संजूः पिता पुत्र के रिश्ते पर बेहतरीन फिल्म

‘‘मुन्नाभाई एमबीबीएस’’ व ‘‘पीके’’ सहित कई सफल फिल्में निर्देशित कर चुके फिल्मकार राजकुमार हिरानी पहली बार अपने दोस्त व अभिनेता संजय दत्त के जीवन पर बायोपिक फिल्म ‘‘संजू’’ लेकर आए हैं. पूरी फिल्म देखकर एक बात उभरकर सामने आती है कि फिल्मकार का मकसद कई बुराईयों के बावजूद संजय दत्त को एक साफ सुथरी ईमेज वाला कलाकार बताना ही रहा है और इसके लिए फिल्म में संजय दत्त की ईमेज को बिगाड़ने या उन्हें ताड़ा के तहत गिरफ्तार किए जाने पर भी संजय दत्त की ईमेज खराब करने के लिए अखबार, न्यूज चैनलों व पत्रकारिता को ही कटघरों में खड़ा किया गया है. इसी के चलते फिल्मकार ने फिल्म में संजय दत्त की वैयक्तिक जीवन को पेश करने से खुद को दूर ही रखा.

फिल्म शुरू होती है संजय दत्त को पांच वर्ष की सजा सुनाए जाने की खबर से. इस खबर को संजय दत्त व मान्यता दत्त अपने छोटे बच्चों के साथ टीवी पर देखते हैं. संजय नहीं चाहते कि लोग उनके बच्चों को टेररिस्ट के बच्चे कहकर बुलाए, इसलिए आत्महत्या करना चाहते हैं, पर मान्यता दत्त यह कह कर रोक लेती हैं कि इससे उन्हे छुटकारा मिल जाएगा, पर बच्चों को नहीं.

उसके बाद मान्यता के कहने पर सजय दत्त एक मशहूर विदेशी लेखक विनी(अनुष्का शर्मा) को अपने जीवन की दास्तान सुनाते हैं. संजय दत्त चाहते हैं कि विनी उनकी आत्मकथा रूपी किताब लिखें. पर विनी एक टेररिस्ट की जिंदगी पर किताब नही लिखना चाहती. संजू उन्हें समझाता है कि अखबारों में जो छपा वह सच नहीं है. खैर, संजू की कहानी सुनने के लिए दूसरे दिन शाम को विनी मिलने आने वाली होती है, पर सुबह समुद्र के किनारे बीच पर टहलते हुए जुबिन मिस्त्री (जिम सरभ), विनी से मिलकर कहता है कि वह संजू पर किताब न लिखे, क्योंकि वह टेररिस्ट है. पर नाटकीय घटनाक्रम के बाद विनी, संजू से उसकी कहानी सुनने बैठ जाती है.

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फिर कहानी शुरू होती है सुनील दत्त(परेश रावल) और नरगिस दत्त(मनीषा कोईराला) के बेटे संजय दत्त उर्फ संजू बाबा(रणबीर कपूर) की पहली फिल्म ‘‘रौकी’’ की शूटिंग से, जिसे स्वयं सुनील दत्त बना रहे होते हैं. किस तरह संजू का दोस्त बना ड्रग्स पैडलर जुबिन मिस्त्री, संजू को सिगरेट व ड्रग्स की लत डालता है. पहली फिल्म में किस तरह से संजू ने अभिनय किया. संजू का अपने माता पिता से औरतबाजी, शराब, ड्रग्स सहित सभी बुरी आदतों को छिपाना, नरगिस दत्त का बीमार होना, अमरीका के अस्पताल में नरगिस दत्त जब कोमा में चली जाती हैं तब नरगिस दत्त और सुनील दत्त के प्रशंसक कमलेश उर्फ कमली (विक्की कौशल) से संजू की मुलाकात, फिल्म रौकी’ के प्रदर्शन से तीन दिन पहले नरगिस दत्त की मौत हो जाना, रौकी के बाद बुरी लतों के चलते संजू को फिल्में न मिलना, कमलेश की सलाह पर सुनील दत्त का संजू को अमरीका के रिहैब सेंटर ले जाना, संजू का रिहैब सेंटर से भागना, सड़क पर भीख मांगकर बस का किराया इकट्ठा कर कमलेश के घर पहुंचना, फिर दुबारा रिहैब सेंटर जाना. बुरी लत छूटने के बाद फिल्में मिलना शुरू होना. जुबिन का सच भी सामने आता है.

तभी 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद तोड़ने की घटना के बाद संजू को अंडरवर्ल्ड से धमकियां मिलना, उनसे बचने के लिए संजू का अपने घर में ‘एके 56’ राइफल रखना व पकड़े जाना. अखबार में संजय दत्त के घर के बाहर आरडीएक्स से भरा ट्रक का पकड़े जाने की खबर का छपना और कमलेश का संजय से दूर हो जाना, सुनील दत्त की मौत सहित कई कहानियां संजू सुनाते हैं.

इस बीच संजू को बाइज्जत बरी कराने के लिए सुनील दत्त की अपनी जद्दोजेहद की कहानी भी सामने आती है. पांच साल तक जेल की सजा काटकर जब संजू बाहर निकलते हैं तो कमलेश उनसे मिलता है. संजय दत्त की पत्नी मान्यता दत्त(दिया मिर्जा) हमेशा उनके साथ चट्टान बनकर खड़ी नजर आती हैं.

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यूं तो फिल्म की शुरूआत के दस मिनट काफी शुष्क व धीमी गति के हैं, पर फिर फिल्म गति पकड़ती है. फिल्म के पटकथा लेखक- अभिजात जोशी और राज कुमार हिरानी ने संजय दत्त के जीवन की सर्वविदित कहानी को भी इतने रोचक तरीके से सेल्यूलाइड के परदे पर पेश किया है कि दर्शक टकटकी बांधे फिल्म देखता रहता है.

फिल्म में तमाम भावनात्मक दृश्यों के दौरान दर्शकों की आंखे भी नम होती है. राज कुमार हिरानी का निर्देशन भी कमाल का है. मगर फिल्म में कई जगह एडिटिंग कर दृश्यों को छोटा करने की जरुरत महसूस होती है. कई जगह फिल्म ढीली भी होती है. पूरी फिल्म देखने के बाद एक ही बात उभरकर आती है कि यह फिल्म संजय दत्त का महिमा मंडन करने के लिए बनाई गई है और जिस तरह से फिल्म में अखबार, न्यूज चैनल व पत्रकारिता को कोसा गया है, उससे फिल्म खराब ही हुई है और यह लेखक व निर्देशक के तौर पर राज कुमार हिरानी की सबसे बड़ी कमजोरी है. राज कुमार हिरानी पूरी फिल्म में संजय दत्त को मीडिया द्वारा शोषित कलाकार ही चित्रित किया गया है. फिल्म का क्लायमेक्स अटपटा सा है.

फिल्म में एक जगह संजय दत्त कबूल करते हैं कि उनके 308 औरतों से संबंध रहे हैं. पर संजय दत्त के कई हीरोईनो संग इश्क की कहानियों, मान्यता दत्त से शादी की कहानी, पहली पत्नी रिचा शर्मा और बेटी त्रिशाला, कलाकारों के बीच दोस्ती, मित्रता, नफरत के रिश्ते आदि को लेकर एक शब्द नहीं कहा गया. ऐसे में फिल्म ‘संजू’ संजय दत्त की बायोपिक फिल्म कैसे हो गई?

जहां तक अभिनय का सवाल है, तो यह फिल्म रणबीर कपूर, परेश रावल व विक्की कौशल की है. रणबीर कपूर खुद को पूर्णरूपेण संजय दत्त के किरदार में ढालने में सफल रहे हैं. रणबीर कपूर ने साबित कर दिखाया कि उनके अंदर अभिनय क्षमता कूट कूट कर भरी हुई है. मगर उन्हें अच्छे निर्देशक, अच्छी पटकथा व किरदार न मिले, तो वह क्या करें. परेश रावल के साथ रणबीर कपूर के सभी दृश्य जीवंत बनकर उभरे हैं.

संजय दत्त की बौडीलैंगवेज के साथ ही संजय दत्त के माइंडसेट/दिमागी सोच को समझने में भी रणबीर कपूर पूरी तरह से सफल रहे हैं. सुनील दत्त के किरदार में परेश रावल से बेहतर कोई हो ही नहीं सकता था. नरगिस दत्त के किरदार में मनीषा कोईराला का भी अभिनय ठीक ठाक है. कमलेश उर्फ कमली के किरदार में विक्की कौशल ने एक बार फिर अपने अभिनय का जादू दिखा दिया है. वहीं संजय दत्त की प्रेमिका रूबी के छोटे से किरदार में सोनम कपूर अपनी छाप छोड़ जाती हैं.

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अनुष्का शर्मा के हिस्से कुछ खास करने को है नहीं. जिम सरभ ने नकारात्मक जुबिन मिस्त्री के किरदार में जबरदस्त अभिनय किया है. दर्शकों को रणबीर कपूर के बेहतरीन अभिनय का रसास्वादन करने के लिए फिल्म ‘संजू’ देखना चाहिए. यदि फिल्मकार की ईमानदार कोशिश की चाह रखकर सिनेमाघर जाएंगे, तो सिर्फ निराशा ही हाथ लगेगी.

दो घंटे 21 मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘संजू’’ का निर्माण विधु विनोद चोपड़ा व राज कुमार हिरानी ने किया है. फिल्म के निर्देशक राज कुमार हिरानी, पटकथा लेखक अभिजात जोशी व राज कुमार हिरानी, कैमरामैन रवि वर्मन, एडीटर राज कुमार हिरानी तथा कलाकार हैं- रणबीर कपूर, दिया मिर्जा, परेश रावल, मनीषा कोईराला, अनुष्का शर्मा, विक्की कौशल, जिम सरभ, सोनम कपूर, बोमन ईरानी, महेश मांजरेकर, संजय दत्त, अदिति गौतम, अरशद वारसी व अन्य.

बारिश की बूंदों के साथ जमकर नाची भोजपुरी एक्ट्रेस गार्गी पंडित

भोजपुरी बाला गार्गी पंडित फिल्‍मों में तो अपने स्‍टालिश और बोल्‍ड अंदाज से सभी का ध्‍यान अपनी तरफ खींचती ही रही हैं, लेकिन सोशल मीडिया पर भी वह काफी एक्टिव रहती हैं. चाहे यूट्यूब हो या फिर इंस्‍टाग्राम, गार्गी का अंदाज फैन्‍स में काफी पौपुलर रहता है.

अब एक बार फिर गार्गी का अंदाज सोशल मीडिया पर छा गया है. अपने एक नए वीडियो में गार्गी बारिश की बूंदों में मस्‍ती भरे अंदाज में नजर आ रही हैं. यह वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया है.

No caption #mumbairains #behappy #shootingday #musicallylover @musical.lyindiaofficial

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याद दिला दें कि गार्गी हाल ही में भोजपुरी फिल्‍म ‘आवारा बलम’ में अरविंद अकेला कल्‍लू के साथ एक गाने में नाचती नजर आई थीं. यह गाना गार्गी के बोल्‍ड अंदाज के चलते ही काफी हिट हो गया था. इस गाने में भी गार्गी, कल्‍लू के साथ पानी में भीगती और हौट लुक में दिखी थीं. इस गाने के बाद गार्गी ने अब अपने इंस्‍टाग्राम पर भी कुछ ऐसा ही किया है. देखें यह वीडियो.

बता दें कि गार्गी पंडित भोजपुरी की काफी प्रसिद्ध एक्‍ट्रेस हैं. वह कई फिल्‍मों में परफौर्म कर चुकी हैं और अक्‍सर सोशल मीडिया पर भी मजेदार वीडियो शेयर करती हैं. वह जल्‍द ही फिल्‍म ‘कर्म युग’ और ‘दुल्‍हिन चाही पाकिस्‍तान से 2’ में भी नजर आने वाली हैं.

जिताऊ उम्मीदवारों पर दांव लगाने का फैसला

आखिरकार इमरान खान ने भी मान ही लिया कि व्यक्तिगत करिश्मे या महज अपनी पार्टी के कार्यक्रमों के बूते चुनावी नैया पार नहीं लगने वाली. पीएमएल-एन और आसिफ जरदारी की पीपीपी की तरह अब उन्होंने भी चुनावों में ‘जिताऊ उम्मीदवारों’ पर ही दांव लगाने का फैसला किया है.

बनीगला में पार्टी कार्यकर्ताओं के सामने अपने इस इरादे की घोषणा करते हुए उन्होंने बिल्कुल साफ कर दिया कि पार्टी उन्हीं को टिकट देगी, जो ‘चुनाव जीतने की कला’ में माहिर होंगे. यह कहकर इमरान ने साफ कर दिया है कि उनकी गलतफहमी अब दूर हो चुकी है और वह जीत के लिए लहर जैसी कोई चीज पैदा करने की स्थिति में खुद को नहीं पा रहे हैं.

यह सब 1970 के उन चुनावों की याद दिला रहा है, जब जुल्फिकार अली भुट्टो ने भी कमोबेश यही तकनीक अपनाई और बाद में उसका खामियाजा भुगता.

साफ है कि इमरान का यह सब कहना और करना उनकी हताशा दिखाता है, लेकिन भूलना नहीं चाहिए कि ‘जिताऊ’ लोगों पर निर्भरता का मतलब होगा, सत्ता के लिए सभी उसूलों को ताक पर रखकर खुद को ऐसी ताकतों के हवाले कर देना. ऐसे लोग बार-बार एहसास कराएंगे कि वे अपने बूते जीते हैं, और उनकी न चलने दी गई, तो वे कभी भी, किसी और का दामन थाम सकते हैं.

इमरान कम से कम बलूचिस्तान से ही सबक ले लेते, जहां पीएमएल-एन सरकार महज इसलिए ताश के पत्तों के महल की तरह भरभराकर गिर गई, क्योंकि वहां ‘पार्टी वफादारों’ को अचानक नए चरागाह की हरियाली भा गई थी. उन्हें नहीं भूलना चाहिए कि ‘अपने बूते’ जीतकर आए कुख्यात धनकुबेर-माफिया या ऐसे लोग किस तरह उन्हें घेरेंगे और इमरान की हालत एक डोर के सहारे नाचने वाली कठपुतली जैसी होकर रह जाएगी.

इमरान के इर्द-गिर्द ऐसे लोगों की कमी नहीं है, जो महज निजी फायदे के लिए कुछ भी करने को तैयार बैठे हैं. पार्टी की अंतर्कलह भी छिपी नहीं है. चीजें जिस मोड़ पर हैं, उसमें इमरान के पास सब-कुछ खामोशी से देखते रहने के अलावा कोई विकल्प भी नहीं है. यह तो आने वाले वक्त की आहट मात्र है.

क्या प्रियंका चोपड़ा और निक जोनास की हो चुकी है शादी

कुछ समय पहले तक प्रियंका चोपड़ा अपनी अमेरिकन टीवी सीरीज ‘क्‍वांटिको 3’ के लिए सुर्खियां बटोर रही थीं लेकिन इन दिनों बौलीवुड की देसी गर्ल अपने रोमांस के लिए सुर्खियां बटौर रही हैं. प्रियंका पिछले कुछ दिनों से अपने अमेरिकी सिंगर और गीतकार कथित बौयफ्रेंड निक जोनास के साथ काफी क्‍लोज नजर आ रही हैं.

अभी तक तो यह जोड़ी अमेरिका में ही साथ नजर आ रही थी, लेकिन यह खबरें और भी गर्म तक हो गईं जब प्रियंका, निक को लेकर इंडिया ही आ गईं. इंडिया आए, निक और प्रियंका की फोटो काफी वायरल हुईं, लेकिन अब इस जोड़ी के फोटोज की कुछ और डिटेल सामने आने से इनकी रिश्‍ते की गहराई का और भी खुलासा हुआ है.

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शुक्रवार को प्रियंका और निक मुंबई में नजर आए और इसके साथ यह जोड़ी हाथ में हाथ डाले साथ में डिनर डेट पर जाती नजर आए. इस डिनर डेट पर नजर आए प्रियंका चोपड़ा और निक जोनास हाथों में बिलकुल एक जैसी रिंग पहने नजर आएं हैं. प्रियंका इस डिनर डेट पर चैका का ड्रेस पहने नजर आईं. जबकि निक यहां वाइट शर्ट और ट्राउजर्स में दिखे.

बता दें कि प्रियंका और निक मुंबई में प्रियंका की फैमली से मिलने के बाद गोवा में वेकेशन मनाने गए हैं. इस वेकेशन में उनके साथ प्रियंका की कजिन और एक्‍ट्रेस परिणीति चोपड़ा भी गई थीं. यहां से यह दोनों बहनें काफी मस्‍ती करती नजर आई हैं.

हवा में उड़ती सरकार का हारना सुखद है

आमतौर पर सरकारों के बननेबदलने से आम घरवालियों को फर्क नहीं पड़ता पर जब लगने लगे कि जो सरकार आप के घर में घुस रही है और आप को घर चलाने तक की नसीहत देने में लगी हो और उस सरकार के पांव लड़खड़ाने लगें तो थोड़ा सुकून मिलता है. कर्नाटक में सरकार न बना पाने पर और उस के बाद होने वाले उपचुनावों में 15 में से 12 सीटें हार जाने वाले नरेंद्र मोदी वही हैं जो कहते हैं कि चाय देर से मिलने पर पति को झगड़ने का हक नैतिक व नैसर्गिक दोनों हैं. श्रीमान नरेंद्र मोदी ने घरों में घुस कर लोगों से कहकह कर सस्ते गैस सिलैंडर छुड़वाए और वाहवाही लेने की तर्ज पर एक औरत से कह डाला कि अब पति सिलैंडर होने के कारण चाय देर से मिलने के लिए डांटता तो नहीं होगा यानी उन का अर्थ था कि अगर चाय देर से मिले तो डांटना गलत नहीं है. इसी पार्टी के लोग कहते रहते हैं कि औरतों का बलात्कार होता है तो वे खुद ही जिम्मेदार होती हैं. इसी के समर्थक लोगों के घरों में घुस कर रैफ्रिजरेटर में झांकना हक समझते हैं कि वहां रखा मीट गाय का मांस तो नहीं है.

इसी पार्टी के लोग बिंदी जैसी छोटी चीज पर भारीभरकम जीएसटी को सही मानते हैं. इस पार्टी को मंदिरों, योगासनों, ब्राह्मणों की तो फिक्र है पर 4 सालों में इस ने औरतों के हित का एक भी कानून पास नहीं किया है. अगर तीन तलाक कानून पास हुआ है तो सिर्फ इसलिए कि हिंदू जमात को जताना था कि वह इसलामी कानूनों में दखल दे सकती है. असल में सरकारों के फैसले घरों को उसी तरह प्रभावित करते हैं जैसे व्यवसायों और कारखानों को. सरकारी फैसलों का असर एक घरवाली पर कैसे पड़ेगा, अगर कोई सरकार यह न समझ पाए तो वह निकम्मी है.

नोटबंदी ने लाखों औरतों की छिपाई पूंजी बाहर निकलवा दी और आज भी कुछ नोट हर महिला की साडि़यों से निकल आते हैं, जो कमाए तो पूरी मेहनत से गए थे पर सरकार की बेवकूफी के कदम से कागज के रंगीन टुकड़े भर रह गए. उस सरकार को झटका लगे तो ठीक है. जैसे बेटी अगर घर में तोड़फोड़ करने लगे तो मां की डांट सही होती है वैसे ही वोटरों की यदाकदा डांट भी अच्छी रहती है.

अब सरकार के सामने वैसी ही स्थिति होगी जैसी पति की गलती से कीमती मग टूट जाने के बाद पत्नी की होती है. उम्मीद करें कि इन झटकों से सरकार को लगे कि उस के पास जो हक हैं, वे जानता के दिए हैं, जन्मजात पंडों की तरह के नहीं हैं. सरकार को धर्म और उस की किसी विशेष जाति के लिए हर नागरिक के घर को सुखद व सुरक्षित बनाने का काम करना चाहिए पर ऐसा कहीं होता दिख नहीं रहा है. सरकारें चुने जाने के बाद अकसर सत्ता में इतनी मशगूल हो जाती हैं कि वे भूल जाती हैं कि देश के वोटरों में 50 फीसदी औरतें हैं और उन की कोई भी जाति हो या धर्म, सरकारी फैसलों का उन पर बराबर का असर पड़ता है.

इन चुनाव नतीजों ने हवा में उड़ती सरकार को जो डोर से बांधा है वह सुखद है.

नीट नहीं रहा नीट

6 मई, 2018 को नैशनल एलिजिबिलिटी कम ऐंट्रैंस टैस्ट यानी नीट में शामिल हुए देशभर के कोई 13 लाख 36 हजार छात्रों ने चैन की सांस ली, क्योंकि यह अहम परीक्षा किसी अड़चन यानी बिना पेपर लीक हुए हो गई, नहीं तो छात्र नीट की विश्वसनीयता और गोपनीयता को ले कर बेवजह शंकित नहीं थे. इस साल इस परीक्षा के जरिए 66 हजार युवाओं का डाक्टर बनने का सपना पूरा होगा.

छात्रों का डर और चिंता अपनी जगह वाजिब थे क्योंकि साल की शुरुआत प्रतियोगी परीक्षाओं के लिहाज से ठीक नहीं रही थी. अलगअलग परीक्षाओं सहित सीबीएसई तक के पेपर लीक होने से प्रतिभागियों और छात्रों के मन में खटका था कि कहीं उन की मेहनत और भविष्य पर भी लीक का ग्रहण न लग जाए. वजह, बीते 2 मार्च को होली के दिन जब पूरे देश में रंगगुलाल उड़ रहा था तब दिल्ली में कर्मचारी चयन आयोग (एसएससी) के कार्यालय के बाहर लगभग 2 हजार छात्र धरनाप्रदर्शन कर रहे थे. दिल्ली और आसपास के राज्यों से इकट्ठा हुए इन छात्रों का यह आरोप गंभीर था कि बीती 17 से 21 फरवरी तक एसएससी द्वारा आयोजित टियर टू की परीक्षा में भारी धांधलियां की गई हैं.

ये धांधलियां वैसी ही थीं जैसी कि आमतौर पर देश की प्रतियोगी परीक्षाओं में होती हैं. मसलन, 21 फरवरी को गणित का पेपर दोपहर साढ़े 12 बजे से था, लगभग 15 मिनट बाद परीक्षा रोक दी गई. अनधिकृत या मौखिक रूप से यह बताया गया कि यह पेपर लीक हो चुका है. फिर 15 मिनट बाद प्रश्नपत्र का दूसरा सैट दे कर परीक्षा शुरू करवाई गई.  पेपर पूरा हो जाने के बाद छात्रों को बताया गया कि अब गणित का पेपर 9 मार्च को होगा.

पेपर रद्द क्यों हुआ, इसे ले कर हुई गफलत अभी तक बरकरार है. एक उम्मीदवार रीतेश गुप्ता का कहना था कि परीक्षा शुरू होने के कुछ देर बाद ही गणित के पेपर का स्क्रीन शौट सोशल मीडिया पर वायरल हो गया था. उलट इस के एसएससी के अधिकारियों की मासूमियतभरी दलील यह थी कि तकनीकी कारणों के चलते पेपर रद्द किया गया. इन कथित तकनीकी कारणों का खुलासा शायद ही सीबीआई जांच के बाद हो पाए.

लेकिन बात इतनी भर नहीं थी.  उम्मीदवारों का स्पष्ट आरोप यह भी था कि एसएससी की परीक्षाओं में बड़े स्तर पर फर्जीवाड़े और धांधलियों का रैकेट चल रहा है. हरेक नौकरी की कीमत तय है.

पूछने पर उम्मीदवारों ने दरें भी गिना दीं कि एग्जामिनर के पद के लिए 40 लाख रुपए, इनकम टैक्स विभाग के लिए 35 लाख रुपए, सब इंस्पैक्टर के लिए 25 लाख रुपए और क्लर्क के लिए 8 लाख रुपए का रेट चल रहा है.

उम्मीदवारों का प्रदर्शन 26 फरवरी से ही शुरू हो गया था. धीरेधीरे दूसरे राज्यों से भी उम्मीदवार आने लगे. इस से पहले उम्मीदवारों ने अपने आरोपों के प्रमाण एसएससी के अधिकारियों को सौंपे थे.  इस पर एसएससी के चेयरमैन असीम खुराना ने झल्लाते हुए कहा था कि उन्हें मिली जानकारी के मुताबिक, कुछ कोचिंग इंस्टिट्यूट इस आंदोलन को हवा दे रहे हैं. उन्होंने अनजान बनते यह भी कहा कि अगर छात्रों के पास कोई सुबूत है तो वे उन्हें पेश करें.

छात्र यानी उम्मीदवार सुबूत पेश कर चुके थे और यह कहने लगे थे कि आरोपों की सीबीआई जांच कराई जाए, वरना वे धरनाप्रदर्शन बंद नहीं करेंगे.  फिर भी ऐसा लग नहीं रहा था कि उम्मीदवारों की सुनवाई कोई करेगा.  लेकिन जब स्वराज इंडिया के मुखिया योगेंद्र यादव उम्मीदवारों से मिले और इस के बाद दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने उम्मीदवारों की मांगों का समर्थन किया तो सियासी सुगबुगाहट शुरू हो गई.

सालोंसाल चलती जांच

मशहूर समाजसेवी अन्ना हजारे ने भी इन उम्मीदवारों की मांगों का समर्थन किया तो चौकन्नी हो चली भाजपा को लगा कि कहीं ऐसा न हो कि देखते ही देखते देशभर के लाखों उम्मीदवार, जो  परीक्षा में शामिल हुए थे, इस आंदोलन में शामिल हो जाएं. दिल्ली भाजपा प्रदेश अध्यक्ष मनोज तिवारी ने प्रदर्शनकारी छात्रों से मुलाकात की और उन्हें गृहमंत्री राजनाथ सिंह से मिलवाया. राजनाथ सिंह ने तुरंत सीबीआई जांच के आदेश दे दिए, तब कहीं जा कर 6 मार्च को उम्मीदवार अपने घरों को लौटे थे.

अपने भविष्य के प्रति चिंतित इन छात्रों को जाहिर है कतई अंदाजा नहीं कि सीबीआई जांच कोई अलादीन का चिराग नहीं होती, उलटे, यह बीरबल की खिचड़ी है जो सालोंसाल पकती रहती है.  इंसाफ की आस लगाए बैठे उम्मीदवारों के बालों में सफेदी आने लगती है, लेकिन सीबीआई जांच पूरी नहीं होती.  इस का बेहतर उदाहरण मध्य प्रदेश का व्यापमं महाघोटाला है जिस की सीबीआई जांच कछुए की चाल को भी मात कर रही है. व्यापमं महाघोटाले के सीबीआई के हाथ में आने के बाद इतना जरूर हुआ कि घोटाले के कई दिग्गज आरोपियों को एकएक कर जमानत मिल गई और वे खुली हवा में चैन की सांस लेते सुकूनभरी जिंदगी गुजार रहे हैं.

नीट पर शक क्यों

एसएससी परीक्षा में पेपर लीक हुए थे और पद भी बिके थे, इस की सीबीआई जांच जब तक चलेगी तब तक नतीजों के कोई माने नहीं रहेंगे. फिर छात्रों के भविष्य का क्या होगा, यह बताने को कोई तैयार नहीं.

दरअसल, सच यह है कि देशभर की प्रवेश और प्रतियोगी परीक्षाओं की विश्वसनीयता और गोपनीयता एक बार फिर शक के दायरे में आ गई है जिस की किसी भी जांच के नतीजे कुछ भी आएं, नुकसान युवाओं का ही होना है जिन की आंखों में सरकारी नौकरी के सपने हैं.  इन सपनों को पंख नहीं लगते, बल्कि भ्रष्टाचार, धांधलियों और नीलामी का ग्रहण लगता है. और ये बेचारे टुकुरटुकुर देखते रह जाते हैं कि यह आखिर क्या हो रहा है.

सीबीएसई द्वारा आयोजित की जाने वाली ऐसी ही एक अहम परीक्षा नीट (राष्ट्रीय पात्रता व प्रवेश परीक्षा) 6 मई को को चुकी है. साल 2013 से नीट आयोजित हो रही है जिसे कराने के पीछे सरकार का मकसद यह था कि इस से भ्रष्टाचार मिटेगा, पारदर्शिता आएगी और फर्जीवाड़ा खत्म हो जाएगा.

ये बातें अब कहनेसुनने में भी भली नहीं लगतीं. वजह, नीट का हाल भी एसएससी जैसा होना शुरू हो गया है.  पिछले साल अक्तूबर में दिल्ली क्राइम ब्रांच ने पटना मैडिकल कालेज हौस्पिटल (पीएमसीएच) में छापामारी करते 32 वर्षीय डाक्टर जौन मेहता उर्फ राजीव रंजन को गिरफ्तार किया था.

दरअसल, यह डाक्टर उस गिरोह का मास्टरमाइंड था जो नीट में सैटिंग के खेल के लिए मशहूर है. यह शख्स बिहार के मधेपुरा जिले के गांव तुलसिया का रहने वाला है जो बिहारीगंज थाना क्षेत्र के अंतर्गत आता है. साल 2009 में डाक्टर जौन को पीएमसीएच में एमबीबीएस में प्रवेश मिला था और साल 2017 की पीजी परीक्षा में वह अपने बैच का टौपर था. पढ़ाई के बाद वह इसी संस्थान में रेडियोलौजी विभाग में बहैसियत जूनियर डाक्टर नौकरी करने लगा था

नीट का यह घोटाला या फर्जीवाड़ा एक तरह से व्यापमं महाघोटाले की तरह ही था. एमबीबीएस की पढ़ाई पूरी करने के बाद डाक्टर जौन साल्वर गैंग्स से सांठगांठ करने लगा था. दिल्ली क्राइम ब्रांच मान चुकी है कि वह पिछले 2 वर्षों से नीट की औनलाइन परीक्षा में सौफ्टवेयर हैक कर रहा था. उस पर दूसरे राज्यों में भी मुकदमे दर्ज हैं. पोस्टग्रेजुएट परीक्षा में सफलता दिलाने के लिए वह प्रतिछात्र 50 लाख रुपए से ले कर

1 करोड़ रुपए तक लेता था. इस सौदेबाजी में गिरोह से जुड़े दूसरे लोगों को भी हिस्सा जाता था. इस के बाद भी डाक्टर जौन को लगभग 25 लाख रुपए प्रतिछात्र मिल जाते थे.

जब धांधली का शक और शिकायतें हुईं तो जांच शुरू हुई. गिरफ्तारी के बाद इस आरोपी ने अपने गिरोह में शामिल कुछ डाक्टर्स के अलावा उन छात्रों के नाम भी बताए थे जिन्होंने सैटिंग के जरिए मैडिकल कालेजों में दाखिला लिया था.  डाक्टर जौन के बाद 22 और आरोपी गिरफ्तार किए गए थे, जिन में साल्वर गैंग का सरगना, सौफ्टवेयर हैकर, इंजीनियर और औपरेटर शामिल थे.

नीट परीक्षा पर ग्रहण लगाते इस गिरोह में शामिल लोग कौन और कैसे थे, इस का पुलिस पूरी तरह खुलासा जब करेगी तब करेगी, लेकिन यह साफ दिख रहा है कि प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता के लिए हाड़तोड़ मेहनत करने वाले और पैसा खर्च करने वाले उम्मीदवार बेफिक्र हो कर अपनी काबिलीयत के बलबूते पर डाक्टर बनने का सपना पूरा नहीं कर सकते, क्योंकि देशभर में फर्जीवाड़ा होना आम बात है. कोई भी नियमकानून वजूद में आता नहीं कि उस का तोड़ अपराधी निकाल लेते हैं.

नीट की परीक्षा अब शुद्ध नहीं रह गई है, इस का एक उदाहरण पिछले साल मई में जयपुर से भी मिला था. डाक्टर जौन तो सौफ्टवेयर हैक कर धोखाधड़ी करता था, लेकिन जयपुर में खुलेआम नीट के पेपर बिके थे. आरोपियों के नाम विक्रम सिंह, विकास कुमार सिन्हा, भूपेश कुमार शर्मा, दिशांक उर्फ राहुल मलिक और आलोक गुप्ता थे.

इन पांचों ने कुछ छात्रों को 5-5 लाख रुपए में नीट के प्रश्नपत्र उपलब्ध कराए थे, वह भी व्यापमं की तर्ज पर कि खरीदारों को पहले तयशुदा स्थान पर परीक्षा की रात बुलवाया गया और फिर उन्हें सीधे परीक्षा केंद्रों पर छोड़ा गया.

एटीएस की टीम ने इन में से 2 को दिल्ली और 3 को जयपुर से गिरफ्तार किया था. कथित रूप से ही सही, नीट के भी पेपर बिके थे, इस से परीक्षार्थियों में निराशा आनी स्वाभाविक बात थी. यह निराशा उस वक्त गहरा गई जब व्यापमं महाघोटाले की राजधानी भोपाल से सैकड़ों उम्मीदवारों द्वारा फर्जी मूलनिवास प्रमाणपत्र 2-2 राज्यों से बनवाने की बात सामने आई थी.

गौरतलब है कि नीट की परीक्षा से 85 फीसदी सीटें राज्यों के मूल निवासियों से भरी जाती हैं. ये सीटें राज्य कोटे की कहलाती हैं. बाकी बची 15 फीसदी सीटें औल इंडिया कोटे से भरी जाती हैं. 2-2 राज्यों के मूल निवास प्रमाणपत्र बनवा कर कई छात्र मध्य प्रदेश के अलावा दूसरे राज्यों से भी राज्य कोटे की सीट के पात्र हो गए जिस से वहां के मूल निवासियों का हक मारा गया. इस मामले की भी जांच अभी चल रही है.

जाहिर है नीट परीक्षा भी बेदाग नहीं रह गई है जो दूसरे कई तरीकों से भी छात्रों का नुकसान करती है. इन नुकसानों का आकलन कोई नहीं करता कि  असफल रहे 95 फीसदी छात्रों की हालत बाद में क्या होती है.

सुनहरे वक्त की बरबादी

भोपाल का 26 वर्षीय अविनाश रायजादा (बदला नाम) गहरे अवसाद से ग्रस्त है जिस का इलाज एक नामी मनोचिकित्सक के यहां चल रहा है.

अविनाश साल 2015 से नीट की परीक्षा दे रहा था, लेकिन सफल नहीं हुआ. उस ने मन लगा कर इस प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी की थी और एक नहीं, बल्कि 3-3 कोचिंग इंस्टिट्यूट से कोचिंग भी ली थी. उस के सिर पर डाक्टर बनने की धुन इस कदर सवार थी कि वह बाकी दुनिया और घटनाओं से कट गया था. 8 घंटे सोने के अलावा वह पूरा वक्त परीक्षा की तैयारी में बिता रहा था. उसे उम्मीद थी कि मेहनत रंग लाएगी.

लेकिन 2017 में भी उस का चयन मैडिकल के लिए नहीं हुआ तो वह भीतर तक टूट गया. प्रतिस्पर्धा में पिछड़ने को वह अपना नकारापन मानने लगा था और  उसे लगने लगा था कि अब वह किसी काम का नहीं रह गया है. राजनीति में क्या हो रहा है, क्रिकेट में कौन सी स्पर्धा  चल रही है, पड़ोस में कौन से नए अंकलआंटी आ गए हैं और बाजार में कौन से नए गैजेट्स आए हैं, यह तक उसे नहीं मालूम था. एक पढ़ाई के अलावा बाकी सभी बातों से उस की दिलचस्पी खत्म हो गई थी.

ऐसे में उस का अवसादग्रस्त होना स्वाभाविक बात थी, जिस की जिम्मेदार वह प्रतियोगी परीक्षा थी जिसे वह सबकुछ मान बैठा था. जैसेतैसे बीएससी तो उस ने कर ली थी पर एमएससी की पढ़ाई करने की उस की हिम्मत नहीं पड़ रही थी. बीएससी बायोलौजी से पास युवक को कहीं नौकरी नहीं मिलती, यह बात जब उस के दिलोदिमाग में घर कर गई तो मांबाप के लिए खासी परेशानी उठ खड़ी हुई. इधर, उस का छोटा भाई मनीष जिंदगी के सब रंगों में जीता एमबीए कर पुणे में एक नामी कंपनी में अच्छे पैकेज पर नौकरी करने लगा था.

मम्मीपापा और छोटे भाई ने तरहतरह से समझाया कि हारजीत और फेलपास वगैरह एक ही सिक्के के दो पहलू हैं. लेकिन स्वेट मार्डेन छाप इस समझाइश का अविनाश पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा. उलटे, वह पहले से ज्यादा एकांत में रहने लगा. न किसी से मिलना और न ही उम्र के हिसाब से कोई शौक होना चिंता की बात थी. मांबाप डरने लगे थे कि इस हालत के चलते वह कोई आत्मघाती कदम न उठा बैठे.

यह ठीक है कि अविनाश बहुत गहरे अवसाद में है, लेकिन इस से कम अवसाद में हर वह छात्र होता है जो खुद को प्रतियोगी परीक्षाओं में झोंक देता है.  जिंदगी की अनगिनत रंगीनियों से इन युवाओं को कोई सरोकार नहीं रह जाता, उन का बस एक ही मकसद होता है कैसे भी हो, कंपीटिशन का महाभारत जीतो.  यह तो 3-4 वर्षों बाद पता चलता है कि वे इस महाभारत के अर्जुन नहीं बन पाए, बल्कि अभिमन्यु बन कर ही चक्रव्यूह  में घिरे हुए हैं.

जवानी के 4-5 साल एक धुन या सनक में जीते ये युवा फिर किसी दूसरे क्षेत्र में जाने की बात नहीं सोच पाते, क्योंकि उन की हिम्मत टूट चुकी होती है और उन की पूरी ऊर्जा प्रतियोगी परीक्षा नाम की जोंक चूस चुकी होती है.

तेजी से बढ़ती युवाओं की यह भीड़ चिंता का विषय है. नीट में उलझे छात्रों का शक बेवजह नहीं है कि इस में नंबरों की खरीदफरोख्त होगी. यहां भी एसएससी जैसे सीटों की नीलामी होगी.  नीट की परीक्षा दे रहे छात्रों की जिंदगी तो 4 ऐसे विषयों में उलझ कर रह जाती है जिन का व्यावहारिक जिंदगी से कोई वास्ता नहीं रहता.

फिर औचित्य क्या

नीट से जुड़ी खबरों को बड़े चाव से पढ़ा जाता है. हर साल नीट के नियमों में बदलावों का ढिंढोरा संविधान के संशोधनों की तरह पीटा जाता है. मसलन, अब 25 साल तक की उम्र के युवा ही नीट की परीक्षा दे पाएंगे. नीट अब उर्दू में भी होगी और विदेश डाक्टरी पढ़ने जाने वाले छात्रों को भी नीट पास करनी होगी. इन खबरों का छात्रों के भविष्य या चयन से कोई बहुत महत्त्वपूर्ण संबंध नहीं है.

अब छात्र नीट की परीक्षा असीमित बार दे सकते हैं, हालांकि नए नियमों से छात्रों का कोई भला नहीं होता. इसे तकनीकी तौर पर देखें तो रायपुर मैनिट के एक प्राध्यापक के इस तर्क में दम है कि यह राजस्व की लड़ाई है जो पहले राज्य सरकार को जाता था, अब केंद्र सरकार उसे समेट रही है.

हास्यास्पद बात तो यह भी है कि डाक्टर बन जाना अब एक झूठी शान की बात भर रह गई है. इस पेशे में भी कैरियर या सुनहरे भविष्य की कोई गारंटी नहीं रह गई है. भोपाल के शाहपुरा इलाके के एक नामी नर्सिंगहोम में कार्यरत आदिवासी बाहुल्य जिले बैतूल के एक डाक्टर का कहना है कि वे पिछले 8 वर्षों से औसतन 40 हजार रुपए की पगार पर नौकरी कर रहे हैं और नौकरी के नाम पर उन्हें अधिकतर रात की ड्यूटी करनी पड़ती है. इस डाक्टर के मुताबिक, चिकित्सा व्यवसाय अब मगरमच्छों के हाथों में है.

ऐसी परीक्षा, जिस में विश्वसनीयता और गोपनीयता की गारंटी न हो, का आयोजन क्यों? एक छात्र सालभर में लाखों रुपए इस पर खर्चता है, जिंदगी का खूबसूरत व हसीन वक्त जाया करता है और असफल हो जाने पर किसी काम का नहीं रह जाता. सफल होने पर भी भविष्य की गारंटी नहीं होती तो फिर नीट की औचित्यता पर सोचा जाना जरूरी है.

अर्जुन रेड्डी के रीमेक में काम करेंगे शाहिद कपूर

बौलीवुड अभिनेता शाहिद कपूर तेलगू सुपरहिट फिल्म अर्जुन रेड्डी के रीमेक में काम करते नजर आयेंगे. फिल्म में शाहिद के अपोजिट तारा सुतारिया काम करेंगी. तारा सुतारिया ‘स्टूडेंट्स औफ द ईयर-2’ से बॉलीवुड में डेब्यू करने जा रही हैं.

तेलुगू फिल्म ‘अर्जुन रेड्डी’ में विजय देवरकोंडा ने लीड रोल निभाया था. विजय को इस साल फिल्मफेयर के अवॉर्ड से नवाजा गया था. अब फिल्म के हिंदी रीमेक में उनका किरदार शाहिद कपूर निभाएंगे. वहीं तारा सुतारिया ‘अर्जुन रेड्डी’ की महिला किरदार शालिनी पांडे का रोल निभाती दिखेंगी.

फिल्म की कहानी को उत्तर भारत की ऑडियंस के हिसाब से बनाया जाएगा. फिल्म की लीडिंग लेडी का किरदार एक मासूम महिला का है, इसलिए मेकर्स किसी नए चेहरे को ही इस रोल के लिए लेना चाहते थे.

लीड ऐक्ट्रेस के रोल के लिए जाह्नवी कपूर और सारा अली खान के नाम पर भी विचार किया गया था, लेकिन टीम तारा के नाम पर ही सहमत हुई.

‘अर्जुन रेड्डी’ को निर्देशित करने वाले संदीप वांगा ही फिल्म का हिंदी रीमेक भी बनाएंगे. इस रीमेक के साथ वह अपना बॉलीवुड डेब्यू करेंगे. फिल्म में शाहिद कपूर एक सर्जन का किरदार निभाएंगे जो अपने पहले प्यार के किसी और से शादी करने के बाद खुद को तबाह करने पर तुला है. वह नशे में डूबा रहता है.

‘अर्जुन रेड्डी’ की रीमेक के लिए शाहिद बौडी में बदलाव लाने के साथ ही दाढ़ी-मूंछ भी बढ़ाएंगे.

जे डे हत्याकांड : जेल से ही करा दी हत्या

2 मई, 2018 को बुधवार था. उस दिन मुंबई के मशहूर पत्रकार ज्योतिर्मय डे (जे. डे) हत्याकांड में सजा सुनाई जानी थी. यह केस विशेष मकोका अदालत के जस्टिस समीर अदकर की अदालत में चल रहा था और इस में माफिया डौन छोटा राजन सहित 11 आरोपी थे. मामला चूंकि एक वरिष्ठ पत्रकार और माफिया डौन से जुड़ा था, इसलिए फैसला सुनने के लिए अदालत में काफी भीड़ थी. दोनों पक्षों के वकीलों और सभी आरोपियों सहित उन के घर वाले भी मौजूद थे.

जब सजा के लिए बहस शुरू हुई तो सरकारी वकील प्रदीप घरात ने अपनी दलील देते हुए अदालत से कहा, ‘‘योर औनर, ज्योतिर्मय डे की हत्या आम हत्या नहीं बल्कि यह एक दुर्लभतम मामला है, क्योंकि इस में माफिया सरगना ने एक वरिष्ठ पत्रकार की हत्या कराई. अगर इन अपराधियों को कड़ी सजा नहीं दी गई तो पत्रकारों के लिए काम करना कठिन हो जाएगा. पत्रकारिता लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है. लोकतंत्र की सफलता के लिए निर्भीक और स्वतंत्र पत्रकारिता जरूरी है.’’

सरकारी वकील प्रदीप घरात ने आगे कहा, ‘‘ज्योतिर्मय डे की बहन लीना बीमार रहती है. न कोई उस का इलाज कराने वाला है और न देखभाल करने वाला.’’

प्रदीप घरात ने इस मामले को दुर्लभतम बताने के बाद छोटा राजन सहित सभी दोषियों के लिए सख्त से सख्त सजा की मांग की. दूसरी ओर बचावपक्ष ने दोषियों की उम्र, कुछ के छोटेछोटे बच्चे होने और कुछ के घर वालों की बीमारी का हवाला देते हुए उन के साथ नरमी बरतने की दलील दी.

इस सुनवाई में एक खास बात यह भी थी कि दिल्ली की तिहाड़ जेल में बंद छोटा राजन के लिए वीडियो कौन्फ्रैंसिंग की व्यवस्था की गई थी, ताकि वह अदालत की काररवाई और बहस को देख भी सके और जवाब भी दे सके.

बता दें कि जे. डे की 11 जून, 2011 को मुंबई के पवई में उस समय गोली मार कर हत्या कर दी गई थी, जब वह मोटरसाइकिल से घर जा रहे थे. छोटा राजन के इशारे पर जे. डे की हत्या के लिए सतीश कालिया ने 7 लोगों का गिरोह बना कर कार और बंदूकों का इंतजाम किया था. बाद में इन लोगों ने ही जे. डे की हत्या की थी. इन सभी पर हत्या की धारा 302, आपराधिक साजिश की धारा 120बी और सबूत नष्ट करने की धारा 204 और विभिन्न धाराओं के अलावा मकोका व शस्त्र कानून के तहत केस चल रहा था.

यहां यह भी स्पष्ट कर दें कि छोटा राजन को नवंबर 2015 में सीबीआई द्वारा इंडोनेशिया के बाली से भारत लाया गया था. पिछले साल ही दिल्ली की एक अदालत ने छोटा राजन को फरजी पासपोर्ट मामले में 7 साल की सजा सुनाई थी. नवंबर, 2015 से ही वह तिहाड़ जेल में बंद था.

सजा पर बहस के बाद न्यायाधीश सतीश अदकर ने जे. डे की हत्या के मामले में 9 लोगों को दोषी करार दिया, जबकि 2 आरोपियों जिग्ना वोरा और जोसेफ को संदेह का लाभ दे कर बरी कर दिया.

जिग्ना पर आरोप था कि उन्होंने छोटा राजन से न केवल जे. डे की शिकायत की थी, बल्कि उन की मोटरसाइकिल की नंबर प्लेट और उन के घर की सूचना भी उस तक पहुंचाई थी. उन पर यह भी आरोप था कि उन्होंने छोटा राजन को जे. डे के खिलाफ भड़काया था और इसी सिलसिले में जोसेफ के मोबाइल से इंडोनेशिया में बैठे छोटा राजन से बात की.

मकोका अदालत के फैसले के बारे में जानने से पहले जे. डे की हत्या की वजह जान लें. 25 नवंबर, 2011. शनिवार का दिन था. उस समय सुबह के लगभग 4 बजे थे. महानगर मुंबई के उपनगर घाटकोपर की सड़कों पर सन्नाटा छाया हुआ था. इक्कादुक्का वाहन उधर से गुजरते थे तो थोड़ी देर के लिए सन्नाटा टूट जाता था.

तभी मुंबई क्राइम ब्रांच की कई गाडि़यां तेजी से आईं और एक इमारत के नीचे खड़ी हो गईं. गाडि़यों से उतर कर कुछ पुलिस वाले नीचे खड़े हो गए और कुछ उस इमारत के एक फ्लैट में चले गए.

जिस फ्लैट में पुलिस गई थी, वह मुंबई के सुप्रसिद्ध अंगरेजी दैनिक एशियन एज की ब्यूरो प्रमुख और वरिष्ठ पत्रकार जिग्ना वोरा का था. पुलिस अफसरों ने जिग्ना वोरा से काफी देर तक पूछताछ की.

पुलिस ने उन के घर की तलाशी भी ली. पूछताछ और तलाशी के बाद उन लोगों ने जिग्ना का लैपटौप और मोबाइल अपने कब्जे में ले कर उन्हें गिरफ्तार कर लिया.

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इस पुलिस काररवाई में मुंबई पुलिस के तत्कालीन कमिश्नर अरूप पटनायक, जौइंट पुलिस कमिश्नर (क्राइम) दिवंगत हिमांशु राय, एडीशनल सीपी देवेन भारती, एसीपी अशोक दुराफे, क्राइम ब्रांच यूनिट 5 और 6 के वरिष्ठ इंसपेक्टर अरुण चव्हाण, श्रीपद काले, रमेश महाले और उन के सहायक शामिल थे.

इन लोगों ने जिग्ना वोरा की गिरफ्तारी मुंबई के बहुचर्चित वरिष्ठ पत्रकार ज्योतिर्मय नेपियन कुमार उर्फ जे. डे हत्याकांड के सिलसिले में की थी. जे. डे सुप्रसिद्ध अंगरेजी और गुजराती अखबार दैनिक मिड डे के ब्यूरो प्रमुख और सहायक संपादक थे.

जिग्ना वोरा की गिरफ्तारी जे. डे हत्याकांड के एक प्रमुख गवाह के बयान और 5 महीनों की जांचपड़ताल के आधार पर की गई थी. पुलिस ने जिग्ना को जे. डे की हत्या और हत्या की साजिश रचने के आरोप में भादंवि की धारा 302,120बी, 34 और मकोका के अंतर्गत गिरफ्तार किया था. जिग्ना वोरा को गिरफ्तार कर के क्राइम ब्रांच के हैड औफिस लाया गया. पुलिस ने उन्हें उसी दिन मकोका अदालत में पेश कर के विस्तृत पूछताछ के लिए रिमांड पर ले लिया.

मुंबई के अंगरेजी दैनिक मिड डे के वरिष्ठ पत्रकार ज्योतिर्मय डे की हत्या 11 जून, 2011 को लगभग 2 बजे मुंबई के पवई इलाके में उस समय हुई थी, जब वह घाटकोपर में रह रही अपनी मां और बहन से मिल कर मोटरसाइकिल से पवई स्थित अपने फ्लैट पर लौट रहे थे. उस दिन जे. डे जब हीरानंदानी गार्डन के पास पहुंचे, तभी कुछ अज्ञात लोगों ने गोली मार कर उन की हत्या कर दी थी.

जे. डे मुंबई के मशहूर पत्रकार थे. यही वजह थी कि उन की हत्या होते ही यह खबर मुंबई भर में फैल गई. सूचना मिलते ही मुंबई पुलिस, क्राइम ब्रांच के अधिकारी और उन की टीमें घटनास्थल पर पहुंच गईं. हत्या चूंकि एक जानेमाने वरिष्ठ पत्रकार की हुई थी, इसलिए पुलिस ने इस मामले को बहुत गंभीरता से लिया था. जे. डे की हत्या के बाद तत्कालीन पुलिस आयुक्त अरूप पटनायक, क्राइम ब्रांच सीआईडी के जौइंट पुलिस आयुक्त हिमांशु राय, एडीशनल सीपी देवेन भारती, डसीपी विश्वास राव नागरे और एसीपी अशोक दुराफे आदि सभी वरिष्ठ अधिकारी घटनास्थल पर पहुंचे थे.

वहां जे. डे की मोटरसाइकिल गिरी पड़ी थी और उस के पास ही गोलियों से छलनी उन की लाश पड़ी थी. अधिकारियों ने अपनेअपने नजरिए से घटनास्थल का निरीक्षण किया. प्राथमिक काररवाई के बाद पोस्टमार्टम के लिए जे. डे की लाश अस्पताल भेज दी गई.

उन की मोटरसाइकिल को भी पुलिस ने केस प्रौपर्टी बना कर अपने कब्जे में ले लिया. इस के साथ ही थाना पवई में जे. डे की हत्या का मुकदमा दर्ज हो गया.

वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देश पर इस मामले की जांच की जिम्मेदारी पुलिस और क्राइम ब्रांच सीआईडी की यूनिट नंबर 5 और 6 के सीनियर इंसपेक्टर अरुण चव्हाण और श्रीपद काले को सौंपी गई.

इंसपेक्टर अरुण चव्हाण और श्रीपद काले ने पूरी जिम्मेदारी के साथ पत्रकार जे. डे हत्याकांड की जांच शुरू कर दी. लेकिन तात्कालिक रूप से उन्हें कोई कामयाबी नहीं मिली. उन्होंने पत्रकार जे. डे का मोबाइल फोन, लैपटौप, डायरी, कंप्यूटर की हार्डडिस्क आदि चीजें अपने कब्जे में ले कर उन का निरीक्षण किया. लेकिन इस का कोई नतीजा नहीं निकला.

जे. डे को मौत के घाट उतारने वालों की गिरफ्तारी न होने से पत्रकारों में रोष था. उन्होंने तत्कालीन मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण और तत्कालीन गृहमंत्री आर.आर. पाटिल को एक ज्ञापन सौंपा, जिस में इस मामले की जांच सीबीआई को सौंपने की मांग की गई.

इस उलझी हुई जांच के दौरान जे. डे के एक मित्र पत्रकार ने इंसपेक्टर रमेश महाले को एक ऐसी बात बताई, जिसे जानने के बाद उन्हें उम्मीद की किरणें नजर आने लगीं. उस पत्रकार ने उन्हें बताया कि जे. डे की जेब हमेशा एकएक रुपए के सिक्कों से भरी रहती थी. उस ने यह भी बताया कि जे. डे कुछ खास तरह की खबरों के लिए अपने मोबाइल की जगह पीसीओ से फोन किया करते थे.

पुलिस इंसपेक्टर रमेश महाले ने उस पत्रकार की बातों को गंभीरता से लिया. उन्होंने पत्रकार जे. डे के घाटकोपर स्थित घर से ले कर पवई तक के रास्ते में पड़ने वाले उन सभी पीसीओ बूथों के काल डिटेल्स निकलवाए, जिन रास्तों से जे. डे का आनाजाना था. इन पीसीओ के काल रिकौर्ड्स में एक नंबर बारबार आ रहा था.

उस नंबर की जांच की गई तो यह नंबर अरुण डाके का निकला जो अंडरवर्ल्ड सरगना छोटा राजन के लिए काम करता था. यह नंबर 3 जून से ले कर 11 जून तक के काल रिकौर्ड्स में मिला था.

पत्रकार जे. डे की हत्या में छोटा राजन का नाम जुड़ते ही क्राइम ब्रांच ने डाके पर शिकंजा कस दिया. जल्दी ही डाके को गिरफ्तार भी कर लिया गया.

अरुण डाके से पूछताछ की गई तो जे. डे हत्याकांड का खुलासा हो गया. उस के बयान के आधार पर पुलिस और क्राइम ब्रांच ने छोटा राजन के खास शूटर रोहित थंगप्पन जोसेफ उर्फ सतीश कालिया सहित जे. डे हत्याकांड से जुड़े 11 अभियुक्तों को गिरफ्तार कर लिया.

लेकिन ये वे लोग थे, जिन्होंने जे. डे की रेकी कर के उन्हें मौत के घाट उतारा था. इन लोगों की जे. डे से कोई व्यक्तिगत दुश्मनी नहीं थी. इस का मतलब जे. डे की हत्या की साजिश रचने वाला कोई और ही था.

गिरफ्तार किए गए लोगों से यह जरूर पता चल गया था कि जे. डे की हत्या माफिया डौन छोटा राजन के इशारे पर की गई थी. लेकिन इस की वजह साफ नजर नहीं आ रही थी. यह वजह जानने के लिए पुलिस ने छोटा राजन के उन सभी गुर्गों के फोन रिकौर्ड करने शुरू किए, जो किसी न किसी रूप में छोटा राजन से जुड़े थे.

पुलिस का यह प्रयास रंग लाया. अपने सभी गुर्गों को एकएक कर गिरफ्तार होते देख अंडरवर्ल्ड डौन छोटा राजन बौखला गया था. पुलिस द्वारा अदालत में दी गई चार्जशीट के अनुसार, उस ने जे. डे की हत्या से जुड़े अपने एक गुर्गे विनोद असरानी उर्फ विनोद चेंबूर के भाई को फोन कर के वरिष्ठ पत्रकार जिग्ना वोरा को गाली देते हुए कहा कि इस औरत के भड़काने में आ कर मैं ने अपना एक दोस्त तो खो ही दिया, साथ ही अपने लिए एक बड़ी मुसीबत भी मोल ले ली है.

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यह बात क्राइम ब्रांच ने टेप करवा ली थी. चेंबूर में ही विनोद असरानी उर्फ विनोद चेंबूर का उमा पैलेस नाम से बीयर बार था, जहां जे. डे को बुला कर उन्हें उन लोगों से मिलवाया गया था, जो उन की हत्या करने वाले थे. इन लोगों में सतीश कालिया शामिल नहीं था, क्योंकि वह जे. डे को जानता था.

पुलिस अधिकारियों ने विनोद असरानी उर्फ चेंबूर के भाई को क्राइम ब्रांच बुला कर उस का बयान लिया. चार्जशीट के अनुसार, उस के बयान के आधार पर उसे सरकारी गवाह बना लिया गया. उस के बयान से ही जिग्ना वोरा का नाम सामने आया.

जे. डे की हत्या में शामिल सभी लोगों को पहले ही गिरफ्तार कर के जेल भेजा जा चुका था. अब जिग्ना वोरा की बारी थी. चार्जशीट के हिसाब से जब छानबीन शुरू हुई तो पुलिस को जिग्ना के खिलाफ सबूत मिलने शुरू हो गए. अंतत: जे. डे की हत्या के लगभग 6 महीने बाद जिग्ना वोरा को गिरफ्तार कर लिया गया.

क्राइम ब्रांच अधिकारियों की जांचपड़ताल और जिग्ना वोरा के पुलिस को दिए बयान के अनुसार वरिष्ठ पत्रकार ज्योतिर्मय डे की हत्या की जो कहानी पता चली वह कुछ इस तरह थी—

जिग्ना जितेंद्र वोरा खूबसूरत और महत्त्वाकांक्षी महिला थीं. उन का जन्म एक प्रतिष्ठित और संभ्रांत परिवार में हुआ था. वह पढ़ाईलिखाई और बातचीत में काफी तेजतर्रार महिला थीं. उन्होंने मुंबई के एक सुप्रसिद्ध कालेज से बड़े अच्छे नंबरों से एलएलबी और एलएलएम किया था.

विवाह के बाद वह अपने पति जितेंद्र वोरा के साथ दुबई चली गई थीं. जितेंद्र वोरा का दुबई में कारोबार था. विवाह के कुछ दिनों बाद तक तो उन दोनों का दांपत्य जीवन बड़ी हंसीखुशी से बीता, लेकिन बाद में किन्हीं कारणों से दोनों के बीच दरार आ गई और फिर जल्दी ही तलाक हो गया.

पति से तलाक लेने के बाद जिग्ना मुंबई आ कर रहने लगीं. अलग होने के बाद जिग्ना के सामने भविष्य का सवाल था. सोचविचार कर उन्होंने अपने भविष्य को ध्यान में रख कर अपने कैरियर के लिए पत्रकारिता को चुना.

जिग्ना वोरा ने अपना शुरुआती कैरियर उसी मिड डे अखबार से शुरू किया था, जिस में जे. डे पहले से ही काम कर रहे थे. जे. डे उस अखबार के लिए क्राइम की खबरें कवर करते थे. जिग्ना वोरा के पास चूंकि एमए, एलएलबी की डिग्री थी, इसलिए मिड डे में उन का चयन अदालत और राजनीति की खबरों की कवरेज के लिए किया गया था. लेकिन जिग्ना वोरा यह बात अच्छी तरह जानती थीं कि जो बात क्राइम बीट की कवरेज में है, वह किसी अन्य बीट में नहीं है.

यही वजह थी कि जिग्ना वोरा के मन के किसी कोने में क्राइम की खबरों को कवर करने की लालसा दबी थी. वह चाहती थीं कि उन्हें क्राइम की खबरों को कवर करने का मौका दिया जाए. लेकिन उन का नेटवर्क ऐसा नहीं था कि वह क्राइम की खबरें कवर कर सकतीं. जे. डे से मदद की उन्हें कोई उम्मीद नहीं थी. क्योंकि सही मायने में पत्रकार वही होता है जो दाएं हाथ की बात बाएं हाथ को पता न चलने दे.

जिग्ना वोरा की यह इच्छा तब पूरी हुई, जब वह मिड डे छोड़ कर एशियन ऐज अखबार में गईं. एशियन ऐज के संपादक हुसैन जैदी थे, जो पहले इसी अखबार में क्राइम ब्यूरो चीफ रह चुके थे. जैदी ने जिग्ना से कहा कि वह क्राइम की खबरें कवर करें. चूंकि जिग्ना स्वयं भी यही चाहती थीं, इसलिए उन्हें आसानी से क्राइम बीट मिल गई.

जिग्ना ने जब क्राइम बीट में काम करना शुरू किया तो जल्दी ही उन की जानपहचान छोटा राजन गिरोह के करीबी माने जाने वाले फरीद तानशा, विक्की मल्होत्रा और पाल्सन जोसेफ से हो गई.

मुंबई में क्राइम की खबरें कवर करने वाले पत्रकार पुलिस के उच्चाधिकारियों और अंडरवर्ल्ड सरगनाओं के बीच अपनी जगह बना कर रखते हैं और अपने इन संबंधों पर गर्व भी महसूस करते हैं. पुलिस द्वारा अदालत को दिए गए जांच रिकौर्ड के अनुसार, ऐसी ही लालसा जिग्ना वोरा के मन में भी थी. वह किसी भी तरह अंडरवर्ल्ड सरगनाओं के बीच पहुंचना चाहती थीं.

हालांकि जिग्ना वोरा फरीद तानशा, विक्की मल्होत्रा और जोसेफ पाल्सन को पिछले लगभग 3 सालों से जानती थीं और उन से बातें करती रहती थीं. फरीद तानशा से तो जिग्ना वोरा का घर जैसा रिश्ता बन गया था. वह उस के घर आतीजाती थीं और उस की दोनों पत्नियों को भाभीजान कहा करती थीं.

छोटा राजन गिरोह के लोगों से जिग्ना के भले ही संबंध बन गए थे, लेकिन छोटा राजन से उन की कभी बात नहीं हुई थी. जिग्ना वोरा में शायद इतनी हिम्मत भी नहीं थी कि छोटा राजन से बात कर सकें. दरअसल वह इस बात को अच्छी तरह जानती थीं कि माफिया डौन से बातचीत करने में कहीं कुछ गड़बड़ हो गई, तो लेने के देने पड़ जाएंगे.

अदालत में पेश रिकौर्ड के अनुसार, जिग्ना वोरा अभी छोटा राजन तक पहुंचने का रास्ता खोज ही रही थीं कि एक दिन उन्होंने टीवी पर छोटा राजन का इंटरव्यू देखा. यह इंटरव्यू एक ऐसे पत्रकार ने लिया था, जो जिग्ना से कमतर और नया था.

इस से जिग्ना को लगा कि जब एक छोटा सा पत्रकार छोटा राजन तक पहुंच सकता है तो वह क्यों नहीं. उन्होंने मन ही मन सोचा कि जिन लोगों से वह मिलती हैं, अगर उन्हीं को माध्यम बना कर छोटा राजन तक पहुंचने की कोशिश करें तो यह काम मुश्किल नहीं होगा.

यह बात दिमाग में आने के बाद जिग्ना वोरा ने अपने मन की बात फरीद तानशा से कही. लेकिन फरीद तानशा उन्हें यह कह कर टालता रहा कि किसी दिन मौका देख कर छोटा राजन से उन की बात करा देगा. इसी बीच फरीद तानशा डी कंपनी के छोटा शकील से मिल गया. इस चक्कर में भरत नेपाली गिरोह ने उस की हत्या करवा दी थी.

फलस्वरूप छोटा राजन का इंटरव्यू जिग्ना के लिए एक सपना सा बन कर रह गया. अपने इस तथाकथित सपने को पूरा करने के लिए जिग्ना ने पाल्सन जोसेफ का सहारा लिया. इस के लिए वह पाल्सन जोसेफ पर दबाव डालने लगीं. पुलिस चार्जशीट के मुताबिक, जिग्ना वोरा के ज्यादा दबाव डालने पर आखिरकार पाल्सन जोसेफ ने उन का फोन नंबर अंडरवर्ल्ड डौन छोटा राजन को दे कर अनुरोध किया कि वह जिग्ना से बात कर ले.

पाल्सन जोसेफ के नंबर देने के कुछ दिनों बाद जिग्ना वोरा के फोन पर छोटा राजन का फोन आ गया. इस के बाद अंडरवर्ल्ड डौन छोटा राजन और जिग्ना वोरा के बीच बातचीत का सिलसिला जुड़ गया.

अदालत में दिए गए आरोपपत्र के अनुसार, जब अंडरवर्ल्ड डौन छोटा राजन का पहला फोन आया था तो जिग्ना वोरा काफी खुश हुई थीं. इस के बाद वह छोटा राजन को अकसर फोन करने लगी थीं. बातचीत के दौरान वह माफिया डौन से अंडरवर्ल्ड के बदलते समीकरणों के बारे में पूछती रहती थीं. इस के अलावा वह छोटा राजन या मुंबई के दूसरे डौनों से संबंधित छपने वाली खबरों की सच्चाई जानने के लिए भी राजन से संपर्क करती रहती थीं.

बातचीत के दौरान जिग्ना वोरा अंगरेजी न जानने वाले छोटा राजन से जब तब छपी जे. डे की खबरों का न केवल जिक्र करती थीं, बल्कि उन खबरों का उसे विस्तार से अर्थ भी समझाया करती थीं.

पुलिस की चार्जशीट के अनुसार जिग्ना वोरा और जे. डे की रंजिश घटना के 2 साल पहले तब शुरू हुई थी, जब जिग्ना ने एक दिन जे. डे को अपने खास खबरी फरीद तानशा के साथ देख लिया था. इस से जिग्ना वोरा को यह वहम हो गया था कि जे. डे उन के संपर्कों को अपना बनाने की कोशिश कर रहे हैं. जबकि हकीकत यह थी कि फरीद तानशा जे. डे का पुराना खबरी था.

अंडरवर्ल्ड डौन छोटा राजन के गिरोह में जे. डे की गहरी पैठ थी. जे. डे ने उस की कई खबरें छापी थीं. यहां तक कि छोटा राजन ने खुद ही जे. डे को अपने गिरोह के कई सदस्यों से मिलवाया भी था. कह सकते हैं कि एक समय ऐसा भी था जब छोटा राजन और जे. डे के रिश्ते काफी मधुर हुआ करते थे.

लेकिन जिग्ना वोरा ने छोटा राजन के गिरोह के बीच अपनी पैठ बनाने के लिए जे. डे और छोटा राजन के मधुर संबंधों को बिगाड़ने में बड़ी भूमिका निभाई.

अदालत में पेश दस्तावेजों के अनुसार, वैसे तो जिग्ना वोरा काफी समय से छोटा राजन को जे. डे के खिलाफ भड़का रही थीं, लेकिन उन दोनों का मधुर रिश्ता तब और बिगड़ गया, जब जे. डे ने 28 अप्रैल से 5 मई, 2011 के बीच यूरोप और कई देशों में घूमने जाने का प्रोग्राम बनाया. जे. डे ने तय किया था कि अपने इस प्रोग्राम के दौरान वह छोटा राजन से मिलेंगे.

इस बीच बातचीत के बाद दोनों का लंदन में मिलना भी तय हो गया था. वजह यह थी कि जे. डे छोटा राजन पर एक किताब लिखना चाहते थे. लेकिन सब कुछ पहले से तय होने के बाद भी छोटा राजन जे. डे से मिलने लंदन नहीं गया. दरअसल जिग्ना वोरा ने छोटा राजन से बात कर के उस के मन में यह भय बैठा दिया था कि अगर वह लंदन गया तो उस की हत्या हो जाएगी. जबकि ऐसी कोई बात नहीं थी.

जिग्ना को जे. डे के इस टुअर की जानकारी थी. बातचीत के दौरान छोटा राजन ने जब जिग्ना से जे. डे के लंदन और कई देशों के टुअर का जिक्र किया तो उन्होंने ऐसा जाहिर किया जैसे उन्हें जे. डे के इस टुअर के बारे में बहुत पहले से जानकारी है.

बातोंबातों में उन्होंने छोटा राजन को बताया कि जे. डे ड्रग माफिया इकबाल मिर्ची से मिला हुआ है और इकबाल मिर्ची उस की हत्या करना चाहता है. जिग्ना ने छोटा राजन को यह भी बताया कि यह जे. डे और इकबाल मिर्ची की मिलीभगत है.

जिग्ना की बातों से छोटा राजन के मन में डर बैठ गया और वह जे. डे से मिलने लंदन नहीं गया. जे. डे चूंकि छोटा राजन के विश्वास पात्र थे. इसलिए यह बात जान कर राजन को बहुत दुख हुआ. वह जे. डे से नाराज हो गया. बस यहीं से राजन और जे. डे के बीच दरार आ गई. यह दरार तब और गहरी हो गई जब जे. डे ने लंदन से लौट कर अपने अखबार में यह खबर छापी कि दाऊद पाकिस्तान छोड़ कर दुबई भाग गया है. इस के बाद जिग्ना वोरा ने लादेन की मौत के बाद राजन से दाऊद की लोकेशन का इंटरव्यू झटक लिया था.

बस यहीं से राजन को ले कर जे. डे और जिग्ना वोरा की कलम की लड़ाई शुरू हो गई. अपने विदेश के टुअर से लौटने के बाद तो जे. डे ने जैसे राजन पर हमला ही बोल दिया था. 30 मई, 2011 को जे. डे ने अपने लेख में लिखा कि डौन छोटा राजन को अब तीर्थयात्रा पर चले जाना चाहिए. दूसरा लेख जे. डे ने 2 जून, 2011 को लिखा कि राजन अब बूढ़ा हो गया है. जिग्ना वोरा ने इन दोनों लेखों की कटिंग छोटा राजन को भेज दीं. इस से राजन बौखला गया. उसे सब से अधिक गुस्सा 2 जून को छपी खबर ‘राजन बूढ़ा हो गया’ पर आया था. अदालत में पेश आरोपपत्र के अनुसार, उस ने जे. डे को सबक सिखाने के लिए जिग्ना वोरा से उन के घर और औफिस का पता मांगा.

जिग्ना वोरा घाटकोपर में जहां रहती थीं, वहां से जे. डे का घर दूर नहीं था. इसलिए उन्होंने जे. डे के घर और उन की मोटरसाइकिल का नंबर छोटा राजन को दे दिया. जे. डे का पताठिकाना पाने के बाद छोटा राजन ने अपने आदमियों को उन की रेकी कर के उन का गेम करने का आदेश दे दिया.

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इसी बीच जिग्ना वोरा अपने औफिस से 10 दिन की छुट्टी ले कर बाहर चली गईं. जे डे की हत्या की खबर उन्हें तब मिली जब वह कोलकाता में थीं. लेकिन जिग्ना वोरा ने इस खबर को कोई महत्त्व नहीं दिया और वह वहां से सिक्किम चली गईं.

जे. डे की हत्या को ले कर मुंबई के सभी पत्रकारों ने अपनेअपने अखबारों में खबरें लिखीं, साथ ही खूब शोरशराबा भी किया. लेकिन एक बड़े अखबार की संवाददाता होते हुए भी जिग्ना ने जे. डे की हत्या से संबंधित न तो कोई खबर लिखी और न किसी पुलिस अधिकारी से संपर्क किया.

10 दिन बाद टुअर से लौट कर वह अपने औफिस गईं और उन्होंने क्राइम ब्रांच की जांच को गुमराह करने के लिए ड्रग माफिया इकबाल मिर्ची पर संदेह जाहिर करते हुए जे. डे की हत्या की खबर छापी. लेकिन यह खबर उन के लिए उलटी पड़ी. इस से जांच अधिकारियों का ध्यान उन पर जम गया. लेकिन इसी बीच जे. डे के हत्यारों की गिरफ्तारी शुरू हो चुकी थी, जिस की वजह से पुलिस का ध्यान जिग्ना वोरा की तरफ से हट गया था.

जिग्ना वोरा यह जान चुकी थीं कि उन की गिरफ्तारी कभी भी हो सकती है. इसलिए वह अपने खिलाफ सभी सबूतों को मिटाने में जुट गईं.

लेकिन फिर भी जांच अधिकारियों ने कुछ सबूत जुटा कर जिग्ना वोरा को गिरफ्तार कर लिया. विस्तृत पूछताछ के बाद जिग्ना वोरा को जे. डे हत्याकांड का प्रमुख आरोपी बनाया और अदालत पर पेश कर के जेल भेज दिया गया. जिग्ना पर पुलिस ने मकोका भी लगाया.

मुंबई क्राइम ब्रांच ने 7 जुलाई, 2011 को इस केस के आरोपियों पर महाराष्ट्र कंट्रोल औफ आर्गनाइज्ड क्राइम एक्ट (मकोका) लगाया. लंबी जांच के बाद क्राइम ब्रांच ने राजेंद्र सदाशिव निखलजे उर्फ छोटा राजन और नारायण सिंह बिष्ट, जो कि फरार था, के खिलाफ कोर्ट में चार्जशीट पेश की. इस के बाद क्राइम ब्रांच ने 3 दिसंबर, 2011 को अदालत को जिग्ना वोरा के खिलाफ सप्लीमेंट्री चार्जशीट सौंपी. जुलाई, 2012 में जिग्ना वोरा को जमानत मिल गई.

केस के चलते 10 अप्रैल, 2012 को लंबी बीमारी के बाद जेल में ही एक आरोपी असरानी की मौत हो गई. करीब 5 साल बाद 8 जून, 2015 को अदालत ने 22 आरोपियों के खिलाफ भारतीय दंड विधान की धारा 302, 120बी, 34, आर्म्स एक्ट और मकोका के अंतर्गत चार्ज फ्रेम किया.

25 अक्तूबर, 2015 को इस केस के मुख्य अभियुक्त छोटा राजन को सीबीआई ने इंडोनेशिया के बाली से अरेस्ट किया और भारत ले आई, लेकिन उसे अन्य केसों की वजह से लाया गया था. हालांकि बाद में 5 जनवरी, 2016 को जे. डे मर्डर केस भी सीबीआई को ट्रांसफर कर दिया गया था. 31 अगस्त, 2017 को विशेष मकोका अदालत ने छोटा राजन के खिलाफ चार्ज फ्रेम किया.

 

लंबी चली सुनवाई और बहस के बाद 22 फरवरी, 2018 को अभियोजन पक्ष ने इस केस में अपनी बहस पूरी की. बाद में 2 अप्रैल, 2018 को मकोका कोर्ट ने वीडियो कौन्फ्रैंसिंग के जरिए सीआरपीसी की धारा 313 के अंतर्गत तिहाड़ जेल में बंद छोटा राजन का फाइनल स्टेटमेंट दर्ज किया. 3 अप्रैल, 2018 को बचावपक्ष ने अपनी अंतिम बहस पूरी की. उसी दिन जस्टिस समीर अदकर ने 2 मई, 2018 को इस केस का फैसला सुनाने की घोषणा की.

2 मई, 2018 को जस्टिस समीर अदकर ने खचाखच भरी अदालत में अपना फैसला सुनाया. उन्होंने इस केस में दोषी ठहराए गए छोटा राजन, सतीश कालिया, अनिल बाघमोड, अभिजीत शिंदे, निलेश शिंदे, अरुण डाके, मंगेश अगवाने, सचिन गायकवाड़ और दीपक सिसौदिया को आजन्म कारावास की सजा सुनाई. साथ ही सभी पर 26-26 लाख रुपए का जुरमाना भी लगाया.

जस्टिस समीर अदकर ने सबूतों के अभाव में जिग्ना वेरा और जोसेफ पाल्सन को संदेह का लाभ दे कर बरी कर दिया. साथ ही अदालत ने जे. डे की बहन लीना को 5 लाख रुपए देने का भी आदेश दिया ताकि वह अपना इलाज करा सकें. सजा सुनाते समय न्यायाधीश ने वीडियो कौन्फ्रैंसिंग के जरिए जब छोटा राजन से पूछा कि कुछ कहना चाहते हो तो उस ने बस इतना ही कहा, ‘ठीक है.’?

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