


संजय दत्त की बायोपिक ‘संजू’ ने तो बौक्स औफिस पर कमाल कर दिया है. फिल्म में रणबीर कपूर ने संजय दत्त के किरदार में कमाल कर दिया है और इस फिल्म के जरिए उन्हें अपने करियर की अब तक की सबसे बड़ी हिट फिल्म भी मिल गई है. अपनी इस बायोपिक की सक्सेस पर जहां संजय दत्त ज्यादा कुछ नहीं कहते दिखे, तो वहीं लगता है उनकी पत्नी मान्यता दत्त इस सक्सेस को काफी गंभीरता से ले रही हैं और अब इसी खुशी में वेकेशन भी मना रही हैं. दरअसल मान्यता दत्त इन दिनों सिंगापुर में अपने दोनों बच्चों के साथ वेकेशन मना रही हैं.
मान्यता इंस्टाग्राम पर काफी एक्टिव हैं और अक्सर पति संजय दत्त और बच्चों के साथ की फोटो शेयर करती रही हैं. ऐसे में मान्यता ने अपने इस वेकेशन के फोटो भी इंस्टाग्राम पर शेयर किए हैं और जो सोशल मीडिया पर काफी वायरल हो रहे हैं. इन फोटो में वह पूल पार्टी करने से लेकर अपने बच्चों के साथ मस्ती करती नजर आ रही हैं. आप भी देखें मान्यता के यह वेकेशन पिक्स.
जहां एक तरफ मान्यता दत्त इन दिनों सिंगापुर में हैं तो वहीं आज ही संजय दत्त की आने वाली फिल्म ‘प्रस्थानम’ का मोशन पोस्टर रिलीज किया गया है. इस फिल्म में संजय दत्त के साथ जैकी श्रौफ, मनीषा कोइराला, अली फजल, अमायरा दस्तूर और सत्यजीत दुबे जैसे एक्टर नजर आएंगे. बता दें कि यह फिल्म संजय दत्त की होम प्रोडक्शन फिल्म है. इसकी शूटिंग इन दिनों लखनऊ में चल रही है.
इसके अलावा संजय दत्त जल्द ही रणबीर कपूर के साथ यश राज बैनर की फिल्म ‘शमशेरा’ में स्क्रीन शेयर करते नजर आएंगे. इसके अलावा वह जल्द ही निर्देशक तिगमांशू धूलिया की फिल्म ‘साहब बीवी और गैंगस्टर 3’ में भी रौकिंग अंदाज में दिखेंगे.
बौलीवुड अभिनेता सनी देओल अपनी अपकमिंग फिल्म ‘यमला पगला दीवाना 3’ से पहले एक नई फिल्म लेकर आ रहे हैं. इस फिल्म का नाम है ‘भईया जी सुपरहिट’. जिसमें वह 12 साल के लंबे समय के बाद फिर से अमीषा पटेल के साथ रोमांस करते दिखेंगे. गौरतलब है कि इसके पहले दोनों गदर-एक प्रेम कथा में साथ रोमांस करते दिखे थे.

अमीषा पटेल अब ‘भईया जी सुपरहिट’ से एक बार फिर से बौलीवुड में कमबैक करने जा रही हैं. अमीषा पटेल को आखिरी बार साल 2013 में रिलीज हुई फिल्म ‘रेस-3’ में देखा गया था. अमीषा और सनी देओल के अलावा इस फिल्म में अभिनेत्री प्रीति जिंटा, अरशद वार्सी, श्रेयस तलपड़े, संजय मिश्रा, मुकुल देव, पकंज त्रिपाठी जैसे सितारे भी लीड भूमिका में हैं.

अमीषा की इस अपकमिंग कौमेडी फिल्म को नीरज पाठक ने डायरेक्ट किया है. फिल्म में सनी देओल का डबल रोल होगा. इस फिल्म की कहानी उत्तरप्रदेश और बिहार पर आधारित है. फिल्म के निर्माता महेंद्र हैं. यह फिल्म 19 अक्टूबर को सिनेमाघरों में रिलीज होगी. यह फिल्म कुछ सालों पहले ही रिलीज होने वाली थी, हालांकि ट्यूबलाइट से क्लैश करने के कारण फिल्म की रिलीज डेट को आगे खिसकाना पड़ा था.
मर्द हो या औरत अंदरूनी अंगों की सफाई सभी के लिए बेहद जरूरी होती है. ऐसा करना सैक्स के लिए ही नहीं, बल्कि सेहत के हिसाब से भी बेहद जरूरी होता है.
मर्दों के मुकाबले औरतों के लिए यह बेहद जरूरी होता है. इस की वजह यह है कि औरत के अंदरूनी अंगों की बनावट ऐसी होती है जिन में इंफैक्शन होने का डर ज्यादा होता है. उन के अंग से स्राव, पसीना या फिर पेशाब के बाद अंग को साफ नहीं करने के चलते जांघें गीली हो जाती हैं.
लंबे समय तक गीले रहने के चलते उन में बैक्टीरिया पनपने का खतरा रहता है. इतना ही नहीं, इंफैक्शन या फि र बदबू की समस्या का भी खतरा रहता है, इसलिए अंग की सफाई करने के साथ ही इस जगह को सूखा रखना भी बेहद जरूरी है.
सैनेटरी नैपकिन बदलती रहें
माहवारी के समय ज्यादातर औरतें सैनेटरी नैपकिन को काफी लंबे समय तक नहीं बदलती हैं, जबकि उसे हर 5 से 7 घंटे में बदलना चाहिए. अगर एक ही सैनेटरी नैपकिन को लंबे समय तक इस्तेमाल किया जाता है तो वह बदन पर लाल चकत्ते या फिर बदबू के साथ इंफैक्शन की वजह बन सकता है.
पीएच लैवल को बनाए रखें
औरत का अंग खुद को बैक्टीरिया और इंफैक्शन से बचाने के लिए एक उचित तापमान, पीएच लैवल और नमी को बनाए रखने में मदद करता है.
आमतौर पर अंग का पीएच लैवल तकरीबन 3.8 से 4.5 होता है, जो कठोर साबुन या कैमिकल वगैरह के इस्तेमाल से काफी बदल सकता है जिस से अंग को नुकसान पहुंच सकता है.
पीएच लैवल को बनाए रखने के लिए कोमल साबुन इस्तेमाल करना चाहिए. कभी भी कठोर साबुन का इस्तेमाल न करें. बाजार में अंग की सफाई के लिए भी कई साबुन मौजूद हैं. उन का इस्तेमाल किया जा सकता है.
सैक्स के बाद सफाई
इंफैक्शन से बचना है तो सैक्स के बाद अंग की सफाई करना बहुत जरूरी है. इस्तेमाल किए गए कंडोम के कुछ अंश अंग में रहने से इंफैक्शन की वजह बन सकते हैं, इसलिए अंग को इंफैक्शन और बैक्टीरिया से दूर रखने के लिए कोमल साबुन और पानी के साथ साफ करना बहुत अहम है. सैक्स के बाद पेशाब करना भी जरूरी होता है.
बालों की सफाई करें
अंग के बालों को प्यूबिक हेयर भी कहते हैं. इन की सफाई समयसमय पर करते रहें. कोशिश करें कि प्राइवेट एरिया में बाल छोटे हों या फिर न हों जिस से पसीने से होने वाली खुजली से नजात मिल सके. अंग के बालों को साफ करने के कई तरीके होते हैं, जैसे:
हेयर रिमूवर क्रीम
हेयर रिमूवर क्रीम बैस्ट तरीका है बाल हटाने का. औरतें इस का सब से ज्यादा इस्तेमाल करती हैं. इस का सब से बड़ा फायदा यह है कि इस में किसी तरह का दर्द नहीं होता और न ही इस में ज्यादा समय लगता है.
कोई भी क्रीम इस्तेमाल करने से पहले उस पर लिखे सभी सुझावों को अच्छी तरह से पढ़ लें, फिर इस्तेमाल करें. अगर इस क्रीम से किसी तरह की जलन या खुजली होती है तो तुरंत पानी से साफ कर दें.
वैक्सिंग
हेयर रिमूव करने का सब से पुराना उपाय है वैक्सिंग. वैक्सिंग में दर्द होता है. इस उपाय को केवल वे ही अपनाएं जो दर्द को सहन करने की ताकत रखते हैं.
वैक्सिंग का एक फायदा यह होता है कि इस से थोड़ा लंबे समय तक बालों से छुटकारा मिल जाता है.
वैक्सिंग करते समय थोड़ी सावधानी रखने की भी जरूरत होती है, तो इसे थोड़ा ध्यान से करें. यह खुद करना आसान नहीं होता है. औरतें ब्यूटीपार्लर में इस को करा सकती हैं.
लेजर ट्रीटमैंट
लेजर ट्रीटमैंट हेयर रिमूव करने का एक ऐसा उपाय है जिस में एक लेजर डिवाइस का इस्तेमाल किया जाता है. इस से निकलने वाली लेजर के जरीए हेयर फाइलिइस को खत्म कर दिया जाता है.
यह ट्रीटमैंट घातक नहीं है. बस, इतना जरूर है कि इस में बड़ी सावधानी बरतनी पड़ती है. इसे किसी अच्छे डाक्टर की मदद से ही कराएं.
यह ट्रीटमैंट थोड़ा महंगा होता है लेकिन इस से हमेशा के लिए राहत मिल जाती है. यह ट्रीटमैंट कराने के लिए कुछ समय तक सिटिंग्स लेनी पड़ती हैं और साथ ही लोशन और आइस पैक्स भी इस्तेमाल करना होता है.
शेविंग
हेयर रिमूव करने का सब से सस्ता और आसान उपाय है शेविंग करना. शेविंग करते समय थोड़ी सावधानी बरतें ताकि आप को कोई कट या निशान न पड़ जाए.
शेविंग के लिए जो रेजर और ब्लेड का आप इस्तेमाल करें वह अच्छी क्वालिटी का होना चाहिए.
यह भी हो सकता है कि शेविंग करने के कुछ समय बाद आप को खुजली या जलन होने लगे. ऐसा होने पर किसी लोशन का इस्तेमाल करें और लापरवाही न बरतें. अब औरतों के लिए रेजर भी आने लगे हैं.
मर्द भी रखे सावधानी
अंदरूनी अंगों का इंफैक्शन मर्दों को भी हो सकता है. ऐसे में उन को भी अपने अंग के बाल छोटे या फिर न के बराबर ही रखने चाहिए. बालों को हलका मतलब ट्रिम कर सकते हैं. ट्रिम करने का काम कैंची से भी हो सकता है. बालों को शेव भी कर सकते हैं. इस में सावधानी रखनी पड़ेगी. नहाते समय अंगों को साफ रखें. कठोर साबुन का इस्तेमाल न करें. अंग में नीचे सफेद रंग का पदार्थ जमा हो जाता है. इस को साफ पानी से अच्छी तरह धो लें नहीं तो यह बदबू की वजह बन जाता है. इस से इंफैक्शन भी हो सकता है. साफ अंडरवियर पहनें.
जवानी आने की निशानी माने जाने वाले कीलमुंहासे एक ऐसी बला हैं, जिन्हें कोई भी लड़का या लड़की अपने चेहरे पर नहीं देखना चाहता. इस का ठीकठाक और सटीक इलाज शायद हकीम लुकमान के पास भी नहीं रहा होगा.
कीलमुंहासे क्यों होते हैं, इस की कई वजहें गिनाई जा सकती हैं. मसलन, हार्मोनों में बदलाव, हाजमा खराब होना, तैलीय चमड़ी होना, ज्यादा चिकनाई वाली चीजें खाना वगैरह.
कीलमुंहासे आमतौर पर 16 साल की उम्र से अपना रंग चेहरे पर दिखाने लगते हैं. इस से चेहरा न केवल भद्दा दिखता है बल्कि जिस के चेहरे पर ये जडें़ जमा लेते हैं उस का काफीकुछ छीन लेते हैं.
यह मुमकिन है
कीलमुंहासों से अब छुटकारा पाया जा सकता है. इस के लिए बाजार में मिलने वाली क्रीमों के इस्तेमाल के अलावा खुद की कुछ आदतें बदलना भी जरूरी हैं, मसलन:
* ज्यादा से ज्यादा पानी पीएं.
* चेहरे को 3-4 बार किसी अच्छे फेसवाश से साफ करें.
* पेट साफ रखें और कब्ज से बचें.
* कीलमुंहासों को फोड़ें नहीं और न ही उन्हें रगड़ें.
* ज्यादा तेल वाली चीजें न खाएं.
* चेहरे को दिन में एक बार उबटन से साफ करें. यह उबटन घर में ही बनाया जा सकता है. मलाई, बेसन, हलदी और नीबू के रस से एक चम्मच लेप बनाएं और उसे चेहरे पर लगा कर कुछ देर बाद धो लें.
* खाना और नींद वक्त पर लें और देर रात तक नहीं जागे.
* सिगरेट, तंबाकू और शराब का सेवन न करें.
इन कुछ उपायों से कीलमुंहासों की समस्या काफी हद तक हल होती है जिसे पूरी तरह खत्म करने के लिए किसी अच्छी कंपनी की क्रीम इस्तेमाल करें.
कीलमुंहासे ठीक हो जाने पर उन की तरफ से लापरवाह नहीं हो जाना चाहिए क्योंकि एक बार ठीक होने के बाद वे दोबारा भी हो सकते हैं.
कुछ माहिरों का तो यह मानना है कि कीलमुंहासों की एक बड़ी वजह खून की खराबी होती है जिसे नीम की गोलियों से काबू किया जा सकता है इसलिए 2-3 महीने तक नियमित नीम की गोलियां खाना नुकसान की बात नहीं क्योंकि नीम से किसी तरह का नुकसान नहीं पहुंचता है.
2 अप्रैल, 2018 को दलितों के भारत बंद आह्वान के चलते ग्वालियर शहर में कुछ ज्यादा ही तनाव था, जो जातिगत रूप से बेहद संवेदनशील माना जाता है. मार्च के आखिरी सप्ताह से पुलिस कुछ ज्यादा ही सतर्क थी और मुखबिरों के जरिए लगातार इलाके की टोह ले रही थी. सावधानी बरतते हुए वह रात की गश्त में भी कोई ढील नहीं दे रही थी.
31 मार्च की रात जब एक पुलिस दल पड़ाव इलाके के गांधीनगर स्थित नामी होटल सिद्धार्थ पैलेस पहुंचा तो होटल में अफरातफरी मच गई. आमतौर पर देर रात मारे जाने वाले ऐसे छापों का मकसद देहव्यापार में लिप्त लोगों को पकड़ना होता है, पर इस रात बात कुछ और थी.
सिद्धार्थ होटल ग्वालियर का एक नामी होटल है, जिस की गिनती बजट होटलों में होती है. मोलभाव करने पर इस होटल में डेढ़ हजार रुपए वाला एसी कमरा एक हजार रुपए में मिल जाता है, जिस में वे तमाम सुविधाएं मिल जाती हैं जिन की दरकार ठहरने वालों को होती है.
गरमियों में रात के करीब साढ़े 9 बजे पड़ाव इलाके में चहलपहल शवाब पर होती है. ऐसे में पुलिस की गाडि़यों का काफिला देख राहगीर ठिठक कर देखने लगे कि आखिरकार माजरा क्या है. कोई देहव्यापार का अंदाजा लगा रहा था तो कोई 2 अप्रैल के बंद के मद्देनजर सोच रहा था कि जरूर यहां कोई गुप्त मीटिंग चल रही होगी.
लेकिन दोनों ही अंदाजे गलत थे और जो सच था, वह दूसरे दिन विस्तार से लोगों के सामने आ गया. दरअसल इस होटल में एक और लीक पेपर की स्क्रिप्ट लिखी जा रही थी. यह पेपर किसी स्कूलकालेज का न हो कर एफसीआई (भारतीय खाद्य निगम) का था. यह जानकारी मिलने के बाद लोगों ने दांतों तले अंगुलियां दबा लीं कि देश में यह हो क्या रहा है. लीक पर लीक… यह तो भ्रष्टाचार की हद है.
छापे की काररवाई देर रात तक चली जिस में पूरे 50 लोगों को पुलिस की एसटीएफ ने गिरफ्तार किया. दरअसल, एसटीफ के एसपी सुनील कुमार शिवहरे को मुखबिर से जो खबर मिली थी, वह एकदम सच निकली.
एफसीआई की यह परीक्षा मध्य प्रदेश में रविवार पहली अप्रैल को होनी थी, जिस में 217 वाचमैन पदों के लिए रिकौर्ड 50 हजार से भी ज्यादा आवेदन आए थे. ग्वालियर के अलावा वाचमैन भरती परीक्षा भोपाल, इंदौर, उज्जैन, सागर, जबलपुर और सतना शहरों में होनी थी. इन शहरों में अनेक परीक्षा केंद्र बनाए गए थे. वाचमैन के पद के लिए शैक्षणिक योग्यता 8वीं पास होना रहती है, इसलिए भी आवेदन उम्मीद से ज्यादा आए थे.
अब तमाम छोटे पदों की भरती के लिए भी लिखित परीक्षाएं होने लगी हैं, जिन का मकसद योग्य उम्मीदवारों का चयन करना होता है. वाचमैन भरती परीक्षा में भी मौखिक परीक्षा यानी इंटरव्यू के पहले लिखित परीक्षा ली जाने लगी है. इस की वजह यह है कि नाकाबिल उम्मीदवारों की छंटनी हो जाती है और तयशुदा पैमाने और पदों की संख्या के अनुपात में वे उम्मीदवार इंटरव्यू के लिए बुलाए जाते हैं जो लिखित परीक्षा पास कर चुके होते हैं.
वाचमैन भरती परीक्षा में ज्यादा कठिन सवाल नहीं पूछे जाते, क्योंकि इस का मकसद केवल उम्मीदवार का सामान्य ज्ञान, गणित और तर्कशक्ति को आंकना होता है.

सिद्धार्थ होटल में मौजूद 48 उम्मीदवारों को 2 दलाल अगले दिन होने वाला परचा हल कर के दे रहे थे और उम्मीदवारों को परीक्षा का अभ्यास करा रहे थे कि किस सवाल का सही जवाब क्या है. एसटीएफ की टीम ने जब होटल के एकएक कमरे में जा कर उम्मीदवारों को पकड़ा तो सब के सब बड़ी शांति से प्रश्नपत्र हल करने की प्रैक्टिस कर रहे थे.
अचानक पुलिस को आया देख सभी हड़बड़ा उठे. दरअसल, उन्हें आश्वस्त किया गया था कि परीक्षा देने में उन्हें कोई झंझट नहीं होगा, फिर भी झंझट हो ही गया. वह भी कुछ इस तरह कि ये लोग शायद जिंदगी भर चौकीदारी के नाम से भी कांपते रहेंगे.
थोड़ी देर पहले तक वातानुकूलित कमरों में बैठ कर परीक्षा की तैयारी करना तो ज्यादती होगी, घोटाला करने जा रहे ये लड़के पुलिस को देख कर होटल के हौल में खड़े थरथर कांप रहे थे. इन का रहनसहन देख कर ही अंदाजा लगाया जा सकता था कि इन में से शायद पहले कभी कोई इतने बड़े होटल में गया होगा. और जेल तो शायद ही कभी कोई गया होगा.
एफसीआई में वाचमैन पदों के लिए परीक्षा देश भर में होनी थी. अलगअलग राज्यों में इस की तारीखें अलगअलग रखी गई थीं. मध्य प्रदेश की परीक्षा की जानकारी सिर्फ उन्हीं युवाओं को लगी थी, जो जागरूक हैं और 8वीं या इस से आगे तक पढ़ेलिखे हो कर सरकारी नौकरी की तलाश में रहते हैं.
ऐसे राज्यों में बिहार का नाम सब से ऊपर आता है, जहां के युवा सरकारी नौकरी वाला विज्ञापन देखते ही फौर्म भर देते हैं और परीक्षा की तैयारियां भी शुरू कर देते हैं.
जो 48 लोग परचा हल करते पकड़े गए, उन में 35 बिहार के थे और 13 अन्य राज्यों के थे, मध्य प्रदेश का उन में कोई नहीं था. मध्य प्रदेश का इसलिए नहीं था कि परचा बेचने वाला गिरोह कोई जोखिम नहीं उठाना चाहता था. इस गिरोह को डर था कि अगर मध्य प्रदेश के उम्मीदवारों को पेपर बेचा गया तो जरूर पकड़े जाएंगे.
क्योंकि होता यह है कि जिसे पेपर बेचो, वह या तो उस का ढिंढोरा साथियों से पीट देता है या फिर अपने पैसे वसूलने के लिए किसी और को भी बेच देता है, जिस से पेपर लीक होने की संभावनाएं ज्यादा हो जाती हैं.
गिरफ्तार 48 उम्मीदवारों से एसटीएफ ने पूछताछ की तो उन्होंने बिना किसी लागलपेट के सच उगल दिया. यह सच था कि उन्होंने इस पेपर के बाबत गिरोह से 5-5 लाख रुपए में सौदा किया था, लेकिन अभी पूरा भुगतान नहीं किया था. अपनी हैसियत के मुताबिक उम्मीदवारों ने 10 हजार से ले कर एक लाख रुपए तक एडवांस दिए थे. बाकी की राशि चयन हो जाने के बाद देनी तय हुई थी.
बाहरी राज्यों के ये उम्मीदवार कैसे इस गिरोह के संपर्क या चंगुल में आए, यह बात भी कम दिलचस्प नहीं, जिस का खुलासा अगर हो पाया तो उस से न केवल असली मुलजिमों के चेहरे बेनकाब होंगे, बल्कि यह भी साबित होगा कि भ्रष्टाचार की जड़ें पाताल से भी नीचे पांव पसार चुकी हैं.
48 उम्मीदवारों को पेपर हल कराते जो 2 दलाल पकड़े गए, उन के नाम हरीश कुमार और आशुतोष कुमार हैं. ये दोनों ही दिल्ली के रहने वाले हैं. पूछताछ में इन दोनों ने भी माना कि उन्होंने हल किया पेपर इन लोगों को दिया था और वे कल होने वाली परीक्षा की तैयारी करा रहे थे.
इन दोनों ने बताया कि वे तो सिर्फ निचली कड़ी हैं, जिन का काम उम्मीदवारों को इकट्ठा कर उन्हें पेपर हल कराना था. इस बाबत गिरोह से उन्हें 30-30 हजार रुपए मिले थे. इन दोनों की एक जिम्मेदारी उम्मीदवारों को परीक्षा केंद्र तक रवाना करने की भी थी. सभी उम्मीदवारों के मोबाइल फोन इन्होंने अपने पास रख लिए थे.
केवल मोबाइल फोन ही नहीं, बल्कि उम्मीदवार कहीं परीक्षा के बाद बाकी के पैसे देने से मुकर न जाए, इसलिए उन्होंने उन के आधार कार्ड और मार्कशीट जैसे महत्त्वपूर्ण दस्तावेजों की मूल प्रतियां भी अपने पास रख ली थीं. तय यह हुआ था कि परीक्षा पास कर लेने के बाद उन्हें इन दस्तावेजों की मूल प्रतियां वापस कर दी जाएंगी.
हल की गई आंसरशीट तो एसटीएफ को मिल गई लेकिन उम्मीदवारों के दस्तावेजों की मूल प्रतियां नहीं मिलीं. आशुतोष और हरीश के मुताबिक, वे दस्तावेज और इकट्ठा किए गए पैसे तो गिरोह का मास्टरमाइंड किशोर कुमार अपने साथ दिल्ली ले गया था.
बीकौम सेकेंड ईयर के छात्र आशुतोष और अपनी इवेंट मैनेजमेंट कंपनी चलाने वाले हरीश कुमार पुलिस को झूठ बोलते नहीं लगे. लेकिन असली अपराधी या वह कड़ी जिस से असली अपराधी तक पहुंचा जा सकता था, वह किशोर कुमार छापे के कुछ घंटों पहले ही ग्वालियर से निकल चुका था.
यह साफ जरूर हो गया था कि पेपर मध्य प्रदेश से नहीं बल्कि दिल्ली से लीक हुआ था और यह सिर्फ किशोर कुमार के पास था. शुरुआती पूछताछ से इतना ही पता चल पाया कि किशोर दिल्ली में कोचिंग क्लासेज चलाता है.
इन पंक्तियों के लिखे जाने तक किशोर कुमार की गिरफ्तारी नहीं हुई थी, लेकिन यह जरूर उस के बारे में पता चला कि श्योपुर में उस का एक बीएड कालेज भी है और उस के औफिसों में कई नामी नेताओं के साथ फोटो लगे हुए हैं. केंद्र सरकार के सार्वजनिक उपक्रमों में भी उस की खासी घुसपैठ है.
किशोर कुमार को अंदेशा था कि छापा पड़ सकता है, इसलिए उस ने खिसक लेने में ही भलाई और सलामती समझी. दरअसल, एसटीएफ को काफी पहले से खबरें मिल रही थीं कि यह पेपर लीक होने वाला है.
इस की जिम्मेदारी सुनील कुमार शिवहरे को सौंपी गई तो उन्होंने अपनी टीम में इंसपेक्टर एजाज अहमद, चेतन सिंह बैंस और जहीर खान सहित 2 दरजन पुलिसकर्मियों को शामिल किया. इस टीम के कुछ सदस्यों ने भनक लगने पर इस गिरोह के सदस्यों से उम्मीदवार बन कर संपर्क भी किया था.
गिरोह की तरफ से टीम के सदस्यों को यह जवाब दिया गया था कि अभी उन का काम भोपाल और मध्य प्रदेश में नहीं चल रहा है.
इस जवाब के मायने बेहद साफ हैं कि यह गिरोह कंस्ट्रक्शन कंपनियों और ठेकेदारों की भाषा बोल रहा था, जिस से लगता है कि इस का काम देश भर में कहीं न कहीं चल रहा होता है और अब इस तरह के पेपर भी सोचसमझ कर सावधानी से बेचे जाते हैं. ग्वालियर में पकड़े गए इस का मतलब यह नहीं कि दूसरे शहरों या राज्यों में इन का काम नहीं चलता होगा.
इस फूलप्रूफ तैयारी में अगर पुलिस सेंधमार पाई तो उसे अपने मुखबिरों के साथसाथ खुद की मुस्तैदी पर भी फख्र होना स्वाभाविक बात है. सिद्धार्थ होटल में पहले आरोपियों ने 10 कमरे बुक कराए थे, लेकिन जब उन्हें लगा कि होटल के दूसरे कमरों में ठहरे लोग अड़ंगा बन सकते हैं तो उन्होंने पूरा होटल ही बुक करा लिया था. होटल बुक कराने की वजह उम्मीदवारों द्वारा बीएड की परीक्षा का प्रैक्टिकल देना बताई गई थी.
होटल बुक कराते वक्त इन्होंने मैनेजर शैलेंद्र सिंह को 10 हजार रुपए एडवांस दिए थे और जब पूरा होटल बुक कराया तो 5 हजार रुपए और दिए थे. उम्मीदवारों के आने का सिलसिला 30 मार्च की रात से ही शुरू हो गया था जो 31 मार्च की शाम 6 बजे तक चला.
एसटीएफ की 31 मार्च की कामयाबी मिट्टी में मिलती दिख रही है, क्योंकि दिल्ली के इंद्रपुरी इलाके में स्कूल और कोचिंग सेंटर चलाने वाला किशोर कुमार गिरफ्तार नहीं हो पाया था. छापे के बाद जो हुआ, वह सीबीएसई के 10वीं और 12वीं के पेपर लीक होने जैसा था, जिस से लगता है इस फ्रौड और करप्शन में एफसीआई का रोल भी कमतर शक वाला नहीं है.
किशोर कुमार को पेपर कहां से मिला होगा, फौरी तौर पर तो हर किसी का जवाब यही होगा कि जाहिर है एफसीआई से. क्योंकि परीक्षा तो उस की ही थी. लेकिन ऐसा है नहीं, जिस में कई नए पेच सामने आए. एसटीएफ ने छापेमारी के बाद जब इस अहम मामले से एफसीआई के अधिकारियों को अवगत कराया तो उन की प्रतिक्रिया बेहद निराशा भरी लेकिन चौंकाने वाली निकली.
एफसीआई के मध्य प्रदेश के महाप्रबंधक अभिषेक यादव को यह जानकारी मिल चुकी थी कि विभाग में वाचमैन की परीक्षा के लिए जो 50 हजार से ज्यादा अभ्यर्थी शामिल होने वाले हैं, उस का प्रश्नपत्र लीक हो चुका है.
इस के बावजूद भी उन्होंने परीक्षा रद्द करने की कोई बात नहीं की. बल्कि उन्होंने कहा कि एसटीएफ की काररवाई की रिपोर्ट मिल जाने के बाद अगर जरूरी हुआ तो परीक्षा रद्द कर देंगे. यानी अभिषेक यादव यह मानने से इनकार कर रहे हैं कि पेपर किसी दूसरे शहर में लीक नहीं हुआ होगा. यह उतनी ही बेहूदा बात थी जितनी यह कि पहली बार एफसीआई ने खुद परीक्षा आयोजित कराने के बजाए किसी एजेंसी को यह जिम्मेदारी सौंप दी थी.
परीक्षा के बाद जब सिद्धार्थ होटल में हल कराए गए पेपरों का मिलान कराया गया तो साबित हो गया कि 80 फीसदी प्रश्न मेल खा रहे थे. यह बात गिरफ्तारी के बाद अभिषेक और हरीश बता चुके थे कि प्रश्नपत्र में बीचबीच में दूसरे सवाल डाल दिए गए थे. जाहिर है ऐसा बाद के बचाव के लिए किया गया था जो खरीदफरोख्त की बात के चलते बेमानी ही है.
एफसीआई के भोपाल कार्यालय के पर्सनल डिपार्टमेंट के डीजीएम जी.पी. यादव भी यह कहते पल्ला झाड़ने की कोशिश करते रहे कि परीक्षा की जिम्मेदारी एक निजी एजेंसी को दी थी, इसलिए गड़बड़ी की वही जिम्मेदार है.
बात बेहद चिंताजदक है कि तमाम कायदेकानूनों को ताक में रखते हुए भोपाल एफसीआई के अधिकारियों ने कोलकाता की एक एजेंसी को परीक्षा का ठेका दे दिया था. जबकि यह परीक्षा अब तक एसएससी कराती रही है. क्या सरकारी कर्मचारियों की नियुक्ति के लिए किसी प्राइवेट एजेंसी की सेवाएं लेनी चाहिए, इस सवाल का साफसाफ जवाब कोई नहीं दे पा रहा.
यह ठेका देने का ही नतीजा था कि परीक्षा के लिए जिन लोगों ने आवेदन किए थे, उन में से कोई 2 हजार के डाटा लीक हो गए और मय नामपते व मोबाइल नंबरों के जादुई तरीके से इस गुमनाम गिरोह तक पहुंच गए. गिरोह ने आवेदकों से मिल कर सौदेबाजी की, जिस में 135 आवेदक 5-5 लाख रुपए दे कर 15 हजार रुपए महीने वाली यह नौकरी हासिल करने को तैयार हो गए.
सीधेसीधे गिरोह ने 7 करोड़ रुपए का सौदा कर डाला, जिस से एफसीआई को कोई मतलब नहीं था. शायद ही एफसीआई के ये होनहार अफसर यह बता पाएं कि क्या एजेंसी को यह ठेका भी दिया गया था कि वह आवेदकों का डाटा लीक कर पैसे बनाए?
इस से तो बेहतर होता कि एफसीआई इन पदों की खुलेआम नीलामी ही कर डालता, जिस से उसे करोड़ों की आमदनी होती. लेकिन इस काम को ही अंजाम देने के लिए उस ने एक एजेंसी की सेवाएं लीं. गौर करने वाली बात यह है कि इस एजेंसी को सरकारी नौकरियों में भरती का कोई तजुरबा भी नहीं था.
केंद्र सरकार के इस अहम सार्वजनिक उपक्रम की साख पर आए दिन बट्टा लगता रहा है पर परीक्षा के मामले में पहली बार बट्टा लगा है. इस पर भी नीचे से ले कर ऊपर तक सब खामोश हैं तो लगता है कि लीक अब बड़ा धंधा बन चुका है, जिसे मोहरों के जरिए खेला जाता है. केंद्रीय खाद्य मंत्री रामविलास पासवान ने भी बेरोजगार युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ करते इस घोटाले से कोई वास्ता नहीं रखा, मानो यह कोई छोटामोटा मामला हो.
अब होगा यह कि आशुतोष और हरीश कुमार जैसे प्यादे कानून की बलि चढ़ जाएंगे और असली गुनहगार कहीं और अगले लीक की तैयारी में जुटे होंगे.
एसटीएफ के मुताबिक लीक पेपरों का सौदा ग्वालियर के अलावा इंदौर, भोपाल और उज्जैन में भी हुआ था, लेकिन गिरफ्तार सिर्फ 48 हुए. 135 में से 87 का पैसा गिरोह डकार गया और अपराधी मौज कर रहे हैं. कथा लिखे जाने तक एफसीआई दोबारा परीक्षा कराने का फैसला नहीं ले पाया था.
एसटीएफ ने हालांकि एफसीआई से जवाब मांगा है, जो जाहिर है गोलमोल ही होगा. परीक्षा कराने वाली एजेंसी के एक कोऔर्डिनेटर संदीप मोगा के मुताबिक, हम डिटेल नहीं दे सकते क्योंकि हम गोपनीयता की शपथ से बंधे हुए हैं. यह गोपनीयता वही थी, जिस के चिथड़े 31 मार्च के छापे में उड़ चुके हैं.
जेलों में मारपीट, मोबाइल से लेकर तमाम अवैध चीजों की बरामदगी आम बात है और हर घटना के बाद प्रशासन का मौन साध लेना भी उतना ही आम है. लेकिन एक अतिसुरक्षित मानी जाने वाली जेल की बैरक के अंदर एक कुख्यात अपराधी को गोलियों से भून देना आम नहीं माना जा सकता, इसलिए बुरी तरह चौंकाता भी है.
उत्तर प्रदेश की बागपत जेल में पूर्वांचल के कुख्यात माफिया डौन प्रेम प्रकाश उर्फ मुन्ना बजरंगी की जिस तरह हत्या हुई, उसने सूबे की कानून-व्यवस्था के साथ ही जेलों में अव्यवस्था की पोल भी खोल दी है. तमाम आशंकाओं और आरोपों के बीच मुन्ना बजरंगी रविवार को ही झांसी जेल से बागपत जेल लाया गया था.
उसे पूर्व बसपा विधायक लोकेश दीक्षित से रंगदारी मांगने के आरोप में सोमवार को कोर्ट में पेश होना था. जेल से पेशी पर जाते या लौटते वक्त बंदियों पर हमले नई बात नहीं, लेकिन पेशी से पहले और एक ही दिन पूर्व दूसरी जेल से लाए गए माफिया की बैरक में ही इस तरह हत्या कई सवाल छोड़ती है.
सब कुछ इतना फिल्मी है कि किसी को इल्म भी न हुआ और एक गहरी पटकथा लिखकर उसे अंजाम भी दे दिया गया! इस हत्याकांड ने लखनऊ के सीएमओ हत्याकांड के अभियुक्त डिप्टी सीएमओ योगेंद्र सचान की लखनऊ सेंट्रल जेल में ‘आत्महत्या’ की याद दिला दी, जिसके बारे में माना गया कि तमाम राज उनके साथ खत्म हो गए थे.
उत्तर प्रदेश पुलिस का बड़ा सिरदर्द मुन्ना नवंबर 2005 में भाजपा विधायक कृष्णानंद राय की हत्या के बाद सुर्खियों में आया. इस हत्याकांड में राय के अलावा 6 और लोग मारे गए थे. यह इतना क्रूर हत्याकांड था कि हर मृतक के शरीर पर 60 से सौ गोलियों के निशान पाए गए थे.
सच है कि अपने मुंह से 20 साल के आपराधिक जीवन में 40 हत्याओं की बात करने वाले मुन्ना की फरारी से लेकर उसके एनकाउंटर में बचने और फिर गिरफ्तारी की कहानी जितनी फिल्मी है, उसका अंत भी उतना ही फिल्मी हुआ.
यह हत्याकांड जेल व्यवस्था पर ऐसा तीखा सवाल है, जिसके जवाब जल्द तलाशने होंगे. जब जेल की बैरक में कोई गोलियों से भूना जा सकता है, तो मान लेना चाहिए कि अपराधियों की ही पौ बारह नहीं है, प्रशासन-पुलिस की नाक भी इस गर्त में गहरे डूबी है.
यह इसलिए और भी संगीन हो जाता है कि दस दिन पहले ही मुन्ना की पत्नी ने उसकी हत्या की साजिश रचने का आरोप एसटीएफ पर लगाया था और उसे पेशी के लिए जेल से बाहर न ले जाकर वीडियो कान्फ्रेंसिंग से ही सुनावाई की गुहार लगाई थी.
यह वक्त किसी बड़ी घटना के बाद जेल की सुरक्षा व्यवस्था और चौकसी खंगालने की बार-बार की जाने वाली कवायद के तौर पर सक्रिय होने का नहीं, इस खतरे के प्रति भी सचेत होने का है कि अगर हथियार हमारी जेलों में इस तरह पहुंच सकते हैं, तो वह दिन दूर नहीं, जब राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी भी शायद जेलों के भीतर निपटाए जाने लगें और एक नए तरह का संकट सामने आए.
इस हत्याकांड के और भी निहितार्थ हैं. राजनीति में पैठ रखने वाले इस माफिया सरगना की हत्या के बाद पूर्वांचल के आपराधिक गैंगवार और माफिया वल्र्ड में तो नए समीकरण बनेंगे ही, जातीय गुणागणित वाला पूर्वांचल का राजनीतिक परिदृश्य भी इससे कहीं गहरे प्रभावित होने जा रहा है, इस सच से इनकार नहीं किया जा सकता.
लो जी, फिर मुझ दुखियारी के फोन पर बेटे की काल आ गई. सच कहूं, जबजब मेरे बेटे का गांव से फोन आता है, तबतब मेरा तो यह फटा कलेजा सुनने से पहले ही मुंह को आ जाता है.
मेरा बेटा दिल्ली छोड़ कर जब से गांव गोद लेने गया है न, अपनी तो भूखप्यास सब खत्म हो गई है. दिनभर में चारचार बार फोन रीचार्ज कराना पड़ रहा है.
वाह रे बेटा, जवानी में ऐसे दिन भी तुझे देखने थे. अभी तो चुनाव होने में 5 साल हैं. पता नहीं, तब तक और क्याक्या दिन देखने पड़ेंगे.
बुरा हो इस सरकार का, जो मन में आए किए जा रही है. हम विपक्ष वालों तक के हाथों में कभी झाड़ू पकड़वा देती है, तो कभी फावड़ा. कल को न जाने क्या हाथ में पकड़वा दे.
अब देखो न, मेरे फूल से बेटे को गांव गोद लेना पड़ा. मैं ने उसे यह करते हुए बहुत समझाया कि बेटा, उन्हें लेने दे 4-4 गांव गोद. तेरे दिन तो अभी मां की गोद में बैठने के हैं. मैं तेरी जगह एक के बदले 2 गांव गोद ले लेती हूं, पर बेटा नहीं माना तो नहीं माना.
लाड़ला है, सो जिद्दी है. बड़ा भी हो गया है. पर मां के लिए तो बेटा कितना भी बड़ा क्यों न हो जाए, जब तक उस की शादी नहीं हो जाती, तब तक वह बच्चा ही रहता है.
अब सरकार को कोई कैसे समझाए कि उस के भी तो अभी गोद में बैठनेखेलने के दिन हैं. आज तक वह किसी न किसी की गोद में ही लोटता रहा. उसे आज तक हम ने गोद से उतारा ही कब? उस ने उतरना भी चाहा, तो हम ने उतरने न दिया.
उसे क्या पता कि किसी को गोद में कैसे बैठाते हैं? वह तो पड़ोसियों तक के बच्चों को गोद में लेने से मना करता है. डरता है कि कहीं उस पर किसी बच्चे ने शूशू कर दिया तो…
बेचारा, पता नहीं गोद में गांव ले कर कैसे रह रहा होगा? हाय रे यह जनसेवा, उसे तो ठीक से अभी गोद में बैठना भी नहीं आता और बेचारा वह.
अब जा कर कोई उन से पूछे कि कल तक जो मेरी गोद में रहा, उसे क्या आता है किसी को अपनी गोद में लेना? पर नहीं. वे सुनने वाले कहां. उन के तो आजकल कहने के दिन हैं और सुनने के अपने.
‘अरे, क्या हाल है बेटा? गांव में सब ठीक तो है?’
‘मांमां, फिर दिक्कत आ गई है.’
‘अब क्या दिक्कत आ गई मेरे फूल से लाल को?’
‘मां, गांव में बिजली नहीं है. यहां तो सरकारी मुलाजिम तो दिखते ही नहीं, पर सूरज भी अपनी मरजी का है. बिजली वालों ने बस बिजली की तारें ही पेड़ों से बांध रखी हैं और उन पर गांव वाले अपने कपड़े सूखने के लिए डालते हैं.
‘गांव में पानी के लिए पाइप तो है, पर उन में पानी नहीं आता. गांव वाले उन में गागरों से पानी डाल कर फिर नल से भरते हैं.’
‘यह गागर कैसी होती है बेटा?’
‘मां, मेरे पास उसे समझाने के लिए शब्द नहीं हैं. मैं मोबाइल पर फोटो भेज दूंगा, तो किसी से पूछ लेना. पर इस अंधेरे का क्या करूं मां?
‘यहां तो रात को तो अंधेरा रहता ही है, पर दिन में भी अंधेरा ही रहता है. आप के बिना बहुत डर लग रहा है. मन कर रहा है कि गांव किसी और की गोद में बैठा कर दिल्ली आ जाऊं.
‘बस, मुझे नहीं बनना अब कुछ… ऐसा नहीं हो सकता मां कि हम मोदी अंकल की दिल्ली वाली गली ही गोद ले लें? यहां तो कोई मेरी गोद में आ कर शूशू कर देता है, तो कोई…’
‘चिंता मत कर मेरे लाल. कुरिअर से अभी हगीज भिजवा रही हूं. हर पैकेट के साथ 10 रुपए का मोबाइल रीचार्ज फ्री.’
‘पर मां, क्या करना फ्री रीचार्ज का. यहां तो मोबाइल सिगनल पेड़ की चोटी पर चढ़ कर ही आता है. वहीं से चढ़ कर आप को फोन किया है मां. अब हम से यह गांव और नहीं. सहा जाता. हम बस अभी बैलगाड़ी से…’
इस बार 10वीं व 12वीं परीक्षाओं के अलगअलग परीक्षा बोर्डों के परिणाम लगभग एकसाथ आए और 99.3 से 99.6 फीसदी तक अंक पाने वाले ही फर्स्ट रैंक पा सके. अधिक आश्चर्य की बात यह रही कि ज्यादातर बोर्डों की परीक्षाओं में लड़कियों को ही पहला रैंक मिला. एक और बात जो सामने आई, वह यह कि अब गरीब घरों के बच्चे बहुत अच्छे नंबर ला रहे हैं. अंगरेजी मीडियम स्कूलों के बोर्डों में भी जो मैरिट लिस्ट में आए हैं उन में लड़कियां और साधारण पैसे वाले परिवारों के बच्चे हैं जबकि बेहद अमीर घरानों के बच्चे लाख कोचिंग के बावजूद रैंकों में नहीं दिखे.
मध्य प्रदेश के सरकारी स्कूलों वाले परीक्षा बोर्ड ने अपने परिणाम इस बार जाति के आधार पर बांट कर घोषित किए. पर इस से यह साफ हुआ कि अब अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति व अन्य पिछड़े वर्ग के बच्चों के भी जम कर नंबर आए और उन की संख्या सामान्य वर्ग के छात्रों के फर्स्ट डिविजन पाने वालों से कहीं ज्यादा है.
रैंक, लड़कियां और गरीब घरों के बच्चों की शिक्षा के प्रति दिलचस्पी देखते हुए साफ है कि अगले 5-7 वर्षों में लाखों नहीं, करोड़ों फर्स्ट डिविजन लाने वाले विद्यार्थी नौकरियों के लिए कतार में खड़े होंगे. वे आरक्षण के हकदार हों या न हों, उन की ऐबिलिटी व कैपेबिलिटी बराबर की सी होगी. सरकार के लिए यह चैलेंज होगा कि वह उन्हें जौब्स दे. उन की मेहनत का फल उन्हें मिलना चाहिए. पर सरकार की जो नीतियां हैं, उन के मद्देनजर उन युवाओं को न तो नौकरियां मिल पाएंगी और न उन्हें अपने काम शुरू करने के मौके. बस, वे ईकौमर्स कंपनियों का माल पीठ पर लादे घरघर पहुंचाते नजर आएंगे.
सरकार की लचर नीतियां पढ़ाई का ऐसा नुकसान करने वाली हैं कि देश किसी केऔस में डूब जाए तो सरप्राइज न होगा. आगे की गुफा में अंधेरा है और अंधेरे के आगे रोशनी नहीं, यह साफ लग रहा है.