परिवार में सबसे ज्यादा चर्चित हैं तैमूर : शर्मिला टैगोर

मीडिया के कैमरावालों की जान और शायद आजकल सबसे फेमस खान तैमूर को लेकर जब भी कोई तस्वीर या खबर आती है तो लोगों की दिलचस्पी उसमें जरूर होती है क्योंकि इस सुपर क्यूट किड का चार्म जन्म से लेकर अब तक कम नहीं हुआ है.

पिता सैफ अली खान और मां करीना सहित कपूर परिवार के कई सदस्य पहले ही इस बात को कह चुके हैं कि वर्तमान में अगर उनके परिवार में कोई सबसे अधिक लोकप्रिय है तो वो हैं तैमूर. पिता सैफ तो यहां तक कह चुके हैं कि आजकल तो लोग जब घर आते हैं तो हमसे बिना मिले सिर्फ तैमूर के साथ तस्वीर खिंचवा कर लौट जाते हैं. दादी शर्मीला टैगोर तो तैमूर पर कुछ ज़्यादा ही प्यार लुटातीं हैं.

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हाल ही में कोलकाता में हुए एक इवेंट के दौरान शर्मीला ने इस बात को स्वीकार किया कि तैमूर तो उनसे भी ज्यादा लाइमलाईट में रहता है. आजकल सारी सुर्खियां वही बटोर ले जाता है. वो मुझसे भी फेमस हो गया है. हालांकि इस दौरान उन्होंने मीडिया को भी आड़े हाथों लेते हुए कहा कि ऐसा लगता है कि उसे इस तरह से तवज्जो दी जा रही है मानो वो पहले ही स्टार बन चुका है. करीना और सैफ इन दिनों लंदन में छुट्टियां मना रहे हैं. हाल में वहां से तैमूर का एक वीडियो काफी चर्चित हुआ था जहां वो एक गार्डन में खिलौनों के साथ खेल रहे हैं. और बाद में चिड़ियाघर में भी गए.

कुछ दिनों पहले तैमूर को प्री-स्कूल में डाला गया है और वहां भी उनका जलवा बना हुआ है. पिछले दिनों तैमूर के मामा रणबीर कपूर ने बताया था कि ‘जब मैं उसे हाथों में लेता हूं तो मैं खुद भी उसे देख कर सोचने लगता हूं कि ये क्या चीज हैं. ये इस दुनिया का तो हो ही नहीं सकता. क्यूटनेस का ओवरलोड है. रणबीर ने अपनी बातचीत में यह भी कहा कि मैं तो खुद को प्रीवलेज मानता हूं कि मुझे तैमूर को गोद में लेने का सुख प्राप्त है.

रणबीर ने यह भी स्वीकारा कि वह तैमूर की तस्वीरें जो कि वायरल होती रहती हैं वह उन्हें खूब स्टौक करते रहते हैं. रणबीर कहते हैं कि हाल ही में जब तैमूर ने हेयर कट किया था. तब भी वह उसे देख कर दीवाने हो गये थे. वह कहते हैं कि उन्हें काफी अच्छा लगता तैमूर को देख कर.

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इस भोजपुरी फिल्म में अलग अंदाज में नजर आईं स्वेता यादव

महिलाओं के सशक्तिकरण पर आधारित अभिनेत्री स्वेता यादव की भोजपुरी फिल्‍म ‘मोहब्बत के सौगात’ बिहार में रिलीज हो चुकी है और इसके शो हाउसफुल चल रहे हैं. खासकर मुजफ्फरपुर में ‘मोहब्बत के सौगात’ को दर्शकों ने हाथों हाथ लिया है और फिल्‍म को बेहतरीन बताया है. पल्लवी प्रकाश इंटरनेशनल के बैनर तले बनी भोजपुरी फिल्म ‘मोहब्बत के सौगात’ में स्‍त्री संघर्ष की दास्‍तान के अलावा मनोरंजन के सभी आयाम हैं, जो दर्शकों को फिल्‍म से बांधती है.

खूब पसंद किया गया था ट्रेलर

इसके डायलौग, संवाद, एक्शन और नृत्‍य भी कथानाक के हिसाब से बेहद उम्‍दा हैं. फिल्म ‘मोहब्बत के सौगात’ के ट्रेलर को भी खूब पसंद किया गया था, जिसके बाद निर्माता पल्लवी प्रकाश और निर्देशक ब्रज भूषण की फिल्‍म से उम्‍मीदें और बढ़ गई थी. वहीं, फिल्‍म को मिल रहे रेस्‍पांस और ट्रेड पंडितों के आकलन के बाद स्वेता यादव ने कहा, ‘फिल्‍म वीमेन इंपावरमेंट बेस्‍ड है.

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समाज में किस तरह औरतों को दबा कर रखा जाता है और किस प्रकार उनका हक उन्हें नहीं दिया जाता. यह इस फिल्म में बखूबी दर्शाया गया है. यही वजह है कि आज फिल्‍म की मजबूत स्‍टोरी और दिल को छू लेने वाले संवाद लोगों को पसंद आ रहे हैं. मैं सभी को धन्‍यवाद कहना चाहूंगी कि उन्‍हें ये फिल्‍म पसंद आ रही है. खासकर मेरे किरदार को जिस तरह से लोगों ने प्‍यार दिया है, वो मेरे लिए काफी अहम है. मैंने फिल्‍म के लिए काफी मेहनत की थी, जिस पर आज दर्शकों का मुहर लगा है.’

उन्होंने कहा, ‘ये मेरे लिए बेहद खुशी की बात है. फिल्‍म के लिए मैं निर्माता पल्लवी प्रकाश और निर्देशक ब्रज भूषण के साथ–साथ पूरे भोजपुरी समाज का आभार व्‍यक्‍त करना चाहती हूं.’  गौरतलब है कि फिल्‍म ‘मोहब्बत के सौगात’ के मुख्य कलाकारों में आदित्य मोहन और स्वेता यादव के अलावा उदय श्रीवास्तव, स्मिता दुबे जैसे जाने -माने चेहरे नजर आ रहे हैं. फिल्म का प्रचार प्रसार संजय भूषण पटियाला हैं. इस फिल्म के सभी गाने मनोरंजक और बेहतरीन हैं, जिसमें संगीत छोटे बाबा, पंकज, प्रीतम और मनीष सिन्हा ने दिया है. गानों को नीलेश उपाध्याय, पुष्पलता, प्रियंका सिंह, खुशबू जैन और शेखर गोस्वामी ने आवाज दी है.

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ब्राजील में दिखी प्रियंका और निक के बीच शानदार लव केमेस्ट्री

बौलीवुड से हौलीवुड का सफर तय करने वाली अदाकारा प्रियंका चोपड़ा और निक जोनास ने भारत में कुछ समय साथ व्यतीत किया. भारत में बिताएं कुछ खास पल ने इनके रिश्ते को और भी खूबसूरत बना दिया और यही वजह है कि भारत आने के बाद दोनों के रिश्ते लगातार सुर्खियां बटोरते रहे. भारत में समय बिताने के बाद अब वे ब्राजील में हैं और वहां भी अपने रिश्तों को लेकर चर्चा में हैं.

ब्राजील में विलामिक्स फेस्टिवल में निक जोनास को परफौर्म करना था. इस मौके पर प्रियंका और निक के बीच जबरदस्त केमेस्ट्री एक बार फिर से दिखाई दी. दरअसल जब निक जोनास मंच पर परफौर्म कर रहे थे, उस समय दर्शक दीर्घा में बैठी प्रियंका चोपड़ा उनका मनोबल बढ़ा रही थीं. इस मौके पर प्रियंका के चेहरे पर प्रसन्नता के हाव-भाव स्पष्ट तौर पर देखें जा सकते हैं. वो इस मौके पर निक जोनास की परफौर्मेंस की अच्छी तस्वीरें लेने का भी प्रयत्न कर रही थीं. जब निक जोनास उनकी परफौर्मेंस में पूरी तरह से मग्न थे, तब बीच-बीच में प्रियंका चिल्लाकर भी निक जोनास को प्रोत्साहित कर रही थीं.

वैसे तो अमेरिका में विभिन्न इवेंट्स पर जब दोनों को साथ देखा गया था तब से ही यह चर्चा हो रही थी दोनों की बीच कुछ है. इसके बाद अमेरिका से जब निक और प्रियंका भारत पहुंचे तब भी दोनों को लेकर खूब चर्चा हुई. प्रियंका जब भारत आई तो मुंबई के एक रेस्त्रा में निक को लेकर गई थीं. इसके बाद दोनों वेकेशन एंजौय करने गोवा भी गए थे. वहीं, मुंबई में हाल ही में मुकेश अंबानी के बेटे आकाश अंबानी की एंगेजमेंट की ग्रैंड पार्टी में भी दोनों खास तौर पर मौजूद थे. इसके बाद दोनों ब्राजील निकल गए.

दरअसल, प्रियंका जब गोवा में थी तब उन्होंने सोशल मीडिया पर एक तस्वीर शेयर की थी जिसमें प्रियंका के भाई और कथित बौयफ्रेंड निक जोनास नजर आ रहे थे. इसको शेयर करते हुए उन्होंने लिखा था माय फेवरेट मेन. खैर, अभी तक दोनों की तरफ से अफेयर को लेकर कुछ भी साफ तौर पर नहीं कहा गया है. लेकिन जिस तरह से इन दोनों की तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हुई हैं और कई दिनों से दोनों साथ हैं तो यह जरूर चर्चा है कि दोनों के बीच कुछ तो है.

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महाबोधि बम धमाका, 5 को मिली सजा

5 साल लग गए बोधगया के महाबोधि टैंपल पर हुए आतंकी हमले में शामिल आतंकवादियों को सजा मिलने में. इंडियन मुजाहिदीन के 5 आतंकवादियों को एनआईए यानी नैशनल इंवैस्टिगेशन एजेंसी की स्पैशल कोर्ट ने 1 जून, 2018 को सजा सुनाई.

पांचों को यूएपीए ऐक्ट की 4 धाराओं के तहत 4 बार उम्रकैद की सजा दी गई है. इस के साथ ही हत्या की कोशिश के लिए 10-10 साल की सजा भी सुनाई गई है. सभी सजाएं साथसाथ चलेंगी.

इस के अलावा हैदर अली को 60,000 रुपए, इम्तियाज और मुजीबुल्लाह को 50,000-50,000 रुपए और उमर सिद्दीकी और अजहरुद्दीन को 40,000-40,000 रुपए का जुर्माना भी भरना होगा.

पुलिस और जांच एजेंसी को आतंकवादियों ने बताया कि उन का समूचा बोधगया टैंपल उड़ाने का प्लान था. लोकल गैस सिलैंडर में बम बनाया गया था जो दबाव की वजह से उस की पेंदी पहले ही निकल गई. अगर सिलैंडर की पेंदी मजबूत होती तो धमाके के बाद सिलैंडर के परखच्चे उड़ जाते और जानमाल का ज्यादा नुकसान होता.

12 जगहों पर बम लगाए गए थे जिन में से 9 बम ही फट सके थे. अगर सभी बमों की टाइमिंग और धमाका सही तरीके से होता तो महाबोधि टैंपल पूरी तरह से जमींदोज हो गया होता.

बम धमाका करने के लिए आतंकवादियों ने अमोनियम नाइट्रेट का इस्तेमाल किया था. धमाका क्रूड बम से किया गया था जो देशी बम की तरह ही होता है और इस की मारक क्षमता ज्यादा नहीं होती है. जो बम फटे, उन में पोटैशियम, सल्फेट, पोटाश, आर्सेनिक और छर्रों का इस्तेमाल किया गया था.

3 जिंदा बम मिले जिन में धमाका नहीं हो सका था. उन में आरडीएक्स था. अगर वे बम फटते तो काफी तबाही और नुकसान हो सकता था. खास बात यह है कि महाबोधि पेड़ के नीचे रखा सिलैंडर बम नहीं फटा था. उस बम के ऊपर ‘बुद्ध’ लिखा हुआ था.

एनआईए की स्पैशल कोर्ट ने महाबोधि टैंपल में हुए बम धमाके को आतंकी वारदात करार दिया था. झारखंड के रांची के रहने वाले हैदर अली उर्फ ब्लैक ब्यूटी, इम्तियाज अंसारी, मुजीबुल्लाह व छत्तीसगढ़ के रायपुर के रहने वाले उमर सिद्दीकी और अजहरुद्दीन कुरैशी को आतंकवाद निरोधक कानून, विस्फोटक अधिनियम, आतंकी फंडिंग, साजिश और आईपीसी की धारा 307 व 120-बी के तहत हत्या की कोशिश का मुजरिम करार दिया था.

एनआईए के वकील ललन प्रसाद सिन्हा ने कोर्ट को बताया कि सभी आरोपियों ने रोहिंग्या मुसलिमों पर म्यांमार में हो रहे हमलों का बदला लेने के लिए महाबोधि टैंपल में बम धमाका किया था.

इस मामले में 90 गवाह कोर्ट में पेश किए गए थे जिन में से 12 प्रोटैक्टेड विटनैस (पहचान उजागर नहीं किए जाने वाले गवाह) थे.

गौरतलब है कि महाबोधि टैंपल के हमले के बाद 27 अक्तूबर, 2018 को पटना के गांधी मैदान में भारतीय जनता पार्टी की ‘हुंकार रैली’ के दौरान कई इलाकों में बम धमाके किए गए थे.

बोधगया बम धमाके का आरोपी इम्तियाज अंसारी पटना जंक्शन के शौचालय में हुए बम धमाके का भी आरोपी है. उस धमाके में अंसारी जख्मी हो गया था और उस के साथी आतंकी ऐनुल की मौत हो गई थी. जख्मी अंसारी पुलिस के हत्थे चढ़ गया था और उसी ने पुलिस को बताया था कि बोधगया बम धमाके में कौनकौन शामिल था.

इंडियन मुजाहिदीन के आतंकवादी हैदर अली ने ही महाबोधि टैंपल में बम रखा था. पार्क की तरफ से वह टैंपल में घुसा था और 4 जगहों पर बम प्लांट कर उसी रास्ते से वापस निकल गया था. उस ने बौद्ध भिक्षु वाले कपड़े पहन रखे थे.

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धमाके से पहले हैदर ने 3 बार बोधगया की रेकी की थी. 6 जुलाई, 2013 की रात वह 5 आतंकवादियों के साथ बोधगया पहुंचा था. उस पर किसी को शक न हो, इस वजह से उस ने अपने बाल और दाढ़ी को मुंड़वा लिया था.

धमाके के बाद महाबोधि टैंपल के कैंपस में एक बैग मिला था. उस में एक रूमाल, दूसरे कपड़े थे. उस का डीएनए टैस्ट कराया गया और उस का मिलान हैदर के पिता के डीएनए से किया गया था. उस के बाद ही बम धमाके में हैदर के शामिल होने के पुख्ता सुबूत मिले थे. रांची के डोरंडा इलाके का रहने वाला हैदर साल 2014 से पटना के बेऊर जेल में बंद है.

रांची के ओरमांझी थाने के चकला गांव का रहने वाला मुजीबुल्लाह भी साल 2014 से बेऊर जेल में बंद है. रांची के धुर्वा इलाके का रहने वाला इम्तियाज साल 2013 से बेऊर जेल में बंद है.

छत्तीसगढ़ के रायपुर का रहने वाला उमर साल 2013 से जेल में बंद है और उस के घर में बम धमाका करने की साजिश रची गई थी. उमर ने ही बम बनाने के लिए कैमिकल खरीदने में हैदर की मदद की थी. रायपुर के क्रिसैंट मैडिकल से 3 शीशी कैमिकल और 2 पैकेट अमोनियम नाइट्रेट को 3,000 रुपए में खरीदा गया था. इन सब को ले कर हैदर रांची चला गया था. रायपुर का ही रहने वाला अजहर कुरैशी भी साल 2013 से जेल में बंद है.

एनआईए की चार्जशीट में कहा गया है कि बोधगया में बम धमाका कराने की साजिश पाकिस्तान में रची गई थी. साजिश का मास्टरमाइंड पाकिस्तान में बैठा इंडियन मुजाहिदीन का रियाज भटकल था.

गौरतलब है कि 7 जुलाई, 2013 की सुबह समूची दुनिया को शांति का नारा देने वाला महाबोधि टैंपल एक के बाद एक बम धमाकों से थर्रा उठा था.

1500 साल पुराने इस टैंपल के भीतर और उस के आसपास 9 सिलसिलेवार बम धमाके हुए थे. सुबहसुबह 5 बज कर 40 मिनट से 5 बज कर 56 मिनट के बीच 9 बम धमाके. उस धमाके ने भारत समेत चीन, जापान, श्रीलंका, थाईलैंड जैसे बौद्ध देशों में हलचल मचा दी थी. उन देशों से हर साल लाखों सैलानी बोधगया आते हैं और महाबोधि टैंपल हमेशा सैलानियों से भरा रहता है.

धमाके के बाद टूरिस्ट और टैंपल की हिफाजत को ले कर कई सवाल खड़े किए गए. पहले तो बिहार सरकार ने केंद्र सरकार पर आरोप मढ़ते हुए अपना पल्ला झाड़ने की पूरी कोशिश की, लेकिन महाबोधि टैंपल ऐक्ट 1949 में साफ कहा गया है कि मंदिर परिसर की हिफाजत की जवाबदेही बिहार सरकार की है. यह पूरी तरह से बिहार सरकार के अधीन है. टैंपल की सिक्योरिटी, मैनेजमैंट और सलाहकार काउंसिल से जुड़े सभी फैसले लेने का अधिकार राज्य सरकार को ही है.

26 अक्तूबर, 2012 को जब दिल्ली पुलिस ने इंडियन मुजाहिदीन के आतंकवादी सैयद मकबूल को दबोचा था तो उस ने पूछताछ के दौरान उगला था कि बिहार का महाबोधि टैंपल आतंकवादियों के निशाने पर है.

1 अगस्त, 2012 को पुणे के जरमन बैस्ट बेकरी के धमाके का आरोपी मकबूल ने पुलिस को बताया था कि महाबोधि पर हमले की रेकी भी की जा चुकी है.

दिल्ली पुलिस के तब के कमिश्नर नीरज कुमार ने इस बारे में बिहार सरकार को ताकीद कर दी थी. इस के बाद भी बिहार सरकार ने सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम नहीं किए. जिस समय वहां धमाका हुआ उस समय पुलिस का एक भी जवान तैनात नहीं था. कुछ प्राइवेट सिक्योरिटी गार्ड थे जो धमाके की आवाज सुनते ही भाग खड़े हुए थे.

इतना ही नहीं, टैंपल कैंपस के चप्पेचप्पे पर निगाह रखने के लिए 16 सीसीटीवी कैमरे लगाए गए थे जिन में से 10 खराब थे. इस का जवाब देने के लिए कोई आज भी तैयार नहीं है.

गया शहर से 15 किलोमीटर दूर निरंजन नदी के किनारे बसा बोधगया छोटा सा कसबा है. गौतम बुद्ध को यहीं ज्ञान मिला था. यह बौद्धों की मशहूर जगह है. महाबोधि परिसर में आज भी सीना ताने वह पीपल का पेड़ खड़ा है, जिस के नीचे बैठ कर गौतम बुद्ध को ज्ञान हासिल हुआ था. इस के आसपास कई तिब्बती मठ हैं. जापान, चीन, श्रीलंका, थाईलैंड और म्यांमार देशों की मदद से यहां कई भवन बनाए गए हैं.

हर साल 7-8 लाख सैलानी बोधगया आते हैं, जिन में से ज्यादातर चीन, जापान, श्रीलंका, थाईलैंड के सैलानी होते हैं.

आतंकवादियों का सेफ जोन बना बिहार इंटैलिजैंस ब्यूरो के सूत्रों के मुताबिक, उत्तर बिहार के बौर्डर वाले जिलों को आतंकी संगठन अपने सेफ जोन के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं. वे लोकल बेरोजगार नौजवानों को कई तरह का लालच दे कर संगठन में बहाल करते रहे हैं.

नेपाल की सरहद से लगे पूर्वी चंपारण, पश्चिमी पंचारण, मुधबनी, दरभंगा, सुपौल, सीतामढ़ी, अररिया और बंगलादेश की सरहद से सटे किशनगंज, कटिहार और पूर्णिया जिले आतंकवादियों के महफूज ठिकाने बने हुए हैं. नेपाल और बंगलादेश के रास्ते आतंकवादी आसानी से भारत की सरहद में घुस कर खतरनाक साजिशें बनाते हैं और उन में लोकल लड़कों को शामिल करते हैं.

आईबी के एक आला अफसर का मानना है कि आतंकवाद की अहम वजह गरीबी है. गरीबों को पैसों का लालच दे कर आतंकी संगठन आसानी से अपना उल्लू सीधा करते रहते हैं.

भारत और नेपाल के बीच खुली सरहद होने से आतंकवादी आसानी से बिहार आ जाते हैं और अपने मनसूबों को कामयाब बनाने की साजिश रचते हैं. बेरोजगार नौजवानों को यह समझना होगा कि थोड़े से पैसे का लालच दे कर आतंकी उन की जिंदगी बरबाद कर रहे हैं और देश को भी नुकसान पहुंचा रहे हैं.

लश्कर ए तैयबा का नेपाल प्रमुख और मुख्य खजांची मोहम्मद उमर मदनी बिहार के मधुबनी जिले का रहने वाला है. उस ने जिले के कई नौजवानों को अपने आतंकी संगठन से जोड़ा था.

मुंबई की लोकल टे्रनों में सिलसिलेवार बम धमाके कराने के मामले का आरोपी मोहम्मद कमाल भी मधुबनी जिले के बासोपट्टी गांव का रहने वाला है. पाकिस्तान में मुखबिरी करने के मामले में चंडीगढ़ पुलिस ने मोहम्मद जाकिर को दबोचा था. उस ने अपने मोबाइल फोन से सैकड़ों बार पाकिस्तान और नेपाल बात की थी. आईएसआई से उस के तार जुड़े होने के मामले में पड़ताल चल रही है. तालिबान से रिश्ता रखने के आरोपी मिर्जा खान को साल 2010 में पूर्णिया में दबोचा गया था.

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भारत नेपाल बौर्डर : जारी है लड़कियों की खरीदफरोख्त

भारत नेपाल बौर्डर के लौकहा बीओपी इलाके से 24 मई, 2018 को सीमा सुरक्षा बल के जवानों ने 8 नेपाली नागरिकों को हिरासत में लिया तो एक बार फिर बौर्डर इलाके में मानव तस्करी का भंडाफोड़ हुआ. इन में 2 नौजवान दोनों देशों के बौर्डर की हिफाजत में लगे सुरक्षा बलों की आंखों में धूल झोंक कर अपने साथ 6 नेपाली लड़कियों को ले कर भारत की सरहद में घुस गए थे.

भारतीय इलाके में घुसने के बाद वे सभी तेजी से बसस्टैंड की ओर बढ़ रहे थे कि उसी समय कुछ लोगों को उन के हावभाव पर शक हुआ. सीमा सुरक्षा बल को इस की जानकारी दी गई और उन लोगों को दबोच लिया गया.

उन दोनों नौजवानों से पूछताछ के बाद खुलासा हुआ कि वे मानव तस्करों के एक गैंग के लिए काम करते हैं और 6 नेपाली लड़कियों को दिल्ली पहुंचाने की जिम्मेदारी उन्हें मिली थी. इस के लिए उन्हें 2 लाख रुपए मिलने वाले थे.

इस वारदात ने बौर्डर पर चाकचौबंद निगरानी का दावा करने वाले सुरक्षा बलों की भी पोल खोल दी.

सीमा सुरक्षा बल की 18वीं बटालियन के कमांडैंट अजय कुमार ने बताया कि दोपहर के तकरीबन डेढ़ बजे 8 लोग भारत की सरहद में दाखिल हुए और सभी लौकहा बसस्टैंड की ओर बढ़ने लगे. उसी समय सीमा सुरक्षा बल को सूचना मिली थी कि उन में से 2 नौजवान मानव तस्करी गिरोह के लिए काम करते हैं. तुरंत ही उन सभी को गिरफ्तार कर लिया गया.

सख्ती से पूछताछ के बाद उन दोनों नौजवानों ने कबूल किया कि वे मानव तस्करी के धंधे में लगे हुए हैं. वे 6 लड़कियों को दिल्ली ले जा रहे थे. ये सभी लड़कियां नेपाल की राजधानी काठमांडू के सिंधुपाल चौक की रहने वाली हैं.

गिरफ्तार नौजवानों में से एक का नाम परमानंद चौधरी है और वह नेपाल के सप्तरी जिले के कनकपुरा गांव का रहने वाला है. दूसरे नौजवान का नाम दिनेश राम है और वह सप्तरी जिले के ही लक्ष्मीपुर गांव का रहने वाला है.

सीमा सुरक्षा बल के अफसर बताते हैं कि साल 2015 में नेपाल में आए भूकंप के बाद से वहां लड़कियों की तस्करी में काफी तेजी आई है. इस पर काबू पाना इसलिए मुश्किल हो गया है कि ज्यादातर लड़कियों के मांबाप की मरजी से ही उन्हें बेचा जा रहा है.

मानव तस्करी में लगे लोग लड़कियों के मांबाप, भाई वगैरह को बहलाफुसला कर इस बात के लिए राजी कर लेते हैं कि वे ही अपनी बेटियों को बौर्डर पार करा दें. इस के लिए उन्हें अलग से कुछ और पैसे दे दिए जाते हैं. इस से जहां एक ओर तस्करों का काम आसान हो जाता है, वहीं दूसरी ओर बौर्डर पर तैनात सुरक्षा बलों को शक नहीं हो पाता है.

अगर सीमा सुरक्षा बल शक के आधार पर किसी से पूछताछ करता है तो लोग बता देते हैं कि वे अपनी बेटी को ले कर कुछ काम से भारत जा रहे हैं. लड़की भी कबूल करती है कि उस के साथ उस का पिता, भाई या चाचा है.

लड़की को उस के घर से लेने के बाद एजेंट लड़की को बौर्डर पार करने में मदद पहुंचाने वालों के हाथों में 10,000 से 12,000 तक रुपए थमा देते हैं.

भारत और नेपाल के बीच 1751 किलोमीटर का खुला बौर्डर है और दोनों देशों के लोग बेरोकटोक इधर से उधर आतेजाते रहते हैं.

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नेपालभारत की सरहद पर पिछले 12 सालों से ‘कैरियर’ (तस्करों के सामान को आरपार करने वाले को नेपाल में कैरियर कहा जाता है) का काम कर रहे एक नेपाली ने बताया कि वह पिछले 7-8 सालों से तस्करों के सामान को आरपार पहुंचाने का काम कर रहा है और कभी भी पकड़ा नहीं गया है. ऐसे लोगों को गांजा, अफीम, हेरोइन, विदेशी सामान समेत लड़कियों और बच्चों को इधरउधर पहुंचाने का काम सौंपा जाता है. इस के बदले में तस्कर उन्हें मोटी रकम देते हैं. साथ ही, वे पुलिस और कस्टम वालों से भी बचाते हैं.

भारतनेपाल बौर्डर पर मानव तस्करी की रोकथाम का काम करने वाली एक एनजीओ ‘भूमिका विहार’ की डायरैक्टर शिल्पी सिंह बताती हैं कि मानव तस्करी के मामले में बिहार का सरहदी इलाका ट्रांजिट पौइंट बन चुका है.

इस संगठन की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले 5 सालों में 519 बच्चे गायब हुए हैं, जिन में ज्यादातर लड़कियां थीं. शादी और नौकरी का लालच दे कर लड़कियों की तस्करी की जाती है. बच्चों को गायब करने के बाद उन्हें वेश्यालयों में पहुंचा कर देह धंधे के दलदल में धकेल दिया जाता है.

दोनों देशों के लोगों को आनेजाने के लिए पासपोर्ट, वीजा वगैरह की जरूरत नहीं पड़ती है. सीमा सुरक्षा बलों का मानना है कि सिक्योरिटी के लिए दोनों देशों के बीच कुल 26 चौकियां बनी हुई हैं और रोजाना तकरीबन 15,000 लोग आरपार होते हैं.

पिछले कुछ समय से यह देखा गया है कि मानव तस्करों ने अपने काम को आसान बनाने के लिए 14-15 साल के बच्चों तक को भी तस्करी के धंधे में झोंक रखा है. बच्चेबच्चियों को कुछ लालच दे कर बौर्डर पार करने के लिए कहा जाता है और वे हंसतेखेलते बौर्डर पार कर जाते हैं.

दिक्कत यह है कि खुला बौर्डर होने की वजह से दोनों देशों के लोगों के इधरउधर आनेजाने का कोई रिकौर्ड भी नहीं रखा जाता है. इस से यह पता करना मुश्किल हो जाता है कि किस देश से कितने लोगों ने बौर्डर पार किया और कितने वापस लौटे.

मानव तस्कर लड़कियों को बौर्डर पार कराने के बाद पटना लाते हैं और उस के बाद रेलगाड़ी से उन्हें दिल्ली, मुंबई, गोवा, पुणे वगैरह बड़े शहरों में ले जाते हैं.

पिछले साल पटना में 15 साल की मासूम नेपाली लड़की ने मानव तस्करों के चंगुल से भाग कर पुलिस को जो कहानी सुनाई, उस से पुलिस वालों के भी होश उड़ गए थे.

वह लड़की नेपाल के रौतहट जिले की रहने वाली थी. उस ने बताया कि वह अपने स्कूल में ही पढ़ने वाले किशन नाम के लड़के से प्यार करती थी और उस से ब्याह रचाना चाहती थी.

किशन भी उस से शादी करने को तैयार था. किशन ने उसे समझाया कि उन के घर वाले उन की शादी नहीं होने देंगे, इसलिए घर से भाग कर ही शादी की जा सकती है.

उस लड़की पर मुहब्बत का भूत इस कदर हावी था कि वह बगैर कुछ सोचेसमझे किशन के साथ भाग कर पटना आ गई. किशन का असली चेहरा तब सामने आया, जब पटना पहुंचते ही उस का रंग ही बदल गया.

लड़की ने पुलिस को बताया कि वह किशन से रोज कहती कि जल्दी शादी करें, पर वह 30-35 दिनों तक टालता रहा. उस के बाद तो जब भी वह शादी की बात कहती तो वह भड़क जाता.

उस के बाद किशन उस से गंदेगंदे काम करने के लिए कहता था. कुछ दिनों के बाद वह अपने साथ 2-4 लड़कों को ले कर आने लगा. वे उस के साथ छेड़छाड़ करने लगे.

लड़की किशन को अपनी मुहब्बत की दुहाई देती तो वह उसे पीटने लगता था. वह चुपचाप किशन की बातों को मानने के लिए मजबूर थी. लेकिन एक दिन मौका मिलते ही वह वहां से भाग निकली.

पुलिस सूत्रों के मुताबिक, मानव तस्करों ने अपने धंधे में तेजी लाने के लिए कई दलालों को भी लगा रखा है. दलाल लोकल लोग ही होते हैं, जिस से वे आमतौर पर गरीब बच्चों के मांबाप को यह समझाने में कामयाब हो जाते हैं कि उन के बच्चों को मुंबई, दिल्ली, कोलकाता, पटना जैसे बड़े शहरों में नौकरी लगवा देंगे या ऊंची पढ़ाई का इंतजाम करवा देंगे. इस से अच्छा पैसा मिलेगा. गरीबी में सिर से पैर तक डूबे गरीब लोग अपने बच्चों की बेहतरी के लिए दलालों के चंगुल में फंस जाते हैं.

कस्टम अफसर आरके सिंह कहते हैं कि तस्कर पढ़ाई, खाना और बेहतर जिंदगी देने का वादा करते हैं. नेपाल में भूकंप और गरीबी की दोहरी मार झेल रहे मांबाप आसानी से दलालों के झांसे में फंस जाते हैं. बेटी को बेहतर जिंदगी देने और कुछ रुपयों के चक्कर में उस की जिंदगी को बदतर बना रहे हैं. उस के बाद कभी भी न तो वह अपनी बेटी से बात कर पाते हैं और न ही कभी बेटी वापस लौट कर आती है.

वे दलालों के सामने रोतेगिड़गिड़ाते रहते हैं कि कम से कम बेटी से बात तो करा दें, पर दलाल उन्हें टका सा जवाब देते हैं कि बेटी सही जगह पर है और अच्छी जिंदगी जी रही है. किसी तरह की टैंशन न लें.

पुलिस सूत्रों के मुताबिक, वेश्यालयों के साथ ही डांस गर्ल, बार गर्ल और मसाज गर्ल के रूप में भी नेपाली लड़कियों को आसानी से खपाया जाता है. पटना, मुजफ्फरपुर, रांची, कोलकाता वगैरह शहरों के कई मसाज पार्लरों में नेपाली लड़कियां काम करती हुई आसानी से दिख जाती हैं.

भारत में सैक्स का यह कारोबार तकरीबन 4 लाख करोड़ रुपए का है. दिल्ली के जीबी रोड, कोलकाता के सोनागाछी, मुंबई के कमाठीपुरा, पुणे के पेठ, इलाहाबाद के मीरगंज, बनारस के शिवदासपुर, मुजफ्फरपुर के चतुर्भुज स्थान, मुंगेर के श्रवण बाजार आदि रेड लाइट इलाकों में पिछले 3-4 महीने के दौरान नेपाली लड़कियों की तादाद तेजी से बढ़ी है.

पिछले साल पुणे, महाराष्ट्र के पेठ इलाके में छापामारी कर पुलिस ने तकरीबन 700 नेपाली लड़कियों को बरामद किया था. इस के बाद भी भारत सरकार लड़कियों की तस्करी को रोकने के नाम पर केवल दावे और वादे ही करती रही है.

बिहार के किशनगंज, कटिहार, अररिया और पूर्णिया जिलों के जरीए नेपाल से मानव तस्करी का धंधा फलफूल रहा है. ज्यादातर बच्चे गरीब और अनपढ़ परिवारों के ही गायब होते हैं. ऐसे बच्चों के मांबाप अपने बच्चे के गायब होने की शिकायत पुलिस थानों में दर्ज करने से घबराते हैं. उधर पुलिस महकमा भी मानव तस्करी को ले कर लापरवाह बना हुआ है.

संयुक्त राष्ट्र संघ की पिछले साल  की रिपोर्ट साफतौर पर बता देती है कि नेपाल में किस कदर गरीबी है और भूकंप आने के बाद उस में कई गुना इजाफा हुआ है.

रिपोर्ट यह भी कहती है कि भूकंप आने के बाद नेपाल में लड़कियों को भेड़बकरियों की तरह बेचा जा रहा है. भूकंप राहत शिविरों में 15 लाख से ज्यादा लड़कियों को जानवरों की तरह ठूंसठूंस कर रखा गया है और उन की हिफाजत का कोई पुख्ता इंतजाम ही नहीं है.

तकरीबन 40,000-45,000 तो ऐसी लड़कियां हैं जिन के परिवार के सभी लोग भूकंप में मारे गए. उन के सिर पर किसी का साया नहीं है. कुछ रुपयों और दो वक्त की रोटी के लिए वे कुछ भी करगुजरने को तैयार हो जाती हैं. दलाल उन्हें नौकरी दिलाने के झांसे में आसानी से फंसा लेते हैं.

नेपाल और भारत के बौर्डर के आसपास सैकड़ों ट्रैवल एजेंसी, प्लेसमैंट एजेंसी और मैरिज ब्यूरो बेरोकटोक लड़कियों और मानव तस्करी के खेल में लगे हुए?हैं. लड़कियों की शादी कराने, नौकरी दिलाने, भारत में सैर कराने वगैरह का झांसा दे कर वे गरीब और भोलेभाले मांबाप को अपने जाल में फंसा लेते हैं.

नेपाल की राजधानी काठमांडू में तो इस तरह की सैकड़ों एजेंसी कुकुरमुत्तों की तरह उग चुकी हैं. उन पर लगाम लगाने का कोई इंतजाम नहीं है.

एजेंसी के दलाल गरीब मांबाप को समझाते हैं कि गरीबी की वजह से वे अपनी बेटी का ब्याह तो कर नहीं सकते हैं, ऐसे में मैरिज ब्यूरो के जरीए अच्छा लड़का मिल सकता है.

पोखरा का रहने वाला सुरेश दहाल बताता है कि उस की बेटी की शादी दिल्ली के किसी कारोबारी से कराने की बात कही गई थी. उस ने मैरिज ब्यूरो के एजेंट की बात मान ली.

गरीबी की वजह से वह अपनी बेटी रीना का ब्याह किसी अच्छे लड़के से नहीं कर सकता था, इसलिए वह अपनी बेटी को शादी के लिए दिल्ली भेजने के लिए मन मार कर तैयार हो गया.

सुरेश कहता?है, ‘‘जब एजेंट रीना को ले कर जाने लगा तो उस ने मेरे हाथ में 2,000 रुपए थमाए थे. उसी समय मेरा माथा ठनका था कि उस ने 2,000 रुपए क्यों दिए? कुछ रुपए तो हमें ही बेटी को देने चाहिए थे, पर उस समय कुछ कह नहीं सका.’’

सुरेश आगे बताता है कि उस की बेटी को घर से गए 2 साल से ज्यादा का समय हो गया है, लेकिन उस के ठौरठिकाने का कुछ भी पता नहीं है.

मैरिज ब्यूरो के लोगों से वह जब भी बेटी के बारे में पूछता है तो उसे यही जवाब मिलता है कि वह ससुराल में राज कर रही है और अगर वह अपने घर वालों से बात नहीं करती है तो इस में ब्यूरो क्या कर सकता है?

मोतिहारी सिविल कोर्ट के सीनियर वकील अभय कुमार बताते हैं कि नेपाल में लड़कियों को औनेपौने दामों पर खरीद कर उन्हें वेश्यालयों तक पहुंचाने वाले दलाल जम कर पैसा बना रहे हैं. नेपाली लड़कियां 1-2 हजार रुपए में भी बेच दी जा रही हैं. कुछ दिनों के लिए पेट की आग बुझाने के लिए गरीब मांबाप अपनी लाड़ली बेटियों को दरिंदों के हाथों बेच देते हैं.

वहीं तस्कर लड़कियों को दिल्ली, मुंबई या कोलकाता के देह बाजार में डेढ़ से ढाई लाख रुपए तक में बेच डालते हैं.

ज्यादातर नेपाली लड़कियों को वहां से सऊदी अरब, हौंगकौंग, जापान, कोरिया, अफ्रीका, मलयेशिया, थाईलैंड वगैरह दूसरे देशों में पहुंचा दिया जाता है. वहां लड़की के सारे दस्तावेजों को जब्त कर लिया जाता है, ताकि वह कहीं भाग नहीं सके. लड़की के सामने जिल्लत की जिंदगी जीने के अलावा और कोई चारा नहीं रह जाता है.

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लफड़े पे लफड़ा : शादी की दावत का बुलावा

मुद्दतों के बाद आज मुझे किसी शादी की दावत में शामिल होने का बुलावा आया था. मेरा मन बल्लियों उछलने लगा था.

मेरा खुश होना वाजिब था. एक तो बुलावा लड़के वालों की ओर से था. दूसरा, होने वाला दूल्हा रिश्ते में मेरा बड़ा भाई था. मैं ने सोचा, ‘वाह, अब कम से कम 3-4 दिन तो मौजमस्ती रहेगी. रंगबिरंगी मिठाइयों के अलावा तरहतरह का खाना खाने को मिलेगा.’

सफर पर जाने के खयाल से मैं ने सारे कपड़े और साथ ले जाने वाली दूसरी चीजों को अभी से ही सहेज लेना ठीक समझा, ताकि सुबह कोई परेशानी न हो.

सारी तैयारियां करने के बाद घड़ी पर नजर डाली, रात के 11 बज चुके थे. मुझे लगा कि अब सोना चाहिए. सुबह 4 बजे का अलार्म लगा दिया.

बिस्तर पर जाने के बाद सोने की मेरी सारी कोशिशें बेकार हो रही थीं. बारबार नजर घड़ी की ओर जा रही थी. आखिरी बार जब घड़ी की तरफ देखा था, तब 12 बज रहे थे. उस के बाद मैं कब सो गया, कुछ पता नहीं चला.

सुबह जब आंख खुली और नजर घड़ी की ओर गई तो मैं अवाक रह गया. घड़ी की सूइयां ठहरी हुई थीं. शायद बैटरी खत्म हो गई थी और घड़ी रात साढ़े 12 बजे बंद हो चुकी थी.

‘‘इस बेवफा बैटरी को भी आज ही खत्म होना था,’’ मैं झुंझलाया और लपक कर कलाई घड़ी उठाई. देखा, साढ़े 12 तो नहीं, लेकिन सुबह के 9 जरूर बज रहे थे.

मैं ने तेजी से सारे काम निबटाए. फिर भी एक घंटा लग गया. तैयार हो कर मैं बसस्टैंड की ओर लपक पड़ा.

वहां पहुंचने पर देखा कि बस खचाखच भरी हुई थी. पूछताछ करने पर पता चला कि अगली बस 3 घंटे बाद है. मुझे लगा कि किसी तरह इसी बस से चलना चाहिए, वरना बहुत देर हो जाएगी.

मैं फौरन बस की छत पर चढ़ कर सब से आगे बैठ गया. देखते ही देखते पूरी छत मुसाफिरों से भर गई.

बस चल पड़ी. मैं एक हाथ से अपना बैग और दूसरे से रेलिंग को मजबूती से थामे टूटीफूटी सड़क पर या यों कहें कि गड्ढों में बनी सड़क की बदहाली की तुलना खुद से कर रहा था.

हिचकोले खाती हुई आगे बढ़ रही बस के साथ कभी बाएं तो कभी दाएं लुढ़कतेलुढ़कते बड़ी मुश्किल से खुद को संभाल रहा था.

मेरा बुरा हाल देख कर मेरे ठीक पीछे बैठे एक मुसाफिर ने मुझ से पूछा, ‘‘पहली बार छत पर बैठे हैं क्या?’’

‘‘जी, बिलकुल. मैं पहली ही बार बस की छत पर बैठ कर सफर कर रहा हूं,’’ मैं ने जवाब दिया.

‘‘तभी तो आप इतना परेशान हैं. कुछ नहीं होगा. आप सोच रहे हैं न कि बस उलट जाएगी… तो ऐसा सोचना बिलकुल गलत है. अरे, बस उलट कर भी कहां जाएगी? देखते नहीं कि सड़क के दोनों तरफ पेड़ लगे हैं. उलटेगी भी तो पेड़ पर अटक जाएगी.’’

उस मुसाफिर की बातों को सुन कर मेरी घबराहट कुछ कम हुई थी.

थोड़ी देर चुप रहने के बाद उस आदमी ने फिर फरमाया, ‘‘यह बैग लाइए. इस को इधर बीच में रख देते हैं. तब आप दोनों हाथों से रेलिंग पकड़ कर आराम से बैठिएगा.’’

उस की बात मुझे जंच गई. मैं अभी पीछे मुड़ कर बैग उस के हाथों में थमा ही रहा था कि मेरे माथे पर कोई भारीभरकम चीज ‘खट’ से लगी.

मेरे मुंह से आह निकल गई. देखा, पेड़ की एक डाली सड़क की ओर कुछ ज्यादा ही झुकी हुई थी. वही मेरे सिर से टकराई थी.

जब मैं ने सिर का मुआयना किया, तो मालूम हुआ कि खून तो नहीं आ रहा था, मगर जिस हिस्से में चोट लगी थी, वह धीरेधीरे फूलती जा रही थी. दर्द तो जबरदस्त था, लेकिन इज्जत के मारे मैं चुप था.

एक हाथ से तो मैं अभी भी रेलिंग ही पकड़े हुए था, पर दूसरे हाथ में बैग की जगह मेरा माथा था.

बस अपनी रफ्तार से चलती जा रही थी. कुछ देर के बाद बस अचानक रुक गई. अपने ठिकाने तक पहुंचने के लिए मैं बेचैन हुआ जा रहा था.

बस से उतर कर बस का कंडक्टर चिल्लाया, ‘‘बस का एक टायर पंक्चर हो गया है. टायर बदलने में घंटाभर लगेगा.’’

कंडक्टर की बात सुन कर मेरा तो मानो दिल बैठ गया. मुसीबत की इस घड़ी में जो एक चीज मुझे तसल्ली दे रही थी, वह थी शादी में मौजमस्ती करने और ढेर सारी मिठाइयां खाने की उम्मीद.

मैं ने कहीं पढ़ रखा था कि जो चीज जितनी मुश्किल से मिलती है, वह उतनी ही मजेदार होती है.

लेकिन गड़बड़ यह थी कि मुसीबतें घटने के बजाय बढ़ती ही जा रही थीं. कड़ी धूप और बस वाले के ऐलान के बावजूद कोई भी अपनी जगह से टस से मस नहीं हो रहा था. सब को यही डर था कि धूप से राहत पाने के लिए वह छत के नीचे उतरे नहीं कि उस की जगह पर दूसरे का कब्जा हो जाएगा.

सब अपनीअपनी जगह पर इस तरह बैठे हुए थे मानो उन्होंने उन जगहों को खरीद रखा हो.

मैं ने नीचे देखा तो एक डिस्पैंसरी नजर आई. मेरे माथे का दर्द अभी भी कम नहीं हुआ था. मैं ने दवा ले लेना ही ठीक समझा. अपना बैग लेने के लिए जब मैं पीछे वाले सज्जन की ओर मुखातिब हुआ तो देखा कि वे बैग को शायद गद्दा समझ कर उस पर आराम से बैठे हुए थे.

मैं ने उन से कहा, ‘‘जरा मेरा बैग लाइएगा.’’

‘‘उतरना है क्या?’’ उन्होंने पूछा.

मैं ने कहा, ‘‘जी, उतरना तो नहीं है, लेकिन बैग लाइए न.’’

उन्होंने बिना कुछ कहे मुझे बैग थमा दिया. मैं ने बैग को अपनी जगह पर रखते हुए एक दूसरे मुसाफिर से कहा, ‘‘जरा, बैग को देखते रहिएगा. मैं दवा खरीदने नीचे जा रहा हूं.’’

मुझे बैग से कहीं ज्यादा फिक्र अपनी जगह की थी. बस से उतर कर मैं ने डिस्पैंसरी से कुछ दवाएं ले कर खाईं और फिर अपनी जगह पर आ कर बैठ गया.

अब तक घंटेभर से ज्यादा समय बीत चुका था. टायर बदल दिया गया था. बस वाले ने एक आवाज दे कर बस स्टार्ट कर दी.

बस चले अभी कोई घंटाभर ही बीता होगा कि मैं ने देखा सड़क पर कुछ ज्यादा ही भीड़ हो गई थी. मालूम हुआ कि सड़क पर जाम लगा है. मैं ने अपना माथा पीट लिया.

1-2 घंटे नहीं, बल्कि पूरे 4 घंटे तक बस जाम में फंसी रही. जाम खत्म हुआ तो बस फिर चल पड़ी.

आखिरकार रात करीब 9 बजे बस अपने ठिकाने पर पहुंची. 5 घंटे का सफर पूरे 10 घंटे में तय हुआ था.

मैं बैग थामे झट से नीचे उतरा और तेज कदमों से अपनी मंजिल की ओर चल पड़ा. वहां पहुंचने के बाद हाथमुंह धोया. मैं ने चेहरा पोंछने के खयाल से तौलिया निकालने के लिए जब बैग खोला तो हैरान रह गया.

बैग में रखे मेरे सारे कपड़े और बाकी सामान गायब थे. उन की जगह चिथड़े ठूंसे हुए थे.

मैं अपनी हालत पर रोंआसा हो गया था. अब मुझे पता लगा कि बस पर वह आदमी मेरे लिए इतनी हमदर्दी क्यों जता रहा था. इधर भूख के मारे मेरा भी बुरा हाल हो रहा था.

मैं ने एक आदमी से तौलिया मांग कर चेहरा पोंछा और दावत का लुत्फ उठाने चला गया.

मुझे लग रहा था कि मैं ने जितनी तकलीफ उठाई और घाटा सहा, उस की भरपाई ये मिठाइयां शायद ही कर सकें. उलटे, मिठाइयों से चिढ़ सी होने लगी थी मुझे.

खाना खाने के बाद दिनभर की थकावट की वजह से नींद आने लगी थी. एक मेजबान से सोने की जगह के बारे में पूछा तो उस ने टका सा जवाब दे दिया, ‘‘सोने की जगह कोई तय थोड़े ही है. जहां जगह मिले सो जाओ.’’

मैं अपने सोने का इंतजाम करने लगा, पर जहां भी बिछावन नजर आता, वहां मेहमान खर्राटे लेते दिखते. ढूंढ़तेढूंढ़ते एक बिस्तर पर मैं ने देखा कि 2 आदमियों के सोने की जगह पर केवल एक आदमी सोया हुआ था.

नजदीक गया तो देखा, उस का एक हाथ उस के जिस्म से ठीक 90 डिगरी का कोण बनाए हुए बिस्तर पर पड़ा था. मैं ने जैसे ही हाथ को खिसका कर सोने की कोशिश के लिए जगह बनाई तो उस की नींद टूट गई.

वह एकदम कड़क आवाज में बोला, ‘‘यह क्या कर रहे हैं?’’

मैं ने हिम्मत बटोरते हुए कहा, ‘‘जी, मैं अपने सोने के लिए जगह बना रहा हूं. इस बिस्तर पर 2 आदमी तो आराम से सो सकते हैं.’’

‘‘2 आदमी सो तो सकते हैं, लेकिन मेरा हाथ ऐसे नहीं रहेगा न,’’ कहते हुए उस ने अपने हाथ को फैला कर पहले जैसा कर लिया.

मैं सोचने लगा, ‘अब कुछ चालाकी करने पड़ेगी,’ तभी मैं ने देखा कि एक आदमी उठ कर बाथरूम की ओर जा रहा था. ज्यों ही वह आदमी गया, मैं ने एक जगह सोए हुए 2 बच्चों को उठा कर झट से उस आदमी की जगह पर सुला दिया और बच्चों की जगह पर खुद निढाल हो कर सो गया.

सुबह नींद खुलने पर सब से पहले मैं ने अपने कपड़ों पर नजर डाली. उन की बुरी हालत देख कर मुझे लगा कि उन्हें साफ किए बिना काम नहीं चल सकता. आखिर यही तो एकलौता जोड़ा है मेरे पास और इसे ही पहन कर बरात में भी जाना है.

इधर मैं इस सोचविचार में खोया था, उधर वह आदमी, जिस की जगह पर रात मैं ने बच्चों को सुलाया था, उन बच्चों को बुरी तरह डांट रहा था, ‘‘अबे गधो, रात को मेरी जगह पर क्यों सो गए थे?’’

मैं उधर से ध्यान हटा कर फिर कपड़ों के बारे में सोचने लगा. जब यह तय हो गया कि कपड़े धोने हैं, तब एक और समस्या सामने आ गई कि इस बीच मैं पहनूंगा क्या?

बहुत सोचनेविचारने के बाद एक सज्जन मुझे अपनी फटीपुरानी लुंगी देने को तैयार हुए. मैं ने मन मसोस कर लुंगी पहनी और कपड़े धो कर सूखने के लिए डाल दिए.

अब हालत यह थी कि एक ओर जहां सारे के सारे लोग चाहे वे मेजबान हों या मेहमान, एक से एक सूटबूट में नजर आ रहे थे, वहीं दूसरी ओर मैं लुंगीगंजी में किसी फटीचर की तरह  इधरउधर टहल रहा था. बारबार देख रहा था कि कपड़े सूखे हैं या नहीं.

आखिर वह समय भी आ ही गया, जब कपड़े पूरी तरह सूख चुके थे. मैं उन्हें हाथों में लिए खड़ाखड़ा सोच रहा था कि इन में इस्तरी की जाए या नहीं. उसी समय एक मेजबान ने मुझ से पूछा, ‘‘बरात में जाने की तैयारी पूरी हो गई क्या?’’

‘‘जी, करीबकरीब पूरी हो गई है. बस, इन कपड़ों पर जरा इस्तरी करना बाकी है,’’ मैं ने कहा.

मेरी बात सुन कर उन के चेहरे पर एक अजीब सी मुसकराहट उभर आई. मुझे लगा शायद बरात जाने में बहुत कम समय बचा है, इसलिए मुझे देख कर मुसकरा रहे हैं कि मैं अभी तक पूरी तरह तैयार नहीं हो सका हूं.

मैं ने कहा, ‘‘आप मुसकरा क्यों रहे हैं? बहुत जल्दबाजी है क्या? जल्दी है तो कहिए न, मैं बिना इस्तरी किए ही इन कपड़ों को पहन कर चला जाऊंगा.’’

उन्होंने बड़े इतमीनान से फरमाया, ‘‘जल्दबाजी कैसी बरखुरदार, अब बरात जाएगी ही नहीं.’’

‘‘क्या कहा आप ने? बरात नहीं जाएगी, मगर क्यों?’’ मैं हैरान था.

‘‘वह इसलिए कि अभीअभी लड़की वालों के यहां से खबर आई है कि लड़की की दादी इस दुनिया से विदा हो गई हैं, इसलिए शादी को फिलहाल रद्द कर दिया गया है,’’ कहते हुए उस ने एक जोरदार ठहाका लगाया.

उस आदमी की बात सुन कर पहले तो मुझे समझ ही नहीं आया कि मेरे लिए यह अच्छा हुआ कि बुरा, लेकिन बाद में मैं ने राहत की सांस ली.

मैं सोच रहा था, ‘शादी का रुकना औरों के लिए भले ही लफड़ा हो, लेकिन मेरे लिए यह लफड़ा कतई नहीं है.’

मैं खुश था कि अच्छा हुआ जो  ऐसा हो गया, वरना अभी तक जो हुआ था सो तो हुआ ही, आगे भी मेरे सामने कौनकौन से लफड़े आते, पता नहीं. उन आने वाले लफड़ों के चंगुल में फंसने से मैं बच गया था.

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लालू के लालों में छिड़ी जंग

तारीख 11 जून. समय दिन के साढ़े 11 बजे. राष्ट्रीय जनता दल के सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव के छोटे लाड़ले तेजस्वी यादव के सरकारी बंगले 5, देशरत्न रोड में अच्छीखासी चहलपहल थी.

हाल में एक बड़ा सा केक रखा हुआ था. वजन में 7 पौंड का. लालू प्रसाद यादव का 71वां जन्मदिन मनाने के लिए यह सारा इंतजाम किया गया था.

राजद के कार्यकर्ता ‘लालू यादव जिंदाबाद’ के नारे लगा रहे थे. बीमार होने की वजह से लालू प्रसाद यादव इस गहमागहमी से दूर राबड़ी देवी के सरकारी बंगले 10, सर्कुलर रोड में आराम कर रहे थे.

राबड़ी देवी अपने दोनों बेटों को ले कर मुसकराते हुए केक के पास पहुंचीं. तीनों ने साथ मिल कर केक काटा. तेजप्रताप और तेजस्वी ने एकदूसरे को केक खिला कर यह जताने की पुरजोर कोशिश की कि उन के बीच कोई तनाव या विवाद नहीं है.

पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष रामचंद्र पूर्वे से नाराज चल रहे तेजप्रताप यादव को राबड़ी देवी ने इशारा किया कि वह उन्हें भी केक खिलाए.

तेजप्रताप ने रामचंद्र पूर्वे को केक खिला कर यह दिखाने की कवायद की कि लालू परिवार और राजद के भीतर कोई तल्खी नहीं है.

लालू प्रसाद यादव के कुनबे में छिड़ी जंग के बीच उन के जन्मदिन के मौके पर राबड़ी देवी ने लोगों के बीच यह जताने की भी भरपूर कोशिश की कि तेजप्रताप साफ दिल का है और उस की नीयत खराब नहीं है.

तेजस्वी यादव ने सफाई देते हुए कहा कि तेजप्रताप उन के बड़े भाई हैं और उन के बीच कोई मतभेद हो ही नहीं सकता है. उन्होंने दावा किया कि कोई कितनी भी तिकड़म लड़ा ले, लालू का परिवार और राजद टूट नहीं सकते हैं.

सब जानते हैं कि लालू प्रसाद यादव अपने छोटे बेटे तेजस्वी यादव को अपनी राजनीतिक विरासत सौंप चुके हैं. इस से पार्टी पर उन की अच्छीखासी पकड़ है और सभी नेता उन की बातों को सुनते हैं. तेजप्रताप में इसी बात की कसक है.

गौरतलब है कि 9 जून को तेजप्रताप यादव ने मीडिया से बातचीत के दौरान अपने भाई तेजस्वी यादव और राजद के प्रदेश अध्यक्ष रामचंद्र पूर्वे के खिलाफ मोरचा खोलते हुए कहा था कि तेजस्वी को उन्होंने राजद का युवराज बनाया, लेकिन इस के बदले उन्हें केवल अपमान ही मिला.

वे इस कदर नाराज थे कि उन्होंने सबकुछ छोड़ कर संन्यास लेने तक का ऐलान कर डाला था. उन्होंने साफ लहजे में कहा था कि पार्टी में उन की कोई सुनता ही नहीं है. कई नेता पार्टी को डुबाने की साजिश में लगे हुए हैं.

बेबाक तेजप्रताप ने राजद के भीतर उमड़घुमड़ रहे काले बादलों की ओर इशारा किया, लेकिन राजद के नेता उसे दूर करने के बजाय तेजप्रताप को चुप कराने की ही कवायद में लगे रहे.

अपना दर्द बयां करते हुए तेजप्रताप यादव ने कहा कि राजद के बड़े नेता उन का फोन तक नहीं उठाते हैं.

वे यहीं तक नहीं रुके. उन्होंने आगे कहा कि राजेंद्र प्रसाद नाम के एक मेहनती कार्यकर्ता को पार्टी में सम्मान देने के लिए रामचंद्र पूर्वे से कहा तो उन्होंने उन की बात ही नहीं सुनी. अपने भाई तेजस्वी से इस बारे में बात की तो भी कोई फायदा नहीं हुआ.

थकहार कर उन्होंने अपने पिता लालू प्रसाद यादव और मां राबड़ी देवी से बात की तो उन की सुनवाई हुई.

तेजस्वी यादव ने बड़ी ही चालाकी के साथ तेजप्रताप यादव के गुस्से को विरोधियों की साजिश करार देते हुए कहा कि कुछ लोग लालू के बेटों के बीच दरार पैदा कराने में लगे हुए हैं. ऐसे लोगों के मनसूबे कभी पूरे नहीं होने वाले हैं.

तेजस्वी यादव ने कहा कि वे अपने भाई तेजप्रताप और पार्टी के नेताओं व कार्यकर्ताओं के साथ मिल कर 2019 के लोकसभा चुनाव और 2020 के बिहार विधानसभा चुनावों की तैयारियों में मजबूती से लगे हुए हैं, जो विरोधियों को हजम नहीं हो रहा है.

तेजस्वी यादव समेत पूरा लालू परिवार तेजप्रताप यादव की बयानबाजी के बाद डैमेज कंट्रोल करने की पूरी कोशिश कर रहा है, लेकिन उन के विरोधियों की बांछें खिली हुई हैं. मौकेबेमौके शंख बजाने वाले तेजप्रताप यादव ने अपने घर में ही सत्ता के संघर्ष का बिगुल फूंक दिया है. इस से अगले लोकसभा चुनाव की तैयारियों और राजग को तोड़ने की कोशिशों में लगे लालू और राजद को घर से ही बड़ा झटका मिला है.

12 मई को तेजप्रताप यादव की शादी राजद के ही एक नेता चंद्रिका राय की बेटी ऐश्वर्या राय से हुई थी. ऐश्वर्या को भी इस विवाद से जोड़ कर देखा जा रहा है.

तेजप्रताप यादव ने भी कहा था कि जब पार्टी में अपनी अनदेखी के सवाल पर उन्होंने अपनी पत्नी से बात की तो उन्होंने कहा कि इस मसले पर उन्हें स्टैंड लेना चाहिए.

राजद सूत्रों की मानें तो पत्नी के बहकावे में आ कर तेजप्रताप यादव ने परिवार में ही हंगामा खड़ा कर दिया है.

राजद के एक नेता दबी जबान में कहते हैं कि बहुत जल्दी तेजप्रताप को अंचरा (आंचल) की हवा लग गई है.

तेजप्रताप यादव आमतौर पर कम बोलते हैं पर जब बोलते हैं तो वे नफेनुकसान की नहीं सोचते हैं. सियासी दांवपेंच उन की समझ से परे हैं. वे बहुत जल्दी तैश में भी आ जाते हैं.

पिछले साल 1 जनवरी के मौके पर उन्होंने अपने सिर पर पगड़ी बांधी थी और उस में मोर का पंख जड़ डाला था. उस के बाद गायों के साथ बांसुरी बजाने लगे थे. उस के बाद खुद को कृष्ण का वंशज बताया था.

सरस्वती पूजा के मौके पर वे हलवाई के साथ चूल्हे के पास जा बैठे थे और लगे जलेबियां छानने. जलेबी छानने के बाद उन्होंने स्कूली बच्चों को जलेबियां खिलाई थीं और खुद भी उन का लुत्फ उठाया था.

पटना पुस्तक मेले में घूमने गए तो कुम्हार का चाक देख कर वे वहीं बैठ गए थे और चाक को घुमा कर मिट्टी के बरतन बनाने लगे थे.

हमेशा सुर्खियों में रहने वाले तेजप्रताप यादव साल 2016 में गौ हत्या पर रोक लगाने की मांग कर अपनी पार्टी के लिए मुसीबत खड़ी कर चुके हैं.

राज्य में मंत्री रहते हुए वृंदावन पहुंच कर उन्होंने केंद्र की मोदी सरकार से अपील की थी कि नोटबंदी की तरह से गायों की हत्या पर भी रोक लगाई जाए.

उन्होंने यह भी कहा था कि बिहार में शराबबंदी के बाद गौ हत्या पर भी रोक लगानी चाहिए. उन की इस बयानबाजी से उन के पिता लालू प्रसाद यादव सकते में आ गए थे.

गौरतलब है कि लालू प्रसाद यादव का बड़ा मुसलिम वोट बैंक है और तेजप्रताप ने गाय को मारने पर रोक लगाने की कह कर मुसलिमों को नाराज कर डाला था.

अकसर अपने माथे पर चंदन का टीका लगा कर घूमने वाले 30 साल के तेजप्रताप यादव राजद की टिकट और महुआ विधानसभा सीट से पहली बार 2015 में विधायक बने थे. बिहार में महागठबंधन की सरकार में उन्हें स्वास्थ्य मंत्री बनाया गया था. उस समय भी वे अपने छोटे भाई तेजस्वी यादव को उपमुख्यमंत्री बनाए जाने से खूब नाराज हुए थे.

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फर्जीवाड़े में फंसा इंजीनियर

उत्तर प्रदेश में एक इंजीनियर पकड़ा गया है जिस के पास 200 करोड़ की दौलत है जो उस ने दिल्लीनोएडा के पास जेवर के इलाके में इंजीनियर के पद पर रहते हुए कमाई थी. उस ने 2 शादियां कर रखी थीं पर दोनों से हुए बच्चों के एकजैसे नाम रखे हुए थे ताकि हेराफेरी में आसानी रहे. उस ने बीसियों कंपनियां खोल रखी थीं जबकि वह सरकारी पद पर है.

सरकार में इतनी भयंकर रिश्वत लेने के बाद कोई पकड़ा जाए, यह सरकार का सब से बड़ा निकम्मापन है. यह साफ करता है कि हमारी सरकार को अपनी नाक तले अपराधों का कुछ पता नहीं होता, वह नागरिकों को जुर्म होने से पहले कैसे बचा सकती है? इतनी बड़ी संपत्ति जिस में आलीशान मकान, विदेशी गाडि़यां, ठाठ की जिंदगी जीता अफसर हो और सरकार को दिखे ही न, ऐसा कैसे हो सकता है और हो सकता है तो समझ लें कि सरकार पर भरोसा ही नहीं करा जा सकता है.

सरकार बड़ी शान से इनकम टैक्स की इस रेड के बारे में बताती है जिस में यह पैसा निकला पर सवाल है कि क्या यह नोटबंदी के बाद ही जमा किया गया पैसा है? यदि नहीं तो नोटबंदी का क्या फायदा हुआ जिस पर नरेंद्र मोदी ने कहा था कि इस से काला धन खत्म हो जाएगा? क्या सरकारी अफसरों के हाथों में काला धन काला नहीं है?

जिस देश में आम जनता पैसेपैसे को तरस रही हो वहां महज 50-60 हजार मासिक वेतन पाने वाला इंजीनियर 200 करोड़ का मालिक बन जाए और वर्षों तक किसी को खबर न हो, यह अगर हो रहा है तो साफ है कि इस में मिलीभगत 5-7 की नहीं सैकड़ों अफसरों और बाबुओं की है जिस में हरेक ने मोटा पैसा बनाया होगा. इस पोस्ट पर कहीं से पैसा लगातार बरसता होगा वरना 200 करोड़ रुपए कमाना आसान तो नहीं है. यह तो सभी के साथ मिल कर कमाने होते हैं और यह बात दूसरी है कि यह इंजीनियर पकड़ा गया है.

कुछ साल पहले यादव सिंह नाम का इंजीनियर भी पकड़ा गया था पर पूरे मुकदमे के फैसले का इंतजार किए बिना सुप्रीम कोर्ट ने न जाने किस कारण उसे हाल में जमानत पर भी रिहा कर दिया. यह ब्रजपाल चौधरी सहायक इंजीनियर भी जल्दी ही छूट जाएगा, यह इस देश के साथ वादा है. कोई काला धनपति नहीं बच पाएगा यह मंचों पर बोलने वाले बोलते रहें पर उन्हें शायद मालूम रहता है कि जिस ने मंच बनवाया था वह पक्का रिश्वतखोर ही था और जनता को बहलाफुसला या धमका कर वसूलता है.

यह तो देश का दस्तूर है. यहां पैसा मेहनत से नहीं पद से बनता है और इसीलिए सरकारी नौकरी या सरकारी नेतागीरी के पीछे सब भागते हैं. यहां काम की पूजा नहीं होती पद की होती है.

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