एक छात्रा को एग्जाम हौल में जाने से पहले इनरवियर निकालना पड़ा था, क्योंकि उस में मैटल हुक लगा था जो मैटल डिटैक्टर से पता चला. इस पर आपत्ति जताते हुए केरल के एक सांसद पी के श्रीमाधी ने कहा था, ‘‘परीक्षा केंद्रों पर छात्राओं के कपड़े उतरवाना बेहद चौंकाने वाली व अमानवीय घटना है.’’

अगस्त 2017 में तमिलनाडु के त्रिची जिले के एक कुली की 17 वर्षीया बेटी अनीता ने इसलिए आत्महत्या कर ली क्योंकि उसे मैडिकल में ऐडमिशन नहीं मिल सका. अनीता ने नीट में 700 में से मात्र 86 मार्क्स प्राप्त किए थे जो मैडिकल की पढ़ाई के लिए पर्याप्त नहीं थे, जबकि स्टेट बोर्ड के परिणाम के अनुसार, अनीता एक मेधावी और प्रतिभाशाली छात्रा थी, 12वीं में उसे कुल 1,200 में से 1,176 मार्क्स मिले थे. फिजिक्स और मैथ्स में 100 प्रतिशत के साथ उस ने कुल 98 प्रतिशत मार्क्स प्राप्त किए थे.

दरअसल, तमिलनाडु में मैडिकल में ऐडमिशन के लिए नीट के स्कोर को अनिवार्य करने के केंद्र के फैसले के विरोध में अनीता ने देश की सब से बड़ी अदालत सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और याचिका दाखिल की, जिस में उस ने कहा था कि उस के जैसे गरीब व ग्रामीण क्षेत्र के बच्चे, शहर के बच्चों जैसी कोचिंग क्लासेस नहीं ले सकते हैं, इसलिए उन्हें नीट जैसी कठिन प्रतिस्पर्धात्मक परीक्षा में छूट दी जाए. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने अनीता की याचिका को खारिज करते हुए आदेश दिया कि तमिलनाडु में मैडिकल में प्रवेश 12वीं कक्षा के अंकों पर नहीं, बल्कि नीट के परिणाम पर ही आधारित हो. यह फैसला आने के बाद अनीता की डाक्टर बनने की आखिरी उम्मीद भी टूट गई और उस ने आत्महत्या कर ली. यह घटना हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि नीट के जरिए हम किस तरह के मैडिकल छात्रों का चुनाव कर रहे हैं.

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ऐसे में नैशनल एलिजिबिलिटी कम ऐंट्रैंस टैस्ट न केवल एक गलत विचार है बल्कि इसे आयोजित करने का तरीका आज के समय में किसी कल्पना से कम नहीं है. देश के मैडिकल कालेजों में ऐडमिशन लेने के लिए नीट एकमात्र जरिया है, इसलिए इस की कठिनाई के स्तर पर कई तरह के सवाल उठाए जा रहे हैं. विविधताओं से भरे भारत जैसे देश में ऐसा कोई संस्थान सक्षम और योग्य नहीं है जिस में नीट जैसी परीक्षा को इतने बड़े स्तर पर उचित ढंग से आयोजित करने की क्षमता हो.

केंद्रीय पाठयक्रम और स्टेट बोर्ड:?भारतीय शिक्षा विरोधी संघ

नीट का पैटर्न एनसीईआरटी द्वारा तय 11वीं व 12वीं के पाठ्यक्रम पर आधारित है. इस में स्टेट एवं अन्य बोर्ड्स के पाठ्यक्रमों को शामिल करने पर कोई अध्ययन या विचार तक नहीं किया गया है. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर क्यों मैडिकल काउंसिल औफ इंडिया ने नीट के लिए एनसीईआरटी के ही पाठ्यक्रम को चुना है, जबकि देश में मात्र कुछ ही फीसदी छात्र एनसीईआरटी का पाठ्यक्रम पढ़ते हैं.

इस निर्णय पर देश के कई शिक्षाविदों ने सवाल उठाया था कि उस देश में केवल एक बोर्ड पर आधारित नीट की अनिवार्यता कैसे न्यायपूर्ण हो सकती है, जहां शिक्षा बोर्ड और उन के सिलेबस एकसमान नहीं हैं. नीट राज्यस्तरीय शिक्षा प्रणाली को पूरी तरह नजरअंदाज कर केंद्रीय शिक्षा प्रणाली को स्वीकार कर रहा है. इस के अलावा नीट प्रश्नपत्र अंगरेजी और हिंदी में होने के कारण क्षेत्रीय भाषाओं में पढ़ रहे छात्रों की जरूरतों को नजरअंदाज किया जा रहा है. इस से स्पष्ट है कि नीट, भारत के संघीय ढांचे में भेदभाव पैदा कर रहा है और असमानता फैला रहा है.

अप्रासंगिक हुआ 12वीं का परिणाम

नीट का प्रश्नपत्र बहुविकल्पीयहोता है, जिस में फिजिक्स, कैमिस्ट्री, बायोलौजी, जूलौजी और इंगलिश सब्जैक्ट शामिल हैं. नीट ने उन छात्रों के लिए 12वीं के परिणाम को अप्रासंगिक बना दिया है जो मैडिकल में ऐडमिशन के लिए मेहनत करते हैं क्योंकि अब मैडिकल काउंसिल द्वारा मान्य तकनीकी जरूरतों के अलावा अन्य अंकों की गणना नहीं की जाएगी. नीट की परीक्षा के लिए 12वीं में सामान्य वर्ग के छात्रों को कम से कम 50 फीसदी और आरक्षित वर्ग के छात्रों को 40 फीसदी अंक प्राप्त करना जरूरी है, विशेषकर इंगलिश, फिजिक्स, कैमिस्ट्री और बायोलौजी के पेपर में पास होना अनिवार्य है. इस के बावजूद नीट की मैरिट लिस्ट में आने के बाद ही आप किसी मैडिकल कालेज में ऐडमिशन के लिए योग्य होंगे.

सवाल है कि दोनों परीक्षाओं में औसत परिणाम अनिवार्य करने की आवश्यकता क्या है? जब ऐडमिशन के लिए नीट के परिणाम ही सर्वमान्य हैं तो मैडिकल काउंसिल को 12वीं में 5 फीसदी लाने की अनिवार्यता खत्म कर देनी चाहिए जिस से छात्रों को दोहरी पढ़ाई के भार से राहत मिल सके.

मुंबई के केसी कालेज की फिजिक्स की प्रोफैसर ज्योत्सना पांडेय के अनुसार, एनसीईआरटी (नैशनल काउंसिल औफ एजुकेशन रिसर्च ऐंड ट्रेनिंग) द्वारा निर्धारित फिजिक्स, कैमिस्ट्री, जूलौजी और मैथ्स के पाठयक्रम विशेषरूप से मैडिकल और इंजीनियरिंग में प्रवेश लेने वाले स्टूडैंट्स को ट्रेनिंग देने के उद्देश्य से तैयार किए जाते हैं. वहीं स्टेट बोर्ड साइंस को ले कर हैलिकौप्टर दृष्टिकोण अपनाता है, जिस के कारण स्टूडैंट्स को नीट जैसी परीक्षा पास करना मुश्किल साबित होता है. स्टेट बोर्ड साइंस के बजाय क्षेत्रीय भाषा, कला और संस्कृति पर अधिक जोर देता है जो नौनसाइंस कोर्सेस के लिए उपयुक्त है.

नीट की तैयारी कर रहे छात्रों का कहना है कि स्टेट बोर्ड का सिलेबस सब्जैक्टिव होता है जबकि नीट का सिलेबस काफी व्यापक व बहुविकल्पीय होता है. ऐसे में दोनों की अलगअलग तैयारी करनी पड़ती है, जिस से उन पर दोहरा भार पड़ता है. इतना ही नहीं, बिना कोचिंग क्लासेस के नीट पास कर के किसी अच्छे कालेज में ऐडमिशन लेना लगभग असंभव है.

कोचिंग के बिना नीट पास करना मुश्किल

नीट का पेपर कुल 700 मार्क्स का होता है, जिस में से स्टूडैंट्स को कम से कम 400 मार्क्स हासिल करना अनिवार्य है. इस के बाद भी ऐडमिशन राज्य में सीटों की उपलब्धता पर निर्भर करता है. कर्नाटक में लोअर रैंक लाने वाले छात्रों को भी ऐडमिशन मिल जाता है, क्योंकि पड़ोसी राज्यों केरल और महाराष्ट्र की तुलना में वहां मैडिकल कालेजों की संख्या ज्यादा है.

मुंबई के केईएम मैडिकल कालेज में नीट पास कर के आए एमबीबीएस के स्टूडैंट्स का कहना था कि नीट और स्टेट बोर्ड के सिलेबस में काफी अंतर है. नीट के प्रश्नपत्र में जहां 90 प्रतिशत सीबीएसई बोर्ड का विषय रहता है, तो वहीं

10 प्रतिशत स्टेट बोर्ड का होता है. ऐसे में स्टेट बोर्ड के छात्रों को बिना कोचिंग क्लास के यह परीक्षा पास करना बहुत कठिन है. परीक्षा में केवल पास होना ही माने नहीं रखता, बल्कि केईएम जैसे बड़े मैडिकल कालेज में ऐडमिशन के लिए नीट में अधिकतम स्कोर प्राप्त करना महत्त्वपूर्ण है, जो बिना कोचिंग के संभव नहीं है. यही वजह है कि देश के हर कोने में बड़ी संख्या में कोचिंग सैंटर फलफूल रहे हैं.

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महाराष्ट्र में कोचिंग सैंटर चला रहे एक प्रोफैसर का कहना है कि राज्य में इन क्लासेस की फीस क्षेत्र के अनुसार 1 लाख से ले कर 5 लाख रुपए है, जो मध्यवर्गीय और निम्नवर्गीय परिवारों के लिए बहुत ज्यादा है. यह समस्या ग्रामीण इलाकों में और भी गंभीर है, जहां शिक्षकों और बुनियादी ढांचे दोनों की कमी है.

नीट समर्थकों का कहना है कि स्कूल के शिक्षकों को एनसीईआरटी का सिलेबस पढ़ाना चाहिए जिस से बच्चों को इस तरह के एग्जाम्स देने में आसानी हो. परंतु हम सब जानते हैं कि सरकारी स्कूलों में ज्यादातर शिक्षक नदारद रहते हैं. ऐसे में उन से अतिरिक्त जिम्मेदारी उठाने की अपेक्षा अविश्वसनीय है. परिणामस्वरूप, 40 प्रतिशत शहरी छात्रों की तुलना में केवल 1-2 प्रतिशत छात्र ग्रामीण क्षेत्रों से होंगे जो नीट पास कर पाते हैं. इस वजह से मैडिकल की पढ़ाई कर रहे शहर के छात्र ग्रामीण क्षेत्रों में प्रैक्टिस नहीं करना चाहते हैं. यहां तक कि सरकारी कालेजों से पढ़े डाक्टर, जो ग्रामीण इलाकों में प्रैक्टिस करने के लिए बाध्य हैं, भी शहर में आने के मौके तलाशते हैं.

शिक्षा व्यवस्था में जातिवाद की जड़ें

भारत में जाति व्यवस्था लगभग सभी सरकारी प्रक्रियाओं का एक अभिन्न अंग है और इस की जड़ें भारतीय शिक्षा प्रणाली में गहराई तक फैली हुई हैं. ऐसे में जातिगत भेदभाव स्कूल से ही शुरू हो जाता है. देश के कई राज्यों में जातिवाद की पकड़ मजबूत है. जहां ऊंची जाति के लोग अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में नहीं भेजते हैं, तो वहीं पिछड़ी जातियों के लिए विकास का मतलब अपने बच्चों को निजी संस्थानों में भेजना होता है. यद्यपि नीट समर्थकों की मानें तो नीट के अंतर्गत आरक्षण में किसी तरह का परिवर्तन नहीं किया गया है, लेकिन यह स्पष्ट है कि नीट ऊंची जातियों और वर्ग के पक्ष में है. इतना ही नहीं, नीट शिक्षा का बेहतर स्तर भी सुनिश्चित नहीं करता है. ऐसे में इसे एकतरफा लागू करना अनुचित है जब तक कि सभी को समान स्तर की शिक्षा न दी जाए.

शहर और गांव में भेदभाव

2017 में सीबीएसई ने देश के 103 बड़े शहरों में 1,921 परीक्षा केंद्रों पर नीट की परीक्षा आयोजित की थी, जहां स्टूडैंट्स को अपनी सुविधानुसार राज्य के 3 केंद्र चुनने थे. उदाहरण के तौर पर, महाराष्ट्र में मुंबई, ठाणे, औरंगाबाद, पुणे, नासिक, नागपुर में परीक्षा केंद्र थे जहां नीट आयोजित किया गया था, जिस में से कोई 3 केंद्र चुनने थे. लेकिन सीबीएसई की तरफ से यह सुनिश्चित नहीं किया जाता है कि परीक्षा का स्थान कहां होगा, जिस के कारण दूरदराज के छात्रों को परेशानी का सामना करना पड़ता है.

2017 में नीट के सैंटर कम होने से दूरदराज के ग्रामीण विद्यार्थियों को परीक्षा केंद्रों तक पहुंचने में आर्थिक व मानसिक रूप से कई समस्याओं का सामना करना पड़ा था. इसलिए यहां के छात्र संगठनों ने परीक्षा केंद्रों की संख्या बढ़ाने की मांग की थी.

2017 में नीट अनिवार्य करने से पहले, प्री मैडिकल एग्जाम टैस्ट के रूप में एमएचसीईटी को डिविजनल अथौरिटी द्वारा राज्य के सभी 36 जिलों में आयोजित किया जाता था. इस के मुंबई जैसे शहर में 11, ठाणे में 13 और अधिकतम सैंटर चंद्रपुर में 45, गढ़चिरौली में 46 थे. इसलिए बच्चों को सैंटर को ले कर कोई परेशानी नहीं होती थी.

प्राइवेट कालेजों की आसमान छूती फीस

सरकारी और प्राइवेट कालेजों में अपनी सीट सुरक्षित करने के लिए स्टूडैंट्स को नीट पास करना किसी युद्ध लड़ने से कम नहीं है. महाराष्ट्र में 48 सरकारी मैडिकल कालेज हैं जिन में कुल 6,245 सीटें हैं.

मुंबई के जेजे हौस्पिटल के डा. योगेंद्र यादव के अनुसार, सरकारी मैडिकल कालेजों में एमबीबीएस की कुल फीस ढाई लाख रुपए है तो वहीं नवी मुंबई के डीवाई पाटिल जैसे प्राइवेट मैडिकल कालेज में 23 लाख रुपए वार्षिक है. महाराष्ट्र के ज्यादातर प्राइवेट कालेजों की फीस 16 लाख से 23 लाख रुपए वार्षिक है. ऐसे में यदि गरीब और पिछड़े वर्ग के छात्र नीट की मैरिट लिस्ट में जगह हासिल कर सरकारी मैडिकल कालेज में सीट नहीं प्राप्त करते हैं तो उन को डाक्टर बनने के लिए प्राइवेट कालेजों में ऐडमिशन पाना लगभग सपने के समान है क्योंकि इन कालेजों में आसमान छूती फीस चुका पाना उन के लिए असंभव है.

वहीं केरल सरकार ने सभी मैडिकल कालेजों के लिए एकसमान फीस स्ट्रक्चर तय किया था. लेकिन 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार की मैडिकल फीस 5 लाख रुपए की एक निश्चित सीमा खारिज कर दी और प्राइवेट मैडिकल कालेजों को 11 लाख रुपए वार्षिक फीस तय करने का आदेश दिया. यह आदेश ऐडमिशन प्रोसैस समाप्त होने के 3 दिन पहले आया, जबकि ज्यादातर कालेजों ने एकसमान फीस स्ट्रक्चर के तहत 5 लाख रुपए ही फीस ली और शेष 6 लाख रुपए की बैंक गारंटी दी.

सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर केरल

के मुख्यमंत्री ने कहा था, ‘‘मैडिकल के एकसमान फीस स्ट्रक्चर को हटाना हमारी मजबूरी है, क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा मैडिकल के लिए एकमात्र प्रवेश परीक्षा नीट अनिवार्य करने के बाद सरकार एकसमान फीस स्ट्रक्चर को जारी नहीं रख सकती है. यह शिक्षा के क्षेत्र में राज्य की स्वायत्तता पर अतिक्रमण है. सरकार उन छात्रों और उन के परिवारों के साथ है जो इस फैसले से पीडि़त हैं.’’

परिणामस्वरूप, डाक्टर बनने योग्य कई छात्रों ने अपना रास्ता बदल लिया है. बीडीएस में ऐडमिशन के पहले राउंड में सीट सुरक्षित करने वाली छात्रा लिंडा एकसमान फीस स्ट्रक्चर के तहत सैल्फ फाइनैंसिंग कालेज में एमबीबीएस के लिए ऐडमिशन लेने वाली थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद उस ने यह विचार छोड़ दिया, क्योंकि लिंडा जैसे मध्यवर्गीय स्टूडैंट्स इतनी अधिक फीस की व्यवस्था नहीं कर सकते हैं. आज डाक्टर बनने के लिए पैसारूपी ताकत की जरूरत है और यही वजह है कि डाक्टर बनने के बाद ये लोग समाज की सेवा करने के बजाय पैसा कमाने को ज्यादा महत्त्व देते हैं.

दक्षिण भारतीय राज्यों का विरोध

अब तक तमिलनाडु में 10वीं के मार्क्स के आधार पर ही मैडिकल में ऐडमिशन हो रहा था, जिस से वहां के गांव और छोटे शहरों के छात्रों को मैडिकल की पढ़ाई करना आसान होता था. यही वजह है कि तमिलनाडु शुरू से ही नीट के पक्ष में नहीं था. सुप्रीम कोर्ट ने भी तमिलनाडु को नीट की परीक्षा से बाहर रखा था, लेकिन नीट को ले कर तमिलनाडु और केंद्र सरकार की लड़ाई में आखिरकार केंद्र की जीत हुई और 2017 से तमिलनाडु में अनिवार्यरूप से नीट को लागू कर दिया गया.

मई 2013 में पहली बार जब औल इंडिया प्री मैडिकल टैस्ट की जगह नीट को आयोजित किया गया, तब तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और केरल ने स्टेट एजुकेशन बोर्ड को खतरा बताते हुए इस का कड़ा विरोध किया था. जुलाई, 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने नीट को असंवैधानिक करार दे दिया. इतना ही नहीं, नीट को राज्य में दोबारा शुरू करने की केंद्र की घोषणा के बाद फरवरी 2016 में मुख्यमंत्री जयललिता ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिख कर नीट के खिलाफ कड़े विरोध की चेतावनी दी थी. पत्र में उन्होंने लिखा था कि नीट लागू करना संघवाद का उल्लंघन और तमिलनाडु के छात्रों के प्रति अन्याय है, क्योंकि नैशनल एलिजिबिलिटी एग्जाम यानी नीट के लिए सीबीएसई के छात्रों जैसी ट्रेनिंग स्टेट बोर्ड के छात्रों को नहीं दी जाती है.

जयललिता की आपत्ति को नजरअंदाज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने एमबीबीएस और बीडीएस कोर्सेस में ऐडमिशन के लिए नीट अनिवार्य कर दिया, जिस के सामने स्टेट बोर्ड के परिणाम बेमानी रह गए. 24 मई, 2017 को मद्रास होईकोर्ट ने सीबीएसई के खिलाफ नीट के परिणाम पर प्रतिबंध लगाने का आदेश दिया, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने स्टे लगा दिया. राज्य सरकार ने तमिलनाडु के विद्यार्थियों के लिए विशेष छूट दिए जाने का अनुरोध करते हुए केंद्र सरकार से संपर्क किया और इस के लिए एक अध्यादेश भेजा, लेकिन वह भी मंजूरी हासिल करने में विफल रही. 27 अगस्त, 2017 को सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार तमिलनाडु में मैडिकल में ऐडमिशन के लिए नीट को अनिवार्य कर दिया गया.

शिक्षा नीति पर पुनर्विचार

हम भारत की विविधता और एकता पर गर्व करते हैं, लेकिन नीट शिक्षा बोर्ड और उन में पढ़ रहे शहरी व ग्रामीण छात्रों के बीच एक बड़ी दरार पैदा कर रहा है. शिक्षाविदों के अनुसार, नीट सीबीएसई की विचारधारा रखने वालों के लिए फायदेमंद है जहां तक अनीता जैसे छात्र नहीं पहुंच सकते हैं.

यह परीक्षा पूरी तरह से इंगलिश में होती है जिस को क्षेत्रीय भाषाओं में अनुवादित किया जाता है. एनडीए की सरकार हो या यूपीए की, आजकल भारत में चलन बन गया है कि पहले किसी विचार को जनता पर थोप दिया जाए, फिर जनता को खुद इस से लड़ने व समझौता करने दिया जाए. ऐसे में कभीकभी देश की सब से बड़ी अदालत भी जमीनी हकीकत को समझने में विफल हो जाती है और सरकार के पक्ष में फैसला ले लेती है, जबकि अनीता जैसे गरीब और समाज में हाशिये पर रहने वाले लोगों की आवाज को सब से अधिक सुरक्षा की आवश्यकता है.

देश की पूरी शिक्षा नीति पर पुनर्विचार करने की जरूरत है. साथ ही, यह भी सुनिश्चित करना होगा कि देश की शिक्षा नीति केवल अमीर, शहरी और समतावादी वर्ग के पक्ष में न हो कर, ग्रामीण, क्षेत्रीय भाषा और उन की जरूरतों को भी पूरा करे.

कुकुरमुत्तों की तरह फैलतीं शिक्षा की दुकानें

जिस तरह जंगलों में बिना देखभाल के कुकुरमुत्ते के पौधे पनपते रहते हैं, ठीक वैसे ही आजकल शहरोंकसबों में विद्यालय और महाविद्यालय देखे जा रहे हैं. कुकुरमुत्ता के पौधे हालांकि किसी काम के नहीं होते, लेकिन वे दूसरे को कोई नुकसान भी नहीं पहुंचाते जबकि ये विद्यालय महाविद्यालय नौनिहालों को ठगने में लिप्त हैं.

मैं ने एमए करने के लिए इंदिरा गांधी ओपन यूनिवर्सिटी की वैबसाइट पर अपना रजिस्ट्रेशन करवाया, लेकिन कुछ ही घंटों में मेरे पास एक मैसेज आया जिस में लिखा था, ‘हम विवेकानंद सुभारती यूनिवर्सिटी से डिस्टेंस लर्निंग कोर्स करवाते हैं. कृपया आप अपना कौंटैक्ट नंबर दें.’

मेरे कौंटैक्ट नंबर देने पर मेरे पास एक कौल आई और बताया गया कि हम आप को सभी तरह की सुविधाएं देंगे. यही नहीं, पास होने की भी गारंटी है और अगर आप चाहें तो 2 साल का कोर्स 1 ही साल में पूरा कर सकती हैं.

मेरे पूछने पर उन्होंने बताया कि हम आप का 2 साल का कोर्स 1 साल में ही पूरा करवा देंगे लेकिन फीस उसी हिसाब से लेंगे. 1 साल की फीस 13,800 रुपए है जबकि 2 साल के 28 हजार रुपए और प्रौस्पैक्टस के 500 रुपए. इस के बाद उन्होंने मुझ से 10वीं, 12वीं और बीए की मार्कशीट मांगी और कहा कि फीस जमा कराएं.

जब मैं ने उन्हें बताया कि प्रौस्पैक्टस तो मुझे मिला ही नहीं, फिर मैं उस के रुपए क्यों दूं? तो उन्होंने कहा कि हम आप के नंबर पर डिटेल्ड व्हाट्सऐप कर रहे हैं. यह पूरा फी स्ट्रक्चर है जो आप को देना है.

वे 10-12 दिनों तक मुझ पर फीस जमा कराने का प्रैशर बनाते रहे. मेरे बारबार यह पूछने पर कि क्या मेरे पेपर्स वैरीफाई हो गए हैं? उन्होंने जवाब दिया कि जब आप फीस जमा कराएंगे, उस के बाद ही आप के पास वैरिफिकेशन कौल आएगी. मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था. तब मैं ने कहा कि क्या सारी फीस एकसाथ जमा करानी जरूरी है, मैं अभी आधी फीस ही भर पाऊंगी.

इस पर काउंसलर ने कहा कि कोई बात नहीं. बाकी आप बाद में देते रहिएगा. मैं ने 5 हजार रुपए उन के अकाउंट में जमा करवा दिए. उन की तरफ से कोई भी रसीद या मेल न आने पर मैं ने एक बार फिर फोन घुमाया. इस पर काउंसलर ने मुझ से कहा कि आप के रुपए हमारे अकाउंट में आ गए हैं, अब जल्द ही आप के पास वैरिफिकेशन कौल आएगी और उस के बाद कोर्स की सौफ्टकौपी और हार्डकौपी भेजी जाएगी.

एक महीना निकलने पर भी वैरिफिकेशन कौल नहीं आई. काउंसलर को बारबार फोन करने के बाद एक दिन कौल आई और कहा गया कि हम ने पेपर वैरीफाई कर दिए हैं. हम जल्द ही आप को कोर्स मैटीरियल भिजवाते हैं. इस के बावजूद न कोई रसीद आई, न ही कोई पाठ्य सामग्री.

ऐसे ही 3 महीने निकल गए. मुझे कुछ गड़बड़ी का अंदेशा हुआ और मैं ने जब एक बार फिर संपर्क किया तो वहां से जूही नाम की लड़की ने कहा कि पहले आप 2 साल की पूरी पेमैंट करें, तभी आप को कोर्स मैटीरियल भेजा जाएगा.

मैं ने कहा कि जब तक मुझे कोर्स मैटीरियल नहीं मिलेगा, मैं रुपए नहीं दूंगी. आज तक मेरे पास कोर्स की कोई भी सौफ्ट या हार्ड कौपी नहीं आई है, न ही कोर्स से संबंधित कोई डिटेल आई है. बस, आया तो एक मेल जिस में लिखा था कि बाकी रुपए जल्दी जमा कराएं.

2 दिनों बाद मेरे पास इस यूनिवर्सिटी से मुबीन नाम के एक आदमी की कौल आई कि मैडम, आप के पेपर पूरे नहीं हैं. आप पूरे पेपर्स भेजिए वरना हम आप का ऐडमिशन कैंसिल कर देंगे.

मैं ने उसे समझाना चाहा कि पेपर्स पूरे हैं, लेकिन वह बारबार एक ही बात बोलता रहा. फिर मैं ने दोबारा इस यूनिवर्सिटी की काउंसलर रुकैया से बात की, लेकिन रुकैया ने भी बड़ी लापरवाही से मुझे जवाब दिया कि आप के पास इस नाम के व्यक्ति की कोई कौल आ ही नहीं सकती. इस नाम का व्यक्ति तो बहुत पहले ही यहां से चला गया है और आप ने अभी तक अपने पूरे पेपर्स व फोटोग्राफ हमें नहीं भेजे हैं.

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यह सुन कर मुझे बहुत गुस्सा आया. मैं ने कहा कि कितनी बार आप पेपर्स और फोटो झूठ बोल कर लेंगे? आप लोग मुझे सही नहीं लग रहे हैं. आज तक मेरे पास कोई कोर्स मैटीरियल नहीं आया है.

इस पर काउंसलर ने गुस्से में फोन रख दिया. तभी 2 मिनट के अंदर एक कौल आई जिस में मुझ से कहा जाता है, ‘‘आप को रुकैयाजी से इस तरह की बात नहीं करनी चाहिए थी. हम फेक नहीं हैं. आप जब तक पूरे रुपए जमा नहीं कराएंगी, आप को कोई स्टडी मैटीरियल नहीं भेजा जाएगा. वैसे भी आप के पेपर्स पूरे नहीं हैं.’’

मैं ने उन पर गुस्सा करते हुए कहा कि अगर पेपर्स पूरे नहीं थे तो वैरिफिकेशन कौल कैसे आ गई? वैरिफिकेशन कौल का मतलब यह है कि आप ने मुझे ऐडमिशन देने के लिए वैरीफाई कर दिया है. फिर आप झूठ क्यों बोल रहे हैं?

इस पर उस व्यक्ति ने कहा कि अगर आज शाम तक आप ने पूरे रुपए नहीं जमा कराए, तो हम ऐडमिशन कैंसिल कर देंगे. आप पूरे 28 हजार रुपए एकसाथ दीजिए. इस के अलावा 8 हजार रुपए का खर्च आप को अलग से देना है.

जिस बात की शंका थी वही हुआ. न ही मुझे दाखिला मिला न ही कोई स्टडी मैटीरियल आया. ये छोटीछोटी दुकानें खोले बैठे वे लोग हैं जो खुलेआम लोगों को बेवकूफ बनाते हैं. झूठी डिगरियां, झूठे सपने दिखाते हैं. 5 हजार रुपए का मुझे जो नुकसान हुआ सो हुआ, लेकिन उस से ज्यादा दुख इस बात का था कि मैं इन लोगों की बातों में कैसे आ गई? न जाने मेरे जैसे कितने लोग इन के जाल में फंसते होंगे.

जिधर देखो उधर इंटर व डिगरी कालेज दिखाई दे रहे हैं. ऐसा क्यों? बहुत सोचने पर जो समझ आया, वह है देश की बढ़ती आबादी तथा शिक्षा की तरफ लोगों का बढ़ रहा रुझान और आम जनता का सरकारी व वित्तपोषित कालेज से भंग हो रहा मोह.

लेकिन प्रमुख कारण है सरकार द्वारा बनाए गए नियमों की शिथिल प्रणाली, जिस का फायदा उठा कर इंटर व डिगरी कालेज अपनी जेबें भर रहे हैं. नतीजतन, पूरे क्षेत्र में कुकुरमुत्ते की तरह उग आए इन विद्यालयोंमहाविद्यालयों के बोर्ड, बैनर व पोस्टर लगे दिखाई दे जाएंगे और जब इन के पास जाया जाता है तो पता चलता है कि ये 4 कमरे व 2 व्यक्तियों को बैठा कर पंजीकरण शुरू कर देने वाली दुकानें मात्र हैं.

इन के झांसे में आ कर जब कुछ छात्र व छात्राएं दाखिला लेते हैं, तो औनेपौने वेतन पर बेरोजगारों को ला कर फैकल्टी के तौर पर पढ़वाना शुरू करवा दिया जाता है. यही नहीं, किसी वित्तविहीन महाविद्यालय में छात्रों का पंजीकरण करा दिया जाता है. जहां पर उन को केवल वार्षिक परीक्षा देने जाना पड़ता है. गैरमान्यता वाले महाविद्यालय विद्यार्थियों से मोटी रकम वसूल कर, उन्हें परीक्षा में मनमुताबिक अंक दिलाने का वादा करते हैं.

दिल्ली के रहने वाले प्रकाश सिंह अपने बेटे का इंटर कालेज में ऐडमिशन कराना चाहते थे. अखबार में उन्होंने एक इंटरनैशनल यूनिवर्सिटी से जुड़े इंटर कालेज का विज्ञापन देखा, जिस में लंबेचौड़े वादे किए गए थे. प्रकाश सिंह ने कालेज जा कर देखा और स्टाफ से मिले. इस के बाद उन्होंने बेटे का ऐडमिशन करा दिया. अभी एक साल भी नहीं गुजरा था कि उन्हें पता चला कि उस कालेज की तो कोई मान्यता ही नहीं है. दरअसल, झूठे विज्ञापन के जरिए यह कालेज लाखों स्टूडैंट्स के भविष्य से खिलवाड़ कर रहा था.

धन उगाही का खेल

महाविद्यालयों में मानक के अनुरूप शिक्षक न होने से विद्यार्थियों को बहुत सी समस्याओं का सामना करना पड़ता है. सब से बड़ी समस्या तो संबंधित विषय की जानकारी न होने के कारण डिगरी के बावजूद विद्यार्थी बेरोजगार ही रहता है और समय को कोसने के लिए मजबूर होता है. आज शिक्षा का स्तर इतना गिर गया है कि छात्रों को शिक्षा का समुचित लाभ नहीं मिल पा रहा है. संस्थान तो केवल धनउगाही के कुचक्र में फंसे रहते हैं.

नवाबगंज के देवीदीन सिंह महाविद्यालय के प्रबंधन ने बीएससी प्रथम वर्ष की परीक्षा में फेल हो चुके 60 विद्यार्थियों को पास होने की नकली मार्कशीट बना कर थमा दी. मार्कशीट अवध विश्वविद्यालय की असली मार्कशीट की तरह होने के कारण छात्र भी धोखा खा गए. शक होने पर जब एक छात्रा ने विश्वविद्यालय जा कर इस की सत्यता की पड़ताल कराई तो इस फर्जीवाड़े का खुलासा हुआ.

इस समय रायबरेली जनपद, मेरठ, नोएडा आदि चाहे ग्रामीण क्षेत्र हों या शहरी, सभी जगह आप को मानकविहीन विद्यालय कुकुरमुत्तों की तरह पैर फैलाए मिल जाएंगे. सब से आश्चर्यजनक बात यह है कि इन विद्यालयों में न्यूनतम मानक के अनुरूप न तो शिक्षा भवन हैं और न ही प्रयोगशाला. लेकिन वहां स्नातक स्तर के छात्र पढ़ने के लिए आते हैं. विद्यालयों का संचालन किया जा रहा है और शिक्षा विभाग इन्हें देखते हुए भी अनजान बना रहता है. आज जो विद्यालय वित्तविहीन मान्यताप्राप्त अथवा वित्तपोषित भी हैं, वहां भी मानक शिक्षक नहीं मिल पा रहे हैं.

चंद्रवलिया गांव की रहने वाली बीना देवी के मुताबिक, उस ने शैक्षिक वर्ष 2015-16 में नवाबगंज थाना क्षेत्र के कटरा शिवदयालगंज स्थित देवीदीन सिंह महाविद्यालय में बीएससी प्रथम वर्ष में प्रवेश लिया था. फरवरी 2016 में आयोजित परीक्षा में वह फेल हो गई थी. इस कारण नए सत्र में उस ने अपना नाम जिले के वजीरगंज थाना क्षेत्र के भागीरथी सिंह स्मारक महाविद्यालय में बीएससी प्रथम वर्ष में ही लिखा लिया.

बीना का कहना है कि प्रवेश लेने के बाद अगस्त 2016 में देवीदीन महाविद्यालय के क्लर्क चंदन सिंह उर्फ संदीप सिंह ने उस के मोबाइल पर फोन कर उसे पास होने की जानकारी दी और बीएससी द्वितीय वर्ष में प्रवेश लेने के लिए कहा. इस पर भरोसा कर के भागीरथी कालेज को छोड़ कर उस ने फिर से देवीदीन सिंह महाविद्यालय में बीएससी द्वितीय वर्ष में प्रवेश ले लिया.

कुछ दिनों बाद उसे मार्कशीट के फर्जी होने का शक हुआ तो उस ने अवध विश्वविद्यालय जा कर मार्कशीट की जांच कराने का फैसला किया. बीना ने बताया कि जब उस ने विश्वविद्यालय में मार्कशीट की जांच कराई तो पता चला कि वह फेल है और उसे जो मार्कशीट दी गई है वह जाली है. इस जानकारी के बाद वह फिर से महाविद्यालय पहुंची और मार्कशीट नकली होने की जानकारी देते हुए क्लर्क से परीक्षा की क्रौसलिस्ट दिखाने की मांग की.

बीना का आरोप है कि अपनी पोल खुलती देख क्लर्क ने पहले तो उसे चुप रहने की नसीहत दी, लेकिन जब वह नहीं मानी तो उस ने उस से अभद्रता करते हुए उसे जान से मारने की धमकी देते हुए कालेज से भगा दिया.

बीना का कहना है कि उस के अलावा, बीएससी प्रथम वर्ष में कुल 72 छात्र थे और सब के सब फेल हो गए थे. लेकिन महाविद्यालय ने छात्रा मधु गुप्ता, पूजा सिंह, धनोसरी मिश्रा, वली मोहम्मद समेत करीब 60 छात्रों को पास वाली फर्जी मार्कशीट दे कर अपने यहां बीएससी द्वितीय वर्ष में दाखिला दे दिया था.

इन फर्जी महाविद्यालयों के कारण बच्चों को आधाअधूरा ज्ञान ही मिल पा रहा है. इसी कारण शिक्षा का स्तर भी दिनप्रतिदिन गिरता जा रहा है. देखा जाए तो इन रसूखदार, लंबरदार व प्रभावशाली लोगों द्वारा संचालित किए जा रहे विद्यालयों के आगे जिलाप्रशासन, शिक्षा विभाग व विश्वविद्यालय आंख मूंदे हुए हैं और अपनी झोली भरने में मशगूल हैं.

आज हमारे बीच से जो जा रही है वह है शिक्षा, जिस का परिणाम अब धीरेधीरे दिखाई पड़ने लगा है और भविष्य में इस का परिणाम और भी भयानक हो सकता है. कुकुरमुत्तों की तरह फैले डिगरी व इंटर कालेजों पर शासनप्रशासन द्वारा शिकंजा कभी नहीं कसा जाएगा, क्योंकि पूरा तंत्र इन्हें विकसित करने में लगा है. सरकारी नीतियां ही इस तरह बन रही हैं कि शिक्षा कुछ को मिले और लोग दक्षिणा की तरह फीस दे कर भूल जाएं कि बदले में आश्वासन के अलावा कुछ मिलेगा.

राजस्थान से कश्मीर पहुंच गई रितु

राजस्थान के बाड़मेर शहर के महावीर चौक में एक खंडेलवाल परिवार रहता है. इस परिवार की एक लाडली बेटी थी रितु खंडेलवाल. वह खूबसूरत थी. पढ़ाईलिखाई में वह कोई ज्यादा होशियार तो नहीं थी, पर ठीकठाक थी. मांबाप उसे जमाने के हिसाब से रहने की सीख दिया करते थे.

रितु के मांबाप मध्यमवर्गीय परिवार से ताल्लुक रखते थे. घर से विद्यालय आतेजाते वह किसी से भी बेवजह बोलती तक नहीं थी. ऐसी शरमीली और संकोची स्वभाव की रितु न जाने कब एक कश्मीरी युवक गुलजार से प्यार कर बैठी.

गुलजार करीब 2 साल पहले कुपवाड़ा (कश्मीर) से बाड़मेर में कामधंधे की तलाश में आया था. गुलजार को बाड़मेर के एक कैफे में वेटर की नौकरी मिल गई थी. वह पढ़ालिखा, अच्छी कदकाठी का नौजवान था. उस की बोलचाल से सभी प्रभावित हो जाते थे.

गुलजार को महंगे मोबाइल रखने का शौक था. जैसे ही कोई नया अच्छा मोबाइल बाजार में आता और वह उस के खरीदने की क्षमता की रेंज में होता तो वह खरीद लेता था. वह फेसबुक एवं वाट्सऐप पर ज्यादा ऐक्टिव रहता था. वह अपने इलाके के 3-4 लड़कों को भी बाड़मेर लाया था, जो उसी कौफी कैफे में नौकरी करते थे.

गुलजार घर से साधनसंपन्न था. तभी वह महंगे मोबाइल खरीदता था वरना कैफे की 7-8 हजार रुपए महीने की तनख्वाह से महंगे मोबाइल खरीदना संभव नहीं था. अब बात यह आती है कि अगर गुलजार घर से साधनसंपन्न था तो वह कुपवाड़ा से इतनी दूर वह भी वेटर की नौकरी करने क्यों आया? क्या इस का राज कुछ और था?

बाड़मेर के जिस कैफे में गुलजार नौकरी करता था, वह कैफे एक स्थानीय भाजपा नेता का है. पाकिस्तान से सटे सीमावर्ती जिले बाड़मेर में न जाने कितने गुलजार अपना गुल खिलाने में लगे हैं.

कहते हैं प्यार मजहब और अमीरीगरीबी नहीं देखता. मगर यह कटु सत्य है कि जब भी 2 धर्मों के युवकयुवती ने प्यार या शादी की, बवाल जरूर हुआ है और आगे भी होता रहेगा.

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कोई भी मातापिता यह नहीं चाहेगा कि उस के बच्चे दूसरे धर्म में शादी करें. दूसरे धर्म में शादी करने पर जब हालात बिगड़े तो कोर्ट को भी ऐसे मामलों में दखल देना पड़ा. गत वर्ष जोधपुर शहर में एक हिंदू युवती के मुसलिम युवक से प्यार के बाद शादी करने पर खूब बवाल मचा था. हिंदूवादी संगठनों ने खूब हायतौबा मचाई थी.

अब ऐसा ही ताजा मामला बाड़मेर की रितु खंडेलवाल और कुपवाड़ा के गुलजार का सामने आया है. यह किसी को पता नहीं चला कि कब दोनों में प्यार हुआ और कब उन्होंने बाड़मेर से भाग कर कुपवाड़ा जा कर निकाह और कोर्टमैरिज की. उस में भी यह कि लड़की ने धर्म परिवर्तन कर अपना नाम रितु से जैनब रखा.

रितु हो गई गुलजार की दीवानी

रितु जब गुलजार के संपर्क में आई तो वह उस की दीवानी हो गई. गुलजार भी रितु से बेइंतहा मोहब्बत करता था. उन दोनों को लगा कि उन्हें सारे जहां की खुशी मिल गई. गुलजार सिर्फ डेढ़ साल बाड़मेर में रहा. जमाने से नजरें बचा कर वह दोनों थार नगरी में मिलते रहे. दोनों एकदूसरे को हद से ज्यादा प्यार करते थे. मगर किसी को इन के प्यार की भनक तक नहीं लगी.

एक रोज दोनों एकांत में मिले तो गुलजार बोला, ‘‘रितु, हम दोनों अलगअलग धर्मों के हैं. अगर कल को कोई समस्या खड़ी हो गई तो तुम मुझ से बिछुड़ तो नहीं जाओगी? यह बात याद रखो कि अगर तुम मुझे नहीं मिली तो मैं जीतेजी मर जाऊंगा.’’

‘‘गुलजार, मैं इस जन्म में ही नहीं, हर जन्म में तुम्हारी रहूंगी. तुम से प्यार किया है तो जीते जी निभाऊंगी भी. मैं जमाने से नहीं डरती. तुम्हारे कहने पर मैं अपनी जान भी कुरबान कर सकती हूं.’’ रितु ने गुलजार की आंखों में आंखें डाल कर कहा तो गुलजार समझ गया कि रितु उस का साथ मरते दम तक नहीं छोड़ेगी.

इस के बाद दोनों मिलते रहे और उन का प्यार परवान चढ़ता रहा. गुलजार के एक इशारे पर रितु जान तक देने को तैयार थी. अपने प्यार की खातिर वह अपने मातापिता तक को भुलाने के लिए तैयार हो गई. वही मांबाप जिन्होंने उस की खुशी के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी. जैसा वह कहती, वह वैसा ही करते थे.

गुलजार ने रितु को अपने रंग में ऐसा रंग लिया था कि वह चंद दिनों की मुलाकात में ही उस पर बेतहाशा यकीन करने लगी थी. एक दिन गुलजार ने उस से कहा, ‘‘रितु, अब थोड़े दिनों बाद तुम बालिग हो जाओगी. इस के बाद हम दोनों कोर्टमैरिज के साथ निकाह कर लेंगे.’’

‘‘सही कह रहे हो गुलजार, मैं भी यही चाहती हूं.’’ रितु ने गुलजार की हां में हां मिलाते हुए कहा.

‘‘रितु, अब मैं वापस कुपवाड़ा जाने की सोच रहा हूं. तुम भी बाद में मौका मिलने पर वहां आ जाना. तुम जानती ही हो कि अगर हम ने बाड़मेर में रह कर कोर्टमैरिज या निकाह किया तो बवाल हो जाएगा. हम कुपवाड़ा जा कर यह सब करेंगे ताकि हमें कभी कोई अलग न कर सके.’’ गुलजार ने रितु को अपनी पूरी योजना समझा दी और इस के बाद घटना से करीब 3 महीने पहले गुलजार हमेशा के लिए बाड़मेर को अलविदा कह कर कुपवाड़ा चला गया.

रितु बाड़मेर में थी और गुलजार कुपवाड़ा में था. दोनों दूर हो कर भी दिलों के करीब थे. दोनों की मोबाइल पर अकसर बातें होती थीं. दोनों एकदूसरे के दिल का हाल पूछते रहते थे. प्रेमी के बिना रितु का मन नहीं लग रहा था.

बना ली कुपवाड़ा जाने की योजना

रितु गुलजार के पास कुपवाड़ा (कश्मीर) जाने की योजना बनाने लगी. उस ने अपने पढ़ाई के कागज और आईडी वगैरह इकट्ठे कर लिए. आखिर उस ने बाड़मेर को अलविदा कहने का मन बना लिया. योजनानुसार रितु खंडेलवाल 16 मार्च, 2018 को बाड़मेर से बड़ौदा के लिए रवाना हुई. वहां उस के कोई रिश्तेदार रहते थे. उस की बुआ मुंबई में रहती थी. उन के पास भी वह राजस्थान से मुंबई अकेली जाती रहती थी. इसलिए मांबाप ने उस के अकेला बड़ौदा जाने पर कोई आपत्ति नहीं जताई.

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रितु राजस्थान से बड़ौदा जाने वाली बस में बैठ कर गई थी, मगर वह 17 मार्च को देर रात तक भी बड़ौदा नहीं पहुंची थी. इस का पता रितु के मातापिता को तब चला, जब उन्होंने बड़ौदा में रहने वाले अपने रिश्तेदार को फोन कर के रितु के पहुंचने के बारे में पूछा. मातापिता एवं अन्य परिजन चिंता करने लगे कि वह कहां चली गई. रितु ने बस का टिकट बाड़मेर से बड़ौदा का लिया था मगर वह कहां गुम हो गई, कोई नहीं जानता.

जवान बेटी के गायब होने पर रितु के मातापिता के होशोहवास गुम थे. उन्होंने अपने स्तर पर उस का पता लगाने की कोशिश की. मगर कहीं पता नहीं चला तो थकहार कर 21 मार्च, 2018 को बाड़मेर की थाना कोतवाली पहुंचे.

थानाप्रभारी को उन्होंने बेटी के गायब होने की बात बताई. थानाप्रभारी अमर सिंह रतनू ने रितु की गुमशुदगी दर्ज कर जांच शुरू कर दी. इस बारे में थानाप्रभारी ने उच्चाधिकारियों से भी विचारविमर्श किया. उन्होंने रितु के मोबाइल फोन की कालडिटेल्स निकलवाई तो उस के फोन की लोकेशन कुपवाड़ा, जम्मूकश्मीर की आ रही थी.

मोबाइल कालडिटेल्स में एक फोन नंबर पर ज्यादा बात करने के सबूत भी मिले. जांच करने पर वह फोन नंबर कुपवाड़ा के गुलजार का पाया गया. जांच में बाड़मेर पुलिस को पता चला कि गुलजार बाड़मेर के ही कौफी कैफे में नौकरी करता था.

इस के बाद बाड़मेर से एक पुलिस टीम कुपवाड़ा, कश्मीर गई. मगर रितु और गुलजार नहीं मिले. कुपवाड़ा पुलिस ने भी बाड़मेर पुलिस को सहयोग नहीं दिया. वहां आतंकवादियों का इतना खौफ है कि पुलिस इलाके में जाने से भी कतराती है.

रितु ने धर्म परिवर्तन कर नाम रखा जैनब

बाड़मेर पुलिस कश्मीर में खाक छान रही थी कि इस बीच बाड़मेर पुलिस को डाक के जरिए जम्मूकश्मीर कोर्ट से रितु उर्फ जैनब और गुलजार के शादी करने के दस्तावेज मिले तो पुलिस टीम बाड़मेर लौट आई.

पुलिस को पता चला कि रितु ने इसलाम धर्म कबूल कर लिया है. उस का नाम जैनब रखा गया है और उस ने गुलजार से निकाह कर लिया है. बाद में उन दोनों ने कोर्ट में कोर्टमैरिज कर ली है.

बाड़मेर पुलिस जम्मूकश्मीर से वापस लौट आई तो रितु के परिजन पुलिस से मिले. पुलिस के हाथ कानून से बंधे थे. रितु बालिग थी और उस ने अपनी मरजी से शादी की थी. ऐसे में पुलिस से मदद नहीं मिलने की स्थिति में परिजन मीडिया के सामने आए. उन्होंने आरोप लगाया कि उन की बेटी को षडयंत्र के तहत फंसाया गया है. पुलिस मदद करे.

इस पर पुलिस अधीक्षक डा. गगनदीप सिंगला के निर्देश के बाद पुलिस की एक स्पैशल टीम बाड़मेर से कुपवाड़ा भेजी गई. इसी बीच रितु के परिजनों ने गुलजार के खिलाफ धोखाधड़ी व अपहरण कर जबरदस्ती शादी करने का मामला दर्ज करा दिया.

राजस्थान हाईकोर्ट में इस मामले में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका भी दायर हुई. रितु के पिता ने बाड़मेर कोतवाली थाने में गुलजार नामक कश्मीरी युवक पर रितु का अपहरण कर जबरदस्ती शादी रचाने के आरोप लगाए थे. जयपुर हाईकोर्ट में याचिका दायर कर उन्होंने बताया था कि उन की बेटी रितु का अपहरण हुआ है और झूठे दस्तावेजों के आधार पर गुलजार ने जम्मूकश्मीर में उन की बेटी से शादी कर ली है. उन्होंने लव जिहाद की आशंका भी जताई.

बाड़मेर से स्पैशल पुलिस टीम कुपवाड़ा गई और दोबारा खाली हाथ लौट आई. रितु नहीं मिली. बाड़मेर पुलिस अधीक्षक डा. गगनदीप सिंगला ने कहा कि जम्मूकश्मीर पुलिस ने बाड़मेर पुलिस की कोई मदद नहीं की. इस कारण पुलिस रितु को बरामद नहीं कर सकी. रितु के परिजन पुलिस अधीक्षक से फिर मिले और रोरो कर बेटी को बरामद करने की गुहार लगाई.

फेसबुक पर हुआ वीडियो जारी

पुलिस अधीक्षक डा. गगनदीप सिंगला भले इंसान थे. इस कारण वह कोशिश में थे कि किसी तरह रितु और गुलजार एक बार पुलिस गिरफ्त में आ जाएं तो सारा सच सामने आ जाए. मगर रितु के मिलने से पहले 24 अप्रैल, 2018 को कश्मीरी युवक गुलजार के फेसबुक पर रितु और गुलजार ने संयुक्त वीडियो जारी कर पूरे मामले को नया मोड़ दे दिया.

वीडियो में गुलजार हाथ जोड़ कर बोल रहा था कि बाड़मेर के एसपी साहब से निवेदन करते हैं कि उन के पीछे मत लगो. हम ने रजामंदी से शादी की है, कोई गुनाह नहीं किया है. हम अपनी लाइफ जीना चाहते हैं. हमें हमारी लाइफ जीने दो, तंग मत करो.

वीडियो में रितु कह रही थी कि पापा मैं अपने पति गुलजार के साथ बहुत खुश हूं. मैं जिंदगी भर इसी के साथ रहना चाहती हूं और मरना भी इसी के साथ ही है. मेरे पीछे हाथ धो कर मत पड़ो. पापा हमें शाति से रहने दो, तंग मत करो.

पहले वीडियो में रितु का कहना है कि रितु के मातापिता ने उस के पति पर जो आरोप लगाए, वे झूठे हैं. उस ने कहा कि उस का मैरिज सर्टिफिकेट है, जिस पर उस के खुद के फिंगरप्रिंट हैं, जो झूठे नहीं हो सकते.

मैरिज सर्टिफिकेट दिखाते हुए रितु ने कहा कि वह खुद जम्मूकश्मीर आई और वहां आ कर निकाह किया था. मेरा खुद का स्टेटमेंट है, मेरे घर वाले कह रहे हैं कि वो फेक है. कोर्ट के और्डर कभी फेक नहीं होते. मैं अपने बयान जम्मूकश्मीर पुलिस के यहां भी दर्ज करवा चुकी हूं और स्टेटमेंट बाड़मेर भी भिजवा दिया गया है.

उस नेकहा कि मैं खुद यहां आई थी. सभी टिकटें मैं ने खुद करवाई थीं. मैं बड़ौदा के लिए रवाना हुई, अहमदाबाद में बस से उतरी. यदि मेरा अपहरण होता तो मैं अहमदाबाद में क्यों उतरती. अहमदाबाद से मैं दिल्ली पहुंची और दिल्ली से श्रीनगर की फ्लाइट की टिकट भी मैं ने खुद ही करवाई.

मैं अकेली थी, मेरे साथ कोई नहीं था. यहां श्रीनगर कोर्ट में निकाह किया था. उस ने कहा कि मेरे घर वाले कहते हैं कि 18 साल की नहीं हूं. ये मेरी 10वीं की मार्कशीट है, जिस में जन्मतिथि लिखी हुई है.

दूसरा वीडियो गुलजार के फेसबुक पर जारी हुआ. उस वीडियो में गुलजार ने रितु उर्फ जैनब से सवाल किए हैं, जिन के रितु ने जवाब दिए हैं. गुलजार पूछता है कि तुम्हारे मातापिता का आरोप है कि मैं तुम्हारा रास्ता रोकता था, क्या मैं ने ऐसा कभी किया था? इस के जवाब में रितु कहती है कि गुलजार ने मेरे साथ कभी ऐसी हरकत नहीं की.

गुलजार दूसरा सवाल करता है कि क्या मैं ने तुम्हारा अपहरण किया था? इस पर रितु बताती है कि मेरा अपहरण नहीं हुआ, बल्कि मैं खुद फ्लाइट से यहां आई.

तीसरे सवाल में पूछता है कि तुम्हारे पिता का आरोप है कि 20 दिसंबर, 2017 को तुम ने एग्जाम दिए थे, सच्चाई क्या है बताएं?  इस पर रितु कहती है कि 20 दिसंबर को नहीं 20 फरवरी को कालेज में बीए द्वितीय वर्ष का एग्जाम दिया था. यह बात कालेज में पता कर सकते हैं.

रितु ने घर वालों को बताया झूठा

अंत में रितु हाथ जोड़ कर कहती है कि मेरा एसपी साहब से निवेदन है कि मुझ पर मेरे घर वाले झूठा इलजाम लगा रहे हैं, मुझे तंग कर रहे हैं. मैं 18 साल की हूं. मुझे अपनी जिंदगी जीने का हक है. मैं अपनी लाइफ के फैसले खुद कर सकती हूं. मुझे इस (गुलजार) के सिवाय किसी की जरूरत नहीं है.

वीडियो जारी होने के बाद रितु के परिजन मीडिया से मुखातिब हुए. उन्होंने बताया कि ये सब झूठ है. रितु को डरायाधमकाया गया है. वह दबाव में बोल रही थी. 17 मार्च को अहमदाबाद से फ्लाइट में गुलजार भी उस के साथ था. उस की टिकट और दोनों के वीडियो फुटेज भी हैं.

बाड़मेर कोतवाली थानाप्रभारी अमर सिंह रतनू ने वीडियो जारी होने के बाद कहा, ‘‘गुलजार ने जो वीडियो फेसबुक पर डाले हैं, वे सही हैं. गुलजार की लोकेशन तो लगातार कुपवाड़ा की ही आ रही थी. लड़की अकेली ही वहां गई थी, हम लगातार तलाश कर रहे थे. हमारे यहां रिपोर्ट ही दर्ज है, हाईकोर्ट में जवाब पेश करेंगे.’’

बाड़मेर की रितु के कथित धर्म परिवर्तन व निकाह के मामले में वीडियो फेसबुक पर जारी होने के बाद नया मोड़ आ गया. रितु का कहना था कि वह एक बार पहले भी जम्मूकश्मीर गई थी. अब दूसरी बार वह जम्मूकश्मीर आई है.

बाड़मेर पुलिस अधीक्षक डा. गगनदीप सिंगला ने कहा, ‘‘बाड़मेर पुलिस ने युवती के बयान दर्ज किए हैं. युवती ने वीडियो में जो बातें बताई हैं, वही पुलिस ने दर्ज की हैं. परिजनों से फोन पर उस की बात भी करवाई है.’’

रितु का कहना है कि उस पर कोई दबाव नहीं, रजामंदी से निकाह किया है. रितु के मातापिता अब भी यह मानने को तैयार नहीं हैं कि रितु ऐसा कदम उठा सकती है. मगर सत्य को कैसे नकारा जा सकता है.

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सत्य यही है कि रितु धर्म परिवर्तन कर इसलाम धर्म कबूल कर के जैनब बन गई और उस ने गुलजार से निकाह और कोर्टमैरिज कर ली है. वे दोनों बालिग हैं और उन्हें अपना जीवन जीने का हक है.

कथा लिखने तक जैनब और गुलजार कश्मीर में ही थे. इस मामले ने एक बार फिर साबित कर दिया कि प्यार न तो धर्म देखता है और न ही रंगरूप. प्यार जिस से हो गया, वही अच्छा लगता है. बाकी सब बेमानी लगते हैं.

घरेलू कुत्तों ने चोरी करवाई, गली के कुत्तों ने चोर को पकड़वाया

नवंबर 2008 में दिबाकर बनर्जी निर्देशित एक फिल्म आई थी ‘ओए लकी ओए’. यह फिल्म सुपरचोर बंटी की सच्ची कहानी पर आधारित थी, जिस में मुख्य भूमिका निभाई थी अभय देओल ने. यानी सुपरचोर बंटी की भूमिका में अभय देओल थे. जैसा कि बंटी करता था, वैसे ही फिल्म में दिखाया गया था कि फिल्म का नायक जिस कोठी या फ्लैट में चोरी करने जाता है, वहां के कुत्ते को इस तरह अपने वश में कर लेता है कि उसे देख भौंके नहीं. उस के बाद वह वहां आराम से चोरी करता था.

बीते महीने दिल्ली पुलिस ने एक ऐसे ही चोर को पकड़ा है, जो किसी भी तरह के कुत्ते को अपने वश में कर लेता था और आराम से चोरी करता था. 24 वर्षीय इस चोर का नाम था आकाश, जो उत्तर प्रदेश के इटावा के गांव शेखपुरा सराय का रहने वाला है. महज एक आवाज और फिर कुत्ते के सिर पर हाथ फिरा कर उसे वश में कर लेने वाला यह चोर दिल्ली में अभी तक 100 से ज्यादा चोरियां कर चुका है.

चोरी करने के पीछे इस चोर की चाहत भी कुछ अलग तरह की थी. दरअसल, अप्रैल में आकाश की शादी होने वाली थी. वह चाहता था कि सुहागरात में अपनी नईनवेली दुलहन को उपहारस्वरूप ढेर सारी जूलरी दे.

आकाश का यह सपना पूरा हो पाता, इस से पहले ही वह पुलिस के हत्थे चढ़ गया. दरअसल, उत्तमनगर के आनंदविहार में आकाश के गांव के कुछ लोग रहते थे. काम की तलाश में उन के साथ दिल्ली आया आकाश वहीं किराए का कमरा ले कर रहने लगा. उस ने अपने लिए काम ढूंढने की काफी कोशिश की, लेकिन उसे कोई अच्छा काम नहीं मिला. जब भूखों मरने की नौबत आई तो उस ने स्नैचिंग शुरू कर दी. वह राह चलते लोगों से मोबाइल फोन, गले की चेन वगैरह की झपटमारी करने लगा. इस काम में उसे सफलता मिली तो उस की हिम्मत बढ़ गई. झपटे हुए सामान को औनेपौने दामों में बेच कर वह अपना खर्चा चलाने लगा.

इसी में से कुछ पैसे वह अपने मातापिता को भेजता था. उस ने घर पर बता रखा था कि वह एक अच्छी कंपनी में नौकरी करता है. चूंकि आकाश कभी पकड़ा नहीं गया था, इसलिए उस की हिम्मत बढ़ती जा रही थी. इसी के चलते उस ने घरों में चोरियां करनी शुरू कर दीं.

कुत्तों की परेशानी आई तो उस ने अपने गांव के कुछ अनुभवों और कुत्तों के व्यवहार से संबंधित कुछ किताबें पढ़ कर कुत्तों को वश में करना सीखा. इस से उसे बड़े लोगों के घरों में चोरी करने में आसानी होने लगी. जब आकाश की आय बढ़ी तो वह अपने घर ज्यादा पैसे भेजने लगा. लेकिन इसी बीच उसे ड्रग लेने की लत लग गई. धीरेधीरे उस की यह आदत इतनी बढ़ी कि वह करीब 3 हजार रुपए रोजाना ड्रग पर खर्च करने लगा.

आकाश जिस तरह मोटी रकम गांव भेजता था, उस से गांव वालों को लगता था कि वह कोई अच्छी नौकरी करता है. फलस्वरूप उस की शादी के लिए अच्छे परिवारों से रिश्ते आने लगे. आकाश से बात कर के उस के घर वालों ने एक अच्छे घरपरिवार में उस का रिश्ता पक्का कर दिया. अप्रैल में उस की शादी की तारीख भी तय हो गई.

आकाश चाहता था कि वह सुहागरात में अपनी दुलहन को ढेर सारी जूलरी गिफ्ट करे ताकि वह खुश हो जाए. इसी के मद्देनजर उस ने ताबड़तोड़ स्नैचिंग और चोरियां शुरू कर दीं. इस बीच उस ने 100 से ज्यादा वारदातों को अंजाम दिया.

द्वारका के बिंदापुर थानाक्षेत्र में एक मकान में की गई चोरी में उसे लाखों की जूलरी मिली. खास बात यह थी कि जिस कोठी में उस ने चोरी की, उस में 4 खतरनाक कुत्ते थे, लेकिन भौंका एक भी नहीं. असलियत में आकाश को देख कर वे दुम हिलाने लगे थे, जैसे कह रहे हों, जाओ आराम से चोरी करो.

आकाश ने उस मकान में चोरी तो कर ली, लेकिन काम हो जाने के बाद जब वह सड़क पर आया तो उसे गली के कुत्तों ने घेर लिया. उस ने उन्हें कंट्रोल करने की बहुत कोशिश की, लेकिन उन्होंने पीछा नहीं छोड़ा.

यहां तक कि एक कुत्ते ने उस के पैर में काट भी लिया. इस के बावजूद घायल आकाश किसी तरह कुत्तों से पीछा छुड़ा कर अपने कमरे पर पहुंच गया. अगले दिन थाना बिंदापुर में इस मामले की रिपोर्ट दर्ज हुई. लाखों की जूलरी चोरी का मामला था, इसलिए इस की जांच की जिम्मेदारी द्वारका जिले के स्पैशल स्टाफ को सौंपी गई.

सबइंसपेक्टर नवीन कुमार और अरविंद कुमार की टीम इस मामले को सुलझाने में लग गई. पुलिस ने घटनास्थल के आसपास के सीसीटीवी कैमरों की फुटेज खंगाली. 3 किलोमीटर के दायरे में उन्होंने करीब 25 सीसीटीवी कैमरों की फुटेज देखीं.

एक फुटेज में उन्हें एक संदिग्ध युवक दिखाई तो दिया लेकिन उस की शक्ल क्लियर नहीं थी. ऐसे में उसे पहचानना संभव नहीं था. अलबत्ता उस फुटेज से यह पता चल गया कि उस युवक को गली के कुत्तों ने घेर लिया था और उस की टांग में काटा भी था.

पुलिस के लिए यह काफी महत्त्वपूर्ण क्लू था. पुलिस टीम समझ गई कि कुत्ते का काटा हुआ व्यक्ति कहीं न कहीं इंजेक्शन लगवाने जरूर जाएगा.

अपनी इस सोच के चलते पुलिस टीम ने उन सरकारी अस्पतालों से संपर्क किया, जहां कुत्तों के काटे व्यक्ति को इंजेक्शन लगाए जाते हैं. वहां इस बात का भी पता लगाया गया कि 25, 26, 27 मार्च को ऐसे कौनकौन युवक आए थे, जिन की टांग में कुत्ते ने काटा था.

इसी छानबीन में पुलिस को जानकारी मिली कि उत्तमनगर के आनंदविहार इलाके में रहने वाला आकाश इंजेक्शन लगवाने आया था. थोड़ी कोशिश के बाद पुलिस आकाश तक पहुंच गई और उसे हिरासत में ले कर पूछताछ की.

अंतत: आकाश ने चोरी की इस वारदात को तो स्वीकारा ही, साथ ही चोरी के ऐसे खुलासे किए, जिन्हें सुन कर पुलिस भी हैरत में रह गई. उस ने 100 से अधिक वारदातों को अंजाम देने की बात स्वीकार की. इन में से 17 केसों को तो पुलिस टीम ने सुलझाया ही, आकाश से 20 लाख रुपए की जूलरी भी बरामद की.

पूछताछ के बाद आकाश को अदालत में पेश कर के तिहाड़ जेल भेज दिया गया. अब आकाश की शादी भी खटाई में पड़ गई और सुहागरात में अपनी दुलहन को ढेरों ज्वैलरी उपहार देने का सपना भी अधूरा रह गया.

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